मन में हौसला हो और कुछ कर दिखाने का जज्बा तो कुछ भी नामुमकिन नहीं. अलबत्ता यह जज्बा और जोश पोगापंथियों को ठोकर मार खुद को नई पहचान देने की हो तो बात ही क्या.

कहते हैं, भारत जैसे देश में जहां अधिकांश लोग अब भी धर्म, पूजापाठ, अंधविश्वास के आगे हथियार डाल कर अपना भविष्य बेकार कर लेते हैं, वहीं महाराष्ट्र की रहने वाली प्रांजल पाटिल ने आंखों की रोशनी जाने के बाद न तो हिम्मत हारी और न ही किसी की दया का पात्र बन कर जीवन काटने जैसा रास्ता अपनाया. उन्होंने पढाई से दोस्ती कर ली, किताबों से बातें करना सीख लिया.

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