Download App

गुड़ के हैं अनेको लाभ

गुड़  का नाम सुनते ही मुंह में पानी और मन में मिठास आ जाती है, मन-मस्तिष्क को भाने वाला गुड सेहत के लिए फायदेमंद है. आयुर्वेद में गुड़ को अत्यन्त गुणवान, आयु को बढ़ाने वाला और शरीर को निरोग तथा यौवन को स्थिर रखने वाला कहा गया है. आयुर्वेद के अनुसार गुड़ क्षारीय, भारी, सि्ग्ध होता है. ठंड के दिनों में शक्तिवर्ध्दक है, और मूत्र की रुकावटों को दूर करता है. गुड़ जितना पुराना हो उतना अधिक गुणों से युक्त होता है.गुड़ में पाया जाने वाला क्षारीय गुण रक्त की अम्लता को दूर करता है। मेहनतकश एवं खिलाड़ियों के लिये तो यह किसी वरदान से कम नहीं है.

” गुड़ का उपयोग मूलतः दक्षिण एशिया में किया जाता है. भारत के ग्रामीण इलाकों मे गुड़ का उपयोग चीनी के स्थान पर किया जाता है. गुड़ लोहतत्व का एक प्रमुख स्रोत है और रक्ताल्पता (एनीमिया) के शिकार व्यक्ति को चीनी के स्थान पर इसके सेवन की सलाह दी जाती है.गुड़ के एक अन्य हिन्दी शब्द जागरी का प्रयोग अंग्रेजी में किया जाता है. ”

ये भी पढ़ें-सिर्फ मोबाइल ही नहीं दूसरी डिवाइस भी हैं सेहत के लिए खतरनाक

शक्कर के अधिक सेवन करने से कई प्रकार की बीमारियां हो जाती हैं, जबकि गुड़ के प्रयोग से कुछ नहीं होता.गुड़ में कई पौष्टिक तत्व विद्यमान रहते हैं.रासायनिक विश्लेषणों से यह बात सामने आयी है कि अनेक खाद्योपयोगी घटक तथा लोहा, कैल्शियम, गंधक, पोटेशियम एवं विटामिन आदि गुड़ में भरपूर मात्रा में उपलब्ध है. गुड़ में पैनथीनिक एसिड, नायसिन, थियासिन, रीबोप्लेविन, पायरिडोक्सिन, बायोटिन, फालिक एसिड तथा आइनोसिटल इतनी मात्रा में पाए जाते हैं कि यह एक प्रमुख सामग्री के रूप में गिना जाता है.गुड़ के प्रत्येक 100 ग्राम भाग में प्रोटीन 0.4 ग्राम, वसा 0.1 ग्राम, खनिज 0.6 ग्राम, कैल्शियम 80 मि.ग्रा, फास्फोरस 40 मि.ग्रा, लोहा 11.4 मि.ग्रा आदि पोषक तत्व होते हैं. हमारे भोजन में मक्का, ज्वार, बाजरे की रोटी के साथ गुड़ खाया जाता है.आजकल तो शादियों में बड़े-बड़े भोज आयोजित किये जाते हैं तथा वहां पर भी मक्का, बाजरे की रोटी के साथ गुड़ का स्टाल लगाया जाता है.हृदय विशेषज्ञ नीरज सिन्हा का मानना है कि गुड़ की पपड़ी या गुड़ की चीज खाने से हृदय मजबूत होता है.

गुड़ में कैल्शियम, मैंगनीज और मेगनीशियम होने के कारण उसका औषधीय महत्व भी बहुत है.तो आईये जानते है, इसके महत्वपूर्ण गुणों के बारे में …

* प्रसव के पश्चात स्त्रियों को गुड़ देना प्राचीनकाल से चला आ रहा है.शिशु जन्म के बाद गर्भाशय की पूर्ण रूप से सफाई न होने पर अनेक विकार होने की संभावना बनी रहती है.

ये भी पढ़ें-सावधान सिर पर सींग निकाल देता है मोबाइल

* शिशु के जन्म के 3 दिन तक प्रसूता को गुड़ के पानी के साथ सौंठ दी जाती है. गुड़ ग्लूकोज के समान ही एक पौष्टिक आहार है.इसमें कैलोरी भी भरपूर मात्रा में पायी जाती है.

* वैज्ञानिकों एवं चिकित्सकों का कहना है कि यौवन क्षमता बनाए रखने तथा दीर्वजीवन के लिये गुड़ का प्रयोग अच्छा रहता है.

*जो बच्चे रिकेट दांत के क्षय या कैल्शियमहीनता की दूसरी बीमारियों से पीड़ित हो उनको हमेशा चीनी की जगह पर्याप्त गुड़ देना चाहिये.

* बढ़ते हुए बच्चों के लिये यह एक अत्यन्त उत्तम खाद्य है.

* यदि बच्चों को उचित मात्रा में दूध न मिले तो उन्हें कुछ मात्रा में गुड़ देना चाहिए .

* पतले दस्त लगने पर एवं तेज बुखार के कारण शरीर में पानी की कमी हो जाने पर गुड़ के पानी में नींबू का रस मिलाकर देने से तत्काल राहत मिलती है क्योंकि गुड़ ग्लूकोज के समान कार्य करता है.

* भोजन के साथ गुड़ खाने से थकान दूर होती है.

ये भी पढ़ें-पीरियड्स का न आना ओवरी कैंसर का संकेत तो नहीं

* गुड़ और काले तिल के लड्डू बच्चों को देने से बच्चों का बिस्तर में पेशाब करना दूर हो जाता है.

* भोजन के बाद गुड़ खाने से गैस नहीं बनती है। सर्दी, जुकाम या कफ बहुत बनता हो तो अदरक व गुड़ बराबर मात्रा में दिन में तीन बार लेने से आराम मिलता है.

* दुधारु पशुओं को गुड़ के साथ हिमालिया बत्तीसा देने से  वह स्वस्थ रहते हैं। पाचन क्रिया ठीक रहती है, तथा दूध में भी बढ़ोत्तरी होती है.इसके अलावा पशुओं को पानी पिलाते समय तगारी या बाल्टी में थोड़ा आटा व थोड़ा सा गुड़ व मामूली नमक डालकर पिलायें, पशु बहुत ही रूचि से पानी पीता है.

काश ऐसा हो पाता भाग-4

सुमन के मम्मीपापा को इस में आपत्ति नहीं थी मगर उन्होंने इस के पूर्व सुधाकर से मिलने की इच्छा जताई.

सुधाकर मथुरा जा कर सुमन के मम्मीपापा से मिल आया. सुमन के पापा तब तक नहीं जान पाए थे कि सुधाकर उन्हीं के मित्र विमल शर्मा का पुत्र है, जिन को लोग उन के शत्रु के रूप में जानते हैं. उन्हें अपनी बेटी के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश थी, जो घरबैठे पूर्ण हो रही थी.

यह राज तो तब खुला जब सुधाकर के मम्मीपापा अपने बेटे के विवाह के लिए औपचारिक रस्म निभाने मथुरा आए.

थोड़ी देर के लिए तो वे दोनों अवाक् रह गए कि वे क्या देखसुन रहे हैं. और उन्हें क्या और कैसे बात करनी है.

‘मुझे माफ कर दो, विमल,’ आखिरकार सुमन के पापा रुंधे कंठ से बोले, ‘15 साल पहले की गई गलती का एहसास मुझे समय रहते हो गया था. मगर समय को वापस लौटाना कहां संभव है. अगर वह हादसा हो जाता जिसे करने की मैं ने कोशिश की थी, तो दोनों ही परिवार बरबाद हो जाते.’

‘अब उस बात को जाने भी दो.’

‘मैं सुमन का विवाह सुधाकर से करूं, यही मेरा प्रायश्चित्त होगा.’

‘अरे, यह प्रायश्चित्त की नहीं, प्रसन्नता की बात है. मैं अपने बेटे के लिए तुम्हारी बेटी का हाथ मांगने आया हूं,’ विमल शर्मा उन्हें गले लगाते हुए बोले, ‘उस दुस्वप्न को तो मैं कब का भूल चुका हूं.’

विवाह की रस्म पूर्ण होने के कुछ दिन बाद वह सुधाकर के घर चली आई थी.

‘‘अरे सुमन, कहां खो गईं,’’ सुधाकर बोला तो उस की तंद्रा टूटी, ‘‘जरा बाहर का नजारा तो देखो, कितना खूबसूरत है.’’

वह शीघ्रतापूर्वक संभल कर चैतन्य हुई. गाड़ी के शीशे से वह बाहर प्रकृति का नजारा देखने लगी. रास्ते की ढलान पर गाड़ी मंथर गति से आगे बढ़ रही थी. जरा सी फिसलन हुई नहीं, जरा सा चूके नहीं कि सैकड़ों फुट गहरी खाई में गिरने का खतरा था.

जैसा कि भय था, वही हुआ. बारिश अब बर्फबारी में बदल चुकी थी. रूई के फाहे के समान बर्फ के झोंके गिर रहे थे. देखते ही देखते पहाड़ों और घाटियों की हरियाली बर्फ की सफेद चादर से ढक गई थी. चारों तरफ दूरदूर तक निशब्द सन्नाटा था. वातावरण पर जैसे एक ही सफेद रंग पुत सा गया था. बर्फ की परत जमी कंक्रीट की सड़क पर गाडि़यों का काफिला बैलगाड़ी की गति से आगे बढ़ रहा था. जैसे किसी आसन्न खतरे का आभास हो, वैसी चुप्पी सब के चेहरे पर चस्पां थी. चूंकि गाडि़यों के ड्राइवर स्थानीय थे और एक्सपर्ट थे, यही एक बात आश्वस्त करने वाली थी कि दिक्कत नहीं आएगी.

रास्ते में कहींकहीं कुछ अर्द्धवृत्ताकार टिन के घर दिखे, जिन के बाहर सन्नाटा पसरा था. वहीं कहीं कुछ धर्मचक्र घुमाते बौद्ध भिक्षु दिखे. मंत्र लिखित सफेद पताकाओं की शृंखलाएं भी पहाड़ों और घाटियों के बीच दिख जाती थीं, जो हवाओं से लहराते हुए रहस्यमय वातावरण का सृजन करती प्रतीत होती थीं.

रास्ते में छोटेनाटे, मगर हृष्टपुष्ट कदकाठी के स्थानीय स्त्रीपुरुष दिखे, जो सड़क के निर्माण कार्य में व्यस्त थे. रबर के गमबूट और दस्ताने पहने, पत्थर तोड़ते और बिछाते हुए स्थानीय लोग. कभी खाली हाथ तो कभी बेलचोंकांटों की मदद से काम करते. भीमकाय डोजरक्रशर आदि कहीं पत्थरों में छेद करते तो कहीं काटतेतोड़ते, कहीं हटाते और डंपरों में भरते अथवा खाली करते थे.

जीवन में रोमांच क्या होता है और हजारों फुट ऊपर बर्फ से ढके पहाड़ों का जीवन कितना कठिन होता होगा, यह उसे अब समझ में आने लगा था. रास्ते के किनारे पैरों में गमबूट और हाथों में रबर के दस्ताने पहने रास्ते को ठीक करने वाले स्थानीय मजदूर इस जोखिम भरे मौसम में भी काम कर रहे थे.

सड़क के कार्यरत स्थल पर पहाड़ी कुत्ते रास्ते की बर्फ में ही कुलेल कर रहे थे. एक स्थान पर भैंसे समान याक पर सामान लादे कुछ स्थानीय लोग उधर से गुजर गए.

ओ, तो यही याक है. इसे देखना भी एक सुखद संयोग था.

बादलों के बीच सूर्य पता नहीं कहां छिप गया था. बर्फबारी रुकने का नाम नहीं ले रही थी. रास्ते की फिसलन बढ़ती जा रही थी. एक स्थान पर गाडि़यों का काफिला रुका तो सभी गाडि़यों के ड्राइवर गाड़ी के पिछले पहियों में लोहे की जंजीर पहनाने लगे ताकि फिसलन का दबाव कम हो. यह भी एक अलग रोमांचक अनुभव था.

लगभग 9 बजे रात में गाड़ी ने जब गंगटोक शहर की सीमा में प्रवेश किया तो सभी की जान में जान आई. इधर हिमपात के बजाय वर्षा हो रही थी. गाडि़यों की गति में अब तीव्रता आ गई थी. एक खतरनाक अनुभव से गुजर कर अब सभी जैसे चैन की सांस ले रहे थे.

होटल पहुंच कर उन्होंने कपड़े बदले. होटल का नौकर खाना लगाने लगा.

‘‘बहुत दिक्कत हुआ न साहेब,’’ वह बोला, ‘‘अचानक ही मौसम खराब

हो गया. यहां अकसर ही ऐसा हो

जाता है.’’

‘‘हां भई, बड़ी मुश्किल से जान बची,’’ सुधाकर बोला, ‘‘बर्फ भरे रास्ते पर गाड़ी का चलना बहुत मुश्किल था. मुझे लगा कि अब हमें वहीं सड़क के किनारे रात काटनी होगी. अगर ऐसा होता तो हमारी तो कुल्फी ही जम जाती.’’

वह चुपचाप बाहर का दृश्य देख रही थी. बारिश बंद हो चुकी थी और सितारों से सजे आकाश के नीचे गंगटोक शहर  कृत्रिम रोशनी में झिलमिला रहा था. वैसे भी पहाड़ी शहर होते ही ऐसे हैं कि हमेशा वहां दीवाली सी रोशनी का आभास होता है. मगर वहां का नजारा ही कुछ अलग था. वहां के ऊंचेऊंचे दरख्त हरियाली से भरे पड़े थे.

‘‘अरे, तुम कुछ बोलो भी,’’ सुधाकर बोला, ‘‘लगता है तुम काफी डर गई हो.’’

‘‘डर तो गई ही थी, सुधाकर,’’ वह बोली, ‘‘फिलहाल मैं नाथुला की सीमाओं के बारे में सोच रही हूं, जहां भारतीय और चीनी सैनिक आमनेसामने खड़े थे. हम तो वहां से सुरक्षित निकल कर यहां आ गए. मगर उस बर्फबारी में भी वे अपनी सीमाओं पर डटे होंगे. मैं यह सोच रही हूं कि इस परिस्थिति में भी क्या उन्हें अपने परिवार की याद नहीं आती होगी, जैसे कि हमें आई थी?’’

‘‘क्यों नहीं याद आती होगी, सुमन,’’ सुधाकर गंभीर स्वर में बोला, ‘‘तमाम प्रशिक्षण के बावजूद आखिर वे भी मनुष्य हैं. उन के सीने में भी दिल धड़कते हैं. और उन के मन में भी मानवीय विचार अंगड़ाई लेते होंगे. उन के हृदय में भी भावनाएं हैं. मगर कर्तव्य सर्वोपरि होता है, इस का एहसास उन्हें है. इसी कारण हम यहां सुरक्षित हैं. देश और समाज इसी तरह आगे बढ़ता और सुरक्षित रहता है. तुम्हारे एक चाचाजी भी तो इसी प्रकार के सैनिक थे.’’

सुमन का मन एक गहरी टीस से

भर गया.

‘‘हमारे और तुम्हारे परिवार के बीच में भी एक खटास थी, जो हम ने खत्म कर दी. क्या इसी प्रकार राष्ट्रों के बीच की यह खटास खत्म नहीं हो सकती?’’

‘‘क्यों नहीं हो सकती,’’ वह बोला, ‘‘स्वार्थ और संघर्ष की व्यर्थता का एहसास होते ही दूरियां खत्म होने लगती हैं,’’ सुधाकर उस की बगल में आ कर खड़ा हो गया था, ‘‘काश ऐसा हो पाता, जैसा कि तुम सोच रही हो.’’

बाहर बारिश थम गई थी. बादल छंट गए थे और आकाश सितारों से सज गया था. धुला हुआ गंगटोक शहर अब कृत्रिम प्रकाश से और चमक उठा था.

काश ऐसा हो पाता

क्यों सुलग रही है दिल्ली?

बीती 23 फरवरी से राजधानी दिल्ली में शुरू हुई हिंसा में इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय तक 22 लोगों की मौत हो चुकी थी और 250 लोग जख्मी हैं. जहां तक मौतों का सवाल है, अब तक जीटीबी अस्पताल में 21 और जेपी अस्पताल में 1 मौत हुई है. अब हालात काबू में करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल पर है. गृहमंत्री अमित शाह दिल्ली के हालात पर जल्द ही रिपोर्ट पेश करेंगे.

मगर मूल सवाल यह है कि दिल्ली में किसी भी संकट से निपटने के लिए मौजूद तमाम संसाधनों के बावजूद आखिर इस कदर हिंसा हुई कैसे? क्या इसके लिए सिर्फ कपिल मिश्रा जैसे छुटभैय्ये नेता और उनके उकसाऊ भाषण जिम्मेदार हैं या इसके लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक की घोर लापरवाही जिम्मेदार है? या फिर हिंसक उग्रता को जांचने परखने के लिए दिल्ली को एक मॉडल की तरह इस्तेमाल किये जाने की यह देन है?

ये भी पढ़ें- चार दिनों से सुलगती आग में जल रही है दिलवालों की दिल्ली

इसमें कोई दो राय नहीं है कि दिल्ली में जनसंख्या के अनुपात में पुलिसबलों की संख्या काफी कम हैलेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि महज 1484 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले दिल्ली शहर में 84,000 से ज्यादा पुलिसबल हैजिसमें करीब 50,000 पुलिसबल हमेशा सक्रिय और सेवा में रहता है. क्या इतने बड़े पुलिस दल को भी 5 से 6 कालोनियों में भड़की दंगों को काबू में करना मुश्किल थावह भी तब जब उत्तर पूर्व दिल्ली की इन चार पांच कालोनियों को छोड़कर पूरी दिल्ली में शांतिपूर्ण माहौल था.

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीआईजी पुलिस तथा चर्चित विचारक विभूति नारायण राय ने बहुत साल पहले एक बात कही थी कि अगर सरकार और पुलिस न चाहे तो दंगे भड़क तो सकते हैंलेकिन वो फैल नहीं सकते.

दिल्ली में पिछले करीब 3 महीनों से जिस तरह की स्थितियां धीरे-धीरे करके गढ़ी गई हैं,उससे तो लगता है कि यहां साम्प्रदायिक तनाव विस्तारित नहीं हुआ बल्कि एक तरह से उसे पूरी मेहनतमशक्कत के साथ जमीन में बोया गया है, जिसकी अब जहरीली फसल तैयार हो चुकी है. दिल्ली में पिछले तीन दिनों में देखते ही देखते जिस तरह स्थितियां काबू से बाहर हुईंवह दंगों के फैलने और बढ़ने का एक क्लासिक उदाहरण है. शायद देश के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब थोड़े से इलाके में साम्प्रदायिक तनाव के चलते दो समुदायों के बीच रह-रहकर एक हजार राउंड से भी ज्यादा गोलियां चलायी गई हैं. याद रखिए यह आंकड़ा बहुत खतरनाक इसलिए भी है क्योंकि इतनी गोलियां महज 48 घंटे के अंदर चलीं. ऐसा अब के पहले कभी नहीं हुआ मुंबई जैसे भयानक दंगों के समय भी.

ये भी पढ़ें- भारत भूमि युगे युगे: इन से भी न हुआ

लगता है दिल्ली की इस अराजक हिंसा के बाद अब दंगाइयों का गोली चलाना आम हो जाएगा.आखिर ये स्थितियां क्यों और कैसे बनीं ? इसके पीछे किसकी सुनियोजित साजिश या लापरवाही थीक्या यह हिंसा और बेकाबू में हुई स्थितियां राजनीतिक फायदा उठाने के लिए एक तयशुदा योजना के साथ घटित हुईंदिल्ली में जैसा कि हम सभी जानते हैं कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्री की है.गृह मंत्रालय के अधीन देश के अंदर और देश के बाहर सक्रिय रहने वाली खुफिया एजेंसियां हैं तथा और भी जबरदस्त नेटवर्क हैं. इसके बाद भी यह किसकी चूक थी कि एक मामूली सा तनाव देखते ही देखते इतना उग्र हो गया.

अगर सारी स्थिति को क्रमिकता के नजरिये से देखें तो साफ पता चलता है कि दिल्ली में जो खौफनाक स्थितियां पैदा हुईंवह स्वतःस्फूर्त नहीं थींउन्हें कोशिशन पैदा किया गया था और इसमें हर राजनीतिक पार्टी की अपने-अपने स्तर की भूमिका थी. केंद्रीय गृह मंत्रालय जिसके अंतर्गत दिल्ली की पुलिस तथा कानून व्यवस्था आती हैवह केंद्र सरकार अगर पहले से इस भयावह स्थिति का सही आंकलन कर पाती तो इस तरह की स्थितियां नहीं बनतीं. लेकिन सिर्फ केंद्रीय गृह मंत्रालय और अमित शाह को ही इस पूरी घटना का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

आखिर दिल्ली के अब तक के सर्वाधिक लोकप्रिय और जनता के लिए उनके हितैशी के रूप में मशहूर केजरीवाल ने इन दंगों को इस स्थिति तक न पहुंचने देने के लिए क्या कियामाना कि उनके पास पुलिस की बागडोर नहीं हैलेकिन पुलिस से ज्यादा कारगर दंगों के समय राजनेताओं का जमीन में उतरना होता है.

ये भी पढ़ें- जाफराबाद और चांदबाग में भी CAA के खिलाफ प्रदर्शन

क्या मुख्यमंत्री केजरीवाल अपने विधायकोंमंत्रियों के साथ तनाव वाली सड़कों में उतर नहीं सकते थे? अगर वह वाकई ऐसा करते क्या तब भी स्थितियां ऐसी होतीं? अगर कांग्रेस तथा दूसरी विपक्षी पार्टियों के लोग भी इस तनावपूर्ण स्थिति की संवेदना को समझते हुए लोगों के बीच पहुंचते तो क्या दंगाई मनमानी कर पाते? हकीकत तो यह है कि जिन इलाकों में पुलिस को स्थिति काबू में करनी थी, वहां कई जगहों पर पुलिस ने अपनी घिनौनी हरकतों से खुद साम्प्रदायिक उन्माद का हिस्सा बनी हुई थी.

दीपिका के बाद तापसी भी हुईं ट्रोलिंग का शिकार, रिलीज से पहले ही शुरू हुआ ‘थप्पड़’ का बॉयकॉट

दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘छपाक’ 10 जनवरी को पर्दे पर आई थी. इस फिल्म की कहानी एसिड पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर आधारित थी. फिल्म की कहानी बेहद ही शानदार थी सभी को उम्मीद थी यह फिल्म पर्दे पर शानदार प्रर्दशन करेगी, लेकिन दीपिका जेएनयू में हो रहे प्रोटेस्ट का हिस्सा बनी जिसका असर उनके फिल्म पर दिखा,लोगों ने इस फिल्म का बॉयकॉट करना शुरू कर दिया. यहीं कारण था जिस वजह से फिल्म पर्दे पर फ्लॉप हो गई. कुछ ऐसा ही हुआ तापसी पन्नू की फिल्म ‘थप्पड़’ के साथ भी

दरअसल, तापसी की फिल्म ‘थप्पड़’ 28 फरवरी को पर्दे पर रिलीज हुई जबकी इससे पहले ही लोग इस फिल्म के खिलाफ कई तरह के सवाल करने लगे थें. इस फिल्म के खिलाफ बॉयकॉट के नारे लगाने शुरू हो गए थे. इसके पीछे की वजह थी तापसी का प्रोटेस्ट में जाना.

ये भी पढ़ें-इंडिया के बाद न्यूयॉर्क में भी चला अनुपम खेर का जादू, देखें PHOTOS

मुंबई में हुए प्रोटेस्ट में तापसी ने हिस्सा लिया था जिसके बाद लोग उनके खिलाफ हो  गए थें. तापसी ने प्रोटेस्ट के दौरान कहा था मैं CAA के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी क्योंकि इसके बारे में मैं ज्यादा पढ़ी नहीं थी लेकिन जेएनयू में जो लड़ाई का वीडियो देखा था वह बहुत ही शर्मनाक था.

 

View this post on Instagram

 

A heart laugh! Our most common expression lately! #Thappad

A post shared by Taapsee Pannu (@taapsee) on

इस बात से तापसी लाइमलाइट में आ गई थीं. लोग उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिए थे. वहीं तापसी ने इस बात पर सफाई देते हुए कहा है ‘व्यक्तिगत राय औऱ प्रोफेशनल लाइफ दोनों अलग-अलग चीज है. दोनों की तुलना करना गलत है. आगे उन्होंने कहा किसी भी हैशटैग  को  ट्रेंड  करने के लिए 1000-2000 ट्वीट्स  से अगर किसीको लगता है वाकई किसी फिल्म पर फर्क पड़ता है तो यह गलत है. इससे मेरे फिल्म पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. जिसे मेरी फिल्म देखनी होगी वह जाकर जरूर देखेंगे. फिल्म को राजनीतिक विचारधारा पर तय करना गलत है.’

ये भी पढ़ें-Film Review: जानें कैसी है फिल्म ‘दूरदर्शन’, यहां पढ़ें रिव्यू

तापसी अपने बेबाक अंदाज की वजह से आए दिन ट्रोलर्स का सामना करती हैं. दिल्ली इलेक्शन के दौरान भी उन्हें कुछ ट्रोलर्स का सामना करना पड़ा था हालांकि तापसी बहुत स्मार्ट तरीके से उनका जवाब देती हैं. अगर काम की बात करें तो तापसी कई अळग-अलग प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं.

Film Review: जानें कैसी है फिल्म ‘दूरदर्शन’, यहां पढ़ें रिव्यू

रेटिंग: डेढ़ स्टार

निर्माताः रितु आर्या व संध्या आर्या

निर्देशकः गगन पुरी

कलाकारः माही गिल,मुनरिषि चड्ढा,डौली अहलूवालिया, सुप्रिया शुक्ला

अवधिःदो घंटे दस मिनट

फिल्मकार गगनपुरी ने आधुनिक रिश्तों को तीस वर्ष पहले के दूरदर्शन व उस पर प्र्रसारित होने वाले कार्र्यक्रमों के साथ जोड़कर हास्य के साथ रिश्तों के ताने-बाने चित्रित करने जैसा बेहतरीन विषय चुना है.जहां अत्याधुनिक परिवार के  सभी सदस्य,जो कि अश्लील साहित्य में डूबे रहते हैं,वह भी तीस वर्ष बाद कोमा से अपनी दादी के जागने पर खुद को उसी माहौल में ढ़ालते हैं.मगर कमजोर पटकथा के चलते वह एक बेहतरीन फिल्म बनाने से पूरी तरह चूक गए.

ये भी पढ़ें-इंडिया के बाद न्यूयॉर्क में भी चला अनुपम खेर का जादू, देखें PHOTOS

कहानीः

यह कहानी सुनील (मनु ऋषि चड्ढा)के परिवार की है.सुनील की पत्नी प्रिया(माही गिल)उनसे अलग रहती है और तलाक लेना चाहती है.सुनील अपने किशोर वय के बेटे सनी (शार्दुल राणा)व बेटी के साथ रहते हैं.सनी को अपने पिता के मित्र व पड़ोसी(राजेश शर्मा)की बेटी ट्विंकल( महक मनवानी)से प्यार करता है.तो वहीं सनी अपने मित्र बंटी के साथ अश्लील साहित्य पढ़ता रहता है.सुनील की मां दर्शन कौर (डॉली अहलूवालिया) तीस साल से कोमा में हैं.एक दिन घर के अंदर सुनील की मां दर्शन कौर के कमरे में बैठकर बंटी,सनी को अश्लील कहानी पढ़कर सुनाता है.विमला की कहानी सुनकर तीस वर्षों से कोमा में पड़ी दादी दर्शन कौर (डॉली अहलूवालिया)कोमा से उठ खड़ी होती है.इतने वर्षों से कोमा में पड़ा रहने की जानकारी पाकर कोई सदमा ना लगे,इसके डर से उनका बेटा सुनील (मनु ऋषि चड्ढा) और उसकी पत्नी प्रिया (माही गिल) उनके इर्द-गिर्द 90 के दशक का माहौल बनाते हैं.सुनील का बेटा सनी व बेटी आपसी मतभेद भुलाकर दादी की सेवा में जुट जाते हैं.अपने कमरे में ज्यादातर समय बिताने वाली दादी अपने जमाने वाले दूरदर्शन लगाने की बात करती हैं. दादी एक एक करके चित्रहार से लेकर दूसरे कार्यक्रम देखने की फरमाइश करती हैं.सभी मिलकर दादी के लिए खुद शूटिंग करके उस जमाने के कार्यक्रम तैयार करते हैं. सिर्फ टीवी ही नहीं बल्कि उनके परिवार के लोगों को खुद को भी तीस वर्ष पहले के जमाने के अनुसार ढलना पड़ता है.परिणामतः पोते पोती घर के नौकर,तो सुनील और प्रिया स्कूल जाने वाले विद्यार्थी के रूप में पेश आते हैं,जिनकी जल्द शादी होने वाली है.पर एक दिन दादी के सामने सच आ ही जाता है.

ये भी पढ़ें-प्रियंका से दस साल छोटे निक जोनस का बयान- रिश्ते में उम्र से नहीं पड़ता फर्क

लेखन व निर्देशनः

फिल्मकार ने हास्यप्रद फिल्म के लिए एक बेहतरीन विषय को चुना,मगर वह इसके साथ न्याय नहीं कर पाए.जबकि वह इस विषय पर बेहतरीन फिल्म बना सकते थे.मगर फिल्म की शुरूआत अश्लील दृश्यों व अश्लील किताबों के साथ शुरू कर उन्होेने फिल्म को मटियामेट कर डाला.फिल्म की गति बहुत धीमी है,शायद उन्होने इसे नब्बे के दशक की फिल्म के रूप में धीमी गति प्रदान की है.वह रोचक किरदारों को भी सही ढंग से चित्रित नही कर पाए.फिल्मकार चाहते तो नब्बे के दशक के माहौल को और ज्यादा कॉमिक ढंग से दर्शा सकते थे.फिल्म में जितनी तेज तर्रार दादी हैं,उसे देखते हुए सुनील और प्रिया का स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थी के रूप में ख्ुाद को पेश करना गले से नहीं उतरता.फिल्म के कुछ दृश्य जरुर चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान लाते हैं.फिल्म का क्लायमेक्स तो बहुत ही ज्यादा गड़बड़ है.

अभिनयः

सुनील के किरदार में मनु ऋषि चड्ढा और उनके दोस्त के किरदार में राजेश शर्मा ने बेहतरीन अभिनय किया है.मां के लिए कुछ भी करने को तत्पर बेटे के रूप में मनु ऋषि चड्ढा काफी कन्विंसिंग लगे हैं. दादी के किरदार में डौली अहलूवालिया बेहद चार्मिंग नजर आयी.प्रिया के किरदार में माही गिल ठीक ठाक हैं.अन्य कलाकारों ने प्रभावित करने वाला अभिनय नहीं किया है.

मेरे पति के एक रिश्तेदार अजीब नजरों से मुझे देखते हैं और छूने का प्रयास भी करते हैं, मुझे क्या करना चाहिए

सवाल
मेरे पति के एक दूर के रिश्तेदार का हमारे घर में काफी आनाजाना है. वे मेरे पति के काफी करीब हैं. और वक्तबेवक्त कभी भी आ धमकते हैं. कई बार मुझे उन का रवैया सही नहीं लगता. वे कुछ अजीब नजरों से मेरी तरफ देखते हैं और कई दफा जबरन मुझे स्पर्श करने का प्रयास भी करते हैं. मैं पति से कुछ कह नहीं पाती यह सोच कर कि पता नहीं वे क्या सोचेंगे. 1-2 बार तो ऐसा मौका भी आया जब वे उस वक्त आ पहुंचे जब पति औफिस में और ससुरजी बाहर होते हैं, मैं घर में अकेली होती हूं. मुझे बहुत डर लगता है.

जवाब
डरने या घबराने की कोई बात नहीं है. आप को सब से पहले अपने पति से ये सारी बातें शेयर करनी चाहिए. पति से कहें कि वे उस रिश्तेदार को ताकीद कर दें कि फोन करने के बाद ही वे आप के घर आया करें. पति घर में न हों तो आप स्वयं कोई बहाना बना कर उन्हें दरवाजे से ही वापस भेज सकती हैं. उस रिश्तेदार से किसी भी तरह दूरी बढ़ा लें ताकि वह अकसर आ कर आप को परेशान न करे. सिर्फ पति से ही नहीं, अपने ससुर से भी इस बारे में चर्चा जरूर करें.

ये भी पढ़ें…

एक दिन का बौयफ्रैंड

‘‘क्या तुम मेरे एक दिन के बौयफ्रैंड बनोगे?’’ उस लड़की के कहे ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे. मैं हक्काबक्का सा उस की तरफ देखने लगा. काली, लंबी जुल्फों और मुसकराते चेहरे के बीच चमकती उस की 2 आंखें मेरे दिल को धड़का गईं. एक अजनबी लड़की के मुंह से इस तरह का प्रस्ताव सुन कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.

मैं अच्छे घर का होनहार लड़का हूं. प्यार और शादी को ले कर मेरे विचार बिलकुल स्पष्ट हैं. बहुत पहले एक बार प्यार में पड़ा था पर हमारी लव स्टोरी अधिक दिनों तक नहीं चल सकी. लड़की बेवफा निकली. वह न सिर्फ मुझे, बल्कि दुनिया छोड़ कर गई और मैं अकेला रह गया.

लाख चाह कर भी मैं उसे भुला नहीं सका. सोच लिया था कि अब अरेंज्ड मैरिज करूंगा. घर वाले जिसे पसंद करेंगे, उसे ही अपना जीवनसाथी मान लूंगा.

ये भी पढ़ें-क्या पहली बार सैक्स करते समय ब्लीडिंग होनी जरूरी है और क्या दर्द भी होता है?

अगले महीने मेरी सगाई है. लड़की को मैं ने देखा नहीं है पर घर वालों को वह बहुत पसंद आई है. फिलहाल मैं अपने मामा के घर छुट्टियां बिताने आया हूं. मेरे घर पहुंचते ही सगाई की तैयारियां शुरू हो जाएंगी.

‘‘बोलो न, क्या तुम मेरे साथ..,’’ उस ने फिर अपना सवाल दोहराया.

‘‘मैं तो आप को जानता भी नहीं, फिर कैसे…’’ में उलझन में था.

‘‘जानते नहीं तभी तो एक दिन के लिए बना रही हूं, हमेशा के लिए नहीं,’’ लड़की ने अपनी बड़ीबड़ी आंखों को नचाया. ‘‘दरअसल,

2-4 महीनों में मेरी शादी हो जाएगी. मेरे घर

वाले बहुत रूढि़वादी हैं. बौयफ्रैंड तो दूर कभी मुझे किसी लड़के से दोस्ती भी नहीं करने दी. मैं ने अपनी जिंदगी से समझौता कर लिया है. घर

वाले मेरे लिए जिसे ढूंढ़ेंगे उस से आंखें बंद कर शादी कर लूंगी. मगर मेरी सहेलियां कहती हैं कि शादी का मजा तो लव मैरिज में है, किसी को बौयफ्रैंड बना कर जिंदगी ऐंजौय करने में है. मेरी सभी सहेलियों के बौयफ्रैंड हैं. केवल मेरा ही कोई नहीं है.

ये भी पढ़ें-मेरी बीवी की कई लड़कों से दोस्ती है, मुझे क्या करना चाहिए?

‘‘यह भी सच है कि मैं बहुत संवेदनशील लड़की हूं. किसी से प्यार करूंगी तो बहुत गहराई से करूंगी. इसी वजह से इन मामलों में फंसने से डर लगता है. मैं जानती हूं कि मैं तुम्हें आजकल की लड़कियों जैसी बिलकुल नहीं लग रही होऊंगी. बट बिलीव मी, ऐसी ही हूं मैं. फिलहाल मुझे यह महसूस करना है कि बौयफ्रैंड के होने से जिंदगी कैसा रुख बदलती है, कैसा लगता है सब कुछ, बस यही देखना है मुझे. क्या तुम इस में मेरी मदद नहीं कर सकते?’’

‘‘ओके, पर कहीं मेरे मन में तुम्हारे लिए फीलिंग्स आ गईं तो?’’

‘‘तो क्या है, वन नाइट स्टैंड की तरह हमें एक दिन के इस अफेयर को भूल जाना है. यह सोच कर ही मेरे साथ आना. बस एक दिन खूब मस्ती करेंगे, घूमेंगेफिरेंगे. बोलो क्या कहते हो? वैसे भी मैं तुम से 5 साल बड़ी हूं. मैं ने तुम्हारे ड्राइविंग लाइसैंस में तुम्हारी उम्र देख ली है. यह लो. रास्ते में तुम से गिर गया था. यही लौटाने आई थी. तुम्हें देखा तो लगा कि तुम एक शरीफ लड़के हो. मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे, इसीलिए यह प्रस्ताव रखा है.’’

ये भी पढ़ें-मेरे संबंध मेरी विधवा भाभी से हो गए हैं, जो 2 बच्चों की मां है. घर वाले इस बात से खुश नहीं हैं. क्या करना ठीक रहेगा.

मैं मुसकराया. एक अजीब सा उत्साह था मेरे मन में. चेहरे पर मुसकराहट की रेखा गहरी होती गई. मैं इनकार नहीं कर सका. तुरंत हामी भरता हुआ बोला, ‘‘ठीक है, परसों सुबह 8 बजे इसी जगह आ जाना. उस दिन मैं पूरी तरह तुम्हारा बौयफ्रैंड हूं.’’

‘‘ओके थैंक्यू,’’ कह कर मुसकराती हुई वह चली गई.

घर आ कर भी मैं सारा समय उस के बारे में सोचता रहा.

2 दिन बाद तय समय पर उसी जगह पहुंचा तो देखा वह बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही थी.

‘‘हाय डियर,’’ कहते हुए वह करीब आ गई.

‘‘हाय,’’ मैं थोड़ा सकुचाया.

मगर उस लड़की ने झट से मेरा हाथ थाम लिया और बोली, ‘‘चलो, अब से तुम मेरे बौयफ्रैंड हुए. कोई हिचकिचाहट नहीं, खुल कर मिलो यार.’’

मैं ने खुद को समझाया, बस एक दिन. फिर कहां मैं, कहां यह. फिर हम 2 अजनबियों ने हमसफर बन कर उस एक दिन के खूबसूरत सफर की शुरुआत की. प्रिया नाम था उस का. मैं गाड़ी ड्राइव कर रहा था और वह मेरी बगल में बैठी थी. उस की जुल्फें हौलेहौले उस के कंधों पर लहरा रही थीं. भीनीभीनी सी उस की खुशबू मुझे आगोश में लेने लगी थी. एक अजीब सा एहसास था, जो मेरे जिस्म को महका रहा था. मैं एक गीत गुनगुनाने लगा. वह एकटक मुझे निहारती हुई बोली, ‘‘तुम तो बहुत अच्छा गाते हो.’’

‘‘हां थोड़ाबहुत गा लेता हूं… जब दिल को कोई अच्छा लगता है तो गीत खुद ब खुद होंठों पर आ जाता है.’’

मैं ने डायलौग मारा तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी. दूधिया चांदनी सी छिटक कर उस की हंसी मेरी सांसों को छूने लगी. यह क्या हो रहा है मुझे. मैं मन ही मन सोचने लगा.

तभी उस ने मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया, ‘‘माई प्रिंस चार्मिंग, हम जा कहां रहे हैं?’’

‘‘जहां तुम कहो. वैसे मैं यहां की सब से रोमांटिक जगह जानता हूं, शायद तुम भी जाना चाहोगी,’’ मेरी आवाज में भी शोखी उतर आई थी.

‘‘श्योर, जहां तुम चाहो ले चलो. मैं ने तुम पर शतप्रतिशत विश्वास किया है.’’

‘‘पर इतने विश्वास की वजह?’’

‘‘किसीकिसी की आंखों में लिखा होता है कि वह शतप्रतिशत विश्वास के योग्य है. तभी तो पूरी दुनिया में एक तुम्हें ही चुना मैं ने अपना बौयफ्रैंड बनाने को.’’

‘‘देखो तुम मुझ से इमोशनली जुड़ने की कोशिश मत करो. बाद में दर्द होगा.’’

‘‘किसे? तुम्हें या मुझे?’’

‘‘शायद दोनों को.’’

‘‘नहीं, मैं प्रैक्टिकल हूं. मैं बस 1 दिन के लिए ही तुम से जुड़ रही हूं, क्योंकि मैं जानती हूं हमारे रिश्ते को सिर्फ इतने समय की ही मंजूरी मिली है.’’

‘‘हां, वह तो है. मैं अपने घर वालों के खिलाफ नहीं जा सकता.’’

‘‘अरे यार, खिलाफ जाने को किस ने कहा? मैं तो खुद पापा के वचन में बंधी हूं. उन के दोस्त के बेटे से शादी करने वाली हूं. 6-7 महीनों में वह इंडिया आ जाएगा और फिर चट मंगनी पट विवाह. हो सकता है मैं हमेशा के लिए पैरिस चली जाऊं,’’ उस ने सहजता से कहा.

‘‘तो क्या तुम भी ‘कुछकुछ होता है’ मूवी की सिमरन की तरह किसी अजनबी से शादी करने वाली हो, जिसे तुम ने कभी देखा भी नहीं है?’’ कहते हुए मैं ने उस की आंखों में झांका. वह हंसती हुई बोली, ‘‘हां, ऐसा ही कुछ है. पर चिंता न करो. मैं तुम्हें शाहरुख यानी राज की तरह अपनी जिंदगी में नहीं आने दूंगी. शादी तो मैं उसी से करूंगी जिस से पापा चाहते हैं.’’

‘‘तो फिर यह सब क्यों? मेरे इमोशंस के साथ क्यों खेल रही हो?’’

‘‘अरे यार, मैं कहां खेल रही हूं? फर्स्ट मीटिंग में ही मैं ने साफ कह दिया था कि हम केवल 1 दिन के रिश्ते में हैं.’’

‘‘हां वह तो है. ओके बाबा, आई ऐम सौरी. चलो आ गई हमारी मंजिल.’’

‘‘वैरी नाइस. बहुत सुंदर व्यू है,’’ कहते हुए उस के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

थोड़ा घूमने के बाद वह मेरे पास आती हुई बोली, ‘‘लो अब मुझे अपनी बांहों में भरो जैसे फिल्मों में करते हैं.’’

वह मेरे और करीब आ गई. उस की जुल्फें मेरे कंधों पर लहराने लगीं. लग रहा था जैसे मेरी पुरानी गर्लफ्रैंड बिंदु ही मेरे पास खड़ी है. अजीब सा आकर्षण महसूस होने लगा. मैं अलग हो गया, ‘‘नहीं, यह नहीं होगा मुझ से. किसी गैर लड़की को मैं करीब क्यों आने दूं?’’

‘‘क्यों, तुम्हें डर लग रहा है कि मैं यह वीडियो बना कर वायरल न कर दूं?’’ वह शरारत से खिलखिलाई. मैं ने मुंह बनाया, ‘‘बना लो. मुझे क्या करना है? वैसे भी मैं लड़का हूं. मेरी इज्जत थोड़े ही जा रही है.’’

‘‘वही तो मैं तुम्हें समझा रही हूं. तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, तुम तो लड़के हो,’’ वह फिर से मुसकराई, ‘‘वैसे तुम आजकल के लड़कों जैसे बिलकुल नहीं.’’

‘‘आजकल के लड़कों से क्या मतलब है? सब एकजैसे नहीं होते.’’

‘‘वही तो बात है. इसीलिए तो तुम्हें चुना है मैं ने, क्योंकि मुझे पता था तुम मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे वरना किसी और लड़के को ऐसा मौका मिलता तो उसे लगता जैसे लौटरी लग गई हो.’’

‘‘तुम मेरे बारे में इतनी श्योर कैसे हो कि वाकई मैं शरीफ ही हूं? तुम कैसे जानती हो कि मैं कैसा हूं और कैसा नहीं हूं?’’

‘‘तुम्हारी आंखों ने सब बता दिया मेरी जान, शराफत आंखों पर लिखी होती है. तुम नहीं जानते?’’

इस लड़की की बातें पलपल मेरे दिल को धड़काने लगी थीं. बहुत अलग सी थी वह. काफी देर तक हम इधरउधर घूमते रहे. बातें करते रहे.

एक बार फिर वह मेरे करीब आती हुई बोली, ‘‘अपनी गर्लफ्रैंड को हग भी नहीं करोगे?’’ वह मेरे सीने से लग गई. लगा जैसे वह पल वहीं ठहर गया हो. कुछ देर तक हम ऐसे ही खड़े रहे. मेरी बढ़ी हुई धड़कनें शायद वह भी महसूस कर रही थी. मैं ने भी उसे आगोश में ले लिया. उस पल को ऐसा लगा जैसे आकाश और धरती एकदूसरे से मिल गए हों. कुछ पल बाद उस ने खुद को अलग किया और दूर जा कर खड़ी हो गई.

‘‘बस, कुछ और हुआ तो हमारे कदम बहक जाएंगे. चलो वापस चलते हैं,’’ वह बोली. मैं अपनेआप को संभालता हुआ बिना कुछ कहे उस के पीछेपीछे चलने लगा. मेरी सांसें रुक रही थीं. गला सूख रहा था. गाड़ी में बैठ कर मैं ने पानी की पूरी बोतल खाली कर दी.

सहसा वह हंस पड़ी, ‘‘जनाब, ऐसा लग रहा था जैसे शराब की बोतल एक बार में ही हलक के नीचे उतार रहे हो.’’

उस के बोलने का अंदाज कुछ ऐसा था कि मुझे हंसी आ गई. ‘‘सच, बहुत अच्छी हो तुम. मुझे डर है कहीं तुम से प्यार न हो जाए,’’ मैं ने कहा.

‘‘छोड़ो भी यार. मैं बड़ी हूं तुम से, इस तरह की बातें सोचना भी मत.’’

‘‘मगर मैं क्या करूं? मेरा दिल कुछ और कह रहा है और दिमाग कुछ और.’’

‘‘चलता है. तुम बस आज की सोचो और यह बताओ कि हम लंच कहां करने वाले हैं?’’

‘‘एक बेहतरीन जगह है मेरे दिमाग में. बिंदु के साथ आया था एक बार. चलो वहीं चलते हैं,’’ मैं ने वृंदावन रैस्टोरैंट की तरफ गाड़ी मोड़ते हुए कहा, ‘‘घर के खाने जैसा बढि़या स्वाद होता है यहां के खाने का और अरेंजमैंट देखो तो लगेगा ही नहीं कि रैस्टोरैंट आए हैं. गार्डन में बेंत की टेबलकुरसियां रखी हुई हैं.’’

रैस्टोरैंट पहुंच कर उत्साहित होती हुई प्रिया बोली, ‘‘सच कह रहे थे तुम. वाकई लग रहा है जैसे पार्क में बैठ कर खाना खाने वाले हैं हम… हर तरफ ग्रीनरी. सो नाइस. सजावटी पौधों के बीच बेंत की बनी डिजाइनर टेबलकुरसियों पर स्वादिष्ठ खाना, मन को बहुत सुकून देता होगा.

है न?’’

मैं खामोशी से उस का चेहरा निहारता रहा. लंच के बाद हम 2-1 जगह और गए. जी भर कर मस्ती की. अब तक हम दोनों एकदूसरे से खुल गए थे. बातें करने में भी मजा आ रहा था. दोनों ने ही एकदूसरे की कंपनी बहुत ऐंजौय की थी, एकदूसरे की पसंदनापसंद, घरपरिवार, स्कूलकालेज की कितनी ही बातें हुईं.

थोड़ीबहुत प्यार भरी बातें भी हुईं. धीरेधीरे शाम हो गई और उस के जाने का समय आ गया. मुझे लगा जैसे मेरी रूह मुझ से जुदा हो रही है, हमेशा के लिए.

‘‘कैसे रह पाऊंगा मैं तुम से मिले बिना? नहीं प्रिया, तुम्हें अपना नंबर देना होगा मुझे,’’ मैं ने व्यथित स्वर में कहा.

‘‘आर यू सीरियस?’’

‘‘यस आई ऐम सीरियस,’’ मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मुझे नहीं लगता कि अब मैं तुम्हें भूल सकूंगा. नो प्रिया, आई थिंक आई लाइक यू वैरी मच.’’

‘‘वह डील न भूलो मयंक,’’ प्रिया ने याद दिलाया.

‘‘मगर दोस्त बन कर तो रह सकते हैं न?’’

‘‘नो, मैं कमजोर पड़ गई तो? यह रिस्क मैं नहीं उठा सकती.’’

‘‘तो ठीक है. आई विल मैरी यू,’’ मैं ने जल्दी से कहा. उस से जुदा होने के खयाल से ही मेरी आंखें भर आई थीं. एक दिन में ही जाने कैसा बंधन जोड़ लिया था उस ने कि दिल कर रहा था हमेशा के लिए वह मेरी जिंदगी में आ जाए.

वह मुझ से दूर जाती हुई बोली, ‘‘गुडबाय मयंक, मैं शादी वहीं करूंगी जहां पापा चाहते हैं. तुम्हारा कोई चांस नहीं. भूल जाना मुझे.’’ वह चली गई और मैं पत्थर की मूर्त बना उसे जाते देखता रहा. दिल भर आया था मेरा. ड्राइविंग सीट पर अकेला बैठा अचानक फफकफफक कर रो पड़ा. लगा जैसे एक बार फिर से बिंदु मुझे अकेला छोड़ कर चली गई है. जाना ही था तो फिर जरूरत क्या थी मेरी जिंदगी में आने की. किसी तरह खुद को संभालता हुआ घर लौटा. दिन का चैन, रात की नींद सब लुट चुकी थी. जाने कहां से आई थी वह और कहां चली गई थी? पर एक दिन में मेरी दुनिया पूरी तरह बदल गई थी. देवदास बन गया था मैं. इधर घर वाले मेरी सगाई की तैयारियों में लगे थे. वे मुझे उस लड़की से मिलवाने ले जाना चाहते थे, जिसे उन्होंने पसंद किया था. पर मैं ने साफ इनकार कर दिया.

‘‘मैं शादी नहीं करूंगा,’’ मेरा इतना कहना था कि घर में कुहराम मच गया.

‘‘क्यों, कोई और पसंद आ गई?’’ मां ने अलग ले जा कर पूछा.

‘‘हां.’’ मैं ने सीधा जवाब दिया.

‘‘तो ठीक है, उसी से बात करते हैं. पता और फोन नंबर दो.’’

‘‘मेरे पास कुछ नहीं है.’’

‘‘कुछ नहीं, यह कैसा प्यार है?’’ मां ने कहा.

‘‘क्या पता मां, वह क्या चाहती थी? अपना दीवाना बना लिया और अपना कोई अतापता भी नहीं दिया.’’

फिर मैं ने उन्हें सारी कहानी सुनाई तो वे खामोश रह गईं. 6 माह बीत गए. आखिर घर वालों की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा. लड़की वाले हमारे घर आए. मुझे जबरन लड़की के पास भेजा गया. उस कमरे में कोई और नहीं था. लड़की दूसरी तरफ चेहरा किए बैठी थी. मैं बहुत अजीब महसूस कर रहा था.

लड़की की तरफ देखे बगैर मैं ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं आप को किसी भ्रम में नहीं रखना चाहता. दरअसल मैं किसी और से प्यार करने लगा हूं और अब उस के अलावा किसी से शादी का खयाल भी मुझे रास नहीं आ रहा. आई एम सौरी. आप इस रिश्ते के लिए न कह दीजिए.’’

‘‘सच में न कह दूं?’’ लड़की के स्वर मेरे कानों से टकराए तो मैं हैरान रह गया. यह तो प्रिया के स्वर थे. मैं ने लड़की की तरफ देखा तो दिल खुशी से झूम उठा. यह वाकई प्रिया ही थी.

‘‘तुम?’’

‘‘हां मैं, कोई शक?’’ वह मुसकराई.

‘‘पर वह सब क्या था प्रिया?’’

‘‘दरअसल, मैं अरेंज्ड नहीं, लव मैरिज करना चाहती थी. अत: पहले तुम से प्यार का इजहार कराया, फिर इस शादी के लिए रजामंदी दी. बताओ कैसा लगा मेरा सरप्राइज.’’

‘‘बहुत खूबसूरत,’’ मैं ने पल भर भी देर नहीं की कहने में और फिर उसे बांहों में भर लिया.

सिंगल पेरैंट डेटिंग टिप्स

सिंगल पेरैंट डेटिंग टिप्स  पिछले रिश्ते से निकलने के बाद कुछ समय इंतजार करें. आप को अकेलापन महसूस हो सकता है, पर नए रिश्ते में जल्दबाजी न करें. आप एक असफल रिश्ते से बाहर आए हैं. सो, यह मनन जरूर करें कि कहां क्या गलत हुआ, आप का इस में कितना योगदान था. वरना आप ये इश्यूज नए रिश्ते में भी ले कर चल सकते हैं. और आप के सामने फिर वही स्थिति आ सकती है और फिर तनाव ?झेलना पड़ सकता है

यदि आप में आत्मविश्वास की कमी हो तो किसी थेरैपिस्ट से मिलने में कोई बुराई नहीं. द्य यह स्वीकार कर लें कि आप की फैमिली लाइफ पर डेटिंग के बाद असर पड़ेगा. कोई अपराधबोध न पालें. आप के जीवन में इस से खुशी आ सकती है, तो जरूर आगे बढ़ें. द्य अच्छी तरह सोच लें कि आप को नए पार्टनर से क्या चाहिए. देख लें कि उस में कितना पेशंस है, क्योंकि आप सिंगल पेरैंट हैं. आप को अपने बच्चे के साथ उस का व्यवहार कैसा है, यह भी देखना होगा.  बच्चा आप की डेटिंग पर क्या रिऐक्शन देगा,

ये भी पढ़ें-जब डेट पर जाएं सिंगल पेरैंट

यह चिंता स्वाभाविक है. पर यह डर अपने ऊपर हावी न होने दें. बच्चों से बात करते रहिए, इसे राज बना कर न रखें. उन्हें उन के मन की बात कहने दें. आप के बच्चे यंग हैं, तो उन्हें आराम से सम?ाइए कि डेटिंग है क्या. उन्हें बताएं कि एडल्ट्स के लिए आपस में मिलना, दोस्त बनना नैचुरल है.

ये भी पढ़ें-बच्चों को डांटें मगर प्यार से

फर्स्ट डेट पर आप को अपने जीवन की पूरी स्टोरी सुनाने की जरूरत नहीं है. पर यदि आप मां या पिता हैं, तो जल्दी से जल्दी बता दें. आप का पार्टनर सही होगा, तो वह आप की हर भावना का सम्मान करेगा. द्य हो सकता है बच्चा आप के नए पार्टनर को तुरंत स्वीकार न करे. उसे कुछ समय दें. पार्टनर को भी बच्चे का व्यवहार बताएं कि उसे क्या पसंद है, क्या नहीं.

 

 

 

सिर्फ मोबाइल ही नहीं दूसरी डिवाइस भी हैं सेहत के लिए खतरनाक

शोधकर्ताओं का मानना है कि सिर्फ मोबाइल ही नहीं बल्कि स्मार्टफोन की ही तरह के दूसरे डिवाइस भी इसी तरह का असर दे रहे हैं. ये मानव स्वरूप को बदल रहे हैं. शोधकर्ताओं का दावा है कि टैक्नोलौजी के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव की यह अपनी तरह की पहली रिसर्च है.

बच्चे भी हो रहे हैं शिकार

साल 2018 में दूसरे पेपर में 4 टीनएजर्स की केस स्टडी को सामने रखा गया था जिन के सिर पर सींग उग आए थे. शोधकर्ताओं ने दावा किया कि इन बच्चों के सिर पर जो सींग आए हैं वे गरदन के दबाव के कारण हैं. उन्हें शोधकर्ताओं ने आनुवंशिक मानने से इनकार कर दिया.

इससे पहले प्रकाशित की गई शोध रिपोर्ट में 18 साल से ले कर 86 साल तक के 1,200 लोगों के एक्सरे को शामिल किया गया जिस में शोधकर्ताओं ने पाया कि 33 फीसदी लोगों में सींग जैसी हड्डी विकसित हो गई थी.

ये भी पढ़ेॆ-पीरियड्स का न आना ओवरी कैंसर का संकेत तो नहीं

अगर आप भी मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसे समय और जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करें और इन बातों का ध्यान रखें…

  1. रात को सोते वक्त मोबाइल को खुद से दूर रखें.
  2. जहां तक हो सके बच्चों को मोबाइल से दूर रखें, क्योंकि बच्चों में इस के दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं.
  3. बच्चे के शारीरिक विकास में रुकावट, मोटापा, याद्दाश्त में कमी, मानसिक विकार, चिड़चिड़ापन, आक्रामक होना, आंखों पर बुरा असर, यहां तक कि कैंसर आदि तमाम लक्षण बच्चों में देखने को मिल रहे हैं.
  4. सिर्फ बच्चे ही नहीं, बड़े भी मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से कई बीमारियों से घिर रहे हैं. कई शोध कहते हैं कि फोन से निकलने वाला रेडिएशन शरीर पर नकारात्मक असर डालता है.
  5. 2013 का शोध कहता है कि फोन के प्रयोग से रक्तचाप बढ़ जाता है. ऐसे में दिल को कई बीमारियां घेर लेती हैं.

ये भी पढ़ेॆ-सावधान सिर पर सींग निकाल देता है मोबाइल

  1. फोन की एल्कोट्रोमैग्रेट किरणें कई खतरों को बुलावा देती हैं.
  2. बहुत देर तक फोन पर बात करना खतरनाक हो सकता है. यह सुनने की क्षमता पर सीधे असर डालता है.
  3. अगर आप अपने फोन को खुद से चिपका कर सोते हैं तो नपुंसकता का भी खतरा बन सकता है.
  4. शोधकर्ताओं ने चेताया है कि पैंट की जेब में स्मार्टफोन रखने से पुरुषों में न सिर्फ शुक्राणुओं की कमी होती है, बल्कि अंडाणुओं को निषेचित करने की उन की क्षमता भी कमजोर पड़ने लगती है.

बेसमेंट में छिपा राज : भाग 1

कभीकभी अपनी इज्जत की खातिर इंसान अविवेक में ऐसा खतरनाक कदम उठा लेता है, जिस के लिए उसे पूरी उम्र पछताना पड़ता है. कानून की पढ़ाई करने वाले छात्र पंकज कुमार सिंह की हत्या के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ.

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के थाना चितबड़ा के अंतर्गत फिरोजपुर गांव के रहने वाले नरेंद्र कुमार सिंह पेशे से डाक्टर हैं.  नरेंद्र सिंह चितबड़ा में ही अपना क्लिनिक चलाते हैं. उन के परिवार में उन की पत्नी आशा सिंह के अलावा 3 बेटे हैं.

सब से बड़े बेटे मनीष कुमार सिंह ने ग्रैजुएशन की और वह दिल्ली आ गया. दिल्ली आ कर मनीष ने ट्रांसपोर्ट का काम शुरू कर दिया. वह टैक्सियां किराए पर चलवाने लगा. मनीष शादीशुदा है. मंझला बेटा पंकज 4 साल पहले गाजियाबाद आया और यहां जीटी रोड पर स्थित इंस्टीट्यूट औफ मैनेजमेंट एजुकेशन में एलएलबी में दाखिला ले लिया.

पंकज का एक छोटा भाई भी है, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद बंगलुरु की एक निजी कंपनी में नौकरी कर रहा है. नरेंद्र सिंह की जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन इस साल अक्तूबर महीने में अचानक ही उन की जिंदगी में भूचाल आ गया.

10 अक्तूबर, 2019 की सुबह करीब 10 बजे का वक्त था. पंकज का भाई मनीष साहिबाबाद थाने पहुंचा. उस वक्त ड्यूटी औफिसर के रूप में एसआई जितेंद्र कुमार मौजूद थे. मनीष ने उन्हें बताया कि उस का छोटा भाई पंकज गिरधर एनक्लेव स्थित नवीन त्यागी के मकान नंबर 109 में किराए पर रहता है. वह 9 अक्तूबर की सुबह करीब 10 बजे से लापता है.

ये भी पढ़ें- दबंगों का कहर

मनीष ने एसआई जितेंद्र कुमार को बताया कि 8 अक्तूबर की शाम को उस की पंकज से फोन पर बात हुई थी, तब तक वह ठीक था. अगले दिन यानी 9 अक्तूबर को जब उस ने पंकज को दोपहर 12 बजे फोन किया तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला.

मनीष ने बताया कि उस ने सोचा या तो पंकज के फोन की बैटरी खत्म हो गई होगी या वह क्लास में होगा. यही सोच कर उस ने ज्यादा परवाह नहीं की. लेकिन दोपहर बाद जब 3 बजे से रात 8 बजे तक कई बार फोन करने पर भी पंकज का फोन स्विच्ड औफ मिला तो उसे घबराहट होने लगी.

मनीष ने बताया कि पंकज नवीन त्यागी के जिस फ्लैट में रहता था, उस में उस का एक रूम पार्टनर संजय भी था. संजय भी पंकज के साथ इंस्टीट्यूट औफ मैनेजमेंट एजुकेशन से एलएलबी की पढ़ाई कर रहा था. उस ने संजय से अपने भाई पंकज के बारे में पूछा कि वह कहां है और उस का फोन क्यों नहीं लग रहा?

तब संजय ने बताया कि पंकज 9 अक्तूबर की सुबह करीब पौने 10 बजे उस से यह कह कर फ्लैट से निकला था कि वह अपने साइबर कैफे जा रहा है. दोपहर में जब वह कालेज के लिए निकले तो उसे वहीं पर मिले. पंकज ने एक साइबर कैफे भी खोल रखा था. संजय ने बताया कि जब वह साढ़े 12 बजे साइबर कैफे पहुंचा तो वहां ताला लटका हुआ मिला.

संजय को आसपड़ोस के लोगों ने बताया कि आज तो कैफे खुला ही नहीं.

संजय को समझ नहीं आया कि दुकान खोलने के लिए आया पंकज उसे बिना बताए कहां चला गया. यही जानने के लिए उस ने पंकज को फोन किया तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला.

चूंकि संजय को कालेज पहुंचना था इसलिए उस ने उस वक्त यही सोचा कि शायद पंकज को कोई मिल गया होगा और वह उसे बिना बताए कहीं चला गया होगा. यह सोच कर वह कालेज चला गया.

शाम को 5 बजे वह जब कालेज से लौटा तो उस ने पाया कि पंकज का साइबर कैफे तब भी बंद था.

फ्लैट पर पहुंचने के बाद संजय ने खाना बनाया और पंकज का इंतजार करने लगा. इस दौरान उस ने कई बार पंकज के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन हर बार मोबाइल स्विच्ड औफ मिला.

अब संजय को भी पंकज की चिंता होने लगी थी. वह सोच ही रहा था कि क्या करे, इसी बीच पंकज के भाई मनीष का फोन आ गया तो उस ने सारी बात मनीष को बता दी. क्योंकि रात हो चुकी थी. इसलिए मनीष को यह नहीं सूझा कि वह क्या करे.

मनीष ने रात में ही पंकज के लापता होने की बात अपने पिता डा. नरेंद्र कुमार सिंह को बताई तो वे भी चिंतित हो उठे. पिता ने अनिष्ट की आशंका जताते हुए मनीष से अगली सुबह थाने जा कर इस संबंध में रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा.

इस के बाद अगली सुबह यानी 10 अक्तूबर को मनीष थाना साहिबाबाद पहुंचा और ड्यूटी पर तैनात एसआई जितेंद्र कुमार को अपने भाई पंकज के लापता होने की सारी बात विस्तार से बता दी.

इस के बाद मनीष की तहरीर पर पुलिस ने भादंसं की धारा 365 के अंतर्गत अज्ञात अपराधियों के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत कर लिया.

ये भी पढ़ें- संतोष को बच्चे और पति नहीं प्यार चाहिए था

साहिबाबाद थाने के थानाप्रभारी जे.के. सिंह के निर्देश पर एसआई जितेंद्र कुमार ने ही जांच का काम शुरू कर दिया.

अपहरण के ऐसे मामलों में पुलिस अकसर पीडि़त के मोबाइल फोन की काल डिटेल से ही उस तक पहुंचने का प्रयास करती है. एसआई जितेंद्र कुमार ने पंकज के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा ली. उन्होंने कांस्टेबल संजीव, विपिन और प्रवेश को ऐसे लोगों की सूची तैयार करने के काम पर लगा दिया, जिन से पंकज की सब से ज्यादा बातचीत होती थी और अंतिम बार उस ने किन लोगों के साथ बातचीत की.

2 दिन गुजर गए और पुलिस की अब तक की जांच बेनतीजा रही.

इधर मनीष के पिता डा. नरेंद्र सिंह भी बलिया से उस के पास दिल्ली आ गए थे. मनीष के कुछ परिजन और रिश्तेदार भी पंकज के लापता होने की जानकारी मिलने पर गाजियाबाद पहुंच गए. सभी लोग अपनेअपने तरीके से पंकज की तलाश में जुटे थे.

इसी सिलसिले में मनीष 12 अक्तूबर की सुबह एक बार फिर गिरधर एनक्लेव पहुंचा जहां पंकज रहता था. मनीष के दिमाग में न जाने क्यों कल से यह बात आ रही थी कि उसे मुन्ना से पंकज के बारे में जानकारी करने के लिए मिलना चाहिए.

दरअसल, 3 महीने पहले पंकज 15 दिन के लिए गिरधर कालोनी के ही मकान नंबर 51 के मालिक मुन्ना के घर में किराए पर रहा था.

मुन्ना से पंकज के काफी अच्छे संबंध थे. क्योंकि पंकज मुन्ना के 2 बेटों और 2 बेटियों को ट्यूशन पढ़ाता था. इन्हीं संबंधों के नाते मुन्ना ने पंकज को अपना फ्लैट कुछ दिन के लिए रहने को दे दिया था. मुन्ना के मकान में पंकज 15 दिन ही रहा था. उस ने उस का मकान खाली कर दिया और नवीन त्यागी के मकान में जा कर रहने लगा. वहां उस ने साथ में पढ़ने वाले एक दोस्त  पंकज को भी पार्टनर के रूप में साथ रख लिया था.

मनीष को पता था कि मुन्ना और उस के परिवार से पंकज के काफी अच्छे संबंध थे. उस ने सोचा कि क्यों न एक बार मुन्ना और उस के परिवार से मिल कर पता कर ले. हालांकि जिस दिन मनीष ने पंकज के अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया था, उस दिन भी वह मुन्ना से मिला था. मुन्ना ने पंकज के इस तरह लापता होने पर काफी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि वह तो बेहद शरीफ और अच्छा लड़का है.

लेकिन 12 तारीख की सुबह जब मनीष मुन्ना के घर पहुंचा तो वहां ताला लटका मिला. मुन्ना के मकान में जो किराएदार रहते थे, उन के परिवार की महिलाएं तो मिलीं, लेकिन पुरुष सदस्य काम पर जा चुके थे. पूछने पर महिलाओं ने मनीष को बताया कि मकान मालिक मुन्ना तो अपने परिवार के साथ 11 अक्तूबर  की सुबह से ही वहां नहीं है.

मुन्ना के 3 मंजिला मकान में ग्राउंड फ्लोर पर वह खुद रहता था, जबकि पहली और दूसरी मंजिल पर किराएदार रहते थे. चौथी मंजिल पर भी एक कमरा बना था जो खाली था. पंकज उसी कमरे में कुछ दिन रहा था.

जब मनीष ने मुन्ना के फ्लैट पर ताला लटका देखा तो वह असमंजस में पड़ गया कि आखिर पूरा परिवार कहां चला गया.

मनीष समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे, क्या न करे. इसी दौरान उस की नजर ग्राउंड फ्लोर पर उस हिस्से पर पड़ी, जहां से बेसमेंट की तरफ सीढि़यां उतर रही थीं. सीढि़यों से उतरते हुए मनीष बेसमेंट में पहुंच गया. वहां काफी अंधेरा था. अचानक उसे एक अजीब सी गंध का एहसास हुआ.

मनीष ने अपने मोबाइल की टौर्च जला कर देखा तो वहां कई जगह इधरउधर सीमेंट बिखरा था और कबाड़ भी फैला था. ऐसा लग रहा था था कि वहां कुछ रोज पहले ही राजमिस्त्री ने कोई काम किया है.

उसे जो गंध आ रही थी, ऐसी गंध हमेशा किसी जानवर या मरे हुए इंसान से उठती है. लेकिन कमरे में ऐसा कुछ नहीं दिख रहा था. मनीष ने जांच अधिकारी जितेंद्र कुमार को फोन कर के सारी बात बता दी.

एसआई जितेंद्र कुमार, हैडकांस्टेबल कृष्णवीर और रविंद्र को ले कर कुछ ही देर में मुन्ना के मकान पर पहुंच गए.

पुलिस जब बेसमेंट में पहुंची तो बदबू का अहसास उन्हें भी हुआ. मोबाइल टौर्च से पर्याप्त उजाला होने पर एक सिपाही ने कमरे में लगा बिजली का बोर्ड तलाश कर बंद पड़ी लाइटेंजला दीं, जिस से कमरा प्रकाश से भर गया. अब उस हालनुमा कमरे में सब कुछ साफसाफ दिखाई पड़ रहा था. कमरे के बीचोबीच ढेर सारा कबाड़ पड़ा था. कमरे में जहांतहां सीमेंट और बदरपुर फैला हुआ था.

जांच अधिकारी जितेंद्र कुमार ने सब से पहले अपने सहयोगी सिपाहियों की मदद से मकान में रहने वाले किराएदारों की मौजूदगी में बेसमेंट में बने दोनों कमरों के ताले तोड़े. लेकिन दोनों कमरों में ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से पता चलता कि बदबू कहां से आ रही है.

ये भी पढ़ें- बुढ़ापे में दुल्हन ! कृपया रुकिए

पुलिस ने हाल के बीचोबीच पड़ा कबाड़ का सामान हटाया तो देखा उन के नीचे फूस बिछी हुई थी. जब वहां से फूस को हटाया गया तो नीचे टाट की बोरियां बिछी मिलीं.

पुलिस टीम ने टाट की इन बोरियों को भी हटाया, तो उस के नीचे काफी बड़े क्षेत्र में फर्श के ताजा प्लास्टर होने के निशान साफ दिख रहे थे. टाट की बोरियां हटाने के बाद कमरे में आ रही दुर्गंध और भी ज्यादा तेज हो गई थी.

जितेंद्र कुमार को लगने लगा कि हो न हो, इस फर्श के नीचे ऐसा कुछ जरूर दबा है जिस की वजह से वहां बदबू फैली हुई है.

जितेंद्र कुमार ने बेसमेंट से बाहर आ कर थानाप्रभारी जे.के. सिंह को फोन पर मुन्ना के मकान में इस संदिग्ध गतिविधि के बारे में बताया तो थानाप्रभारी भी कुछ अन्य पुलिसकर्मियों के साथ गिरधर एनक्लेव में मुन्ना के मकान पर पहुंच गए. तब तक जितेंद्र कुमार ने अपने एक सिपाही को भेज कर 2-3 मजदूर बुलवा लिए थे.

थानाप्रभारी जे.के. सिंह ने निरीक्षण किया तो संदेह की सब से बड़ी बात यह मिली कि जिस स्थान पर प्लास्टर किया गया था, वहां दबाने पर जमीन दब रही थी. ऐसा लग रहा था कि यह प्लास्टर 2-3 दिन पहले ही किया गया हो और इस का भराव ठीक से नहीं किया गया था.

बहरहाल, थानाप्रभारी जे.के. सिंह को भी मामला संदिग्ध लगा. सीओ डा. राकेश कुमार मिश्रा और एसडीएम को सारी बात बता कर मौके पर आने का अनुरोध किया.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें