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विद्रोह: भाग-3

अब वह आंखें बंद कर के सोचने लगी, ‘काश, मेरी बहू रीता जैसी होती, कितनी अच्छी है, कितना खयाल रखती है अपनी सासू मां का, जितनी बार भी इस की सास मुझ से मिली हैं, हमेशा अपनी बहू की तारीफों के पुल ही बांधती रही हैं, लेकिन मुझे दुष्ट बहू मिली. अरे बहू का क्या दोष है, नालायक तो अपना बेटा है. यदि बेटा ठीक होता तो बहू की क्या मजाल कि गलत काम करे?’

ज्योंज्यों कानपुर नजदीक आ रहा था, कुसुम घबरा रही थी कि भैयाभाभी पता नहीं क्या सोचेंगे. सोचें तो सोचें, उस के पास उस रास्ते के सिवा कोई रास्ता नहीं था. वह बोझ नहीं बनेगी भैयाभाभी पर, कुछ ही दिनों में अलग छोटा सा मकान ले कर रहेगी, एक नौकरानी रखेगी. एक विचार की लहर बारबार उठ रही थी कि घर छोड़ कर मैं ने गलत काम तो नहीं किया.

फिर दिमाग ने कहा, तो फिर क्या करती, हर रोज मार खाती. और वह मारता रहता जब तक जायदाद पूरी अपने नाम न लिखवा लेता. एक बार, दो बार, तीन बार…उस ने अपनी दोबारा बनाई वसीयत पढ़ी, जिस की एक प्रति उसे अपनी बेटी के पास भी भेजनी पड़ेगी, वकील के पास तो एक कौपी रख आई थी.

कुसुम अब सोचने लगी, ‘आज मैं ने जो कुछ भी किया वह पहले ही कर लेना चाहिए था. छि:छि:, मां बेटे से मार खाए, इस से अच्छा मर न जाए. मैं अकेली पड़ गई थी, वे दोनों पतिपत्नी एक हो गए थे. शुक्र है कि रीता जैसी पड़ोसिन मिल गई, जिस ने मेरी मृतप्राय जिंदगी को सांसें दे दीं. रीता न होती तो मैं वसीयत भी न बदल पाती और घर से भाग भी नहीं पाती.’

इन्हीं विचारों का तानाबाना बुनते हुए कानपुर आ गया. हड़बड़ाते हुए कुसुम ने अटैची और पर्स पकड़ा, फिर स्वरूपनगर के लिए रिकशा कर के चल दी.

कुसुम निश्चय कर के अपने भाई देवेंद्र के घर पहुंच गई. दरवाजे पर लगी कौल बैल बजाई. थोड़ी देर में एक भोलीभाली, सुंदर सी बालिका ने दरवाजा खोला.

‘‘आप कौन, किस से मिलना है?’’ मीठी आवाज में बच्ची ने पूछा.

‘‘बेटी, मैं लखनऊ से आई हूं. तुम्हारे पापाजी की बहन हूं. मेरा नाम कुसुम है.’’

‘‘अंदर आइए, दादीजी, अंदर आइए.’’

बच्ची के पीछेपीछे कुसुम अपना पर्स और अटैची संभालती हुई चल दी. बरामदे के साथ जुड़ा हुआ ही ड्राइंगरूम था. उस घर में कुसुम 5 वर्षों बाद आई थी. पिछली बार अपने पति के साथ कुसुम कार से आई थी. घरपरिवार वालों ने खूब इज्जत, मानसम्मान दिया था. भैयाभाभी ने तो आंखों पर ही बिठा लिया था.

कुसुम के भाई के घर का वातावरण उस समय भी शांत था और अब भी लगता है सुखमय और शांत है. कुसुम की विचारतंद्रा उस के भाई ने ही तोड़ी, ‘‘अरे कुसुम, तू इस समय अकेली कैसे? कु़छ फोन वगैरह तो कर देती?’’

‘‘वह भैया, बस आना पड़ा,’’ सूखा चेहरा, मरियल आवाज में दिए उत्तर से भाई सशंकित हो गया.

‘‘आना पड़ा, मैं समझा नहीं. खैर, चल पहले चाय पी ले, कुछ खा ले फिर बताना.’’

कुसुम की आवाज सुन कर बरामदे में ही सब्जी काटती हुई भाभी दौड़ कर आईं, पांव छुए फिर बैठ गईं. थोड़ी देर बाद चायनाश्ता भी आ गया.

‘‘दीदी, आप तो बहुत दुबली हो गई हैं. 5 साल में चेहरा ही बदल गया. क्या हो गया है आप को?’’ कुसुम के पास आ कर भाभी ने आलिंगन किया और आश्चर्यचकित नजरों से उस की ओर देखती रहीं.

कुसुम बारबार बांहों पर, गरदन पर पड़े जख्मों के निशान छिपा रही थी. लेकिन मेज पर रखी हुई चाय की प्याली उठाते समय गरदन से शाल हट गई और बांह का स्वेटर ऊपर को हो गया, देखते ही भैया दौड़ कर पास आए, घबरा कर पूछा, ‘‘यह सब क्या है, कुसुम? तुम्हारे शरीर पर ये जख्म कैसे हैं?’’

‘‘वह…वह भैया, रवि मारता था. पीटता था. एक बार तो उस ने इतनी जोर से मारा कि दांत तक टूट गया. बस, ये सब उसी के निशान हैं.’’

‘‘इतना सब होता रहा और तुम ने बताया तक नहीं. अरे हम कोई गैर हैं क्या? कभी फोन ही कर देतीं या कोई खत ही डाल देती. पता नहीं तुम ने कितने दुख झेले हैं जीजाजी की मृत्यु के बाद. छि:छि:, इतना कू्रर, बिगड़ा रवि बेटा हो जाएगा. सपने में भी नहीं सोचा था. खैर, कुसुम, तुम ने अच्छा किया जो आ गईं.’’

‘‘वह तो मुझे भूखा तक रखता था. बाहर दरवाजे पर ताला, टैलीफोन पर ताला, फ्रिज और सभी अलमारियों में ताला लगा रहता था. भैया, ऐसी दुर्दशा तो किसी कैदी की भी नहीं होगी जो उस ने मेरी की थी,’’ कहते ही कुसुम फूटफूट कर रोने लगी.

भैयाभाभी घबरा गए. आंसू पोंछे भाभी ने फिर कुसुम से वसीयत की योजना पूछी. थोड़ी देर बाद स्वयं पर काबू पा कर कुसुम ने अपनी नई वसीयत उन दोनों को दिखा दी. भैयाभाभी खुश हुए. बहन को भाई ने खूब प्यार कर के कहा, ‘‘बहन, घबराओ मत. जैसा तुम चाहती हो वैसे ही होगा. वैसे तो अलग रहने की जरूरत नहीं है, लेकिन अगर तुम चाहोगी तो स्वरूपनगर में ही तुम्हें अच्छा मकान मिल जाएगा. अभी तुम आराम करो, चिंता मत करो.’’

‘‘अच्छा भैया,’’ कह कर कुसुम सोफे पर ही लेट गई.

उधर, शाम को जब रवि औफिस से लौटा, पल्लवी ने रोनी सी सूरत ले कर दरवाजा खोला और वह वृक्ष से टूटी हुई डाली सी धम्म से सोफे पर बैठ गई. रवि ने उसे झकझोर कर पूछा, ‘‘क्यों, क्या बात है? सब ठीक तो है.’’

पल्लवी चीख पड़ी, ‘‘कुछ ठीक नहीं है, तुम्हारी मां धोखा दे कर भाग गईं और…’’

‘‘और क्या?’’

‘‘यह देखो, अपने पलंग पर यह चिट्ठी रख गई हैं. लिखा है : ‘मैं जा रही हूं. कुछ भी नहीं मिलेगा तुम्हें जायदाद में से. मैं ने वसीयत बदल दी है. आधी जायदाद बेटी मोनिका और आधी विकलांगों की संस्था के नाम कर दी है. मैं कपूत बेटे से विद्रोह करती हूं. जिस बेटे को पालपोस कर बड़ा किया वह मां पर हाथ उठाता है, वह भी जायदाद के लिए. मेरा सबकुछ तेरा ही तो था. लेकिन तू ने मांबेटे के रिश्ते का कोई लिहाज नहीं किया. तुझ से रिश्ता तोड़ने का मुझे कोई गम नहीं.’’’

कागज का टुकड़ा पढ़ कर रवि पागलों की तरह चिल्लाने लगा. कभी इधर कभी उधर चक्कर लगाने लगा. उधर पत्नी पल्लवी क्रोध में बड़बड़ाने लगी, ‘मैं ने पहले ही कहा था कि मांजी को मत सताओ, मत मारोपीटो, प्यार से उन्हें अपने वश में करो लेकिन तुम ने मेरी एक न सुनी. अब भुगतो. यह घर भी खाली करना पड़ेगा.’

विद्रोह भाग-2

हक्कीबक्की बावली सी कुसुम डायनिंग चेयर पर बैठ गई. एक प्लेट में हलवा रखा था, दूसरी प्लेट में गोभी के गरम परांठे. नाश्ता देते समय शहद सी मीठी बोली में बहू बोली, ‘‘पहले इन कागजों पर साइन कर दीजिए. फिर नाश्ता कर लीजिएगा.’’

‘‘न…न, मैं नहीं करूंगी साइन.’’

‘अच्छा, तो यह आदर, यह प्यार इस लालच में किया जा रहा था. छि:छि:, तुम दोनों ने तो रिश्तों को नीलाम कर दिया है. मैं चाहे मर जाऊं, चाहे मुझे कुछ भी हो जाए, मैं साइन नहीं करूंगी,’ कुसुम बड़बड़ाती रही.

‘‘जाइएजाइए, लीजिए सूखी ब्रैड और चाय, मत करिए साइन. और जब ये आ जाएं तब खाइएगा इन की मार.’’

बहू के शब्द तीरों से भी ज्यादा घायल कर गए कुसुम को. वह बाहर से अंदर तक लहूलुहान हो गई.

मरती क्या न करती. भूखी थी सूखी ब्रैड चाय में डुबो कर खाई, रोती रही. सोचती रही, ‘लानत है ऐसी जिंदगी पर. गाजर का हलवा, भरवां परांठे खा कर क्या मैं तेरी गुलाम बन जाऊं. न…न, मैं अपाहिज नहीं बनना चाहती. मैं अपना सबकुछ तुझे दे दूं और मैं अपाहिज बन जाऊं, यह नहीं हो सकता,’ बुदबुदाती हुई कुसुम, ब्रैड और चाय से ही संतुष्ट हो गई. मन ने कहा, ‘जाए भाड़ में तेरा हलवा और परांठे. मैं अपने जमाने में बचा हुआ हलवा, परांठेऔर पूरी मेहरी तक को खाने के लिए देती थी.’

कुसुम बहू की क्रियाएं आंखें फाड़फाड़ कर देख रही थी. सास की पीड़ा, दुख, व्यथा से बहू अनजान सी अपने कामों में व्यस्त थी. चायनाश्ता कर के उस ने अपना लंच बौक्स तैयार किया, फिर गुनगुनाती हुई पिं्रटैड सिल्क की साड़ी और उसी रंग की मैच करती माला पहन कर कालेज चली गई. बाहर से घर में ताला लगा दिया.

बाहर ताला बंद कर वह हर रोज ही कालेज जाती रही. और तो और टैलीफोन भी लौक कर दिया जाता था. लेकिन उस दिन वह टैलीफोन लौक करना भूल गई. कुसुम ने हर रोज की तरह पूरा घर देखा. हर चीज लौक थी. यहां तक कि फ्रिज में भी ताला लगा हुआ था.

हां, बहू कुसुम के लिए डायनिंग टेबल पर 4 सूखी रोटी और अरहर की दाल बना कर रख गई थी. अनलौक टैलीफोन देख कर कुसुम के दिल में खुशी का खेत लहराने लगा. अब तो पड़ोसिन को फोन कर दूंगी. वह मुझे बाहर भागने में सहायता कर देगी.

उस समय कुसुम में हजार हाथियों की ताकत ने जन्म ले लिया. देह का दर्द भी कपूर सा उड़ गया. आंखों में हीरे सी चमक उत्पन्न हो गई. सब से पहले तो उस ने पड़ोसिन को फोन किया, ‘‘हैलो, कौन बोल रहा है?’’

‘‘मैं बोल रही हूं आंटी, रीता, लेकिन आप फोन कैसे कर रही हैं? क्या आज आप का फोन लौक नहीं है?’’

मुक्ति की खुशी में झूमती हुई कुसुम बोली, ‘‘हांहां बेटी, लौक नहीं है. सुनो, तुम इस समय बाहर का ताला तोड़ कर आ जाओ. तब तक मैं तैयारी करती हूं.’’

‘‘कैसी तैयारी, आंटी?’’ सुन कर रीता को आश्चर्य हुआ.

‘‘बेटी, तुम्हीं ने तो उस दिन कहा था कि आप यहां से भाग जाओ आंटी, किसी और शहर या बेटी के पास.’’

‘‘हांहां, कहा तो था. लेकिन आंटी, आप कहां जाएंगी?’’

‘‘मैं कानपुर अपने भाई के पास जाऊंगी. वह बस स्टेशन पर लेने आ जाएगा, फिर सब ठीक हो जाएगा. बेटी, अगर मैं नहीं गई तो यह मुझ से जबरदस्ती मारपीट कर, नशा पिला कर साइन करवा लेगा और…और…’’ कुसुम फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘और क्या आंटी… बताओ न…’’

‘‘और फिर मुझे दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर फेंक देगा,’’ बोलते हुए कुसुम की आवाज कांप रही थी. पूरी की पूरी देह ही कंपकंपाने लगी थी. उस की देह जवाब दे रही थी. लेकिन फोन रख कर उस की हिम्मत सांस लेने लगी. आशा जीवित होने लगी.

जल्दीजल्दी अलमारी खोल कर अपने कपड़े, रुपए और वसीयत के कागज निकाले, पर्स लिया. ढंग से सिल्क की साड़ी पहन कर दरवाजे के पास अटैची ले कर खड़ी हो गई.

पत्थर से ताला नहीं टूटा तो रीता ने हथौड़ी से ताला तोड़ा. कुसुम दरवाजे के पास ही खड़ी थी.

एक ओर जेल से छूटे कैदी सी खुशी कुसुम के दिल में थी तो दूसरी ओर अपना घर, अपना घोंसला छोड़ने का दुख उसे खाए जा रहा था. वह घर, जिस में उस ने रानी सा जीवन व्यतीत किया, जहां उस ने सोने से दिन और चांदी सी रातें काटीं, जहां उस के आंगन में किलकारियां गूंजती थीं, प्यार का सूरज सदा उगता था, जहां उस के पति ने उसे संपूर्ण ब्रह्मांड का सुख दिया था, जहां वह घंटों पति के साथ प्रेम क्रीड़ाएं करती थी, जो घर खुशियों के फूलों से महकता था, वक्त ने ऐसी करवट बदली कि कुसुम आज उसे छोड़ कर जाने पर विवश हो गई. क्या करती वह? कोई अन्य उपाय नहीं था.

रीता ने अपनी कार में कुसुम को बिठा लिया, उस का सूटकेस उठाते समय रीता भी रोने लगी आंटी के बिछोह पर. रोंआसी रीता ने आंटी से उन के भाई का फोन नंबर ले लिया. और बस पर चढ़ाते समय यह वादा कर लिया कि वह हफ्ते में 2 बार फोन पर उन का हालचाल पता लगाती रहेगी.

जितना दुख कुसुम को अपना घर छोड़ने का था उस से कुछ ही कम दुख रीता से बिछुड़ने का था. ज्यादा देर वह रीता को बस के पास रोकना नहीं चाह रही थी. वह सरहद पर तैनात सिपाही सी सतर्क थी, सावधान थी कि कहीं खोजते हुए उस की बहू या बेटा न आ जाएं. वह उस घर में वापस जाना नहीं चाहती थी, जहां तालाब में मगरमच्छ सा उस का बेटा रहता था, जहां उस की जिंदगी मुहताज हो गई थी.

बस चल पड़ी. वह खिड़की से बाहर आंसूभरी आंखों से रीता को तब तक देखती रही जब तक उस की आकृति ने बिंदु का रूप नहीं ले लिया.

ज्योंज्यों बस आगे बढ़ रही थी उस का अपना शहर दूर होता जा रहा था, वह शहर जहां वह सोलहशृंगार कर के अपने सुहाग के साथ आई थी. उसे लगा उस की जिंदगी एक नदी है जिस ने अपना रास्ता बदल लिया है और वह एक गांव है जो पीछे छूट गया है. बस जितना आगे बढ़ रही थी उस का दिल उतनी ही जोरों से धड़क रहा था. काफी देर बाद उस ने स्वयं को सामान्य स्थिति में पाया.

आगे पढ़ें- अब वह आंखें बंद कर के सोचने लगी, ‘काश, मेरी….

विद्रोह भाग-1

वैसे तो रवि आएदिन मां को मारता रहता है लेकिन उस रात पता नहीं उसे क्या हो गया कि इतनी जोर का घूंसा मारा कि दांत तक टूट गया. बीच में आई पत्नी को भी खूब मारा. पड़ोसी लोग घबरा गए, उन्हें लगा कि कहीं विस्फोट हुआ और उस की किरचें जमीन को भेद रही हैं. खिड़कियां खोल कर वे बाहर झांकने लगे. लेकिन किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि रवि के घर का दरवाजा खटखटा कर शोर मचने का कारण पूछ ले. मार तो क्या एक थप्पड़ तक कुसुम के पति ने उस की रेशमी देह पर नहीं मारा था, बेटा तो एकदम कसाई हो गया है. हर वक्त सजीधजी रहने वाली, हीरोइन सी लगने वाली कुसुम अब तो अर्धविक्षिप्त सी हो गई है. फटेगंदे कपड़े, सूखामुरझाया चेहरा, गहरी, हजारों अनसुलझे प्रश्नों की भीड़ वाली आंखें, कुछ कहने को लालायित सूखे होंठ, सबकुछ उस की दयनीय जिंदगी को व्यक्त करने लगे.

उस रात कुसुम बरामदे में ही पड़ी एक कंबल में ठिठुरती रही. टांगों में इतनी शक्ति भी नहीं बची कि वह अपने छोटे से कमरे में, जो पहले स्टोर था, चली जाए. केवल एक ही वाक्य कहा था कुसुम ने अपनी बहू से : ‘पल्लवी, तुम ने यह साड़ी मुझ से बिना पूछे क्यों पहन ली, यह तो मेरी शादी की सिल्वर जुबली की थी.’

बस, बेटा मां को रुई की तरह धुनने लगा और बकने लगा, ‘‘तेरी यह हिम्मत कि मेरी बीवी से साड़ी के लिए पूछती है.’’

कुसुम बेचारी चुप हो गई, जैसे उसे सांप सूंघ गया, फिर भी बेटे ने मारा. पहले थप्पड़ों से, फिर घूंसों से.

ठंडी हवा का तेज झोंका उस की घायल देह से छू रहा था. उस का अंगअंग दर्द करने लगा था. वह कराह उठी थी. आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. चलचित्र की तरह घटनाएं, बीते दिन सूनी आंखों के आगे घूमने लगे.

‘इस साड़ी में कुसुम तू बहुत सुंदर लगती है और आज तो गजब ही ढा रही है. आज रात को…’ पति पराग ने कहा था.

‘धत्’ कह कर कुसुम शरमा गई थी नई दुलहन सी, फिर रात को उस के साथ उस के पति एक स्वर एक ताल एक लय हुए थे. खिड़की से झांकता हुआ चांद भी उन दोनों को देख कर शरमा गया था. वह पल याद कर के उस का दिल पानी से बाहर निकली मछली सा तड़पने लगा. जब भी खाने की किसी चीज की कुसुम फरमाइश करती थी तुरंत उस के पति ला कर दे देते थे. बातबात पर कुसुम से कहते थे, ‘तू चिंता मत कर. मैं ने तो यह घर तेरे नाम ही लिया है और बैंक में 5 लाख रुपए फिक्स्ड डिपौजिट भी तेरे नाम से कर दिया है. अगर मुझे कुछ हो भी जाएगा तब भी तू ठाट से रहेगी.’

हंस देती थी कुसुम. बहुत खुश थी कि उसे इतना अच्छा पति और लायक बेटी, बेटा दिए हैं. अपने इसी बेटे को उस ने बेटी से सौ गुना ज्यादा प्यार दिया, लेकिन यह क्या हो गया…एकदम से उस की चलती नाव में कैसे छेद हो गया. पानी भरने लगा और नाव डूबने लगी. सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की जिंदगी कगार पर पड़ी चट्टान सी हो जाएगी कि पता नहीं कब उस चट्टान को समुद्र निगल ले.

वह बीते पलों को याद कर पिंजड़े में कैद पंछी सी फड़फड़ाने लगी. उस रात वह सो नहीं पाई.

सुबह उठते ही धीरेधीरे मरियल चूहे सी चल कर दैनिक कार्यों से निवृत्त हो कर, अपने लिए एक कप चाय बना कर, अपनी कोठरी में ले आई और पड़ोसिन के दिए हुए बिस्कुट के पैकेट में से बिस्कुट ले कर खाने लगी. बिस्कुट खाते हुए दिमाग में विचार आकाश में उड़ती पतंग से उड़ने लगे.

‘इस कू्रर, निर्दयी बेटेबहू से तो पड़ोसिनें ही अच्छी हैं जो गाहेबगाहे खानेपीने की चीजें चोरी से दे जाती हैं. तो क्यों न उन की सहायता ले कर अपनी इस मुसीबत से छुटकारा पा लूं.’ एक बार एक और विचार बिजली सा कौंधा.

‘क्यों न अपनी बेटी को सबकुछ बता दूं और वह मेरी मदद करे, लेकिन वह लालची दामाद कभी भी बेटी को मेरी मदद नहीं करने देगा. बेटी को तो फोन भी नहीं कर सकती, हमेशा लौक रहता है. घर से भाग भी नहीं सकती, दोनों पतिपत्नी ताला लगा कर नौकरी पर जाते हैं.’

बस, इन्हीं सब विचारों की पगडंडी पर चलते हुए ही कुसुम ने कराहते हुए स्नान कर लिया और दर्द से तड़पते हुए हाथों से ही उलटीसीधी चोटी गूंथ ली. बेटेबहू की हंसीमजाक, ठिठोली की आवाजें गरम पिघलते शीशे सी कानों में पड़ रही थीं. कहां वह सजेसजाए, साफसुथरे, कालीन बिछे बैडरूम में सोती थी और कहां अब बदबूदार स्टोर में फोल्ंिडग चारपाई पर? छि:छि: इतना सफेद हो जाएगा रवि का खून, उस ने कभी सोचा न था. महंगे से महंगा कपड़ा पहनाया उसे, बढि़या से बढि़या खाने की चीजें खिलाईं. हर जिद, हर चाहत रवि की कुसुम और पराग ने पूरी की. शहर के महंगे इंगलिश कौन्वेंट स्कूल से, फिर विश्वविद्यालय से रवि ने शिक्षा ग्रहण की.

कितनी मेहनत से, कितनी लगन से पराग ने इसे बैंक की नौकरी की परीक्षाएं दिलवाईं. जब यह पास हो गया तो दोनों खुशी के मारे फूले नहीं समाए, खोजबीन कर के जानपहचान निकाली तब जा कर इस की नौकरी लगी.

और पराग के मरने के बाद यह सबकुछ भूल गया. काश, यह जन्म ही न लेता. मैं निपूती ही सुखी थी. इस के जन्म लेने के बाद मेरे मना करने पर भी 150 लोगों की पार्टी पराग ने खूब धूमधाम से की थी. बड़ा शरीफ, सीधासादा और संस्कारों वाला लड़का था यह. लेकिन पता नहीं इस ने क्या खा लिया, इस की बुद्धि भ्रष्ट हो गई, जो राक्षसों जैसा बरताव करता है. अब तो इस के पंख निकल आए हैं. प्यार, त्याग, दया, मान, सम्मान की भावनाएं तो इस के दिल से गायब ही हो गई हैं, जैसे अंधेरे में से परछाईं.

रसोई से आ रही मीठीमीठी सुगंध से कुसुम बच्ची सी मनचली हो गई. हिम्मत की सीढ़ी चढ़ कर धीरेधीरे बहू के पास आई, ‘‘बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है, बेटी क्या बनाया है?’’ पता नहीं कैसे दुनिया का नया आश्चर्य लगा कुसुम को बहू के उत्तर देने के ढंग से, ‘‘मांजी, गाजर का हलवा बनाया है. खाएंगी? आइए, बैठिए.’’

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इंडिया के बाद न्यूयॉर्क में भी चला अनुपम खेर का जादू, देखें PHOTOS

अनुपम खेर एक ऐसा नाम है जो न सिर्फ अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीतते हैं बल्कि अन्य कार्यों से भी दर्शकों को खुद से जोड़ने की कला जो उनके अंदर है वह किसी और में नही है. अपनी अभिनय की कला से उन्होंने सिर्फ बॉलीवुड में ही राज नहीं किया, बल्कि दुनियाभर के थिएटर्स और स्टेज पर दमदार परफॉरमेंस देने वाले इस अभिनेता की कला को हर किसी ने देखा है.न्यूयॉर्क के भी थिएटर प्रेमियों ने हाल ही में अनुपम खेर का ‘कुछ भी हो सकता है’ प्ले देखा.

ये सिर्फ एक प्रदर्शन ही नही था बल्कि दिग्गज अभिनेता की जर्नी पर आधारित एक नाटक था. पहले ही सीन से अनुपम खेर ने अपनी परफॉरमेंस से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

शहर के crème de la crème में एक शाम की मेजबानी की गई, जिसमें 120 मेहमान शामिल हुए जिसकी वजह से यह पूरा भर गया. एक सहज कलाकार के तौर पर पहचाने जाने वाले अनुपम खेर जल्द ही दर्शकों से काफी घुलमिल गए, जिसके बाद वह उन्हें चुटकुले सुनाते हुए नज़र आए.

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यह स्पष्ट था कि चाहे हज़ारों दर्शक हो या फिर प्ले देखने वाले 120 लोग अनुपम खेर दर्शकों का ध्यान कैसे अपनी तरफ खींचना है यह बखूबी जानते हैं.

अनुपम खेर जिस तरह से अपना परफॉरमेंस दे रहे थे उसे देखकर दर्शक भी तुरंत अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर रहे थे. एक ऐसी प्रतिभा जिसके लिए किसी भी कलाकार को सालों की मेहनत की जरूरत होती है. पूरा हॉल दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था.

परफॉरमेंस के बाद, भारत के राजदूत और संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि, सैयद अकबरुद्दीन ने कहा, “मुझे कभी भी रंगमंच मेइन दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन मैंने जो आज देखा वह इससे पहले कभी नही देखा. अनुपम खेर अपने हम सभी को कर्जदार बना दिया है क्योंकि दर्शकों को खुद से इतने लंबे समय तक जोड़े रखना किसी आम व्यक्ति के बस भी बात नही है. ”

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दर्शकों से मिली प्रतिक्रिया पर अपनी ख़ुशी व्यक्त करते हुए अनुपम खेर ने कहा, “दर्शकों को ये बहुत ही अच्छा लगा, खासकर उन्हें वो हिस्सा पसंद आया जिसमें मैंने अपनी असफलताओं के बारे में बताया| मैं एक ऐसा नाटक करना चाहता था जोकि मेरी आत्मकथा हो. उस स्टूडियों में 130 लोग फिट होते हैं और एक हाथ की दूरी पर बैठे दर्शकों के सामने प्ले करने में बहुत मज़ा आया. यह काफी शानदार अनुभव था. मैं एक दिन बाद यानि की शनिवार की शाम को प्ले कर रहा हूं. यहां पर ज़्यादातर भारतीय दर्शक थे, इसके अलावा अमेरिकी और चीनी ऑडियंस भी मौजूद थी. उन्होंने महसूस किया कि यह एक ऐसा जीवन है जो बहुत प्रेरणादायक हो सकता है. ”

अनुपम खेर हाल ही में न्यूयॉर्क में एक अतिथि वक्ता के रूप में पहुंचे थे, जहां उन्होंने सिनेमा के लिए अपने प्यार के बारे में बात की. अनुपम खेर ने अब तक 500 फिल्मों से ज़्यादा में अभिनय किया है और वह अपनी अविश्वसनीय प्रतिभा के साथ अंतर्राष्ट्रीय प्लेटफार्मों पर भारत को गौरवान्वित करा रहे हैं.

अनुपम खेर अभी अपने अमेरिकी मेडिकल शो न्यू एम्स्टर्डम की शूटिंग कर रहे हैं , जिसमें वह डॉक्टर विजय कपूर की भूमिका निभा रहे हैं.

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चार दिनों से सुलगती आग में जल रही है दिलवालों की दिल्ली

दिल्ली महज देश की राजधानी नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम भी है. दिल्ली को आप लघु भारत भी कह सकते हैं. फर्राटा भरती मेट्रो, सड़कों पर दौड़ते वाहन, चांदनी चौक के पराठे, पुरानी दिल्ली की सकरी गलियां, गालिब का शहर, भारत का भविष्य तय करती संसद, शूरवीरों की गाथा सुनाता इंडिया गेट, कनॉट प्लेस में लंबी गाड़ियों वाले लोगों की जमात और वहीं पर इश्क लड़ाते नौजवान…

अभी भी बहुत कम बताया है दिल्ली के बारे में…दरअसल दिल्ली को लफ्जों या अल्फ़ाजों में बयां करना बेहद मुश्किल काम है. यहां की तासीर इतनी खूबसूरत है कि हवा में जहर घुले होने के बावजूद इस खुशबू से दूर जाने का दिल नहीं करता. कमोबेश आज मेरी दिल्ली सुलग रही है. हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं.

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उत्तर पूर्वी दिल्ली में पिछले चार दिनों से फैली हिंसा के कारण दहशत का माहौल है. लोग अब भी घरों से निकलने में डर रहे हैं. सीलमपुर, जाफराबाद, मौजपुर, कबीरनगर, विजयपार्क आदि इलाकों में ऐसा ही माहौल है. लोग काम धंधों पर जाना बंद कर चुके हैं. हालांकि, तीसरे दिन स्थिति तनावपूर्ण मगर नियंत्रण में है. कई दुकानों में हुई लूट के कारण लोग अब अपनी दुकानें और घर बचाने के लिए रतजगा करने को मजबूर हैं.

विजय पार्क में रहने वाले विजेंद्र कुमार ने बताया, “सोमवार की रात मोहल्ले में उपद्रवियों के हमले के बाद से लोगों में डर और दहशत का माहौल है. हम मारकाट नहीं चाहते, लेकिन रात-रात भर जागकर डंडा लेकर घरों की रखवाली करने को मजबूर हो गए हैं. क्योंकि कब कौन आकर के घरों और दुकानों पर हमला कर दे कुछ कहा नहीं जा सकता. डंडे थाम कर हम भले ही उपद्रवी की तरह दिखते हो सच पूछिए तो हमारे लिए मजबूरी हो गई है डंडे थामना. अपना सिर्फ घर बचाना चाहते हैं.”

मोहल्ले के ही राहुल ने कहा कि वो कॉल सेंटर में जॉब करते हैं. नाइट ड्यूटी करते हैं। लेकिन डर के मारे जाना बंद कर चुके हैं. अपने बॉस को मेल कर घर से ही काम करने की इजाजत मांग चुके हैं.

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जाफराबाद के इरशाद हिंसा के कारण रोजी रोटी पर असर पड़ने की बात कहते हैं. जूस की दुकान चलाने वाले इरशाद ने कहा कि रविवार से ही उनकी दुकान बंद चल रही है. हर रोज कम से कम वह हजार रुपए कमा लेते थे, मगर यह मामूली सी कमाई भी अब नहीं हो रही है दुकान में ताला डालना मजबूरी हो गई. हमारे जैसे तमाम दुकानदारों का भी यही हाल है.

सीलमपुर रेड लाइट पर दो दर्जन से अधिक दुकानें हैं लेकिन इसमें सिर्फ एक दुकान खुली है चाय और पकौड़ी की. चाय पकौड़ी की दुकान पर भी खरीददारों की संख्या बड़ी कम है. आज के लिए मीडियाकर्मी इस दुकान के लिए कस्टमर बने हैं. दुकानदार का कहना है कि तनाव पैदा होने के बाद से राहगीरों ने सीलमपुर से जाफराबाद मौजपुर वाले रोड पर आना जाना कम कर दिया है.

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प्रधानमंत्री के निर्देश पर मंगलवार की रात से लेकर बुधवार को 16 घंटे का ऑपरेशन चलाकर अजित डोभाल ने उत्तरी-पूर्वी दिल्ली के बेकाबू होते हालात को काबू में किया. मंगलवार की रात साढ़े 11 बजे और बुधवार को साढ़े तीन बजे दो बार वह उत्तरी-पूर्वी डीसीपी दफ्तर पहुंचे. इन 16 घंटों में डोभाल ने पुलिस, अर्धसैनिक बलों की ठीक संख्या में तैनाती, दोनों पक्षों के प्रभावशाली लोगों और धर्मगुरुओं से शांति की अपीलें से लेकर हर वो रणनीति अपनाई जिससे सड़कों पर भीड़ आने से रोका जा सके.

भारत भूमि युगे युगे: इन से भी न हुआ

जब मंचीय कवि कुमार विश्वास आम आदमी पार्टी से जुड़े थे तो उन्हें अपने मित्र अरविंद केजरीवाल से बड़ी उम्मीदें थीं कि लोकसभा चुनाव हारने के एवज में वे उन्हें राज्यसभा भेज देंगे, लेकिन हुआ उलटा कि उन्हें आप से ही बाहर कर दिया गया. यह कसक अक्सर कुमार विश्वास को सालती रहती है और वे हर कहीं अपने भूतपूर्व यार को दगाबाज वगैरह कविताओं के जरिए बताते रहते हैं.

चुनाव प्रचार के दिनों में शाहीनबाग मसले पर उन्होंने केजरीवाल को गुंडे सप्लाई करने वाला बताया था. अभी तक जिन लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि केजरीवाल ने कुमार को अपने विश्वास से बाहर क्यों किया था, उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले वे वीडियो देखने चाहिए जिन में कुमार विश्वास रामकथा बांच रहे हैं और वर्णव्यवस्था की पूरी धूर्त निष्ठा से हिमायत करते नजर आ रहे हैं.

दरअसल, केजरीवाल ने मायावती के अंजाम से सबक लिया है कि पंडित सतीश मिश्रा जैसा मनुवादी असिस्टैंट कैसे नैया डुबोता है.

दत्तक ठाकरे

दूसरे करोड़ों लोगों की तरह मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने भी सोचा यही होगा कि कुछ भी हो जाए, उन के कजिन व शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार नहीं बनाएंगे. लेकिन जब ऐसा हो ही गया तो उन्हें पहली बार समझ आया कि असल नादान और अपरिपक्व तो वे खुद हैं जो चाचा बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी अपने को मानते और समझते रहे थे.

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साबित हो गया कि घुटना पेट की तरफ ही मुड़ता है, इस के बाद भी राज, उद्धव नाम के घुटने के टूटने का उबाऊ इंतजार करते रहे. अब खुद पूरी तरह टूट चुके राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी मनसे के झंडे को पूरी तरह भगवा कर मैसेज दे दिया है कि अमित शाह अगर चाहें तो वे भाजपा की गोद में जाने के लिए तैयार हैं. लेकिन पहले से ही अपने दर्जनभर कमजोर दत्तक पुत्रों की नालायकी से परेशान भाजपा किसी नए राजदुलारे के पालनपोषण का जोखिम उठाएगी, फिलहाल ऐसा लग नहीं रहा.

धनुषबाण हो साथ

इन दिनों सब से सुखी राजनीतिक पिता कोई अगर है तो वे गुरुजी के नाम से मशहूर शिबू सोरेन हैं जिन के बेटे हेमंत सोरेन ने झारखंड की सत्ता सफलतापूर्वक संभाल ली है. झारखंड मुक्ति मोरचा के जनक शिबू सोरेन ने आदिवासियों को नया मंत्र यह दिया है कि वे बाजार में हों या ससुराल में, अपनी संस्कृति के चिह्न तीरधनुष को वैसे ही हमेशा साथ रखें जैसे सिख समुदाय के लोग पगड़ी पहनते और कृपाण साथ में रखते हैं.

कहना तो वे यह चाह रहे थे कि जैसे पंडेपुजारी चुटिया रखते हैं, तिलक लगाते हैं, रुद्राक्ष की माला पहन कर अपनी संस्कृति व दुकान की नुमाइश करते हैं वैसा ही आदिवासियों को भी करना चाहिए जिस से कोई उन्हें जबरिया हिंदू बनाने की जुर्रत न करे.

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अच्छा तो यह होगा कि खुद गुरुजी इस की पहल करें जिन्हें झारखंड का गार्जियन कहा जाने लगा है. लेकिन यह भी वे सोच लें कि हिंदूवादी फिर कहेंगे कि इन वनवासियों को धनुषबाण चलाना सिखाया तो हमारे रामजी ने ही था, इसलिए वे हिंदू ही हैं.

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डाक्टर डेंग बनाम खेरू

अनुपम खेर और नसीरुद्दीन शाह दोनों सुभाष घई की हिट फिल्म ‘कर्मा’ में एकसाथ नजर आए थे जिस में अनुपम डाक्टर डेंग नाम के खूंखार आतंकवादी के रोल में थे जबकि नसीद्दीन आतंकवादियों के खेरू नाम के मामूली प्यादे बने थे जिसे जेल से दादा ठाकुर यानी दिलीप कुमार निकाल कर लाए थे और डेंग को मारने में उस का इस्तेमाल किया था. नेकी और बदी की इस राष्ट्रीय लड़ाई में मारा खेरू भी गया था वह भी डेंग के गुर्गों के हाथों.

हालिया विवाद जिस में नसीरुद्दीन ने अनुपम को चाटुकार और अनुपम ने उन्हें नशेड़ी कहा, वह भी खूब हिट रहा. इस अहिंसक शाब्दिक युद्ध का फिल्म ‘कर्मा’ से कोई लेनादेना नहीं है क्योंकि वह फिल्म थी और यह इन बुढ़ाते कलाकारों का छिछोरापन, कुंठा और हकीकत है. कल्पना ही की जा सकती है कि दादा ठाकुर के रोल में अब कौन फिट बैठेगा जो खेरू को सुधारे और डेंग को गूंज वाला थप्पड़ मार पाए.

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जब डेट पर जाएं सिंगल पेरैंट

सिंगल पेरैंटिंग अपनेआप में एक चैलेंज है. समाज और परिवार को आप से बहुत अपेक्षाएं होती हैं. ऐसे में आप जब एक बार फिर डेट पर जाने की सोचें तो कई बातों का खयाल रखना जरूरी है. देश में जैसे-जैसे तलाक के केस बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे सिंगल पेरैंट्स की संख्या भी बढ़ती जा रही है. ऐसे में अपने बच्चों की केयर करते हुए वे फिर किसी को डेट करें या नहीं, उन के सामने यह सवाल उठ खड़ा होता है.

सिंगल पेरैंट की बहुत सी जिम्मेदारियों के साथ यह स्थिति उन के लिए काफी जटिल होती है क्योंकि उन के दिमाग में अपने बच्चे की सुरक्षा और जरूरतें प्राथमिकता में होती हैं. 2 बच्चों की सिंगल पेरैंट मां सुलेखा कहती हैं, ‘‘जब आप सिंगल हो, आप पार्टी, डिनर, छुट्टी जब चाहे एंजौय कर सकते हैं, पर जब आप का बच्चा साथ हो, आप हर चीज बच्चे की टाइमिंग्स, उस की उम्र व उस की जरूरतों के अनुसार ही तय करते हो.’’

11 और 16 वर्षीय बेटों की सिंगल पेरैंट अंजलि का कहना है, ‘‘समाज और फैमिली की अलग ही उम्मीदें हैं, इसलिए मैं खुल कर डेट नहीं कर पाई. मुझे कोई गिल्ट नहीं था. पर मैं अपने पेरैंट्स के सामने डेटिंग नहीं कर पाई, यह स्वीकार करना मेरे पेरैंट्स के लिए मुश्किल था कि मैं आगे बढ़ रही हूं. उन्हें हमेशा यही आशा थी कि मैं अपने एक्स हस्बैंड के पास वापस चली जाऊंगी.’’

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प्राजक्ता देशमुख के अनुसार, ‘‘यह याद रखना चाहिए कि सुखी माता या पिता ही बैस्ट माता-पिता होते हैं और यदि डेटिंग से उन्हें खुशी मिल रही है तो उन के जीवन में यह खुशी आनी ही चाहिए. अपने नए पार्टनर को बच्चे के बारे में साफ बता देना चाहिए. पर बच्चों को अपने पार्टनर के बारे में बताने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए.’’

8 वर्षों से सिंगल पेरैंट रह रहीं रीता कहती हैं, ‘‘मैं अपने बच्चों के बारे में क्यों छिपाऊं? वे मेरे जीवन के सब से प्यारे लोग हैं. यदि कोई मेरे बच्चों को स्वीकार नहीं करता, तो बस, बायबाय. मैं अपने नए पार्टनर को पहले अपना दोस्त कह कर बच्चों से मिलवाती हूं. 4 साल मैं ने जिसे डेट किया, वे उस से 5 बार मिले. मुझे महसूस हुआ कि सिंगल पेरैंट के बच्चों के लिए भी यह स्थिति काफी कन्फ्यूजिंग होती है. उन के पास 2 अलगअलग रूल्स वाले घर होते हैं. ऐसे में आप एक नया पर्सन उन के सामने ले आते हैं तो और रूल्स जुड़ जाते हैं. तभी मैं ने तय कर लिया कि मैं सिंगल पेरैंट बन कर ही रहूंगी.’’

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7 साल के बेटे की सिंगल पेरैंट आरती की कोशिश रहती है कि डेटिंग से पहले नया व्यक्ति उस का अच्छा दोस्त बन जाए. वह मेरे बेटे को और मेरा बेटा उसे पसंद करता हो. दोनों एकदूसरे की कंपनी एंजौय करते हों. अगर मैं दोनों के बीच यह पौजिटिव एनर्जी देख लूंगी, तभी मैं आगे बढ़ने के बारे में सोच सकती हूं.’’ सिंगल पेरैंट अगर वर्किंग हैं तो उन के सामने सब से बड़ा चैलेंज होता है कि वे कैसे अपना टाइम मैनेज करें.

सुलेखा कहती हैं, ‘‘मैं 9 बजे के बाद वीकडेज में बाहर जाती हूं. मैं घर पर अपनी डेट से कभी नहीं मिलती. मेरे बच्चे वीकैंड पर अपने पिता के पास चले जाते हैं. मैं तब पूरी तरह से फ्री होती हूं.’’ आरती ने वीकैंड को बेटे के साथ टाइम बिताने के लिए रिजर्व रखा है. उस ने कह रखा है कि वह वीकडेज में ही मिल सकती है. वीकैंड में वह अपने बेटे को बाहर उस की पसंद की जगह ले कर जरूर जाती है. वह कभी डेट को अपने बेटे के सामने घर नहीं लाती और उस ने यह क्लियर कर रखा है कि बेटे से संबंधित जब भी कोई इमरजैंसी होगी, वह हर चीज पीछे छोड़ सकती है. वह कहती है, ‘‘अपने लिए टाइम मैनेज करना एक चैलेंज होता है. पहले बच्चा, फिर दोस्त, उस के बाद अपने लिए टाइम बचता है. कभीकभी थकान हो जाती है.’’

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पुरुषों के लिए स्थिति अलग 10 साल के बेटे के सिंगल पेरैंट अजय कहते हैं, ‘‘मेरी पत्नी के बजाय बेटे ने मेरे साथ रहना चुना. सिंगल पिता को महिलाएं ज्यादा विश्वसनीय डेटिंग औप्शन मानती हैं. मेरा बेटा मेरे साथ रहता है, इसलिए उन्हें लगता है कि मैं बहुत जिम्मेदार इंसान हूं. मेरा बेटा समझदार है. उसे नए लोगों से मिलने में कोई प्रौब्लम नहीं होती. वह हर जगह एडजस्ट कर लेता है. ‘‘मेरा रिलेशन लौंग टर्म चले या शौर्ट टर्म चले, मैं उन्हीं लोगों को बेटे से मिलवाता हूं जिन के बारे में मुझे पता होता है कि वे मेरे बेटे के साथ ठीक से रहेंगे. मेरी मां मेरे साथ रहती हैं, इसलिए मुझे किसी से मिलने बाहर भी जाना हो तो मेरे बेटे को देखने के लिए कोई घर पर होता है.

वैसे, मेरी प्राथमिकता काम पर से घर ही आने की होती है. मैं अपने बेटे के साथ कुछ समय बिताता हूं. साढ़े 9 बजे उस के सोने के बाद ही बाहर जाता हूं.’’ अजय कहते हैं, ‘‘सभी सिंगल पेरैंट्स को अपने बच्चों से खुली बात करनी चाहिए. बच्चे सवाल पूछते हैं. कुछ पेरैंट्स उन्हें चुप करा देते हैं. मैं यह कभी नहीं करता. वह चाहे कुछ भी पूछे, चाहे सैक्सुअलिटी पर ही, मैं जवाब देने की कोशिश जरूर करता हूं. जैसेजैसे बच्चे बड़े होते हैं, अपने आसपास बहुतकुछ देखते हैं. उन का सवाल पूछना स्वाभाविक है.

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बच्चों के साथ हैल्दी बात होने का माहौल रहना चाहिए. उन के साथ नम्र रहना चाहिए.’’ अंजलि ऐसी ही स्थिति से गुजरी हैं. कुछ साल पहले उन के बेटे ने पूछ लिया कि क्या वे किसी को डेट कर रही हैं? वे बताती हैं, ‘‘मेरी लाइफ में किसी के आने से वह खुद को इनसिक्योर समझने लगा. मुझे अजीब सी स्थिति से निबटना पड़ा. उसे समझना पड़ा कि किसी से मिलने, किसी के साथ मूवी जाने से मेरी लाइफ में उस का महत्त्व कम नहीं हो जाएगा. वह ही मेरी पहली प्राथमिकता रहेगा. अपने बच्चों से फ्रैंडली बात करने की आदत यहां बड़ी काम आई.’’

कई बार बच्चे खुद ही महसूस करने लगते हैं कि उन के पेरैंट्स के लिए कौन सही रहेगा. मोना बताती हैं, ‘‘मेरे सभी दोस्तों में मेरा बेटा अंदाजा लगा लेता है कि कौन मेरा अच्छा, सही दोस्त हो सकता है. जिन्हें मैं ने डेट किया, उन के बच्चों के साथ उन का कैसा संबंध रहा है, यह भी जानना जरूरी होता है. बच्चों का साथ होना आप को सिखा देता है कि लाइफ में क्या महत्त्व रखता है.’’

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आरती के अनुसार, बच्चों की जिम्मेदारी के चलते उन के सामने यह स्पष्ट था कि उन्हें लाइफ में अब क्या नहीं चाहिए. उस ने बताया, ‘‘जिस ने बच्चों को साइडलाइन करने की कोशिश की, उसे मैं ने साफसाफ न कहने में देर नहीं लगाई. जब आप अपने बच्चों की लाइफ, फ्यूचर, कैरियर के बारे में सोचते हो तो आप के सोचने का नजरिया कुछ और होता है. आप को लगता है कि किसी इडियट के साथ रहने से अच्छा है अकेले रहना.

सिंगल पेरैंट के लिए मेरी यही सलाह है कि भावनात्मक रूप से इनसिक्योर लोगों से दूर रहो. अपने इमोशंस, अपने बच्चों के इमोशंस और फिर तीसरे व्यक्ति के इमोशंस मैनेज करना बहुत मुश्किल है.’’

इसी कड़ी में आगे पढ़िए सिंगल पैरेट्स के लिए परफैक्ट डेटिंग टिप्स…

मुद्दा: जलकुंभी से खतरा

लेखक- रामकिशोर दयाराम

पंवार जलकुंभी की वजह से सतपुड़ा जलाशय 60 प्रतिशत घट चुका है. यदि इसे जल्दी ही जड़मूल से नष्ट न किया तो यह पूरे जलाशय को अपनी आगोश में जकड़ लेगी. मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा को कहीं आने वाले समय में चाइनीज झालर यानी जलकुंभी निगल न ले, इस बात पर चिंता करना और चतुराई दिखाना होगा. चाइनीज झालर ने वर्ष 1960 के दशक से नगरीय क्षेत्र की जीवनदायिनी तवा नदी पर बने सतपुड़ा जलाशय को बुरी तरह से अपनी आगोश में जकड़ लिया है.

नदियों की बहती जलधारा के संग जिस दिन तवानगर के तवा जलाशय को अपना शिकार बनाने के बाद ब्रांदा बांध में नर्मदा से मिलने जलकुंभी पहुंच गई उस दिन नर्मदा को अपने आंचल को बचाना मुश्किल हो जाएगा. वर्तमान समय में सतपुड़ा बांध अपने अस्तित्व की लड़ाई में सुरसारूपी चाइनीज झालर के जबड़े में जकड़ा अपने स्वरूप को बचाने के लिए हाथपांव मारने को विवश है.

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बैतूल जिले के सारणी स्थित सतपुड़ा ताप बिजलीघर के लिए 2,875 एकड़ में फैले सतपुड़ा जलाशय का 60 प्रतिशत भाग पिछले नवंबर में ही विदेशी खरपतवार से पट चुका है. चाइनीज झालर को जड़मूल नष्ट करने के लिए अगर अभी नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी. सतपुड़ा जलाशय को बचाने का एकमात्र विकल्प सामूहिक प्रबंधन है जिस में सब की सहभागिता सुनिश्चित होनी जरूरी है. चाइनीज झालर जलकुंभी को वाटर हाइसिंथ कहते हैं. इसे समुद्र सोख भी कहा जाता है. यह एक विदेशी जलीय खरपतवार है. भारत में यह 1855 में कोलकाता में पहली बार देखी गई. बीते 164 वर्षों में कोलकाता में दिखी जलकुंभी ने देशभर के जलाशयों में तेजी से फैलना शुरू कर दिया.

नतीजा यह निकला कि वायुमार्ग से कहें या जलमार्ग से, किसी न किसी बहाने कोलकाता से बैतूल तक पहुंची इस जलकुंभी ने भयावह समस्या पैदा कर दी है. जलकुंभी पर अपनी रिसर्च रिपोर्ट प्रस्तुत कर चुके वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में रोचक जानकारी को परोसा है जिस के अनुसार जिस जलाशय में जलकुंभी होती है, उस जलाशय के पानी का वाष्पीकरण 7 गुना तेजी से होता है. दरअसल, जलकुंभी में 90 प्रतिशत पानी होता है. इस वजह से यह पानी का वाष्पीकरण करने में सहायक है. छोटे तालाबों में यदि जलकुंभी फैल जाए तो उसे बहुत तेजी से सुखा देती है. वहीं, साल्विनिया मोलेस्टा, जिसे भी चाइनीज झालर कहते हैं, साउथ इंडिया में पाई जाने वाली इस खरपतवार को बैतूल जिले की विद्युत नगरीय सारनी क्षेत्र का मौसम उपयुक्त मिला, जिस के चलते यह खरपतवार कुछ ही दिनों में जलाशय के पानी के ऊपर किसी खेल मैदान की घास की तरह फैल गई.

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सतपुड़ा जलाशय में तीसरी सब से ज्यादा प्र्रभावित करने वाली खरपतवार हाइड्रा वर्टिसीलाटा है. यह पानी के भीतर पाई जाती है. इस के अलावा टाइफ समेत अन्य जलीय खरपतवार सतपुड़ा जलाशय में तेजी से फैल रही हैं. सतपुड़ा जलाशय को विदेशी खरपतवार से बचा पाना मुश्किल हो जाएगा, ऐसे संकेत खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर, के डा. सुशील कुमार और डा. वी के चौधरी द्वारा दिए गए हैं. सामने आएंगे दुष्परिणाम जलाशय में तेजी से फैल रही खरपतवार के दुष्परिणाम गरमी के दिनों में सामने आते हैं. भारी बारिश के चलते कई बार सतपुड़ा जलाशय के गेटों को खोला जाता है तो जलाशय में पहाड़ी नदियों से मिट्टी, पत्थर के कण, शहरी नालों का मलबा और सतपुड़ा जलाशय की राख नहरों में पहुंचने लगते हैं जिस से उस की क्षमता घट जाती है. वर्ष 1960 में सतपुड़ा जलाशय के निर्माण के समय जलाशय की क्षमता 110 एमसीएम थी. वर्ष 2008 के सर्वे में 75 एमसीएम रह गई है. इसलिए गरमी के दिनों में पानी की किल्लत से इनकार नहीं किया जा सकता.

जलीय खरपतवार को निकालने का ठेका जिस कंपनी को दिया गया, उस ने कम दर पर काम का ठेका तो ले लिया लेकिन जलीय खरपतवार को जलाशय से पूरी तरह निकालना उस के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ. शासकीय निविदा स्वीकृत दर से कम दर पर ठेका लेने के बाद जब सतपुड़ा जलाशय में जलकुंभी की जमीन को तलाशने के लिए गोताखोरी की गई तो जान गले में अटक गई. सफाई मशीन हुई बीमार जलाशय के विभिन्न चिह्नित 5 क्षेत्रों की सफाई के लिए मध्य प्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी ने एक करोड़ 36 लाख रुपए का टैंडर निकाला था. यह टैंडर एमबी (मठारदेव बाबा कंस्ट्रक्शन) कंपनी ने 24 लाख रुपए कम में यानी 1 करोड़ 2 लाख रुपए में ले लिया है. सफाई का कुल क्षेत्रफल 7 लाख 52 हजार 100 वर्गमीटर है. सफाई का कार्य एमबी कंपनी को 2 सालों तक करना है. 75.21 हैक्टेयर की सफाई का काम चरणजीत सिंह सैनी के 3 सहयोगी रमेश सरोज, शकील, ओ झा की सा झेदार कंपनी को दिया गया.

वीड़ हार्वेस्टर (नदियों में चल कर खरपतवार निकालने का काम करती है) मशीन आई जिसे पूरी खरपतवार को निकालना था. लेकिन असमय ही मशीन ने दम तोड़ दिया. 13 अक्तूबर, 2019 को बीमार मशीन इलाज कराने के लिए फरीदाबाद ले जाई गई. सो, सारनी में जो काम मशीन से होना था, वह अब मजदूरों द्वारा करवाया जा रहा है जिस के कारण पूरी तरह से जलकुंभी का निकलना दिल्ली की तरह दूर हो गया है. विदेशी परिंदों की जान को खतरा मध्य प्रदेश के सतपुड़ा जलाशय पिछले डेढ़ साल से साल्विनिया मोलेस्टा समेत अन्य खरपतवार से ग्रसित है. साल्विनिया मोलेस्टा नामक खरपतवार पानी में तेजी से फैलती है और पूरे पानी की सतह पर फैल जाती है. जिस वजह से देशविदेश से आने वाले प्रवासी पक्षियों को जलाशय में पानी नजर नहीं आता और पक्षी परेशान हो कर कहीं और चले जाते हैं. इस खरपतवार की वजह से जलाशय में मछलियों की भी मृत्यु होने लगी है. द्य हमारी बेडि़यां मेरी परिचित पड़ोसिन महिला मेरे घर आईं. वे कौलबैल न बजा कर अपनी चाबी की रिंग से गेट खटखटाने लगीं. मैं रसोई के काम में व्यस्त थी.

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हड़बड़ा कर खिड़की से बाहर झांक कर देखने लगी तो उन्हें पहचान गई. मैं वहीं से ऊंची आवाज लगा कर बोली, ‘‘गेट खुला ही है. आप हैंडल खोल कर अंदर आ जाइए.’’ वे गेट के पास ही खामोश, अनमनी सी खड़ी रहीं, तो मजबूर हो कर मुझे ही बाहर आना पड़ा. मैं ने बाहर आ कर गेट खोला और बोली, ‘‘गेट तो बस हैंडल से ही बंद था. आप उसे खोल कर अंदर क्यों नहीं आ गईं?’’ इस प्रश्न पर उन्होंने जवाब दिया, ‘‘लोगों के घरों में सफाई करने व कूड़ा उठाने वाले लोग भी बैल बजा कर अपनेआप गेट खोल कर कूड़ा लेने के लिए आते हैं और जाते समय गेट बंद भी करते हैं. उन के कारण बैल का स्विच और हैंडल गंदा हो जाता है. इसीलिए, मैं किसी के घर का गेट अपने हाथ से नहीं खोलती और कौलबैल भी नहीं बजाती.’’ मैं बरबस बोल पड़ी, ‘‘उन से ऐसी गंदगी तो नहीं हो जाती है?’’ इस प्रश्न पर वे कुछ नहीं बोलीं और वापस चली गईं. और मैं काफी देर तक उन की दकियानूसी सोच के बारे में सोचती रही. रेणुका श्रीवास्तव (सर्वश्रेष्ठ) मेरे पड़ोसी सिन्हा साहब का परिवार बहुत अंधविश्वासी है. उन के कथनानुसार परिवार के मुखिया के खाए बिना घर के नौकर को खाना नहीं देना चाहिए और बृहस्पतिवार को पैसा भी नहीं देना चाहिए, इस से घर का रुपयापैसा चला जाता है और खाने का अंश निकल जाता है. फिर वह खाना किसी अंग में नहीं लगता.

व्यवसायी परिवार होने की वजह से वे लोग 3 बजे दिन में खाना खाते हैं. उन की नौकरानी बहुत गरीब और विधवा है. सुबह को दो रोटी खा कर वह 3 बजे तक भूख से तड़पती रहती है. सब के खाने के बाद, सब कुछ निबटा कर, उसे खाना मिलता है. पड़ोसिन मु झे भी बारबार टोकती हैं कि आप नौकरानी को खाना सब के साथ क्यों देती हैं, किंतु मु झे इस में विश्वास नहीं है कि जिस बाई के कठिन परिश्रम से मु झे मेरी पसंद का खाना बैठेबिठाए मेज पर मिल जाता है, उसे खाना मैं देर से दूं. सिन्हा परिवार के इस अटूट विश्वास के बाद भी उन के यहां खर्चे की किचकिच मची रहती है जबकि मैं बहुत संतुष्ट और बाई भी बहुत खुश रहती है. न जानें क्यों लोग अंधविश्वास के पीछे मानवता को भूल जाते हैं. पुष्पा श्रीवास्तव द

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प्रियंका से दस साल छोटे निक जोनस का बयान- रिश्ते में उम्र से नहीं पड़ता फर्क

बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा आए दिन निक जोनस के साथ रिश्ते को लेकर चर्चा में बनी रहती हैं. प्रियंका औऱ निक के उम्र में दस साल का डिफरेंस है. लोग अक्सर इस बात पर सवाल करते नजर आते हैं.उम्र को लेकर हमेशा दोनों को ट्रोलर का सामना करना पड़ता है.वहीं प्रियंका के पति निक जोनस का इस बात पर बयान आया है.

निक ने अपने और प्रियंका के रिश्ते को खूबसूरत बताते हुए कहा है मैं 27 का हूं और मेरी पत्नी 37 की हैं कितना कूल है हम दोनों का रिश्ता.

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प्रियंका पहले भी इस बात पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुकी हैं. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है हम दोनों साथ में बहुत खुश हैं. हमारी फैमली को कोई दिक्कत नहीं है.

बीते दिनों प्रियंका ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपनी पुरानी तस्वीर शेयर की थी. जिसमें प्रियंका  ने  मिस वर्ल्ड 2000 का खिताब जीता था.

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पोस्ट में लिखा है यह 20 साल पुरानी तस्वीर है इसे देखकर ऐसा लग रहा है जैसे कल की ही बात हो, अगर आपके मन में कुछ कर दिखाने की तमन्ना हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है.

बता दें जिस वक्त प्रिंयका के हाथ में मिस वर्ल्ड 2000 का खिताब था उस वक्त प्रियंका की उम्र 18 साल थी तो वहीं निक जोनस उस वक्त 8 साल के थें.

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प्रियंका अपने शादीशुदा जीवन में बहुत खुश है. अक्सर अपने ससुराल वालों के साथ तस्वीर शेयर करती रहती हैं. हाल ही में प्रियंका अपनी मां की 40वीं सालगिरह मनाते दिखी थीं जिसमें उनके करीबी दोस्त और रिश्तेदार मौजूद थें.

वर्कफ्रांट की बात करें तो प्रियंका फिल्म ‘द स्काई इज पिंक’के बाद  कई प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं, लेकिन इस बारे में उन्होंने खुलासा नहीं किया है. इस फिल्म में फरहान अख्तर के साथ प्रियंका की जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया था.

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