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1 महीने के हुई Shilpa Shetty की बेटी Samisha, PHOTO शेयर कर लिखा ये इमोशनल मैसेज

पिछले महीने सरोगेसी के जरिए मां बनीं शिल्पा शेट्टी कुंद्रा (Shilpa Shetty Kundra) की बेटी समीशा (Samisha) अब एक महीने की हो चुकी हैं. इस खुशी में शिल्पा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक बेहद प्यारी फैमिली फोटो शेयर की है और बेटी के नाम इमोशनल मैसेज लिखकर अपना प्यार भी जाहिर किया है. फैंस को ये तस्वीर बेहद पसंद आ रही हैं, इसी वजह से ये सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है.

 तुम मेरी राजकुमारी हो…

 इस तस्वीर में शिल्पा शेट्टी अपनी बेटी का नन्हा हाथ थामे नजर आ रही हैं. इसके साथ ही राज कुंद्रा और उनके बेटे वियान कुंद्रा का भी हाथ साफ देखा जा सकता है. इन चारों के हाथ तस्वीर को पूरा कर रहे हैं.

अपनी खुशी का इजहार करते हुए शिल्पा शेट्टी ने कैप्शन में लिखा- तुमने अपनी जिंदगी का पहला पड़ाव परा कर दिया है. आज तुम एक महीने की हो चुकी हो. मैं तुमको बहुत चाहती हूं. समीशा तुम मेरी राजकुमारी हो….

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वायरल हुई थीं ये फोटोज

कुछ वक्त पहले ही शिल्पा को मुंबई एयरपोर्ट पर अपनी बेटी के साथ पोज देते हुए देखा गया था. इस दौरान शिल्पा के साथ उनके पति राज कुंद्रा और बेटा वियान भी नजर आया था. बेटी के जन्म देने के बाद शिल्पा अपनी बेटी को होली के मौके पर घर भी ले जा चुकी हैं.

 

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||Om Shri Ganeshaya Namah|| Our prayers have been answered with a miracle… With gratitude in our hearts, we are thrilled to announce the arrival of our little Angel, ???????? ?????? ??????? Born: February 15, 2020 Junior SSK in the house? ‘Sa’ in Sanskrit is “to have”, and ‘Misha’ in Russian stands for “someone like God”. You personify this name – our Goddess Laxmi, and complete our family. ⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀ ⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀⠀ ⠀⠀⠀⠀⠀⠀ ~ Please bestow our angel with all your love and blessings??❤ ~ Ecstatic parents: Raj and Shilpa Shetty Kundra Overjoyed brother: Viaan-Raj Kundra . . . . . . . . . #SamishaShettyKundra ? #gratitude #blessed #MahaShivratri #daughter #family #love

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बता दें कि शिल्पा की ही तरह बॉलीवुड के कई सेलेब्स सरोगेसी के जरिए माता-पिता बन चुके हैं. इस लिस्ट में एकता कपूर, करण जौहर, तुषार कपूर जैसे कई सेलेब्स के नाम शामिल हैं.

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सीड ट्रे: जड़ साधक में तैयार होते पौधे

डा. नवीन कुमार बोहरा

पर्यावरण के प्रति लोगों में पिछले कुछ सालों से जागरूकता बढ़ी है और बडे़ पैमाने पर वृक्षारोपण यानी पेड़ लगाने के कार्यक्रम किए जा रहे हैं. पर दुख की बात है कि हर साल लगाए जाने वाले पौधों में आधे से ज्यादा पौधे तो किसी न किसी वजह से बेकार हो जाते हैं और बाकी बचे पौधों में भी कुछ अल्पविकसित होते हैं और कुछ सही तरह से पनप पाते हैं.

उलट वातावरण के अलावा बारिश न होने, दीमक या दूसरे कीटों का हमला होने व रोगों का फैलाव वगैरह कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिन्हें टाला नहीं जा सकता है, पर अच्छी किस्म के पौधे नर्सरी यानी रोपणी में तैयार किए जा सकते हैं. अच्छी किस्म के पौधों से पौधों की उत्पादकता बढ़ती है.

इस तरह के पौधे तैयार करने के लिए पिछले कुछ सालों में कृषि वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक ईजाद की है, जिन्हें रूट ट्रेनर तकनीक या जड़ साधक कहते हैं.

भारत में वृक्षारोपण कार्यक्रम

भारत में वानिकी कार्यक्रम 100 सालों से भी कहीं ज्यादा पुराना है और अभी भी भारत का एक बड़ा इलाका वनों से वंचित है. भारत में पहले ही बीजों को सीधा बोने का चलन था. इस के बाद विभिन्न प्रकार के पात्रों यानी बरतनों में पौधे तैयार करने की तकनीक चलाई गई. ये बरतन धातु, मिट्टी, पत्तियों, बांस वगैरह सभी तरह के मुहैया स्रोतों से बनाए जाते थे. इन सभी के बाद प्लास्टिक की थैलियों यानी पौली बैग का चलन शुरू हुआ जो आज भी जारी है. ये पौली बैग आसानी से बाजार में मुहैया हो जाते हैं और काफी सस्ते भी पड़ते हैं, पर इन पौली बैग में कई तरह की कमियां भी हैं. ये हैं :

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* इन में जड़ें कुंडलित यानी उला हुई होती हैं और पार्श्व जडें़ यानी पास की जड़ें पूरी तरह पनप नहीं पाती हैं. इस वजह से परिपक्व व विकसित जड़ तंत्र नहीं बन पाता है.

* पौधों को लाने व ले जाने के दौरान मिट्टी ढीली हो जाती है और जड़ों को बांधे रखने में नाकाम हो जाती है. इस तरह के पौधे रोपने के बाद जल्दी विकसित नहीं हो पाते और इन पर रोगों का हमला भी ज्यादा होता है.

* पौली बैग के इस्तेमाल में हर रोज जांच करनी पड़ती है और ज्यादा मजदूरों की जरूरत नहीं पड़ती है.

* पौली बैग दोबारा उपयोग में नहीं लाए जा सकते और वे फिर से वातावरणीय तंत्र में विघटित भी नहीं होते, इसलिए पर्यावरण संतुलन में भी बाधक होते हैं.

जड़ साधक यानी रूट ट्रेनर तकनीक के प्रयोग द्वारा ये सभी समस्याएं खत्म हो जाती हैं. पश्चिमी देशों में इन का कामयाबी से प्रयोग होने के बाद भारत में इस का उपयोग शुरू किया जा चुका है.

क्या है जड़ साधक तकनीक

जड़ साधक ऊंचे लैवल के बने बरतन हैं, जिन में यूवी अवरोधक भी लगा होता है. ये एक टे्र के रूप में होते हैं और पूरी दुनिया में ऊंची क्वालिटी के पादपों को तैयार करने में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. आसान परिवहन और सुविधा के लिए 20 बरतनों के एक सैट को 5×4 की लाइनों में व्यवस्थित किया जाता है.

प्रत्येक बरतन 150 सीसी की कूवत वाले होते हैं. इन बरतनों के तल में एक छेद होता है. इन बरतनों में ऊपर से नीचे तक पूरे भाग में 5 खांचे एकदूसरे के समानांतर लगे रहते हैं. इन खांचों के चलते ही जडें़ कुंडलित नहीं हो पाती हैं और सीधे नीचे चली जाती हैं.

ये जडें पैदे में स्थित छेद से बाहर निकलने पर हवा और रोशनी के संपर्क में आती हैं और विकसित हो जाती हैं. इस तरह पूरी तरह विकसित होने पर ये पौधे को नई जडें भेजने के लिए संदेश भेजती हैं और यह प्रक्रिया चलती रहती है.

इस तरह से पार्श्व जड़ों यानी पास की जड़ों का एक जाल विकसित हो जाता है. ये पादप जब मिट्टी में रोपे जाते हैं, तब यह जड़ तंत्र जमीन से ज्यादा मात्रा में पोषक तत्त्व हासिल करता है और पौधे की बढ़वार तेजी से होती है. जड़ साधकों के प्रयोग से कई प्रकार के फायदे हैं. ये इस तरह हैं :

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* यह एक ट्रे के रूप में होते हैं और कम जगह घेरते हैं, इसलिए छोटी जगह में भी कई हजार पौधे रोपणी यानी नर्सरी में तैयार हो सकते हैं.

* इन में कम मात्रा में पोषक पदार्थ की जरूरत होती है और बारबार इन्हें देखने की जरूरत नहीं होती है. इस से खर्च में भी कमी आती है.

* इस में हवा के आनेजाने की पर्याप्त जगह होती है और हवा द्वारा जडें़ विकसित हो जाने के चलते पूरा विकसित जड़ तंत्र बनता है.

* इस में पार्श्व जड़ों यानी पास की जड़ों से भरापूरा जड़ तंत्र होने से पादप में पोषण के लिए उपयुक्त जडें विकसित हो जाती हैं, जो पौध रोपने के बाद तेजी से बढ़वार में मददगार साबित होती है.

* इस में पादपों के लाने व ले जाने के दौरान नुकसान नहीं होता है और इन में कवक या दूसरे रोग भी नहीं लगते, जिस से उच्च क्वालिटी के पौध नर्सरी में तैयार होते हैं.

* जड़ साधक यानी सीड ट्रे में जड़ों का सर्पिलीकरण या कुंडलन नहीं होता है और इस से जड़ या स्तंभ अनुपात में इजाफा होता है.

* ऐसे जड़ साधक में पादप रोपने के बाद जल्दी विकसित होते हैं और इन में जिंदा रहने की दर भी ज्यादा होती है.

* जड़ साधकों में रोपित पौधों की बढ़वार समान रूप से होती है और उच्च क्षमता के पौधे विकसित होते हैं, जो पौधों की उत्पादकता में बढ़वार करते हैं.

* ये जड़ साधक यानी सीड ट्रे आसानी से कई सालों तक इस्तेमाल में लाए जा सकते हैं.

* बडे़ लैवल पर ये सीड ट्रे वृक्षारोपण कार्यक्रमों के लिए बहुत ही उपयोगी हैं.

दुनिया के कई नर्सरी माहिरों ने पौली बैग में पौध तैयार करने को अनुपयुक्त करार दिया है और उन्हें टाइम बम कहा है. जड़ साधकों में तैयार पौधों को वैज्ञानिक फोर्स मल्टीप्लाय यानी तेजी से गुणन करने वाला बताते हैं.

ये न केवल जल्दी विकसित होते हैं, बल्कि अच्छी क्वालिटी के भी होते हैं, जिन से पेड़ों के उत्पाद यानी खाद्य, लकड़ी, ईंधन वगैरह में भी बढ़वार होती है. ये जड़ साधक कई सालों तक उपयोग में लाए जा सकते हैं, इसलिए पर्यावरण संतुलन में भी सहायक होते हैं.

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यों भी कह सकते हैं कि पौलीथिन में तैयार पौधों की लागत कम आती है, पर अगर हम जड़ साधकों का प्रयोग करें तो पहले साल में कीमत ज्यादा पड़ती है, पर ये बारबार प्रयोग किए जा सकते हैं और इन में पादप पोषक की मात्रा कम लगती है व मजूदरों की भी कम जरूरत होती है.

इस तरह से अगर हम कई सालों के खर्च की तुलना करें तो जड़ साधक सस्ते पड़ते हैं और इन से अच्छी क्वालिटी के पौध तैयार होते हैं. जड़ साधकों का प्रयोग नर्सरी में पौध तैयार करने की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव है.

मेरे अपने: भाग 3

उधर से गुजरती एक नर्स की दृष्टि उस पर पड़ी तो वह पास आ कर सुरभि को सांत्वना देने लगी. जब उस ने देखा कि बिना पूरे गरम कपड़ों के वह ठंड से कांप रही है तो उस ने तुरंत वार्ड बौय को आवाज लगाई और एक कंबल मंगवाया. उस के लिए एक कप कौफी मंगवा कर जबरदस्ती पिलाई. फिर धीरे से बोली, ‘‘मैडम, सर ठीक हो जाएंगे. आप चिंता मत करो. मैं देख रही हूं कि आप कब से अकेले ही भागदौड़ कर रही हैं. आप अपने बच्चों और रिश्तेदारों को फोन कर दो. फोन है न आप के पास. नहीं तो मैं दूं.’’

नर्स द्वारा पहुंचाई गई बाह्य उपकरणों की गरमी और उस की स्नेहमयी सांत्वना की गरमाई ने पत्थर बनी सुरभि को पिघला दिया. उस की आंखों में आंसू आ गए. कानपुर में होते तो एक फोन करने की देर थी, सारा शहर एकत्र हो जाता पर मास्टरजी के इस ‘अपने’ अनजान शहर में उसे एक भी व्यक्ति याद न आया जिस को संकट की इस घड़ी में वह सहायतार्थ बुला सके. 8 महीने हो गए थे यहां आए. पर अड़ोसपड़ोस से सामान्य परिचय से अधिक संबंध बनाने का अवसर ही न मिला था. बस्ती के कई व्यक्तियों, मीडिया व नाट्य अकादमी के कई छात्रों के फोन नंबर थे उस के पास. पर वह निश्चय न कर पा रही थी कि क्या कार्य संबंधी कुछ मुलाकातों में उन लोगों से इतना रिश्ता जुड़ गया है कि अपनी निजी आवश्यकताओं के समय उन्हें सहायता के लिए बुलाया जा सके.

सुरभि को एक बार फिर से उन अपनों की कमी खलने लगी थी जिन का अस्तित्व कभी था ही नहीं. मास्टरजी के मातापिता उन्हें किशोरावस्था में ही अकेला छोड़ कर इस दुनिया से चले गए थे. मास्टरजी अपने मातापिता के इकलौते पुत्र थे. मातृपितृविहीन बालक से धीरेधीरे सभी सगेसंबंधियों ने दूरी बना ली थी. सभी को डर था

कि कहीं अनाथ हो गए बालक का उत्तरदायित्व उन पर न आ पड़े. दूसरी ओर सुरभि ने अपने मातापिता को कभी देखा

ही न था. उस का पालनपोषण उस के चाचाचाची ने किया था. मास्टरजी के साथ ब्याह कर उन्होंने फिर कभी उन की ओर पलट कर भी न देखा था. इन दोनों ने विवाह के बाद जब अपना छोटा सा नीड़ बसाया तो उसे प्रेम, मधुरता, स्नेह और आपसी समर्पण से ऐसे सजाया कि किसी अन्य रिश्ते के अभाव की ओर उन का ध्यान ही न गया. 10 साल यों ही बीत गए थे. फिर धीरेधीरे उन्हें अपने आंगन में किलकारियों की कमी सताने लगी.

शादी के इतने बरस बाद भी वे इस सुख से वंचित थे. सारे चिकित्सकीय प्रयास भी जब निष्फल रहे तो सुरभि ने मास्टरजी के विरोध और अपनी स्वयं की अवधारणाओं के विपरीत जा कर पूजापाठ, व्रत, मन्नत, पंडित, मौलवी कुछ भी न छोड़ा लेकिन सब व्यर्थ के पाखंड सिद्ध हुए. धीरेधीरे सुरभि की मां बनने की संभावना क्षीण होती जा रही थी. अब वह बच्चा गोद लेने का मन बना रही थी पर मास्टरजी के आदर्श कुछ और ही थे. उन के अनुसार, एक बच्चे को गोद ले कर उसे अपना वारिस बनाने से उत्तम है उस हर बच्चे में प्रेम बांटना, जो उन के पास पढ़ने आता है. एक बालक को अपना नाम देने से बेहतर है सब को ज्ञान देना. एक को ‘मेरा’ कहने से बेहतर है सब को अपना कहना. सुरभि ने सदा की भांति इस विषय में भी मास्टरजी का विरोध न किया था और अपने मातृत्व की धारा को उसी ओर मोड़ दिया था जिस ओर मास्टरजी चाहते थे. पर आज… आज कहां हैं वे सब अपने? कहां हैं वे?

अचानक रिसैप्शन की ओर कुछ हलचल सी हुई. 15-20 लोग हड़बड़ाए हुए तेजी से भीतर घुसे और रिसैप्शन को घेर कर कुछ पूछताछ करने लगे. रिसैप्शनिस्ट ने उन्हें इशारे से कुछ बताया और भीड़ तेजी से औपरेशन थिएटर की ओर लपक पड़ी. कुछ पास आने पर सुरभि ने देखा कि भीड़ में सब से आगे मीडिया केंद्र के कुछ लड़केलड़कियां थे. कुछ लोग नाट्य अकादमी के थे. उन के साथ पड़ोस में रहने वाले राजीवजी और उन की पत्नी थीं. कुछ और लोग भी थे जिन्हें सुरभि ने अकसर बस्ती में नुक्कड़ पर अड्डेबाजी करते देखा था.

‘‘अम्मा…’’ कहते हुए वृंदा दौड़ कर सुरभि के पास पहुंची और उस से लिपट गई. वे लोग पता नहीं क्याक्या कहनेपूछने लगे. सुरभि को बस एक ही आवाज सुनाई दे रही थी. क्या कहा था उस लड़की ने, ‘अम्मा…’

सुरभि को अम्मा कहा था उस लड़की ने.

ये सब विद्यार्थी अकसर उस के घर आते थे. कभीकभी किचन में भी घुस जाते थे चायकौफी या नाश्ता बनाने. मास्टरजी स्वयं बच्चों के साथ बच्चा हो जाते थे. पर सुरभि के साथ वे सब कभी अनौपचारिक न हो पाए थे. उस के गुरुगंभीर चेहरे को और भी गुरुता प्रदान करती बालों में

चांदी की चंद तारें और आंखों पर चढ़ा मोटे शीशों वाला चश्मा, कलफ लगी सिलवटविहीन सूती साड़ी और सदा कसे रहने वाले होंठों के कोर, ये सबकुछ मिला कर उस का व्यक्तित्व जैसे एक अदृश्य प्रभामंडल से घिरा रहता था जिस पर मानो प्रवेश निषेध की तख्ती लगी रहती थी. इन सब के साथ सुरभि की आत्मीयता थी, पर वह उद्दंड बरसाती झरने सी न हो कर शांत गंभीर मानसरोवर सी थी.

ऐसे में वह आदर और सम्मान की औपचारिकता में बंधे विद्यार्थियों व अन्य बस्ती वालों के लिए ‘मैम’ ही थी. पर आज यह क्या हुआ. शुष्क वर्जनाओं को ध्वस्त करता यह कौन सा झोंका था जो सुरभि को विभोर कर गया या वह स्वयं ही कोई और थी इस समय. बीती रात्रि का एकएक पल उस के चेहरे पर चिंता की झुर्रियां बन कर बिछा हुआ था. झुकी कमर और दुख से कातर आंखों में न जाने वह कौन सा खिंचाव था जो वृंदा उस के गले आ लगी थी. विकास, तरुण, तारा, सुबोध, रुचि सब ने उसे घेर लिया.

‘‘अम्मा, आप ने हमें फोन क्यों नहीं किया?’’ अरुण बोला.

‘‘वह तो अच्छा हुआ कि भूरा चाचा को मेज पर रखा मास्टरजी का फोन मिल गया. आप दरवाजे जो खुले छोड़ आई थीं. तब भूरा चाचा ने हमें ढूंढ़ कर सबकुछ बताया,’’ रुचि बोलतेबोलते रोंआसी हो आई थी.

उस के बाद किसी ने डाक्टरों और नर्सों से मास्टरजी के औपरेशन के विषय में जानकारी लेनी आरंभ कर दी, तो कोई नर्स द्वारा थमाया गया दवाओं का परचा ले कर कैमिस्ट की दुकान की ओर भागा. रुचि ने उस की पीठ के पीछे एक तकिया लगाया और उस के पांव बैंच के ऊपर कर दिए. फिर ठीक से कंबल ओढ़ा दिया. मालती शर्मा ने तुरंत थर्मस में से चाय निकाल कर उन्हें स्नेहपगी जिद के साथ पिलाई. अधिक खून की आवश्यकता न पड़ जाए, इसलिए सब बच्चों ने तुरंत अपने खून के सैंपल दिए जांच के लिए. बस्ती के टैक्सी ड्राइवर ने अपनी गाड़ी अस्पताल के बाहर ही खड़ी कर दी थी कि कहीं भागदौड़ की आवश्यकता न पड़ जाए. भूरा ने बताया कि वह दुलारी और अपनी घरवाली को मास्टरजी के घर बिठा कर आया है, इसलिए सुरभि को घर की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.

सुरभि भौचक्की सी कभी एक की सूरत देखती कभी दूसरे की. कितने प्यारे, कितने अपने लग रहे थे आज ये सब. सुरभि ने पहली बार अपने भीतर मातृत्व को अंगड़ाई लेते महसूस किया था. उस ने बांहें फैला कर बच्चों को सीने से लगा लिया.

मेरे अपने: भाग 2

बिजली के नियमित कनैक्शन न होने के कारण मेन सड़क पर से गुजरते हाईटैंशन तार से बिजली चुराई जाती थी. मोबाइल फोन तो खैर हर छोटेबड़े के हाथ में था ही. प्रगति के नाम पर क्या ये कम था, चाहे जगहजगह कचरे के ढेर और कच्ची गलियों में जमा कीचड़ व मच्छरों की भरमार क्यों न हो. खुली नालियों में शौच करते बच्चों पर भी किसी को एतराज न था. सामुदायिक नल के काई जमे चबूतरे पर पानी भरने के इंतजार में लड़तीझगड़ती औरतों के पास फुरसत ही कहां थी वहां की गंदगी साफ करने की. मर्द चाहे निठल्ले हों या कामगार, शाम होते ही दारू के अड्डे पर जमा हो कर पीनापिलाना, औरतों पर फिकरे कसना और मारकुटाई, गालीगलौज करना उन का प्रिय टाइमपास था. बचीखुची मर्दानगी घर पहुंच कर औरतों को पीटने में खर्च होती. बच्चों को इन लोगों ने सरकारी स्कूलों में तो डाल रखा था पर उस का कारण शिक्षा के प्रति जागरूकता कतई न था. सरकार की ओर से हर विद्यार्थी को छात्रवृत्ति मिलती थी और किताबें मुफ्त बांटी जाती थीं. स्कूल में मिलने वाला भोजन भी बच्चों को वहां भेजने के मुख्य कारणों में से एक था.

जितना बुरा हाल उस बस्ती का था, उतनी ही दृढ़ता से सुरभि ने निश्चय कर लिया उसे सुधारने का. मास्टरजी का उसे पूरा सहयोग मिला. सब से पहले दोनों कई संबंधित अधिकारियों से मिले. कई दफ्तरों के चक्कर काटे. इलाके के विधायक से भी मिले. सब को उन्होंने बस्ती की दुर्दशा और अपने प्रोजैक्ट के विषय में बताया. सर्वोदय विद्यालय के प्रधानाध्यापक से भी मिले और वहां रात्रिकालीन प्रौढ़ शिक्षा केंद्र शुरू करने का प्रबंध किया. लोगों को केंद्र पर आने के लिए आकर्षित करने के लिए सुरभि ने एक अनूठा कार्यक्रम बनाया. वह यूनिवर्सिटी के टैली कम्यूनिकेशन ऐंड मल्टीमीडिया विभाग के डीन से मिली और उन्हें अपना प्रोजैक्ट समझा कर उन से सहायता मांगी.

वह चाहती थी कि छात्र सामाजिक जागरूकता व महिला कल्याण जैसे विषयों पर कुछ ऐसी रोचक व विचारोत्तेजक फीचर और ऐनिमेशन फिल्मों का निर्माण करें जो नीरस डाक्युमैंट्री फिल्मों जैसी न हों. मनोरंजन के साथसाथ वे फिल्में उन के दिलोदिमाग को झकझोर कर सोचने पर मजबूर कर दें. छात्रों ने उन को भरपूर सहयोग दिया और ऐसी कई टैलीफिल्मों का निर्माण किया जिन का प्रदर्शन हर रविवार को केंद्र पर किया जाने लगा. इस के साथ ही सुरभि ने इंदौर युवा नाट्य कला केंद्र के नुक्कड़ नाटक करने वाले कलाकारों को भी अपने अभियान में शामिल कर लिया. ये लोग हफ्ते में 1 दिन वहां सामाजिक जागरूकता संबंधित नाटक खेलते. बड़ी भीड़ जुट जाती थी. कुछ लोग केवल फिल्में और नाटक देखने आते और कुछ केंद्र द्वारा परोसी गई चाय पीने. कुछ भी हो, चिंगारी लग चुकी थी.

बस्ती के जिन लोगों ने इन दोनों पतिपत्नी को पागल की संज्ञा दी थी वही अब उन के अथक परिश्रम और लगन से विस्मित थे. लोग हैरान थे, कुछ तो बात है इन में. जो कुछ भी ये लोग कर रहे हैं शायद सच में ही उस से हमारा भला होगा और धीरेधीरे बात बन गई. स्कूल चल निकला. सुरभि और मास्टरजी के चेहरों पर थकान तो थी पर सफलता की रौनक का तेज भी था.

सुरभि ने जो कार्य अपने खाली समय के सदुपयोग के लिए शुरू  किया था वह अब एक लक्ष्य बन गया था. सारी उम्र एक नियमित जीवन जीने वाले व्यक्तियों की दिनचर्या अब इस उम्र में आ कर अस्तव्यस्त हो रही थी. देर रात तक काम करने की वजह से अकसर सुबह की सैर छूट जाती.

नाश्ते के समय कभी नुक्कड़ नाटक वाले तो कभी मल्टीमीडिया के विद्यार्थी आ जुटते नएनए विषयों पर विचारविमर्श करने. कभी बस्ती के निवासी ही आ जाते अपनी समस्याओं के निवारणार्थ. कोई अपने घरेलू झगड़ों का निबटारा मैडमजी से करवाना चाहता तो कोई किसी सरकारी दफ्तर में फंसी अपनी किसी समस्या के निराकरण का रास्ता पूछने आता था.

कभी कुछ लोग एकत्र हो कर आते और अपनी नईनई आवश्यकताओं की सूची मास्टरजी को पकड़ा देते. खुली नालियां ढकवानी हों या बहते सीवरों की सफाई, मच्छर मारने की दवा छिड़कवानी हो या जमा हुए पानी में लाल दवाई, लोग अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काट कर सीधे मास्टरजी के पास ही आते थे. सुरभि और मास्टरजी जैसे उन की हर समस्या की ‘मास्टर की’ बन गए थे.

सारी उम्र मास्टरजी ने एक जगह बैठ कर मात्र अध्यापन कार्य ही किया था. इस तरह की भागदौड़ उन के स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही थी. उत्तरदायित्वों को अपने आराम के लिए बीच में ही अधूरा छोड़ देना उन्होंने न तो स्वयं सीखा था न अपने विद्यार्थियों को सिखाया था. सुरभि कभी आराम करने या समय पर खानेपीने को टोकती भी तो वे नजरअंदाज कर जाते. काम के जनून में वे अब अकसर अपनी छोटीमोटी शारीरिक परेशानियों और थकावट को सुरभि से छिपा जाते थे. उसी का नतीजा आज सामने था.

रात को सोते समय दी गई डायजीन की गोलियां कुछ काम न आई थीं. अपनी बेचैनी को वे भरसक दबा रहे थे. उधर, सुरभि रजाई में घुसते ही सो गई थी. मास्टरजी कुछ देर तक यों ही बेचैनी में करवटें बदलते रहे. फिर धीरे से उठ कर कमरे में ही टहलने लगे. उन्हें पसीना आने लगा. अचानक सीने में और बाएं बाजू में उन्हें तेज दर्द महसूस हुआ. आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. सीने में एक बार फिर तेज दर्द की लहर उठी और वे कराह कर बिस्तर पर लुढ़क गए.

सुरभि की नींद टूट गई. वह घबरा कर उठी और मास्टरजी को अर्धबेहोशी में पसीने से भीगा व दर्द से कराहते देख कर उस की चीख निकल गई. सारे संकेत हार्ट अटैक की ओर इशारा कर रहे थे. उस ने दौड़ कर दवाओं का डब्बा उठाया और एक एस्प्रिन टैबलेट पानी में घोल कर मास्टरजी को पिला दी. फिर उन्हें शाल ओढ़ाई और भाग कर गाड़ी की चाबी उठाई. दरवाजा खोल कर चौकीदार को बुलाया और उस की सहायता से मास्टरजी को गाड़ी में लिटाया. फिर घर के दरवाजे तक बंद करने की चिंता किए बिना तूफानी गति से गाड़ी दौड़ाती वह अस्पताल पहुंच गई.

आपातकालीन विभाग में तुरंत उन्हें डाक्टरों ने घेर लिया. आवश्यक टैस्ट किए गए. यह एक मेजर हार्ट अटैक था. मास्टरजी को आननफानन औपरेशन थिएटर में शिफ्ट कर दिया गया. सुरभि को रिसैप्शन पर जा कर औपरेशन संबंधी आवश्यक कार्यवाही पूरी करने को कहा गया. खून का प्रबंध भी करना था. सुरभि जैसे सम्मोहन अवस्था में थी. वह यंत्रवत भागभाग कर सारी व्यवस्था करने लगी. औपरेशन शुरू हो गया था. सुबह के 6 बजे थे. औपरेशन थिएटर के बाहर सूने गलियारे में सुरभि 2 घंटे से मूर्तिवत जड़ बैठी थी.

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मेरे अपने: भाग 1

सुबह के 4 बजे थे. फरवरी का  महीना था. नैशनल हार्ट इंस्टिट्यूट की सूनी व सर्द गैलरी की ठंडी बैंच पर बैठी सुरभि को न तो कुछ महसूस हो रहा था न कुछ सूझ रहा था. कोमा की सी स्थिति में सुन्न सुरभि औपरेशन थिएटर के दरवाजे पर नजरें टिकाए बैठी थी. भीतर मास्टरजी का औपरेशन हो रहा था. उन्हें हार्ट अटैक हुआ था.

रात को सोते समय उन्हें कुछ बेचैनी महसूस हो रही थी. उन्होंने सुरभि को बताया तो सुरभि रसोई समेटते हुए बोली, ‘गैस हो गई है पेट में. मैं अभी डायजीन ले कर आती हूं,’ उस ने सपने में भी न सोचा था कि जिन को आज तक साधारण तकलीफों के अतिरिक्त कभी कुछ न हुआ था उन की इस बेचैनी का गैस या बदहजमी के अलावा कोई दूसरा कारण भी हो सकता है. उन्होंने सदा एक नियमित जीवन जीया था. सैर और योगाभ्यास नियम से करते थे. खानपान भी उन का बिलकुल सादा था.

दोनों सुबह 7 बजे अपनेअपने स्कूल के लिए निकल जाते थे. मास्टरजी कार से सुरभि को उस के कन्या विद्यालय छोड़ते, जहां वह अध्यापन कार्य करती थी. उस के बाद अपने राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पहुंचते जहां वे गणित के अध्यापक थे. लौटते भी दोनों एक ही साथ थे. उन के कोई संतान न थी. इसलिए बचे समय में वे अपने विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ाते थे. ये कक्षाएं वित्तीय कारणों से नहीं ली जाती थीं, बल्कि जो होनहार छात्र बड़ेबड़े कोचिंग सैंटरों की मोटी फीस भर पाने में असमर्थ होते थे, उन से नाममात्र की गुरुदक्षिणा ले ये दोनों उन्हें पढ़ाते थे.

मास्टरजी अपने छात्रों में बहुत लोकप्रिय थे. वे अपने हंसमुख और मित्रवत व्यवहार से छात्रों के गुरु ही नहीं, मित्र भी बन जाते थे. वहीं, टीचर आंटी हालांकि अपने गंभीर और अंतर्मुखी स्वभाव के कारण छात्रों से अधिक घुलतीमिलती नहीं थीं परंतु उन का स्नेह बच्चों के लिए कम न था. पूरा दिन इतने सारे बच्चों में घिरे रह कर उन्हें कभी अपनी संतान के न होने की कमी महसूस ही न हुई थी. अवकाश के दिनों में भी बच्चे अकसर उन के घर कुछ न कुछ पूछनेपढ़ने चले आते थे. पूरा जीवन एक ही ढर्रे पर चलते बीत रहा था.

आखिरकार, एक दिन मास्टरजी रिटायर हो गए. अब उन्हें अपना सरकारी आवास खाली करना था. मास्टरजी उम्र के इस पड़ाव पर आ कर किराए के मकानों में भटकना नहीं चाहते थे. इंदौर में उन का अपना घर था जो वर्षों से बंद पड़ा था. मास्टरजी चाहते थे कि अब वे अपना बाकी का बचा समय अपने उसी पैतृक निवास में व्यतीत करें, जहां उन का बचपन बीता था. सुरभि के रिटायरमैंट को अभी 5 साल बाकी थे. पर उस ने मास्टरजी की इच्छा का सम्मान किया और सेवानिवृत्ति ले ली. इंदौर शिफ्ट होने से पहले उन के मित्रों और छात्रों ने मिल कर उन के लिए विदाई समारोह का आयोजन किया और अश्रुपूरित आंखों से उन्हें विदा किया.

इंदौर हालांकि मास्टरजी का पैतृक निवास था पर जीवन के 40-45 वर्ष उन्होंने कानपुर में व्यतीत किए थे. इतने लंबे अरसे में वे कभी लौट कर यहां नहीं आए थे. अब यहां की दुनिया उन के लिए लगभग अनजान ही थी. शुरू के 8-10 दिन तो सामान इत्यादि व्यवस्थित करने में व्यतीत हो गए. उस के बाद करने को कुछ था ही नहीं. दोनों जैसे नौकरी से सेवानिवृत्त ही न हुए थे बल्कि जीवन की तेज बहती धार से छिटक कर दूर आ गिरे थे.

अपने ही शहर में अपरिचय का एक महासागर ढाढें़ मार रहा था और दोनों पतिपत्नी उस के किनारे हतप्रभ से खड़े थे. अकेले, उदास और किंकर्तव्यविमूढ़. सुरभि रोंआसी हो उठती. इस उम्र में किसी नए स्थान पर फिर अपनी जड़ें जमाना आसान तो नहीं. ऐसा विकराल अकेलापन जीवन में उन्हें कभी महसूस नहीं हुआ था. इंदौर आने का निर्णय कहीं उन की भूल तो नहीं थी.

जिस ‘अपने’ शहर में लौटने को मास्टरजी इतने लालायित थे, वहां दूरदूर तक कोई अपना दिखाई नहीं दे रहा था. अपनी संतान के न होने का दुख भी अब सालने लगा था सुरभि को. काश, समय रहते उन्होंने कोई बच्चा गोद ले लिया होता तो आज उसी के सहारे जिंदगी कट जाती. सुरभि तो सदा अपने आदर्शवादी पति की परछाईं बनी, उन्हीं के पदचिह्नों पर चलती आई थी. मास्टरजी कहते थे कि 1 या 2 स्वयं के पैदा किए बच्चों की रगों में अपना खून दौड़ने से कहीं बेहतर है, पराए कहे जाने वाले बच्चों की रगरग में नैतिकता, मनुष्यता और उत्तम आचारविचार भर दिए जाएं. पूरी उम्र पतिपत्नी दोनों इन्हीं उसूलों और आदर्शों पर चलते आए थे.

आज सुरभि का मन डोलने लगा था. उदास तो मास्टरजी भी थे. पर उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा था. बरसों पहले एक अनजान शहर को उन्होंने अपना बना लिया था तो इस अपने शहर को फिर से अपना बनाने में कितना समय लगेगा. इसी तरह की उत्साहवर्धक बातों से उन्होंने सुरभि का हौसला बनाए रखा. शीघ्र ही घबरा कर हतोत्साहित हो जाने वालों में से तो सुरभि भी न थी. उस ने शीघ्र ही खुद पर काबू पाया और अपने करने के लिए कुछ रचनात्मक कार्य खोजने लगी.

सुरभि के घर जो कामवाली बाई आती थी उसे पढ़नालिखना न आता था. अध्यापकों के घर में अशिक्षित? न, यह नहीं हो सकता. सुरभि को काम मिल गया था. उस ने उसे शिक्षित करने का बीड़ा उठा लिया. बड़े ही उत्साह से सुरभि उस के लिए स्लेट, पैंसिल व आवश्यक सामान जुटा लाई.

दुलारी की शिक्षा का बीड़ा उन्होंने उठा लिया. 2-4 दिन तो वह बड़े उत्साह से पढ़ने आई लेकिन शीघ्र ही वह इस कवायद से ऊब गई. पढ़ने में आनाकानी करने के उस के पास सौ बहाने थे. दुलारी के अनुसार, वास्तव में अब इस उम्र में उसे पढ़ने की कोई आवश्यकता ही न थी. पर सुरभि ने हार न मानी. उस ने ठान लिया था कि वह दुलारी और उस के जैसी अन्य स्त्रियों को शिक्षा का महत्त्व समझा कर उन्हें पढ़नेलिखने योग्य बना कर ही दम लेगी.

दुलारी पास की बस्ती में रहती थी. सुरभि ने मास्टरजी को अपना मंतव्य बताया और दोनों अब रोज शाम को बस्ती में चक्कर लगाने जाते. उन्हें यह देख कर हैरानी हुई कि वहां लगभग हर कच्चेपक्के घर में रंगीन टीवी, कूलर, फ्रिज इत्यादि मौजूद थे.

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खेल में बाजारवाद

जीवन को खेल और खेल को जीवन समझने वालों को धक्का तब लगा जब उन्हें पता चला कि मैदान में जिस खिलाड़ी को प्रतिभावान समझ कर वे जोरजोर से तालियां बजाते हैं, दरअसल, वे खिलाड़ी उस के हकदार हैं ही नहीं क्योंकि वे तो पैसे ले कर जीत रहे होते हैं या यों कहिए कि पैसे ले कर उन्हें जिताया जाता है. चाचा सिंह ने नुक्कड़ की चाय की दुकान पर जमा अपने युवा भतीजों को यह बात बताई थी.

‘‘वह कैसे, चाचाजी?’’ एक भतीजे ने सिगरेट छिपाते हुए पूछा.

चाचा सिंह यही तो चाहते थे, उन्होंने कहना शुरू किया, ‘‘धौनी को मोटरसाइकिल और पैंटशर्ट बेचते हुए विज्ञापन में नहीं देखते हो, यह क्या है, अपने हुनर से हासिल प्रसिद्धि के सहारे ही न आज सामान बेचने के लिए कंपनी उन्हें करोड़ों देती है?’’

‘‘लेकिन चाचा, विज्ञापन तो बड़ेबड़े नेता, अभिनेता, खिलाड़ी सभी करते हैं, इसे बिकना कैसे कहा जा सकता है?’’ विज्ञापन युग की पैदाइश एक भतीजे ने पूछा.

चाचा सिंह तुनक गए और कहा, ‘‘देखो भतीजे, विज्ञापन को अगर बिकना नहीं कहते हो तो यह क्या है कि खिलाडि़यों की जर्सी में तरहतरह के लोगो लगे होते हैं और खिलाडि़यों के बल्ले पर प्रायोजकों का लोगो रहता है, यह बिकना नहीं है क्या?’’

तपाक से एक युवा भतीजे ने चाचा सिंह पर प्रश्न दागा, ‘‘चाचा, मैं भी तो ‘ली’ की जर्सी पहनता हूं. तो क्या मैं बिक गया?’’

चाचा सिंह ने भन्नाते हुए युवा भतीजे को बाजार का समाजशास्त्र समझाया, ‘‘देखो भतीजे, तुम ने ‘ली’ कंपनी की जर्सी खरीदी तो कोई बात नहीं, पैसे दे कर तुम ने जर्सी खरीदी परंतु जब भारतीय टीम ‘ली’ की जर्सी का इस्तेमाल खेल के दौरान करेगी तो क्या खिलाड़ी उस जर्सी को तुम्हारी तरह खरीद कर नहीं न पहनेंगे?’’

‘‘अरे हां चाचा, आप ने तो सटीक उत्तर दिया.’’

‘‘असल में क्या है भतीजे,’’ चाचा सिंह थोड़े गंभीर होते हुए बोेले, ‘‘आजकल बाजारवाद का युग है, समझे, जैसे समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद, लेनिनवाद का युग हुआ करता था न, वैसे ही आज बाजारवाद का युग है.’’

‘‘वह कैसे, चाचा?’’ एक अतिगंभीर युवक, जो अब तक चाय की दुकान की बैंच के कोने में बैठा अखबार के पन्नों में रोजगार कौलम के विज्ञापन का अध्ययन कर रहा था, ने पूछा.

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‘‘वह ऐसे भतीजे,’’ चाचा सिंह बोले, ‘‘देखो, बाजारवाद का सीधा अर्थ यह है कि बाजार तुम्हें मजबूर कर देगा वह चीज खरीदने को जिस की तुम्हें आवश्यकता भी नहीं है. कहते हैं न आवश्यकता आविष्कार की जननी है, अब मैं कहता हूं कि आवश्यकता आविष्कार बाजार की जननी है.’’

‘‘चाचा, कुछ समझा नहीं, जरा और स्पष्ट कीजिए,’’ गंभीर से भतीजे ने पूछा.

चाचा कहने लगे, ‘‘अरे भतीजे, अब देखो, एक सामान में दो सामान फ्री दिया जाएगा. जहां लोग देखते हैं, खरीदने के लिए तैयार, पैसा तो उन्हें 3 सामान का ही चुकाना पड़ता है न.’’

अब तक चुपचाप, सिगरेट का धुआं उगलते हुए एक युवा भतीजे ने पूछा, ‘‘हां, तो चाचा, आप खेल में धंधा और बिकाऊ खिलाड़ी के संबंध में कुछ बोल रहे थे.

‘‘अरे हां, भतीजे, हम तो विषय से भटक रहे थे,’’ चाचा सिंह ने कहा, ‘‘लेकिन भतीजे, वृहद परिप्रेक्ष्य में बिकाऊ खिलाड़ी और खेल में धंधे का संदर्भ भी बाजारवाद से ही जुड़ा है. अब देखो, भतीजे, बाजार है तो पैसे का लेनदेन है और पैसा ही आज का ‘ईश्वर’ बन बैठा है. पैसे के लिए कोई कुछ भी करने को तैयार है, कितने भी नीचे तल्ले तक जा सकता है. अब क्या तुम लोगों को यह जान कर कोई आश्चर्य होता है कि फलां नेता इतना बड़ा घोटालेबाज निकला या फलां अधिकारी अकूत धनसंपत्ति के दो नंबर के तरीके से मालिक बन बैठा?’’

‘‘यह तो आप ठीक कह रहे हैं, चाचा,’’ एक युवा भतीजे ने कहा, ‘‘अब तो घोटाला रोजमर्रा का समाचार है. जिसे देखो वही घोटाला कर रहा है. नमक तक का घोटाला हो चुका है हमारे देश में.’’

चाचा सिंह बोले, ‘‘हम लोग अब तक खिलाडि़यों को घोटालेबाज नहीं समझते थे लेकिन आईपीएल के बाद यह स्पष्ट हो गया कि खेल घोटाला भी यहां हो चुका. अरे, खेल में अभिनेता, अभिनेत्री, व्यवसायी का क्या काम?’’ चाचा सिंह गरजने लगे थे,‘‘शाहरुख खान, प्रीति जिंटा, मुकेश अंबानी इन लोगों ने जो अपनीअपनी टीमें बना ली थीं, उन टीमों में खिलाड़ी खरीद कर ही तो लाए गए और खिलाडि़यों को खरीदने के बाद ठेके पर बुलाए गए ‘चियर लीडर्स.’

‘‘तुम सभी जब मैच देखते थे,’’ चाचा सिंह उदाहरण दे कर भतीजों का भ्रम दूर कर रहे थे, ‘‘तो अब तक खिलाडि़यों को तालियां बजाबजा कर उत्साहित करते थे न.’’

सभी भतीजों ने एक स्वर में कहा, ‘‘हां, करते तो थे.’’ चाचा सिंह ने कहा, ‘‘अब चियर लीडर्स ठुमके मारमार कर खिलाडि़यों को उत्साहित कर रही हैं. चियर लीडर्स के ठुमके लगाने वाली महाकलाकारों को भी तो पैसे चाहिए.

‘‘इसलिए भतीजो,’’ चाचा सिंह ने अपने विचार के जीत का झंडा गाड़ते हुए कहा, ‘‘हम सब अब तक समझते रहे कि खेल स्पोर्ट्समैनशिप के सिद्धांत पर खेला जा रहा है लेकिन ऐसा नहीं है. खेल भी एक धंधा बन चुका है और सिर्फ टिकट ही नहीं बिक रहे बल्कि खिलाड़ी भी बिक रहे हैं.’

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दीपिका-आलिया से आगे निकलीं कियारा, बौलीवुड के बाद यहां मारी बाजी

अभी-अभी अभिनेत्री कियारा आडवाणी (Kiara Advani) की नेटफ्लिक्स पर GUILTY नाम की एक फिल्म आई है जो खूब धमाल मचा रही है, इस फिल्म की काफी चर्चा भी खूब हो रही है. इस फिल्म में कियारा आडवाणी के अभियन की खूब तारीफ की जा रही है. साल 2019 में एक मुद्द उठा था #me too  का जब कई अभिनेत्रियों ने सोशल मीडिया के जरिए अपने साथ हुए शोषण के बारे में बताया था और ये खूब चला था उन दिनों कई चर्चित नाम सामने आए थें.

कियारा की ये फिल्म guilty  #me too  पर ही अधारित है औऱ काफी फेमस भी हो रही है. इस फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है कि दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी में अमीरज़ादों के बच्चे पढ़ते हैं जैसा की अक्सर कई फिल्मों में दिखाया जाता है तो इन्हीं बच्चों में से 4-5 स्टूडेंट्स का एक ग्रुप है जिनका एक म्यूजिक बैंड है और इनमें एक लड़की का नाम है नानकी दत्ता यानी की कियारा आडवाणी, उसका एक बॉयफ्रेंड है और उसके कुछ अच्छे दोस्त हैं. तभी यूनिवर्सिटी में एक जूनियर की एंट्री होती है जिसका नाम है तनु कुमार.

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वह एक छोटे शहर से आई है लेकिन उसके ख्वाब बड़े हैं. इसी दौरान जब उसकी मुलाकात नानकी के दोस्तों से होती है तो उसका दिल नानकी के बॉयफ्रेंड पर आ जाता है.वो उसे पसंद करने लगती है. यूनिवर्सिटी में फेस्टिवल के दौरान उसका रेप किया जाता है तनु कुमार उसका खुलासा करती है और उसके बाद किस तरह लोग इस बात को टालने की कोशिश करते हैं या बचाने की कोशिश करते हैं फिल्म इसी के इर्द-गिर्द घूमती है.आगे क्या होगा ये तो आपको फिल्म देख कर ही पता चलेगा.

फिल्म में कियारा आडवाणी की एक्टिंग बेहद शानदार है. जिस मुद्दे पर फिल्म बनाई गई है वह काफी दमदार है औऱ समाज को आइना दिखाने वाली फिल्म है जिसे जरूर देखना चाहिए. इससे पहले भी नेटफ्लिक्स की ही लस्ट स्टोरीज़ में कियारा आडवाणी के शानदार काम की तारीफ हुई थी.

कियारा आडवाणी की कुछ औऱ भी फिल्में हैं जो काफी फेमस हैं और लोगों को काफी पसंद आए थें जिनमें फगली, एमएस धोनी द अनटोल्ड स्टोरी, कलंग ,कबीर सिंह ,गुड न्यूज़ ,इंदु की जवानी. भले ही कियारा अभी बड़ी हिरोइनों में शामिल न हो पाई हों लेकिन उनकी एक्टिंग की जितनी तारीफ की जाए वो कम है.

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#coronavirus: कोरोना को लेकर दुनियाभर में बदहवासी, यह कैसा पागलपन है?

हालांकि जब 13 मार्च 2020 की दोपहर मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूं तब तक भारतीय शेयर बाजार सुबह-सुबह तगड़ा गोता खाकर फिर से उछलने के मूड में लौट आये थे. बीएसई सुबह खुलने के समय 3600 अंक तक गिरने के बाद दोपहर बाद पिछले दिन के मुकाबले करीब 951 अंक उछल चुका था और निफ्टी में भी 282 प्वाइंट का उछाल देखा जा रहा था. लेकिन कोरोना वायरस के चलते दुनिया की अर्थव्यवस्था में जो भयावह कहर टूटा है, उससे यह क्षणिक राहत शायद मुक्ति नहीं दे पायेगी; क्योंकि कोरोना के कारण न सिर्फ पिछले एक पखवाड़े में कई बार दुनियाभर के शेयर बाजारों में बदहवासी और हड़कंप की स्थिति बनी है बल्कि अर्थव्यवस्था के दूसरे मोर्चों में भी ऐसी ही दहशतों ने आकार डेरा जमा लिया है. सवाल है इसके पीछे किसका हाथ है? क्या वाकई कोरोना वायरस का कहर इतना बड़ा संकट है कि दुनिया के दिलोदिमाग में खत्म हो जाने का भय व्याप्त हो गया है? क्या कोरोना वायरस से वाकई दुनिया के अस्तित्व पर सवालियां निशान लग गया है? ऐसा कुछ भी नहीं है. सच तो यह है कि आज की तारीख में दुनिया में इंसानी जान के लिए जिस तरह के कई दूसरे संकट हैं कोरोना वायरस का कहर उनके मुकाबले कहीं पासंग भी नहीं है.

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विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि हर साल 46 लाख से ज्यादा लोग महज वायु प्रदूषण के चलते मर जाते हैं. इसका मतलब हुआ कि वायु प्रदूषण से हर महीना करीब 3,33,400 लोगों की मौत हो जाती है. अगर इसे दिन में तब्दील करें तो हर दिन 12,777, हर घंटे 532 और हर एक मिनट में 8.87 यानी करीब 9 लोग मर जाते हैं. इसी तरह सीडीसी यानी सेंटर्स फाॅर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक हर साल सड़क दुर्घटनाओं के कारण पूरी दुनिया में 13,50,000 लोग मरते हैं, जो हर दिन औसतन 3,700 होते हैं. यह आंकड़ा भी विश्व स्वास्थ्य संगठन का है. साल 2018 में पूरी दुनिया में हुई सड़क दुर्घटनाओं में इतने लोग मरे थे. जबकि जहां तक कोरोना के कहर की बात है तो अगर अब तक के वैश्विक आंकड़ों को देखें तो पिछले डेढ़ महीने में कोरोना वायरस से पूरी दुनिया में 4800 लोगों की जान ली है और अब तक यह दुनिया के 125 देशों में फैल चुका है. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पूरी दुनिया में 1,34,768 लोग कोरोना से संक्रमित थे. भारत में अब इस वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 75 हो गई और हमारे यहां पहली मौत भी हो चुकी है. सवाल है क्या इन आंकड़ों को देखते हुए जिस तरह से कोरोना को लेकर दुनिया में भगदड़ और बदहवासी का माहौल बनाया गया है, वह जायज है? हो सकता है यह सहज स्वभाविक हो. लेकिन अगर कल को पता चले कि इसके पीछे एक बड़ी साजिश थी तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

सवाल है कोरोना को लेकर आखिर यह पागलों जैसी हरकतें क्यों हो रही है? अगर भूमंडलीकरण इतना ही कमजोर और इतना की डरपोक आधार पर टिका है, तो फिर इसकी क्या जरूरत है? सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस बदहवासी को फैलाने में उस देश की सबसे बड़ी भूमिका है, जो अपने को हथियारों के मामले में ही नहीं, दवाओं और मेडिकल सुविधाओं के मामले में भी दुनिया का सबसे ताकतवर देश मानता है. उस देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति ने इस बदहवासी को फैलाने में आग में डाले जाने वाले घी की भूमिका अदा की है. जी, हां! अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इन दिनों हाथ जोड़कर हर किसी से नमस्ते करते हुए जो तस्वीरें वायरल हो रही हैं, उनसे हम गर्वित नहीं हो सकते. क्योंकि वे नमस्ते की भारतीय शिष्टता का विस्तार नहीं कर रहे बल्कि वह एक ऐसे डरे हुए व्यक्ति की तस्वीरें हैं जो अपनी अदा से दुनिया को और ज्यादा डराने की कोशिश कर रहा है.

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अमरीकी राष्ट्रपति ने आयरलैंड के प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान हाथ नहीं मिलाया. हाथ जोड़कर नमस्ते की और यह भी कहा कि मैं हाल ही मैं भारत से आया हूं, वहां भी मैंने हाथ नहीं मिलाया क्योंकि हाथ जोड़ना आसान था. हालांकि उनका इसमें स्वभाविक झूठ भी शामिल था. क्योंकि उन्हें हम सबने प्रधानमंत्री मोदी से न सिर्फ हाथ मिलाते बल्कि बार बार गले मिलते भी देखा है. बहरहाल यह महज हाथ जोड़कर व्यक्तिगत रूप से बरती गई सजगताभर नहीं है बल्कि दुनिया को डराने का एक सबसे संवेदनशील तरीका भी है. कोरोना वायरस सिर्फ व्यक्तिगत रूप से मौत के भय का ही प्रचार प्रसार नहीं कर रहा बल्कि इसने अपनी गैरजरूरी संवेदनशीलता के चलते न केवल दुनिया की अर्थव्यवस्था को महज 72 घंटों में चैपट कर दिया है बल्कि करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी पर लात मार दिया है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 31 मार्च तक के लिए स्कूलों, काॅलेजों के साथ-साथ माॅल और सिनेमाहाल बंद करके यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि जैसे वह कोरोना को लेकर कितने सजग हैं. दिल्ली में कोरोना वायरस के संक्रमण को माहमारी भी घोषित कर दी गई है. जबकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक महज 6 लोग इससे संक्रमित पाये गये थे.

इस बदहवासी में सबसे ज्यादा बेनकाब तो वह अवधारणा हुई है जिसे हम भूमंडलीकरण कहते हैं और जिसका गुणगान 90 के दशक से अब तक दुनिया के भविष्य के रूप में होता रहा है. सवाल है क्या इन्हीं दिनों के लिए भूमंडलीय एकता, साझेदारी और मेलमिलाप की कल्पना की गई थी? यह तो बर्बर युग से भी खराब आचरण है कि जरा से संकट आने पर हर देश अपने दड़बे में घुस जाए. अगर संकट के समय सबको अकेले-अकेले ही रहना है, तमाम परेशानियों को अकेले-अकेले ही सहना है तो फिर शांति के समय के लिए भूमंडलीय एकजुटता मिलजुलकर रहने की बड़ी बड़ी दुहाईयों का क्या मतलब है? क्या सिर्फ लाभ और कारोबार के लिए ही दुनियावी एकजुटता होनी चाहिए? क्या किसी संकट से निपटने के लिए इस तरह की एकजुटता की जरूरत नहीं है? कोरोना वायरस को लेकर दुनियाभर में घट रही खुद को लैंडलाक्ड करने की घटनाएं वास्तव में कोरोना द्वारा इंसान की समझ पर जड़ा गया करारा तमाचा हैं.

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मैंने पड़ोस की औरत के साथ संंबंध बनाए हैं, इससे एड्स का कोई डर तो नहीं?

सवाल

मैं 32 साल का हूं. मैंने पड़ोस की औरत के साथ हमबिस्तरी की है, पर डर है कि कहीं मुझे एड्स न हो जाए. वैसे, जिस्मानी संबंध बनाने के 5 दिन बाद मैंने जांच कराई, तो नतीजा निगेटिव रहा. औरत ने 10 दिन बाद जांच कराई, तो उस का नतीजा भी निगेटिव ही था. कोई डर तो नहीं है?

जवाब

एक ओर तो आप को जिस्मानी संबंधों का मजा चाहिए, वहीं दूसरी ओर मौत का डर भी है. आखिर ऐसा काम किया ही क्यों जाए, जिस में खौफ हो. वैसे, जांच रिपोर्टों के मुताबिक आप दोनों ही महफूज हैं, लेकिन यह खेल दूसरे तरीके से भी खतरनाक हो सकता है. औरत के पति को पता चलेगा, तो वह एड्स से भी ज्यादा दर्द देगा.

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मेरी पत्नी के एक युवक से अवैध संबंध हैं. इसके कारण वह मेरे साथ शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करती है. मैं क्या करूं?

सवाल
मैं विवाहित युवक हूं और एक बच्चे का पिता हूं. मैं अपनी वैवाहिक जिंदगी से बहुत परेशान हूं. मेरी पत्नी ने पहले एक युवक से दोस्ती की और धीरेधीरे उन की घनिष्ठता इतनी बढ़ गई कि दोनों के बीच अवैध संबंध तक बन गए. मुझे  जब पत्नी के इस व्यभिचार के बारे में पता चला तो हमारे बीच पहले काफी लड़ाईझगड़ा हुआ. साथ रहते हुए भी हम दोनों में दूरियां बढ़ने लगीं और एक दिन वह बेटे को मेरे पास छोड़ कर चली गई. अब वह 3 साल के बाद अचानक लौट आई है.

लगता है कि उस का दोस्त उस से पल्ला झाड़ चुका है, इसीलिए वह वापस आ गई है. उस के आने के बाद मैं ने सामान्य रहने का भरसक प्रयास किया, बावजूद इस के वह न तो मुझ से खुल कर बात करती है और न ही शारीरिक संबंध को तवज्जो देती है. एक ही छत के नीचे रहते हुए हम दोनों अजनबियों की तरह हैं. मैं क्या करूं?

जवाब
अब यह तो नहीं कहा जा सकता कि आप की पत्नी को अपने किए पर ग्लानि हो रही होगी और इसीलिए वह सामान्य नहीं हो पा रही. आप उम्मीद करें कि थोड़े वक्त बाद वह स्वयं ही सामान्य व्यवहार करने लगे. यदि ऐसा नहीं होता तो आप किसी मनोचिकित्सक से परामर्श ले सकते हैं. काउंसलिंग से ज्ञात होगा कि पत्नी के मन में क्या है. कानून हाथ में लेना आसान नहीं है, क्योंकि अदालतें ऐसी पत्नी की भी ज्यादा ही सुनती हैं.

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