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Government Bans on Cinema : सिनेमा की स्वतंत्रता बनाम सत्ता का अंकुश

Government Bans on Cinema : दिसंबर में 30वें केरल अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफके) में केंद्र सरकार द्वारा कुछ फिल्मों की स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगाने का फैसला फिल्मकारों, केरल राज्य चलचित्र अकादमी की कलात्मक स्वतंत्रता पर नरेंद्र मोदी की सरकार का हमला और जनता के मामलों में अनुचित हस्तक्षेप है.

भारत में कला, संस्कृति और विचारों की आजादी संकुचित और इकतरफा होती जा रही है. यह विवाद तब शुरू हुआ जब नरेंद्र मोदी की सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या विदेशी संबंधों को प्रभावित करने की आशंका का निराधार हवाला देते हुए सिनेमेटोग्राफ अधिनियम 1952 के नाम पर 19 फिल्मों को ‘सैंसर छूट’ देने से इनकार कर दिया. किसी भी इंटरनैशनल फिल्म महोत्सव में विदेशी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए सैंसर छूट अनिवार्य होती है. केरल सरकार की आपत्ति के बाद इन में से 13 को पारित किया गया लेकिन आखिरकार 6 फिल्में प्रदर्शित न की जा सकीं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा, सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम पर सरकारी अंकुश लगाने और फिल्म मीडिया से जुड़े संस्थानों में सरकार के हस्तक्षेप को ले कर सवाल उठ खड़े हुए हैं. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार हर इंसान को मिला है. यह हक हर फिल्म निर्माता, लेखक व निर्देशक को भी है.

सिनेमाई स्वतंत्रता पर प्रतिबंध केवल तभी लगाया जा सकता है जब वह वास्तव में हिंसा भड़काए, न कि केवल इसलिए कि वह सरकार की विचारधारा से मेल नहीं खाती हो. लेकिन अब ज्यादातर मामलों में सरकार की तरफ से ब्यूरोक्रैट्स संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत ‘उचित प्रतिबंधों’ (जैसे, राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता) के प्रावधान का गलत ढंग से इस्तेमाल कर सैंसरशिप को सही ठहराते हैं. इसी मसले पर कई साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय देते हुए साफसाफ कहा था कि, ‘सैंसरशिप तब वैध हो सकती है जब प्रतिबंध तर्कसंगत हों, न कि मनमाने ढंग से लगाए गए हों. देश की सुरक्षा के लिए जो खतरे सरकार बताए वह दूर के या काल्पनिक नहीं, बल्कि सीधे और स्पष्ट होने चाहिए. सरकारी अधिकारी जानते हैं कि जब तक नागरिक सुप्रीम कोर्ट से कोई फैसला लाएंगे, महोत्सव हुए बरसों बीत चुके होंगे.

सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का गाइड और अभिव्यक्ति का सब से सशक्त माध्यम है. अफसोस की बात यह है कि ऐसे सशक्त माध्यम पर अंकुश लगाने के लिए ‘नैतिकता’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा‘ जैसे शब्दों का हाल के कुछ वर्षों में नौकरशाही और धार्मिक नेताओं द्वारा गलत ढंग से उपयोग किया जाने लगा है.  

राष्ट्रीय सुरक्षा के बहाने राजनीतिक रूप से संवेदनशील या असुविधाजनक विषयों वाली फिल्मों को लक्षित किया जाता है, भले ही उन का देश की सुरक्षा से सीधा संबंध न हो. अकसर, सत्ता की आलोचना करने वाली फिल्मों को ‘देशविरोधी’ कह कर दबा दिया जाता है. 

वर्तमान समय में तो यदि किसी आम इंसान के घर या उस के कंप्यूटर पर कोई सरकार को अप्रिय लगने वाली किताब या सामग्री उपलब्ध हो, भले ही उस इंसान ने उस सामग्री को न पढ़ा हो और न ही उस का प्रचारप्रसार किया हो, तो भी उसे दोषी कह कर जेल में ठूंसा जा रहा है. 

वास्तव में नैतिकता बहुत ही ज्यादा व्यक्तिपरक शब्द है और इस का उपयोग अकसर उन विषयों को दबाने के लिए किया जाता है जो सत्तावादी या बहुसंख्यकवादी विचारधारा के अनुरूप नहीं होते. जबकि नैतिकता इस कदर व्यक्तिपरक होती है. एक इंसान के लिए जो एक कला है, वह दूसरे के लिए आपत्तिजनक हो सकती है. सरकार को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि वयस्क नागरिक क्या देखें अथवा क्या न देखें.  

‘नैतिकता’ और ‘देश की सुरक्षा’ के नाम पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा केरल के फिल्म समारोह की फिल्मों पर लगाए गए प्रतिबंध को सभी फिल्मकारों ने एकजुटता के साथ कलात्मक स्वतंत्रता पर धर्म के रंग में डूबी नौकरशाही और राजनीति का अंकुश माना, जोकि लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है.  

सरकार सदैव सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम पर अंकुश रखने का प्रयास करती रहती हैं. इस के लिए वह मोरैलिटी/नैतिकता की बात करती है. जबकि मोरैलिटी/नैतिकता के नाम पर नग्नता सहित कई चीजों को फिल्मों में दिखाने पर रोक लगाती है. इस के लिए पैनल कोड है. नग्नता को दिखाने या नग्नता का प्रचारप्रसार करने को ले कर आपराधिक कानून बने हुए हैं. इस कानून के तहत फिल्म के निर्माता, लेखक, निर्देशक और सिनेमाघर के मालिकों पर फिल्म के प्रदर्शन के बाद भी कार्रवाई की जा सकती है. लेकिन ऐसा करने के बजाय सरकार सीधे सिनेमा पर पहले से ही अंकुश लगाने का प्रयास करती है. 

वास्तव में सरकार नैतिकता की आड़ में अपना पौलिटिकल एजेंडा चलाती है.  

सभी को पता है कि भारत सहित पूरे विश्व के सभी देशों में इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में सैंसर बोर्ड से फिल्म पारित करवाए बिना फिल्में प्रदर्शित होती हैं, जो महोत्सव में विदेशी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए अनिवार्य होती है. पर फिल्मों के नाम भेज कर इस की अनुमति केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से लिया जाना होता है. इसी आधार पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सब से पहले केरल राज्य चलचित्र अकादमी द्वारा 30वें केरल इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में 197 फिल्में दिखाने की जो सूची भेजी थी उस में से 100 से अधिक फिल्मों को प्रदर्शित न करने के लिए कहा. 

केरल सरकार द्वारा विरोध जताने पर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 19 फिल्मों को छोड़ कर अन्य फिल्मों को हरी झंडी दे दी. सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या विदेशी संबंधों को प्रभावित करने की आशंका का हवाला देते हुए सिनेमेटोग्राफ अधिनियम 1952 के तहत छूट देने से इनकार कर दिया. लेकिन केरल सरकार ने घोषणा की कि वह सैंसरशिप छूट से इनकार का विरोध करेगी और आयोजकों को निर्धारित सभी फिल्मों का प्रदर्शन करने का निर्देश दिया. यह अलग बात है कि फिल्म समारोह के आयोजकों ने कुछ फिल्मों का प्रदर्शन रद्द कर दिया. हालांकि यह दावा किया गया कि छूट से इनकार प्रक्रियात्मक कारणों से किया गया था लेकिन व्यापक रूप से यह माना जाता है कि यह राजनीतिक रूप से प्रेरित था, जिस की केरल के मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन ने कड़ी आलोचना की. 

वास्तव में राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की बात न मानने के आदेश के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म फैस्टिवल आयोजकों को नोटिस भेज कर कहा है कि यदि उस के निर्देश का उल्लंघन किया जाता है तो सिनेमेटोग्राफिक अधिनियम के अन्य प्रावधान लागू होंगे और मुकदमा चलाया जाएगा. इसी वजह से 6 फिल्में नहीं दिखाई गईं. इसे केवल फिल्मों की हार नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि हकीकत में यह संघीय ढांचे और सांस्कृतिक स्वायत्तता की हार है.  

यह अलग बात है कि इस पूरे प्रकरण पर केरल राज्य चलचित्र अकादमी के अध्यक्ष रसुल पुकुट्टी ने कहा- “मैं ने झुकने का फैसला इसलिए किया क्योंकि हम अवज्ञा का माहौल नहीं बनाना चाहते थे. हम नहीं चाहते थे कि इस से अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर असर पड़े. वैसे, केंद्र सरकार ने इन 6 फिल्मों को सैंसर से छूट देने से इनकार करने का कोई कारण नहीं बताया है.” फिल्म जगत में कई लोग रसूल पुकुट्टी की बातों से असहमत होते हुए दबी जबान कटाक्ष कर रहे हैं- ‘‘हम एक ऐसे देश की ओर बढ़ रहे हैं जहां कला ‘सरकारी मंजूरी’ की मुहताज होगी तथा सोचने व समझने से पहले इस की भी अनुमति लेनी पड़ेगी?” 

फेसबुक पर कुछ लोगों ने लिखा है- ‘‘इस के पीछे वर्तमान में केंद्रीय सरकार में बैठे वे लोग हैं जिन्हें नागपुरिया विश्वविद्यालय में दीक्षित किया गया है. इस विवि ने पिछले 10-11 सालों में इसी देश में एक ऐसी आबादी पैदा कर दी है जो पूरी निष्ठा से वह सब कर रही है जो भारत के भविष्य के लिए भले ही सर्वनाशी हो, पर नागपुरिया हिंदुत्ववादियों के लिए उन की शिक्षाओं के अनुकूल हो. 

“चिंता की बात यह कि इस जमात में शामिल अधिकांश आबादी बहुजनों की है जो पहले भी इस्तेमाल की गई और आज भी की जा रही है. दूसरी ओर, इन को हांकने वाले गड़ेरिए वही पुराने पुरोहितों के खानदानी हैं, जिन को कभी बुद्ध ने अपने क्रांतिकारी आंदोलन से पटरी पर ला दिया था. अफसोस अब न बुद्ध हैं और न गांधी.’’ 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने विदेश नीति की आड़ में ‘यस’, ‘ईगल्स औफ द रिपब्लिक’, ‘क्लैश’, ‘फ्लेम्स’, ‘पोएट अनकंसील्ड और ‘औल दैट्स लेफ्ट औफ यू’ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और दूसरे देशों के साथ संबंधों का हवाला दिया. जबकि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की इस बात के आलोचकों का कहना है कि महोत्सव के दर्शकों के पास फिल्म देखने और समझने की पर्याप्त परिपक्वता होती है. 

इन सभी मुद्दों के आधार पर देखा जाए, तो केरल सरकार द्वारा केंद्र के आदेश को चुनौती देते हुए फिल्म फैस्टिवल के दौरान फिल्मों का प्रदर्शन जारी रखने का निर्णय एक साहसिक कदम था, लेकिन कानूनी पेचीदगियों और विदेश मंत्रालय की चेतावनियों के कारण केरल राज्य चलचित्र अकादमी को कुछ फिल्मों को हटाना पड़ा. इस से एक बात साफतौर पर उभर कर आई कि 2025 में भी सिनेमा जैसे स्वतंत्र माध्यम को नौकरशाही की संकीर्ण व्याख्याओं और राजनीतिक एजेंडे से जूझना पड़ रहा है. कला को केवल ‘सुरक्षा’ के चश्मे से देखना उस के मूल उद्देश्य, संवेदना और संवाद को समाप्त करने के अलावा कुछ नहीं है. 

कला के क्षेत्र में यह कदम ‘वैचारिक आपातकाल’ जैसा है. हम सभी जानते हैं कि एक प्रतिबंधित फिल्म ‘बैटलशिप पोटेमकिन’ को हर फिल्म इंस्टिट्यूट में पाठ्यक्रम की तरह पढ़ाया जाता है. दुनियाभर के फिल्म स्कूल इस फिल्म को सिनेमा के व्याकरण की बुनियाद मानते हैं 

पहले जिन फिल्मों को स्क्रीनिंग से वंचित रखा गया था, उन में कुछ फिलिस्तीनी फिल्में भी शामिल थीं, जिस से यह संदेह पैदा होता है कि क्या उन्हें फिलिस्तीनी होने के कारण ही भेदभाव का सामना करना पड़ा. पहले फिलिस्तीन केंद्रित ‘पैलेस्टाइन 36’, ‘वन्स अपौन अ टाइम इन गाजा’ और ‘वाजिब’ जैसी फिल्मों को भी रोका गया, जिस से भारत की विदेश नीति और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन पर बहस छिड़ गई. 

‘संतोश’ (पुलिस बर्बरता और जातिवाद पर आधारित), ‘टिम्बकटू’, ‘बमाका’ और ‘क्लैश’ जैसी फिल्में भी इस सूची में थीं. क्रांतिकारी सक्रियता पर आधारित अर्जेंटीना की 1968 में बनी राजनीतिक डाक्यूमैंट्री फिल्म ‘द औवर औफ द फर्नेसेस’ के साथ ही महज नाम के आधार पर स्पैनिश फिल्म ‘बीफ’ को भी रोका गया. मजेदार बात यह है कि स्पैनिश फिल्म ‘बीफ’ हिपहौप संस्कृति और विरोध पर आधारित है. इतना ही नहीं, चार्ली चैप्लिन की जरमनी के तानाशाह अडोल्फ़ हिटलर पर बनी क्लासिक फिल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ को भी रोका गया. जबकि ये फिल्में कई इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल का हिस्सा रह चुकी हैं. क्या नौकरशाहों को लग रहा था कि यह फिल्म लोगों को देह में बढ़ती तानाशाही के खिलाफ खड़े होने को प्रेरित कर सकती है. 

यदि कोई फिल्म देश की सुरक्षा और अखंडता को प्रभावित करती है, कानूनव्यवस्था को बिगाड़ती है, या दूसरे देशों के संगसंबंधों पर असर डालती है, तो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास ऐसी फिल्म को सैंसरशिप से छूट देने से इनकार करने का अधिकार है. मगर इस बार जिन फिल्मों को रोका गया, उन्हें इस आधार पर अस्वीकार करने का मसला बनता ही नहीं है.  

फिल्म ‘बीफ’ को रोकना विपक्ष द्वारा शासित राज्य में लोकप्रिय सांस्कृतिक कार्यक्रम को बाधित करने की शरारती इच्छा के अलावा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है और संकीर्ण सोच का संकेत मात्र माना जा सकता है. वहीं कुछ लोग मानते हैं कि यह वर्तमान सरकार द्वारा अपना पौलिटिकल एजेंडा चलाने का मसला है. यों तो केरल राज्य चलचित्र अकादमी के रसूल पुकुट्टी ने कहा- ‘‘आईएफएफके में 6 फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने के पीछे राजनीतिक नहीं, बल्कि नौकरशाही कारण है.’’ आखिरकार जिन फिल्मों को सैंसरशिप से छूट नहीं मिली है, वे हैं ‘ईगल्स औफ द रिपब्लिक’, ‘क्लैश’ और ‘ए पोएट’ (मिस्र), ‘औल दैट्स लेफ्ट औफ यू’ (फिलिस्तीन), ‘यस’ (इजराइल) और भारतीय फिल्म ‘फ्लेम्स’. 

वर्तमान समय में राम मंदिर, कुंभ मेले में गंगा नदी में डुबकी लगाने और केदारनाथ जा कर पूजापाठ करने को प्रचारित कर सरकार टिकी हुई है. इन दिनों हर तरफ एक ही तरह की बातें की जा रही हैं. सरकार के मन के विपरीत बात कहना गुनाह हो गया है.  

जिस देश में नैरेटिव पर अंकुश लगाया जा रहा हो, उस देश में सिनेमा पर अंकुश न लगे, ऐसा कैसे हो सकता है. पर सरकार और ब्यूरोक्रेट्स यह भूल जाते हैं कि हर देश का सिनेमा ही उस देश का सांस्कृतिक राजदूत होता है. लेकिन वर्तमान सरकार ने तो अपने प्रयासों से एक राज्य की सांस्कृतिक छवि के साथ देश की सांस्कृतिक छवि को ही तहसनहस करने वाला काम किया है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रोपेगैंडा सिनेमा से ही किसी देश की संस्कृति का विकास होता है?  

केरल इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल सहित सभी फिल्म महोत्सव दुनियाभर की विविध सोच को एक सार्थक मंच देते हैं. वैसे, केरल इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल अपने राजनीतिक रूप से जागरूक प्रोग्रामिंग के लिए जाना जाता है. ऐसे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की कार्रवाई से यह बाधित हुआ, जिस से आयोजकों और फिल्मप्रेमियों में निराशा फैली. जब सरकार इन महोत्सव की फिल्मों को प्रतिबंधित करती है, तो यह वैश्विक स्तर पर भारत की ‘लोकतांत्रिक छवि’ को नुकसान पहुंचाता है. यह कलाकारों के भीतर ‘खुद को सैंसर करने’ का डर पैदा करता है, जो रचनात्मकता के लिए घातक है. इतना ही नहीं, ऐसे प्रतिबंध 2 देशों के बीच सांस्कृतिक आदानप्रदान को भी बाधित करते हैं.

सब से बड़ा व अहम सवाल यह है कि क्या अब भारतीय वयस्क नागरिकों के पास यह स्वतंत्रता भी नहीं है कि वे क्या देखें और क्या सोचें?

6 प्रतिबंधित फिल्मों की संक्षिप्त जानकारी:

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01. क्लैश (मूल शीर्षक: एश्तेबक):

यह मोहम्मद दीब द्वारा निर्देशित मिस्र की फिल्म है. जून 2013 की राजनीतिक घटनाओं के ठीक बाद की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म पूरी तरह से एक पुलिस वैन के भीतर फिल्माई गई है, जिस में मुसलिम ब्रदरहुड के सदस्य और सेना समर्थक, साथ ही इन दोनों गुटों से संबंधित न होने वाले अन्य लोग भी मौजूद हैं. फिल्म अरब स्प्रिंग के 2 साल बाद मिस्र में हिंसा और राजनीतिक उथलपुथल का वर्णन करती है, जहां अलगअलग पृष्ठभूमि के हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को एकसाथ रहने के लिए मजबूर किया जाता है. 

इसे 2016 के कांस फिल्म महोत्सव में आधिकारिक तौर पर चुना गया था और यह उस वर्ष महोत्सव के अन सर्टेन रिगार्ड सैक्शन की ओपनिंग फिल्म थी. इसे 89वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए मिस्र की प्रविष्टि के रूप में चुना गया था, लेकिन इसे नामांकित नहीं किया गया था. 2016 में 21वें आईएफएफके में इसे कई पुरस्कार मिले थे, जहां इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए सुवर्ण चकोरम (गोल्डन क्रो फीजेंट) और औडियंस चौइस अवार्ड से सम्मानित किया गया था. टौम होन्क्स भी इस फिल्म की तारीफ कर चुके हैं.

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02. ईगल्स औफ द रिपब्लिक:

2025 में बनी एक मिस्र की अरबी भाषा की राजनीतिक थ्रिलर फिल्म है, जिसे तारिक सालेह ने लिखा और निर्देशित किया है. यह उन की काहिरा त्रयी की अंतिम कड़ी है, जो द नाइल हिल्टन इंसिडेंट (2017) और बौय फ्रौम हेवन (2022) के बाद आई है. इस में फारेस ने जौर्ज फहमी का किरदार निभाया है, जो एक अभिनेता है जिस पर एक प्रचार फिल्म में अभिनय करने का दबाव डाला जाता है. मिस्र के सब से प्रसिद्ध अभिनेताओं में से एक जौर्ज फहमी को उस फिल्म से बाहर करवा दिया जाता है जिस की वे शूटिंग कर रहे थे और उन पर एक नई प्रचारात्मक फिल्म में राष्ट्रपति की भूमिका निभाने का दबाव डाला जाता है. वे मजबूरन स्वीकार करते हैं, फिर शूटिंग के दौरान क्या क्या होता है, वही इस फिल्म की कहानी है.

फिल्म का विश्व प्रीमियर 19 मई, 2025 को कांस फिल्म महोत्सव के मुख्य प्रतियोगिता खंड में हुआ था, जहां इसे पाल्मे डीओर के लिए नामांकित किया गया था. इसे 98वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए स्वीडिश प्रविष्टि के रूप में चुना गया था, लेकिन इसे नामांकित नहीं किया गया.

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03. औल दैट्स लेफ्ट औफ यू:

चेरियन डाबिस द्वारा लिखित व निर्देशित यह 2025 में बनी एक सशक्त फिलिस्तीनी महाकाव्य फिल्म है. यह फिल्म इजरायलफिलिस्तीनी संघर्ष के बीच एक फिलिस्तीनी परिवार की 3 पीढ़ियों की कहानी बयां करती है. यह एक फिलिस्तीनी परिवार के लचीलेपन, विस्थापन और संघर्ष की बहुपीढ़ीगत कहानी बयां करती है, जो 1948 के नक्बा से ले कर आज तक की घटनाओं को दर्शाती है. यह फिल्म आघात, अस्तित्व और प्रतिरोध के रूप में कहानी कहने पर केंद्रित है, जिस में सालेह बकरी, मारिया ज़्रेइक और एडम बकरी जैसे कलाकार हैं. 

यह जौर्डन की औस्कर के लिए भेजी गई फिल्म थी. इस का विश्व प्रीमियर 25 जनवरी, 2025 को सनडांस फिल्म फैस्टिवल में हुआ था. इसे 98वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए जौर्डन की प्रविष्टि के रूप में चुना गया था और दिसंबर की शौर्टलिस्ट में जगह बनाई थी. 

फिल्म की कहानी के अनुसार एक फिलिस्तीनी किशोर के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से उस की मां अपने परिवार के इतिहास को बयां करती है, जिस की शुरुआत 1948 में जाफा से हुए विस्थापन से होती है, और यह बेदखली के स्थायी प्रभाव को उजागर करती है. 

यह फिल्म अंतरपीढ़ीगत आघात, पहचान, गरिमा, कहानी कहने के माध्यम से प्रतिरोध और अपनी आवाज को संरक्षित करने की सार्वभौमिक मानवीय आवश्यकता का अन्वेशण करती है.

04. यस (हिब्रू):

नादव लैपिड लिखित और निर्देशित 2025 में बनी यह एक ड्रामा फिल्म है, जिस में एरियल ब्रोंज, एफ़्रैट डोर, नामा प्रीस, अलेक्सी सेरेब्रियाकोव और शेरोन अलेक्जैंडर ने अभिनय किया है. फिल्म का विश्व प्रीमियर 22 मई, 2025 को कांस फिल्म महोत्सव के डायरैक्टर्स फोर्टनाइट सैक्शन में हुआ और इसे 17 सितंबर को लेस फिल्म्स डू लोसांगे द्वारा फ्रांस में सिनेमाघरों में रिलीज किया गया. 

7 अक्टूबर के हमलों के बाद पियानोवादक और हास्य कलाकार वाई अपने कैरियर को आर्थिक रूप से सफल बनाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है, तभी उसे एक नए राष्ट्रगान के लिए संगीत तैयार करने का काम सौंपा जाता है.

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05. फ्लेम्स:

रवि शंकर कौशिक द्वारा निर्देशित और सुपन एस वर्मा द्वारा प्रस्तुत यह सर्वाइवल थ्रिलर फिल्म है. जिस में एक निम्न जाति के प्रवासी मजदूर की कहानी है. भारत के हरियाणा के समृद्ध लेकिन जातिग्रस्त कृषि क्षेत्रों में  एक मूक प्रवासी खेतिहर मजदूर महेश को अपने अस्तित्व के लिए एक भयावह यात्रा पर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जब उस के 10 वर्षीय बेटे पर हत्या का आरोप लगता है. अपनी पत्नी की हत्या के बाद महेश जीवनयापन के लिए संघर्ष करता है. इस ने जोगजानेटपैक एशियन फिल्म फैस्टिवल में दर्शकों को प्रभावित किया. इस फिल्म में वाजिद अली, कलावती देवी, विक्रम कोचर की अहम भूमिकाएं हैं.

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06. ए पोएटः

2025 में बनी एक ट्रैजिक कौमेडी फिल्म है, जिसे साइमन मेसा सोटो ने लिखा, सहनिर्मित किया और निर्देशित किया है. कोलंबिया, जरमनी और स्वीडन के बीच एक अंतर्राष्ट्रीय सहनिर्माण वाली इस फिल्म में उबेइमार रियोस, रेबेका एंड्रेड, गुइलेर्मो कार्डोना, एलिसन कोरिया, मार्गरीटा सोटो और हंबर्टो रेस्ट्रेपो ने अभिनय किया है. 

फिल्म का विश्व प्रीमियर 19 मई, 2025 को कांस फिल्म महोत्सव के अन सर्टेन रिगार्ड सैक्शन में हुआ, जहां इस ने सैक्शन का जूरी पुरस्कार जीता. इसे 28 अगस्त, 2025 को ओटीएएच द्वारा कोलंबिया में सिनेमाघरों में रिलीज किया गया था. इसे 98वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए कोलंबियाई प्रविष्टि के रूप में चुना गया था, लेकिन इसे नामांकित नहीं किया गया. 

फिल्म की कहानी के केंद्र में कहानी कवि औस्कर रेस्ट्रेपो हैं. औस्कर रेस्ट्रेपो का कविता के प्रति जनून उन्हें कोई प्रसिद्धि नहीं दिला पाया है. उम्रदराज और अनियमित स्वभाव के कारण वह गुमनाम कवि की छवि में ढल चुका है. जब उस की मुलाकात युरलेडी नाम की एक किशोरी से होती है, तो वह उस की प्रतिभा को निखारने में मदद करता है. Government Bans on Cinema

Anemia in Girls : लड़कियों में एनीमिया – लापरवाही का नतीजा

Anemia in Girls : व्रत और सही खानपान न होने के कारण लड़कियां एनीमिया का शिकार हो रही हैं. जिस का प्रभाव न केवल उन की पर्सनाल्टी पर पड़ता है बल्कि वह बीमारियों से भी ग्रस्त हो जा रही हैं. वैसे तो शहर और गांव दोनों ही जगहों पर रहने वाली लड़कियां इस का शिकार हैं लेकिन गांव और गरीब परिवारों में रहने वाली लड़कियों पर इस का प्रभाव अधिक दिख रहा है.

लखनऊ के चिनहट इलाके में सीजी गर्ल्स कालेज के नाम से लड़कियां का स्कूल है. नारी सशक्ति नाम का एनजीओ लड़कियों के स्वास्थ्य की जांच करने का काम करता है. नवंबर माह में नारी शक्ति एनजीओ ने अपना एक कैंप सीजी गर्ल्स कालेज में लगाया. कक्षा 9 से कक्षा 12 की लड़कियों का वजन और दूसरी जांचों के जरिए उन के अंदर एनीमिया का पता लगाने का काम किया जा रहा था. जांच में 120 लड़कियों का हेल्थ परीक्षण किया गया. इन में से 80 लड़कियां अंडरवेट थी. यह सभी एनीमिया का शिकार थी. इन के घरवालों को इस का पता नहीं था न ही इन लड़कियों को इस का पता था.

इन में से अधिकतर को काम में मन न लगने की शिकायत थी. कुछ को थकान लगती थी. जिन लड़कियों को माहवारी होती थी वह इस से परेशान थी कि कभी रक्तस्राव होता था, कभी कम होता था और कभी न के बारबार केवल रक्त की बूंदें ही दिखती थी. माहवारी के दौरान पेट और पीठ की तरफ कमर में दर्द होता था. यह स्कूल में खेलकूद में हिस्सा नहीं लेती थी.

नारी शक्ति एनजीओ ने इस तरह की परेशान लड़कियों के टिफिन बौक्स की जांच की तो उन में ज्यादातर के पास टिफिन नहीं था. उन्होंने बताया कि वह घर से 10-20 रूपए ले कर आती हैं और कालेज के बाहर लगने वाले ठेले से खस्तापकौड़ा और ब्रेडरोल ले कर खाती है. जो लड़कियां टिफिन ले कर आती थी उन का कहना था कि वह कभी पराठा, कभी पूड़ी और कभी रोटी ले कर आती हैं. उस के साथ खाने के लिए अचार या आलू की सब्जी लाती थी.

इन सभी को खाने में फल और हरी सब्जी टिफिन में नहीं मिलती थी. न इन को यह खाना पसंद था. इन में से अधिकतर शाकाहारी खाना खाती थी. 20-25 लड़कियां वह थी जो सप्ताह में एक दिन व्रत भी रहती थी. कुछ सोमवार का व्रत रखती थी तो कुछ गुरूवार का व्रत रखती थी. जिस में वह केवल शाम को खाना खाती थी.

डाक्टर मांडवी कौर कहती है ‘इन लड़कियों की दिनचर्या और खानपान देख कर समझ आ रहा था कि इन को न तो अपनी सेहत क चिंता थी न ही वह यह मानती थी कि वह बीमार है. उन को यह भी नहीं पता था कि एनीमिया जैसा कोई रोग होता है.’

एनीमिया की कमी से होने वाली परेशानियां:

लड़कियों में खून की कमी यानि एनीमिया के कारण कई तरह की बीमारियां बढ़ जाती हैं. अगर समय पर इन का उपचार नहीं किया जाता तो यह खतरनाक साबित हो जाती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पूरी दुनिया में 20 साल तक की आयु की 49 फीसदी लड़कियां इस से प्रभावित हैं. भारत में 15 से 20 साल आयुवर्ग की 57 फीसदी लड़कियां एनीमिया की शिकार हैं. गांव में रहने वाले गरीब एससी बिरादरी के परिवारों में रहने वाली लड़कियों में एनीमिया का खतरा सब से अधिक है. इस का सब से बड़ा कारण अच्छा खाना न मिलना है. इसी के साथ लड़कियों में माहवारी का शुरू होना दूसरा प्रमुख कारण है.

एनीमिया के दूसरे प्रमुख कारणों में विटामिन बी12 और फौलेट की कमी, थैलेसीमिया जैसी हीमोग्लोबिनोपैथी, सिकल सेल रोग या लक्षण शामिल हैं. माहवारी के दौरान कई लड़कियों को अधिक रक्तस्राव होता है. इस के साथ ही साथ माहवारी का अनियमित होना, हार्मोन के स्तर में उतार चढ़ाव भी हो सकता है. आज गांव में लड़कियों को पौष्टिक आहार कम ही मिल पाता है. अभी भी उन के साथ भेदभाव कायम है. काम लड़कियों को अधिक करना होता है. वह घर के काम, पढ़ाई और बाहर के काम भी करती हैं.

Anemia in Girls
एनीमिया से ग्रसित महिला (प्रतीकात्मक छवि)

एनीमिया की सब से बड़ी पहचान यह होती है कि थोड़ा भी मेहनत वाला काम करते ही थकान महसूस होने लगती है. माहवारी के समय यह परेशानी अधिक महसूस होती है. जिस की वजह से लड़कियां बीमार सी बनी रहती है. इस से वह चिड़चिड़ी हो जाती हैं. उन की सुदंरता खत्म हो जाती है. वह चिंतित और बीमार नजर आती हैं. उन का पढ़ाई, खेलकूद या किसी काम करने में मन नहीं लगता जिस से उन के शरीर का सही विकास नहीं होता है. यह एनीमिया अगर लंबे समय तक बनी रहती है तो टीबी जैसे खतरनाक रोग हो सकते हैं. यह लड़कियां जब मां बनती हैं तो प्रसव के समय या गर्भावस्था के दौरान परेशानी का सामना करना पड़ता है.

माहवारी और एनीमिया:

लड़कियों में एनीमिया और माहवारी का आपस में गहरा संबंध है. जिन लड़कियों को लंबे समय तक यानि 5 से 7 दिन तक पीरियड्स आते हैं या माह में दो बार पीरियड्स आते हैं उन को दिक्कत बहुत होती है. इस से शरीर में आयरन की कमी हो जाती है. जिस से थकान, कमजोरी, सांस फूलना और पीलापन जैसे लक्षण दिखते हैं. लड़कियों में हर माह माहवारी के दौरान शरीर से रक्त के साथ आयरन निकल जाता है. ज्यादा समय तक जिन के लंबे समय तक पीरियड्स आते हैं. उन में एनीमिया का खतरा बहुत ज्यादा होता है. क्योंकि शरीर की आयरन की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं.

एनिमिया से बचाव:

डाइटीशियन रानू सिंह बताती हैं ‘एनीमिया से बचाव के लिए आयरन की कमी को पूरा करने के लिए पालक, चुकंदर, अनार, और दालों का प्रयोग करना चाहिए. विटामिन 12 मांस, मछली, अंडे और फौलिक एसिड हरी सब्जियों से मिल जाती हैं. संतुलित और पौष्टिक आहार लें. विटामिन सी के लिए नीबू, संतरा खाएं. इस के साथ ही चायकौफी का सेवन कम करें. लोहे के बर्तनों में खाना पकाने से भोजन में आयरन की मात्रा बढ़ सकती हैं.

तांबे के बर्तन में रखा पानी पीना भी फायदेमंद माना जाता है. भारी मासिक धर्म वाली लड़कियों को नियमित जांच करानी चाहिए. खाने के तुरंत पहले या बाद में चायकौफी पीने से बचें. यह आयरन को कम करने का काम करते हैं. भरपूर नींद लें. तनाव कम करें और एक्सरसाइज करें. पेट के कीड़ों से होने वाला संक्रमण भी एनीमिया का कारण बन सकता है. इसलिए इन का इलाज कराते रहें.

इस के अलावा चाहे वजन कम करने के लिए हो यह व्रत रहने के लिए शरीर को भूखा न रखे. भूखा रहने से शरीर में कई तरह की परेशानियां बढ़ जाती है शुरूआत में जिन का पता नहीं चलता है. धीरेधीरे यह कई तरह की बीमारियों को बढ़ाने का काम करती हैं. ऐसे में स्कूल के समय से ही ध्यान रखें जिस से मां बनने और प्रसव के दौरान कई खतरों से बचा जा सके.

नौकरी और कैरियर के दौरान शरीर से जिस तरह की मेहनत ली जाती है वह भी हो सके. कैरियर में आगे बढ़ने के लिए भागदौड़ की जरूरत होती है. अब लड़कियों को उन क्षेत्रों में भी जौब मिलता है जहां ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. ऐेसे में कमजोर शरीर से कदम आगे नहीं बढ़ाए जा सकते हैं. Anemia in Girls

Patriotism : देशभक्ति, धर्मभक्ति और अंधभक्ति से ऊपर है

Patriotism : देशभक्ति पर बहस ने कई रूप ले लिए हैं. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारत के टुकड़े करने के नारों का नाम ले कर जो गुब्बारा फुलाया गया वह एक वर्ग में काफी कामयाब हुआ और देश का अंधभक्त वर्ग जो अंधविश्वासों को आस्था मानता है, तर्क को विश्वासघातक मानता है, दान को मुक्ति का रास्ता मानता है, पूजापाठ, व्रत को समृद्धि का अकेला मार्ग मानता है, अब देशभक्ति की आड़ में अपने कट्टरपन को दूसरों पर थोपने का मार्ग ढूंढ़ रहा है. देशभक्ति होती है देश के लिए काम करना और उस के लिए न तो झंडा लहराना जरूरी है और न ही 26 जनवरी को इंडिया गेट व 15 अगस्त को लालकिले में वंदना करना. देशभक्ति होती है देश के संविधान की भावना का आदर करना, बराबरी के सिद्धांत को मानना, परिश्रम कर देश व खुद को उन्नत करना. देशभक्ति में स्वयं का उद्धार व स्वयं की सफलता छिपी है पर दूसरों की कीमत पर नहीं, खुद की मेहनत पर.

देशभक्ति का अर्थ है हर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना, सामाजिक नियमों का पालन करना, कानूनों का अनुसरण करना और सही तरह से लोकतंत्र की प्रक्रिया को अपनाना. देशभक्ति का अर्थ है कि हर व्यक्ति को, जो भारतीय है या नहीं पर भारत में है, को कानूनों की सुरक्षा देना और हरेक को गौरव दिलवाना. नई देशभक्ति का मतलब हो रहा है कि तिरंगा लहराओ और देशभक्त हैं के नारे लगाओ और बाकी सभी कर्तव्यों को भूल जाओ. नई देशभक्ति है कि जो हम कह रहे हैं वह देशभक्ति है, जो हम से सहमत नहीं वह देशद्रोही है. देशभक्त वह है जो भारत माता की पूजा संतोषी माता की तरह करे वरना देशद्रोही. देशभक्त वह है जो प्रधानमंत्री के पांव पूजे और उन सब के पांव पूजे जिन के पांव प्रधानमंत्री पूजते हैं वरना देशद्रोही. देशभक्ति धर्मभक्ति है और उस धर्म की भक्ति जो सत्तारूढ़ धनपतियों का है.

देश के गरीबों, दलितों, पिछड़ों, मुसलिमों, आदिवासियों, बेकारों, अनपढ़ों, भूखों, बीमारों की तो छोडि़ए, देश के उच्च वर्णों और वर्गों की औरतों का हाल तो देखिए जो धर्मभक्ति यानी देशभक्ति के बोझ से दबीकुचली हैं. कितनी विधवाओं को देश का समाज बराबरी का हक देता है? कितनी कुंआरियों को सम्मान मिलता है? कितनी बांझों को समाज में बराबरी की जगह मिलती है? पुनर्विवाह में कितनी विधवाओं और तलाकशुदाओं को बराबरी का पति मिल पाता है, अगर मिल भी जाए? सिर्फ औरतों को ही क्यों व्रतों, उपवासों, पूजा, साधू सेवा में ठूंस दिया जाता है? रिवाजों के नाम पर कितनी औरतों को मीलों नंगे पैर चलवा कर मंदिरों में जाने को मजबूर करा जाता है? स्वतंत्र देश में कितनी औरतें अपनी इच्छा के अनुसार वोट दे पाती हैं? कितनी औरतें परिवार यानी पति की इच्छा के खिलाफ चुनावों में भाग ले पाती हैं?

बराबरी का हक देशभक्ति की निशानी है पर दफ्तरों, दुकानों, कारखानों में कितनी औरतें नजर आती हैं? देशभक्ति तब आड़े नहीं आती जब औरतों को धार्मिक कामों में पुरुषों से अलग कर दिया जाता है. देशभक्ति का सवाल तब नहीं उठता जब विरासत का हिस्सा पुरुषों के हाथों में चला जाता है. जो पुत्रवती भव: कह कर कन्या भू्रण हत्या करते हैं, करवाते हैं या होने देते हैं उन्हें देशद्रोही नहीं कहा जाता. देशभक्ति को पूजापाठ के बराबर न बनाएं. देश के सही कानूनों व नियमों का उल्लंघन तो ठीक है पर नारा लगाना उसी तरह खराब है जैसे काले धब्बे वाले देवीदेवताओं की पूजा तो ठीक है पर उन के साथ जुड़ी विवादास्पद बातों की चर्चा करना ईश निंदा करना है.

देशभक्ति धर्मभक्ति और अंधभक्ति से कहीं अलग और कहीं ऊपर है. देशभक्ति में देश व सरकार की आलोचना शामिल है. देशभक्ति में असहमति शामिल है. देशभक्ति में देश में रह कर देश के फैसलों का विरोध करना शामिल है. देशभक्ति में तो देश से अलग हो जाने का हक भी शामिल है. क्या उन लाखों नागरिकों को देशद्रोही कहेंगे, जिन्होंने भारत छोड़ कर दूसरे देशों में पहले नौकरियां कीं, फिर नागरिकता ली और भारत की नागरिकता छोड़ी? वे भी देशद्रोही नहीं हैं, क्योंकि देशभक्ति में व्यक्तिगत विचार, मरजी से काम करने का हक, अलग रहने का हक शामिल है. जब तक देश में रह कर खूनखराबा न किया जाए. मारपीट करना, जेल में बंद करना, भाषणों की तेजाबी वर्षा करना देशभक्ति नहीं है. देशभक्त बनना है तो कम से कम पहले आधी दुनिया यानी औरतों को तो देशभक्ति का सुख देना सीखो. Patriotism

Best Satire Story in Hindi : बिलबिलाता देशभक्त

Best Satire Story in Hindi : उस के अंदर का दर्द किसी सुलगे हुए विस्फोटक के समान चेहरे पर झलक रहा था. किसी भी क्षण भयंकर विस्फोट हो सकता था और विस्फोट से हर कोई डरता है, हम भी. हमारा देशभक्त मित्र बड़ा परेशान नजर आ रहा था. मौसम तो सुहावना था लेकिन वह पसीनापसीना हो रहा था. उस के अंदर का दर्द किसी सुलगे हुए विस्फोटक के समान चेहरे पर झलक रहा था.

किसी भी क्षण भयंकर विस्फोट हो सकता था. विस्फोट से कौन नहीं डरता? हम सावधान थे लेकिन हमारा जिज्ञासु मन मान नहीं रहा था, वह जल्दी से जल्दी विस्फोट का परिणाम जानने को उत्सुक था. इस के लिए हम ने खुद उत्प्रेरक बनने का काम किया और आग में घी डालते हुए अपने परमप्रिय देशभक्त मित्र से कहा, ‘‘मित्र, क्या हुआ? अपनी सरकार के होते हुए भी चेहरे पर यह गुस्सा, यह परेशानी, तोबातोबा.’’ जैसी कि उम्मीद थी, हमारा देशभक्त मित्र एकदम से फट पड़ा, ‘‘क्या खाक अपनी सरकार है? किस मुंह से कह दें कि यह अपनी सरकार है?’’

‘‘अरे इसी चौखटे से चौड़े मुंह से कह दो जो तुम्हारे पास है,’’ हम ने मित्र को चिढ़ाते हुए कहा. यह सुन कर उस का मुंह तो बना लेकिन इस समय उस के अंदर का लावा इतना बलवती था कि वह खुद को बोलने से रोक नहीं पा रहा था. वह बिलकुल चोंच को आगे करते हुए कागा की तरह बोला, ‘‘अरे हम ने तो यह सरकार इसलिए बनवाई थी कि कश्मीर में आतंकवाद का बिलकुल सफाया हो जाए. लेकिन वहां तो उलटा हो रहा है. आएदिन आतंकवादी हमारे जांबाज सैनिकों को शहीद कर के तिरंगे में लपेट कर भेज रहे हैं. पहले तो कश्मीर घाटी ही आतंकवाद से त्रस्त और ग्रस्त थी, अब तो आतंकवादी जम्मू क्षेत्र को भी निशाना बना रहे हैं और कुछ लोग उन का साथ भी दे रहे हैं.’’

‘‘देखो मित्र, बात तो तुम्हारी सही है लेकिन सरकार अपना काम तो कर रही है.’’ हमारी बात पूरी होने से पहले ही देशभक्त मित्र तिड़क उठा, ‘‘क्या खाक काम कर रही है? आतंकवाद तो उस से रोका नहीं जा रहा.’’ ‘‘देखो, तुम्हारी सरकार ने अनुच्छेद 370 का खात्मा कर दिया. पत्थरबाजी भी खत्म ही हो गई और अब क्या चाहिए तुम्हें?’’ देशभक्त मित्र ने झल्ला कर सिर खुजाया. अभिनय तो उस ने ऐसा किया जैसे सिर के बाल ही नोंच लेगा. फिर हमारी तरफ आग उगलती नजरों से देख कर बोला, ‘‘बस, तुम्हें इतने से ही चैन है. हम जैसे देशभक्त से पूछो हमारे दिल पर क्या गुजर रही है? हमारा एक सैनिक शहीद होता है, हमारा कलेजा टुकड़ेटुकड़े हो जाता है. मैं तो कहता हूं कि एकएक आतंकवादी को जहन्नुम पहुंचा दिया जाए.’’ ‘‘अरे भाई, तुम्हारे वोट से चुनी हुई सरकार आतंकवादियों के खिलाफ ‘जीरो टौलरेंस’ की नीति तो अपनाए हुए है और इस के तहत आतंकवादियों को चुनचुन कर मारा भी जा रहा है.’’

देशभक्त मित्र हमारी बात सुन कर कड़क कर बोला, ‘‘मैं जानता था, तुम्हारे अंदर देशभक्ति नाम की कोई चीज है ही नहीं. तुम्हें सैक्युलरिज्म के कीड़े ने काटा हुआ है. तुम क्या समझोगे देशभक्ति का जज्बा?’’ ‘‘अरे मित्र, फिर तुम ही समझा दो न, क्या किया जाना चाहिए?’’ हम ने उस की राय जानने की कोशिश की. वह तड़प कर बोला, ‘‘यह बताओ, यह जो हमारी सेना के पास नाग, त्रिशूल, अग्नि और भी न जाने कौनकौन सी मिसाइलें हैं, क्या उन्हें शोकेस में सजा कर रखने के लिए बनाया हुआ है? और वे जो फ्रांस से अरबों रुपयों के राफेल लड़ाकू विमान खरीदे हैं, उन जंगी जहाजों को क्या जंग लगाने के लिए खरीदा गया है?’’ देशभक्त मित्र की जंगीजबान सुन कर हम सहम गए. हम ने कहा, ‘‘मित्र, तुम तो किसी पाकिस्तानी कट्टरपंथी की भाषा बोल रहे हो, आखिर कहना क्या चाहते हो?’’ ‘‘तुम नहीं सम?ागे. तुम सैक्युलर कभी नहीं सम?ागे देशभक्ति की भाषा. अरे हम और हमारी सरकार दुनियाभर में ढोल पीटते घूमते हैं कि पाकिस्तान ‘आतंकवाद की फैक्ट्री’ है. फिर इन मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से आतंकवाद की उस फैक्ट्री को तबाह क्यों नहीं कर डालते?’’ ‘‘लेकिन मित्र, ऐसा करने के लिए तो बहुतकुछ सोचना पड़ता है और उस से भी बड़ी बात यह है कि ऐसा करने के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए.’’

हमारा देशभक्त मित्र मुंह बिचकाते हुए बोला, ‘‘यही तो दुख की बात है. हम भी सोचते थे उन के पास 56 इंच का सीना है लेकिन किस काम का. अमेरिका को देखो, 26/11 के हमले के बाद उस ने देश के देश तबाह कर दिए. सद्दाम हुसैन को सरेआम फांसी पर लटका दिया. कर्नल गद्दाफी को मौत की नींद सुला दिया और ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में घुस कर मारा. जब अमेरिका ऐसा कर सकता है तो हम क्यों नहीं?’’ हम ने यह सुन कर अपनी हंसी को दबाया. हमारा मित्र भारत की तुलना अमेरिका से कर रहा था. हम ने अपने देशभक्त मित्र को और चिढ़ाते हुए कहा, ‘‘जहां तक 56 इंच के सीने की बात है तो हम तो इतना ही कहेंगे भाई, हाथी के दांत दिखाने के और, और खाने के और होते हैं. देखो इजराइल को, उस ने अपने दुश्मनों को कैसा सबक सिखाया?’’

इजराइल का नाम सुनते ही हमारे देशभक्त मित्र का सीना गर्व से चारगुना चौड़ा हो गया. चेहरे पर मुसकान की लकीर खिंच गईं. वह जोश के साथ बोला, ‘‘बिलकुल सही. अब पकड़ा न, तुम ने बात का सही सिरा. इजराइल की बात ही कुछ और है. हमें भी इजराइल की तरह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए.’’ ‘‘लेकिन मित्र, हमारा देश तो शांति का मसीहा है. हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय नियमों और कानूनों का सम्मान करता है. हमारा देश बम और गोली की बात नहीं करता. देखा नहीं, मोदीजी अपनी रूस यात्रा के दौरान पुतिन को कैसे शांति का पाठ पढ़ा कर आए हैं? आस्ट्रिया में तो उन्होंने यह तक कह दिया कि हम ने दुनिया को युद्ध नहीं, बुद्ध दिए हैं. और तुम भी हर समय ‘ओम शांति, ओम शांति’ का पाठ जपते रहते हो, फिर क्रांति कैसे हो?’’ हमारे द्वारा शांति का यह व्याख्यान सुन कर देशभक्त मित्र कुलबुलाया, ‘‘सही कहते हो, मित्र. जो दूसरों को शांति का पाठ पढ़ाए, वह तो खुद एक मक्खी भी नहीं मार सकता, आतंकवादियों के खात्मे की बात तो बहुत दूर. अब तो पीओके को पाने की रहीसही कसर भी खत्म. हमारी सरकार तो तब कुछ नहीं कर पाई जब 14 फरवरी, 2019 को पुलवामा में आतंकवादियों ने सीआरपीएफ के 40 से ज्यादा जवान शहीद कर दिए थे. तब तो दुनिया भी हमारे साथ थी. तब हमारे दिल के घावों पर  ‘झंडू बाम’ लगाते हुए यह बताया गया था, ‘समय हमारा होगा, जगह हम चुनेंगे, फैसला हम करेंगे.’ लेकिन आंखें पथरा गईं, कान बहरे हो गए, न वह समय आया और न आएगा.’’ ‘‘अरे मित्र, इतने निराश क्यों होते हो? तुम्हारी देशभक्त सरकार ने पाकिस्तान के बालाकोट में कितनी बहादुरी से सर्जिकल स्ट्राइक कर के 300 आतंकवादियों को मौत की नींद सुला दिया था और उस समय तुम भी तो कितनी मस्ती से नाचे थे? याद है न तुम्हें, क्यों?’’ मित्र को न जाने क्यों ऐसा लगा जैसे मैं उस के जले पर नमक छिड़क रहा हूं. वह कुछ मायूस सा हो कर बोला, ‘‘अब तो वह सब भी ? झूठ का एक पुलिंदा लगता है. वह तो जनता को बेवकूफ बनाने का एक नाटक भर लगता है. अगर हम ने पाकिस्तान के 300 आतंकवादी मारे होते तो हम तो इतने ढिंढोरची हैं कि सारी दुनिया में उस का वीडियो दिखादिखा कर मोदी के विजयी गान गा रहे होते और सारी दुनिया में हल्ला काट रहे होते- अरे, 56 इंच का सीना है हमारा, 56 इंच का.’’ ‘‘इस का मतलब तो यह हुआ कि अब तुम भी यह स्वीकार करते हो कि बालाकोट में केवल कुछ पेड़ गिराए गए थे?’’

इस संवेदनशील मुद्दे पर हम ने देशभक्त मित्र की राय जानने की कोशिश की. वह बोला, ‘‘अब तो मुझे भी यही शक होने लगा है. आखिर सेना तो वही करेगी जो उस को आदेश दिया जाएगा. दम होता तो रावलपिंडी पर बम गिराने का हुक्म देते.’’ हम को लगा कि देशभक्त मित्र सरकार की आलोचना में सरकार के विरोधियों से भी आगे निकल रहा है. शायद यह उस के मन की पीड़ा थी जिसे वह आग की तरह उगल रहा था. हम ने उस को थोड़ी सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘मित्र, अपनी सरकार को ले कर इतने उदास न हो. देखो, तुम्हारी सरकार ने आतंकवादियों के हितैषी और अलगाववादी नेता यासीन मलिक, इंजीनियर शेख अब्दुल राशिद, अमृतपाल सिंह आदि को जेलों में डाल रखा है.’’ ‘‘हम देशभक्तों को यही तो परेशानी है कि इन अलगाववादियों और आतंकवाद के पैरोकारों को जेल में डाल ही क्यों रखा है, इन्हें अब तक जहन्नुम पहुंचाया क्यों नहीं?

जेल में जा कर इंजीनियर राशिद बारामूला से और अमृतपाल खडूर साहिब से सम्मानित संसद सदस्य बन गए हैं. इन का हश्र तो ओसामा बिन लादेन जैसा होना चाहिए था. ऐसी ढुलमुल नीति से देश नहीं चला करते.’’ हम ने सोचा यह नाग सा बिलबिलाता देशभक्त है. यह सारी सीमाएं लांघ रहा है. जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की मौत मांग रहा है. इसे न संविधान की चिंता है और न कानून का डर. इसे सबक सिखाना जरूरी है. हम ने धोबी पाट लगाते हुए कहा, ‘‘मित्र, तुम बड़े देशभक्त बने फिरते हो. अपनी ही सरकार की जम कर आलोचना कर रहे हो. इतने बड़े देशभक्त हो तो जैसे ये आतंकवादी अपने मिशन के लिए जान गंवा देते हैं, तुम भी देशभक्ति दिखाते हुए उन का मुकाबला करो. उन के खिलाफ आंदोलन करो, जेल जाओ, गोली खाओ. पाकिस्तान से आतंकवादी जान हथेली पर ले कर आते हैं, तुम भी जान हथेली पर ले कर पाकिस्तान जाओ और वहां ‘आतंकवाद की फैक्ट्री’ में पनप रहे आतंकवादियों को ढेर कर आओ. तब होगी तुम्हारी जांबाजी और देशभक्ति की परीक्षा कि चलो, तुम ने कुछ कर के दिखाया.’’

यह सुनते ही देशभक्त मित्र बौखला गया. वह हम से नाराज होते हुए बोला, ‘‘अरे, ये कैसी बातें करते हो? आतंकवादियों से लड़ना तो सरकार का काम है. तुम तो हमें ही मरवा डालोगे. तुम फालतू की बात करते हो. तुम्हें सैक्युलरिज्म के कीड़े ने काटा है. तुम से बातें करना ही बेकार है. तुम जैसे सैक्युलरिस्ट के पास बैठ कर अपना दिमाग खराब ही नहीं करना चाहिए. तुम क्या जानो देशभक्ति क्या होती है?’’ ऐसा कहते हुए बौखलाया हुआ हमारा देशभक्त मित्र वहां से पैर पटकता हुआ दफा हो गया. उस के जाने पर हम ने चैन की एक गहरी सांस ली. हम जानते थे, देशभक्तों की दुनिया निराली होती है, इस प्रजाति के जीव बोलते बहुत हैं, करते कुछ नहीं. Best Satire Story in Hindi

Social Story in Hindi : 26 जनवरी स्पेशल – छुट्टी – सरहद पार क्यों तनाव था ?

Social Story in Hindi : दूर दूर तक जहां तक नजर जा सकती थी, पहाड़ों पर बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी. प्रेमी जोड़ों के लिए यह एक शानदार जगह हो सकती थी, पर सरहद पर इन पहाडि़यों की शांति के पीछे जानलेवा अशांति छिपी हुई थी.

पिछले कई महीनों से कोई भी दिन ऐसा नहीं बीता था, जब तोपों के धमाकों और गोलियों की तड़तड़ाहट ने यहां की शांति भंग न की हो.

‘‘साहबजी, आप कौफी पीजिए. ठंड दूर हो जाएगी,’’ हवलदार बलवंत सिंह ने गरम कौफी का बड़ा सा मग मेजर जतिन खन्ना की ओर बढ़ाते हुए कहा.

‘‘ओए बलवंत, लड़ तो हम दिनरात रहे हैं, मगर क्यों  यह तो शायद ऊपर वाला ही जाने. अब तू कहता है, तो ठंड से भी लड़ लेते हैं,’’ मेजर जतिन खन्ना ने हंसते हुए मग थाम लिया.

कौफी का एक लंबा घूंट भरते हुए वे बोले, ‘‘वाह, मजा आ गया. अगर ऐसी कौफी हर घंटे मिल जाया करे, तो वक्त बिताना मुश्किल न होगा.’’

‘‘साहबजी, आप की मुश्किल तो हल हो जाएगी, लेकिन मेरी मुश्किल कब हल होगी ’’ बलवंत सिंह ने भी कौफी का लंबा घूंट भरते हुए कहा.

‘‘कैसी मुश्किल ’’ मेजर जतिन खन्ना ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘साहबजी, अगले हफ्ते मेरी बीवी का आपरेशन है. मेरी छुट्टियों का क्या हुआ ’’ बलवंत सिंह ने पूछा.

‘‘सरहद पर इतना तनाव चल रहा है.  हम लोगों के कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. ऐसे में छुट्टी मिलना थोड़ा मुश्किल है, पर मैं कोशिश कर रहा हूं,’’ मेजर जतिन खन्ना ने समझाया.

‘‘लेकिन सर, क्या देशभक्ति का सारा ठेका हम फौजियों ने ही ले रखा है ’’ कहते हुए बलवंत सिंह ने मेजर जतिन खन्ना के चेहरे की ओर देखा.

‘‘क्या मतलब… ’’ मेजर जतिन खन्ना ने पूछा.

‘‘यहां जान हथेली पर ले कर डटे रहें हम, वहां देश में हमारी कोई कद्र नहीं. सालभर गांव न जाओ, तो दबंग फसल काट ले जाते हैं. रिश्तेदार जमीन हथिया लेते हैं. ट्रेन में टीटी भी पैसे लिए बिना हमें सीट नहीं देता. पुलिस वाले भी मौका पड़ने पर फौजियों से वसूली करने से नहीं चूकते,’’ बलवंत सिंह के सीने का दर्द बाहर उभर आया.

‘‘सारे जुल्म सह कर भी हम देश पर अपनी जान न्योछावर करने के लिए तैयार हैं, मगर कम से कम हमें इनसान तो समझा जाए.

‘‘घर में कोई त्योहार हो, तो छुट्टी नहीं मिलेगी. कोई रिश्तेदार मरने वाला हो, तो छुट्टी नहीं मिलेगी. जमीनजायदाद का मुकदमा हो, तो छुट्टी नहीं मिलेगी. अब बीवी का आपरेशन है, तो भी छुट्टी नहीं मिलेगी. लानत है ऐसी नौकरी

पर, जहां कोई इज्जत न हो.’’

‘‘ओए बलवंत, आज क्या हो गया है तुझे  कैसी बहकीबहकी बातें कर रहा है  अरे, हम फौजियों की पूरी देश इज्जत करता है. हमें सिरआंखों पर बिठाया जाता है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने आगे बढ़ कर बलवंत सिंह के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘हां, इज्जत मिलती है, लेकिन मर जाने के बाद. हमें सिरआंखों पर बिठाया जाता है, मगर शहीद हो जाने के बाद. जिंदा रहते हमें बस और ट्रेन में जगह नहीं मिलेगी, हमारे बच्चे एकएक पैसे को तरसेंगे, मगर मरते ही हमारी लाश को हवाईजहाज पर लाद कर ले जाया जाएगा. परिवार के दुख को लाखों रुपए की सौगात से खरीद लिया जाएगा. जिस के घर में कभी कोई झांकने भी न आया हो, उसे सलामी देने हुक्मरानों की लाइन लग जाएगी.

‘‘हमारी जिंदगी से तो हमारी मौत लाख गुना अच्छी है. जी करता है कि उसे आज ही गले लगा लूं, कम से कम परिवार वालों को तो सुख मिल सकेगा,’’ कहते हुए बलवंत सिंह का चेहरा तमतमा उठा.

‘‘ओए बलवंत…’’

‘‘ओए मेजर…’’ इतना कह कर बलवंत सिंह चीते की फुरती से मेजर जतिन खन्ना के ऊपर झपट पड़ा और उन्हें दबोचे हुए चट्टान के नीचे आ गिरा. इस से पहले कि वे कुछ समझ पाते, बलवंत सिंह के कंधे पर टंगी स्टेनगन आग उगलने लगी.

गोलियों की ‘तड़…तड़…तड़…’ की आवाज के साथ तेज चीखें गूंजीं और चंद पलों बाद सबकुछ शांत हो गया.

‘‘ओए बलवंत मेरे यार, तू ठीक तो है न ’’ मेजर जतिन खन्ना ने अपने को संभालते हुए पूछा.

‘‘हां, साहबजी, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ बलवंत सिंह हलका सा हंसा, फिर बोला, ‘‘मगर, ये पाकिस्तानी कभी ठीक नहीं होंगे. इन की समझ में क्यों नहीं आता कि जब तक एक भी हिंदुस्तानी फौजी जिंदा है, तब तक वे हमारी चौकी को हाथ भी नहीं लगा सकते,’’ इतना कह कर बलवंत सिंह ने चट्टान के पीछे से झांका. थोड़ी दूरी पर ही 3 पाकिस्तानी सैनिकों की लाशें पड़ी थीं. छिपतेछिपाते वे कब यहां आ गए थे, पता ही नहीं चला था. उन में से एक ने अपनी एके 47 से मेजर जतिन खन्ना के सीने को निशाना लगाया ही था कि उस पर बलवंत सिंह की नजर पड़ गई और वह बिजली की रफ्तार से मेजर साहब को ले कर जमीन पर आ गिरा.

‘‘बलवंत, तेरी बांह से खून बह रहा है,’’ गोलियों की आवाज सुन कर खंदक से निकल आए फौजी निहाल सिंह ने कहा. उस के पीछेपीछे उस चौकी की सिक्योरिटी के लिए तैनात कई और जवान दौडे़ चले आए थे.

‘‘कुछ नहीं, मामूली सी खरोंच है. पाकिस्तानियों की गोली जरा सा छूते हुए निकल गई थी,’’ कह कर बलवंत सिंह मुसकराया.

‘‘बलवंत, तू ने मेरी खातिर अपनी जान दांव पर लगा दी. बता, तू ने ऐसा क्यों किया ’’ कह कर मेजर जतिन खन्ना ने आगे बढ़ कर बलवंत सिंह को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘क्योंकि देशभक्ति का ठेका हम फौजियों ने ले रखा है,’’ कह कर बलवंत सिंह फिर मुसकराया.

‘‘तू कैसा इनसान है. अभी तो तू सौ बुराइयां गिना रहा था और अब देशभक्ति का राग अलाप रहा है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने दर्दभरी आवाज में कहा.

‘‘साहबजी, हम फौजी हैं. लड़ना हमारा काम है. हम लड़ेंगे. अपने ऊपर होने वाले जुल्म के खिलाफ लड़ेंगे, मगर जब देश की बात आएगी, तो सबकुछ भूल कर देश के लिए लड़तेलड़ते जान न्योछावर कर देंगे. कुरबानी देने का पहला हक हमारा है. उसे हम से कोई नहीं छीन सकता,’’ कहतेकहते बलवंत सिंह तड़प कर जोर से उछला.

उस के बाद एक तेज धमाका हुआ और फिर सबकुछ शांत हो गया.

बलवंत सिंह की जब आंखें खुलीं, तो वह अस्पताल में था. मेजर जतिन खन्ना उस के सामने ही थे.

‘‘सरजी, मैं यहां कैसे आ गया ’’ बलवंत सिंह के होंठ हिले.

‘‘अपने ठेके के चलते…’’ मेजर जतिन खन्ना ने आगे बढ़ कर बलवंत सिंह के सिर पर हाथ फेरा, फिर बोले, ‘‘तू ने कमाल कर दिया. दुश्मन के

3 सैनिक एक तरफ से आए थे, जिन्हें तू ने मार गिराया था. बाकी के सैनिक दूसरी तरफ से आए थे. उन्होंने हमारे ऊपर हथगोला फेंका था, जिसे तू ने उछल कर हवा में ही थाम कर उन की ओर वापस उछाल दिया था. वे सारे के सारे मारे गए और हमारी चौकी बिना किसी नुकसान के बच गई.’’

‘‘तेरे जैसे बहादुरों पर देश को नाज है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने बलवंत सिंह का कंधा थपथपाया, फिर बोले, ‘‘तू भी बिलकुल ठीक है. डाक्टर बता रहे थे कि मामूली जख्म है. एकदो दिन में यहां से छुट्टी मिल जाएगी.

‘‘छुट्टी…’’ बलवंत सिंह के होंठ धीरे से हिले.

‘‘हां, वह भी मंजूर हो गई है. यहां से तू सीधे घर जा सकता है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने बताया, फिर चौंकते हुए बोले, ‘‘एक बात बताना तो मैं भूल ही गया था.’’

‘‘क्या… ’’ बलवंत सिंह ने पूछा.

‘‘तुझे हैलीकौफ्टर से यहां तक लाया गया था.’’

‘‘पर अब हवाईजहाज से घर नहीं भेजेंगे ’’ कह कर बलवंत सिंह मुसकराया.

‘‘कभी नहीं…’’ मेजर जतिन खन्ना भी मुसकराए, फिर बोले, ‘‘ब्रिगेडियर साहब ने सरकार से तुझे इनाम देने की सिफारिश की है.’’

‘‘साहबजी, एक बात बोलूं ’’

‘‘बोलो…’’

‘‘इनाम दिलवाइए या न दिलवाइए, मगर सरकार से इतनी सिफारिश जरूर करा दीजिए कि हम फौजियों की जमीनजायदाद के मुकदमों का फैसला करने के लिए अलग से अदालतें बना दी जाएं, जहां फटाफट इंसाफ हो, वरना हजारों किलोमीटर दूर से हम पैरवी नहीं कर पाते.

‘‘सरहद पर हम भले ही न हारें, मगर अपनों से लड़ाई में जरूर हार जाते हैं,’’ बलवंत सिंह ने उम्मीद भरी आवाज में कहा.

मेजर जतिन खन्ना की निगाहें कहीं आसमान में खो गईं. बलवंत सिंह ने जोकुछ भी कहा था, वह सच था, मगर जो वह कह रहा है, क्या वह कभी मुमकिन हो सकेगा. Social Story in Hindi

January 26th Special : तिरंगा फहराना आसान है पर उसका रखरखाव मुश्किल है

January 26th Special : अटारी वाघा बौर्डर की चैक पोस्ट के नजदीक मार्च, 2017 को लगाए गए 360 फुट ऊंचे तिरंगे झंडे की अपनी अहमियत है. लेकिन इस के फट जाने और बारबार बदले जाने के चलते हो रहे लाखों रुपए के खर्च की खबरें सुर्खियों में रही हैं. इस तिरंगे झंडे की खूबी यह है कि यह दुनिया का 10वां सब से ऊंचा झंडा भी है, पर लंबे समय तक इस के नहीं दिखने के बीच कहा जाने लगा कि अफसरों ने तिरंगा लगाने से पहले तकनीकी चीजों का खयाल नहीं रखा. इस मामले में लापरवाही बरतने का एक आरोप भी अमृतसर इंप्रूवमैंट ट्रस्ट (एआईटी) ने लगाया और सरकार से गुजारिश की है कि वह इस मामले में जांच करे कि आखिर एक महीने में ही यह झंडा 3 बार कैसे फट गया, जबकि झंडे को 3 बार बदला भी गया?

याद रहे कि अटारी के तिरंगे से पहले देश के सब से ऊंचे तिरंगे के रूप में झारखंड की राजधानी रांची के पहाड़ी मंदिर पर 293 मीटर ऊंचे तिरंगे का नाम दर्ज था.

तिरंगे को एक खास आदर से देखा जाता है, लेकिन इधर कुछ अरसे में देश के अलगअलग हिस्सों में ऊंचा तिरंगा फहराने के सिलसिले में तिरंगे के फटने या झुकने की घटनाएं हुई हैं, उस से यह सवाल पैदा हो गया है कि देशभक्ति दिखाने के चक्कर में ऐसी घटनाएं कहीं इस राष्ट्रीय प्रतीक के असम्मान की वजह तो नहीं बन गई हैं?

देश में हर नागरिक को अब अपनी मनचाही जगह पर तिरंगा फहराने और उस के प्रति सम्मान जाहिर करने की आजादी मिली है. अब यह जरूरी नहीं रहा है कि तिरंगा सिर्फ सरकारी इमारतों पर फहराया जाए और किसी खास मौके पर यानी 26 जनवरी व 15 अगस्त को ही इसे लहरानेफहराने की छूट मिले.

यह आजादी देते समय निर्देशित किया गया था कि तिरंगे को फहराते वक्त कोई ऐसी घटना न घटे, जिस से कि उस का अपमान हो. अगर कहीं ऐसा होता है, तो सरकार के मंत्रियोंअफसरों तक को इस के लिए भलाबुरा कहा जाता है. पर कई बार तिरंगे के प्रति देशभक्ति दिखाने के चक्कर में ऐसा भी हुआ है, जब तिरंगे के असम्मान होने का खतरा पैदा हो गया.

जैसे, पिछले साल तेलंगाना सरकार ने नया राज्य बनने की दूसरी वर्षगांठ पर देश का दूसरा सब से ऊंचा तिरंगा झंडा हैदराबाद के हुसैन सागर नामक झील में बने संजीवैया पार्क में फहराया, तो वह 2 दिन बाद फट गया.

इस घटना के बाद वहां नया तिरंगा फहराने की कोशिश की गई, लेकिन वह भी तेज हवाओं के बीच टिक न सका.

इस तिरंगे की देखरेख का जिम्मा ग्रेटर हैदराबाद नगरनिगम को दिया गया था, लेकिन हर तेज हवाओं के साथ हर बार फट जाने वाले तिरंगे को बदलना उसे भारी पड़ रहा है.

ऐसा विशालकाय तिरंगा बनाने में एक लाख, 35 हजार रुपए का खर्च आ रहा है, जिसे उठाना नगरनिगम के लिए मुमकिन नहीं हो पा रहा है.

वैसे तो ऊंची जगह पर फहराए जाने वाले तिरंगे पौलिएस्टर से बनाए जाते हैं, ताकि तेज हवा में वे जल्दी फटे नहीं और बारिश में जल्दी गल न जाएं, लेकिन तेलंगाना वाले मामले में साबित हो रहा है कि वहां यह काम बिना रिसर्च के कर लिया गया था. गौरतलब है कि दिल्ली में भी बेहद ऊंचे खंभे पर तिरंगा फहराया गया है.

दिल्ली में कनाट प्लेस के बीचोंबीच ऐसा तिरंगा आम लोगों को अपनी देशभक्ति दिखाने का मौका देता है. यहां तिरंगे के इतनी जल्दी फट जाने की खबर नहीं मिली है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि यहां ऊंचाई पर तिरंगा फहराने से पहले बाकायदा रिसर्च की गई थी.

कनाट प्लेस में इमारतों से घिरे इलाके में तिरंगा फहराया गया, जहां हवा सीधे नहीं आती है. ऐसे बंद इलाकों में तेज हवाएं तिरंगे को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाती हैं, लेकिन इस की तुलना में हैदराबाद का हुसैन सागर इलाका काफी खुला हुआ है. वहां सागर से उठने वाली तेज हवाएं बड़ी आसानी से तिरंगे को चिथड़े में बदल डालती हैं.

तिरंगे के ऐसे अपमान की कुछ घटनाएं देश के दूसरे इलाकों में भी हुई हैं. झारखंड की राजधानी रांची में पहाड़ी मंदिर पर लगा तिरंगा आधा झुका हुआ पाया गया था, जिस से राज्य सरकार की किरकिरी हुई थी.

रांची में पहाड़ी मंदिर में लगे तिरंगे की ऊंचाई 66 फुट और चौड़ाई 99 फुट है. इस का वजन 60 किलोग्राम है और यह 293 मीटर ऊंचे खंभे पर फहराया जाता है.

गौरतलब है कि 23 जनवरी, 2016 के बाद जब झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास की मौजूदगी में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने इसे देश के सब से बड़े तिरंगे के तौर पर फहराया था, लेकिन अप्रैल महीने में तिरंगे को खंभे के ऊपर ले जाने वाली पुली खराब हो गई, जिस के चलते तिरंगा आधा झुक गया. रांची जिला प्रशासन ने पुली ठीक करने के लिए भारतीय सेना से मदद मांगी.

ध्यान रहे कि आधा झुका झंडा शोक का प्रतीक है, ऐसे में रांची के मामले को तिरंगे के मानकों के उल्लंघन का मामला भी माना गया था.

तेलंगाना और झारखंड जैसी घटना पिछले साल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी हो चुकी है. रायपुर के मरीन ड्राइव इलाके में देश का सब से ऊंचा तिरंगा फहराने का दावा 30 अप्रैल में किया गया था. लेकिन फहराए जाने के 20-22 दिन बाद यह फट गया और तब से चुपचाप उतार कर रख लिया गया.

एक दिन जब लोगों ने इस तिरंगे को खंभे से नदारद पाया, तो उन्होंने सोशल मीडिया पर तमाम सवाल उठाए.

सरकार को तिरंगे के रखरखाव में हो रही अनदेखी की घटनाओं को भी गंभीरता से लेना चाहिए. यह कहना सही नहीं कि मौसम की वजह से तिरंगा 2 दिन में ही फट गया, तो प्रशासन इस के लिए क्या कर सकता है.

मसला यह भी है कि अगर जनता समेत प्रशासन तिरंगा फहरा कर अपनी देशभक्ति का परिचय देना चाहता है, तो जरूरी है कि वे सब तिरंगे का सम्मान बनाए रखने के लिए उस के रखरखाव से जुड़े नियमकायदों का सख्ती से पालन भी करें.

देशभक्ति का मतलब तिरंगा फहरा देना या तिरंगा यात्रा कर लेना मात्र नहीं है, बल्कि उस की पूरी देखभाल भी जरूरी है. साफ है कि जिस तरह से हमें देश के सम्मान का खयाल है, उसी तरह तिरंगे के सम्मान की भी चिंता होनी चाहिए. January 26th Special

Hindi Family Story : 26 जनवरी स्पेशल – सीमा के सेनानी – कौन था वह फौजी जिसे दिल से सैल्यूट करने का मन किया?

Hindi Family Story : वह एक सीमा थी. सीमा पर तैनात वे एक सेनानी थे. सीमा भौगोलिक न थी, देश की न थी. सीमा जिंदगी और मौत की थी. वे सेना से रिटायर्ड थे, मैं सरकारी नौकरी से. गुर्दे उन के खराब थे और मेरे भी. डायलेसिस कराने के लिए सप्ताह के 3 दिन अस्पताल के इसी कक्ष में वे भी और मैं भी. इस कक्ष में एक बार में 12 लोग डायलेसिस की प्रक्रिया में होते हैं.

शरीर में जब द्रव की मात्रा अधिक हो तो डायलेसिस कराने की जरूरत होती है और अगर इस प्रक्रिया में देर होती है तो पानी फेफड़ों में भर जाता है. फेफड़ों में पानी के भरने का मतलब सांस का न आना है और यह तो बताने की जरूरत ही नहीं कि सांस का न आना मतलब कथा का समाप्त हो जाना है. फेफड़ों के पानी से पूरे भर जाने में आधे घंटे का समय लगता है क्योंकि इंसान पानी में डूब नहीं रहा कि 2 मिनट का समय लगे. यह पानी तो शरीर का ही है जो धीरेधीरे हर सांस के साथ चढ़ता है. ब्लडप्रैशर बढ़ा, पानी चढ़ा. पानी चढ़ा, ब्लडप्रैशर बढ़ा. दोनों ऐसे बढ़ते हैं मानो मृत्यु को झट से छू लेंगे.

जीवनमृत्यु की इस लुकाछिपी को आएदिन देखने का संजोग होता है. मेरी सांस फूल रही थी यानी फेफड़ों में पानी भर रहा था. औक्सीजन का सिलैंडर ले कर हम घर से चले थे. औक्सीजन के बावजूद बेचैनी बढ़ रही थी. फेफड़ों में पानी भर जाएगा तो फिर औक्सीजन जाएगी कहां?

मैं व्हीलचेयर पर थी, औक्सीजन मास्क लगा हुआ था. बेचैनी का आलम यह कि वह हर सांस के साथ बढ़ती जाए. फेफड़ों में चढ़ते पानी के साथ बेचैनी बढ़ती जाती है तेजी के साथ. डायलेसिस कक्ष में मैं उपस्थित थी किंतु कोई बैड खाली नहीं था. अपनेअपने बिस्तर पर पड़े सब लोग मुझे आधा जिंदा आधा मुर्दा लगते हैं. शायद बिस्तर पर पड़ी मैं भी ऐसी ही दिखाई देती होऊंगी.

सब जानते हैं कि डायलेसिस कोई इलाज नहीं, एक प्रक्रियाभर है. जीवन की लीज का टैंपरेरी ऐक्सटैंशन. लगभग 4 घंटे बिस्तर पर पड़ेपड़े शरीर के रक्त को शरीर से बाहर निकल कर एक कंप्यूटर से जुड़ी डायलेसिस मशीन से हो कर गुजरता हुआ देखा करो. अपने ही रक्त की ऊष्मा देखो, महसूस करो. रक्त का रंग देखो. गहरे काले रंग से धीरेधीरे 4 घंटों में काला होते देखो, कम काला होते देखो, लाल होते देखो.

बीच में कभी ब्लडप्रैशर नाराज हो जाता है तो साथ देने को उस की सखी यानी ब्लडशुगर भी धड़ाम हो जाती है. वे गिरते हैं और पसीना न केवल बीमार के हाथ में आता है माथे से पुंछ कर, बल्कि पसीने के कण तो खड़े डाक्टर के माथे पर भी झिलमिलाते देखे हैं. डाक्टर भी यह कह कर बाहर पटक देते हैं – मरने का अभी वक्त नहीं आया. चलो उठो, जीओ.

डाक्टर के कहने से ही नहीं, मेरा तो खुद भी जीने का मन करता है. मरने को तो बिलकुल ही जी नहीं है. अभी तो मुझे टीटो की शादी में लहंगा पहन कर नाचना है. टीटो मेरा पोता है. 2 साल का है. टीटो प्यारा है. टीटो का बाप, अब्बा, बाबा सभी प्यारे हैं. यही मेरी दुनिया है. मुझ को सारी दुनिया प्यारी लगती है. ऐसी सुंदर दुनिया को छोड़ कर कौन जाए? मैं कौन हूं जाने, न जाने वाली? इधर, फेफड़ों में सांससांस के साथ भरता, सांसों की गिनती कम करता जाता पानी लेकिन अभी आधे घंटे से पहले कोई बैड, कोई मशीन खाली नहीं होगी. यहां मैं देर से नहीं आई हूं, अपने निर्धारित समय पर ही डायलेसिस कक्ष में उपस्थित हूं लेकिन कोई बैड खाली नहीं है. जाहिर है किसी को अधबीच में तो नहीं हटा सकते.

‘‘कहां जाऊं?’’ बेटे का घबराया हुआ स्वर कान में पड़ता है.

‘‘आप को ऐसी स्थिति के लिए कुछ तो इंतजाम रखना चाहिए,’’ बेटी द्वारा अस्पताल प्रबंधन से बोला वाक्य सुना.

‘‘इमरजैंसी में ले जाओ.’’

इमरजैंसी निचले तल पर है. आपदा में हर मिनट कीमती है. व्हीलचेयर की दिशा पलटी जाती है. बाहर का रुख करती ही है कि जीवनमृत्यु की इस सीमा पर एक कड़कदार आवाज सुनाई देती है, ‘‘मेरा अभी आधा घंटा बाकी है, मेरा डायलेसिस फौरन बंद कर इन का लगा दो.’’

यह आवाज उस सेनानी की है जो फौज से रिटायर्ड है. वह सरकारी नौकरी से पेंशनयाफ्ता दूसरे आदमी को अपना समय देने को तैयार है. फौजियों को देश के लिए गोली खाना आता है तो देशवासियों के लिए अपनी जान खतरे में डालाना भी. वे सोचने में वक्त जाया नहीं करते. तुरंत ऐक्शन में यकीन करते हैं.

जहां अपने वश में होता, गोली फौरन ठांय कर देते. यहां ये फैली रक्तनलिकाएं तो मैडिकल स्टाफ ही समेट सकता है और इस तरह समेटना अस्पताल के प्रोटोकौल में नहीं है. सेनानी ने जीवनमृत्यु की सीमा पर खड़ी मुझे अपना स्थान देने की एक बार फिर ऊंची आवाज में पेशकश की. अस्पताल ने सुना नहीं. मेरी व्हीलचेयर इमरजैंसी की ओर मोड़ दी गई, फिर स्ट्रेचर से आईसीयू में पहुंची. सांस अगले दिन कुछ काबू में आई. पलक खुली तो डा. अंकुर गुप्ता दिखे. पता नहीं, पर शायद वे मेरे परोपकारी रहे होंगे. हर बार वे मुझे मौत के मुंह से खींच लाते हैं.

लेकिन सीमा के उस सेनानी के बारे में मुझे कोई संशय नहीं है. हर क्षण में वे देश की सीमा के ही नहीं, जीवनमृत्यु की सीमा पर खड़े देशवासियों के भी रक्षक हैं. डायलेसिस कक्ष में जबजब उन का मेरा समय एक हुआ या आतेजाते दिखे तो उन्होंने पुरखुलूस आवाज में ‘गुडमौर्निंग’ या ‘गुडइवनिंग’ कहा और मैं ने उन्हें ‘जयहिंद सर’ कहा. नाम न मैं ने पूछा न उन्होंने. उन्होंने कहा, ‘‘आप मुझे सर मत कहिए, मैं मामूली फौजी हूं.’’

फौजी कब मामूली होते हैं? वे तो सदा सैल्यूट के अधिकारी होते हैं. सैल्यूट, जो हाथ से नहीं, दिल से किया जाता है.

सीमा के सेनानी को मेरा सौसौ बार नमन. जयहिंद सर. Hindi Family Story

Best Family Story in Hindi : 26 जनवरी स्पेशल – कभी अलविदा न कहना

Best Family Story in Hindi : वरुण के बदन में इतनी जोर का दर्द हो रहा था कि उस का जी कर रहा था कि वह चीखे, पर वह चिल्लाता कैसे. वह था भारतीय सेना का फौजी अफसर. अगर वह चिल्लाएगा, तो उस के जवान उस के बारे में क्या सोचेंगे कि यह कैसा अफसर है, जो चंद गोलियों की मार नहीं सह सकता.

वरुण की आंखों के सामने उस की पूरी जिंदगी धीरेधीरे खुलने लगी. उसे अपना बचपन याद आने लगा. उस के 5वें जन्मदिन पर उसे फौजी वरदी भेंट में मिली थी, जिसे पहन कर वह आगेपीछे मार्च करता था और सेना में अफसर बनने के सपने देखता था.

‘पापा, मैं बड़ा हो कर फौज में भरती होऊंगा,’ जब वह ऐसा कहता, तो उस के पापा अपने बेटे की इस मासूमियत पर मुसकराते, लेकिन कहते कुछ नहीं थे.

वरुण के पापा एक बड़े कारोबारी थे. उन का इरादा था कि वरुण कालेज खत्म करने के बाद उन्हीं के साथ मिल कर खुद एक मशहूर कारोबारी बने. उन्होंने सोच रखा था कि वे वरुण को फौज में तो किसी हालत में नहीं जाने देंगे. अचानक वरुण के बचपन की यादों में किसी ने बाधा डाली. उस के कंधे पर एक नाजुक सा हाथ आया और उस के साथ किसी की सिसकियां गूंज उठीं. तभी एक मधुर सी आवाज आई, ‘मेजर वरुण…’ और फिर एक सिसकी सुनाई दी. फिर सुनने में आया, ‘मेजर वरुण…’

वरुण ने सिर घुमा कर देखा कि एक हसीन लड़की उस के पास खड़ी थी. उस के हाथ में एक खूबसूरत सा लाल गुलाब भी था.

‘वाह हुजूर, अब आप मुझे पहचान नहीं रहे हैं…’

वरुण को हैरानी हुई. उस ने सोचा, ‘कमाल है यार, मैं फौजी अफसर हूं और यह जानते हुए भी यह मुझे बहलाफुसला कर अपने चुंगल में फंसाने के लिए मुझ से जानपहचान बनाना चाह रही है. मैं इस से बात नहीं करूंगा. अपना समय बरबाद नहीं होने दूंगा,’ और उस ने अपना सिर घुमा लिया. वरुण की जिंदगी की कहानी फिर उस की आंखों के सामने से गुजरने लगी. जब वह सीनियर स्कूल में पहुंचा, तो एनसीसी में भरती हो गया. वह फौज में जाने की पूरी तैयारी कर रहा था. स्कूल खत्म होने के बाद वरुण के पापा ने से कालेज भेजा. कालेज तो उसी शहर में था, पर उन्होंने वरुण का होस्टल में रहने का बंदोबस्त किया. वह इसलिए कि वरुण के पापा का खयाल था कि होस्टल में रह कर उन का बेटा खुद अपने पैरों पर खड़ा होना सीखेगा.

उस जमाने में मोबाइल फोन तो थे नहीं, इसलिए वरुण हफ्ते में एक बार घर पर फोन कर सकता था, अपना हालचाल बताने और घर की खबर लेने के लिए. उस के पापा उस से हमेशा कहते, ‘बेटे, याद रखो कि कालेज खत्म करने के बाद तुम कारोबार में मेरा हाथ बंटाओगे. आखिर एक दिन यह सारा कारोबार तुम्हारा ही होगा.’ वरुण को अपनी आंखों के सामने फौजी अफसर बनने का सपना टूटता सा दिखने लगा. वह हिम्मत हारने लगा. फिर एक दिन अचानक एक अनोखी घटना घटी, जिस से उस की जिंदगी का मकसद ही बदल गया.

वरुण के होस्टल का वार्डन ईसाई था. उस के पिता फौज के एक रिटायर्ड कर्नल थे, जो पत्नी की मौत के चलते अपने बेटे के साथ रहते थे. एक दिन 90 साल की उम्र में उन की मौत हो गई. वार्डन होस्टल के लड़कों की अच्छी देखभाल करता था. इस वजह से होस्टल के सारे लड़कों ने तय किया कि वे सब वार्डन के पिता की अंत्येष्टि में शामिल होंगे. जब लड़के कब्रिस्तान पहुंचे, तो उन्होंने एक अजीब नजारा देखा. वार्डन के पिता का शव कफन के अंदर था, पर कफन के दोनों तरफ गोल छेद काटे गए थे, जिन में से उन के हाथ बाहर लटक रहे थे. एक लड़के ने पास खड़े उन के एक रिश्तेदार से पूछा कि ऐसा क्यों किया गया है.

जवाब मिला, ‘यह उन की मरजी थी और उन की वसीयत में भी लिखा था कि उन को इस हालत में दफनाया जाए. लोग देखें कि वे इस दुनिया में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जा रहे हैं.’

वरुण यह जवाब सुन कर हैरान हो गया. उस ने सोचा कि अगर खाली हाथ ही जाना है, तो क्या फर्क पड़ेगा कि वह अपने मन की मुराद पूरी कर के फौजी अफसर की तनख्वाह कमाए, बनिस्बत कि अपने पिता के साथ करोड़ों रुपए का मालिक बने. उस ने पक्का इरादा किया कि वह फौजी अफसर ही बनेगा. वरुण जानता था कि उस के पापा उसे कभी अपनी रजामंदी से फौज में जाने नहीं देंगे. काफी सोचविचार के बाद वरुण ने अपने पिता को राजी कराने के लिए एक तरकीब निकाली.

एक दिन जब देर शाम वरुण के पापा घर लौटे और उस के कमरे में गए, तो उन्होंने उस की टेबल पर एक चिट्ठी पाई. लिखा था:

‘पापा, मैं घर छोड़ कर अपनी प्रेमिका के साथ जा रहा हूं. वैसे तो उम्र में वह मुझ से 10 साल बड़ी है, पर इतनी बूढ़ी लगती नहीं है. वह पेट से भी है, क्योंकि उस के एक दोस्त ने शादी का वादा कर के उसे धोखा दिया.

‘हम दोनों किसी मंदिर में शादी कर लेंगे और कहीं दूर जा कर रहेंगे. जब एक साल के बाद हम वापस आएंगे, तो आप अपनी पोती या पोते का स्वागत करने के लिए एक बड़ी पार्टी जरूर दीजिएगा.

‘आप का आज्ञाकारी बेटा,

‘वरुण.’

वरुण को पीछे पता चला कि उस की चिट्ठी पढ़ने के बाद उस के पापा की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा. तब तक उस के कमरे में उस की मां आ गईं.

‘वरुण कहां है ’ मां ने पूछा, तो वरुण के पापा की आवाज बड़ी मुश्किल से उन के गले से निकली. ‘पता नहीं…’

वरुण की मां ने कहा, ‘तकरीबन एक घंटे पहले उस ने कहा था कि वह बाहर जा रहा है और शायद देर से लौटेगा. पर बात क्या है  आप की तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है.’

वरुण के पापा ने बिना कुछ बोले जमीन पर गिरी चिट्ठी की ओर इशारा किया. उस की मां ने चिट्ठी उठाई और पढ़ने लगीं.

‘मेरे प्यारे पापा,

‘जो इस चिट्ठीके पिछली तरफ लिखा है, वह सरासर झूठ है. मेरी कोई प्रेमिका नहीं है और न ही मैं किसी के साथ आप से दूर जा रहा हूं. मैं अपने दोस्त मनोहर के घर पर हूं. हम देर रात तक टैलीविजन पर क्रिकेट मैच देखेंगे और फिर मैं वहीं सो जाऊंगा

‘मैं ने मनोहर क मम्मीपापा को बताया है कि मुझे उन के यहां रात बिताने में कोई दिक्कत नहीं है. मैं आप लोगों से कल सुबह मिलूंगा.

‘मैं ने जो पिछली तरफ लिखा है, वह तो इसलिए, ताकि आप को महसूस हो कि मेरा फौज में जाना बेहतर होगा, इस से पहले कि मैं कोई गड़बड़ी वाला काम कर लूं.’

वरुण के पापा ने ठंडी सांस भरी और मन ही मन में बोले, ‘तू जीत गया मेरे बेटे, मैं हार गया.’

वरुण ने यूपीएससी का इम्तिहान आसानी से पास किया. सिलैक्शन बोर्ड के इंटरव्यू में भी उस के अच्छे नंबर आए. फिर देहरादून की मिलिटरी एकेडमी में उस ने 2 साल की तालीम पाई. उस के बाद उस के बचपन का सपना पूरा हुआ और वह फौजी अफसर बन गया. कुछ साल बाद कारगिल की लड़ाई छिड़ी. वरुण की पलटन दूसरे फौजी बेड़ों के साथ वहां पहुंची. वरुण उस समय छुट्टी पर था… उस की छुट्टियां कैंसिल हो गईं. वह लौट कर अपनी पलटन में आ गया. वरुण ने अपनी कंपनी के साथ दुश्मन पर धावा बोला. भारतीय अफसरों की परंपरा के मुताबिक, वरुण अपने सिपाहियों के आगे था. दुश्मन ने अपनी मशीनगनें चलानी शुरू कीं. वरुण को कई गोलियां लगीं और वह गिर गया… फिर वही सिसकियों वाली आवाज वरुण के कानों में गूंज उठी, ‘वरुण, मैं आप का इंतजार कब तक करती रहूंगी  आप मुझे क्यों नहीं पहचान रहे हैं ’

वह लड़की घूम कर वरुण के सामने आ कर खड़ी हो गई. वरुण की सहने की ताकत खत्म हो गई.

‘हे सुंदरी….’ वरुण की आवाज में रोब भरा था, ‘मैं जानता नहीं कि तुम कौन हो और तुम्हारी मंशा क्या है. पर अगर तुम एक मिनट में यहां से दफा नहीं हुईं, तो मैं…’

‘आप मुझे कैसे भूल गए हैं  आप ने खुद मुझ से मिलने के लिए कदम उठाया था.’

वरुण ने सोचा, ‘अरे, एक बार मिलने पर क्या तुम्हें कोई अपना दिल दे सकता है,’ पर वह चुप रहा.

इस से पहले कि वह अपनी निगाहें सुंदरी से हटा लेता, वह फिर बोली, ‘अरे फौजी साहब, आप के पापा ने आप के मेजर बनने की खुशी में पार्टी दी थी. आप के दोस्त तो उस में आए ही, पर उन से बहुत ज्यादा आप के मम्मीपापा के ढेरों दोस्त आए हुए थे.

‘मेरे पापा आप के पापा के खास दोस्तों में हैं. वे मुझे भी साथ ले गए थे. ‘आप के पापा ने मेरे मम्मीपापा से आप को मिलवाया था. मैं भी उन के साथ थी. आप ने मुझे देखा और मुझे देखते ही रह गए. बाद में मुझे लगा कि आप की आंखें मेरा पीछा कर रही हैं. मुझे बड़ा अजीब लगा.’ वह कुछ देर चुप रही. वरुण उसे एकटक देखता ही रहा.

‘मैं ने देखा कि बहुत से लोग आप को फूलों के गुलदस्ते भेंट कर रहे थे. मैं दूर जा कर एक कोने में दुबक कर बैठ गई. जब आप शायद फारिग हुए होंगे, तो आप मुझे ढूंढ़ते हुए आए. मेरे सामने झुक कर एक लाल गुलाब आप ने मुझे भेंट किया.’

वरुण के मन में एक परदा सा उठा और उसे लगा कि वह लड़की सच ही कह रही थी. तभी उसे आगे की बातेंयाद आईं. उस की मम्मी ठीक उसी समय वहां पहुंच गईं. उन्होंने शायद सारा नजारा देख लिया था, इसलिए उन्होंने मुसकराते हुए वरुण की पीठ थपथपाई. वे काफी खुश लग रही थीं. वे शायद उस के पापा के पास चली गईं और उन्हें सारी बातें बता दी होंगी.

तभी वरुण के माइक पर सभी लोगों से कहा, ‘आज की पार्टी मेरे बेटे वरुण के मेजर बनने की खुशी में है,’ उन्होंने वरुण की ओर देख कर उसे बुलाया. जब वरुण स्टेज पर पहुंच गया, तब वे माइक पर आगे बोले, ‘और इस मौके पर उसे मैं एक भेंट देने जा रहा हूं.’ उन्होंने एक हाथ बढ़ा कर वरुण का हाथ थामा और दूसरे हाथ से अपने दोस्त राम कुमार की बेटी का हाथ पकड़ा और बोले, ‘वरुण को हमारी भेंट है… भेंट है उस की होने वाली दुलहन विनीता, जो मेरे दोस्त राम कुमार की बेटी है.’ उन्होंने वरुण को विनीता का हाथ थमा दिया. सारा माहौल खुशी की लहरों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

विनीता शरमा कर अपना हाथ वरुण के हाथ से छुड़ाने की कोशिश करने लगी. वरुण ने हाथ नहीं छोड़ा और विनीता के कान के पास कहा, ‘सगाई में मैं तुम्हारे लिए एक अंगूठी देख लूंगा. अभी मेरी छुट्टी के 45 दिन बाकी हैं.’

अफसोस, लड़ाई छिड़ने के चलते वरुण की छुट्टियां कैंसिल हो गईं…

फौजी डाक्टर ने वरुण के शरीर की पूरी जांचपड़ताल की. उस के पास ही वरुण के कमांडिंग अफसर खड़े थे, जिन के चेहरे पर भारी आशंका छाई हुई थी.

‘‘मुबारक हो सर,’’ डाक्टर ने उन को संबोधित कर के कहा, ‘‘आप के मेजर को 4 गोलियां लगी हैं, पर कोई भी जानलेवा नहीं है. खून काफी बह चुका है, पर वे जिंदा हैं. आप के ये अफसर बड़े मजबूत हैं. मैं इन्हें जल्द ही अस्पताल पहुंचा दूंगा. मुझे पक्का यकीन है कि चंद हफ्तों में ये बिलकुल ठीक हो जाएंगे.’’

‘‘मुझे भी यही लग रहा है,’’ वरुण के कमांडिंग अफसर ने जवाब दिया. Best Family Story in Hindi

Editorial : सरित प्रवाह – भारत की विदेश (अ)नीति

Editorial : भारत की विदेश नीति अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या विदेश मंत्री एस. जयशंकर साउथ ब्लाक के दफ्तर में तय नहीं करते, गलियों में भगवा दुपट्टा डाले व हाथ में सस्ता स्कार्फ लिए तिलकधारी बेरोजगार छोकरे तय करते हैं. बंगलादेश जो 1971 से 2024 तक भारत का दोस्त रहा अब ‘बंगलादेश घुसपैठियों वापस जाओ’ के नारों के कारण आज इतना खफा है कि वह अपनी क्रिकेट टीम तक को भारत में वर्ल्ड कप क्रिकेट मैच खेलने के लिए भेजने से इनकार कर रहा है चाहे इस की वजह से उसे वर्ल्ड कप टी20 टूर्नामैंट से बाहर निकाल दिया जाए.

जब शाहरुख खान की आईपीएल टीम केकेआर ने बंगलादेश के खिलाड़ी मुस्तफीजुर रहमान को टीम में शामिल किया तो विदेश नीति की परवा किए बिना भगवा गैंग शाहरुख खान के फैसले पर टूट पड़ा. चूंकि बंगलादेश का नाम ले कर भारतीय जनता पार्टी असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मेघालय के चुनावों को लड़ती है, भारत सरकार ने इस भगवार्ई विद्रोह को खूब समर्थन दिया और बेचारा खिलाड़ी दो तरफ के कट्टरों का शिकार बन गया.

बात यहीं खत्म नहीं हुई. क्रिकेट भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश के लडक़ों का अकेला खेल बचा है जिस में वे घंटों लगाते हैं, खेलने में नहीं, देखने में, जुआ लगाने में. इसलिए जब वर्ल्ड कप में बंगलादेश की टीम को वेस्टइंडीज के साथ मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में मैच खेलना था तो उन्होंने इनकार कर दिया.

यह भारत की विदेश नीति पर तमाचा है. अब तक जो देश इस एहसान से दबा हुआ था कि उसे 1971 में कांग्रेस की इंदिरा गांधी ने पश्चिमी पाकिस्तान की जालिम फौजों की मार और औरतों के किए जा रहे बलात्कारों से उसे बचाया था, आज उस की क्रिकेट टीम भारत में पैर रखने को भी तैयार नहीं है. बंगलादेश को दोस्त से दुश्मन बनाने में कोरा हाथ उन हिंदू कट्टरवादियों का है जो एक सांस में 4 बार घुसपैठियों को भारत पर छिपा हमलावर बताते हैं.

अफसोस यह है कि सरकार के पास इन कट्टरों को समर्थन देने के अलावा कोई नारा नहीं है क्योंकि मंदिर बिजनैस अगर रातदिन फलफूल रहा है तो इसीलिए कि हिंदूमुसलिम, हिंदूमुसलिम कह कर बंगलादेश को यही कटटर ही तो बदनाम कर रहे हैं, वह भी भाजपाई सरकार के इशारों पर ही. ममता बनर्जी के राज से लडऩे का भाजपा का सब से बड़ा हथियार बंगलादेश का नाम है.

अब जब बंगलादेश में पाकिस्तान के जमाते इसलामी जैसे कट्टरों का राज है तो वे इस वर्ल्ड कप टी20 को क्यों न डिप्लोमैसी का हथियार बनाएं. भारत आज अपने ही दोस्तों को खो बैठा है. सार्क, साउथ एशियाई देशों का संगठन, मर चुका है. दोस्त अब दोस्त नहीं रहे. Editorial

Editorial : सरित प्रवाह – संविधान के खिलाफ कानून

Editorial : जब भी कहीं किसी शहर या कसबे में धार्मिक या जातीय दंगे होते हैं, बहुत से लोग, जो अल्पसंख्यक होते हैं और बहुसंख्यकों के बीच काफी समय से रह रहे होते हैं, घबरा कर घर बदलने की कोशिश करने लगते हैं. आमतौर पर ये हिंदुओं के बीच रह रहे होते हैं, ऐसा मुसलिमों के साथ होता है. कभीकभार मुसलिमों के बीच लंबे समय से रहते हिंदुओं के साथ भी ऐसा होता है.

अब राज्य सरकारों ने इस असुरक्षा के कारण पलायन की जिम्मेदारी अपने पर न लेते हुए रहने वालों पर ही डालनी शुरू कर दी है. कई राज्यों ने कानून बना दिए हैं जिन में डिस्टर्ब्द इलाकों को छोडऩे वालों द्वारा संपत्ति बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. राजस्थान एक कानून बना रहा है भारीभरकम नाम वाला. ‘द राजस्थान प्रोहिबिशन औफ ट्रांसफर औफ इम्मूवेबल प्रौपर्टी एंड प्रोटैक्शन औफ टिनैंट्स फ्रौम इविक्शन फ्रौम प्रीमिसिस इन डिस्टर्ब्द एरिया कानून 2026’ नाम का कानून पीडि़तों को सुरक्षा देने के लिए बनाया जा रहा है या उन्हें जबरन अपने से नाराज लोगों के बीच नारों, पत्थरों की बरसातों, छेड़छाड़ को सहते रहने लिए बनाया जा रहा है.

यह कानून कैसे इलाका छोडऩे वालों को सुरक्षा देगा, समझ से परे है. लोग घबरा कर सस्ते में संपत्ति न बेचें, इस पर सरकार बजाय उन्हें विवादास्पद इलाकों में सुरक्षा देने के उन्हें वहीं रहने व गुस्सैल भीड़ का सामना करते रहने को मजबूर कर रही है.

इस कानून के अंतर्गत जब भी कोई इलाका संवेदनशील घोषित कर दिया जाएगा, वहां की संपत्तियों का लेनदेन बंद हो जाएगा. यह तो उन इलाकों के लोगों को उन्हीं इलाकों में रहने को मजबूर करना है, उन का बचाव नहीं करना है. गुजरात में ऐसा कानून है और इस का जम कर दुरुपयोग हो रहा है क्योंकि जिला आयुक्त संपत्ति को बेचने की अनुमति दे सकता है. भीड़ का गैंग लीडर अपने शिकार की संपत्ति इस कानून के अंतर्गत आयुक्त पर दबाव डाल कर मनमाने दामों में खरीद सकता है.

इस तरह के कानून संविधान के खिलाफ हैं. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार मिला है और सुख व सुकून में जीना, जहां मरजी जीना आम व्यक्ति का हक है.

संवेदनशील या उत्पात हो रहे इलाकों से लोग भाग रहे हैं, तो यह सरकार की प्रतिष्ठा पर धब्बा है. बंद ताले लगे मकान-दुकान दर्शाते हैं कि लोग भयभीत हैं, कानून व्यवस्था टूट चुकी है. सो, यह कानून राज्य सरकार को सुरक्षा देता है, उग्र भीड़ के शिकार हुए लोगों को नहीं. Editorial

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