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Social Story in Hindi : दकियानूसी मौडर्न – क्या अलका पर पुरातनपंथी सोच हावी हो रही थी ?

Social Story in Hindi : घंटी की आवाज सुन कर अलका के दरवाजा खोलते ही नवागुंतक ने कहा, ‘‘नमस्कार, आप मुझे नहीं जानतीं, मेरा नाम पूनम है. मैं इसी अपार्टमैंट में रहती हूं.’’‘‘नमस्कार, मैं अलका, आइए,’’ कहते हुए अलका ने पूनम को अंदर आने का निमंत्रण दिया.

‘‘फिर कभी, आज जरा जल्दी में हूं. कल गुरुपूर्णिमा है, गुरुजी के आश्रम से गुरुजी के अनुयाई आए हैं. उन के सान्निध्य से लाभ उठाने के लिए गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हम ने घर में सत्संग का आयोजन किया है. उस के बाद महाप्रसाद की भी व्यवस्था है. आप सपरिवार आइएगा,’’ पूनम ने अलका से कहा.
‘‘सत्संग…’’ अलका ने वाक्य अधूरा छोड़ते हुए कहा.

‘‘हमारी गुरुमाता हैं, उन का मुंबई में आश्रम है. वे तो देशविदेश धर्म के प्रचारप्रसार के लिए जाती रहती हैं, लेकिन उन के अनुशासित शिष्य उन के काम को आगे बढ़ाते रहते हैं. हम उन के प्रवचन औडियो, वीडियो सीडी के जरिए दिखाते हैं. हम चाहते हैं ज्यादा से ज्यादा लोग गुरुमाई के विचारों को आत्मसात कर धर्मकर्म को अपनाएं. इस से उन के जीवन में सुख व शांति का प्रवाह होने के साथ उन का जीवन सफल होगा. यही नहीं दूसरों को भी उन के विचारों से अवगत करा कर उन के जीवन को भी सफल बनाने में सहयोग दें.’’

अलका इस अपार्टमैंट में कुछ दिनों पहले आई थी. सो, अभी तक उस का किसी से ज्यादा परिचय नहीं हुआ था. पूनम के निमंत्रण पर सोच में पड़ गई. वह कभी सत्संग में नहीं गई थी. उस ने अपनी सासुमां को टीवी पर कई बाबाओं का सत्संग सुनते देखा था. सब की एक ही बातें. एक ही चालें. अपनी करनी के चलते जब आसाराम जेल गए तो सासुमां को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था. बारबार वे यही कहती रहीं कि उन को फंसाया गया है. कई बार उस ने उन्हें सचाई बतानी चाही, तो उन्होंने उसे धर्म, कर्म से विमुख की उपाधि से विभूषित कर उस का मुंह बंद कर दिया था. नतीजा यह हुआ कि वह उन की बातें चुपचाप सुनती रहती थी, लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती थी. वैसे भी, उस का मानना था जिस ने अपने मनमस्तिष्क के दरवाजे बंद कर रखे हैं, उस को समझा पाना बेहद कठिन है.

अलका को इन बाबाओं पर कोई विश्वास नहीं था, क्योंकि उसे लगता था कि ये आम भोलेभाले इंसानों को फंसा कर उन्हें कर्म से विमुख कर, अकर्मण्य बना कर सिर्फ धर्म की अफीम चटा कर ही जीवनरूपी नाव को वैतरणी पार करने के लिए विवश कर रहे हैं.

साधुसंन्यासियों से सदा दूर रहने वाली अलका को इस समय पूनम के आग्रह को ठुकरा पाना उचित नहीं लग रहा था. अब उसे यहीं रहना है, सो, जल में रह कर मगर से बैर लेना उचित नहीं है. यह सोच कर उस ने जाने का मन बना लिया था. वैसे भी, इस अपार्टमैंट वालों से मेलजोल बढ़ाने का सुनहरा अवसर वह खोना नहीं चाहती थी.

सुबह 10 बजे से ही अपार्टमैंट में गहमागहमी शुरू हो गई. लगभग 11 बजे ढोलमंजीरों की आवाज सुनाई देने लगी. आवाज सुन कर घर का दरवाजा बंद कर वह पूनम के घर गई. वहां पूनम के अतिरिक्त कई अन्य स्त्रियां सुंदरसुंदर परिधानों में उपस्थित थीं, जबकि पुरुष बाहर खड़े थे, साधुओं के दल का इंतजार कर रहे थे.

कुछ ही देर में उस ने एक युवा को हाथ में चरणपादुकाएं तथा उस के पीछे भगवा वस्त्र पहने हुए लगभग 15-20 युवा युवकयुवती आते देखे. सभी लगभग 25 से 40 वर्ष की उम्र के होंगे. उन को देख कर अलका को आश्चर्य हुआ. जो उम्र किसी भी इंसान के कैरियर के लिए अत्यंत मूल्यवान होती है, उस उम्र में संन्यास लेना क्या उचित है? अभी वह सोच ही रही थी कि चरणपादुकाएं पकड़े युवक ने घर में प्रवेश किया. गृहस्वामिनी उस का स्वागत करते हुए उसे उस स्थान तक ले गई जहां गुरुमाई का एक बड़ा सा तैलीय चित्र एक लाल कपड़े वाले आसन पर रखा था. आगे वाले युवक ने चरणपादुकाएं आसन पर चित्र के सामने रख दीं.

दीप प्रज्ज्वलित कर सभी मेहमानों ने गुरुमाई के चित्र तथा चरणपादुका को फूलमालाएं पहना कर पूजा की. इस के बाद सभी लोगों ने अपनेअपने आसन ग्रहण किए. लगभग 2 घंटे तक पूजासत्संग चला. सब से पहले गुरुमाई की औडियो, वीडियो, सीडी द्वारा सभी अनुयाइयों को उन के संदेश सुनाए गए. आधा घंटा भजन चला तथा 10 मिनट का ध्यान व उस के बाद आरती हुई. आरती का थाल 50-100 रुपए के नोटों से भर गया था. आश्चर्य तो यह था कि किसी को 10-20 रुपए देने में आनाकानी करने वाली स्त्रियां थाल में बड़ेबड़े नोट डाल कर गर्वोन्मुक्त हो रही थीं.

आरती के बाद गुरुमाई का भोग लगा कर उन के शिष्यों को प्रसाद दिया गया. फिर दूसरे लोग महाप्रसाद के लिए बैठे. जो महिलाएं अभी आस्था से ओतप्रोत थीं, वही अब कपड़े, गहनों के साथ, सासबहू तो कुछ पतिपुराण पर भी आ गईं.एक महिला ने अपना परिचय देते हुए अलका का परिचय पूछा. अलका के परिचय देने के बाद उस महिला ने जिस ने अपना नाम अर्चना बताया था, कहा, ‘‘आप यहां नएनए आए हो. गृहप्रवेश की पूजा करा ली होगी. आप ने किसी को बुलाया नहीं?’’
उस की बात सुन कर कई दूसरी महिलाओं के चेहरे अलका की ओर घूमे.

‘‘अर्चना जी, मैं तथा आलोक इन सब में विश्वास नहीं करते. हमारे लिए तो हर दिन एकसमान है. जिस दिन हमें सुविधा लगी, उस दिन हम ने शिफ्ट कर लिया.’’‘‘अच्छा, विवाह तो शुभ मुहूर्त देख कर ही किया होगा,’’ अर्चना के बगल में बैठी शोभना ने पूछा.‘‘विवाह का फैसला तो मेरे तथा आलोक के मातापिता का था, किंतु गृहप्रवेश का हमारा अपना,’’ अलका ने शोभना की आंखों में व्यंग्नात्मक मुसकान देख कर कहा.
‘‘क्या गृहप्रवेश में आप के और भाईसाहब के मातापिता नहीं आए थे?’’ शोभना ने फिर पूछा.‘‘आए थे.’’
‘‘क्या उन्होंने विरोध नहीं किया?’’

‘‘नहीं,’’ कह कर अलका ने बेकार की चलती बहस को खत्म करने की कोशिश की.‘‘शुभ समय देख कर किया हर काम अच्छा होता है वरना बाद में परेशानी आती है,’’ शोभना की बात सुन कर उस की पड़ोसिन रूचि भी कह उठी.अलका ने किसी की भी बात का उत्तर देना अब उचित नहीं समझा. वैसे भी, उन लोगों की बात का क्या उत्तर देना जो अपनी सोच में इतने जकड़े हों कि दूसरों की बात व्यर्थ लगे.पूनम के घर हर सोमवार, शाम को 7 से 8 बजे सत्संग होता था. 10 मिनट के ध्यान के समय वह दरवाजे के बाहर आ कर खड़ी हो जाती, जिस से वह हर आनेजाने वाले पर निगाह रख कर ध्यान करने वालों का ध्यान भंग होने से बचा सके. इस सत्संग में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की भागीदारी होती थी वह भी उन महिलाओं की जो स्वयं को अत्याधुनिक मानती थीं. कुछ तो जौब भी करती थीं. पूनम स्वयं महिला विद्यालय में रसायनशास्त्र की प्रवक्ता थी, इस के बावजूद उस की इतनी अंधभक्ति अलका को आश्चर्यचकित कर रही थी.

इस से अधिक आश्चर्य तो अलका को तब हुआ जब उस की पड़ोसिन रुचि ने उसे अपार्टमैंट में चल रही ‘सुंदरकांड किटी’ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रण दिया. महिलाओं की सामान्य किटी तो उस ने सुनी थी, पर ‘सुंदरकांड किटी…’ वह सोच ही रही थी कि रुचि ने कहा, ‘‘अलकाजी, इस किटी में सुंदरकांड के पाठ के साथ सामान्य किटी की तरह ही आयोजक को आए अतिथियों के लिए खानपान का भी आयोजन करना होता है. इस बहाने धर्मकर्म के साथ हम महिलाएं अपना मनोरंजन भी कर लेती हैं.’’अलका ने रुचि को नम्रतापूर्वक मना कर दिया था. लखनऊ में जेठ के महीने का हर मंगल ‘बड़ा मंगल’ माना जाता है. हर मंगल को किसी न किसी के घर से भंडारे का न्योता आ जाता. सुंदरकांड के साथ खानेपीने की अच्छीखासी व्यवस्था रहती थी.

प्रारंभ में अलका सामाजिकता निभाने चली जाती थी, किंतु धीरेधीरे उसे इन आयोजनों में अरुचि होने लगी. आस्था मन की चीज है, न कि दिखाने की. यही कारण था कि हर आयोजन उसे उस के करने वाले की प्रतिष्ठा का द्योतक लगने लगा था. आखिरकार, पहनावे से आधुनिक व विचारों से दकियानूसी महिलाओं का अपनी आस्था का भौंड़ा प्रदर्शन कर दूसरों को नीचा दिखाने को आतुर रहना उसे पसंद न था इसलिए ऐसी महिलाओं से उस ने दूरी बना लेना ही बेहतर समझा. नतीजा यह हुआ कि धीरेधीरे आस्था के रंग में डूबी महिलाओं ने उसे नास्तिक की उपाधि से विभूषित कर उस का सामाजिक बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया. लेकिन, उस ने उन की इस मनोवृत्ति को भी सहजता से लिया. कम से कम अब उसे ऐसे आयोजनों में सम्मिलित न हो पाने पर बहाना बनाने से मुक्ति मिल गई थी. Social Story in Hindi

Iranian Women Protest : ईरान की महिलाओं का धार्मिक सत्ता को खुला चैलेंज

Iranian Women Protest : ईरान के लोगों को बोलने की आजादी चाहिए. महिलाओं को अपनी देह, अपने कपड़ों और जीवन पर अधिकार चाहिए. जनता न राजशाही चाहती है और न ही धार्मिक तानाशाही, बल्कि वह निष्पक्ष चुनाव और एक जवाबदेह सरकार चाहती है.

ईरान की सड़कों पर प्रदर्शनकारी औरतों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की तसवीरों में आग लगा कर उस से अपने होंठों में दबी सिगरेटें सुलगाईं और धार्मिक तानाशाही के खिलाफ अपने विरोध की वे तसवीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट कीं. यह धर्म के खिलाफ औरत का एक तीव्र प्रतीकात्मक विरोध है. खामेनेई की तसवीर ईरान की धार्मिकराजनीतिक सत्ता का प्रतीक है. उसे जलाना और उसी से सिगरेट सुलगाना यह जताता है कि डर टूट चुका है और सर्वोच्च सत्ता को चुनौती दी जा रही है. खामेनेई सिर्फ राजनीतिक नहीं, धार्मिक सत्ता के भी प्रतीक हैं. उन की तसवीर जलाना यह भी बताता है कि प्रदर्शनकारी धर्म के नाम पर थोपे गए नियमों को स्वीकार नहीं करना चाहते, खासतौर पर युवा वर्ग और औरतें. यह कृत्य अशिष्टता नहीं, बल्कि गहरे असंतोष और साहसिक प्रतिरोध का संकेत है- एक ऐसा संदेश कि महिलाएं अब अपनी आवाज दबने नहीं देंगी, चाहे जोखिम कितना भी बड़ा क्यों न हो. खामेनेई ईरान में सिर्फ सत्ता के शिखर पर बैठे नेता नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रतीक हैं जहां धर्म और राजनीति व राजसत्ता एकदूसरे में घुल कर व्यक्ति की आजादी को नियंत्रित करते हैं.

Iranian Women Protest
ख़ामेनेई के पोस्टर से सिगरेट सुलगाती महिला

यह कृत्य इसलिए भी असाधारण है क्योंकि ईरान जैसे देश में, जहां धार्मिक सत्ता से असहमति को ईशनिंदा और राष्ट्रद्रोह के समान देखा जाता है, सार्वजनिक रूप से इस तरह का प्रतिरोध जीवन को दांव पर लगाने जैसा है. सिगरेट सुलगाने की यह क्रिया यह संदेश देती है कि अब पवित्रता और भय का आवरण टूट चुका है. महिलाएं साफ कह रही हैं कि धर्म के नाम पर उन के पहनावे, उन की आवाज और उन के जीवन पर नियंत्रण स्वीकार्य नहीं है. यह अशिष्टता नहीं, बल्कि साहस का वह रूप है जो तब जन्म लेता है जब दमन असहनीय हो जाता है.

हाल के वर्षों में भारत में भी समान प्रवृत्ति उभरती दिखाई दे रही है. मोदी सरकार धर्म को लगातार राजनीति के केंद्र में ला कर उसे राष्ट्रीय पहचान से जोड़ रही है. धार्मिक प्रतीकों, जुलूसों, नारों और कर्मकांडों को इतना उभारा जा रहा है कि शिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे मूलभूत प्रश्न हाशिए पर जा बैठे हैं. उन की तरफ सरकार की नजर ही नहीं है. सरकार के खिलाफ असहमति की आवाजों को ‘धर्म विरोधी’, ‘राष्ट्र विरोधी’ या ‘संस्कृति के खिलाफ’ बता कर दबाने की कोशिशें साफ दिखाई देने लगी हैं. यही वह मोड़ है जहां समाज को तय करना होता है कि धर्म व्यक्तिगत आस्था रहेगा या सत्ता का हथियार बनेगा.

ईरान की महिलाओं का साहस यह बताता है कि जब सत्ता डर के सहारे चलती है, तो एक दिन डर टूटता जरूर है. जरूरी है कि धर्म को सवालों से बचाने की ढाल न बनने दिया जाए. शिक्षा, रोज़गार और महंगाई जैसे मुद्दों पर खुली बहस हो और युवा वर्ग को कर्मकांडों में उलझा कर नहीं, बल्कि सोचनेसमझने की आजादी दे कर सशक्त किया जाए. जब सवाल पूछना बंद हो जाता है तब प्रतीकात्मक आग लगने में देर नहीं लगती और इतिहास गवाह है कि ऐसी आग सिर्फ तसवीरों तक सीमित नहीं रहती फिर बात चाहे ईरान की हो, अफगानिस्तान की, भारत की या अमेरिका की हो.

ईरान में हालिया जनाक्रोश किसी एक घटना की उपज नहीं है. 1979 की इसलामी क्रांति के बाद से धार्मिकराजनीतिक सत्ता ने आम जनता के निजी जीवन में गहरी दखलअंदाजी की. लोगों, खासकर औरतों, का पहनावा, आवाजाही, अभिव्यक्ति जैसी हर चीज पर धार्मिक सत्ता का नियंत्रण बढ़ता चला गया. समय के साथ यह नियंत्रण सामाजिक अनुशासन से आगे बढ़ कर दमन में बदल गया. आर्थिक प्रतिबंधों, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने आम ईरानी नागरिक की मुश्किलें बढ़ाईं. पर महिलाओं के लिए तो यह दोहरा बोझ साबित हुआ. आर्थिक संकट के साथसाथ उस के शरीर और पहचान पर भी राज्य का नियंत्रण हावी हो गया. बीते 3 दशकों के दौरान हुए आंदोलनों में ईरानी महिलाएं इसलिए आगे दिखीं क्योंकि सरकारी नीतियों का सब से कठोर असर सीधे उन्हीं के जीवन पर पड़ा.

मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के राजनीतिक मानचित्र पर ईरान और अफगानिस्तान दो ऐसे देश हैं, जहां सत्ता और धर्म का गठजोड़ महिलाओं की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का प्रमुख औजार रहा है. हाल के वर्षों में ईरान की सड़कों पर औरतों का उग्र प्रतिरोध और अफगानिस्तान में उन की जबरन खामोशी दोनों मिल कर यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या दमन हर जगह एकजैसा काम करता है?

Iranian Women Protest
ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति

1979 की इसलामी क्रांति के बाद ईरान में ‘इसलामी नैतिकता’ के नाम पर महिलाओं पर सख्त नियम थोपे गए. इसलामी क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य कर दिया गया. इसे लागू करने के लिए ‘मोरल पुलिस’ बनाई गई, जो सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की निगरानी करती है. बुर्के के बाहर बाल दिखने, कपड़े ‘अनुचित’ होने या मेकअप तक पर गिरफ्तारी और हिंसा की खबरें आना ईरान में आम बात हो गई.

Iranian Women Protest
महसा अमीनी की कस्टोडियल किलिंग के बाद ईरान में महिलाओं का उग्र प्रदर्शन

2022 में 23 वर्षीया स्टूडैंट महसा अमीनी ने इस दबाव को चुनौती दी. उस ने बाल कटवाए और अपने कटे बालों को खुली हवा में लहराते हुए सड़कों पर चक्कर लगाए. ईरान की मोरल पुलिस ने महसा को गिरफ्तार कर लिया और उसे इतना प्रताड़ित किया गया कि कस्टडी में उस की मौत हो गई. महसा की मौत के बाद भड़का आंदोलन केवल हिजाबविरोध नहीं था, बल्कि यह सत्ता के उस धार्मिकराजनीतिक गठजोड़ को चुनौती थी जिस की वैधता डर पर टिकी है. महसा अमीनी की हिरासत में हुई मौत ने पूरे ईरान को झकझोर दिया. यह घटना सिर्फ एक मौत नहीं थी, यह उस सिस्टम का प्रतीक थी जो महिलाओं को नियंत्रित करता है.

नारा उभरा: “औरत, जिंदगी, आजादी”- और आंदोलन देशव्यापी बन गया. इतिहास गवाह है कि जब सत्ता महिलाओं के सिर पर धर्म और नैतिकता का बोझ रख कर उन्हें नियंत्रित करना चाहती है, तो वही नैतिकता आखिरकार प्रतिरोध का हथियार बन जाती है. यही ईरान में हुआ और हो रहा है.

धर्म की सत्ता सब से पहले औरतों पर नकेल कसती है. उन के जरिए पूरे परिवार और फिर पूरे समाज को धर्म के चक्रव्यूह में फंसाती है. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि कोई भी शासन डर पैदा कर के ज्यादा दिन नहीं टिक सकता है. आज ईरान की सड़कों पर और अफगानिस्तान की खामोश गलियों में जो संघर्ष चल रहा है, वह सिर्फ महिलाओं का संघर्ष नहीं है, बल्कि वह देश के भविष्य की दिशा तय करने की लड़ाई है.

सवाल यह नहीं कि ये आंदोलन जीतेंगे या नहीं, सवाल यह है कि दुनिया कब यह मानेगी कि औरतों की आजादी किसी समाज के पतन का नहीं, बल्कि उस के परिपक्व होने का संकेत होती है. ईरानी महिलाओं का संघर्ष सिर्फ हिजाब के खिलाफ नहीं, बल्कि गरिमा, बराबरी और अपने जीवन पर अधिकार की लड़ाई है. धार्मिक सत्ता द्वारा बारबार आंदोलनों का दमन करने के बावजूद उठ खड़े होने वाले आंदोलन दिखाते हैं कि समाज में बदलाव की आकांक्षा को दबाया नहीं जा सकता है.

ईरान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां सत्ता की सख्ती और समाज की बेचैनी आमनेसामने दिखाई दे रही है. हालिया महीनों में महिलाओं के नेतृत्व में उभरे विरोधप्रदर्शन, युवाओं की मुखरता और आर्थिक दबावों ने इसलामी गणराज्य की शासनव्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं. यह केवल सड़कों पर उतर आए ग़ुस्से की कहानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक अनुबंध की टूटन का संकेत है जिस पर दशकों से सत्ता टिकी रही.

खामेनेई सरकार की कुनीतियां न सिर्फ औरत की हस्ती, आजादी और गरिमा के खिलाफ हैं, बल्कि धर्म और सत्ता को बचाने में लगी यह सरकार आम जनता, खासकर युवाओं, की जिंदगी सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती है. एक तरफ जहां अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों ने देश में महंगाई और बेरोजगारी को चरम बिंदु पर पंहुचा दिया है, वहीं पढ़ेलिखे ईरानी युवाओं को अपना भविष्य पूरी तरह अंधकारमय नजर आ रहा है.

ईरान इस वक्त क्रांति की आग में जल रहा है जहां लोग इसलामी गणराज्य के खामेनेई शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सड़कों पर हैं. खामेनेई 1989 से अब तक 37 साल से सत्ता में हैं. इस पूरे काल में ईरान आर्थिक संकट, भारी महंगाई, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों, बेरोजगारी, मुद्रा गिरावट और लगातार जनआंदोलनों जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझता रहा. मौजूदा आर्थिक बदहाली और सख्त धार्मिक शासन से नाराज लोग अब बदलाव चाहते हैं.

खामेनेई सरकार अपने खिलाफ हो रहे उग्र प्रदर्शनों से घबराई हुई है और आंदोलन को कुचलने के लिए पूरा जोर लगा रही है. बीते एक हफ्ते में ईरान में 600 से ज्यादा लोगों की जान पुलिस की गोलियों से जा चुकी है और हजारों की संख्या में लोग घायल हुए हैं. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी खामेनेई को लगातार धमका रहे हैं कि यदि प्रदर्शनकारियों की हत्या हुई तो वे ईरान पर हमला करेंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान सरकार प्रदर्शनों को रोकने के लिए रेड लाइन पार कर रही है. अमेरिका ‘कड़े विकल्पों’ पर विचार कर रहा है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘ईरान आजादी की ओर देख रहा है, जो पहले कभी नहीं हुआ. हम ईरान के लोगों की मदद के लिए तैयार है.’

पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान में प्रदर्शनकारियों के साथ जो हो रहा है, उस पर अमेरिका की नजर है. उधर ईरान ने भी अमेरिका को चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह अमेरिकी सैनिकों और इजराइल को निशाना बनाएगा.

ईरान में खामेनेई सरकार के खिलाफ विरोधप्रदर्शन के बीच कई शहरों में राजशाही के लिए नारे और ‘पहलवी वापस आएं’ जैसे स्लोगन भी सुने जा रहे हैं. रजा पहलवी, जिन्हें क्राउन प्रिंस भी कहा जाता है, ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बड़े बेटे हैं और लगभग 50 वर्षों से अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे हैं. उन्होंने लंबे समय से ईरान में धार्मिक शासन यानी इसलामिक रिपब्लिक के खिलाफ आवाज उठाई है और लोकतांत्रिक बदलाव की वकालत की है. हालांकि ईरान की जनता देश में एक बार फिर राजशाही बहाल करने के समर्थन में नहीं है लेकिन वह एक अच्छे लोकतंत्र का सपना जरूर देख रही है. ‘शाह वापस आए’ या ‘पहलवी’ जैसे नारे फिलहाल इसलामी गणतंत्र के प्रति गहरे आक्रोश की अभिव्यक्ति है. ये नारे बता रहे हैं कि मौजूदा व्यवस्था से लोग कितने निराश हैं.

ईरान का असली संघर्ष धार्मिक तानाशाही बनाम नागरिक स्वतंत्रता ही है. ईरान के लोगों को बोलने की आजादी चाहिए. महिलाओं को अपनी देह, अपने कपड़ों और जीवन पर अधिकार चाहिए. जनता न राजशाही चाहती है और न ही धार्मिक तानाशाही, बल्कि वह निष्पक्ष चुनाव और एक जवाबदेह सरकार चाहती है.

ईरान की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा, शिक्षित और वैश्विक दुनिया से जुड़ा है. इंटरनैट, विज्ञान, कला और तकनीक के युग में वे ऐसे राज्य की चाह रखते हैं जो ज्ञान, नवाचार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा दे, न कि आम आदमी की जीवनशैली पर नियंत्रण करे. महिलाएं इस परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में हैं. हिजाब, पहनावे और निजी जीवन पर नियंत्रण के खिलाफ उन का संघर्ष असल में नागरिक गरिमा और बराबरी की मांग है, जो किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की बुनियाद है.

ईरान में जारी आंदोलन भारत के लिए केवल एक विदेशी घटना नहीं है, बल्कि एक गहरी चेतावनी और सीख है. यह आंदोलन बताता है कि जब राज्य, धर्म और सत्ता मिल कर नागरिकों- खासतौर पर महिलाओं, की आज़ादी को कुचलते हैं तो समाज के भीतर असंतोष लंबे समय तक दबा नहीं रह सकता है. व्यक्तिगत स्वतंत्रता से समझौता खतरनाक साबित हो सकता है. ईरान में हिजाब जैसे निजी मामलों को राज्य द्वारा नियंत्रित किया गया. भारत में भी यदि पहनावे, खानपान, प्रेम, विवाह या विचार पर नियंत्रण की प्रवृत्ति बढ़ेगी, तो लोकतंत्र खोखला होगा.

धर्म और सत्ता का घालमेल लोकतंत्र को नष्ट करता है. ईरान में धार्मिक सत्ता ने संविधान, कानून और जीवनशैली पर कब्जा कर लिया. भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है, यह उस की सब से बड़ी ताकत है. इस से किसी भी तरह का समझौता भविष्य में गंभीर संकट पैदा कर सकता है. महिला परिवार की धुरी है, इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि महिलाओं की आजादी ही लोकतंत्र की असली कसौटी है. ईरान के आंदोलन की अगुआई महिलाओं ने की. यह दिखाता है कि जब महिलाओं के अधिकार छीने जाते हैं तो समाज का संतुलन टूटता है. भारत में महिलाओं की शिक्षा, काम, आवाज और सुरक्षा पर किसी भी तरह का अंकुश लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है.

कोई भी शासक लंबे समय तक तभी टिकता है जब वह डर से नहीं बल्कि सहमति से अपना शासन चलाता है. ईरान की सत्ता दमन, गिरफ्तारी और हिंसा के बल पर टिकी है. भारत को याद रखना होगा कि लोकतंत्र बहुमत से नहीं, अधिकारों की रक्षा से मजबूत होता है और असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं होती. ईरान में युवा पीढ़ी आधुनिक, वैश्विक और सवाल करने वाली है. भारत की भी विशाल युवा आबादी है. यदि उन की आकांक्षाओं, रोजगार और स्वतंत्र सोच को दबाया गया, तो असंतोष ही बढ़ेगा, रामराज्य स्थापित नहीं होगा. ईरान का आंदोलन बताता है कि आजादी छीनी जा सकती है, पर इच्छा नहीं. भारत के लिए यह समय आत्ममंथन का है, ताकि वह धार्मिक कठोरता, सांस्कृतिक नैतिकता के नाम पर दमन और असहमति के दमन की राह पर न जाए. लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं, नागरिक स्वतंत्रता से जीवित रहता है. Iranian Women Protest

Editorial : सरित प्रवाह – धर्म का धंधा

Editorial : धर्म में सब से बड़ी चीज दान है. यह न समझें कि दानदक्षिणा पर हिंदू पंडेपुजारियों का एकाधिकार है. अमीर लोगों का चर्च भी ईसा मसीह और स्वर्ग में बैठे ईश्वर के नाम पर पैसा मांगता रहता है, एक ईमेल लीडिंग द वे चर्च, साउथ वेल्स, आस्ट्रेलिया के डा. माइकल यूसुफ से प्राप्त हुआ.

सब से पहले उन्होंने पढ़ने वाले के मर्म को छुआ. फिर पूछा, क्या आप को लगता है कि आप को कोई अपना नजदीकी मातापिता, बेटाबेटी, भाईबहन, पत्नी जिसे आप बहुत प्यार करते हैं आप को इग्नोर कर रहा है. अब हर घर में हरेक को लगता है कि कोई न कोई आप के प्यार को समझ नहीं रहा. ईमेल इस सर्वव्यापी तथ्य को भुनाते हुए लिखता है कि चिंता न करें, ऊपर आकाश में बैठा एक ऐसा पिता है जो आप को कभी अस्वीकार या इग्नोर नहीं करेगा.

डा. माइकल यूसुफ़ ने यह खोज कैसे की, यह ईमेल का उद्देश्य नहीं है वरना तो उन से पूछा जा सकता था कि जब वह सर्वशक्तिमान पिता कभी अपनी संतानों को इग्नोर नहीं करता तो वह किसी के मांबाप, भाईबहन, बेटे, पतिपत्नी द्वारा उस के सगे को इग्नोर कैसे करने दे सकता है. आमतौर पर इस का उत्तर धर्म के प्रचारक यह कह कर देते हैं कि ईश्वर सब की परीक्षा लेता है. वह जानना चाहता है कि आप ईश्वर में कितनी अगाध श्रद्धा रखते हैं. कितना विश्वास है आप का उस में. अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है और उसी ने हर पतिपत्नी, मांबाप, बेटाबेटी, भाईबहन को खुद डिजाइन कर के बनाया है तो समस्या पैदा ही क्यों हुई, उस ने परीक्षा लेने की सोची ही क्यों? जब वह भक्त के साथ हाथ पकड़ कर हर समय खड़ा रहता है तो भक्त के नजदीकियों का भी तो हाथ और मस्तिष्क उस ने हमेशा पकड़ रखा है. बाकी भी तो उसी के भक्त है, ईमेल पढ़ने वाले भक्त की तरह के.

असली बात यह है कि ईमेल पैसा जमा करने के लिए भेजा गया है. उस में यह कहा गया है कि सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, हरेक का हाथ पकड़े ईश्वर का संदेश हरेक को पकड़ाना है, उस के लिए कंप्यूटर खरीदने हैं, स्टाफ रखना है, ईश्वर का संदेश उन को देना जिन का हाथ ईश्वर ने खुद पकड़ रखा है. विरोधाभासी बातें कहते हुए धर्मप्रचारकों को कतई भी हिचक नहीं होती क्योंकि उन से कोई सवाल पूछता ही नहीं. अगर कोई पूछ लेता है तो उसे या तो धर्मभ्रष्ट कह कर भगा दिया जाता है या फिर मार डाला जाता है. यह लीडिंग द वे भी 30 डौलर, 60 डौलर, 150 डौलर, 300 डौलर हर माह देने की अपील करता है.

यही नहीं, उस के द्वारा यह आश्वासन भी दिया जाता है कि आप जितना दोगे उस को ईश्वर दोगुना समझेगा क्योंकि यह लीडिंग द वे ऊपरवाले सर्वशक्तिमान (जिस के लाखों चर्च दुनियाभर में हैं) का विशेषप्रिय चर्च है. वाह, क्या मार्केटिंग है.

ईमेल पढ़ने वालों से यह भी कहा जा रहा है कि दान देने के पुनीत कार्य में हाथ बंटाने और सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान जीसस के पिता ईश्वर को प्रसन्न रखने के लिए अपने सगेसंबंधियों को ईमेल फौरवर्ड करो और सब से सारी संपत्ति के मालिक ईश्वर को और पैसे दिलवाओ.

धर्म का धंधा तरहतरह के रूप लेता है. कोई भी धर्म बिना दान के जिंदा नहीं रह सकता. यही ऐसा धंधा है जिस में बिक्री के लिए तो मेहनत करनी पड़ती है पर सामान की डिलीवरी बाद में, मरने के बाद दी जाती है. कुछ में स्वर्गनर्क मिलता है तो कुछ में अच्छे कुल में पुनर्जन्म. यह सब दान पर निर्भर करता है. आप को कोई मिला है धार्मिक एजेंट जो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से पैसे नहीं लेता. कुछ तो ऐसा वातावरण बना लेते हैं कि लोग लाइनों में लग कर पैसा देते हैं, जैसे एप्पल 17 के समय लोगों ने लाइनें लगाई थीं. तब, मोबाइल तो मिला था. यहां तो मरने के बाद कुछ मिलने का सिर्फ आश्वासन मिलता है. Editorial

Social Story in Hindi : एक दिन का सुलतान – पुरस्कार पाकर शिक्षक क्यों परेशान हो गए थे ?

Social Story in Hindi : मुझे उन्होंने राष्ट्रपति पुरस्कार दे दिया. उन की मरजी, वे जानें कि क्यों दिया? कैसे दिया? मैं तो नहीं कहता कि मैं कोई बहुत बढि़या अध्यापक हूं. हां, यह तो कह सकता हूं कि मुझे पढ़ने और पढ़ाने का शौक है और बच्चे मुझे अच्छे लगते हैं. यदि पुरस्कार देने का यही आधार है, तो कुछ अनुचित नहीं किया उन्होंने, यह भी कह सकता हूं.

जिस दिन मुझे पुरस्कार के बाबत सूचना मिली तरहतरह के मुखौटे सामने आए. कुछ को असली खुशी हुई, कुछ को हुई ही नहीं और कुछ को जलन भी हुई. अब यह तो दुनिया है. सब रंग हैं यहां, हम किसे दोष दें? क्या हक है हम को किसी को दोष देने का? मनुष्य अपना दृष्टिकोण बनाने को स्वतंत्र है. जरमन दार्शनिक शापनहोवर ने भी तो यही कहा था, ‘‘गौड भाग्य विधाता नहीं है, वह तो मनुष्य को अपनी स्वतंत्र बुद्धि का प्रयोग करने की पूरी छूट देता है. उसे जंचे सेब खाए तो खाए, न खाए तो न खाए. अब बहकावट में आदमी ने यदि सेब खा लिया और मुसीबत सारी मानव जाति के लिए पैदा कर दी तो इस में ऊपर वाले का क्या दोष.’’

हां, तो पुरस्कार के दोचार दिन बाद ही मुझे गौर से देखने के बाद एक सज्जन बोले, ‘‘हम ने तो आप की चालढाल में कोई परिवर्तन ही नहीं पाया. आप के बोलनेचालने से, आप के हावभाव से ऐसा लगता ही नहीं कि आप को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है.’’

मैं सुन कर चुप रह गया. क्या कहता? खुशी तो मुझे हुई थी लेकिन मेरी चालढाल में परिवर्तन नहीं आया तो इस का मैं क्या करूं? जबरदस्ती नाटक करना मुझे आता नहीं. मेरी पत्नी को तो यही शिकायत रहती है कि यदि आप पहले जैसा प्यार नहीं कर सकते तो प्यार का नाटक ही कर दिया करो, हमारा गुजारा तो उस से ही हो जाएगा. हम हंस कर कह दिया करते हैं कि पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट जाएंगे ट्रेनिंग लेने और वह खीझ कर रह जाती है.

पुरस्कार मिलने के बारे में कई शंकाएंआशंकाएं व प्रतिक्रियाएं सामने आईं. उन्हीं दिनों मैं स्टेशन पर टिकट लेने लंबी लाइन में खड़ा था. मेरा एक छात्र, जो था तो 21वीं सदी का पर श्रद्धा रखता?था महाभारतकाल के शिष्य जैसी, पूछ बैठा :

‘‘सर, आप तो राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक हैं. क्या आप को भी इस प्रकार लाइन में खड़ा होना पड़ता है? आप को तो फ्री पास मिलना चाहिए था, संसद के सदस्यों की तरह.’’

उसे क्या पता, कहां हम और कहां संसद सदस्य. वे हम को तो खुश करने की खातिर राष्ट्रनिर्माता कहते?हैं पर वे तो भाग्यविधाता हैं. उन का हमारा क्या मुकाबला. छात्र गहरी श्रद्धा रखता?था सो उसे यह बात समझ में नहीं आई. उस ने तुरंत ही दूसरा सवाल कर डाला.

‘‘सर, आप को पुरस्कार में कितने हजार रुपए मिले? नौकरी में क्या तरक्की मिली? कितने स्कूटर, कितनी बीघा जमीन वगैरह?’’

यह सब सुन कर मैं चौंक गया और पूछा, ‘‘बेटे, यह तुम ने कैसे सोच लिया कि मास्टरजी को यह सब मिलना चाहिए?’’

उस ने कहा, ‘‘सर, क्रिकेट खिलाडि़यों को तो कितना पैसा, कितनी कारें, मानसम्मान, सबकुछ मिलता है, आप को क्यों नहीं? आप तो राष्ट्रनिर्माता हैं.’’

मुझे उस के इस प्रश्न का जवाब समझ में नहीं आया तो प्लेटफार्म पर आ रही गाड़ी की तरफ मैं लपका.

उन्हीं दिनों एक शादी में मेरा जाना हुआ. वहां मेरे एक कद्रदान रिश्तेदार ने समीप बैठे कुछ लोगों से कहा, ‘‘इन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार मिला है. तपाक से एक सज्जन बोले, ‘‘मान गए उस्ताद आप को, बड़ी पहुंच है आप की, खूब तिकड़म लगाई. कुछ खर्चावर्चा भी हुआ?’’

मैं उन की बातें सुन कर सकते में आ गया. उन्होंने मेरी उपलब्धि अथवा अन्य कार्यों के संबंध में न पूछ कर सीधे ही टिप्पणी दे डाली. पुरस्कार के पीछे उन की इस अवधारणा ने मुझे झकझोर दिया. और पुरस्कार के प्रति एक वितृष्णा सी हो उठी. क्यों लोगों में इस के प्रति आस्था नहीं है? कई प्रश्न मेरे सामने एकएक कर आते गए जिन का उत्तर मैं खोजता आ रहा हूं.

एक दिन अचानक एक अध्यापक बंधु मिले. उन की ग्रेडफिक्सेशन आदि की कुछ समस्या थी. वे मुझ से बोले, ‘‘भाई साहब, आप तो राष्ट्रीय पुरस्कारप्राप्त शिक्षक हैं. आप की बात का तो वजन विभाग में होगा ही, कुछ मेरी भी सहायता कीजिए.’’

मैं ने उन को बताया कि मेरे खुद के मामले ही अनिर्णीत पड़े हैं, कौन जानता है मुझे विभाग में. कौन सुनता है मेरी. मैं ने उन्हें यह भी बताया कि एक बार जिला शिक्षा अधिकारी से मिलने गया था. मैं ने अपनी परची में अपने नाम के आगे ‘राष्ट्रीय पुरस्कारप्राप्त’ भी लिख दिया था. मुझे पदवी लिखने का शौक नहीं है पर किसी ने सुझा दिया था. मैं ने भी सोचा कि देखें कितना प्रभाव है इस लेबल का. सो, आधा घंटे तक तो बुलाया ही नहीं. बाद में डेढ़ बजे बाहर निकलते हुए मेरे पूछने पर कहा, ‘‘आप साढ़े 3 बजे मिलिएगा.’’ और फिर उस दिन वे लंच के बाद आए ही नहीं और हम अपने पुरस्कार को याद करते हुए लौट आए.

मुझे अफसोस है कि मुझे पुरस्कार तो दिया गया पर पूछा क्यों नहीं जाता है, पहचाना क्यों नहीं जाता है, सुना क्यों नहीं जाता है? क्यों यह मात्र एक औपचारिकता ही है कि 5 सितंबर को एक जलसे में कुछ कर दिया जाता है और बस कहानी खत्म.

एक बार मैं ऐसे ही पुरस्कार समारोह के अवसर पर बैठा था. मेरी बगल में बैठे शिक्षक मित्र ने पूछा, ‘‘आप तो पुरस्कृत शिक्षक हैं, आप को तो आगे बैठना चाहिए. आप का तो विशेष स्थान सुरक्षित होगा?  आप को तो हर वर्ष बुलाते होंगे?’’

मैं ने कहा, ‘‘भाई मेरे, मुझे ही शौक है लोगों से मिलने का सो चला आता हूं. निमंत्रण तो इन 10 वर्षों में केवल 2 बार ही पहुंच पाया है और वह भी इसलिए कि निमंत्रणपत्र भेजने वाले मेरे परिचित एवं मित्र थे.

समारोह में कुछ व्यवस्थापक सदस्य आए और कुछ लोगों को परचियां दे गए, और कहा, ‘‘आप लोग समारोह के बाद पुरस्कृत शिक्षकों के साथ अल्पाहार लेंगे.’’ मेरे पड़ोसी ने फिर पूछा, ‘‘आप तो पुरस्कृत शिक्षक?हैं, आप को क्यों नहीं दे रहे हैं यह परची?’’ मैं ने एक लंबी सांस ली और कहा, ‘‘अरे, भाई साहब, यह पुरस्कार तो एक औपचारिकता है, पहचान थोड़े ही है. एक महान पुरुष ने चालू कर दिया सो चालू हो गया. अब चलता रहेगा जब तक कोई दूसरा महापुरुष बंद नहीं कर देगा.’’

बगल वाले सज्जन ने पूछा, ‘‘तो क्या ऐसे महापुरुष भी हैं जो बंद कर देंगे.’’

‘‘अरे, साहब, क्या कमी है इस वीरभूमि में ऐसे बहादुरों की. देखिए न, पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों को 3 वर्षों की सेवावृद्धि स्वीकृत थी पर बंद कर दी न किसी महापुरुष ने.’’

‘‘अच्छा, यह तो बताइए कि लोग क्या देते हैं आप को? क्या केवल 1 से 5 हजार रुपए ही?’’

‘‘जी हां, यह क्या कम है? सच पूछो तो वे क्या देते हैं हम को, देते तो हम हैं उन्हें.’’

‘‘ वह क्या?’’

‘‘अजी, हम धन्यवाद देते हैं कि वे भले ही एक दिन ही सही, हमारा अभिनंदन तो करते हैं और हम भिश्ती को एक दिन का सुलतान बनाए जाने की बात याद कर लेते हैं.’’

‘‘लेकिन उस को तो फुल पावर मिली थी और उस ने चला दिया था चमड़े का सिक्का.’’

‘‘इतनी पावर तो हमें मिलने का प्रश्न ही नहीं. पर हां, उस दिन तो डायरेक्टर, कमिश्नर, मिनिस्टर सभी हाथ मिलाते हैं हम से, हमारे साथ चाय पी लेते हैं, हम से बात कर लेते हैं, यह क्या कम है?’’ इसी बीच राज्यपाल महोदय आ गए और सब खड़े हो गए. बाद में सब बैठे भी, लेकिन कम्बख्त सवाल हैं कि तब से खड़े ही हैं. Social Story in Hindi :

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