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sad love story : हम बेवफा न थे

‘‘अरे, आप लोग यहां क्या कर रहे हैं? सब लोग वहां आप दोनों के इंतजार में खड़े हैं,’’ हमशां ने अपने भैया और होने वाली भाभी को एक कोने में खड़े देख कर पूछा.

‘‘बस कुछ नहीं, ऐसे ही…’’ हमशां की होने वाली भाभी बोलीं.

‘‘पर भैया, आप तो ऐसे छिपने वाले नहीं थे…’’ हमशां ने हंसते हुए पूछा.

‘काश हमशां, तुम जान पातीं कि मैं आज कितना उदास हूं, मगर मैं चाह कर भी तुम्हें नहीं बता सकता,’ इतना सोच कर हमशां का भाई अख्तर लोगों के स्वागत के लिए दरवाजे पर आ कर खड़ा हो गया.

तभी अख्तर की नजर सामने से आती निदा पर पड़ी जो पहले कभी उसी की मंगेतर थी. वह उसे लाख भुलाने के बावजूद भी भूल नहीं पाया था.

‘‘हैलो अंकल, कैसे हैं आप?’’ निदा ने अख्तर के अब्बू से पूछा.

‘‘बेटी, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ अख्तर के अब्बू ने प्यार से जवाब दिया.

‘‘हैलो अख्तर, मंगनी मुबारक हो. और कितनी बार मंगनी करने की कसम खा रखी है?’’ निदा ने सवाल दागा.

‘‘यह तुम क्या कह रही हो? मैं तो कुछ नहीं जानता कि हमारी मंगनी क्यों टूटी. पता नहीं, तुम्हारे घर वालों को मुझ में क्या बुराई नजर आई,’’ अख्तर ने जवाब दिया.

‘‘बस मिस्टर अख्तर, आप जैसे लोग ही दुनिया को धोखा देते फिरते हैं और हमारे जैसे लोग धोखा खाते रहते हैं,’’ इतना कह कर निदा गुस्से में वहां से चली गई.

सामने स्टेज पर मंगनी की तैयारी पूरे जोरशोर से हो रही थी. सब लोग एकदूसरे से बातें करते नजर आ रहे थे. तभी निदा ने हमशां को देखा, जो उसी की तरफ दौड़ी चली आ रही थी.

‘‘निदा, आप आ गईं. मैं तो सोच रही थी कि आप भी उन लड़कियों जैसी होंगी, जो मंगनी टूटने के बाद रिश्ता तोड़ लेती हैं,’’ हमशां बोली.

‘‘हमशां, मैं उन में से नहीं हूं. यह सब तो हालात की वजह से हुआ?है…’’ निदा उदास हो कर बोली, ‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि वह लड़की कौन है जो तुम लोगों को पसंद आई है?’’

‘‘हां, क्यों नहीं. वह देखो, सामने स्टेज की तरफ सुनहरे रंग का लहंगा पहने हुए खड़ी है,’’ हमशां ने अपनी होने वाली भाभी की ओर इशारा करते हुए बताया.

‘‘अच्छा, तो यही वह लड़की है जो तुम लोगों की अगली शिकार है,’’ निदा ने कोसने वाले अंदाज में कहा.

‘‘आप ऐसा क्यों कह रही हैं. इस में भैया की कोई गलती नहीं है. वह तो आज भी नहीं जानते कि हम लोगों की तरफ से मंगनी तोड़ी गई?है,’’ हमशां ने धीमी आवाज में कहा.

‘‘मगर, तुम तो बता सकती थीं.

तुम ने क्यों नहीं बताया? आखिर तुम भी तो इसी घर की हो,’’ इतना कह कर निदा वहां से दूसरी तरफ खड़े लोगों की तरफ बढ़ने लगी.

निदा की बातें हमशां को बुरी तरह कचोट गईं.

‘‘प्लीज निदा, आप हम लोगों को गलत न समझें. बस, मम्मी चाहती थीं कि भैया की शादी उन की सहेली की बेटी से ही हो,’’ निदा को रोकते हुए हमशां ने सफाई पेश की.

‘‘और तुम लोग मान गए. एक लड़की की जिंदगी बरबाद कर के अपनी कामयाबी का जश्न मना रहे हो,’’ निदा गुस्से से बोली.

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं?है. मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि मम्मी की कसम के आगे हम सब मजबूर थे वरना मंगनी कभी भी न टूटने देते,’’ कह कर हमशां ने उस का हाथ पकड़ लिया.

‘‘देखो हमशां, अब पुरानी बातों को भूल जाओ. पर अफसोस तो उम्रभर रहेगा कि इनसानों की पहचान करना आजकल के लोग भूल चुके हैं,’’ इतना कह कर निदा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और आगे बढ़ गई.

‘‘निदा, इन से मिलो. ये मेरी होने वाली बहू के मम्मीपापा हैं. यह इन की छोटी बेटी है, जो मैडिकल की पढ़ाई कर रही है,’’ अख्तर की अम्मी ने निदा को अपने नए रिश्तेदारों से मिलवाया.

निदा सोचने लगी कि लोग तो रिश्ता टूटने पर नफरत करते हैं, लेकिन मैं उन में से नहीं हूं. अमीरों के लिए दौलत ही सबकुछ है. मगर मैं दौलत की इज्जत नहीं करती, बल्कि इनसानों की इज्जत करना मुझे अपने घर वालों ने सिखाया है.

‘‘निदा, आप भैया को माफ कर दें, प्लीज,’’ हमशां उस के पास आ कर फिर मिन्नत भरे लहजे में बोली.

‘‘हमशां, कैसी बातें करती हो? अब जब मुझे पता चल गया है कि इस में तुम्हारे भैया की कोई गलती नहीं है तो माफी मांगने का सवाल ही नहीं उठता,’’ निदा ने हंस कर उस के गाल पर एक हलकी सी चपत लगाई.

कुछ देर ठहर कर निदा फिर बोली, ‘‘हमशां, तुम्हारी मम्मी ने मुझ से रिश्ता तोड़ कर बहुत बड़ी गलती की. काश, मैं भी अमीर घर से होती तो यह रिश्ता चंद सिक्कों के लिए न टूटता.’’

‘‘मुझे मालूम है कि आप नाराज हैं. मम्मी ने आप से मंगनी तो तोड़ दी, पर उन्हें भी हमेशा अफसोस रहेगा कि उन्होंने दौलत के लिए अपने बेटे की खुशियों का खून कर दिया,’’ हमशां ने संजीदगी से कहा.

‘‘बेटा, आप लोग यहां क्यों खड़े हैं? चलो, सब लोग इंतजार कर रहे हैं. निदा, तुम भी चलो,’’ अख्तर के अब्बू खुशी से चहकते हुए बोले.

‘‘मुझे यहां इतना प्यार मिलता है, फिर भी दिल में एक टीस सी उठती?है कि इन्होंने मुझे ठुकराया है. पर दिल में नफरत से कहीं ज्यादा मुहब्बत का असर है, जो चाह कर भी नहीं मिटा सकती,’ निदा सोच रही थी.

‘‘निदा, आप को बुरा नहीं लग रहा कि भैया किसी और से शादी कर रहे हैं?’’ हमशां ने मासूमियत से पूछा.

‘‘नहीं हमशां, मुझे क्यों बुरा लगने लगा. अगर आदमी का दिल साफ और पाक हो, तो वह एक अच्छा दोस्त भी तो बन सकता है,’’ निदा उमड़ते आंसुओं को रोकना चाहती थी, मगर कोशिश करने पर भी वह ऐसा कर नहीं सकी और आखिरकार उस की आंखें भर आईं.

‘‘भैया, आप निदा से वादा करें कि आप दोनों जिंदगी के किसी भी मोड़ पर दोस्ती का दामन नहीं छोड़ेंगे,’’ हमशां ने इतना कह कर निदा का हाथ अपने भैया के हाथ में थमा दिया और दोनों के अच्छे दोस्त बने रहने की दुआ करने लगी.

‘‘माफ कीजिएगा, अब हम एकदूसरे के दोस्त बन गए हैं और दोस्ती में कोई परदा नहीं, इसलिए आप मुझे बेवफा न समझें तो बेहतर होगा,’’ अख्तर ने कहा.

‘‘अच्छा, आप लोग मेरे बिना दोस्ती कैसे कर सकते हैं. मैं तीसरी दोस्त हूं,’’ अख्तर की मंगेतर निदा से बोली.

निदा उस लड़की को देखती रह गई और सोचने लगी कि कितनी अच्छी लड़की है. वैसे भी इस सब में इस की कोई गलती भी नहीं है.

‘‘आंटी, मैं हमशां को अपने भाई के लिए मांग रही हूं. प्लीज, इनकार न कीजिएगा,’’ निदा ने कहा.

‘‘तुम मुझ को शर्मिंदा तो नहीं कर रही हो?’’ अख्तर की अम्मी ने पलट कर पूछा.

‘‘नहीं आंटी, मैं एक दोस्त होने के नाते अपने दोस्त की बहन को अपने भाई के लिए मांग रही हूं,’’ इतना कह कर निदा ने हमशां को गले से लगा लिया.

‘‘निदा, आप हम से बदला लेना चाहती हैं. आप भी मम्मी की तरह रिश्ता जोड़ कर फिर तोड़ लीजिएगा ताकि मैं भी दुनिया वालों की नजर में बदनाम हो जाऊं,’’ हमशां रोते हुए बोली.

‘‘अरी पगली, मैं तो तेरे भैया की दोस्त हूं, दुख और सुख में साथ देना दोस्तों का फर्ज होता है, न कि उन से बदला लेना,’’ निदा ने कहा.

‘‘नहीं, मुझे यह रिश्ता मंजूर नहीं है,’’ अख्तर की अम्मी ने जिद्दी लहजे में कहा.

तभी अख्तर के अब्बू आ गए.

‘‘क्या बात है? किस का रिश्ता नहीं होने देंगी आप?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘अंकल, मैं हमशां को अपने भाई के लिए मांग रही हूं.’’

‘‘तो देर किस बात की है. ले जाओ. तुम्हारी अमानत है, तुम्हें सौंप देता हूं.’’

‘‘निदा, आप अब भी सोच लें, मुझे बरबाद होने से आप ही बचा सकती हैं,’’ हमशां ने रोते हुए कहा.

‘‘कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हो. मैं तो तुम्हें दिल से कबूल कर रही हूं, जबान से नहीं, जो बदल जाऊंगी,’’ निदा खुशी से चहकी.

‘‘हमशां, निदा ठीक कह रही हैं. तुम खुशीखुशी मान जाओ. यह कोई जरूरी नहीं कि हम लोगों ने उस के साथ गलत बरताव किया तो वह भी ऐसी ही गलती दोहराए,’’ अख्तर हमशां को समझाते हुए कहने लगा.

‘‘अगर वह भी हमारे जैसी बन जाएगी, तब हम में और उस में क्या फर्क रहेगा,’’ इतना कह कर अख्तर ने हमशां का हाथ निदा के भाई के हाथों में दे दिया.

‘‘निदा, हम यह नहीं जानते कि कौन बेवफा था, लेकिन इतना जरूर जानते हैं कि हम बेवफा न थे,’’ अख्तर नजर झुकाए हुए बोला.

‘‘भैया, आप बेवफा न थे तो फिर कौन बेवफा था?’’ हमशां शिकायती लहजे में बोली. उस की नजर जब अपने भैया पर पड़ी तो देख कर दंग रह गई. उस का भाई रो रहा था.

‘‘भैया, मुझे माफ कर दीजिए. मैं ने आप को गलत समझा,’’ हमशां अख्तर के गले लग कर रोने लगी.

सच है कि इनसान को हालात के आगे झुकना पड़ता है. अपनों के लिए बेवफा भी बनना पड़ता है.

online hindi kahani : यह शादी जरूर होगी

दीपों की टेढ़ीमेढ़ी कतारों के कुछ दीप अपनी यात्रा समाप्त कर अंधकार के सागर में विलीन हो चुके थे, तो कुछ उजाले और अंधेरे के बीच की दूरी में टिमटिमा रहे थे. गली का शोर अब कभीकभार के पटाखों के शोर में बदल चुका था.

दिव्या ने छत की मुंडेर से नीचे आंगन में झांका जहां मां को घेर पड़ोस की औरतें इकट्ठी थीं. वह जानबूझ कर वहां से हट आई थी. महिलाओं का उसे देखते ही फुसफुसाना, सहानुभूति से देखना, होंठों की मंद स्मिति, दिव्या अपने अंतर में कहां तक झेलती? ‘कहीं बात चली क्या…’, ‘क्या बिटिया को बूढ़ी करने का इरादा है…’ वाक्य तो अब बासी भात से लगने लगे हैं, जिन में न कोई स्वाद रहता है न नयापन. हां, जबान पर रखने की कड़वाहट अवश्य बरकरार है.

काफी देर हो गई तो दिव्या नीचे उतरने लगी. सीढि़यों पर ही रंभा मिल गई. बड़ेबड़े फूल की साड़ी, कटी बांहों का ब्लाउज और जूड़े से झूलती वेणी…बहुत ही प्यारी लग रही थी, रंभा.

‘‘कैसी लग रही हूं, दीदी…मैं?’’ रंभा ने उस के गले में बांहें डालते हुए पूछा तो दिव्या मुसकरा उठी.

‘‘यही कह सकती हूं कि चांद में तो दाग है पर मेरी रंभा में कोई दाग नहीं है,’’ दिव्या ने प्यार से कहा तो रंभा खिलखिला कर हंस दी.

‘‘चलो न दीदी, रोशनी देखने.’’

‘‘पगली, वहां दीप बुझने भी लगे, तू अब जा रही है.’’

‘‘क्या करती दीदी, महल्ले की डाकिया रमा चाची जो आ गई थीं. तुम तो जानती हो, अपने शब्दबाणों से वे मां को कितना छलनी करती हैं. वहां मेरा रहना जरूरी था न.’’

दिव्या की आंखें छलछला आईं. रंभा को जाने का संकेत करती वह अपने कमरे में चली आई. बत्ती बुझाने के पूर्व उस की दृष्टि सामने शीशे पर चली गई, जहां उस का प्रतिबिंब किसी शांत सागर की याद दिला रहा था. लंबे छरहरे शरीर पर सौम्यता की पहनी गई सादी सी साड़ी, लंबे बालों का ढीलाढाला जूड़ा, तारे सी नन्ही बिंदी… ‘क्या उस का रूप किसी पुरुष को रिझाने में समर्थ नहीं है? पर…’

बिस्तर पर लेटते ही दिव्या के मन के सारे तार झनझना उठे. 30 वर्षों तक उम्र की डगर पर घिसटघिसट कर बिताने वाली दिव्या का हृदय हाहाकार कर उठा. दीवाली का पर्व सतरंगे इंद्रधनुष में पिरोने वाली दिव्या के लिए अब न किसी पर्व का महत्त्व था, न उमंग थी. रूढि़वादी परिवार में जन्म लेने का प्रतिदान वह आज तक झेल रही है. रूप, यौवन और विद्या इन तीनों गुणों से संपन्न दिव्या अब तक कुंआरी थी. कारण था जन्मकुंडली का मिलान.

तकिए का कोना भीगा महसूस कर दिव्या का हाथ अनायास ही उस स्थान को टटोलने लगा जहां उस के बिंदु आपस में मिल कर अतीत और वर्तमान की झांकी प्रस्तुत कर रहे थे. अभी एक सप्ताह पूर्व की ही तो बात है, बैठक से गुजरते हुए हिले परदे से उस ने अंदर देख लिया था. पंडितजी की आवाज ने उसे अंदर झांकने पर मजबूर किया, आज किस का भाग्य विचारा जा रहा है? पंडितजी हाथ में पत्रा खोले उंगलियों

पर कुछ जोड़ रहे थे. कमरे तक आते हुए दिव्या ने हिसाब लगाया, 7 वर्ष से उस के भाग्य की गणना की जा रही है.

खिड़की से आती धूप की मोटी तह उस के बिस्तर पर साधिकार पसरी हुई थी. दिव्या ने क्षुब्ध हो कर खिड़की बंद कर दी.

‘‘दीदी…’’ बाहर से रंभा ने आते ही उस के गले में बांहें डाल दीं.

‘‘बाहर क्या हो रहा है…’’ संभलते हुए दिव्या ने पूछा था.

‘‘वही गुणों के मिलान पर तुम्हारा दूल्हा तोला जा रहा है.’’

रंभा ने व्यंग्य से उत्तर दिया, ‘‘दीदी, मेरी समझ में नहीं आता…तुम आखिर मौन क्यों हो? तुम कुछ बोलती क्यों नहीं?’’

‘‘क्या बोलूं, रंभा?’’

‘‘यही कि यह ढकोसले बंद करो. 7 वर्षों से तुम्हारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है और तुम शांत हो. आखिर ये गुण मिल कर क्या कर लेंगे? कितने अच्छेअच्छे रिश्ते अम्मांबाबूजी ने छोड़ दिए इस कुंडली के चक्कर में. और वह इंजीनियर जिस के घर वालों ने बिना दहेज के सिर्फ तुम्हें मांगा था…’’

‘‘चुप कर, रंभा. अम्मां सुनेंगी तो क्या कहेंगी.’’

‘‘सच बोलने से मैं नहीं डरती. समय आने दो. फिर पता चलेगा कि इन की रूढि़वादिता ने इन्हें क्या दिया.’’

रंभा के जलते वाक्य ने दिव्या को चौंका दिया. जिद्दी एवं दबंग लड़की जाने कब क्या कर बैठे. यों तो उस का नाम रंभा था पर रूप में दिव्या ही रंभा सी प्रतीत होती थी. मां से किसी ने एक बार कहा भी था, ‘बहन, आप ने नाम रखने में गलती कर दी. रंभा सी तो आप की बड़ी बेटी है. इसे तो कोई भाग्य वाला मांग कर ले जाएगा,’

तब मां चुपके से उस के कान के पीछे काला टीका लगा जातीं. कान के पीछे लगा काला दाग कब मस्तक तक फैल आया, स्वयं दिव्या भी नहीं जान पाई.

बी.एड. करते ही एक इंटर कालेज में दिव्या की नौकरी लग गई तो शुरू हुआ सिलसिला ब्याह का. तब पंडितजी ने कुंडली देख कर बताया कि वह मंगली है, उस का ब्याह किसी मंगली युवक से ही हो सकता है अन्यथा दोनों में से कोई एक शीघ्र कालकवलित हो जाएगा.

पहले तो उस ने इसे बड़े हलकेफुलके ढंग से लिया. जब भी कोई नया रिश्ता आता, उस के गाल सुर्ख हो जाते, दिल मीठी लय पर धड़कने लगता. पर जब कई रिश्ते कुंडली के चक्कर में लौटने लगे तो वह चौंक पड़ी. कई रिश्ते तो बिना दानदहेज के भी आए पर अम्मांबाबूजी ने बिना कुंडली का मिलान किए शादी करने से मना कर दिया.

धीरेधीरे समय सरकता गया और घर में शादी का प्रसंग शाम की चाय सा साधारण बैठक की तरह हो गया. एकदो जगह कुंडली मिली भी तो कहीं लड़का विधुर था, कहीं परिवार अच्छा नहीं था. आज घर में पंडितजी की उपस्थिति बता रही थी कि घर में फिर कोई तामझाम होने वाला है.

वही हुआ, रात्रि के भोजन पर अम्मांबाबूजी की वही पुरानी बात छिड़ गई.

‘‘मैं कहती हूं, 21 गुण कोई माने नहीं रखते, 26 से कम गुण पर मैं शादी नहीं होने दूंगी.’’

‘‘पर दिव्या की मां, इतनी देर हो चुकी है. दिव्या की उम्र बीती जा रही है. कल को रिश्ते मिलने भी बंद हो जाएंगे. फिर पंडितजी का कहना है कि यह विवाह हो सकता है.’’

‘‘कहने दो उन्हें, एक तो लड़का विधुर, दूसरे, 21 गुण मिलते हैं,’’ तभी वे रुक गईं.

रंभा ने पानी का गिलास जोर से पटका था, ‘‘सिर्फ विधुर है. उस से पूछो, बच्चे कितने हैं? ब्याह दीदी का उसी से करना…गुण मिलना जरूरी है लेकिन…’’

रंभा का एकएक शब्द उमंगों के तरकश से छोड़ा हुआ बाण था जो सीधे दिव्या ने अपने अंदर उतरता महसूस किया.

‘‘क्या बकती है, रंभा, मैं क्या तुम लोगों की दुश्मन हूं? हम तुम्हारे ही भले की सोचते हैं कि कल को कोई परेशानी न हो, इसी से इतनी मिलान कराते हैं,’’ मां की झल्लाहट स्वर में स्पष्ट झलक रही थी.

‘‘और यदि कुंडली मिलने के बाद भी जोड़ा सुखी न रहा या कोई मर गया तो क्या तुम्हारे पंडितजी फिर से उसे जिंदा कर देंगे?’’ रंभा ने चिढ़ कर कहा.

‘‘अरे, कीड़े पड़ें तेरी जबान में. शुभ बोल, शुभ. तेरे बाबूजी से मेरे सिर्फ 19 गुण मिले थे, आज तक हम दोनों विचारों में पूरबपश्चिम की तरह हैं.’’

अम्मांबाबूजी से बहस व्यर्थ जान रंभा उठ गई. दिव्या तो जाने कब की उठ कर अपने कमरे में चली गई थी. दोचार दिन तक घर में विवाह का प्रसंग सुनाई देता रहा. फिर बंद हो गया. फिर किसी नए रिश्ते की बाट जोहना शुरू हो गया. दिव्या का खामोश मन कभीकभी विद्रोह करने को उकसाता पर संकोची संस्कार उसे रोक देते. स्वयं को उस ने मांबाप एवं परिस्थितियों के अधीन कर दिया था.

रंभा के विचार सर्वथा भिन्न थे. उस ने बी.ए. किया था और बैंक की प्रतियोगी परीक्षा में बैठ रही थी. अम्मांबाबूजी के अंधविश्वासी विचारों पर उसे कुढ़न होती. दीदी का तिलतिल जलता यौवन उसे उस गुलाब की याद दिलाता जिस की एकएक पंखड़ी को धीरेधीरे समय की आंधी अपने हाथों तोड़ रही हो.

आज दीवाली की ढलती रात अपने अंतर में कुछ रहस्य छिपाए हुए थी. तभी तो बुझते दीपों के साथ लगी उस की आंख सुबह के हलके शोर से टूट गई. धूप काफी निकल आई थी. रंभा उत्तेजित स्वरों में उसे जगा रही थी, ‘‘दीदी…दीदी, उठो न…देखो तो भला नीचे क्या हो रहा है…’’

‘‘क्या हो रहा है नीचे? कोई आया है क्या?’’

‘‘हां, दीदी, अनिल और उस के घर वाले.’’

‘‘अनिल वही तो नहीं जो तुम्हारा मित्र है और जो मुंसिफ की परीक्षा में बैठा था,’’ दिव्या उठ बैठी.

‘‘हां, दीदी, वही. अनिल की नियुक्ति शाहजहांपुर में ही हो गई है. दीदी, हम दोनों एकदूसरे को पसंद करते हैं. सोचा था शादी की बात घर में चलाएंगे पर कल रात अचानक अनिल के घर वालों ने अनिल के लिए लड़की देखने की बात की तब अनिल ने उन्हें मेरे बारे में बताया.’’

‘‘फिर…’’ दिव्या घबरा उठी.

‘‘फिर क्या? उन लोगों ने तो मुझे देखा था, वह अनिल पर इस कारण नाराज हुए कि उस ने उन्हें इस विषय में पहले ही क्यों नहीं बता दिया, वे और कहीं बात ही न चलाते. वे तो रात में ही बात करने आ रहे थे पर ज्यादा देर हो जाने से नहीं आए. आज अभी आए हैं.’’

‘‘और मांबाबूजी, वे क्या कह रहे हैं?’’ दिव्या समझ रही थी कि रंभा का रिश्ता भी यों आसानी से तय होने वाला नहीं है.

‘‘पता नहीं, उन्हें बिठा कर मैं पहले तुम्हें ही उठाने आ गई. दीदी, तुम उठो न, पता नहीं अम्मां उन से क्या कह दें?’’

दिव्या नीचे पहुंची तो उस की नजर सुदर्शन से युवक अनिल पर पड़ी. रंभा की पसंद की प्रशंसा उस ने मन ही मन की. अनिल की बगल में उस की मां और बहन बैठी थीं. सामने एक वृद्ध थे, संभवत: अनिल के पिताजी. उस ने सुना, मां कह रही थीं, ‘‘यह कैसे हो सकता है बहनजी, आप वैश्य हम बंगाली ब्राह्मण. रिश्ता तो हो ही नहीं सकता. कुंडली तो बाद की चीज है.’’

‘‘पर बहनजी, लड़कालड़की एकदूसरे को पसंद करते हैं. हमें भी रंभा पसंद है. अच्छी लड़की है, फिर समस्या क्या है?’’ यह वृद्ध सज्जन का स्वर था.

‘‘समस्या यही है कि हम दूसरी जाति में लड़की नहीं दे सकते,’’ मां के सपाट स्वर पर मेहमानों का चेहरा सफेद हो गया. अपमान एवं विषाद की रेखाएं उन के अस्तित्व को कुरेदने लगीं. अनिल की नजर उठी तो दिव्या की शांत सागर सी आंखों में उलझ गई. घने खुले बाल, सादी सी धोती और शरीर पर स्वाभिमान की तनी हुई कमान. वह कुछ बोलता इस के पूर्व ही दिव्या की अपरिचित ध्वनि गूंजी, ‘‘यह शादी अवश्य होगी, मां. अनिल रंभा के लिए सर्वथा उपयुक्त वर है. ऐसे घर में जा कर रंभा सुखी रहेगी. चाहे कोई कुछ भी कर ले मैं जाति एवं कुंडली के चक्कर में रंभा का जीवन नष्ट नहीं होने दूंगी.’’

‘‘दिव्या, यह तू…तू बोल रही है?’’ पिता का स्वर आश्चर्य से भरा था.

‘‘बाबूजी, जो कुछ होता रहा, मैं शांत हो देखती रही क्योंकि आप मेरे मातापिता हैं, जो करते अच्छा करते. परंतु 7 वर्षों में मैं ने देख लिया कि अंधविश्वास का अंधेरा इस घर को पूरी तरह समेटे ले रहा है.

‘‘रंभा मेरी छोटी बहन है. उसे मुझ से भी कुछ अपेक्षाएं हैं जैसे मुझे आप से थीं. मैं उस की अपेक्षा को टूटने नहीं दूंगी. यह शादी होगी और जरूर होगी,’’ फिर वह अनिल की मां की तरफ मुड़ कर बोली, ‘‘आप विवाह की तिथि निकलवा लें. रंभा आप की हुई.’’

अब आगे किसी को कुछ बोलने का साहस नहीं हुआ पर रंभा सोच रही थी, ‘दीदी नारी का वास्तविक प्रतिबिंब है जो स्वयं पर हुए अन्याय को तो झेल लेती है पर जब चोट उस के वात्सल्य पर या अपनों पर होती है तो वह इसे सहन नहीं कर पाती. इसी कारण तो ढेरों विवाद और तूफान को अंतर में समेटे सागर सी शांत दिव्या आज ज्वारभाटा बन कर उमड़ आई है.’

Hindi Online Story : कन्‍यादान

‘‘आप ही बताइए मैं क्या करूं, अपनी नौकरी छोड़ कर तो आप के पास आ नहीं सकता और इतनी दूर से आप की हर दिन की नईनई समस्याएं सुलझ भी नहीं सकता,’’ फोन पर अपनी मां से बात करतेकरते प्रेरित लगभग झंझला से पड़े थे.

जब से हम लोग दिल्ली से मुंबई आए हैं, लगभग हर दूसरेतीसरे दिन प्रेरित की अपने मम्मीपापा से इस तरह की हौटटौक हो ही जाती है. चूंकि प्रेरित को अपने मम्मीपापा को खुद ही डील करना होता है, इसलिए मैं बिना किसी प्रतिक्रिया के बस शांति से सुनती हूं.

अब तक गैस पर चढ़ी चाय उबल कर पैन से बाहर आने को आतुर थी, सो, मैं ने गैस बंद की और 2 कपों में चाय डाल कर टोस्ट के साथ एक ट्रे में ले कर बालकनी में आ बैठी. कुछ ही देर में अपना मुंह लटकाए प्रेरित मेरी बगल की कुरसी पर आ कर बैठ गए और उखड़े मूड से पेपर पढ़ने लगे.

‘‘अब क्या हुआ, क्यों सुबहसुबह अपना मूड खराब कर के बैठ गए हो? मौर्निंग वाक करने का कोई फायदा नहीं अगर आप सुबहसुबह ही अपना मूड खराब कर लो,’’ मैं ने प्रेरित को कुछ शांत करने के उद्देश्य से कहा.

‘‘पापा कल पार्क में गिर पड़े, मां को गठिया का दर्द फिर से परेशान कर रहा है. अभी 15 दिन पहले ही तो लौटा हूं कानपुर से, डाक्टर से पूरा चैकअप करवा कर और जहां तक हो सकता था, सब इंतजाम कर के आया था. जैसेजैसे उम्र बढ़ेगी, नितनई समस्याएं तो सिर उठाएंगी ही न. यहां आने को वे तैयार नहीं. बिट्टू के पास जाएंगे नहीं तो क्या किया जाए? नौकरी करूं या हर दिन इन की समस्याएं सुलझता रहूं? इस समस्या का कोई सौल्यूशन भी तो दूरदूर तक नजर नहीं आता,’’ प्रेरित कुछ झंझलाते हुए बोले.

‘‘चलो, अब शांत हो जाओ और अच्छे मन से औफिस की तैयारी करो. आज वैसे भी तुम्हारी इंपौर्टेंट मीटिंग है. कल वीकैंड है, इन 2 दिनों में हमें अम्माबाबूजी की समस्याओं का कोई परमानैंट हल निकालना पड़ेगा वरना इस तरह की समस्याएं हर दूसरेतीसरे दिन उठती रहेंगी,’’ यह कह कर मैं ने प्रेरित को कुछ शांत करने का प्रयास किया और इस के बाद हम दोनों ही अपनेअपने औफिस की तैयारी में लग गए थे.

मैं और प्रेरित दोनों ही आईसीआईसीआई बैंक में सीनियर मैनेजर की पोस्ट पर हैं. अभी हमें मुंबई शिफ्ट हुए 3 माह ही हुए थे. सो, बहुत अच्छी तरह मुंबई शहर से परिचित नहीं थे. हमारी इकलौती बेटी आरुषी 3 माह पहले ही 12वीं पास कर के वीआईटी वेल्लोर से इंजीनियरिंग करने चली गई. उस के जाने के बाद हम अकेले रह गए थे. हम तो अभी तक उस के जाने के दुख में ही डूबे रहते यदि हमारा ट्रांसफर मुंबई न हुआ होता. ट्रांसफर हो जाने पर शिफ्ंिटग में इतने अधिक व्यस्त हो गए हम दोनों कि बेटी का जाना तक भूल गए यद्यपि सुबहशाम उस से बात हो जाती थी.

हम दोनों को ही 10 बजे तक निकलना होता है, इसलिए 8 बजे मेड आ जाती है. टाइम के अनुसार सुशीला मेड आ गई थी. उसे नाश्ताखाने की कुछ जरूरी हिदायतें दे कर मैं बाथरूम में घुस गई.

नहातेनहाते वह दिन भी याद आ गया जब मैं पहली बार प्रेरित से मिली थी. मैं और प्रेरित दोनों ही इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से थे और अब भोपाल के आईआईएएम कालेज से फौरेस्ट मैनेजमैंट में एमबीए कर रहे थे. एक दिन कालेज के ग्रुप पर मैं ने एक मैसेज देखा, ‘इफ एनीवन इंट्रेस्टेड फौर यूपीएससी एग्जाम, प्लीज डी एम टू मी.’

मेरे मन के किसी कोने में भी यूपीएससी बसा हुआ था, सो, मैं ने दिए गए नंबर पर मैसेज किया और एक दिन जब कालेज की लाइब्रेरी में हम दोनों मिले तो अपने सामने लंबी कदकाठी, गौरवर्णीय, सलीके से ड्रैसअप किए सुदर्शन नौजवान को देखती ही रह गई. इस के बाद तो कभी कोचिंग, कभी नोट्स और कभी तैयारी के बहाने मिलनाजुलना प्रारंभ हो गया था और कुछ ही दिनों के बाद हम दोनों के बीच से यूपीएससी तो गायब हो गया और रह गया हमारा प्यार, एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें, एकदूसरे की तारीफ में पढ़े गए कसीदे और भविष्य की लंबीचौड़ी प्लानिंग.

भोपाल के कलिया सोत डैम के पास चारों ओर हरीतिमा से ओतप्रोत एक छोटी सी पहाड़ी पर नेहरू नगर में स्थित आईआईएफएम कालेज में हमारा प्यार पूरे 2 साल परवान चढ़ता रहा. कोर्स के पूरा होतेहोते हम दोनों का ही प्लेसमैंट आईसीआईसीआई बैंक में हो गया था और अब हम दोनों ही विवाह के बंधन में बंध जाना चाहते थे. चूंकि हम दोनों की जाति ब्राह्मण ही थी, इसलिए आश्वस्त थे कि विवाह में कोई बाधा नहीं आएगी. मैं अपने मातापिता की इकलौती संतान थी और प्रेरित 2 भाई थे. उन का छोटा भाई प्रेरक (बिट्टू) मैडिकल की पढ़ाई कर रहा था. प्रेरित की मां एक होममेकर थीं और पापा एक राजपत्रित अधिकारी के पद से इस वर्ष ही रिटायर हुए थे.

मेरी मां एक मनोवैज्ञानिक काउंसलर और पापा बैंक मैनेजर थे. अभी उन के रिटायरमैंट में 2 वर्ष थे. हम दोनों ने ही घर में अपने प्यार के बारे में पहले ही बता दिया था. सो, अब औपचारिक मोहर लगनी ही बाकी थी. हम दोनों की मम्मियों ने फोन पर बातचीत भी कर ली थी. इसी सिलसिले में एक दिन प्रेरित के मम्मीपापा कानपुर से इंदौर मुझे देखने या यों कहें कि विधिवत रूप से गोद भराई की रस्म करने आए.

उन लोगों के आने की सूचना मात्र से ही मांपापा खुशी से दोहरे हुए जा रहे थे आखिर उन की इकलौती संतान के हाथ पीले होने का प्रथम चरण का आयोजन जो होने जा रहा था. आने वाले मेहमानों के लिए पूरे घर को पापा ने फूलों से सजा दिया था. मम्मी ने कांता मेड के साथ मिल कर डाइनिंग टेबल पर न जाने कितने व्यंजनों की लाइन लगा दी थी जिन के मसालों की महक से किचन ही नहीं, पूरा घर ही महक उठा था.

अतिथियों को कोई परेशानी न हो, इस के लिए पापा ने हमारे घर के पास में ही स्थित होटल रेडिसन में उन के रुकने की व्यवस्था कर दी थी. होटल से सुबह ही तैयार हो कर प्रेरित और उस के मम्मीपापा हमारे यहां आ गए थे.

चायनाश्ते के बाद मेरी गोदभराई की रस्म के तहत प्रेरित की मम्मी ने साथ लाए फल, मिठाई और कपड़ों के साथसाथ शगुन के नाम पर एक सोने की चेन मेरे गले में डाल दी थी. लंच के बाद जब सब लोग हंसीखुशी के माहौल में बातचीत कर रहे थे तभी प्रेरित की मम्मी मेरे मांपापा की ओर मुखातिब हो कर बोलीं, ‘आप लोग बुरा न मानें तो एक बात पूछ सकती हूं?’

 

‘जी कहिए, बुरा मानने की क्या बात है. अब हम रिश्तेदार होने जा रहे हैं तो संकोच कैसा?’ पापा ने मुसकराते हुए कहा.

‘अब ये त्रिपाठीजी (प्रेरित के पापा) तो रिटायर हो गए हैं और आप के रिटायरमैंट में अभी वक्त है तो आफ्टर रिटायरमैंट आप लोगों ने क्या सोचा है?’

‘जी, मैं कुछ समझ नहीं?’ पापा ने कुछ चौंकते हुए से कहा.

‘मेरा मतलब है कि अब हमारे तो 2 बेटे हैं इसलिए हमें तो कोई चिंता नहीं है बुढ़ापे की, कभी इस के पास और कभी उस के पास रहेंगे. बस, इसी में जीवन कट जाएगा पर आप की तो एक ही बेटी है, सो रिटायरमैंट के बाद वृद्धावस्था में आप लोगों ने कहां रहने का प्लान बनाया है. यहीं इंदौर में या बेटी के पास?’ प्रेरित की मम्मी के इस प्रश्न को सुन कर मम्मीपापा ही नहीं, मैं और प्रेरित भी बुरी तरह चौंक गए थे. कुछ देर बाद मुझे समझ आया कि प्रेरित के मम्मीपापा घुमाफिरा कर जानना चाह रहे थे कि विवाह के बाद मेरे मम्मीपापा की जिम्मेदारी कहीं उन के लाड़ले बेटे को न उठानी पड़ जाए. अपनी मम्मी के इस बेतुके प्रश्न पर प्रेरित का चुप रह जाना मुझे अखर गया और उन के इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए जैसे ही मैं ने अपना मुंह खोलना चाहा था कि मेरी मां ने आंख के इशारे से मुझे रोक दिया था.

‘मां खुद बड़े ही शांतभाव से बोलीं, ‘जी देखिए, पहले तो अभी तो हम ने इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं है, पर हां, उम्मीद करता हूं कि जीवन के अंतिम दिनों तक हम इतना फिट रहें कि हमें किसी का मुंह न देखना पड़े. फिर आज के जमाने में नौकरीपेशा लोगों के लिए बेटा और बेटी में फर्क ही कहां रह गया है क्योंकि दोनों ही तो अपनी नौकरी पर चले जाते हैं. न आप का बेटा आप के पास रहेगा और न हमारी बेटी. हां, जरूरत पड़ने पर मेरी बेटी ही मेरा सबकुछ है और इसे हम ने पढ़ायालिखाया भी जीभर के है. तो, देखना तो इसे ही पड़ेगा. वैसे, आप निश्ंिचत रहें, हम दोनों ही इंदौरप्रेमी हैं और यहां से कहीं जाने वाले नहीं.’

मम्मी के इतने नपेतुले और संतुलित शब्दों में दिए गए उत्तर से मैं तो प्रभावित ही हो गई थी पर अकेले में प्रेरित से मिलते ही फट पड़ी थी, ‘‘यह सब क्या है, प्रेरित? आज के समय में जब जीवन के हर क्षेत्र में महिलाएं नितनई बुलंदियों के झंडे गाड़ रही हैं, मातापिता अपनी बेटियों को पढ़ानेलिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे तो ऐसे में इस तरह की बातें, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहीं. मुझे नहीं पता था कि तुम्हारे पेरैंट्स इस प्रकार की सोच रखते हैं. जरूरत पड़ने पर मैं अपने मांपापा का सहारा नहीं बनूंगी तो कौन बनेगा. मैं पहले ही स्पष्ट किए देती हूं कि जिस तरह तुम्हारे मातापिता के लिए तुम ठीक हो वैसे ही अपने मातापिता के लिए मैं हूं, उन के लिए कुछ भी करने के लिए न मैं तुम्हें रोकूंगी और न ही मेरे मातापिता के लिए तुम मुझे रोकोगे और भविष्य में अपनेअपने मातापिता को हम खुद ही डील करेंगे. हां, जहां आवश्यकता होगी, हम एकदूसरे की मदद करेंगे.’

‘मुझे खुद इस बारे में कुछ पता नहीं था कि वे लोग कुछ दकियानूसी सोच वाले हैं. तुम जरा भी चिंता मत करो, बाद में सब ठीक हो जाएगा.’ यह कह कर प्रेरित ने मुझे उस समय बहला दिया था और इस के कुछ दिनों बाद ही मैं प्रेरित की दुलहन बन कर कानपुर आ गई थी. थोड़े से प्रयास से प्रेरित ने हम दोनों की पोस्ंिटग भी कानपुर ही करवा ली थी.

मेरे आने के बाद मांपापा अकेले हो गए थे लेकिन सब से अच्छी बात यह थी कि अपने जौब के अलावा दोनों ने ही गीतसंगीत, बागबानी और कुकिंग जैसे अनेक शौक पाल रखे थे, सो, दोनों ही बहुत व्यस्त रहते थे. इस के अलावा दोनों ही मौर्निंग वाक और व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल किए हुए थे. सो, फिजिकली भी वे बेहद फिट थे.

वहीं, प्रेरित के परिवार में इस सब से कोई लेनादेना नहीं था. सब देर तक सोते. यही नहीं, सभी कनपुरिया अंदाज में खाने के भी बहुत शौकीन थे और इसी सब का नतीजा था कि मम्मीजी और पापाजी दोनों ही बीपी, शुगर और ओबेसिटी के शिकार थे और आएदिन डाक्टर के यहां चक्कर लगाते थे. मैं अभी इस सब में ही उलझ थी कि बाथरूम के दरवाजे पर प्रेरित की आवाज आई, ‘‘तुम कर क्या रही हो, सुशीला दीदी पूरा काम कर के चली गईं, मैं औफिस के लिए रेडी हो गया और तुम हो कि नहाने में ही लगी हो. औफिस चलना है या नहीं?’’

‘‘अरे, समय का पता ही नहीं चला. बस, दो मिनट में आई,’’ कह कर मैं ने अपने नहाने व विचारों को बाइंडअप किया और बाहर आ कर फटाफट दोनों का टिफिन तैयार कर के नाश्ता टेबल पर लगा दिया और तैयार हो कर औफिस के लिए निकल पड़े. अभी मैं कार में बैठी ही थी कि मां का फोन आ गया. हम दोनों मां से बात कर सकें, इस के लिए मैं ने फोन स्पीकर पर डाल दिया.

‘‘कैसे हो बच्चो, तुम लोगों को एक गुड न्यूज देनी थी,’’ मां बोलीं.

‘‘हम लोग बिलकुल अच्छे हैं, मां. बस, अभी औफिस के लिए निकले ही हैं. कौन सी गुड न्यूज है, मां, जल्दी बताइए. आप पहले न्यूज बताया कीजिए, फिर और बातें किया कीजिए,’’ मैं ने आतुरता से मां से कहा.

‘‘अगले हफ्ते तेरे पापा का सीनियर सिटीजन क्लब की तरफ से सिक्किम में एक सैमिनार है. सो, हम दोनों ही जा रहे हैं. सैमिनार के बाद एक हफ्ते और रुक कर घूमेंगे, फिर वापस आएंगे. कल ही पता चला तो आज तुम्हें बता दिया.’’

‘‘वाऊ मां, यह तो सच में बहुत अच्छी न्यूज है. जाइएजाइए, खूब घूमिएगा और रोज मुझे पिक्स भेजिएगा. ठीक है, मां. अभी फोन रखती हूं. शाम को घर पहुंच कर बात करूंगी,’’ यह कह कर मैं ने फोन रख दिया. इस बीच प्रेरित बिलकुल शांत थे मानो मेरे मातापिता की अपने मातापिता से तुलना कर रहे हों.

मैं प्रेरित से कुछ बोल पाती, इस से पहले ही कार पार्किंग में लग चुकी थी. मैं और प्रेरित दोनों ही एकदूसरे को बाय कह कर अपनीअपनी केबिन की तरफ बढ़ गए थे. औफिस के कामों में जो हम उलझे तो शाम को 7 बजे ही मिले. वापस आते समय शरीर और मन इतना अधिक थक जाता है कि हम दोनों आमतौर पर शांत ही रहते हैं. घर आ कर डिनर कर के जो बैड पर लेटी तो कुछ अधूरे पन्ने फिर फड़फड़ाने लगे थे.

‘पूर्णशिक्षित होने के बाद भी प्रेरित के मम्मीपापा, बेटाबेटी के फर्क से जरा भी अछूते नहीं थे. बेटे के विवाह में खासे दानदहेज की भी उम्मीद थी उन्हें लेकिन प्रेरित की पसंद ने उन के अरमानों पर पानी फेर दिया था क्योंकि मैं और मम्मी दोनों ही दहेज की सख्त विरोधी थीं और मम्मी ने शुरू में ही स्पष्ट शब्दों में कह दिया था-

‘देखिए बहनजी, हम अपनी बेटी के विवाह में न तो दहेज देंगे और न ही हम उस का कन्यादान करेंगे.’

‘अरेअरे, यह क्या कह रहीं हैं आप, ऐसे विवाह में दहेज की तो हम भी उम्मीद नहीं करते लेकिन कन्यादान तो एक जरूरी रस्म है जिसे हर लड़की के मातापिता करते हैं ताकि उन्हें पुण्य प्राप्त हो सके. क्या आप उस पुण्य को प्राप्त नहीं करना चाहेंगे?’ प्रेरित के मम्मीपापा ने कहा.

‘मेरी बेटी कोई दान की वस्तु नहीं है जो मैं कन्यादान की रस्म करूं. मेरी बेटी हमारे घर की शान, हमारा अभिमान और गरूर है. हमारी बेटी ने हमें मातापिता होने का गौरव प्रदान किया है. कोई अपने गरूर और गौरव का दान करता है भला. कन्यादान की जगह हम प्रेरित और प्रेरणा को एकदूसरे का हाथ सौंप कर पाणिग्रहण संस्कार करेंगे क्योंकि विवाह के बाद जीवन के समस्त उत्तरदायित्वों का निर्वहन इन्हें एकसाथ मिल कर करना है.’

मेरी मम्मी की इतनी तर्कपूर्ण बातें सुन कर प्रेरित के मम्मीपापा शांत हो गए थे और यही कारण था जिस से वे हमारे विवाह को राजी तो हो गए थे पर उतने खुश नहीं थे क्योंकि विवाह के बाद जब प्रेरित की ताईजी ने प्रेरित की मम्मी से पूछा, ‘बहू तो बढि़या है पर दानदहेज में क्याक्या मिला, वह भी दिखाओ या उसे सात परदों में रखने का विचार है.’

‘अरे जिज्जी, कैसी बातें करती हो. जो मिला, सो आप के सामने है. आप की जानकारी के लिए बता दें कि बहुरिया और उस के मम्मीपापा दानदहेज के सख्त विरोधी हैं,’ प्रेरित की मम्मी ने मेरी तरफ इशारा कर के निराशाभरे स्वर में कहा था.

‘हम ने तो सुना है कि बहू इकलौती है, कोई भाई नहीं है इस के तो बबलू (प्रेरित का घर का नाम) तुम्हें देखे कि आपन सासससुर को…’’ ताईजी कुछ कम नहीं थीं, सो, मम्मीजी की दुखती रग पर हाथ रख दिया था.

‘जिज्जी देखो, हमार तो दुई बिटवा हैं. बुढ़ापा तो बहुत आराम से कटे. चिंता तो वे करें जिन के बिटवा नहीं है. हमें किसी और के सहारे की का जरूरत. अब इस ब्याह में तो अरमान पूरे न हुए, बिट्टू के ब्याह में देखना अपने सारे अरमान पूरे करूंगी,’’ मम्मीजी ने लगभग मुझे सुनाते हुए कहा था.

विवाह के बाद हम दोनों हनीमून के लिए साउथ घूमने गए. मुन्नार, कन्याकुमारी, मदुरई जैसी प्राकृतिक छटाओं से भरपूर केरल को घूम कर हम दोनों ने दोनों माताओं के लिए कांजीवरम साडि़यां खरीदीं. जब मम्मीजी को साड़ी दी तो वे बड़ी खुश हुईं पर साथ ही यह बोलीं, ‘अपनी मम्मी के लिए नहीं लाईं? वैसे हमारे कानपुर में तो बेटियों से कुछ लिया नहीं जाता.’

‘जी, मम्मीजी, लाई हूं न, बिलकुल आप के जैसी, आप की ही तरह. वे भी मेरी प्यारी मां हैं न.’

मन के अंदर उठते तूफानी गुबार को किसी तरह शांत करते हुए मैं ने कहा था. इस के बाद हम दोनों ने अपने बैंक को जौइन कर लिया और जिंदगी बुलेट ट्रेन की स्पीड से दौड़ने लगी थी. दो वर्षों बाद मैं ने हमारे प्यार की निशानी आरुषी को जन्म दिया. एक बार फिर हमारी जिंदगी खुशियों से गुलजार हो उठी थी. पापामम्मी ढेर सारे साजोसामान के साथ अपनी नातिन से मिलने आए थे. इस के 4 वर्षों बाद घर का घटनाक्रम बहुत तेजी से बदला. हमारा प्रमोशन हुआ तो कानपुर से दिल्ली ट्रांसफर हो गया. प्रेरित के भाई प्रेरक का मैडिकल पूरा हो गया और उन की पोस्ंिटग लखनऊ के के जी मैडिकल कालेज में हो गई. मम्मीपापाजी अपने डाक्टर बेटे के लिए लड़की खोजने में लग गए. मेरी शादी में अधूरे रह गए अपने सभी अरमानों को मानो अब वे पूरा कर लेना चाहते थे. इस बीच जितने भी रिश्ते आए उन में जो मम्मीजी, पापाजी की कसौटियों पर खरे उतरे उन्हें शौर्ट लिस्ट कर के रख लिया गया था ताकि भैया जब छुट्टी में आएं तो उन का रिश्ता पक्का किया जा सके. जब भैया इस बार दीवाली पर आए तो पापाजी ने खुश होते हुए कुछ लड़कियों के फोटो उन के सामने रखते हुए कहा, ‘बेटा, अब तेरा ब्याह करना बचा है. बहुत सारे रिश्ते आए थे. उन में से जो हमें अच्छे लगे उन की फोटो रख कर शेष वापस कर दी हैं. अब इन में से तुम जिसे बताओ उसे ही फाइनल कर देते हैं.’

‘ये सब क्या है, पापा, मुझ से पूछे बिना आप लोगों ने किसी से बात क्यों कर ली? किसी भी बात को आगे बढ़ाने से पहले आप लोगों को एक बार मुझ से पूछना तो था न?’ प्रेरक भैया ने एकदम आवेश में कहा तो मम्मीजी बोलीं, ‘अरे, तो हम ने कौन सी फाइनल कर दी है. तू देख ले, जो तुझे अच्छी लगे, बता दे. सब का अच्छाखासा खातापीता परिवार है, जानेमाने पैसे वाले लोग हैं और पढ़ीलिखी लड़की है. अच्छा दानदहेज देने को भी तैयार हैं ये सब. शर्माजी की लड़की तो 2 भाइयों के बीच अकेली बहन है, सो, प्रेरित की तरह ससुराल की भी कोई जिम्मेदारी नहीं है.’

‘मैं कोई फोटोवोटो नहीं देखने वाला क्योंकि मैं अपने साथ की ही एक लड़की सुगंधा से प्यार करता हूं जो मेरी ही तरह एक डाक्टर है. मैं उसी से शादी भी करूंगा. इसलिए आप ने जिन से भी बात की है उन्हें मना कर दें और ये फोटो भी वापस कर दें. हां, यह भी बता दूं कि सुगंधा जाति से ठाकुर है.’

इतना सुनते ही पापाजी आगबबूला हो उठे थे, ‘दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा? तुम्हारे बड़े भाई ने अपनी पसंद से शादी की तो तुम कैसे पीछे रहोगे. अरे एक बार यह तो सोचा होता कि हमारे भी कुछ अरमान होंगे. आजकल के बच्चों को जरा पढ़नेलिखने बाहर क्या भेज दो, उन के दिमाग सातवें आसमान पर पहुंच जाते हैं. मेरे जीतेजी तो यह ब्याह नहीं हो सकता.’

इस के बाद घर में तूफान सा आ गया था. प्रेरक भैया अवकाश समाप्त होने के बाद चले गए थे. इस के बाद जब अपने घुटने के दर्द के इलाज के लिए मम्मीजी और पापाजी हमारे पास दिल्ली आए तो प्रेरित से अपने भाई को समझने के लिए कहा.

प्रेरित बोले, ‘आप लोग समझते क्यों नहीं, अब जमाना बदल गया है. आप लोगों को भी अपनी सोच बदलनी पड़ेगी. यदि बिट्टू को कोई परेशानी नहीं है तो हम सब को भी कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. आखिर अपनी जिंदगी तो उसे ही जीनी है, न कि हमें. मेरी मानिए और अगले मुहूर्त में दोनों की शादी करवा दीजिए.’

‘हांहां, तुम तो उस का पक्ष लोगे ही. चिनगारी तो तुम्हीं ने लगाई थी न. तुम ने कम से कम अपनी जातिबिरादरी का तो ध्यान रखा था, यह तो और दस कदम आगे निकला,’ मम्मीजी ने हम दोनों पर ही कटाक्ष करते हुए कहा था.

इस के बाद कुछ दिनों तक घर में उन के ब्याह की चर्चाएं समाप्त सी हो गई थीं. एक वर्ष तक मानमनौवल होती रही. पर कहते हैं न, कि इश्क पर जोर नहीं. सो, आखिरकार बड़े बेमन से मम्मीपापाजी उन की शादी को राजी हुए.

पर रिटायरमैंट की सारी प्लानिंग को धराशायी होते देख अब दोनों ही घोर निराशा से घिर गए थे. बीमार तो पहले ही रहते थे, अब तनाव भी होने लगा था. सो गठिया, सर्वाइकल स्पौंडिलाइसिस जैसी अनेक बीमारियों ने भी आ घेरा था. सब से बड़ी समस्या यह थी कि मम्मीजी कहीं भी एडजस्ट नहीं कर पाती थीं. उन्हें कानपुर के सिवा कहीं अच्छा नहीं लगता था.

हम जब तक दिल्ली में थे, बमुश्किल 15 दिनों तक हमारे पास रह कर वापस चले जाते थे. अब यहां मुंबई के तो नाम से ही घबराने लगते हैं वे दोनों. यह सब सोचतेसोचते कब मेरी आंख लग गई, पता ही नहीं चला. अगले दिन शनिवार था, सो, थोड़े आराम से ही उठी. सुबह के काम निबटा कर बैठी ही थी कि इंदौर से मां का फोन आ गया, ‘‘कितनी बिजी हो गई है हमारी बिटिया कि मांपापा से बात करने की भी फुरसत नहीं.’’

‘‘अरे हां मां, रात को थक गई थी तो सो गई थी. आप बताइए तैयारी शुरू कर दी घूमने की. मां, वहां पहाड़ी एरिया है, स्पोर्ट्स शूज जरूर ले जाइएगा. और हां, अपना और पापा का एकएक स्वेटर भी रख लेना, ठंडक रहेगी वहां.’’

‘‘अरे हां, रचना, सब रख लूंगी. तुम लोग अपना ध्यान रखो और हां, हम दोनों आज अपने ग्रुप के साथ मांडू घूमने जा रहे हैं. नाइट स्टे भी वहीं करेंगे. हो सकता है वहां नैटवर्क न मिल पाए, सो तुम परेशान न होना. परसों लौट कर बात करते हैं,’’ कह कर मां ने फोन रख दिया.

जब से पापा रिटायर हुए हैं, उन का अपने यारदोस्तों का एक ग्रुप है और सभी एकसाथ घूमतेफिरते और लाइफ को एंजौय करते हैं. मैं सुबह से नोटिस कर रही थी कि जब से मम्मीजी का फोन आया है, प्रेरित बहुत उदास और चुप हैं मानो उन के मन में कुछ आत्ममंथन चल रहा हो. अभी भी मेरी बगल में टीवी खोल कर बैठे हैं पर मन कहीं और है. सो, मैं ने उन्हें छेड़ते हुए कहा, ‘‘क्या हुआ, आज छुट्टी वाले दिन भी शक्ल पर बारह क्यों बजा रखे हैं?’’

‘‘कुछ नहीं. बस, ऐसे ही. कल से दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा. कल से मांबाबूजी के शब्द ही कानों में गूंज रहे हैं. मैं उन की दकियानूसी सोच से परिचित हूं. यह भी जानता हूं कि वे आज भी अपने मनमुताबिक जीना पसंद करते हैं पर यह भी कटु सत्य है कि वे मेरे मातापिता हैं और मुझे यहां तक पहुंचाने में उन्होंने एड़ीचोटी का जोर लगाया है पर आज जब वे तकलीफ में हैं तो मैं बेबस हूं. मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं और कैसे करूं. उन के लिए कुछ न कर पाने का गिल्ट मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है,’’ कहतेकहते प्रेरित की आंखें भर आईं.

‘‘ओह, इतनी सी बात है. सच कहूं तो मैं खुद तुम से इस बारे में बात करना चाह रही थी. प्रेरित, मातापिता चाहे तुम्हारे हों या मेरे, आखिर वे हमारे मातापिता हैं और आज हम जो कुछ भी हैं अपने मातापिता की बदौलत ही हैं. इसलिए आज उन्हें जब हमारी जरूरत है तो उन्हें अकेले छोड़ना सही नहीं है. यों भी इतने बड़े फ्लैट में हम 2 ही तो रहते हैं. आरुषी के जाने के बाद पूरे घर में हमेशा सन्नाटा पसरा रहता है और औफिस से आने के बाद घर मानो काटने को दौड़ता है. वे रहेंगे तो घर भराभरा रहेगा, तुम और मैं टैंशनफ्री रहेंगे और घर उन की आपस की नोंकझंक से गुलजार रहेगा.’’

‘‘पर क्या वे यहां एडजस्ट हो पाएंगे?’’ प्रेरित ने कुछ सशंकित होते हुए कहा.

‘‘प्रेरित, इस उम्र में उन्हें नहीं, हम दोनों को एडजस्ट करना होगा और जब हम दोनों उन के साथ कंफर्टेबल और एडजस्ट हो जाएंगे तो वे तो खुदबखुद ही एडजस्ट हो जाएंगे. तुम कानपुर जा कर उन्हें ले आओ. यह सही है कि वे आने में आनाकानी करेंगे पर उन की सही देखभाल भी यहीं हो पाएगी, यह भी कटु सत्य है.

‘‘शुरुआत में हम दोनों मिल कर कुछ छुट्टियां ले लेंगे और फिर पूरे दिन के लिए एक मेड लगा देंगे जिस से उन के लिए रहना थोड़ा आसान हो जाएगा. सुबहशाम उन्हें नीचे ले चला करेंगे, वीकैंड पर उन्हें अपने साथ घुमाने ले चला करेंगे. फिर देखना, धीरेधीरे उन्हें अच्छा लगने लगेगा. यहां अच्छे डाक्टर्स भी हैं जिन से उन का इलाज करवा देंगे. तुम आज ही फ्लाइट से बुकिंग कर लो और उन्हें ले आओ. उन के यहां आ जाने से हम दोनों भी अपने काम पर फोकस कर पाएंगे.’’ मैं ने जब प्रेरित के सामने यह प्रस्ताव रखा तो प्रेरित खुश हो कर बोले, ‘‘रचना, ले तो मैं आऊंगा, बस, यहां तुम संभाल लेना.’’

‘‘तुम चिंता मत करो. बस, उन्हें लाने के बारे में सोचो,’’ मैं ने यह कहा तो प्रेरित तुरंत अपना लैपटौप खोल कर बैठ गए और बोले, ‘‘मैं अभी बुकिंग करता हूं. मुझे तुम पर हमेशा इसीलिए गर्व होता है क्योंकि तुम बड़ी से बड़ी समस्या को चुटकियों में हल कर देती हो. देखो न, तुम ने तो दो मिनट में मेरी इतनी बड़ी समस्या हल कर दी. मैं अब खुद को इतना हलका महसूस कर रहा हूं कि बता नहीं सकता.’’

‘‘प्रेरित, मातापिता चाहे मेरे हों या तुम्हारे, बुढ़ापे में उन की जरूरतों को समझना और उन के अनुसार खुद को बदलना हमारी जिम्मेदारी है न कि उन की. हां, एक बात तो माननी पड़ेगी कि यहां पर मेरे मम्मीपापा का रिटायरमैंट प्लान सक्सैस हो गया,’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘इस में तो कोई शक नहीं. और हां, हमें भी अभी से उन का प्लान ही फौलो करना चाहिए,’’ प्रेरित ने यह कहते हुए मुझे अपने आलिंगन में भर लिया और इस के बाद हम दोनों ही अपनीअपनी तैयारियों में जुट गए. प्रेरित मम्मीजी, पापाजी को कानपुर से मुंबई लाने की और मैं खुद में और घर में कुछ बदलावों की.

Motivational Story : मां की सहेली

लेखक –  चंद्रभान ‘राही’

एक वक्त था जब गायत्री के सामने प्रिया उन की छोटी सी प्यारी बच्ची थी और आज वही प्रिया मां के रूप में अपनी बच्ची के सामने खड़ी थी. लेकिन ममता का रूप कभी नहीं बदलता. जो ममता गायत्री के मन में प्रिया के लिए थी वही आज प्रिया के हृदय में अपनी बेटी के लिए भी.

दालान से गायत्री ने अपनी बेटी की चीख सुनी और फिर तेजी से पेपर वेट के गिरने की आवाज आई तो उन के कान खड़े हो गए. उन की बेटी प्रिया और नातिन रानी में जोरों की तूतू, मैंमैं हो रही थी. कहां 10 साल की बच्ची रानी और कहां 35 साल की प्रिया, दोनों का कोई जोड़ नहीं था. एक अनुभवों की खान थी और दूसरी नादानी का भंडार, पर ऐसे तनी हुई थीं दोनों जैसे एकदूसरे की प्रतिद्वंद्वी हों.

‘‘आखिर तू मेरी बात नहीं सुनेगी.’’

‘‘नहीं, मैं 2 चोटियां करूंगी.’’

‘‘क्यों? तुझे इस बात की समझ है कि तेरे चेहरे पर 2 चोटियां फबेंगी या 1 चोटी.’’

‘‘फिर भी मैं ने कह दिया तो कह दिया,’’ रानी ने अपना अंतिम फैसला सुना डाला और इसी के साथ चांटों की आवाज सुनाई दी थी गायत्री को.

रात गहरा गई थी. गायत्री सोने की कोशिश कर रही थीं. यह सोते समय चोटी बांधने का मसला क्यों? जरूर दिन की चोटियां रानी ने खोल दी होंगी. वह दौड़ कर दालान में पहुंचीं तो देखा कि प्रिया के बाल बिखरे हुए थे. साड़ी का आंचल जमीन पर लोट रहा था. एक चप्पल उस ने अपने हाथ में उठा रखी थी. बेटी का यह रूप देख कर गायत्री को जोरों की हंसी आ गई. मां की हंसी से चिढ़ कर प्रिया ने चप्पल नीचे पटक दी. रानी डर कर गायत्री के पीछे जा छिपी.

‘‘पता नहीं मैं ने किस करमजली को जन्म दिया है. हाय, जन्म देते समय मर क्यों नहीं गई,’’ प्रिया ने माथे पर हाथ मार कर रोना शुरू कर दिया.

अब गायत्री के लिए हंसना मुश्किल हो गया. हंसी रोक कर उन्होंने झिड़की दी, ‘‘क्या बेकार की बातें करती है. क्या तेरा मरना देखने के लिए ही मैं जिंदा हूं. बंद कर यह बकवास.’’

‘‘अपनी नातिन को तो कुछ कहती नहीं हो, मुझे ही दोषी ठहराती हो,’’ रोना बंद कर के प्रिया ने कहा और रानी को खा जाने वाली आंखों से घूरने लगी.

‘‘क्या कहूं इसे? अभी तो इस के खेलनेखाने के दिन हैं.’’

इस बीच गायत्री के पीछे छिपी रानी, प्रिया को मुंह चिढ़ाती रही.

प्रिया की नजर उस पर पड़ी तो क्रोध में चिल्ला कर बोली, ‘‘देख लो, इस कलमुंही को, मेरी नकल उतार रही है.’’

गायत्री ने इस बार चौंक कर देखा कि प्रिया अपनी बेटी की मां न लग कर उस की दुश्मन लग रही थी. अब उन के लिए जरूरी था कि वह नातिन को मारें और प्रिया को भी कस कर फटकारें. उन्होंने रानी का कान ऐंठ कर उसे साथ के कमरे में धकेल दिया और ऊंची आवाज में बोलीं, ‘‘प्रिया, रानी के लिए तू ऐसा अनापशनाप मत बका कर.’’

प्रिया गायत्री की बड़ी लड़की है और रानी, प्रिया की एकलौती बेटी. गरमियों में हर बार प्रिया अपनी बेटी को ले कर मां के सूने घर को गुलजार करने आ जाती है.

गायत्री ने अपने 8 बच्चों को पाला है. उन की लड़कियां भी कुछ उसी प्रकार बड़ी हुईं जिस तरह आज रानी बड़ी हो रही है. बातबात पर तनना, ऐंठना और चुप्पी साध कर बैठ जाना जैसी आदतें 8-10 वर्ष की उम्र से लड़कियों में शुरू होने लगती हैं. खेलने से मना करो तो बेटियां झल्लाने लगती हैं. पढ़ने के लिए कहो तो काटने दौड़ती हैं. घर का थोड़ा काम करने को कहो तो भी परेशानी और किसी बात के लिए मना करो तो भी.

 

प्रिया के साथ जो पहली घटना घटी थी वह गायत्री को अब तक याद है. उन्होंने पहली बार प्रिया को देर तक खेलते रहने के लिए चपत लगाई थी तो वह भी हाथ उठा कर तन कर खड़ी हो गई थी. गायत्री बेटी का वह रूप देख कर अवाक् रह गई थीं.

प्रिया को दंड देने के मकसद से घर से बाहर निकाला तो वह 2 घंटे का समय कभी तितलियों के पीछे भागभाग कर तो कभी आकाश में उड़ते हवाई जहाज की ओर मुंह कर ‘पापा, पापा’ की आवाज लगा कर बिताती रही थी पर उस ने एक बार भी यह नहीं कहा कि मां, दरवाजा खोल दो, मैं ऐसी गलती दोबारा नहीं करूंगी.

घड़ी की छोटी सूई जब 6 को भी पार करने लगी तब गायत्री स्वयं ही दरवाजा खोल कर प्रिया को अंदर ले आई थीं और उसे समझाते हुए कहा था, ‘ढीठ, एक बार भी तू यह नहीं कह सकती थी कि मां, दरवाजा खोल दो.’

प्रिया ने आंखें मिला कर गुस्से से भर कर कहा था, ‘मैं क्यों बोलूं? मेरी कितनी बेइज्जती की तुम ने.’

अपने नन्हे व्यक्तित्व के अपमान से प्रिया का गला भर आया था. गायत्री हैरान रह गई थीं. उस दिन के बाद से प्रिया का व्यवहार ही जैसे बदल सा गया था.

ऐसी ही एक दूसरी घटना गायत्री को नहीं भूलती जब वह सिरदर्द से बेजार हो कर प्रिया से बोली थीं, ‘बेटा, तू ये प्लेटें धो लेना, मैं डाक्टर के पास जा रही हूं.’

प्रिया मां की गोद में बिट्टो को देख कर ही समझ गई थी कि बाजार जाने का उस का पत्ता काट दिया गया है.

गायत्री बाजार से घर लौट कर आईं तो देखा कि प्रिया नदारद है और प्लेट, पतीला सब उसी तरह पड़े हुए थे. गायत्री की पूरी देह में आग लग गई पर बेटी से उलझने का साहस उन में न हुआ था. क्योंकि पिछली घटना अभी गायत्री भूली नहीं थीं. गोद के बच्चे को पलंग पर बैठा कर क्रोध से दांत किटकिटाते हुए उन्होंने बरतन धोए थे. चूल्हा जला कर खाना बनाने बैठ गई थीं.

इसी बीच प्रिया लौट आई थी. गायत्री ने सभी बच्चों को खाना परोस कर प्रिया से कहा था, ‘तुझे घंटे भर बाद खाना मिलेगा, यही सजा है तेरी.’

प्रिया का चेहरा फक पड़ गया था. मगर वह शांत रह कर थोड़ी देर प्रतीक्षा करती रही थी. उधर गायत्री अपने निर्णय पर अटल रहते हुए 1 घंटे बाद प्रिया को बुलाने पहुंचीं तो उस ने देखा कि वह दरी पर लुढ़की हुई थी.

गायत्री ने उसे उठ कर रसोई में चलने को कहा तो प्रिया शांत स्वर में बोली थी, ‘मैं न खाऊंगी, अम्मां, मुझे भूख नहीं है.’

गायत्री ने बेटी को प्यार से घुड़का था, ‘चल, चल खा और सो जा.’

प्रिया ने एक कौर भी न तोड़ा. गायत्री के पैरों तले जमीन खिसक गई थी. इस के बाद उन्होंने बहुत मनाया, डांटा, झिड़का पर प्रिया ने खाने की ओर देखा भी नहीं था. थक कर गायत्री भी अपने बिस्तर पर जा बैठी थीं. उस रात खाना उन से भी न खाया गया था.

दूसरे दिन प्रिया ने जब तक खाना नहीं खाया गायत्री का कलेजा धकधक करता रहा था.

उस दिन की घटना के बाद गायत्री ने फिर खाने से संबंधित कोई सजा प्रिया को नहीं दी थी. प्रिया कई बार देख चुकी थी कि गायत्री उस की बेहद चिंता करती थीं और उस के लिए पलकें बिछाए रहती थीं. फिर भी वह मां से अड़ जाती थी, उस की कोई बात नहीं मानती थी. इतना ही नहीं कई बार तो वह भाईबहन के युद्ध में अपनी मां गायत्री पर ताना कसने से भी बाज नहीं आती, ‘हां…हां…अम्मां, तुम भैया की ओर से क्यों न बोलोगी. आखिर पूरी उम्र जो उन्हीं के साथ तुम्हें रहना है.’

 

गायत्री ने कई घरों के ऐसे ही किस्से सुन रखे थे कि मांबेटियों में इस बात पर तनातनी रहती है कि मां सदा बेटों का पक्ष लेती हैं. वह इस बात से अपनी बेटियों को बचाए रखना चाहती थीं पर प्रिया को मां की हर बात में जैसे पक्षपात की बू आती थी.

ऐसे ही तानों और लड़ाइयों के बीच प्रिया जवानी में कदम रखते ही बदल गई थी. अब वह मां का हित चाहने वाली सब से प्यारी सहेली हो गई थी. जिस बात से मां को ठेस लग सकती हो, प्रिया उसे छेड़ती भी नहीं थी. मां को परेशान देख झट उन के काम में हाथ बंटाने के लिए आ जाती थी. मां के बदन में दर्द होता तो उपचार करती. यहां तक कि कोई छोटी बहन मां से अकड़ती, ऐंठती तो वही प्रिया उसे समझाती कि ऐसा न करो.

बेटों के व्यवहार से मां गायत्री परेशान होतीं तो प्रिया उन की हिम्मत बढ़ाती. गायत्री उस के इस नए रूप को देख चकित हो उठी थीं और उन्हें लगने लगा था कि औरत की दुनिया में उस की सब से पक्की सहेली उस की बेटी ही होती है.

यही सब सोचतेविचारते जब गायत्री की नींद टूटी तो सूरज का तीखा प्रकाश खिड़की से हो कर उन के बिछौने पर पड़ रहा था. रात की बातें दिमाग से हट गई थीं. अब उन्हें बड़ा हलका महसूस हो रहा था. जल्दी ही वह खाने की तैयारी में जुट गईं.

 

आटा गूंधते हुए उन्होंने एक बार खिड़की से उचक कर प्रिया के कमरे में देखा तो उन के होंठों पर हंसी आ गई. प्रिया रानी के सिरहाने बैठी उस का माथा सहला रही थी. गायत्री को लगा वह प्रिया नहीं गायत्री है और रानी, रानी नहीं प्रिया है. कभी ऐसे ही तो ममता और उलझन के दिन उन्होंने भी काटे हैं.

गायत्री ने चाहा एक बार आवाज दे कर रानी को उठा ले फिर कुछ सोच कर वह कड़ाही में मठरियां तलने लगीं. उन्हें लगा, प्रिया उठ कर अब बाहर आ रही है. लगता है रानी भी उठ गई है क्योंकि उस की छलांग लगाने की आवाज उन के कानों से टकराई थी.

अचानक प्रिया के चीखने की आवाज आई, ‘‘मैं देख रही हूं तेरी कारस्तानी. तुझे कूट कर नहीं धर दिया तो कहना.’’

कितना कसैला था प्रिया का वाक्य. अभी थोड़ी देर पहले की ममता से कितना भिन्न पर गायत्री को इस वाक्य से घबराहट नहीं हुई. उन्होंने देखा रानी, प्रिया के हाथों मंजन लेने से बच रही है. एकाएक प्रिया ने गायत्री की ओर देखा तो थोड़ा झेंप गई.

‘‘देखती हो अम्मां,’’ प्रिया चिड़चिड़ा कर बोली, ‘‘कैसे लक्षण हैं इस के? कल थोड़ा सा डांट क्या दिया कि कंधे पर हाथ नहीं धरने दे रही है. रात मेरे साथ सोई भी नहीं. मुझ से ही नहीं बोलती है मेरी लड़की. तुम्हीं बोलो, क्या पैरों में गिर कर माफी मांगूं तभी बोलेगी यह,’’ कह कर प्रिया मुंह में आंचल दे कर फूटफूट कर रो पड़ी.

ऐंठी, तनी रानी का सारा बचपन उड़ गया. वह थोड़ा सहम कर प्रिया के हाथ से मंजनब्रश ले कर मुंह धोने चल दी.

गायत्री ने जा कर प्रिया के कंधे पर हाथ रखा और झिड़का, ‘‘यह क्या बचपना कर रही है. रानी आखिर है तो तेरी ही बच्ची.’’

‘‘हां, मेरी बच्ची है पर जाने किस जन्म का बैर निकालने के लिए मेरी कोख से पैदा हुई है,’’ प्रिया ने रोतेसुबकते कहा, ‘‘यह जैसेजैसे समझदार होती जा रही है, इस के रंगढंग बदलते जा रहे हैं.’’

‘‘तो चिंता क्यों करती है?’’ गायत्री ने फुसफुसा कर बेहद ममता से कहा, ‘‘थोड़ा धीरज से काम ले, आज की सूखे डंडे सी तनी यह लड़की कल कच्चे बांस सी नरम, कोमल हो जाएगी. कभी इस उम्र में तू ने भी यह सब किया था और मैं भी तेरी तरह रोती रहती थी पर देख, आज तू मेरे सुखदुख की सब से पक्की सहेली है. थोड़ा धैर्य रख प्रिया, रानी भी तेरी सहेली बनेगी एक दिन.’’

‘‘क्या?’’ प्रिया की आंखें फट गईं.

‘‘क्यों अम्मां, मैं ने भी कभी आप का इसी तरह दिल दुखाया था? कभी मैं भी ऐसे ही थी सच? ओह, कैसा लगता होगा तब अम्मां तुम्हें?’’

बेटी की आंखों में पश्चात्ताप के आंसू देख कर गायत्री की ममता छलक उठी और उन्होंने बेटी के आंसुओं को आंचल में समेट कर उसे गले से लगा लिया.

Wife को रखना है खुश तो हस्बैंड को बनना होगा परफेक्शनिस्ट

जो लोग अपने हर काम को बिल्कुल सही तरीके से करना चाहते हैं, जिसमें किसी भी कमी की कोई गुंजाइश ना हो, उन्हें परफेक्शनिस्ट कहते हैं. माना कि परफेक्शनिस्ट’ होना आसान नहीं है लेकिन किसी का अपने काम में ‘परफेक्शनिस्ट’ होना अच्छी बात है . परफेक्शनिस्ट’ होने को हमारे समाज में एक गुण माना जाता है.  आमिर खान को भी एक बेहतरीन एक्टर इसलिए माना जाता है क्योंकि वो ‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ हैं.

रोहित और अनन्‍या की जिंदगी पर एक नजर डालें 

“अनन्या को दो दिन के लिए ऑफिस के काम से बैंगलोर जाना पड़ा और पीछे से वह पूरा घर सिस्टमेटिक तरीके से मैनेज करके गई थी लेकिन जैसे घर में घुसी तो उसे लगा जैसे वह किसी और के ही घर में आ गई है.. घर के हालत देखकर उसने अपना सर पकड़ लिया .

किचन में पूरे स्लैब पर घी फैला हुआ था ,गैस बर्नर पर चाय निकली हुई थी .. सारी दालों मसालों के डिब्बे खुले पड़े थे  ,सिंक में झूठे बर्तनॉन से स्मेल आ रही थी ,मसालेदानी में सारे मसाले एक दूसरे मे मिले हुए थे ,सोफ़े पर कपड़ों का ढेर लगा हुआ था ,नमकीन ,चिप्स के खाली रैपर यहाँ वहाँ पड़े हुए थे .. राशन का सारा सामन डाइनिंग टेबल पर बिखरा हुआ था ..
अनन्या और रोहित के घर से हमेशा ये ही बातें सुनाई देती थी ..
“रोहित, तुम ने आज फिर टूथपेस्ट का ढक्कन खुला छोड़ दिया..
ऑफिस से आने के बाद तुम्हारे जूते हमेशा यहाँ वहाँ पड़े रहते हैं
ग्रॉसरी लाने के बाद उन्हें अपनी जगह पर क्यों नहीं रखते हो
तुमने चाय में लगता है चीनी की जगह नमक डाल दिया है !
तुमने अपनी कपबर्ड देखी है किसी भी सॉक्स का पेयर कंप्लीट नहीं है ..
रोहित और अनन्या शादी के बाद अकेले रहते हैं . ऊपर के डायलॉग्स से आप यह तो समझ गए होंगे कि अनन्या अपने काम में परफेक्शनिस्ट’ है और वहीं रोहित उसके बिल्कुल उल्टा .. जिसकी वजह से रोज उनके बीच बहस होती रहती है .

परफेक्शनिस्ट होने के फायदे

·        परफेक्शनिस्ट लोग अपने काम को बेहतर तरीके से करने की कोशिश करते हैं.
·        ऐसे लोग काम की बारीकियों पर ध्यान देते हैं और कम गलतियां करते हैं.
·        परफेक्शनिस्ट लोगों पर लोग अपना काम कराने के लिए भरोसा करते हैं.

हसबैंड वाइफ के परफेक्शनिस्ट होने के हैं कई फायदे

·        घर में तनाव लड़ाई झगड़ा कम होता है.  हर चीज सही जगह पर मिलती है .
·        घर साफ सुथरा रहता है और साफ-सुथरे घर में रहने से तनाव कम होता है और आराम करने का ज्यादा समय मिलता है.
·        घर के काम आसानी से और जल्दी करने में मदद मिलती है
·        हसबैन्ड वाइफ के बीच जिम्मेदारियों को लेकर मानसिक स्पष्टता बढ़ती है
·        दोनों का जीवन खुशहाल और सार्थक होता है
·        रिश्तों में टेंशन न होने से हल्कापन महसूस होता है ,दिमाग रिलैक्स रहता है.
·        घर के माहौल में सुधार होता है और यह दोस्तों, परिवार के सदस्यों, और गेस्ट्स को अच्छा लगता है .

वाइफ ,हसबैन्ड की कोशिशों को सराहे

कोई भी इंसान किसी काम में परफेक्ट नहीं होता है, समय के साथ ही वो सारी चीजें सीखता है.  इसलिए वाइफ को भी चाहिए कि अगर आपके हस्बैंड परफेक्शनिस्ट बनने की दिशा में घर का कोई काम करते हैं तो उनका मनोबल बढ़ाएं, भले ही वो सही से नहीं कर पा रहे हों.  बार-बार टोकें नहीं, ऐसा करने से उन्हें बुरा लग सकता है. रिश्तेदारों ,दोस्तों के सामने हसबैन्ड द्वारा की गई कोशिशों को ,उनके काम को सराहें.  इससे हसबैंड को अच्छा लगेगा.  हसबैंड को यह समझाएं कि साथ और सही तरीके से काम करने से आप दोनों एक दूसरे के साथ ज्यादा और क्वालिटी टाइम बिता पाएंगे.

धीरे धीरे बनेगी बात

किसी भी प्रकार की आदत को जल्दी बदल पाना बेहद कठिन होता है लेकिन रोजाना की जिंदगी में कोशिश करने से आदत में बदलाव अवश्य आता है. एक रणनीति के अनुसार अगर हसबैन्ड वाइफ  दोनों मिलकर अपने घर को व्यवस्थित और साफ-सुथरा रखेंगे तो इससे उन्हें एक ही दिन में सफाई में अपनी पूरी एनर्जी नहीं लगानी पड़ेगी और उन्हें पता भी नहीं चलेगा कि कितनी जल्दी और आसानी से हर रोज की सफाई हो गयी है.
अपना बेटर वर्जन बनने की कोशिश करें

हसबैन्ड वाइफ में से अगर एक अपना हर काम परफेक्ट तरीके से करता है और दूसरा बेढंगे तरीके से तो पक्का दोनों में महाभारत होगी इसलिए शुरुआत में बेढंगे पार्टनर आदर्श या बेस्ट हो जाने के लिए नहीं, बल्कि बेहतरी की राह पर चलने की सोचे.  धीरे धीरे अपनी आदतों में बदलाव लाए . ऐसी कोशिशें करे जिस में वह खुद को तराशे और आज को बीते हुए कल से बेहतर बनाने की दिशा में काम करे और अपने आने वाले कल की बेहतरी की बुनियाद भी रख सके.  ऐसे प्रयास जिंदगी के सफर को जी भरकर जीने का जरिया बनते हैं.

घर दोनों का तो जिम्मेदारी भी दोनों की

घर को साफ-सुथरा और व्यवस्थित रखना हसबैंड वाइफ दोनों की जिम्मेदारी होती है. आपके यहां आने वाले लोग आपके घर को देखकर यह अनुमान लगाते हैं कि आप अपनी जिंदगी में कितने व्‍यवस्थित हैं. आपका घर तभी व्यवस्थित और साफ-सुथरा बना रह सकता है जब आप इसको अच्छे तरीके से बनाए रखते हैं. अगर आप सलीके से नहीं रहते हैं तो आपका घर बार-बार बिखरता और अव्यवस्थित रहेगा. इसलिए अपने घर को व्यवस्थित और साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए आप इसे अपनी आदत में शामिल करें.

Gen Z & Millennial : कंफर्ट और पैसा फिर क्यों हैं कंफ्यूजन

26 साल का यंग आईटी प्रोफैशनल का ईयरली पैकेज 50 लाख, फिर भी वह सेस्टिसफाइड नहीं है. वह हर साल जौब बदलता है. उस की लाइफ में पर्सनल रिश्तों की कोई जगह नहीं है, वीकेंड पर पार्टी करना, औफिस क्लीग्स के साथ हैंग आउट, हर 2-3 महीने में महंगा फोन लेना, साल में 3-4 बार फौरेन ट्रिप्स, हर दूसरे साल गाड़ी बदलना फिर भी वह जिंदगी से बोर हो गया है, खुश नहीं है.

एनर्जेटिक, इम्पेशेंट, केयरलेस, टैक सैवी, स्मार्ट, रिबेलियस, एमलेस, कन्फ्यूज़्ड, एनर्जी ज्यादा पेशेंस कम, फिजिकल और मेंटल हैल्थ बड़ा कन्सर्न. ये सारे फीचर जेनजी के हैं. मिलेनियल्स वह जनरेशन है जिसे पता नहीं मैं क्या करूं, कैसे अपनी खुशी हासिल करूं?

आज के यूथ से अगर पूछा जाए कि उन के लाइफ के गोल्स क्या हैं? तो वे बोलेंगे कि उन के पास कोई लिस्ट औफ गोल्स नहीं है. सोचिए कितनी ऐमलेस है आज की जेनरेशन. यही वजह है कि वह हमेशा स्ट्रेस में रहती है. सारी सुविधाओं के बावजूद भी खुश नहीं है.

यूथ को यह समझना होगा कि टारगेट बनाने से ही सफलता हासिल की जा सकती है. जैसे अगर कोई रेलवे स्टेशन के काउंटर पर टिकट लेने के लिए पहुंचता है, काउंटर पर बैठा व्यक्ति उस से पूछता है, ”कहां की टिकट चाहिए” तो वह कहता है “कहीं की भी दे दो और टिकट न मिलने पर और वह कहीं भी नहीं पहुंच पाता.

जब किसी को किसी जगह जाने के बारे में उसे सारी जानकारी होती है कि कौन सी ट्रेन जाएगी, कितने बजे जाएगी, कोन सा सीट नंबर है तो सफर सुहाना और मंजिल पर पहुंचना आसान होता है लेकिन जब जिंदगी के गोल्स क्लियर नहीं होते तो कहीं भी पहुंचा नहीं जा सकता.

यही हाल युवाओं का है गैलरी में ढेरों फोटोज हैं लेकिन प्रोफाइल पिक के लिए कोई अच्छी नहीं लग रही. एक ही एंगल की दसियों फोटो हैं और कंफ्यूज हैं कि अच्छी कौन सी है. हर थोड़े दिन में लाइफ जीने का तरीका बदल रहे हैं, रिस्क लेने को तैयार नहीं हैं, इनफार्मेशन है, कम्फर्ट है फिर भी खुश नहीं. सोशल मीडिया में लाइक्स और कमेंट पर ही सारा ध्यान है.  लक्ष्य जिंदगी में उदेश्य और दिशा देते हैं और बताते हैं कि क्या और कैसे हासिल करना है और किस दिशा में काम और मेहनत करनी है.

 

पेरैंट्स की सोच बदलना जरूरी

हमारी जेनजी जनरेशन के पेरैंट्स बचपन से वो सपने देखते हैं जो वे खुद पूरे नहीं कर पाए. बच्चों के लिए पूरी जिंदगी कुर्बान कर देते हैं इस एवज में कि बच्चे उन का नाम रोशन करेंगे. यह एक तरह का दबाव बनाता है. इस से बच्चों के दिमाग में हर समय प्रेशर हावी रहता है और बच्चे उसी दिशा में जुट जाते हैं.

दसवीं में अच्छे नंबर मिठाई तारीफें, बारहवीं में भी यही, इस के बाद प्रतियोगी परीक्षा में सफलता में या कैम्पस सेलेक्शन से और ज्यादा खुशी. अच्छी सैलरी, घर परिवार से दूरी, अकेलापन इन सब से युवाओं की मेंटल हैल्थ पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. पेरैंट्स को समझाना होगा कि वे अपनी अपेक्षाएं बच्चों पर न थोपें. जिस फील्ड में उन की रुचि और टैलेंट है वह फील्ड उसे चुनने दें, मतलब उस पर बड़ा आदमी बनने का अपना ख्वाब न थोपें. खुश कैसे रहना है उसे यह सिखाएं.

यूथ को दिशाहीन बनाने में सब से ज्यादा जिम्मेदार पेरैंट्स, मीडिया, सिनेमा और राजनीति है. देश में एक भी ऐसा नेता और संत नहीं जिस का आचरण यूथ को प्रेरित करता हो. हमारे समाज में जन्मपत्री देखने वाले, तांत्रिक, झोलाछाप डाक्टर, पूजापाठ कराने वाले पाखंडी समाज में बड़ी शान से कमाई कर रहे हैं और यूथ स्ट्रेस, अकेलेपन, गुस्सा, डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं.

दुनिया में हुए अधिकतर सर्वे कहते हैं कि मिलेनियल्स सब से अनफिट जनरेशन है और फिज़िकल ही नहीं मेंटल हैल्थ भी इन के लिए एक बड़ा कन्सर्न है. इस से बुरा हाल जेनजी का है. यह दोनों जेनरेशन ही डिप्रेशन, कैफीन डिसऔर्डर, गेमिंग डिसऔर्डर से भी जूझ रही है.

 

क्यों कन्फ्यूज्ड है यूथ

• किसी भी बात में बहुत जल्दी निर्णय लेना
• किसी के बारे में बहुत जल्दी एक सोच बना लेना
• पेशेंस की कमी होना
• हर चीज में प्रैक्टिकल होना
• हर किसी को एक ही तराजू पर तौलना
• दूसरों की गलती से न सीखना
• बहुत जल्दी किसी पर यकीन कर लेना
• प्लान ए के फेल होने पर प्लान बी का न होना
• प्रेशर न झेल पाना
• सब कुछ अपने तरीके से करना किसी की न सुनना

यूथ हर किसी को देख के आकर्षित हो जाता है. उसे अपना रोल मौडल मान लेता है बिना अपनी क्षमता को पहचाने, उस के जैसा बनने की चाहत रखने लगता. अपने मार्ग से भटक जाता है और उसे अपना जीवन बेकार लगने लगता है. कैसे यूथ को एक ही दिन में प्यार हो जाता है और फिर कुछ हफ़्तों में वही रिश्ते खत्म हो जाते हैं? उबासी और बासीपन छा जाता है. जिस नौकरी को पाने के लिए मशक्कत करता है कुछ समय बाद उसी नौकरी से नफरत करता है और अपने सपनों अपनी खुशियों पर काम करने की बजाय स्ट्रेस में आ कर जंक फूड खाते, नशा करते हुए वेब सीरीज देखने में लग जाता है. कुछ बड़ा करना तो चाहता है, लेकिन इंस्टाग्राम, फेसबुक पर समय बरबाद करता है.

गैर जिम्मेदार सरकार

देश की करीब आधी आबादी 25 वर्ष से कम उम्र वाले युवाओं की है मगर महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि, हमारी सरकार युवाओं के लिए कुछ करने के लिए गंभीर हैं? क्या सरकार युवा शक्ति का, उन की ऊर्जा का, उन के समय का सदुपयोग करने पर कोई काम कर रही है?
सिर्फ आईआईटी, आईआईएम व नैशनल यूनिवर्सिटीज खोल कर दे देने भर से युवा देश में सक्रिय भूमिका में आ जाएंगे ऐसा नहीं है. हर साल करीब एक से डेढ़ लाख छात्र एमबीए और इस के आधे इंजीनियरिंग कर के बेरोजगार घूम रहे हैं. देश में सिर्फ 20% ग्रेजुएट्स को ही रोजगार मिलता है. बाकी बचे 80% बेरोजगार राजनीतिक रैलियों में कुछ पैसों के लिए जिंदाबाद मुर्दाबाद करते हैं. लोकल राजनीति भी इसलिए कम जिम्मेदार नहीं है. चुनावी सीजन में हर नेता को इन फेसबुकिया यूथ की टीम चाहिए होती है जो उन के लिए जिंदाबाद के नारे लगाते रहें. किसी की तारीफ तो किसी को ट्रोल करे. इस सब से नेताजी का भविष्य तो सुरक्षित हो जाता है पर यूथ का भविष्य चौपट हो जाता है.

 

यूथ की जीवनशैली बरबाद करता सोशल मीडिया

 

एक सर्वे के हिसाब से इस साल के शुरूआत तक करीब 200 मिलियन यानि कि 20 करोड़ युवा फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हात्सऐप का इस्तेमाल करते हैं और इस का रिजल्ट साइबर क्राइम, ड्रग एडिक्शन, आभासी रिश्ते बनाने के रूप में सामने आ रहा है. युवाओं की जिंदगी मशीनी होती जा रही है. समाज में फैले अपराध खासकर साइबर अपराध, हिंसा, साजिश, धोखे में युवा जानेअनजाने संलिप्त हो रहे हैं. बिना मेहनत के मिली सुविधाओं और आधुनिकता के कारण उन्होंने जिंदगी को मजाक समझ लिया है.

 

रिस्क लेना सीखे यूथ

अगर कुछ बड़ा करना है तो रिस्क और जोखिम लेने ही होते हैं. हमारे परिवारों में अगर बच्चा रूटीन से अलग कैरियर चुनने की बात घर वालों को कहता है तो वे उसे डराते हैं उस का साथ नहीं देते क्योंकि उन्होंने खुद कभी रिस्क नहीं उठाया होता. अगर कुछ नया करना है और बड़ा करना है रिस्क लेना ही एकमात्र तरीका है. यूथ को यह समझना होगा कि बिना रिस्क के कुछ नहीं मिलता और पेरैंट्स को इस में उन का साथ देना होगा.

Love Affair :  मेरे बेटे को इश्‍क हो गया

विकी ने अपने मातापिता से कभी कोई बात नहीं छिपाई थी, लेकिन बरखा के साथ अपनी मुहब्बत की बात बताने से वह ?ि?ाक रहा था. आखिर ऐसा क्या हुआ कि मां को अपने बेटे की पसंद का आभास हो गया और उन्होंने बेटे की पसंद पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी.

 

‘‘दा,तुम मेरी बात मान लो और आज खाने की मेज पर मम्मीपापा को सारी बातें साफसाफ बता दो. आखिर कब तक यों परेशान बैठे रहोगे?’’

बच्चों की बातें कानों में पड़ीं तो मैं रुक गई. ऐसी कौन सी गलती विकी से हुई जो वह हम से छिपा रहा है और उस का छोटा भाई उसे सलाह दे रहा है. मैं ‘बात क्या है’ यह जानने की गरज से छिप कर उन की बातें सुनने लगी.

‘‘इतना आसान नहीं है सबकुछ साफसाफ बता देना जितना तू समझ रहा है,’’ विकी की आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘दा, यह इतना मुश्किल भी तो नहीं है. आप की जगह मैं होता तो देखते कितनी स्टाइल से मम्मीपापा को सारी बातें बता भी देता और उन्हें मना भी लेता,’’ इस बार विनी की आवाज आई.

‘‘तेरी बात और है पर मुझ से किसी को ऐसी उम्मीद नहीं होगी,’’ यह आवाज मेरे बड़े बेटे विकी की थी.

‘‘दा, आप ने कोई अपराध तो किया नहीं जो इतना डर रहे हैं. सच कहूं तो मुझे ऐसा लगता है कि मम्मीपापा आप की बात सुन कर गले लगा लेंगे,’’ विनी की आवाज खुशी और उत्साह दोनों से भरी हुई थी.

‘बात क्या है’ मेरी समझ में कुछ नहीं आया. थोड़ी देर और खड़ी रह कर उन की आगे की बातें सुनती तो शायद कुछ समझ में आ भी जाता पर तभी प्रेस वाले ने डोर बेल बजा दी तो मैं दबे पांव वहां से खिसक ली.

बच्चों की आधीअधूरी बातें सुनने के बाद तो और किसी काम में मन ही नहीं लगा. बारबार मन में यही प्रश्न उठते कि मेरा वह पुत्र जो अपनी हर छोटीबड़ी बात मुझे बताए बिना मुंह में कौर तक नहीं डालता है, आज ऐसा क्या कर बैठा जो हम से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. सोचा, चल कर साफसाफ पूछ लूं पर फिर लगा कि बच्चे क्या सोचेंगे कि मम्मी छिपछिप कर उन की बातें सुनती हैं.

जैसेतैसे दोपहर का खाना तैयार कर के मेज पर लगा दिया और विकीविनी को खाने के लिए आवाज दी. खाना परोसते समय खयाल आया कि यह मैं ने क्या कर दिया, लौकी की सब्जी बना दी. अभी दोनों अपनीअपनी कटोरी मेरी ओर बढ़ा देंगे और कहेंगे कि रामदेव की प्रबल अनुयायी माताजी, यह लौकी की सब्जी आप को ही सादर समर्पित हो. कृपया आप ही इसे ग्रहण करें. पर मैं आश्चर्यचकित रह गई यह देख कर कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उलटा दोनों इतने मन से सब्जी खाने में जुटे थे मानो उस से ज्यादा प्रिय उन्हें कोई दूसरी सब्जी है ही नहीं.

बात जरूर कुछ गंभीर है. मैं ने मन में सोचा क्योंकि मेरी बनाई नापसंद सब्जी या और भी किसी चीज को ये चुपचाप तभी खा लेते हैं जब या तो कुछ देर पहले उन्हें किसी बात पर जबरदस्त डांट पड़ी हो या फिर अपनी कोई इच्छा पूरी करवानी हो.

खाना खा कर विकी और विनी फिर अपने कमरे में चले गए. ऐसा लग रहा था कि किसी खास मसले पर मीटिंग अटेंड करने की बहुत जल्दी हो उन्हें.

विकी सी.ए. है. कानपुर में उस ने अपना शानदार आफिस बना लिया है. ज्यादातर शनिवार को ही आता है और सोमवार को चला जाता है. विनी एम.बी.ए. की तैयारी कर रहा है. बचपन से दोनों भाइयों के स्वभाव में जबरदस्त अंतर होते हुए भी दोनों पल भर को भी अलग नहीं होते हैं. विकी बेहद शांत स्वभाव का आज्ञाकारी लड़का रहा है तो विनी इस के ठीक उलट अत्यंत चंचल और अपनी बातों को मनवा कर ही दम लेने वाला रहा है. इस के बावजूद इन दोनों भाइयों का प्यार देख हम दोनों पतिपत्नी मन ही मन मुसकराते रहते हैं.

 

अपना काम निबटा कर मैं बच्चों के कमरे में चली गई. संडे की दोपहर हमारी बच्चों के कमरे में ही गुजरती है और बच्चे हम से सारी बातें भी कह डालते हैं, जबकि ऐसा करने में दूसरे बच्चे मांबाप से डरते हैं. आज मुझे राजीव का बाहर होना बहुत खलने लगा. वह रहते तो माहौल ही कुछ और होता और वह किसी न किसी तरह बच्चों के मन की थाह ले ही लेते.

मेरे कमरे में पहुंचते ही विनी अपनी कुरसी से उछलते हुए चिल्लाया, ‘‘मम्मा, एक बात आप को बताऊं, विकी दा ने…’’

उस की बात विकी की घूरती निगाहों की वजह से वहीं की वहीं रुक गई. मैं ने 1-2 बार कहा भी कि ऐसी कौन सी बात है जो आज तुम लोग मुझ से छिपा रहे हो, पर विकी ने यह कह कर टाल दिया कि कुछ खास नहीं मम्मा, थोड़ी आफिस से संबंधित समस्या है. मैं आप को बता कर परेशान नहीं करना चाहता पर विनी के पेट में कोई बात पचती ही नहीं है.

हालांकि मैं मन ही मन बहुत परेशान थी फिर भी न जाने कैसे झपकी लग गई और मैं वहीं लेट गई. अचानक ‘मम्मा’ शब्द कानों में पड़ने से एक झटके से मेरी नींद खुल गई पर मैं आंखें मूंदे पड़ी रही. मुझे सोता देख कर उन की बातें फिर से चालू हो गई थीं और इस बार उसी कमरे में होने की वजह से मुझे सबकुछ साफसाफ सुनाई दे रहा था.

विकी ने विनी को डांटा, ‘‘तुझे मना किया था फिर भी तू मम्मा को क्या बताने जा रहा था?’’

‘‘क्या करता, तुम्हारे पास हिम्मत जो नहीं है. दा, अब मुझ से नहीं रहा जाता, अब तो मुझे जल्दी से भाभी को घर लाना है. बस, चाहे कैसे भी.’’

विकी ने एक बार फिर विनी को चुप रहने का इशारा किया. उसे डर था कि कहीं मैं जाग न जाऊं या उन की बातें मेरे कानों में न पड़ जाएं.

अब तक तो नींद मुझ से कोसों दूर जा चुकी थी. ‘तो क्या विकी ने शादी कर ली है,’ यह सोच कर लगा मानो मेरे शरीर से सारा खून किसी ने निचोड़ लिया. कहां कमी रह गई थी हमारे प्यार में और कैसे हम अपने बच्चों में यह विश्वास उत्पन्न करने में असफल रह गए कि जीवन के हर निर्णय में हम उन के साथ हैं.

आज पलपल की बातें शेयर करने वाले मेरे बेटे ने मुझे इस योग्य भी न समझा कि अपने शादी जैसे महत्त्वपूर्ण फैसले में शामिल करे. शामिल करना तो दूर उस ने तो बताने तक की भी जरूरत नहीं समझी. मेरे व्यथित और तड़पते दिल से एक आवाज निकली, ‘विकी, सिर्फ एक बार कह कर तो देखा होता बेटे तुम ने, फिर देखते कैसे मैं तुम्हारी पसंद को अपने अरमानों का जोड़ा पहना कर इस घर में लाती. पर तुम ने तो मुझे जीतेजी मार डाला.’

पल भर के अंदर ही विकी के पिछले 25 बरस आंखों के सामने से गुजर गए और उन 25 सालों में कहीं भी विकी मेरा दिल दुखाता हुआ नहीं दिखा. टेबल पर रखे फल उठा कर खाने से पहले भी वह जहां होता वहीं से चिल्ला कर मुझे बताता था कि मम्मा, मैं यह सेब खाने जा रहा हूं. और आज…एक पल में ही पराया बना दिया बेटे ने.

कलेजे को चीरता हुआ आंसुओं का सैलाब बंद पलकों के छोर से बूंद बन कर टपकने ही वाला था कि अचानक विकी की फुसफुसाहट सुनाई पड़ी, ‘‘तुम ने देखा नहीं है मम्मीपापा के कितने अरमान हैं अपनी बहुओं को ले कर और बस, मैं इसी बात से डरता हूं कि कहीं बरखा मम्मीपापा की कल्पनाओं के अनुरूप नहीं उतरी तो क्या होगा? अगर मैं पहले ही इन्हें बता दूंगा कि मैं बरखा को पसंद करता हूं तो फिर कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि मम्मीपापा उसे नापसंद करें, वे हर हाल में मेरी शादी उस से कर देंगे और मैं यही नहीं चाहता हूं. मम्मीपापा के शौक और अरमान पूरे होने चाहिए, उन की बहू उन्हें पसंद होनी चाहिए. बस, मैं इतना ही चाहता हूं.’’

‘‘और अगर वह उन्हें पसंद नहीं आई तो?’’

‘‘नहीं आई तो देखेंगे, पर मैं ने इतना तो तय कर लिया है कि मैं पहले से यह बिलकुल नहीं कह सकता कि मैं किसी को पसंद करता हूं.’’

तो विकी ने शादी नहीं की है, वह केवल किसी बरखा नाम की लड़की को पसंद करता है और उस की समस्या यह है कि बरखा के बारे में हमें बताए कैसे? इस बात का एहसास होते ही लगा जैसे मेरे बेजान शरीर में जान वापस आ गई. एक बार फिर से मेरे सामने वही विकी आ खड़ा हुआ जो अपनी कोई बात कहने से पहले मेरे चारों ओर चक्कर लगाता रहता, मेरा मूड देखता फिर शरमातेझिझकते हुए अपनी बात कहता. उस का कहना कुछ ऐसा होता कि मना करने का मैं साहस ही नहीं कर पाती. ‘बुद्धू, कहीं का,’ मन ही मन मैं बुदबुदाई. जानता है कि मम्मा किसी बात के लिए मना नहीं करतीं फिर भी इतनी जरूरी बात कहने से डर रहा है.

सो कर उठी तो सिर बहुत हलका लग रहा था. मन में चिंता का स्थान एक चुलबुले उत्साह ने ले लिया था. मेरे बेटे को प्यार हो गया है यह सोचसोच कर मुझे गुदगुदी सी होने लगी. अब मुझे समझ में आने लगा कि विनी को भाभी घर में लाने की इतनी जल्दी क्यों मच रही थी. ऐसा लगने लगा कि विनी का उतावलापन मेरे अंदर भी आ कर समा गया है. मन होने लगा कि अभी चलूं विकी के पास और बोलूं कि ले चल मुझे मेरी बहू के पास, मैं अभी उसे अपने घर में लाना चाहती हूं पर मां होने की मर्यादा और खुद विकी के मुंह से सुनने की एक चाह ने मुझे रोक दिया.

रात को खाने की मेज पर मेरा मूड तो खुश था ही, दिन भर के बाद बच्चों से मिलने के कारण राजीव भी बहुत खुश दिख रहे थे. मैं ने देखा कि विनी कई बार विकी को इशारा कर रहा था कि वह हम से बात करे पर विकी हर बार कुछ कहतेकहते रुक सा जाता था. अपने बेटे का यह हाल मुझ से और न देखा गया और मैं पूछ ही बैठी, ‘‘तुम कुछ कहना चाह रहे हो, विकी?’’

‘‘नहीं…हां, मैं यह कहना चाहता था मम्मा कि जब से कानपुर गया हूं दोस्तों से मुलाकात नहीं हो पाती है. अगर आप कहें तो अगले संडे को घर पर दोस्तों की एक पार्टी रख लूं. वैसे भी जब से काम शुरू किया है सारे दोस्त पार्टी मांग रहे हैं.’’

‘‘तो इस में पूछने की क्या बात है. कहा होता तो आज ही इंतजाम कर दिया होता,’’ मैं ने कहा, ‘‘वैसे कुल कितने दोस्तों को बुलाने की सोच रहे हो, सारे पुराने दोस्त ही हैं या कोई नया भी है?’’

‘‘हां, 2-4 नए भी हैं. अच्छा रहेगा, आप सब से भी मुलाकात हो जाएगी. क्यों विनी, अच्छा रहेगा न?’’ कह कर विकी ने विनी को संकेत कर के राहत की सांस ली.

मैं समझ गई थी कि पार्टी की योजना दोनों ने मिल कर बरखा को हम से मिलाने के लिए ही बनाई है और विकी के ‘नए दोस्तों’ में बरखा भी शामिल होगी.

 

अब बच्चों के साथसाथ मेरे लिए भी पार्टी की अहमियत बहुत बढ़ गई थी. अगले संडे की सुबह से ही विकी बहुत नर्वस दिख रहा था. कई बार मन में आया कि उसे पास बुला कर बता दूं कि वह सारी चिंता छोड़ दे क्योंकि हमें सबकुछ मालूम हो चुका है, और बरखा जैसी भी होगी मुझे पसंद होगी. पर एक बार फिर विकी के भविष्य को ले कर आशंकित मेरे मन ने मुझे चुप करा दिया कि कहीं बरखा विकी के योग्य न निकली तो? जब तक बात सामने नहीं आई है तब तक तो ठीक है, उस के बारे में कुछ भी राय दे सकती हूं, पर अगर एक बार सामने बात हो गई तो विकी का दिल टूट जाएगा.

4 बजतेबजते विकी के दोस्त एकएक कर के आने लगे. सच कहूं तो उस समय मैं खुद काफी नर्वस होने लगी थी कि आने वालों में बरखा नाम की लड़की न मालूम कैसी होगी. सचमुच वह मेरे विकी के लायक होगी या नहीं. मेरी भावनाओं को राजीव अच्छी तरह समझ रहे थे और आंखों के इशारे से मुझे धैर्य रखने को कह रहे थे. हमें देख कर आश्चर्य हो रहा था कि सदैव हंगामा करते रहने वाला विनी भी बिलकुल शांति  से मेरी मदद में लगा था और बीचबीच में जा कर विकी की बगल में कुछ इस अंदाज से खड़ा होता मानो उस से कह रहा हो, ‘दा, दुखी न हो, मैं तुम्हारे साथ हूं.’

ठीक साढ़े 4 बजे बरखा ने अपनी एक सहेली के साथ ड्राइंगरूम में प्रवेश किया. उस के घुसते ही विकी की नजरें विनी से और मेरी नजरें इन से जा टकराईं. विकी अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और उन्हें हमारे पास ला कर उन से हमारा परिचय करवाया, ‘‘बरखा, यह मेरे मम्मीपापा हैं और मम्मीपापा, यह मेरी नई दोस्त बरखा और यह बरखा की दोस्त मालविका है. ये दोनों एम.सी.ए. कर रही हैं. पिछले 7 महीने से हमारी दोस्ती है पर आप लोगों से मुलाकात न करवा सका था.’’

 

हम ने महसूस किया कि बरखा से हमारे परिचय के दौरान पूरे कमरे का शोर थम गया था. इस का मतलब था कि विकी के सारे दोस्तों को पहले से बरखा के बारे में मालूम था. सच है, प्यार एक ऐसा मामला है जिस के बारे में बच्चों के मांबाप को ही सब से बाद में पता चलता है. बच्चे अपना यह राज दूसरों से तो खुल कर शेयर कर लेते हैं पर अपनों से बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं.

बरखा को देख लेने और उस से बातचीत कर लेने के बाद मेरे मन में उसे बहू बना लेने का फैसला पूर्णतया पक्का हो गया. विकी बरखा के ही साथ बातें कर रहा था पर उस से ज्यादा विनी उस का खयाल रख रहा था. पार्टी लगभग समाप्ति की ओर अग्रसर थी. यों तो हमारा फैसला पक्का हो चुका था पर फिर भी मैं ने एक बार बरखा को चेक करने की कोशिश की कि शादी के बाद घरगृहस्थी संभालने के उस में कुछ गुण हैं या नहीं.

मेरा मानना है कि लड़की कितने ही उच्च पद पर आसीन हो पर घरपरिवार को उस के मार्गदर्शन की आवश्यकता सदैव एक बच्चे की तरह होती है. वह चूल्हेचौके में अपना दिन भले ही न गुजारे पर चौके में क्या कैसे होता है, इस की जानकारी उसे अवश्य होनी चाहिए ताकि वह अच्छा बना कर खिलाने का वक्त न रखते हुए भी कम से कम अच्छा बनवाने का हुनर तो अवश्य रखती हो.

मैं शादी से पहले घरगृहस्थी में निपुण होना आवश्यक नहीं मानती पर उस का ‘क ख ग’ मालूम रहने पर ही उस जिम्मेदारी को निभा पाने की विश्वसनीयता होती है. बहुत से रिश्तों को इन्हीं बुनियादी जिम्मेदारियों के अभाव में बिखरते देखा था मैं ने, इसलिए विकी के जीवन के लिए मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी.

मैं ने बरखा को अपने पास बुला कर कहा, ‘‘बेटा, सुबह से पार्टी की तैयारी में लगे होने की वजह से इस वक्त सिर बहुत दुखने लगा है. मैं ने गैस पर तुम सब के लिए चाय का पानी चढ़ा दिया है, अगर तुम्हें चाय बनानी आती हो तो प्लीज, तुम बना लो.’’

‘‘जी, आंटी, अभी बना लाती हूं,’’ कह कर वह विकी की तरफ पलटी, ‘‘किचन कहां है?’’

‘‘उस तरफ,’’ हाथ से किचन की तरफ इशारा करते हुए विकी ने कहा, ‘‘चलो, मैं तुम्हें चीनी और चायपत्ती बता देता हूं,’’ कहते हुए वह बरखा के साथ ही चल पड़ा.

‘‘बरखाजी को अदरक कूट कर दे आता हूं,’’ कहता हुआ विनी भी उन के पीछे हो लिया.

चाय चाहे सब के सहयोग से बनी हो या अकेले पर बनी ठीक थी. किचन में जा कर मैं देख आई कि चीनी और चायपत्ती के डब्बे यथास्थान रखे थे, दूध ढक कर फ्रिज में रखा था और गैस के आसपास कहीं भी चाय गिरी, फैली नहीं थी. मैं निश्चिंत हो आ कर बैठ गई. मुझे मेरी बहू मिल गई थी.

एकएक कर के दोस्तों का जाना शुरू हो गया. सब से अंत में बरखा और मालविका हमारे पास आईं और नमस्ते कर के हम से जाने की अनुमति मांगने लगीं. अब हमारी बारी थी, विकी ने अपनी मर्यादा निभाई थी. पिछले न जाने कितने दिनों से असमंजस की स्थिति गुजरने के बाद उस ने हमारे सामने अपनी पसंद जाहिर नहीं की बल्कि उसे हमारे सामने ला कर हमारी राय जाननेसमझने का प्रयत्न करता रहा. और हम दोनों को अच्छी तरह पता है कि अभी भी अपनी बात कहने से पहले वह बरखा के बारे में हमारी राय जानने की कोशिश अवश्य करेगा, चाहे इस के लिए उसे कितना ही इंतजार क्यों न करना पड़े.

मैं अपने बेटे को और असमंजस में नहीं देख सकती थी, अगर वह अपने मुंह से नहीं कह पा रहा है तो उस की बात को मैं ही कह कर उसे कशमकश से उबार लूंगी.

 

बरखा के दोबारा अनुमति मांगने पर मैं ने कहा, ‘‘घर की बहू क्या घर से खाली हाथ और अकेली जाएगी?’’

मेरी बात का अर्थ जैसे पहली बार किसी की समझ में नहीं आया. मैं ने विकी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘तेरी पसंद हमें पसंद है. चल, गाड़ी निकाल, हम सब बरखा को उस के घर पहुंचाने जाएंगे. वहीं इस के मम्मीडैडी से रिश्ते की बात भी करनी है. अब अपनी बहू को घर में लाने की हमें भी बहुत जल्दी है.’’

मेरी बात का अर्थ समझ में आते ही पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. मम्मीपापा को यह सब कैसे पता चला, इस सवाल में उलझाअटका विकी पहले तो जहां का तहां खड़ा रह गया फिर अपने पापा की पहल पर बढ़ कर उन के सीने से लग गया.

इन सब बातों में समय गंवाए बिना विनी गैरेज से गाड़ी निकाल कर जोरजोर से हार्न बजाने लगा. उस की बेताबी देख कर मैं दौड़ते हुए अपनी खानदानी अंगूठी लेने के लिए अंदर चली गई, जिसे मैं बरखा के मातापिता की सहमति ले कर उसे वहीं पहनाने वाली थी.

True Love Story : महान कवि जौन कीट्स का अनमोल लव लेटर

रोमांटिसिज्म एरा में जौन कीट्स का ब्रोन के लिए  प्यार गहरा था, जैसा कि कीट्स के फैनी को लिखे गए पत्रों में दिखाई भी देता है. ये पत्र अंगरेजी भाषा के सब से भावुक माने जाते हैं.

क्या ग़ालिब के पास शब्दों की कमी थी? मीर के पास? कैफ़ी आज़मी या गुलजार के पास? नहीं, ये शब्दों के जादूगर थे, हैं. कोई बात कहनी हो तो झट से दिमाग के पिटारे को खंगाला और पटक दिया सामने. भारत का कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को प्यार भरी बात कहता है तो ग़ालिब की शायरी आधीअधूरी तुतला के कह देता है. क्यों? क्योंकि हमें प्यार भरे शब्द सिखाए ही नहीं जाते. भाव क्या है बताए ही नहीं जाते. धर्म के लिए यह भलीच जैसी बातें जो हैं.

आखिर क्यों दिल टूटने के बाद जौन एलिया साहब याद आते हैं और ‘मुझे चैन क्यूं नहीं पड़ता, एक ही शख्स था जहान में क्या’ बुनबुनाते हैं. प्यार मार्मिक है. दिल को जोड़ता है. धोखा मिलता है तो दिल टूटता है. क्या इसे रील्स की दुनिया में समझा जा सकता है, जहां वीडियो का स्खलन 16-30 सैकेंड में हो जाता है.

मगर दिक्कत और बड़ी है कि सोशल मीडिया ने युवाओं को इन शब्दों से और दूर कर दिया है. गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड बना लेना प्यार नहीं होता, इस में कोई बड़ी बात नहीं. ओपोजिट सैक्स एकदूसरे के करीब आते ही हैं, पहले भी आते थे या आने की इच्छा रखते थे. प्यार एकदूसरे को अपनी फीलिंग शेयर करना, सपोर्ट करना, केयर करना, सुधारना और बदलना होता है. प्रेम के शब्द गढ़े जाते हैं उन में स्पष्टता होती है, यहां सस्पेक्ट का सुस, डेफिनेटली का हाइली, करिज्मा का रिज, सैक्सी या स्टाइलिश का ड्रिप नहीं चलता, बल्कि चलती है, घुमावफिराव, लफ्फेलफ्फाजी चलता है.

कोई अपनी गर्लफ्रैंड को चांद या फूल कहता है, तो इसलिए नहीं कि वह ये सब है. इस का मतलब यह है कि चूंकि चांद और फूल सुंदर और खुशबूदार होते हैं तो गर्लफ्रैंड को उन का रूपक दिया जाता है.

इसे जौन कीट्स और फैनी ब्रोन के प्यार से समझा जा सकता है. इन की प्रेम कहानी साहित्य के इतिहास की सब से मार्मिक कहानियों में से एक है. इंग्लिश रोमांटिसिज्म के एक बड़े कवि कीट्स ने 1818 में 23 साल की उम्र में लंदन के हैम्पस्टेड में रहते हुए फैनी ब्रोन से मुलाकात की थी. इंग्लिश रोमांटिसिज्म 18वीं शताब्दी के अंत और 19वीं के शुरुआत तक चला. इस दौरान बड़ेबड़े कवि पैदा हुए जो इंडस्ट्रियल रेवोलुशन के रिएक्शन से उपजे थे.

जौन का प्रेम जल्दी ही परवान चढ़ा, लेकिन यह कई चुनौतियों से भरा हुआ था, जिन में मुख्य चुनौती बिगड़ती सेहत और आर्थिक तंगी थी.

कीट्स और ब्रोन का प्यार गहरा था, जैसा कि कीट्स के फैनी को लिखे गए पत्रों में दिखाई भी देता है. ये पत्र अंगरेजी भाषा के सब से भावुक माने जाते हैं. कीट्स ने अपने पत्रों में अपने प्यार का जिक्र किया. लेकिन साथ ही अपने डर भी व्यक्त किए. वह अपनी प्रेमिका से अपनी समस्याएं साझा करते थे. उन का टीबी तेजी से बढ़ रहा था, और उन्हें इस बात का डर था कि उन के पास समय बहुत कम है.

1820 में कीट्स अपनी बीमारी से उबरने की उम्मीद में इटली चले गए, फैनी लंदन में रह गई. दुखद यह था कि वे फिर कभी एकदूसरे से मिल नहीं पाए क्योंकि फरवरी 1821 में रोम में कीट्स का 25 साल की उम्र में निधन हो गया. 1814 और 1819 के बीच जौन कीट्स ने 64 सानेट लिखे. सोनेट 14 लाइनों की लम्बी कविता होती है, जो 13वीं शताब्दी में इटली से शुरू हुई. इसे छोटा गाना भी कहा जा सकता है. जब कीट्स अपना पहला सोनेट लिखा था, तब उन की उम्र 18 साल थी, और जब उन्होंने अपना अंतिम सोनेट पूरा किया, तब उन की उम्र 24 साल थी. इंग्लैंड में नए बदलावों के का असर कीट्स पर पड़ा, जो उन की कविताओं में दिखती है.

कीट्स की मृत्यु के बाद, फैनी ब्रोन ने कई वर्षों तक शोक वस्त्र पहने और सार्वजनिक जीवन से दूर रहीं. उन्होंने बाद में शादी की और परिवार बसाया, पर कीट्स से उन का संबंध उन प्रेम पत्रों के माध्यम से हमेशा जीवित रहा, जो कीट्स ने उन्हें लिखे थे. उन्हीं में से एक पत्र यहां साझा किया जा रहा है.

(पत्र)

माय लव,

इस पल मैं ने कुछ पंक्तियां साफसुथरी तरीके से लिखने की ठानी थी, लेकिन मैं इसे जारी नहीं रख पा रहा हूं. मुझे तुम्हें कुछ लाइनें लिखनी होंगी ताकि शायद तुम्हें थोड़े समय के लिए अपने मन से हटा सकूं. लेकिन सच कहूं तो मेरे मन में बस तुम्हारा ही ख्याल आता है.

मेरा प्यार मुझे स्वार्थी बना चुका है. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता, तुम्हारे सिवाय मुझे कुछ याद नहीं रहता, बस फिर से तुम्हें देखना चाहता हूं. वहीं पर मेरे जीवन की गति रुक जाती है. मुझे कोई और दिशा नहीं दिखती. तुम ने मुझे पूरी तरह अपने में समा लिया है.

इस वक्त ऐसा महसूस हो रहा है जैसे मैं पिघल रहा हूं. तुम्हें जल्दी देखने की आशा न हो तो मैं बहुत दुखी हो जाऊंगा. मैं तुम से दूर जाने से डरता हूं. मेरी प्यारी फेनी, क्या तुम्हारा दिल कभी बदलेगा? मेरी जान, क्या ऐसा होगा? अब मेरे प्रेम की कोई सीमा नहीं रही.

तुम्हारा संदेश अभी आया और वह मुझे दूर रह कर भी सुकून नहीं दे सकता. यह किसी बहुमूल्य रत्नों से भरी हुई गाड़ी से भी अधिक अनमोल है. मजाक में भी मुझे डरा मत देना. मुझे यह सोच कर आश्चर्य होता था कि लोग धर्म के लिए कैसे शहीद हो जाते हैं, मैं इसे देख डर जाता था, अब नहीं. मैं भी अपने धर्म के लिए शहीद हो सकता हूं – प्यार ही मेरा धर्म है और तुम्हारे लिए मैं मर सकता हूं.

मेरा विश्वास प्रेम है और तुम उस में मेरी एकमात्र आस्था हो. तुम ने मुझे अपने वश में कर लिया है, एक ऐसी शक्ति से जिस का मैं विरोध नहीं कर सकता. तुम्हें देखने के बाद भी मैं ने अकसर “अपने प्रेम के तर्क के खिलाफ तर्क” करने का प्रयास किया. अब मैं यह नहीं कर सकता. दर्द बहुत बड़ा होगा. मेरा प्यार स्वार्थी है. मैं तुम्हारे बिना सांस भी नहीं ले सकता.

तुम्हारा,

जौन कीट्स

Best Hindi Story : 2 दूल्हे 2 दुलहनियां

लेखक : युगेश शर्मा 

नंदिता ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस छोटे भाई को पढ़ालिखा कर उस ने अफसर की कुरसी तक पहुंचाया है, एक अच्छे परिवार में शादी करवा कर जिस की गृहस्थी बसाई है वही भाई उस के साथ ऐसा बरताव करेगा. उस ने नया फ्लैट खरीदने के लिए डेढ़ लाख रुपए देने से इनकार ही तो किया था. उस ने तब उस को समझाया भी था कि हमारा यह पुश्तैनी मकान है. अच्छे इलाके में है. 2 परिवार आराम से रह सकें, इतनी जगह इस में है.

तब नवीन ने बड़ी बहन के प्रति आदरभाव को तारतार करते हुए कह डाला, ‘‘दीदी, मां और बाबूजी के साथ ही इस पुराने मकान की रौनक भी चली गई है. अब यह पलस्तर उखड़ा मकान हमें काटने को दौड़ता है. मोनिका तो यहां एक दिन भी रहना नहीं चाहती. मायके में वह शानदार मकान में रहती थी. कहती है कि इस खंडहर में रहना पड़ेगा, उस को यह शादी के पहले मालूम होता तो वह मुझ से शादी भी नहीं करती. वह सोतेजागते नया फ्लैट खरीदने की रट लगाए रहती है. आखिर, मैं उस के तकाजे को कब तक अनसुना करूं.’’

नंदिता ने बहुतेरा समझाया था कि छोटी बहन नमिता की शादी महीने दो महीने में करनी है. अगर जमापूंजी फ्लैट खरीदने में निकल गई तो उस की शादी के लिए पैसे कहां से आएंगे. उस का तो जीपीएफ अकाउंट भी खाली हो चुका है.

नवीन उस दिन बहुत उखड़ा हुआ था. आव देखा न ताव, बोल पड़ा, ‘‘यह आप की चिंता है, दीदी. मैं इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहता. नमिता की शादी करना आप की जिम्मेदारी है. उस को आप कैसे निभाएंगी, आप जानें.’’

नंदिता आश्चर्य से छोटे भाई का मुंह देखने लगी. नवीन इस तरह की बातें कहेगा, उस ने तो सपने में भी नहीं सोचा था. वह भी बिफर उठी थी, ‘‘तुम नमिता के बड़े भाई हो, इस परिवार के एकमात्र पुरुष. इस तरह अपनी जिम्मेदारी से पिंड कैसे छुड़ा सकते हो तुम.’’

‘‘देखो, दीदी, अब मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूं. सच बात तो यह है कि जिम्मेदारी जिस को सौंपी जाती है वही उस को निभाने के लिए पाबंद होता है. आप परिवार में सब से बड़ी हैं,’’ नवीन ने आज अपने मन की सारी भड़ास निकालने का फैसला ही कर लिया था. बोला, ‘बाबूजी ने अंतिम समय हम लोगों की सारसंभाल की जिम्मेदारी आप को सौंपी थी और आप ने तब भी उन से वादा किया था कि आप अपनी इस जिम्मेदारी को निभाएंगी.’’

यह कह कर तो नवीन ने नंदिता के मुंह पर ताला ही लगा दिया था. कुछ कहने, समझने की उस ने गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी. वह चुपचाप ड्राइंगरूम से उठ कर अपने कमरे में जा कर बिस्तर पर पड़ गई. उस का दिमाग पुरानी स्मृतियों के झंझावातों से भर उठा. बीती घटनाएं फिल्म के दृश्यों की तरह एक के बाद एक उस के स्मृतिपटल पर उभरने लगीं :

जब थोड़ी सी बीमारी के बाद मां की मृत्यु हुई वह बीए फाइनल में थी. मेरिट में आने का मनसूबा बांधे बैठी थी वह. परिवार की सब से बड़ी संतान और लड़की होने से घर की देखभाल का जिम्मा न जाने कब उस के कमजोर कंधों पर आ पड़ा, वह समझ ही नहीं पाई. घर की गाड़ी के पहिए उस को धुरी मान कर घूमने लगे.

‘मेरी समझदार बेटी नंदिता सब संभाल लेगी,’ बाहरभीतर सब तरफ यह घोषणा कर के पिताजी ने तो घर की सारी जिम्मेदारियों से खुद को जैसे बरी कर लिया था.

 

नंदिता 3 भाईबहन हैं. नंदिता से छोटा नवीन है और नवीन से छोटी नमिता. नवीन को पढ़ने, दोस्तों के साथ मौजमस्ती करने और बाकी समय में क्रिकेट खेलने से फुरसत ही नहीं मिलती थी. नमिता तो परिवार की लाड़ली होने का पूरापूरा फायदा उठाती रही. कभी मूड होता तो घर के काम में नंदिता का हाथ बंटाती वरना सहेलियों और कालेज की पढ़ाई में ही अपने को व्यस्त रखती.

नंदिता जानती थी कि नमिता को आखिर एक दिन पराए घर जाना है. घर के रोजमर्रा के काम में भी वह रुचि ले, ऐसी कोशिश नंदिता करती रहती थी पर नमिता यह कह कर उस पर पानी फेर देती कि अभी तो मुझे आप अपने राज में आजाद पंछी की जिंदगी जी लेने दो, जब ससुराल पहुंचूंगी तो सब सीख लूंगी. समय अपनेआप सब सिखा देता है. आप आज घर को जिस कुशलता से संभाल रही हैं वह भी तो समय की जरूरत ने ही आप को सिखाया है, दीदी.

नंदिता ने इस के बाद तो किसी से शिकवाशिकायत करना छोड़ ही दिया था. प्रथम श्रेणी में बीए करने के बाद वह समाजशास्त्र में एमए कर के पीएचडी करना चाहती थी पर सोचा हुआ सब कहां हो पाता है. पिताजी ने घर की जिम्मेदारियों का वास्ता दे कर बीए करने के बाद उस को घर बैठा लिया था. बेचारी मन मसोस कर रह गई थी.

एक दिन भयानक हादसा हुआ. दौरे से लौटते समय एक सड़क दुर्घटना में उस के पिता इन तीनों भाईबहनों को अनाथ कर के संसार से विदा हो गए. नंदिता पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा. तब कुल 25 वर्ष की उम्र थी उस की. पिता के दफ्तर वालों ने बड़ी मदद की. उस को पिता के दफ्तर में ही क्लर्क की नौकरी दे दी.

 

जैसेतैसे परिवार की गाड़ी चलने लगी. कई बार पैसे की तंगी उस का रास्ता रोक कर खड़ी हुई पर नंदिता ने नवीन और नमिता को यह एहसास नहीं होने दिया कि वे अनाथ हैं. उन की पढ़ाई बदस्तूर चलती रही.

नवीन पढ़ने में होशियार था. उस ने प्रथम श्रेणी में बीए की परीक्षा पास की और खंड विकास अधिकारी के पद पर नौकरी पाने में सफल रहा.

एक दिन नंदिता के मन में आया कि अब नवीन की शादी कर दे. बहू के आने पर घर के काम में दिनरात खटने से उस को भी कुछ राहत मिल जाएगी. उस ने लड़की तलाशनी शुरू की. छोटे मामाजी की मदद से नवीन की शादी बड़े अफसर की बेटी मोनिका के साथ हो गई.

नंदिता ने मोनिका को ले कर जो आशाएं मन में पाल रखी थीं वे कुछ महीने बीततेबीतते मिट्टी में मिल गईं. बड़े बाप की बेटी ने ससुराल में ऐसे रंग दिखाए कि नंदिता को घर के काम में उस की तरफ से किसी भी तरह की मदद की उम्मीद छोड़नी पड़ी.

नंदिता को हालांकि सकारात्मक उत्तर की जरा भी आस नहीं थी, फिर भी हिम्मत बटोर कर एक दिन उस ने मोनिका से कह डाला, ‘मोनिका, मुझे भी 10 बजे दफ्तर जाना पड़ता है. मैं चाहती हूं कि रोटियां तुम सेंक लिया करो. किचन का बाकी काम तो मैं निबटा ही लूंगी. तुम से इतनी मदद मिलने पर दफ्तर जाने के लिए मैं अपनी तैयारी भी सहूलियत से कर सकूंगी.’

‘नहीं, दीदी,’ मोनिका ने रूखा सा जवाब दिया, ‘यह मुझ से नहीं होगा. मैं तो सो कर ही सुबह 9 बजे उठती हूं. नवीन के भी बहुत सारे काम मुझे करने पड़ते हैं. रोज रोटियां सेंकने का जिम्मा मैं नहीं ले सकती. वैसे भी किचन के गोरखधंधे में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. हमारे यहां तो नौकर ही यह सब करते थे. मुझे तो आप बख्श ही दीजिए.’

इस के बाद तो नंदिता ने घर के कामकाज को ले कर चुप्पी ही साध ली. खुद ही गृहस्थी की गाड़ी को एक मशीन की तरह ढोती चली गई. परिवार के बाकी सदस्य तो सब देख कर भी अनजान बन बैठे. इस बीच मौसाजी की एक बात को ले कर घर में भूचाल ही आ गया और कई दिन उस का कंपन थमा ही नहीं. उस दिन मौसाजी ने सहज भाव से इतना ही तो कहा था कि उन्होंने भी नंदिता के लिए एक अच्छा सा लड़का देखा है. लड़का क्लास टू औफिसर है. परिवार भी खानदानी है, आदर्श विचारों के लोग हैं. दहेज की मांग भी नहीं है. नंदिता वहां बहुत सुखी रहेगी.

 

मौसाजी की बात सुन कर एक मिनट के लिए तो जैसे सन्नाटा ही छा गया. नवीन और मोनिका एकदूसरे का मुंह ताकने लगे. दोनों के चेहरों पर हैरानी और परेशानी की गहरी रेखाएं खिंचती चली गईं.

‘यह क्या बात ले बैठे आप भी, मौसाजी,’ नवीन ने सकुचाते हुए अपनी बात रखी, ‘दीदी तो इस घर की सबकुछ हैं. वह तो आत्मा हैं हमारे परिवार की. बाबूजी उन्हीं को तो घर की सारी जिम्मेदारियां सौंप गए थे. अभी नमिता की शादी होनी है. हम पतिपत्नी भी अभी ठीक से सैटल नहीं हो पाए हैं. दुनियादारी की हम लोगों को समझ ही कहां है. दीदी दूसरे घर चली गईं तो इस घर का क्या होगा. हम तो कहीं के नहीं रहेंगे.’

मौसाजी हक्केबक्के थे. मोनिका के शब्दों ने तो उन्हें आहत ही कर डाला था. वह तैश में आ कर बोली थी, ‘दीदी यों ही सब संभालती रहेंगी, यह विश्वास कर के ही तो मैं नवीन के साथ शादी करने के लिए राजी हुई थी. वह हमें अधबीच में छोड़ कर इस घर से नहीं जाएंगी, यह आप साफसाफ सुन लीजिए, मौसाजी.’

नंदिता को लगा जैसे कई बिच्छुओं ने एकसाथ उस के शरीर में अपने जहरीले पैने डंक घुसेड़ दिए हैं और वह चीख भी नहीं पा रही है.

मोनिका की बात ने बुजुर्ग मौसाजी के दिल को छलनी कर डाला. एक लंबी जिंदगी देखी है उन्होंने, समझ गए कि माटी के पक्के बरतनों पर कोई रंग नहीं चढ़ता. बिना कुछ कहेसुने वह तुरंत घर से बाहर हो गए. वह जानते थे कि जिन की आंखों की शरम मर जाती है, उन के मन में मानवीय रिश्तों की कोई कीमत नहीं रहती, ऐसे लोगों को अच्छी नसीहतें देना रेत का घरौंदा बनाने जैसा है. नंदिता भी वहां ज्यादा देर बैठी न रह सकी.

 

उस दिन के बाद घर में रोज की जिंदगी तो पिछली रफ्तार से ही चलती रही पर जैसे उस में जगहजगह स्पीड ब्रेकर खडे़ हो गए थे. इन स्थितियों ने नंदिता को काफी दुखी कर दिया. वह चुपचुप रहने लगी. सिर्फ नमिता के साथ ही वह खुल कर बात करती थी, नवीन और मोनिका के साथ उस के संवाद का दायरा काफी सिकुड़ता चला गया था. ज्यादातर वह अपने कमरे में कैदी सी पड़ी रहने लगी थी. कोई कुछ पूछता तो ‘हां’ या ‘न’ में जवाब दे कर चुप हो जाती थी. जब अकेली होती तो खुद से पूछने लगती कि उस के स्नेह, परिश्रम और त्याग का उस को क्या यही प्रतिफल मिलना चाहिए था?

नवीन और मोनिका की निष्ठुरता से जूझते हुए भी नंदिता छोटी बहन के लिए अपनी जिम्मेदारी के बारे में बराबर सचेत रही. वह चुपचाप उस के लिए लड़के की तलाश में लगी रहती. एक अच्छा लड़का उस को पसंद आया. प्राइवेट कंपनी में एग्जीक्यूटिव था. अच्छी तनख्वाह थी. देखने में भी ठीक ही था. परिवार में पढ़ालिखा और उदार विचारों वाला था. उम्र में 7 साल का अंतर नंदिता की नजर में ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं था. अमूमन लड़के और लड़की की उम्र में 5-6 साल का अंतर तो आजकल आम बात है.

 

लड़के का नाम था, कपिल. एक दिन रविवार को नंदिता ने कपिल को अपने घर चाय पर बुला लिया. उद्देश्य था वह नमिता को ठीक से देख ले, आपस में जो भी पूछताछ करनी हो, कर ले. बाकी बातें तो कपिल के मातापिता से मिल कर उस को स्वयं ही तय करनी हैं. मौसाजी और मामाजी को भी अपने साथ ले लेगी. नवीन और मोनिका को इस बात की भनक लग चुकी थी पर नंदिता ने इस काम में उन की कोई भूमिका तय नहीं की थी इसलिए दोनों चुप थे.

कपिल वक्त का पाबंद निकला. शाम के 5 बजतेबजते पहुंच गया. एक सलोना सा युवक भी उस के साथ था.

‘‘कपिलजी, एक बात पूछूं?’’ नंदिता ने शुरुआत की, ‘‘आप पिछले कुछ दिनों से मेरे दफ्तर में खूब आजा रहे हैं. कोई काम तो वहां नहीं अटका है आप का?’’

‘‘जी नहीं, कोई काम नहीं अटका. यों ही आया होऊंगा.’’

‘‘आप सरीखा समझदार आदमी किसी सरकारी दफ्तर में यों ही चक्कर काटेगा, यह बात मेरे गले नहीं उतर रही.’’

‘‘समझ आने पर बात आप के गले उतर जाएगी. आप बिलकुल चिंता न करें. अभी तो बस, इतना ही बताइए कि मेरे लिए क्या आज्ञा है?’’

नंदिता ने जांच लिया कि लड़का सचमुच तेज है. उस को बातों में भरमाया नहीं जा सकता. सो बिना भूमिका के उस ने काम की बात शुरू कर दी, ‘‘आजकल शादीब्याह के मामले में आगे बढ़ने के लिए पहली और सब से जरूरी औपचारिकता है लड़केलड़की के बीच सीधा संवाद. मैं चाहती हूं कि आप कमरे में जा कर नमिता से बात करें. जो पूछना हो पूछ लें और जो बताना हो वह बताएं.’’

‘‘मैं भला क्यों करूं यह सब पूछताछ नमिता से,’’ कपिल ने शरारती लहजे  में कहा.

 

‘‘आप को नमिता को अपने लिए चुनना है. इसलिए नमिता से पूछताछ आप नहीं करेंगे तो भला कौन करेगा,’’ नंदिता पसोपेश में पड़ गई. सच बात तो यह थी कि कपिल की पहेली को वह समझ ही नहीं पा रही थी.

‘‘आप से यह किस ने कह दिया कि नमिता को मुझे अपने लिए चुनना है?’’

‘‘कपिलजी, आप को आज यह हो क्या गया है. कैसी उलटीपुलटी बातें कर रहे हैं आप.’’

‘‘मेरी बात तो एकदम सीधीसीधी है, नंदिताजी.’’

‘‘सीधी किस तरह है. मैं ने नमिता के बारे में ही तो आज आप को यहां बुलाया है. आप यह बेकार का कन्फ्यूजन क्यों पैदा कर रहे हैं?’’

‘‘कन्फ्यूजन वाली कोई बात नहीं है, मैं तो बस, आप से बात करने आया हूं.’’

‘‘मतलब.’’

‘‘यही कि मुझे तो जिंदगी में एक का चुनाव करना था, सो मैं ने कर लिया है.’’

‘‘किस का?’’

‘‘नंदिताजी का, नमिताजी की बड़ी बहन का.’’

नंदिता को लगा जैसे वह आसमान से गिर पड़ी है. एक बार तो उसे महसूस हुआ कि कपिल उस के साथ ठिठोली कर रहा है पर उस के हावभाव से तो ऐसा कुछ भी नहीं लग रहा था.

वह बोली, ‘‘यह क्या गजब कर रहे हैं आप. मैं इतनी स्वार्थी नहीं हूं कि अपनी लाड़ली बहन के सौभाग्य का सिंदूर झपट कर अपनी मांग में सजा लूं. नमिता मेरी छोटी बहन ही नहीं मेरी प्यारी बेटी भी है. मां के देहांत के बाद मैं ने प्यारदुलार दे कर उसे बड़े जतन से पाला है. मैं उस के साथ ऐसा अनर्थ तो सपने में भी नहीं कर सकती.’’ नंदिता की आंखों में आंसू छलछला आए. सारा वातावरण संजीदगी से भर गया.

 

कपिल ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा, ‘‘नंदिताजी, आप सच मानिए, पिछले एक महीने से मैं आप के बारे में ही सारी जानकारी इकट्ठी करने में लगा था. उसी की खातिर आप के दफ्तर भी जाया करता था. आप के साथ घोर अन्याय हुआ है, फिर चाहे वह हालात ने किया हो, आप के पिता ने या फिर आप के भाई ने. आप ने अपने परिवार के लिए जो तपस्या की है उस के एवज में तो आप को वरदान मिलना चाहिए था पर सब जानते हैं कि अब तक अभिशाप ही आप के पल्ले पड़ा है. क्या अपनी गृहस्थी बसाने का आप का कोई सपना नहीं है? सचसच बताइए?’’

नंदिता ने संयत होते हुए कहा, ‘‘वह सब तो ठीक है पर नमिता के सौभाग्य को अपने सपने पर कुर्बान करने के लिए मैं न तो कल तैयार थी और न आज तैयार हूं. उसे मैं जिंदगीभर कुछ न कुछ देती ही रहना चाहती हूं. उस के अधिकार की कोई वस्तु छीनना मुझे कतई गवारा नहीं है. यह मुझ से कभी नहीं होगा. आप जा सकते हैं. आप का प्रस्ताव मुझे कतई मंजूर नहीं है.’’

 

‘‘आप को मेरा प्रस्ताव मंजूर हो या न हो पर हम तो इस घर से जल्दी ही दुलहनियां ले कर जाएंगे,’’ कपिल ने वातावरण को हलका बनाने की गरज से कहा.

‘‘मेरे जीतेजी तो यह कभी नहीं होगा.’’

‘‘जरूर होगा. इस घर से एक दिन 2 दूल्हे 2 दुलहनियां ले कर ही विदा होंगे.’’

नंदिता जैसे सोते से जाग उठी. पूछा, ‘‘और वह दूसरा लड़का?’’

‘‘यह रहा,’’ साथ में बैठे सलोने युवक की ओर इशारा करते हुए कपिल ने जवाब दिया, ‘‘और इन दोनों को किसी कमरे में जा कर आपस में पूछपरख करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि ये दोनों कालेज के सहपाठी हैं. एकदूसरे को खूब जानते हैं. साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा चुके हैं, बहुत पहले.’’

‘‘पर ये हैं कौन? परिचय तो दीजिए इन का.’’

अचानक नमिता ड्राइंगरूम में आई. वह पास के कमरे में नंदिता और कपिल की बातें कान लगाए सुन रही थी.

‘‘मैं देती हूं इन का परिचय,’ नमिता बोली, ‘दीदी, इन का नाम विकास है और यह कपिलजी के चचेरे भाई हैं. डिगरी कालेज में 3 साल हम क्लासमेट रहे हैं. मेलजोल अब भी है. हम दोनों ने साथसाथ जीवन का सफर

तय करने का फैसला बहुत पहले कर लिया था.’’

‘‘लेकिन पगली, इस बारे में मुझे तो बताती. मैं तेरी दुश्मन थोड़े ही हूं,’’ नंदिता ने नमिता को अपने पास सोफे पर बिठाते हुए कहा.

‘‘आप वैसे भी इन दिनों काफी परेशान रहती हैं, दीदी. मैं विकास और अपने बारे में आप को बता कर आप की परेशानियों को बढ़ाना नहीं चाहती थी. मैंने आप से यह बात छिपाने की गलती की है. मुझे माफ करदो, दीदी.’’

 

‘‘इस में माफी जैसी कोई बात नहीं है मेरी प्यारी बहना. तू ने जो भी किया अपनी समझ से अच्छा ही किया है. विकासजी, इस बारे में आप को कुछ कहना है या फिर फैसला सुना दिया जाए?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं कहना. जो कहना था वह नमिता कह चुकी है. नंदिताजी, आप तो बस, फैसला सुना दीजिए,’’ विकास बोला.

‘‘कपिलजी ने ठीक ही कहा है, इस घर से जल्दी ही 2 दूल्हे, 2 दुलहनियां ले कर विदा होंगे,’’ इतना कह कर नंदिता ने नमिता को गले लगा लिया.

आज बरसों बाद नंदिता की सूखी आंखों में खुशी के आंसू छलछला आए. उसे लगा आज पहली बार कुदरत ने उस के साथ इंसाफ किया है. इस तरह अचानक मिले इंसाफ से कितनी खुशी होती है, इस का एहसास भी उसे पहली बार हुआ.

Movie : ‘पुष्पा 2 द रुल’ देखने में मजा आएगा जब दिमाग घर छोड़ कर आएंगे

3 स्टार
किसी सीक्वअल फिल्म के लिए पहली मूल फिल्म के बेंच मार्क को मात देना बहुत मुश्किल होता है लेकिन इस कसौटी पर निर्देशक सुकुमार सफल रहे हैं. वह 2021 की सफल फिल्म ‘पुष्पा द राइज’ का सीक्वअल ‘पुष्पा द रूल’ ले कर आए हैं. यह 3 घंटे 20 मिनट लंबी फिल्म मनोरंजन परोसने के साथ ही पुरुषप्रधान समाज पर कुठाराघात करने के साथ ही पारिवारिक मूल्यों की बात करती है. फिल्म में सिर्फ अच्छाइयां हों, ऐसा भी नहीं है.
फिल्म में गानों के अंदर नृत्य की जो कामुक भाव मुद्राएं हैं, उन्हें देख कर समाज का एक वर्ग परेशान है और आरोप लगा रहा है कि अजंता एलोरा की गुफाओं में मौजूद वल्गर मुर्तिकला को इस फिल्म में नृत्य में तब्दील किया गया है. इस तरह निर्देशक ने आम इंसान की सैक्स के प्रति जो ललक होती है, उसे भुनाने का प्रयास किया है. वहीं समाज का एक वर्ग इन नृत्य दृश्यों को देख कर आनंदित है. इतना ही नहीं पर्यावरण के मुद्दे पर फिल्म चुप रहती है. इस के अलावा समाज का एक वर्ग इस बात से नाराज है कि फिल्म सर्जक ने फिल्म में स्मगलर का महिमा मंडन किया है.

फिल्म की शुरूआत जापान में चंदन की लकड़ी के कंटेनर पहुंचने से मचे हंगामे और पुष्पा के एक्शन व जापानी भाषा में बात करने से होती है. जापानी सुरक्षा बलों से मुठभेड़ के दौरान पुष्पा के दिल में गोली लगती है और वह पानी में गिर जाता है और यह दृश्य अचानक खत्म हो जाता है. पता चलता है कि यह दृश्य पुष्पा के सपने का हिस्सा है.

इस के बाद कहानी वहीं से शुरू होती है, जहां पहले भाग की कहानी खत्म हुई थी. पुराने प्रतिद्वंदी श्रीनु (सुनील) और उस की गुस्सैल पत्नी दक्षा (अनसूया भारद्वाज) उस तस्करी सिंडिकेट पर फिर से नियंत्रण हासिल करना चाहते हैं जिसे पुष्पा अब नियंत्रित करता है. पुलिस इंस्पैक्टर से एसपी बन चुके भंवर सिंह शेखावत (फहद फाजिल) पुष्पाराज से बदला लेना चाहता है.

इस के लिए पुष्पा को नैतिक और पेशेवर रूप से हराने के लिए शेखावत, पुष्पा को उसी के अपने तस्करी के सिंडिकेट से बाहर करने की योजना पर काम कर रहा है लेकिन पुष्पाराज काम में प्रतिभाशाली है और वह हर बार शेखावत को पराजित और निशब्द कर देता है. उन की पत्नी श्रीवल्ली (रश्मिका मंदाना) और केशव (जगदीश प्रताप भंडारी) के नेतृत्व में उन के वफादार अनुयायी उन की पूजा करते हैं.

पुष्पा का अपने गले पर हाथ फिराने का इशारा अब एक नृत्य मुद्रा है. जब कहानी आगे बढ़ी है तो स्वाभाविक तौर पर पुष्पाराज का चरित्र विकसित होता है. अब उस के शरीर पर सोने के जेवर ही नजर आते हैं. उस के पास शक्ति है तो वह किसी की कहां सुनने वाला? उस की अहंकारी इच्छाएं और आत्मसम्मान की जिद उस के दुश्मनों के लिए बहुत परेशानी का कारण बनती है.

अब पुष्पा वह मजदूर नहीं रहा, वह तो बड़ा आदमी बन गया है. लेकिन आज भी श्रीवल्ली (रश्मिका मंदाना) उसे अपनी उंगलियों पर नचाती है. तभी तो एक तरफ पुष्पाराज अपनी पत्नी श्रीवल्ली की मुख्यमंत्री संग फोटो के लिए राज्य के मुख्यमंत्री को ही बदलवा देता है. तो वहीं श्रीवल्ली, पुष्पा की प्रतिष्ठा व मान सम्मान को बचाने के लिए पूरी दुनिया और यहां तक कि रिश्तेदारों से लड़ने के लिए तैयार है. भंवर सिंह शेखावत खुद ही अपनेआप को खत्म करने पर मजबूर हो जाता है तो दूसरी तरफ पुष्पाराज का सौतेला भाई मोहन (अजय) उस से माफी मांग कर उसे अपने परिवार, खानदान व गौत्र का हिस्सा स्वीकार कर लेता है.
माना कि यह कहानी एक तरफ पुष्पाराज व भंवर सिंह शेखावत के बीच बदले की है तो दूसरी तरफ पुष्पाराज द्वारा अपना हक व मान सम्मान पाने की लड़ाई है. मगर फिल्म की पटकथा इतनी कमाल की है, आप को इस बात का अहसास ही नहीं होगा कि इस में कहानी नहीं है. माना कि फिल्म में कई दृश्य एपीसोडिक हैं, मगर इन्हें जिस तरह से कहानी का हिस्सा बनाया गया है, वह कमाल का है.

लेखक व निर्देशक सुकुमार ने साबित कर दिया कि उन्हें भौगोलिक सीमाओं से परे अच्छे कंटैंट और दर्शकों की नब्ज की बेहतरीन समझ है. और वह लंबी फिल्म में भी दर्शक को बोर न होने देने की कूवत रखते हैं. फिल्म में पतिपत्नी के बीच प्यार व रिश्तों का गहराई से चित्रण है.
पुष्पाराज की अपनी असंगतियों व अंतर्विरोधों के साथ फिल्म आगे बढ़ती रहती है. पुष्पा के जीवन की समस्याओं में सब से बड़ी समस्या यही है कि वह वैधता चाहता है. वह अपने पिता का नाम, गौत्र व खानदान का नाम चाहता है. वह अपना हक, पहचान चाहता है. वह रिश्तों की भावुकता को भी समझता है इसीलिए वह हिंसक हो जाता है.

निर्देशक की सब से बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने धन को रिश्तों के बीच नहीं आने दिया. अति महत्वाकांक्षी पुष्पाराज पत्नी से प्रेम, भतीजी से स्नेह, सैातेले भाई से रिश्ते सुधरने की उम्मीद, इन सभी चक्रव्यूहों में फंसा हुआ है. पहले भाग में ही पता चल गया था कि पुष्पाराज अपने पिता की नाजायज औलाद है, सौतेला भाई उसे अपने परिवार, गौत्र या खनदान का नहीं मानता तो पहचान ही उस का बहुत बड़ा संघर्ष है. अपनी मां को वह प्रतिष्ठा दिलाना चाहता है. वह पैसे से किसी को भी खरीदने की क्षमता रखता है. मगर वह रिश्तों को पैसे के बल पर खरीदने में यकीन नहीं रखता.

बौलीवुड के किसी अभिनेता में इतना दम नहीं है कि वह इस तरह की परफौर्मेंस दे सके या किसी निर्देशक में इतना दम नहीं है कि किसी कलाकार से इस तरह की उच्च गुणवत्ता वाली परफौर्मेंस निकलवा सके. फिल्म के सारे सीन डिजाइन किए गए हैं. भाषा व संवाद पर काफी मेहनत की गई है, तभी तो फिल्म देखते समय यह अहसास नहीं होता कि यह फिल्म डब है.
फिल्म की एडिटिंग अच्छी है. एपीसोडिक एक्शन सीन को एडिटर ने कहानी के मध्य गूंथा है. जात्रा वाला दृश्य शानदार है और दर्शकों के मन में कुछ अजीब सी बेचैनी भी पैदा करता है.

फिल्म की लंबी अवधि को कम कर यह एक क्लासिक फिल्म बन सकती थी. कुछ गाने तो बेवजह ठूंसे हुए नजर आते हैं. तो वहीं कुछ घरेलू दृश्य, खासकर श्रीवल्ली और पुष्पाराज के बीच छेड़खानी और अंतरंग क्षण अनावश्यक हैं. फिल्म के संवाद अच्छे हैं. और इन संवादों को सुन कर दर्शक ताली बजाने से बाज नहीं आ सकता. नदी के माध्यम से पुलिस का चंदन के लिए पीछा करना और पुष्पा और शेखावत के बीच मूक इशारा संचार जैसे क्षण प्रभावशाली हैं.

‘फ्लावर समझे क्या? फायर है मैं’ जैसे संवाद में अल्लू अर्जुन का स्वैग दर्शकों को ताली बजाने पर मजबूर करता है. बौलीवुड तो आम इंसान को पसंद आने वाला सिनेमा बनाना भूल ही चुका है. फिल्म में एक्शन व सैक्स दोनों हैं. मगर ‘एनिमल’ से लाख गुना बेहतर है. और हर सीन जायज नजर आता है.
दक्षिण की फिल्मों से शिकायत रहती है कि इन फिल्मों में महिलाओं का सम्मान नहीं किया जाता, लेकिन अल्लू अर्जुन और सुकुमार ने इस बार सरप्राइज किया है. इन दोनों ने इस फिल्म में कुछ ऐसा कर दिखाया है जिसे करना आसान नहीं होता. बौलीवुड का सुपर स्टार फिल्म में अपने किरदार की पत्नी के पैर छूते हुए या उस के पेर में मलहम लगाते नजर नहीं आ सकता. फिल्म में नारी सशक्तिकरण के साथ ही नारी सम्मान का बहुत बड़ा मुद्दा प्रभावशाली ढंग से उठाया गया है, मगर बिना किसी भाषणबाजी के.

20 मिनट का जात्रा वाला दृश्य भावनाओं और एक्शन से भरपूर, सावधानीपूर्वक कोरियोग्राफ किया गया है. फिल्म में एक सीन है, जहां पुष्पा के 200 से ज्यादा साथियों को शेखावत पकड़ लेता है. दर्शक सोचते हैं कि अब पुष्पाराज आएगा और पुलिस स्टेशन में तोड़फोड़ व मारधाड़ कर अपने साथियों को छुड़ा ले जाएगा. पुष्पाराज अपने सभी साथियों को इज्जत से अपने साथ ले जाता है, मगर बिना मारधाड़ किए. यहां पर पुष्पाराज पुलिस स्टेशन में मौजूद सभी पुलिसकर्मियों को उन के जीवनभर की तनख्वाह का नगद भुगतान कर सभी से त्यागपत्र लिखवा लेता है और अपने साथियों को ले कर चला जाता है.
कई लोग इस दृश्य पर आपत्ति जता रहे हैं. दक्षिण की फिल्मों की चिरपरिचत शैली में इस फिल्म में भी धर्म है. पूजापाठ है, मगर फिल्म सर्जक ने इन्हें सांस्कृति धरातल पर फिल्माया है, न कि धर्म को बेचा है.
निर्देशक ने चाहे जो मुद्दे उठाए हों, पर उस ने इस बात पर जोर दिया कि वह क्लासी नहीं बल्कि मासी फिल्म यानी कि आम दर्शकों की पसंद को ध्यान में रख कर फिल्म बनाई है.

फिल्म के कुछ दृश्यों पर यकीन करना भले मुश्किल हो, मगर फिल्मकारों के लिए यह सिनेमायी स्वतंत्रता है. मसलन-फिल्म के शुरूआती दृश्य में कंटेनर में 40 दिन बिना कुछ खाएपिए जापान पहुंचना कैसे संभव है? कंटेनर के अंधेरे में किसी किताब को पढ़ कर जापानी भाषा सीखना कैसे संभव है. जब आप के हाथ व पैर दोनों बंधे हों, तब आप कैसे उछल कर दांतों से किसी को काट या यूं कहें कि घायल कर सकते हैं?
फिल्म में जत्रा वाले दृश्य में जब पुष्पाराज को पता चलता है कि उस की पत्नी श्रीवल्ली गर्भवती है तो वह कामना करता है कि बेटी पैदा हो. इस के पीछे उस की सोच यह हे कि बेटी को शादी के बाद अपने आप गौत्र व खानदान मिल जाएगा. इस तरह यहां पर निर्देशक ने कहीं न कहीं पुरुष प्रधान समाज व पितृसत्तात्मक सोच पर चोट की है.

जहां तक तकनीकी पक्ष का सवाल है तो फिल्म के कैमरामैन पोलैंड के मूल निवासी सिनेमैटोग्राफर कुबा ब्रोजेक मिरोस्लोव बधाई के पात्र हैं. फिल्म का वीएफएक्स भी प्रभावशाली है. फिल्म का सर्वाधिक कमजोर पक्ष इस का संगीत है.
हक, मान सम्मान, पहचान हासिल करने के साथ ही सौतेले भाई के साथ बचपन से ही एक अजीब तरह की लड़ाई लड़ रहे पुष्पा राज के किरदार में अल्लू अर्जुन ने जानदार अभिनय किया है. श्रीवल्ली के किरदार में रश्मिका मंदाना ने भी ठीक काम किया है लेकिन अधिक नाटकीय उदाहरणों में कार्टून जैसा महसूस कराती है. यह उन की कमजोरी है.

मलयालम फिल्मों के सुपर स्टार हीरो फहाद फाजिल ने इस फिल्म में विलेन भंवर सिंह शेखावत के किरदार में कमाल का अभिनय किया है. फहाद फाजिल ने साबित कर दिखाया कि उन के अंदर हर तरह के किरदार को निभाने की क्षमता है.
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