Download App

नचिकेत नार्वेकर ने रखा बौलीवुड में कदम, जानें कौन हैं ये?

एक तरफ कंगना रानौट लगातार नेपोटिजम को लेकर हल्ला मचा रही हैं, तो दूसरी तरफ बौलीवुड की हस्तियों की संतानें लगातार बौलीवुड से जुड़ती जा रही हैं. अब 21 जून को प्रदर्शित हो रही निर्माता, लेखक व निर्देशक अमित अग्रवाल की फिल्म ‘‘फंसते फंसाते’’ से अपने समय के मशहूर फिल्मकार एन. चंद्रा के बेटे नचिकेत नार्वेकर भी बौलीवुड में कदम रखने जा रहे हैं. ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के मुद्दे पर बनी पर इस हास्य फिल्म में नचिकेत ने एक शादीशुदा युवक देव का किरदार निभाया हैं, जो कि आकाश (अर्पित चैधरी) का दोस्त है.

ये भी पढ़ें- बिहार के छपरा में होगा “सारण अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह” !

बौलीवुड से जुड़ने की चर्चा चलने पर नचिकेत कहते हैं-‘‘मेरी परवरिश फिल्मी माहौल में ही हुई है. मेरे पिता एन. चंद्रा ने ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘तेजाब’, ‘नरसिम्हा’, ‘वजूद’,  ‘शिकारी’ व ‘यह मेरा इंडिया’ जैसी सफलतम फिल्में निर्देशित की हैं. पर वह खुद मुझे निर्देशित नही करना चाहते थे. मैं भी अपनी प्रतिभा के बल पर बौलीवुड से जुड़ना चाहता था. मुझे एक अच्छी पटकथा की तलाश थी. फिल्म ‘फंसते फंसाते’ के निर्देशक अमित अग्रवाल सर मुझे लंबे समय से जानते हैं. एक दिन उन्होंने मुझे बुलाकर इस फिल्म की पटकथा सुनायी, मैंने तुरंत हामी भर दी. मैंने खुद कहा कि मुझे देव का किरदार निभाना है.’’

ये भी पढ़ें- आयुष्मान खुराना: हमें अपने देश को बेहतर बनाने की जरूरत है

नचिकेत नार्वेकर आगे कहते हैं- ‘‘फिल्म ‘फंसते फंसाते’ ऐसी कंटेंट प्रधान फिल्म है, जिसके साथ पूरा यूथ रिलेट करेगा. इस फिल्म से मेरे करियर को नई गति मिलेगी. मैं इस फिल्म को लेकर इतना उत्साहित हूं कि मैंने इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद ही दूसरी फिल्म लेने का निर्णय लिया हैं.’’

जोखिम उठाएं और एडवेंचर स्पोर्ट्स का मजा लें

एडवैंचर स्पोर्ट्स का अलग ही मजा है. आप अपने जीवन के कुछ घंटे ऐसी चुनौतीपूर्ण ऐक्टिविटीज को करने में व्यतीत करते हैं जो आप को उत्साह और थ्रिल से भर देती हैं. ये ऐक्टिविटीज ट्रेनर्स की देखरेख में होती हैं, तो इन में जान का खतरा नहीं होता. इन में मजा इतना आता है कि लगता है जिंदगी जी ली. एडवैंचर स्पोर्ट्स वे होते हैं जिन में शारीरिक के साथसाथ मानसिक संबल की भी जरूरत होती है.

एडवैंचर स्पोर्ट्स कई तरह के होते हैं. भारत में अलगअलग पर्यटन स्थलों पर अलगअलग एडवैंचर स्पोर्ट्स होते हैं. इन एडवैंचर स्पोर्ट्स में स्काईडाइविंग, रिवर राफ्टिंग, बंजी जंपिंग, स्कूबा डाइविंग, माउंटेन बाइकिंग, रौक क्लाइंबिंग, पैराग्लाइडिंग प्रमुख हैं. अरुणाचल प्रदेश, गोवा, ऋषिकेश, असम और हिमाचल प्रदेश एडवैंचर स्पोर्ट्स के लिए मुफीद जगहें हैं.

बंजी जंपिंग

बंजी जंपिंग में आप को कुछ सेफ्टी उपकरण पहनाए जाते हैं और एक लंबी मजबूत रस्सी से बांधा जाता है. इस के बाद आप को जमीन से 70-130 मीटर के बीच की ऊंचाई के एक प्लेटफौर्म से नीचे कूदना होता है. रस्सी की इलास्टिसिटी के कारण वह आप के भार के अनुसार तेजी से आप को नीचे ले जाती है और उतनी ही तेजी से वापस ऊपर खींचती है. रोमांच के शौकीनों के लिए इस से बेहतर आखिर क्या हो सकता है.

ये भी पढ़ें- सोलो ट्रैवल टिप्स: जो बनाएं आपके सफर को खूबसूरत

कहां जाएं

ऋषिकेश : बंजी जंपिंग के लिए भारत के कुछ पर्यटन स्थल मशहूर हैं. ऋ षिकेश के मोहनचट्टी गांव को बंजी जंपिंग के लिए जाना जाता है. इस

बंजी जंपिंग सैंटर का नाम जंपिन हाइट्स है. इसे पूर्व आर्मी अफसर और न्यूजीलैंड से आए ट्रेनर्स द्वारा चलाया जाता है. यहां एक फिक्स्ड प्लेटफौर्म है जो जमीन से 83 मीटर ऊंचाई पर स्थित है. एक जंप के लिए यहां की फीस 2,500 रुपए है. जंपिन हाइट्स मंगलवार को बंद रहता है.

बेंगलुरु : बेंगलुरु का ओजोन एडवैंचर भी बंजी जंपिंग के लिए मशहूर स्थानों में से एक है. यहां कोई फिक्स्ड प्लेटफौर्म नहीं है, एक क्रेन के जरिए 80 मीटर की ऊंचाई से जंप कराई जाती है. यहां 18 से 60 वर्ष के व्यक्ति इस का लुत्फ उठा सकते हैं. अक्तूबर से फरवरी के बीच यहां आप बंजी जंपिंग के लिए जा सकते हैं. यहां एक व्यक्ति को जंप कराने के मात्र 400 रुपए लगते हैं.

दिल्ली : दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके में स्थित वंडरलस्ट में बंजी जंपिंग 51 मीटर ऊंचाई से कराई जाती है. इस की खास बात यह है कि यहां के ट्रेनर्स जरमनी से प्रशिक्षण प्राप्त हैं और एडवैंचर स्पोर्ट्स जरमन तकनीक से औपरेट होते हैं. 14 से 50 वर्ष के व्यक्ति इस का लुत्फ उठा सकते हैं. यहां बंजी जंपिंग के लिए 3,000 रुपए प्रतिव्यक्ति फीस है. यह हफ्ते के सभी दिन खुला रहता है.

स्कूबा डाइविंग

स्कूबा डाइविंग सब से ज्यादा रोमांचकारी अंडरवाटर एडवैंचर स्पोर्ट है. यह समुद्र के अंदर होता है. इस में गोताखोर के चेहरे पर मास्क पहनाए जाते हैं जो उसे पानी के अंदर सांस लेने में मदद करते हैं. स्कूबा डाइविंग में आप समुद्र की अंदरूनी दुनिया से वाकिफ होते हैं जो अपनेआप में ही विस्मयकारी अनुभव है. यह ट्रेनर्स की मौजूदगी में सेफ्टी उपकरणों के साथ कराया जाता है.

कहां जाएं

अंडमान और निकोबार द्वीप : गहरे साफ पानी और समुद्री जनजीवन के लिए जाना जाने वाला यह द्वीप बैस्ट अंडरवाटर स्पोर्ट्स के लिए मशहूर है. यहां ऐसे ढेरों डाइविंग स्थल हैं जहां आप को स्टारफिश, औक्टोपस, स्कौर्पियन फिश और कोरल रीफ्स जैसी वैराइटीज देखने को मिलती हैं.

द वाल, किनके आइलैंड और फिश रौक जा कर आप स्कूबा डाइविंग कर सकते हैं. यहां 5 हजार से 10 हजार रुपए के बीच में स्कूबा डाइविंग कराई जाती है.

पुदुचेरी : यहां का कोरल शार्क्स रीफ स्कूबा डाइविंग के लिए बेहद ही खूबसूरत और रोमांचभरी जगह है. खूबसूरत इसलिए क्योंकि यहां का समुद्र तल रेतीला है व कोरल रीफ्स सुंदर, रोमांचकारी इसलिए क्योंकि डाइविंग की गहराई 5 मीटर से 25 मीटर के मध्य है.

यहां डाइविंग करने का अच्छा समय मार्च और अक्तूबर है जब पानी ठंडा व शांत होता है. स्कूबा डाइविंग करने के लिए आप को प्रतिव्यक्ति 3,500 से 6,000 रुपए के बीच खर्च करने होंगे.

गोवा : गोवा केवल अपने बीचेस और पार्टीज के लिए ही मशहूर नहीं हैं, बल्कि यह एडवैंचर स्पोर्ट्स के लिए भी लोगों में चर्चा का विषय बना रहता है. गोवा का ग्रैंड आइलैंड दुनियाभर में एडवैंचर के शौकीनों का पसंदीदा एडवैंचर स्थल है. यहां पहुंचने के लिए आप को नाव या फैरी से जाना होता है.

यहां का तापमान नवंबर और मार्च के महीने में परफैक्ट होता है, तो आप उस समय यहां जा सकते हैं. प्रतिव्यक्ति 4,000 रुपए में स्कूबा डाइविंग कराई जाती है. बताए गए रेट कमज्यादा हो सकते हैं.

रौक क्लाइंबिंग

भारत अपनी पर्वत शृंखलाओं को रौक क्लाइंबिंग, माउंटेनियरिंग और दूसरे एडवैंचर स्पोर्ट्स के लिए भलीभांति इस्तेमाल कर रहा है. रौक क्लाइंबिंग में व्यक्ति पर्वतों पर ऊपर की तरफ या साइड में चढ़ाई करता है. पर्वत या पत्थर प्राकृतिक भी हो सकते हैं और कृत्रिम भी. वह समय जा चुका है जब सभी को लगता था कि रौक क्लाइंबिंग केवल प्रशिक्षण प्राप्त ऐथलीट ही कर सकते हैं. अब युवा अपनी ताकत और शक्ति का मुआयना करने के लिए रौक क्लाइंबिंग के लिए आते हैं और इस एडवैंचर स्पोर्ट का मजा उठाते हैं. रौक क्लाइंबिंग के लिए टूरिस्ट किसी रौक क्लाइंबिंग अकादमी से शौर्टटर्म कोर्स के बाद रौक क्लाइंबिंग कर सकते हैं. इस के लिए विशेष उपकरण होते हैं जिन्हें वे खरीद सकते हैं और ट्रेनर्स की मदद से इस एडवैंचर का आनंद ले सकते हैं.

ये भी पढ़ें- कम खर्च में घूमें ऋषिकेश, जानें कैसे

कहां जाएं

हिमाचल प्रदेश : हिमाचल प्रदेश में कई पर्वत शृंखलाएं हैं जहां चोटी तक पहुंचने की इच्छा पर्यटकों को रौक क्लाइंबिंग की तरफ खींचती है. हिमाचल प्रदेश की पर्वत वैली रौक क्लाइंबिंग के लिए बहुत मशहूर है. यहां जाने का अच्छा सीजन मार्च से अक्तूबर है. पर्वत वैली शृंखला की ऊंचाई 5,319 मीटर है.

लेह : लेह का शेय रौक, रौक क्लाइंबिंग के लिए एक आदर्श गंतव्य स्थल है. लेह ट्रैवलिंग के लिए युवाओं में मशहूर है और यही कारण है कि यहां विभिन्न एडवैंचर स्पोर्ट्स को शामिल किया जाने लगा है. रौक क्लाइंबिंग के साथ ही रौक मूविंग भी पर्यटकों के लिए मजेदार स्पोर्ट है. जुलाई से सितंबर के बीच का समय यहां रौक क्लाइंबिंग के लिए बैस्ट है.

केरल : केरल स्थित पैथलमाला प्राकृतिक सौंदर्य के बीच रौक क्लाइंबिंग करने के लिए सब से अच्छा स्थान है. दक्षिण भारत में स्थित यह पर्वत शृंखला भारत की प्रमुख पर्वत शृंखलाओं में से एक है. यहां भीषण गरमी में जाने से बचें. जुलाई से अक्तूबर का समय यहां जाने के लिए बेहतर है.

मशरूम कटलेट रेसिपी

यह एक बहुत ही स्वादिष्ट कटलेट रेसिपी है, जिसमें मशरूम, आलू और मसाले से कटलेटस तैयार किए जाते हैं. इसके बाद इन्हें अंडे में डिप करके ब्रेड क्रम्बस में लपेटकर डीप फ्राई किया जाता है. तो आइए जानते है इसकी रेसिपी.

सामग्री

400  मशरूम ( पोंछकर साफ करके काट लें)

1 कप प्याज  (कटा हुआ)

2 टेबल स्पून तेल

1 टी स्पून जीरा

2 टी स्पून अदरक (बारीक कटा हुआ)

1 कप आलू (उबालकर मैश किए हुए)

धनिया पाउडर (2 टी स्पून)

आमचूर (2 टी स्पून)

नमक (1/2 टी स्पून)

हरी मिर्च (2 टी स्पून)

2 अंडे

मैदा (1/2 कप)

ड्राई ब्रेड क्रम्बस

तेल (आवश्यकतानुसार)

ये भी बनाएं- घर पर बनाएं बेसनी पनीर सब्जी

बनाने की वि​धि

एक पैन में 2 बड़े चम्मच तेल गर्म करें, इसमें जीरा और अदरक डालें.

इसे हल्का सा फ्राई करें और इसमें मशरूम डालें और इसे तेज आंच पर पकाएं ताकि इसका सारा मौइश्चर सूख जाए.

इसमें, धनिया, आमचूर, नमक और हरी मिर्च डालकर कुछ देर भूनें और आंच बंद कर दें.

जब यह ठंडा हो जाएं तो इसमें आलू मिलाएं.

इससे ओवल शेप के कटलेट्स तैयार कर लें.

इन पर मैदा डाले और  इसके बाद अंडे में डीप करें.

अब इसे क्रम्बस में कोट करें.

एक बार फिर से कटलेट्स को अंडे में डीप करें और फिर क्रम्बस लगाएं.

कटलेट्स को डीप फ्राई करें और गोल्डन कलर आने पर बाहर निकालकर सर्व करें.

ये भी पढ़ें- समर रेसिपी: आम पन्ना

सावधान! प्रोटीन पाउडर के भी होते हैं साइड इफेक्ट

अक्सर लोग प्रोटीन सप्लिमेंट की पूर्ति के लिए प्रोटीन पाउडर का सहारा लेते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि प्रोटीन पाउडर के भी साइड इफेक्ट होते हैं. इससे आपकी उम्र भी कम हो सकती है. पर ये आपके सेहत को नुकसान भी पहुंचा सकता है. तो चलिए जानते हैं, प्रोटिन पाउडर से होने वाले नुकसान के बारे में.

प्रोटीन पाउडर के भी साइड इफेक्ट

ऐसा इसलिए है क्योंकि ये प्रोटीन पाउडर ब्रांच्ड-चेन एमिनो एसिड (बीसीएए) से भरपूर होते हैं, जो कि बल्कअप करने में तो मदद करते हैं और मांसपेशियों के निर्माण में भी लाभ देते हैं, लेकिन इसके साथ ही साथ यह सेहत से जुड़े कई वितरित प्रभावों से भरे होते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के चार्ल्स पर्किन्स सेंटर के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक शोध, जोकि नेचर मेटाबौलिज्म में प्रकाशित हुआ. इसके अुनसार यह हमारे स्वास्थ्य के लिए भी नुकसान का कारण बन सकते हैं.

ये भी पढ़ें- क्या आपको भी होती है सांस फूलने की परेशानी ?

भले ही बीसीएए से भरपूर प्रोटीन पाउडर आपको मसल्स दे सकता है  लेकिन यह गंभीर नतीजे भी दे सकता है और उपभोग करने वालों की जीवन-काल को प्रभावित कर सकता है. इस शोध का शीर्षक था, ‘ब्रांच्ड-चेन एमिनो एसिड स्वास्थ्य और जीवनकाल को अप्रत्यक्ष रूप से एमिनो एसिड संतुलन और भूख नियंत्रण के माध्यम से प्रभावित करता है’ इस शोध के अनुसार बीसीएए किसी की उम्र को कम कर सकता है. इसके साथ ही बीसीएए से मोटापे का जोखिम भी बढ़ सकता है.

ये भी पढ़ें- जानें, मेंटल हेल्थ को कैसे बनाएं स्ट्रौन्ग

यूनिवर्सिटी औफ सिडनी की वेबसाइट पर प्रकाशित अध्ययन पर एक रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने एक स्वस्थ और संतुलित आहार के माध्यम से विभिन्न प्रकार के प्रोटीन स्रोतों के साथ बीसीएए-समृद्ध प्रोटीन शेक की जगह लेने का सुझाव दिया, जो अमीनो एसिड की वाइड रेंज में समृद्ध हो.

बुजुर्गों को सबसे अधिक परेशानी बेटों से  

हेल्पेज इण्डिया की सर्वे रिपोर्ट से पता चलता है कि घरों में वृद्धों की देखभाल करने वाले 29 प्रतिशत लोगों को यह उनकी देखभाल करना बोझ महसूस होता है. 15 प्रतिशत को यह काम बहुत भारी लगता है. ऐसे में वह वृद्धों को घर की जगह पर ओल्ड ऐज होम में ही रखना पसंद करते है. संयुक्त राष्ट्र द्वारा 15 जून को ‘विश्व वृद्ध दुव्र्यवहार जागरूकता दिवस‘ किया गया है. हेल्पेज इण्डिया ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘भारत में वृद्ध दुव्र्यवहारः देखभाल में परिवार की भूमिकाः चुनौतियां एवं प्रतिक्रियाएं‘ रिपोर्ट का विमोचन किया. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में उत्तर प्रदेश सरकार के समाज कल्याण मंत्री रमापति शास्त्री ने यह रिपोर्ट जारी की.

रिपोर्ट में 25.7 प्रतिशत देखभाल करने वालों का कहना है कि उन्हें थकान एवं कुंठा होती है जिससे वृद्ध रिश्तेदार के प्रति उनका व्यवहार आक्रामक हो जाता है. 35 प्रतिशत देखभाल करने वालों ने बताया कि वृद्धों की देखभाल से कोई खशी महसूस नहीं हुई. 29 प्रतिशत देखभाल करने वालों का सोचना है कि ‘पैसे देकर उन्हें वृद्धाश्रम में रखना और वहां जाकर मिलते रहना ज्यादा अच्छा है‘. तमाम लोग ऐसे भी है जो बोझ महसूस होने के बावज़ूद भी वृद्धजनों की देखभाल करते हैं. 32 प्रतिशत देखभाल करने वालो ने बताया कि दैनिक क्रियाएं जैसे कपड़े बदलना, चलना, खाना, नहाना, शौच आदि में मदद/सहायता देने के लिये शारीरिक रूप से देखभाल करते हैं. देखभाल करने वालों में 68 प्रतिशत महिलायें है इनमें मुख्यतः बहू औरं बेटी है.

ये भी पढ़ें- अपने ही परिवार की खूनी इंजीनियरिंग

39 प्रतिशत वृद्धों की कोई मासिक आय नहीं होने से वे अपने देखभाल करने वाले पर निर्भर थे. ऐसे लोगों की हालत ज्यादा खराब होती है. वृद्ध की देखभाल में एक परिवार औसतन रु. 4,125 रूपया खर्च करता है. 42.5 प्रतिशत देखभाल करने वालों को हमेशा ही वृद्धों की दवाईयों पर खर्च करना होता है. आर्थिक मदद के लिये वृद्ध अपने बेटों की तरफ ज्यादा देखते हैं, उदाहरण के लिये व्यक्तिगत आवश्यकताओं हेतु 57 प्रतिशत आर्थिक मदद बेटों से ली गई, 23 फीसदी मदद बहुओं से ली गई. 45 फीसदी जीवनसाथी को पसद नहीं करे है.

जिन वृद्धों में व्यग्रता, आत्मविश्वास की कमी, अवसाद एवं अकेलापन होता है उन्हें भावनात्मक सहारा दिये जाने की आवश्यकता महसूस की जाती है. 70 प्रतिशत आश्रित वृद्धों को देखभाल करने वालों से मुश्किल परिस्थितियों में कभी-कभी से हमेशा ही भावनात्मक सहारे की तलाश रहती है. 35 प्रतिशत देखभाल करने वालों ने वृद्धों को भावनात्मक सहारा तथा ढांढस दिया. 43 प्रतिशत देखभाल करने वालो ने वृद्धों की व्यक्तिगत समस्याओं को सुना और उन्हें भावनात्मक सहारा दिया. 78.1 प्रतिशत देखभाल करने वालों को लगता है कि सरकार के द्वारा ऐसी नीति बनाई जाये जिससे घर में वृद्ध की देखभाल करने के बोझ में कुछ आसानी हो सके.

सरकार को चाहिये कि वृद्वजनों को दवाईयों में रियायत, बेहतर चिकित्सीय यातायात सुविधा, सरकारी सहायता प्राप्त वृद्धाश्रम, हेल्थ-कार्ड का प्रावधान, सरकारी चिकित्सीय संस्थानों में मुफ्त इलाज, जीएसटी मुक्त रियायती दवाईयां, सरकारी अस्पतालों में बेहतर चिकित्सीय कर्मचारी एवं अधिकारी, मेडिकल इंश्योरेंस पाॅलिसी, मेडिक्लेम तथा अस्पताल आने-जाने हेतु यातायात सुविधा देनी चाहिये. वृद्धों के साथ हो रहे जघन्य अपराधों के प्रति जागरूकता लाने के उदेश्य से प्रत्येक वर्ष समूचे विश्व में ‘विश्व वृद्ध दुव्र्यवहार जागरूकता दिवस‘ मनाया जाता है.

ये भी पढ़ें- अनचाहा पति

हेल्पेज इण्डिया द्वारा किये गये सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भारत में वृद्धों से दुव्र्यवहार का स्तर ना सिर्फ व्यापक है अपितु दुर्भाग्यवश दुव्र्यवहार करने वाले उनके अपने बच्चे होते हैं, जिसमें ज्यादातर बेटा-बहू हैं. निरादर, उपेक्षा एवं मौखिक दुव्र्यवहार दुव्र्यवहारों के मुख्य प्रकार हैं. रिपोर्ट में 20 शहरों के 30 से 50 आयुवर्ग की सैण्डविच पीढ़ी को केन्द्रित किया गया है. यह वह पीढ़ी है जिसे अपने वृद्ध माता-पिता और अपने बच्चों दोनों की देखभाल करनी है. यह वह पीढ़ी भी है जो पूर्व में हेल्पेज द्वारा किये गये सर्वें में प्राथमिक दुव्र्यवहारकर्ता निकली थी.

आश्चर्यचकित तो यह करता है कि भले ही वृद्धों को घर में अपने वयस्क बच्चों के हाथों दुव्र्यवहार सहना पड़ता है परन्तु वे फिर भी परिवार के दायरे में ही रहना चाहते हैं. इसका इलाज यह है कि उनके बच्चे को समझाया जाय जिससे वह वृद्धोंजनो के साथ अच्छा व्यवहार कर सके. परिवार की समस्या यह है कि उनपर वृद्धों की देखभाल को लेकर आर्थिक बोझ भी बढता जा रहा है. हेल्पेज इण्डिया के निदेशक श्री ए. के. सिंह ने कहा कि सरकार को चाहिये कि वृद्धों के लिये ऐसी योजनायें लाये जिससे परिवार पर बढते आर्थिक बोझ को कम किया जा सके.

ये भी पढ़ें- स्टिंग आपरेशन का खेल

हेल्पेज इण्डिया के सीईओ मैथ्यू चेरियन ने कहा कि ‘हम इस बात में पूर्णतः विश्वास करते हैं कि ‘मेरे माता-पिता मेरी जिम्मेदारी है और वृद्धों की सबसे अच्छी देखभाल घर पर ही हो सकती है.ऐसे में अब सरकार को ऐसा सिस्टम बनाना चाहिये कि वृद्ध जनो के कारण घरों पर पडने वाले बोझ को कम किया जा सके. हेल्पएज की रिपोर्ट से पता चलता है कि हर घरों में वृद्धों की देखभाल करने वाले 29 प्रतिशत देखभाल करने वालों में मुख्यतः बेटा, बहू, बेटी और दामाद होते है. अब इनकों वृद्धों की देखभाल करना बोझ महसूस होता है.

मौनसून में आपके त्वचा को फ्रेश रखेंगे ये 3 टिप्स

मौनसून की शुरूआत हो चुकी है. अगर आप भी अपनी त्वचा को मानूसन के असर से बचाना चाहती हैं, तो आपको कुछ खास मौनसून ब्यूटी टिप्स बताते हैं, जिससे आप अपनाकर त्वचा का ख्याल रख सकती है. ताकि आपकी त्वचा मौनसून में भी तरोताजा रहे.

  1. वाटर बेस्ड कौस्मेटिक्स

चेहरे को मेडिकेटेड फेसवाश से दिन में 2-3 बार धोएं, ताकि त्वचा के रोमछिद्रों में जमी धूल और तेल साफ हो सके. अगर आप टोनर्स यूज करते हैं, तो नौन-अल्कोहलिक टोनर्स यूज करें. इससे आपकी त्वचा का पीएच लेवल बैलेंस रहेगा.

ये भी पढ़ें- जानें, कैसे बनाएं घर पर ब्लैकहेड रिमूवर

त्वचा को मुलायम रखने के लिए वाटर बेस्ड मौइस्चराइजर या गुलाब जल का इस्तेमाल करें. आप बादाम का तेल भी यूज कर सकती हैं

2. एंटी-फंगल क्रीम जरूर रखें

इन दिनों संक्रमित पानी, कीचड़ आदि के संपर्क में आने से एथलीट फुट, रिंगवर्म या त्वचा में खुजली की समस्या ज्यादा रहती है. ऐसे में अपनी त्वचा को लंबे समय तक भीगे रहने से बचाएं.

हल्के गुनगुने पानी से नहाएं. सफंगल इंफेक्शन से बचने के लिए एंटी-फंगल क्रीम लगाएं. नहाने के बाद पंखे की हवा में शरीर को अच्छी तरह से सुखाएं. पैरों की अंगुलियों के बीच के हिस्से और अंडरआर्म्स को तौलिये से पोंछकर सुखा लें. संक्रमण से बचने के लिए अंडर आर्म्स व पैरों की अंगुलियों के बीच एंटी-फंगल पाउडर यूज कर सकते हैं.

ये भी पढ़ें- रिबौन्डिंग हेयर: बालों का ऐसे रखें ख्याल

3. ऐसे हटाएं डेड स्किन

चेहरे से डेड स्किन को रिमूव करने के लिए सप्ताह में एक बार अखरोट या स्ट्रौबेरी युक्त स्क्रब का इस्तेमाल करें. इसके बाद चेहरे पर नींबू या नीम युक्त फेस पैक लगा सकते हैं. इन दिनों हैवी मेकअप न करें. सनस्क्रीन लोशन लगाएं और त्वचा की नमी बरकरार रखने के लिए दिन में 8-10 गिलास पानी पिएं.

कबाड़

इस बार दीवाली पर जब घर का सारा सामान धूप लगा कर समेटा तब विजय के होंठों पर एक फीकी सी हंसी चली आई थी. मैं जानती हूं कि वह क्यों मुसकरा रहे हैं.

‘‘तो इस बार दीवाली पर भाई के घर जाओगी? वहां जा कर कितने दिन रहोगी? तुम जानती हो न कि तुम्हारी सूरत देखे बिना मेरी सांस नहीं चलती. जल्दी वापस आना.’’

बस स्टैंड तक छोड़ने आए विजय बारबार मेरे बैग को तोलते हुए बोले, ‘‘कितने कपड़े ले कर जा रही हो? भारी है तुम्हारा बैग. क्या ज्यादा दिन रहने वाली हो?’’

चुप हूं मैं. चुप ही तो हूं मैं, न जाने कब से. अच्छा समय बीता भाई के पास मगर जो नया सा लगा वह था मेरी भतीजी का व्यवहार.

डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर चुकी मिनी के पास नया सामान रखने को जगह ही न थी सो उस ने बचपन का संजोया अपनी जान से भी प्यारा सामान यों खुद से अलग कर दिया मानो वास्तव में उसे संभाल कर रखे रखना कोई मूर्खता हो. खिलौने महरी को उस के बच्चों के लिए थमा दिए थे.

और भी विचित्र तब लगा जब मिनी ने अपने ही प्रिय सामान का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था.

‘‘देखो न बूआ, याद है यह बार्बी डौल, इस के लिए कितना झगड़ा किया था मैं ने भैया से. और यह लकड़ी के खिलौने, यह डब्बा देखो तो…’’

सामने सारा सामान बिखरा पड़ा था.

‘‘बच्चे थे तो कितने बुद्धू थे न हम. जराजरा सी बात पर रोते थे. यह बचकाना सामान हटा दिया. देखो, अब पूरी अलमारी खाली हो गई है…सच्ची, कितनी पागल थी न मैं जो इस कबाड़ से ही जगह भर रखी थी.’’

अच्छा नहीं लगा था मुझे उस का यह व्यवहार. आखिर हमारे जीवन में संवेदना भी तो कोई स्थान रखती है. जो कभी प्यारा था वह सदा प्यारा ही तो रहता है न, चाहे बचपन हो या जवानी. फिर जवानी में बचपन की सारी धरोहर कचरा कह कर कूड़े के डब्बे में फेंकना क्या क्रूरता नहीं है?

‘‘पुरानी चीजें जाएंगी नहीं तो नई चीजों को स्थान कैसे मिलेगा, जया. यह संसार भी तो इसी नियम पर चल रहा है न. यह तो प्रकृति का नियम है. जरा सोचो हमारे पुरखे अगर आज भी जिंदा होते तो क्या होता. कैसी हालत होती उन की?’’

‘‘कैसी निर्दयता भरी बात करते हैं विजय, अपने मांबाप के विषय में ऐसा कहते आप को शरम नहीं आती…’’

‘‘मेरी मां को कैंसर था. दिनरात पीड़ा से तड़पती थीं. मैं बेटा हूं फिर भी अपनी मां की मृत्यु चाहता था क्योंकि उन के लिए मौत वरदान थी. मुझे अपनी मां से प्यार था पर उन की मौत चाही थी मैं ने. जया, न ही जीवन सदा वरदान की श्रेणी में आता है और न ही मौत सदा श्राप होती है.’’

विजय की बातें मेरे गले में फांस जैसी ही अटक गई थीं.

‘‘जया, जीवन टिक कर रहने का नाम नहीं है. जीवन तो पलपल बदलता है, जो आज है वह कल नहीं भी हो सकता है और जीवन हम सब के चाहने से कभी मुड़ता भी नहीं. यह तो हम ही हैं जिन्हें खुद को जीवन की गति के अनुरूप ढालना पड़ता है.’’

मैं उठ कर अपनी क्लास लेने चली गई थी. जीवन का फलसफा सभी की नजर में एक कहां होता है जो मेरा और विजय का भी एक हो जाता.

एक बार विजय ने मेरे जमा किए पीतल के फूलदान, किताबों के ट्रंक, टेपरिकार्डर को कबाड़ कहा था. माना कि आज अगर पति और बेटे इस संसार में नहीं हैं तो उन का सामान क्या सामान नहीं रहा?

‘‘जब इनसान ही नहीं रहा तब उस के सामान को सहेजा क्यों जाए. जो चले गए वे आने वाले तो नहीं, तुम तो दिवंगत नहीं हो न.’’

कैसी कड़वी होती हैं न विजय की बातें, कभी भी कुछ भी कह देते हैं. मैं मानती हूं कि इतनी कड़वी बात सिर्फ वही कर सकता है जिस का मन ज्यादा साफ हो और जो खुद भी उसी हालात से गुजर चुका हो.

मैं उस दुविधा से उबर नहीं पा रही हूं जिस में मेरा खोया परिवार मुझे अकेला छोड़ कर चला गया है. अपने किसी प्रिय की मौत से क्या कोई उबर सकता है?

‘‘क्यों नहीं उबर सकता? क्या मैं उबर कर बाहर नहीं आया तुम्हारे सामने. मेरे पिता तब चले गए थे जब मैं कालिज में पढ़ता था. मां का हाल तुम ने देख ही लिया. पत्नी को मैं ही रास नहीं आया… कोई जीतेजी छोड़ गया और कोई मर कर. तो क्या करूं मैं? मर तो नहीं सकता न. क्योंकि जितनी सांसें मुझे प्रकृति ने दी हैं कम से कम उन पर तो मेरा हक है न. कभी आओ मेरे घर, देखो तो, क्या मेरा घर भी तुम्हारे घर जैसा चिडि़याघर या अजायबघर है जिस में ज्ंिदा लोगों का सामान कम और मरे लोगों का सामान ज्यादा है…’’

विजय की कड़वी बातें ही बहुत थीं मेरी संवेदना को झकझोरने के लिए, उस पर मिनी का व्यवहार भी बहुतकुछ हिलाडुला गया था मेरे अंतर में.

‘‘देखो न बूआ, अलमारी खोलो तो कितना अच्छा लग रहा है. लगता है सांस आ रही है. कैसा बचकाना सामान था न, जिसे इतने साल सहेज कर रखा…’’ मिनी चहकी.

जवानी आतेआते मिनी में नई चेतना, नई सोच चली आई थी जिस ने उस के प्रिय सामान को बचकाने की श्रेणी में ला खड़ा किया था. पता नहीं क्यों यह सब भी विजय के साथ बांट लिया मैं ने. जानती हूं वह मेरा उपहास ही उड़ाएंगे, ऐसा भी कह दिया तो सहसा आंखें भर आईं विजय की.

‘‘मैं इतना भी कू्रर नहीं हूं, जया. पगली, मैं भी तो उसी हालात का मारा हूं जिन की मारी तुम हो. आज 5 साल हो गए दोनों को गए… जया, वे दोनों सदा तुम्हारी यादों में हैं, तुम्हारे मन में हैं… उन्हें इतना तो सस्ता न बनाओ कि उन्हें उन के सामान में ही खोजती रहो. जो मन की गहराई में छिपा है, सुरक्षित है, वह कचरे में क्योंकर होगा…’’ मेरे सिर पर हाथ रखा विजय ने, ‘‘तुम्हारी शादी तुम्हारे पति के साथ हुई थी, इस सामान के साथ तो नहीं. लोग तो ज्ंिदा जीवनसाथी तक बदल लेते हैं, मेरी पत्नी तो मुझ ज्ंिदा को छोड़ गई और तुम यह बेजान सामान भी नहीं बदल सकतीं.’’

ये भी पढ़ें- मां, मां होती है

सहसा लगा कि विजय की बातों में कुछ गहराई है. उसी पल निश्चय किया, शायद शुरुआत हो पाए.

लौटते ही दूसरे दिन पूरे घर का मुआयना किया. पीतल का कितना ही सामान था जिस का उपयोग मुमकिन न था. उसे एकत्र कर एक बोरी में डाल दिया. महरी को कबाड़ी की दुकान पर भेजा, थोड़ी ही देर में कबाड़ी वाले की गाड़ी आ गई.

शाम को महरी पुराने कपड़ों से बरतन बदलने वाली को पकड़ लाई. मैं ने कभी कपड़ा दे कर बरतन नहीं लिए थे. अच्छा नहीं लगता मुझे.

‘‘बीबीजी, इन की भी तो रोजीरोटी है न. इस में बुरा क्या है जो आप को भी चार बरतन मिल जाएं.’’

‘‘मैं अकेली जान क्या करूंगी बरतन ले कर?’’

‘‘मेरी बेटी की शादी है, मुझे दे देना. इसी तरह साहब का आशीर्वाद मुझे भी मिल जाएगा. कपड़ों का सही उपयोग हो जाएगा न बीबीजी.’’

गरदन हिला दी मैं ने.

2 ही दिन में मेरा घर खाली हो गया. ढेर सारे नए बरतन मेज पर सज गए, जिन्हें महरी ने दुआएं देते हुए उठा लिया.

‘‘बच्ची की गृहस्थी के पूरे बरतन निकल आए साहब के कपड़ों से. बरसों इस्तेमाल करेगी और आप को दुआएं देगी, बीबीजी.’’

पुरानी पीतल और किताबें बेच कर कुछ हजार रुपए हाथ में आ गए.

कालिज आतेजाते अकसर कालीन की दुकान पर बिछे व टंगे सुंदर कालीन नजर आ जाते थे. बहुत इच्छा होती थी कि मेरे घर में भी कालीन हो. पति की भी बहुत इच्छा थी, जब वह ज्ंिदा थे.

शाम होतेहोते मेरे 2 कमरों के घर में नरम कालीन बिछ गए. पूरा घर खुलाखुला, स्वच्छ हो कर नयानया लगने लगा. अलमारी खोलती तो वह भी खुलीखुली लगती. रसोई में जाती तो वहां भी सांस न घुटती.

‘‘जया, क्या बात है 2 दिन से कालिज नहीं आई?’’ सहसा चौंका दिया विजय ने.

मैं घर की सफाई में व्यस्त थी. कालिज से छुट्टी जो ले ली थी.

‘‘अरे वाह, इतना सुंदर हो गया तुम्हारा घर. वह सारा कबाड़ कहां गया? क्या सब निकाल दिया?’’

विजय झट से पूरा घर देख भी आए. भीग उठी थीं विजय की आंखें. कितनी ही देर मेरा चेहरा निहारते रहे फिर मेरे सिर पर हाथ रखा और बोले, ‘‘उम्मीद मरने लगी थी मेरी. लगता था ज्यादा दिन जी नहीं पाओगी इस कबाड़ में. लेकिन अब लगता है अवसाद की काई साफ हो जाएगी. तुम भी मेरी तरह जी लोगी.’’

पहली बार लगा, विजय भी संवेदनशील हैं. उन का दिल भी नरम है. कुछ सोच कर कहने लगे, ‘‘मैं भी तुम जैसा ही था, जया. मां की दर्दनाक मौत का नजारा आंखों से हटता ही नहीं था. जरा सोचो, जिस मां ने मुझे जीवन दिया उसे एक आसान मौत दे पाना भी मेरे हाथ में नहीं था. क्या करता मैं? पत्नी भी ज्यादा दिन साथ नहीं रही. मैं जानता हूं कि इन परिस्थितियों में जीवन ठहर सा जाता है. फिर भी सब भूल कर आगे देखना ही जीवन है.’’

विजय की आंखें झिलमिलाने लगी थीं. मेरे सिर पर अभी भी उन का हाथ था. हाथ उठा कर मैं ने विजय का हाथ पकड़ लिया. हजार अवसर आए थे जब विजय ने सहारा दिया था. सौसौ बार बहलाना भी चाहा था.

यह पहला अवसर था जब वह खुद मेरे सामने कमजोर पड़े थे. सस्नेह थाम लिया मैं ने विजय का हाथ.

‘‘मेरे पति की बड़ी इच्छा थी कि नरम कालीन हों घर में. बस, कभी मौका ही नहीं मिला था…कभी मौका मिला भी तो इतने रुपए नहीं थे हाथ में. बेकार पड़े सामान को निकाला तो उन की इच्छा पूरी हो गई. मैं ने कुछ गलत तो नहीं किया न?’’

जरा सी आत्मग्लानि सिर उठाने लगी तो फिर से उबार लिया विजय ने, यह कह कर कि नहीं तो, जया, सुंदर कालीन में भी तो तुम अपने पति की ही इच्छा देख रही हो  न. सच तो यह है कि जो जीवन की ओर मोड़ पाए वह भला गलत कैसे हो सकता है.

रोतेरोते मुसकराना कैसा लगता है. मैं अकसर रोतीरोती मुसकरा देती हूं तो विजय हाथ हिला दिया करते हैं.

‘‘इस तरह तो तुम जाने वालों को दुख दे रही हो. उन का रास्ता आसान बनाओ, पीछे को मत खींचो उन्हें. जो चले गए उन्हें जाने दो, पगली. खुश रहना सीखो. इस से उन्हें भी खुशी होगी. वह भी तुम्हें खुश ही देखना चाहते हैं न.’’

सहसा हाथ बढ़ा कर विजय ने पास खींच लिया और कहने लगे, ‘‘जीवन के अंतिम छोर तक तुम ने अपने पति का साथ दिया है. तुम किसी के साथ विश्वासघात नहीं कर रही. न अपने पति के साथ, न बेटे के साथ और न ही मेरे साथ. हम सब साथसाथ रह सकते हैं, जया.’’

विजय के हाथों को पिछले 3 साल से हटाने का प्रयास कर रही हूं मैं. विजय ने सदा मेरी इच्छा का सम्मान किया है.

लेकिन इस पल मैं ने जरा सा भी प्रयास नहीं किया. विजय स्तब्ध रह गए. उन की भावनाओं का सम्मान कर मैं पति का अपमान नहीं कर रही. धीरेधीरे विश्वास होने लगा मुझे. अविश्वास आंखों में लिए विजय ने मेरा चेहरा सामने किया. हैरान तो होना ही था उन्हें.

न जाने क्याक्या था जिस के नीचे दबी पड़ी थी मैं. कुछ यादों का बोझ, कुछ अपराधबोध का बोझ और कुछ अनिश्चय का बोझ. पता नहीं कल क्या हो.

ये भी पढ़ें- सूनी मांग का दर्द

शब्दों की आवश्यकता तो कभी नहीं रही मेरे और विजय के बीच. सदा मेरा चेहरा देख कर ही वह सब भांपते रहे हैं. भीगी आंखों में सब था. सम्मान सहित आजीवन साथ निभाने का आश्वासन. मुसकरा पड़े विजय. झुक कर मेरे माथे पर एक प्रगाढ़ चुंबन जड़ दिया. खुश थे विजय. मैं कबाड़ से बाहर जो चली आई थी.

सुधा 

रिश्ता

पीयूष बेहद खुश था और हो भी क्यों न, उस की सगाई शिल्पी के साथ जो हो रही थी. शिल्पी जो कुदरत की शिल्पकला का अद्भुत नमूना थी. सुंदरता के साथसाथ उस का व्यवहार और आत्मविश्वास भी पीयूष को आकर्षित करता था. इसीलिए उस की निगाहें भीड़ में इधरउधर घूम कर शिल्पी के चेहरे पर जा कर टिक जाती थीं.

दोनों के प्रेम को जमाने की नजर इसलिए भी नहीं लग सकी क्योंकि दोनों सजातीय होने के साथसाथ हर तरह से साधन संपन्न थे. पीयूष आकर्षक व्यक्तित्व वाला तो था ही साथ ही कंप्यूटर इंजीनियर भी था.

सगाई के मौके पर दोनों तरफ से ढेर सारे मेहमान जमा थे. पीयूष के मातापिता की खुशी की कोई सीमा न थी. सगाई की रस्म पूरी हो जाने के बाद पार्टी अपने उफान पर थी कि शिल्पी के मामामामी ने घर में प्रवेश किया और देर से आने की वजह बताते हुए शिल्पी के पिता से माफी मांगी.

शिल्पी के पिता ने अपने साले को ले जा कर पीयूष के घर वालों से परिचित कराया. पीयूष के पिता पर शिल्पी के मामा की नजर गई तो वह अचानक ही गंभीर हो गए और थोड़ा रुक कर बोले.

‘‘लगता है मैं ने आप को अपने ही महल्ले में देखा है. आप वही हैं न जो मिसेज श्रद्धा के घर अकसर आते रहते हैं.’’

पीयूष के पापा यानी संजीव थोड़ा सकपका गए, फिर संभल कर बोले, ‘‘जी…जी हां. मैं कभीकभी उधर जाता हूं.’’

‘‘कभीकभी नहीं संजीव साहब, आप अकसर ही जाते रहते हैं,’’ शिल्पी के मामा अपनी बातों पर जोर डाल कर बोले, ‘‘क्या यह सच नहीं है कि उन की बेटी की शादी की सारी जिम्मेदारी आप ने ही निभाई थी? आज के जमाने में कौन करता है किसी गैर के लिए?’’

‘‘असल में वह मेरे दोस्त की विधवा हैं, इसीलिए,’’ बिना विचलित हुए संजीव ने जवाब दिया.

‘‘अगर हर दोस्त की विधवा पर कोई यों ही मेहरबान रहे तो घर में पत्नियां सिर्फ देखने की चीज रह जाएंगी. हकीकत तो यह है कि उन के साथ आप के कुछ ऐसे नाजायज संबंध हैं जो समाज की नजर में उचित नहीं. संजीव साहब, जहां पानी होता है वहीं बुलबुले भी बनते हैं.’’

मामा की आवाज में तलखी आ गई थी.

‘‘देखिए मिस्टर राजन, आप हद से आगे बढ़ रहे हैं. हमारे बीच वैसा कोई रिश्ता नहीं है जो समाज की या हमारी अपनी नजर में गलत हो,’’ संजीव भी उत्तेजित हो उठे थे.

दोनों के बीच उठ खड़ी हुई इस झड़प ने पीयूष को परेशान कर दिया. उस के साथ शिल्पी एवं उस के घर वाले भी अचानक उठे इस विवाद पर नजरें टिकाए हुए थे परंतु यह सोच कर उस वक्त मामला वहीं शांत करा दिया गया कि कहीं पार्टी मजाक न बन जाए.

मेहमानों के जाने के बाद असली मुद्दे पर फिर बातचीत शुरू हुई. शिल्पी के घर में वैसे भी उस के मामा का काफी प्रभाव था. उस पर इस सच को अधूरे मन में ही सही, पर संजीव ने भी मान लिया था, सो अंतिम फैसला शिल्पी के पिता ने यह कह कर दिया, ‘‘मैं इस मामले की तह तक जाऊंगा. यदि यह वाकई सच है तो फिर ऐसे घर में बेटी देने से पहले मुझे सोचना पड़ेगा. शादी की तारीख भी अब आगे बढ़ा दी जाएगी.’’

हैरानपरेशान पीयूष अपने पिता से सचाई जानने को बेचैन था. वह यही कहे जा रहे थे कि उन के और श्रद्धा के बीच कोई गलत संबंध नहीं, कोई रिश्ता नहीं है. बस, वह अपाहिज हैं, दोस्त की विधवा हैं, इसीलिए सहानुभूतिवश वह उन की मदद करते हैं.

पीयूष की मां आज पति पर विश्वास नहीं कर पा रही थीं. घर आते ही उन्होंने पति को आड़े हाथों लेते हुए प्रश्नों की झड़ी लगा दी, ‘‘श्रद्धा की बेटी की शादी आप ने निबटाई, क्यों? क्या इस के पीछे यह सच नहीं हो सकता कि वह आप की ही संतान हो? क्या मेरा संदेह निराधार है? और क्या यह सच नहीं कि हमारी शादी के पहले भी आप का श्रद्धा के साथ तथाकथित दोस्ताना रिश्ता था?

‘‘मैं ने आज तक इस बारे में लोगों से बातें सुनी थीं पर इसे मात्र एक अफवाह मान कर दिल पर नहीं लिया. आज मेहमानों के बीच सिर्फ आप की वजह से हमें शर्मिंदा होना पड़ा है. आप ने मेरे विश्वास को तोड़ा है,’’ कहतेकहते पीयूष की मां विभा की आंखों में व्यथा की लहर गहरी होती गई.

‘‘विभा, ऐसी बात नहीं है. मैं बस, यही कह सकता हूं कि यह सब सच नहीं है. हमारा रिश्ता करीबी जरूर है, मगर इस का आधार कुछ और है, विभा, कुछ और,’’ इतना कहतेकहते संजीव की आंखें भर आईं. वह उठ कर अपने कमरे में चले गए.

‘‘मां, जो लोग गलत काम करते हैं, वे इतनी आसानी से उसे स्वीकार नहीं करते,’’ पीयूष ने कहा, ‘‘पापा के चरित्र पर लगा यह कलंक मुझे शिल्पी से दूर कर देगा.’’

‘‘क्या कहूं बेटे, कुछ समझ में नहीं आता. इसी तरह की कुछ उड़ती सी खबरें मैं ने पहले भी सुनी थीं पर तुम्हारे पिता हमेशा ही इस बात का यों ही जोरदार खंडन करते रहे हैं और दुखी भी हो जाते हैं. इसी वजह से मैं कभी गंभीरता से इस विषय पर उन से बात नहीं कर पाती पर आज मेरी भी सहनशक्ति की सीमा टूट गई लगती है. पीयूष, मैं क्या कहूं?’’

‘‘मां, मुझे लगता है कि एक बार श्रद्धा से मिलना चाहिए.’’

पीयूष का यह निर्णय विभा को उचित लगा.

अगले दिन पीयूष श्रद्धा के घर गया. नौकर पीयूष को ड्राइंगरूम में बैठा कर मालकिन को बुलाने के लिए अंदर चला गया. उन के घर की कलात्मक साजसज्जा बड़ी ही मनमोहक थी. इतना प्यारा और सलीके से सजा घर उस ने पहले न देखा था.

ये भी पढ़ें- खुशियों के पल

अंदर से एक पैर से कुछ लंगड़ाती हुई एक महिला ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया तो पीयूष उन्हें एकटक देखता ही रह गया. महिला का चेहरा उसे पहचाना सा लग रहा था. तुरंत उसे खयाल आया कि बचपन में इस महिला से वह कई बार मिल चुका है. उसे वर्षों पहले की वे बातें याद आ गईं जब यह आंटी उस से मिलने उस के स्कूल आया करती थीं और ढेर सारा प्यार कर के उस का बस्ता चाकलेट और खिलौनों से भर जाया करती थीं.

लेकिन पिछले 10 वर्षों से वह एक बार भी उस से मिलने नहीं आईं. आज फिर उन के चेहरे की उसी स्नेहपूर्ण मुसकान ने पीयूष को सबकुछ याद दिला दिया था. वह भी पीयूष को जैसे पहचान गई थीं तभी तो उन्होंने प्यार से उस को अपने पास बैठाया था. अतीत की सोच से वर्तमान की घटना और यहां आने का उद्देश्य याद आते ही पीयूष की भवें तन गईं. वह अकड़ कर बोला, ‘‘आप भी अच्छा नाटक कर लेती हैं. अब समझ में आया कि बचपन में आप मुझ पर प्यार क्यों लुटाती थीं क्योंकि आप को मेरे पापा के दिल पर अधिकार जो जमाना था. बेटे से प्यार जता कर बाप को ठगने का यह नया अंदाज आखिर काम कर गया न.’’

‘‘ऐसा मत कहो, पीयूष. मेरे रिश्ते को कम से कम, तुम तो इस तरह बदनाम न करो.’’

‘‘बदनाम…बदनाम तो आप ने पापा को, मुझे और मेरे परिवार को कर दिया है. समाज में हमारे खानदान की कितनी प्रतिष्ठा थी पर आप के जादू ने पापा पर वह असर  डाला है कि आज हमें लोगों के आगे जलील होना पड़ता है. लोग अपनी बेटी देने से इनकार कर देते हैं. बोलिए, ऐसे घर में कौन देगा अपनी बेटी, जिस परिवार का मुखिया ही चरित्रहीन हो?’’ पीयूष की आवाज तेज हो रही थी.

‘‘बेटे, तुम हमें गलत समझ रहे हो. हमारा रिश्ता पाकसाफ है. हमारे दिलों में यदि एकदूसरे के लिए प्यार है तो उसे हम ने कभी कलंकित नहीं होने दिया है. देखो पीयूष, तुम्हारी आंखों में मैं अपने लिए घृणा का यह सागर नहीं देख सकती. तुम जो कहो, मैं करने को तैयार हूं,’’ तड़प कर श्रद्धा बोलीं.

‘‘तो फिर आप मुझे वचन दीजिए कि आप पापा को अपने घर आने के लिए बढ़ावा नहीं देंगी. आप को अपनी जिंदगी में सिमटना होगा, जहां पापा कहीं नहीं होंगे.’’

‘‘पीयूष बेटे, अगर तुम्हारी खुशी इसी में है कि मैं उन से कभी न मिलूं तो मैं तुम्हारी खुशी के लिए आज तुम्हें वचन देती हूं कि अब के बाद तुम्हारे पिता

यदि यहां आए भी तो मैं उन से नहीं मिलूंगी, बात भी नहीं करूंगी,’’इतना कहतेकहते उन की आंखों से आंसू टपकने लगे.

पीयूष यह समझ नहीं पा रहा था कि इस औरत में ऐसी क्या बात थी जिस ने उस के मन में उठे नफरत के ज्वार को बिलकुल ठंडा कर दिया था और सहानुभूति एवं स्नेह की नन्ही बूंदें उस के तप्त मन को भी भिगोने लगी थीं.

नहीं…वह पापा की तरह कमजोर नहीं जो इन के आंसुओं की तपिश और बातों की कशिश से पिघल जाएगा. उस ने अपने चेहरे पर कोई कोमल भाव नहीं आने दिया और वापस चला आया. घर आ कर उस ने मां से सारी बात बता दी.

2-3 दिन यों ही गुजर गए. फिर उस दिन जब संजीव घर लौटे तो बड़े परेशान थे. आ कर उदास से सोफे पर बैठ गए. पीयूष को आवाज दी. उसे पास बुला कर बड़ी तपती सी निगाहों से देखते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘तुम श्रद्धा से मिलने गए थे? तुम ने उन्हें क्या कहा, पीयूष? बोलो, क्या कहा है तुम ने? क्यों दुख दे रहे हो उन्हें?’’

‘‘मैं किसी को दुख नहीं दे रहा, पापा. मैं ने उस औरत से सिर्फ यही कहा कि मेरी और पापा की जिंदगी से हट जाओ.’’

‘‘तुम उसे औरत कह रहे हो? तुम यह ठीक नहीं कर रहे हो. तुम्हें यदि सचाई का पता चला तो बहुत पछताओगे.’’

‘‘मैं सचाई ही तो जानना चाहता हूं, पापा.’’

‘‘तो फिर आओ मेरे कमरे में, आज मैं तुम्हें इस कहानी का सच बता ही देता हूं…क्योंकि मैं अपनी हर तरह की बेइज्जती सह सकता हूं पर उस मां समान औरत के साथ तुम्हारा इस तरह का बरताव बरदाश्त नहीं कर सकता.

संजीव गंभीर हो कर खिड़की से बाहर देखने लगे. फिर धीरेधीरे अपनी जिंदगी की किताब के पन्ने पीयूष के आगे खोलने लगे :

‘‘मैं, श्रद्धा और उस के पति यानी सुधांशु तीनों ही बचपन के दोस्त हैं. श्रद्धा का शांत व्यवहार मेरे उद्दंड स्वभाव को सदा ही ठंडा करता रहता था. अकसर हम तीनों ही खेलते हुए घर से काफी दूर निकल जाते थे. बचपन से ही श्रद्धा की एक विशेषता रही है कि वह सिर्फ देना जानती है, लेना नहीं. यही वजह थी कि मैं और सुधांशु दोनों ही उसे बहुत मान देते थे.

‘‘समय के साथ हम तीनों बड़े हो गए. मेरी जिंदगी में विभा यानी तुम्हारी मां आईं. मैं विभा को चाहने लगा हूं यह बात मैं ने श्रद्धा और सुधांशु को भी बताई थी. मैं ने विभा से शादी कर ली और अपनी जिंदगी में खुश रहने लगा. कई साल बीत गए. एक दिन सुधांशु ने मेरे आगे एक रहस्य खोला. उस ने बताया कि श्रद्धा शुरू से ही तुझे मन ही मन बहुत प्यार करती थी पर चूंकि तुम्हारी पसंद विभा थी इसलिए वह तुम्हारे पे्रम के बीच नहीं आई और उस ने अपनी भावनाएं कुचल दीं.’’

‘‘तब क्या इस बात के लिए आप ने खुद को दोषी मान लिया, पापा?’’

‘‘दोषी तो नहीं माना, पर उस दिन अफसोस बहुत हुआ था. श्रद्धा का पहला प्यार मैं था और इसी कारण उस ने जिंदगी में शादी न करने का फैसला ले लिया था. सारी बात जान कर मैं काफी परेशान हो गया था. बाद में भी मैं ने जितना ही इस पिषय पर गहराई से सोचा, उतना ही बेचैन होता गया.

अंत मेंमैं ने फैसला लिया कि श्रद्धा से खुल कर इस बारे में बात करूंगा और अपनी कसम दे कर या किसी भी तरह उसे शादी के लिए तैयार करूंगा. और सचमुच मेरा भावनात्मक प्रयास सफल रहा. अंतत: सुधांशु ने श्रद्धा का हाथ थाम लिया और मेरे मन का बोझ काफी हद तक उतर गया.’’

कहते हुए संजीव ने बेटे की ओर देखा. पीयूष के चेहरे पर कितने ही भाव बिखरे पड़े थे.

‘‘पर इस का मतलब यह तो नहीं पापा कि अब श्रद्धा आंटी इस तरह आप को पाना चाहें. शायद अभी भी वह उस पहले प्यार के सहारे जीना चाहती हैं.’’

श्रद्धा के प्रति पीयूष के इस आरोप से संजीव उत्तेजित हो उठे, ‘‘यह सब गलत है…गलत. तुम चुपचाप पूरी कहानी सुनो, तब फैसला करना. आज मैं तुम्हें उस सत्य से परिचित कराने जा रहा हूं जिस के बारे में तुम्हारी मां भी नहीं जानती है. जो शायद तुम्हारे हृदय को पीड़ा पहुंचाए और मुझ से अनचाहे ही एक दूरी बना जाए. लेकिन श्रद्धा के प्रति तुम्हारा रूखा व्यवहार मुझे वह सब बताने को मजबूर कर रहा है,’’ कहते हुए उन्होंने एक तसवीर पीयूष के आगे कर दी.

पीयूष देखता रह गया. यह तो हूबहू जैसे उसी की तसवीर थी.

‘‘जानते हो बेटे, यह कौन हैं? यह सुधांशु है.’’

‘‘सुधांशु अंकल…मेरे जैसे?’’

‘‘नहीं, तुम उस के जैसे हो पीयूष. सत्य यही है. तुम श्रद्धा और सुधांशु के खून हो. मेरे या विभा के नहीं.

‘‘क्या…’’ एकबारगी पीयूष अविश्वास से पिता को देखने लगा. जैसे उस की आंखें कह रही हों, एक बार कह दो पापा कि यह सच नहीं है.

‘‘हां, यही सच है, बेटे. हमारी शादी के 5 साल बाद बहुत इलाज करने पर विभा गर्भवती हुई. उधर संयोगवश श्रद्धा भी तभी मां बनने वाली थी. दोनों एक ही समय हास्पिटल पहुंचीं. श्रद्धा को जुड़वां बेटे हुए तो विभा का आपरेशन करना पड़ा, पर बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ. डाक्टर ने यह भी बताया कि अब दूसरी बार विभा मां नहीं बन सकती. उस वक्त मैं सुधांशु के कंधे से लग कर सिसक पड़ा था. तब जानते हो, नवप्रसूत श्रद्धा ने यह सब जानने पर सुधांशु से क्या कहा? उस ने कहा था, ‘हमारा एक बेटा संजीव को दे दो सुधांशु, वरना विभा का दिल टूट जाएगा. वह जी नहीं सकेगी.’

‘‘सुधांशु गोद में बच्चे को ले कर मेरे पास पहुंचा. मैं तैयार नहीं था, पर श्रद्धा की जिद से सुधांशु ने अपने एक बच्चे को सोई विभा के बगल में लिटा दिया ताकि वह उसे अपना ही बेटा समझे. और इस तरह तुम हमारे बेटे बने.

‘‘फिर सुधांशु और श्रद्धा दूसरे बच्चे के साथ अपनी जिंदगी गुजारने लगे और हमारा आंगन भी तुम्हारी किलकारियों से आबाद हो गया.

‘‘पर वक्त के बेरहम हाथों ने श्रद्धा को एक दुर्घटना में अपाहिज बना दिया और उस से उस के पति तथा बेटे को छीन लिया. तब से छोटी बेटी के साथ वह बिलकुल एकांत जिंदगी जी रही है. मुझ पर श्रद्धा के इतने एहसान हैं कि मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सका.’’

‘‘और मैं? मुझे तो भुला दिया उन्होंने?’’ पीयूष की आवाज में जैसे सारी दुनिया का दर्द सिमट आया था.

उस के प्रश्न पर संजीव स्नेह से बोले, ‘‘नहीं, पीयूष, श्रद्धा तो तुम्हें एक पल को भी भूल नहीं सकती. उस के दिल में तुम्हारे लिए प्यार और ममता का जो सैलाब छिपा है वह सिर्फ मैं ने महसूस किया है. पर नहीं, वह कभी कुछ बताना तो जानती ही नहीं. अपने बेटे की मौत के बाद तो वह तुम से मिलने से भी डरती है. जानते हो क्यों?’’

‘‘क्यों?’’ पीयूष भौंचक था.

‘‘यह सोच कर कि तुम्हें देख कर वह कमजोर पड़ जाएगी और अपने आंसुओं को रोक नहीं सकेगी. ऐसे में अनजाने ही कहीं सच सामने न आ जाए.’’

‘‘ओह,’’ पीयूष ने नजरें झुका लीं.

संजीव ने फिर कहना शुरू किया.

‘‘मैं हर साल नियम से तुम्हारी तसवीर उस के पास पहुंचाता हूं, जिसे सीने से लगा कर वह सुकून पा लेती है. अब सोचो, इतना होने पर तुम ने और विभा ने उस पर कितना बड़ा आरोप लगाया है. क्या गुजरी होगी उस पर? वह चाहती तो अपने बेटे की मौत के बाद विभा से तुम्हें छीन सकती थी. पर मैं ने कहा न, वह सिर्फ देना जानती है, लेना नहीं. उस ने तो तुम्हारी खुशी के लिए तुम्हें वचन दे दिया कि वह मुझ से नहीं मिलेगी, पर क्या उस ने तुम से अपनी ममता का हक कभी मांगा?’’

‘‘पापा, आज मुझे अपनी छोटी बुद्धि पर तरस आ रहा है,’’ पीयूष बोला, ‘‘मैं ने उन की भावनाओं के साथ कितना अन्याय किया है. कितना दुख पहुंचाया उन्हें. यदि वह सिर्फ देना जानती हैं तो मैं अब उन्हें बिन मांगे वह सबकुछ दे दूंगा जिस की वह अधिकारिणी हैं. आज से मेरी 2 मां हैं. और इन में से किसी का स्थान दूसरे से थोड़ा भी कम नहीं है.’’

संजीव आंसू भरी नजरों से एकटक बेटे को देख रहे थे और उस की ऐसी प्रतिक्रिया पर विह्वल थे.

‘‘पापा, आप यह मत सोचना कि सत्य जान कर मेरे और आप के बीच थोड़ी सी भी दूरी बढ़ेगी. आप का और मम्मी का जो स्थान मेरे हृदय में है वह तो सदा रहेगा ही, पर हां, उस मां के लिए एक और विशेष स्थान मेरे मन में बन गया है. उन की ममता का आंचल अब खाली नहीं रहेगा.’’

ये भी पढ़ें- लड़का चाहिए

पीयूष की बातें सुन कर संजीव की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े. अभिभूत हो कर उन्होंने बेटे को बढ़ कर गले से लगा लिया.

शिल्पा और उस का परिवार भी सच को जान कर खामोश हो गया. निर्धारित समय पर बड़ी धूमधाम से दोनों की शादी संपन्न हुई. आशीर्वाद देते समय पीयूष ने श्रद्धा का हाथ पकड़ कर अपने सिर से लगा लिया.

अजब गजब: 7 फीट 6 इंच लंबा पुलिस वाला

हम यहां ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं. जो जरूरत से कुछ ज्यादा ही लंबे हैं. इतने लंबे कि कोई बच्चा उन का चेहरा देखना चाहे तो उसे आसमान की तरह मुंह उठा कर देखना पड़ेगा. हम बात कर रहे हैं पंजाब आर्म्ड पुलिस के हवलदार जगदीप सिंह की.

इन साहब की लंबाई 7 फीट 6 इंच है. पिछले 18 सालों से पंजाब पुलिस में तैनात 35 वर्षीय जगदीप सिंह अपनी लंबाई की वजह से मशहूर तो हैं लेकिन इस की वजह से कितनी ही बार उन्हें परेशानी भी उठानी पड़ती है.

police

ये भी पढ़ें- अजब इत्तेफाक: किसी फिल्म से कम नहीं ये लव स्टोरी

पहली परेशानी तो यही है कि 190 किलोग्राम वजन वाले जगदीप को पैरों के लिए 19 नंबर के जूते की जरूरत होती है, जो अपने देश में नहीं मिलता. उन्हें अपने लिए जूता विदेशों से मंगाना पड़ता है, जिस के लिए वह विदेशों में रह रहे अपने दोस्तों का सहारा लेते हैं. कपड़ों की भी यही स्थिति है.

जगदीप अगर कहीं बैठना चाहें तो नहीं बैठ सकते. बैठने से पहले उन्हें कुरसी को टटोलना पड़ता है कि वह उन का वजन झेल भी पाएगी या नहीं. देखनेपरखने के बाद भी वह कुरसी को दीवार से सटा कर बैठते हैं ताकि कुरसी को सहारा मिलता रहे. जगदीप सिंह को ज्यादातर संवेदनशील जगहों पर तैनात किया जाता है ताकि सामने वाला उन्हें देख कर घबरा जाए.

जगदीप पुलिस वाहनों का उपयोग नहीं कर पाते, इसलिए उन्होंने अपने लिए मोडिफाइ कर के मोटरसाइकिल बनवाई है, जिस का वह इस्तेमाल करते हैं. इस बाइक के ईंधन का इंतजाम उन्हें अपनी पगार से करना पड़ता है. उन की शादी के समय भी काफी दिक्कतें आई थीं.

काफी कोशिशों के बाद उन के लिए 5 फीट 11 इंच लंबी लड़की मिली, नाम था सुखबीर. बहरहाल, दोनों की शादी हो गई और अब इन की 10 साल की एक बच्ची है. अपनी लंबाई की वजह से जगदीप जब तब हंसी का पात्र बनते रहे हैं. लोग उन्हें एलियन तक कह देते थे. जगदीप को सब से ज्यादा दिक्कत तब होती है जब वह बाहर निकलते हैं और लोग उन के साथ तसवीर खिंचाने की जिद करने लगते हैं.

ये भी पढ़ें- रहस्यमयी बौनों का गांव

जगदीप सिंह कुछ दिन पहले ही अमेरिकी टीवी शो ‘अमेरिका गाट टैलेंट’ में भाग ले कर लौटे हैं. उन्हें बौलीवुड की फिल्म ‘वेलकम न्यूयार्क’, ‘रंग दे बसंती’ और ‘फिर हेराफेरी’ में भी एक्टिंग करने का मौका मिला था.  द्य

  — रविंद्र शिवाजी दुपार गुड़े

बच्चों को जरूर सिखाएं ये 5 बातें

आवश्यकता से अधिक बच्चों को बांध कर रखना बच्चों के विकास के लिए हानिकारक हो सकता है. दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है और बच्चों को हमेशा दुनिया की परेशानियों से दूर ऐसी दुनिया में नहीं रख सकते जहां उन्हें हमेशा यह महसूस हो कि सब बहुत अच्छा है. हाल ही में गुजरात के एक हीरा व्यापारी ने अपने इकलौते बेटे को खुद अपने बल पर कुछ कमाने के लिए कहा. अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की 15 वर्षीया बेटी का सीफूड रेस्तरां में काम करना इस बात का प्रमाण है कि जीवन में शिक्षा के साथ और भी बहुतकुछ महत्त्वपूर्ण है. कुछ तरीकों से आप अपने बच्चे को आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर बना सकते हैं, जैसे–

उन्हें सिखाएं कि ‘न’ कैसे कहना है : यह सुननेपढ़ने में आसान लगता है पर न कहना सीखना वाकई मुश्किल होता है. दुनिया अपने हिसाब से हमें चलाने की उम्मीद रखती है. ऐसे में न कहने के लिए काफी हिम्मत चाहिए. बच्चों को जल्दी ही न कहना सिखा देना उन्हें कई चीजों में मदद करता है. उन्हें सिखाएं कि जो तुम्हें पसंद नहीं आ रहा है उस के बारे में वे साफसाफ कहें. इस से उन का आत्मविश्वास बढ़ेगा, कोई उन्हें हलके में नहीं लेगा. अगर न कहना नहीं आएगा तो उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. वे तनाव नहीं झेल पाएंगे, झूठ बोल सकते हैं या किसी की भी बातों में फंस सकते हैं.

ये भी पढ़ें- अच्छे लोग ही हमेशा रिश्तों में क्यों खाते हैं मात, जानें 5 कारण

घर में कभीकभी अकेला छोड़ें : बहुत सारे मातापिता को घर में बच्चों को अकेला छोड़ना मुश्किल लगेगा लेकिन सीसीटीवी कैमरा, आप के फोन कौल्स, पड़ोसी, इन सब सुरक्षाओं के साथ आप थोड़ा निश्चिंत हो सकते हैं. एक पेपर पर इमरजैंसी नंबर लिख कर रखें. बच्चों को गैस रैगुलेटर बंद करना सिखाएं. उन्हें फिनायल, कीटनाशक दवाओं या इस तरह की चीजों से दूर रखना सिखाएं. सब से जरूरी बात, उन्हें दरवाजा खोलने से पहले पीपहोल का प्रयोग करना सिखाएं.

10 वर्षीया बेटी की मां सरिता शर्मा कहती हैं, ‘‘कभीकभी बैंक या सब्जी या कुछ और खरीदने के लिए बेटी को घर में छोड़ कर जाना पड़ता है. इसलिए मैं ने उसे डिलीवरी बौयज या किसी अजनबी के लिए दरवाजा खोलने से मना किया हुआ है. दूसरा, यदि मैं घर पर नहीं हूं तो कोई लैंडलाइन पर फोन करता है तो उसे समझाया है कि वह यह कहे कि मम्मी व्यस्त हैं और बस, वह मैसेज ले ले. इस से बच्चे अपना समय ज्यादा अच्छी तरह बिताना सीख लेते हैं और अपनेआप ही उन्हें कई काम करने आ जाते हैं.’’

घूमने और अनुभव लेने दें : चाहे कौमिक पढ़ना हो, मूवी देखना हो, कैंप में जाना हो या ट्रैकिंग के लिए जाना हो, उन्हें  मना न करें. उन से अपनी पसंद की पुस्तकें चुनने के लिए कहें. उन से दोस्तों के साथ समय बिताने दें. उन पर हमेशा हावी न रहें. उन्हें भविष्य में बड़े, महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे. 4 वर्षीय बेटे के पिता गौरव कपूर कहते हैं, ‘‘जब मेरा बेटा 7 साल का था तब से ही मैं उसे अपनी बिल्डिंग में नीचे ही सामान खरीदने भेज दिया करता था. उसे स्कूल एजुकेशनल ट्रिप पर भी भेजा करता था. वह अपनी उम्र के बच्चों से ज्यादा आत्मनिर्भर है और बातचीत करने में उस में बहुत आत्मविश्वास है.’’

ये भी पढ़ें- छोटी-मोटी तकरार से भी रिश्तों में बढ़ता है प्यार

पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बारे में बताएं : अंजू गोयल ने अपने 2 साल के बेटे का जन्मदिन अपने पति के साथ मुंबई में ‘बैस्ट’ बस में बिताया. वे कहती हैं, ‘‘जब भी हम बाहर जाते हैं, मेरा बेटा बस को बहुत शौक से देखता है. मैं ने सोचा अपने जन्मदिन पर वह बस में बैठ कर खुश होगा और वह बहुत खुश हुआ भी. जब वह और बड़ा होगा, मैं उस से पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग करने के लिए ही कहूंगी.’’ भले ही आप अपने बच्चे को कार का आराम देना चाहें, उन्हें पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बारे में बताना भी बहुत महत्त्वपूर्ण है. सामान्य ट्रैफिक नियम बताएं, सड़क के शिष्टाचार सिखाएं.

यदि ऐसा हो तो : जीवन में कई स्थितियों में अपने बच्चों को ऐक्सिडैंटप्रूफ बनाने के लिए, ‘यदि ऐसा हो जाए’ वाली स्थिति से निबटने के लिए समझाएं. 8 और 10 साल के बच्चों की मां रीता शर्मा कहती हैं, ‘‘हम दोनों कामकाजी हैं. हमारे बच्चे डेकेयर में रहते हैं. मैं ने बच्चों को लोकप्रिय गानों की ट्यून पर इमरजैंसी नंबर, पास में रहने वाले रिश्तेदारों के नंबर बताए हैं. अब जब गाना बजता है, वे नंबर दोहराने लगते हैं.’’ बच्चों को अजनबियों से सचेत रहने के लिए कहें. उन्हें असुरक्षित जगहों के बारे में बताएं. अपने घर के आसपास महत्त्वपूर्ण लैंडमार्क समझा दें. भले ही वे सुरक्षित माहौल में हों, आप खुद भी उन पर, उन के आसपास की चीजों पर नजर जरूर रखें. उन की बातें ध्यान से सुनें, उन्हें अपना समय दें.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें