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Short Story: बनारसी साड़ी

आज सुबह सुबह ही प्रशांत भैया का फोन आया. ‘‘छुटकी,’’ उन्होंने आंसुओं से भीगे स्वर में कहा, ‘‘राधा नहीं रही. अभी कुछ देर पहले वह हमें छोड़ गई.’’

मेरा जी धक से रह गया. वैसे मैं जानती थी कि कभी न कभी यह दुखद समाचार भैया मुझे देने वाले हैं. जब से उन्होंने बताया था कि भाभी को फेफड़ों का कैंसर हुआ है, मेरे मन में डर बैठ गया था. मैं मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि भाभी को और थोड़े दिनों की मोहलत मिल जाए पर ऐसा न हुआ. भला 40 साल की उम्र भी कोई उम्र होती है, मैं ने आह भर कर सोचा. भाभी ने अभी दुनिया में देखा ही क्या था. उन के नन्हेनन्हे बच्चों की बात सोच कर कलेजा मुंह को आने लगा. कंठ में रुलाई उमड़ने लगी. मैं ने भारी मन से अपना सामान पैक किया. अलमारी के कपड़े निकालते समय मेरी नजर सफेद मलमल में लिपटी बनारसी साड़ी पर जा टिकी. उसे देखते ही मुझे बीते दिन याद आ गए. कितने चाव से भाभी ने यह साड़ी खरीदी थी. भैया को दफ्तर के काम से बनारस जाना था. ‘‘चाहो तो तुम भी चलो,’’ उन्होंने भाभी से कहा था, ‘‘पटना से बनारस ज्यादा दूर नहीं है और फिर 2 ही दिन की बात है. बच्चों को मां देख लेंगी.’’

‘‘भैया मैं भी चलूंगी,’’ मैं ने मचल कर कहा था.

‘‘ठीक है तू भी चल,’’ उन्होंने हंस कर कहा था.

हम तीनों खूब घूमफिरे. फिर हम एक बनारसी साड़ी की दुकान में घुसे.

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‘‘बनारस आओ और बनारसी साड़ी न खरीदो, यह हो ही नहीं सकता,’’ भैया बोले. भाभी ने काफी साडि़यां देख डालीं. फिर एक गुलाबी रंग की साड़ी पर उन की नजर गई, तो उन की आंखें चमक उठीं, लेकिन कीमत देख कर उन्होंने साड़ी परे सरका दी.

‘‘क्यों क्या हुआ?’’ भैया ने पूछा, ‘‘यह साड़ी तुम्हें पसंद है तो ले लो न.’’

‘‘नहीं, कोई हलके दाम वाली ले लेते हैं. यह बहुत महंगी है.’’

‘‘तुम्हें दाम के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं,’’ कह कर उन्होंने फौरन वह साड़ी बंधवाई और हम दुकान से बाहर निकले.

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‘‘शशि के लिए भी कुछ ले लेते हैं,’’ भाभी बोलीं.

‘‘शशि तो अभी साड़ी पहनती नहीं. जब पहनने लगेगी तो ले लेंगे. अभी इस के लिए एक सलवारकमीज का कपड़ा ले लो.’’ मेरा बहुत मन था कि भैया मेरे लिए भी एक साड़ी खरीद देते. मेरी आंखों के सामने रंगबिरंगी साडि़यों का समां बंधा था. जैसे ही हम घर लौटे मैं ने मां से शिकायत जड़ दी. मां को बताना बारूद के पलीते में आग लगाने जैसा था. मां एकदम भड़क उठीं, ‘‘अरे इस प्रशांत के लिए मैं क्या कहूं,’’ उन्होंने कड़क कर कहा, ‘‘बीवी के लिए 8 हजार रुपए खर्च कर दिए. अरे साथ में तेरी बिन ब्याही बहन भी तो थी. उस के लिए भी एक साड़ी खरीद देता तो तेरा क्या बिगड़ जाता? इस बेचारी का पिता जिंदा होता तो यह तेरा मुंह क्यों जोहती?’’

‘‘मां, इस के लिए भी खरीद देता पर यह अभी 14 साल की ही तो है. इस की साड़ी पहनने की उम्र थोड़े ही है.’’

‘‘तो क्या हुआ? अभी नहीं तो एकाध साल बाद ही पहन लेती. बीवी के ऊपर पैसा फूंकने को हरदम तैयार. हम लोगों के खर्च का बहुत हिसाबकिताब करते हो.’’ भैया चुप लगा गए. मां बहुत देर तक बकतीझकती रहीं. भाभी ने साड़ी मां के सामने रखते हुए कहा, ‘‘मांजी, यह साड़ी शशि के लिए रख लीजिए. यह रंग उस पर बहुत खिलेगा.’’ मां ने साड़ी को पैर से खिसकाते हुए कहा, ‘‘रहने दे बहू, हम साड़ी के भूखे नहीं हैं. देना होता तो पहले ही खरीदवा देतीं. अब क्यों यह ढोंग कर रही हो? तुम्हारी साड़ी तुम्हें ही मुबारक हो.’’ फिर वे रोने लगीं, ‘‘प्रशांत के बापू जीवित थे तो हम ने बहुत कुछ ओढ़ा और पहना. वे मुझे रानी की तरह रखते थे. अब तो तुम्हारे आसरे हैं. जैसे रखोगी वैसे रहेंगे. जो दोगी सो खाएंगे.’’ साड़ी उपेक्षित सी बहुत देर तक जमीन पर पड़ी रही. फिर भाभी ने उसे उठा कर अलमारी में रख दिया.

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मुझे याद है कुछ महीने बाद भैया के सहकर्मी की शादी थी और घर भर को निमंत्रित किया गया था.

‘‘वह बनारसी साड़ी पहनो न,’’ भैया ने भाभी से आग्रह किया, ‘‘खरीदने के बाद एक बार भी तुम्हें उसे पहने नहीं देखा.’’

‘‘भाभी साड़ी पहन कर आईं तो उन पर नजर नहीं टिकती थी. बहुत सुंदर दिख रही थीं वे. भैया मंत्रमुग्ध से उन्हें एकटक देखते रहे.’’

‘‘चलो सब जन गाड़ी में बैठो,’’ उन्होंने कहा. मां की नजर भैया पर पड़ी तो वे बोलीं, ‘‘अरे, तू यही कपड़े पहन कर शादी में जाएगा?’’

‘‘क्यों क्या हुआ ठीक तो है?’’

‘‘खाक ठीक है. कमीज की बांह तो फटी हुई है.’’

‘‘ओह जरा सी सीवन उधड़ गई है. मैं ने ध्यान नहीं दिया.’’ ‘‘अब यही फटी कमीज पहन कर शादी में जाओगे? जोरू पहने बनारसी साड़ी और तुम पहनो फटे कपड़े. तुम्हें अपनी मानमर्यादा का तनिक भी खयाल नहीं है. लोग देखेंगे तो हंसी नहीं उड़ाएंगे?’’

‘‘मैं अभी कमीज बदल कर आता हूं.’’

‘‘लाइए मैं 1 मिनट में कमीज सी देती हूं,’’ भाभी बोलीं, ‘‘उतारिए जल्दी.’’

थोड़ी देर में भाभी बाहर आईं, तो उन्होंने अपनी साड़ी बदल कर एक सादी फूलदार रेशमी साड़ी पहन ली थी.

‘‘यह क्या?’’ भैया ने आहत भाव से पूछा,’’ तुम पर कितनी फब रही थी साड़ी. बदलने की क्या जरूरत थी?

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‘‘मुझे लगा साड़ी जरा भड़कीली है. दुलहन से भी ज्यादा बनसंवर कर जाऊं यह कुछ ठीक नहीं लगता.’’ भैया चुप लगा गए. उस दिन के बाद भाभी ने वह साड़ी कभी नहीं पहनी. हर साल साड़ी को धूप दिखा कर जतन से तह कर रख देतीं थीं. मैं जानती थी कि भाभी को मां की बात लग गई है. मां असमय पति को खो कर अत्यंत चिड़चिड़ी हो गई थीं. भाभी के प्रति तो वे बहुत ही असहिष्णु थीं. और इधर मैं भी यदाकदा मां से चुगली जड़ कर कलह का वातावरण उत्पन्न कर देती थी. घर में सब से छोटी होने के कारण मैं अत्यधिक लाडली थी. भैया भी जीजान से कोशिश करते कि मुझे पिता की कमी महसूस न हो और उन पर आश्रित होने की वजह से मुझ में हीन भाव न पनपे. इधर मां भी पलपल उन्हें कोंचती रहती थीं कि प्रशांत अब गृहस्थी की बागडोर तेरे हाथ में है. तू ही घर का कर्ताधर्ता है. तेरा कर्तव्य है कि तू सब को संभाले, सब को खुश रखे. लेकिन क्या यह काम इतना आसान था? सम्मिलित परिवार में हर सदस्य को खुश रखना कठिन था.

भैया प्रशासन आधिकारी थे. आय अधिक न थी पर शहर में दबदबा था. लेकिन महीना खत्म होतेहोते पैसे चुक जाते और कई चीजों में कटौती करनी पड़ती. मुझे याद है एक बार दीवाली पर भैया का हाथ बिलकुल तंग था. उन्होंने मां से सलाह की और तय किया कि इस बार दीवाली पर पटाखे और मिठाई पर थोड़ेबहुत पैसे खर्च किए जाएंगे और किसी के लिए नए कपड़े नहीं लिए जाएंगे. ‘‘लेकिन छुटकी के लिए एक साड़ी जरूर ले लेना. अब तो वह साड़ी पहनने लगी है. उस का मन दुखेगा अगर उसे नए कपड़े न मिले तो. अब कितने दिन हमारे घर रहने वाली है? पराया धन, बेटी की जात.’’

‘‘ठीक है,’’ भैया ने सिर हिलाया.

मैं नए कपड़े पहन कर घर में मटकती फिरी. बाकी सब ने पुराने धुले हुए कपड़े पहने हुए थे. लेकिन भाभी के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं आई. जहां तक मुझे याद है शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरा हो जब घर में किसी बात को ले कर खटपट न हुई हो. भैया के दफ्तर से लौटते ही मां उन के पास शिकायत की पोटली ले कर बैठ जातीं. भैयाभाभी कहीं घूमने जाते तो मां का चेहरा फूल जाता. फिर जैसे ही वे घर लौटते वे कहतीं, ‘‘प्रशांत बेटा, घर में बिन ब्याही बहन बैठी है. पहले उस को ठिकाने लगा. फिर तुम मियांबीवी जो चाहे करना. चाहे अभिसार करना चाहे रास रचाना. मैं कुछ नहीं बोलूंगी.’’ कभी भाभी को सजतेसंवरते देखतीं तो ताने देतीं, ‘‘अरी बहू, सारा समय शृंगार में लगाओगी, तो इन बालगोपालों को कौन देखेगा?’’ कभी भाभी को बनठन कर बाहर जाते देख मुंह बिचकातीं और कहतीं, ‘‘उंह, 3 बच्चों की मां हो गईं पर अभी भी साजशृंगार का इतना शौक.’’

इधर भैया भाभी को सजतेसवंरते देखते तो उन का चेहरा खिल उठता. शायद यही बात मां को अखरती थी. उन्हें लगता था कि भाभी ने भैया पर कोई जादू कर दिया है तभी वे हर वक्त उन का ही दम भरते रहते हैं. जबकि भाभी के सौम्य स्वभाव के कारण ही भैया उन्हें इतना चाहते थे. मैं ने कभी किसी बात पर उन्हें झगड़ते नहीं देखा था. कभीकभी मुझे ताज्जुब होता था कि भाभी जाने किस मिट्टी की बनी हैं. इतनी सहनशील थीं वे कि मां के तमाम तानों के बावजूद उन का चेहरा कभी उदास नहीं हुआ. हां, एकाध बार मैं ने उन्हें फूटफूट कर रोते हुए देखा था. भाभी के 2 छोटे भाई थे जो अभी स्कूल में पढ़ रहे थे. वे जब भी भाभी से मिलने आते तो भाभी खुशी से फूली न समातीं. वे बड़े उत्साह से उन के लिए पकवान बनातीं. उस समय मां का गुस्सा चरम पर पहुंच जाता, ‘‘ओह आज तो बड़ा जोश चढ़ा है. चलो भाइयों के बहाने आज सारे घर को अच्छा खाना मिलेगा. लेकिन रानीजी मैं पूछूं, तुम्हारे भाई हमेशा खाली हाथ झुलाते हुए क्यों आते हैं? इन को सूझता नहीं कि बहन से मिलने जा रहे हैं, तो एकाध गिफ्ट ले कर चलें. बालबच्चों वाला घर है आखिर.’’

‘‘मांजी, अभी पढ़ रहे हैं दोनों. इन के पास इतने पैसे ही कहां होते हैं कि गिफ्ट वगैरह खरीदें.’’

‘‘अरे इतने भी गएगुजरे नहीं हैं कि 2-4 रुपए की मिठाई भी न खरीद सकें. आखिर कंगलों के घर से है न. ये सब तौरतरीके कहां से जानेंगे.’’ भाभी को यह बात चुभ गई. वे चुपचाप आंसू बहाने लगीं. कुछ वर्ष बाद मेरी शादी तय हो गई. मेरे ससुराल वाले बड़े भले लोग थे. उन्होंने दहेज लेने से इनकार कर दिया. जब मैं विदा हो रही थी तो भाभी ने वह बनारसी साड़ी मेरे बक्से में रखते हुए कहा, ‘‘छुटकी, यह मेरी तरफ से एक तुच्छ भेंट है.’’

‘‘अरे, यह तो तुम्हारी बहुत ही प्रिय साड़ी है.’’

‘‘हां, पर इस को पहनने का अवसर ही कहां मिलता है. जब भी इसे पहनोगी तुम्हें मेरी याद आएगी.’’

‘हां भाभी’ मैं ने मन ही मन कहा, ‘इस साड़ी को देखूंगी तो तुम्हें याद करूंगी. तुम्हारे जैसी स्त्रियां इस संसार में कम होती हैं. इतनी सहिष्णु, इतनी उदार. कभी अपने लिए कुछ मांगा नहीं, कुछ चाहा नहीं हमेशा दूसरों के लिए खटती रहीं, बिना किसी प्रकार की अपेक्षा किए.’ मुझे उन की महानता का तब एहसास होता था जब वे अपने प्रति होते अन्याय को नजरअंदाज कर जातीं. मेरी ससुराल में भरापूरा परिवार था. 2 ननदें, 1 लाड़ला देवर, सासससुर. हर नए ब्याहे जोड़े की तरह मैं और मेरे पति भी एकदूसरे के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की कोशिश करते. शाम को जब मेरे पति दफ्तर से लौटते तो हम कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बनाते. जब मैं बनठन का तैयार होती, तो मेरी नजर अपनी ननद पर पड़ती जो अकसर मेरे कमरे में ही पड़ी रहती और टकटकी बांधे मेरी ओर देखती रहती. वह मुझ से हजार सवाल करती. कौन सी साड़ी पहन रही हो? कौन सी लिपस्टिक लगाओगी? मैचिंग चप्पल निकाल दूं क्या? इत्यादि. बाहर की ओर बढ़ते मेरे कदम थम जाते. ‘‘सुनो जी,’’ मैं अपने पति से फुसफुसा कर कहती, ‘‘सीमा को भी साथ ले चलते हैं. ये बेचारी कहीं बाहर निकल नहीं पाती और घर में बैठी बोर होती रहती है.

‘‘अच्छी बात है,’’ ये बेमन से कहते, ‘‘जैसा तुम ठीक समझो.’’ मेरी सास के कानों में यह बात पड़ती तो वे बीच ही में टोक देतीं,

‘‘सीमा नहीं जाएगी तुम लोगों के साथ. उसे स्कूल का ढेर सारा होमवर्क करना है और उस को ले जाने का मतलब है टैक्सी करना, क्योंकि मोटरसाइकिल पर 3 सवारियां नहीं जा सकतीं.’’ सीमा भुनभनाती, मुंह फुलाती, अपनी मां से हुज्जत करती पर सास का फरमान कोई टाल नहीं सकता था. मैं मन ही मन जानती थी कि मेरी सास जानबूझ कर सीमा को हमारे साथ नहीं भेजती थीं और उसे घर के किसी काम में उलझाए रखती थीं. मैं मन ही मन उन का आभार मानती. एक बार मेरे भैया मुझ से मिलने आए थे. मां ने अपने सामर्थ्य भर कुछ सौगात भेजी थीं. मेरी सास ने उन वस्तुओं की बहुत तारीफ की और घर भर को दिखाया. फिर उन्होंने मुझ से कहा, ‘‘बहू, बहुत दिनों बाद तुम्हारे भाई तुम से मिलने आए हैं. तुम अपनी निगरानी में आज का खाना बनवाओ और उन की पसंद की चीजें बनवा कर उन्हें खिलाओ.’’ मेरा मन खुशी से नाच उठा. उन के प्रति मेरा मन आदर से झुक गया. कितना फर्क था मेरी मां और मेरी सास के बरताव में, मैं ने सोचा. मुझे याद है जब भी मेरी भाभी का कोई रिश्तेदार उन से मिलने आता तो मेरी मां की भृकुटी तन जाती. वे किचन में जा कर जोरजोर से बरतन पटकतीं ताकि घर भर को उन की अप्रसन्नता का भान हो जाए.

मुझे याद आया कि जब मेरी शादी हुई तो मेरी मां ने मुझे बुला कर हिदायत दी थी, ‘‘देख छुटकी, तेरा दूल्हा बड़ा सलोना है. तू उस के मुकाबले में कुछ भी नहीं है. मैं तुझे चेताए देती हूं कि तू हमेशा उन के सामने बनठन कर रहना. तभी तू उन का मन जीत पाएगी.’’ मुझ से कहे बिना नहीं रहा गया, ‘‘लेकिन भाभी को तो तुम हमेशा बननेसंवरने पर टोका करती थीं.’’

‘‘वह और बात है. तेरी भाभी कोई नईनवेली दुलहन थोड़े न है. बालबच्चों वाली है,’’ मां मुझ से बोलीं. इस के विपरीत मेरी ससुराल में जब भी कोई त्योहार आता तो मेरी सास आग्रह कर के मुझे नई साड़ी पहनातीं और अपने गहनों से सजातीं. वे सब से कहती फिरतीं, ‘‘मेरी बहू तो लाखों में एक है.’’

इधर मेरी मां थीं जिन्होंने भाभी को तिलतिल जलाया था. उन की भावनाओं की अवहेलना कर के उन के जीवन में जहर घोल दिया था. ऐसा क्यों किया था उन्होंने? ऐसा कर के न केवल उन्होंने मेरे भाई की सुखशांति भंग कर दी थी बल्कि भाभी के व्यक्तित्व को भी पंगु बना दिया था. मुझे लगता है भाभी अपने प्रति बहुत ही लापरवाह हो गई थीं. उन में जीने की इच्छा ही मर गई थी. यहां तक कि जब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी ने उन्हें धर दबोचा तब भी उन्होंने अपनी परवाह न की, न घर में किसी को बताया कि उन्हें इतनी प्राणघातक बीमारी है. जब भैया को भनक लगी तब तक बहुत देर हो चुकी थी. जब मैं घर पहुंची तो भाभी की अर्थी उठने वाली थी. मैं ने अपने बक्से से बनारसी साड़ी निकाली और भाभी को पहना दी.

‘‘ये क्या कर रही है छुटकी,’’ मां ने कहा, ‘‘थोड़ी देर में तो सब राख होने वाला है.’’

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‘‘होने दो,’’ मैं ने रुक्षता से कहा.

मुझे भाभी की वह छवि याद आई जब वे वधू के रूप में घर के द्वार पर खड़ी थीं. उन के माथे पर गोल बिंदी सूरज की तरह दमक रही थी. उन के होंठों पर सलज्ज मुसकान थी. उन की आंखों में हजार सपने थे. भाभी की अर्थी उठ रही थी. मां का रुदन सब से ऊंचा था. वे गला फाड़फाड़ कर विलाप कर रही थीं. भैया एकदम काठ हो गए थे. उन के दोनों बेटे रो रहे थे पर छोटी बेटी नेहा जो अभी 4 साल की ही थी चारों ओर अबोध भाव से टुकुरटुकुर देख रही थी. मैं ने उस बच्ची को गोद में उठा लिया और भैया से कहा, ‘‘लड़के बड़े हैं. कुछ दिनों में बोर्डिंग में पढ़ने चले जाएंगे. पर यह नन्ही सी जान है जिसे कोई देखने वाला नहीं है. इस को तुम मुझे दे दो. मैं इसे पाल लूंगी और जब कहोगे वापस लौटा दूंगी.’’

‘‘अरी ये क्या कर रही है?’’ मां फुसफुफसाईं ‘‘तू क्यों इस जंजाल को मोल ले रही है. तुझे नाहक परेशानी होगी.’’

‘‘नहीं मां मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. उलटे अगर बच्ची यहां रहेगी तो तुम उसे संभाल न सकोगी.’’ ‘‘लेकिन तेरी सास की मरजी भी तो जाननी होगी. तू अपनी भतीजी को गोद में लिए पहुंचेगी तो पता नहीं वे क्या कहेंगी.’’

‘‘मैं अपनी सास को अच्छी तरह जानती हूं. वे मेरे निर्णय की प्रशंसा ही करेंगी,’’ मैं ने दृढ़ शब्दों में कहा. मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे भाभी अंतरिक्ष से मुझे देख रही हैं और हलकेहलके मुसकारा रही हैं. ‘भाभी,’ मैं ने मन ही मन कहा, ‘मैं तुम्हारी थाती लिए जा रही हूं. मुझे पक्का विश्वास है कि इस में तुम्हारे संस्कार भरे हैं. इसे अपने हृदय से लगा कर तुम्हारी याद ताजा कर लिया करूंगी.

बिहार के छपरा में होगा “सारण अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह” !

छपरा , बिहार 15 जून  2019 : “सारण अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह“ बिहार के छपरा (सारण जिला)  में होने जा रहा है.  ये तीन दिवसीय समारोह इस वर्ष नवम्बर में आयोजित होना है. 15 , 16 और 17 नवंबर समारोह की तारीख हैं. प्रतियोगिता के लिए फिल्मों की एंट्रीज समारोह के वेबसाइट के माध्यम से शुरू हो गयी हैं.

फिल्म सबमिट करने के लिए कुछ कैटेगरी बनाई गयीं है जैस- डाक्यूमेंट्री, शौर्ट फिक्शन, एनीमेशन, ट्राइबल और मोबाइल फिल्म. फिल्म सबमिट करने के बाद प्री-सिलेक्शन कमेटी के द्वारा सभी फिल्मों को देखा जाएगा और उनमें से कुछ फ़िल्में तीन दिवसीय समारोह में प्रतियोगिता के लिए चुनी जाएंगी और समारोह के दौरान दिखाई जाएंगी.

समारोह के दौरान कुछ विशेष आकर्षण भी होंगे जैसे- फिल्म स्टूडेंट्स के लिए मास्टर क्लास, सेलेब्रिटी के साथ बातचीत, भोजपुरी क्लासिक फिल्मों की स्क्रीनिंग, सिनेमा से सम्बंधित मुद्दों पर पैनल डिस्क्शन आदि.

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फेस्टिवल में सभी प्रतिभागियों के लिए आकर्षक पुरस्कार भी हैं और ये एक अच्छा बहाना हो सकता है उनके लिए जिन्होंने कभी बिहार नहीं देखा है, वे यहां आ सकते हैं और अपनी फिल्मों के माध्यम से अपनी बात दुनिया तक पहुंचा सकते हैं .

फेस्टिवल डायरेक्टर अभिषेक अरुण ने बताया कि, “ ये समारोह अपने आप में अनूठा होगा, जिसमें दुनिया भर से फिल्मकार भाग ले सकतें हैं. सभी का हमारी सारण की धरती पर स्वागत है. हमारा मुख्य उद्देश्य है की दुनिया की विभिन्न संस्कृति एक मंच पर मिलें और उन सभी संस्कृतियों का संगम ये समारोह हो. हम चाहते हैं की हमारा क्षेत्रीय प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़े और हमारे सारण का नाम दुनिया के अलग अलग हिस्से में रोशन हो. हम सभी को पता है की बिहार की धरती कला, संस्कृति और परम्पराओं की धरती है, बहुत से प्रसिद्ध हीरे जो की आज सिनेमा की दुनिया में अपना नाम कमा रहे हैं, वो बिहार से ही हुए हैं. उन सभी को जोड़ने का काम ये महोत्सव करेगा. हमारा तो टैग लाइन ही है “ REGIONAL BECOMES GLOBAL” . इस महोत्सव में क्षेत्रीय संस्कृति और परंपरा को भी विश्व स्तर पर एक अलग पहचान मिलेगी.

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समारोह का आयोजन फ्रेमजोमेनिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है जो की एक तेज़ी से उभरता हुआ प्रोडक्शन हाउस है जो कई वर्षों से औडियो विज़ुअल कंटेंट बनाने का काम कर रहा है, ये आर्गेनाइजेशन इवेंट्स और फिल्म फेस्टिवल के आयोजन से पिछले चार-पांच वर्षों से लगा है. इस  ग्रुप के दिशा निर्देश में बिहार के छपरा में एक रेडियो स्टेशन भी कार्यान्वित है जो सामुदायिक काम करके सामाजिक बदलाव ला रहा है.

आप अधिक जानकारी के लिए समारोह के वेबसाइट www.siffindia.com से जानकारी ले सकते हैं.  फिल्म भेजने की आखिरी तारीख 25 Sep, 2019 हैं.

2019 के वर्ल्ड कप में दिखा 1983 का रणवीर

रविवार,16 जून को दुनियाभर में ‘फादर्स डे’ मनाया गया और इसी दिन इंगलैंड के नामचीन शहर मैनचेस्टर में भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ल्ड कप का लीग मैच भी खेला गया. इस मैच का सभी को बेसब्री से इंतजार था कि क्या भारत पाकिस्तान को 7वीं बार हरा देगा? वैसे, इस टूर्नामेंट में जब से बारिश ने कई मैचों को धोया है, उस से तो यह लग रहा था कि यह मैच भी हो पाएगा या नहीं.

बहरहाल, मैच शुरू हुआ. पाकिस्तान ने टास जीता और भारत को पहले बल्लेबाजी करने का न्योता दिया. पूर्व क्रिकेटर आकाश चोपड़ा की जबान में कहें तो भारत ने इस निमंत्रण को स्वीकार किया और शुरू से ही मैच पर नियंत्रण बनाते हुए बारिश से बाधित इस मैच में ‘डकवर्थ लुईस नियम’ के आधार पर पाकिस्तान को 89 रनों से धो डाला.

भारत की इस जीत पर सब ने जश्न मनाया, पर एक बंदा था जिस ने खेल के मैदान से ले कर कमेंटरी बौक्स तक सब जगह अपने बिंदास हुलिए और बातों से लोगों का भरपूर मनोरंजन किया. हम बात कर रहे हैं शानदार बौलीवुड कलाकार रणवीर सिंह की, जो हाल-फिलहाल अपनी नई फिल्म ’83’ की शूटिंग इंगलैंड में कर रहे हैं. यह फिल्म साल 1983 में हुए इंगलैंड के उस वर्ल्ड कप पर बन रही है जिसे कपिल देव की औसत दर्जे की टीम ने तब की दिग्गज टीम वेस्टइंडीज को फाइनल मुकाबले में हरा कर जीता था. इस फिल्म में रणवीर सिंह कपिल देव का किरदार निभा रहे हैं.

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रणवीर सिंह मैच शुरू होने से पहले हरभजन सिंह, ब्रायन लारा और वीरेंद्र सहवाग से बात करते नजर आए. इस के अलावा उन्होंने सभी के साथ तसवीरें भी खिंचवाईं. वे सुनील गावस्कर से मस्ती करते दिखे तो मैच जीतने की बाद विराट कोहली के गले लग कर उन्हें जीत की बधाई भी दी.

इस के अलावा रणवीर सिंह अपनी ड्रेस से भी सुर्खियां बटोर गए. उन्होंने 1983 के जमाने का वह लुक याद दिला दिया जब ढीलेढाले कोटपैंट पर बड़े चेक्स बने होने का चलन था. रणवीर सिंह ने गहरे भूरे रंग का ऐसा ही बड़े चेक वाला कोटपैंट पहना था. उन्होंने सफेद रंग की शर्ट पर चटक लाल टाई बांधी हुई थी और एक मैच करता मफलर भी गले में डाल रखा था. साथ ही उन्होंने बड़े आकार के डार्क ब्राउन शेड्स भी पहने हुए थे.

पहली नजर में रणवीर सिंह का यह हुलिया थोड़ा अजीबोगरीब लगा पर चूंकि वे फिल्म ’83’ कर रहे हैं तो उन का यह लुक तो बनता ही था.

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अजब इत्तेफाक: किसी फिल्म से कम नहीं ये लव स्टोरी

आस्ट्रेलिया के रहने वाले डेनियल और जेम्मा के बीच जो प्यार हुआ, वह रोमांटिक हिंदी फिल्मों की लव स्टोरी से जुदा नहीं है. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि दोनों का जन्म एक अस्पताल में एक ही दिन हुआ था. दोनों को डाक्टरों ने एक ही पालने में लेटाया था. दोनों की परवरिश अलगअलग शहरों में अलग परिवारों में हुई लेकिन अब दोनों हमसफर बन गए.

डेनियल और जेम्मा का जन्म सन 1989 में एक ही दिन हुआ था. दोनों की मांएं एक अस्पताल में भरती थीं. उन के बैड भी साथसाथ थे, जिस से उन के बीच दोस्ती हो गई थी. इत्तफाक देखिए कि दोनों मांओं को प्रसव भी साथ हुआ और एक ही दिन दोनों के बच्चे हुए. डाक्टरों ने दोनों के बच्चे को एक ही पालने में रखा. यानी डेनियल और जेम्मा की पहली मुलाकात पालने में हुई थी. तब जब दोनों में न तो कोई बोल सकता था और न कुछ समझ सकता था.

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अस्पताल में छुट्टी के बाद दोनों मांएं अपनेअपने परिवार के साथ घर चली गईं. इस बीच कभीकभी उन की बातचीत और मुलाकात होती रहती थी. दोनों परिवारों के बीच 9 सालों तक दोस्ताना संबंध रहे. इस के बाद डेनियल की फैमिली मेलबर्न शिफ्ट हो गई तो इन का साथ छूट गया. कई सालों तक न तो डेनियल और जेम्मा के बीच कोई बात हुई और न ही उन के परिवारों के बीच. लेकिन दोस्ती की धुंधली यादें जेहन में थीं.

सन 2013 में एक दिन जेम्मा फेसबुक खोल कर देख रही थी, तभी उसे एक हेयर ड्रेसर का पेज मिला. वह पेज जेम्मा को पसंद आया तो उस ने उसे लाइक कर दिया. वह हेयर ड्रेसर रियाना थी. इस के बाद रियाना और जेम्मा की फेसबुक पर चैटिंग होने लगी.

चैटिंग के दौरान रियाना ने उसे अपने परिवार के बारे में बताया. तब पता चला कि रियाना डेनियल की बहन है. फिर एक दिन जेम्मा रियाना के सैलून पर गई. वह उस से अपने बालों पर कलर कराने गई थी. उस के आधे बालों पर ही कलर हो पाया था कि उसी समय डेनियल वहां आ गया. डेनियल को देख कर जेम्मा इतनी खुश हुई कि वह तुरंत चेयर से उतर कर उस के गले लग गई. उस समय वह यह भी भूल चुकी थी कि उस के बालों पर कलरिंग की प्रकिया चल रही है.

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इस के बाद जेम्मा और डेनियल के बीच बातें और मुलाकातें होने लगीं. सन 2014 में दोनों ने अपने परिवारों को बता दिया कि वे डेटिंग कर रहे हैं. इस के 2 साल बाद न्यू ईयर ईव पर डेनियल ने जेम्मा को प्रपोज किया. फिर 2017 में उन की शादी हो गई. 28 साल बाद दोनों एकदूसरे के हुए.

डेनियल और जेम्मा अपने वैवाहिक जीवन से खुश हैं और अब उन के बीच एक नया मेहमान भी आने वाला है. जब भी उन का मन होता है, वे अपनी बचपन की तसवीरें देखते हैं, जिन्हें देख कर उन का विश्वास और पक्का हो जाता है कि दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं.

सोलो ट्रैवल टिप्स: जो बनाएं आपके सफर को खूबसूरत

सपना है पूरा जहां घूमने का, लेकिन एक दोस्त की ‘न’ से प्लान कैंसिल पर कैंसिल होते जाएं तो आप क्या करेंगी? किसी और के भरोसे बैठी रहेंगी? अपने गु्रप के हर सदस्य को मनातेमनाते ट्रिप के मौके गंवाती रहेंगी? वह समय गया जब मम्मी कहा करती थीं कि जहां जाना है शादी के बाद जाना. अब समय है कि दोस्त हों न हों, साथ जाने के लिए गु्रप हो न हो, उठो, सामान बांधो और अपनी मंजिल की ओर निकल जाओ.

सोलो ट्रैवल प्लान जितना डरावना लगता है, असल में वह उस से कहीं ज्यादा रोमांच भरा होता है. खासकर, लड़कियों को तो सोलो ट्रैवलिंग के लिए जाना ही चाहिए. यह न केवल आप के आत्मविश्वास को बढ़ाता है बल्कि आप को आंतरिक व बाहरी दोनों रूपों से मजबूत भी बनाता है. किसी अनजान शहर में घूमना, कहीं पहाड़ की चोटी से सूरज डूबते देखना, एक नई हवा, नई ऊर्जा को महसूस करना अलग एहसास है, जो सोलो ट्रिप पर ही आप को मिलता है. फैमिली ट्रैवल, गु्रप ट्रैवल और अपने पार्टनर के साथ ट्रिप पर जाने और अकेले ट्रिप पर जाने में बहुत फर्क है.

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सोलो ट्रिप पर आप की निर्भरता खुद पर होती है किसी और पर नहीं, आप जहां चाहें, जैसे चाहें, अपनी मरजी से आजा सकते हैं, किसी और की मनमरजी के हिसाब से आप को कार्य नहीं करना पड़ता. दुनिया को देखने का नजरिया अकेले जाने पर अलग होता है. आप किसी पल शांत, तो किसी पल मस्ती से भरे हुए होते हैं, जिस में आप को रोकनेटोकने वाला कोई नहीं होता.

इन टिप्स को रखें याद

अकेले ट्रैवल पर जाने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना जरुरी है. जहां जा रहे हैं उस के बारे में जानकारी रखना, ट्रैवल प्लान बनाना, यातायात के साधनों की जानकारी रखना, गैस्टहाउस या होस्टल बुक कर के रखना आदि. सही तरह से बनाए गए ट्रैवल प्लान में खतरे की गुंजाइश न के बराबर होती है. लड़कियों के लिए सोलो ट्रैवलिंग एक बहुत ही रोमांचकारी सफर होता है और यदि कुछ सावधानियों व जानकारियों के साथ जाएं तो यह जीवनभर के लिए खुशनुमा अनुभव बन जाएगा.

यातायात हो सुरक्षित

कोशिश करें कि आप अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचने के लिए सार्वजनिक वाहन से पहुंचें. हो सके तो फ्लाइट, ट्रेन या बस से जाएं. प्राइवेट बसों, ट्रकों या वैन आदि से न जाएं. सार्वजनिक वाहन अकेले व्यक्ति के लिए सही होते हैं क्योंकि आप को पता होता है कि आप बाकी लोगों के समान ही गंतव्य स्थल पर पहुंचेंगे जबकि प्राइवेट वाहन में ड्राइवर आप को रास्ता भटका सकता है. साथ ही, रात में ट्रैवल करने से बचें, सुबह से शाम के बीच गंतव्य स्थान पर पहुंचें और रात होने से पहले घूमफिर कर अपने रुकने के स्थान पर वापस आ जाएं.

रुपयों का रखें प्रबंध

आप जिस जगह घूमने जा रहे हैं वहां जरूरत पड़ने पर एटीएम मिलेगा या नहीं, यह आप को नहीं पता. इसलिए हमेशा अपने साथ कुछ कैश जरूर रखें. बड़े नोट के साथसाथ खुले पैसे ले कर जाएं ताकि आप को हर किसी के सामने 500 या 2000 रुपए के नोट न निकालने पड़ें और चोरउचक्कों का ध्यान आप की ओर आकर्षित न हो.

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अपने एटीएम कार्ड को साथ रखें और उस के कहीं गुम हो जाने पर तुरंत परिवार को सूचित कर उसे बंद कराएं. कैशलैस ऐप्स का जितना हो सके उतना यूज करें. अपने पैसों को कभी भी एकसाथ न रखें. कुछ अपने बैग में, कुछ पौकेट में. बाहर घूमते समय, कुछ होटल में और कुछ यहांवहां छिपा कर रखें.

बैकपैक लें, ट्रौली बैग नहीं

ट्रैवलिंग में सब से जरूरी है यह समझना कि आप जितना कम सामान ले जाएंगे उतने ही आराम से ट्रैवल कर पाएंगे, घूमफिर पाएंगे. अपने साथ बैकपैक रखें, न कि ट्रौली बैग, ताकि आप जब चाहें एक जगह से दूसरी जगह जा सकें, शहरशहर घूम अपनी ट्रिप का आनंद ले सकें. अपनी जरूरत का सामान ही कैरी करें.

आम लोगों की तरह दिखें

कोशिश करें कि आप अपनी साजसज्जा से टूरिस्ट जैसे न लगें क्योंकि ऐसे में आप केवल लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करेंगी, उस से ज्यादा कुछ नहीं. आम लोगों जैसे ही कपड़े पहनें, अलग से दिखने वाले चमकधमक वाले कपड़े या हाई हील्स सैंडल्स नहीं. सिंपल स्पोर्ट्स शूज पहनें जो आप के लंबे सफर के साथी हों. आम लोगों में घुलमिल जाने पर आप किसी प्रकार के खतरे को अपनी ओर आकर्षित नहीं करेंगी.

इमरजैंसी के लिए तैयार रहें

अपने परिवार के सदस्यों और करीबी दोस्तों को अपनी ट्रिप की पूरी जानकारी दें. आप कहां रुक रही हैं, कहां जाने वाली हैं, सब. अपने करीबी लोगों के फोन नंबर भी याद कर लें, यदि आप का फोन खो जाए या खराब हो जाए तो आप को तकलीफ नहीं होगी. साथ ही, अपने फोन में जरूरी ऐप्स भी डाउनलोड कर के रखें, जैसे गूगल मैप्स, पेटीएम, बैंकिंग ऐप्स और होटल आदि की जानकारी देने वाली ऐप्स.

नशा न करें, होश में रहें

किसी जगह अकेले जाने पर आप को अपना खुद का ध्यान रखना होता है. ऐसे में नशा करना किसी भी तरह से सुरक्षित नहीं है. नशा न कर के टाइम से अपने रूम में आएं और आराम करें. अपने कान और आंखें हर समय खुली रखें और किसी और के हाथ से कुछ खानेपीने से अच्छा है खुद जाएं, लाएं और खाएं. आप का होश में रहना बेहद जरूरी है, इसलिए नशे से दूर रहें.

अलर्ट रहें

यदि आप को कहीं घूमतेफिरते किसी प्रकार का खतरा महसूस होता है तो उस स्थिति से जितना जल्दी हो, निकल जाएं. किसी भी लड़की की छठी इंद्रिय कभी गलत नहीं होती. कुछ अटपटा लगे तो वहां से चले जाएं और सुरक्षित स्थान पर पहुंचें. बहुत ज्यादा घूरने वाले या खतरनाक दिखने वाले लोगों से दूर रहें. रास्ते पर चलते वक्त अपना महंगा फोन दिखाते हुए या कानों में हैडफोन लगा कर न चलें. यदि ऐसा लगे कि कोई आप का पीछा कर रहा है तो अपना फोन पौकेट में रखें और आसपास के किसी व्यक्ति से मदद लें.

खुद की कंपनी एंजौय करें

हो सकता है आप को अपनी ट्रिप के दौरान कुछ ऐसे लोग मिलें जो जरूरत से ज्यादा पीछे पड़ते हुए लगें. ऐसे लोगों से दूरी बना कर रखें. बहुत ज्यादा घुलनेमिलने से बचें. याद रखें कि सोलो ट्रैवल पर आप अकेले घूमनेफिरने आई हैं, अपनी कंपनी एंजौय करने आई हैं. टाइमपास के लिए साथी ढूंढ़ती न रहें. इस से आप की सोलो ट्रिप का मकसद भी पूरा नहीं होगा और ऐसे घुलनेमिलने से क्या पता आप किसी अपराधी को अपनी ओर न खींच लें.

जनजीवन, संस्कृति को जानें

पर्यटन स्थल पर जा कर खुद को अकेला समझ कर अपने रूम में ही न पड़ी रहें. बाहरी जीवन, लोगों के जीवन, वहां की सभ्यता व संस्कृति से वाकिफ हों. कहीं मेला लगता हो या कोई इवैंट होता हो तो उसे जा कर देखें. कहीं नाचगाना हो रहा हो और कदम थिरक रहे हों तो खुद को रोकें नहीं, नाचेंगाएं. लोक गीतों और लोक नाटकों को देखने जाएं.

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आम लोगों से करें बात

जिस स्थान पर आप घूमने गई हैं वहां के आम लोगों से हलकीफुलकी बातें करें. वे आप के टूरिस्ट गाइड से ज्यादा अच्छे सुझाव देंगे. साथ ही, उस स्थान पर मिलने वाली चीजों, उन के दामों और तरहतरह की नईनई बातें भी बताएंगे. इस से आप को खानेपीने और खासकर शौपिंग करने में बहुत मदद मिलेगी.

आयुष्मान खुराना: हमें अपने देश को बेहतर बनाने की जरूरत है

आयुष्मान खुराना का कहना है कि हमारा देश अद्भूत है क्योंकि यहां हर तरह के लोग रहते हैं. हम एक-दूसरे के प्रति काफी संवेदनशील है. लेकिन किसी को भी अपने देश पर आंख बंदकर गर्व नहीं करना चाहिए. दरअसल, आयुष्मान ने ये बातें एक न्यूज साइट को दिए इंटरव्यू में कही जहां वो अपनी फिल्म ‘आर्टिकल 15’ के प्रमोशन के लिए पहुंचे थे. इनकी ये फिल्म जाति भेदभाव पर आधारित है.

आयुष्मान ने यहां ये भी कहा, हमारा देश इसलिए अनोखा है क्योंकि यहां हर तरह के लोग रहते हैं. उन्होंने कहा, हम अपने वास्तविक जीवन में इतने उदास हैं कि हमें गर्व महसूस करने के लिए कुछ चाहिए.

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मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, हम इस फिल्म से यही संदेश देना चाहते हैं कि हमें अपने देश पर गर्व करना चहिए, लेकिन हमें आंखे मूंदकर ऐसा नहीं करना चाहिये. हमें अपने देश को बेहतर बनाने की आवश्यकता है.

क्या है ‘आर्टिकल 15’ …

आपको बता दें कि ये फिल्म कथित तौर पर बदायूं रेप और मर्डर केस पर आधारित है. 27 मई 2014 को उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के कटरा सआदतगंज गांव की घटना ने पिछड़ी जाति (शाक्य) की दो बालिकाओं के साथ हुए बलात्कार और उसके बाद हत्या को लेकर  तत्कालीन सपा सरकार की खूब किरकिरी हुई थी. ये फिल्म उसी मुद्दे पर आधारित है.

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‘आर्टिकल 15’ के ट्रेलर की कुछ लोग आलोचना भी कर रहे हैं. इस पर आयुष्मान ने कहा कि मैं जानता था कि समाज के एक वर्ग को यह बुरा लगेगा. लेकिन जब वे फिल्म देखेंगे तो महसूस करेंगे कि इसमें कुछ भी बुरा नहीं है. आपको बता दें, ‘आर्टिकल 15’ 28 जून को रिलीज होगी. इस फिल्म को अनुभव सिन्हा ने डायरेक्ट किया है जो इससे पहले तापसी पानू और ऋषि कपूर स्टारर फिल्म ‘मुल्क’ बना चुके हैं.

क्यों हुई मसाज के आइडिये की भ्रूण हत्या?

दरअसल में सारा दोष उस भारी भरकम बहुमत का है जो भाजपा से संभाले नहीं संभल रहा है. रेल मंत्री भी इससे अछूते नहीं हैं, जिन्हें मालूम है कि देश के बेरोजगार युवाओं ने बड़ी उम्मीद से दोबारा कमल का फूल यह सोचते खिलाया हैं कि अच्छे दिन मानसून की तरह कहीं अटक गए होंगे. इसमें बेचारे मोदी जी या उनकी सरकार का क्या कुसूर जो पूरे पांच साल काम धाम छोड़ पूजा पाठ में लगे रहे. ऊपर वाले से गुहार लगाते रहे कि प्रभु हमारी तो वोटों से भर दी. अब इन बेरोजगारों की झोली भी रोजगार से भर दो क्योंकि हम घंटे घड़ियाल तो बजा सकते हैं लेकिन पिचके गालों वाले इन नौजवानों का पेट भरने का इंतजाम नहीं कर सकते .

तो ईश्वरीय प्रेरणा से रेल मंत्री जी के दिल में खयाल आया कि क्यों न चलती ट्रेन में मालिश का इंतजाम किया जाये. आइडिया धांसू था कि जिससे एक जाति विशेष जिसे प्यार से नाई या हजाम कहा जाता है. करोड़ों नहीं तो लाखों नौजवानों को काम मिल जाता और दूसरी जाति विशेष जिसे फख्र से सवर्ण कहा जाता है कि बदन मजबूत रहती. जो लोग यह कहते भाजपा को खा-म-खा बदनाम करते हैं कि वह दलित विरोधी पार्टी है. उन्हें रेल मंत्री की भावनाओं पर गौर करना चाहिए कि उन्हें इस जाति के लोगों का इतना ख्याल था या है कि वे रोजगार का परंपरागत तरीका जिंदा करने की बात कर रहे थे.

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इधर पिछले कुछ सालों से शहरों में जगह-जगह मसाज पार्लर उग गए हैं जिनमें मालिश के साथ साथ एक्स्ट्रा सर्विस के नाम पर और भी बहुत कुछ ऐसा उल्टा सीधा प्रोवाइड कराया जाता है जो गौरवशाली भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल है क्योंकि वह छिपाए नहीं छुपता. ऐसा इसलिए हुआ कि मालिश की जिम्मेदारी खूबसूरत कमसिन कन्याओं ने संभाल ली. वे गली गली चिल्लाकर आवाज नहीं लगातीं कि मालिश चंपी करा लो यह नजारा तो अस्सी के दशक में ही दम तोड़ चुका था जब पाश्चत्य संस्कृति ने हमारी गौरवशाली संस्कृति को निगलना शुरू किया था. मालिश का पुश्तैनी काम भी नाइयों से छिन गया तो वे बेचारे फुटपाथ पर आ गए .

मंत्री जी से उनकी यह दुर्दशा नहीं देखी गयी तो उन्होंने अपनी पार्टी के सांसदों से मशवरा किए बिना ट्रेनों में मसाज की घोषणा कर डाली. उनके मंत्रालय ने भी फुर्ती दिखाई और बाकायदा उन ट्रेनों की सूची जारी कर दी जिनमें मालिश को प्रायोगतमक तौर पर शुरू किया जाना था. अधिकारियों की फुर्ती की वजह यह थी कि उन्हें अपनी मुफ्त की मालिश और घूस दिख रही थी. रेलवे के ऊपर से लेकर नीचे तक के मुलजिम खुश थे कि चलो दिन भर की थकान उतारने का भी इंतजाम हो गया. इस नए काम के लिए जिसे भी इजाजत देंगे उसे बताने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी कि भईया दिन में कम से कम तीन कांप्लेमेंट्री मसाज करना पड़ेगी तभी ट्रेन में मालिश करने का लाइसेन्स मिलेगा .

जैसे फेरी बाले और अवैध वेंडर चाय, पकौड़े ( रोजगार वाले नहीं ) समोसा, पापकार्न और  मूंगफली वगैरह खिलाते हैं और तो और गला तर करने चुनिन्दा स्टेशनों पर बोतलें तक मुहैया कराते हैं वैसे ही अब मालिश भी होगी. लेकिन बुरा हो सांसद इंदोर और उनकी बास का जिनहोंने फिर से संस्कृति का बेरियर कुछ ऐसे अड़ाया कि इस नायाब आइडिये की भ्रूण हत्या करना पड़ी. रेल मंत्री जिस संस्कृति को जिंदा करना चाहते थे उसी संस्कृति को हथियार बनाते इन दोनों ने मालिश पर पानी फेर दिया.

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मुद्दा या बात कतई रेलों में मालिश के नफा नुकसान या रेलवे को मिलने बाले संभावित राजस्व के नुकसान का नहीं है. मुद्दा भाजपा का दलित विरोधी चेहरा और चरित्र उजागर होने का है जो नहीं चाहता कि नाइयों को पैसा मिले. हां बात अगर ट्रेन में सत्यनारायन की कथा के लिए ब्राह्मण युवाओं को रोजगार देने की होती तो कोई विरोध नहीं होता उल्टे मालिश का विरोध करने वाले ही इसे अभूतपूर्व और राष्ट्र वादी कदम बताते उसका स्वागत करते और अब तक तो रेलों में सत्यनारायन कोच भी लग चुके होते .

इधर मुसाफिर भी खुश थे कि मालिश कराते सफर करेंगे तो वक्त अच्छा कटेगा और शरीर में फुर्ती भी बनी रहेगी. लोग ट्रेनों में और भी सुविधाएं मिलने की उम्मीद पालने लगे थे मसलन महिलाएं सोचने लगी थीं कि अब ट्रेन में ब्यूटी पार्लर भी खुल जाएंगे और मेंहदी भी रचने लगेगी. और ज्यादा चिंतन मनन करने वाले तो जिम, कसीनों और बार के हसीन ख्वाव भी देखने लगे थे. अब मालिश के फैसले के रद्द होने के साथ ही सब गुड़ गोबर हो गया है .

जानें, कैसे बनाएं घर पर ब्लैकहेड रिमूवर

अगर आपको भी ब्लैकहैड की समस्या है तो इससे राहत पाना काफी आसान है. आप घर पर भी ब्लैकहेड रिमूवर बना सकती है. और ये होममेड रिमूवर आपके लिए काफी फायदेमंद भी होगा. तो आइए जानते है ब्लैकहेड रिमूवर बनाने की विधि.

ब्लैकहेड रिमूवर बनाने की विधि

दालचीनी और शहद दो ऐसी चीजें हैं जिनके इस्तेमाल से आप ब्लैकहैड की समस्या को दूर कर सकते हैं. शहद और दालचीनी दोनों में ही एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं. जिससे इंफेक्शन का खतरा कम हो जाता है. इसके अलावा शहद स्कि‍न को मौइश्चराइज करने का काम करता है.

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ज्यादातर लोग उंगलियों और नाखून से दबाकर ब्लैकहैड निकालते हैं लेकिन आप चाहें तो शहद और दालचीनी की मदद से एक स्ट्रिप तैयार कर सकती हैं. इससे ब्लैकहैड तो दूर हो ही जाएगा साथ ही नाक भी चिकनी हो जाएगी.

ऐसे करें इस्तेमाल

दालचीनी और शहद को अच्छी तरह मिला लें. चेहरे के जिस हिस्से पर ब्लैकहैड हो रखे हैं, वहां इस पेस्ट को लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें. इस पेस्ट के ऊपर कौटन की एक स्ट्रिप लगाएं. जब ये पेस्ट सूखने लगे तो इसे हल्के हाथों से उतार लें. उसके बाद चेहरे को अच्छी तरह धो लें. दो से तीन बार के इस्तेमाल से ही ब्लैकहैड दूर हो जाएंगे.

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जानें, मेंटल हेल्थ को कैसे बनाएं स्ट्रौन्ग

आजकल के भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव लेना आम बात है. इस स्थिती में खुद को मेंटली स्ट्रांग  रखना काफी  चैलेंजिंग होता है. आप अपने हेल्दी माइंड के कारण ही लाइफ में होने वाली सम्सयाओं से राहत पाते हैं. आपको स्वस्थ रहने के लिए हेल्दी माइंड की काफी जरूरत है. तो आइए जानते है दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए आपको क्या करना चाहिए.

नया सीखने की कोशिश करें

दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए कोशिश करनी चाहिए कि कुछ नया सीखते रहना चाहिए. इसके अलावा जो काम आपको पसंद है उसके लिए समय निकालकर उन्हें करें. इससे आप मेंटली स्ट्रांग होंगे.

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दूसरों की सहायता करें

हर व्यक्ति को कोशिश करनी चाहिए कि वह जरूरत पड़ने पर दूसरों की मदद करें. अपनी ऊर्जा को दूसरे की मदद में लगाने से आपको काफी खुशी मिलेगी. खुश रहना आपके दिमाग को स्वस्थ रखने में मददगार होता है.

शरीर का ध्‍यान रखें

कहते है स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिमाग रहता है. स्वस्थ शरीर रखने के लिए आपको अपने सेहत का ध्यान रखना चाहिए. इसके लिए आप हेल्दी भोजन का सेवन करें और खूब पानी पिएं. पूरी नींद लें और धूम्रपान से दूरी बनाकर रखें.

जरूरत पड़ने पर मदद लें

जिंदगी में कई बार पेरशानी आती है, इसके लिए आपको कभी-कभी दूसरों की जरूरत पड़ती है. ऐसे में आप बिना संकोच के दूसरों से मदद लें.  इससे काफी हद तक हमारी परेशानी कम हो जाती है और मानसिक रूप से स्वस्थ रखते हैं.

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तनाव से दूर रहें

तनाव के कारण आप शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार हो जाते हैं. ऐसे में आपको तनाव से दूर करना चाहिए. तनाव से दूर रहने के लिए आपको नियमित रूप से एक्साइज करना चाहिए.

अच्छे लोग ही हमेशा रिश्तों में क्यों खाते हैं मात, जानें 5 कारण

एक बहुत अच्छे साइकायट्रिस्ट और लेखक ने कहा है कि दुनिया का सबसे खूबसूरत इंसान वह होता है जिसने हार,  मुश्किलें, संघर्ष,  हानि और पीड़ा आदि सबको करीब से जाना है और फिर भी गहराई से बाहर निकलने के लिये रास्ता बनाया हो. इन लोगों में प्रशंसा,  नम्रता, संवेदनशीलता और जीवन को जीने की एक समझ होती है. वो लोग हर दिन अपनी जिंदगी एक नई लड़ाई के साथ शुरू करते हैं लेकिन फिर भी कभी शिकायत नहीं करते. अच्छे इंसान जन्म से ही अच्छे हो ऐसा नहीं है, उन्हें जिंदगी के उतार-चढ़ाव ऐसा बना देते हैं. अच्छे इंसान बाकी लोगों की जिंदगी में रोशनी लाते हैं क्योंकि वे खुद अंधेरों का मतलब समझते हैं. अक्सर ऐसा होता है कि जो इंसान अच्छे होते हैं, हमेशा दूसरों के बारे में सोचते हैं, लेकिन उन्हें ही सबसे ज्यादा मुसीबत झेलनी पड़ती हैं. आखिर क्यों होता है ऐसा चलिए जानते हैं.

किस्मत की मार…

बहुत बार अच्छे लोग किस्मत के सामने हार जाते हैं. वो जो चाहते हैं उन्हें कभी नहीं मिलता. हालांकि, वो परेशानियों से लड़ना जानते हैं. सफलता कैसे मिलनी है उन्हें पता हैं और इस तरह की परेशानी से निकलना भी जानते हैं लेकिन उनकी भावनाएं कोई समझ नहीं पाता. उनमें ये हुनर होता है कि वे कुछ भी ना होने का बहाना नहीं बनाते बल्कि जो है उसका सम्मान करते हैं और इसलिए वो रास्ते बनने का इंतजार नहीं करते, बल्कि रास्ते बना लेते हैं.

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उन्हें ‘ना’ बोलना नहीं आता है…

अच्छे इंसान आपको कभी किसी चीज़ के लिए ना नहीं बोलते हैं. चाहे उसके लिये उन्हें कितनी भी मेहनत करनी पड़े. वे हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहते हैं. इसी कारण लोग उनसे काम निकलवाने के लिये सोचते हैं. आप चाहे उनके काम आएं या न आएं वो आपके काम जरूर आते हैं. इससे ये होता है कि वो खुद भी कभी-कभी मुसीबत में पड़ जाते हैं.

किसी पर भी जल्दी भरोसा कर लेना…

जो इंसान किसी पर भी जल्दी भरोसा कर लेते हैं उन्हें हमेशा लोगों से धोखा ही मिलता है मगर फिर भी वो आपको धोखा देने के बारे में नहीं सोचते हैं. बल्कि धोखे के बावजूद भी वो आपकी हमेशा मदद करते हैं इसलिए आज के जमाने में इंसान को आंख बंद करके किसी पर भी भरोसा नहीं करनी चाहिए. वरना उन्हें दुख के अलावा और कुछ नहीं मिलेगा.

दूसरों को कभी दुख नहीं पहुंचाते…

अच्छे लोग दुख का मतलब जानते हैं इसलिए वो सोचते हैं कि कभी किसी को हर्ट ना करें हालांकि उनके लिए भी लोग यही सोचे ऐसा जरुरी नहीं होता है. जो लोग सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, वो दूसरो को हर्ट करने से पहले एक बार भी नहीं सोचते हैं. जो इंसान अच्छे होते हैं वो इस बात का ध्यान जरूर रखते हैं की उनकी किसी बात का लोगों को बुरा न लग जाए. साफ दिल के इंसान अपनी खुशी से पहले दूसरों की खुशी के बारे में सोचते हैं. अपनी जरूरतों को पूरा करने से पहले दूसरों की जरूरतों को पूरा करते हैं. अच्छे इंसान हमेशा आपको आगे बढ़ने की हिम्मत देते हैं.

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अपनी भावनाओं को नहीं दिखाना…

जो अपने से ज्यादा दूसरों के बारे में सोचते हैं वो इंसान कभी भी अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी भावनाओं से शायद कोई परेशान न हो जाए या अपनी परेशानी से दूसरों को और परेशान नहीं करना चाहते हैं.

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