भारतीय जनता पार्टी जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस को पश्चिम बंगाल से हटाने के लिए कमर कस कर अड़ी है उस से लगता है कि ममता बनर्जी उस की निगाह में कोई विदेशी मूल की हस्ती है जिसे हटाना उस का पुनीत कर्तव्य है. राहुल गांधी के खिलाफ उस ने यह कमर कसी थी सोशल मीडिया के माध्यम से पर पश्चिम बंगाल में वह जमीनी विवाद खड़े कर, दंगों की स्थिति पैदा कर, टीएमसी के नेताओं से दलबदल करा कर जंग लड़ रही है.

जिस तरह के कैडर आज भारतीय जनता पार्टी के पास हैं, उस से लगता नहीं कि ममता बनर्जी राज्य की सत्ता पर टिक पाएंगी. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल की तरह ममता का किला भी ढह जाएगा.

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भारतीय जनता पार्टी के पास मंदिरों और धर्म की दुकानदारी कर रहे हजारों कार्यकर्ताओं की फौज है. उधर ऊंची जातियों के सरकारी कर्मचारी, पुराने ठाकुर, व्यापारी, उद्योगपति तृणमूल कांग्रेस में अब अपना कल्याण नहीं देखते. उन्हें पौराणिक सामाजिक व्यवस्था का सपना दिखाने वाली भाजपा ज्यादा अच्छी लगती प्रतीत हो रही है.

पश्चिम बंगाल का इतिहास जहां एक तरफ हिंदू समाज की जड़ता के विरुद्ध मोरचे लेने वालों से भरा है वहीं पौराणिक संस्कृति के रखवालों से भी भरा है. अगर वहां राममोहन राय रहे हैं तो बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय भी जिन का आनंद मठ धर्मप्रचार का हिस्सा था. कट्टरवादी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद के राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी ने पैर फैलाए लेकिन आज यह मृतप्राय है. ममता ने ही इसे कुचला था पर आज यही उस के पैरों का जख्म बन चुकी है. पुराने कम्युनिस्टों ने अब भारतीय जनता पार्टी की राह पकड़ ली है.

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