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दंगल गर्ल के फैसले से नाराज बौलीवुड, किया ट्रोल

रविवार को ‘दंगल गर्ल’ जायरा वसीम ने एक चौंकाने वाला ऐलान कर दिया. सोशल मीडिया पर तो जायरा वसीम के इस ऐलान पर अलग- अलग तरह के रिएक्शन्स भी आने लगे हैं. दरअसल जायरा वसीम ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स पर ऐलान किया कि वो एक्टिंग से अलविदा ले रही हैं.

इसकी वजह उन्होंने ये बताया कि वो एक्टिंग के कारण अपने अल्लाह और मजहब से दूर होती जा रही हैं. जायरा के इस ऐलान पर काफी लोगों के तीखे कमेंट्स भी आ रहे हैं. और अब इस पर बौलीवुड इंडस्ट्री भी खफा है.

बता दें, फिल्ममेकर अशोक पंडित ने ट्वीट करते हुए कहा, ‘जायरा जी, मेरे लिए कला, सिनेमा और संगीत ने मुझे भगवान के करीब लाया है. अपने खुद के फैसले के लिए भगवान पर न थोपें क्योंकि आपके पुराने फैसलों से उनका फायदा नहीं हुआ. आपका इंस्टाग्राम स्टेटस कहता है… आपको भविष्य के लिए शुभकामनाएं.

वही जायरा वसीम के इस ऐलान पर बौलीवुड एक्ट्रेस रवीना टंडन ने बिना उनका नाम लेते हुए ट्वीट किया जिससे लग रहा है कि वो जायरा के बारे में बात कर रही हैं. रवीना ने ट्वीट किया है, कि  कोई फर्क नहीं पड़ता अगर दो फिल्म पुराना कलाकार उस फिल्म इंडस्ट्री के लिए कृतज्ञ नहीं है जिसने उसे बहुत कुछ दिया है तो बस यही इच्छा है कि वो पूरे सम्मान के साथ बाहर निकलें और अपने प्रतिगामी विचारों को खुद तक ही सीमित रखें.

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जायरा के इस ऐलान पर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने भी आलोचना की हैं. उन्होंने लिखा है, ‘हे भगवान, बौलीवुड की टैलेंटेड एक्ट्रेस जायरा वसीम अब फिल्मी दुनिया छोड़ना चाहती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि एक्टिंग करियर उनका अल्लाह पर से विश्वास खत्म कर रहा है. कैसा विडबंना भरा फैसला है ये. मुस्लिम समुदाय में कितने टैलेंट को बुर्के के अंधेरे में जीवन बिताने के लिए मजबूर होना होगा.

आपको बता दें, साल 2016 में जायरा वसीम ने ‘दंगल’ से फिल्मी कैरियर की शुरूआत की थी. इस फिल्म में वो आमिर खान की बेटी की भूमिका में नजर आई थी. इसके बाद वो साल 2017 में अद्विवैत चंदन की ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ में नजर आईं. और इस फिल्म को काफी पसंद भी किया गया था. जायरा वसीम को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है.

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जायरा वसीम आखिरी बार फिल्म ‘स्काई इज पिंक’ में नजर आने वाली है. इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा हैं. फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है. शोनाली बोस नें इस फिल्म को डायरेक्ट किया है. यह फिल्म मोटिवेशनल स्पीकर और लेखिका आयशा चौधरी की जिंदगी पर आधारित है.

ट्रैवल: दिल्ली का दिल देखो!

देश की राजधानी दिल्ली में यों तो घूमने के लिए हर मिजाज के पर्यटन के ठिकाने हैं लेकिन कनाट प्लेस, जनपथ और पालिका बाजार आ कर ही दिल्ली की आबोहवा का सही सही अंदाजा लग पाता है. यहां का खानापीना, खरीदारी और आधुनिक माहौल इसे पर्यटन के लिए सब से दिलचस्प जगह बनाता है.

राष्ट्रपति भवन के समीप बना संसद भवन देश की राजनीति का केंद्रबिंदु है. लालकिला का आर्किटैक्चर इतना आकर्षक है कि यह आज भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है. संरचना में ब्रिटिशकाल की याद दिलाता कनाट प्लेस दिल्ली का सब से आधुनिक व आकर्षक बाजार माना जाता है.

जंतरमंतर खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है. ऐतिहासिक इमारतों में दिल्ली की कुतुबमीनार विशेष रूप से उल्लेखनीय है. राजस्थान के मकराना संगमरमर से कमल के फूल के आकार में बने लोटस टैंपल की भव्यता देखते ही बनती है.

कनाट प्लेस का अत्याधुनिक वातावरण और ऊंचीऊंची इमारतें पर्यटकों को लुभाती हैं.  पूरी तरह से वातानुकूलित अंडरग्राउंड पालिका बाजार में विदेशी पर्यटक खूब खरीदारी करते हैं. खानपान और खरीदारी के लिए चांदनी चौक का बाजार अति उत्तम है. कनाट प्लेस के भीड़भरे माहौल में खरीदारी के वक्त पौकेटमारों से जरा सावधान रहें.

दिल्ली घूमने आए हैं तो क्या देखेंगे? लालकिला, इंडिया गेट, कुतुबमीनार, पुराना किला, लोटस टैंपल, जंतरमंतर या फिर जामा मसजिद? सब देख सकते हैं, इन सभी जगहों तक जाने के लिए दिल्ली के किसी भी कोने से आटो, कैब या बस आप को मिल जाएंगे. आटो या कैब 100 से 250 रुपए के बजट में आप को घंटे दोघंटे समय के अंतराल में पहुंचा देंगे.

दिल्ली के राजपथ पर स्थित इंडिया गेट को दिल्ली का सिग्नेचर मार्क भी कह सकते हैं. इस का निर्माण प्रथम विश्व युद्ध और अफगान युद्ध में मारे गए 90 हजार भारतीय सैनिकों की स्मृति में कराया गया था. 160 फुट ऊंचा इंडिया गेट देखते ही बनता है. जिन सैनिकों की याद में यह बनाया गया था उन के नाम इस इमारत पर अंकित हैं. इस के अंदर अखंड अमर जवान ज्योति भी जलती रहती है.

इस के पास में ही संसद भवन और राष्ट्रपति भवन हैं जहां का मुगल गार्डन उम्दा स्थान है पर्यटन के लिए. राष्ट्रपति भवन का मुगल गार्डन कुछ दिनों के लिए खुलता है पर्यटकों के लिए, खासतौर से नएनए किस्म के फूलों की प्रजाति में दिलचस्पी रखने वालों के लिए. लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर मंडी हाउस है. कलाप्रेमियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के शौकीन पर्यटकों के लिए यह माकूल जगह है.

पुराने किले में पुराने खंडहर हैं और बोटक्लब है जहां सैलानी अपने परिवार के साथ नौकायन का आनंद उठाते हैं. इस में प्रवेश करने के 3 दरवाजे हैं. हुमायूं दरवाजा, तलकी दरवाजा और बड़ा दरवाजा. वर्तमान में सिर्फ बड़ा दरवाजा ही प्रयोग में लाया जाता है.

लालकिला यानी रेड फोर्ट पुरानी दिल्ली इलाके में स्थित है. मुगल शासक शाहजहां ने 17वीं सदी में इस लालकिले का निर्माण कराया था. इस का आर्किटैक्चर इतना आकर्षक है कि यह आज भी पुरानी दिल्ली के सब से ज्यादा लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक बना हुआ है.

कनाट प्लेस से 5 मिनट की पैदल दूरी पर जंतरमंतर है. जंतरमंतर की बात करें तो यह जंतरमंतर समरकंद की वेधशाला से प्रेरित है. ग्रहों की गति नापने के लिए यहां विभिन्न प्रकार के उपकरण लगाए गए हैं. यहां बना सम्राट यंत्र सूर्य की सहायता से समय और ग्रहों की स्थिति की सूचना देता है. यह राजीव चौक के नजदीक ही है. एक बार देखा जा सकता है.

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दिल्ली में कुतुबमीनार को देख कर पीसा की झुकी हुई मीनार का चित्र उभर कर सामने आ जाता है. यह मीनार मूल रूप से सातमंजिला थी पर अब यह पांचमंजिल की ही रह गई है. इस मीनार की कुल ऊंचाई 72.5 मीटर है और इस में 379 सीढि़यां हैं. परिसर में और भी कई इमारतें हैं जो अपने ऐतिहासिक महत्त्व व वास्तुकला से सैलानियों का मन मोह लेती हैं.

लोटस टैंपल की शानदार व कलाकृत बनावट और यहां का शांतिपूर्ण माहौल इसे एक बार देखने लायक जगह बनाता है. बाहर से आने वाले दिल्ली में इन जगहों का दीदार एक बार तो जरूर करते हैं लेकिन जो बारबार दिल्ली आते हैं और नई जगहों में घूम कर अपना समय बिताना पसंद करते हैं तो उन को कुछ नया आजमाना चाहिए. वैसे भी इन तमाम जगहों में जा कर देखिए, बमुश्किल 2 घंटे में ही बोर हो जाएंगे. देखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं होता जबकि घूमने आए हैं तो कम से कम ऐसी जगह होनी चाहिए जहां पूरा दिन खातेपीते, घूमतेफिरते और खरीदारी करते हुए अच्छे से बिताया जा सके.

दिल्ली में घुमक्कड़ों के लिए सिर्फ स्मारक और म्यूजियम ही नहीं हैं बल्कि मौजमस्ती, शौपिंग, इंटरटेनमैंट के साथ खानाखजाना के बेपनाह विकल्प जहां मौजूद हैं. वे विकल्प हैं कनाट प्लेस, जनपथ, पालिका बाजार और चांदनी चौक आदि.

राजीव चौक की सैर

पहले बात करते हैं दिल्ली के कनाट प्लेस की. कनाट प्लेस में 2 सर्कल हैं. इनर सर्कल और आउटर सर्कल. इनर सर्कल में ए से एफ ब्लौक आते हैं जबकि आउटर सर्कल में जी से पी तक के ब्लौक आते हैं. कोलोनियल आर्किटैक्ट शैली में बना कनाट प्लेस ब्रिटिशकाल की याद दिलाता है.

चहलपहल, भीड़ और फुटपाथ पर बिकते हस्तकला की वस्तुएं, पोस्टर्स, राजस्थानी कारीगरी के पर्स, थैलियां और कारपेट्स, बुद्धा की मूर्तियां मोनैस्ट्री सा माहौल रचती हैं. सरकार द्वारा संचालित सैंट्रल कौटेज एंपोरियम से सोवेनियर ले सकते हैं क्योंकि यहां कीमतें तय होती हैं.

शौपिंग व खानापीना

राजीव चौक मैट्रो स्टेशन के ठीक ऊपर बना सैंट्रल पार्क युवाओं के लिए हैंगआउट करने या किसी वर्कशौप में हिस्सा लेने, डिबेट या म्यूजिकल परफौर्मेंसेज अटैंड करने के लिए बैस्ट औप्शन है. यहां अकसर प्रेमी युगल वक्त बिताते साथसाथ देखे जा सकते हैं. दिल्ली के बीचोंबीच कहीं अगर पिकनिक मनाने की जगह हो सकती है तो वह सैंट्रल पार्क ही है.

बात खरीदारी की करें तो दिल्ली के इस केंद्रबिंदु में सभी देसी विदेशी ब्रैंड्स के शोरूम तो हैं ही साथ ही, अंडरग्राउंड पालिका बाजार भी है जो पूरी तरह से वातानुकूलित है. कनाट प्लेस में हर ब्रैंड तो मिलता है, साथ में खानपान के सब फास्ट फूड चैन्स, कौफी शौप्स और मनोरंजन के लिए सिनेमाहौल (रिवोली, ओडियन, प्लाजा, रीगल) के भी कई औप्शन हैं.

इतना ही नहीं, नई दिल्ली स्टेशन यहां से 5 मिनट की दूरी पर ही है. यहां मैट्रो और आटो

से आसानी से पहुंचा जा सकता है. एम ब्लौक में एचएनएम ब्रैंड का शोरूम भी खुल गया है जो भारत में मुंबई और दिल्ली समेत गिनती की जगहों में ही है. अगर यहां से खरीदारी का इरादा है तो कर लीजिए और फिर एच ब्लौक पर रुक कर निजाम के फेमस काठी कबाब का मजा लीजिए. फिर ब्लौक एफ का चायोस कैफे भी है जहां की कुल्हड़ वाली चाय का मजा ले सकते हैं. पीवीआर रिवोली सिनेमाघर से सटे कौफी हाउस में घंटों बैठिए और कौफी के साथ कलाप्रेमियों के साथ नौस्टाल्जिक हो जाइए. बहुत सस्ती और टाइमपास जगह है यह.

इनर सर्कल पर सस्ते रेस्तरां और होटल भी हैं. मसलन, ओडियन और प्लाजा सिनेमाहौल्स के बीच बने रेस्तरां में नौर्थ इंडियन खाना अच्छा और सस्ता मिलता है. यहां आएं तो दक्षिण भारतीय खाने के शौकीन सवर्णा भवन का खाना जरूर चखें और नौनवेज के शौकीनों के लिए पिंडब्लूची अच्छा विकल्प है. इस के अलावा भी मीडियम बजट के रेस्तरां मसलन हीरा स्वीट, हल्दीराम, बीकानेर जैसे खाने के ठिकाने भी मौजूद हैं.

रंगीन व पौकेटफ्रैंडली 

कनाट प्लेस सिर्फ खानेपीने, पब, बार और शौपिंग के लिए ही नहीं, बल्कि यह जगह कई अहम फाइनैंशियल, बिजनैस और कमर्शियल दफ्तरों के लिए लोगों के विजिट करने का कारण बनती है. विदेशी सैलानियों के रुकने के लिए यह सब से पहली पसंद है क्योंकि यहां टू स्टार्स से ले कर फाइव स्टार्स होटल के तमाम विकल्प मौजूद हैं.

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यहां का माहौल पुरानी दिल्ली से एकदम उलट है. जिन्होंने पुरानी दिल्ली का माहौल देखा है वे जानते हैं कि वहां काफी गंदगी, पुरानी शैली की दुकानें और माहौल काफी स्ट्रैसभरा है जबकि कनाट प्लेस में फैशनेबल क्राउड, ब्रैंडेड रंगीन शोरूम्स, एलीट कैफे और रूफटौप रेस्तरां वैस्टर्न कंट्री के किसी मेनहेटननुमा स्ट्रीट मार्केट की याद दिला देता है. 360 डिगरी पार्किंग सुविधा है यहां. इसलिए चाहे अपनी गाड़ी से आएं या मैट्रो से, ट्रांसपोर्टिंग कनैक्टिविटी यहां सब से बेहतर है.

पालिका बाजार

पालिका बाजार की बात करें तो 70 के दशक में बनी अंडरग्राउंड सैंट्रलाइज्ड एसी से लैस इस मार्केट की बात ही अलग है. युवाओं की बजट शौपिंग का यह मनपसंद अड्डा है. सस्ता सामान जिन में कपड़े, जींस, शर्ट, बैग्स, मोबाइल एक्सेसरीज, पर्स, बैल्ट, जैकेट, जूते, कैमरा, वीडियो गेम्स आदि इफरात से कम से कम दामों में मिल जाते हैं.

हां, याद रखें पालिका बाजार, जनपथ और फुटपाथ में ब्रैंडेड कुछ नहीं मिलता. इसलिए बहकावे में न आएं. पालिका बाजार में तो लाइट इस तरह से लगी होती हैं कि सामान का रंग अच्छा दिखता है लेकिन बाद में कुछ और निकलता है.

पुरानी दिल्ली की रौनक

दिल्ली में इस के अलावा पुरानी दिल्ली का चांदनी चौक इलाका भी कम आकर्षक नहीं है. असली दिल्ली की तसवीर तो यहीं दिखती है. यह जगह भी खानेपीने और खरीदारी का पुराना अड्डा है.

यहां की परांठे वाली गली में तो जवाहरलाल नेहरू से ले कर अक्षय कुमार जैसी हर हस्ती डेरा डाल चुकी है. दिल्ली के पुराने इलाके को समझने के लिए यह सब से मुफीद जगह है.

दिल्ली के चांदनी चौक से शादी के लिए परफैक्ट शौपिंग की जा सकती है. यहां आप को डिजाइनर साड़ी और लहंगे के अच्छे कलैक्शन मिल जाएंगे. थोक में ड्रैस मैटीरियल भी यहां अच्छे दामों में मिलते हैं. पुरानी दिल्ली मैट्रो स्टेशन से उतर कर यहां पैदल जाया जा सकता है. पास में ही जामा मसजिद, लालकिला, जैन मंदिर और गुरुद्वारे भी हैं. यहां से सदर बाजार भी जाया जा सकता है.

कुल मिला कर दिल्ली दिनबदिन रंगीन और दिलचस्प होती जा रही है. हर मजहब, संस्कृति और मिजाज के दिलचस्प नजारों का लुत्फ अगर आप भी उठाना चाहते हैं तो चले आइए दिलवालों के इस खूबसूरत शहर में.

सस्ती शौपिंग

कनाट प्लेस के इनर सर्किल में लगभग सभी अंतर्राष्ट्रीय ब्रैंड के कपड़ों के शोरूम, बेशुमार रैस्टोरैंट, कैफे और बार हैं. पास में ही जनपथ बाजार भी है जहां कई तरह का हैंडीक्राफ्ट मैटीरियल, एंटीक शोपीस और स्ट्रीट शौपिंग का सामान मिल जाता है. यहां की दुकानें बड़ी व्यवस्थित हैं.

ब्लौक ए की वेंगर्स काफी पुरानी बेकरी शौप है जहां उम्दा गुणवत्ता की पेस्ट्रीज, बेकरीज और ब्रैड लेने के लिए लोग काफी दूर से आते हैं. और हां, ब्लौक ई में यूनाइटेड कौफी हाउस में साउथ इंडियन फिल्टर्ड कौफी न पी, तो क्या पिया.

चांदनी चौक के चटखारे

ज्ञानी की कुल्फी, फालूदा से ले कर परांठे वाली गली के परांठे, नटराज की भल्लेपापड़ी, जलेबी और चाटकचौड़ी के लिए दिल्ली का सब से हौट अड्डा है चांदनी चौक.

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नए जमाने के नए किसान 

एक समय था जब भारत के लोग कहते थे कि हमारा देश कृषि प्रधान है, तब था भी, लेकिन पिछली 3 दशाब्दियों से कृषि के प्रति लोगों की रुचि कम हुई है. ज्यादातर किसानों के बच्चे पढ़लिख कर महानगरों की ओर भाग रहे हैं. किसानों के बच्चे ही नहीं कामगार भी. फलस्वरूप गांव में खेतों के लिए मजदूर नहीं मिलते.

आशा की किरण वहां नजर आती है, जहां पढ़ेलिखे कुछ डिग्रीधारियों ने अपने कंधों पर खेती के औजार उठाए ही नहीं बल्कि यह भी साबित कर दिखाया है कि अगर उन्नत ढंग से खेती की जाए तो बड़ी नौकरियों से बेहतर है.

बेंगलुरु की 37 वर्षीय गीतांजलि राजमणि ऐसी ही महिला हैं. गीतांजलि ने 2017 में दो दोस्तों के साथ मिल कर स्टार्टअप कंपनी फार्मिजन शुरू की थी. अब यह कंपनी बेंगलुरु, हैदराबाद और सूरत में काम कर रही है. एक तरफ यह किसानों से बराबर की पार्टनरशिप कर उन से जैविक खेती करवाती है, दूसरी ओर उन के खेत को 600-600 वर्गफुट के आकार में बांट कर ग्राहकों को 2500 रुपए प्रति माह दर पर किराए पर देती है.

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ग्राहक मोबाइल ऐप से चुने प्लौट में अपनी पसंद की सब्जियां लगवाते हैं. सब्जियां तैयार होने पर फार्मिजन का वाहन उन्हें ग्राहकों के घर तक पहुंचा देता है. इस से 2 फायदे होते हैं. एक तो यह कि ग्राहकों को घर बैठे 100 प्रतिशत जैविक सब्जियां मिल जाती हैं. दूसरा यह कि किसानों की कमाई 3 गुना बढ़ जाती है.

3 महीने पहले फार्मिजन ने जैविक फलों की डिलीवरी शुरू की है. इस के ग्राहकों की संख्या 3 हजार से भी ज्यादा है. सालाना का टर्न ओवर 8.40 करोड़ है. गोल्ड मैन साक्स और फौर्च्यून ने पिछले साल अक्तूबर में गीतांजलि को ग्लोबल वीमन लीडर के अवार्ड से सम्मानित किया था.

गीतांजलि का जन्म 14 जून, 1981 को हैदराबाद में हुआ था. जब वह मात्र 2 साल की थीं, एक सड़क दुर्घटना में उन के पिता का निधन हो गया था. मां ने बड़े बेटे और बेटी गीतांजलि को अपने दम पर पाला.

गीतांजलि ने 2001 में उस्मानिया कालेज फौर वीमन, हैदराबाद से बीएससी की. इस के बाद 2004 में उन्होंने सेंट्रल यूनिवर्सिटी औफ पांडिचेरी से इंटरनेशनल बिजनैस में एमबीए किया. इस के बाद उन्होंने करीब 12 सालों तक क्लीनिकल रिसर्च कंपनियों में काम किया.

2014 में टीसीएस का जौब छोड़ कर गीतांजलि ने अपना कोई काम करने की सोची. प्लौटिंग गार्डनिंग का शौक था. गीतांजलि ने 2014 में ग्रीन माई लाइफ नाम की कंपनी शुरू की. यह रूफ टौप गार्डनिंग, टैरेस गार्डनिंग और डिजाइनिंग का काम करती है. इस का सालाना टर्नओवर 6 करोड़ रुपए का है.

फार्मिजन किसानों के साथ बराबरी की साझेदारी करता है. साथ ही किसानों को जैविक खेती करने की सलाह भी देता है, बीज और पौध मुहैया कराता है. खेती को कीटनाशकों से बचाने के लिए नीम का तेल और अरंडी का तेल देता है ताकि वे फसल को कीट पतंगों से बचाने के लिए छिड़काव कर सकें. स्टार्टअप उपज की मार्केटिंग करता है. 600 वर्गफुट के लिए मिलने वाला 2500 किराया फार्मिजन और किसान आधा बांट लेते हैं.

फार्जिमन से जुड़े किसान हितेश जैन के पास बेंगलुरु में 3 एकड़ जमीन है. उन्होंने फार्मिजन को 22 प्लौट किराए पर दे रखे हैं. बाकी हिस्से में कौमन एरिया है, जहां फसल उगाई जाती है.

प्लौट बुक करवाने पर सब्जियां उगने में 1 से 2 महीने लग जाते हैं. फिलहाल फार्मिजन कौमन एरिया में उगी सब्जियां ग्राहकों के घर पहुंचा रहा है. हर ग्राहक को प्रत्येक सप्ताह 10 किलो सब्जियां मिल रही है.

दरअसल जो सब्जियां हम खाते हैं उन में कीटनाशक भी होते हैं. जो शरीर के लिए घातक होते हैं. इसी को ध्यान में रख कर गीतांजलि ने 2 साल पहले फार्मिजन की शुरुआत की.

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उन के 2 दोस्तों शमिक चक्रवर्ती और सुधाकरण बालसुब्रमणियम ने उन की मदद की. ये दोनों आईटी से थे. इन दोनों दोस्तों ने जून 2017 में एप बनाया था. इस के तहत पहली बार 600 वर्गफुट का खेत लौंच किया. अब फार्मिजन बेंगलुरु, हैदराबाद और सूरत में 46 एकड़ जमीन पर काम कर रहा है.

उनके निशाने पर आपकी मानवता

इंसान ही इंसान के काम आता है, यह कहना गलत नहीं है लेकिन इंसान ही इंसान को लूटता है, इस में कोई संदेह भी नहीं है.

दिल्ली की रहने वाली शोभा अकसर मैट्रो से सफर किया करती है. घर से निकलने से कालेज पहुंचने तक शोभा बहुतों का दिल जीत लिया करती थी. दूसरों के काम आना, दूसरों की मदद करना शोभा को बहुत भाता है. रास्ते में चलते नेत्रहीन लोगों की मदद करना, चलतेफिरते गरीब बच्चों को कुछ टौफीबिस्कुट दे देना उस की आदत थी.

शोभा का व्यवहार इतना अच्छा है कि सभी उस की प्रशंसा करते नहीं थकते. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि बिना सोचेसमझे लोगों की मदद करने वाली शोभा अब अकसर ऐसे लोगों को देख कर सोच में पड़ जाती है.

दरअसल, सुबह मैट्रो के सफर के दौरान शोभा को एक आंटी मिलीं. शोभा थोड़ी जल्दी में थी, गोविंदपुरी से मंडी हाउस फिर मंडी हाउस से ब्लू लाइन वाली मैट्रो लेना और ऊपर से लोगों की भीड़. इस भीड़ में शोभा भी तेजी से चलते हुए बाकी लोगों के साथ दौड़ लगा रही थी. तभी उस भीड़ से एक आवाज आई, ‘सुनो बेटा.’ शोभा को लगा कोई किसी और को आवाज दे रहा है लेकिन तभी किसी ने उस के कंधे पर हाथ रखा. शोभा ने पीछे मुड़ कर देखा तो एक महिला खड़ी थीं. उन की उम्र 55 वर्ष रही होगी. पहनावे से महिला अच्छे घर की लग रही थीं.

महिला की आंखों में नमी थी. महिला को देखते ही शोभा समझ गई कि कोई मदद की जरूरत है. मुसकरा कर शोभा ने पूछा, ‘हां आंटी, क्या हुआ?’

महिला ने शोभा से उदास मन से कहा, ‘बेटा, मैट्रो में भीड़ थी और इस भीड़ में किसी ने मेरा पर्स निकाल लिया. मुझे गुरुग्राम जाना है. न मेरे पास मैट्रो कार्ड है, न पैसे. क्या तुम मेरी मदद कर दोगी?’ यह सुनते ही शोभा ने 100 रुपए का नोट निकाल कर उन्हें दे दिया. नोट को झट से महिला ने ले लिया और खूब सारा आशीर्वाद देने लगीं. महिला जातेजाते शोभा का मोबाइल नंबर मांगने लगीं. नंबर मांगने पर जब शोभा ने कारण पूछा तो महिला का कहना था, ‘बेटा, तुम मुझे नंबर दे दोगी तो मैं तुम्हारे अकाउंट में औनलाइन पैसे भिजवा दूंगी.’

महिला के बहुत कहने पर शोभा ने नंबर दे दिया. तभी शोभा की मैट्रो आ गई. वह उन महिला को बाय बोलते हुए मैट्रो में चढ़ गई. पूरे रास्ते शोभा महिला के लिए सोचती रही ‘कितनी अच्छी महिला थीं पैसे लौटाने के लिए नंबर ले कर गई हैं.’

कालेज से घर जाते वक्त वह पूरे समय फोन को देख रही थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि क्या सच में आज के समय में लोग इतने ईमानदार होते हैं. शाम को घर पहुंचते ही उस ने सारी कहानी मां को बताई. मां ने हंसते हुए कहा, ‘मेरी भोली बेटी, तुम उस का फोन का इंतजार मत करो. उस का फोन आएगा ही नहीं.’ शोभा ने मां को गलत बोलते हुए कहा, ‘क्यों नहीं आएगा? वे नंबर ले कर गई हैं.’

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मां हंसतेहंसते बोलने लगीं, ‘अच्छा ठीक है. उस महिला का फोन आएगा तो मुझे भी बताना.’ शोभा ने उस दिन इंतजार किया. लेकिन कोई फोन आया ही नहीं. शोभा को 100 रुपए से कोई मतलब नहीं था. उसे तो बस यह देखना था कि सच में वह महिला इतनी ईमानदार हैं क्या.

कुछ दिन बीत गए, लेकिन कोई फोन नहीं आया. शोभा को लगा शायद वे आंटी भूल गई होंगी या नंबर खो गया होगा. महिला के फोन न आने पर भी शोभा ने उन के लिए सकारात्मक सोच ही रखी. लेकिन 3 महीने बाद वे महिला उस को फिर दिखीं.

रविवार के दिन शोभा अपने दोस्तों के साथ घूमने जा रही थी. हौज खास मैट्रो स्टेशन से जब शोभा और उस के दोस्त बाहर की तरफ जा रहे थे तभी वे महिला सामने आ गईं. उसी दिन की तरह मदद मांगने लगीं. यह सब देख कर शोभा हैरान थी. उस का मुंह गुस्से से लाल हो गया था. शोभा की एक दोस्त ने मदद करनी चाही, तो शोभा ने मना कर दिया. दोस्तों के सामने ही वह महिला को सुनाने लगी. शोभा आज भी लोगों की मदद करती है लेकिन जहां कोई पैसे मांगता है, वह साफ इनकार कर देती है.

लोगों की भावनात्मक्ता और मानवता को निशाना बना कर लूटने वाले भिखारियों की तादाद बढ़ती जा रही है. शोभा जैसे कई लोग इन के फैलाए जाल में हर रोज फंसते हैं. बड़े शहरों में तो पूरा शहर ही भिखारियों से आबाद है. रैड सिग्नल पर ही देख लीजिए, जैसे ही रैड लाइट होती है, ये झुंड की तरह निकलते हैं और गाडि़यों से चिपक जाते हैं. अगर आप ध्यान दें तो इन में ज्यादातर बच्चे और औरतें होती हैं.

मासूम चेहरे शातिर दिमाग

लालबत्ती पर अधिकतर महिलाएं बच्चों के साथ भीख मांगती दिखती हैं. इन में से अधिकतर महिलाएं लोगों को उल्लू बनाती हैं. गोद में बच्चों को लिए ये महिलाएं भीख तो खाने के नाम पर मांगती हैं लेकिन आप इन्हें खाना देंगे तो ये साफ इनकार कर देंगी और पैसे की मांग करेंगी. बच्चों को भी यही सिखाया जाता है, हाथ में रोटी नहीं, पैसे होने चाहिए. मासूम चेहरे पर मासूमियत तो होती है, लेकिन दिखावे की. इन बच्चों का सिर्फ एक ही मकसद होता है, पैसा बोलना, पैसा पहचानना, पैसा लाना.

ये बच्चे शक्ल से जितने मासूम लगते हैं उतने ही बदमाश होते हैं. भीख मांगने के समय ये बच्चे ऐसे दिखाते हैं जैसे सच में जिंदगी में इन्हें कितनी तकलीफ है, लेकिन हकीकत कुछ और ही है. दरअसल, ये बच्चे भीख मांगने वाले धंधे से जुड़े होते हैं. जहां इन्हें सबकुछ सिखाया जाता है.

कई बार तो आप इन की हरकतों को देख कर हैरान भी हो जाएंगे. थोड़ी देर पहले जो आप के सामने हाथ जोड़ कर भीख मांग रहे होते हैं, आप को भैयादीदी बोल कर भूखे पेट की तरफ इशारा कर रहे होते हैं, वही बच्चे आप के भीख न देने पर आप को नुकसान भी पहुंचा देते हैं. इन बच्चों से धर्म का सहारा ले कर गुल्लक भरने को कहा जाता है.

कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आईर् है कि बाल भिक्षावृत्ति का यह पूरा धंधा सुनियोजित ढंग से चल रहा है और भीख मांगने के लिए बच्चों को इस तरह से प्रशिक्षित किया जाता है कि वे लोगों का भावनात्मक स्तर पर फायदा उठा सकें.

धर्म, दया और गरीबी से भिखारियों का पुराना नाता रहा है. तभी तो धर्म का सहारा लिए लोग अमीरी की सीढ़ी चढ़ रहे हैं. मंदिर के बाहर तो कभी मसजिद के बाहर, कभी बच्चे, बूढ़े तो कभी अपाहिज के रूप में भिखारी आप को वेशभूषा बदलते दिखेंगे. भिखारी कोई भी हो सकता है, चाहे वह पूजा के नाम पर चंदा इकट्ठा करने वाला व्यक्ति हो या फिर गरीबी और बीमारी को दिखा कर लूटने वाला लुटेरा.

धर्म और भिखारी की मित्रता

आज के समय में भिखारियों ने हाथ फैलाना छोड़ दिया है. अब वे धर्म का सहारा ले कर अपनी झोली भरते हैं. जिस देश में गंगा बहती है उस देश में लोगों को काम करने की कोई जरूरत ही नहीं है. बस, गंगा किनारे हाथ फैला कर बैठ जाओ.

प्राचीनकाल से ही दान देने की प्रथा चली आ रही है. महाभारत में कर्ण को दानवीर कहा गया है. हम धर्म के नाम पर दान करते हैं. गरीब लोगों और भिखारियों की मदद करते हैं ताकि हमारा भला हो सके. लेकिन, यह कैसी मानसिकता है? दूसरों का भला करने से दूसरों का ही भला होता है. ब्राह्मण को गाय दान करने से दूध भी ब्राह्मण को ही मिलेगा. दान देना गलत नहीं लेकिन क्या हम जिन को दान दे रहे हैं वे लोग सही हैं? कहीं हम ऐसे लोगों को बढ़ावा तो नहीं दे रहे जो धर्म को निशाना बना कर अपनी जेबें भरते हैं?

अब त्योहारों में ही देख लीजिए, दीवाली के समय कोई हनुमान बन कर गलीगली में घूम कर पैसे कमाता है तो कोई काली का रूप ले कर. लोग इन्हें देख कर हाथ जोड़ते हैं और इन को पैसे भी देते हैं. यह सब क्या है? यह सब धर्म के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाना ही तो है.

आजकल तो भिखारियों ने नएनए तरीके खोज लिए हैं. वे लोगों को आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं. पहले भिखारी फटे कपड़े पहन कर भीख मांगा करते थे. लेकिन अब अच्छेखासे परिधान पहन कर भीख मांगते भिखारी आप को दिखेंगे.

कपड़ों से धनी, जेब में नो मनी

कभी बसस्टौप, रेलवे स्टेशन, मैट्रो स्टेशन तो कभी सड़कों पर ऐसे लोग मिल जाते हैं जो लोगों से झूठ बोल कर उन्हें बेवकूफ बनाते हैं. इस में अधिकतर औरतें शामिल होती हैं. पर्स खो जाना या पैसे चोरी हो जाने का बहाना कर वे लोगों को भावुक करती हैं और उन से घर जाने के नाम पर पैसे लेती हैं. शोभा को भी ऐसी ही एक महिला ने भावुक कर के बेवकूफ बनाया था. जरूरी नहीं कि सभी लोग ऐसे हों लेकिन अधिकतर लोग इस से अपना धंधा चलाते हैं.

भारत में ऐसे कई लोग हैं जो भीख मांगने को एक प्रोफैशनल धंधे की तरह चलाते हैं. ये लोग सड़क पर आप को गरीब और लाचार दिखते हैं लेकिन जब आप इन के घर जाते हैं तो ये अच्छाखासा लाइफस्टाइल जी रहे होते हैं. आप को जान कर हैरानी होगी कि कुछ भिखारी तो महीनेभर में इतनी कमाई कर लेते हैं कि एक अच्छी नौकरी करने वाले व्यक्ति की सैलरी इन के सामने कुछ नहीं है.

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भिखारियों का अच्छाखासा समूह होता है जो अलगअलग इलाकों में बंटा होता है. इन का एक सरदार भी होता है जो लोगों को भीख मांगने के लिए नौकरी पर रखता है. बड़ेबड़े शहरों में तो ये गैंग कई बार बच्चों को किडनैप कर उन्हें भीख मांगने पर मजबूर कर देते हैं.

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में 14 साल तक के 3,72,217 बच्चे भीख मांगते हैं और खानाबदोश की जिंदगी जी रहे हैं. भीख मांगते बच्चों के धंधे में गिरोह लिप्त हैं जो मौसम के हिसाब से लोगों की भावनाओं से खेलते हैं और भीषण गरमी व कंपकपाती ठंड में छोटेछोटे बच्चों का इस्तेमाल करते हैं.

भारत देश में भीख मांगना अपराध है लेकिन यहां भिखारी का सालाना टर्नओवर करोड़ों में है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर भिखारी प्रतिदिन कम से कम एक हजार रुपए कमा लेते हैं. शनिवार, रविवार या त्योहार के मौकों पर यह कमाई दोगुनीतीनगुनी तक हो जाती है. इन की भीख में सफेदपोशों, पुलिस वालों का भी हिस्सा होता है. इन का कोई ईमानधर्म नहीं होता है. मुसलिमबहुल इलाकों पर मुसलिम हुलिए में तो हिंदूबहुल स्थलों पर ये साधुसंन्यासियों वाली वेशभूषा धारण कर लेते हैं. उसी के अनुरूप बोलचाल, भाषा का भी इस्तेमाल करते हैं.

अधिकतर भिखारियों का निशाना महिलाएं होती हैं. जब पुरुष काम पर चले जाते हैं तब ये लोग आ कर इमोशनल अत्याचार करते हैं जिस से महिलाएं इन के जाल में फंस जाती हैं. ऐसे में इन लोगों को पहचानना बहुत मुश्किल हो जाता है. दया कर के हम इन की मदद तो कर देते हैं लेकिन इस का ये नाजायज फायदा उठाते हैं. ये लोगों को भावुक कर के उन की मानवता को ठेस पहुंचाते हैं.

सुखद सैक्स लाइफ के लिए ये टिप्स जरूर आजमाएं

दिल्ली के दीपक का मानना है कि शारीरिक संबंध तभी बनाया जाए जब इस की भूख हो. भावना और प्यार की इन की सोच में कहीं जगह नहीं है.

ऐसा अकसर देखने में आता है कि पतिपत्नी सहवास के दौरान एकदूसरे की इच्छा और भावना को नहीं समझते. वे बस एक खानापूर्ति करते हैं. लेकिन वे यह बात भूल जाते हैं कि खानापूर्ति से सैक्सुअल लाइफ तो प्रभावित होती ही है, पतिपत्नी के संबंधों की गरमाहट भी धीरेधीरे कम होती जाती है. ऐसा न हो इस के लिए प्यार और भावनाओं को नजरअंदाज न करें. अपने दांपत्य जीवन में गरमाहट को बनाए रखने के लिए आगे बताए जा रहे टिप्स को जरूर आजमाएं.

पत्नी की इच्छाओं को समझें

सागरपुर में रहने वाली शीला की अकसर पति के साथ कहासुनी हो जाती है. शीला घर के कामकाज, बच्चों की देखभाल वगैरह से अकसर थक जाती है, लेकिन औफिस से आने के बाद शीला के पति देवेंद्र उसे सहवास के लिए तैयार किए बिना अकसर यौन संबंध बनाते हैं. वे यह नहीं देखते कि पत्नी का मन सहवास के लिए तैयार है या नहीं.

सैक्सोलौजिस्ट डा. कुंदरा के मुताबिक, ‘‘महिलाओं को अकसर इस बात की शिकायत रहती है कि पति उन की इच्छाओं को बिना समझे सहवास करने लगते हैं. लेकिन ऐसा कर के वे केवल खुद की इच्छापूर्ति करते हैं. पत्नी और्गेज्म तक नहीं पहुंच पाती. आगे चल कर इसी बात को ले कर आपसी संबंधों में कड़वाहट पैदा होती है.

‘‘पति को चाहिए कि सैक्स करने से पहले पत्नी की इच्छा को जाने. उसे सैक्स के लिए तैयार करे. तभी संबंधों में गरमाहट बरकरार रहती है.’’

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करें प्यार भरी बातें

एक हैल्दी सैक्सुअल लाइफ के लिए बेहद जरूरी है कि यौन संबंध बनाने से पहले पत्नी से प्यार भरी बातें जरूर की जाएं. कोई समस्या हो तो उस का हल निकालें. पत्नी से बातोंबातों में पता करें कि वह सैक्स में क्या सहयोग, क्या नवीनता चाहती है.

जयपुर के संजय और रूपाली का विवाह 2007 में हुआ. शादी के कुछ सालों तक संजय रूपाली के साथ खुल कर यौन संबंध बनाते रहे. लेकिन इधर 1 साल से वे रूपाली के साथ सैक्स संबंध बनाने से कतराने लगे हैं. रूपाली कहती है कि संजय गाहेबगाहे शारीरिक संबंध बनाते तो हैं, लेकिन बाद में उस से अलग हो कर सोने लगते हैं.

दरअसल, संजय की नजरों में यौन संबंध केवल पुरुष की भूख है, इसलिए रूपाली चाह कर भी संजय को भरपूर सहयोग नहीं कर पाती है.

मनोचिकित्सक डा. दिनेश त्यागी का मानना है कि एक अच्छे सहवास सुख के लिए आवश्यक है कि पतिपत्नी आपस में सैक्स के दौरान प्यार भरी बातें करें. यदि ऐसा नहीं हो तो पत्नी को लगता है कि पति को केवल सैक्स की ही भूख है, प्यार की नहीं. इसलिए प्यार भरी बातों को नजरअंदाज न करें.

स्थान व समय को बदलें

दिल्ली के ही नवीन का कहना है कि यदि वे रोजरोज पत्नी के साथ यौन संबंध नहीं बनाएंगे तो दूसरे दिन औफिस में तरोताजा हो कर काम नहीं कर पाएंगे. लेकिन उन की पत्नी को कोई मजा नहीं आता है, क्योंकि यह रोज के ढर्रे जैसी बात बन गई है. उस में कोई भी नवीनता नहीं रहती.

डा. कुंदरा कहते हैं कि सहवास का भरपूर आनंद उठाने के लिए कभी सोफा, कभी फर्श, कभी कालीन तो कभी छत पर और अगर घर में झूला लगा हो तो झूले पर, नहीं तो लौन पर चटाई बिछा कर सैक्स का आनंद लिया जा सकता है. पत्नियां सैक्स को प्यार से जोड़ती हैं. प्यार के इस अनुभव को वे घर के अलगअलग स्थानों पर अलगअलग समय पर नएनए तरीके से करना चाहती हैं. लेकिन अकसर पति यह बात समझ कर भी नहीं समझते.

शुरुआत धीरेधीरे करें

डा. कुंदरा यह भी कहते हैं कि कई पत्नियों की यह शिकायत रहती है कि उन के पति सहवास की शुरुआत धीरेधीरे न कर के उन्हें बिना उत्तेजित किए जल्दीबाजी में करते हैं. जबकि सहवास की शुरुआत धीरेधीरे विभिन्न सैक्स मुद्राओं जैसे गालों को काटना, सैक्स के हिस्सों पर थप्पड़ लगाना आदि को अपना कर ही करनी चाहिए और उस के बाद ही सैक्स सुख का आनंद लेना चाहिए.

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फोर प्ले का आनंद उठाएं

पति को चाहिए कि वह पत्नी के साथ चुंबन, आलिंगन, उसे सहलाना, केशों में उंगलियां फेरना, अंगों को स्पर्श करना वगैरह की अहमियत को समझे. ऐसा कर के वह पत्नी को उत्तेजित कर के मानसिक और शारीरिक रूप से सहवास के लिए तैयार करे. पत्नी का और्गेज्म तक पहुंचना जरूरी होता है. और्गेज्म तक नहीं पहुंच पाने के कारण घर में अकसर तनाव का माहौल पैदा हो जाता है, जो आपसी संबंधों में दिक्कतें भी पैदा करता है. एक सर्वे के मुताबिक 55% लोगों का मानना है कि सैक्स के दौरान जो आनंदमयी क्षण आते हैं, उन का अनुभव बेहद महत्त्वपूर्ण है.

बराबर का साथ दें

डा. कुंदरा के अनुसार, ‘‘सैक्सुअल लाइफ बेहद रोमांटिक तभी बन पाती है, जब पतिपत्नी सैक्स संबंध बनाते समय बराबर का साथ दें. सहवास के दौरान 70% महिलाएं बिस्तर पर चुपचाप ही पड़ी रहती हैं. पुरुष ऐसी महिलाओं को पसंद नहीं करते. सहवास के दौरान बराबर का साथ पति पसंद करते हैं. यदि पत्नी ऐसा करती है तो सैक्स का आनंद और भी ज्यादा बढ़ जाता है.’’

दिल्ली की जनकपुरी की रेशमा 48 साल की और उन के पति 54 साल के हो गए हैं, लेकिन हफ्ते में 1-2 बार दोनों खुल कर यौन संबंध बनाते हैं. एकदूसरे के लिए रोमांटिक बने रह कर वे खुल कर उस का आनंद उठाते हैं.

फालतू बातों को तूल न दें

मैरिज काउंसलर एन.के. सूद कहते हैं कि पतिपत्नी जब भी यौन संबंध बनाएं, पत्नी घर की समस्याओं या शिकायतों का पिटारा खोल कर न बैठे. सारिका जब भी रमेश के साथ सहवास करती थी, कोई न कोई शिकायत ले कर बातें शुरू कर देती थी. इस से रमेश असहज हो जाता था. आगे चल कर इन की समस्या इतनी बढ़ गई कि इन्हें आपसी संबंधों को सहज बनाने के लिए मैरिज काउंसलर की सहायता लेनी पड़ी.

संबंधों में गरमाहट बनी रहे इस के लिए ऐसी बातों को तूल न दे कर सैक्स लाइफ को ऐंजौय करें. पति का साथ दें, उन के साथ बिस्तर पर सक्रिय बनी रहें.

सैक्सी कपड़ों में लुभाएं

कोटा में रहने वाली राधा गोरी और खूबसूरत नैननक्श वाली है. लेकिन वह अपने पति महेंद्र के पास उन्हीं कपड़ों में जाती है, जो उस ने सुबह से पहने होते हैं. राधा को तरोताजा न देख कर महेंद्र सहवास में ढंग से सहयोग नहीं कर पाते हैं.

पति को लुभाने व उत्तेजित करने के लिए सैक्सी ड्रैस व हौट लुक में अपने पार्टनर को ऐसा सरप्राइज दें कि यौन संबंधों में नवीनता तो आए ही, सहवास सुखद भी बने. ऐसा होने से पतिपत्नी का आपसी विश्वास व प्यार भी बराकरार रहता है.

नएनए प्रयोग करें

डा. कुंदरा कहते हैं कि अकसर पुरुष सैक्स को ले कर ज्यादा ही उत्साहित होते हैं. वे नएनए आसनों का प्रयोग कर सहवास को सुखद बनाते हैं. लेकिन पत्नी यदि किसी तरीके को अनकंफर्टेबल महसूस करे तो पति को बताए जरूर.

बहुत सी महिलाएं यौन संबंध बनाते वक्त नएनए प्रयोगों से घबराती हैं. वे ऐसा न कर के पति के साथ सहवास में प्रयोग करें. उम्र कोई बाधा नहीं, दिलदिमाग और शरीर को स्वस्थ रखने और वैवाहिक जीवन को सफल बनाने में नए प्रयोग हमेशा मददगार ही साबित होते हैं.

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जोड़ों के दर्द को न करें अनदेखा

शरीर के किसी भी जोड़ में दर्द, अकड़न और सूजन को अनदेखा नहीं करना चाहिए. यह आर्थराइटिस यानी गठिया रोग हो सकता है. जोड़ वह जगह होती है जहां पर दो हड्डियों का मिलन होता है, जैसे कोहनी या घुटना. कुछ तरह के आर्थराइटिस में जोड़ों की बहुत ज्यादा क्षति पहुंचती है. आर्थराइटिस यानी जोड़ों की सूजन, शरीर में एक या एक से अधिक जोड़ों को प्रभावित कर सकती है. डाक्टर्स की मानें तो हमारे शरीर में सौ से ज्यादा प्रकार की आर्थराइटिस होती है. सबसे आम प्रकारों में से दो – आस्टियो आर्थराइटिस और रूमेटोइड आर्थराइटिस है, जिससे ज्यादातर लोग प्रभावित होते हैं.

आर्थराइटिस जोड़ों के ऊतकों में जलन और क्षति के कारण पैदा होता है. जलन के कारण ही ऊतक गर्म, सूजन और दर्द से भर जाते हैं. आर्थराइटिस के लक्षण आमतौर पर बुढ़ापे में विकसित होते हैं, लेकिन आजकल ये लक्षण बच्चों और युवाओं में भी देखे जा रहे हैं. पुरुषों में और अधिक वजन वाले लोगों की तुलना में महिलाओं में आर्थराइटिस की बीमारी बड़ी तेजी से पैर पसार रही है.

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क्यों होती है यह बीमारी?

असंयमित जीवनशैली, न्यूट्रीशन की कमी और प्रदूषण के कारण आर्थराइटिस की बीमारी आज बच्चों, युवाओं और वृद्धों सभी को अपना निशाना बना रही है. इसकी वजह आनुवांशिक भी हो सकती है. सही खानपान न होना, अधिक समय तक बैठ कर काम करना, वाकिंग की कमी, एक्सरसाइज की कमी, धूप की कमी जैसे कारक इस रोग का कारण होते हैं. अगर इस बीमारी का समय पर और जल्दी उपचार नहीं करवाया जाए तो, यह स्थाई अपंगता का रूप ले सकती है. इस हालत में चलना-फिरना और घर का नार्मल कामकाज करने में भी परेशानी पैदा होने लगती है. घुटनों और कोहनी की जकड़न चलना-फिरना तक मुश्किल कर देती है और ज्यादातर बैठे रहने की वजह से शरीर का वजन तेजी से बढ़ने लगता है और इससे यह बीमारी और जटिल हो जाती है.

इस तरह पहचानें लक्षण

आर्थराइटिस में शरीर के जोड़ों में दर्द और सूजन महसूस होती है. एक जगह बैठे रहने पर अकड़न होती है. हर वक्त थकान महसूस होती है. भूख भी कम लगती है और धीरे-धीरे वजन भी कम होने लगता है. कई बार बुखार भी आता है. कई बार जोड़ों में पानी भर जाता है. कई मामलों में ये लक्षण कुछ दिनों बाद ही दिखने लगते हैं, तो कुछ में कई महीनों या सालों बाद ये लक्षण सामने आते हैं. कई लोगों में ये लक्षण उभरकर ठीक भी हो जाते हैं और दोबारा कुछ साल बार वापस आ सकते हैं. आर्थराइटिस में जब रोग अपने चरम पर होता है, तो सुबह उठने के साथ ही जोड़ों, हड्डियों में दर्द के साथ अकड़न होती है और यह अकड़न लगभग एक से पांच घंटे तक बनी रहती है.

शुरुआती अवस्था में डाक्टर जोड़ों में दर्द के प्रकार, सूजन आदि के आधार पर ही बीमारी का पता लगाते हैं. हालांकि डाक्टर कई बार सी-रिएक्टिव प्रोटीन, कम्पलीट ब्लड काउंट (सीबीसी), ईएसआर आदि टेस्ट भी करवाते हैं. कुछ आर्थराइटिस में विशेष टेस्ट करवाये जाते हैं, लेकिन यह बीमारी की स्टेज पर निर्भर करता है. इसके अलावा एक्सर-रे, अल्ट्रासाउंड और एमआरआई भी करवानी पड़ सकती है. बीमारी की शुरुआत में दर्द से निजात देने के लिए डाक्टर कार्टिसोन टेबलेट या इंजेक्शन देते हैं. हालांकि कई बार यह दर्द तो ठीक कर देते हैं, लेकिन इसके चलते क्लिनिकली रोग का पता लगाने में दिक्कत होती है और बीमारी होने के बावजूद उसके लक्षण दब जाते हैं.

कितनी तरह का आर्थराइटिस

आर्थराइटिस मुख्य रूप से दो तरह का होता है – रूमेटायड और स्पौन्डिलोआर्थोपेथी. रूमेटायड में हड्डियों के जोड़ों पर, खासतौर पर दोनों हाथ, कलाइयां, घुटने, कोहनी, कंधे, पैर के पंजे और एड़ियों में दर्द होता है. वहीं स्पौन्डिलोआर्थोपेथी में कूल्हे, कंधे और रीढ़ की हड्डी में दर्द रहता है. महिलाओं में रूमेटायड आर्थराइटिस की शिकायत ज्यादा होती है, वहीं पुरुषों में स्पान्डिलोआर्थोपेथी ज्यादा होता है. कई बार अधिक उम्र की महिलाओं में अचानक किसी एक जोड़ में या पैर के पंजे अथवा उंगली में गंभीर दर्द और सूजन हो जाती है. यह खून में बढ़े हुए यूरिक एसिड के कारण भी हो सकता है. इसे गाउट कहते हैं, जो आर्थराइटिस का ही एक प्रकार है.

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जल्दी शुरू करें उपचार

अगर आर्थराइटिस के लक्षण नजर आ रहे हैं, तो इस दर्द और सूजन को टालें नहीं और न ही दर्दनिवारक दवा खा कर इसको दबाने की कोशिश करें. आर्थराइटिस के लक्षण दिखने पर तुरंत रूमेटोलाजिस्ट के पास जाएं. इलाज जितना जल्दी शुरू होगा, उतना ही जोड़ों को कम नुकसान पहुंचेगा और भविष्य में जोड़ों के विकार के आसार कम होंगे. आर्थराइटिस में होने वाले दर्द, सूजन और अन्य परेशानियों को कम करने के लिए डौक्टर्स दवाइयां देते हैं, लेकिन अच्छा जीवन जीने के लिए मरीज को दवाइयों के साथ-साथ नियमित व्यायाम भी करना चाहिए. सरसों या जैतून के गर्म तेल की मालिश दर्द और सूजन में काफी राहत पहुंचाती है.

घर पर बनाएं दाल पिज्जा

सामग्री

– 250 ग्राम धुली हुई मूंग की दाल

– 1 कप बारीक कटी हुई सब्जियां (शिमला मिर्च, टमाटर, प्याज, बंदगोभी, गाजर, बींस, फूलगोभी)

– 1 कप चीज (कसा हुआ)

– 1 चम्मच बारीक कटा हुआ हरा धनिया

– बारीक कटी हुई हरी मिर्च

– 8-10 ब्रेड स्लाइस, नमक और लाल मिर्च स्वादानुसार.

बनाने की विधि

– मूंग की दाल को 2-3 घंटे के लिए भिगो दें.

– भीगी हुई दाल से मिक्सी में बारीक पेस्ट तैयार करें.

– पेस्ट में स्वादानुसार नमक और लाल मिर्च पाउडर मिला दें.

– तवा गर्म करके उस पर थोड़ा सा तेल डालें.

– जब तेल गर्म हो जाए, तो गैस धीमी कर दें.

– ब्रेड के एक टुकड़े को मूंग दाल के पेस्ट में डिप करके गर्म तवे पर डाल दें.

– ब्रेड के ऊपरी हिस्से पर बारीक कटी हरी सब्जियां डालकर थोड़ा सा चीज बुरक कर पकने दें.

– तवे पर ब्रेड के चारों तरफ थोड़ा सा तेल भी डालें और पलटकर सब्जी वाली तरफ से सेक लें. गर्मा-गर्म मूंग दाल पिज्जा हरी चटनी या सॉस के साथ सर्व करें.

रिश्तों की डोर

भाग-1

खाना खातेखाते जतिन के हाथ रुक गए. बराबर वाले कमरे से मम्मी की आवाज आ रही थी, ‘‘क्या इसी दिन के लिए मैं ने इसे पालपोस कर बड़ा किया था कि एक दिन यह मुझे खून के आंसू रुलाएगा.’’

‘‘साहबजादे बड़े हो गए हैं न, इसलिए अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं करेंगे. मांबाप की अब भला क्या जरूरत है?’’ यह पापा की आवाज थी.

जतिन ने हाथ में पकड़ा रोटी का कौर वापस प्लेट में रख दिया और पानी पी कर उठ गया.

‘‘क्या बात है, जतिन, खाना क्यों छोड़ दिया? और मम्मीपापा सुबहसुबह नाराज क्यों हो रहे हैं?’’ मैं ने चाय का कप टेबल पर रखा और जतिन के समीप चेयर पर बैठ गई. जतिन ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया. चुपचाप अपना ब्रीफकेस उठाया और बैंक चल दिया. मैं हैरानी से उसे जाता देखती रही.

2 दिन पहले ही मैं अपनी ससुराल से मायके बी.एड. करने के लिए आई थी. जिस क्षण मैं ने घर की देहरी पर पांव रखा था उसी क्षण घर में पसरे तनाव को महसूस कर लिया था. यद्यपि हमेशा की भांति मम्मीपापा ने गले लगा कर मेरे माथे को चूमा था किंतु उन के माथे पर परेशानी की लकीरें मैं ने साफ महसूस की थीं.

उस समय तो घर पहुंचने के उत्साह में मैं ने इस बात को अनदेखा कर दिया था किंतु शाम होतेहोते जब जतिन घर आया तो उस का चेहरा देख कर मुझे लगा, मेरा अंदेशा गलत नहीं था. अवश्य ही घर में किसी बात को ले कर तनाव था. फिर आज सुबह की घटना, जतिन का भूखे आफिस जाना और मम्मीपापा का उसे कोसते रहना, ये सब बातें मेरे संदेह की पुष्टि कर रही थीं.

जतिन के जाते ही मैं मम्मी के पास गई और पूछा, ‘‘क्या बात है, मम्मी, उधर जतिन बिना खाना खाए बैंक चला गया और इधर आप को और पापा को गुस्सा आ रहा है. आखिर बात क्या है? कोई मुझे कुछ बताता क्यों नहीं?’’

‘‘अब तुम्हें क्या बताऊं? इस लड़के ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा. तुम्हारे पापा ने इस के रिश्ते के लिए एक जगह बात चलाई है. लड़की और उस का परिवार दोनों अच्छे हैं. कल मैं ने इसे लड़की की फोटो दिखानी चाही तो बोला, ‘मैं ने अपने लिए लड़की ढूंढ़ रखी है.’ फोटो तक देखने से इनकार कर दिया. अब तुम्हीं बताओ, मुझे और तुम्हारे पापा को गुस्सा आएगा या नहीं?’’

मम्मी की बात पर मैं सहजता से मुसकरा दी, ‘‘इस में गुस्से वाली कौन सी बात है, मम्मी. अब जमाना बदल चुका है. अकसर लड़केलड़कियां अपने जीवनसाथी स्वयं चुन लेते हैं. जतिन ने भी ऐसा कर लिया तो कौन सी बड़ी बात हो गई.’’

‘‘बेकार की बातें मत कर, नीलू. समझा दे उसे. उस का विवाह वहीं होगा जहां हम चाहेंगे.’’

मैं ने एक गहरी सांस ली और अपने कमरे में आ गई.

शाम को जतिन के बैंक से वापस लौटने पर मैं ने उसे आड़े हाथों लिया, ‘‘क्या मैं अब इतनी पराई हो गई हूं कि तुम अब अपने मन की बात भी मुझ से नहीं कह सकते हो?’’

‘‘सच कहूं, दीदी, अभी रास्ते में यही सोचता आ रहा था कि आज तुम से सारी बात कहूंगा,’’ जतिन बोला.

‘‘अच्छा, अब बता कौन है वह लड़की जिसे तू पसंद करता है,’’ मैं ने उस के लिए चाय का कप टेबल पर रखा और उस के समीप बैठ गई.

‘‘दीदी, उस का नाम स्वाति है. मेरे साथ बैंक में काम करती है. बहुत अच्छी लड़की है पर मम्मीपापा ने उसे बिना देखे अस्वीकृत कर दिया.’’

‘‘जतिन, मम्मीपापा की बात का बुरा मत मानो. वे दोनों पुराने खयालों के हैं. हम दोनों मिल कर उन्हें मनाने का प्रयत्न करेंगे. अच्छा, पहले यह बताओ, मुझे स्वाति से कब मिलवा रहे हो?’’

‘‘दीदी, कल रविवार है. शाम 5 बजे स्वाति को मैं क्वालिटी रेस्तरां में बुला लेता हूं. वहीं पर मिल लेना.’’

अगले दिन 5 बजे मैं और जतिन क्वालिटी रेस्तरां पहुंचे. जब तक जतिन कौफी का आर्डर करता, एक गोरी- चिट्टी सुंदर सी लड़की हमारे करीब आ कर खड़ी हो गई. जतिन ने हमारा परस्पर परिचय कराया. स्वाति ने तुरंत झुक कर मेरे पांव छू लिए. कौफी पीते हुए मैं उस के परिवार से संबंधित हलकेफुलके प्रश्न पूछती रही जिन का वह सहज उत्तर देती रही.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम जानती ही होगी, मम्मीपापा तुम्हारे और जतिन के विवाह के लिए राजी नहीं हैं. ऐसे में जतिन, तुम्हें छोड़ कर उन की पसंद की लड़की से विवाह कर ले तो तुम क्या करोगी?’’

‘‘दीदी, यह तुम क्या…’’ जतिन ने मुझे टोकना चाहा किंतु मैं ने उसे खामोश रहने का संकेत किया और अपना प्रश्न दोहरा दिया.

स्वाति के चेहरे पर मुझे पीड़ा के भाव दिखाई दिए. वह धीमे स्वर में बोली, ‘‘मैं भला क्या कर सकती हूं?’’

‘‘कहीं आत्महत्या जैसा मूर्खतापूर्ण कदम तो नहीं उठाओगी?’’

‘‘नहीं दीदी, मैं इतनी कमजोर नहीं हूं. जिंदगी में संघर्ष करना अच्छी तरह जानती हूं. आत्महत्या कायरों का काम है. ऐसा कर के अपने मांबाप और भाई को जीतेजी नहीं मार सकती.’’

स्वाति का जवाब सुन कर मुझे अच्छा लगा. प्यार से उस के सिर पर हाथ फेर कर मैं बोली, ‘‘मुझे अपने भाई की पसंद पर गर्व है. मैं तुम दोनों को मिलाने का पूरा प्रयास करूंगी.’’

कौफी पी कर हम लोग उठ खड़े हुए. रास्ते में जतिन बोला, ‘‘दीदी, स्वाति आप को कैसी लगी?’’

‘‘बहुत सुंदर, बहुत समझदार. तुम्हारी शादी उसी से होनी चाहिए.’’

मेरा जवाब सुन कर जतिन के मन को कुछ राहत अवश्य मिली.

एक दिन मैं कालिज से वापस लौटी, तो स्वाति मेरे साथ थी. मम्मी से उसे मिलवाते हुए मैं ने कहा, ‘‘मम्मी, यह स्वाति है. राहुल की बूआ की लड़की. पिछले माह इस की हमारे शहर में नौकरी लगी है.’’

‘‘बेटी, तुम्हारे मातापिता कहां पर हैं?’’

‘‘मम्मीपापा तो दिल्ली में हैं. मैं यहां होस्टल में रहती हूं,’’ मेरे सिखाए हुए जवाब स्वाति ने मम्मी के आगे दोहरा दिए.

‘‘इसे अपना ही घर समझना. जब भी मन करे, आ जाना,’’ मम्मी ने चलते हुए स्वाति से कहा. उस के बाद स्वाति का हमारे घर आनाजाना शुरू हो गया. मम्मी से उस की खूब पटने लगी थी. 2-4 दिन भी वह नहीं आती तो मम्मी उस के बारे में पूछपूछ कर मुझे परेशान कर देती थीं.

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एक दिन लंच टाइम में स्वाति घर पर आई. मैं उस समय कालिज गई हुई थी. ज्यों ही वह गेट खोल कर अंदर घुसी उसे सीढि़यों पर से मम्मी के चीखने की आवाज सुनाई दी. वह तेजी से उस ओर लपकीं. देखा, मम्मी सीढि़यां उतरते हुए फिसल गई थीं. स्वाति ने उन्हें सहारा दे कर उठाया. मम्मी के बाएं हाथ में चोट आई थी. हाथ हिलाने में भी तकलीफ हो रही थी. स्वाति ने तुरंत टैक्सी की और उन्हें डाक्टर के पास ले गई. एक्सरे लेने के बाद डाक्टर ने हाथ पर कच्चा प्लास्टर चढ़ा दिया. शाम को हम सब मम्मी का हाथ देख घबरा गए.

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सारी बात बता कर मम्मी बोलीं, ‘‘स्वाति बहुत अच्छी लड़की है. उस ने जिस जिम्मेदारी के साथ मेरी देखभाल की, मुझे विश्वास है, वह घर बहुत भाग्यशाली होगा जहां वह बहू बन कर जाएगी.’’

मैं ने जतिन की तरफ मुसकरा कर देखा, बोली, ‘‘मम्मी, क्यों न हम अपने ही घर को भाग्यशाली बना डालें.’’

‘‘अरे, मेरे बस में होता तो कब का बना चुकी होती, परंतु इसे भी तो अक्ल आए न. पता नहीं कौन सी लड़की पसंद किए बैठा है,’’ मम्मी ने जतिन की तरफ गुस्से से देखा.

मैं ने मम्मी के गले में बांहें डाल कर कहा, ‘‘ओह, मम्मी, इतनी निराश क्यों होती हो? तुम्हारा लड़का बहुत अक्लमंद है. इस ने स्वाति को ही पसंद कर रखा है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मम्मी चौंक उठीं.

‘‘मतलब यह मम्मी कि स्वाति, राहुल की बूआ की लड़की नहीं है. यह वही लड़की है जिसे जतिन ने पसंद कर रखा है,’’ मैं ने मम्मी को शुरू से अंत तक सारी बातें बताईं और कहा, ‘‘आप ने और पापा ने तो बिना देखे ही लड़की रिजेक्ट कर दी थी. मेरे पास उसे

आप से मिलवाने का कोई और रास्ता न था.’’

अभी मैं ने अपनी बात पूरी की ही थी कि तभी पापा कमरे में आ गए.

‘‘सुना आप ने, नीलू कह रही है?’’ मम्मी अभी भी मेरी बात से अचंभित थीं.

‘‘मैं ने सब सुन लिया है. इस बारे में हम अब कल बात करेंगे.’’

पापा को शायद सोचने के लिए समय चाहिए था.

अगले दिन तक मैं और जतिन पसोपेश की स्थिति में रहे, पापा के जवाब पर ही हमारी सारी उम्मीदें टिकी थीं. रात को डाइनिंग टेबल पर पापा बोले, ‘‘जतिन, तुम्हें स्वाति पसंद है तो हमें कोई एतराज नहीं है. उसे अपने घर की बहू बना कर हमें भी खुशी होगी, परंतु लड़की वालों से बात करने हम नहीं जाएंगे. उन्हें हमारे घर आना होगा.’’

‘‘यह कोई बड़ी बात नहीं है, पापा. वही लोग आप से बात करने आ जाएंगे.’’

जतिन फोन की तरफ लपका. अवश्य ही वह स्वाति को यह खबर सुनाना चाहता होगा.

रविवार शाम को स्वाति के मम्मीपापा हमारे घर आए. चाय पीते हुए पापा बोले, ‘‘भई, हमें आप की बेटी बहुत पसंद है. हम इस रिश्ते के लिए तैयार हैं. आप सगाई की तारीख निकलवा लें.’’

‘‘देखिए भाई साहब, खुल कर बात करना अच्छा होता है. आप की कोई डिमांड तो नहीं है?’’ स्वाति की मम्मी ने पूछा.

‘‘डिमांड तो कोई नहीं है. हां, शादी बढि़या होनी चाहिए. यों भी आप लोगों में लड़की के विवाह में नकद रुपया तो चलता ही है.’’ स्वाति के पापा के चेहरे पर उलझन के भाव आए, ‘‘मैं आप का मतलब नहीं समझा.’’

‘‘मैं समझाता हूं. अगर जतिन और स्वाति एकदूसरे को प्रेम न करते तो आप लोग स्वाति के लिए अपनी ही बिरादरी में लड़का ढूंढ़ते. तब क्या आप को उस के विवाह में नकद रुपया नहीं देना पड़ता? जो रुपए आप तब देते, वही रुपए आप हमें अब दे दीजिए.’’

‘‘पापा, यह आप क्या कह रहे हैं?’’ जतिन हैरान सा हो उठा था. उसे पापा से यह उम्मीद नहीं थी. मम्मी ने उस की ओर आंखें तरेर कर देखा, ‘‘जतिन, बड़ों के बीच में तुम मत बोलो.’’

‘‘भाई साहब, आप स्पष्ट बता दें तो अच्छा रहेगा, कितना नकद रुपया आप चाहते हैं,’’ स्वाति के पापा ने पूछा.

‘‘अधिक नहीं, कम से कम 2 लाख तो आप को देना ही चाहिए,’’ पापा और मम्मी एकदूसरे की ओर देख कर मुसकराए.

जतिन का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा था. वह उठ कर अंदर चला गया.

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-क्रमश

मान मर्दन

अपर्णा को मानसी ने अपने भाई अविनाश के लिए पसंद किया था. शादी के बाद उस के ब्रेन ट्यूमर की खबर ने सब को चौंका दिया. परंतु सकुशल आपरेशन के पश्चात उस के स्वस्थ होने पर भी मानसी के मन में उस के प्रति नफरत का बीज पनपने लगा लेकिन अपर्णा ने कुछ ऐसा किया कि पत्थर दिल मानसी सहित पूरे परिवार का दिल जीत लिया…

कुत्ता जोरजोर से भौंक रहा था. बाहर गली में चौकीदार के जूतों की चपरचपर और लाठी की ठकठक की आवाज से स्पष्ट था कि अभी सुबह नहीं हुई थी.

एक नजर स्वप्निल पर डाली. गहरी नींद में भी उन के चेहरे पर पसीने की 2-4 बूंदें उभर आई थीं. पूरा दिन दौड़भाग करने के बाद रात 12 बजे तो लौटे थे. मुझ से तो किसी प्रकार की सहानुभूति या अपनत्व की अपेक्षा नहीं करते ये लोग. किंतु आज मेरे मन को एक पल के लिए भी चैन नहीं था. मां और अपर्णा का रुग्ण चेहरा बारबार मेरी आंखों के आगे घूम जाता था. क्या मनोस्थिति होगी पापा और भैया की? डाक्टरों ने बताया था कि यदि आज की रात निकल गई तो दोनों खतरे से बाहर होंगी, वरना…

मां परिवार की केंद्र हैं तो अपर्णा परिधि. यदि दोनों में से किसी को भी कुछ हो गया तो पूरा परिवार बिखर जाएगा. किस तरह जोड़ लिया था मां ने बहू को अपने साथ. बहू नहीं बेटी थी वह उस घर की. घर का कोई भी काम, कोई भी सलाह उस के बिना अधूरी थी.

लेकिन इतना सब देने के बाद मां को बदले में क्या मिला? तीमारदारी? मैं ने कई बार अपर्णा को तिरस्कृत करने के लिए मां से कहा भी था, ‘बहुएं दानदहेज के साथ डिगरियां लाती हैं लेकिन तुम्हारी बहू तो अपने साथ मेडिकल रिपोर्ट, एमआरआई और एक्सरे रिपोर्ट से भरी फाइलें लाई है.’

यह सुनते ही मां हंस देतीं, ‘संस्कारों की अनमोल धरोहर भी तो लाई है अपने साथ.’

मां कमरा छोड़ कर चली जातीं. जाहिर था, उन्हें अपर्णा के प्रति मेरे द्वारा कहे गए कठोर शब्दों से दुख पहुंचता था पर मैं भी क्या करती? मन था कि लाख प्रयासों के बाद भी नियंत्रित नहीं होता था.

सुबह के 5 बजे थे. कुछ देर पहले ही स्वप्निल अस्पताल के लिए निकल चुके थे. फोन की घंटी बज रही थी. कहीं कोई अप्रिय समाचार न हो? कांपते मन से फोन का चोंगा उठाया. पापा थे, बोले, ‘रुक्मिणी की तबीयत ठीक है लेकिन बहू की हालत चिंताजनक है.’

मन आत्मग्लानि से भर उठा. क्यों पापा और भैया के कहने पर मैं लौट आई? इस समय तो भैया और उन दोनों को सहानुभूति की आवश्यकता होगी. स्वप्निल भी तो बिना कुछ कहे चले गए. एक बार कहते तो मैं भी चली जाती उन के साथ. कुछ पल ठहर कर मैं कम से कम उन का मनोबल तो बढ़ा सकती थी. लेकिन उन्हें क्या पता, अपर्णा के प्रति मेरे मन में अब किसी प्रकार का मलाल नहीं.

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अपर्णा से मेरा परिचय बोट्सवाना में हुआ था. उन दिनों मैं स्वप्निल के साथ एक ‘असाइनमेंट’ पर बोट्सवाना आई थी. चारों तरफ हरियाली, पेड़पौधे और वादियां और उन के बीच बसी वह छोटी सी कालोनी. कुल मिला कर वहां 10-12 ही घर थे और एक घर से दूसरे घर का फासला इतना कम था कि मौकेबेमौके आसानी से लोग एकदूसरे के यहां आतेजाते थे. यों तो अन्य परिवार भी थे वहां पर अपर्णा के परिवार से कुछ ही दिनों में हमारी अच्छी दोस्ती हो गई थी. उस के पिता स्वप्निल की कंपनी में ही वरिष्ठ पद पर थे. दूसरे, वह हमारी ही तरह ब्राह्मण थे और लखनऊ के मूल निवासी भी. रीतिरिवाज और बोलचाल में समानता होने की वजह से कुछ ही दिनों में हमारी दोस्ती घनिष्ठता में बदल गई और हम हर दिन मिलने लगे.

कभी घर पर, कभी क्लब में. बातचीत का सिलसिला इधर- उधर की बातों  से घूमता फिरता लखनऊ की नफासत नजा- कत, खानपान या फिर चौड़ीसंकरी गलियों से होता हुआ एकदूसरे के रीतिरिवाजों और तीजत्योहारों के मनाने के ढंग पर अटक जाता.

मुझे गोरी, लंबी, छरहरी, काली आंखों और घने बालों वाली अपर्णा का व्यक्तित्व हर समय आकर्षित करता था. वह जितनी सुंदर थी उतनी ही मेधावी भी. लगभग हर विषय पर अपने विचार खुल कर व्यक्त कर सकती थी. कालिज के बाद वह अकसर मेरे घर आ जाती और किसी न किसी विषय पर  बहस छेड़ देती.

अपर्णा की मां भी एक शिष्ट, व्यावहारिक और सुलझी हुई महिला थीं. 2 बहुओं की सास और 4 पोतेपोतियों की दादी होने के बाद भी उन के व्यवहार में बचपना ही झलकता था. उम्र में वह मुझ से काफी बड़ी थीं, फिर भी उन का सान्निध्य मुझे भला लगता था.

एक शाम मैं उन के घर गई तो मुझे ऐसा लगा जैसे वह मेरी ही बाट जोह रही हों. मुझे पास बिठा कर बोलीं, ‘मानसी, अपर्णा तेरी हर बात मानती है. तू ही इसे समझा. ब्याह की बात करो तो रोनाधोना शुरू हो जाता है इस का.’

‘मुझे ब्याह नहीं करना है,’ उस की आंखें सूजी हुई थीं. ऐसा लगा जैसे रो कर आई हो.

‘क्यों? ब्याह तो सभी लड़कियां करती हैं,’ जवानी की दहलीज पर खड़ी सुनहरे, रुपहले सपनों को देखने की उम्र में अपर्णा का वह वाक्य मुझे अचरज में डाल गया था.

‘कब तक बिठा कर रखूंगी तुझे? जब तक मांबाप हैं तब तक ठीक, उस के बाद भाईभौजाई नहीं पूछेंगे.’

‘मुझे किसी का सहारा नहीं चाहिए, पढ़ीलिखी हूं, नौकरी कर के अपनी देखभाल स्वयं कर लूंगी.’

‘औरत को जीने के लिए किसी का तो अवलंबन चाहिए. ब्याह, परिवार और बच्चे इन्हीं सब में उलझ कर तो स्त्री का जीवन सार्थक बनता है.’

‘और अगर ब्याह के बाद भी यही एकाकीपन हाथ आया तो?’ अपर्णा के शब्दों में छिपी निराशा देख मन विचलित हो उठा था. शायद हर दिन तलाक, टूटन और बिखराव की खबरें पढ़तेपढ़ते उस ने सफल, सुखद, वैवाहिक जीवन की उम्मीद ही छोड़ दी थी.

‘ऐसा कुछ नहीं होगा,’ मैं ने दृढ़ता से कहा तो वह मेरा चेहरा देखने लगी.

‘अपर्णा के लिए मेरी नजर में एक रिश्ता है. अगर आप चाहें तो…’

‘हांहां क्यों नहीं,’ अपर्णा की मां ने अति उत्साह से मेरी बात बीच में ही काट दी.

‘मैं अपने भाई अविनाश के लिए, अपर्णा का हाथ आप से मांग रही हूं. वहां आप की अपर्णा को बहू नहीं बेटी का प्यार मिलेगा.’

किसी विशेष परिचय के मुहताज नहीं थे अविनाश भैया. दिल्ली आईआईटी से इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने लंदन से एम.बी.ए. किया था. भारत लौट कर जब से उन्होंने पापा की फैक्टरी संभाली, मेरे मन में भाभी की इच्छा प्रबल हो उठी थी. जब भी मां से भैया के ब्याह की बात करती तो वह हंस कर टाल जातीं.

‘पहले तुझे ब्याहेंगे, फिर बहू आएगी इस घर में.’

‘कुछ दिन मैं भी तो भाभी के  साथ हंसबोल लूं.’

‘दूर थोड़े ही भेजेंगे तुझे. इसी शहर में ब्याहेंगे. जब मरजी हो चली आना और भाभी के साथ रह कर हंसबोल लेना,’ मां ने कहा था.

धूमधाम से ब्याह दी गई थी मैं लखनऊ में ही. स्वप्निल साफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर थे. सासससुर, देवरानीजेठानी का परिवार था मेरा. मां से अकसर फोन पर बात होती रहती थी. मेरा जब जी चाहता, स्वप्निल मुझे मम्मीपापा से मिलवाने ले जाते. मां, मेरी पसंद के  पकवान पकातीं लाड़ जतातीं. भैया और पापा मेरे इर्दगिर्द ही घूमते रहते. मन खुशियों से भरा रहता था. लेकिन ज्यादा दिन नहीं चल पाया यह सब. 2 माह बाद ही स्वप्निल को बोट्सवाना का प्रोजेक्ट मिला और हम दोनों यहां चले आए.

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अपर्णा की मां से स्वीकृति पाते ही मैं ने लखनऊ फोन मिला कर मां से बात की. अपर्णा के विषय में सारी जानकारी दे कर मैं ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘मां, लड़की स्वभाव से सुशील और सुंदर है और सब से बड़ी बात, एम.बी.ए. भी है. भैया और पापा को बिजनेस में भी मदद करेगी.’

‘विदेश में पलीबढ़ी लड़की हमारे यहां तारतम्य बिठा पाएगी? हमारे और वहां के रहनसहन और तौरतरीकों में बहुत अंतर है,’ मां को चिंता ने घेर लिया था.

‘आप नहीं जानतीं अपर्णा

का स्वभाव. वह बेहद सरल और सादगीपसंद है. हमारे परिवार के लिए सुशील बहू और भैया के लिए आदर्श पत्नी साबित होगी वह. उन के और हमारे परिवार के वातावरण में कोई अंतर थोड़े ही है.’

‘विवाह संबंधों में पूरे परिवार का लेखाजोखा लिया जाता है,’ मां ने कहा था.

‘भारद्वाज साहब हमारी कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. पिछले 20 वर्षों से बोट्सवाना में हैं. अगले वर्ष रिटायर होने वाले हैं. 2 बेटे, 2 बहुएं, बच्चे सब लखनऊ में ही हैं. हजरतगंज के पास 500 गज की कोठी है.’

मां इस जानकारी से संतुष्ट हो गई थीं. कंप्यूटर के इस युग में फोटो का आदानप्रदान कुछ ही घंटों में हो गया था. शीघ्र ही संबंध को स्वीकृति दे दी गई. प्रोजेक्ट समाप्त होते ही मैं स्वप्निल के साथ लखनऊ पहुंच गई थी. मम्मीपापा का विश्वास देखते ही बनता था. बारबार कहते, हमारे घर लक्ष्मी आ रही है. एकएक दिन यहां पर सब के लिए एक युग के समान प्रतीत हो रहा था. आकांक्षाएं, उम्मीदें आसमान छू रही थीं. कब वह दिन आए और मम्मीपापा बहू का मुंह देखें.

भैया की जिज्ञासा उन की बातों से स्पष्ट थी. प्रत्यक्षत: कुछ नहीं पूछते थे पर जब भी अपर्णा का प्रसंग छिड़ता, उन की आंखों में चमक उभर आती. बारबार कहते, ‘जाओ, बाजार से खरीदारी कर के आओ.’

अपर्णा के गोरे रंग पर क्या फबेगा, यह सोच कर साडि़यां ली जातीं. हीरेमोती के सेट लेते हुए मुझे भी कीमती साड़ी व जड़ाऊ सेट पापा ने दिलवाया था.

ब्याह से ठीक एक माह पूर्व भारद्वाज परिवार ने लखनऊ पहुंचने की सूचना दी थी. हवाई अड्डे पहुंचने से पहले मां का फोन आया. बोलीं, ‘मैं, अपनी बहू को पहचानूंगी कैसे?’

‘हवाई जहाज से जो सब से सुंदर लड़की उतरेगी, समझ लेना वही तुम्हारी बहू है.’

अपर्णा और उस के परिवारजनों से मिल कर मां धन्य हो उठी थीं. ब्याह की काफी तैयारियां तो पहले ही हो चुकी थीं. रहीसही कसर अपर्णा के परिजनों से मिल कर पूरी हो गई.

घर लौट कर मैं ने भैया को टटोला था, ‘कैसी लगी हमारी अपर्णा?’

चेहरे पर गंभीरता का मुखौटा ओढ़ कर उन्होंने शांत भाव से सहमति प्रदान की तो हम सब संतुष्ट हो गए थे.

ब्याह धूमधाम से हुआ. भारद्वाज दंपती ने बरात का स्वागत और दानदहेज देने में कोई कसर नहीं रखी. हीरेमोती कुंदन के सैट, कलर टीवी, वाशिंग मशीन और इंपोर्टेड फर्नीचर दे कर उन्होंने पूरा घर भर दिया था. मम्मीपापा की साध पूरी हुई, मुझे प्यारी भाभी मिली और भैया को स्नेहमयी पत्नी.

ब्याह से अगले दिन नए जोड़े ने हनीमून के लिए गोवा प्रस्थान किया तो मां बिखरा घर समेटने में जुट गई थीं. मैं भी मां की सहायता के लिए कुछ दिन वहीं ठहर गई थी.

पूरा घर व्यवस्थित कर के मां निश्ंिचत हुईं तो दरवाजे की घंटी बजी. पापा घर पर ही थे. दरवाजा स्वप्निल ने ही खोला था. भैया दरवाजे पर थे. पीछे अपर्णा खड़ी थी.

नवब्याहता जोड़े को यों अचानक वापस आया देख कर सभी हैरान रह गए थे.

कहीं झगड़ा तो नहीं हो गया, यह सोच मां चिंतित हो उठी थीं.

अपर्णा कमरे में अपना बैग खोलने में व्यस्त हो गई और भैया हमारे पास ही टेबल पर बैठ गए. मां ने जिज्ञासा व्यक्त की, ‘यों अचानक कैसे लौट आए? तुम लोग तो 15 दिन बाद आने वाले थे.’

‘मां, अपर्णा की तबीयत अचानक खराब हो गई थी. सिरदर्द और उलटियां शुरू हो गईं, इसीलिए लौटना पड़ा.’

पहाड़ी क्षेत्रों में चढ़ाई उतरनेचढ़ने से अकसर उलटियां हो जाती हैं. यही सोच कर मां ने कहा, ‘तो किसी डाक्टर से मशविरा कर के दवा दिलवा देते.’

‘कहा था मैं ने, पर अपर्णा नहीं मानी. बोली घर चलना है,’ भैया अब भी चिंतित थे.

हमेशा हंसनेखिलखिलाने वाली अपर्णा का चेहरा बेहद फीका और बेजान सा दिखा था उस पल.

‘चलो, कोई बात नहीं. अगली बार किसी और जगह हो आना,’ कह कर मां ने मीटिंग बर्खास्त कर दी थी.

यों घर में काम करने के लिए नौकरचाकर थे पर चौके का काम मां ही संभालती थीं. अपर्णा ने अगले दिन से ही उन्हें इस कार्यभार से मुक्त कर दिया. सब की पसंद का भोजन पकाने और खिलाने में उसे विशिष्ट आनंद की अनुभूति होती थी. कोई भी काम, अपने हाथ में ले कर, जब तक दौड़भाग कर पूरी तन्मयता से संपूर्ण नहीं करती, उसे चैन नहीं मिलता था.

एक दिन मां अपर्णा को अपने पास बुला कर बोलीं, ‘तुम ने एम.बी.ए. किया है. यों घरगृहस्थी के कामों में उलझ कर तो तुम्हारी सारी शिक्षा व्यर्थ चली जाएगी. तुम्हें घर से बाहर निकल कर कुछ करना चाहिए.’

‘पर घर का कामकाज…’ अपर्णा मां के इस अचानक आए प्रस्ताव से घबरा गई थी.

‘वह तो पहले भी होता था और आगे भी होता रहेगा. अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करो, बेटी,’ मां की मुसकराहट और विश्वास उसे धीरे से सहला गया था.

अगले ही दिन पापा और भैया के साथ जा कर फैक्टरी का वित्तीय कार्यभार उस ने अपने जिम्मे ले लिया था.

पूरी तन्मयता के साथ काम करने लगी थी अपर्णा. परिणाम अच्छे घोषित हुए. मुनाफे में वृद्धि हुई. हर किसी की प्रशंसा की पात्र बनी अपर्णा कभीकभी खुशी के उन लम्हों में भी बेहद उदास हो जाती. उस की यों असमय चुप्पी का कारण कई बार हम ने जानने का प्रयास भी किया पर वह कभी किसी से कुछ कहती नहीं थी.

कुछ ही दिन बीते थे. उसे फिर से भयानक दर्द हुआ. इस बार दर्द की तीव्रता पहले से भी ज्यादा थी. चेहरा काला पड़ गया था. होंठ टेढ़े हो गए थे.

पापा और मां सोच रहे थे उस की यह दशा तनाव की वजह से है, पर मैं उस के स्वास्थ्य को ले कर बेहद चिंतित थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि अपर्णा इस घर में खुश नहीं? अपर्णा का ब्याह मैं ने ही करवाया था. ‘अगर उसे किसी बात से परेशानी है तो उस का समाधान भी मैं ही करूंगी,’ मैं ने सोचा.

इसी निश्चय के साथ मैं उस के कमरे में चली गई. अपर्णा आरामकुरसी पर बैठी कुछ सोच रही थी. मैं ने पूछा, ‘अपर्णा, कहां खोई हो? कुछ कहोगी नहीं?’ मेरे अंदर समुद्रमंथन जैसी हलचल मची हुई थी.

वह आंखें नीचे किए फर्श को निहार रही थी.

‘तुम्हें सिरदर्द क्यों हो रहा है? किसी चीज की कमी है या तुम किसी बात से असंतुष्ट हो? मुझे बताओ, शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं.’

अजगर की तरह पसरा सन्नाटा जैसे अंधियारे को लील रहा था. निराशा के पल में प्यार का स्नेहिल स्पर्श और आश्वासन पाते ही उस की आंखों में आंसू छलक उठे.

‘यह सिरदर्द नया नहीं पुराना है. मुझे बे्रन ट्यूमर है.’

‘क्या… ब्रेन ट्यूमर?’ मेरे पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई थी.

‘चाची ये सब जानती थीं?’ मेरे अंतर्मन की पीड़ा पके फोडे़ सी लहकने लगी थी.

‘हां, उन दिनों मैं एम.बी.ए. फाइनल में थी, जब मुझे पहली बार सिरदर्द उठा. मां ने मुझे दर्द निवारक गोली दी और नियमित रूप से बादाम का दूध देने लगीं. सभी सोच रहे थे कि यह सिरदर्द कमजोरी और तनाव की वजह से है. आंखों का भी टेस्ट हुआ. सबकुछ सामान्य निकला. उस के बाद जब दर्द फिर हुआ तो पापा मुझे विशेषज्ञ के पास ले गए. वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मुझे ब्रेन ट्यूमर है, जिस का एकमात्र इलाज आपरेशन ही है. एक दिन पापा ने एक मशहूर डाक्टर से मेरे आपरेशन की बात की. अपाइंटमेंट भी ले लिया, पर मां नहीं मानी थीं. बोलीं, ‘ब्याह योग्य बेटी के दिमाग की चीड़फाड़ करवाएंगे? अपर्णा को कुछ हो गया तो रिश्ता करना मुश्किल हो जाएगा.’ इस पर पापाजी बोले थे, ‘तुम्हें इस के रिश्ते की चिंता है. मैं तो उस के स्वास्थ्य को ले कर परेशान हूं. इसे कुछ हो गया तो मैं जीतेजी मर जाऊंगा.’

अपर्णा की बीमारी के बारे में धीरेधीरे सब को पता चल गया.

पापा संज्ञाशून्य से हो गए थे. भैया गंभीरता का मुखौटा ओढ़े कभी पत्नी को निहारते और कभी हम सब को. अपनी जीवनसंगिनी को इस रूप में देख कर उन की आकांक्षाओं पर तुषारापात हुआ था. मां गश खा कर गिर पड़ी थीं.

भैया दौड़ कर डाक्टर को बुला लाए थे. पूरी जांच के बाद पता चला, उन्हें हलका हार्टअटैक हुआ है. अचानक रक्तचाप इतना बढ़ गया कि उन्हें तुरंत अस्पताल में भरती कराना पड़ा था.

जिस दिन उन्हें थोड़ा स्वास्थ्य लाभ हुआ मैं घर लौट आई थी. इतना रोई कि  शायद दीवारें भी पसीज गई होंगी.

मैं सोच रही थी कि कितने प्रसन्न और सुखी थे मेरे पीहर के लोग. मगर अब मेरे भाई का जीवन अंधकारमय हो गया है. अब तो पूरे परिवार का जीवन ही दुख से भर गया है. मूकदर्शिका सी बनी, परिवार की खुशियों को लुटते देख रही थी मैं. अपने भाई की खुशियों को आग में जलता देख कर कौन सी बहन का दिल रो नहीं पड़ेगा. अपर्णा के रोग का एक ही इलाज था आपरेशन. सफल हुआ तो ठीक, नहीं तो अपर्णा अपंग भी हो सकती है. फिर मेरे भैया उस अपंग पत्नी के साथ कैसे जीएंगे? उम्र भर अपर्णा की सेवा में ही जुटे रहेंगे. अब क्या मां के दिन हैं सेवा करने के? पर जो कुछ भी था उस सब के लिए मैं खुद को दोषी मान रही थी.

पहली बार मेरे मन के एक चोर कोने में विचार आया. यदि इस पूरे परिदृश्य से अपर्णा को ही हटा दिया जाए तो सब सही हो जाएगा. आजकल तो लोग बातबेबात तलाक ले लेते हैं और दूसरा ब्याह भी कर लेते हैं, अगर भैया भी ऐसा ही करें तो?

उस दिन मैं मां के कमरे में न जा कर सीधे भैया के कमरे में चली गई थी. भैया अकेले कमरे में बैठे गजलें सुन रहे थे. अपर्णा मां को जूस पिला रही थी. दोनों को अनदेखा कर के मैं भैया के पास जा कर तीखे स्वर में बोली, ‘क्या आप गलत गाड़ी में सिर्र्फ इसलिए सवार रहेंगे कि पहले आप गलती से उस पर चढ़ गए थे और अब सामान समेटने और नया टिकट कटवाने के झंझट से डर रहे हैं?’

भैया शायद मेरा आशय समझ नहीं पाए थे. मैं ने दोबारा कहा, ‘अब भी वक्त है. अपर्णा से तलाक ले लीजिए और दोबारा शादी कर लीजिए.’

कुछ देर तक चुप्पी छाई रही.

‘भैया, विश्वास कीजिए. अपर्णा की मां के छल को मैं समझ नहीं पाई, वरना वह कभी मेरी भाभी नहीं बनती.’

‘कारण जाने बिना तुम भी परिणाम तक पहुंच गईं,’ वह फीकी हंसी हंस दिए,  ‘अपर्णा बहुत अच्छी है. सच बात तो यह है कि वह ब्याह करना ही नहीं चाहती थी पर मां के आगे उस की चली नहीं.’

‘झूठ की बुनियाद पर क्या इमारत खड़ी हो सकती है?’ मेरा मन अब भी अशांत था.

‘झूठ उस ने नहीं, उस की मां ने बोला था, वैसे उन का निर्णय भी गलत  कहां था? हर मां की तरह उस की मां के मन में भी अपनी बेटी को सुखी गृहस्थ जीवन देने की कामना रही होगी. तुम्हारे ब्याह के समय भी मां कितनी चिंतित थीं.’

भैया पुन: बोले, ‘अपर्णा की मां की दशा भी कुछ वैसी ही रही होगी. मानसी, कितना अजीब है हमारे समाज का चलन. बेटी की इच्छाअनिच्छा जाने बिना ब्याह की चिंता शुरू हो जाती है. अधिकांश विवाह लड़की की अनुमति के बिना होते हैं. अपर्णा ने भी विरोध किया था पर उस की एक नहीं चली और अब अपर्णा मेरी पत्नी है. उस का हर सुखदुख मेरा है.’

मैं विस्मित सी अपने भाई का चेहरा निहारती रह गई.

उस दिन के बाद मैं ने उस चौखट पर कदम नहीं रखा. स्वप्निल ने कई बार समझाया, ‘रिश्ते, संयोगवश बनते हैं. तुम्हारे भैया का ब्याह अपर्णा के साथ ही होना लिखा था. इस संबंध में व्यर्थ की चिंता करने से क्या लाभ? जरा सोचो, यही बीमारी उसे ब्याह के बाद होती तब क्या करतीं? और फिर यह रोग, असाध्य नहीं है.’

मैं चिढ़ कर जवाब देती, ‘तब की बात और थी. देखभाल कर कोई मक्खी निगलता है क्या?’

मां अकसर फोन पर अपर्णा की तबीयत के विषय में बताती रहती थीं. एक दिन बोलीं, ‘कल अपर्णा फिर बेहोश हो गई थी. उस की तबीयत देख कर घबराहट होती है. डाक्टरों ने जल्द आपरेशन करवाने की सलाह दी है.’

‘भेज दो उसे मायके. जिस तरह उन लोगों ने हमारे साथ खेल खेला है तुम भी चालाकी से काम लो,’ क्रोध से मेरी कनपटियां बजने लगीं.

‘उन्होंने तो हवाई जहाज की टिकटें भेजी हैं पर अपर्णा खुद ही नहीं जाना चाहती. सच पूछो तो मेरा भी मोह पड़ गया है इस बच्ची में,’ मां ने कहा था.

‘तो, करती रहो सेवा.’

मां निरुत्तर हो जातीं. उन्हें कुछ कहने का मौका ही मैं कब देती थी.

मुझे बारबार मम्मीपापा और भैया पर क्रोध आ रहा था. इस नए युग में एक बीमार बहू के प्रति इतनी आत्मीयता और सहृदयता दिखाने की क्या जरूरत थी.

मेरे मनोभावों से बेखबर स्वप्निल ने मुझे आगाह किया, ‘मानसी, कल अपर्णा को अस्पताल में भरती किया जा रहा है. वैलूर से एक विशेषज्ञ सीमाराम अस्पताल आ रहे हैं. वह आपरेशन करेंगे.’

मैं ने एक बार भी पलट कर उस का हाल नहीं पूछा, बल्कि पीहर फोन ही नहीं किया. अपर्णा के प्रति मेरे मन में छिपा तिरस्कार स्वप्निल बखूबी पहचान रहे थे. एक दिन बुरी तरह झल्लाए मुझ पर, ‘हद होती है रूखे व्यवहार की. एक व्यक्ति जीवनमरण के बीच झूल रहा है और तुम्हारे विचार इतने ओछे हैं कि तुम उस का चेहरा भी देखना नहीं चाहतीं.’

स्वप्निल का मन रखने के लिए मैं एक बार अस्पताल हो आई थी. नाक में आक्सीजन, मुंह में नली, एक बांह में ग्लूकोज, दूसरी बांह में दवाओं की नलिकाएं लगी थीं. मां का सेवाभाव, पापा का दुलार और भैया की आत्मीयता देखते ही बनती थी. एक पल के लिए मुझे तरस भी आया पर अगले ही पल वह भाव घृणा में बदल गया, ‘कितना अच्छा हो अगर अपर्णा की आपरेशन टेबल पर ही मृत्यु हो जाए. कम से कम भैया को तो छुटकारा मिलेगा इस रोगिणी पत्नी से.’

पर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था. कुछ ही दिनों में वह बिलकुल ठीक हो गई. अब वह भैया के साथ गाड़ी में बैठ कर दफ्तर भी जाने लगी थी. पापा अब वृद्ध हो गए थे. वह फैक्टरी कम ही जाते थे. भैया बाहर आर्डर लेने जाते तो अपर्णा घर और फैक्टरी अच्छी तरह संभाल लेती थी. मां को अब भी अस्वस्थता घेरे रहती. बहू से कई बार उन्होंने कहा भी कि एक बार बोट्सवाना घूम आओ पर वह हर बार यही कहती, ‘एक बार आप अच्छी तरह से ठीक हो जाएं, तभी जाऊंगी.’

एक सुबह वह मेरे घर आई. मेरी बिटिया को तेज बुखार था. डाक्टर ने टायफायड बताया था. मैं पूरी रात जाग कर उस के माथे पर बर्फ की पट्टियां रखती रही थी. एक ओर बिटिया की तबीयत को ले कर मैं बुरी तरह तनावग्रस्त थी, दूसरी ओर थकावट की वजह से बुरा हाल था मेरा. उस ने चौके में जा कर पूरा नाश्ता तैयार किया. फिर दोपहर की दालसब्जी तैयार कर के हमारे पास आ कर बैठी तो स्वप्निल दफ्तर की कुछ उलझनें ले कर बैठ गए. अपर्णा चुपचाप सुनती रही. फिर भैया के साथ मिल कर उस ने बहुत मशविरे दिए. उस के सुझावों से स्वप्निल को काफी लाभ हुआ था.

मां का स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता जा रहा था. बैठेबैठे सांस फूलने लगती, थकावट महसूस होती, छाती में दर्द उठता. मुझे ये खबरें स्वप्निल से मिलती रहती थीं. वह अकसर मम्मीपापा से मिलने मेरे घर जाया करते थे.

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उस दिन रविवार था. स्वप्निल समय से पहले ही तैयार हो गए थे.

‘कहीं बाहर जा रहे हो?’ नाश्ते की प्लेट डाइनिंग टेबल पर रखते हुए मैं ने पूछा.

‘नहीं,’ उन्होंने रूखे स्वर में उत्तर दिया. फिर चौके में जा कर उन्होंने दूध गरम कर के थरमस में उडे़ला और 4 डबलरोटी के स्लाइस पर मक्खन लगा कर पैक करने लगे. मैं ने अपना प्रश्न फिर दोहराया, ‘कहीं जा रहे हो?’

‘हां, अस्पताल.’

‘क्यों, अब कौन बीमार है? कहीं अपर्णा, फिर तो अस्पताल नहीं चली गई?’ मेरे स्वर की कड़वाहट छिपी नहीं थी.

‘तुम, इतनी कठोर और अहंकारी हो, मैं नहीं जानता था.’

मैं अवाक् उन का चेहरा निहारने लगी.

‘कम से कम, इनसानियत के नाते ही मां का हाल पूछ लेतीं?’

‘क्या हुआ मां को?’ मैं बुरी तरह चौंक उठी थी.

‘2 दिन से अस्पताल में हैं.’

‘क्या तुम जानते थे?’

‘हां.’

‘तो फिर बताया क्यों नहीं?’

‘इसलिए क्योंकि तुम्हारे जैसी पत्थरदिल औरत कभी पसीज ही नहीं सकती. एक इनसान अगर बुरा है तो बुरा है, अच्छा तो वह हो ही नहीं सकता. एक ग्रंथि पाल ली तुम ने अपर्णा के विरुद्ध और इतनी दुश्मनी पाल ली कि मायके से नाता ही तोड़ लिया. कम से कम बूढ़े मातापिता की तो खबर ली होती. जानती हो, तुम्हारी मां का आपरेशन हुआ है और उन्हें खून की जरूरत थी. वह खून अपर्णा ने दिया है. अपर्णा की दशा चिंताजनक बता रहे हैं डाक्टर,’ इतना कह कर स्वप्निल बाहर निकल गए.

कितना गिरा हुआ समझ रही थी मैं खुद को उस पल? बीमार, कमजोर, पराए घर की बेटी, मां की सेवा करती रही, स्नेह बरसाती रही और मैं उन की अपनी बेटी बेखबर बैठी रही.

आज अपने खून का एक कतरा दे कर भी मां की जान बचा सकूं तो खुद को धन्य समझूं, यह सोचती हुई मैं अस्पताल पहुंची. बाहर कोरिडोर में भैया और पापा खड़े थे. स्वप्निल डाक्टरों से परामर्श कर रहे थे. मुझे देखते ही भैया फूटफूट कर रो पड़े.

‘मां कैसी हैं?’ मैं ने उन्हें धीरज बंधा कर आत्मीयता से पूछा.

‘खतरे से बाहर हैं.’

‘और अपर्णा?’ पहली बार मुझे अपर्णा के प्रति चिंतित देख कर सभी के चेहरों पर ताज्जुब मगर संतुष्टि के भाव मुखर हो उठे थे.

‘रक्तचाप गिर गया है बेहोश है,’ पापा अब भी चिंतित थे.

‘उसे क्यों खून देने दिया? ब्लड बैंक से ले लेते.’

‘कहा तो था पर अपर्णा नहीं मानी. बोली, जब उस का खून मैच कर रहा है तो ब्लड बैंक से खून ले कर बीमारियों का खतरा क्यों मोल लिया जाए?’ सभी सन्नाटे में थे. भैया निढाल से बैंच पर बैठे थे. मैं देख रही थी इन लोगों का अपर्णा के साथ बंधन अटूट है. वह वास्तव में इस घर की बहू नहीं बेटी है. मेरा मन उस के प्रति सहानुभूति से भर गया था….

बाहर किसी शोर से अचानक मेरे विचारों का सिलसिला टूटा. जल्दीजल्दी तैयार हो कर मैं अकेली ही अस्पताल पहुंची.

उसी समय डाक्टर ने बाहर आ कर  बताया, ‘‘अपर्णा स्वस्थ है. आप लोग उस से मिल सकते हैं.’’

सब के चेहरे पर संतुष्टि के भाव तिर आए थे. अगर अपर्णा को कुछ हो जाता तो कोई भी खुद को माफ नहीं कर पाता. सब से ज्यादा मैं खुद को दोषी समझती.

भाग कर मैं अपर्णा के बिस्तर पर पहुंच गई और उस के माथे पर चुंबनों की बौछार लगा दी. सभी अचरज से मुझे देख रहे थे. शायद किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि मेरे हृदय के इर्दगिर्द उगा खरपतवार यों एकाएक कैसे छंट गया. आंसुओं से विगलित तीव्र वेदना की धार मुख से निकली, ‘‘अपर्णा, तुम ने मां को जीवनदान दिया है.’’

‘‘नहीं दीदी, जीवनदान तो आप सब ने मुझे दिया है. मैं ने तो केवल अपना कर्तव्य निभाया है.’’

मेरी आंखों की कोर से ढुलके आंसू कब अपर्णा के आंसुओं से मिल गए, मैं नहीं जानती.

छत्तीसगढ़ में मोहन मरकाम बनें कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी  के आलाकमान ने विधायक मोहन मरकाम को प्रदेश अध्यक्ष का ‘ताज’ पहना दिया है . प्रदेश में इस बहुप्रतीक्षित नियुक्ति का लंबा इंतजार खत्म हो गया है . मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नए सदर मोहन मरकाम को बधाई दे दी है . कांग्रेस में गांव से लेकर राजधानी तक मोहन मरकाम को प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष बनने पर खुशी व्यक्त की जा रही है. बधाई का तांता लगा हुआ है . जैसा कि हमेशा होता है… अभी भी वही नाटक चल रहा है वही चापलूसी, वही जर्रा नवाजी वही आंखें बंद करके आलाकमान के आदेश का पालन.

कुछ प्रश्न हैं, जिनका जवाब शायद, न तो कांग्रेस के सुप्रीम नेता राहुल गांधी के पास है, न ही छत्तीसगढ़ प्रदेश के सत्ता के मुखिया भूपेश बघेल और पूर्व नेता प्रतिपक्ष व वर्तमान में नंबर दो की हैसियत रखने वाले टी. एस. सिंहदेव के पास . यह सवाल है तो जवाब भी आने चाहिए . मोहन मरकाम की नियुक्ति के सकारात्मक नकारात्मक प्रभाव से आपको अवगत कराया जाए उससे पूर्व यह प्रश्न जानना आपके लिए आवश्यक है ताकि छत्तीसगढ़ की कांग्रेसी राजनीति से आप कुछ समझ सकें….. और राहुल गांधी के इस्तीफे के एक बड़े राष्ट्रीय प्रश्न को भी आप समझ जाए, आपमें इसका माद्दा पैदा हो .

 प्रश्न राहुल गांधी से…

23 मई को जैसे ही लोकसभा समर के परिणाम आए और कांग्रेस का एक तरह से सूपड़ा साफ हो गया. तब कांग्रेस मे सनाका खींच गया . मन में उठते प्रश्नों को दबाकर श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल गांधी व उनके कांग्रेस परिवार ने नरेंद्र मोदी को बधाई दी और जनादेश स्वीकार किया . चंद दिनों बाद राहुल गांधी ने इस्तीफे की बात कही और इस्तीफे पर अड़ गए . कहा-“नहीं मैं इस्तीफा दे कर रहूंगा.”

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी हतप्रभ रह गई क्योंकि ऐसा तो होता रहता है. लोकतंत्र में कोई जीतता है कोई हारता है . मगर राहुल गांधी ने मानो तड़प कर यह स्वीकार किया कि कांग्रेस की यह हालत इसलिए है कि उनका नेतृत्व उनका, आभामंडल कहीं चूक गया है . प्रियंका गांधी का बड़ा आसरा था मगर वह भी चमत्कार नहीं दिखा पाईं.

ऐसे में राहुल गांधी का इस्तीफा एक क्रांतिकारी कदम था . मगर उसमें पुन: एक माह का समय दिया जाना ? यह कांग्रेस को कमजोर बनाता है इस्तीफा तो इस्तीफा फिर काहे का मान मनौव्वल . राहुल गांधी डटे हुए हैं . एक माह व्यतीत हो चुका है अशोक गहलोत का नाम चर्चा में है . सवाल है,  कांग्रेस में चुनाव क्यों नहीं कराया जाता… पार्टी संगठन में, पूर्व में 2 वर्षों में चुनाव का नाटक होता था. श्रीमती सोनिया गांधी ने उसे 5 वर्षों का करा दिया .कांग्रेस संविधान बदल दिया गया, कांग्रेस अब इसीलिए मरणासन्न है.इधर छत्तीसगढ़ सहित सभी प्रदेशों में संगठन में फेरबदल की जा रही है.

प्रश्न यही है, जब आपको राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं रहना है फिर आप प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति क्यों कर रहे हैं ?

कोई सशक्त चेहरा नहीं मिला आपको…

राहुल गांधी ने  छत्तीसगढ़ कांग्रेस के दो विधायकों का इंटरव्यू लिया. वे थे मनोज मंडावी व मोहन मरकाम . दोनों बस्तर अंचल से विधायक हैं . मजे की बात यह कि दोनों विधायकों को प्रदेश की सत्ता के संरक्षण में राहुल गांधी से मिलवाया गया . प्रदेश में कांग्रेस के एक से एक सशक्त और प्रखर नेता है चाहे वह विधायक, सांसद हो या न हो ऐसी फेहरिस्त को छोड़कर कांग्रेस ने आदिवासी कार्ड खेला है और सहज सरल स्वभाव के मोहन मरकाम जो कोडांगांव से विधायक है को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का सदर बना दिया गया .

प्रश्न है छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बड़े चेहरे सत्ता सुख भोगने के लिए सत्ता के घोड़े  पर चढ़ गए हैं अब पार्टी को कौन संभाले ?

डां. चरणदास महंत, रवींद्र चौबे, टी.एस. सिंहदेव जैसे बड़े नाम 15 वर्षों के वनवास के बाद सत्ता सुंदरी का सुख भोगना चाहते हैं . यह ऐसे लोग हैं जिन्हें प्रदेश का हर एक कार्यकर्ता जानता है यह ऐसी हस्तियां हैं जिनकी प्रदेश की राजनीति पर पकड़ है अच्छा दखल है . मगर प्रदेश अध्यक्ष पद अब इन्हे छोटा प्रतीत होने लगा है जिस संगठन के बूते आज कांग्रेस सत्ता में आई है,उस संगठन की उपेक्षा कर ऐसे शख्स को अध्यक्षी का ताज पहनाया गया है जो संपूर्ण छत्तीसगढ़ से वाफिक ही नहीं है .

सत्ता संगठन में टकराव कारण है

दरअसल सहज सरल और ऐसे शख्स को अध्यक्ष बनाना, जो नया नवेला हो, यह सत्ता की चाहत होती है और राहुल गांधी इस चक्रव्यूह में फंस गए . अविभाजित मध्य प्रदेश के दरमियान ख्याल करें तो दिग्गज हस्तियां पार्टी का प्रमुख चेहरा होती थी जिससे प्रदेश में सरगर्मी का संचार होता था और पार्टी जनता जनार्दन की नब्ज पर हाथ रखती थी. अब भूपेश के राज में संगठन की नब्ज पर सत्ता का हाथ होगा . परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की स्थिति कमजोर होगी . और यह सब जान समझ कर किया जा रहा है अगरचे किसी तेजतर्रार शख्स को सदर बना दिया जाए तो सत्ता संगठन में तलवारें निकल आती है प्रदेश अध्यक्ष मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने लगता है इस कारण संगठन की भ्रूण हत्या छत्तीसगढ़ में मोहन मरकाम को प्रदेश अध्यक्ष बना की गयी है. जो शख्स  बस्तर से लेकर सरगुजा तक जनता और कार्यकर्ताओं से वाफिक ही नहीं है उसे अध्यक्ष बनाने का और क्या मतलब है यानी इसका लाभ आगे भाजपा को भरपूर मिलेगा .

दिग्गजों की अनदेखी क्यों

ठीक है छत्तीसगढ़ में आपको 68 विधायकों का भारी बहुमत मिल गया है तो क्या यह आपके व्यक्तित्व का चमत्कार है ! राजनीतिक पंडितों के अनुसार यह सामूहिक नेतृत्व का कमाल है और उसके आगे डाक्टर रमन के 15 वर्षों की एन्टीइन्कमबेसी का. ऐसे में छत्तीसगढ़ के बड़े दिग्गजों की अनदेखी अच्छी बात नहीं है .

मोतीलाल वोरा एक बड़े चेहरे हैं . बड़ा कद है . उसके बाद सत्यनारायण शर्मा हैं जो चार दशकों से कांग्रेस की राजनीति के क्षत्रप है. अमितेश शुक्ल हैं जो पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल के सुपुत्र हैं .अरुण वोरा हैं धनेंद्र साहू संगठन में देखें तो शैलेश नितिन त्रिवेदी रमेश वल्याणी किरणमयी नायक भाजपा से कांग्रेस में  पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की भतीजी करुणा शुक्ला है.ऐसी शख्सियतों को छोड़कर जिनकी मुट्ठी में प्रदेश है,जाने पहचाने चेहरे हैं किसी नये शख्स को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपना. यह जग जाहिर करता है कि यह पार्टी के हित में कतई कतई  नहीं है .

कौन है मोहन मरकाम

सरकारी नौकरी छोड़कर 2008 में मोहन मरकाम ने पहला चुनाव लड़ा और विजयी हुए . बंगाल टाइगर कहे जाने वाले महेंद्र कर्मा ने उन्हें राजनीति में लाकर आगे बढ़ाया 2013 में विधायक बने और पुनः 2018 में विजयी हुए . बखत इतना परिचय होने के पश्चात सिर्फ राजनीतिक समीकरणों, आदिवासी कार्ड के नाम पर आप प्रदेश के अध्यक्ष मनोनीत हुए हैं. देखिए आगे आगे होता है क्या.एक कहावत है आदमी को ठंडे दूध को फूंक मार मार कर नहीं पीना चाहिए मगर कांग्रेस अब यही करने लगी है.

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