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स्टडी: कर्मचारियों से करवाना हो क्रिएटिव काम तो दीजिए ‘पिज्जा’ ट्रीट

आमतौर पर जौब करते करते एक वक्त ऐसा आता है जब आपको लगता है कि आपकी जिंदगी केवल घर से औफिस और औफिस से घर तक ही सीमित हो गयी है. इसके साथ ही आपको अपनी जौब से बोरियत होने लगती है और आपका काम करने में मन भी नहीं लगता है. ऐसे में अगर आप स्वादिष्ट खाना खाए तो आपकी काम की क्षमता बढ़ सकती है और आपका काम करने में मन अधिक लगेगा. जी हां, इसके लिए एक स्टडी सामने आया है.

दरअसल, अमेरिकी साइकोलौजिस्ट ने कर्मचारियों की काम करने की क्षमता जानना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने एक फैक्ट्री के कर्मचारियों पर अध्ययन किया. उन्होंने कर्मचारियों को बेहतर काम करने पर तीन तरीके के इनसेंटिव देने का औफर दिया. पहला औफर था पिज्जा, दूसरा बोनस और तीसरा बौस से तारीफ. इस दौरान कुछ कर्मचारियों ने पिज्जा खाने का औफर लिया कुछ ने तारीफ और कुछ ने बोनस का औफर लिया.

1 हफ्ते बाद एम्प्लौईज के काम की तुलना की गई और पाया गया कि जिन कर्मचारियों ने पिज्जा खाने का औफर स्वीकार किया था उन लोगों के काम करने की क्षमता में 6.7% की बढ़ोत्तरी हुई.

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पानी से कमाई कर रही हैं स्वयंसेवी संस्थाएं

बचपन से पढ़ते और सुनते आए हैं कि ‘जल ही जीवन है’ और बीते एकडेढ़ दशक के दौरान जिस तेजी से जल यानी पानी का कारोबार करने वाली कंपनियों की संख्या में इजाफा हुआ है, लगभग उतनी ही तेजी से लोगों में बोतलबंद पानी की मांग भी बढ़ी है. उपभोक्ता बेहिचक 15 से 30 रुपए दे कर विभिन्न कंपनियों की एक लिटर की पानी की बोतल खरीद रहा है.

जहां तक कंपनियों के पानी बेचने और मुनाफा कमाने की बात है तो व्यापारिक नजरिए से इसे गलत नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन समाजसेवा और मानवसेवा के लिए गठित स्वयंसेवी संस्थाएं अगर ऐसा करें यानी पानी बेचें तो इसे आप क्या कहेंगे? शायद यही कि स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए जल जीवन नहीं, बल्कि धन है.

देश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले शहर कोलकाता में श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति, संजीवनी सेवा ट्रस्ट, भारत रिलीफ सोसाइटी, नागरिक स्वास्थ्य संघ, कुम्हारटोली सेवा समिति, बीबीडी बाग नागरिक फाउंडेशन, साल्टलेक संस्कृति संसद, विधाननगर नागरिक विकास मंच, ईस्ट कोलकाता नागरिक फाउंडेशन और हावड़ा वैलफेयर ट्रस्ट समेत महानगर कोलकाता और हावड़ा व विधाननगर इलाके में दर्जनों ऐसी स्वयंसेवी संस्थाएं हैं जो सेवा के नाम पर खुलेआम पानी बेचने का व्यापार कर रही हैं.

गरमी के दिनों में पेयजल की किल्लत बढ़ने के साथ ही ऐसी संस्थाओं की कमाई भी बढ़ जाती है. एक टैंकर (6 हजार से 12 हजार लिटर)पानी के एवज में संस्थाएं 700 से 7,000 रुपए लेती हैं और इस राशि की रसीद तो संस्थाएं जरूर देती हैं, लेकिन कानूनी झंझट से बचने के लिए उस में पानी बेचने का नहीं, बल्कि डोनेशन का जिक्र रहता है.

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इस के अलावा टैंकरचालक और खलासी को चायपानी के नाम पर एक सौ से दो सौ रुपए देने पड़ते हैं. सेवा के नाम पर पानी बेचने का यह गोरखधंधा यों तो बारहों महीने चलता है, लेकिन गरमी और लगन के दिनों में इस की रफ्तार कुछ अधिक तेज हो जाती है.

इस के अलावा पांचसितारा होटलों, निर्माणकार्यों और फिल्मों की शूटिंग के दौरान भी संस्थाओं द्वारा भरभर टैंकर पानी भेजा और बेचा जा रहा है.

सेवा के नाम पर स्वार्थसिद्धि

सेवा के नाम पर स्थापित की गई दर्जनों संस्थाएं इन दिनों पानी बेच कर खासी कमाई कर रही हैं. गरमी के मौसम में संस्थाएं एक दिन में 12 से 15 टैंकर तक पानी बेच देती हैं. इस गणित से रोजाना वे हजारों रुपए कमा रही हैं. इस बाबत कई संस्थाओं के पदाधिकारियों का तर्क है कि एक टैंकर पानी के एवज में हम जनता से जो राशि लेते हैं, उस की बाकायदा दान (डोनेशन) की रसीद देते हैं.

दान तो आदमी अपनी इच्छा और हैसियत के मुताबिक देता है, लेकिन संस्थाओं ने तो एक दर (रेट) तय कर रखी है और बिना तयराशि के संस्था वाले जलापूर्ति नहीं करते. इस आरोप पर सफाई देते हुए एक प्राचीनतम संस्था के पदाधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, ‘‘धार्मिक आयोजन के लिए जलापूर्ति करने पर हम कोई पैसा नहीं लेते. हां, वाणिज्यिक लाभ के लिए जो लोग पानी लेते हैं, उन से हम पैसे लेते हैं और रसीद देते हैं.’’

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रसीद में दान का जिक्र होता है. रसीद देख कर ऐसा नहीं लगता कि यह एक टैंकर पानी के एवज में दी गई राशि की रसीद है. पैसे पानी के लेते हैं, तो रसीद में दान के स्थान पर पानी क्यों नहीं लिखते? इस का जवाब देने में संस्थाओं ने असमर्थता जाहिर की. उन्होंने इतना भर कहा कि वे पानी के एवज में लोगों से जितने रुपए लेते हैं उतने की रसीद दे देते हैं. अब रसीद में दान लिखा हो या पानी, क्या फर्क पड़ता है.

दान के रूप में मिली लाखों रुपए वाली जलवाहिनी गाड़ी (टैंकर) के जरिए और स्वयंसेवी संस्थाओं के बैनर तले पानी बेचना क्या उचित है? पानी बेचने को आप सही माने में सेवा मानते हैं? क्या दानदाताओं से यह कह कर टैंकर लेते हैं कि पानी बेचेंगे? इन सवालों का सटीक और संतोषजनक उत्तर किसी संस्था का कोई भी पदाधिकारी नहीं दे पाया.

काफी जोर देने पर एक संस्था संजीवनी सेवा ट्रस्ट से जुडे़ प्रदीप कुमार ने हिसाब गिनाते हुए कहा, ‘‘लोगों से जो राशि लेते हैं उस में से कोलकाता नगर निगम को 200 रुपए देने होते हैं. इस के अलावा टैंकर के चालक व खलासी का वेतन. साथ ही, ईंधन और गाड़ी की टूटफूट का खर्च है. इन खर्चों को जोड़ा जाए तो हम कुछ ज्यादा नहीं लेते.’’ तो फिर इसे सेवा के बदले व्यापार क्यों नहीं कहते? इस सवाल पर वे चुप्पी साध गए.

इस बाबत कोलकाता नगरनिगम के जलापूर्ति विभाग के अधिकारियों ने बताया कि 17-18 वर्ष पहले तक सोसाइटी एक्ट में पंजीकृत स्वयंसेवी संस्थाओं के टैंकरों को मुफ्त में पानी दिया जाता था, लेकिन शिकायत आने लगी कि नगरनिगम से मुफ्त में पानी ले कर संस्थाएं उसे बेचती हैं. इस के बाद सुब्रत मुखर्जी के मेयर रहते नगरनिगम ने प्रति टैंकर 200 रुपए लेना तय किया. अब संस्था वाले आम लोगों से कितनी राशि लेते हैं, यह देखना नगरनिगम का काम नहीं है.

बहुत पुरानी कहावत है- सेवा करने से मेवा मिलता है. लेकिन संस्थाओं ने इस कहावत में कुछ बदलाव करते हुए इसे अपनाया है. आजकल संस्था वाले सेवा तो नहीं कर रहे, लेकिन मेवा खूब लूट रहे हैं.

बात एक राज की

रक्ताभ, रुधिर, लालिमा और सिंदूरी चारों कालेज के कैंपस में बैठ कर गपशप कर रहे थे, तभी शिरा ने आ कर सूचना दी.

‘‘फ्रैंड्स, खुश हो जाओ. कालेज हम लोगों का एनुअल टूर अरेंज कर रहा है

अगले महीने.’’

‘‘अरे वाह, किस ने बताया तुझे?’’  लालिमा ने पूछा, ‘‘कहां जा रहा है?’’

‘‘नोटिस बोर्ड पर नोटिस लगा है. नौर्थ इंडिया का टूर है. शिमला, कुल्लूमनाली, डलहौजी, धर्मशाला और भी कई जगहें हैं. पूरे 15 दिनों का टूर है,’’ शिरा ने बताया.

‘‘कितने पैसे लगेंगे?’’ सिंदूरी ने पूछा.

‘‘40 हजार रुपए पर हैड,’’ शिरा ने बताया और बाय कर के चली गई.

‘‘यार, हमारा तो फाइनल ईयर है. हमें तो जाना ही चाहिए. भविष्य में हमें साथ जाने का मौका शायद न मिले,’’ रक्ताभ खुश होता हुआ बोला.

‘‘मैं तो जाऊंगी,’’ लालिमा चहकते हुए बोली.

‘‘मैं भी,’’ सिंदूरी भी उसी लय में बोली.

‘‘मैं नहीं जा पाऊंगा. मेरा कंजूस बाप फीस के लिए तो बड़ी मुश्किल से पैसे देता है. टूर के लिए तो बिलकुल नहीं देगा,’’ रुधिर कुछ गंभीर किंतु निराश स्वर में बोला.

‘‘ऐसा नहीं है, यार. तेरे पापा का इतना अच्छा बिजनैस है. करोड़ों की फर्म है. कई ट्रस्ट और पार्कों में उन के द्वारा दान में दी गई वस्तुएं लगी हैं. एक बार रिक्वैस्ट कर के तो देख. बेटे की खुशी से बढ़ कर एक पिता के लिए और कुछ नहीं होता,’’ रक्ताभ रुधिर को समझाते हुआ बोला.

‘‘अगर रुधिर नहीं जाएगा तो मैं भी नहीं जाऊंगी,’’ रुधिर की क्लोज फ्रैंड सिंदूरी बोली.

‘‘सिंदूरी नहीं गई तो मेरे घर वाले मुझे भी नहीं जाने देंगे. क्योंकि मेरे घर वाले किसी और पर विश्वास नहीं करते,’’ लालिमा बोली.

‘‘लो, यह लो. यह तो पूरा प्लान ही खत्म हो गया,’’ रक्ताभ निराशाभरे स्वर में बोला.

‘‘क्या रुधिर के लिए चंदा इकट्ठा नहीं कर सकते?’’ सिंदूरी ने प्रश्न किया.

‘‘हम सब साधारण घरों से हैं. 40 हजार रुपए के अलावा 10 हजार रुपए खर्चे के लिए चाहिए. मतलब 50 हजार रुपए. इतना पैसा भी निकालना हमारे घर वालों के लिए मुश्किल होगा,’’ रक्ताभ बोला.

‘‘हां, यह बात तो सही है,’’ लालिमा ने सहमति व्यक्त की.

‘‘टूर अगले महीने की 25 तारीख को जाएगा. आज तो 3 ही तारीख है. अभी डेढ़ महीने से ज्यादा समय है. कल मिल कर सोचते हैं क्या करना है,’’ रक्ताभ बोला.

‘‘नहीं, जो सोचना है आज ही सोचना है. बैठो और बैठ कर सोचो,’’ रुधिर बोला, ‘‘मेरे पापा से पैसे कैसे निकलवाए जाएं.’’

‘‘उन्होंने शायद बहुत मुश्किलों से यह पैसा कमाया है और शायद यह चाहते हों कि तुझे पैसों की सही कीमत पता चले. इसलिए तुझे पैसे देने की आनाकानी करते हों,’’ रक्ताभ ने अपने विचार रखे.

‘‘कारण कुछ भी हो, अभी टूर के लिए पैसे कैसे जमा किए जाएं, यह सोचो,’’ रुधिर सामान्य होता हुआ बोला.

‘‘क्या सोचूं? किसी का मर्डर करूं? किसी का किडनैप कर फिरौती मांगूं?’’ रक्ताभ झुंझलाता हुआ बोला.

‘‘किडनैप? वाह, क्या बढि़या आइडिया है. हम किडनैप ही करेंगे,’’ रुधिर खुशी से उछलते हुए बोला.

‘‘किडनैप? अरे बाप रे,’’ लालिमा डर कर आश्चर्य से बोली.

‘‘किस का किडनैप करोगे, रुधिर? देखो, कोई गलत कदम मत उठाना वरना सारी उम्र पछताना पड़ेगा,’’ सिंदूरी भी विरोध करते हुए बोली.

‘‘अरे, किसी दूसरे का नहीं, मेरा किडनैप, तुम सब मिल कर मेरा किडनैप करोगे और मेरे बाप से फिरौती मांगोगे. कम से कम लोकलाज की खातिर वे फिरौती तो देंगे ही,’’ रुधिर अपनी योजना बताते हुए बोला.

‘‘और अगर पुलिस को बता दिया तो हम सब अंदर जाएंगे,’’ रक्ताभ बोला.

‘‘मेरी मां ऐसा नहीं करने देंगी,’’ रुधिर ने कहा.

‘‘लेकिन पुलिस को सूचना दे दी तो? तब क्या होगा?’’ रक्ताभ ने संशय जाहिर किया.

‘‘चलो, हम सब बैठते हैं और एक फूलप्रूफ प्लान बनाते हैं,’’ रुधिर सभी को बैठाते हुए बोला.

‘‘नहीं रुधिर, यह गलत है,’’ सिंदूरी ने एक बार फिर विरोध किया.

‘‘क्या सही क्या गलत? एक फिल्म के गाने की लाइन है ‘जहां सच न चले वहां झूठ सही, जहां हक न मिले वहां लूट सही… मैं अपना हक ही तो ले रहा हूं,’’ रुधिर बोला.

‘‘चल ठीक है. अपना प्लान बता,’’ रक्ताभ बात को समाप्त करने के दृष्टिकोण से बोला, ‘‘हमारी योजना में सब से बड़ी बाधा पुलिस ही रहेगी.’’

‘‘वह कैसे?’’ रुधिर ने पूछा.

‘‘वह ऐसे कि कालेज में हम चारों का ही ग्रुप है. यदि किसी एक को अचानक कुछ होता है तो बाकी के 3 शक के दायरे में आएंगे ही न,’’ रक्ताभ बोला.

‘‘इस का समाधान खोज लिया है मैं ने. प्लान शुरू होने के 3-4 दिनों से पहले से मैं घर से कालेज के लिए निकलूंगा जरूर, मगर मैं कालेज में आऊंगा नहीं. कालेज रिकौर्ड से यह साफ हो जाएगा कि मैं कालेज आ ही नहीं रहा हूं, बल्कि यह भी साबित होगा कि मैं किसी तीसरे के साथ हूं,’’ रुधिर ने अपनी योजना बतानी प्रारंभ की.

‘‘तो तू रहेगा कहां? किसी को तो दिखाई देगा न?’’ लालिमा ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं किसी को भी दिखाई नहीं दूंगा क्योंकि मैं घर से निकल कर पास के प्लौट पर बने गैराज में छिप जाऊंगा. जब से पापा ने नई कार ली है तब से गैराज में पुरानी गाड़ी ही खड़ी रहती है. मेरी साइकिल भी वहां पर आसानी से घुस जाएगी. कालेज छूटने के समय मैं वापस घर पहुंच जाऊंगा. मां अकसर घर के अंदर ही रहती हैं, इसलिए उन्हें कुछ मालूम नहीं पड़ेगा और तुम लोग भी शक के दायरे से बाहर ही रहोगे,’’ रुधिर ने अपनी योजना का पहला दृश्य सामने रखा.

‘‘चलो, यहां तक तो ठीक है पर किडनैपिंग होगी कैसे? और किडनैपिंग के बाद तुझे रखेंगे कहां?’’ सिंदूरी ने उत्सुकता से प्रश्न किया.

‘‘जो भी दिन किडनैपिंग के लिए निश्चित किया जाएगा उस दिन मैं कालेज के नाम पर निकल कर शहर के दूसरे छोर पर बने रैस्टोरैंट में पहुंच जाऊंगा. वहां पर मैं अपनी साइकिल रख कर लगभग आधा किलोमीटर पैदल जाऊंगा. इतने बड़े शहर में मुझे कोई पहचानेगा, इस बात की संभावना कम ही है. वहां से रक्ताभ मुझे अपनी बाइक से 20 किलोमीटर दूर मेरे फार्महाउस पर छोड़ आएगा. पुलिस सब जगह ढूंढे़गी मगर मुझे मेरे ही घर में नहीं ढूंढे़गी.’’ रुधिर ने आगे कहा.

‘‘पर वहां तो तुम्हारे बरसों पुराने चौकीदार रामू अंकल हैं न?’’ रक्ताभ ने कहा.

‘‘हां, हैं तो सही. वे बहुत ही सीधे और अनपढ़ हैं. उन्हें तो लैंडलाइन से डायल करना भी नहीं आता. मैं जाते ही फोन को डेड कर दूंगा. मेरा विचार है एक या ज्यादा से ज्यादा 2 दिनों में ही अपना प्लान कंपलीट हो जाएगा,’’ रुधिर ने आशा जताई.

‘‘वह सब तो ठीक है. फिरौती की रकम कब, कहां और कितनी मांगनी है?’’ रक्ताभ ने पूछा.

‘‘हमारी आवश्यकता तो सिर्फ 40 हजार रुपए ही है,’’ लालिमा बोली.

‘‘अरे, नाक कटवाओगे क्या? इतनी रकम तो लोग कुत्तेबिल्ली का किडनैप करने के भी नहीं मांगते हैं. तुम ऐसा करना 5 लाख रुपए मांग लेना,’’ रुधिर रक्ताभ को निर्देश देता हुआ बोला.

‘‘5 लाख रुपए? यह तो बहुत अधिक हो जाएगा. क्या करेंगे हम इतने रुपयों का?’’ रक्ताभ का मुंह आश्चर्य से खुल गया.

‘‘देखो, जैसी कि रीत है, मांगने वाले को उतने पैसे तो मिलते नहीं हैं जितने वह चाहता है. कुछ मोलभाव अवश्य होता है. ऐसी स्थिति में तुम 2 लाख रुपए पर डील पक्की कर लेना,’’ रुधिर ने समझाया.

‘‘2 लाख रुपए भी ज्यादा हैं. क्या करेंगे हम इतने पैसों का?’’ लालिमा कुछ चिंतित स्वर में बोली.

‘‘तुम लोगों के टूर के पैसे भी मैं दे दूंगा.

बचेंगे 40 हजार रुपए तो तुम लोग भी अपने घर से 40 हजार रुपए जमा करने वाले ही थे. वे पैसे रास्ते के खर्च के लिए रख लेना. सभी के पास बराबर पैसा होगा,’’ रुधिर मुसकराता हुआ बोला.

‘‘और संपर्क करने के लिए फोन कौन सा इस्तेमाल करेंगे?’’ रक्ताभ ने पूछा.

‘‘कोई एक फोन यूज नहीं करेंगे. कल मैं पापा की फर्म का गुमाश्ता और्डर की फोटोकौपी, लैटरपैड, सील और बाकी डौक्युमैंट्स ले कर आ जाऊंगा. इतने डौक्युमैंट्स से कौर्पोरेट के नाम पर जितनी चाहे उतनी सिम ले सकते हैं. मैं 5 पोस्टपेड सिम निकलवा दूंगा. अगर कभी पुलिस कंप्लैंट हुई भी, तो शौपकीपर मेरा ही हुलिया बताएगा. इस से यह स्पष्ट होगा कि पापा की फर्म का ही कोई प्रतिद्वंद्वी यह काम मुझ से दबाव डलवा कर करवा रहा है. तुम लोगों पर कोई शक नहीं जाएगा,’’ रुधिर ने योजना का पूरा खुलासा किया.

‘‘फिरौती की रकम किस जगह ली जाएगी?’’ रक्ताभ ने अगली परेशानी प्रस्तुत की.

‘‘हमारे फार्महाउस के बिलकुल विपरीत शहर के दूसरे छोर पर. रुपए किसी शौपिंग बैग में ही लेना ताकि किसी को शक न हो. रुपए लेने के बाद बताना कि तुम ने मुझे फार्महाउस के नजदीक छोड़ दिया है. यहां पर तो मैं पहले से रहूंगा ही,’’ रुधिर ने स्पष्ट किया.

‘‘हम लोगों का तो कोई काम नहीं रहेगा न? इतना काम तो तुम निबटा ही लोगे?’’ लालिमा ने पूछा.

‘‘अरे मैडम, मेन रोल तो आप लोगों का ही रहेगा. रक्ताभ के धमकीभरे फोन करने के बाद फौलोअप करने का काम बारीबारी से तुम दोनों करोगे. इस से ऐसा लगेगा कि गु्रप बहुत बड़ा व खतरनाक है. यदि वौयस चेंजिंग ऐप से कौल करोगे तो बेहतर रहेगा. कोई तुम्हारी आवाज को ट्रैस नहीं कर सकेगा. दूसरा, पैसे लेने भी तुम लोग ही जाओगे, क्योंकि रक्ताभ अगर अपना मुंह कवर करेगा तो लोगों के शक के घेरे में आ जाएगा और तुम लोग स्टौल से कवर कर के आसानी से जा सकती हो,’’ रुधिर ने दोनों लड़कियों को समझाया.

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‘‘तुम्हारी योजना तो बहुत आकर्षक लग रही है. मुझे विश्वास है जरूर सफल होगी.’’ रक्ताभ ने आशा प्रकट की.

‘‘फार्महाउस पर रामू अंकल रहेंगे. वे अनाथ हैं, दादाजी उन्हें किसी अनाथालय से उठा कर लाए थे. इस कारण वे हमेशा हमारे एहसानमंद रहते हैं. मुझे बहुत अधिक चाहते हैं. इस कारण वहां खानेपीने, रहने की कोई समस्या नहीं होगी. हां, तुम लोग अपनी तरफ से कोई गलती मत करना,’’ रुधिर समझाते हुआ बोला.

‘‘बिलकुल ठीक,’’ रक्ताभ ने समर्थन किया.

‘‘ठीक है, तो अपनी योजना पक्की रही. कल मैं घर से निकलूंगा मगर कालेज नहीं आऊंगा. मैं कल ही सिमों का इंतजाम कर के पहुंचा दूंगा. आज से ठीक 6 दिनों बाद मेरा किडनैप कर के मेरे घर पर फोन कर देना. मेरे मम्मी व पापा का नंबर अभी से नोट कर लो,’’ रुधिर नंबर लिख कर देता हुआ बोला.

‘‘ठीक है, औल द बैस्ट,’’ रक्ताभ बोला.

‘‘औल द बैस्ट,’’ चारों एक स्वर में मगर धीमे से बुदबुदा कर बोले.

अगले 5 दिनों तक सभीकुछ तय योजना के मुताबिक चलता रहा. छठे दिन रुधिर तय समय पर निकल कर निश्चित किए गए रैस्टोरैंट के सामने साइकिल रख कर पैदल चल पड़ा. लगभग आधा किलोमीटर चलने के बाद रक्ताभ अपनी बाइक पर इंतजार करता हुआ मिल गया. वह उसे फार्महाउस पर छोड़ आया.

कालेज समाप्त होने के लगभग आधा घंटा बाद रक्ताभ ने रुधिर के पापा को फोन किया.

‘‘हैलो, शांतिलाल बोल रहे हैं?’’ रक्ताभ ने आवाज बदल कर पूछा.

‘‘हां, मैं शांतिलाल बोल रहा हूं. आप कौन?’’ उधर से आवाज आई.

‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो और किसी दूसरे को बताने की कोशिश मत करना. हम ने तुम्हारे लड़के रुधिर का अपहरण कर लिया है. अगर उस की सलामती चाहते हो तो आज शाम 5 लाख रुपयों का इंतजाम कर लो. रुपया कहां लाना हैं, इस के बारे में हम शाम को बताएंगे. पुलिस को बताने पर अपने लड़के की लाश ही पाओगे,’’ रक्ताभ ने भरपूर पेशेवर रवैया अपनाते हुए कहा.

‘‘अपहरण? मेरे लड़के का? बहुत अच्छा किया. मेरी तरफ से जान ले लो उस की. रुपया छोड़ो, मैं एक पैसा भी नहीं देने वाला,’’ उधर से रुधिर के पापा ने कहा.

यह सुन कर रक्ताभ घबरा गया और उस ने फोन काट दिया. साथ में खड़ी हुई लालिमा और सिंदूरी से पूरी बात बताते हुए वह बोला, ‘‘कहीं हमारा दांव उलटा तो नहीं पड़ गया?’’

‘‘अब क्या होगा?’’ लालिमा घबराते हुए बोली.

‘‘अरे, इस समय तक तो रुधिर घर पहुंचता ही नहीं है. हम ने फोन में जल्दबाजी कर दी है. इसी कारण अतिआत्मविश्वास के साथ वे ऐसी बातें कर रहे हैं. 2 घंटे बाद उन्हें जब मालूम पड़ेगा की रुधिर सचमुच घर नहीं पहुंचा, तब वे घबराएंगे और हमारी बात मान लेंगे,’’ सिंदूरी ने अनुमान लगाया.

‘‘हां, हां, शायद ऐसा हो. ऐसा करते हैं हम शाम को 6 बजे पार्क में मिल कर फोन लगाते हैं,’’ रक्ताभ ने सहमति जताई.

‘‘सिंदूरी इस बार तुम फोन लगाओ. अब तो 6 घंटे गुजर चुके हैं. शायद अब तक रुधिर के घर वाले घबरा गए हों,’’ रक्ताभ ने पार्क में मिलते ही कहा.

‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’ लालिमा ने समर्थन किया.

‘‘ठीक है, मैं फोन लगाती हूं,’’ सिंदूरी ने कहा और फोन लगाने लगी, ‘‘हैलो, शांतिलालजी…’’

‘‘हां, मैं शांतिलाल ही बोल रहा हूं.’’ वे बीच में ही सिंदूरी की बात काटते हुए बोले, ‘‘तुम किडनैपर्स गैंग से बोल रही हो न? मेरा जवाब अभी भी वही है जो पहले था. आप लोग मेरा व अपना समय बरबाद न करें,’’ कहते हुए शांतिलाल ने गुस्से में फोन काट दिया.

‘‘अब क्या करें? इन पर तो कोई असर नहीं हो रहा,’’ लालिमा बोली.

‘‘अब तो हमें रुधिर से संपर्क करना ही पड़ेगा. वह ही बता सकता है आगे क्या करना है, ‘‘सिंदूरी ने कहा.

‘‘शायद रुधिर लैंडलाइन फोन बंद न कर पाया हो और शांतिलालजी का फोन आने पर रामू अंकल ने रुधिर की उपस्थिति के बारे में बता दिया हो,’’ लालिमा ने आशंका व्यक्त की.

‘‘हां, हो सकता है. अगर ऐसा है तो हमें रुधिर से संपर्क स्थापित करना चाहिए,’’ सिंदूरी बोली.

‘‘ठीक है मैं रुधिर का मोबाइल लगाता हूं,’’ रक्ताभ रुधिर को फोन डायल करते हुए बोला, ‘‘अरे, इस का फोन तो स्विच औफ है.’’

‘‘मतलब, रुधिर को इस बारे में कुछ नहीं मालूम. हमें उसे बताना चाहिए,’’ सिंदूरी बोली.

‘‘मगर बताएं कैसे?’’ रक्ताभ बोला.

‘‘चलो, अभी तुम्हारी बाइक से चलते हैं,’’ सिंदूरी बोली.

‘‘नहीं, अभी नहीं जा सकते क्योंकि वह इलाका सुनसान है और अकसर वहां लूटडकैती की वारदातें होती रहती हैं,’’ रक्ताभ ने बताया.

‘‘फिर क्या करें?’’ सिंदूरी नर्वस होती हुई बोली.

‘‘देखो, कल संडे है. मैं 9 साढ़े 9 बजे जा कर उस से मिल लूंगा. वहीं पर अगली रूपरेखा बना लेंगे,’’ रक्ताभ बोला.

‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’ लालिमा ने समर्थन किया.

‘‘हैलो लालिमा. तुरंत सिंदूरी को कौन्फ्रैंस कौल पर लो,’’ सुबह साढ़े 9 बजे रक्ताभ की घबराई हुई आवाज में फोन आया.

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ लालिमा सिंदूरी को कौन्फ्रैंस कौल पर लेती हुए बोली. ‘‘यह लो रक्ताभ, सिंदूरी भी आ गई.’’

‘‘क्या हुआ रक्ताभ? तुम्हारी आवाज घबराई हुई सी क्यों हैं?’’ सिंदूरी फोन पर जौइन करते हुए बोली.

‘‘अरे, मैं अभी रुधिर के फार्महाउस गया था. वहां पर सीन बहुत चौंकाने वाला था? रुधिर ने सुसाइड कर लिया है,’’ रक्ताभ घबराता हुआ बोला.

‘‘क्या? कैसे??’’ दोनों ने एकसाथ घबराई आवाज में पूछा.

‘‘ उस के एक हाथ में रिवौल्वर है और छाती पर गोली लगी है. शायद रिवौल्वर से खुद को बिस्तर पर लेटेलेटे गोली मार ली है,’’ रक्ताभ की आवाज अभी भी लड़खड़ा रही थी.

रुधिर की मौत की खबर सुन कर लालिमा और सिंदूरी दोनों रोने लगीं. रक्ताभ की आंखें भी भर आईं.

‘‘देखो, संभालो अपनेआप को. रुधिर के पापा को जब यह बात मालूम पड़ेगी तो वे पुलिस में अवश्य जाएंगे. तब आज नहीं तो कल, पुलिस हम तक पहुंचेगी जरूर. हमें अपने बचाव के लिए कुछ करना चाहिए,’’ रक्ताभ ने भर्राई आवाज में कहा.

‘‘क्या करें?’’ लालिमा ने पूछा.

‘‘तुम लोग पार्क में आओ. वहीं बैठ कर सोचते हैं कि हमें आगे क्या करना है. हम पर किडनैप करने का आरोप लगा तो हमारा कैरियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा. हम पर किडनैपर होने का ठप्पा लग जाएगा वह अलग,’’ रक्ताभ बोला.

‘‘ठीक है, एक घंटे बाद पार्क में मिलते हैं,’’ सिंदूरी रोते हुए बोली.

लगभग एक घंटे बाद तीनों पार्क में इकट्ठे हुए. सिंदूरी बहुत गंभीर व उदास लग रही थी. लालिमा की आंखों में भी रोने के कारण लाल डोरे पड़े हुए थे.

‘‘कैसे हुआ रक्ताभ?’’ सिंदूरी ने पूछा.

‘‘पता नहीं,’’ रक्ताभ ने जवाब दिया.

‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि फोन आने पर रामू अंकल ने रुधिर के पापा को रुधिर के वहां होने की खबर दे दी हो और राज खुलने के डर से घरवालों की नजरों में गिरने से बचने के लिए फार्महाउस पर रखी हुई रिवौल्वर से खुद को शूट कर लिया हो,’’ रक्ताभ चिंतित होते हुए बोला.

‘‘एक बार पुलिस के हत्थे चढ़ना मतलब आगे की जिंदगी को परेशानियों में डालना,’’ लालिमा भी उसी तरह चिंतित होते हुए बोली.

‘‘अब क्या करें?’’ सिंदूरी ने पूछा.

‘‘मेरे विचार से हमें आगे हो कर पुलिस को सूचना देनी चाहिए. इस से पुलिस हमारी बात सुनेगी भी और विश्वास करेगी भी. हमारी बातों की सचाई जानने के लिए वह सिम बेचने वाले शौपकीपर के पास भी जा सकती है जो हमारी बा?तों को सच साबित करेगा. बाद में तो हमारी बात कोई ठीक से सुनेगा भी नहीं,’’ रक्ताभ ने कहा.

‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’ लालिमा ने भी समर्थन किया.

‘‘जैसा तुम को उचित लगे,’’ सिंदूरी घबराए हुए निराश स्वर में बोली.

‘‘रुधिर के पिताजी के जाने के बाद अंदर चलेंगे ताकि हम अपनी बात अच्छे से रख सकें,’’ रक्ताभ ने सुझाया.

‘‘हां, यह ठीक रहेगा. अभी उन्हें अपने बेटे की मौत का गम और गुस्सा दोनों होगा. पता नहीं हमारे साथ क्या कर बैठें,’’ लालिमा बोली.

‘‘ठीक है, हम उन के जाने के बाद अंदर चलेंगे,’’ रक्ताभ ने समर्थन किया. लगभग 15 मिनट के बाद रुधिर के पिताजी बाहर आ गए.

‘‘सर, हम एक घटना की सूचना देने आए हैं,’’ रक्ताभ, लालिमा और सिंदूरी थाना इंचार्ज के सामने खड़े हो कर कह रहे थे.

‘‘पहले आराम से बैठो. घबराओ मत और बताओ किस घटना की सूचना देना चाहते हो,’’ थाना इंचार्ज ने तीनों को बैठने का इशारा करते हुए कहा.

‘‘सर, हमारे मित्र रुधिर ने आत्महत्या कर ली है,’’ रक्ताभ ने साहस बटोर कर कहा.

‘‘क्या कहा रुधिर? सेठ शांतिलाल का बेटा?’’ थाना इंचार्ज ने प्रश्न किया.

‘‘जी हां, वही,’’ सिंदूरी ने कहा.

‘‘परंतु सेठ शांतिलाल ने तो रिपोर्ट लिखवाई है कि उन का बेटा रुधिर आज सुबह से उन की रिवौल्वर के साथ गायब है,’’ थाना इंचार्ज ने कहा.

‘‘नहीं सर, आज सुबह से नहीं, रुधिर तो कल से ही गायब है,’’ कहते हुए रक्ताभ ने रुधिर के अपहरण की पूरी कहानी बयान कर दी.

‘‘ओह, तो ऐसा है,’’ थाना इंचार्ज ने कहा. ‘‘तुम्हारे अलावा इस योजना के बारे में और कौनकौन जानता था.’’

‘‘कोई भी नहीं. अगर फार्महाउस जाने के बाद रुधिर ने रामू अंकल को यह बात बताई हो, तो पता नहीं,’’ रक्ताभ बोला.

‘‘एक बात और समझ में नहीं आई. तुम्हारे हिसाब से अपहरण कल सुबह ही हो गया था. और तुम ने इस विषय में शांतिलाल को फोन भी कर दिया था. लेकिन उस ने तुम्हारे फोन को तवज्जुह नहीं दी?’’ पुलिस अफसर ने रक्ताभ से पूछा.

‘‘यस सर,’’ रक्ताभ ने सहमति दी.

‘‘इस का मतलब तो एक ही निकलता है कि जिस समय तुम ने फोन किया उस समय तक रुधिर वापस घर पहुंच चुका था. तुम्हारा प्लान फेल हो चुका था. शायद इसी शर्मिंदगी में रुधिर ने सुबह वापस फार्महाउस जा कर आत्महत्या कर ली,’’ पुलिस अफसर ने अनुमान लगाया.

‘‘हो सकता है. परंतु रुधिर को कम से कम हमें सूचित तो करना चाहिए था,’’ रक्ताभ कुछ सहमते हुए बोला.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मुझे पूरा विश्वास है रुधिर के साथ कुछ गलत जरूर हुआ है.’’ सिंदूरी रुधिर पर विश्वास जताते हुए बोली.

‘‘पहले घटनास्थल पर जा कर मौके का मुआयना करते हैं. शायद कुछ निकल कर आए. आप तीनों को भी साथ चलना पड़ेगा,’’ थाना इंचार्ज ने कहा.

तीनों पुलिस वालों के साथ फार्महाउस पहुंच गए.

‘‘आप डेडबौडी की स्टडी कीजिए और अपने थौट्स के बारे में मुझे बताइए,’’ पुलिस अफसर ने फोरैंसिक ऐक्सपर्ट को निर्देश दिए.

‘‘सर, यह सुसाइड का केस है ही नहीं, यह तो सीधेसीधे मर्डर का केस है,’’ अपनी प्रारंभिक जांच के बाद ऐक्सपर्ट ने कहा.

‘‘क्या?’’ सभी आश्चर्य से बोल पड़े.

‘‘आप कैसे कह सकते हैं कि यह मर्डर है?’’ इंस्पैक्टर ने पूछा.

‘‘क्योंकि रिवौल्वर पर जिस प्रैशर से फिंगरप्रिंट बनने चाहिए थे उतने प्रैशर से फिंगरप्रिंट बने नहीं हैं. दूसरा, रिवौल्वर चलने के बाद गन पाउडर का कुछ अंश चलाने वाले की कलाइयों पर आ जाता है जो नहीं है. ऐसा लगता है गहरी नींद में सोते हुए रुधिर पर किसी ने बहुत पास से दिल पर गोली मारी है और आत्महत्या दर्शाने के लिए रिवौल्वर हाथ में पकड़ा दी है. इसी कारण रिवौल्वर पर फिंगर एक्सप्रैशन प्रौपर नहीं आ पाए हैं,’’ एक्सपर्ट ने अपनी राय दी.

‘‘ओह, यह तो केस का डायरैक्शन ही चेंज हो गया. मतलब इस केस के बारे में और किसी को भी मालूम था. और उस ने फिरौती न मिलने की दशा में रुधिर को मार डाला. दूसरा एंगल यह है कि चौकीदार रामू ही रुधिर का कातिल हो सकता है. क्योंकि कायदे से तो सब से पहले सूचना उसी को देनी चाहिए थी मगर वह घटना के बाद से ही फरार है,’’ इंस्पैक्टर ने अपना शक जाहिर करते हुए कहा.

‘‘किंतु सर, रामू अंकल तो अनपढ़ हैं उन्हें तो लैंडलाइन से फोन करना तक नहीं आता. वे गोली इतनी सही नहीं चला सकते,’’ सिंदूरी ने कहा क्योंकि वह 2-3 बार रुधिर के साथ फार्महाउस आ चुकी थी.

‘‘तीसरा एंगल यह बनता है कि तुम तीनों में से ही किसी ने उस की हत्या की हो और पुलिस की जांच को भटकाने के लिए खुद पहले आ कर शिकायत कर दी ताकि तुम पर शक न हो,’’ इंस्पैक्टर तीनों पर पैनी नजर डालता हुआ बोला, ‘‘पुलिस तुम तीनों को अरैस्ट करती है.’’

‘‘सर, हम ने तो कुछ किया ही नहीं. हमें घर जाने दीजिए, प्लीज सर,’’ घबराते हुए लालिमा बोली.

‘‘जांच पूरी होने तक थाने का लौकअप ही तुम्हारा घर रहेगा. कौंस्टेबल, सेठ शांतिलाल को फोन कर के यही बुलवा लो. बता दो उन की रिवौल्वर मिल गई है,’’ इंस्पैक्टर ने आदेश दिया.

‘‘यस सर,’’ कौंस्टेबल बोला.

कुछ ही देर में सेठ शांतिलाल अपनी कार से वहां पहुंच गए.

‘‘कहां है रिवौल्वर और कहां है रुधिर? फार्महाउस में घुसते ही शांतिलाल ने प्रश्न किया.

‘‘बैडरूम में हैं दोनों. आप के लड़के ने उस रिवौल्वर से खुद को गोली मार ली है,’’ पुलिस अफसर ने बताया.

‘‘ओह,’’ शांतिलाल ने अफसोस वाले स्वर में कहा.

‘‘एक बात समझ में नहीं आ रही है शांतिलालजी. इन तीनों बच्चों का कहना है कि इन्होंने रुधिर के साथ मिल कर उस के अपहरण की साजिश रची और जब इन्होंने फिरौती के लिए आप को फोन किया तो आप ने ऐसा कुछ रिस्पौंस नहीं दिया जिस से लगे कि आप को कोई शौक लगा है,’’ इंस्पैक्टर ने पूछा.

‘‘क्योंकि मैं इन के अपहरण प्लान के बारे में पहले से ही जानता था,’’ सेठ शांतिलाल ने रहस्योद्घाटन किया, ‘‘इन लोगों की योजना के अनुसार जब रुधिर पहले दिन गैराज में छिपा, उस समय मैं बंगले की छत पर ही था और मैं ने उसे गैराज में जाते हुए देख लिया था. मैं ने सोचा, शायद कुछ सामान लेने के लिए गया है. परंतु जब वह लंबे समय तक बाहर नहीं आया तो मैं ने अपने ड्राइवर को उस की निगरानी के लिए रख दिया. मैं यह भी जानता था कि रुधिर ने मेरे फर्म के नाम पर कुछ सिमें निकलवाई हैं. मुझे यह भी पता था कि रुधिर फार्महाउस पर ही छिपा हुआ है. बच्चे हैं, गलतियां कर रहे हैं, आज नहीं तो कल इन लोगों की समझ में आ जाएगी. यही सोच कर मैं ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. अगर मैं पुलिस में रिपोर्ट करूंगा तो इन का भविष्य बरबाद हो जाएगा. यही सब सोच कर मैं ने शिकायत नहीं की.’’

‘‘मतलब कल रात को रुधिर घर पर आ गया था?’’ इंस्पैक्टर ने प्रश्न किया.

‘‘जी नहीं, उसे तो पता ही नहीं कि उस का प्लान लीक हो गया था,’’ शांतिलाल ने उसी धारा प्रवाह में उत्तर दिया.

‘‘तो फिर रिवौल्वर आज सुबह बंगले से कैसे गायब हुई? उसे तो कल ही रुधिर के साथ गायब हो जाना चाहिए था,’’ अफसर ने कहा.

‘‘जी, जी वो शायद मैं ने कल ध्यान से कबर्ड देखा नहीं था. शायद वह कल ही अपने साथ ले आया हो,’’ शांतिलाल ने भरपूर आत्मविश्वास के बीच अपनी घबराहट छिपाते हुए कहा.

‘‘आश्चर्य है इतनी बड़ी गलती आप कैसे कर सकते हैं. ऐसी गलती करने पर सरकार आप का लाइसैंस रद्द तक कर सकती है,’’ इंस्पैक्टर ने चेताया.

‘‘मैं ने रिवौल्वर रख कर ही गलती कर दी, साहब. अगर यह रिवौल्वर नहीं होती तो रुधिर आत्महत्या नहीं करता,’’ शांतिलाल अफसोस जाहिर करते हुए बोले.

‘‘सरकार, माईबाप, यह आत्महत्या नहीं हत्या है और सेठजी ने ही रुधिर बाबा की…’’ एक अजनबी घटनास्थल पर प्रवेश करता हुआ बोला.

‘‘तुम कौन हो?’’ इंस्पैक्टर ने कड़क आवाज में पूछा.

‘‘सर, यही हैं यहां के चौकीदार रामू अंकल,’’ रक्ताभ ने बताया.

‘‘कैसे चौकीदार हो तुम? यहां पर इतनी बड़ी घटना हो गई और तुम्हारे पतेठिकाने ही नहीं हैं. जानते हो, इस घटना की सब से पहली सूचना तुम्हें ही पुलिस को देनी चाहिए थी,’’ इंस्पैक्टर रामू को डपटते हुए बोला. ‘‘तुम इतनी आसानी से कैसे कह सकते हो कि खून सेठ शांतिलाल ने ही किया है?’’

‘‘सरकार, मैं ठहरा अनपढ़गंवार. मुझे नहीं पता किसे सूचना देनी चाहिए,’’ रामू मिमियाता हुआ बोला, ‘‘पर आप एक बार मेरी बात ध्यान से सुन लीजिए.’’

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‘‘अच्छा, बताओ क्या जानते हो इस घटना के बारे में?’’ इंस्पैक्टर कुछ नरम पड़ कर बोला.

‘‘सरकार, कल सुबह रुधिर बाबा अचानक आ गए. आते ही उन्होंने मुझे चाय बनाने को कहा. मैं किचन में चाय बनाने चला गया. जब मैं वापस लौटा तो उन्होंने मुझे बताया कि वे सेठजी से नाराज हो कर यहां आ गए हैं. लेकिन मैं सेठजी को यह बात किसी कीमत पर न बताऊं कि वे यहां पर हैं. उन्होंने मुझे यह भी बताया कि बाहर से कोई फोन न आ सके, इसलिए उन्होंने फोन खराब कर दिया है. एकदो दिनों में जब सेठजी का गुस्सा शांत होगा तब वे घर वापस चले जाएंगे. शाम को सेठजी का ड्राइवर आया और बोला कि सुबह साढ़े 6 बजे तक आवश्यक सफाई के लिए बंगले पर बुलवाया है. मैं अकसर तीजत्योहार पर बंगले की सफाई करने जाता ही हूं.

‘‘शाम को खाने में रुधिर बाबा ने चिकन बनाने की फरमाइश रखी. इसी कारण खाना बनाने और सफाई करने में काफी देर हो गई. देर से सोने के कारण नींद भी सुबह देर से खुली. जागा, तब तक साढ़े 7 बज चुके थे. रुधिर बाबा अभी सो ही रहे थे. मैं ने सोचा दिशामैदान कर आता हूं, उस के बाद बाबा को चायनाश्ता करवा कर चला जाऊंगा.

‘‘मैं कुछ दूर झाडि़यों में बैठा ही था कि मैं ने देखा सेठजी खुद कार चला कर फार्महाउस आ गए हैं. मैं ने सोचा शायद मुझे लेने आए हैं. लगभग 5 मिनट के बाद मैं ने देखा कि सेठजी वापस जा रहे हैं. मुझे फार्महाउस में न पा कर शायद सेठजी ने सोचा होगा कि मैं सफाई के लिए पहले ही निकल चुका हूं. मैं जल्दी से फार्महाउस पहुंचा तो देखा कि रुधिर बाबा के सीने में गोली लगी है और हाथ में पिस्तौल है.

‘‘मुझे कुछ समझ में नहीं आया और मैं साइकिल उठा कर सेठजी के घर निकल पड़ा. मैं तकरीबन 11 बजे सेठजी के घर पहुंच गया. लेकिन तब तक सेठजी वहां से निकल पड़े थे. मेरे पूछने पर सेठानीजी ने बताया कि उन की पिस्तौल चोरी हो गई

है और वे इस की सूचना देने के लिए थाने गए हैं.

‘‘तब मैं ने सेठानीजी को फार्महाउस की पूरी घटना की जानकारी दे दी. रुधिर बाबा की मौत की खबर सुन कर वे बेहोश हो गईं. पानी के छींटे डालने और होश में आने पर काफी समझाने के बाद वे सामान्य हुईं. उन्होंने ही मुझे पुलिस को सूचित करने को बोला.

‘‘थाने पहुंचने पर पता चला कि आप लोग फार्महाउस पहुंच चुके हैं. साइकिल से लगभग 2 घंटे बाद यहां पहुंच सका हूं,’’ रामू ने अपने बयान में बताया.

‘‘क्यों शांतिलालजी, रामू ठीक कह रहा है?’’ इस के बयानों की तसदीक आप के ड्राइवर से करवाई जाए?’’ इंस्पैक्टर ने पूछा.

‘‘नहीं, रामू सही कह रहा है. मैं ने ही रुधिर की हत्या की है,’’ सेठ शांतिलाल ने अपने जुर्म का इकबाल किया.

वहां खड़े रक्ताभ, लालिमा और सिंदूरी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि जो उन्होंने चुना वह ठीक था या नहीं, वे चुपचाप हैरानी से सब देखते रहे.

‘‘तुम ने अपने बेटे का खून क्यों किया?’’ इंस्पैक्टर ने हैरत से पूछा.

‘‘क्योंकि रुधिर मेरा बेटा है ही नहीं,’’ शांतिलाल ने खुलासा किया.

‘‘आप का बेटा नहीं है रुधिर, तो फिर किस का बेटा है?’’ आप को कैसे पता चला रुधिर आप का अपना बेटा नहीं है?’’ इंस्पैक्टर ने पूछा.

‘‘पता नहीं रुधिर किस का बेटा है. सौभाग्यवती से शादी से पूर्व ही मैं जानता था कि मैं सौभाग्यवती को दुनिया का हर सुख दे सकता हूं सिवा मातृत्व सुख के. मैं ने सोचा था अगर सौभाग्यवती अनुरोध करेगी तो किसी वैज्ञानिक पद्धति से या अनाथालय से बच्चा गोद ले कर वह कमी पूरी कर लेंगे. किंतु सौभाग्यवती ने मुझे बताए बिना यह गलत कदम उठा लिया.

‘‘मैं  ने रुधिर को कभी भी अपना खून नहीं समझा, सिर्फ सौभाग्यवती की खुशी की खातिर उसे मैं अपने साथ रखे हुए था. मुझे उस पर कभी भी विश्वास नहीं था. इसी कारण मैं उसे सिर्फ जरूरत के अनुसार ही आवश्यक सुविधाएं दिया करता था. मेरी धारणा थी कि मेरी दौलत पाने के लिए रुधिर किसी भी स्तर पर गिर सकता है. खुद के अपहरण की इस साजिश ने मेरी इस धारणा को और पक्का कर दिया. इसी कारण अपनेआप को भविष्य में सुरक्षित रखने के दृष्टिकोण से मैं ने यह योजना बनाई. काश, मुझे पता चल पाता कि रुधिर का पिता कौन है,’’ सेठ शांतिलाल स्वीकारोक्ति करते हुए बोला.

‘‘मैं हूं उस का पिता,’’ नजरें झुका आगे आ कर रामू बोला. लगभग 20 साल पहले फार्महाउस पर आप की अनुपस्थिति में मैं सेठानीजी के आग्रह को ठुकरा न सका. वह पहला और आखिरी मिलाप था हमारा. आज जब सेठानीजी को फार्महाउस की घटना बतलाई तो उन्होंने यह राज की बात मुझे बताई. एक तरफ नमक का कर्ज था तो दूसरी तरफ पिता होने का फर्ज. आखिरकार पिता ने अपना आखिरी व एकमात्र कर्तव्य पूरा किया.’’

‘‘चलिए, सेठ शांतिलालजी, गुनाहगार का फैसला अदालत ही करेगी,’’ इंस्पैक्टर असली गुनाहगार को अपने साथ ले जाते हुए बोले.

रक्ताभ, लालिमा, सिंदूरी के होंठ जैसे किसी ने सी दिए हों. मन ही मन तीनों अपनी नादानी पर पछता रहे थे जिस की वजह से उन्होंने अपना प्यारा दोस्त हमेशा के लिए खो दिया था.

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इन घरेलू उपायों से दूर करें अनियमित पीरियड्स की समस्या

महिलाओं में असमय पीरियड्स की समस्या एक समान्य बात है. पीरियड्स में कभी कभी अनियमितता आम है पर जब ये परेशानी हमेशा होने लगे तो आपको सचेत हो जाना चाहिए. कई महिलाओं में पीरियड्स में 15 से 20 दिनों की देरी हो जाती है. अगर महिलाओं को इतने दिनों तक पीरियड्स ना आएं तो उन्हें कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं. इसमें बदन दर्द,पीठ में दर्द,बालों का झड़ना, घबराहट प्रमुख परेशानियां हैं.

इस दौरान आपको बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है ये सब हार्मोन परिवर्तन होने की वजह से होता है. इस खबर में हम बताएंगे कि मासिक धर्म या पीरियड की होने वाली परेशानियों का घरेलू उपचार आप कैसे कर सकती हैं. इन नुस्खों से आपके पीरियड की समस्या दूर हो जाएगी.

कच्‍चा पपीता

पीरियड्स की परेशानी में कच्चा पपिता काफी कारगर होता है. इसमें ढेर सारा पोषण, एंटीऔक्‍सीडेंट और बीमारी को ठीक करने वाले गुण होते हैं. कच्‍चे पपीते का सेवन मासिक धर्म से जुड़ी हर समस्‍याएं ठीक हो सकती हैं.

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अदरक

पीरियड्स को नियमित करने के लिए अदरक बेहद लाभकारी है. इससे पीरियड्स में होने वाले दर्द में भी काफी आराम मिलता है. इसके लिए आप आधा चम्मच अदरक को पीस लें और 1 कप पानी में सात मिनट तक उबालें. अब इसमें थोड़ी शक्कर डालें और खाना खाने के बाद इसे दिन में 3 बार पिएं. ऐसा कम से कम 1 महीने तक करे.

जीरा

पीरियड्स से होने वाली परेशानियों में जीरा काफी कारगर होता है. इसके अलावा उस दौरान होने वाले दर्द में भी काफी राहत देता है. इससे आपको आयरन मिलता है जो महिलाओं में पीरियड्स के दौरान कम हो जाता है. एक चम्‍मच जीरे में साथ 1 चम्‍मच शहद का सेवन हर रोज करें.

बादाम

रात को 2 छुआरे और 4 बादाम को पानी में भिगो कर रख दें. सुबह इनके साथ थोड़ा सी मिश्री के साथ इन्हें पीस लें और मक्खन के साथ इसका सेवन करें. मासिक धर्म से जुडी समस्याएं दूर हो जाएंगी.

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मेरा ब्वायफ्रैंड मेरे साथ फिजिकल रिलेशन बनाना चाहता है. कभी कभी मैं भी चाहती हूं. पर मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है?

सवाल
मेरी उम्र 18 वर्ष है और मैं बीकौम फर्स्ट ईयर की छात्रा हूं. मेरे एक फ्रैंड के भाई ने मुझे वैलेंटाइन डे पर प्रपोज किया था. मैं ने पहले उसे नजरअंदाज किया था पर बाद में उसे हां कर दी. वह मुझ से एक साल बड़ा है और हम एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं. वह मेरे साथ रिलेशन बनाना चाहता है. कभीकभी तो मेरा मन भी बहक जाता है. मैं जब भी उसे मना करती हूं, वह कहता है कि मुझे उस पर विश्वास नहीं है.

मैं एक मिडिल क्लास फैमिली से हूं और मेरे पेरैंट्स ने मुझे पढ़ाई के लिए बाहर भेजा है. मैं अपने पेरैंट्स को धोखा नहीं देना चाहती हूं और न ही मैं अपने बौयफ्रैंड को छोड़ना चाहती हूं. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं?

जवाब
कब दिल किस के लिए धड़कने लगे कहा नहीं जा सकता और इस पर किसी का वश भी नहीं चलता. लेकिन अभी आप की उम्र पढ़ाई व कैरियर बनाने की है ताकि आप अच्छी जौब में सैटल हो कर जीवनभर खुशहाल रह सकें, न कि अभी से सैक्स रिलेशन बना कर अपनी जिंदगी को खतरे में डाल दें.

भले ही आप अपने बौयफ्रैंड पर खुद से भी ज्यादा विश्वास करती हों, लेकिन कब किस की नीयत बदल जाए कहा नहीं जा सकता और हो सकता है वह आप से सिर्फ संबंध बनाने तक ही प्यार का नाटक कर रहा हो और एक बार मतलब निकलने पर आप से संपर्क भी न रखे, इसलिए ऐसा करने से पहले दस बार उस के परिणामों के बारे में जरूर सोचें. और जब वह आप से कहे कि आप उस पर विश्वास नहीं करतीं तो आप स्पष्ट कहें कि इस में विश्वास नहीं करने की कोई बात नहीं है.

यह सब शादी के बाद ही उचित है. इस से उसे समझ आ जाएगा कि आप की रुचि सैक्स में नहीं है. इस के बाद अगर उस का व्यवहार आप के प्रति बदलता है तो आप के सामने सारी बात साफ हो जाएगी.

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विवादों में घिरी अक्षय कुमार की ‘मिशन मंगल’, मुश्किल में रिलीज!

बौलीवुड एक्टर अक्षय कुमार की फिल्म मिशन मंगल स्वतंत्रत दिवस के मौके पर यानी 15 अगस्त को रिलीज होने वाली है. इस फिल्म को लेकर ना सिर्फ अक्षय कुमार बल्कि फिल्म से जुड़े सभी कलाकार काफी उत्साहित हैं.

लेकिन अब इस फिल्म को लेकर बड़ी खबर सामने आ रही हैं. अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के फिल्म डिविजन के अध्यक्ष अमेय खोपकर ने ‘मिशन मंगल’ को लेकर बड़ी घोषणा की हैं. उन्होंने कहा, अगर अक्षय कुमार फिल्म ‘मिशन मंगल’ को मराठी में डब करेंगे तो हम इस फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे. जब कि अक्षय कुमार ने कहा है कि  ‘मिशन मंगल’ सिर्फ हिंदी में रिलीज होगी, मराठी में रिलीज नहीं होने वाली है.

खबरों के अनुसार फिल्म डिविजन के अध्यक्ष  ने खुलासा करते हुए कहा- ‘मैं अक्षय कुमार की फिल्में देखता हूं, उनकी फिल्मों को पसंद करता हूं,  मैं उनका बहुत बड़े फैन हैं. मुझे ‘मिशन मंगल’  के मेकर्स और अक्षय कुमार से कोई परेशानी नहीं है.

अगर ये फिल्म हिंदी में रिलीज होती है तो ठीक है लेकिन अगर इस फिल्म को मराठी में डब करके रिलीज किया जाएगा तो हम ऐसा नहीं होने देंगे. मिशन मंगल पर बात करते हुए अमेय खोपकर ने आगे कहा- ‘महाराष्ट्र में हर सिनेमाघर में एक थियेटर खास कर मराठी फिल्मों के लिए आरक्षित रखा जाता है. अगर मेकर्स इस फिल्म को मराठी में रिलीज करेंगे तो मराठी फिल्मों के लिए आरक्षित रखे हुए थियेटर में भी ‘मिशन मंगल’ दिखाई जाएगी. इसके कारण हम उन्हें ‘मिशन मंगल’ मराठी में रिलीज नहीं करने देंगे. वह सरकार से निवेदन करते है कि वह इस मामले में दखल दें.

इस फिल्म में मुख्य भूमिका में सोनाक्षी सिन्हा, तापसी पन्नू, विद्या बालन, निथ्या मेनन, कीर्ति कुल्हारी और शरमन जोशी नजर आएंगे.

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अर्जुन कपूर से कब शादी करेंगी मलाइका अरोड़ा? जानें उनका जवाब

फिल्म इंडस्ट्री के पौपुलर कपल में शुमार मलाइका अरोड़ा और अर्जुन कपूर अपने रिलेशनशिप को लेकर हमेशा चर्चाओं में रहते हैं. फैंस इनके रिलेशनशिप को लेकर हर रोज कुछ नया जानने की चाह में रहते हैं. लेकिन मलाइका अरोड़ा ने कुछ नया खुलासा किया है.

इनके चाहने वाले ये जानना चाहते हैं कि ये कपल शादी कब करेंगे. इसके बारे में मलाइका अरोड़ा ने बड़ा खुलासा किया है. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक मलाइका अरोड़ा ने कहा- ‘अर्जुन कपूर के साथ शादी की बातें महज सिर्फ एक अफवाह हैं. हम शादी नहीं कर रहे है हम दोनों जैसे भी है बहुत खुश है. मलाइका ने इस पर बात करते हुए आगे कहा- ‘मीडिया में हम दोनों की शादी को लेकर कई तरह ही अफवाह चलती रहती है. लेकिन मैं कहना चाहती हूं कि इस तरफ की किसी भी अफवाह को हवा बिलकुल भी न दें.

 

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आपको बता दें, हाल ही में मलाइका अरोड़ा और अर्जुन कपूर ने सोशल मीडिया  पर अपने रिश्ते को औफिसियली कुबूल किया हैं. इन दोनों ने अपनी एक खूबसूरत तस्वीर शेयर करते हुए अपने रिश्ते को औफिशियल अनाउंसमेंट किया था.

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संघ की समरसता का सच

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सपना है कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र हो. संघ की उत्पत्ति ही इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हुई थी, तो इसे वह कैसे छोड़ सकता है? वह ऐसा हिन्दू राष्ट्र चाहता है जिसमें वर्णाश्रम व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा सुदृढ़ हो. कितनी विरोधाभासी बात है कि यही संघ ‘समरसता’ का नारा देता है, यानी सबके साथ समान व्यवहार हो, लेकिन मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी यह सवाल उठाएगा कि जातीय श्रेष्ठता के भाव से पैदा हुए शोषण, उत्पीड़न को खत्म किये बगैर समरसता कैसे हो सकती है? दलित समाज को भी ‘संघ की समरसता’ पर चिन्तन करना चाहिए. समरसता के सच को ढूंढना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चाहे अपने हाथों से दलितों के पांव पखारें, या संघ दलितों की ओर शंकराचार्य, महामंडलेश्वर और मंदिर का पुजारी बनने का चुग्गा फेंके, इन प्रलोभनों के पीछे छिपी साजिश को समझना दलित समाज के लिए बेहद जरूरी है.

दलित, जिन्हें पहले अछूत कहा जाता था, वो भारत की कुल आबादी का 16.6 फीसद हैं. इन्हें अब सरकारी आंकड़ों में अनुसूचित जातियों के नाम से जाना जाता है. वर्ष 1850 से 1936 तक ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार इन्हें दबे-कुचले वर्ग के नाम से बुलाती थी. भारत में आज हिन्दू दलितों की कुल आबादी करीब 23 करोड़ है. अगर हम दो करोड़ दलित ईसाईयों और 10 करोड़ दलित मुसलमानों को भी जोड़ लें, तो भारत में दलितों की कुल आबादी करीब 35 करोड़ बैठती है. ये भारत की कुल आबादी के एक चौथाई से भी ज्यादा है. यह बहुत बड़ा वोट बैंक है, जिसकी तरफ सबकी नजरें लगी रहती हैं. दलित पार्टियों, कांग्रेस, भाजपा, सपा के बीच यह वोट बंटा रहता है. ऐसे में कोई एक पार्टी यदि इसे अपने पक्ष में एकजुट कर ले तो उसकी ताकत जबरदस्त तरीके से बढ़ जाए.

सदियों से दलितों के साथ जारी भेदभाव, दमन, मंदिरों में प्रवेश से रोक और अत्याचारों से तंग यह समुदाय कभी मुस्लिम धर्म अपना लेता है, कभी ईसाई हो जाता है. आजकल यह बौद्ध धर्म की ओर खासा आकर्षित है. बौद्ध धर्म में मूर्ति पूजा नहीं है, भेदभाव नहीं है, इसलिए धर्मपरिवर्तन के जरिये लाखों की संख्या में दलित बौद्ध धर्म स्वीकार कर चुके हैं. अब हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की कल्पना पाले हिन्दुत्ववादियों को यह डर सता रहा है कि कहीं बचे हुए 23 करोड़ दलित भी हिन्दू धर्म न छोड़ दें. इससे उनकी ताकत कम हो जाएगी. दरअसल इन हिन्दुत्ववादियों से दलित यह सवाल करने लगा है कि अगर हम भी हिन्दू हैं तो फिर अछूत कैसे हैं?  हम मन्दिरों में प्रवेश क्यों नहीं कर सकते हैं? हम पुजारी क्यों नहीं हो सकते हैं? हम शंकराचार्य या महामंडलेश्वर क्यों नहीं बन सकते हैं?  हमसे हेय व्यवहार क्यों हो रहा है?  हमें अलग-थलग क्यों रखा जाता है?  इसीलिए संघ ने ‘समरसता’ का नारा देकर इन्हें जोड़े रखने की चाल चली है. इसीलिए एक मन्दिर, एक शमशान की बातें भी हो रही हैं. मगर वर्ण-व्यवस्था को खत्म करने की बात कहीं नहीं सुनायी पड़ रही. सवर्ण समुदाय और दलित समुदाय के बीच रोटी-बेटी के सम्बन्ध की बात भी नहीं सुनायी देती. और जब तक यह शुरू नहीं होता, तब तक समरसता कैसी?

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दलितों को हिन्दू बनाये रखने के लिए संघ ने पहले अपनी सभाओं के द्वार उनके लिए खोले. दलित सभा में बैठने के लिए अपनी दरी अपने साथ लाया. सभा में सभी अपनी-अपनी दरियां लाते हैं. अग्रणीय पंक्ति में बैठने वाले सवर्णों की महीन रेशमी धागों से बुनी सुन्दर कलाकृतियों वाली मंहगी दरियां और अंतिम पंक्तियों में बैठने वाले निम्न जाति के लोगों की मोटे धागे-जूट की बनी सस्ती दरियां. कौन सवर्ण और कौन दलित यह फर्क दरी देख कर ही नजर आ जाता था. हीनता का बोध कराता था. सभा-संदेशों से दलितों को विमुख करता था. इन सभाओं में दलितों का मन नहीं रमता था. अपमान महसूस होता था. इसे देखते हुए संघ ने अब ‘समरसता’ का मंत्र दिया गया है और सबकी दरियों का रंग भगवा कर दिया गया है. लिहाजा ऊपरी तौर पर फर्क समाप्त हो गया है. संघ से जुड़े दलितों की हीन भावना में भी कुछ कमी दिख रही है. सभा-संदेश की तरफ उसका भी मन लगने लगा है. मगर दलितों को यह समझने की जरूरत है कि अन्दरूनी तौर पर तो फर्क अभी भी ज्यों का त्यों बना हुआ है. रेशमी भगवा दरियां और मोटे जूट की भगवा दरियों में फर्क तो है ही, और यह फर्क उस पर बैठने वाले को ही अनुभव होता है. यानी भगवा रंग के भीतर वर्णव्यवस्था ज्यों की त्यों बरकरार है. फर्क वहीं का वहीं है. संघ की इस चालाकी को दलित समाज समझ भी रहा है.

तिल-गुड़ की जगह रोटी-बेटी की बात नहीं करता संघ

बीते चंद सालों में दलितों को साथ जोड़ने की कवायद में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कई बार दलित समुदाय के लोगों के घर जा-जाकर उनके साथ जमीन पर बैठे और उनके हाथ का बना खाना खाया. उज्जैन के सिंहस्थ में उन्होंने दलितों और उनके संतों के साथ न केवल खुद क्षिप्रा नदी में डुबकियां लगायीं, बल्कि अवधेशानंद जैसे ऊंची जाति के संत को दलित संत उमेश दास के साथ डुबकियां लगवा दीं. मगर गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे जब आशा के विरुद्ध आये तो भाजपा के चेहरे पर चिंता उभर आयी. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी सत्ता हाथ से न निकल जाए, इस चिन्ता में दलित वोट लपकने के लिए और ज्यादा उपाय किये गये. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को दलितों से नजदीकियां बढ़ाने आदेश हुआ. मकर सक्रांति का त्योहार निकट था. आमतौर पर यह त्योहार दलित तबका नहीं मनाता है. यह ऊंची जाति वालों का त्योहार है. लेकिन शिवराज सिंह ने मध्य प्रदेश में इसे दलितों को भी मनाने की छूट दी और इस बात के लिए उन्हें बढ़ावा भी दिया. इस कवायद में यहां तिल-गुड़ मुहिम की शुरुआत हुई और संघ के स्वयंसेवकों ने खुद दलित-आदिवासियों को घर-घर जाकर तिल और गुड़ का प्रसाद भेंट किया. इस तरह सर्विस देने वाले क्लास में समरसता का मंत्र फूंका गया.

11 जनवरी,  2018 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विदिशा में ऐलान किया कि वे खुद घरेलू काम करने वालों जैसे धोबियों, मजदूरों और दूसरे गरीब तबके के लोगों के घर तिल-गुड़ ले कर जाएंगे. गरीब तबके से सीधा मतलब उन दलितों से था जो जाति के आधार पर ऊंची जाति वालों की सेवा करते आ रहे हैं. मगर यह पहल छोटी जाति वालों को उनकी जाति की बिना पर नीचा दिखाने की कोशिश ही कही जाएगी. अगर संघ और भाजपा ‘समरसता’ की बात करते हैं तो तिल-गुड़ का प्रसाद शिवराज सिंह चौहान को ऊंची जाति के घरों में जाकर भी बांटना चाहिए था. सरसंघचालक मोहन भागवत का इशारा पाकर शिवराज ने धोबियों के घर जाकर तिल-गुड़ बांटा, मगर पंडों यानी ब्राह्मणों के घर जाकर तिल-गुड़ भेंट नहीं किया. आखिर वे भी तो पारिश्रमिक लेकर पूजापाठ का काम करते हैं, यानी सर्विस देते हैं, तो यह भेदभाव क्यों? बनियों, कायस्थों और ठाकुरों के यहां जाकर भी तिल-गुड़ देने का काम क्यों नहीं हुआ? आखिर यह कैसी समरसता थी?

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एक तरफ तो संघ कहता है कि सब हिन्दू बराबर हैं, वहीं दूसरी तरफ यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ता कि इस बराबरी में भी जाति के आधार पर भेदभाव है और इसे दूर करने का उसका न तो कोई इरादा है और न ही इस बाबत वह कभी कोई पहल करेगा. साजिश यह कि हिन्दुओं की ताकत को बढ़ाना है तो दलितों को दुत्कारो मत, बल्कि उन्हें तीज-त्योहारों पर दान देते रहो, जिससे वे हिन्दू धर्म में भी बने रहें और सेवा में भी लगे रहें.

वैसे भी तीज-त्योहारों पर भारत के गांव-देहातों और शहरों में आज भी छोटे तबके के लोग ऊंची जाति वालों के घर जाकर ‘पावन’ इकट्ठा करते हैं. पावन के तहत आटा और खानेपीने का सामान छोटी जाति वालों की झोली में इस तरह डाला जाता है कि कहीं हाथ उन्हें छू न जाए, नहीं तो फिर से नहाना पड़ेगा. हालांकि पिछड़े और दलित समाज में शिक्षा के प्रसार के साथ अब इस रिवाज में थोड़ी कमी आयी है. मानवता की नजर में यह प्रथा ही शर्मनाक है कि होली-दीवाली पर छोटी जाति वाले ऊंची जाति वालों के दरवाजों पर जा कर मिठाई, नकदी, आटा-दाल वगैरह मांगें.

इस असमानता, अपमान और हीनताबोध को समाप्त करने के लिए संघ और भाजपा ने कभी कोई कदम नहीं उठाया, उलटे अब इसे दूसरे तरीके से बढ़ावा देना शुरू हो गया है. अगर वे लेने नहीं आते तो खुद ही चल कर देना शुरू हो गया है, ताकि उनके मन में बैठा दलितपना कभी दूर न हो सके. क्या यह सामाजिक बराबरी या समरसता की नजीर है? यह तो सीधे-सीधे मनुवाद को बदले ढंग से ही परोसने की साजिश है. अगर वाकई संघ सामाजिक समरसता के प्रति इतना गम्भीर है तो बजाय तिल-गुड़ बांटने के उसे दलितों से रोटी-बेटी के सम्बन्धों की बात करनी चाहिए, जिससे जातिगत भेदभाव जमीनी तौर पर मिट सके, लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि विदेशी मंचों पर विकास और आधुनिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले, चन्द्रमा पर चंद्रयान भेजने वाले अभी भी छोटी जाति के लोगों को धर्म के नाम पर भीख देने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने इसे दान-दक्षिणा नहीं कहा क्योंकि उस पर तो पंडों का हक होता है, जो उन्हें पैर छू कर दी जाती है.

जाति का कहर

मेरे नजदीकी परिवार में पढ़ीलिखी व सुंदर लड़की ने एक विधर्मी लड़के से विवाह कर लिया. विवाह कोर्ट में हुआ. जब घरवालों को पता चला तो उन के घर का माहौल ऐसा हो गया मानो वहां किसी की मृत्यु हो गई हो. मैं उन के घर गई. लड़की के पिता 3 दिनों से औफिस नहीं गए, कमरा बंद कर बैठे थे. मां दूसरे कमरे में रोनाधोना कर रही थीं. भाभी मुरझाई सी खामोश बैठी थीं. भाई ने गुस्से में घर के कई कीमती सामान तोड़ दिए थे.

लड़की का उस गली में आना भी वर्जित था. कुछ समय बीत गया. एक बार मैं उन के घर गई हुई थी. उस लड़की का फोन आया, मां से पूछ रही थी कि पिता और भाई घर पर तो नहीं हैं. थोड़ी ही देर में वह दुपट्टे से मुंह छिपाए घर आई. मैं उसे देख हैरान रह गई. इतनी खूबसूरत लड़की का रूप तिरोहित हो चुका था, स्याह रंगत और शरीर कंकाल मात्र रह गया था.

उस की मां ने ममतावश उस से बोलचाल शुरू कर दी थी. हम किचन में ही बैठे थे. मैं ने देखा, उन्होंने उसे किचन के बाहर ही बैठने को स्टूल दे दिया था. उन्होंने एक अलमारी से अलग रखे बरतन निकाले और कुछ खानेपीने को बाहर ही पकड़ा दिया. साथ में, मां ने हिदायत भी दी कि खा कर बरतन धो कर रख जाना.

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लड़की अश्रुपूरित नेत्रों से खाती जाती, मेरी ओर देखती जाती कि शायद एक अध्यापिका होने के कारण या उस की प्रिय आंटी होने के कारण मैं उस से या उस की मां से कुछ सकारात्मक बात करूंगी. पर मैं अपने छलकते आंसुओं को मुश्किल से छिपाए भारी मन से उठ खड़ी हुई.

घर आने पर मुझे सभी पर बेहद दया आ रही थी. वे मां, पिता, भाई शिक्षित होते हुए भी संकीर्ण मानसिकता से नहीं निकल पा रहे थे.

मैं सोचती, जाति और धर्म के कारण फैली हुई ओछी मानसिकता वाले लोगों के बच्चों को प्यारमोहब्बत करने का क्या अधिकार ही नहीं है?

अफसोस और सोचने की बात है कि आज देश में धर्मजाति के चलते एकदूसरे से नफरत करने की अघोषित मुहिम सी चलाई जा रही है. नतीजतन, हम इंसान हो कर भी इंसान के बिना वजह दुश्मन बनते जा रहे हैं. ऐसे में हमआप सब को धार्मिकताजातीयता की जकड़न से अपनेआप को छुड़ाना होगा और सामाजिक समरसता को अपनानाफैलाना होगा ताकि देश व देशवासियों का सिर दुनियाभर में ऊंचा हो.

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सैरसपाटे पर जाएं और पैसे बचाएं, जानें कैसे

जब कभी घूमनेफिरने की बात मन में आती है तो किशोरों के मन में यह बात उठने लगती है कि इतने पैसे कहां से आएंगे, मातापिता से भी पैसे मांगना असंभव लगता है और अपनी पौकेट वैसे ही खाली है. ऐसे में कुछ किशोर स्कूलकालेज के टूर पर निर्भर रहते हैं या फिर कुछ घूमनेफिरने का प्रोग्राम ही कैंसिल कर देते हैं, लेकिन बहुत कम किशोर ऐसे होते हैं जो पहले से प्लानिंग कर के पैसों की बचत करते हैं और यह भी जानते हैं कि कैसे कम पैसों में घूमा जा सकता है. जानिए, कैसे पैसे बचा कर ज्यादा एंजौय कर सकते हैं आप :

बजट बना कर चलें

अगर आप ने कहीं बाहर दूसरे शहर घूमने जाने का मन बनाया है तो उस के साथसाथ बजट बना कर भी चलें, तभी आप जम कर मस्ती कर पाएंगे. यदि आप 7 फ्रैंड्स ग्रुप में मनाली जा रहे हैं और प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के हिसाब से मात्र 100 रुपए ही खर्च कर सकते हैं तो अपने साथ एक डायरी ले कर चलें, जिस से आप को पता रहेगा कि आज पूरे दिन 700 रुपए में ही गुजारा करना है, जिस में खानापीना, रहना, घूमनाफिरना सब शामिल है. जो खर्च होता जाए उसे डायरी में नोट करते जाएं, जिस से आप के सामने सारा हिसाब- किताब रहेगा और जैसे ही बजट बिगड़ने लगेगा आप सचेत हो खुद पर कंट्रोल कर पाएंगे.

होटल लें लो कौस्ट पर

आउटिंग पर जाने का यह मतलब नहीं कि बेहिसाब पैसा खर्च किया जाए बल्कि जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारें. ध्यान रखें आप जहां ठहर रहे हैं वह होटल ज्यादा महंगा न हो वरना आप का सारा बजट गड़बड़ा जाएगा और मौजमस्ती करने के बजाय आप एकदूसरे का मुंह ताकते रह जाएंगे. यह बात मन में गांठ बांध लें कि होटल में रुकने का मकसद सिर्फ रात गुजारने के लिए छत का इंतजाम करना है. ऐसे में अगर आप को कम पैसों में बैड की जगह जमीन पर गद्दों पर भी लेटना पड़े तो खुद से समझौता करें और सोचें कि आप के बजट में रहने का बंदोबस्त हो गया है, यही बड़ी बात है. इस बात का भी ध्यान रखें कि एकदम से किसी एक होटल में न ठहरें, बल्कि पहले दोचार होटलों में रेट पता कर लें. हो सकता है कि आप को सस्ते में बढि़या होटल मिल जाए, जिस की आप ने उम्मीद भी न की हो, लेकिन इस के लिए आप को थोड़ा सब्र रखना होगा.

जहां ठहरें वहां खाने की भूल न करें

अकसर हम यही सोचते हैं कि जिस होटल में ठहरे हैं, वहीं सुबह का चायनाश्ता कर लें ताकि इधरउधर आनेजाने का झंझट न रहे. भले ही इस से आनेजाने में लगने वाला समय बच जाएगा, लेकिन आप शायद इस बात से अनजान हैं कि जो चाय आप को बाहर 10 रुपए में आसानी से मिल जाएगी वही चाय होटल वाले 20-25 रुपए में देंगे. यही बात नाश्ते, लंच व डिनर के संदर्भ में भी लागू होती है, जिस से सीधा आप के बजट पर असर पड़ेगा. इसलिए अच्छा रहेगा कि खुद बाहर जा कर चायनाश्ता करें और साथ में मौसम का भी मजा लें.

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फुजूलखर्ची से बचें

पहाड़ी स्थानों पर जाएं या फिर कहीं और, वहां नईनई चीजें देख कर उन्हें खरीदने का दिल किस का नहीं करता, लेकिन यह जरूरी नहीं कि जो भी चीज मन को भा जाए उसे खरीदा ही जाए. भले ही आप यह सोचें कि मैं ने तो 30 रुपए की ही चीज खरीदनी है, लेकिन यही छोटीछोटी चीजें खरीदतेखरीदते आप का पूरा बजट बिगड़ जाएगा. इसलिए घर से ही मन बना कर जाएं कि मुझे सिर्फ वहां घूमना है बाकी शोपीस, ऐक्सैसरीज, पापड़, मिठाई वगैरा लेने पर पैसे खर्च नहीं करने, क्योंकि ये सब चीजें तो आप अपने घर आ कर भी खरीद सकते हैं. अगर कोई चीज बहुत सस्ती मिल रही है तो आप उसे 3-4 दोस्तों के साथ मिल कर खरीदें ताकि उस पर और डिस्काउंट मिल जाए.

प्रोफैशनल्स से फोटो न खिंचवाएं

जब कभी हम कहीं घूमने जाते हैं तो अपने साथ स्मार्टफोन व कैमरा ले जाना नहीं भूलते ताकि अपने ट्रिप का हर पल कैमरे में कैद कर पाएं. लेकिन यह भी सच है कि भले ही हमारे हाथ में स्मार्टफोन हो और हम सैल्फी खींचने में भी ऐक्सपर्ट हों, फिर भी हमारा मन एकदो फोटोज प्रोफैशनल्स से खिंचवाने का करता है ताकि फोटो अच्छे आएं. पूरे ग्रुप का फोटो एकसाथ आ पाए और वह सब व्यू भी आ जाए जो हम फोटो में लेना चाहते हैं, लेकिन इस के लिए हमें 50-60 रुपए में एक फोटो खिंचवाना पड़ता है, जो पैसों की बरबादी के सिवा कुछ नहीं है. अगर आप खुद बैस्ट फोटो क्लिक कर सकते हैं तो इस के लिए पैसे बरबाद करना कोई अक्लमंदी नहीं बल्कि आप उन पैसों को घूमनेफिरने में लगाएं.

हर राइड न करें ट्राई

अगर आप पहाड़ी स्थानों पर घूमने गए हैं तो आप को वहां ढेरों राइड करने के मौके मिल जाएंगे, लेकिन हर राइड ट्राई न करें. कोशिश करें दूर से ही चीजों को देख कर ऐंजौय करने की, जिस से मजा भी आए और पैसे भी खर्च न हों.

क्रिएटिविटी दिखाने में न हिचकें

अगर किसी अनजान जगह जा कर अपना हुनर दिखा कर कमाई की जा सके तो इस में शर्म कैसी. यदि आप को मेहंदी वगैरा लगाने का शौक है तो आप जहां घूमने गए हैं उस जगह के सब से भीड़भाड़ वाले इलाके में मेहंदी लगाना शुरू कर दें, लेकिन इस के लिए आप घर से ही सारा बंदोबस्त जैसे मेहंदी की कीप वगैरा साथ ले कर जाएं. यकीन मानिए, देखते ही देखते आप के पास काफी लोगों की भीड़ एकत्रित हो जाएगी जो आप को काफी कमाई करा देगी. इसी तरह यदि आप को गाने का शौक है तो आप अपने दोस्तों के बीच गाना शुरू कर दें. आप की मधुर आवाज सुन कर आसपास के लोग भी वहां एकत्रित हो जाएंगे जिस से लोगों के सामने आप का हुनर आने के साथसाथ आप की कमाई भी हो जाएगी.

ज्यादा खाना और्डर न करें

‘भूख लगी है, भूख लगी है,’ शोर मचा कर अगर हर फ्रैंड अपनी फरमाइश की चीजें और्डर करने लगेगा तो इस से खाना वेस्ट होने के चांसेज तो हैं ही साथ ही पैसों की बरबादी भी होगी. इस से अच्छा है कि आप सब आपस में बात कर के 2-3 डिशेज ऐसी मंगवा लें जो सब को पसंद हों. अगर न भी पसंद हों तब भी उन्हें अपनी पसंद बनाने की कोशिश करें और साथ ही ऐसी चीजें मंगवाने की भी कोशिश करें जो लो प्राइज में होने के साथसाथ वहां की स्पैशल हों.

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जेब देखें, स्वाद नहीं

अकसर टीनएजर्स के मन में कुछ नया ट्राई करने की इच्छा रहती है और इसी के चलते जब भी वे कहीं बाहर घूमने जाते हैं तो वहां लोगों से पूछते हैं कि यहां फेमस क्या चीज है. अगर किसी ने उन्हें बता दिया कि यहां से 20 किलोमीटर दूर एक रैस्टोरैंट है जहां का खाना बहुत बढि़या होता है तो फिर तो वे खुद को रोक नहीं पाते और किराया लगा कर वहां पहुंच जाते हैं. भले ही उन्हें इस के लिए ऐक्स्ट्रा पैसे खर्च करने पड़ें. लेकिन अगर वे जहां ठहरे हुए हैं वहीं आसपास खाना वगैरा खा लें तो उन के काफी पैसे बच सकते हैं. इस तरह आप पैसों की काफी बचत कर पाएंगे.

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