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राखी सावंत ने फिर दिया विवादित बयान, हो रही हैं ट्रोल

भाजपा के दिग्गज नेता और देश के पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के निधन पर कंट्रोवर्सी क्वीन राखी सावंत ने एक वीडियो संदेश जारी किया है, जिसके बाद से सोशल मीडिया पर उन्हें यूजर्स काफी  ट्रोल कर रहे हैं.

इस वीडियो में राखी कह रही हैं, नमस्कार! दोस्तों.. जेटली जी, जो बीजेपी के नेता हैं. वो हमारे बीच में नहीं रहे. मैंने तो एक हफ्ते पहले नहीं, 10 दिन पहले ही कह दिया था. मुझे कभी कभी ऐसे स्वप्न आते हैं. मुझे पता चल जाता है. पता नहीं ये इश्वरीय ताकत है. भगवान का शुक्रिया, कि मुझे ईश्वरीय ताकत है.”

वीडियो में राखी सावंत अरुण जेटली को श्रद्धांजलि भी देती नजर आ रही हैं. वो कहती हैं कि उनकी आत्मा को शांति मिले. राखी ने कहा कि जेटली जी को पूरा हिंदुस्तान याद रखेगा. लेकिन निधन के बारे में पहले से पता होने की बात कहकर राखी ट्रोल के निशाने पर आ गईं. सोशल मीडिया पर राखी को यूजर्स जमकर ट्रोल कर रहे हैं.

एक यूजर ने कमेंट किया, ‘दीदी ये बताओ कि आपका टाइम कब आएगा.’ वही दूसरे यूजर ने लिखा है कि ‘मेरे भी सपने लेकर देखना कि मैं यूएसए जा सकती हूं कि नहीं.’ ऐसे कई सारे कमेंटस यूजर्स ने राखी के इस पोस्ट किए हैं.

आपको बता दें, अपने विवादित बयानों से चर्चा में रहने वाली मशहूर आदाकारा राखी सावंत ने  हाल ही में शादी की  हैं. उन्होंने अपने फैन के साथ शादी रचाई हैं. उनके पति का नाम रितेश है. रितेश यूरोप के रहने वाले हैं. ये एक एनआरआई बिजनेस मैन हैं.

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सुंदरवन: सुंदरता का खजाना

दुनिया का सब से बड़ा मैनग्रोव का जंगल आप को सुंदरवन में हीं मिलेगा. कहते हैं यहां का घना जंगल रोमांचित कर देता है क्योंकि रौयल बंगाल टाइगर आप को कहीं भी और कभी भी दिख सकता है. यह रोमांच सुंदरवन यात्रा के दौरान पूरे समय तक बना रहता है.

सुंदरवन की अपनी यात्रा को 2 भागों में बांट लें. एक तरफ सुंदरवन बायोस्फियर रिजर्व का भगवतपुर लोथियान द्वीप, बोनी कैंप, कलश कैंप और दूसरी तरफ सुंदरवन टाइगर रिजर्व का सजनेखाली, सुधन्यखाली, दोबांकी से ले कर बुड़ीरडाबरी तक. सुंदरवन का प्रवेशद्वार कोलकाता से 40 किलोमीटर की दूरी पर कैनिंग है. यहां से किराए पर लौंच ले कर घूमा जा सकता है.

सुंदरवन का मुख्य आकर्षण रौयल बंगाल टाइगर तो है ही, लेकिन इस के अलावा चीतल, हिरण, विभिन्न प्रजातियों के सांप और खूबसूरत पक्षियों का मेला है यहां. सुंदरवन के द्वीपों के बीच से छोटीछोटी और संकरी नदियों की धार भी यहां के आकर्षण हैं. यहां के लोग छोटी नाव के जरिए मछली और केकड़ा पकड़ने के लिए जाते हैं. संकरी नदियों के पार कहींकहीं विस्तृत मैदान हैं, जहां चीतल, हिरण विचरण करते हुए दिख जाएंगे. लेकिन इंसानी कदमों की आहट पाते ही वे चौकड़ी भर कर दूर निकल जाते हैं.

इन हिरणों में बाघ का आतंक भी कुछ कम नहीं है. वैसे सुंदरवन में ये हिरण ही बाघों की खुराक हैं. खुराक में कमी होने पर बाघ रिहायशी बस्ती पर हमला करते हैं. इसीलिए हिरणों की संख्या पर वन विभाग की नजर कुछ ज्यादा ही होती है. वैसे, प्राकृतिक रूप से अपने बचाव के लिए प्रकृति ने हिरणों को तेज गति दे रखी है.

सुंदरवन के लोग केवल अपने ही नहीं, पर्यटकों की सुरक्षा के लिए भी उस जगह अंगोछा लटका देते हैं जहां बाघ का किसी इंसान पर हमला होता है. ऐसा इसलिए कि सुंदरवन के लोगों का मानना है जिस जगह पर बाघ किसी इंसान का शिकार करता है, वहां बाघ कम से कम एक साल तक बारबार लौट कर आता है. अंगोछा लटका कर सुंदरवन निवासी पर्यटकों और दूसरे लोगों को खतरे से आगाह करते हैं.

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सुंदरी और मैनग्रोव

सुंदरवन में पर्यटन का सब से अच्छा समय है नवंबर से मार्च तक. यों तो हर मौसम में यह एक अलग रूप लेता है मगर इस की खूबसूरती बारिश के दिनों में अपने पूरे शबाब पर होती है. इसीलिए बारिश के मौसम में पर्यटन का पैकेज अलग होता है और कुछ टूर औपरेटर बारिश के दिनों में अपने पैकेज की घोषणा करते हैं. बहुत कम लोगों को पता है कि सुंदरवन का नाम यहां पाए जाने वाली सुंदरी पेड़ से ही पड़ा है.

गरमी के दिनों में चांदनी रात के दौरान सुंदरवन को देखना अपनी तरह का एक अलग अनुभव होता है. दरअसल, यहां आम दिनों में 2 बार ज्वारभाटा होता है. इस ज्वार और भाटे का अलग ही रूप होता है. मजेदार बात यह है कि ऐसे ज्वार के दिन जब सुंदरवन का बड़ा हिस्सा डूब जाता है, सारे वन्यजीव टापू में ऊंची जगह पर चले जाते हैं और भाटा होने पर खाने की खोज में वापस नीचे लौटते हैं. इसीलिए ज्वार के बाद भाटा के दौरान पर्यटक बड़ी तादाद में वन्यजीव देख पाते हैं.

दुनियाभर में सुंदरवन की ख्याति यहां के मैनग्रोव के कारण भी है. मैनग्रोव जंगल सुंदरवन की दलदली भूमि पर है. यहां के मैनग्रोव वाकई मुग्ध कर देते हैं. इन्हीं मैनग्रोव के कारण ही सुंदरवन यहां रौयल बंगाल टाइगर का ठिकाना बना. यह मैनग्रोव एक खास तरह की वनस्पति है, जो दलदली भूमि में पाई जाती है. इस की जड़ें जमीन के ऊपर नजर आती हैं, लेकिन जड़ों की अंतिम छोर पानी में पैठ बनाए होती हैं. इस से इसे नमी प्राप्त होती रहती है.

गाइड बगैर खतरा

सुंदरवन के इन जंगलों में टूर गाइड की बहुत जरूरत होती है. क्योंकि घने जंगल में भटक जाने का खतरा होता है. साथ ही, बगैर सावधान रहे, हो सकता है भूखे बाघ से सामना हो जाए. सुंदरवन के गांवों में अकसर ऐसे बाघों का हमला होता है. वहीं, जंगल से शहद इकट्ठा करने वाले, मछली और केकड़ा पकड़ने वालों की भी बाघ से अचानक टक्कर हो जाती है.

वैसे, सुंदरवन जाना हो तो कोलकाता में बहुत सारे टूर औपरेटर मिल जाएंगे, जो लांच में एक गाइड के साथ सुंदरवन घुमा कर दिखा देते हैं. बेहतर है कि राज्य सरकार के पर्यटन विभाग से फौरेस्ट बंगला बुक कर लिया जाए.

2 दिन व 1 रात के लिए प्रति व्यक्ति लगभग 4 हजार रुपए का खर्च पड़ता है. इस के अलावा राज्य पर्यटन विभाग का एक और भी पैकेज है 3 दिन 2 रात का, जिस का खर्च प्रतिव्यक्ति लगभग साढ़े 5 हजार रुपए आता है. सुंदरवन पर्यटन की शुरुआत डब्लूबीटीडीसी के दफ्तर से होती है.

उम्दा शहद

सुंदरवन में अगर खरीदारी करना चाहते हैं तो यहां के जंगलों में बहुत उम्दा शहद पाए जाते हैं. अगर शहद मिल जाए तो जरूर ले लें, क्योंकि यह ताजा और विशुद्ध शहद होता है.

मछली के कई व्यंजन

सुंदरवन में खाने की बात की जाए तो यह जगह विभिन्न किस्म की मछलियों के लिए जानी जाती है. मछली की तरहतरह की डिशेज आसानी से मिल जाती हैं-कोई माछ, चितल माछ, पाबदा माछ, भेटकी, हिलसा के अलावा चिगड़ी, जिसे आमतौर पर झींगा भी कहा जाता है. यहां रेस्तरां में बंगाल की प्रसिद्ध डिशेज मिल जाएंगी-सरसों इलिश यानी सरसों हिलसा, दही हिलसा, हिलसा बिरयानी, मुड़ीघंटों दाल (मछली का सिर डाल कर दाल की एक विशेष रैसिपी), हिलसाकोचू साग (हिलसा और अरबी का साग), पाबदा माछेर झाल (पाबदा मछली की तीखी करी), हिलसा टौक (हिलसा मछली की खट्टा डिश), आलू भाजा, आलू पोस्ता (खसखस), पोस्तो चिंगड़ी (खसखस झींगा मछली की डिश), पोस्तो बड़ा (खसखस का पकौड़ा), टेंगड़ा माछेर झोल, बेगून भाजा, भेटकी मछली की फिश फ्राई और फिश कटलेट आदि. अपनी पसंद की कोई भी डिश चुन सकते हैं. इन के साथ उबले चावल, पापड़ और टमाटरखजूर की चटनी का मेल आप को भाएगा.

कोलकाता में हैंगआउट

पश्चिम बंगाल की संस्कृति में रचाबसा है अड्डा कल्चर. जाहिर है कोलकाता में हैंगआउट के लिए जगह की कमी नहीं है. एक ढूंढ़े तो हजारों मिल जाएंगी. अगर बौद्धिक हैंगआउट की चाह हो तो कालेज स्ट्रीट में कलकत्ता विश्वविद्यालय और प्रैसिडैंसी विश्वविद्यालय के करीब कौफी हाउस हैं. यहां हर टेबल में रखे हुए चायकौफी के कप में देशदुनिया के हर किस्म के मुद्दे पर उफान उठता है. यहां हर उम्र, हर पेशे और हर सामाजिक स्टेटस के लोगों का अड्डा मिल जाएगा.हैंगआउट के लिए दूसरी जगह है भवानीपुर में फोरम, चाय ब्रैक और हमारो मोमो. यह मोमो के लिए प्रख्यात है. यहां अकसर स्टूडैंट आ कर हैंगआउट करते हैं. इस के अलावा सौल्टलेक और राजारहाट में सिटी सैंटर भी हैंगआउट के लिए अच्छी जगह  है. यहां कोई भी हैंगआउट कर सकता है. इस के अलावा युवा जोड़े के लिए न्यू टाउन में ईको पार्क, विक्टोरिया मैमोरियल, रवींद्र सरोवर के आसपास हैंगआउट किया जा सकता है. इन हैंगआउट के लिए इन जगहों पर फिशफ्राई, चिकन और फिश कविराजी, चाउमिन, चिकन रोल से ले कर मोमो तक का मजा लिया जा सकता है.

इस के अलावा पार्क स्ट्रीट में ईटिंग आउट के लिए बेहतर पीटर कैट, आइरा में मकमल कोफ्ता, पनीर केशरी कबाब, तवा फिश, मुर्ग अफ्सा, आतिशे तंदूरी के लिए जाना जाता है. पार्क स्ट्रीट में ही है वेदा. यहां मुर्ग सीक, वेदा में मोंटे कार्लो, क्लासिक प्रौन कौकटेल आदि विख्यात डिशेज हैं. वहीं, डलहौजी में द ब्रिज फ्लोटेल है, जो कि हुगली नदी पर फ्लोटिंग रेस्तरां है. यहां इंडियन, कौंटीनैंटल, चायनीज डिशेज के अलावा तंदूरी से ले कर बंगाल की पारंपरिक डिशेज मिल जाएंगी. वहीं, मध्य कोलकाता में है ओह कोलकाता, जो कि खाने में अपने स्थानीय फ्लेवर के लिए जाना जाता है. यहां हर तरह की इंडियन, एशियन डिशेज के साथ वीगन फूड का भी विकल्प उपलब्ध है. सौल्टलेक में नलवन, वाटरसाइड कैफे, बटर चिकन, आलू अमीनाबादी, बाटी चिंगडी के अलावा बर्गर, सैंडविच और सलाद की बहुत सारी वैरायटियां मिल जाती हैं. राजारहाट के तमारा की विख्यात डिशेज हैं इटैलियन फिश पिकाटा, ग्रैंड सीफूड प्लैटर और क्रिस्पी कालामारी पेपर सौल्ट.

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पश्चिम बंगाल की मशहूर मिठाइयां

पश्चिम बंगाल का नाम लेते ही रसगुल्ला और संदेश की याद बरबस आ ही जाती है. पर्यटन के लिए कोलकाता ही नहीं, बंगाल के किसी भी कोने में हों, रसगुल्ला और संदेश कहीं भी मिल जाएंगे. इसीलिए जब कभी इधर आना हो तो अपने एजेंडे में मिठाई को जरूर रखें. रसगुल्ला और संदेश की बहुत सारी किस्में हैं, जो कोलकाता की गलीमहल्लों की मिठाई की दुकानों पर मिल तो जाती हैं, लेकिन कुछ खास दुकानें हैं जहां के रसगुल्ले, संदेश, मिस्टी दोई खाए बगैर बंगाल की मिठाइयों के स्वाद का पता नहीं चलेगा. बंगाल की किसी भी तरह की मिठाई का स्वाद चखने के लिए गिरीश चंद्र दे ऐंड नोकुड़ चंद दे, केसी दास, चितरंजन मिष्ठान भंडार, बलराम मल्लिक, द्वारिका, नलिन चंद्र दास, मौउचाक, हिंदुस्तान स्वीट, सेन महाशय, भीमचंद्र नाग का रुख किया जा सकता है.

इन सभी दुकानों पर गुलाब पत्ती, नलेन गुड़ेर संदेश, आइसक्रीम संदेश के अलावा संदेश की और भी बहुत सारी किस्में होती हैं. संदेश के अलावा लबंग लतिका, सीताभोग, खीर कदम, छेनार जलेबी, पापंतुआ और इमरती का भी स्वाद लिया जा सकता है. अब अगर रसगुल्ला जैसी रसदार मिठाई की बात की जाए तो बंगाल में और भी बहुत सारी मिठाइयां हैं, मसलन काला जामुन, गुलाब जामुन, लेडीकेनी, लैंगचा, कमलाभोग, मलाई चमचम, रसमलाई, राजभोग और सौर (मलाई) भाजा. इन्हें भी जरूर चखना चाहिए.

अंधविश्वास फैलाता अंतिम संस्कारों का लाइव टेलीकास्ट

तमाम न्यूज चैनल ने पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के अंतिम संस्कार का सीधा प्रसारण जिस तरह श्मशान घाट से दिखाया वह संवेदनहीनता और फूहड़ता की हद थी. ऐसा लग रहा था मानो टीआरपी बढ़ाने के इस नए टोटके ने चैनल से सोचने समझने की बुद्धि और क्षमता छीन ली है. उन्हें खुद नहीं मालूम था कि वे ऐसा करके क्या मैसेज दर्शकों को देना चाह रहे हैं. हां इतना जरूर समझ आया हर किसी की प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की होड़ ने अरुण जेटली की जितनी किरकिरी उनके निधन के बाद करवाई उतनी उनके जिंदा रहते शायद ही कभी हुई हो.

किसी दिग्गज राजनेता के अंतिम संस्कार को यूं लगातार घंटों दिखाना न तो उसके प्रति सच्ची श्रद्धा या श्रद्धांजलि कही जा सकती और न ही इसे मीडिया की भाषा में न्यूज आइटम कहा जा सकता क्योंकि सभी चैनल के एंकर दर्शकों को बांधे रखने की कमेंटरी इस तरह कर रहे थे मानो यह क्रिकेट फुटबौल या हौकी का रोमांचकारी मैच हो या फिर कोई इवेंट हो. सीधे प्रसारण में चूंकि दृश्य सभी चैनल में समान होते हैं इसलिए एंकर दर्शकों को अपने चैनल पर रोके रखने अपनी कमेंटरी को हथियार बनाने की कोशिश करते रहते हैं.

इस प्रतिनिधि ने कोई 20 मिनिट चैनल बदल बदल कर उनकी मंशा समझने की कोशिश की तो लगा कि इन्होने ही अंधविश्वास फैलाने की जिम्मेदारी अपनी स्क्रीन पर उठा रखी है. कोई गीता का जिक्र करते आत्मा परमात्मा का राग आलाप रहा था तो कोई गरुड पुराण बांच रहा था . एक विद्वान एंकर तो बता रहे थे कि कपाल क्रिया क्या होती है और मुखाग्नि के समय इंद्र देवता पानी क्यों बरसाते हैं. एक चैनल के ज्ञानी महिलाओं के शमशान में होने पर सिक्ख और हिन्दू धर्म की मान्य-अमान्य परम्पराओं पर व्याख्यान देते अपना अधकचरा ज्ञान बघारते दिखे तो दूसरे बैराग्य का व्याकरण खोल कर बैठे दर्शकों को लुभाने की कोशिश करते नजर आए.

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ऐसी कई बेहूदी और बेतुकी बातों से महसूस हुआ कि ये लोग एंकर या पत्रकार कम प्रयाग और गया के पंडे ज्यादा हैं जो चरणबद्ध तरीके से अंतिम संस्कार का आखों देखा हाल सुनाकर अपनी दुकान चमका रहे हैं. पत्रकारिता के कारोबार की साख पर बट्टा लगा रहे इन न्यूज चैनल वालों ने दरअसल में पत्रकारिता के धर्म को ध्यान में नहीं रखा. अरुण जेटली के पहले सुषमा स्वराज और अटल बिहारी बाजपेयी के अंतिम संस्कारों पर भी इसी तरह के स्वांग रच कर उनका बड़े सभ्य, आभिजात्य और स्वीकृत तरीके से मखौल उड़ाया गया था.

किसी भी दिग्गज के अंतिम संस्कार की कुछ झलकियां दिखाकर भी अपनी जिम्मेदारी ये पूरी कर सकते हैं लेकिन बात जब धंधे की हो तो इन्हें कहां संवेदनाओं और शोक से कोई सरोकार रह जाता है. इनके लिए तो अंतिम संस्कार भी पैसा बरसाऊ साबित होता है जिसे देख तरस ही खाया जा सकता है कि यही हमारी महान संस्कृति और धर्म है कि मरने पर भी राजस्व झटकने का मौका मत छोड़ो क्योंकि एक पैसे को छोड़कर बाकी सब नश्वर है. मृतक की लोकप्रियता को जितना हो सके सुनाओ यही परम सत्य है .

इस चक्कर में जानबूझकर अंधविश्वास फैलाये गए वेद, पुराणों, गीता, भागवत, संहिताओं और स्मृतियों का हवाला दिया गया जिससे कोई इनकी असल मंशा पर एतराज न जताए.

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आइए जानते हैं इस बारे में कुछ सुधी लेखकों की राय… 

गीता यादवेंदु: इसी संदर्भ में मंटो की यह उक्ति उधृत की गई थी एक जगह. “मैं ऐसे समाज पर हजार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल हो कि मरने के बाद हर शख्स के किरदार को लौन्ड्री में भेज दिया जाए जहां से वो धुल-धुलाकर आए.” ( सआदत हसन मंटो)

पल्लवी: मृत्यु हो गई, ठीक है, सूचना जरूर दो, चाहे तो प्रोग्राम दे दो एक. किन्तु ऐसा लग रहा था जैसे सभी ने संवेदनाएं ऐसे समय के लिए बचा कर रखी हों. फेसबुक, वाट्सएप अथवा टी वी चैनल, सभी जगह. व्यक्ति पूजन तो मनुष्य का स्वभाव बन गया है, इससे निकलना नामुमकिन सा लगता है. देश हो अथवा विदेश, यह रोग तो सांझा है, हां किन्तु भारत में तो मूर्खता की हद पार हो जाती है.”

सुधा जुगरान: “मृत्यु उपरांत चाटुकारिता दिवंगत नेता को तो चाहे कुछ दें न दें पर चाटुकारों को दो चार टहनियां ऊपर जरूर चढ़ा देता है. राजनीति के क्षेत्र में चाटुकारों का इतिहास तो बहुत पुराना है. फिर नेता दिवंगत हो या जीवित. कुछ की रोटी चाटुकारिता से भी सिंकती है. सबके अपने स्वार्थ हैं.”

पूनम अहमद: “नेता चाहे जीवित हो या मृत, उनकी चाटुकारिता ऐसे की जाती है कि सारी हदें पार हो जाती हैं,  इनकी मृत्यु के बाद भी कुछ लोग यही सोचते हैं कि जाते जाते भी कुछ फायदा अभी भी हो ही जाए, सोशल मीडिया पर होने वाली पोस्ट्स को देखकर तो हैरानी होती है,  मतलब कोई भी प्लेटफार्म मिले, दिखावे का मौका न छूटे.”

शालू दुग्गल: “कोई भी हो मौका नही छोड़ता… अटल जी को लोटा में ले कर पूरे भारत मे घुमाया, शीला जी पर 2 दिन तक टीवी पर समाचार नहीं शोक चलता रहा… सिर्फ फायदा उठना चाहते है शायद सहानभूति के कुछ वोट ज्यादा मिल जाए.”

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इस बौलीवुड एक्ट्रेस के दिवाने हैं ‘बाहुबली’ प्रभास, कपिल के शो में किया खुलासा

सुपरस्टार प्रभास फिल्म बाहुबली 2 में नजर आए थे. यह फिल्म 2017 में रिलीज हुई थी और इसने कमाई के मामले में कई  ब्लौबस्टर फिल्मों को पीछे छोड़ दिया था. अब वे 2 साल बाद वह एक्शन-थ्रिलर फिल्म साहो लेकर आ रहे हैं. यह 30 अगस्त को रिलीज होने वाली है.  इस फिल्म का ट्रेलर जारी हो चुका है जिसे दर्शक काफी पसंद कर रहे हैं.

इस फिल्म में श्रद्धा कपूर, प्रभास के अपोजिट नजर आएंगी. दोनों सितारों ने फिल्म का प्रमोशन करने के लिए द कपिल शर्मा में पहुंचे. शो में दोनों स्टार्स से कपिल के कई दिलचस्प सवाल किए. जब प्रभास से पूछा गया कि बौलीवुड में उनका पसंदीदा एक्टर्स और एक्ट्रेस कौन हैं. तो उन्होंने बताया कि शाहरुख खान और सलमान खान के बहुत बड़े फैन हैं. और दीपिका पादुकोण और आलिया भट्ट फेवरेट एक्ट्रेस हैं. फेवरेय मूवी के बारे में भी प्रभास ने बताया. उन्हें आमिर खान की दंगल और अमिताभ बच्चन-धर्मेंद्र की ब्लौकबस्टर फिल्म शोले पसंद है.

शो में कपिल के बाद जज अर्चना पूरन सिंह ने भी प्रभास से कई सवाल पूछे. उन्होंने प्रभास से सवाल किया कि उनकी फेवरेट मूवी  कौन सी है? इसके बाद उन्होंने बताया कि वह और उनकी फिल्में देखना पसंद करते हैं. जब उनसे उनकी फेवरेट एक्ट्रेस का नाम पूछा गया.

इसके अलावा कपिल, प्रभास से पूछते हैं कि आपकी फिल्म साहो का बजट कितना है? इस पर प्रभास कहते हैं 350 करोड़. तो इस पर अर्चना पूरन सिंह और पूरी औडियंश हैरत में पड़ जाती हैं. वहीं कपिल शर्मा क्रू मेंबर को कहते हैं कि कोई चाय लेकर आओ मेरा बीपी लो हो रहा है. इसके बाद सभी जोर-जोर से हंसने लगते हैं.

इस फिल्म में चंकी पांडे, जैकी श्रौफ,  महेश मांजरेकर और नील नितिन मुकेश विलेन की भूमिका निभा रहे हैं. श्रद्धा कपूर इस फिल्म में क्राइम ब्रांच औफिसर का किरदार निभा रही हैं.

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इंडो इजरायल कल्चरल फेस्टिवल 2019: धूम मचाने वाले हैं ये तीन स्टार्स

भारत और इजराइल के बीच आपसी और दोस्ताना संबंध काफी गहरे हैं. इसी को और मजबूत करने के लिए अब दोनो देशों  के बीच सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन किए जाने की योजना पर काम शुरू हुआ है. गत वर्ष गोवा में आयोजित ‘‘भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह’’ में इजराइल को खास तवज्जो देते हुए इस देश की कई फिल्मों का प्रदर्शन किया गया था.  इस फिल्म समारोह के दौरान इजराइल कौंसुलेट ने काफी योगदान दिया था. उसके बाद फिल्मकार सुधीर मिश्रा ने इजराइली वेब शो ‘‘होस्टेज’’को हिंदी में अडौप्ट किया.

अब दोनों देशों के बीच कला व संस्कृति के क्षेत्र में और अधिक सहयोग बढ़ाने के मकसद से भारत के मशहूर इवेंट और्गनाइजर ‘युनिवर्सल इवेंट्स‘ ‘रिसर्च मीडिया ग्रुप‘  के सहयोग से इजरायल में ‘इंडो इजरायल फेस्टिवल-2019’  का आयोजन 15 से 17 अक्टूबर 2019 तक आयोजित करने जा रहा है. इस ‘‘इंडो इजराइल फेस्टिवल 2019’’ साहित्य व अन्य क्षेत्रों के अलावा बौलीवुड व दक्षिण भारत की कई फिल्मी हस्तियां हिस्सा लेने के लिए इजराइल जाएंगी. इस फेस्टिवल के मुख्य अतिथि अनिल कपूर के अलावा रवीना टंडन और अमिषा पटेल होंगे.

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इजराइल में संपन्न होने वाले इस ‘‘इंडो इजराइल फेस्ट 2019’’ में मुख्य अतिथि बनकर अनिल कपूर उस कड़ी को मजबूत करने वाले हैं, जिसे सोनम कपूर ने तीन साल पहले शुरू किया था. मई 2016 में अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर ‘इजराइली ट्यूरिजम मिनिस्ट्री’’ के निमंत्रण पर इजाइल गयी थीं. उसके बाद सोनम कपूर ने एक पत्रिका के मुख्य पृष्ठ के लिए इजराइल में फोटो  शूट भी करवाया था.

इतना ही नही अक्टूबर 2017 में पहली बार किसी भारतीय फिल्म को इजराइल में फिल्माया गया.जब फिल्मकार तरूण मनसुखानी ने अपनी एक्शन प्रधान फिल्म ‘‘ड्राइव’’ के लिए पार्टी सीन व कुछ अन्य दृश्य इजराइल के तेल अवीव शहर में फिल्माएं.

‘‘इंडो इजराइल फेस्ट 2019’’ के लिए मुंबई अंधेरी (वेस्ट) स्थित ‘कंट्री कल्ब’ में एक भव्य प्रेस कौफ्रेंस कर फेस्टिवल के पोस्टर को लांच किया गया. इस अवसर पर बौलीवुड और टौलीवुड की चर्चित अदाकारा पायल घोष ने इस पोस्टर को लांच किया. इसके बाद पायल घोष ने कहा- ‘‘इस तरह के फेस्टिवल से देश की संस्कृति, कला और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा.’’

इस प्रेस कौफ्रेंस में ‘युनिवर्सल इवेंट्स’ के डायरेक्टर मोसेज कूर्मा, रिसर्च मीडिया ग्रुप के चेयरमैन चैतन्य जंगा, आरएमजी के एक्सिकेटिव डायरेक्टर पीवीएस वर्मा,  आरएमजी के सीईओ हरि लीला प्रसाद, अभिनेत्री पायल घोष, प्रियंका रेवड़ी, समायरा खान सहित कई हस्तियां मौजूद थीं.

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‘‘यूनिवर्सल इवेंट्स’’के डायरेक्टर मोसेज कुर्मा ने कहा -‘‘अनिल कपूर जी ने फेस्टिवल के मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करने के लिए हामी भरी है. अनिल कपूर जी की उपस्थिति कला और संस्कृति को प्रोत्साहित करने में बहुत मदद करेगी. अनिल कपूर, रवीना टंडन व अन्य हस्तियों के इस फेस्टिवल में पहुंचने से इजरायल में रहने वाले भारतीय समुदाय के लोगों में जोश भरने का काम होगा. हम इस फेस्टिवल को बहुत बड़े भव्य पैमाने पर आयोजित करने के लिए दिन रात काम कर रहे हैं. इससे दोनों देशों के बीच भाईचारा बढ़ेगा और पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलेगा.‘‘

रिसर्च मीडिया ग्रुप के चेयरमैन चैतन्य जंगा ने इस अवसर पैर कहा, ‘‘इंडो इजरायल सांस्कृतिक संबंध के इतिहास में यह पहला और सबसे बड़ा आयोजन होने जा रहा है. इस फेस्टिवल के जरिए भारत की कला, संस्कृति और पर्यटन को एक नया मुकाम मिलेगा.‘‘

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6 टिप्स: ऐसे जानें अपने रिश्ते की गहराई

दुनिया के कई करोड़ लोगों में से अपने लिए एक सच्चे साथी को चुनना आसान नहीं होता है. अगर आप ने अपने लिए किसी को चुन भी लिया है तो क्या आपको पता है यह वही इंसान है जो आपके लिए सही है. आपके लिये यह जानना जरुरी है कि आप जिस के साथ अपनी जिंदगी बिताने वाले हैं या बिताना चाहते हैं वह सही मायनों में आपका पार्टनर बनने लायक है. यह जाने बिना रिश्ते को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा. अगर आप जानना चाहते हैं कि आपके रिश्ते में कितनी गहराई है तो ये कुछ संकेत हैं जो आपकी मदद कर सकते हैं.

  1. आपमें आपसी समझ हो: अगर आप अपने पार्टनर के साथ पूरी जिंदगी बिताना चाहते हैं तो आपके बीच आपसी समझ होनी चाहिए. आपको अपने पार्टनर की हर अच्छी-बुरी चीज के बारे में पता होना चाहिए. ऐसा न हो कि जो आप चाहते हैं वो आपका साथी नहीं चाहता हो. अगर आप अपने रिश्ते में आगे बढ़ना चाहते हैं और आपका पार्टनर ऐसा नहीं सोचता हैं तो हो सकता है कि आपको अभी एक-दूसरे को समझने की जरुरत है क्योंकि आप दोनों एक-दूसरे के गोल्स को अच्छे से जानते ही नहीं हैं.
  2. मोरल सपोर्ट देते हैं: इस बात का ध्यान जरूर रखना भी रिश्ते में जरुरी है कि आपके पार्टनर को कई स्थितियों में मॉरल सपोर्ट की जरूरत होती है. ऐसा करने से आप-दोनों के रिश्ते मजबूत बनेंगे. परेशानी और अकेलापन महसूस करने की स्थिति में आप अपने साथी को मॉरल सपोर्ट दे. इससे वो समझेंगे कि वो आपके लिये कितना मायने रखते हैं.
  3. एक-दूसरे की कंपनी एंजाय करना: जब भी आप अकेले हो तो कुछ ऐसा करें जिससे आप एक-दूसरे की कंपनी एंजॉय कर सके. एक-दूसरे का साथ रहना अच्छा लगे. साथ में गेम खेले, बाहर कॉफी पीने जाएं या फिर कही लॉन्ग ड्राइव पर जाएं. ऐसा करने से आप दोनों को अच्छा लगेगा और आप एक दूसरे के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिता पाएंगे. आपके बीच की दूरी तो कम होगी ही साथ ही एक बॉन्ड भी विकसित होगा जो कि पहले से मजबूत होगा.
  4. पार्टनर पर भरोसा करना: किसी भी रिश्ते की नींव भरोसे पर टिकी हुई होती है. अगर आपको अपने पार्टनर पर भरोसा ही नहीं है तो उस रिश्ते का कोई मतलब भी नहीं होता है. अगर आपको किसी बात पर शक है तो आप अपने पार्टनर से सीधे जाकर पूछ लें ना कि उनकी जासूसी करें. जासूसी करना मतलब आप अपने साथ-साथ अपने पार्टनर का भी अपमान कर रहे हैं और साथ-साथ लोगों को अपना मजाक बनाने का मौका भी दे रहे हैं. एक-दूसरे से कोई बात न छुपाएं और एक दूसरे पर भरोसा रखें.
  5. आप परफेक्शन की उम्मीद नहीं करते: अगर आपके पार्टनर से कोई गलती हो जाती है और आप बार-बार उन्हें उनकी गलती याद नहीं दिलाते हैं और आपका साथी भी आपके साथ ऐसा ही करता है तो इसका मतलब है आप एक-दूसरे के साथ इस रिश्ते में खुश हैं. ऐसा करते हुए आप जानते हैं कि कोई भी इस दुनिया में परफेक्ट नहीं होता है. जिस तरह आप गलतियां करते हैं तो आपका साथी आपकी गलती को भूला देता है इसी तरह आपको भी इस और पहल करनी चाहिए. साथ ही ये बात आपके पार्टनर भी लागू होती है. अगर ऐसा है तो फिर आप को किसी तरह के बदलाव की जरुरत नहीं है. आप एक सही रिश्ते की नींव रख चुके हैं.
  6. रिश्ते में स्पेस दें: अपने साथी को उसकी निजी जिंदगी के लिये समय देना भी एक अच्छा संकेत होता है. अगर आप ऐसा करते हैं को आप सही रिश्ते की ओर आगे बढ़ रहे हैं. जरुरत से ज्यादा एक-दूसरे की लाइफ में दखल देना अच्छा नहीं होता है. हर इंसान को थोड़ी आजादी चाहिए होती है. हम में से कोई भी किसी भी रिश्ते में बंधना नहीं चाहेगा. अगर आप पूरा समय अपने साथी के साथ ही रहेंगे तो फिर स्पेशल जैसा कुछ रहेगा ही नहीं. थोड़ी दूरी भी होनी चाहिए तब ही आप एक-दूसरे को मिस भी करेंगे.

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प्रेसबायोपिया: आंखों की रोशनी कमजोर न हो

प्रेसबायोपिया या लैंस के सामंजस्य की क्षमता का खत्म हो जाना उम्र के साथ होने वाला सामान्य परिवर्तन है. यह लोगों को 40 वर्ष की उम्र के बाद प्रभावित करता है. हालांकि, मोबाइल फोन और इसी तरह के गैजेट्स का प्रयोग करने से अब यह लक्षण उम्र से पहले ही नजर आने लगा है. यह नजदीक में नजर केंद्रित करने को कठिन बना देता है, खासकर छोटे अक्षरों और कम रोशनी में.

प्रेसबायोपिया के शुरुआती चरण में व्यक्ति फोन या किताब को कुछ दूर तक रख सकता है. व्यक्ति कुछ स्थितियों में, यहां तक कि लंबे हाथ वाले व्यक्ति भी, लंबे समय तक मैन्यू के छोटे अक्षरों को नहीं पढ़ सकते. साथ ही, नजदीक का काम करने जैसे कढ़ाई या हाथों से लिखने पर प्रभावित लोगों को सिरदर्द, आंखों पर दबाव या थकान महसूस हो सकती है. यह वह स्थिति होती है जब लोगों को मदद की या फिर नेत्ररोग विशेषज्ञ से मिलने की जरूरत हो जाती है.

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क्या हैं लक्षण

आमतौर पर प्रेसबायोपिया व्यक्ति के 40 वर्ष की उम्र की शुरुआत या मध्य में शुरू होता है, जब लोगों का ध्यान जाता है कि उन्हें मोबाइल पर नंबर टाइप करने या किताब पढ़ने में परेशानी महसूस हो रही है. जो लोग पास की चीजों को देखने की गतिविधि रोजाना करते हैं, उन्हें इस बात का पता जल्दी चल जाता है और वे जल्द ही इस की शिकायत करते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि आजकल मोबाइल फोन और टेबलेट्स के अत्यधिक इस्तेमाल करने से लोगों को जल्द ही सुधारात्मक चश्मे लग जाते हैं, यहां तक कि 37-38 साल की उम्र में ही.

बता दें कि एस्टीमैटिज्म (दृष्टिवैषम्य), नियरसाइटेडनैस (निकटदृष्टि दोष) और फारसाइटेडनैस (दूरदृष्टि दोष) के रूप में प्रेसबायोपिया में अंतर पाया जा सकता है, जोकि आंखों की पुतलियों के आकार से संबंधित हैं और आनुवंशिक व पर्यावरणीय कारणों से होते हैं. यदि पास की धुंधली नजर आप को पढ़ने, नजदीक के काम करने या अन्य सामान्य गतिविधियों को करने से रोक रही है तो आंखों के डाक्टर को दिखाएं.

क्या है इलाज

प्रेसबायोपिया को ठीक करने के लिए कोई भी बेहतर तरीका नहीं है. इस में सुधार का सब से सही तरीका आप की आंखों और आप की जीवनशैली पर निर्भर करता है. आप को अपने नेत्ररोग विशेषज्ञ से अपनी जीवनशैली के बारे में जरूर चर्चा करनी चाहिए, ताकि यह निर्णय लिया जा सके कि कौन सा सुधार आप के लिए सब से ज्यादा ठीक हो सकता है.

चश्मा : बायफोकल या प्रोग्रैसिव लैंस के साथ वाले चश्मे प्रेसबायोपिया में सुधार के लिए सब से आम होते हैं. बायफोकल का मतलब है जिस में 2 फोकस लैंस होते हैं. चश्मे के लैंस का प्रमुख भाग दूरदृष्टि दोष के सुधार के लिए होता है, जबकि लैंस का निचला हिस्सा निकटदृष्टि दोष की अत्यधिक परेशानी में निकट का काम करने के लिए होता है. प्रोग्रैसिव प्रकार के लैंस बायफोकल लैंस के समान होते हैं लेकिन दोनों सुधारों या उपचारों के बीच होने वाले लगातार बदलाव के लिए उपयुक्त होते हैं, जिस में उन के बीच कोई लकीर नजर नहीं आती. यदि आप कौन्टैक्ट लैंस लगाते हैं तो आप के नेत्ररोग विशेषज्ञ पढ़ने के लिए चश्मे की सलाह दे सकते हैं. इन्हें आप तब लगा सकते हैं जब कौन्टैक्ट लगे हुए हों, उन की जांच नियमित रूप से होती रहे, खासकर 50 वर्ष की आयु के बाद.

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सर्जरी : प्रेसबायोपिया का उपचार करने के लिए कंडक्टिव कैरेटोप्लास्टी या कौर्नियल इन लेज जैसे सर्जरी के विकल्प मौजूद हैं. इस के अलावा, लेजर का प्रयोग मोनोविजन तैयार करने के लिए किया जा सकता है, जिस में एक आंख के निकटदृष्टि दोष को ठीक किया जाता है, जबकि दूसरी आंख दूरदृष्टि के लिए मजबूत बनाई जाती है.

एक अन्य प्रभावशाली प्रक्रिया है जो रिफ्रैक्टिव लैंस एक्सचेंज के रूप में जानी जाती है. यह आंख के विजन को स्पष्ट बना सकती है लेकिन कड़े प्राकृतिक लैंस के साथ. यह एक कृत्रिम प्रेसबायोपिया सुधार लैंस है जो मल्टीफोकल विजन या बहुकेंद्रक दृष्टि के लिए होता है.

यह आवश्यक रूप से मोतियाबिंद की सर्जरी है. लेकिन यह उन लोगों पर की जाती है जिन्हें मोतियाबिंद तो न हो लेकिन सभी प्रकार के दूरदृष्टि दोष हों.

बहरहाल, आंख की किसी भी समस्या को नजरअंदाज न करें. जब भी आप को महसूस हो कि आप की आंखें सामान्य से कम कार्य कर रही हैं तो नेत्ररोग विशेषज्ञ को जरूर दिखाएं.

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(लेखक नई दिल्ली स्थित सैंटर फौर साइट के निदेशक हैं)         

स्कूल ड्रेस का धंधा

शिक्षण संस्थानों का नया सैशन शुरू होते ही अभिभावकों की भागदौड़ शुरू हो जाती है. कौपीकिताब के साथसाथ बच्चों के लिए स्कूलों द्वारा निर्धारित ड्रेस खरीदना आवश्यक होता है. अधिकतर स्कूलों द्वारा ड्रेस के लिए कुछ दुकानें अधिकृत कर दी जाती हैं और पेरैंट्स के लिए वहीं से अपने नौनिहालों के वास्ते ड्रेस खरीदना अनिवार्य रहता है.

मंगला अपने बेटे के लिए शर्ट खरीद रही थीं. शर्ट का कपड़ा और उस का मूल्य देख कर वे दुकानदार से नाराज हो कर बोलीं, ‘‘क्यों भैया, आप ने तो एकदम लूट मचा रखी है. इतने बेकार कपड़े की शर्ट और दाम 400 रुपए? यह तो 200 रुपए से ज्यादा की नहीं है.’’

‘‘मैडम, नाराज मत होइए. इस दाम में यही कपड़ा है. हम लोगों को जो थोक व्यापारी देते हैं, वही हम लोग आप को देते हैं. हम लोगों की भी अपनी मजबूरी होती है.’’

तभी पास में खड़ी कविता बोल पड़ी थी, ‘दीदी, ये लोग ड्रैस की कीमत तो ज्यादा रखेंगे ही, आखिर इन बेचारों को अपनी दुकानदारी बढ़ाने के लिए स्कूल वालों को खुश करना पड़ता है और इस के लिए इन्हें अपनी जेबें ढीली करनी पड़ती हैं. तभी ये लोग अधिकृत दुकानदार बन पाते हैं.’’

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स्कूलों की मनमानी

आजकल स्कूल वाले हर चीज में अपनी कमाई देखते हैं. हमारी मजबूरी है कि हमें अपने बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए इन सब के इशारों पर नाचना पड़ता है.

मेरे 2 बच्चे हैं. उन दोनों की पूरी ड्रैस खरीदने में महीने का सारा बजट बिगड़ जाता है, क्योंकि हर बच्चे को हफ्तेभर में 3 तरह की ड्रैस पहननी होती हैं. एक दिन पीटी ड्रैस, एक दिन हाउस ड्रैस और बाकी दिन स्कूल डै्रस. चूंकि बच्चे

कपड़े बहुत जल्दी गंदे करते हैं, इसलिए 2-2 सैट खरीदने पड़ते हैं.

मेरठ की अंकिता मोजवानी अपना दर्द साझा करते हुए कहती हैं, ‘‘तमाम सरकारी नियमों के बावजूद कईर् प्राइवेट स्कूल

खुद ही स्कूल ड्रैस बेच रहे हैं. कुछ स्कूल दुकानदारों से अच्छाखासा कमीशन लेते हैं, उस के बाद फिर उन्हें अपने स्कूल की ड्रैस बेचने का अधिकार प्रदान करते हैं.’’

जो ड्रैस बाजार में 300 रुपए की है, स्कूल का ठप्पा लगते ही सीधे उस की कीमत 1,000 रुपए तक पहुंच जाती है. दरअसल, स्कूलों और ड्रैस बेचने वाले कारोबारियों के बीच आपस में गठजोड़ है.

उदाहरण के लिए, भोपाल में स्कूल ड्रैस बनाने वाले छोटेबड़े करीब डेढ़ सौ सैंटर्स ने स्कूलों से गठजोड़ कर रखा है. एक कारोबारी ने अपना नाम न बताने की शर्त पर बताया कि उस के पास 30 प्राइवेट स्कूलों के और्डर हैं. स्कूल ड्रैस पर स्कूल का ‘मोनो’ जरूरी होता है, जोकि स्कूल से ही उपलब्ध करवाया जाता है. वे खुद को छोटा कारोबारी बताते हैं लेकिन जुलाई माह में लगभग 50 लाख रुपए तक का कारोबार कर लेते हैं. शहर में लगभग

325 बड़े स्कूल हैं. गली, महल्ले में सिमटे हुए निजी स्कूलों की संख्या करीब 700 है, जिन में 5 लाख से अधिक नौनिहाल पढ़ते हैं. स्कूल ड्रैस की मनमानी दरों से बच्चों के पेरैंट्स को जूझना पड़ता है.

गठजोड़ का खेल

स्कूल ड्रैस की सिलाई करने वाले मोहन कुमार का कहना है, ‘‘5वीं के छात्र की पैंट 95 सैंटीमीटर कपड़े में बन जाती है. इस के लिए जो कपड़ा उपयोग के लिए लिया जाता है, उस की क्वालिटी के अनुसार इतना बड़़ा कपड़ा केवल 100 रुपए में आ जाता है. शर्ट में

सवा मीटर कपड़ा लगता है, जो 80 रुपए में आता है. 120 रुपए सिलाई मिला कर एक स्कूल ड्रैस 300 रुपए में तैयार हो जाती है.’’

एक स्कूल ड्रैस विक्रेता का कहना है, ‘‘हम लोग सभी स्कूलों की ड्रैस तैयार करते हैं और सीधे पेरैंट्स को बेचते हैं. जबकि हकीकत यह है कि स्कूलों की मंजूरी के बिना कोई भी किसी स्कूल की ड्रैस नहीं बनाता. लागत के बाद जो राशि बचती है, वह दुकानदार और स्कूल के बीच में बंट जाती है.’’

जब प्रशासन से इस विषय में पूछताछ की गई तो उस का कहना है, ‘‘हां, स्कूल ड्रैस के कारोबार की शिकायतें मिली हैं. प्रशासन लगातार कोशिश कर रहा है कि पेरैंट्स अपनी पसंद की कीमत की स्कूल ड्रैस आदि खरीद सकें. हम इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए प्रयासरत हैं. हम इस पर कड़ी मौनिटरिंग कर रहे हैं. हमें इस ठगबंधन को तोड़ने में काफी सफलता भी मिली है. अब परैंट्स जागरूक हो रहे हैं. हम कारोबारियों और स्कूलों के आपसी ठगबंधन को तोड़ने में एक दिन अवश्य कामयाब होंगे.’

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टीचर्स की ड्रैस

अब कुछ राज्य सरकारों ने स्कूलों में टीचर्स के लिए भी ड्रैसकोड लागू किया है. सरकार का कहना है कि बच्चे अपनी टीचर को अपना रोलमौडल मानते हैं. उन की भड़कीली और उकसाऊ ड्रैस से बच्चों पर खराब असर पड़ता है.

अविका मिश्रा, जो ग्वालियर में रहती हैं, उदास मन से बोलीं, ‘‘मुझे तो हमेशा से फैशनेबल कपड़ों का शौक रहा है. मुझे तो अपने कालेज में ‘फैशन क्वीन’ का टाइटल भी मिला था. अब जौब में आई तो ड्रैस कोड के कारण रोज एक ही तरह की ड्रैस पहननी होगी.’’

2012 में एक आदेश निकाला गया था कि टीचर स्कूल में सिंपल कपड़े पहन कर आएं. लेकिन देखा गया कि फीमेल टीचर्स स्कूलों में तड़कभड़क वाले कपड़े पहन कर आती हैं. जैंट्स टीचर की भी फटी जींस और टाइट पैंट व टीशर्ट पर सरकार की नजर है.

टीचर के फैशनेबल कपड़े देख कर बच्चे भी अपने पेरैंट्स पर ऐसे कपड़े लाने का दबाव डालते हैं, जो गरीब मांबाप के लिए मुश्किल खड़ी करता है. और साथ ही, न मिलने पर बच्चों के मन में हीनभावना पैदा होती है.

टीचर्स की ड्रैसकोड के पीछे भगवा सोच भी है कि टीचर गुरु के समान तो है पर वह लीक से हट कर न सोचे, न पढ़ाए. ड्रैसकोड का अर्थ है कि आप विविधता का विरोध कर रहे हैं. अनुसंधान जो सफल हुए हैं इसलिए कि वे लीक से हट कर सोचने व करने की प्रेरणा देते हैं. ड्रैसकोड मानसिक गुलामी का एक रूप है जिस में जंजीर के  पैसे भी गुलाम ही देता है.

अनावश्यक रूप से लगभग सभी स्कूलों ने 6 दिनों में 3 तरह की ड्रैसेस अनिवार्य कर रखी हैं. पेरैंट्स को तीनों ड्रैसेस के 2-2 सैट लेने ही पड़ते हैं. इस के अलावा समर और विंटर ड्रैस के नाम पर हर 6 महीने में यूनिफौर्म भी बदल जाती है.

स्कूलों ने जूतेमोजे का भी विकल्प नहीं छोड़ा है. शर्टपैंट, ट्राउजर, ब्लेजर के अलावा स्ट्राइप वाले मोजों को भी पेरैंट्स को निर्धारित शौप से ही खरीदना पड़ता है. उन्हें ड्रैस के नाम पर खास तरह के जूतेमोजों का सैट खरीदना पड़ रहा है.

दरअसल, स्कूली डै्रस उत्पादन उद्योग काफी तेजी से बढ़ रहा है. इस का आकार वित्त वर्ष 2016-17 के 18 हजार करोड़ रुपए से बढ़ कर वित्त वर्ष 2021-22 तक 25 हजार करोड़ हो जाने का अनुमान है. महाराष्ट्र के जिला शोलापुर रेडीमेड इंडस्ट्री एसोसिएशन के उपाध्यक्ष नीलेश शाह कहते हैं, ‘‘शिक्षा के प्रति देश में बढ़ती जागरूकता के कारण स्कूल ड्रैस उद्योग बहुत तेजी से बढ़ रहा है. यह जिला इस उद्योग का केंद्र बन चुका है. शहर में 2022 तक लगभग 2 हजार नई इकाइयां शुरू करने की योजना है.’’

जरूरत इस बात की है कि सरकार व्यापारियों और स्कूलों के इस ठगबंधन के जाल को समूलरूप से नष्ट करे ताकि पेरैंट्स को सही दामों में स्कूल ड्रैस उन के नौनिहालों के लिए मिल सकें.

फरिश्ता : भाग 4

शाम ढलते-ढलते पूनम डौक्टर सूर्यकांत के साथ गांव पहुंच गयी. अपने बाबा को सामने देखकर वह हर्ष के अतिरेक में उनके सीने से जा लगी. न जाने कितनी देर तक बाप बेटी खुशी के आंसुओं में डूबे खड़े रहे. डौक्टर भी बड़ी देर तक बाप-बेटी के इस मिलन को देखकर भावुक होता रहा. साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पोछती हुई पूनम जब बाबा से अलग हुई तो उसने गौर किया कि बाबा अब कितने स्वस्थ दिखने लगे थे. गाल भरे-भरे से हो रहे थे और उन पर लाली भी उभर आयी थी. बदन भी काफी भर गया था. उसका दिल डौक्टर को दुआएं देते नहीं भर रहा था, जिनकी वजह से एक मरता हुआ परिवार फिर से जी उठा था. यही हाल बाबा का भी था. बेटी को इतना खुश और उजले-उजले कपड़ों में देखकर बाप का दिल डौक्टर के अहसानों तले दब गया था. वो हाथ जोड़कर डौक्टर की ओर बढ़े और इससे पहले कि वह उसके कदमों पर झुक सकें, डौक्टर ने उन्हें कन्धों से पकड़ कर अपने सीने से लिपटा लिया.

‘मास्टर जी… फिर आप वही बच्चों जैसी हरकत करने लगे… अरे इतने दिनों के बाद पूनम घर आयी है और आप रो रहे हैं…?’ डौक्टर ने उन्हें हंसाने की कोशिश की.

‘डौक्टर साहब…’ बूढ़े की जुबान लड़खड़ा गयी.

‘बस अब रोना-धोना बन्द कीजिए… जाओ पूनम, मेरे और बाबा के लिए जरा चाय बना लाओ….’ उसने पूनम को आदेश दिया.

डौक्टर सूर्यकांत का इस तरह अपनेपन से बोलना पूनम को भीतर तक छू गया. वो भागती हुई रसोई की तरफ चली गयी.

‘बस मास्टर जी… इसकी नर्सिंग की ट्रेनिंग पूरी होने दीजिए, फिर तो नौकरी पक्की समझिये… बहुत मेहनत से पढ़ रही है….’

‘सब आपकी कृपा है डौक्टर साहब… वरना…’ बूढ़े ने फिर हाथ जोड़ दिये.

‘नहीं मास्टर जी… ये सब पूनम की मेहनत का फल है…’

‘डौक्टर साहब, अब तो बस यही ख्वाहिश है कि मेरी आंखें बंद होने से पहले इसके हाथ पीले हो जाएं… फिर मैं चैन से मर सकूंगा….’

‘भगवान ने चाहा तो सब कुछ हो जाएगा मास्टर जी, आप बस हौंसला रखें. हां… आप की नजर में कोई लड़का हो तो बात…’ डौक्टर ने मास्टर जी से जानना चाहा.

‘इस गांव में तो डौक्टर साहब, बस उज्जड-गंवार ही बसे हैं… जो जरा पढ़-लिख गये तो शहर के हो गये. एक चौधरी का लड़का है भी, तो बदमाश इतना कि राह चलती बहू-बेटियों को आए दिन छेड़ता रहता है…’ मास्टर जी ने चिन्ता जाहिर की.

‘वैसे मुझे भी नहीं लगता कि इस गांव में कोई भी लड़का पूनम के लायक है, अगर आप कहें तो मैं शहर में जरूर कोशिश करूंगा… बस आप पहले इस तरह चिन्ता करना और निराशावादी बातें करना बंद कर दीजिए…’ उसने पूनम के हाथ से चाय का प्याला और गर्म-गर्म पकौड़ियों की प्लेट थामते हुए कहा.

अपनी शादी की चर्चा सुन कर पूनम का चेहरा लाल हो गया. वह शरमा कर अन्दर भाग गयी. डौक्टर सूर्यकांत हंस पड़े और साथ ही मास्टर जी भी. थोड़ी देर बाद डौक्टर सूर्यकांत ने दोनों से यह कहते हुए विदा ली कि अब आया हूं तो जरा विधायक बाबू को भी देखता जाऊं.

एक महीने बाबा के साथ रहने के बाद पूनम पुन: अपनी नर्सिंग ट्रेनिंग पर शहर वापस आ गयी. वह बड़ी मेहनत से काम सीख रही थी. रहने के लिए उसे अभी भी हौस्टल का कमरा मिला हुआ था. वार्डन सिरिल उसे अपनी बेटी की तरह चाहने लगी थीं. वह भी उनकी बहुत इज्जत करती थी. डौक्टर सूर्यकांत ने दो-तीन जगह उसके रिश्ते की बात चलानी शुरू कर दी थी. दो-एक अच्छे लड़के उसकी नजर में थे. वो चाहता था कि पूनम का विवाह किसी ऐसे लड़के से हो जो उसे सदैव खुश रखे. इतने दिनों में वह अपने आपको पूनम का संरक्षक समझने लगा था. उसके प्रति एक जिम्मेदारी सी उसे महसूस होती थी. पूनम के भोलेपन में उसे जो अपनापन प्रतीत होता था वह उसने कभी शहर के लोगों में नहीं पाया था. पूनम की आंखों में उसे सदैव एक कशिश सी महसूस होती. क्यों…? यह वो कभी नहीं समझ पाया. कभी-कभी वह इस खिंचाव से घबरा भी जाता था. यही वजह थी कि उसका पूनम के हौस्टल जाना इधर काफी कम हो गया था.

काफी खोजबीन के बाद उसने पूनम के लिए योग्य वर तलाश ही लिया. लड़का एक प्राइवेट फर्म में चार्टर्ड एकाउंटेंट था. खाते-पीते घर का होनहार और पूनम जैसा ही खूबसूरत नौजवान. नाम था अंकुर. डौक्टर सूर्यकांत के एक करीबी दोस्त का छोटा भाई था. पूनम को तो उसने फोटो देखते ही पसन्द कर लिया था. बस, अब तो सिर्फ मास्टर जी को शहर लाने की बात थी, आखिर शादी तो उनकी बेटी की थी. सिर्फ डौक्टर के चाहने भर से तो बात पक्की नहीं हो सकती थी. घर-वर मास्टर जी को भी पसन्द आना जरूरी था.

उस शाम जब सिस्टर सिरिल ने पूनम को अंकुर की तस्वीर दिखायी और डौक्टर सूर्यकांत की पसन्द पर अपनी पसन्द की भी मुहर लगाते हुए पूनम की राय जाननी चाही तो पूनम अचानक उनसे लिपट कर रोने लगी. वो काफी देर तक उसे अपने सीने से लगाए दिलासा देती रहीं.

‘अरे बेटी… इसमें रोने की क्या यबात है…? आखिर एक न एक दिन तो हर लड़की को अपने घर जाना होता है… अपने मां-बाप को छोड़ना होता है… चलो आंसू पोछो… गलत बात… ऐसे नहीं रोते… यह तो खुशी का मौका है… डौक्टर बता रहे थे कि अंकुर बहुत अच्छा लड़का है… उस घर में तुम बहुत खुश रहोगी…’ वह बड़ी देर तक उसे पुचकारती रहीं.

पूनम ने बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला और आंसू पोछते अपने कमरे में लौट आयी.

(धारावाहिक के अगले भाग में पढ़िये कि वह क्या बात थी जिसने पूनम को परेशान कर दिया था. डौक्टर सूर्यकांत ने उसके लिए इतना अच्छा घर-वर ढूंढा था, लेकिन पूनम खुश नहीं थी… वह आंसुओं के सैलाब में डूबती जा रही थी… आखिर क्यों?)

परदे देेते हैं स्टाइलिश लुक

एक समय था जब परदे केवल जरूरत के लिये ही घर में लगाए जाते थे. अब हालात बदल गए है. परदों का प्रयोग घर की खूबसूरती बढ़ाने के लिये किया जाता है. परदों का महत्व इंटीरियर के नए ट्रेंड में सबसे प्रमुख हो गया है.

परदे कमरे की दीवारों, खिड़कियों और दरवाजों की खूबसूरती बढ़ाने और उनमें नयापन लाने के लिये प्रयोग किये जा रहे हैं. इसलिए परदे अब बस परदे भर नहीं रह गए हैं. ‘इंटेरियो आर्च” की ओनर इंटीरियर डिजाइनर गरिमा मिश्रा कहती हैं ‘अब परदे अलग अलग डिजाइन, कपडे, रंग के बनने लगे है.

कुछ परदे कपड़ों के अलावा दूसरे मैटेरियल से भी बनने लगे हैं. यह पूरे कमरे के डिजाइन को बदल देते है. घर के ही नहीं औफिस और दूसरी जगहों पर भी परदों का स्टाइल पूरी तरह से बदल चुका है. इंटीरियर डिजाइनर गरिमा मिश्रा कहती हैं-

  • ‘परदों का चयन करते समय कमरे की दीवारों, खिड़कियों और दरवाजे पर किये गए रंग का पूरा ख्याल रखें. परदे का कपड़ा और उसका रंग बहुत महत्वपूर्ण होता है. परदों का डिजाइन जिस जगह पर परदा लगाया जा रहा हो उसके अनुसार चुने.
  • अगर बच्चों के कमरे में परदा लगाना हो तो उसका डिजाइन बच्चों की पसंद से मिलता जुलता हो. इंटीरियर का नया ट्रेंड यह है कि परदों का प्रयोग जब कमरें की खिडकियों पर हो रहा हो तो कारपेट के कलर के साथ भी उसका सही तालमेल रखा जाये. कुछ इंटीरियर डिजाइनर कारपेट के कलर से मैच खाता और कुछ उसके कलर से अलग कलर रखने की बात करते है. आजकल क्रीम और बादामी कलर ज्यादा चलन में है‘.
  • परदे के साथ ही साथ उसमें लगने वाली डोरी भी खूबसूरत होनी चाहिये. परदों को लगाने के लिये गोल्डन रौड का प्रयोग चलन में है. खिड़की या दीवार के पास परदें का बांधने के लिए खूंटी जैसी चीजों का प्रयोग भी कर सकती हैं. अब यह भी स्टाइलिश हो गई है. इसके अलावा परदों को हैंग करने के लिये स्टील के ऐससरीज का प्रयोग भी ट्रेंड में है. यह जल्दी खराब नहीं होते और मजबूती में भी सबसे अधिक होते हैं.
  • इंटीरियर डिजाइनर गरिमा मिश्रा कहती हैं ‘अगर आप चाहती हैं कि कमरे में परदा पड़े रहने का खूबसूरत अहसास हो और रोशनी भी आती रहे तो पारदर्शी कपड़े के परदे और नेट के परदों का प्रयोग भी कर सकती हैं.
  • कमरा छोटा हो तो प्लने और बड़ा हो तो फूलदार प्रिंट वाले परदे लगाये. हल्के रंगों के परदे लगाने से गर्मी का अहसास कम होता है. परदे के कपड़े के रूप में नेट, काौटन, सिल्क, लिनेन जैसी फैब्रिक का प्रयोग खूब हो रहा है.
  • परदे को बदलने के लिये उनके फटने का इंतजार न करें. साल में एक बार परदे जरूर बदल दें. अगर खिड़की और दरवाजे का साइज एक जैसा हो तो एक कमरे का परदा दूसरे कमरे में लगा कर परदों के नए होने का अहसास बना सकती हैं.

आजकल डिजाइनर परदों का प्रयोग चलन में है. यह कमरों के इंटीरियर को अलग लुक देते हैं.

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