धारावाहिक कहानी: फरिश्ता

धारावाहिक कहानी: फरिश्ता

धारावाहिक कहानी: फरिश्ता

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 (भाग – 4)

शाम ढलते-ढलते पूनम डौक्टर सूर्यकांत के साथ गांव पहुंच गयी. अपने बाबा को सामने देखकर वह हर्ष के अतिरेक में उनके सीने से जा लगी. न जाने कितनी देर तक बाप बेटी खुशी के आंसुओं में डूबे खड़े रहे. डौक्टर भी बड़ी देर तक बाप-बेटी के इस मिलन को देखकर भावुक होता रहा. साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पोछती हुई पूनम जब बाबा से अलग हुई तो उसने गौर किया कि बाबा अब कितने स्वस्थ दिखने लगे थे. गाल भरे-भरे से हो रहे थे और उन पर लाली भी उभर आयी थी. बदन भी काफी भर गया था. उसका दिल डौक्टर को दुआएं देते नहीं भर रहा था, जिनकी वजह से एक मरता हुआ परिवार फिर से जी उठा था. यही हाल बाबा का भी था. बेटी को इतना खुश और उजले-उजले कपड़ों में देखकर बाप का दिल डौक्टर के अहसानों तले दब गया था. वो हाथ जोड़कर डौक्टर की ओर बढ़े और इससे पहले कि वह उसके कदमों पर झुक सकें, डौक्टर ने उन्हें कन्धों से पकड़ कर अपने सीने से लिपटा लिया.

‘मास्टर जी… फिर आप वही बच्चों जैसी हरकत करने लगे… अरे इतने दिनों के बाद पूनम घर आयी है और आप रो रहे हैं…?’ डौक्टर ने उन्हें हंसाने की कोशिश की.

‘डौक्टर साहब…’ बूढ़े की जुबान लड़खड़ा गयी.

‘बस अब रोना-धोना बन्द कीजिए… जाओ पूनम, मेरे और बाबा के लिए जरा चाय बना लाओ….’ उसने पूनम को आदेश दिया.

डौक्टर सूर्यकांत का इस तरह अपनेपन से बोलना पूनम को भीतर तक छू गया. वो भागती हुई रसोई की तरफ चली गयी.

‘बस मास्टर जी… इसकी नर्सिंग की ट्रेनिंग पूरी होने दीजिए, फिर तो नौकरी पक्की समझिये… बहुत मेहनत से पढ़ रही है….’

‘सब आपकी कृपा है डौक्टर साहब… वरना…’ बूढ़े ने फिर हाथ जोड़ दिये.

‘नहीं मास्टर जी… ये सब पूनम की मेहनत का फल है…’

‘डौक्टर साहब, अब तो बस यही ख्वाहिश है कि मेरी आंखें बंद होने से पहले इसके हाथ पीले हो जाएं… फिर मैं चैन से मर सकूंगा….’

‘भगवान ने चाहा तो सब कुछ हो जाएगा मास्टर जी, आप बस हौंसला रखें. हां… आप की नजर में कोई लड़का हो तो बात…’ डौक्टर ने मास्टर जी से जानना चाहा.

‘इस गांव में तो डौक्टर साहब, बस उज्जड-गंवार ही बसे हैं… जो जरा पढ़-लिख गये तो शहर के हो गये. एक चौधरी का लड़का है भी, तो बदमाश इतना कि राह चलती बहू-बेटियों को आए दिन छेड़ता रहता है…’ मास्टर जी ने चिन्ता जाहिर की.

‘वैसे मुझे भी नहीं लगता कि इस गांव में कोई भी लड़का पूनम के लायक है, अगर आप कहें तो मैं शहर में जरूर कोशिश करूंगा… बस आप पहले इस तरह चिन्ता करना और निराशावादी बातें करना बंद कर दीजिए…’ उसने पूनम के हाथ से चाय का प्याला और गर्म-गर्म पकौड़ियों की प्लेट थामते हुए कहा.

अपनी शादी की चर्चा सुन कर पूनम का चेहरा लाल हो गया. वह शरमा कर अन्दर भाग गयी. डौक्टर सूर्यकांत हंस पड़े और साथ ही मास्टर जी भी. थोड़ी देर बाद डौक्टर सूर्यकांत ने दोनों से यह कहते हुए विदा ली कि अब आया हूं तो जरा विधायक बाबू को भी देखता जाऊं.

एक महीने बाबा के साथ रहने के बाद पूनम पुन: अपनी नर्सिंग ट्रेनिंग पर शहर वापस आ गयी. वह बड़ी मेहनत से काम सीख रही थी. रहने के लिए उसे अभी भी हौस्टल का कमरा मिला हुआ था. वार्डन सिरिल उसे अपनी बेटी की तरह चाहने लगी थीं. वह भी उनकी बहुत इज्जत करती थी. डौक्टर सूर्यकांत ने दो-तीन जगह उसके रिश्ते की बात चलानी शुरू कर दी थी. दो-एक अच्छे लड़के उसकी नजर में थे. वो चाहता था कि पूनम का विवाह किसी ऐसे लड़के से हो जो उसे सदैव खुश रखे. इतने दिनों में वह अपने आपको पूनम का संरक्षक समझने लगा था. उसके प्रति एक जिम्मेदारी सी उसे महसूस होती थी. पूनम के भोलेपन में उसे जो अपनापन प्रतीत होता था वह उसने कभी शहर के लोगों में नहीं पाया था. पूनम की आंखों में उसे सदैव एक कशिश सी महसूस होती. क्यों…? यह वो कभी नहीं समझ पाया. कभी-कभी वह इस खिंचाव से घबरा भी जाता था. यही वजह थी कि उसका पूनम के हौस्टल जाना इधर काफी कम हो गया था.

काफी खोजबीन के बाद उसने पूनम के लिए योग्य वर तलाश ही लिया. लड़का एक प्राइवेट फर्म में चार्टर्ड एकाउंटेंट था. खाते-पीते घर का होनहार और पूनम जैसा ही खूबसूरत नौजवान. नाम था अंकुर. डौक्टर सूर्यकांत के एक करीबी दोस्त का छोटा भाई था. पूनम को तो उसने फोटो देखते ही पसन्द कर लिया था. बस, अब तो सिर्फ मास्टर जी को शहर लाने की बात थी, आखिर शादी तो उनकी बेटी की थी. सिर्फ डौक्टर के चाहने भर से तो बात पक्की नहीं हो सकती थी. घर-वर मास्टर जी को भी पसन्द आना जरूरी था.

उस शाम जब सिस्टर सिरिल ने पूनम को अंकुर की तस्वीर दिखायी और डौक्टर सूर्यकांत की पसन्द पर अपनी पसन्द की भी मुहर लगाते हुए पूनम की राय जाननी चाही तो पूनम अचानक उनसे लिपट कर रोने लगी. वो काफी देर तक उसे अपने सीने से लगाए दिलासा देती रहीं.

‘अरे बेटी… इसमें रोने की क्या यबात है…? आखिर एक न एक दिन तो हर लड़की को अपने घर जाना होता है… अपने मां-बाप को छोड़ना होता है… चलो आंसू पोछो… गलत बात… ऐसे नहीं रोते… यह तो खुशी का मौका है… डौक्टर बता रहे थे कि अंकुर बहुत अच्छा लड़का है… उस घर में तुम बहुत खुश रहोगी…’ वह बड़ी देर तक उसे पुचकारती रहीं.

पूनम ने बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला और आंसू पोछते अपने कमरे में लौट आयी.

(धारावाहिक के अगले भाग में पढ़िये कि वह क्या बात थी जिसने पूनम को परेशान कर दिया था. डौक्टर सूर्यकांत ने उसके लिए इतना अच्छा घर-वर ढूंढा था, लेकिन पूनम खुश नहीं थी… वह आंसुओं के सैलाब में डूबती जा रही थी… आखिर क्यों?)

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