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कई सारी पत्र पत्रिकाओं में aids आते हैं कि घर बैठे 15 से 20 हजार रुपए कमाएं. क्या ये सच है?

सवाल

आजकल बहुत सी पत्र पत्रिकाओं में इश्तिहार छपते हैं कि एसएमएस कर के घर बैठे 15 से 20 हजार रुपए कमाएं. इस के लिए हजार या 15 सौ रुपए तक देने होते हैं. सच क्या है?

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जवाब

ऐसे कई इश्तिहार झूठे होते हैं. अगर पहले पैसे मांगें, तो इन के चक्कर में कभी नहीं पड़ना चाहिए. चमत्कारों से कमाई नहीं होती, यह सिद्धांत हरेक को मालूम होना चाहिए. पैसा मेहनत का हो तो ही फलता है. हराम की या चोरी की कमाई कुछ लोग ही पचा सकते हैं, शरीफ तो बिलकुल नहीं. इसलिए शरीफों को इन चक्करों में पड़ने पर भारी नुकसान ही होता है.

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‘मेरा भविष्य उज्ज्वल है’: संजय कपूर

लगभग 25 वर्ष पहले अनिल कपूर के छोटे भाई संजय कपूर ने जब बौलीवुड में अभिनेता के रूप में संजय कपूर ने कदम रखा था, तो एक नया इतिहास रचा था. उनकी तीन फिल्में प्रदर्शन के लिए तैयार थीं और वह चार फिल्मों की शूटिंग कर रहे थे. उनकी एक भी फिल्म प्रदर्शित नही हुई थी. पर ‘‘टिप्स संगीत ’’ कंपनी  एक औडियो कैसेट ‘‘हिट्स औफ संजय कपूर’ ’बाजार में लेकर आयी थी. यह एक अलग बात है कि उसके बाद उनका करियर काफी हिचकोले लेकर आगे बढ़ता रहा. बीच में उन्होने अभिनय से दूरी बनाते हुए ‘तेवर’ सहित दो फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें से एक फिल्म आज तक सिनेमाघरों में नहीं पहुंच पायी. पर पिछले तीन चार वर्षों से वह बतौर अभिनेता कई उंचाइयां छू रहे हैं. उन्हें टीवी सीरियल के अलावा वेब सीरीज ‘‘लस्ट स्टोरीज’’ के अलावा फिल्म ‘‘मिशन मंगल’’में जमकर तारीफ मिली. फिलहाल वह फिल्म‘‘द जोया फैक्टर’’को लेकर चर्चा में हैं, जिसमें वह निजी जिंदगी की भतीजी सोनम कपूर के पिता के किरदार में है. यह फिल्म 20 सितंबर को प्रदर्शित हो रही है.

जब आपने अपने करियर की शुरुआत की थी, तब आपकी फिल्मों के सिनेमाघर में प्रदर्शन से पहले ही  टिप्स कंपनी ने ‘‘हिट्स आफ संजय कपूर’ नामक औडियो कैसेट निकाला था. यह क्या मसला था. आपने उस वक्त क्या सोचा था?

जब हम करियर में शुरूआत कर रहे होते हैं, उस वक्त जो कुछ भी हो रहा होता है, हम उसका लुत्फ नही उठा पाते. उस वक्त हम अपने काम में इतना व्यस्त रहते हैं कि हमें लगता है कि शायद ऐसा ही हर कलाकार के साथ होता होगा. आज जब मैं सोचता हूं, तो मुझे लगता है कि मेरी फिल्म आयी भी नहीं थी और टिप्स वालों ने ‘हिट्स आफ संजय कपूर’ कैसेट निकाल दिया था. जिस कलाकार की एक भी फिल्म रिलीज नहीं हुई हो, उसके ऊपर औडियो आना बड़ी बात है. यह 25 साल पहले 1995 की बात है. कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो पीछे मुड़कर देखने पर अचंभित करती हैं. आज जब मैं इंसान व कलाकार के तौर पर परिपक्व हो चुका हूं, तो मुझे अहसास होता है कि वह कैसेट आना कितनी बड़ी उपलब्धि थी. आपने टिप्स के कैसेट की बात की, आपको यह वाकया याद है, यह बहुत बडी बात है. आज मैं पीछे मुड़ मुड़ का देखता हूं, तो अपने आपको प्रिविलेज्ड महसूस करता हूं.

आपके 25 साल के करियर के टर्निंग प्वौइंट क्या रहे?

मैं ऐसे कोई टर्निंग प्वौइंट नहीं मानता हूं. जब 25 साल का करियर होता है, तो आप कुछ सही निर्णय लेते हैं, कुछ गलत निर्णय लेते हैं. आपने सही निर्णय लिया है, सही काम किया है, पर किसी अन्य की गलती से भी परिणाम गलत निकल सकते हैं. एक फिल्म की सफलता और असफलता के पीछे कई वजहें होती हैं. आप इंसान हैं और हर इंसान से गलती होना स्वाभाविक है. फिर चाहे वह कलाकार हो या डौक्टर हो या कोई अन्य पेशेवर हो. हर इंसान सोचकर गलती नहीं करता. इंसान तो यही सोचता कि वह सही कर रहा है, पर गलत हो जाता है. फिर फिल्म का जो अंतिम परिणाम आता है, उसके गलत होने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं. आपकी अपनी गलती हो सकती है, निर्देशक या निर्माता या फिल्म वितरण करने वाले से गलती हो सकती है. फिल्म रिलीज का समय गलत हो सकता है. बहुत सी चीजें होती हैं.

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मतलब?

शायद आपको पता होगा कि पहले एक फिल्म निर्माण में 2 से 4 साल का वक्त लगता था. अब तो  छह माह में फिल्में बन जाती हैं. यह एक अलग बात है कि फिल्म के निर्माण से पहले उसके प्रोडक्शन में, उसकी तैयारी में एक से डेढ़ साल का समय लगाते हैं. मेरी एक फिल्म ‘‘छुपा रुस्तम’’ थी, जो कि सुपरहिट  हुई थी. पर इसके निर्माण में पांच साल का वक्त लग गया था. इस फिल्म की शूटिंग मैंने 1994 में शुरू की थी. निर्माता के साथ कुछ समस्याएं खड़ी हो गईं, तो फिल्म रुक गयी. उसके बाद राज बब्बर साहब राजनीति में चले गए, इस कारण फिल्म रुक गयी. इस फिल्म में राज बब्बर साहब का बहुत महत्वपूर्ण किरदार था. फिर मनीषा कोइराला की अपनी समस्याएं शुरू हो गई थीं. जिसके चलते यह फिल्म रूकी रही. शूटिंग बार बार रुकती गयी. पूरे 5 साल के बाद 1999 में यह फिल्म रिलीज हुई, तो सुपर डुपर हिट हो गयी. अमूमन इस तरह की फिल्में सफल नही होती.‘‘छुपा रुस्तम’’ के निर्माण में पांच साल की जो देरी हुई, उसमें किसी की कोई गलती नहीं थी. अच्छा हुआ कि फिल्म चल गई, पर यदि फिल्म ना चलती, तो किसी ने किसी पर तो दोषारोपण किया जाता. कहीं वक्त गलत हो जाता. अक्सर होता है कि जब हम कोई कहानी सुनते हैं, तो हमें लगता है कि आप बिल्कुल सही समय पर बन रही फिल्म है, पर उसके बनने में देरी हुई, तो पता चलता है कि जब फिल्म रिलीज हुई, तो वक्त गलत हो चुका था. और फिल्म नहीं चली. अब ऐसी स्थिति में मैं किसे क्या दोष दूं. पहले जमाने में तो एक फिल्म के बनने में 2 से 4 साल का वक्त लगता था, 2 साल के बाद फिल्म के जौनर का जो ट्रेंड है, वह बदल गया, तो आप क्या करेंगे?

अब तो फिल्म के निर्माण में दो साल नहीं लगते हैं. मगर अब उसकी पहले से तैयारी करने में समय ज्यादा लगाते हैं. उसके बाद फिल्म बनने में सिर्फ 6 माह लगते हैं. ऐसे में यदि शूटिंग के समय पता चला कि ट्रेंड बदल गया है, तो उसमें बदलाव करना आसान है. हम फिल्म के संगीत को भी शूटिंग शुरू होने के समय ही रिकौर्ड करते हैं. कई बार तो फिल्म की शूटिंग के दौरान ही गाने रिकौर्ड किए जाते हैं. वह समसामायिक लगते हैं. मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि सिर्फ संगीत की वजह से ही कुछ फिल्में चली या नहीं चली.

पहली बार मैंने फिल्म‘‘द जोया फैक्टर’’ में पिता का किरदार निभाया है. ऊपर से सोनम के पिता का किरदार है, जिसके चलते लोगों को ज्यादा रोचकता नजर आएगी. इसलिए कह सकता हूं कि मेरा भविष्य उज्ज्वल है. लोग मुझे आने वाले कल में कुछ बेहतरीन किरदारों में देख सकेंगे.

लेकिन बीच में आप अभिनय को बाय बाय कर फिल्म निर्माण से जुड़ गए थे?

अभिनय को बाय बाय नही किया था. ऐसा कभी नही रहा कि मेरे पास फिल्मों के आफर न आए हों. मैं मानता हूं कि मुझे सौ फिल्मों के नही, मगर 10-12 फिल्मों के आफर लगातार आ रहे थे. लेकिन वह कहीं ना कहीं मुझे सही नहीं लग रहे थे. या उनमें कुछ ऐसा था, जिसे करने के लिए मेरा मन गवाही नहीं दे रहा था. तो मैंने नहीं किया. तब मैने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए कि बौलीवुड से जुडा रहूं. मेरे पिता मेरे जन्म के पहले से फिल्म निर्माण कर रहे थे. मेरे भाई बोनी कपूर भी फिल्म निर्माण कर रहे हैं.तो मैने भी सोचा कि फिल्में बनाई जाएं. दो फिल्में बनाई. एक फिल्म कुछ वजहों से हम प्रदर्शित नही कर पाए. पर ‘तेवर’ को प्रदर्शित किया. पर बाक्स आफिस पर इसे लोगों ने पसंद नही किया.

आपको नहीं लगता कि ‘‘तेवर’’ बनाना आपकी गलती थी?

मुझे लगता है कि फिल्म ‘‘तेवर’’ अपने समय से दो साल बाद आयी. यदि यह फिल्म दो साल पहले बनकर प्रदर्शित हो जाती, तो इसका अंजाम कुछ और होता. जब मैंने ‘तेवर’ बनाई, उस वक्त तक ‘तेवर’ के जौनर की कम से कम 25 से तीस फिल्में दर्शक देख चुके थे. जिसकी शुरूआत ‘‘दबंग’’ से शुरू हुई थी. उसके बाद ‘राउडी राठौड़’, ‘बुलेट राजा’, ‘आर राजकुमार’ जैसी फिल्में आ गयी थी. तो वहीं ‘तेवर’ के रिलीज के समय का वह दौर था, जब लोग बदल रहे थे. उस वक्त दर्शक लार्जर देन लाइफ वाली फिल्मों से दूरी बना रहा था. दर्शकों का झुकाव रियलिस्टिक सिनेमा की तरफ हो रहा था. सिनेमा के बदलते दौर का भी खामियाजा ‘तेवर’ को भुगतना पड़ा था. अब देखिए न ‘स्पेशल 26’, ‘उरी’,‘राजी’ व ‘‘मिशन मंगल’ जैसी फिल्मों की तरफ दर्शकों का झुकाव हो गया. जब सिनेमा बदलाव के मुहाने पर था, तभी मेरी फिल्म ‘तेवर’ आई और वह भी उस जौनर की, जिस जौनर की पचास से अधिक फिल्में आ चुकी थीं. इसके अलावा हमारी फिल्म ‘तेवर’ की हीरोइन सोनाक्षी सिन्हा ने बहुत अच्छा काम किया था, मगर मैंने जिन फिल्मों के नाम गिनाए, ऐसी छह फिल्मों में वह खुद हीरोइन थीं. तो लोगों को लगा कि सानेाक्षी ने इसमें खुद को दोहराया होगा. जबकि बाद में जिन लोगों ने टीवी पर या सेटेलाइट चैनल पर ‘तेवर’ को देखा, उन सभी ने फिल्म ‘तेवर’ की तारीफ के पुल बांधे,पर सिनेमाघरो में दर्शक इसे नकार चुके थे.

मैं आज भी दावे के साथ कहता हूं कि फिल्म ‘‘तेवर’’ के निर्देशक अमित शर्मा प्रतिभाशाली थे. उन्होंने ही असफलता का दंश झेलते हुए ‘‘बधाई हो’’ जैसी सफलतम फिल्म दी. उसी निर्देशक ने आयुष्मान खुराना को लेकर 100 करोड़ की फिल्म ‘‘बधाई हो’’ बना डाली. मेरे कहने का अर्थ यह है कि यदि मेरी फिल्म ‘तेवर’ दो साल पहले आ जाती, तो परिणाम कुछ और होता.

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‘‘तेवर’’ की असफलता के बाद आपने फिल्म निर्माण से तौबा कर लिया?

ऐसा नही है. सच यह है कि ‘तेवर’’ की शूटिंग खत्म होने से पहले मैंने दो तीन पटकथाओं पर फिल्म बनाने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था. मगर ‘तेवर’ के प्रदर्शन से पहले ही मुझे फिल्म ‘‘शानदार’’ में अभिनय करने का अवसर मिला. मैं मूलतः अभिनेता ही हूं, इसलिए इसे प्राथमिकता दी. फिर‘शानदार’ की शूटिंग के दौरान अभिनेता के तौर पर तीन चार फिल्में भी अनुबंधित कर ली. पर फिर वही हुआ. फिल्म ‘शानदार’ बौक्स आफिस पर बुरी तरह से असफल हो गयी. लेकिन लोगों ने मेरे काम की तारीफ की. फिल्म ‘शानदार’ के बाद ही मुझे टीवी सीरियल ‘दिल संभल जा जरा’ में बेहतरीन किरदार निभाने का मौका मिल गया, जो कि पूरे एक वर्ष चला. फिर वेब सीरीज ‘‘लस्ट स्टोरीज’’ मिल गयी. फिर ‘मिशन मंगल’, ‘द जोया फैक्टर’ मिल गयी. परिणामतः फिल्म निर्माण का सिलसिला थम गया. लेकिन फिल्म निर्माण मेरे खून में है, आगे करूंगा.

आपने फिल्म ‘‘मिशन मंगल’’ में अपनी ही पुरानी फिल्म ‘‘राजा’’ के गीत ‘‘दिलबर’’ पर नृत्य किया है?

जी हां! यह भी उपलब्धि ही है. आज जब फिल्मों पुराने रीमिक्स गीत आ रहे हैं, तो मैं पहले ऐसा कलाकार हूं, जिसने अपना रीमिक्स गाना खुद किया है. ‘दिलबर’ मेरा सुपरहिट गाना था. मैने कई वर्ष पहले इस गाने को सुष्मिता सेन के साथ किया था.

जब आपको ‘‘मिशन मंगल’’ में ‘दिलबर’ गाने के रीमिक्स पर नृत्य करना था, तो आपकी पहली  प्रतिक्रिया क्या थी?

मुझे यह बताया गया था कि एक गाने पर मुझे नृत्य करना होगा, पर तब गीत तय नहीं था. पर अंत में ‘दिलबर’ गाना तय हुआ. सब कुछ बहुत जल्द हुआ था, तो ज्यादा सोचने या तैयारी करने का अवसर नहीं मिला. फिल्म देखकर लोगों ने इस गाने को काफी पसंद किया. मैंने खुद मुंबई के भी पीवीआर सिनेमाघर में दर्शकों के साथ जाकर यह फिल्म देखी. जब यह गाना परदे पर आया, उस समय लोगों ने जो तालियां व सीटी बजायी, उससे मुझे आत्मसंतुष्टि मिली. फिल्म खत्म होने के बाद लोगों की नजर मुझ पर पड़ी. तो लोगों ने मुझे घेर लिया, सेल्फी खींची. इनमें से ज्यादातर लोग 25 से 30 साल की उम्र के थे, जिन्होंने शायद उस वक्त फिल्म ‘‘राजा’’ देखी भी नहीं होगी. इन्हें तो पता भी नही होगा कि उस वक्त ‘राजा’ कितनी बड़ी सफल फिल्म थी. पर उसी गाने को देखकर लोगों ने मुझे ना सम्मान दिया. यह बात मुझे उस मुकाम पर लाती है, जहां आप स्व.राज कपूर या स्व. देवानंद या स्व.गुरुदत्त को याद करते हैं. मैं इनसे अपनी तुलना नही कर रहा. मैं तो सिर्फ इस गाने के संदर्भ में यह बात कर रहा हूं. जब भी आप इन कलाकारों के गाने सुनेंगे, तो आपको उनका चेहरा नजर आएगा. ‘दिलबर’  गीत को आज जो सफलता मिली है, उससे मुझे लगता है कि इंसान का वक्त बदलता है, तो बहुत कुछ बदल जाता है. ‘दिलबर’ गीत का रीमेक पांच साल या उससे पहले भी आ सकता था. पर जब वक्त बदला, तब आया.

आपने संगीत की बात की. आपको नहीं लगता आज वैसा संगीत नही बन रहा कि लोग उस तरह से संगीत के दीवाने हो जाएं,जैसे बीस साल पहले लोग हो जाते थे?

वक्त के साथ काफी कुछ बदला है. पहले जब लोग कार खरीदते थे, तो सोचते थे कि कौन सा डेक लगाएं?  लोगों की रूचि स्पीकर लगाने को लेकर होती थी. मगर आज जब इंसान कार खरीदकर उसमें बैठता है, तो मोबाइल फोन में ही लगा रहता है. कई बार ऐसा होता है कि मैं घर से निकलने के लिए तैयार होते समय सोचता हूं कि लोगों से गाड़ी में बैठकर बात कर लूंगा. कुछ लोग सोशल मीडिया में लगे रहते हैं. ऐसे में अब लोगों के पास संगीत सुनने का वक्त ही नही है. ऐसा नहीं है कि लोग गाने सुनते नहीं है, पर अब उनके पास च्वाइस बहुत हैं.

आपने उस दौर में भी काम किया है, जब फिल्में बनने में 2 से 3 वर्ष का समय लगता था. अब एक ही शिड्यूल में छह माह में बनती है, यदि हम प्री व पोस्ट प्रोडक्शन को छेाड़ दें. ऐसे में एक कलाकार के तौर पर ज्यादा सहूलियत कब महसूस होती है?

डेफिनेटली वर्तमान में. अब आपने फिल्म ‘मिशन मंगल’ देखी है. इसमें मेरे घर के हिस्से का काम पूरे आठ दिन में खत्म हुआ. मैंने एक साथ 8 दिन में कर लिया था. रोज जब मैं उठता था, तो मैं उस किरदार के बारे में ही सोचता था. टीवी सीरियल में सौ दिन का काम पांच 5 महीने में पूरा किया. तो मैं उठते बैठते उसी किरदार में रहता था. मगर जब मैंने करियर शुरू किया था, तब 15 दिन में ‘राजा’, दस दिन प्रेम करता था . कभी ‘प्रेम’ का कर्तव्य तो कभी ‘बेकाबू’ का जादूगर बन जाता था. ऐसे में किरदार के साथ सामंजस्य बनाकर रखना कठिन होता था.

तो उस दौरान किरदारों के साथ न्याय करना मुश्किल होता होगा?

जी हां!! मुश्किल होता था. हम एक सेट से दूसरे सेट पर भाग रहे होते थे. आप चाहे जितने प्रतिभाशाली हों, पर बार बार दूसरे किरदार में खुद को ढालना आसान नहीं होता. हम जिस कलाकार से परिचित नहीं हाते थे, उसके साथ तीन दिन पहले स्क्रिप्ट पढ़ते थे. जब आप सेट पर पहुंचते, तो लगता कि आप परीक्षा देने जा रहे हैं. अमूमन पहले से पटकथा व संवाद भी नहीं मिलते थे. मेकअप के दौरान भी बताया जाता था कि निर्देशक अभी पटकथा लिख रहे हैं. सेट पर पहुंचने के बाद हमें उस सीन की जानकारी व संवाद मिलते थे. फिर भी उस दौरान फिल्म जरूर हिट होती थी. अच्छा काम भी करते थे. आज का समय बहुत ही मैथड है. हर चीज बहुत ही सिस्टमैटिक है.

क्या डिजिटलाइजेशन में सैल्यूलाइड वाला मजा है?

मेरी राय में सौ प्रतिशत. बड़े परदे पर फिल्म देखने का जो मजा है, वह कभी नहीं बदलेगा. 25 साल पहले जब वीसीआर/वीडियो आया, तब लोगों ने कहा कि इंडस्ट्री खत्म हो जाएगी. पर नही हुई. जब कलर टीवी आया, लोगों ने कहा कि सेटेलाइट में तो 4 हफ्ते के बाद पिक्चर टीवी पर आ जाती है, ऐसे में थिएटर में कौन देखेगा? पर आज दो हफ्तों में ही इतने लोग पिक्चर देख लेते हैं जो पहले 25 हफ्तों में भी नहीं देखते थे. आज फिल्में चार हजार सिनेमाघरों में एक साथ प्रदर्शित होती है. पहले केवल 60 सिनेमाघरों में लगती थी. तो समय के साथ बहुत कुछ बदला है.

फिल्म‘‘द जोया फैक्टर’’को व इसके किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

यह अनुजा चौहाण के इसी उपन्यास पर बनी फिल्म है. इसमें मैंने जोया सिंह सोलंकी (सोनम कपूर) के पिता विजयेंद्र सिंह सोलकी का किरदार निभाया है. जो कि एक रिटायर्ड आर्मी औफिसर है. उसका एक बेटा जोरावर सिंह सोलंकी (सिकंदर खेर ) भी है, जो कि आर्मी आफिसर है. विजयेंद्र सिंह मैन औफ प्रिंसिपल है. उनका बच्चों के साथ जो रिलेशन है, वह दोस्तों की तरह है. जोक्स क्रिएट करते हैं, साथ में क्रिकेट देखते हैं. वह पिता जरूर है, पर ‘मिशन मंगल’ में जिस तरह का पिता है, उस तरह का नहीं.

सोनम कपूर रीयल लाइफ में आपकी भतीजी हैं. भतीजी मतलब बेटी. अब उसी को पर्दे पर जीना कितना सहज रहा?

एकदम सहज.अगर सोनम की जगह कोई दूसरी लड़की भी होती, तो मुझे काम तो उतना ही करना था.

भविष्य की योजना?

एक फिल्म ‘‘बेढब’’ जल्द रिलीज होगी.एक वेब सीरीज की है.एक दूसरी वेब सीरीज की शूटिंग करने वाला हूं.

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‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’: मस्ती करने के मामले में सबसे आगे हैं शिवांगी जोशी

स्टार प्लस का मशहूर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ के जरिए कार्तिक (मोहसीन खान) और नायरा (शिवांगी जोशी) दर्शकों का खूब मनोरंजन कर रहे है.  आपके बता दें, फिलहाल ये शो टीआरपी में टौप पर है. इस शो में लगातार आपको धमाकेदार टविस्ट देखने को मिल रहे है.

इस सीरियल के कलाकार दर्शकों के मनोरंजन के लिए शूटिंग में काफी व्यस्त रहते हैं. लेकिन मौका पाकर ये भी मस्ती कर लेते हैं. जी हां इस शो के सूट के दौरान की एक वीडियो सामने आई है. इस वीडियो में मोहसीन खान सूट में नजर आ रहे है, लेकिन गौर करने वाली ये बात है कि वह चप्पल पहने हुए हैं.  शिवांगी जोशी ने इस वीडियो को बनाया है और वो इस वीडियो में पूछ रही है, क्या हुआ तुम्हें, तुम्हारे जूते कहां है?

इसके बाद पता चल जाता है कि जूते तो खुद शिवांगी ने ही छुपाए है. दरअसल शिवांगी इस वीडियो में एक लम्बी सी ड्रेस में नजर आ रही है और उन्होंने मोहसीन के जूते पहने हुए है, लेकिन ड्रेस लम्बी होने की वजह से उनके पैरों के जूते कोई नहीं पहचान पाया.

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आपको बता दें, इस शो के सेट पर शिवांगी और मोहसीन अक्सर मस्ती करते रहते हैं. शूटिंग से समय निकालकर दोनों एक दूसरे के साथ खूब मस्ती करते हैं. कुछ दिन पहले ही एक वीडियो आया था, जिसमें शिवांगी मोहसीन से उनके मोबाइल का पासवर्ड पूछती हुई नजर आ रही थी.

इस शो में अभी नायरा (शिवांगी जोशी) और कार्तिक (मोहसीन खान) एक दूसरे के काफी करीब नजर आ रहे हैं. सीरियल के इस एंगल को दर्शक काफी पसंद भी कर रहे हैं.

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एफडब्ल्यूआईसीई ने गायक उदित नारायण, कुमार शानू और अलका यागनिक को भेजा नोटिस !

फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लाइज (एफडब्ल्यूआईसीई) ने गायक कुमार शानू, उदित नारायण और गायिका अलका याज्ञनिक को एक नोटिस भेजकर कहा है कि वह १७ नवंबर को पाकिस्तानी नागरिक मोज्जमा हुनईन द्वारा अमेरिका में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रस्तुति देने से पहले पुर्नविचार करें. फिल्म और टेलीविजन जगत की ३२ एसोसिएशनों का प्रतिनिधित्व करने वाले फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लाइज ने स्पष्ट कहा है कि अगर यह कलाकार अपना पाकिस्तान के प्रति प्रेम बंद नहीं करेंगे, तो फेडरेशन उनका बायकौट करेगा. फेडरेशन में फिलहाल १० लाख से ज्यादा सदस्य हैं.

१६ सितंबर को इन तीनों गायक गायिकाओं को भेजी गयी नोटिस में फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्पलाईज की ओर से कहा गया है कि इस समय जबकि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान से संबंध अच्छे नहीं हैं और जम्मू काश्मीर में आर्टिकल ३७० हटाने के बाद पाकिस्तान जिस तरह के बयान जारी कर भारत के प्रति जहर उगल रहा है, ऐसे में आपका देश के प्रति निष्ठावान होना जरुरी है. फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लाइज के प्रेसिडेंट श्रीबी.एन. तिवारी, जनरल सेक्रेटरी अशोक दुबे, ट्रेजरार ज्ञानेश्वरलाल श्रीवास्तव,  मुख्य सलाहकार अशोक पंडित  और मुख्य सलाहकार शरद शेलार के हस्ताक्षर से यह नोटिस गायक कुमार शानू, उदित नारायण और गायिका अलका यागनिक को भेजी गयी है, जिसमें कहा गया है कि फेडरेशन ने तय किया है कि हम पाकिस्तान से किसी भी सांस्कृतिक प्लेटफार्म को साझा नहीं करेंगे. हमारे लिए देश प्रथम है.’’

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इस नोटिस में कहा गया है कि आप भारत के सम्माननीय गायक हैं. भारत के लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए १७ नवंबर को पाकिस्तानी नागरिक मोज्जमा हुनईन द्वारा अमेरिका में आयोजित कार्यक्रम में प्रस्तुति देने से पहले आप पुर्नविचार करें. इससे पहले पाकिस्तान के अरबपति कारोबारी अदनान असद की बेटी की शादी में बौलीवुड सिंगर मीका सिंह ने ८ अगस्त परफॉर्म किया था.इस बात का खुलासा होने के बाद  फेडरेशन आॅफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लाइज  ने मीका सिंह पर बैन लगा दिया था. इसके बाद मीका सिंह फेडरेशन के मुंबई में अंधेरी स्थित कार्यालय पहुंचे और मीडिया और फेडरेशन के पदाधिकारियों की मौजूदगी में देश से माफी मांगी और कहा कि आगे से यह गलती नहीं होगी.

नोटिस में कहा गया है कि इसके पहले गायक दिलजीत दोसांज ने २१ सितंबर को पाकिस्तानी नागरिक रेहान सिद्दीकी के आमंत्रण पर प्रस्तुति देने की सहमति दी थी. मगर फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लाइज की असहमति के बाद देश के लोगों और फेडरेशन के लाखों सदस्यों की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्होंने इस कार्यक्रम में प्रस्तुति देने से इंकार कर दिया था.

फेडरेशन के प्रेसिडेंट बी. एन. तिवारी के मुताबिक फेडरेशन का स्टैंड बिल्कुल साफ है कि हमारे लिए देश और देश के लोगों की भावनाएं पहले हैं. अगर यह गायक अपना पाकिस्तान के प्रति प्रेम बंद नहीं करेंगे तो फेडरेशन उनका बायकौट करेगा.

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अजब गजब : 1.23 अरब रुपये के हैं ये जूते

क्या आपने इस दुनिया का सबसे महंगे जूते देखे हैं?  जी हां, आप यही सोच रहे होंगे न, इस महंगे जूते की कीमत क्या होगी. जब आप इस जूते की कीमत जानेंगे तो हैरान रह जाएंगे. इस अनोखे जूते का नाम पैशन डायमंड शू और इसकी कीमत 1.7 करोड़ डौलर यानी 1.23 अरब रुपये है. इस जूते की कीमत अरबों में है.

इस बेशकीमती जूते में 15 कैरेट का एक हीरा लगा है. इसके अलावा 236 दूसरे छोटे डायमंड की कतार और सोने की सजावट इसे और भी खास बनाता है. इस लग्जरी शू का नाम पैशन डायमंड शू रखा गया है. इसे सोने और हीरों से बनाया गया है. इस शू को डिजाइन करने और बनाने में 9 महीने का समय लगा है. इस शू में सैकड़ों हीरे लगे हैं.

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आपको बता दें कि ब्रांड जदा दुबई हीरे वाले जूते बनाने के लिए जाना जाता है. पैशन डायमंड शू के अलावा भी कुछ ऐसे शूज और स्लिपर्स हैं, जो अपनी कीमत के लिए जाने जाते हैं.

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विकृति की इंतेहा: भाग 2

विकृति की इंतहा: भाग 1

आखिरी भाग

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मतलब साफ था कि फैजान की हत्या करने के बाद कातिल ने शव घर में ही छिपा कर रखा था, लेकिन पुलिस की सक्रियता के कारण उसे शव को ठिकाने लगाने का मौका नहीं मिल पाया था. लेकिन जब लाश से तेज बदबू आने लगी तो उसे ठिकाने लगाना कातिल की मजबूरी हो गई थी.

फैजान का शव जिस बोरी में मिला था, उस में धागों के टुकड़े मिले थे. बोरी का मुंह भी कपड़े की चिंदी से बांधा गया था. फैजान के घर में भी सिलाई का काम होता था. इस के अलावा मोहल्ले में अधिकांश घरों में टेलरिंग का काम होता था. इसलिए सुराग की तलाश में पुलिस ने करीब 200 घरों की गहनता से तलाशी ली.

पुलिस को पता चला कि फैजान के पड़ोस में रहने वाला 19 वर्षीय सोहेल अंसारी उर्फ मोनू घटना वाले दिन रतलाम में अपने घर पर ही था. 2 दिन बाद वह बहन की शादी में शामिल होने खंडवा चला गया था, जहां से वह 22 अप्रैल को वापस आया था.

उस के लौटने के अगले दिन ही 23 अप्रैल को सोहेल के घर से कुछ ही दूर नाले में फैजान का शव मिला था. इसलिए पुलिस ने सोहेल को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. ऐसा नहीं कि पुलिस ने सोहेल से पहले पूछताछ न की हो. घटना के ठीक बाद भी पुलिस उसे उठा कर थाने लाई थी लेकिन उस समय उस की बहन की शादी की वजह से उसे थाने से भेज दिया था.

फैजान का परिवार सोहेल पर खूब भरोसा करता था. घटना के ठीक बाद जब पुलिस मोहल्ले में घरों की तलाशी ले रही थी, तब फैजान के पिता ने खुद सोहेल के घर की तलाशी लेने से पुलिस को यह कह कर रोका था कि यह हमारे घर का ही आदमी है. अब उसी सोहेल को पुलिस ने पुख्ता शक के आधार पर हिरासत में लिया था. लेकिन सोहेल इस मामले में खुद को निर्दोष साबित करने पर तुला था.

अब तक पुलिस को इस बात की जानकारी मिल चुकी थी कि सोहेल को नशा करने के अलावा मोबाइल पर अश्लील फिल्में देखने की लत थी. फैजान के साथ भी अप्राकृतिक दुष्कृत्य की पुष्टि हुई थी. इसलिए पुलिस ने सोहेल के खून का सैंपल डीएनए जांच के लिए सागर भेज दिया. इस दौरान पुलिस ने उस के घर की तलाशी ली, उस के घर में पुलिस को वैसा ही एक प्लास्टिक का बोरा मिला, जिस तरह के बोरे में फैजान का शव नाले में पाया गया था.

30 अप्रैल, 2019 को पुलिस को डीएनए की रिपोर्ट मिल गई, जिस से साफ हो गया कि फैजान के साथ दुष्कृत्य करने वाला सोहेल ही था. पुलिस ने उस के साथ सख्ती बरती तो उस ने न केवल अपना अपराध स्वीकार कर लिया बल्कि यह भी बता दिया कि उस ने फैजान की लाश घर में छिपा कर रखी थी. लाश को छिपाते समय उसे उस की बड़ी बहन कश्मीरा ने देख लिया था.

लेकिन कश्मीरा ने यह जानकारी किसी को देने के बजाए भाई को बचाने की कोशिश की. इतना ही नहीं, 22 अप्रैल की रात में लगभग 8 बजे सोहेल ने कश्मीरा की मदद से ही फैजान की लाश नाले में फेंकी थी.

इस जानकारी के बाद पुलिस ने कश्मीरा को भी गिरफ्तार कर लिया. जिस के बाद पूरी कहानी इस प्रकार सामने आई.

रतलाम के हाट रोड पर बसी बस्ती में ज्यादातर परिवार सिलाई के काम से जुड़े हैं. जफर कुरैशी भी यही काम करता था. जफर का इसी बस्ती में घर भी है, जिस के पड़ोस में सोहेल का परिवार रहता है. सोहेल आवारा किस्म का युवक था. बताया जाता है कि उसे 12 साल की उम्र से ही नशा और सैक्स की आदत पड़ चुकी थी.

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उस के मोबाइल में तमाम देशीविदेशी अश्लील फिल्में रहती थीं, जिन्हें वह देखता रहता था. कई बार वह नाबालिग लड़कियों की अश्लील फिल्म दिखाते हुए अश्लील हरकतें कर चुका था. जिन में से कुछ ने उस के घर जा कर इस की शिकायत भी की थी. जिस के चलते मोहल्ले में कुछ लोगों से विवाद भी हो चुका था.

उस ने पुलिस को बताया कि उन दिनों उस की छोटी बहन की शादी खंडवा में होने जा रही थी, जिस के चलते उस का पूरा परिवार 12 अप्रैल, 2019 को खंडवा चला गया था. सोहेल को भी साथ जाना था लेकिन वह 14 अप्रैल को दोस्तों के संग आने की बात कह कर घर पर रुक गया था.

13 अप्रैल को सोहेल ने पहले तो जी भर कर नशा किया फिर अपने फोन पर अश्लील फिल्में देखनेलगा. फिल्म देखतेदेखते वह इतना उत्तेजित हो गया कि गली में किसी लड़की की तलाश करने लगा. दुर्भाग्य से इसी बीच फैजान उसे अकेला दुकान की तरफ जाते दिखा.

फैजान को देख कर उस के दिमाग का शैतान जाग उठा. उस ने फैजान को आवाज दे कर अपने घर में बुला लिया. फैजान उसे भाईजान कह कर बुलाता था, इसलिए आसानी से उस के बुलाने पर नजदीक चला गया. उसे ले कर सोहेल अंदर गया और दरवाजा बंद कर उस से मीठीमीठी बातें करते हुए उस के कपड़े उतारने लगा.

मासूम फैजान कुछ समझ नहीं सका. लेकिन इतना तो जानता था कि इस तरह से कपड़े नहीं उतारे जाते. उस ने विरोध करना चाहा तो सोहेल ने घर में पड़े टेप से उस के हाथपैर बांध दिए. वह चिल्ला न सके, इस के लिए उस ने मुंह पर भी टेप चिपका दिया. फिर वह उस मासूम के साथ अप्राकृतिक रूप से अपनी वासना शांत करने में जुट गया.

उस दौरान सोहेल इतना पागल हो चुका था कि उस ने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि टेप से फैजान की नाक भी बंद हो गई है. इसलिए जब तक सोहेल की वासना की आग शांत हुई, मासूम फैजान की धड़कनें भी शांत हो चुकी थीं.

यह देख कर सोहेल डरा नहीं बल्कि उस ने उसी हालत में फैजान का शव उठा कर वाशिंग मशीन में डाल दिया और खुद बाहर घूमने निकल गया. इस के बाद जब मोहल्ले में फैजान के लापता होने का हल्ला हुआ तो वह भी उस के घर पहुंच गया. सब के साथ मिल कर उस ने फैजान को खोजने का नाटक किया.

दूसरे दिन बात बढ़ी तो पुलिस ने शक के आधार पर मोहल्ले के कई बदमाशों के साथ सोहेल को भी पूछताछ के लिए उठा लिया. यह खबर उस की बहन की शादी के लिए खंडवा गए उस के परिवार को पता चली तो वहां से उस की बड़ी बहन कश्मीरा रतलाम आई.

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कश्मीरा घर पहुंची तो उस ने वाशिंग मशीन में रखा फैजान का शव देख लिया. लेकिन उस ने न तो इस बात की खबर पुलिस को दी और न ही किसी अन्य को. उलटे थाने जा कर छोटी बहन की शादी के नाम पर सोहेल को अपने साथ छुड़ा लाई और उसे ले कर खंडवा चली गई.

खंडवा से पूरा परिवार 22 अप्रैल को वापस रतलाम आया, जिस के बाद कश्मीरा और सोहेल ने मिल कर रात में लगभग ढाई बजे फैजान का शव बोरी में भर कर नाले में फेंक दिया. चूंकि फैजान का परिवार सोहेल पर काफी भरोसा करता था, इसलिए दोनों को विश्वास था कि पुलिस उन के ऊपर कभी शक नहीं करेगी.

लेकिन मोहल्ले में सोहेल 22 अप्रैल को वापस आया था और 23 को शव उस जगह मिला, जहां पहले ही पुलिस कई बार तलाश कर चुकी थी, इसलिए वह शक के घेरे में आ गया. बाकी का काम डीएनए रिपोर्ट के मिलान हो जाने से पुलिस को पुष्टि हो गई, जिस के बाद पुलिस ने दोनों भाईबहनों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

शादी के बाद जल्दी बच्चा होने से हो सकती हैं ये दिक्कतें

अगर आपका भी परिवार आपको जल्दी बच्चा करने के लिए दबाव डालता है तो हो जाए सावधान क्योंकि ऐसी बहुत सी दिक्कतें और असुविधाएं होती हैं जिसके कारण आप भी परेशान रहती हैं और साथ ही मानसिक तनाव भी बढ़ता है जो आपकी सेहत के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है.अक्सर जब किसी की शादी होती है तब उस लड़की की बहुत सी ख्वाहिशें होती हैं जिनके वो पूरा करना चाहती है.लेकिन फिर जब उसपर बच्चे के लिए दबाव बनाया जाता है तो वो बात मान जाती है.जिससे बहुत उसे बहुत सी परेशानियां उठानी पड़ती हैं.

  • सबसे पहला कारण घर के बड़े बुजुर्ग, अगर उनकी उम्र ज्यादा होती है तो सोचते हैं की पोते का तो मुंह देख लिया अब मरने से पहले परपोते का मुंह भी देख लूं इसलिए यहां पर भी लड़की पर फैमिली प्रेशर डाला जाता है और उसे न चाहते हुए भी बच्चे को जन्म देना पड़ता है. जिसके कारण वो उसकी देखभाल भी सही से नहीं कर पाती क्योंकि वो बच्चे के लिए तैयार ही नहीं रहती है.

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  • अगर बच्चा जल्दी हो जाता है तो फिर वो अपने पार्टनर को भी ज्यादा समय नहीं दे पाती क्योंकि जब इंसान शादी करता है तो उसकी कुछ जरुरतें होती हैं जो पूरी करना चाहता हैं वो या चाहती है लेकिन जल्दी बच्चा होने से वो इन सब से दूर होने लगती है ना ही पति को ज्यादा प्यार दे पाती है और ना ही समय जिसके कारण दोनों के ही मन में मन-मुटाव हो जाता है और दूरियां भी काफी हो जाती है इसलिए प्राइवेट लाइफ बहुत जरूरी है शादी के बाद.
  • अगर पति और पत्नी दोनों ही बच्चे के लिए रेडी नहीं होते हैं. उन्हें लगता हैं कि अभी उस बच्चे की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते हैं लेकिन फिर भी बच्चा हो जाए तो उसकी देखभाल करना दोनों के लिए ही दिक्कत हो जाती है.क्योंकि बच्चे को संभालना उसकी देखभाल करना इतना आसान नहीं होता उसकी परवरिश करना पढ़ाना-लिखाना सारी चीजें देखनी पड़ती हैं और अगर इतना बैंक बैलेंस नहीं है व्यक्ति के पास तो दिक्कतें होनी ही हैं.

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  • कभी-कभी शादी कम उम्र में हो जाती है और फिर बच्चें भी जल्दी हो जाते हैं तो इसका असर शरीर पर भी पड़ता है और आप शारीरिक रूप से बहुत कमजोर भी हो जाती हैं क्योंकि उस वक्त तो आप खुद को भी नहीं संभाल पाती तो ऐसे में बच्चें की जिम्मेदारी कहां से संभालेंगी.

इसलिए जब भी आपको लगे कि आप बच्चे की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हैं उसकी परवरिश अच्छे से कर सकती हैं तभी बच्चे तो जन्म दें.कभी भी परिवार के दबाव में आकर बच्चे पैदा न करें.अपनी प्राइवेट लाइफ को शादी के बाद कम-से-कम तीन साल तो आपको देना ही चाहिए हर कपल की ख्वाहिश होती हैं कि उसका पार्टनर उसको समय दें इसलिए इस बात का हमेशा ध्यान रखें.जब आपको लगे कि आपने अपने भविष्य को सुरक्षित बना लिया और बच्चे को अच्छे से पढ़ा-लिखा सकते हैं तभी बच्चे के बारे में सोचें.

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पैरालिसिस: जब सुन्न पड़ जाए जिस्म

शंकर सुबह जागा तो बिस्तर से उठ ही नहीं पाया. उसके जिस्म में ताकत ही महसूस नहीं हो रही थी कि वह करवट भी ले ले. पत्नी को आवाज लगानी चाही तो मुंह टेढ़ा सा हो गया और आंखों के आगे अंधेरा छा गया. घूं-घूं की आवाज गले से निकली और फिर वह बेहोश हो गया. इसके बाद उसकी आंखें अस्पताल में खुलीं. देखा कि पत्नी और बेटा उसके पैरों की मालिश कर रहे थे. शंकर ने कुछ बोलने की कोशिश की तो मुंह से आवाज नहीं निकली. पत्नी उसको देख कर रो पड़ी. बोली, ‘डॉक्टर लकवा बता रहे हैं. भर्ती कर लिये हैं. तुम ठीक हो जाओगे…’ कह कर वह सुबक पड़ी.

शंकर रिक्शा चलाता है. उम्र यही कोई तीस-पैंतीस साल होगी. दुबला-पतला शरीर. जिसने उसकी बीमारी के बारे में सुना हैरान हुआ कि इस उम्र में क्या किसी को लकवा मार सकता है? मगर शंकर पर पैरालिसिस का अटैक पड़ा था. डौक्टर की मानें तो यह तनाव की वजह से हुआ था. शंकर गरीब है, हमेशा पैसे की तंगी रहती है, इसकी वजह से वह काफी दुख, परेशानी और तनाव में रहता है. इसी तनाव ने आखिरकार उसे बिस्तर पर पटक दिया.

पैरालिसिस को आमतौर पर लकवा, पक्षाघात, अधरंग, ब्रेन अटैक या ब्रेन स्ट्रोक के नाम से जाना जाता है. हमारे देश में हर साल 15-16 लाख लोग इस बीमारी की चपेट में आते हें. सही जानकारी न होने या समय पर इलाज न मिलने से इनमें से एक तिहाई लोगों की मौत हो जाती है, जबकि करीब एक तिहाई लोग अपंग हो जाते हैं. अपंगता की हालत में मरीज जीवन भर के लिए अपने परिवार वालों पर आश्रित हो जाता है. लकवाग्रस्त करीब एक तिहाई लोग ही खुशकिस्मत होते हैं, जो वक्त पर सही इलाज मिलने से पूरी तरह ठीक हो जाते हैं और पहले की तरह ही नौर्मल जिन्दगी जीने लगते हैं.

पैरालिसिस का अटैक पड़ने पर आमतौर पर शरीर का एक तरफ का हिस्सा काम करना बंद कर देता है. साथ ही उसी साइड की आंख और मुंह में भी टेढ़ापन आ जाता है. डौक्टर नीना बहल बताती हैं कि मनुष्य के दिमाग का दायां हिस्सा बाईं ओर के अंगों को कंट्रोल करता है और बायां हिस्सा दाईं ओर के अंगों को. पैरालिसिस स्ट्रोक पड़ने पर अगर हमारे दिमाग के दाएं हिस्से में दिक्कत हुई है तो हमारे बाएं हाथ-पैर पर इसका असर पड़ेगा और अगर बाएं तरफ दिमाग में गड़बड़ी हुई है तो दायां हाथ-पैर काम करना बंद कर देगा. आमतौर पर रात को खाना खाने के बाद और सुबह के वक्त पैरालिसिस का अटैक ज्यादा होता है. बोलने में अचानक समस्या हो, शरीर के एक तरफ के हिस्से में भारीपन महसूस हो, चलने में दिक्कत हो, चीजें उठाने में परेशानी हो, एक आंख की रोशनी कम होने लगे, चाल बिगड़ जाए तो फौरन डॉक्टर के पास जाएं. यह तमाम लक्षण पैरालिसिस स्ट्रोक के लक्षण हो सकते हैं.

पैरालिसिस यानी लकवा लाइलाज नहीं है. वक्त पर डौक्टर के पास पहुंच जाएं तो इस बीमारी का इलाज मुमकिन है और मरीज दूसरों पर आश्रित होने से बच जाता है.

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क्या हैं पैरालिसिस की वजहें

–  हमारा मस्तिष्क शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है और पैरालिसिस का सीधा सम्बन्ध हमारे मस्तिष्क से है. हमारा दिमाग ही हमारे शरीर के सभी अंगों और कामकाज को नियंत्रित करता है. जब दिमाग की खून की नलियों में कोई खराबी आ जाती है तो ब्रेन स्ट्रोक होता है, जो पैरालिसिस की वजह बनता है.

–  शरीर के दूसरे हिस्सों की तरह ही दिमाग में भी दो तरह की खून की नलियां होती हैं. एक जो दिल से दिमाग तक खून लाती हैं यानी धमनी, और दूसरी जो दिमाग से वापस दिल तक खून लौटाती हैं यानी शिरा. यों तो पैरालिसिस धमनी या शिरा दोनों में से किसी की भी खराबी से हो सकता है, लेकिन ज्यादातर लोगों  में यह समस्या धमनी में खराबी के कारण होती है.

–  हाई ब्लड प्रेशर, तनाव, गुस्सा, तेज बुखार आदि के कारण जब धमनी में खून का दबाव बहुत ज्यादा हो जाता है, तब या तो वह लीक करने लगती है अथवा फट जाती है, इससे खून बाहर निकलकर जम जाता है. जैसे-जैसे खून की मात्रा बढ़ती जाती है ‘क्लॉट’ यानी ‘खून के थक्के’ का साइज बढ़ता जाता है और जल्द ही यह थक्का खून की नली या उसके जख्म को बंद कर देता है, जिससे खून का निकलना तो बंद हो जाता है लेकिन यह नाड़ी में खून के आवाजाही के रास्ते को ब्लॉक कर देता है. बहुत से मरीजों में ब्रेन हेमरेज के वक्त इतना खून निकल जाता है कि सिर के अंदर दबाव बढ़ जाता है और इससे दिमाग काम करना बंद करने लगता है. इस बढ़ते दबाव की वजह से सिरदर्द या उलटी होने लगती है. ज्यादा दबाव बढ़ने पर बेहोशी, पैरालिसिस, सांस अटकने जैसी परेशानी हो जाती है.

–  खून की नली के बंद होते ही दिमाग का वह हिस्सा औक्सीजन के अभाव में भूखा-प्यासा तड़पने लगता है और काम करना बंद कर देता है. अगर दिमाग के इस भाग को आसपास से भी खून नहीं मिल पाता या खून की नली का क्लौट ज्यों का त्यों पड़ा रहता है तो दिमाग के इस भाग को भारी नुकसान पहुंचता है. इस भाग की कोशिकाएं मरने लगती हैं. यह पैरालिसिस स्ट्रोक का मुख्य कारण है. ऐसे में दो काम अहम होते हैं.

– पहला, जहां नली के फटने के कारण खून बाहर निकला है, वहां जल्दी से जल्दी थक्के को हटाना और दूसरा, धमनी जहां खून लेकर जा रही थी, वहां जल्दी से जल्दी खून पहुंचाना. अगर मरीज को जल्दी अस्पताल न पहुंचाया गया और समय रहते उसका इलाज शुरू नहीं हुआ तो दिमाग और शरीर पर असर पड़ता है और समस्या बढ़ने पर रोगी की जान भी जा सकती है. यही वजह है कि पैरालिसिस के इलाज में टाइम बहुत अहम चीज हो जाती है. जल्दी इलाज मिल जाए तो ज्यादा नुकसान होने से बचा जा सकता है. खून के थक्के को हटाने के लिए दवाएं चढ़ायी जाती हैं, अथवा सर्जरी करके थक्के को जल्द से जल्द हटा दिया जाता है ताकि दिमाग में खून पहुंचाने वाली नाड़ियों का अवरोध समाप्त हो सके.

कैसे होता है पैरालिसिस

चाहे हेमरेज हो या स्ट्रोक, दिमाग का प्रभावित हिस्सा काम करना बंद कर देता है. दिमाग के अंदर बना क्लौट आसपास के हिस्से को दबाकर निष्क्रिय कर देता है. ऐसे में उस हिस्से का जो भी काम है, उस पर असर पड़ता है. इससे हाथ पांव चलने बंद हो सकते हैं, दिखने और खाना निगलने में दिक्कत हो सकती है, बोलने में परेशानी हो सकती है और बात समझने में मुश्किल आ सकती है. अगर दिमाग का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो तो स्ट्रोक जानलेवा भी साबित हो सकता है.

पैरालिसिस अचानक होता है. अक्सर देखा गया है कि पीड़ित रात का खाना खाकर सोया, मगर सुबह उठने पर पता चलता है कि उसके हाथ पांव काम नहीं कर रहे हैं. वह खड़ा होने की कोशिश करता है तो गिर पड़ता है. कई बार दिन में ही काम करते या खड़े-खड़े अथवा बैठे-बैठे अचानक पैरालिसिस का अटैक पड़ जाता है. ब्रेन हेमरेज अक्सर तेज सिरदर्द और उलटी के साथ शुरू होता है.

फेशियल पैरालिस्सिस भी बहुत कॉमन है. यह चेहरे की मसल्स के कमजोर होने से होता है. यह वायरल इंफेक्शन या उसके बाद भी हो सकता है. मरीज में इस तरह का कोई लक्षण या हिस्ट्री नहीं होने के बावजूद यह हो सकता है. इसमें चेहरे के एक तरफ का हिस्सा टेढ़ा सा होने लगता है और वहां पर स्पर्श महसूस नहीं होता.

ब्रेन हेमरेज और स्ट्रोक में फर्क

ब्रेन हेमरेज में खून की नली दिमाग के अंदर या बाहर फट जाती है. अगर बहुत तेज सिरदर्द  के साथ उलटी और बेहोशी छाने लगे तो हेमरेज होने की आशंका ज्यादा होती है. ब्रेन हेमरेज से भी पैरालिसिस होता है. इसमें दिमाग के बाहर खून निकल जाता है और इसे हटाने के लिए सर्जरी करके क्लॉट को हटाया जाता है. अगर किसी भी रुकावट की वजह से दिमाग को खून की सप्लाई में कोई रुकावट आ जाए तो उसे स्ट्रोक कहते हैं. स्ट्रोक और हेमरेज, दोनों से ही पैरालिसिस हो सकता है.

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लकवे के कारण

–  हाई ब्लड पे्रशर

–  डायबिटीज

–  स्मोकिंग

–  दिल की बीमारी

–  मोटापा

–  बुढ़ापा

कैसे खतरा कम करें

– हार्ट की बीमारी है तो उसकी उचित जांच और इलाज कराएं. 20-25 साल की उम्र से ही नियमित रूप से ब्लड प्रेशर चेक कराएं. डौक्टर की सलाह पर खाने में परहेज करें और एक्सरसाइज बढ़ाएं.

–  अगर आपका ब्लड प्रेशर 120/80 है तो अच्छा है. ज्यादा है तो 135/85 से कम लाना लक्ष्य होना चाहिए.

–  40 साल के बाद साल में एक बार शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच जरूरी रकराएं.

–  वजन कंट्रोल में रखें. कोई बीमारी न हो तो भी 40 की उम्र के बाद ज्यादा नमक और फैट वाली चीजें कम खाएं.

–  तनाव और गुस्से से दूर रहें. मन को हमेशा शान्त रखें.

मिथ और फैक्ट

मिथ – पैरालिसिस का कोई इलाज नहीं.

फैक्ट – पैरालिसिस का इलाज मुमकिन है, बशर्ते जल्द से जल्द सही इलाज मिल जाए.

मिथ – पैरालिसिस अपने आप ठीक हो जाता है.

फैक्ट – अक्सर ऐसा नहीं होता है. अगर होता भी है तो आगे ज्यादा घातक पैरालिसिस अटैक न पड़े इसके लिए जांच और इलाज जरूरी है.

मिथ – कबूतर खाने या उसका शोरबा पीने से यह ठीक हो जाता है.

फैक्ट – ऐसी कोई बात नहीं है. मेडिकल हिस्ट्री में ऐसा कोई सबूत नहीं है. डॉक्टर इसे फिजूल की बात कहते हैं.

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घर पर बनाएं हरे मटर की बर्फी

हरी मटर की सब्जी तो आप बनाएं होंगे. पर क्या आपने कभी हरी मटर की बर्फी बनाया है. जी हां, आप हरी  मटर की बर्फी भी बना सकते हैं. तो आइए आज आपको हरी मटर की बर्फी बनाने की रेसिपी बताते हैं.

सामग्री

हरी मटर- 1 कप

पीस्ते (पानी में गर्म कर के छिलके हटा ले)

1/2 कप घी-

3 चम्‍मच मावा

2 कप शक्‍कर

3/4 कप हरी इलायची पावडर

3/4 चम्‍मच शक्कर

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बनाने की विधि

सबसे पहले एक मिक्‍सर जार में हरी मटर और थोड़ा सा पानी डाल कर उसे पीस लें.

फिर नौन स्‍टिक पैन में घी गरम करें, उसमें पिसी मटर डालें और लगातार चलाते हुए उसका पानी खतम कर लें.

फिर पैन में मावा डाल कर अच्‍छी तरह से मिक्‍स करें.

उसके बाद इसमें शक्‍कर मिलाएं और चलाएं.

अब दूसरी ओर एक एल्‍युमीनियम की ट्रे पर घी लगाएं.

फिर इसमें हरी इलायची और आधे पिस्‍ते डाल कर मिक्‍स करें.

इस मिश्रण को ट्रे पर डालिये और फैलाइये.

ऊपर से बाकी के बचे हुए पिस्‍ते डालिये और बर्फी को ठंडा होने के लिये रख दीजिये.

जब बर्फी ठंडी हो जाए, तब उसे फ्रिज में रख दीजिये और बाद में उसे निकाल कर चाकू से काट कर सर्व करें.

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मलमल की चादर : भाग 1

आज फिर बरसात हो रही है. वर्षा ऋतु जैसी दूसरी ऋतु नहीं. विस्तृत फैले नभ में मेघों का खेल. कभी एकदूसरे के पीछे चलना तो कभी मुठभेड़. कभी छींटे तो कभी मूसलाधार बौछार. किंतु नभ और नीर की यह आंखमिचौली तभी सुहाती है जब चित्त प्रसन्न होता है. मन चंगा तो कठौती में गंगा. और मन ही हताश, निराश, घायल हो तब…? वैदेही ने कमरे की खिड़की की चिटकनी चढ़ाई और फिर बिस्तर पर पसर गई.

उस की दृष्टि में कितना बेरंग मौसम था, घुटा हुआ. पता नहीं मौसम की उदासी उस के दिल पर छाईर् थी या दिल की उदासी मौसम पर. जैसे बादलों से नीर की नहीं, दर्द की बौछार हो रही हो. वैदेही ने शौल को अपने क्षीणकाय कंधों पर कस कर लपेट लिया.

शाम ढलने को थी. बाहर फैला कुहरा मन में दबे पांव उतर कर वहां भी धुंधलका कर रहा था. यही कुहरा कब डूबती शाम का घनेरा बन कमरे में फैल गया, पता ही नहीं चला. लेटेलेटे वैदेही की टांगें कांपने लगीं. पता नहीं यह उस के तन की कमजोरी थी या मन की. उठ कर चलने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी उस की. शौल को खींच कर अपनी टांगों तक ले आई वह.

अचानक कमरे की बत्ती जली. नीरज थे. कुछ रोष जताते हुए बोले, ‘‘कमरे की बत्ती तो जला लेतीं.’’ फिर स्वयं ही अपना स्वर संभाल लिया, ‘‘मैं तुम्हारे लिए बंसी की दुकान से समोसे लाया था. गरमागरम हैं. चलो, उठो, चाय बना दो. मैं हाथमुंह धो आता हूं, फिर साथ खाएंगे.’’

एक वह जमाना था जब वैदेही और नीरज में इसी चटरमटर खाने को ले कर बहस छिड़ी रहती थी. वैदेही का चहेता जंकफूड नीरज की आंख की किरकिरी हुआ करता था. उन्हें तो बस स्वास्थ्यवर्धक भोजन का जनून था. लेकिन आज उन के कृत्य के पीछे का आशय समझने पर वह मन ही मन चिढ़ गई. वह समझ रही थी कि समोसे उस के खानेपीने के शौक को पूरा करने के लिए नहीं थे बल्कि यह एक मदद थी, नीरज की एक और कोशिश वैदेही को जिंदगी में लौटा लाने की. पर वह कैसे पहले की तरह हंसेबोले?

वैदेही तो जीना ही भूल गई थी जब डाक्टर ने बताया था कि उसे कैंसर है. कैंसर…पहले इस चिंता में उस का साथ निभाने को सभी थे. केवल वही नहीं, उस का पूरा परिवार झुलस रहा था इस पीड़ाग्नि में. वैदेही का मन शारीरिक पीड़ा के साथ मानसिक ग्लानि के कारण और भी झुलस उठता था कि सभी को दुखतकलीफ देने के लिए उस का शरीर जिम्मेदार था. बारीबारी कभी सास, कभी मां, कभी मौसी, सभी आई थीं उस की 2 वर्र्ष पुरानी गृहस्थी संभालने को. नीरज तो थे ही. लेकिन वही जानती थी कि सब से नजरें मिलाना कितना कठिन होता था उस के लिए. हर दृष्टि में  ‘मत जाओ छोड़ कर’ का भाव उग्र होता. तो क्या वह अपनी इच्छा से कर रही थी? सभी जरूरत से अधिक कोशिशें कर रहे थे. शायद कोई भी उसे खुश रखने का आखिरी मौका हाथ से खोना नहीं चाहता था.

अब तक उस की जिंदगी मलमल की चादर सी रही थी. हर कोई रश्क करता, और वह शान से इस मलमल की चादर को ओढ़े इठलाती फिरती. लेकिन पिछले 8 महीनों में इस मलमल की चादर में कैंसर का पैबंद लग गया था. इस की खूबसूरती बिगड़ चुकी थी. अब इसे दूसरे तो क्या, स्वयं वैदेही भी ओढ़ना नहीं चाहती थी. आजकल आईना उसे डराता था. हर बार उस की अपनी छवि उसे एक झटका देती.

‘‘धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. देखो न, तुम्हारे बाल फिर से आने लगे हैं. और आजकल तो इस तरह के छोटे कटे बाल लेटेस्ट फैशन भी हैं. क्या कहते हैं इस हेयरस्टाइल को…हां, याद आया, क्रौप कट,’’ आईने से नजरें चुराती वैदेही को कनखियों से देख नीरज ने कहा.

क्यों समझ जाते हैं नीरज उस के दिल की हर बात, हर डर, हर शंका? क्यों करते हैं वे उस से इतना प्यार? आखिर 2 वर्ष ही तो बीते हैं इन्हें साथ में. वैदेही के मन में जो बातें ठंडे छींटे जैसी लगनी चाहिए थीं, वे भी शूल सरीखी चुभती थीं.

समोसे और चाय के बाद नीरज टीवी देखने लगे. वैदेही को भी अपने साथ बैठा लिया. डाक्टरों के पिछले परीक्षण ने यह सिद्ध कर दिया था कि अब वैदेही इस बीमारी के चंगुल से मुक्त है. सभी ने राहत की सांस ली थी और फिर अपनीअपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए थे. रिश्तेदार अपनेअपने घर लौट गए थे. नीरज सारा दिन दफ्तर में व्यस्त रहते. लेकिन शाम को अब भी समय से घर लौट आते थे. डाक्टरी राय के अनुसार, नीरज हर मुमकिन प्रयास करते रहते वैदेही में सकारात्मक विचार फूंकने की.

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