लगभग 25 वर्ष पहले अनिल कपूर के छोटे भाई संजय कपूर ने जब बौलीवुड में अभिनेता के रूप में संजय कपूर ने कदम रखा था, तो एक नया इतिहास रचा था. उनकी तीन फिल्में प्रदर्शन के लिए तैयार थीं और वह चार फिल्मों की शूटिंग कर रहे थे. उनकी एक भी फिल्म प्रदर्शित नही हुई थी. पर ‘‘टिप्स संगीत ’’ कंपनी  एक औडियो कैसेट ‘‘हिट्स औफ संजय कपूर’ ’बाजार में लेकर आयी थी. यह एक अलग बात है कि उसके बाद उनका करियर काफी हिचकोले लेकर आगे बढ़ता रहा. बीच में उन्होने अभिनय से दूरी बनाते हुए ‘तेवर’ सहित दो फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें से एक फिल्म आज तक सिनेमाघरों में नहीं पहुंच पायी. पर पिछले तीन चार वर्षों से वह बतौर अभिनेता कई उंचाइयां छू रहे हैं. उन्हें टीवी सीरियल के अलावा वेब सीरीज ‘‘लस्ट स्टोरीज’’ के अलावा फिल्म ‘‘मिशन मंगल’’में जमकर तारीफ मिली. फिलहाल वह फिल्म‘‘द जोया फैक्टर’’को लेकर चर्चा में हैं, जिसमें वह निजी जिंदगी की भतीजी सोनम कपूर के पिता के किरदार में है. यह फिल्म 20 सितंबर को प्रदर्शित हो रही है.

जब आपने अपने करियर की शुरुआत की थी, तब आपकी फिल्मों के सिनेमाघर में प्रदर्शन से पहले ही  टिप्स कंपनी ने ‘‘हिट्स आफ संजय कपूर’ नामक औडियो कैसेट निकाला था. यह क्या मसला था. आपने उस वक्त क्या सोचा था?

जब हम करियर में शुरूआत कर रहे होते हैं, उस वक्त जो कुछ भी हो रहा होता है, हम उसका लुत्फ नही उठा पाते. उस वक्त हम अपने काम में इतना व्यस्त रहते हैं कि हमें लगता है कि शायद ऐसा ही हर कलाकार के साथ होता होगा. आज जब मैं सोचता हूं, तो मुझे लगता है कि मेरी फिल्म आयी भी नहीं थी और टिप्स वालों ने ‘हिट्स आफ संजय कपूर’ कैसेट निकाल दिया था. जिस कलाकार की एक भी फिल्म रिलीज नहीं हुई हो, उसके ऊपर औडियो आना बड़ी बात है. यह 25 साल पहले 1995 की बात है. कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो पीछे मुड़कर देखने पर अचंभित करती हैं. आज जब मैं इंसान व कलाकार के तौर पर परिपक्व हो चुका हूं, तो मुझे अहसास होता है कि वह कैसेट आना कितनी बड़ी उपलब्धि थी. आपने टिप्स के कैसेट की बात की, आपको यह वाकया याद है, यह बहुत बडी बात है. आज मैं पीछे मुड़ मुड़ का देखता हूं, तो अपने आपको प्रिविलेज्ड महसूस करता हूं.

आपके 25 साल के करियर के टर्निंग प्वौइंट क्या रहे?

मैं ऐसे कोई टर्निंग प्वौइंट नहीं मानता हूं. जब 25 साल का करियर होता है, तो आप कुछ सही निर्णय लेते हैं, कुछ गलत निर्णय लेते हैं. आपने सही निर्णय लिया है, सही काम किया है, पर किसी अन्य की गलती से भी परिणाम गलत निकल सकते हैं. एक फिल्म की सफलता और असफलता के पीछे कई वजहें होती हैं. आप इंसान हैं और हर इंसान से गलती होना स्वाभाविक है. फिर चाहे वह कलाकार हो या डौक्टर हो या कोई अन्य पेशेवर हो. हर इंसान सोचकर गलती नहीं करता. इंसान तो यही सोचता कि वह सही कर रहा है, पर गलत हो जाता है. फिर फिल्म का जो अंतिम परिणाम आता है, उसके गलत होने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं. आपकी अपनी गलती हो सकती है, निर्देशक या निर्माता या फिल्म वितरण करने वाले से गलती हो सकती है. फिल्म रिलीज का समय गलत हो सकता है. बहुत सी चीजें होती हैं.

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मतलब?

शायद आपको पता होगा कि पहले एक फिल्म निर्माण में 2 से 4 साल का वक्त लगता था. अब तो  छह माह में फिल्में बन जाती हैं. यह एक अलग बात है कि फिल्म के निर्माण से पहले उसके प्रोडक्शन में, उसकी तैयारी में एक से डेढ़ साल का समय लगाते हैं. मेरी एक फिल्म ‘‘छुपा रुस्तम’’ थी, जो कि सुपरहिट  हुई थी. पर इसके निर्माण में पांच साल का वक्त लग गया था. इस फिल्म की शूटिंग मैंने 1994 में शुरू की थी. निर्माता के साथ कुछ समस्याएं खड़ी हो गईं, तो फिल्म रुक गयी. उसके बाद राज बब्बर साहब राजनीति में चले गए, इस कारण फिल्म रुक गयी. इस फिल्म में राज बब्बर साहब का बहुत महत्वपूर्ण किरदार था. फिर मनीषा कोइराला की अपनी समस्याएं शुरू हो गई थीं. जिसके चलते यह फिल्म रूकी रही. शूटिंग बार बार रुकती गयी. पूरे 5 साल के बाद 1999 में यह फिल्म रिलीज हुई, तो सुपर डुपर हिट हो गयी. अमूमन इस तरह की फिल्में सफल नही होती.‘‘छुपा रुस्तम’’ के निर्माण में पांच साल की जो देरी हुई, उसमें किसी की कोई गलती नहीं थी. अच्छा हुआ कि फिल्म चल गई, पर यदि फिल्म ना चलती, तो किसी ने किसी पर तो दोषारोपण किया जाता. कहीं वक्त गलत हो जाता. अक्सर होता है कि जब हम कोई कहानी सुनते हैं, तो हमें लगता है कि आप बिल्कुल सही समय पर बन रही फिल्म है, पर उसके बनने में देरी हुई, तो पता चलता है कि जब फिल्म रिलीज हुई, तो वक्त गलत हो चुका था. और फिल्म नहीं चली. अब ऐसी स्थिति में मैं किसे क्या दोष दूं. पहले जमाने में तो एक फिल्म के बनने में 2 से 4 साल का वक्त लगता था, 2 साल के बाद फिल्म के जौनर का जो ट्रेंड है, वह बदल गया, तो आप क्या करेंगे?

अब तो फिल्म के निर्माण में दो साल नहीं लगते हैं. मगर अब उसकी पहले से तैयारी करने में समय ज्यादा लगाते हैं. उसके बाद फिल्म बनने में सिर्फ 6 माह लगते हैं. ऐसे में यदि शूटिंग के समय पता चला कि ट्रेंड बदल गया है, तो उसमें बदलाव करना आसान है. हम फिल्म के संगीत को भी शूटिंग शुरू होने के समय ही रिकौर्ड करते हैं. कई बार तो फिल्म की शूटिंग के दौरान ही गाने रिकौर्ड किए जाते हैं. वह समसामायिक लगते हैं. मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि सिर्फ संगीत की वजह से ही कुछ फिल्में चली या नहीं चली.

पहली बार मैंने फिल्म‘‘द जोया फैक्टर’’ में पिता का किरदार निभाया है. ऊपर से सोनम के पिता का किरदार है, जिसके चलते लोगों को ज्यादा रोचकता नजर आएगी. इसलिए कह सकता हूं कि मेरा भविष्य उज्ज्वल है. लोग मुझे आने वाले कल में कुछ बेहतरीन किरदारों में देख सकेंगे.

लेकिन बीच में आप अभिनय को बाय बाय कर फिल्म निर्माण से जुड़ गए थे?

अभिनय को बाय बाय नही किया था. ऐसा कभी नही रहा कि मेरे पास फिल्मों के आफर न आए हों. मैं मानता हूं कि मुझे सौ फिल्मों के नही, मगर 10-12 फिल्मों के आफर लगातार आ रहे थे. लेकिन वह कहीं ना कहीं मुझे सही नहीं लग रहे थे. या उनमें कुछ ऐसा था, जिसे करने के लिए मेरा मन गवाही नहीं दे रहा था. तो मैंने नहीं किया. तब मैने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए कि बौलीवुड से जुडा रहूं. मेरे पिता मेरे जन्म के पहले से फिल्म निर्माण कर रहे थे. मेरे भाई बोनी कपूर भी फिल्म निर्माण कर रहे हैं.तो मैने भी सोचा कि फिल्में बनाई जाएं. दो फिल्में बनाई. एक फिल्म कुछ वजहों से हम प्रदर्शित नही कर पाए. पर ‘तेवर’ को प्रदर्शित किया. पर बाक्स आफिस पर इसे लोगों ने पसंद नही किया.

आपको नहीं लगता कि ‘‘तेवर’’ बनाना आपकी गलती थी?

मुझे लगता है कि फिल्म ‘‘तेवर’’ अपने समय से दो साल बाद आयी. यदि यह फिल्म दो साल पहले बनकर प्रदर्शित हो जाती, तो इसका अंजाम कुछ और होता. जब मैंने ‘तेवर’ बनाई, उस वक्त तक ‘तेवर’ के जौनर की कम से कम 25 से तीस फिल्में दर्शक देख चुके थे. जिसकी शुरूआत ‘‘दबंग’’ से शुरू हुई थी. उसके बाद ‘राउडी राठौड़’, ‘बुलेट राजा’, ‘आर राजकुमार’ जैसी फिल्में आ गयी थी. तो वहीं ‘तेवर’ के रिलीज के समय का वह दौर था, जब लोग बदल रहे थे. उस वक्त दर्शक लार्जर देन लाइफ वाली फिल्मों से दूरी बना रहा था. दर्शकों का झुकाव रियलिस्टिक सिनेमा की तरफ हो रहा था. सिनेमा के बदलते दौर का भी खामियाजा ‘तेवर’ को भुगतना पड़ा था. अब देखिए न ‘स्पेशल 26’, ‘उरी’,‘राजी’ व ‘‘मिशन मंगल’ जैसी फिल्मों की तरफ दर्शकों का झुकाव हो गया. जब सिनेमा बदलाव के मुहाने पर था, तभी मेरी फिल्म ‘तेवर’ आई और वह भी उस जौनर की, जिस जौनर की पचास से अधिक फिल्में आ चुकी थीं. इसके अलावा हमारी फिल्म ‘तेवर’ की हीरोइन सोनाक्षी सिन्हा ने बहुत अच्छा काम किया था, मगर मैंने जिन फिल्मों के नाम गिनाए, ऐसी छह फिल्मों में वह खुद हीरोइन थीं. तो लोगों को लगा कि सानेाक्षी ने इसमें खुद को दोहराया होगा. जबकि बाद में जिन लोगों ने टीवी पर या सेटेलाइट चैनल पर ‘तेवर’ को देखा, उन सभी ने फिल्म ‘तेवर’ की तारीफ के पुल बांधे,पर सिनेमाघरो में दर्शक इसे नकार चुके थे.

मैं आज भी दावे के साथ कहता हूं कि फिल्म ‘‘तेवर’’ के निर्देशक अमित शर्मा प्रतिभाशाली थे. उन्होंने ही असफलता का दंश झेलते हुए ‘‘बधाई हो’’ जैसी सफलतम फिल्म दी. उसी निर्देशक ने आयुष्मान खुराना को लेकर 100 करोड़ की फिल्म ‘‘बधाई हो’’ बना डाली. मेरे कहने का अर्थ यह है कि यदि मेरी फिल्म ‘तेवर’ दो साल पहले आ जाती, तो परिणाम कुछ और होता.

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‘‘तेवर’’ की असफलता के बाद आपने फिल्म निर्माण से तौबा कर लिया?

ऐसा नही है. सच यह है कि ‘तेवर’’ की शूटिंग खत्म होने से पहले मैंने दो तीन पटकथाओं पर फिल्म बनाने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था. मगर ‘तेवर’ के प्रदर्शन से पहले ही मुझे फिल्म ‘‘शानदार’’ में अभिनय करने का अवसर मिला. मैं मूलतः अभिनेता ही हूं, इसलिए इसे प्राथमिकता दी. फिर‘शानदार’ की शूटिंग के दौरान अभिनेता के तौर पर तीन चार फिल्में भी अनुबंधित कर ली. पर फिर वही हुआ. फिल्म ‘शानदार’ बौक्स आफिस पर बुरी तरह से असफल हो गयी. लेकिन लोगों ने मेरे काम की तारीफ की. फिल्म ‘शानदार’ के बाद ही मुझे टीवी सीरियल ‘दिल संभल जा जरा’ में बेहतरीन किरदार निभाने का मौका मिल गया, जो कि पूरे एक वर्ष चला. फिर वेब सीरीज ‘‘लस्ट स्टोरीज’’ मिल गयी. फिर ‘मिशन मंगल’, ‘द जोया फैक्टर’ मिल गयी. परिणामतः फिल्म निर्माण का सिलसिला थम गया. लेकिन फिल्म निर्माण मेरे खून में है, आगे करूंगा.

आपने फिल्म ‘‘मिशन मंगल’’ में अपनी ही पुरानी फिल्म ‘‘राजा’’ के गीत ‘‘दिलबर’’ पर नृत्य किया है?

जी हां! यह भी उपलब्धि ही है. आज जब फिल्मों पुराने रीमिक्स गीत आ रहे हैं, तो मैं पहले ऐसा कलाकार हूं, जिसने अपना रीमिक्स गाना खुद किया है. ‘दिलबर’ मेरा सुपरहिट गाना था. मैने कई वर्ष पहले इस गाने को सुष्मिता सेन के साथ किया था.

जब आपको ‘‘मिशन मंगल’’ में ‘दिलबर’ गाने के रीमिक्स पर नृत्य करना था, तो आपकी पहली  प्रतिक्रिया क्या थी?

मुझे यह बताया गया था कि एक गाने पर मुझे नृत्य करना होगा, पर तब गीत तय नहीं था. पर अंत में ‘दिलबर’ गाना तय हुआ. सब कुछ बहुत जल्द हुआ था, तो ज्यादा सोचने या तैयारी करने का अवसर नहीं मिला. फिल्म देखकर लोगों ने इस गाने को काफी पसंद किया. मैंने खुद मुंबई के भी पीवीआर सिनेमाघर में दर्शकों के साथ जाकर यह फिल्म देखी. जब यह गाना परदे पर आया, उस समय लोगों ने जो तालियां व सीटी बजायी, उससे मुझे आत्मसंतुष्टि मिली. फिल्म खत्म होने के बाद लोगों की नजर मुझ पर पड़ी. तो लोगों ने मुझे घेर लिया, सेल्फी खींची. इनमें से ज्यादातर लोग 25 से 30 साल की उम्र के थे, जिन्होंने शायद उस वक्त फिल्म ‘‘राजा’’ देखी भी नहीं होगी. इन्हें तो पता भी नही होगा कि उस वक्त ‘राजा’ कितनी बड़ी सफल फिल्म थी. पर उसी गाने को देखकर लोगों ने मुझे ना सम्मान दिया. यह बात मुझे उस मुकाम पर लाती है, जहां आप स्व.राज कपूर या स्व. देवानंद या स्व.गुरुदत्त को याद करते हैं. मैं इनसे अपनी तुलना नही कर रहा. मैं तो सिर्फ इस गाने के संदर्भ में यह बात कर रहा हूं. जब भी आप इन कलाकारों के गाने सुनेंगे, तो आपको उनका चेहरा नजर आएगा. ‘दिलबर’  गीत को आज जो सफलता मिली है, उससे मुझे लगता है कि इंसान का वक्त बदलता है, तो बहुत कुछ बदल जाता है. ‘दिलबर’ गीत का रीमेक पांच साल या उससे पहले भी आ सकता था. पर जब वक्त बदला, तब आया.

आपने संगीत की बात की. आपको नहीं लगता आज वैसा संगीत नही बन रहा कि लोग उस तरह से संगीत के दीवाने हो जाएं,जैसे बीस साल पहले लोग हो जाते थे?

वक्त के साथ काफी कुछ बदला है. पहले जब लोग कार खरीदते थे, तो सोचते थे कि कौन सा डेक लगाएं?  लोगों की रूचि स्पीकर लगाने को लेकर होती थी. मगर आज जब इंसान कार खरीदकर उसमें बैठता है, तो मोबाइल फोन में ही लगा रहता है. कई बार ऐसा होता है कि मैं घर से निकलने के लिए तैयार होते समय सोचता हूं कि लोगों से गाड़ी में बैठकर बात कर लूंगा. कुछ लोग सोशल मीडिया में लगे रहते हैं. ऐसे में अब लोगों के पास संगीत सुनने का वक्त ही नही है. ऐसा नहीं है कि लोग गाने सुनते नहीं है, पर अब उनके पास च्वाइस बहुत हैं.

आपने उस दौर में भी काम किया है, जब फिल्में बनने में 2 से 3 वर्ष का समय लगता था. अब एक ही शिड्यूल में छह माह में बनती है, यदि हम प्री व पोस्ट प्रोडक्शन को छेाड़ दें. ऐसे में एक कलाकार के तौर पर ज्यादा सहूलियत कब महसूस होती है?

डेफिनेटली वर्तमान में. अब आपने फिल्म ‘मिशन मंगल’ देखी है. इसमें मेरे घर के हिस्से का काम पूरे आठ दिन में खत्म हुआ. मैंने एक साथ 8 दिन में कर लिया था. रोज जब मैं उठता था, तो मैं उस किरदार के बारे में ही सोचता था. टीवी सीरियल में सौ दिन का काम पांच 5 महीने में पूरा किया. तो मैं उठते बैठते उसी किरदार में रहता था. मगर जब मैंने करियर शुरू किया था, तब 15 दिन में ‘राजा’, दस दिन प्रेम करता था . कभी ‘प्रेम’ का कर्तव्य तो कभी ‘बेकाबू’ का जादूगर बन जाता था. ऐसे में किरदार के साथ सामंजस्य बनाकर रखना कठिन होता था.

तो उस दौरान किरदारों के साथ न्याय करना मुश्किल होता होगा?

जी हां!! मुश्किल होता था. हम एक सेट से दूसरे सेट पर भाग रहे होते थे. आप चाहे जितने प्रतिभाशाली हों, पर बार बार दूसरे किरदार में खुद को ढालना आसान नहीं होता. हम जिस कलाकार से परिचित नहीं हाते थे, उसके साथ तीन दिन पहले स्क्रिप्ट पढ़ते थे. जब आप सेट पर पहुंचते, तो लगता कि आप परीक्षा देने जा रहे हैं. अमूमन पहले से पटकथा व संवाद भी नहीं मिलते थे. मेकअप के दौरान भी बताया जाता था कि निर्देशक अभी पटकथा लिख रहे हैं. सेट पर पहुंचने के बाद हमें उस सीन की जानकारी व संवाद मिलते थे. फिर भी उस दौरान फिल्म जरूर हिट होती थी. अच्छा काम भी करते थे. आज का समय बहुत ही मैथड है. हर चीज बहुत ही सिस्टमैटिक है.

क्या डिजिटलाइजेशन में सैल्यूलाइड वाला मजा है?

मेरी राय में सौ प्रतिशत. बड़े परदे पर फिल्म देखने का जो मजा है, वह कभी नहीं बदलेगा. 25 साल पहले जब वीसीआर/वीडियो आया, तब लोगों ने कहा कि इंडस्ट्री खत्म हो जाएगी. पर नही हुई. जब कलर टीवी आया, लोगों ने कहा कि सेटेलाइट में तो 4 हफ्ते के बाद पिक्चर टीवी पर आ जाती है, ऐसे में थिएटर में कौन देखेगा? पर आज दो हफ्तों में ही इतने लोग पिक्चर देख लेते हैं जो पहले 25 हफ्तों में भी नहीं देखते थे. आज फिल्में चार हजार सिनेमाघरों में एक साथ प्रदर्शित होती है. पहले केवल 60 सिनेमाघरों में लगती थी. तो समय के साथ बहुत कुछ बदला है.

फिल्म‘‘द जोया फैक्टर’’को व इसके किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

यह अनुजा चौहाण के इसी उपन्यास पर बनी फिल्म है. इसमें मैंने जोया सिंह सोलंकी (सोनम कपूर) के पिता विजयेंद्र सिंह सोलकी का किरदार निभाया है. जो कि एक रिटायर्ड आर्मी औफिसर है. उसका एक बेटा जोरावर सिंह सोलंकी (सिकंदर खेर ) भी है, जो कि आर्मी आफिसर है. विजयेंद्र सिंह मैन औफ प्रिंसिपल है. उनका बच्चों के साथ जो रिलेशन है, वह दोस्तों की तरह है. जोक्स क्रिएट करते हैं, साथ में क्रिकेट देखते हैं. वह पिता जरूर है, पर ‘मिशन मंगल’ में जिस तरह का पिता है, उस तरह का नहीं.

सोनम कपूर रीयल लाइफ में आपकी भतीजी हैं. भतीजी मतलब बेटी. अब उसी को पर्दे पर जीना कितना सहज रहा?

एकदम सहज.अगर सोनम की जगह कोई दूसरी लड़की भी होती, तो मुझे काम तो उतना ही करना था.

भविष्य की योजना?

एक फिल्म ‘‘बेढब’’ जल्द रिलीज होगी.एक वेब सीरीज की है.एक दूसरी वेब सीरीज की शूटिंग करने वाला हूं.

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