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हम हैं राही प्यार के : भाग 1

उस समय आंध्र प्रदेश अविभाजित था. हैदराबाद के एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज में श्रीराम और प्रेमा पढ़ रहे थे. श्रीराम आंध्र प्रदेश से था जबकि प्रेमा बिहार के पटना शहर से थी. दोनों ही कंप्यूटर साइंस फाइनल ईयर की परीक्षा दे चुके थे और दोनों को कैंपस से जौब मिल चुकी थी. मगर दोनों का एमबीए करने का इरादा था जिस के लिए उन्होंने जी मैट और जी आर ई टैस्ट भी दिए थे. दोनों का चयन हैदराबाद के ‘इंडियन स्कूल औफ बिजनैस’ के लिए हो चुका था.

कालेज में फर्स्ट ईयर के दिनों में दोनों में कोईर् खास जानपहचान नहीं थी. दोनों एक ही सैक्शन में थे बस इतना जानते थे. सैकंड ईयर से प्रेमा और श्रीराम दोनों लैब के एक ही ग्रुप में थे और प्रोजैक्ट्स में भी दोनों का एक ही ग्रुप था. प्रेमा को तेलुगु का कोई ज्ञान नहीं था, जबकि श्रीराम अच्छी हिंदी बोल लेता था. दोनों में अच्छी दोस्ती हुई. प्रेमा ने धीरेधीरे तेलुगु के कुछ शब्द सीख लिए थे. फिर दोनों कैंपस के बाहर एकसाथ जाने लगे. कभी लंच, कभी डिनर या कभी मूवी भी. दोस्ती प्यार का रूप लेने लगी तो दोनों ने मैनेजमैंट करने के बाद शादी का निर्णय लिया.

श्रीराम को प्रेमा श्री पुकारती थी. श्री हैदराबाद के अमीर परिवार से था. उस के पापा पुलिस में उच्च पद पर थे. श्री अकसर कार से कालेज आता था. प्रेमा मध्यवर्गीय परिवार से थी. पर इस फासले से उन के प्यार में कोई फर्कनहीं पड़ने वाला था. अपनी पढ़ाई के लिए प्रेमा ने बैंक से कर्ज लिया था. फाइनल ईयर में जातेजाते श्री ने प्रेमा को भी ड्राइविंग सिखा दी और फिर उसे लाइसैंस भी मिल गया था.

प्रेमा के मातापिता को बेटी और श्रीराम की लव मैरिज पर आपत्ति नहीं थी, पर श्रीराम के मातापिता उस की शादी किसी तेलुगु लड़की से ही करना चाहते थे. शुरू में उन्होंने इस का विरोध किया पर बेटे की जिद के सामने एक न चली. हैदराबाद का बिजनैस स्कूल पूर्णतया रैजिडैंशियल था, इसलिए प्रेमा के पिता चाहते थे कि दोनों की शादी मैनेजमैंट स्कूल में जाने से पहले हो जाए, पर श्रीराम के मातापिता इस के खिलाफ थे. तय हुआ कि कम से कम उन की सगाई कर दी जाए.

श्री और प्रेमा की सगाई हो गई. दोनों बहुत खुश थे. उसी दिन शाम को कालेज में फाइनल ईयर के छात्रों का बिदाई समारोह था. प्रेमा श्री

के साथ उस की कार में कालेज आई थी. उस अवसर पर सभी लड़कों और लड़कियों से कहा गया कि अपने मन की कोई बात बोर्ड पर आ कर लिखें.

सभी 1-1 कर बोर्ड पर आते और अपने मन की कोई बात लिख जाते. जब श्री की बारी आई तो उस ने प्रेमा की ओर इशारा करते हुए लिखा ‘‘हम हैं राही प्यार के हम से कुछ न बोलिए, जो भी राह में मिला हम उसी के हो लिए…’’

पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा, पर प्रेमा ने शर्म से सिर झुका लिया. कुछ देर के बाद प्रेमा की बारी आई तो उस ने बोर्ड पर लिखा, ‘‘कुछ मैं ने कसम ली, कुछ तुम ने कसम ली, नहीं होंगे जुदा हम…’’

एक बार फिर हाल तालियों से गूंज उठा.

अंत में जिस लड़के की बारी आई वह विकास था. विकास भी बिहार के किसी शहर का रहने वाला था, पर वह काफी शर्मीला और अंतर्मुखी था. दरअसल, विकास और प्रेमा बिहारी स्टूडैंट्स गैटटुगैदर में मिलते तो दोनों में बातें होती थीं. इस के अलावा वे शायद ही कभी मिलते थे.

विकास का ब्रांच मैकेनिकल था. कभी किसी लैब ग्रुप या प्रोजैक्ट में साथ काम करने का मौका भी न मिला था. पर साल में कम से कम 2 बार उन का गैटटुगैदर होता था. एक साल के पहले दिन और दूसरा 22 मार्च बिहार डे के अवसर पर. दोनों मिलते थे और कुछ बातें होती थीं. विकास मन ही मन प्रेमा को चाहता था, पर एक तो अपने स्वभाव और दूसरे श्री से प्रेमा की नजदीकियों के चलते कुछ कह नहीं सका था.

विकास धीरेधीरे चल कर बोर्ड तक गया और बड़े इतमीनान से बोर्ड पर लिखा, ‘‘हम भी थे राही प्यार के, पर किसी को क्या मिला यह अपने हिस्से की बात है…’’

इस बार हाल लगभग खामोश था सिवा इक्कादुक्का तालियों के. सभी की सवालिया निगाहें उसी पर टिकी थीं. वह धीरेधीरे चल कर वापस अपनी सीट पर जा बैठा. उस की बात किसी की समझ में नहीं आई.

इस घटना के 2 दिन बाद श्री और प्रेमा दोनों हैदराबाद के निकट मशहूर रामोजी फिल्मसिटी जा रहे थे. श्री की कार थी और वह खुद चला रहा था. रास्ते में दोनों ने कोमपल्ली के पास रनवे 9 में रुक कर गो कार्टिंग का मजा लेने की सोची. वहां दोनों ने 1-1 कार्ट लिया और अपनाअपना हैलमेट और जैकेट पहनी. वहां के सुपरवाइजर ने उन के कार्ट्स में तेल भरा और दोनों अपनी गाड़ी रनवे पर दौड़ाने लगे. एकदूसरे को चीयर करते हुए वे भरपूर आनंद ले रहे थे.

रनवे से निकल कर श्री ने कहा, ‘‘अब रामोजी तक कार तुम चलाओ. हम शहर से निकल चुके हैं और सड़क काफी अच्छी है.’’

प्रेमा ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं चलाती हूं पर स्पीड 50 किलोमीटर से ज्यादा नहीं रखूंगी.’’

‘‘कोई बात नहीं है. इतने पर भी हम समय पर पहुंच जाएंगे.’’

थोड़ी दूर जाने के बाद दूसरी तरफ से एक बस तेज रफ्तार से आ रही थी. एक औटो को ओवरटेक करने के दौरान बस कार से टकरा गई. उन की कार पलट कर हाईवे के नीचे एक खड्ड में जा गिरी. प्रेमा को काफी चोटें आईं और वह बेहोश हो गई. कुछ चोटें श्री को भी आई थीं पर वह कार से निकलने में सफल हो गया. उस ने अपने पापा को फोन किया.

कुछ ही देर में पुलिस की 2 गाडि़यां आईं. उस के पापा भी आए थे. श्री को एक गाड़ी में बैठा कर अस्पताल में लाया गया. प्रेमा अभी भी बेहोश थी. उसे कार से निकालने में काफी दिक्कत हुई. उस की हालत गंभीर देख कर उसे ऐंबुलैंस में अस्पताल भेजा गया. प्रेमा के मातापिता को फोन पर दुर्घटना की सूचना दी गई.

श्री को प्राथमिक उपचार के बाद मरहमपट्टी कर अस्पताल से छुट्टी मिल गई. कुछ देर बाद वह भी प्रेमा से मिलने गया. दूसरे दिन प्रेमा के मातापिता भी आए. प्रेमा की हालत देख कर वे काफी दुखी हुए.

डाक्टर ने उन से कहा, ‘‘अगले 48 घंटे इन के लिए नाजुक हैं. इन्हें मल्टीपल फ्रैक्चर हुआ है. हम ने कुछ टैस्ट्स कराने के लिए भेजे हैं और कुछ इंजैक्शंस इन्हें दिए हैं. बाकी रिपोर्ट आने पर सही अंदाजा लगा सकते हैं. हम अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं. आप धीरज रखें.’’

अगले दिन प्रेमा की टैस्ट रिपोर्ट्स मिलीं. वह अभी भी बेहोश थी और उसे औक्सीजन लगी थी. डाक्टर ने कहा, ‘‘इन्हें सीरियस इंजरीज हैं. इन के शोल्डर और कौलर बोंस के अलावा रिब केज में भी फ्रैक्चर है. रीढ़ की हड्डी में भी काफी चोट लगी है. इसी कारण इन के लिवर और लंग्स पर बुरा असर पड़ा है. रीढ़ की हड्डी में चोट आने से हमें लकवा का भी संदेह है. पर इन का ब्रेन ठीक काम कर रहा है. उम्मीद है इन्हें जल्दी होश आ जाएगा.’’

प्रेमा के पापा ने पूछा, ‘‘इस के ठीक होने की उम्मीद तो है? प्रेमा कब तक ठीक हो जाएगी?’’

‘‘अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी.

इन की जान को कोई खतरा तो नहीं दिखा रहा है, पर चलनेफिरने लायक होने में इन्हें महीनों लग सकते हैं. हमें शक है कि इन के नीचे के अंग लकवाग्रस्त हों, इन्हें होश आने दीजिए तब

लकवे का असर ठीक से पता चलेगा. आप लोग हौसला रखें.’’

अगले दिन प्रेमा ने आंखें खोलीं. सामने श्री और मातापिता को देखा. उस दिन विकास भी उस से मिलने आया था. प्रेमा के होंठ फड़फड़ाए. टूटीफूटी आवाज में बोली, ‘‘मैं अपने पैर नहीं हिला पा रही हूं.’’

प्रेमा की आंखों में आंसू थे. श्री की ओर देख कर उस ने कहा, ‘‘हम ने क्याक्या सपने देखे थे. मैनेजमैंट के बाद हम अपनी कंपनी खोलेंगे. मैं ने कभी किसी का बुरा नहीं सोचा. फिर भी मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?’’

‘‘धीरज रखो,’’ श्री ने कहा.

प्रेमा को अस्पताल के बैड पर पड़ेपड़े कुछ हफ्ते बीत गए.

कुछ दिन तक तो श्री आता रहा और उस का हालचाल पूछता रहा पर फिर धीरेधीरे उस का आना कम हो गया. उस के बरताव में अब काफी परिवर्तन आ गया था. एक तरह से बेरुखी थी. श्री के रवैए पर वह दुखी थी.

कालेज के दिनों में प्रेमा गूगल कंपनी को ‘गूगल मैप’ ऐप पर अपना सुझाव भेजती थी. गूगल ने अपने मैप पर उस के सुझाव से मैप में सुधार कर उसे बेहतर बनाया. कंपनी ने उस की प्रशंसा करते हुए एक प्रमाणपत्र और पुरस्कार दिया था. उसे गूगल कंपनी से औफर भी मिला था, पर प्रेमा ने पहले एमबीए करना चाहा था.

धीरेधीरे प्रेमा ने अपनी हालत से समझौता कर लिया था. करीब 2 महीने बीत गए. तब उस ने डाक्टर से एक दिन कहा, ‘‘डाक्टर, मैं ऐसे कब तक पड़ी रहूंगी? मैं कुछ काम करना चाहती हूं. क्या मैं अपने लैपटौप से यहीं बैड पर लेटे कुछ कर सकती हूं?’’

‘‘हां, बिलकुल कर सकती हो. नर्स को बोल कर बैड को सिर की तरफ थोड़ा ऊंचा करा कर तुम लैपटौप पर काम कर सकती हो, पर शुरू में लगातार देर तक काम नहीं करना.’’

साथ वाले दूसरे डाक्टर ने कहा, ‘‘तुम एक बहादुर लड़की हो. शायद हम तुम्हें पूरी तरह से ठीक न कर सकें, पर तुम व्हीलचेयर पर चल सकती हो.’’

‘‘ओके, थैंक्स डाक्टर.’’

प्रेमा ने फिर से गूगल के लिए स्वेच्छा से काम करना शुरू किया. गूगल भी उस के संपर्क में रहा. उस के काम से कंपनी काफी खुश थी. उस से यह भी कहा गया कि वह अपने स्वास्थ्य और अपनी क्षमता के अनुसार जितनी देर चाहे बैड से काम कर सकती है.

इस बीच और 2 महीने बीत गए. इस दौरान श्री एक बार भी उस से मिलने न आया. उस दिन प्रेमा अस्पताल से डिस्चार्ज होने वाली थी जिस की सूचना उस ने श्री को दे दी थी. वह अपने पापा के साथ आया था.

बदलती जीवनशैली का नतीजा है अर्थराइटिस

अर्थराइटिस यानी गठिया को पहले बुढ़ापे का रोग माना जाता था. घुटने, कोहनी, कमर के जोड़ों में दर्द और चलने-फिरने में परेशानी कभी बुढ़ापे की निशानी कहलाती थी. डौक्टरों के मुताबिक जोड़ों के बीच का लिक्विड उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे खत्म होने लगता है, जिसके कारण शरीर में जोड़ों का लचीलापन खत्म होने लगता है, जिसे अर्थराइटिस करते हैं. जोड़ों का मूवमेंट प्रभावित होने से बूढ़े लोगों को अकड़न और दर्द महसूस होता है. साठ साल की उम्र के बाद ज्यादातर बुजुर्गों में गठिया के लक्षण दिखने लगते थे. लेकिन जैसे-जैसे हमारे खानपान और रहनसहन में बदलाव आ रहे हैं, अर्थराइटिस की समस्या सिर्फ बूढ़ों तक सीमित नहीं रह गयी है. अब गठिया का रोग जवान लोगों और बच्चों को भी अपना शिकार बना रहा है.

अट्ठाइस साल की आयुषी अपने औफिस की सीढ़ियां चढ़ने में परेशानी अनुभव करती है. उसका वजन 68 किलो है. मोटापे के कारण उसकी सांस भी फूलती है. मौल या मेट्रो स्टेशनों पर वह ज्यादातर लिफ्ट का इस्तेमाल करती है, लेकिन औफिस में लिफ्ट न होने के कारण उसे दूसरे माले पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. यह थोड़ी सी सीढ़ियां भी उसकी जान की आफत हैं.

महानगरों में बदलती जीवनशैली, गलत खानपान, मोटापा, एक्सरसाइज की कमी, पैदल चलने में कोताही, ज्यादातर बैठे रहना ऐसे तमाम कारण हैं जो कम उम्र में ही इन्सान को अर्थराइटिस जैसी तकलीफदेह बीमारी की ओर ढकेल रहे हैं. अर्थराइटिस का सबसे अधिक प्रभाव घुटनों में और उसके बाद कूल्हे की हड्डियों में दिखायी देता है. अधिकतर लोग अपने बदन में दर्द और अकड़न महसूस करते हैं. कभी-कभी हाथों, कंधों और घुटनों में सूजन और दर्द भी रहता है. यही नहीं, रोग बढ़ने पर हाथ की उंगलियां तक मोड़ने में परेशानी होने लगती है.

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क्या होता है अर्थराइटिस

अर्थराइटिस जोड़ों के ऊतकों में जलन और क्षति के कारण होता है. जलन के कारण ही ऊतक लाल, गर्म, दर्दनाक और सूजे हुए हो जाते हैं. जोड़ वह जगह है, जहां पर दो हड्डियों का मिलन होता है, जैसे कोहनी या घुटना. जब इन जगहों पर जकड़न के साथ-साथ दर्द महसूस हो तो यह अर्थराइटिस के साइन हो सकते हैं. अर्थराइटिस कई प्रकार की होती है. डौक्टर कुछ प्रमुख जांचों के आधार पर अर्थराइटिस रोग और इसके प्रकार का पता लगाते हैं. खून में यूरिक एसिड का स्तर यदि जरूरत से ज्यादा है, तो इसका मतलब है कि व्यक्ति गाउटी अर्थराइटिस से पीड़ित है. साइसनोवियल फ्यूड, इसे श्लेष द्रव भी कहते हें, जोड़ों के बीच पाया जाता है. जोड़ों के अंदर से इस द्रव को लेकर इसका टेस्ट किया जाता है, जिसमें मोनोसोडियम यूरेट क्रिस्टल पाये जाते हैं. कभी-कभी यूरिक एसिड मूत्र में भी पाया जाता है, जिसके टेस्ट से गाउटी अर्थराइटिस का पता लगाया जा सकता है. आमतौर पर ब्लड टेस्ट से गाउटी अर्थराइटिस का पता चल जाता है. शरीर में यूरिक एसिड बढ़ने का मतलब है आपके खानपान में प्रोटीन युक्त चीजों की भरमार. चीज, मीट, मक्खन, राजमा, सोयाबीन, दालें प्रोटीन का भरपूर स्रोत हैं. इन पदार्थों के अत्याधिक सेवन से रक्त में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ता है, जिसके चलते आप गाउटी अर्थराइटिस के शिकार हो सकते हैं. गाउट के कारण पैरों के टखने और उंगलियों व अंगूठे के आसपास यूरिक एसिड के जमा होने से वहां सूजन और दर्द रहने लगता है और चलने-फिरने में बहुत परेशानी होती है.

इम्यूनिटी भी अर्थराइटिस की वजह है. रूमेटाइड अर्थराइटिस रोग प्रतिरक्षण प्रणाली में असंतुलन से पैदा होने वाली बीमारी है, जो जोड़ों में सामान्य दर्द के रूप में शुरू होती है और इलाज के अभाव में शरीर के बाकी हिस्सों को प्रभावित करती है. यह लम्बे समय तक रहने वाला सूजन का विकार है, जो हाथों और पैरों के साथ अन्य जोड़ों को भी प्रभावित करता है.

कैसे करें इलाज और बचाव

गठिया के दर्द की पहचान यह है कि इसमें रात को जोड़ों का दर्द बढ़ता है और सुबह उठने पर थकान महसूस होती है. समय पर उपचार ही इसका बचाव है.

वजन घटाएं

गठिया के खतरे से बचने का बेहतर और आसान तरीका यही है कि आप अपने वजन को नियंत्रित रखें. हालांकि वजन बढ़ने के बाद कम करना आसान नहीं है. इसलिए कोशिश करें कि आपका वजन मेंटेन रहे. ज्यादा तला-भुना, प्रोटीनयुक्त खाने से बेहतर है कि आप अपने खाने में फाइबर और कार्बोहाइड्रेट को ज्यादा महत्व दें. मोटापे के शिकार लोगों में गठिया की समस्या आम होती है.

व्यायाम करें

गठिया से ग्रसित लोगों को एक्सरसाइज करनी चाहिए. यदि आपको व्यायाम करने में परेशानी होती है तो आप अपने घर या अपार्टमेंट में टहल भी सकते हैं. व्यायाम और सुबह के समय टहलने के साथ ही यदि आप स्विमिंग पूल या नदी में तैरते हैं तो यह भी आपके लिए फायदेमंद रहेगा.

एक्युपंचर

गठिया के दर्द से राहत पाने के लिए बहुत से लोग एक्युपंचर का भी सहारा लेते हैं. कई अध्ययनों में यह साफ हो चुका है कि एक्युपंचर थेरेपी गठिया के दर्द में फायदेमंद है.

प्रासंगिक उपचार

जिस पार्ट में गठिया का दर्द है उस पर मैंथा औयल से तैयार की गयी क्रीम लगाने पर भी आराम मिलता है. इस तरह की क्रीम को आप निश्चित मात्रा में लेकर दर्द वाले भाग पर मालिश करें. नियमित मालिश से दर्द में राहत मिलेगी.

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कैपसेसिन क्रीम

बाजार में मिलने वाली कैपसेसिन क्रीम का इस्तेमाल करने से भी जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है. इसे आप डौक्टर से बिना परामर्श किये भी यूज कर सकते हैं.

इलेक्ट्रिसिटी एनर्जी

एलेक्ट्रिसिटी एनर्जी से जोड़ों में सूजन और दर्द से राहत मिलता है. फिजिकल थेरेपिस्ट युवाओं के जोड़ों में गुम चोट लगने पर इलेक्ट्रिसिटी एनर्जी से उपचार करते हैं.

अर्थराइटिस के लक्षण

शुरुआत में मरीज को बार-बार बुखार आता है, मांसपेशियों में दर्द रहता है, हमेशा थकान और टूटन महसूस होती है, भूख कम हो जाती है और वजन घटने लगता है. शरीर के तमाम जोड़ों में इतना दर्द होता है कि उन्हें हिलाने पर ही चीख निकल जाती है. खासकर सुबह के समय. इसके अलावा शरीर गर्म रहता है, त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं और जलन की शिकायत होती है. जोड़ों में सूजन इस बीमारी में आम है.

डेंगू, चिकनगुनिया भी हैं जिम्मेदार

डेंगू और चिकनगुनिया के करीब 80 प्रतिशत मरीजों में हाथ-पैर के जोड़ों में दर्द रहता है. चार महीने के बाद रोगी इन लक्षणों से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं, लेकिन 20 प्रतिशत मरीजों को गठिया होने की आशंका होती है, ऐसे में इन मरीजों को अस्थि रोग चिकित्सक से परामर्श लेना जरूरी है.

ठंड में खतरनाक है गठिया

बदलते मौसम में जोड़ों में असहनीय दर्द और अर्थराइटिस की समस्या बढ़ जाती है. जैसे-जैसे तापमान में गिरावट आती है वैसे-वैसे जोड़ों का दर्द बढ़ने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मौसम के ठंडा होने पर जोड़ों की रक्तवाहिनियां सिकुड़ने लगती हैं और उस हिस्से में रक्त का तापमान कम हो जाता है. जिसके चलते जोड़ों में जकड़न हो जाती है जो दर्द का कारण होता है.

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मोहब्बत के दुश्मन: भाग 1

भाग 1

उत्तर प्रदेश के जनपद आगरा में एक थाना है कागारौल. इस थानाक्षेत्र के गांव विश्रामपुर के नाले के पास वाले खेत में 19-20 साल के एक युवक और 17-18 साल की युवती की लाशें पड़ी हुई थीं. विश्रामपुर के लोगों को यह जानकारी मिली तो लोग खेत की तरफ दौड़े. कुछ ही देर में वहां भीड़ जुट गई.

2-2 लाशें मिलने पर गांव में सनसनी फैल गई. इसी बीच किसी ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. यह 27 जून, 2019 की सुबह की बात है.

सुबहसुबह डबल मर्डर की खबर पा कर थानाप्रभारी कागारौल अंजुल पांडेय पुलिस टीम के साथ विश्रामपुर गांव पहुंच गए. जिस समय पुलिस घटनास्थल पर पहुंची तब मृत किशोरी के पास एक महिला और लड़की बैठी रो रही थीं. पास ही युवक की लाश पड़ी थी.

पता चला कि वह मृतका की मां मुनीशा और बहन रूमिका हैं. साथ ही यह भी जानकारी मिली कि मृत युवक और युवती गांव गौरऊ के रहने वाले थे. मृतका का नाम पूजा और मृतक का नाम श्यामवीर था. गांव गोरऊ थाना खैरागढ़ क्षेत्र में आता था न कि थाना कागारौल में.

इंसपेक्टर अंजुल पांडेय ने यह सूचना थाना खैरागढ़ के इंसपेक्टर जसवीर सिंह को दे दी. वह भी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने मुनीशा से उस की बेटी पूजा की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि श्यामवीर ने उस के परिवार का जीना हराम कर दिया था. जबकि रूमिका ने बताया कि श्यामवीर पूजा से जबरन शादी करना चाहता था. रात को वह पूजा को भगा कर ले जा रहा था. गांव वालों ने दोनों को पकड़ लिया और उन के साथ मारपीट की, इसी से दोनों की मौत हो गई.

पुलिस को पता चला कि मृतक नगला गौरऊ निवासी मनेंद्र उर्फ मंगल सिंह का बेटा था. 19 वर्षीय मृत युवक का नाम श्यामवीर तोमर था. जबकि 18 साल की मृतका पूजा कुशवाह मोहन सिंह की बेटी थी. विश्रामपुर गौरऊ गांव की सीमा से सटा हुआ था.

थानाप्रभारी खैरागढ़ जसवीर सिंह ने मामले की जानकारी एसएसपी जोगेंद्र सिंह को दे दी. थोड़ी देर में वह भी मौके पर पहुंच गए. फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया था.

इस घटना की जानकारी मिलने पर गांव गौरऊ के प्रधान ने मृतक श्यामवीर के ताऊ फूल सिंह के घर जा कर बताया कि श्यामवीर खेत में मरा पड़ा है और वहां भीड़ जमा है. यह सुनते ही परिवार में कोहराम मच गया. श्यामवीर के घर वाले गांव के लोगों के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे.

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श्यामवीर और पूजा की लाशें गांव से करीब 100 मीटर दूर एक खेत में पड़ी थीं. दिन चढ़ने के साथ श्यामवीर और पूजा की हत्या की खबर आसपास के गांवों में भी फैल गई. कुछ ही देर में वहां देखने वालों का तांता लग गया. भीड़ बढ़ती देख किसी अनहोनी की आशंका से अफसरों को पुलिस फोर्स मंगानी पड़ी.

पुलिस ने लाशों का मुआयना किया तो पता चला, दोनों लाशों की गरदन, सिर व चेहरों पर चोट के निशान थे. देखने से लग रहा था कि दोनों के साथ मारपीट करने के बाद गला दबा कर हत्या की गई थी.

लाशों के पास 3 मोबाइल फोन पड़े मिले, जिन्हें पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल पर जांच कर साक्ष्य जुटाए.

पुलिस ने घटनास्थल पर आए मृतक श्यामवीर के घर वालों से पूछताछ की. श्यामवीर के ताऊ फूल सिंह तोमर, चाचा विजय सिंह व अन्य घर वालों ने बताया कि श्यामवीर और पूजा एकदूसरे से प्यार करते थे. जबकि पूजा के घर वाले इस का विरोध करते थे. वे लोग कई बार श्यामवीर को जान से मारने की भी धमकी दे चुके थे.

उन्हीं लोगों ने रात को फोन कर के धोखे से श्यामवीर को अपने घर बुलाया था. श्यामवीर के घर वाले आरोप लगा रहे थे कि पूजा के घर वालों ने इस वारदात को षडयंत्र रच कर अंजाम दिया है. श्यामवीर इतना मूर्ख नहीं था कि रात में पूजा से मिलने उस के घर पहुंच जाता.

उसे साजिश के तहत बुलवाया गया था. बाद में उसे गांव से दूर दूसरे थाने की सीमा में खेत में ले जा कर पीटा गया. पूजा ने विरोध किया होगा, इसलिए उसे भी पीटा गया. रात में ही दोनों की हत्या कर दी गई.

पुलिस को भी यह औनर किलिंग का मामला लग रहा था. पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने श्यामवीर के ताऊ फूलसिंह तोमर की तहरीर पर बलवा, मारपीट और हत्या की धाराओं के तहत पूजा के पिता मोहनलाल, भाई कमल, मां मुनीशा, बहन रूमिका, चाचा रामनिवास, चचेरे भाई हरेंद्र व ओमवीर के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया. इस केस में एक अज्ञात को भी शामिल किया गया था. गांव में चर्चा थी कि घटना की पूरी साजिश पूजा के ताऊ बाबू ने रची थी.

श्यामवीर और पूजा के परिवारों में घनिष्ठ संबंध थे. दोनों परिवारों के खेत भी आपस में लगे हुए थे. यहां तक कि उन के घरों के बीच बस कुछ खेतों का फासला था. पिछले 2 वर्ष से श्यामवीर के चाचा विजय सिंह के गांव गौरऊ स्थित खेतों को पूजा के ताऊ बाबू ने बटाई पर ले रखा था.

बटाई पर खेत देने की वजह से श्यामवीर का बाबू के घर आनाजाना था. पूजा और उस के ताऊ के घर आमनेसामने थे. ताऊ के घर पर उस की पूजा से मुलाकात हो जाती थी.

श्यामवीर कदकाठी का कसा हुआ जवान था. पूजा उस की ओर आकर्षित हो गई. वह श्यामवीर को कनखियों से देखा करती थी. यह आभास श्यामवीर को भी था. वह भी मन ही मन पूजा को चाहने लगा था. जब कभी दोनों की नजरें मिलतीं तो दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकरा देते थे.

धीरेधीरे यह मुलाकात दोस्ती में बदल गई. फिर दोनों कभीकभी खेतों पर भी मिलने लगे. दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने फोन नंबर दे दिए थे. श्यामवीर धौलपुर में आटो चलाता था. जब वह धौलपुर चला जाता तो दोनों फोन पर बातें करते.

श्यामवीर जब धौलपुर आता तो उस का मन पूजा में ही रमा रहता. 2 साल पहले हुई दोनों की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला. श्यामवीर जब भी गांव आता, तो जब तक दोनों एकदूसरे को देख नहीं लेते, उन्हें चैन नहीं मिलता था. धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा.

हालांकि दोनों की जाति अलगअलग थीं. इस के बावजूद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया था. दोनों ही बालिग होने की दहलीज पर थे, इसलिए उन्होंने सोच रखा था कि बालिग होते ही शादी कर लेंगे.

श्यामवीर के धौलपुर जाने पर पूजा का किसी काम में मन नहीं लगता था. उसे श्यामवीर के गांव लौटने का बेसब्री से इंतजार रहता था. गांव देहात में प्यारमोहब्बत की बातें ज्यादा दिनों तक नहीं छिप पातीं. अगर किसी एक व्यक्ति को ऐसी किसी बात की भनक लग जाती है तो कानाफूसी से बात पूरे मोहल्ले में ही नहीं, बल्कि गांव भर में फैल जाती है.

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पूजा के घर वालों को भी पता चल गया था कि उस का श्यामवीर के साथ चक्कर चल रहा है. लिहाजा मां और पिता ने पूजा को समझाया कि वह उस लड़के से मिलना बंद कर दे. पर उस के सिर पर तो प्यार का भूत सवार था. समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. उधर श्यामवीर के घर वालों ने भी उसे समझाया कि वह पूजा से दूर रहे. लेकिन उस पर भी कोई असर नहीं हुआ. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा.

श्यामवीर ने सोच रखा था कि पूजा को अपने साथ ले जाएगा. दोनों धौलपुर जा कर साथ रहेंगे. वहां उन का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा. पिता की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी श्यामवीर पर आ गई थी. इस वजह से वह फिलहाल शादी नहीं करना चाहता था.

श्यामवीर और पूजा घटना से कुछ महीने पहले घर से भाग गए थे. बताते हैं श्यामवीर पूजा को ले कर धौलपुर चला गया था. घर वालों का सीधा शक उसी पर गया. उन्होंने उस के घर पर डेरा डाल दिया. घर वालों पर दबाव बना तो दोनों वापस लौट आए. तभी से दोनों परिवारों के बीच रंजिश हो गई थी. इस घटना के बाद पूजा पर पहरा कड़ा कर दिया गया था. वह घर में नजरबंद थी.

पूजा को गांव में छोड़ने के बाद श्यामवीर धौलपुर चला गया था. यह बात पुलिस को छानबीन में पता चली. वह धौलपुर में ही आटो चलाता था.

उस ने पूजा को एक मोबाइल दे दिया था. पूजा के घर वालों ने उस से वह मोबाइल छीन लिया था लेकिन किसी दूसरे नंबर से वह दोबारा श्यामवीर के संपर्क में आ गई थी. वह उस से छिप कर बात करने लगी थी.

श्यामवीर का परिवार जाति से ठाकुर और पेशे से किसान था. गांव में ठाकुर जाति के लड़के और कुशवाहा जाति की लड़की के प्रेम के बारे में खूब चर्चा थी. गांव के युवा दोनों को लैलामजनूं कहते थे.

अगली कड़ी में पढ़ें-  क्या पूजा और श्यामवीर  एक दूसरे को अपना बना पाए ?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य: मनोहर कहानी

बैगन की नई किस्मों की ऐसे करें खेती

लेखक: ललित वर्मा

भारतीय बागबानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने बैगन की 3 नई किस्में ईजाद की हैं, अर्का अवनाश, अर्का हर्षित और अर्का उन्नति.

अर्का अविनाश : इस किस्म के पौधे लंबे और फैलाव लिए होते हैं. इस की पत्तियां गहरे हरे रंग की होती हैं. इस के फल हरे, कोमल और अधिक भंडारण क्षमता वाले होते हैं. पकने की क्वालिटी भी उत्तम पाई गई है. यह जीवाणु उकटा की प्रतिरोधी किस्म है. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 30 टन तक उपज दे देती है.

अर्का हर्षित : इस किस्म के पौधे लंबे और फैले हुए होते हैं. इस किस्म की पत्तियां गहरे हरे रंग की होती हैं. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 40 टन तक उपज दे देती है.

अर्का उन्नति : इस किस्म के पौधे लंबे व उठे हुए होते?हैं. पत्तियां गहरी हरी और हरे कैलिक्स वाले फल होते?हैं जो गुच्छों में लगते हैं. फल कोमल और उन की भंडारण क्षमता ज्यादा होती है.

यह किस्म जीवाणु उकटा की प्रतिरोधी है. इस किस्म की एक खूबी यह भी है कि इसे खरीफ और रबी दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 40 टन तक उपज दे देती है.

जलवायु : बैगन उष्णकटिबंधीय जलवायु वाला पौधा है. इसे गरम मौसम की जरूरत होती?है. पौधों की अच्छी बढ़वार और विकास के लिए 20-30 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान की जरूरत होती?है.

अगर मौसम लंबी अवधि तक ठंडा रहे तो पौधों की बढ़वार पर बुरा असर पड़ता है. थोड़े पाले से भी इसे ज्यादा नुकसान हो जाता है.

भूमि : बैगन को वैसे तो तमाम तरह की जमीनों में उगाया जा सकता है, पर सही जल निकास वाली दोमट मिट्टी, जिस का पीएच मान 5.5-6.0 हो, अच्छी मानी गई है.

जमीन की तैयारी : पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें. उस के बाद

2-3 जुताइयां कल्टीवेटर या हैरो से आरपार कर के कुछ सप्ताह तक खूली धूप में छोड़ दें. रोपाई करने से पहले खेत में सिंचाई के लिए सुविधानुसार क्यारियां बना लें.

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खाद और उर्वरक: बैगन की फसल लंबी अवधि वाली होती है. उच्च उर्वरता वाली जमीनों में यह ज्यादा उपज देने वाली फसल है. इस की उच्च गुणवत्ता वाली ज्यादा उपज लेने के लिए इस की मिट्टी जांच कराना बहुत जरूरी है. अगर किसी कारणवश मिट्टी जांच न हो सके तो उस स्थिति में प्रति हेक्टेयर निम्न मात्रा में खाद व उर्वरक जरूर डालें:

गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद 250-300 क्विंटल, नाइट्रोजन 100 किलोग्राम, फास्फोरस 60 किलोग्राम, पोटाश 40 किलोग्राम.

गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद को पहली जुताई से पहले खेत में समान रूप से बिखेर देना चाहिए. नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा का मिश्रण बना कर आखिरी जुताई के समय डालना चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी बची आधी मात्रा को

2 बराबर हिस्सों में बांट कर एक?भाग रोपाई के 30 दिन बाद और दूसरा भाग रोपाई के 45 दिन बाद टौप?ड्रैसिंग के?दौरान देना चाहिए.

पौध रोपाई

बीज द्वारा पहले बैगन की पौध तैयार की जाती है, फिर पौध तैयार होने पर उसे खेत में रोपा जाता है. बैगन की बोआई के 3 प्रमुख मौसम?हैं:

शरद शिशिर : इस मौसम में पौधशाला में बीज जून माह के अंत से जुलाई माह के मध्य तक बोए जाते?हैं और रोपाई जुलाई माह में की जाती है.

वसंतग्रीष्म : इस के लिए पौधशाला में बीज अक्तूबरनवंबर माह में बोए जाते?हैं और रोपाई जनवरीफरवरी माह में की जाती है.

बीज की मात्रा : एक हेक्टेयर के लिए 400-500 ग्राम बीज पर्याप्त हैं.

बीजों को पौधशाला में बोने से पहले

2.5 ग्राम थाइरम या सेरेसान जीएन प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए. ग्रीष्म व वर्षा ऋतु में पौधा महज 4 हफ्ते में रोपने लायक हो जाता है.

पौधों की रोपाई : पौधशाला से पौधा निकालने के 2-3 दिन पहले हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए ताकि पौधों को सुगमता से बिना जड़ों के नुकसान पहुंचाए उखाड़ा जा सके. लंबे बैगन की किस्मों को पंक्तियों व पौधों की दूरी क्रमश: 60 सैंटीमीटर × 60 सैंटीमीटर और गोल?बैगन की किस्मों में क्रमश: 75 सैंटीमीटर × 60 सैंटीमीटर रखें. पौधों की रोपाई के तुरंत बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए ताकि पौधे सुगमता से जम सकें.

सिंचाई और जल निकास

बैगन में सिंचाई कई बातों पर निर्भर करती है. इन में जमीन, फसल उगाने का समय और वातावरण प्रमुख हैं. जांच से पता चला?है कि बैगन की ज्यादा उपज लेने के लिए 100-110 सैंटीमीटर पानी की जरूरत होती है. बहुत ज्यादा या कम सिंचाई करने से बैगन की फसल खराब हो सकती है.

आमतौर पर गरमियों में प्रति सप्ताह और सर्दियों में 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करना सही रहता है, जबकि खरीफ फसल में सिंचाई की जरूरत नहीं होती है, पर काफी लंबी अवधि तक बारिश न हो तो जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

कभीकभी बारिश के मौसम में ज्यादा बारिश होने से पानी खेत में जमा हो जाता है. अगर ऐसी स्थिति पैदा हो जाए तो  फालतू पानी को तुरंत ही निकालने का बंदोबस्त करना चाहिए वरना पौधे पीले पड़ कर मर जाते हैं.

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फसल सुरक्षा

खरपतवार नियंत्रण : बैगन के पौधों की बढ़वार धीमी गति से होती?है इसलिए वे खरपतवारों के साथ होड़ नहीं कर पाते हैं इसलिए पौधों की शुरुआती बढ़वार के समय हलकी निराईगड़ाई करनी चाहिए. पूरी फसल में 3-4 निराईगुड़ाई करना काफी होता है.

खरपतवार की सही रोकथाम करने के लिए खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. फ्लोक्लोरलिन की 1.0-1.5 किलो सक्रिय अवयव प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. इस के बाद एक बार हाथ से निराईगुड़ाई करें, जब फसल 30 दिन की हो जाए.

कीट नियंत्रण

एपीलेकना बीटिल : यह कीट पौधशाला से नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है. इस कीट का शिशु छोटा व लाल रंग का होता है. इस से पहले पीले रंग का होता है. यह कीट पत्तियों को खा कर छलनी जैसा बना देता?है.

रोकथाम: हाथ से अंडों, सूंडि़यों व प्रौढों को इकट्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए. कार्बोरिल या मैलाथियान के 0.1 फीसदी घोल का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए. कीटरोधक किस्में जैसे अर्का शिरीष, हिसार चयन 14, संकर विजय नामक किस्में उगानी चाहिए.

शाखा व फल छेदक : इस कीट की सूंड़ी चिकनी व गुलाबी रंग की होती है जो बालरहित होती?है. इस की पीठ पर बैगनी रंग की धारियां होती हैं. इस की सूंडि़यां नई शाखाओं में घुस जाती?हैं जिस की वजह से शाखाएं मुरझा जाती?हैं. बाद में ये सूंडि़यां फल में छेद कर के घुस जाती हैं.

रोकथाम : कीट लगी शाखाओं और फलों को तोड़ कर नष्ट कर दें. मैटासिस्टौक्स 2 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. 4-5 साल का फसल चक्र अपनाएं.

तना छेदक : इस कीट की सूंड़ी तने में घुस कर फसल को नुकसान पहुंचाती है और तना नीचे की ओर झुक जाता है.

रोकथाम : कीट लगी शाखाओं और फलों को तोड़ कर नष्ट कर दें. मैटासिस्टौक्स 2 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. 4-5 साल का फसल चक्र अपनाएं.

इस के अलावा हरा तेला एक छोटा कीट होता है जो पत्तियों के निचले भाग में पाया जाता है. यह पत्तियों का रस चूसता है. इस के चलते पत्तियां मुड़ जाती हैं और आखिर में मुरझा जाती हैं और भूरे रंग की हो जाती हैं. इस की रोकथाम में कीट लगे पौधों को नष्ट करे दें.

आर्द्र विगलन : यह एक फफूंदीजनित रोग?है. यह रोग पौधशाला में लगता है. जिन पौधों में यह रोग लगता है, वे भूस्तर से सड़ने लगते?हैं. पौधशाला में पौधों का मुरझाना और सूख जाना इस रोग का प्रमुख लक्षण है.

रोकथाम : पौधशाला में बीज बोने से 10-15 दिन पहले कैप्टान या?थाइरम की 2 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर पर्णीय छिड़काव करना चाहिए.

बीज बोने से पहले कैप्टान या थाइरम की 2 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर उपचारित करना चाहिए. बीज बोने से पहले 50 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान के गरम पानी से 30 मिनट तक उपचारित करना चाहिए.

रोगी पौधों पर रोग के लक्षण दिखाई देते ही उन्हें उखाड़ देना चाहिए. 3-4 साल का फसल चक्र अपनाना चाहिए.

फोमोप्सिस झुलसा: यह एक फफूंदीजनित रोग है. रोगी पत्तियों पर?छोटेछोटे गोल भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. अनियमित आकार के धब्बे पत्तियों के किनारे दिखाई देते?हैं. फलों के धब्बों में धूल के कणों के समान भूरी रचना साफ दिखाई देती है. इस रोग का प्रकोप पौधशाला के पौधों पर भी होता है, जिस के चलते पौधे झुलस जाते हैं.

रोकथाम: सेहतमंद बीज ही बोएं. बीज बोने से पहले कैप्टान या थाइरम से उपचारित कर लें. पौधशाला में कैप्टान के 0.2 फीसदी घोल का प्रति सप्ताह पर्णीय छिड़काव करें. रोपाई के बाद 0.2 फीसदी जिनेब या मैनेब का छिड़काव करें.

पत्तियों के धब्बे : यह रोग 4 प्रकार की फफूंदियों द्वारा फैलता है जैसे आल्टरनेरिया मेलांजनि, आल्टरनेरिया सोलेनाई, स्कोस्पोरा-सोलेनाई मेलांजनि और सरकोस्पोरा मेलांजनि.

आल्टरनेरिया की दोनों प्रजातियों के कारण पत्तियों पर अनियमित आकार के?भूरे धब्बे बन जाते हैं. इस वजह से पत्तियां पीली पड़ कर मर जाती हैं और आखिर में गिर जाती हैं. इस के अलावा रोगी पत्तियां भी गिर जाती?हैं और पौधों पर फल कम लगते हैं.

रोकथाम : रोगी पत्तियों को तोड़ कर जला देना चाहिए. खेत को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए. ब्लाइटौक्स के 0.2 फीसदी घोल का 7-8 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें.

फलों की तोड़ाई: जब फल पूरी तरह से पक जाएं, कोमल हों और उन में रंग आ जाए तब उन्हें तोड़ लेना चाहिए क्योंकि फलों को देरी से तोड़ने पर वे कठोर हो जाते?हैं और उन में बीज पक जाते?हैं व फलों का रंग फीका पड़ जाता है. इस वजह से फल सब्जी बनाने के लिए अनुपयुक्त हो जाते हैं. आमतौर पर फल लगने के तकरीबन 8-10 दिन बाद फल तोड़ने लायक हो जाते?हैं.

उपज : बैगन की उपज कई बातों पर निर्भर करती?है, जिन में जमीन की किस्म, उगाई जाने वाली किस्म, फसल की देखभाल प्रमुख हैं. अगर बैगन की किस्मों को सही तरीके से बोया जाए तो प्रति हेक्टेयर 40 टन तक उपज मिल जाती है.

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देहमुक्ति : भाग 2

इस पर भाई ने गुस्से में कहा, ‘‘आप चाहे कुछ भी कहो, मारो, लेकिन यह एक कड़वी हकीकत है, जिसे आप झुठला नहीं सकतीं. वह वेश्याओं का अड्डा है. वहां सब तरह का धंधा होता है.’’

मां ने चीख कर कहा, ‘‘बस…बहन है वह मेरी. मां समान है. मैं उस के खिलाफ एक शब्द नहीं सुनना चाहूंगी.’’

इस पर भाई ने कहा, ‘‘इन 2 दिनों में मैं ने वहां जो देखा या मुझे बताया गया, तो क्या वह सब झूठ है?’’

‘‘हां, सब झूठ है. होगा सच औरों के लिए पर मेरी मां समान बहन के लिए नहीं. अगर आज के बाद उन के लिए एक भी शब्द बोला, तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

उन दोनों के बीच की कहासुनी सुन कर हम लोगों को बहुत डर लग रहा था. पर जैसे भाईर् भी जिद पर उतर आया था. उस ने कहा, ‘‘आप के लिए होगी मां. मेरे लिए तो…’’

मां बीच में ही बोल पड़ीं, ‘‘बस चुप रहो. मैं एक भी शब्द नहीं सुनना चाहती.’’

भाई गुस्से से वहां से चला गया. झगड़ा खत्म नहीं हो रहा था. मां ने कई बार उसे समझाना चाहा, लेकिन वह भी जिद पर अड़ा रहा. शायद उस के मानसपटल पर सबकुछ चिह्नित हो गया था. मां ने एक बार फिर उसे समझाने की नाकाम कोशिश की.

इस पर उस ने कहा, ‘‘चलो अब बात छोड़ो. अभी मेरे साथ वृंदावन चलो. मैं आप को उन सब लोगों से मिलवाता हूं, जिन्होंने मुझे ये सब बताया.’’

तभी अचानक मौसी का फोन आ गया. मां के सवाल करने पर मौसी रो पड़ीं और फिर बोलीं, ‘‘जब मुझे भेजने का निर्णय लिया गया था तब किसी ने भी नहीं रोका. तब कहां थे सब? यह निर्णय तो समाज का ही था. जितने मुंह उतनी बातें. एक अकेली औरत को क्या नहीं सहना पड़ता? सब का सामना करना आसान नहीं है?’’

‘‘इस जीवन से तो अच्छा मरना है, जीजी,’’ मां ने कहा.

‘‘क्या मरना इतना आसान है सुधा?’’ मौसी ने पूछा.

कुछ देर चुप्पी छाई रही, फिर मौसी ने ही चुप्पी को तोड़ा और कहा, ‘‘सुधा, इस बात की वजह से अपने घर में क्लेश मत रखना. हां, यहां दोबारा मत आना और न ही कोई पत्र व्यवहार करना.’’

‘‘पर… जीजी…’’ अभी मां कुछ पूछतीं उस से पहले ही मौसी ने कहा, ‘‘तुझे मेरा वास्ता.’’

शायद मां में इतनी हिम्मत नहीं थी कि मां समान बहन की बात न मानें. खैर, बात आईगई हो गई. महीनों या कहो सालों तक न तो मां ने ही फोन करना ठीक समझा और न ही मौसी का फोन आया.

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कुछ सालों बाद एक पत्र से पता चला कि मौसी बहुत बीमार हैं और इलाज के लिए दिल्ली गई हैं. तब मां से रहा नहीं गया और उन्होंने भाई के सामने मौसी से मिलने की इच्छा जताई. भाई खुद मां को मौसी से मिलवाने के लिए दिल्ली ले गया. मौसी और मां मिल कर बहुत रोईं. मौसी को कैंसर बताया गया था और वह भी लास्ट स्टेज का.

मौसी की हालत देख मां रोए जा रही थीं. तब कमला मौसी ने नर्स को कमरे में बाहर जाने को कहा और मां से बोलीं, ‘‘सुधा, पूछ क्या पूछना चाहती थी?’’

मां की रूलाई फूट गई. शब्द नहीं निकल रहे थे. मौसी ने अपने जर्जर शरीर से बैठना चाहा पर नाकामयाब रहीं. भाई दूर खड़ा सब देख रहा था. उस ने आगे बढ़, मौसी को सहारा दे कर बैठाया. कमला मौसी ने हाथ से इशारा करते हुए कहा, ‘‘आशू बैठ. नाराज है न मौसी से? सुधा तेरे सभी सवालों के आज जवाब मिल जाएंगे. तू जानना चाहता है न कि कितनी सचाई है इस आशू की बातों में?’’ उन की सांस उखड़ने लगी थी.

मां ने कहा भी, ‘‘मुझे कुछ नहीं जानना. आप शांत रहो.’’

मौसी ने कहा, ‘‘अकेली स्त्री का दर्द बहुत बड़ा होता है. हां मैं अछूती नहीं… सुधा कड़वी सचाई यह है कि यह जो इज्जत, शीलशुचिता, शब्द हैं न, जिन की वजह से बारबार स्त्रियों को कमजोर किया जाता है असल में औरतों के शोषण की सब से बड़ी वजह शायद यही हैं.

‘‘आज भी वह इस तथाकथित चारित्रिक बंधन से मुक्त नहीं हो पाई है. जब मैं जा रही थी, तो किसी ने मुझे हक से रोका भी तो नहीं था. कोई कहता तो सही कि हम मर गए हैं क्या? तुम कैसे जा सकती हो, अपना घर छोड़ कर? लेकिन ऐसा नहीं हुआ. किसी ने भी तो मेरे लिए दरवाजे नहीं खोले. मैं एकदम इतनी पराई हो गई सब के लिए. यह शायद मेरे औरत होने की सजा थी.’’

कुछ देर सुबकने के बाद वे फिर बोलीं, ‘‘आज सब मुझ पर ऊंगलियां उठा रहे हैं. जिन लोगों ने, जिस समाज ने भेजा, वही पीठ पीछे हंसता था, बातें बनाता था. पता है एक महिला अपने चरित्र पर उठती ऊंगली आज भी बरदाश्त नहीं कर पाती और शायद यहीं वह चूक जाती है. यही वजह उस के मानसिक और शारीरिक शोषण का कारण होती है.

‘‘हां, आश्रम में सबकुछ होता है. लेकिन मेरे लिए यह वेश्यालय नहीं. वह आश्रम तो मुझ जैसी और भी कई औरतों के लिए एक आश्रय है. मैं ने उन्हें गुरु माना है. वही मेरे सबकुछ हैं. बहुत सी बार स्थितियोंवश जब 2 लोग जुड़ते हैं तब उस समय एक भावनात्मक संबंध जुड़ता है जो शारीरिक संबंध का रूप ले लेता है. वैसे भी अपनों ने तो मुंह मोड़ लिया था. कहां जाती? ससुराल वालों ने पीछा छुड़ाना चाहा तो मायके वालों का भी तो साथ नहीं मिला… किस ने ढोना चाहा इस बोझ को? बोलो? ऐसे में गुरुजी ने ही सहारा दिया, आश्रय दिया.

‘‘सहारा देने वाला ही मेरे लिए सबकुछ होता होगा. आश्रम में मेरे जैसी न जाने कितनी बेसहारा औरतों को संरक्षण तो मिल जाता है. पति की मृत्यु के बाद तो कुछ लोगों ने कहा कि इस लड़की को मर जाना चाहिए. अब यह जी कर क्या करेगी? पर… मेरे अंदर इतनी शक्ति नहीं थी, जो मैं अपने प्राण त्याग देती. कहना बहुत आसान होता है पर करना बहुत मुश्किल. अपनेअपने गरीबान में झांक कर देखो सब,’’ कहतेकहते फफक कर रो पड़ीं.

फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद आगे बोलीं, ‘‘सत्य की भूख तो सब को होती है, लेकिन जब यह परोसा जाता है, तो बहुत कम लोग इसे पचा पाते हैं, सुधा. अकेली औरत को हजारों बुनियादी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और इसी कारण उसे कई अत्याचारों, शोषण और प्रतिरोध करने पर दमन का शिकार होना पड़ता है.

‘‘मुझे मालूम है पति के साए से दूर औरत को वेश्या ही समझा जाता है. आखिरकार इस पुरुषप्रधान समाज में स्त्री को एक देह से अलग एक स्त्री के रूप में देखता ही कौन है? यहां तो, स्त्री के कपड़ों के भीतर से नग्नता को खींचखींच कर बाहर लाने की परंपरा है. नग्नता और शालीनता के मध्य की बारीक रेखा समाज स्वयं बनाता और स्वयं बिगाड़ता है. हर औरत इस दलदल में हमेशा फंसा महसूस करती है. स्त्री की मुक्ति केवल देह की मुक्ति है? मेरी जिंदगी क्या है? मैं तो एक टूटा हुआ पत्ता हूं. न मेरा कोई आगे, न पीछे. क्या पता एक हवा का झोंका कहां फेंक दे?’’

उस दिन मां और मौसी घंटों रोती रही थीं. भाई को भी अपने कहे शब्दों पर बहुत अफसोस हुआ था. मां से इस मुलाकात के बाद मौसी का मन हलका हो गया था शायद इतना हलका कि उस के बाद उन की सांसें हमेशा के लिए गईं.

क्या ल्यूकोडर्मा के दागों को पूरी तरह छिपाया जा सकता है ?

सवाल
क्या ल्यूकोडर्मा के दागों को पूरी तरह छिपाया जा सकता है. परमानैंट कलरिंग का असर ल्यूकोडर्मा के दागों पर कितने साल तक रहता है?

जवाब
ल्यूकोडर्मा का इलाज तो संभव है, पर इस प्रक्रिया में काफी वक्त लग जाता है. ऐसे में आप इलाज के दौरान अस्थाई डर्मा कलर्स का प्रयोग कर के इन दागों को कुछ समय के लिए छिपा सकती हैं. यदि आप के पास समय कम है या इलाज के बाद कुछ दाग रह गए हैं तो उस स्थिति में दागों को छिपाने के लिए परमानैंट कलरिंग ल्यूकोडर्मा के दागों को पूरी तरह छिपाया जा सकता है. इस में सब से पहले किसी एक सफेद पैच को चुन कर उस पर टैस्ट किया जाता है. यदि त्वचा उस रंग को ग्रहण कर लेती है, तो 2-3 महीने के बाद स्किन से मैच करते कलर को त्वचा की डर्मिस लेयर तक पहुंचाया जाता है, जिस से दाग छिप जाते हैं. परमानैंट कलरिंग का असर 2 साल से 15 साल तक रह सकता है.

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परमानेंट मेकअप: ब्यूटी प्रौब्लम्स का सौल्यूशन

खूबसूरत दिखना हर महिला की ख्वाहिश होती है. मगर इस के लिए रोज मेकअप में काफी सारा वक्त लगा पाना हर किसी के लिए संभव नहीं.

परमानेंट मेकअप सौंदर्य संबंधी सभी समस्याओं का स्थायी निदान है. यह सिर्फ मेकअप तकनीक ही नहीं, एक प्रकार से उपचार भी है. इसे आप टैटू आर्ट के समान मान सकते हैं. इस प्रक्रिया में नीडल के जरिए स्किन की अपर लेयर में पिग्मेंट पहुंचाया जाता है.

परमानेंट मेकअप में कई तरह के विकल्प मौजूद हैं. इस की जानकारी विस्तार से दी है, परमानेंट मेकअप एक्सपर्ट और आल्प्स ब्यूटी क्लिनिक्स की एक्जक्यूटिव डायरेक्टर, गुंजन गौर,

परमानेंट मेकअप के प्रकार

परमानेंट आईब्रोज

आईब्रोज का कलर लाइट हो या आईब्रो पतली हो या फिर बचपन की किसी चोट के चलते आईब्रो में कट हो जाने पर हमें डेलीडेली अपनी आईब्रोज की शेप को इंप्रूव करने के लिए आईब्रो पेंसिल का इस्तेमाल करना पड़ता है. लेकिन परमानेंट आईब्रोज बनवा कर आप इस समस्या से छुटकारा पा सकती हैं. इस के जरिए मशीन द्वारा एक बार आईब्रो को खूबसूरत शेप व मनचाहे रंग से बना दिया जाता है जो पसीने या नहाने से खराब नहीं होती है.

परमानेंट लाइनर व कोल

लेंस व चश्मे का इस्तेमाल करने वालों के लिए रोजरोज लाइनर व काजल लगाना दिक्कत का विषय हो जाता है. परमानेंट आईलाइनर और काजल से आप की ये समस्या सुलझ सकती है.

परमानेंट लिपलाइनर व लिपकलर

लिप्स को शेप देने के लिए परमानेंट लिपलाइनर लगवाया जा सकता है. ये लिपलाइनर आप के मनचाहे शेप के अनुसार लगाया जाता है और लगभग 4 से 10 वर्षों तक बरकार रहता है. पेल लिप्स को कलरफुल करने के लिए परमानेंट लिपस्टिक एक वरदान है. इस से होंठ तकरीबन 3-4 महीने तक गुलाबी व सुंदर बने रहेंगे.

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परमानेंट ब्यूटी स्पोट

हुस्न में सेक्स अपील जोड़ने के लिए परमानेंट ब्यूटी स्पौट बनवा सकती हैं.

परमानेंट कलरिंग

यदि आप सफेद दाग या ल्यूकोडर्मा पैचेस की शिकार हैं तो परमानेंट कलरिंग की तकनीक आप के लिए किसी रामबाण से कम नहीं. इस के अंतर्गत स्किन से मैच करते कलर को त्वचा की डर्मिस लेयर तक पहुंचाया जाता है जिस से दाग छुप जाते हैं. परमानेंट कलरिंग का असर 2 साल से ले कर 15 साल तक बना रह सकता है.

कितने समय तक ठहरता है परमानेंट मेकअप

आमतौर पर सभी परमानेंट मेकअप लगभग 15 सालों तक टिके रहते हैं लेकिन लिप कलर केवल 3 से 4 महीने तक ही रहता है और परमानेंट कलरिंग का असर केस टू केस निर्भर करता है.

ट्रेंड में

मेकअप एक्सपर्ट की हमेशा कोशिश होती है कि वो महिला को उस से भी अच्छे से जान सके और उस की कमियों को पूरा कर सके. वैसे इन दिनों तो परमानेंट आईब्रो बनवाने को ले कर महिलाओं में काफी क्रेज देखा जा रहा है, ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि आईब्रो की सही शेप हमारे चेहरे को बेहतर फ्रेम प्रदान करती हैं और आप के लुक में खूबसूरत चेंज लाती है.

किन के लिए जरूरी

हर पल सुंदर दिखने की इच्छा रखने वाले तो परमानेंट मेकअप करवाना पसंद करते ही हैं. कैंसर के मरीज जो कीमोथेरैपी के दौरान अपनी आईब्रोज के बाल खो चुके होते हैं या फिर अक्सर तलाकशुदा लोग भी खुद को गम से उबारने के लिए अपने अंदर चेंज लाना चाहते हैं और इस कारण वो भी परमानेंट मेकअप को अपने लिए चुनते हैं. परमानेंट मेकअप की रेगुलर युवतियों की रुचि इस में निरंतर बनी रहती है.

जर्मन कलर्स और नीडल्स के द्वारा परमानेंट मेकअप किया जाता है. परमानेंट मेकअप का कोई साईड इफैक्ट नहीं है, बस इस प्रौसैस को करने के बाद हल्की सी रेडनेस नजर आती है जो 15 से 20 मिनट में चली जाती है. परमानेंट आईब्रो और परमानेंट आईलैश जौइनर जदातर वही करवाते हैं जिन की आईब्रो का कलर लाइट है व शेप किसी कारण खराब है. इस के अंतर्गत क्लाइंट की लैश लाइन के ऊपर स्किन और हेयर टोन से मैच करती एक ब्लैक लाइन बना दी जाती है जिस से लैशिज घनी व डार्क नजर आती है.

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करियर वूमैन हो या हाउसवाइफ, हर स्त्री काम की अधिकता और समय की कमी से जूझ रही है. ऐेस में मेकअप करने के लिए उस के पास वक्त नहीं होता, परमानेंट मेकअप इस समस्या का बेहतरीन सौल्यूशन है.

‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’: कार्तिक और नायरा को दूर करने के लिए सबसे बड़ी चाल चलेगी वेदिका

स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’  की कहानी का एंगल कुछ अलग तरह से दिखाया जा रहा है. इस शो की कहानी एक नयी मोड़ लेते जा रही है. इस सीरियल की कहानी में कुछ भी हो सकता है. आपने पिछले एपिसोड में देखा होगा एक ही बेड पर कार्तिक और नायरा को सोते देखकर वेदिका दंग रह जाती है.

आनेवाले एपिसोड में आपको धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिलेंगे. वेदिका नायरा को खूब खरी खोटी सुनाने वाली है और उसे गोयनका हाउस से  निकल जाने के लिए भी कहेगी. खबरों के अनुसार वेदिका जल्द ही नायरा के खिलाफ गोयनका परिवार के सभी सदस्यों को भी भड़काने वाली है. जी हां वेदिका  सबसे बड़ी चाल चलने वाली है.

वेदिका कहेगी कि नायरा सिर्फ और सिर्फ कार्तिक की प्रौपर्टी को हड़पने आई है. ये सब सुनकर कार्तिक किस तरह से रिएक्ट करने वाला है, ये तो आने वाले एपिसोड में पता चलेगा. और ये एपिसोड भी देखना काफी दिलचस्प होगा. आपको बता दें, इस सीरियल का एक नया प्रोमो भी लौन्च किया गया है, जिसमें नायरा और कार्तिक एक दूसरे से कैरव की कस्टडी के लिए लड़ते हुए नजर आ रहे है.

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दरअसल वेदिका की बातें सुनकर नायरा गोयनका हाउस से जाने का फैसला ले लेगी. ऐसे में कार्तिक अपने बेटे की कस्टडी के लिए कोर्ट में केस फाइल करेगा. हाल ही में इस शो के 3000 एपिसोड पूरे हुए हैं. जिससे कलाकारों में काफी खुशी का माहौल है.

‘नच बलिए 9’: मधुरिमा तुली और विशाल आदित्य सिंह के बीच मारा मारी

वक्त वक्त की बात है. कभी मधुरिमा तुली और विशाल आदित्य सिंह एक दूसरे के साथ जीने व मरने की कसमें खाते हुए नहीं थकते थे. मगर अब वक्त बदल चुका है. अब दोनों एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते. मधुरिमा और विशाल आदित्य सिंह के बीच निजी जीवन में इस कदर अनबन है कि इस अनबन के चलते ‘‘स्टार प्लस’’ का रियलिटी डांस शो ‘‘नच बलिए 9’’ कुस्ती का अखाड़ा बन चुका है.

जी हां! मधुरिमा तुली और विशाल आदित्य सिंह के बीच का विवाद खत्म होने की बजाय हिंसक होता जा रहा है. सूत्रों की माने तो दोनों डांस करने की बजाय आपस में लड़ाई- झगड़े और नोक-झोंक में ज्यादा लिप्त हैं. सूत्र बताते हैं कि इनके बीच संबंध इतने कड़वाहट वाले हैं कि दो दिन पहले रिहर्सल के दौरान मधुरिमा तुली ने विशाल आदित्य सिंह को थप्पड़ जड़ दिया था. मगर कल तो रिहर्सल के दौरान दोनों ने झगड़ते हुए सारी हदें पारकर मां बहन की गाली देने के अलावा एक दूसरे को काफी अपशब्द कहे और फिर मारामारी पर उतर आए. मधुरिमा की मां ने भी हिंसक उपद्रव की पुष्टि की है.

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ज्ञातब्य है कि दो दिन पहले मधुरिमा तुली विशाल आदित्य को थप्पड़ जड़ दिया था. इस पर सफाई देेते हुए मधुरिमा कह चुकी हैं कि,‘‘हां! मैंने विशाल को थप्पड़ मारा,क्योंकि उन्होंने मुझे धक्का दिया था. मैंने उन्हें गाली दी थी. तो वह भी मुझे गाली दे सकते थे. उन्हें मुझे धक्का देने का कोई हक नहीं है. मैं यह सब बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं. मुझे लगा कि यह हाई टाइम था और मैंने रिएक्ट किया. विशाल को चंद मिनटों तक अहसास ही नहीं हुआ कि मैंने उन्हें थप्पड़ मारा है.’’

कुछ अंग्रेजी की वेब साइट्स की माने तो कल प्रोडक्शन टीम ने बीच बचाव का असफल प्रयास किया,पर दोनों एक-दूसरे को गाली देते रहे.जब प्रोडक्शन टीम के लोगों ने शारीरिक बल का प्रयोग कर दोनों को एक-दूसरे के पास दूर हटाया तब कहीं जाकर मामला शांत हुआ. लेकिन इस समय तक विशाल आदित्य सिंह के शरीर से खून बह रहा था. मगर इस घटनाक्रम को लेकर किसी भी पक्ष ने पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करायी. बहरहाल, एक अंग्रेजी की वेब साइट से बात करते हुए मधुरिमा तुली ने सारा दोषारोपण विशाल आदित्य सिंह पर मढ़ते हुए कहा है- ‘‘मैं विशाल का 2 घंटे तक इंतजार करने के बाद जब रिहर्सल हौल से बाहर निकल रही थी, उसी क्षण वह पहुंचा. इस पर किसी ने उससे देर से आने के बारे में कुछ कहा, तो उसने मुझे अप्रिय टिप्पणियों के साथ पीटना शुरू कर दिया. वह अतीत में पहले भी इस तरह की हरकतें कर चुुका है. उसका कहना है कि हम  दोनों को शो छोड़ देना चाहिए.’’

मधुरिमा ने आगे कहा-‘‘दो दिन पहले जो घटना घटी थी, उसके बाद मुझे इस शो में वापसी नहीं करनी चाहिए थी. लेकिन हमने इस शो में वापसी करने से स्वस्थ बातचीत की और हर मतभेद को दफनाने का फैसला किया था लेकिन वह नही बदला. देर से आने के बावजूद उसने मुझे गंदी गाली दी. फिर वह मेरी तरफ आया और मुझे कुर्सी से धक्का दे दिया, जिससे मैं नीचे गिर गयी. तब उठकर मैंने भी उसे मारा. मैं उसका दुर्व्यवहार और हिंसा क्यों सहन करुं.’’

विशाल आदित्य सिंह के शरीर से खून बह रहा था या नही. इस पर मधुरिमा कहती हैं-‘‘मुझे नहीं पता.लेकिन अगर ऐसा था, तो यह होना चाहिए, क्योंकि उसने मुझे धक्का देते हुए किसी चीज से खुद को चोट पहुंचाई होगी. क्या आपको लगता है कि मेरे पास विशाल जैसे घातक आदमी को चोट पहुंचाने की ताकत है? सबसे ज्यादा मैं उसे थप्पड़ मार सकती हूं या उसके बाल खींच सकती हूं.’’

जब मधुरिमा से पूछा गया कि क्या वह लड़ाई झगड़े भूलकर विशाल के साथ अच्छी तरह से रहना चाहेंगी?इस पर मधुरिमा ने कहा, ‘क्या आपको लगता है कि मुझे ऐसा करना चाहिए? नहीं! मैं ऐसा नहीं करूंगी. अगर कभी वह मुझसे कहीं टकरा भी जाएं, तब भी मैं उनसे बात करना पसंद नहीं करूंगी.‘’ऐसे में सवाल उठता है कि मधुरिमा तुली ने विशाल आदित्य सिंह  के साथ ‘‘नच बलिए 9’’ में अपनी जोड़ी बनाने पर क्यो सहमत हुई? अफसोस यह एक प्रश्न बना हुआ है.

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उधर टीवी इंडस्ट्री में भी कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं. कुछ लोगों का मानना है कि ‘स्टार प्लस’ चैनल जानबूकर अपने डांस शो ‘‘नच बलिए 9’’ को ‘बिग बौस’बनाने की कोशिश कर रहा है? अन्यथा वह अपने इस डांस शो में एक दूसरे से दुश्मनी का भाव रखने वालों की जोड़ी न बनाते. टीवी इंडस्ट्री से जुड़े एक सूत्र का दावा है कि ‘‘स्टार प्लस’’ चैनल की तरफ से जानबूझकर एक दूसरे को फूटी आंख न सुहाने वालेे मधुरिमा तुली व विशआल आदित्य सिंह की जोड़ी को एक दूसरे के साथ रखकर इस तरह के झगड़े के साथ शो को बदसूरत बनाया जा रहा है. यह सिर्फ टीआरपी की भूख का नतीजा है.

जबकि सर्वविदित है कि पिछले लंबे समय से मधुरिमा तुली और विशाल आदित्य सिंह के बीच झगड़े चले आ रहे थे. दोनों मीडिया के सामने भी अपने झगड़ों पर खुलकर बात करते आ रहे थे. फिर भी ‘स्टार प्लस’ ने इन्हे एक साथ लाने की सोची. ‘स्टार प्लस’ का यह कदम माहौल बिगाड़ने की दिशा में उठाए गए कदम के अलावा कुछ नही है.

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‘डौगी’’में बिना शर्त वाले प्यार का रंग

ग्यारह वर्ष की उम्र में टीवी सीरियल ‘‘बालिका वधू’’ वाली बहू आनंदी बनकर शोहरत बटोर चुकी अविका गौर ने इस किरदार को पूरे आठ वर्ष तक निभाते हुए कई अवार्ड जीते थे. उसके बाद वह लगातार टीवी पर अभिनय करती आयी हैं. अविका ने कई रियालिटी शो के अलावा सीरियल ‘ससुराल सिमर का’ और ‘लाडोःवीरपुर की मर्दानी’ में अभिनय किया. तो वही तमिल,तेलगू व कन्नड़ फिल्मों में हीरोईन के तौर पर अभिनय किया. उन्होंने ‘अनकही बातें’ और ‘आई मी माई सेल्फ’ नामक लघु फिल्में भी बनायी हैं.‘आई मी माई सेल्फ’ का लेखन भी किया. टीवी इंडस्ट्री में उन्हें कुछ लोग डांसिंग क्वीन भी मानते हैं. अब 22 साल की उम्र में अविका गौर म्यूजिक वीडियो ‘‘डौगी’’ को लेकर चर्चा में है,जिसमें उन्होेंने ईशान खान के साथ नृत्य किया है. यह अलबम ‘बीलाइब म्यूजिक’ के बैनर तले बाजार में आ रहा है.

गीतकार कुंवर जुनेजा लिखित गीत ‘डौगी’’के संगीतकार अंजन भट्टाचार्य हैं. इंडी-पौप जाौनर के इस गीत में थोड़ा पंजाबी पौप का तड़का लगाया गया है. क्लिच रोमांटिक गानों के सभी स्टीरियोटाइप्स को तोड़ते हुए, डाौगी एक पूरा पैकेज है और इसमें सस्पेंस का एलीमेंट भी है.

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इस गीत को अपनी आवाज से सजाने वाले गायक ईशान खान कहते हैं-‘‘हम अपने नए गीत ‘डाौगी’ को लेकर बहुत उत्साहित हैं और हमें उम्मीद है कि डौगी के साथ हम हमारा स्तर और भी ऊंचा उठाएंगे. यह 24 सितंबर से हर प्लेटफार्म पर उपलब्ध होगा. हमारे गाने की आइडिया काफी अनोखी है,जो निश्चित रूप से हमारे श्रोताओं व दर्शकों को पसंद आएगा. इसके अलावा इस गाने के लिए नृत्य करते समय मुझे अविका गौर से काफी कुछ सीखने को मिला.वीडियो में अपनी परफौरमेंस को बेहतर बनाने में मदद मिली.’’

अभिनेत्री अविका गौर कहती हैं ‘‘इस म्यूजिक वीडियो में ईशान खान के साथ शूटिंग करने में मुझे बहुत मजा आया. यह गाना बहुत जीवंत है. दर्शकों को बहुत पसंद आएगा. इसके अलावा, म्यूजिक वीडियो में डौगी बहुत ही प्यारा है वह मेरा दिल है! मेरे प्रशंसक जानते हैं कि मैं पंजाबी गीतों की दीवानी हूं. हालांकि, डौगी उन सभी में सबसे प्यारा हैं.’’

‘‘बीलाइव म्यूजिक संगीत के क्षेत्र बहुत ही तेजी से अपनी जगह बनाने में जुटा हुआ है.वह नए टैलेंट को उभरने के एक प्लेटफार्म दे रहे है,जिसका परिणाम है-‘‘डाौगी’’. यह गाना हर किसी को थिरकने पर मजबूर के देगा, सौन्ग कौंसेप्ट और सौन्ग के बोल बहुत हैं अच्छे है,जो जल्दी लोग गुनगुनाने लगेंगे.

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प्रधानमंत्री : सात दिवसीय जन्मोत्सव

“संपूर्ण देश में नमो… नमो हो रहा है और तुम गायब हो… भला ऐसी होती है पत्रकारिता… तुम जैसे  जिम्मेदार कलमवीर से ये उम्मीद नहीं थी… ” संपादक ने रोहरानंद को घूरते हुए कहा.

-” ओह, सर ! सौरी.”

-“सौरी, कहने से काम नहीं चलेगा . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का सात दिवसीय जन्मदिवस मनाया जा रहा है और तुम आराम फरमा रहे हो, कुछ तो अपने पेशे की प्रति कर्तव्य निर्वहन करो. ऐसा समय 365 दिन में आता है… हमारे  प्रसार, विज्ञापन सब डैमेज हो रहे हैं .” संपादक ने व्हील चेयर पर बैठे बैठे तल्ख  स्वर में कहा.

संपादक जी ने आगे कहा, ” परेशान हो, ठीक है, मगर तुम्हारा पत्रकारिता धर्म क्या है? आज से ही अपना काम स्फूर्ति से कर के दिखाओ  आज ही नमो का साक्षात्कार चाहिए वरना तुम्हारी छुट्टी.”

– “यस सर.” कहता हुआ रोहरानंद घबराया  नमो को ढूंढने सड़क पर था . माहौल अजीब सा था, कुछ लोग खुशियां मना रहे थे, कुछ लोग कुछ लोग गिरती अर्थव्यवस्था से गमजदा  थे. इस सब के बीच चहुं और नारे गूंज रहे हैं, बैनर, पोस्टर लगे हुए है. चौक चौराहे पर जन्मोत्सव अपने  शबाब पर है. रोहरानंद सड़क पर इधर-उधर नमो को देखता, निहारता,  ढूंढता आगे बढ़ा .हाथ में कलम और नोटबुक तो थी ही.

एक युवती  कुछ बच्चों के साथ चली जा रही थी रोहरानंद ने उसे सम्मान के साथ रुकने का इशारा किया और उससे कहा, – “मैं नमो को ढूंढ रहा हूं, क्या मुझे नमो का पता बता सकती हैं  बड़ी कृपा होगी.”

युवती मादक भाव लिए  मुस्कुराई बोली,-” नमो से मिलना कौन सी बड़ी बात है.मैं  तुम्हें अभी  नमो से मिला सकती हूं .”

-“क्या ? सच…!” रोहरानंद खुशी से उछल पड़ा और  फूला नहीं समाया .

– “हां,”  युवती  बोली, -” मैं मिलवा सकती हूं,बाकी का काम तुम्हारा …”

– “हां हां… मैं,  आप…मुझे मिलवा भर दो, मैं आपका आभारी रहूंगा.”

युवती  ने इशारा किया मेरे पीछे -पीछे आओ. रोहरानंद युवती  के  बच्चों को कंधे पर उठा, पीछे पीछे लपका.

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वह रोहरानंद के कर्तव्यपरायणता से बहुत खुश हुई,मुदित स्वर में कहा,- “अच्छा! आप यह बताओ आप नमो से मिलना क्यों चाहते हैं क्या काम है ?”

रोहरानंद- बच्चों के बोझ से टूट रहा था… हांफता हुआ बोला, “मैं नमो जी का इंटरव्यू करूंगा. मैं उनसे आपके लिए ही बात करूंगा .”

युवती  – “अच्छा ! यह तो बड़ी अच्छी बात हुई, अब यह बताओ कौन से नमो से मिलना है ?”

रोहरानंद मानो आसमां से जमीन पर गिरा-” कौन सा मतलब, क्या कई – कई नमो है ??”

महिला, – “हां, एक नमो तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अर्थात यही नमो है और दूसरे एक नमो टीवी है जो   प्रारंभ हुआ और बंद हो गया है, किससे मिलना है. एक नमो राष्ट्रीय स्वयं संघ के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं और एक नमो है जो देशभक्त प्रधानमंत्री हैं. ऐसे अनेक नमो है तुम्हें किस से मिलना है.”

रोहरानंद का दिमाग घूमने लगा. उसे तो संपादक ने नमो से इंटरव्यू के लिए फरमान सुनाया था, अब वह किस नमो से बातचीत करें ?

युवती  मुस्कुराई आप असमंजस में हो.. चलो,मैं तुम्हें सभी  नमो से मिलवा देती हूं.”

रोहरानंद बच्चों को कंधे पर उठाये, पसीने से लथपथ पीछे-पीछे चला जा रहा है,उसे यह सुन, मानो नई ऊर्जा मिल गई, वह लंबे डग भरता, आगे बढ़ा.

रोहरानंद ने कहा,- “यह तो बहुत अच्छी बात है,  अगरचे  सभी  से मिलवा सकती हैं तो,  यह तो सोने पर सुहागा वाली बात हो गई.मैं  सभी  से मिल लेता हूं,फिर तय कर लूंगा किस का साक्षात्कार लेना है.”युवती चलती चली जा रही है .रोहरानंद की हालत पतली होती जा रही है. पसीना बहा रहा है,समय व्यतीत होता जा रहा है.

युवती ने कहा, -” बस …बस आ गया मेरा घर. अब तुम नमो से मिल सकते हो.”

रोहरानंद- “क्या नमो आपके घर पर ही है… !! यह तो बहुत अच्छा हुआ, मेरा काम चुटकियों में हो जाएगा.”

युवती  घर के पास रुकी और घर पर लगा ताला खोलते हुए

रहस्यमय में स्वर में कहा, -” आओ ! मिल लो नमो से…”

रोहरानंद ने बच्चों को कंधे से उतारा और गहरी सांस लेकर स्वयं को सयंत करते हुए भीतर प्रविष्ट हुआ. युवती  ने उसे कुर्सी दी और स्वयं भी एक कुर्सी पर विराजमान हो गई.

रोहरानंद ने माथे का पसीना पोछा और कहा,- “कृपया पहले अपना परिचय दें, ताकि मेरे ज्ञान चक्षु खुल जाएं.”

युवती मुस्कुराई और कहा,- “तुम मुझे नहीं जानते ? मैं आर. एस. एस. हूं…मै  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हूं….”

– “अच्छा !”रोहरानंद को अपनी अज्ञानता पर शर्म आई.

युवती  ने कहा, – “अच्छा ! प्रेस का हमारे मन में बहुत सम्मान है इज्जत है. आप अपना काम निर्भीक होकर करो मगर  हाँ  हमारे  संबंधों  को ध्यान  मे  रखकर .”

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रोहरानंद प्रसन्न मुद्रा मे इधर-उधर तकने लगा,  ढूंढने लगा कहां है नमो…!  नहीं दिखने पर, विनम्र स्वर में कहा,- “मैडम आर. एस. एस. ! नमो कहां है ! बुलाइये न!! प्लीज… .”

युवती  बोली -” हमारे आवास पर जब कोई मेहमान आता है तो कलेवा पहले करता है कलेवा लेकर आराम से बात करो.”

रोहरानंद ने  प्रसन्नचित्त कलेवा लिया और बताए गए कक्ष की और बढ़ा,जहां नमो से साक्षात्कार लेना तय हो चुका था.

वह कक्ष की और बढ़ा… दरवाजे पर रुका फिर संशय भाव से भीतर प्रविष्ट हुआ. भीतर एक बड़ी सी फोटो लगी हुई है यह फोटो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अर्थात नमो की है पास ही एक विशालकाय टेलीविजन सेट है जिस पर नमो चैनल पर, नरेंद्र मोदी अपने  जन्म जयंती पर सम्भाषण  कर रहे हैं.

रोहरानंद कुर्सी पर बैठ गया. तभी आर. एस. एस. रूपी युवती  आई और कहा,- “जल्दी से अपना साक्षात्कार करो. युवती  ने इशारा किया यह है नरेंद्र मोदी और यह है नमो टीवी. मैं ने अपना वादा पूरा किया अब बातचीत करो और बढ़िया सा इंटरव्यू छाप दो.”

रोहरानंद, नरेंद्र मोदी के विशाल चित्र और नमो टीवी की और अपलक देखता रहा. उसका मस्तिष्क श्रद्धा से आर. एस .एस. के सम्मान में झुकता चला गया . और मित्रों जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह लाजवाब इंटरव्यू पब्लिश हुआ तो आर एस एस सहित सभी अनुषंगी संगठन रोहरानंद  की पत्रकारिता की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहने लगे हमें ऐसे पत्रकारों पर गर्व है… मगर सच कहूं पता नहीं क्यों रोहरानंद  उदास है.

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