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खुद को बचाने के लिए जवाब देना ही पड़ता है : रिचा चड्ढा

पिछले साढ़े सात वर्ष से हर फिल्म में अलग तरह के किरदार निभाने के साथ हर मुद्दे पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखने वाली अभिनेत्री रिचा चड्डा निंरतर आगे बढ़ती जा रही है.इन दिनों वह अश्विनी अय्यर निर्देशित फिल्म ‘‘पंगा’’ को लेकर उत्साहित हैं, जिसमें उनका स्पेशल अपियरेंस है.

प्रस्तुत है रिचा चड्ढा से हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंशः

2008 से 2020 यानी कि 12 साल के अपने कैरियर को किस तरह से देखती हैं?

-लेकिन मैं अपने कैरियर की शुरूआत 2012 से मानती हूं. 2008 में मैं दिल्ली में ही रहती थी. जब मैं कालेज में पढ़ रही थी, तभी मुझे दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘‘ओए लक्की..’’ मिल गयी. मैंने यह फिल्म की और मुंबई आयी, पर मुझे लगा कि फिल्म इंडस्ट्री में मेरा कुछ होने वाला नही है, तो मैं वापस दिल्ली लौट गयी थी. पर दिल्ली में रहते हुए मैं थिएटर या एड फिल्म जरुर कर लेती थी. लेकिन जब मैं अनुराग कश्यप की फिल्म ‘‘गैंग आफ वासेपुर’  के लिए 2011-2012 के आस पास मुंबई आयी, तो लगा कि इतने बड़े निर्देशक ने मुझे मौका दिया, इसके मायने हैं कि मैं कुछ कर सकती हूं. 2012 से अब तक मैंने बहुत सारी चप्पलें घिसायी हैं. तब यहां तक पहुंच पायी.

चलिए, तो यह बता दें कि साढ़े सात वर्ष के कैरियर को आप किस तरह से देख रही हैं ?

मैंने पाया कि यहां पर दो तरह के लोग हैं. जब मैं इंडस्ट्री में आयी थी, तब कुछ लोग इतनी उंचाई थे, जिन्हें देखकर मुझे लगा था कि यह कभी भी लुप्त नही हो सकते, मगर वह लोग गायब हो चुके हैं. कुछ लोग जो कुछ नहीं थे, वह काफी आगे बढ़ चुके हैं, तो मुझे लगता है कि लंबी रेस वाला घोड़ा का जो वक्त है, वह मेरा अब बौलीवुड में आ गया है. मैं अपने साढ़े सात वर्ष के कैरियर को अच्छे रूप में ही देखती हूं. इस दौरान मैंने काफी उतार चढ़ाव भी देखे. मैंने कभी लीड किया, कभी सह कलाकार की भूमिका निभायी, कभी आर्ट फिल्म की, कभी व्यावसायिक फिल्म की. पर मैंने अब तक जितने भी किरदार निभाए, उनमें विविधता है. इससे मैं खुश हूं.

अब तक के कैरियर में आपका सबसे बड़ा कड़वा अनुभव क्या रहा ?

एक बार ऐसा हुआ था कि मुझे एक फिल्म से अंतिम समय में बाहर कर दिया गया था, मैंने सुना था कि निर्देशक का उस लड़की के संग अफेयर था, जिसे उन्होंने मेरी जगह पर हीरोईन लिया था, पर असली सच नही जानती. और मैं उसका नाम नहीं लेना चाहती. हर किसी के काम करने का ढंग और सोच होती है. जब मुझे फिल्म से निकाला गया था, तब मुझे दुःख हुआ था. मुझे लगा था कि यह कैसे जाहिल लोग हैं, मगर बाद में जब वह फिल्म रिलीज हुई, तो उसने बाक्स आफिस पर पानी भी नही मांगा. तो मुझे लगा कि निर्देशक का फोकश फिल्म नहीं, वह लड़की थी, तो यही हश्र होना था. वैसे तो कड़वे अनुभव आए दिन आते रहते हैं, पर अब मैं उन्हें निजी स्तर पर ज्यादा लेती नही हूं.

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आपको किस फिल्म को करने का गम है ?

सरबजीत, मुझे लगा कि सरबजीत के निर्माताओं ने मेरा उपयोग किया.उन्होंने मेरी पंजाबियत का इस्तेमाल करके बाद में मेरे किरदार पर ऐसी कैंची चला दी कि अब कुछ कहना बेकार है. मुझे बड़ी तकलीफ हुई थी.

फिल्म ‘‘सेक्शन 375’’ के रिलीज के बाद किस तरह के रिएक्शन मिले ?

-कई तरह के रिएक्शन मिले. कुछ लोगों ने कहा कि वह फिल्म के अंत से सहमत नही हैं. अजय बहल काबिल निर्देशक है. देखिए,विवाद की जो चर्चा है, वह कानून पर होनी चाहिए.

फिल्म ‘‘पंगा’’ से जुड़ने के पीछे क्या सोच रही ?

-एक दिन फिल्म की निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी मुझसे मिली और कहा कि वह नारी प्रधान फिल्म ‘पंगा’बना रही है.इसमें लड़कियों का मुद्दा है, तो मैंने हामी भर दी. मेरा लालच था कि मुझे खेल पर आधारित नारी प्रधान फिल्म करने का अवसर मिल रहा है. इस फिल्म को करने से मुझे कबड्डी का खेल सीखने को मिला. दूसरी बात मैं अपने दूसरे काम के साथ सामंजस्य बैठाकर चल रही हूं,तो अगर मैने एक फिल्म सहायक किरदार वाली कर ली,तो चल जाता है. इससे मुझे नुकसान नही होगा.

अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगी ?

-फिल्म ‘‘पंगा’’में मैंने मीनू का किरदार निभाया है. स्कूल व कालेज में मीनू और जया निगम दो स्टार कबड्डी खिलाड़ी होती हैं.पर आगे चलकर जया निगम को प्रशांत श्रीवास्तव से प्यार हो जाता है और जया कबड्डी के खेल को अलविदा कहकर प्रशांत के संग शादी कर अपने पति के साथ पारिवारिक जिंदगी में व्यस्त हो जाती है. वह एक बेटे की मां बन जाती है, जबकि मीनू लगातार कबड्डी खेलते हुए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना लेती है. मीनू को भी रेलवे में नौकरी मिल जाती है. मीनू रेलवे की नौकर करने के साथ साथ कबड्डी का खेल खेलती है और कबड्डी की कोचिंग भी करती है यानीकि दूसरों को कबड्डी का खेल सिखाती है. पर जब बेटा आठ वर्ष का हो जाता है, तब जया, मीनू को देखकर अफसोस करती है कि मीनू खेल रही है और वह नहीं खेल रही है. तब मीनू,जया से कहती है कि कोई बात नहीं. बेटे की मां बनने के बावजूद तुम खेल में वापसी करना चाहती हो, तो आओ, मैं तुम्हे ट्रेंड करती हूं. फिर मीनू, जया को कबड्डी की ट्रेनिंग देती है.

फिल्म ‘‘पंगा’’ और कुछ दिन पहले प्रदर्शित फिल्म ‘‘सांड़ की आंख’’ में आप किस तरह का अंतर देखती हैं?

‘सांड़ की आंख’ में सामाजिक दबाव के चलते पुरूषों द्वारा दबाने का मुद्दा था. मगर ‘पंगा’ में औरत खुद ही कबड्डी से अलग होकर घर गृहस्थी में रम जाती है. तो यह फिल्म देखकर आज की औरतों को सोचने का मौका मिलेगा. जरुरी नही है कि तुम बच्चे की मां बन गयी हो, इसलिए सब छोड़कर घर पर बैठ जाओ. जिसमें फिजिकल होना पड़ता है, मसलन,स्पोर्ट्स हो या अभिनय हो, तो एक बार बात समझ में आती है.

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आपकी फिल्म ‘‘शकीला’’ भी दो वर्ष से बन रही है ?

वास्तव में हमने पिछले वर्ष इसका कलेंडर जारी कर गलती की थी. फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले ही पोस्टर जारी कर दिया था, इसलिए लोगों को लगता है कि यह फिल्म लंबे समय से बन रही है. अभी ‘शकीला’ पोस्ट प्रोडक्शन में है. डबिंग भी करनी पड़ेगी. ‘शकीला’ की यात्रा से हर औरत रिलेट करेगी.

शकीला’ को बहुत बोल्ड माना गया. आप क्या सोचती हैं ?

मुझे लगता है कि छोटी उम्र में अपने परिवार की मदद करने के लिए उसने भले ही बी ग्रेड फिल्में की, पर उसने अपने भाई बहनों को उच्च शिक्षा दिलवाकर उन्हें अच्छे मुकाम पर पहुंचाया. उन्होंने अपने भाई बहनों को अमीर बना दिया, पर वह खुद अकेली रह गयी. उनके परिवार के लोगों ने ही उनका शोषण किया. उनका उपयोग किया. मेरी राय यही है. देखिए, माइकल जैक्सन के मरने के बाद उनके चरित्र पर सवाल उठाए जा रहे हैं,जो कि सच भी हो सकता है.

पर जो इंसान इस दुनिया में नहीं है ?

-इस तरह के आरोप लगाकर यदि पीड़ित को संतुष्टि मिल रही है,तो ठीक है.उसे अपनी बात कहनी चाहिए. मुझे लगता है कि माइकल जैक्सन के पिता का प्रभाव माइकल जैक्सन पर पूरी तरह से रहा.माइकल के पिता की आदत थी मारना पीटना वगैरह..

इधर शकीला गरीब रह गयी. उनके अपने कमाए हुए पैसे भी उनके मां बाप ने उनसे छीन लिए. तो यदि मां बाप सही न हों, तो उसका प्रभाव बच्चे पर किस तरह से पड़ता है, उसका उदाहरण हैं शकीला और माइकल जैक्सन.

फिल्म ‘‘घूमकेतु’’ भी फंस गयी ?

-यह मेरी फिल्म नही है. यह तो नवाजुद्दीन सिद्दिकी की फिल्म है. इसमें मेरा सिर्फ दो दिन का ही काम है.

इसके बाद क्या कर रही हैं ?

फिलहाल तो कई फिल्में तैयार हैं, वही अब आएंगी. ‘अभी तो पार्टी बाकी है, ‘शकीला’ और एक फिल्म की है,  जिसका नाम फिलहाल बताने की स्थिति में नहीं हूं. उसकी निर्माता की तरफ से घोषणा नहीं हुई है.

पर ‘पार्टी अभी शुरू हुई है’भी लंबे समय से बन रही थी ?

हां! फिल्म पूरी होने के बाद अनुभव सर को लगा कि इसमें कुछ बदलाव होना चाहिए, तो नए सिरे से कुछ दृश्य फिल्माए जाने हैं.

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-अभी अधूरी पड़ी है. अब मैं सोच रही हूं कि मैं राइटिंग का कोर्स कर लूं. मेरे अंदर लिखने की आदत इंस्टिंट है, पर मुझे प्रैक्टिस की जरुरत है. सीखने की जरुरत है.

किताब लिख रही थी?

वह भी चल रहा है.

आप एक लघु फिल्म बना चुकी हैं तो फिल्म कब निर्देशित करने वाली हैं ?

मैंने पंजाबी में एक लघु फिल्म का सिर्फ निर्माण किया था. आगे चलकर शायद अपनी लिखी पटकथा पर फिल्म का निर्माण कर लूं पर निर्देशन नही करुंगी. निर्देशन बहुत बड़ा सरदर्द है. फिल्म का निर्माण जरुर कर सकती हूं. पर एक लघु फिल्म का निर्देशन कर सकती हूं. यदि सामाजिक व्यवस्था इसी तरह की रहेगी, तो जरुर कोई न कोई लघु फिल्म बनानी पड़ेगी. उसके बाद मुझे भी गालियां पड़ेंगी.

पिछले दिनों ट्वीटर पर अशोक पंडित से आपकी अनबन हुई ?

-अशोक पंडित ने मुझ पर अर्बन नक्सलवादी होने का आरोप लगाया था,तो मुझे उन्हे जवाब देना पड़ा.मैं खुद को गांधीवादी मानती हूं. मुझे न्याय में विश्वास है, तो मैं उस पर कायम रहती हूं. पर कई बार खुद को बचाने के लिए जवाब देना ही पड़ता है.

आपको नहीं लगता कि सोशल मीडिया आपसी वैमनस्य फैलाने का काम कर रहा है ?

जी हां! मैं इस बात से सहमत हूं. यह बहुत डैंजरस हो गया है. अगर सरकार ‘हैशटैग’ देखकर चलने लगेंगी, तो आम इंसान क्या करेगा. आम इंसान के पास न बिजली है, न मोबाइल फोन है और न ही इंटरनेट की सुविधा है कि बेचारा वह उसी में लगा रहे. हिंदुस्तान तो सबका है. जो किसान हर दिन आत्महत्या कर रहा है, वह तो सुरक्षित नहीं है.सैलीब्रिटी की बात सुनकर या पायल रोहतगी की बात सुनकर किसान जिंदा नहीं रह सकता.

क्या सिनेमा में ओमन इम्पावरमेंट की बात सही ढंग से हो रही है?

हो रही है, मगर थोड़ी सी. पूरी नहीं. सिनेमा भी समाज का हिस्सा है,जब तक समाज में बदलाव नहीं आएगा, समाज में लोग औरतों को लेकर बकवास करते रहेंगे, विवादित टिप्प्पणी देते रहेंगे, तो बदलाव कैसे आएगा.

झारखंड में भाजपा की हार

झारखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के अंदाजे पहले से ही लग रहे थे. देश में नए बनाए गए नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के दौरान इस हार का परिणाम आया. ऐसा लगा है मानो देश की जनता ने पौराणिक परंपरा को थोपने वाली सरकार को फिलहाल सबक सिखाने का मन बना लिया है. हालांकि  झारखंड के मतदान कई चरणों में हुए और नागरिकता संशोधन कानून लाए जाने से पहले से ही मतदान हो रहा था पर आज दोनों को मिला कर ही देखा जाएगा.

झारखंड में हालांकि पहले की तरह भाजपा को खासे वोट मिले पर कांग्रेस और  झारखंड मुक्ति मोरचा के बीच सम झौता होने के कारण दोनों को 81 में से 47 सीटें मिल गईं. भारतीय जनता पार्टी 25 पर सिमट गई. भाजपा के मुख्यमंत्री रघुवर दास भी अपनी सीट नहीं बचा पाए.

महाराष्ट्र में मिले धक्के के बाद  झारखंड में हुई हार से भाजपा का एकछत्र राज करने का सपना टूट रहा है. इस के पीछे कारण वही है जो उस की जीत के पीछे था – धर्म पर आधारित राजनीति. भाजपा, दरअसल, अपने शासन की नीतियां नहीं परोस रही, वह कोरे धर्मराज की स्थापना को परोस रही है और वह धर्म भी ऐसा जैसा पुराणों में वर्णित है, जिस में ज्यादा से ज्यादा लोग पूजापाठ, अर्चना में लगे रहें, सेवा करते रहें और कुछ मौज करते रहें.

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इस देश के कर्मठ लोगों और यहां की उपजाऊ जमीन की देन है कि धर्म के पाखंड पर पैसा और समय देने की गुंजाइश बहुत रहती है. धर्म के नाम पर सदियों से यहां विशाल मंदिर, पगपग पर ऋषियोंमुनियों के आश्रम बनते रहे हैं. लोग अंधश्रद्धा के गुलाम बने हुए हैं. इस अंधश्रद्धा को बढ़ाने व भुनाने के लिए एक खास वर्ग सदियों से मुफ्त की खाता रहा है और असल में शासन भी वही करता रहा है. भारतीय जनता पार्टी उसे ही दोहराना चाह रही थी.

देश के सामने अब आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक व सामाजिक समस्याओं का अंबार है. लेकिन सरकार को किसी भी समस्या को सुल झाने की फुरसत नहीं है. वह राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट को मनवाने, कश्मीर से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 370 पर, बंगलादेश से आए गरीब मुसलमानों, मजदूरों को भगाने के बहाने सभी मुसलमानों को कठघरों में खड़ा करने, बैकडोर से आरक्षण खत्म करने में लगी हुई है.

झारखंड में ही नहीं, हरियाणा व महाराष्ट्र और बहुत से उपचुनावों में यह साफ हुआ है कि सरकार की टैक्स नीतियां भी अमान्य हैं, शासकीय भी. फिर भी भारतीय जनता पार्टी को लग रहा था कि नरेंद्र मोदी की करिश्माई छवि व अमित शाह की कूटनीति से वह जनता को बहकावे में रखने में कामयाब रहेगी.

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पौराणिक सोच वालों ने रामायण और महाभारत के युद्धों में जीत के प्रसंग तो बहुत पढ़े हैं पर दोनों महाकाव्यों के नायकों का बाद में क्या हुआ, यह कम ही लोगों को मालूम है. और जनता अब यही बिना पुराण पढ़े सम झने लगी है.

लखनऊ का घंटाघर पार्क बना दिल्ली का शाहीनबाग

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर टकराव आमने सामने है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जहां एक तरफ केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह 21 जनवरी को रामकथा पार्क में समाजिक संगठनों की एक बड़ी सभा करने जा रहे हैं वही लखनऊ के चैक इलाके घंटाघर पर सीएए और एनआरसी के विरोध में धरना चल रहा है. इसमें बड़ी संख्या में महिलायें और बच्चे हिस्सा ले रहे हैं. यह एक तरह से दिल्ली के शाहीनबाग जैसा धरना चल रहा है. आन्दोलन करने वाले पार्क में धरना दे रहे हैं. जिला प्रशासन ने शहर में धारा 144 लगाकर धरने को खत्म कराने का प्रयास किया. धरना देने वालों और उनका समर्थन करने वालों को अलग अलग तरह से रोकने का काम भी किया जा रहा है इसके बाद भी धरना जारी है.

रात में धरना देने वालों के कंबल और रस्सी की वैरीकेंटिग हटाने का काम पुलिस ने किया. ‘कंबल चोर पुलिस’ सोशल मीडिया पर बुरी तरह से वायरल हो गया. ट्विटर पर यह टौप ट्रेंड पर पहुंच गया. इसके बाद पुलिस को थोड़ा संयम से काम लेना पड़ा. कई लोग तबीयत खराब होने के बाद भी धरना देने में लगे रहे. रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शोएब एक माह से जेल में बंद थे. वहां से छूटते ही वापस धरने पर बैठ गये. वह कह रहे है कि इस कानून संवैधानिक ढंग से विरोध जारी रहेगा.

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चैक घंटाघर के इलाके में प्रदर्शन करने वाली महिलाओं ने अपने चारो तरफ सुरक्षा की नजर से रस्सी का घेरा बना लिया था. जिससे बाहरी कोई उसमें प्रवेश ना कर सके. पुलिस ने जबरन इस रस्सी को हटा दिया. इसके बाद महिलाओं ने खुद से ही एक घेरा बना लिया. पुलिस ने धरने को तोड़ने के लिये सोशल मीडिया पर आने वाली खबरों को रोकने का काम किया. कुछ लोगों को भडकाऊ पोस्ट डालने के लिये मुकदमा भी दर्ज किया गया. इसके बाद भी धरना देने वाला का हौसला टूट नहीं रहा है. पुलिस प्रदर्शन करने वालो के नाम पते नोट करने के बहाने उनको डरा रही है.

पुलिस प्रशासन का कहना है कि शहर में तमाम समारोह के कारण धारा 144 लगी है. ऐसे में धरना पूरी तरह से अवैध है. पुलिस के लिये सबसे बड़ी चुनौती 21 जनवरी को केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की रैली है. एक तरफ नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थन में वह लोगों को समझाने का प्रयास करेगे. दूसरी तरफ चैक घंटा घर में इस कानून के विरोध में प्रदर्शन चैक घटा धर में चलने वाला धरना है. लोगों की तादाद के हिसाब से दोनों में कोई मुकाबला नहीं है. एक तरफ सत्ता प्रायोजित रैली है दूसरी तरफ लोगों का विरोध. भाजपा इसको विरोधी दलों की राजनीति कह रही पर विरोध का यह स्वर देश और समाज के लिये की आपसी दूरी को बढ़ाने वाला है. पुलिस के दबाव में भले ही स्वर धीमा हो और विरोध प्रदर्शन कमजोर दिख रहा हो पर सत्ता के लिये यह चुनौती है.

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19 दिसम्बर को नागरिकता कानून के विरोध में धरना प्रदर्शन जिस तरह से कानून विरोधी हो गया उससे सबक लेते प्रदशर्नकारियों ने चैक के घंटाघर पर प्रदर्शन के दौरान एतिहात बरत रहे हैं. अब पुलिस इनके साहस और सहनशीलता को तोड़ने का प्रयास कर रही है.

शक्ति-अस्तित्व के एहसास की में आएगा लीप, अपने अस्तित्व से अनजान, हीर बढ़ा रही है नई उम्मीदों की ओर कदम

कलर्स के शो, ‘शक्ति-अस्तित्व के एहसास की ‘ में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती सौम्या की कहानी में जल्द नया अध्याय जुड़ने वाला है. जहाँ किन्नर होने के कारण सौम्या का पूरा बचपन पिता की नफरत में बीता तो वहीं शादी के बाद भी ससुराल वालों की नफरत को झेलना पड़ा. इन सब कठिनाइयों के बीच, उसका सबसे बड़ा सहारा बना उसका पति हरमन.  उसने अपने संघर्ष और नेक इरादों से उसने ना सिर्फ अपने पति का समर्थन जीता, बल्कि दुनिया की नजरों में अपना अस्तित्व कायम किया. सौम्या की ही तरह, हीर भी एक किन्नर है और शुरू होने जा रहा है कहानी का एक नया अध्याय. आइए आपको बताते हैं क्या है हीर की कहानी…

सौम्या की तरह किन्नर है हीर

हरमन और माही की बेटी है हीर, जिसे सौम्या ने हमेशा अपनी बेटी की तरह माना है. हीर भी सौम्या की ही तरह किन्नर है, जिसे दुनिया की नजरों से बचाने की सौम्या और प्रीतो ने कसम खायी है. यही कारण है कि हीर को प्रीतो की निगरानी और भरोसे पर छोड़कर, सौम्या ने उससे दूर जाने का फैसला किया. ये कठोर निर्णय सौम्या के लिए भी आसान नही था, लेकिन हीर को किन्नरों की दुनिया से दूर रखना ज्यादा जरूरी था.

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अपने अस्तित्व से अनजान है हीर

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सौम्या की तरह, हीर एक बेहद खूबसूरत और प्यारी लड़की है, पर स्वभाव से बिल्कुल अपने पिता हरमन की तरह है. हीर अब बड़ी हो गई है, लेकिन उसे अपने किन्नर होने का एहसास नही है. हर आम लड़की की तरह वो भी अपने सपनों के राजकुमार से मिलने की ख्वाहिश में जीती है.

 

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Miliye #Heer se aur dekhiye uski kahani ka har roop 20 Jan se raat 8 baje sirf #Shakti par! @jigyasa_07 Anytime on @voot

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हीर को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है प्रीतो

हीर के सपनों से अलग प्रीतो चाहती है कि हीर अपना भविष्य बनाने पर ध्यान दे ताकि जब उसे अपने अस्तित्व का पता चले तो वो इस सच का डटकर सामना कर सके. इस वजह से प्रीतो, हीर के नजदीक किसी लड़के की परछाई तक नही पड़ने देती, यहाँ तक की फोन, टीवी और इंटरनेट से भी दूर ही रखा जाता है हीर को. लेकिन हीर की जिद है, अपने सपनों के राजकुमार से मिलने की और एक नई लव स्टोरी लिखने की.

क्या हीर की जिद, उसे अपने राजकुमार से मिला पाएगी? क्या प्रीतो, हीर को अपने तरीके से जिंदगी जीने पर मजबूर कर सकेगी? क्या होगा जब हीर को होगा अपनी असलियत का एहसास? इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए देखिए, शक्ति- अस्तित्व के एहसास की, सोमवार से शुक्रवार, रात 8 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

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ऐसे बनाएं अपने माता-पिता से रिश्ते मजबूत

माता-पिता के साथ हर किसी का रिश्ता अटूट होता है जिसे चाहकर भी कोई तोड़ नहीं सकता है. लेकिन आज के जमाने में बच्चे माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्य को भूलते जा रहे हैं. बहुत से ऐसे कारण होते हैं जिसकी वजह से आपका रिश्ता आपके माता-पिता के साथ बिगड़ जाता है. अगर आपका रिश्ता आपके माता-पिता से अच्छा नहीं है और आप उस रिश्ते में सुधार लाना चाह रहे हैं तो आपको उसके लिए कुछ ऐसा करना होगा. आइए बताते  हैं.

उनकी भावनाओं को समझें – आप हमेशा कोशिश करें कि अपने माता-पिता के नजरियों को समझें ताकि आप उन्हें वो खुशी दें पाएं जिसके वो हकदार हैं. आपको बहुत सारी बातों के साथ समझौता करना पड़ेगा ताकि आप अपने रिश्ते में सुधार ला सकें.

पहले आप प्रतिक्रिया दें- आप अपने माता-पिता के साथ अपने रिश्ते में सुधार लाना चाहते हैं तो आपको पहले उनसे बात करने की जरूरत है. इस बात का इंतजार बिल्कुल भी नहीं करें कि पहले वे आएं और आपसे बात करें. क्योंकि यह आपका फर्ज है कि आप अपने माता-पिता को बताएं कि आप उनसे कितना प्यार करते हैं या आपको उनकी कितनी फिक्र है.

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माता- पिता की बातों का इज्जत करें–  आप अपने माता-पिता की किसी बात से सहमत नहीं भी होते हैं तो आपको कभी उन्हें इस बात का पता नहीं चलने देना चाहिए. ऐसा करने से शायद आप उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं जिससे आपके रिश्ते में सुधार आने के बजाय आपका रिश्ता बिगड़ सकता है. इसलिए आपको हमेशा उनके हर बात और फैसले की इज्जत करनी चाहिए.

उनकी सराहना करें – माता-पिता द्वारा की गई हर एक बात को आपको सराहने की जरूरत है. हर खुशी या दुख में आपके माता-पिता आपके साथ खड़ें रहें. आपको हमेशा इस बात का एहसास होना चाहिए कि जो भी आपके माता-पिता ने आपके लिए किया है उसे शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता है. अपने रिश्ते में सुधार लाने के लिए आपको अपने माता-पिता को इस बात का एहसास दिलाने कि जरूरत है आप उनके हर काम को सराहते हैं.

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कैसे बनाएं आलू कुर्मा, जानें यहां

यह रेसिपी आलू से बनती है, आलू कुर्मा एक बेहतरीन रेसिपी है. इसकी ग्रेवी भूने हुए काजू, मसाले और दही से तैयार की जाती है. आप इसे लंच या डिनर के लिए बना सकते हैं.

सामग्री

8 मीडियम आलू

20 ग्राम लहसुन पेस्ट

3 ग्राम लाल मिर्च पाउडर

6 ग्राम धनिया पाउडर

125 ग्राम दही

10 ग्राम अदरक पेस्ट

90 ग्राम देसी घी

4 हरी इलाइची

1 टी स्पून हरी इलाइची पाउडर

1.5 ग्राम कालीमिर्च पाउडर

एक चुटकी जायफल पाउडर

1 टी स्पून नींबू का रस

3 टेबल स्पून डेयरी क्रीम

20 ग्राम हरा धनिया

स्वादानुसार नमक

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बनाने की वि​धि

आलूओं को धोकर, छील लें और आधा काट लें.

इन्हें फ्राई करने के लिए एक पैन में तेल गर्म करें और जब आलू सूख जाएं तो इन्हें गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई करें.

दही का मिश्रण बनाने के लिए सभी सामग्री को एक साथ मिला लें और एक तरफ कर दें.

एक पैन में देसी घी डालकर मीडियम आंच पर रख दें, इसमें हरी इलाइची डालें और इसका रंग बदलने चलाएं.

अब इसमें कटा हुआ प्याज डालें और गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई करें और इसमें एक कप पानी डालें और इसे लगातार चलाते रहे ताकि इसका पानी सूख जाए और तेल अलग हो जाए.

इसमें दही का मिश्रण डालें, इसे चलाएं और तेल अलग होने तक इसे भूनें.

इसके बाद इसमें काजू का पेस्ट डाले और लगातार भूनें.

अब इसमें आलू डालें, इसी के साथ नमक, एक कप पानी, इलाइची, कालीमिर्च और जायफल पाउडर डालें और ढककर धीमी आंच पर 4 से 5 मिनट तक पक पकाएं या फिर जब आलू पानी सोख न लें.

अब इसमें नींबू का रस डालकर एक मिनट के लिए पकाएं, इसमें क्रीम डालकर आंच से हटा लें.

बाउल में निकाल और हरे धनिये से गार्निश करके सर्व करें.

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मटर की अच्छी पैदावार और बीज का उत्पादन

सत्य प्रकाश, धीरज कटियार और प्रदीप कुमार सैनी

मटर का स्थान शीतकालीन सब्जियों में प्रमुख है. इस का इस्तेमाल आमतौर पर हरी फली की सब्जी के तौर पर जाना जाता है, वहीं साबुत मटर और दाल के लिए भी किया जाता है. मटर की खेती सब्जी और दाल के लिए उगाई जाती है.

मटर दाल की जरूरत की भरपाई के लिए पीले मटर का उत्पादन करना बहुत जरूरी है. इस का प्रयोग दाल, बेसन व छोले के रूप में अधिक किया जाता है.

आजकल मटर की डब्बाबंदी भी काफी लोकप्रिय है. इस में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, रेशा, पोटैशियम व विटामिन पाया जाता है. देशभर में इस की खेती व्यावसायिक रूप से की जाती है.

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जलवायु

मटर की फसल के लिए नम व ठंडी जलवायु की जरूरत होती है, इसलिए हमारे देश में ज्यादातर जगहों पर मटर की फसल रबी सीजन में उगाई जाती है. बीज अंकुरण के लिए औसत तापमान 22 डिगरी सैल्सियस और अच्छी बढ़वार व विकास के लिए 10-18 डिगरी सैल्सियस की जरूरत होती है.

अगर फलियों के बनने के समय गरम या शुष्क मौसम हो जाए तो मटर के गुणों व उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है. उन सभी जगहों पर जहां सालाना बारिश60-80 सैंटीमीटर तक होती है, मटर की फसल कामयाबी से उगाई जा सकती है. मटर के बढ़ोतरी के दौरान ज्यादा बारिश का होना बहुत ही नुकसानदायक होता है.

भूमि

इस की सफल खेती के लिए उचित जल निकास वाली, जीवांश पदार्थ मिट्टी सही मानी जाती है, जिस का पीएच मान 6-7.5 हो, तो ज्यादा सही होती है.

मटियार दोमट और दोमट मिट्टी मटर की खेती के लिए अति उत्तम है. बलुई दोमट मिट्टी में भी सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर मटर की खेती अच्छी तरह से की जा सकती है, वहीं कछार की जमीन में पानी सूख जाने के बाद मटर की खेती करने योग्य नहीं होती है.

प्रजातियां

फील्ड मटर : इस वर्ग की किस्मों का इस्तेमाल साबुत मटर, दाल के अलावा दाना व चारा के लिए किया जाता है. इन किस्मों में प्रमुख रूप से रचना, स्वर्ण रेखा, अपर्णा, हंस, जेपी-885, विकास, शुभ्रा, पारस, अंबिका वगैरह हैं.

गार्डन मटर : इस वर्ग की किस्मों का इस्तेमाल सब्जियों के लिए किया जाता है.

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तैयार होने वाली किस्में

आर्केल : यह यूरोपियन अगेती किस्म है. इस के दाने मीठे होते हैं. इस में बोआई के 55-65 दिन बाद फलियां तोड़ने योग्य हो जाती हैं. इस की फलियां 8-10 सैंटीमीटर लंबी एकसमान होती हैं. हरी फलियों की 70-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल जाती है.

बोनविले : यह जाति अमेरिका से लाई गई है. यह मध्यम समय में तैयार होने वाली प्रजाति है. इस की फलियां बोआई के 80-85 दिन बाद तोड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं. इस की फलियों की औसत पैदावार 130-140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हासिल होती है.

अर्लीबैजर : यह किस्म संयुक्तराज्य अमेरिका से लाई गई है. यह अगेती किस्म है. बोआई के 65-70 दिन बाद इस की फलियां तोड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं. हरी फलियों की औसत उपज 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

अर्ली दिसंबर : यह जाति टा.19 व अर्लीबैजर के संस्करण से तैयार की गई है. यह किस्म 55-60 दिन में तोड़ने के लिए तैयार हो जाती है. हरी फलियों की औसत उपज 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

असौजी : यह एक अगेती बौनी किस्म है. इस की फलियां बोआई के 55-65 दिन बाद तोड़ी जा सकती हैं. इस की फलियां गहरे हरे रंग की 5-6 सैंटीमीटर लंबी व दोनों सिरे से नुकीली होती हैं. प्रत्येक फली में 5-6 दाने होते हैं. हरी फलियों की औसत उपज 90-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

पंत उपहार : इस किस्म की बोआई 25 अक्तूबर से 15 नवंबर तक की जाती है और इस की फलियां बोआई से 65-75 दिन बाद तोड़ी जा सकती हैं.

जवाहर मटर : इस किस्म की फलियां बोआई से 65-75 दिन बाद तोड़ी जा सकती हैं. यह मध्यम किस्म है. फलियों की औसत लंबाई 7-8 सैंटीमीटर तक होती है और प्रत्येक फली में 5-8 बीज होते हैं. फलियों में दाने ठोस रूप में भरे होते हैं. हरी फलियों की औसत पैदावार 130-140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

मध्यम किस्में

टी-9 : इस किस्म की फलियां 65 दिन में तोड़ने लायक हो जाती हैं. यह मध्यम किस्म है.  फसल की अवधि 120 दिन है. पौधों का रंग गहरा हरा, फूल सफेद व बीज झुर्रीदार व हलका हरापन लिए हुए सफेद होते हैं. फलियों की औसत पैदावार 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

टी-56 : यह भी मध्यम अवधि की किस्म है. पौधे हलके हरे, सफेद बीज झुर्रीदार होते हैं. हरी फलियां 75 दिन में तोड़ सकते हैं. औसत उपज प्रति हेक्टेयर 80-90 क्विंटल हरी फलियां मिल जाती हैं.

एनपी-29 : यह भी अगेती किस्म है. फलियों को 75-80 दिन बाद तोड़ सकते हैं. इस की फसल अवधि 100-110 दिन है. हरी फलियों की औसत पैदावार 100-120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

पछेती यानी देरी से तैयार होने वाली किस्में

ये किस्में बोने के तकरीबन 100-110 दिन बाद पहली तुड़ाई करने योग्य हो जाती हैं. जैसे- आजाद मटर-2, जवाहर मटर-2 वगैरह.

बीजों का चुनाव : मटर के अच्छे उत्पादन के लिए आधार बीज व प्रामाणित बीज बोआई के लिए उपयोग में लाना चाहिए.

बीज दर : अगेती किस्मों के लिए 100 किलोग्राम व मध्यम व पछेती किस्मों के लिए 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर लगता है. बीज हमेशा प्रमाणित व उपचारित कर के बोना चाहिए. बीज को बोने से पहले नीम का तेल या गौमूत्र या मिट्टी के तेल से उपचारित कर लेना चाहिए.

बीज और अंतरण : अकसर मटर शुद्ध फसल या मिश्रित फसल के रूप में ली जाती है. इस की बोआई हल के पीछे कूंड़ों में या

सीड ड्रिल द्वारा की जाती है. बोआई के समय 30-45 सैंटीमीटर पंक्ति से पंक्ति की दूरी रखें और 10-15 सैंटीमीटर पौध से पौध की दूरी रखें. साथ ही, 5-7 सैंटीमीटर की गहराई पर बोएं.

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बोने का समय

उत्तर भारत में दाल वाली मटर की बोआई का उचित समय 15-30 अक्तूबर तक है, वहीं दूसरी ओर फलियों वाली सब्जी के लिए बोआई 20 अक्तूबर से ले कर 15 नवंबर तक करना लाभदायक है.

खाद एवं उर्वरक

मटर की फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए 1 एकड़ जमीन में 10-15 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद और नीम की खली को खेत में समान रूप से बिखेर कर जुताई के समय मिला देना चाहिए. ट्राईकोडर्मा 25 किलोग्राम प्रति एकड़ के अनुपात से खेत में मिलाना चाहिए. लेकिन याद रहे कि खेत में जरूरी नमी हो.

बोआई के 15-20 दिन बाद वर्मिवाश का अच्छी तरह से छिड़काव करें, ताकि पौधा तरबतर हो जाए. निराई के बाद जीवामृत घोल का छिड़काव कर दें.

जब फसल फूल पर हो या समय हो रहा हो तो एमिनो एसिड व पोटैशियम होमोनेट की मात्रा स्प्रे द्वारा देनी चाहिए. 15 दिनबाद एमिनो एसिड पोटैशियम होमोनेट फोल्विक एसिड को मिला कर छिड़क देना चाहिए.

नमी बनी रहे, इस का ध्यान रखें. अगर कैमिकल खाद का इस्तेमाल करते हैं, तो गोबर या कंपोस्ट खाद (10-15 टन प्रति हेक्टेयर) खेत की तैयारी के समय दें.

चूंकि यह दलहनी फसल है, इसलिए इस की जड़ें नाइट्रोजन स्थिरीकरण का काम करती हैं. यही वजह है कि फसल में कम नाइट्रोजन देने की जरूरत पड़ती है.

कैमिकल खाद के रूप में 20-25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-50 किलोग्राम फास्फोरस और 40-50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर बीज बोआई के समय ही कतारों में दिया जाना चाहिए.

यदि किसान उर्वरकों की इस मात्रा को यूरिया, सिंगल सुपर फास्फेट व म्यूरेट औफ पोटाश के माध्यम से देना चाहता है, तो एक बोरी यूरिया, 5 बोरी सिंगल सुपर फास्फेट व डेढ़ बोरी म्यूरेट औफ पोटाश प्रति हेक्टेयर सही रहता है.

सिंचाई

मटर की देशी व उन्नतशील जातियों में 2 सिंचाई की जरूरत पड़ती है. सर्दियों में बारिश हो जाने पर दूसरी सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती.

पहली सिंचाई फूल निकलते समय बोने के 45 दिन बाद और दूसरी सिंचाई जरूरत पड़ने पर फली बनते समय बीज बोने के 60 दिन बाद करें. साधारणतया मटर को कम पानी की जरूरत होती है. सिंचाई हमेशा हलकी करनी चाहिए.

खरपतवार

मटर की फसल के प्रमुख खरपतवार हैं- बथुआ, गजरी, चटरीमटरी, सैजी, अंकारी. इन सभी खरपतवारों को निराईगुड़ाई कर के फसल से बाहर निकाला जा सकता है.

फसल बोने के 35-40 दिन तक फसल को खरपतवारों से बचाना जरूरी है. बोने के 30-35 दिन बाद जरूरत के मुताबिक 1 या 2 निराई करनी चाहिए.

कीट नियंत्रण

तनाछेदक : यह काले रंग की मक्खी होती है. इस की गिडारें फसल की शुरुआती अवस्था में छेद कर अंदर से खाती हैं. इस से पौधे सूख जाते हैं.

रोकथाम : 10 लिटर गौमूत्र रखना चाहिए. इस में 2.5 किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़ कर इसे 15 दिनों तक गौमूत्र में सड़ने दें. 15 दिन बाद इस गौमूत्र को छान लें, फिर छिड़काव करें.

फलीछेदक : देर से बोई गई फसल में इस कीट का हमला ज्यादा होता है. इस कीट की सूंडि़यां फली में छेद कर अंदर तक घुस जाती हैं और दानों को खाती रहती हैं.

रोकथाम : मदार की 5 किलोग्राम पत्ती 15 लिटर गौमूत्र में उबालें. 7.5 लिटर मात्रा बाकी रहने पर छान लें, फिर फसल में तरबतर कर छिड़काव करें.

माहू : इस कीट का प्रकोप जनवरी माह के बाद अकसर होता है.

रोकथाम : 10 लिटर गौमूत्र रखना चाहिए. इस में ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़ कर इसे 15 दिनों तक गौमूत्र में सड़ने दें. 15 दिन बाद इस गौमूत्र को छान लें, फिर छिड़काव करें.

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रोग नियंत्रण

उकठा : इस रोग की शुरुआती अवस्था में पौधों की पत्तियां नीचे से ऊपर की ओर पीली पड़ने लगती हैं और पूरा पौधा सूख जाता है. यह बीजजनित रोग है. इस रोग में फलियां बनती नहीं हैं.

रोकथाम : जिस खेत में एक बार मटर में इस बीमारी का प्रकोप हुआ हो, उस खेत में 3-4  साल तक यह फसल नहीं बोनी चाहिए. तंबाकू की 2.5 किलोग्राम पत्तियां, 2.5 किलोग्राम आक या आंकड़ा और 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों  को 10 लिटर गौमूत्र में उबालें और 5 लिटर मात्रा बाकी रहने पर छान लें, फिर फसल में अच्छी तरह छिड़काव करें.

झुलसा (आल्टरनेरिया ब्लाइट ) : इस का प्रकोप भी पत्तियों पर होता है. सब से पहले नीचे की पत्तियों पर किनारे से भूरे रंग के धब्बे बनते हैं.

रोकथाम : मदार की 5 किलोग्राम पत्ती 15 लिटर गौमूत्र में उबालें. 7.5 लिटर मात्रा बाकी रहने पर छान लें, फिर फसल में तरबतर छिड़काव करें.

उपज

हरी फलियों की पैदावार 80-120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिल जाती है. फलियां तोड़ने के बाद कुल 150 क्विंटल तक हरा चारा मिल जाता है.

ऐसे दूर करें तनाव

तनाव आज के आधुनिक समय का एक हिस्सा बनता जा रहा है. तनाव बहुत ज्यादा मैंटल या इमोशनल प्रैशर की फीलिंग है. जब आप इस प्रैशर से निबट नहीं पाते, यह प्रैशर तनाव बन जाता है. स्ट्रैस या तनाव कहींकहीं मोटिवेशनल फैक्टर का भी काम करता है. पर यह भी ध्यान देने की बात है कि तनाव सिर्फ किसी मुश्किल स्थिति की बात नहीं है, इस का आप के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. यदि आप लगातार तनाव में रहते हैं तो इस की कीमत आप के शरीर और मस्तिष्क को चुकानी पड़ती है.

स्ट्रैस लैवल का बढ़ना सीधेसीधे माइग्रेन, मोटापा जैसी कई शारीरिक बीमारियों का कारण बन जाता है. कभीकभी हार्टअटैक भी हो सकता है. तनाव दूर करने की यहां आसान सी टिप्स दी जा रही हैं जिन्हें आजमा कर आप तनाव को दूर कर स्वस्थ व खुश रहे सकते हैं. तो आइए, जानते हैं-

जब हम तनाव में होते हैं, अपने आसपास बहुत सी नकारात्मकता फैला लेते हैं. हमें यह पता भी नहीं कि यह हमें कितना नुकसान पहुंचा रही है. कई काम ऐसे होते हैं जो उतने जरूरी नहीं होते कि तभी निबटाए जाएं. सो, वे काम हाथ में लें जो उस समय ज्यादा जरूरी हैं. अपने काम को एक और्डर में और समय पर करना सीखें, तनाव महसूस नहीं होगा.

हम लगभग रोज ही न्यूजपेपर्स में या औनलाइन मैडिटेशन और ब्रीदिंग ऐक्सरसाइज के महत्त्व के बारे में पढ़ते हैं. पर इस के लिए टाइम निकालना मुश्किल लगता है. यदि आप अपना स्ट्रैस लैवल कम करना चाहते हैं तो ब्रीदिंग पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. जब आप ब्रश कर रहे हों, ट्रैफिक में फंसे हों, 5 सैकंड्स के लिए सांस लें, 5 सैकंड्स होल्ड करें, 5 सैकंड्स में सांस छोड़ दें. यह टिप आजमा कर देखें.

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अपने दिमाग को शांत रखने के लिए छोटीछोटी चीजें करें. काम के बीच छोटेछोटे ब्रेक लें. डार्क चौकलेट खाएं. मजेदार आर्टिकल पढ़ें. ये चीजें तनाव कम करने में आश्चर्यजनक रूप से काम करती हैं.

ऐसा म्यूजिक सुनें जो आप के मूड को ठीक कर देता हो. प्लेलिस्ट बनाएं. म्यूजिक का आनंद लेते रहें. शावर लेते हुए, ब्रैकफास्ट के समय या सफर करते हुए अपनी पसंद का गाना सुनें. इस से आप का दिमाग तुरंत शांत होगा और तनाव से आप बहुत दूर रह सकते हैं.

अपनी सीमाएं जानें, उतना ही काम हाथ में लें जितना आप कर सकते हों. वरना आप तनाव में आ सकते हैं. मल्टीटास्ंिकग का आइडिया आप को हीरो जैसी फीलिंग तो दे सकता है पर यह जानना भी बहुत जरूरी है कि एक पौइंट पर आप कितना काम बिना तनाव में आए कर सकते हैं.

ऐक्सरसाइज से एनर्जी और कार्यक्षमता बढ़ती है. स्ट्रैस जल्दी कम करने का यह सब से आसान तरीका है. ऐक्सरसाइज के बाद दिमाग एंडोर्फिन्स रिलीज करता है. वौकिंग, स्विमिंग, बाइकिंग, वेट लिफ्ंिटग मूड सुधारने के लिए बहुत लाभदायक हैं, सो ऐक्सरसाइज जरूर करें.

अच्छी नींद लें. यदि आप की नींद पूरी नहीं होती है, आप का दिमाग ठीक तरह से काम नहीं कर सकता और फिर छोटी से छोटी प्रौब्लम भी आप को बहुत बड़ी लगेगी जिस से फिर आप तनाव के घेरे में आ जाएंगे. अध्ययन के अनुसार, व्यक्ति को 8 घंटे की नींद जरूर लेनी चाहिए. इस का एक साइकिल होता है. कम सोने से स्ट्रैस बढ़ता है और तनाव ज्यादा रहने पर नींद आने में परेशानी होती है. इसलिए समय पर सोएं. नींद पूरी करना जरूरी है.

पौजिटिव रहें. जब भी अपने शरीर में तनाव महसूस हो, आंख बंद करें, अच्छी और पौजिटिव बातें सोचें, अपने दिमाग में शांतिपूर्ण जगह की कल्पना करें और अपने जीवन की उन सिंपल चीजों को याद करें जिन्होंने आप को खुशियां दीं. तनाव होने पर यह आसान नहीं होगा पर जीवन के प्रति पौजिटिव सोच रखना असंभव भी नहीं है.

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स्वस्थ खाने की आदत डालें. विटामिन बी से युक्त डाइट लें. जैसे, पालक, ब्रोकली, दालें, बादाम, हरी पत्तेदार सब्जियां खाएं. ओमेगा थ्री फैटी एसिड्स, जिंक तनाव दूर करने में बहुत मदद करते हैं.

कभीकभी खुद को औरों से डिस्कनैक्ट भी कर लें क्योंकि आज के जमाने में एकदूसरे से सोशल मीडिया पर जुड़े रहने में काफी समय जाता है. मस्तिष्क को आराम देने के लिए कभीकभी स्विचऔफ मोड में भी चले जाएं. फोन, टीवी, कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद करें. बाहर निकलें. नेचर के साथ कुछ समय बिताएं. शांत जगह का आनंद लें और अपने मस्तिष्क को फिरकाम करने के लिए अच्छी पौजिटिव एनर्जी दें.

स्ट्रैस कम करने के लिए कभी भी ड्रग्स, अलकोहल का सहारा न लें.

साफसुथरी जगह मन शांत रहता है. साफसफाई का ध्यान रखें. थोड़ी मेहनत करनी होगी, रोज 10-15 मिनट अपने सामान को व्यवस्थित करने में जरूर लगाएं.

अपने घर में ही आप को स्ट्रैस कम करने के तरीके मिल जाएंगे जिन से आप का तनाव तुरंत कम होगा. घर में किसी प्रियजन को गले लगाएं, फिजिकल टच आप के तनाव को दूर करेगा. जब आप किसी के गले लगते हैं, औक्सीटोसिन रिलीज होता है. इस का संबंध प्रसन्नता और तनाव कम होने से है. औक्सीटोसिन स्ट्रैस हार्मोन नोरएपिनफ्राइयन कम करता है और शरीर को रिलैक्स करता है.

अपनेआप से सकारात्मक, आशावादी बातें करें. इस से आप अपनी भावनाओं को मैनेज कर  पाएंगे.

अपने आसपास सपोर्टिव लोग रखें, कोई फैमिली मैंबर या कोई दोस्त ऐसा हो जिस से आप अपने मन की बात शेयर कर सकें. इस से आप को सोशल सपोर्ट मिलेगा.

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हंसने से स्ट्रैस कम होता है. डाक्टर पैच एडम्स के अनुसार, ह्यूमर बीमारी और सर्जरी की रिकवरी में हैल्पफुल है. स्ट्रैस महसूस हो रहा हो, तो हंसनेहंसाने वाले लोगों से मिलें.

संस्कृति का सच और अश्लीलता पर हल्ला

 अधिकतर भारतीय जानते ही नहीं कि संस्कृति है क्या. जिसे वे अपनी संस्कृति बता रहे हैं, क्या वह उन की है? पश्चिम की नग्नता क्या उन की संस्कृति थी? आज है, तो यही दर्शाता है कि उन्होंने अपनी जनता को कूपमंडूकता से बाहर निकाला है, जो भारतीयों को आज भी नसीब नहीं हुआ, तभी तो पश्चिम की संस्कृति को अपसंस्कृति नाम देते हैं.

संस्कृति एक व्यापक शब्द है जिस से आदमी के रहनसहन, बोलने, बात करने का तरीका, यानी हमारी पूरी दिनचर्या प्रभावित रहती है. जो लोग टीवी सीरियलों को हमारी संस्कृति के विपरीत बताते हैं, क्या उन्हें अपनी संस्कृति का पता है? शायद नहीं. क्योंकि हमारी अपनी कोई संस्कृति है ही नहीं.

हम जिसे अपनी संस्कृति मानते हैं, वह बाहर से आई है. बोलने, बात करने, पढ़नेओढ़ने, खानेपीने, यहां तक कि ‘सौरी’, ‘थैंक्यू’ जैसे शब्दों का प्रयोग करने तक की हमें तमीज नहीं थी. आज भी सड़कों पर गाड़ी से बरसाती पानी के छींटे मारने में हमें संकोच नहीं होता. लाइन तोड़ कर टिकट खरीदने में हम अपनी शान सम झते हैं. ट्रेनों में मूंगफली के छिलके फेंक कर गंदा करना हमारी संस्कृति का हिस्सा है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो हम भेड़ हैं. भेड़ की कोई संस्कृति नहीं होती. गड़रिया जिधर धकेलता है, हम उधर ही भागते हैं.

पढ़ालिखा तबका, जो अपने को अंगरेज की औलाद सम झता है, वह भी सिर्फ दिखावे कि लिए ‘थैंक्यू’ या ‘सौरी’ बोलता है. जरा सोचिए, अंगरेजों के आने से पहले, क्या हम किसी को थैंक्यू बोलते थे?  क्या सौरी कहना या अपनी गलती मानना हम अपनी शान के खिलाफ नहीं सम झते थे? आज भी सौरी महज औपचारिकता है वरना अपटूडेट होने के बाद भी अंदर से हम अभद्र ही हैं.

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ताजमहल, फतेहपुर सीकरी, लालकिला, चारमीनार, जीटी रोड, भारतीयों की देन नहीं हैं, जिन्हें हम अपनी संस्कृति से जोड़ कर सीना चौड़ा करते हैं. आश्चर्य होता है तब, जब हम अपनी गुलामी को ‘ग्लोरीफाई’ करते हैं. वजह साफ है, हमारे पास अपना ऐसा कुछ नहीं है जिसे दुनिया के सामने रखा जा सके. यही वजह है जो हम गुलामी की विरासत को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हैं.

हमारे पास था क्या? पंडेपुजारियों के बनाए जातपांत, गोत्र, बेसिरपैर का वास्तुशास्त्र, योग, जिस का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं. महज गोत्र के नाम पर हत्या करनी हो तो रक्त की अलग परिभाषा गढ़ते हैं.

सच तो यह है कि हम जिस पत्तल में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं. न किया होता, तो गुलामी का दंश न  झेलते. विभीषण हो या कृष्ण, अपनी मातृभूमि व प्रतिबद्धता के खिलाफ काम किया, जो हमारे प्रेरणास्रोत व सम्मानित विभूतियां हैं. यही हमारी संस्कृति है. भ्रष्टाचार, जो हमारी संस्कृति का हिस्सा है, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी के जरिए कारगिल के सैनिकों की विधवाओं का हक मारने में भी हमारी आत्मा नहीं धिक्कारती. जबकि चौबीस घंटे आत्मापरमात्मा में जीते हैं. लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. जो जहां है वहीं लूटखसोट में लगा हुआ है. इस में सब लगे हुए हैं. नेता, अधिकारी यहां तक कि आम आदमी भी इस में लिप्त है. इन में कुछ ईमानदार हो सकते हैं पर उस से कुछ नहीं होने वाला.

मानवीय कमजोरी के इस मूल में हमारे वे धार्मिक प्रसंग हैं जो कथाओं के जरिए हम बचपन से सुनते आए हैं. राक्षसों को अमृत न मिले, इस के लिए विष्णुजी ने स्त्री का रूप धरा, जो न केवल पक्षपातपूर्ण था बल्कि भ्रष्ट आचरण का नमूना भी था. यह एक प्रकार का धोखा था. चाणक्य के समय में भी अपराध था. एक ही भ्रष्ट आचरण के लिए ब्राह्मणों को कम ‘पण’ (सिक्का) तथा शूद्रों को ज्यादा ‘पण’ देने का प्रावधान था जो पक्षपात का ज्वलंत उदाहरण है. यह आज भी बदस्तूर कायम है. आज एक अरबपति भी टैक्सों की चोरी करता है. गरीबों का हक मारता है.

जिस अश्लीलता को हम अपसंस्कृति मानते हैं वही हमारी सांस्कृतिक विरासत है. खजुराहो हो या कोणार्क क्या साबित करता है? मनुस्मृति में वंश चलाने के लिए नियोग विधि से देवर के साथ संतानोत्पति करने का प्रावधान है. भीष्म अपने कामांध पिता शांतनु के लिए आजीवन अविवाहित रहने का फैसला लेते हैं. कृष्ण की 16 हजार रानियों पर कोई आपत्ति नहीं करता.

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ऐसी है हमारी संस्कृति

देवदासी प्रथा खुलेआम वेश्यावृत्ति की मिसाल है. मत्स्य पुराण में कहा गया है कि गैरब्राह्मण स्त्री को चाहिए कि ब्राह्मण को संतुष्ट होने तक भोजन कराए और हर रविवार को उस ब्राह्मण को संभोग हेतु अपना शरीर अर्पित करे. कृष्ण अर्जुन को अपनी बहन सुभद्रा को  भगा ले जाने के लिए प्रेरित करते हैं. नगरवधू प्रथा हमारे राजाओं की देन थी जिस का मकसद था मनोरंजन व सहवास. निश्चय ही इस की प्रेरणा इंद्र देवता से मिली होगी. औरतों (अप्सरा) को नचाना व भोगना इन्हीं की देन है, जो हमारी संसकृति का हिस्सा है. शिवलिंग पूजा को किस श्रेणी में रखा जाए?

संक्षेप में कह कह सकते हैं कि व्यर्थ ही हम अपने को पश्चिम से श्रेष्ठ सम झते हैं. कभी जादूटोना, मदारीसंपेरा,  झाड़फूंक के रूप में ही हमें जाना जाता था. डायन प्रथा आज भी मौजूद है. ज्योतिषशास्त्र, जिस ने इस देश की लुटिया डुबोई, आज भी डुबो रही है. जादूटोना,  झाड़फूंक, शक्ति के लिए बेकुसूर जानवरों को बलि देने की कुप्रथा, सती प्रथा, बालविवाह, विधवा प्रथा जिस में वेश्या बनना तो मंजूर था पर पुनर्विवाह नहीं.

एक तरफ जीवनमरण ऊपर वाले के हाथ में मानते हैं, दूसरी तरफ विधवा को अपने पति की मौत का जिम्मेदार मानते हैं. खानेपीने के लिए छप्पन भोग महज कागजों पर, वरना न मुगल आते न हिंदुस्तानी जानते कि तंदूरी रोटी होती क्या है. स्थापत्य कला की बारीकी मुगलों की देन है. संगीत के अनेक वाद्ययंत्र पश्चिम एशिया से आए. चिकन कला पश्चिम एशिया से आई.

अंगरेज आए तो उन्होंने दाढ़ी व बाल काटना सिखाया. पतलूनकोट पहनना सिखाया. कांटाचम्मच उन्हीं की देन है. हायहैलो उन्होंने ही सिखाया. हाथ मिलाना उन्हीं से सीखा.

जिस गालीगलौज को हम अपनी संस्कृति के खिलाफ सम झते हैं, दरअसल, वही हमारी संस्कृति का शुद्ध पत्र है. बंद दीवारों के बीच शौच करना अंगरेजों ने ही सिखाया. हम तो खेतों में जानवरों की तरह बैठते थे. आज भी देश की काफी आबादी खेतों या रेलवे की पटरी के किनारे इत्मीनान से हमारी समृद्ध संस्कृति की विरासत को दर्शाती है. तथाकथित सभ्य सम झने वाले भारतीय जब ट्रेनों के एसी डब्बे में सफर करते हैं, तो इन्हें देख कर नाकभौं सिकोड़ते हैं, जबकि कभी इस जगह पर उन का अतीत था.

गोपाष्टमी को गाय पूजते हैं. रोजाना सूई कोंच कर दूध दुहते, न ग्वाले को खयाल आता है, न खरीद कर पीने वालों को कि गाय हमारी माता है. जानवर ही मानें पर पूजने का पाखंड तो न करें. जान बचानी हो तो खून का ए-बी देखते हैं, पर जब महिलाएं पुत्र के दीर्घायु के लिए सूर्य देवता को अर्घ्य देती हैं. क्या इस से शिशु मृत्युदर में कमी आई? आज भी यह दूसरे देशों की तुलना में भारत में सब से ज्यादा है. क्या अब भी हमें अपनी श्रेष्ठ संस्कृति पर गर्व करने के लिए कुछ बचा है?  झूठ, बेईमानी, भ्रष्टाचार, कपट, ईर्ष्या, भाईभतीजावाद ही हमारी पहचान है. बेहतर होगा इन से निबटें.

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बिना शादी प्रग्नेंट होने पर इस एक्ट्रेस पर उठे थे कई सवाल

बौलीवुड एक्ट्रेस कल्कि केकलां अपनी निजी जिंदगी को लेकर इन दिनों लगातार सुर्खियों में छाई हुई  हैं. दरअसल कल्कि ने पिछले साल अपनी प्रग्नेंसी के बारे में ऐलान किया था. वो अपने बायफ्रेंड के के बच्चे को जन्म देने वाली हैं. उन्होंने अभी तक शादी नहीं की है. इसलिए उनके उनके इस फैसले पर कई सवाल भी किए गए.

बौलीवुड इंडस्ट्री में बिना शादी के मां बनना में कोई नयी बात नहीं है लेकिन इसमें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. हाल ही में कल्कि ने इस सवाल का अपने बेबाक अंदाज में जवाब दिया हैं. आपको बता दें, कल्कि करीना कपूर के चैट शो ‘इश्क एफ एम’ में गईं थीं. इस शो में उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़े हर पहलू पर खुलकर बात की. उन्होंने अपनी प्रेग्नेंसी से लेकर बायफ्रेंड और एक्स पति अनुराग कश्यप पर भी बात की.

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शो के दौरान करीना ने उनसे पूछा कि बिना शादी के मां बनने पर उन पर कई सवाल उठे हैं, उसका सामना कैसे किया. इस पर कल्कि ने हंसते हुए कहा- ‘मेरे पास एक सुपर पावर है कि मैं अपना फोन बेद कर देती हूं और काफी समय तक सोशल मीडिया से दूर रहती हूं. मैं अपने पोस्ट पर कमेंट्स नहीं पढ़ती हूं’.

कल्कि ने एक्स पति को लेकर भी बातें की. कल्कि ने कहा कि वो और अनुराग कश्यप अच्छे दोस्त हैं. उन्होंने ये भी कहा, ‘ऐसा कई बार होता है कि आप किसी से प्यार करते हो लेकिन उसके साथ रहना मुश्किल हो जाता है’.  कल्कि ने अपने पर्सनल लाइफ से जुड़े हर सवालों का बेबाकी से जवाब दिया.

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