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जानें, राष्ट्रीय आपराधिक रिकार्ड ब्यूरो

बाल अपराध – रिपोर्ट कहती हैं कि 2018 में 1 लाख 40 हजार से ज्यादा अपराध हुए हैं. अगर इसे प्रतिदिन के हिसाब से देखे 388 अपराध हर दिन हुए है जो कि बहुत अफसोस जनक है .

CRY ( Child Right and You) NRCB की रिपोर्ट पर अपने अध्ययन में कहती हैं कि बाल अपराध में सबसे ज्यादा मामले अपहरण और जोर ज़बरदस्ती के है जो पिछले साल की तुलना में लगभग 16% बढ़े हैं.  वही पास्को ( Protection of child from Sexual Offences) के अंतर्गत दूसरे सबसे ज्यादा अपराध 39,827 मामलें दर्ज हुए हैं जिसमें 9312 केस रेप के दर्ज हुए हैं.

पौलिसी रिसर्च की डायरेक्टर प्रीति मेहरा का कहना है कि “जहां एक तरफ बाल अपराध की संख्या में वृद्धि हुई है वही दूसरी इन मामलों में रिपोर्ट का दर्ज होना ये दर्शाता है कि खुद लोग और सरकार इन आपराधिक मामलों में सचेत हुई है.”

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बाल अपराध के मामलों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार का नाम सबसे ऊपर है जहां 51% अपराध होते हैं और इन सभी प्रदेशों में उत्तर प्रदेश का नाम सबसे ऊपर आता है.

महिला अपराध – NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक हर 15 मिनट में एक रेप का मामला देश में दर्ज हो रहा है. 2018 में लगभग 34,000 रेप के मामले सामने आए, पिछले वर्ष की तुलना में अपराध में वृद्धि हुई है.

महिला अपराध में बढ़ोतरी की एक वजह पुलिस और कानून का सख्त न होना भी है. जैसा कि पिछले साल कुलदीप सिंह सेंगर का रेप केस सामने आने पर पुलिस ने पीड़ित के ही परिवार के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया था.

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साम्प्रदायिक/ जातीय दंगे – पिछले कुछ महीनों में प्रोटेस्ट और उस दौरान हिंसा भी सामने आ रही है जो कि एक गलत शुरुआत है.  जातीय और साम्प्रदायिक दंगे पिछले वर्ष की तुलना में कम दर्ज हुए हैं.

मेट्रो शहरों में अपराध में बढ़ोतरी – रिपोर्ट के मुताबिक मेट्रो शहरों में अपराध के मामलों में दिल्ली सबसे ऊपर है जहां दिल्ली में 29.6 प्रतिशत है, जिसमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और विशेष व स्थानीय कानून (एसएलएल) शामिल हैं.

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NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक साल दर साल अपराध, हिंसा में बढ़ोतरी ही हो रही है. सरकार को इस पर अध्ययन कर अपराध के कारण और रोकथाम के उपाय को लागू की जरूरत है और साथ ही पुलिस प्रशासन को आपराधिक मामलों में सचेत रहने और संवेदनशील होने की जरूरत है.. ताकि हर अपराध record हो सकें और FastTrack कोर्ट के माध्यम से एक समय सीमा के अंदर न्याय मिलने से कहीं न कहीं अपराध में कमी आएगी. 2012 का दिल्ली का सबसे क्रूरतम अपराध गैंगरेप पर अब 7 साल बाद फांसी की सजा तय की गई.  न्याय में विलंब और अपराध को छुपाया/दबाया जाना भी अपराध होने की वजह है. हम सबको अपराधी का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए भले ही वो किसी भी परिवार या तबके से आता है.. राजनीति में भी आपराधिक व्यक्तियों का बहिष्कार जरूरी है.. वोट देते समय जांच पड़ताल जरूर करनी चाहिए ताकि अपराधी को भी अपराध करते समय सामाजिक बहिष्कार का डर सताये.

धर्म और राजनीति किस के लिए होगा राममंदिर ?

साल 2020 में जो चीजें राष्ट्रीय परिदृश्य पर प्रमुखता से दिखेंगी, अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण उन में सब से ऊपर होगा. वहां दुनिया का सब से बड़ा महंगा और आलीशान मंदिर बनाने की तैयारियां परवान चढ़ रही हैं. अयोध्या में जमीन के दाम दस गुना तक बढ़ गए हैं. देशभर के साधुसंत वहां डेरा डाले पड़े हैं. सुबह से पूजापाठ और यज्ञहवन वगैरह का जो सिलसिला शुरू होता है, वह देररात तक चलता रहता है. कुल जमा अयोध्या में वैदिक कालीन माहौल है.

नए साल के पहले दिन अयोध्या में खासी गहमागहमी थी. इस दिन एक लाख से भी ज्यादा श्रद्धालु यहां पहुंचे थे. इस दिन अयोध्या में राम को 56 भोग का प्रसाद चढ़ाया गया था जिसे खासतौर से वहां धूनी रमाए पड़े साधुसंतों ने चटखारे ले कर खाया. अब जायकेदार पकवानों का यह लुत्फ उन्हें जिंदगीभर मुफ्त में मिलना तय हो गया है.

9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आने के पहले ही से मंदिर निर्माण सामग्री अयोध्या पहुंचाई जा रही थी. अब हजारों मजदूर और कारीगर काम में जुटे हैं. अयोध्या से बाहर लखनऊ और दिल्ली में सूचियां बन रही हैं कि अदालत के आदेश के मुताबिक सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट में कौनकौन होगा. इस बाबत पंडेपुजारियों में खुलेआम लठ भी चल चुके हैं, गालीगलौज का भोज भी संपन्न हो चुका है.

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भगवान राम को चढ़ावा चढ़ाने के लिए कहां से क्या लाया जाएगा, श्रेष्ठि वर्ग यह तय करने में जुटा है. राम को भोग लगाने के लिए बिहार के गांव मोकरी से गोविंद भोग चावल मंगाया जाएगा, जो सब से ज्यादा सुगंधित होता है. हलचल अयोध्या के आसपास के गांवों में भी है जिसे देख लगता है कि राममंदिर केवल सवर्णों के लिए होगा. पिछड़े और दलितों को, हालांकि, यहां आने से घोषित तौर पर रोका नहीं जाएगा लेकिन ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है कि जिस से वे खुद ही यहां आने से हिचकिचाएं.

सूर्यवंशियों की पगड़ी

अयोध्या के आसपास के कोई 105 गांवों में इन दिनों सार्वजनिक सभाएं आयोजित कर उन में पगडि़यां बांटी जा रही हैं. ये पगडि़यां सिर्फ सूर्यवंशी क्षत्रियों के लिए हैं, जिन के बारे में अप्रत्याशित कहानी फैलाई गई है कि उन्होंने 500 साल पहले प्रतिज्ञा की थी कि जब तक राममंदिर फिर से नहीं बन जाता तब तक वे सिर पर पगड़ी नहीं बांधेंगे, छाते से सिर नहीं ढकेंगे और चमड़े के जूते नहीं पहनेंगे. गौरतलब है कि अयोध्या और उस से सटे बस्ती जिले के सूर्यवंशी भी खुद को राम का वंशज मानते हैं.

जैसे ही 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट का फैसला रामलला विराजमान के पक्ष में आया, इन क्षत्रियों में खुशी की लहर दौड़ गई और समारोहपूर्वक डेढ़ लाख लोगों को पगडि़यां व साफे बांटे जाने लगे. सूर्यवंशी चमड़े के जूतेचप्पल पहनने लगे और अब मंदिर निर्माण की तैयारियों में यथासंभव सहयोग दे रहे हैं. एक तरह से इन्होंने अचानक ही राम और अयोध्या पर अपनी दावेदारी ठोक दी है.

यह दावेदारी कोई अप्रत्याशित या अस्वाभाविक नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत है कि देश के लाखों मंदिर सवर्णों के होते ही हैं फिर राममंदिर की तो बात ही निराली है. अयोध्या में पंडेपुजारियों के जमावड़े का मत भी यह है कि राम भगवान के आसपास उन के अलावा अगर कोई फटक सकता है तो वे क्षत्रिय हैं जो उन के परंपरागत यजमान हैं.

यजमान संपन्न वैश्य और दीगर जातियों के सवर्ण भी होंगे जो इफरात से चढ़ावा अयोध्या में दे सकते हैं. वे द्वितीय प्राथमिकता के तहत रामलला के दर्शन के अधिकारी होंगे. लेकिन पिछड़ों और दलितों के बारे में साफ दिख रहा है कि उन्हें अयोध्या आने से रोका तो नहीं जाएगा लेकिन वहां यह एहसास उन्हें हो जाएगा और नहीं होगा तो करा दिया जाएगा कि मर्यादा पुरुषोत्तम का यह मंदिर तुम्हारे लिए नहीं है. तुम लोग अपनी जाति के देवीदेवता पूजो जो वेदपुराणों के निर्देशानुसार तुम्हें सदियों पहले ही पकड़ा दिए गए थे. कुछ नए देवीदेवता गढ़ लिए गए हैं और हर जाति को वर्णव्यवस्था में अपने स्तर के अनुसार दे दिए गए हैं.

जाति के अलावा यह बात आर्थिक आधार पर भी हर कहीं साफसाफ दिखती है कि बड़े भव्य ब्रैंडेड मंदिर पैसे वालों के लिए ही होते हैं. गरीबों के लिए गलीकूचों में इफरात से हनुमान, शनि, काली और भैरों व अनजान देवों, देवियों और माताओं वगैरह के मंदिर हैं. इन में ऊंची जाति वाले कभी नहीं जाते. हां, दक्षिणा तगड़ी मिले तो पंडेपुजारी पूजापाठ कराने के लिए एहसान करते हुए चले जाते हैं. वैसे भी, इन गरीब दलितों ने सवर्णों के बराबर दिखने के लिए अपनी ही जातियों के पंडेपुजारी पैदा भी कर रखे हैं.

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इन्होंने उठाई थी पालकी

सूर्यवंशी क्षत्रियों की पगड़ी और जूतों की आड़ में राममंदिर पर दावेदारी के काफी पहले 28 नवंबर, 2018 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान अलवर की एक रैली में साफसाफ यह कहते फसाद खड़ा कर चुके थे कि हनुमान दलित थे. यानी, जो सेवक है वह दलित है और सवर्णों की सेवा व दासता दलितों का कर्त्तव्य व धर्म है.

जन्मना क्षत्रिय और कर्मना ब्राह्मण आदित्यनाथ के बयान पर उतना ही बवाल मचा था जितना कि वे और उन के पीछे के पैरोकार चाहते थे. तब जगहजगह दलित युवाओं ने हनुमान मंदिरों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था. लेकिन, जैसा कि कट्टर हिंदूवादी चाहते थे, बाद में मान भी लिया गया कि वे भी हनुमान की तरह दलित हैं.

इसी तरह ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने भी राममंदिर पर कब्जा कर लिया है. इस के पीछे कई अहम वजहें हैं. इन में से खास है जातिवाद और वर्णव्यवस्था को बनाए रखना, जो मौजूदा भाजपा सरकार और उस के पितृ संगठन आरएसएस का घोषित एजेंडा भी है. इन की मंशा यह है कि ब्राह्मण, पुजारी और पंडे पूजापाठ कर मलाई चाटते रहें जबकि क्षत्रिय वर्ग हमेशा की तरह इस मुगालते में रहे कि वह यजमान होने के नाते जातिगत रूप से बाकी के 2 वर्णों से श्रेष्ठ है. यानी, वह ब्राह्मणों का मोहरा बने रहने को तैयार है.

यह टोटका बेकार भी नहीं गया है इन दिनों अयोध्या की दान पेटी हर 15 दिन में खुल रही है जिस के नोट उगलने की तादाद भी हैरतअंगेज तरीके से बढ़ती जा रही है. हालफिलहाल हर पखवाड़े

8 लाख रुपए के लगभग दान राशि निकाल रही है जिस के रामनवमी आतेआते 1 करोड़ से भी ज्यादा होने का अंदाजा है क्योंकि तब तक ट्रस्ट बन चुका होगा और मंदिर निर्माण का काम शबाब पर होगा. इस की तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं. राममंदिर परिसर यानी श्री रामलला विराजमान शहर का क्षेत्रफल 67 एकड़ से बढ़ा कर 100 एकड़ करने की कवायद भी लगभग पूरी होने को है.

राममंदिर आंदोलन का इतिहास बताता है कि यह पूरी तरह सवर्णों की अगुआई में ही हुआ है. 80 के दशक से इस आंदोलन ने जो आग पकड़ी थी उस में अग्रणी नाम आरएसएस प्रमुख बाला साहब देवरस, विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल, रज्जू भैया, के सुदर्शन और मोहन भागवत के ही थे. आरएसएस के मौजूदा मुखिया मोहन भागवत हैं. इन के अलावा महंत अवैद्यनाथ, रामचंद्र परमहंस दास, विश्वेशतीर्थ और वासुदेवानंद जैसे नामी संतों ने भी बढ़चढ़ कर राममंदिर आंदोलन को हवा दी थी.

लेकिन मंदिर अभियान में सभी की भागीदारी दिखे, इस बाबत पिछड़े वर्ग के महत्त्वाकांक्षी नेताओं उमा भारती, गोपीनाथ मुंडे, कल्याण सिंह, शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र मोदी को भी इस में शामिल किया गया था. तब नरेंद्र मोदी आज जितने बड़े नाम या व्यक्तित्व नहीं थे. पिछड़े वर्ग की आक्रामक हिंदूवादी तेवरों वाली साध्वी ऋतंभरा ने भी ‘एक धक्का और दो, बाबरी मसजिद तोड़ दो’ और ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहां बनाएंगे’ जैसे भड़काऊ नारों से देश सिर पर उठा लिया था.

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देखा जाए तो यह, दरअसल, वैदिक कालीन वर्णव्यवस्था का लोकतांत्रिक संस्करण था, जिस में नेतृत्व ऊंची जाति वाले करते हैं. वैश्यों और शूद्रों का काम बाकी काम संभालना होता है. ये वे वर्ग हैं जिन्हें धर्म, राम और हिंदुत्व के नाम पर लड़ने को उकसाया जाता है और फिर धार्मिक हिंसा में मरने छोड़ दिया जाता है. इस के बाद भी राममंदिर पर इन का कोई अधिकार नहीं होता.

प्रसंगवश यह उल्लेख यहां जरूरी है कि भाजपाई राजनीति के लिए पिछड़े और दलित आरएसएस ने मंदिर आंदोलन के जरिए ही जोड़े थे. ब्राह्मणों के वर्चस्व वाली धर्म संसद में गुपचुप ऐसे षड्यंत्रकारी फैसले होते हैं. मसलन, 9 नवंबर, 1989 को जब अयोध्या में विवादित स्थल के पास राममंदिर का शिलान्यास होना था तब बिहार के एक दलित कामेश्वर चौपाल को पहली ईंट रखने का सौभाग्य प्रदान किया गया था. तब मकसद यह जताना था कि यह आंदोलन केवल सवर्ण हिंदुओं का नहीं है.

लेकिन, अब यह सब सवर्ण हिंदुओं का ही है और दलितपिछड़ों की हालफिलहाल कोई सुध नहीं ले रहा है. लेकिन संभावना इस बात की ज्यादा है कि आरएसएस और धर्म संसद दलित पिछड़ों को एकदम नजरअंदाज नहीं करेंगे. ये वर्ग तो इस बात से ही खुश हो जाने वाले हैं कि उन के वर्ग से भी किसी को प्रस्तावित ट्रस्ट में नुमाइंदगी मिल जाए. एकाध पिछड़ों को जगह मिल भी सकती है. लेकिन दबदबा ब्राह्मणों का रहेगा, यह बात साफसाफ दिख रही है.

अब होगा यह कि राममंदिर की भव्यता के तले दलितपिछड़ों की हीनता हमेशा की तरह दब कर रह जाएगी. उन्हें सीधे धकियाया नहीं जाएगा, लेकिन हालात ऐसे कर दिए जाएंगे कि वे खुद ही अयोध्या के राम दरबार का रुख न करें. महंगे मौल्स में, फाइवस्टार होटलों में और सिनेप्लैक्स में मैलाकुचैला गरीब धोखे से भी चला जाए तो उस से अपनी हीन मानसिकता उस से छिपाए नहीं छिपती और वह अपने वर्ग के दूसरे लोगों को इन जगहों पर जाने के नुकसान गिनाता व बताता रहता है.

पंडेपुजारियों का दबदबा

ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब देश के किसी कोने से यह खबर न आती हो कि दलित को मंदिर में प्रवेश से रोका न गया हो और न मानने पर माराकूटा भी न गया हो, दलित दूल्हे को मूर्ति के दर्शन न करने दिए गए हों. ऐसी खबरें आम हैं. ये हादसे और झड़पें इस बात का नवीनीकरण कर जाते हैं कि विष्णु अवतार के मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर वैदिक काल से ही रोक है. इधर दलित भी जिद पर अड़े रहते हैं कि पिट लें, जूते खा लें लेकिन मंदिर में जरूर जाएंगे. मानो इस से उन के पाप, जो उन्होंने किए ही नहीं होते, वाकई में धुल जाएंगे और ऊंची जाति वाले उन्हें भैयाभैया कहते गले से लगा लेंगे.

पंडेपुजारियों की निगाह में दलित दलित ही है फिर चाहे वह राष्ट्रपति ही क्यों न हो. आम दलितों की बात तो छोडि़ए, खुद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी मंदिर जाने पर प्रताडि़त, तिरस्कृत और अपमानित किए जा चुके हैं. मार्च 2018 में वे पुरी के नामी जगन्नाथ मंदिर में पत्नी सविता कोविंद के साथ गए थे, तो वहां के सेवादारों ने उन से भी बदसुलूकी करते उन्हें गर्भगृह में नहीं जाने दिया था. सविता के साथ जानबूझ कर धक्कामुक्की भी की गई थी और दोनों के रास्ते में रोड़े अटकाए गए थे.

इस पर राष्ट्रपति भवन के अधिकारियों ने, दिखावे का ही सही, कड़ा एतराज जताते जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) को कलैक्टर पुरी अरविंद अग्रवाल के जरिए पत्र लिखा था. लेकिन मामले पर जल्द ही लीपापोती कर दी गई थी. इस से साबित यह हुआ था कि मंदिरों में दादागीरी तो पंडों की ही चलेगी. उन की नजर में सर्वोच्च संवैधानिक पद की भी कोई अहमियत नहीं है क्योंकि उस पर दलित समुदाय का व्यक्ति बैठा है.

इसी तरह 17 सितंबर, 2019 को भाजपा सांसद ए नारायणस्वामी को कर्नाटक के टुमकुरु जिले के  पारामनाहल्ली के गोल्लकाहट्टी स्थित एक मंदिर में नहीं जाने दिया गया था. यादव जाति के नारायणस्वामी दलित नहीं बल्कि पिछड़े समुदाय से आते हैं जिन्हें टुमकुरु में दलित माना जाता है. चित्रदुर्ग लोकसभा क्षेत्र के ये सांसद महोदय भी अपना सा मुंह ले कर रह गए थे.

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जिस देश में दलित राष्ट्रपति, मंत्री और सांसद तक मंदिर में न घुसने दिए जाते हों वहां आम दलित की हालत क्या होती होगी, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.

अयोध्या में यह सब नहीं होगा, इस की शायद ही कोई गारंटी ले. मुमकिन है, वहां यह सब अप्रत्यक्ष तरीके से किया जाए. मकसद हमेशा की तरह यह जताना होगा कि तुम लोग अपने देवीदेवताओं के मंदिरों में जाओ. बड़े मंदिरों में आने से वे अपवित्र हो जाते हैं, इसलिए उन्हें गंगाजल से धोना पड़ता है.

हिंदू धर्म का यह वीभत्स सच कभी किसी सुबूत का मुहताज नहीं रहा कि बड़े मंदिर सिर्फ ऊंची जाति वालों के लिए हैं. सदियों से चली आ रही मान्य हिंदू परंपरा को तोड़ने की कोशिश दलितों के मसीहा भीमराव अंबेडकर ने की थी. 2 मार्च, 1930 को नासिक के कालाराम मंदिर में उन्होंने एक ऐतिहासिक सत्याग्रह किया था, जिस का मकसद हिंदू दलितों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलाना था. इस सत्याग्रह में कोई 15 हजार दलित शामिल हुए थे.

5 वर्षों से भी ज्यादा चले इस सत्याग्रह के दौरान भीमराव अंबेडकर ने तुक की एक बात यह कही थी कि हिंदू इस बात पर भी विचार करें कि क्या मंदिर प्रवेश हिंदू समाज में दलितों के सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने का अंतिम उद्देश्य है या उन के उत्थान की दिशा में यह पहला कदम है? यदि यह पहला कदम है तो अंतिम लक्ष्य क्या है? दलितों का अंतिम लक्ष्य सत्ता में भागीदारी होना चाहिए.

अफसोस तो इस बात का है कि दलितों को सत्ता में थोड़ीबहुत भागीदारी तो आरक्षण के चलते मिली लेकिन उन की आर्थिक, सामाजिक और दूसरी किसी हैसियत में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है.

राममंदिर से भी भला सवर्णों का ही होना है. दलित तो वहां भी हमेशा की तरह मजदूरी करता नजर आ रहा है और यही काम वर्णव्यवस्था में उसे सौंपा गया है.

अफसोस तो इस बात का भी है कि भाजपा राज में कोई रोजगार और अर्थव्यवस्था सुधारने की बात या पहल नहीं कर रहा. कहीं बड़ी फैक्ट्रियां नहीं बन रहीं, पुलसड़कें, अस्पताल और स्कूल नहीं बन रहे, लेकिन मंदिर इफरात से बन रहे हैं. दिनोंदिन वीभत्स होते इन हालात को देख यही कहा जा सकता है कि भगवान कहीं होता हो तो वही भला करे. नहीं तो, नीचे वाले तो अपनी मनमानी पर उतारू हो ही आए हैं.

श्री रामलला शहर के ढांचागत विकास के लिए पैसा केंद्र सरकार देगी यह कितने अरब या खरब होगा यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है लेकिन यह साफ दिख रहा है कि सरकार कोई कंजूसी या कमी इस में नहीं रखेगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कोई आर्थिक सीमा निर्धारित नहीं की गई है. अब सरकार आम जनता के खूनपसीने के पैसे से भव्य मंदिर बनवाएगी तो किसी को यह पूछने का हक भी नहीं होगा कि किस हक से और किस के लिए यह अथाह धनराशि मंदिर में जाया की जा रही है और इस से जो रिटर्न मिलेगा उस पर किस का हक होगा और क्या वह सरकारी खजाने में जाम किया जाएगा. दूसरी तरफ रामलला ट्रस्ट भी मंदिर निर्माण के लिए आम लोगों से पैसा जुटाने की बात कह चुका है यानी लूट दोहरी होगी.

 सर्वस्व : भाग 3

समय का चक्र मानो फिर से घूम गया था. अब मां व शिखा के प्रति मामामामी का रवैया बदलने लगा था. हर बात में मामी कहतीं, ‘अरे जीजी, बैठो न. आप बस हुक्म करो. बहुत काम कर लिया आप ने.’

मामी के इस रूप का शिखा खूब आनंद लेती. इस दिन के लिए वह कितना तरसी थी.

जब सरकारी बंगले में जाने की बात आई तो सब से पहले मामामामी ने अपना सामान बांधना शुरू कर दिया. मगर नानी ने जाने से मना कर दिया, यह कह कर कि इस घर में नानाजी की यादें बसी हैं, वे इसे छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगी, और जो भी जाना चाहे, वह जा सकता है. मां नानी के दिल की हालत समझती थीं, उन्होंने भी जाने से मना कर दिया. सो, शिखा ने भी शिफ्ट होने का खयाल उस समय टाल दिया.

इसी बीच, एक बहुत ही सुशील और हैंडसम अफसर, जिस का नाम राहुल था, की तरफ से शिखा को शादी का प्रस्ताव आया. राहुल ने खुद आगे बढ़ कर शिखा को बताया कि वह उसे बहुत पसंद करता है व उस से शादी करना चाहता है. शिखा को भी राहुल पसंद था.

राहुल शिखा को अपने घर, अपनी मां से भी मिलाने ले गया था. राहुल ने उसे बताया कि किस प्रकार पिताजी के देहांत के बाद मां ने अपने संपूर्ण जीवन की आहुति सिर्फ और सिर्फ उस के पालनपोषण के लिए दे दी. घरघर काम कर के, रातरात भर सिलाईकढ़ाई व बुनाई कर के उस को इस लायक बनाया कि आज वह इतना बड़ा अफसर बन पाया है. उस की मां के लिए वह और उस के लिए उस की मां. उन दोनों की बस यही दुनिया थी.

राहुल का कहना था कि अब उन की इस 2 छोरों वाली दुनिया का तीसरा छोर शिखा है, जिसे बाकी दोनों छोरों का सहारा भी बनना है व उन्हें मजबूती से बांधे भी रखना है. यह सब सुन कर शिखा को महसूस हुआ था कि यह दुनिया कितनी छोटी है. वह समझती थी कि केवल एक वही दुखों की मारी है. मगर यहां तो राहुल भी कांटों पर चलतेचलते ही उस तक पहुंचा है. अब, जब वे दोनों हमसफर बन गए हैं, तो उन की राहें भी एक हैं और मंजिल भी.

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राहुल की मां शिखा से मिल कर बहुत खुश हुईं. उन की होने वाली बहू इतनी सुंदर, पढ़ीलिखी तथा सुशील है, यह देख कर वे खुशी से फूली नहीं समा रही थीं. झट से उन्होंने अपने गले की सोने की चेन उतार कर शिखा के गले में पहना दी, और बड़े ही स्नेह से शिखा से बोलीं, ‘बस बेटी, अब तुम जल्दी से यहां मेरे पास आ जाओ और इस घर को घर बना दो.’

परंतु एक बार फिर शिखा के परिवार वाले उस की खुशियों के आड़े आ गए. राहुल दूसरी जाति का था और उस के यहां मीटमछली बड़े शौक से खाया जाता था. जबकि शिखा का परिवार पूरी तरह से पंडित बिरादरी का था, जिन्हें मीटमछली तो दूर, प्याजलहसुन से भी परहेज था.

घर पर सब राहुल के साथ उस की शादी के खिलाफ थे. जब शिखा की मां माला ने शिखा को इस शादी के लिए रोकना चाहा तो शिखा तड़प कर बोली, ‘मां, तुम भी. तुम भी चाहती हो कि इतिहास फिर से अपनेआप को दोहराए? फिर एक जिंदगी तिलतिल कर के इन धार्मिक आडंबरों और दुनियादारी के ढकोसलों की अग्नि में अपना जीवन स्वाहा कर दे? तुम भी मां…’ कहतेकहते शिखा रो पड़ी.

शिखा के इस तर्क के आगे मां निरुत्तर हो गईं. वे धीरे से शिखा के पास आईं और उस का सिर सहलाते हुए, रुंधी आवाज में बोलीं, ‘मुझे माफ कर देना मेरी प्यारी बेटी. बढ़ती उम्र ने नजर ही नहीं, मेरी सोचनेसमझने की शक्ति को भी धुंधला दिया था. मेरे लिए तुम्हारी खुशी से बढ़ कर और कुछ भी नहीं. हम आज ही यह घर छोड़ देंगे.’

जब मामामामी को पता लगा कि शिखा का इरादा पक्का है और माला भी उस के साथ है तो सब का आक्रोश ठंडा पड़ गया. अचानक उन्हें गुरुजी का ध्यान आया. साथ ही, गुरुजी में उन्हें आशा की अंतिम किरण भी नजर आई कि शायद उन के कहने से शिखा अपना निर्णय बदल दे.

बात गुरुजी तक पहुंची तो वे भी बिफर उठे. जैसे ही उन्होंने शिखा को कुछ समझाना चाहा, शिखा ने अपने मुंह पर उंगली रख कर उन को चुप रहने को इशारा किया और अपने गले में पड़ा उन की तसवीर वाला लौकेट उतार कर उन के सामने रख दिया. सब लोग गुस्से में कह उठे, ‘यह क्या पागलपन है शिखा?’

गुरुजी भी आश्चर्यमिश्रित रोष से  उसे देखने लगे. इस पर शिखा दृढ़  स्वर में बोली, ‘बहुत कर ली आप की इज्जत और देख ली आप की शक्ति भी, जो सिर्फ और सिर्फ अपना स्वार्थ देखती है. मेरा सर्वस्व, अब मेरा होने वाला पति राहुल है, उस का घर ही मेरी मंजिल है, उस की सेवा मेरा धर्म और वही मेरा सबकुछ है,’ यह कह कर शिखा तेजी से उठ कर वहां से निकल गई.

शिखा के इस आत्मविश्वास के आगे सब ने समर्पण कर दिया और खूब धूमधाम से राहुल के साथ उस का विवाह हुआ.

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अचानक बादलों की गड़गड़ाहट से शिखा की आंख खुल गई. आंगन में लोगों की चहलकदमी शुरू हो गई थी. आंखें मलती हुई वह उठी और सोचने लगी, यहां दीवान पर लेटेलेटे उस की आंख क्या लगी, वह तो अपना अतीत एक बार फिर से जी आई. बाहर बादलों का एक झोंका बरस कर निकल गया था और पेड़ों की पत्तियां धुलीधुली, निखर कर मुसकराने लगी थीं.

राहुल अब किसी भी वक्त उसे लेने पहुंचने ही वाला होगा. इस खयाल से शिखा के चेहरे पर एक लजीली मुसकान बिखर गई.

 सर्वस्व : भाग 2

सब काम निबटातेनिबटाते, भागतेदौड़ते वे स्कूल पहुंचतीं. कई बार तो शिखा को देर से स्कूल पहुंचने पर डांट भी खानी पड़ती. इसी प्रकार शाम को घर लौटने पर जब मां अपनी चाय बनातीं तो बारीबारी पूरे घर के लोग चाय के लिए आ धमकते और फिर वे रसोई से बाहर ही न आ पातीं. रात में शिखा अपनी पढ़ाई करतेकरते मां का इंतजार करती कि कब वे आएं तो वह उन से किसी सवाल या समस्या का हल, या प्रश्न का उत्तर पूछ ले. परंतु मां काम से फुरसत ही नहीं पातीं और वह कौपीकिताब लिएलिए ही सो जाती. जब मां आतीं तो बड़े प्यार से उसे उठ कर खाना खिलातीं और सुला देतीं. फिर अगले दिन सुबह उठ कर उसे पढ़ातीं.

यदि वह कभी मामा या मामी के पास कुछ हल पूछने जाती तो वे लोग हंस कर उस की खिल्ली उड़ाते और उस से कहते, ‘अरे बिटिया, क्या करना है इतना पढ़लिख कर? अफसरी तो करनी नहीं तुझे. चल, मां के साथ थोड़ा हाथ बंटा ले, काम तो यही आएगा.’

वह खीझ कर वापस आ जाती. परंतु उन की उपहासभरी बातों से उस ने हिम्मत न हारी, न ही निराशा को अपने मन में घर करने दिया, बल्कि वह और भी दृढ़ इरादों के साथ पढ़ाई में जुट जाती.

मामामामी अपने बच्चों के साथ अकसर बाहर घूमने जाते और बाहर से ही खापी कर आते. मगर भूल कर भी कभी न उस से, न ही उस की मां से पूछते कि उन का भी कहीं आनेजाने का या बाहर का कुछ खाने का मन तो नहीं. और तो और, जब भी घर में कोई बहुत बढि़या, स्वादिष्ठ चीज बनती तो मामी अपने बच्चों को पहले परोसतीं और उन को भरभर के देतीं. वह एक किनारे चुपचाप अपनी प्लेट लिए, अपना नंबर आने की प्रतीक्षा में खड़ी रहती. सब से बाद में मामी अपनी आवाज में बनावटी मिठास भर के उस से ‘अरे, बिटिया, तुम भी आ गईं. आओ, आओ,’ कह कर बचाखुचा, कंजूसी से उस की प्लेट में डाल देतीं.

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तब उस का मन बहुत कचोटता और कह उठता कि काश, आज उस के भी पापा होते, तो वे उस को कितना प्यार करते, कितने प्यार से उसे खिलाते. तब किसी की भी हिम्मत न होती जो उस का इस तरह मजाक उड़ाता या खानेपीने को तरसाता. तब वह तकिए में मुंह छिपा कर बहुत रोती, मगर फिर मां के आने से पहले ही मुंह धो कर मुसकराने का नाटक करने लगती कि कहीं मां ने उस के आंसू देख लिए तो वे बहुत दुखी हो जाएंगी और वे भी उस के साथ रोने लगेंगी, जो वह हरगिज नहीं चाहती थी.

एकाध बार उस ने गुरुजी से, परिवार से मिलने वाले इन कष्टों का जिक्र करना चाहा, परंतु गुरुजी ने हर बार किसी न किसी बहाने से उसे चुप करा दिया. वह समझ गईर् कि सारी दुनिया की तरह गुरुजी भी बलवान के साथी हैं. सो, उस ने उन के आगे हाथ जोड़ना बंद कर दिया. अब वह सिर्फ अपनेआप पर भरोसा करती थी. प्यासे कौवे की कंकड़ डालडाल कर पानी को ऊपर लाने की जो कहानी उस ने पढ़ी थी, उसी को उस ने अपना मूलमंत्र बना लिया था. उस ने तय कर लिया था कि जीवन में उसे कुछ बड़ा करना है, बड़ा बनना है, जिस के लिए मेहनत जरूरी थी. वह मेहनत से कभी डरी नहीं, फिर चाहे कितनी बार उस के अपनों ने ही उसे नीचे धकेलने की कोशिश क्यों न की हो.

जब वह छोटी थी, तब इन सब बातों से अनजान थी. मगर जैसेजैसे बड़ी होती गई, उसे सारी बातें समझ में आने लगीं. और इस सब का कुछ ऐसा असर हुआ कि वह अपनी उम्र के हिसाब से जल्दी व ज्यादा ही समझदार हो गई.

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उस की मेहनत व लगन रंग लाई और एक दिन वह बहुत बड़ी सरकारी अफसर बन गई. गाड़ीबंगला, नौकरचाकर, दुनिया के ऐशोआराम अब सबकुछ उस के पास थे. उस दिन मांबेटी एकदूसरे के गले लग कर इतना रोईं, इतना रोईं कि पत्थरदिल हो चुके मामामामी की भी आंखें भर आईं. नानी भी बहुत खुश थीं और अपने पूरे कुनबे को फोन कर के उन्होंने बड़े गर्व से यह खबर सुनाई.

वे सभी लोग जो वर्षों से उस को और मां को इस परिवार पर एक बोझ समझते थे, ससुराल से निकाली गई, मायके में आ कर पड़ी रहने वाली समझ कर शकभरी निगाहों से देखते थे, और उन्हें देखते ही मुंह फेर लेते थे, आज उन दोनों की प्रशंसा करते थक नहीं रहे थे. उस को अपनी ‘बिटिया रानी’ बुला रहे थे. मामामामी भी इन से अलग नहीं थे. उन्होंने तो उस के अफसर बनने का पूरा क्रैडिट ही स्वयं को दे दिया था और गर्व से इतराते फिर रहे थे.

अगले भाग में पढ़ें- तुम भी मां…’ कहतेकहते शिखा रो पड़ी.

 सर्वस्व : भाग 1

बैठक में बैठी शिखा, राहुल के खयालों में खोई हुई थी. मंदमंद बहती हवा, खिड़की से भीतर आ कर उस के खुले हुए लंबे बालों की लटों से अटखेलियां कर रही थी. वह नहाने के बाद तैयार हो कर सीधे यहीं आ कर बैठ गई थी. उस का रूप उगते हुए सूरज की तरह बहुत ही खूबसूरत लग रहा था. सुनहरे गोटे की किनारी वाली लाल साड़ी, हाथों में ढेर सारी लाल चूडि़यां, माथे पर बड़ी सी बिंदी और मांग में चमकता हुआ लाल सिंदूर मानो सीधेसीधे सूर्य की लाली को चुनौती दे रहे थे.

घर के सब लोग सो रहे थे मगर शिखा को रातभर नींद नहीं आई थी. शादी के बाद वह पहली बार मायके आईर् हुई थी पैर फेरने. आज राहुल यानी उस का पति उस को वापस लिवाने आने वाला था. वह बहुत प्रसन्न थी.

उस ने एक भरपूर नजर बैठक में घुमाई. उसे याद आ रहा था वह दिन जब वह बहुत छोटी सी थी और अपनी मां के पल्लू को पकड़े हुए, सहमी सी, दीवार के कोने में घुसी जा रही थी. नानाजी यहीं दीवान पर बैठे अपनी रोबदार आवाज में अपना फैसला सुना रहे थे, ‘माला अब अपनी बच्ची के साथ यहीं रहेगी, हम सब के साथ. यह घर उस का भी उतना ही है, जितना तुम सब का.’ अपने बेटेबहुओं की तरफ देखते हुए उन्होंने यह कहा था.

वे आगे बोले थे, ‘यह सही है कि मैं ने माला का विवाह उस की मरजी के खिलाफ किया था क्योंकि जिस लड़के को वह पसंद करती थी, वह हमारे जैसे उच्च कुल का नहीं था, परंतु जयराज (शिखा के पिता) के असमय गुजर जाने के बाद उस की ससुराल वालों ने उस के साथ बहुत अन्याय किया. उन्होंने जयराज के इंश्योरैंस का सारा पैसा हड़प लिया. और तो और, मेरी बेटी को नौकरानी बना कर दिनरात काम करवा कर बेचारी का जीना हराम कर दिया है.

‘मुझे पता नहीं था कि दुनिया में कोई इतना स्वार्थी भी हो सकता है कि अपने बेटे की आखिरी निशानी से भी इस कदर मुंह फेर ले. मैं अब और नहीं देख सकता. इस विषय में मैं ने गुरुजी से भी बात कर ली है और उन की भी यही राय है कि माला बिटिया को उन लालचियों के चंगुल से छुड़ा कर यहीं ले आया जाए.’

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एक पल ठहर कर वे फिर बोले, ‘अभी मैं जिंदा हूं और मुझ में इतनी सामर्थ्य है कि मैं अपनी बेटी और उस की इस फूल सी बच्ची की देखभाल कर सकूं. मैं तुम सब से भी यही उम्मीद करता हूं कि तुम दोनों भी अपने भाई होने का फर्ज बखूबी अदा करोगे.’

यह कहते हुए नानाजी ने बड़े प्यार से उस का हाथ पकड़ कर उसे अपनी गोदी में बिठा लिया था. उस वक्त वह अपनेआप को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझ रही थी. घर के सभी सदस्यों ने इस फैसले को मान लिया था और उस की मां भी घर में पहले की तरह घुलनेमिलने का प्रयत्न करने लगी थीं. मां ने एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी कर ली थी. इस तरह से उन्होंने किसी को यह महसूस भी नहीं होने दिया कि वे किसी पर बोझ हैं.

नानाजी व नानी के परिवार की अपने कुलगुरु में असीम आस्था थी. उन के घरपरिवार में उन गुरुजी का बहुत मानसम्मान था. सब के गले में एक लौकेट में उन गुरुजी की ही तसवीर रहती थी. कोई भी बड़ा निर्णय लेने के पहले गुरुजी की आज्ञा लेनी आवश्यक होती थी. शिखा ने बचपन से ही ऐसा माहौल देखा था, सो वह भी बिना कुछ सोचेसमझे उन को ही सबकुछ मानने लगी थी. अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद उस की मां कुछ वक्त गुरुजी की तसवीर के सामने बैठा करती थीं. कभीकभी वह भी मां के साथ बैठती. उस की ख्वाहिश थी कि वह इतनी बड़ी अफसर बन जाए कि वह अपनी मां को वे सारे सुख और आराम दे सके जिन से वे वंचित रह गई हैं.

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खट की आवाज के साथ शिखा की तंद्रा भंग हो गई. उस ने मुड़ कर देखा, तेज हवा के कारण एक खिड़की अपने कुंडे से निकल कर बारबार चौखट पर टकरा रही थी. उठ कर शिखा ने उस खिड़की पर वापस कुंडा लगाया. आंगन में झांका तो शांति ही थी, घड़ी में देखा तो सुबह के 6 बज रहे थे. सब अभी सो ही रहे हैं, यह सोचते हुए वह भी वहीं सोफे पर अधलेटी हो गई. उस का मन फिर अतीत की ओर भागने लगा.

जब तक नानाजी जिंदा रहे, उस घर में वह राजकुमारी और मां रानी की तरह रहीं. मगर यह सुख उन दोनों की जिंदगी में बहुत अधिक दिनों के लिए नहीं लिखा था. एक वर्र्ष बीततेबीतते अचानक ही एक दिन हृदयगति रुक जाने के कारण नानाजी का देहांत हो गया. सबकुछ इतनी जल्दी घटा कि नानी को बहुत गहरा सदमा लगा. अपनी बेटी व नातिन के बारे में सोचना तो दूर, उन्हें अपनी ही सुधबुध न रही. वे पूरी तरह से अपने बेटों पर निर्भर हो गईं. हालात के इस नए समीकरण ने शिखा और उस की मां माला की जिंदगी को फिर से वापस, कभी न खत्म होने वाले दुखों के द्वार पर ला खड़ा किया.

नानाजी के असमय देहांत और नानीजी के डगमगाते मानसिक संतुलन ने जमीनजायदाद, रुपएपैसे, यहां तक कि घर के बड़े की पदवी भी मामा लोगों के हाथों में थमा दी. अब घर में जो भी निर्णय होता, वह मामामामी की मरजी के अनुसार होता. कुछ वक्त तक तो उन निर्णयों पर नानी से हां की मुहर लगवाई जाती रही. उस के बाद वह रस्म भी बंद हो गई. छोटे मामामामी बेहतर नौकरी का बहाना बना कर अपना हिस्सा ले कर विदेश जा कर बस गए. अब बस बड़े मामामामी ही घर के सर्वेसर्वा थे.

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नानाजी के रहते तो मामी ही सुबहशाम रसोई का काम देखती थीं. मां, जितना संभव होता, उन का हाथ बंटातीं और फिर शिखा को ले कर स्कूल निकल जातीं. इसी प्रकार रात का खाना भी मिलजुल कर बन जाता था. परंतु नानाजी के गुजर जाने के बाद धीरेधीरे मामी का रसोई में जाना कम होता जा रहा था. समय के साथ मामामामी का रवैया भी उस के और उस की मां के प्रति बदलने लगा था. अब मां का अपनी नौकरी से बचाखुचा वक्त रसोई में बीतने लगा था. मां ही सुबह उठ कर चायनाश्ता बनातीं. उस का और अपना टिफिन बनाते वक्त कोई न कोई नाश्ते की भी फरमाइश कर देता, जिसे मां मना नहीं कर पाती थीं.

अगले भाग में पढ़ें- ‘अरे बिटिया, क्या करना है इतना पढ़लिख कर ?

कम खर्चे में तैयार होती नाडेप खाद

इन सब तरीकों में जैविक खाद बनाने की नाडेप विधि भी खास है. जैविक कंपोस्ट बनाने की इस नापेड विधि को महाराष्ट्र के किसान नारायण देवराव पंढरी ने विकसित किया. उन्हीं के नाम पर इस कंपोस्ट का नाम नाडेप रखा गया.

नाडेप कंपोस्ट की खूबी है कि इसे बनाने के लिए कम गोबर का इस्तेमाल होता है. शेष खेती का कूड़ाकरकट, कचरा, पत्ते व मिट्टी पशुमूत्र आदि ही इसे बनाने के काम में लाया जाता है.

यह खाद 90 से 120 दिन में तैयार हो जाती है. इस कंपोस्ट में जैविक रूप से नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के अलावा अनेक सूक्ष्म पोषक तत्त्व पाए जाते हैं जो हमारी खेती में अच्छी पैदावार के लिए बहुत उपजाऊ होते हैं.

नाडेप कंपोस्ट बनाने के लिए औसतन 12 फुट लंबाई, 5 फुट चौड़ाई और 3 फुट गहराई का टांका यानी ईंटों से बनाया गया चारदीवारी वाला टैंक, जिस में जगहजगह हवा के आनेजाने के लिए छेद छोडे़ जाते हैं, बनाया जाता है. इस में लगभग 3 से 4 माह की अवधि में उम्दा किस्म का कंपोस्ट तैयार हो जाता है.

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नाडेप बनाने के लिए सामान

खेती का बचाखुचा कचरा, जिस में पत्तियां, घासफूस, फसल अवशेष, सागसब्जियों के छिलके वगैरह लगभग 1,500 किलोग्राम, पशु का गोबर लगभग 300-400 किलोग्राम, छनी हुई खेत की मिट्टी लगभग 10-12 टोकरे, इस के अलावा पशु का मूत्र 2-3 बालटी और जरूरत के मुताबिक पानी. अगर खेती के अवशेष गीले और हरे हैं

तो कम पानी की जरूरत होगी. सूखे अवशेष होने पर लगभग 400 से 500 लिटर पानी चाहिए.

नाडेप कंपोस्ट

बनाने का तरीका

किसी छायादार जगह का चुनाव करें और उस जगह को एकसार कर के  इस के ऊपर ईंटों से तय आकार का एक आयताकार व हवादार ढांचा बनाएं. इस से खाद जल्दी पकेगी, क्योंकि जीवाणुओं को हवा से औक्सीजन भरपूर मात्रा में मिल जाती है और कई प्रकार की बेकार गैसें बाहर निकल जाती हैं.

आयताकार ढांचे के अंदरबाहर की दीवारों को गोबर से लीप कर सुखा लें. इस के बाद टांके के अंदर सतह पर सब से पहले पहली तह 6 इंच तक हरे व सूखे पदार्थों जैसे घास, पत्ती, छिलकों, डंठल, खरपतवार वगैरह की बिछाएं. अगर नीम पत्तियां उपलब्ध हों तो इस में मिलाना फायदेमंद रहता है. नीम का इस्तेमाल अनेक जैविक कीटनाशकों में होता है.

दूसरी तह में 4-5 किलोग्राम गोबर को 100 लिटर पानी व 5 लिटर गौमूत्र में घोल बना कर पहली परत के ऊपर इस तरह छिड़कें कि पूरे घासपत्ते वगैरह भीग जाएं. इस के बाद गोबर की एक इंच की परत लगाएं.

तीसरी परत 1 इंच ऊंचाई की सूखी छनी हुई मिट्टी की लगाएं, फिर उस मिट्टी को पानी छिड़क कर अच्छी तरह गीला कर दें.

इस प्रकार क्रम को दोहराते हुए आयताकार ढांचे को उस की ऊंचाई से 1-2 फुट ऊपर तक  झोंपड़ीनुमा आकार की तरह भर दें. तकरीबन 7-8 परतों में यह भर जाता है. अब इसे मिट्टी व गोबर की पतली 2 इंच की तह से लीप दें.

7 से 15 दिनों में आयताकार ढांचे में डाली हुई सामग्री ठसक कर 1-1.5 फुट तक नीचे आ जाती है. तब पहली भराई के क्रम की तरह ही फिर से इसे इस की ऊंचाई से डेढ़ फुट तक भर कर गोबर व मिट्टी के घोल से लीप दें.

100-120 दिनों में हवा के छिद्रों में देखने पर अगर खाद का रंग गहरा भूरा हो जाता है तो नाडेप खाद तैयार है. इसे मोटे छेद वाली छलनी से छान कर उपयोग में लाया जा सकता है.

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लाभ : इस तरीके में कम गोबर से अच्छी जीवाणुयुक्त, पोषक तत्त्वों से भरपूर खाद बनाई जा सकती है.

कम खर्च में ही उत्तम नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश व दूसरे पोषक तत्त्वों से भरपूर खाद बड़ी मात्रा में तैयार हो सकती है.

जगहजगह पर बिखरा हुआ कूड़ाकचरा व खरपतवार को एक जगह इकट्ठा कर के खाद में बदला जा सकता है इस से प्रदूषण भी नहीं होता है.

नाडेप खाद बनाने का यह सब से सरल तरीका है, जिसे किसान थोडे़ समय में ही अपना कर लाभ कमा सकते हैं.इस प्रकार की खाद जमीन में जीवों की तादाद में बढ़वार कर के कार्बन की मात्रा को बढ़ाती है.

इस प्रकार की खाद को ईंटों की जगह पर लकडि़यों से भी तैयार कर सकते हैं. इस से किसान रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक दवाओं के जाल से बाहर निकल सकता है.

उपरोक्त बताया गया तरीका पक्का नाडेप तरीका है. ढांचा बनाने के लिए ईंटों का इस्तेमाल होता है. कम खर्च में यह काम लकडि़यों द्वारा भी किया जा सकता है.

लकड़ी से बनाया जाने वाला नाडेप

यह नाडेप जमीन पर बनाए गए पक्के नाडेप की तरह ही बनाते हैं, किंतु इस में पक्की ईंटों की जगह बांस या लकड़ी का प्रयोग किया जाता है. लकड़ी से इस को बनाते समय हवा के लिए स्थान इस में अपनेआप ही रहता है, फिर इस में पक्के नाडेप की तरह घासफूस से भराई करते हैं. खाद का पूरा निर्माण काम व इस को निकालने वगैरह का काम पक्के नाडेप की तरह ही होता है. यह नाडेप से बहुत ही सस्ता बनता है.

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सावधानियां

* नाडेप खाद के लिए ढांचे को छायादार जगह पर बनाएं.

* ढांचा बनाते समय छेद जरूर रखें, क्योंकि सूक्ष्म जीवाणुओं के लिए हवा का आनाजाना जरूरी होता है और कार्बन डाई औक्साइड व दूसरी गैसों के निकलने के लिए रास्ता चाहिए.

* नमी का खास खयाल रखें. पानी का छिड़काव समयसमय पर करते रहें.

* आयताकार ढांचे के ऊपरी भाग में दरारें आने पर समयसमय पर मिट्टी या गोबर से लिपाई कर दें.

* तैयार कंपोस्ट का भंडारण छायादार जगह पर बोरियों में करें. नमी के लिए बीच में कभीकभार हलके पानी का छिड़काव कर सकते हैं.

छोटी सरदारनी: परदे के पीछे सबकी ऐसे नकल उतारता है परम

कलर्स के शो छोटी सरदारनी में इन दिनों परम की बीमारी के चलते गिल परिवार में घर का माहौल काफी गंभीर है. सीरियल में क्यूट और मस्ती करने वाला लड़का परम असल जिंदगी में काफी टैलेंटिड और समझदार है. आइए आपको दिखाते हैं कैसे छोटी सरदारनी की कास्ट को एंटरटेन करता है परम….

को-स्टार्स संग मस्ती करता है परम

परदे के आगे शांत और क्यूट दिखने वाला परम, परदे के पीछे अपने खाली समय में अपने को-स्टार्स के साथ मस्ती करने के साथ-साथ उनकी नकल भी करता है.

 

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ऐसे उतारी नानी कुलवंत कौर की नकल

 

इस वीडियो में अपने नकल उतारने का जलवा दिखाते हुए परम ने पहले अपनी नानी कुलवंत कौर की नकल उतारी और उनका फेवरेट डायलॉग ‘वंडरफुल जी वंडरफुल’ बोला. परम का ये अंदाज आपका दिल चुरा लेगा. इतना ही नहीं ये नन्हा शैतान अपने मेहर मम्मा और पापा की भी बहुत अच्छी नकल करता है.

सेट पर साइकिल चलाता है परम

param-cycling

परदे के पीछे परम पढ़ाई के साथ-साथ मस्ती करना नही भूलता. सेट पर होने के कारण वह बाहर नही खेल सकता, इसीलिए वह अपने खाली टाइम में सेट पर ही साइकिल चलाता रहता है. वहीं इसमें उसका साथ परम के औनस्क्रीन पापा यानी सरब देते हैं.

 मेहर के साथ ऐसे समय बिताता है परम

 

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Wishing everyone a very happy and blessed gurupurab. Satnam Waheguru ?

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मस्ती हो या पढ़ाई, परम हर चीज में आगे है. परम, हर किसी की मदद करने में विश्वास रखता है. इसीलिए उसे जब भी टाइम मिलता है वह अपनी औनस्क्रीन मम्मा, मेहर के साथ गुरूद्वारे में जाकर लोगों को लंगर खिलाता है. ऐसे में वह मेहर के साथ काफी समय बिताता है.

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औफस्क्रीन तो परम की शरारत बरकरार है, पर औनस्क्रीन उसकी हालत काफी गंभीर है. वहीं मेहर को भी परम की बीमारी के बारे में पता चल चुका है. अब देखना ये है कि आखिर परम को बचाने के लिए क्या करेंगे मेहर और सरब?  जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, रात 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

गर्मागर्म परांठे के साथ परोसे दाल की चटनी

आज आपको दाल की चटनी बनाने की विधि बताते हैं. यह टेस्टी दाल की चटनी गर्मागर्म परांठे के साथ सर्व कर सकती है. दाल की चटनी बनाना भी बेहद आसान है.

सामग्री

2 टेबल स्पून चना दाल, रोस्टेड

2 टेबल स्पून मूंग दाल

2 टेबल स्पून साबुत धनिया

2 टेबल स्पून अरहर दाल, रोस्टेड

2 टी स्पून जीरा

2-3 साबुत लाल मिर्च

1/4 टी स्पून हींग

2 टेबल स्पून उड़द दाल, रोस्टेड

1( बीज निकलें हुए) इमली

स्वादानुसार नमक

1 टेबल स्पून तेल

1 टेबल स्पून सरसों

1/2 कप प्याज, बारीक कटा हुआ

10-12 (तड़के के लिए) कढ़ीपत्ता

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बनाने की वि​धि

  • सभी रोस्टेड सामग्री और इमली को एक साथ पीसी लें, पानी की जितनी जरूरत हो उस हिसाब से डाल लें.
  • इसमें नमक मिलाएं.
  • तेल गर्म करें, इसमें सरसों, प्याज और कढ़ीपत्ता डालें.
  • प्याज को ब्राउन होने तक भूनें और इसमें चटनी का मिश्रण डालें.

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बिहाइंड द बार्स : भाग 10

मृणालिनी आज बहुत खुश थी. उसकी थोड़ी सी कोशिश ने नोरा और उसके नन्हे से एडवर्ड का जीवन सलाखों के पीछे घुट-घुट कर खत्म होने से बचा लिया था. मृणालिनी जिसने अपराध की दुनिया में रहते हुए न जाने कितनी लड़कियों का जीवन बर्बाद किया, कितनों की जिन्दगी नरक बना दी, कितनी बच्चियों को उनके मां-बाप से छीन लिया, कितनी बच्चियों को देह के दलालों के हाथों नुचवाया-बिकवाया, उस अपराधिन ने शायद जीवन में पहली बार कोई पुण्य का काम किया था.

नोरा से जुदा होते हुए मृणालिनी के आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी. कुसुम, अनीता, मीना, चांदनी, सीमा, कुसुम सभी रो रही थीं. गोद में बेटे को लिये नोरा अपने सामान का छोटा सा बंडल लिये सबसे विदा ले रही थी. हर कैदी औरत उसे गले लगा कर भविष्य के लिए दुआएं दे रही थी. नोरा के बेटे से सभी हिलीमिली थीं. वह उन सबके लिए दिल बहलाने का खिलौना था. वह हंसता तो सब हंसतीं, वह खेलता तो सब उसके साथ खेलतीं… उसका जाना सबको उदास कर रहा था. एक अनोखा सा रिश्ता बन जाता है जेल की सलाखों में कैदियों के बीच… दर्द का रिश्ता.

जेल के गेट पर नोरा के वकील कैलाश मनचंदा अपनी गाड़ी में बैठे उसका इंतजार कर रहे थे. उनका जूनियर वकील अन्दर जेल अधिकारी के साथ नोरा की रिहाई की कार्रवाई पूरी कर रहा था. कुछ ही देर बाद नोरा अपने बेटे और जूनियर वकील के साथ जेल से बाहर आती दिखायी दी. आज उसके जिस्म पर अपनी वही साड़ी थी, जो उसने गिरफ्तारी के वक्त पहन रखी थी. जेल के दरवाजे से बाहर निकल कर उसने आसमान की ओर देखा और चंद सेकेण्ड्स के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं. शायद वह मन ही मन अपने ईश्वर को धन्यवाद दे रही थी.

कैलाश मनचंदा ने उसको आते देखा तो कार से नीचे उतर आये. नोरा ने पास आकर उनका अभिवादन किया. कैलाश मनचंदा ने जेब से चॉकलेट निकाल कर उसके बेटे को दी. एडबर्ट ने खुशी-खुशी हाथ बढ़ा कर चॉकलेट ले ली. मनचंदा ने नोरा को गाड़ी में बैठने का इशारा किया तो वह झिझकते हुए बैठ गयी. गाड़ी फर्राटा भरते मनचंदा के आॅफिस की ओर रवाना हो गयी.

कोई आधे घंटे में कार कैलाश मनचंदा के आॅफिस पहुंच गयी. वहां उनकी पत्नी ने नोरा का स्वागत किया. उन्हें देखकर नोरा को कुछ राहत महसूस हुई. पता चला कि वह भी वकील हैं और ‘मनचंदा एंड मनचंदा’ फर्म की डायरेक्टर हैं. यह सब जेलर मैडम की कृपा थी कि शहर के इतने बड़े वकील नोरा की मदद कर रहे थे. कैलाश मनचंदा ने अभी तक नोरा से अपनी फीस तक नहीं ली थी. बल्कि उन्होंने उसका हैदराबाद जाने का टिकट भी करवा दिया था. आज रात ही उसकी ट्रेन थी.

‘तुम हैदराबाद पहुंच कर अपने घर जाकर पता करो कि वहां कौन रह रहा है? अगर वह बंद पड़ा है तो तुम उसे खुलवा कर अंदर जा सकती हो, क्योंकि वह तुम्हारा घर है. इसमें झिझकने की जरूरत नहीं है.’ कैलाश मनचंदा ने नोरा को सलाह दी.

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‘जी…’ नोरा ने सिर हिला कर हामी भरी.

‘अगर वहां कोई और रह रहा हो, या उस घर को किसी को बेचा गया हो तो मुझे फोन करना… फिर मैं देखता हूं कि क्या किया जा सकता है… वहां पहुंच कर सबसे पहले अपने पति के बारे में पता लगाने की कोशिश करो… उसकी गिरफ्तारी के बगैर तुम्हारी बेगुनाही साबित नहीं हो पाएगी. जब तक केस चल रहा है तुम्हें हर महीने की पंद्रह तारीख को थाने पर आकर अपनी हाजिरी देनी होगी.’ मनचंदा ने उसको चेतावनी सी दी.

‘जी वकील साहब… आपकी फीस मैं घर पहुंचते ही भिजवा दूंगी.’ नोरा ने कहा.

‘अरे… उसकी जरूरत नहीं है… मुझे मेरी फीस मिल चुकी है….’ उन्होंने मुस्कुराते हुए नोरा को मना किया.

नोरा आश्चर्य से उनका चेहरा ताकने लगी. क्या जेलर मैडम ने पैसे दिये हैं… यह सोच कर वह जेलर मैडम के प्रति कृतज्ञता से भर उठी. उसके पास तो बस उतने ही पैसे थे जितने उसे जेल में काम करने के बाद मजदूरी के तौर पर मिले थे. हां, उसका मोबाइल फोन और कुछ गहने जरूर थे, जो उसने हैदराबाद से आने के वक्त पहन रखे थे. जेल से छूटने पर वह उसको वापस कर दिये गये थे. साथ ही कुछ दूसरा सामान भी वापस मिला था, लेकिन उसमें वह कैश नहीं था जो वह मकान का बयाना देने के लिए लेकर आयी थी.

रात ट्रेन में बैठते हुए नोरा का दिल बहुत बेचैन था. बच्चे के लिए बिस्कुट और दूध खरीद कर उसने बैग में रख लिये थे. पता नहीं हैदराबाद पहुंच कर उसको किन-किन समस्याओं का सामना अकेले करना है. काफी रात तक उसको नींद नहीं आयी. सुबह जब उसकी आंख खुली तो धूप निकल आयी थी. ट्रेन की सीट पर उसका बेटा उससे चिपका गहरी नींद में सो रहा था. देर शाम ट्रेन हैदराबाद पहुंची.

स्टेशन से बाहर कदम रखते हुए नोरा का दिल धाड़-धाड़ बज रहा था. अनेक आशंकाओं से वह घिरी हुई थी. ऑटोरिक्शा करके जब वह अपने घर के सामने पहुंची तो देखा कि फाटक पर बड़ा सा ताला पड़ा है. अंदर झांका तो बाउंड्री के भीतर लम्बी-लम्बी घास और झाड़ियां उगी हुई थीं. ऐसा लगता था जैसे सालों से वहां कोई नहीं आया. उसने आसपास नजरें दौड़ायीं. पास वाले घर का दरवाजा भी बंद था. उसने हिम्मत करके पड़ोसी घर की बेल बजायी. मिसेज शॉ आंखों पर मोटा चश्मा चढ़ाये बाहर आयीं तो दो तीन मिनट नोरा को देखकर कुछ बोल ही नहीं पायीं. फिर उन्होंने नोरा को गले से लगा लिया.

‘हम कितना इंतजार किया तुम्हारा… फ्रेडरिक बोला कि एक दिन तुम आकर अपने घर का चाबी ले जाओगी… आओ अंदर आओ… कहां गया था तुम इतने दिन के लिए….? और फ्रेडरिक भी अभी तक नहीं लौटा…?’ उन्होंने सवालों की झड़ी लगा दी.

नोरा आश्चर्य से उनकी बातें सुन रही थी. तो क्या उसके घर की चाबी मिसेज शॉ के पास है? अच्छा हुआ उसने उनकी घंटी बजा दी, वरना उसे पता ही नहीं चलता. चाबी उनके पास है… यानी उसका घर उसका ही है… किसी ने उस पर कब्जा नहीं किया…. वह सोचते हुए मिसेज शॉ के पीछे उनके ड्राइंग रूम में पहुंच गयी. बेटे को सोफे पर बिठा कर उसने मिसेज शॉ से पूछा, ‘क्या घर की चाबी आपके पास है? फ्रेडरिक देकर गया? फ्रेडरिक कहां का बोल कर गया? कब आने को बोला मिसेज शॉ?’

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‘तुमको नहीं पता?’ उन्होंने आश्चर्य जताया.

‘मेरा एक्सीडेंट हो गया था मिसेज शॉ… मैं बहुत दिन तक हॉस्पिटल में थी…वहां से डिस्चार्ज होने के बाद मैं अपने रिलेटिव के पास चली गयी थी.’ नोरा ने झूठ बोला, ‘फ्रेडरिक ने कब आने को बोला है?’ वह जानने को उतावली थी कि फ्रेडरिक कहां गया है और कब आएगा?

मिसेज शॉ आराम से सोफे पर पसर गयीं. बोलीं, ‘फ्रेडरिक एक दिन आया और घर की चाबी तुम्हारे अंकल को देकर बोला कि वह कनाडा जा रहा है, उसके फादर का तबियत ठीक नहीं है. बोला कि तुम कहीं बाहर गयी हो, जब आओ तो वह चाबी तुम्हें दे दूं.’ मिसेज शॉ बोल कर रुक गयीं. फिर चंद सेकेंड के लिए आंखें बंद कर लीं. नोरा उत्सुकता से उनके आगे बोलने की प्रतीक्षा कर रही थी.

‘तुम्हारा अंकल रोज तुम्हारा रास्ता देखता था. मगर तुम नहीं आया, फिर एक दिन तुम्हारे अंकल को हार्ट अटेक पड़ा और चार दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद वह खुदा के पास चला गया, मगर जाने से पहले चाबी के बारे में बता कर बोला कि तुम जब आएगा तो चाबी तुमको देने का. मैं सोचता रहता कि पता नहीं तुम कब आएगा… कहीं ऐसा न हो कि तुम न आया और मैं भी मर गया तो कौन तुमको बताएगा कि चाबी किधर है.’ मिसेज शॉ बोलते-बोलते मुस्कुरा दीं.

‘थैंक यू मिसेज शॉ… आप नहीं जानतीं कि आज आपने मेरी कितनी मदद की है. मैं तो परेशान हो रही थी कि घर में कैसे जाऊंगी…’ नोरा ने मिसेज शॉ का धन्यवाद किया. वह सोच रही थी कि अच्छा हुआ कि उसने हिम्मत करके मिसेज शॉ के घर की बेल बजा दी. अगर वह यहां नहीं आती तो उसे पता ही नहीं चलता कि फ्रेडरिक देश छोड़ कर जा चुका है.

‘जब तुम गया था तब एक बार एक पुलिस वाला आया था फ्रेडरिक के बारे में पूछने… पर हम बोला कि सामने वाले घर में रहता है… लेकिन वह उसको वहां मिला नहीं… उसके एक हफ्ते बाद फ्रेडरिक कहीं से आया और तुम्हारे अंकल को चाबी देकर चला गया. तब हमने उसको बताया था कि उसको पुलिस वाला पूछ रहा था… मगर वह कुछ बोला नहीं… क्या बात थी?’ मिसेज शॉ ने पुरानी बात याद करते हुए नोरा से पूछा.

‘वो मेरा एक्सीडेंट हो गया था न आंटी… इसीलिए पुलिस आयी होगी बताने… फ्रेडरिक परेशान होगा इसलिए कुछ नहीं बोला होगा…’ नोरा ने फिर झूठ बोला.

मिसेज शॉ के घर कॉफी पीकर नोरा अपने घर की चाबी लेकर आ गयी. घर का दरवाजा खोलते हुए उसका दिल बड़ी जोर-जोर से धड़क रहा था. मिसेज शॉ ने जो बातें बतायी थीं उसका तो यही मतलब है कि पुलिस ने फ्रेडरिक को ढूंढने की कोई खास कोशिश नहीं की और वह बड़े आराम से देश छोड़ कर निकल गया. घर के अंदर सारी चीजें ज्यों की त्यों पड़ी थीं, जैसी वह पौने दो साल पहले छोड़ कर मेरठ गयी थी. हां, उन पर धूल और गंदगी का अम्बार लग गया था. इन पौने दो सालों में वहां परिन्दा भी नहीं फटका था. अलमारियां खुली हुई थीं, मगर उसमें सारा सामान ज्यों का त्यों रखा था. फ्रेडरिक सिर्फ अपना कुछ सामान लेकर ही गया था. नोरा की अलमारी में उसकी ज्वेलरी, पैसा, कपड़े, पासपोर्ट, सर्टिफिकेट्स, बैंक की पासबुक, चेकबुक सब वैसे ही पड़े थे.

नोरा ने वकील कैलाश मनचंदा को फोन करके सारी सिचुएशन बतायी. मनचंदा ने उसको उसके अधिकार बताते हुए कहा कि वह घर उसका है, वहां से उसे कोई बेदखल नहीं कर सकता, वह आराम से वहां रहे और फ्रेडरिक कभी लौटे तो तुरंत उन्हें सूचित करे ताकि पुलिस उसको अरेस्ट करके सारी पड़ताल कर सके और नोरा को कोर्ट में निर्दोष साबित किया जा सके.

नोरा ने उन्हें फ्रेडरिक के भाई और पिता का कनाडा का एड्रेस दिया ताकि वह मेरठ पुलिस को सूचित कर दें. हालांकि नोरा ने अपने अरेस्ट के वक्त भी फ्रेडरिक के पिता और भाई का कनाडा का एड्रेस पुलिस को दिया था, पर तब भी फ्रेडरिक को खोज निकालने की कोई खास कोशिश नहीं की गयी थी, बस उसे ही अरेस्ट करके जेल में ठूंस दिया गया था. जैसे सारा दोष उसी का था. जैसे वही ड्रग्स का धंधा करती थी.

खैर अपना घर वापस पाकर नोरा को बेइन्तहा खुशी महसूस हो रही थी. कम से कम उसके और उसके बेटे के सिर पर छत तो है. वह इसके लिए फ्रेडरिक की अहसानमंद थी कि उसने भागने से पहले यह घर किसी को बेचा नहीं. पूरा घर साफसुथरा और दुरुस्त करने में नोरा को हफ्ता भर लग गया. मजदूर बुला कर उसने बाहर उग आयी बड़ी-बड़ी झाड़ियां कटवायीं. थोड़ा रंगरोगन करवाया. इस बीच उसने कई बार कनाडा फोन भी मिलाया मगर किसी ने उठाया नहीं. उसने फ्रेडरिक के मोबाइल फोन पर भी कई बार कॉल की, मगर वह भी नहीं मिला. लगता है उन लोगों ने फोन, घर सबकुछ बदल लिया है. अगर पुलिस थोड़ी कोशिश कर लेती तो कनाडा पुलिस से सम्पर्क करके उन लोगों तक जरूर पहुंच जाती, लेकिन मेरठ पुलिस ने अपना काम ठीक से किया ही नहीं.

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खैर, नोरा अब जेल की सलाखों से आजाद थी. उसको पता था कि केस अभी लम्बा चलेगा. लेकिन कैलाश मनचंदा जैसा काबिल वकील अब उसके केस को देखेगा, तो दुबारा जेल जाने की नौबत नहीं आएगी, इस बात की उसे उम्मीद थी.

तीन साल बीत गये हैं. नोरा का बेटा अब स्कूल जाने लगा है. नोरा भी पास के एक स्कूल में नर्सरी टीचर के रूप में काम कर रही है, ताकि दोनों का खर्चा चल जाए. इसके अलावा वह घर में भी बच्चों की ट्यूशन लेती है. नोरा एक साल तक हर महीने की पंद्रह तारीख को मेरठ थाने पर हाजिरी देने जाती रही, बाद में मनचंदा ने कोर्ट से तीन महीने में एक बार का समय मुकर्रर करवा दिया. मनचंदा की कोशिश से ही पुलिस पर कोर्ट की फटकार के बाद फ्रेडरिक को ढूंढने के लिए कोशिशें कुछ तेज हुई हैं. नोरा को उम्मीद है कि पुलिस जल्दी ही फ्रेडरिक को ढूंढ निकालेगी और तब उस पर लगा दाग हटेगा. वह तब ही निर्दोष साबित हो सकेगी जब फ्रेडरिक अपना जुर्म कबूलेगा. नोरा को उम्मीद है कि अपने बच्चे का मुंह देख कर फ्रेडरिक सच कबूल लेगा… उम्मीद पर दुनिया कायम है…. नोरा भाग्यशाली है कि उसको मृणालिनी, जेलर मैडम, वकील कैलाश मनचंदा जैसे लोग मिल गये और वह सलाखों से बाहर निकल पायी, वरना ऐसे कितने ही कैदी सलाखों में सिसक रहे हैं, जिनके बाहर आने की उम्मीद दम तोड़ चुकी है.

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