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सावधान सिर पर सींग निकाल देता है मोबाइल

जानवरों की तरह इंसानों के सिर पर भी सींग निकलने लगें तो बात हैरान करने वाली है. इसलिए जो युवा सिर को ज्यादा झुका कर मोबाइल यूज कर रहे हैं, वे सचेत हो जाएं. आप ने जानवरों के सिर पर तो सींग देखासुना होगा, लेकिन क्या इंसानों के सिर पर भी सींग उग सकते हैं, कभी सोचा है आप ने? हां, यह सच है कि अब इंसानों के सिर पर भी सींग उगने लगे हैं और यह सब हो रहा है ज्यादा मोबाइल के इस्तेमाल से.

आज मोबाइल हमारी जरूरत ही नहीं, जिंदगी बन गया है. इस के बिना हम कुछ मिनट भी नहीं रह सकते. एक आप और हम ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया मोबाइल में समा गई है. और ऐसा हो भी क्यों न. घर बैठे ही मोबाइल की मदद से हम कई काम आसानी से कर सकते हैं, जैसे राशन का सामान मंगवाना, होटल से खाना और्डर करना, प्लेन, टे्रन के टिकट बुक करवाना, यह सब हम चुटकियों में घर बैठे कर सकते हैं और सब से बड़ी बात यह है कि दूर रह रहे अपने दोस्तों-रिश्तेदारों का हाल हम पल में जान सकते हैं. तो है न यह कमाल की चीज. लेकिन अति हर चीज की बुरी होती है, यह बात भी सच है.

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हाल ही में हुई एक रिसर्च से पता चला कि मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले युवाओं के सिर में सींग निकल रहे हैं. सिर के स्कैन में इस बात की पुष्टि भी हो गई. यानी मोबाइल अब कंकाल स्तर का बदलाव कर रहा है. यह नई रिसर्च जैव यांत्रिक पर की गई है जिस में यह सामने आया है कि जो युवा सिर को ज्यादा झुका कर मोबाइल यूज कर रहे हैं उन की खोपड़ी में सींग विकसित हो रहे हैं. इस रिसर्च में 18 से 30 साल के ऐसे युवाओं को शामिल किया गया जो मोबाइल पर कई घंटे बिताते हैं.

आस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड स्थित सनशाइन कोस्ट यूनिवर्सिटी में हुई इस रिसर्च में इसे विस्तृत तरीके से सम झाया गया है. कहा गया है कि रीढ़ ही हड्डी से शरीर का वजन शिफ्ट हो कर सिर के पीछे की मांसपेशियों तक जाता है. इस से कनैक्ंिटग टैंडन और लिंगामैंट्स में हड्डी विकसित होती है. इसी का रिजल्ट है कि युवाओं में हुक या सींग की तरह हड्डियां बढ़ रही हैं जो गरदन के ठीक ऊपर की तरफ खोपड़ी से बाहर निकली हुई हैं.

वाशिंगटन टाइम्स की न्यूज रिपोर्ट में उस चित्र को भी दिखाया गया है जिसमें खोपड़ी के निचले हिस्से में यह कांटेदार सींगनुमा हड्डी दिख रही है. डाक्टरों का कहना है कि इंसान की खोपड़ी का वजन करीब साढ़े 4 किलो होता है. डाक्टरों ने रिसर्च में पाया कि मोबाइल चलाते वक्त लोग अपने सिर को आगेपीछे की तरफ हिलाया करते हैं. ऐसे में गरदन के निचले हिस्से की मांसपेशियों में खिंचाव आने लगता है.

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यही वजह है कि कुछ दिनों बाद हड्डियां बाहर की तरफ निकल जाती हैं. सिर पर ज्यादा दबाव पड़ने के चलते सींग जैसी दिखने वाली हड्डियां निकल रही हैं. महिलाओं की तुलना में पुरुष ज्यादा प्रभावित शोधकर्ताओं का पहला पेपर जनरल औफ एनेटौमी में साल 2016 में प्रकाशित हुआ था. इस पेपर में 18 से 30 साल वाले 216 लोगों के एक्सरे को शामिल किया गया था.

रिसर्च में कहा गया कि 41 फीसदी युवा वयस्कों के सिर की हड्डी में वृद्धि देखी जा सकती है. यह पहले के अनुमान में ज्यादा थी और साथ ही पुरुष इस से ज्यादा प्रभावित थे.

इसी कड़ी में आगे पढ़िए मोबाइल के अलावा अन्य डिवाइसों से भी हैं खतरा…

सफर के साथ व्यंजनों का स्वाद

घर के बने चटपटे व स्वादिष्ठ व्यंजनों का स्वाद सफर के मजे को दोगुना कर देते हैं. सफर के दौरान, बच्चों का ही क्या, बड़ों का भी कुछ न कुछ खाने का मन करता रहता है. साथ में व्यंजन हों तो न टे्रन के स्टेशन आने का इंतजार होता है न बस स्टैंड के आने का. जब मन चाहे, साथ ले जा रहे व्यंजनों में से किसी का भी स्वाद लिया जा सकता है. कई तरह की चटनियां, अचार, सब्जियां, भुनी प्याज, टमाटर, खीरा आदि चीजों को भी सफर में ले जाया जा सकता है ताकि साफ, पौष्टिक व स्वादिष्ठ खाने का स्वाद लिया जा सके. प्रस्तुत है सफर में साथ ले जाने वाले कुछ ऐसे ही जायकेदार व्यंजन.

  1. चना दाल कचौड़ी

सामग्री:

1 कप चना दाल, 1/2 किलो मैदा, 3/4 कप तेल, 1/4 छोटा चम्मच नमक, 1/2 छोटा चम्मच मिर्च पाउडर, 1 बड़ा चम्मच धनिया पाउडर, 1/2 छोटा चम्मच गरममसाला, 1 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर, चुटकीभर हींग, तलने के लिए तेल.

विधि:

चना दाल भिगो कर पीस लें. कड़ाही में आधा कप तेल डालें. उस में हींग व मसाले डाल कर भूनें. मसाले भुनने पर दाल डाल कर?भूनें. मैदा में नमक व तेल डाल कर गूंध लें. इस के पेड़े बना कर हलका बेलें व बीच में चना दाल का मसाला भर दें. पेड़े को बंद कर के कचौड़ी बेल लें. गरम तेल में कचौडि़यों को सुनहरा होने तक सेंकें.

2. चटपटा रोल

सामग्री:

2 कटोरी (छोटी) उबली मटर के दाने, 1/4 छोटा चम्मच गरममसाला, 1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर, 1 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर, 1/4 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर, 2 कप मैदा, 1/4 कप तेल, 3 बड़े चम्मच नारियल पाउडर, तलने के लिए तेल, नमक स्वादानुसार.

विधि:

तेल गरम कर मसाला भूनें व उबली मटर डाल कर भून लें. नारियल पाउडर डाल कर एक बार फिर मसाला भूनें. मैदा व नमक छान लें व तेल डाल कर पानी के साथ गूंध लें. इस के पेड़े बना कर बेलें व बीच में मटर का मसाला भर कर दोनों साइड से बंद करें व गरम तेल में तलें.

3. ग्रेनोला बार

सामग्री:

1/2 कप मुरमुरे, 1 कप ओट्स, 1/4 कप फ्लैक्स सीड, 1/2 कप चीनी, 1/2 कप गुड़, 1/2 कप बादाम व काजू, 10-15 किशमिश, 1 बड़ा चम्मच घी.

विधि:

घी में ओट्स, मुरमुरे व फ्लैक्स सीड भून लें. पानी, चीनी, गुड़ की चाशनी में सभी चीजें डाल कर?आंच बंद कर दें. इसे जमा कर बार के आकार में काटें.

मैं बीवी के ऊपर लेट कर सेक्स करने पर भी जल्दी पस्त हो जाता हूं, क्या करूं?

सवाल

मैं 22 साल का हूं. फोरप्ले के बाद बीवी के ऊपर लेट कर सेक्स करने पर भी महज 30 सैकंड में मैं पस्त हो जाता हूं. इस नाकामी पर बीवी के ताने सुन कर खुदकुशी करने का मन करता है. मैं क्या करूं?

जवाब

तजरबे की कमी के चलते ऐसा हो रहा होगा. आप एक बार मामला निबटने के बाद फिर से कोशिश करें, तो दूसरी पारी ज्यादा देर तक टिकेगी और धीरेधीरे आप का हौसला बढ़ जाएगा. अगर फिर भी 30 सैकंड में इजाफा न हो, तो किसी माहिर डाक्टर से इलाज कराएं. नीमहकीमों से कतई न मिलें.

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जानिए कैसे बदलता है उम्र के साथ सेक्स बिहेवियर

शादीशुदा जिंदगी में दूरियां बढ़ाने में सैक्स का भी अहम रोल होता है. अगर परिवार कोर्ट में आए विवादों की जड़ में जाएं तो पता चलता है कि ज्यादातर झगड़ों की शुरुआत इसी को ले कर होती है. बच्चों के बड़े होने पर पतिपत्नी को एकांत नहीं मिल पाता. ऐसे में धीरेधीरे पतिपत्नी में मनमुटाव रहने लगता है, जो कई बार बड़े झगड़े का रूप भी ले लेता है. इस से तलाक की नौबत भी आ जाती है. विवाहेतर संबंध भी कई बार इसी वजह से बनते हैं.

मनोचिकित्सक डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘उम्र के हिसाब से पति और पत्नी के सैक्स का गणित अलगअलग होता है. यही अंतर कई बार उन में दूरियां बढ़ाने का काम करता है. पतिपत्नी के सैक्स संबंधों में तालमेल को समझने के लिए इस गणित को समझना जरूरी होता है. इसी वजह से पतिपत्नी में सैक्स की इच्छा कम अथवा ज्यादा होती है. पत्नियां इसे न समझ कर यह मान लेती हैं कि उन के पति का कहीं चक्कर चल रहा है. यही सोच उन के वैवाहिक जीवन में जहर घोलने का काम करती है. अगर उम्र को 10-10 साल के गु्रपटाइम में बांध कर देखा जाए तो यह बात आसानी से समझ आ सकती है.’’

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शादी के पहले

आजकल शादी की औसत उम्र लड़कियों के लिए 25 से 35 के बीच हो गई है. दूसरी ओर खानपान और बदलते परिवेश में लड़केलड़कियों को 15 साल की उम्र में ही सैक्स का ज्ञान होने लगता है. 15 से 30 साल की आयुवर्ग की लड़कियों में नियमित पीरियड्स होने लगते हैं, जिस से उन में हारमोनल बदलाव होने लगते हैं. ऐसे में उन के अंदर सैक्स की इच्छा बढ़ने लगती है. वे इस इच्छा को पूरी तरह से दबाने का प्रयास करती हैं. उन पर सामाजिक और घरेलू दबाव तो होता ही है, कैरियर और शादी के लिए सही लड़के की तलाश भी मन पर हावी रहती है. ऐसे में सैक्स कहीं दब सा जाता है.

इसी आयुवर्ग के लड़कों में सैक्स के लिए जोश भरा होता है. कुछ नया करने की इच्छा मन पर हावी रहती है. उन की सेहत अच्छी होती है. वे हर तरह से फिट होते हैं. ऐसे में शादी, रिलेशनशिप का खयाल उन में नई ऊर्जा भर देता है. वे सैक्स के लिए तैयार रहते हैं, जबकि लड़कियां इस उम्र में अपनी इच्छाओं को दबाने में लगी रहती हैं.

30 के पार बदल जाते हैं हालात

महिलाओं की स्थिति: 30 के बाद शादी हो जाने के बाद महिलाओं में शादीशुदा रिलेशनशिप बन जाने से सैक्स को ले कर कोई परेशानी नहीं होती है. वे और्गेज्म हासिल करने के लिए पूरी तरह तैयार होती हैं. महिलाएं कैरियर बनाने के दबाव में नहीं होती. घरपरिवार में भी ज्यादा जिम्मेदारी नहीं होती. ऐसे में सैक्स की उन की इच्छा पूरी तरह से बलवती रहती है. बच्चों के होने से शरीर में तमाम तरह के बदलाव आते हैं, जिन के चलते महिलाओं को अपने अंदर के सैक्सभाव को समझने में आसानी होती है. वे बेफिक्र अंदाज में संबंधों का स्वागत करने को तैयार रहती हैं.

पुरुषों की स्थिति: उम्र के इसी दौर में पति तमाम तरह की परेशानियों से जूझ रहा होता है. शादी के बाद बच्चों और परिवार पर होने वाला खर्च, कैरियर में ग्रोथ आदि मन पर हावी होने लगता है, जिस के चलते वह खुद को थका सा महसूस करने लगते हैं. यही वह दौर होता है जिस में ज्यादातर पति नशा करने लगते हैं. ऐसे में सैक्स की इच्छा कम हो जाती है.

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महिला रोग विशेषज्ञा, डाक्टर सुनीता चंद्रा कहती हैं, ‘‘हमारे पास बांझपन को दूर करने के लिए जितनी भी महिलाएं आती हैं उन में से आधी महिलाओं में बांझपन का कारण उन के पतियों में शुक्राणुओं की सही क्वालिटी का न होना होता है. इस का बड़ा कारण पति का मानसिक तनाव और काम का बोझ होता है. इस के कारण वे पत्नी के साथ सही तरह से सैक्स संबंध स्थापित नहीं कर पाते.’’

नौटी 40 एट

40 के बाद की आयुसीमा एक बार फिर शारीरिक बदलाव की चौखट पर खड़ी होती है. महिलाओं में इस उम्र में हारमोन लैवल कम होना शुरू हो जाता है. उन में सैक्स की इच्छा दोबारा जाग्रत होने लगती है. कई महिलाएं अपने को बच्चों की जिम्मेदारियों से मुक्त पाती हैं, जिस की वजह से सैक्स की इच्छा बढ़ने लगती है. मगर यह बदलाव उन्हीं औरतों में दिखता है जो पूरी तरह से स्वस्थ रहती हैं. जो महिलाएं किसी बीमारी का शिकार या बेडौल होती हैं, वे सैक्स संबंधों से बचने का प्रयास करती हैं.

40 प्लस का यह समय पुरुषों के लिए भी नए बदलाव लाता है. उन का कैरियर सैटल हो चुका होता है. वे इस समय को अपने अनुरूप महसूस करने लगते हैं. जो पुरुष सेहतमंद होते हैं, बीमारियों से दूर होते हैं वे पहले से ज्यादा टाइम और ऐनर्जी फील करने लगते हैं. उन के लिए सैक्स में नयापन लाने के विचार तेजी से बढ़ने लगते हैं.

50 के बाद महिलाओं में पीरियड्स का बोझ खत्म हो जाता है. वे सैक्स के प्रति अच्छा फील करने लगती हैं. इस के बाद भी उन के मन में तमाम तरह के सवाल आ जाते हैं. बच्चों के बड़े होने का सवाल मन पर हावी रहता है. हारमोनल चेंज के कारण बौडी फिट नहीं रहती. घुटने की बीमारियां होने लगती हैं. इन परेशानियों के बीच सैक्स की इच्छा दब जाती है.

इस उम्र के पुरुषों में भी ब्लडप्रैशर, डायबिटीज, कोलैस्ट्रौल जैसी बीमारियां और इन को दूर करने में प्रयोग होने वाली दवाएं सैक्स की इच्छा को दबा देती हैं. बौडी का यह सैक्स गणित ही पतिपत्नी के बीच सैक्स संबंधों में दूरी का सब से बड़ा कारण होता है.

डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘ऐसे में जरूरत इस बात की होती है कि सैक्स के इस गणित को मन पर हावी न होने दें ताकि सैक्स जीवन को सही तरह से चलाया जा सके.’’

रिलेशनशिप में सैक्स का अपना अलग महत्त्व होता है. हमारे समाज में सैक्स पर बात करने को बुरा माना जाता है, जिस के चलते वैवाहिक जीवन में तमाम तरह की परेशानियां आने लगती हैं. इन का दवाओं में इलाज तलाश करने के बजाय अगर बातचीत कर के हल निकाला जाए तो समस्या आसानी से दूर हो सकती है. लड़कालड़की सही मानो में विवाह के बाद ही सैक्स लाइफ का आनंद ले पाते हैं. जरूरत इस बात की होती है कि दोनों एक मानसिक लैवल पर चीजों को देखें और एकदूसरे को सहयोग करें. इस से आपसी दूरियां कम करने और वैवाहिक जीवन को सुचारु रूप से चलाने में मदद मिलती है.

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अनाम रिश्ता: भाग-3

हमारी नजरें उत्सुकतावश द्वार पर ही लगी हुई थीं कि उधर से एक हाथ से लड़की की उंगली थामे और दूसरे से लड़के को गोद में उठाए कमला का पदार्पण हुआ. लड़के को देखते ही सब लोग मुसकराने लगे. भाभी ने फुसफुसा कर मां से कहा था, ‘यह तो गोपी का हमशक्ल है.’

अब की बार तो कमला में गजब का परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहा था. आंखें तो पहले ही बड़ीबड़ी थीं, मां ने जो अपनी पुरानी लिपस्टिक और साड़ी दे दी थी, उन के इस्तेमाल के बाद तो उस का रूप ही निखर आया था. कोई नहीं कह सकता था कि यह किसी छोटी जाति के घर की बहू है. काले रंग में भी इतना आकर्षण होता है, यह इंदु ने उस दिन जाना था. अब समझ आया कि क्या था उस कालीकलूटी में जो गोपी जैसा बांका नौजवान उस पर मरता था.

एक दिन मां कुछ हलकेफुलके मूड में थीं. किसी काम से गोपी उन के पास आया तो बोलीं, ‘क्यों रे गोपी, तेरी उम्र निकली जा रही है, तू शादी कब करेगा?’

‘बीबीजी, शादी तो हमारी हो गई.’

‘शादी हो गई? और हमें पता भी नहीं चला?’ मां ने हैरानी से पूछा.

गोपी ने नजर उठा कर इंदु की तरफ देखा. वह समझ गई कि गोपी उस के सामने बात करने में झिझक रहा है, सो वह वहां से उठ तो गई पर बात सुनने का लोभ संवरण न कर पाई, इसलिए बराबर वाली कोठरी में छिप कर खड़ी हो गई.

‘हां, अब बोल,’ मां ने उस की ओर देखा.

‘तुम्हें मालूम नहीं चला तो मैं क्या करूं. तुम्हारे पास तो वह रोज आती है,’ गोपी सिर झुका कर बोला.

‘किस की बात कर रहा है तू?’ मां को समझ नहीं आया.

‘कमला की,’ गोपी धीरे से बोला, ‘हम तो उसे ही अपनी दुलहन मानते हैं. दुनिया के सामने सात फेरे नहीं हुए तो क्या, मन से तो हम दोनों एकदूजे को मियांबीवी समझते हैं.’

‘वह एक शादीशुदा औरत है. तुम्हारे गांव वाले उसे कुछ नहीं कहते? किसना भी जानता है यह सब?’

‘हां, जानता है. उस ने तो कई बार कमला को पीटा भी है पर उस ने भी साफसाफ कह दिया कि मैं गोपी को चाहती हूं, उसे नहीं छोड़ सकती, चाहे तो तू मुझे छोड़ दे. पर वह बेचारा भी क्या करे, एक तो गरीबी, ऊपर से शक्लसूरत भी मामूली. पहली शादी ही मुश्किल से हुई थी. इसे छोड़ दिया तो दूसरी तो होने से रही. सो, यही सोच कर चुप रह जाता है कि चलो, जैसी भी है, घर तो संभाल रही है, बच्चे पाल रही है.

पूरी बात सुनने पर भी मां कुछ  असंतुष्ट सी थीं. बोलीं, ‘वह औरत तो शहर की है, बड़ी चालाक है. एकसाथ दोदो आदमियों को बेवकूफ बना रही है. पर तू क्यों अक्ल के पीछे लट्ठ लिए भाग रहा है. उसे तो घर भी मिल गया. कहने को पति भी है, बच्चे भी हैं और पैसा लुटाने को तू है, पर तुझे क्या मिला? शादी कर ले तो तेरा भी घर बस जाएगा, बच्चे होंगे, समाज में इज्जत होगी,’ मां ने अपने स्तर पर उसे ऊंचनीच समझाने की चेष्टा की.

पर उस ने जो दलील पेश की उसे सुन कर तो मां के साथ इंदु का मुंह भी हैरानी से खुला का खुला रह गया. सिर झुकाएझुकाए ही वह बोला, ‘ठीक है, भाभी, तुम्हारी बात. चलो, हम शादी कर भी लें. पत्नी हमें पसंद न आई तो क्या होगा? किसी की जिंदगी खराब करने से क्या फायदा? कमला मुझे अच्छी लगती है, और मैं उसे. हमारे लिए तो इतना ही बहुत है. रहा सवाल बच्चों का, सो मुझे लगता ही नहीं कि वे बच्चे सिर्फ कमला के ही हैं. जब वह हमें अच्छी लगती है तो उस की हर चीज हमें प्यारी है.

‘तुम्हें लगता होगा कि हम अकेले हैं पर हमारी नजरों से देखो तो पता चलेगा कि हमारे पास सबकुछ है. मन का संतोष सब से बड़ी चीज है, बाकी तो सब दिखावा है.’

वह आगे बोला, ‘कमला के पास भी सबकुछ है, आदमी है, बच्चे हैं. अगर इन चीजों से खुशी मिलती तो वह हमें क्यों चाहती?’

मां को निरुत्तर कर गोपी चला गया. इंदु मन ही मन सोचती रही कि यह गांव का अनपढ़ आदमी कितनी सरल भाषा में जीवन की कितनी बड़ी सचाई कह गया है.

सब लोग सोचते थे कि यह कुछ दिन का खुमार है, समय बीततेबीतते उतर जाएगा. फिर यह भी अपना घर बसा लेगा और कमला को भूल जाएगा. कमला पर भी जब जिम्मेदारियों का बोझ पड़ेगा तो दुनियादारी समझने लगेगी. पर इन दोनों ने तो सब के गणित को अंगूठा दिखा दिया.

इसी बीच, इंदु का विवाह भी हो गया. वह जब भी मायके आती, कुछ न कुछ परिवर्तन जरूर नजर आता. कभी भाभी के बच्चा होने को होता, कभी महल्ले में किसी की मृत्यु की खबर सुनने को मिलती तो कभी किसी की शादी की अथवा भागने की.

पर गोपी और कमला की प्रेम कहानी बिना किसी परिवर्तन के उसी प्रकार आगे बढ़ रही थी. हमेशा वह अपने बच्चों को साथ लिए गोपी से मिलने आती. उसी प्रकार गोपी उसे घुमाने ले जाता. कभी कपड़े दिलवाता और कभी खाने का सामान. इस नियम में जरा भी बदलाव नहीं आया था. हां, इतना जरूर हुआ था कि बच्चे अब

2 के स्थान पर 3 हो गए थे.

अब तो समाज ने भी उन के प्यार को स्वीकार कर लिया था. उन के उस रिश्ते को मान लिया था जिस का कोई नाम न था.

अचानक कोई कमरे में आया तो इंदु की विचारतंद्रा भंग हो गई और वह अतीत से वर्तमान में लौट आई. भाभी चायनाश्ता लाई थीं.

चाय पी कर उस ने भाभी से पूछा, ‘‘गोपी की खबर सुन कर कमला आई थी क्या?’’

‘‘हां, आई थी. आते ही उस की लाश पर गिर कर फूटफूट कर रोई, अपनी चूडि़यां भी तोड़ दीं, लोगों ने बड़ी मुश्किल से उसे चुप कराया. क्रियाकर्म का सारा खर्चा उसी ने किया. हालांकि पिताजी ने कहा था, ‘यह हमारे यहां इतने दिन से नौकरी कर रहा था, इतना तो हम इस के लिए कर ही सकते हैं.’

‘‘पर वह मानी नहीं. बोली, ‘मैं भी तो सारी उम्र इस की कमाई खाती रही. भैयाजी, मेरे पास तो जो कुछ है, सब इसी का दिया है. जब यही नहीं रहा तो मैं इन गहनों का क्या करूंगी,’ कह कर उस ने अपनी अंगूठी उतार कर पिताजी के हाथ में दे दी और कहा कि इसे बेच कर क्रियाकर्म कर दीजिए.

‘‘जब मुखाग्नि देने का समय आया तो वह बोली, ‘मेरा रामू यह काम करेगा. भैयाजी, आप सब को तो मालूम है, गोपी इसे कितना चाहता था और यह तो इस का फर्ज भी है.’

‘‘यह एक ऐसी सचाई थी जिसे सब जानते थे पर कहने की हिम्मत किसी ने नहीं की थी, इसीलिए सब ने कमला की यह बात मान ली.’’

रात को भी मेरे दिमाग में बचपन की बातें घूमती रहीं. मैं सोचने लगी कि प्यार भी क्या चीज है. जो इनसान बाप की मार के डर से गांव छोड़ कर भागा था उसे गांव के नाम से ही नफरत हो गई थी. बहुत समझानेबुझाने के बाद कभीकभी मांबाप से मिलने चला जाता था. लेकिन रात को जाता था और सुबह ही वापस आ जाता था.

परंतु पता नहीं, कौन सी डोर थी जिस ने उसे ऐसे बांध लिया कि वह हर हफ्ते गांव जाने लगा. फिर धीरेधीरे यह अंतराल घटता ही गया. कभी 4 दिन में तो कभी

3 दिन में वह गांव जाने लगा. शाम को भी जल्दी चला जाता था और अगले दिन भी थोड़ी देर से आता था. बाप भी बूढ़ा हो चला था, सो उस की भी जिम्मेदारी सिर पर थी, इसलिए कोई कुछ नहीं कहता था.

गोपी का बाप अब बीमार भी रहने लगा था, सो उस के ब्याह के लिए जोर देने लगा. पर उस ने ब्याह के लिए इनकार कर दिया था. हां, यह जरूर कर दिया कि बापू की दोनों समय की रोटी का इंतजाम कमला को सौंप दिया. कुछ दिन तक तो पिता ने उस के घर का खाना खाने से मना कर दिया, पर अंत में परिस्थिति से उन्हें समझौता करना ही पड़ा.

इंदु की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या नाम दे उस रिश्ते को जिसे वे दोनों जिंदगीभर निभाते रहे. कितनी हिम्मती है वह औरत जो अपने प्यार के लिए दुनिया से लड़ती रही, हार न मानी.

आखिरी वक्त पर भी उस ने जिस बहादुरी से अपने बेटे का परिचय दिया, क्या वह पढ़ेलिखे और समझदार कहे जाने वाले लोगों के बस की बात है?

अगले दिन इंदु ने अपनी मां से पूछा कि क्या कमला अब भी आती है यहां? तो उत्तर मिला, ‘‘नहीं, अब नहीं आती.’’

‘‘मां, किसी दिन उसे बुलवा लो, बड़ा मन है उसे देखने का,’’ इंदु ने अपनी इच्छा मां के आगे व्यक्त की.

मां ने एक आदमी के जरिए गांव में खबर भेज कर कमला को बुलवा लिया.

हलके नीले रंग की किनारीदार सूती धोती, हाथों में कांच की दोदो चूडि़यां और मांग में सिंदूर की हलकी सी रेखा, बिंदी जो पहले चवन्नी के आकार की हुआ करती थी, अब एक बिंदु का आभास भर दे रही थी.

इंदु को देख कर अपनी वही मनमोहिनी हंसी हंस कर कमला बोली, ‘‘अच्छा, इंदु बिटिया आई है. बड़े दिनों में आई बिटिया, अच्छी तो हो?’’

‘‘मैं तो अच्छी हूं पर तुम्हें क्या हो गया ?है? पहचानी ही नहीं जा रही हो. बड़ी कमजोर दिख रही हो,’’ इंदु बोली.

उस की आंखों में आंसू भर आए पर फिर भी हंस कर बोली, ‘‘तुम्हें सब पता चल गया होगा, बिटिया. अब बताओ, क्या अब हम वैसे ही रहेंगे?’’

उस का उत्तर सुन कर इंदु से कुछ कहते न बना. सिर झुका कर हाथ से यों ही निरुद्देश्य कुछ आड़ीतिरछी लकीरें बनाती रही. आंखें उस की भी भीग गईं. जिस औरत को लोग भलाबुरा कहते रहे, उस को ‘चालू’ समझ कर उस का अपमान, तिरस्कार करते रहे, उस को इस रूप में देख कर मन एक अनजानी श्रद्धा से भर गया और अपनी सोच से घृणा सी होने लगी.

कमला तो थोड़ी देर बाद उठ कर चली गई पर मन में हमेशा के लिए एक प्रश्न छोड़ गई कि क्या हम सभ्य, शिक्षित कहलाने वाले लोग प्यार की परिभाषा जानते हैं?

अनाम रिश्ता: भाग-2

वह खिसियानी हंसी हंस कर बोला, ‘अच्छा बिटिया. उड़ा लो तुम भी मजाक हमारा,’ कह कर वह तेजी से बाहर चला गया. जैसा कि अनुमान था वह हमेशा की तरह शाम को 6 बजे लौटा, कमला को फिल्म दिखा कर व चाट खिला कर.

मां ने पूछा, ‘क्यों रे गोपी, कैसा है कमला का लड़का? दिखा दिया डाक्टर को?’

‘उसे तो मामूली सा बुखार था. डाक्टर बोला कि मौसमी बुखार है, अपनेआप ठीक हो जाएगा. बस, 2 रुपए की दवा दे दी.’

‘अच्छा, तो ला मेरे बाकी के रुपए,’ मां बोलीं.

वह जोर से हंस पड़ा और बोला, ‘वे तो खर्च हो गए.’

‘कैसे खर्च हो गए?’ मां ने बनते हुए पूछा.

‘कमला कहने लगी कि ‘गंगाजमुना’ लगी है सो उसे दिखा लाए.’

इंदु सोचने लगी, ‘60 रुपए माहवार पाने वाला यह बेवकूफ नौकर 40 रुपए तो अब तक खर्च कर चुका है. क्या है उस कालीकलूटी में जो यह उस के पीछे दीवाना है. वह तो कभी बच्चों की बीमारी के बहाने तो कभी अपनी बीमारी के बहाने इसे मूंड़ती रहती है. यह कैसा रिश्ता है इन के बीच?’

एक दिन उस ने मां से पूछ ही लिया, ‘कमला तो शादीशुदा है, 2 बच्चों की मां है. फिर यह गोपी की क्या लगती है?’

‘लगने को तो कुछ नहीं लगती पर सबकुछ है,’ मां ने टालने वाले अंदाज में कहा.

‘क्या मतलब?’ इंदु ने उत्सुकतापूर्वक गरदन ऊपर उठा कर कहा.

‘अभी तेरी उम्र नहीं है यह सब समझने की. चल, उठ कर अंगीठी जला,’ मां ने डांट लगाई.

इंदु को समझ नहीं आ रहा था कि अपनी जिज्ञासा कैसे शांत करे. परंतु एक दिन उस ने पड़ोस की भाभी को पटा लिया.

भाभी ने जो कहानी बताई उस का सार कुछ इस प्रकार था :

गोपी और कमला के घर गांव में साथसाथ थे. जब कमला बहू बन कर आई तो पड़ोसी के नाते गोपी उसे भाभी कहने लगा. और कभीकभी उस के घर भी जाने लगा. बस, फिर वह कालीकलूटी उसे इतनी भा गई कि वह रोजरोज उस के घर जाने लगा.

कमला के घरवाले किसना जो छोटी जाति का था, ने भी कभी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया था क्योंकि गांव वाले सीधेसरल स्वभाव के होते हैं. पर कमला आई थी शहर से सो उसे अपना सीधासादा पति पसंद नहीं आया. शक्लसूरत में भी वह साधारण ही था. धीरेधीरे ये दोनों एकदूसरे की ओर आकृष्ट हो गए और अब तो इन्हें समाज की भी परवा नहीं है.

पूरी कहानी सुनने के बाद कमला को देखने की इंदु की उत्सुकता और भी बढ़ गई. एक दिन मां को प्रसन्न मुद्रा में देख कर वह बोली, ‘मां, क्या तुम ने कमला को देखा है?’

‘नहीं, मैं ने नहीं देखा. वह तो जब भी आती है, सड़क पर ही खड़ी रहती है. किसी के जरिए खबर भेज कर गोपी को बुलवा लेती है.’

‘मां, किसी दिन गोपी से कह कर कमला को यहां बुलवा लो. हम भी उसे देखें कि कैसी है,’ इस बार इंदु की भाभी ने भी कमला प्रकरण में रुचि दिखाई.

मां को भी शायद जिज्ञासा थी, सो उन्होंने उन की बात मान ली.

एक दिन जब गोपी फिर से खुशबू वाला तेल मांगने आया तो मां बोलीं, ‘गोपी, आज तो हमारा भी मन हो रहा है तेरी ‘कमली’ को देखने का.’

गोपी कमला को ‘कमली’ कहता था.

पहले तो वह नानुकुर करता रहा कि वह घर नहीं आएगी. पर फिर काफी समझाने के बाद मान गया और उसे लिवाने चल ही दिया क्योंकि उस दिन मां भी अड़ गईं कि आज तुझे पैसे तभी दूंगी जब तू उसे यहां ले कर आएगा.

लगभग 5 मिनट बाद बाहर से छमछम की आवाज आई. सब समझ गए कि कमला आ रही है. जो बच्चे सो गए थे उन्हें भी जगा दिया गया, ‘उठोउठो, कमला आ रही है.’ मानो कोई फिल्मी हस्ती हमारे घर पधार रही हो.

जैसे ही वह दरवाजे पर आ कर रुकी, सब एकदम चुप हो गए. गोपी परदा हटा कर अंदर आया और बोला, ‘लो भाभी, आ गई तुम्हारी कमला.’ फिर उस ने वहीं से आवाज दी, ‘अरी, बाहर क्यों खड़ी है. अंदर आ जा,’ कह कर वह स्वयं कमरे से बाहर चला गया.

कमला आई तो उसे देख कर सब की आंखें खुली की खुली रह गईं. मुंह से आवाज नहीं निकली.

एकदम काला रंग, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी, मांग में खूब गहरा सिंदूर और हरे रंग की साड़ी. साथ में 4-5 वर्ष की एक बच्ची थी जबकि दूसरा शिशु पेट में था.

आखिर मां ने ही उस चुप्पी को तोड़ने की पहल की, ‘जा इंदु, शरबत बना ला और कुछ बिस्कुट वगैरह भी लेती आना.’

इंदु ने शरबत का गिलास कमला को पकड़ा दिया. मां ने पूछा कि कुछ पढ़ीलिखी भी हो तो वह बोली, ‘हां, 5वीं तक.’

उस जमाने में 5वीं की पढ़ाई काफी माने रखती थी.

मां ने 2-3 सवाल उस से और किए. फिर गोपी आ कर उसे बाहर ले गया. चलते समय मां ने कमला को 5 रुपए दिए और दोबारा आने को कहा.

अब तो कमला जब भी गांव से आती, सीधे घर ही आ जाती. मां को ‘जीजी’ कहने लगी थी और आते ही उन के पैर छूती थी.

मां के मना करने पर एक दिन बोली, ‘मेरी सास तो हैं नहीं, आप के पास आ कर मुझे अच्छा लगता है. दूसरी बात जो मुझे कल ही पता चली कि आप का और मेरा पीहर एक ही शहर में है. हम भी लखनऊ के हैं.’

अपने पीहर का तो हर जीव प्यारा लगता है, सो उस दिन से मां भी कमला पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गईं.

इंदु को भी वह अच्छी लगने लगी थी. एक तो शहर की लड़की, ऊपर से थोड़ी पढ़ीलिखी, सो बातचीत में सलीका भी था. हालांकि रंग काला था पर नैननक्श बहुत तीखे थे.

एक दिन गोपी लड्डू ले कर आया और इंदु के हाथ में लिफाफा थमा कर बोला, ‘लो बिटिया, मिठाई खाओ.’

‘कैसी मिठाई? क्या बात है, बड़े खुश नजर आ रहे हो, गोपी?’ इंदु ने हैरानी से पूछा.

‘तुम्हारी चाची के लड़का हुआ है.’

इंदु हैरान कि कौन सी चाची की बात कर रहा है.

मां ने पूछा, ‘गोपी, क्या कह रहा है, ठीक से बता?’

वह झिझकते हुए बोला, ‘कमला के लड़का हुआ है.’

‘तू तो ऐसे नाच रहा है जैसे तेरे ही हुआ हो,’ मां हंसी उड़ाते हुए बोलीं.

‘ऐसा ही समझ लो,’ धीरे से कह कर गोपी चला गया.

उस के बाद 1 साल तक कमला नहीं आई क्योंकि बच्चा छोटा था. एक दिन अचानक पायल की छमछम सुनाई दी तो मां बोलीं, ‘लगता है कमला आई है.’

आगे पढ़ें- लड़के को देखते ही सब लोग मुसकराने लगे. भाभी ने..

अनाम रिश्ता: भाग-1

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी गरमियों की छुट्टियों में जब इंदु मायके आई तो सबकुछ सामान्य प्रतीत हो रहा था. बस, एक ही कमी नजर आ रही थी, गोपी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था. वह इस घर का पुराना नौकर था. इंदु को तो उस ने गोद में खिलाया था, उस से वह कुछ अधिक ही स्नेह करता था.इंदु के आने की भनक पड़ते ही वह दौड़ा आता था. वह हंसीहंसी में छेड़ भी देती, ‘गोपी, जरा तसल्ली से आया कर… कहीं गिर गया तो मुझे ही मरहमपट्टी करनी पड़ेगी. वैसे ही इस समय मैं बहुत थकी हुई हूं.’

‘अरे बिटिया, हमें मालूम है तुम थकी होगी पर क्या करें, तुम्हारे आने की बात सुन कर हम से रहा नहीं जाता.’

इंदु मन ही मन पुरानी घटनाओं को दोहरा रही थी और सोच रही थी कि गोपी अब आया कि अब आया. परंतु उस के आने के आसार न देख कर वह मां से पूछ बैठी, ‘‘मां, गोपी दिखाई नहीं दे रहा, क्या कहीं गया है?’’

‘‘वह तो मर गया,’’ मां ने सीधे सपाट स्वर में कहा.

एक क्षण को तो वह सन्न रह गई. उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, बोली, ‘‘पिछली बार जब मैं यहां आई थी तब तो अच्छाभला था. अचानक ऐसा कैसे हो गया, अभी उस की उम्र ही क्या थी?’’

‘‘दमे का मरीज तो था ही. एक रात को सांस रुक गई. किसी को कुछ पता नहीं चला. सुबह देखा तो सब खत्म हो चुका था.’’

गोपी के बारे में जान कर मन बड़ा अनमना सा हो उठा, सो वह थकान का बहाना कर के कमरे में जा कर लेट गई और गोपी की स्मृतियों में खो गई.

अभी गोपी की उम्र ही क्या थी, मुश्किल से 45 साल का था. 15-16 साल का था जब गांव से भाग कर आया था. खेतीबाड़ी में मन नहीं लगता था, इसलिए बाप रोज मारता था. एक दिन गुस्से में आ कर घर छोड़ दिया. वह दादी के गांव के पास के ही गांव का था. सो, पिताजी ने जब बाजार में घूमते हुए देखा तो सारा किस्सा जान कर घर लिवा लाए. तब से वह इस घर में आया तो यहीं का हो कर रह गया. दादी ने उसे अपने बेटे की तरह रखा.

अतीत की घटनाएं चलचित्र की भांति इंदु की आंखों के आगे घूमने लगीं.

वह छोटी सी थी तो उस के सारे काम गोपी ही किया करता था, जैसे स्कूल छोड़ने जाना, खाना देने जाना, स्कूल से वापस घर ले कर आना, शाम को घुमाने ले जाना वगैरहवगैरह. अकसर खेलखेल में वह अध्यापिका बनती थी और गोपी उस का शिष्य. पढ़ाई ठीक से न करने पर वह उसे मुरगा भी बनाती थी और स्केल से हथेलियों पर मार भी लगाती थी.

इसी तरह दिन बीतते जा रहे थे. इस बीच इंदु के और बहनभाई भी हो गए थे, परंतु गोपी उसी से विशेष स्नेह करता था. इसलिए उस के सारे काम वह बड़ी मुस्तैदी और प्रेम से करता था. चाहे और किसी का कोई काम हो न हो, इंदु का हर काम वक्त पर होता था. वह नियम गोपी सालों से निभाता आ रहा था. उस के पीछे तो वह घरवालों से झगड़ भी लेता था.

अगर पिताजी कुछ कहते तो नाराज हो कर कहता, ‘तुम किसी को डांटो, चाहे मारो, मुझे कुछ नहीं, पर मेरी बिटिया को कुछ मत कहना, जो कहना हो मुझ से कहो.’

10वीं कक्षा में पहुंचने तक उस को कुछकुछ समझ आने लगी थी. चंचलता का स्थान गंभीरता ने ले लिया था. इसीलिए उड़तीउड़ती खबरों से समझ आने लगा था कि गोपी का अपने गांव की किसी कमला नाम की औरत से इश्क का चक्कर चल रहा है. पूरी बात तो उसे मालूम नहीं थी क्योंकि न तो वह किसी से कुछ पूछने की हिम्मत कर पाती थी, न ही उसे कोई कुछ बताता था.

एक दिन दोपहर में सब लोग बड़े वाले कमरे में लेटे हुए थे कि अचानक बाहर किसी के जूते चरमराने की आवाज आई. सब समझ गए कि गोपी होगा. जब वह परदा हटा कर अंदर आया तो उसे नए कुरतेपाजामे में देख कर सब समझ गए कि आज कमला आई होगी. उसी से मिलने जनाब जा रहे हैं, सजधज कर.

‘भाभी, ओ भाभी, जरा सा खुशबू वाला तेल तो देना,’ गोपी खुशामदी लहजे में बोला.

उसे जब कोई मतलब होता था तो मां को ‘भाभी’ कहता था वरना तो हमेशा ‘बीबीजी’ ही कहता. मतलब उसे तभी होता था जब कमला आती थी.

इंदु ने अलमारी से तेल की शीशी निकाल कर थोड़ा सा तेल उसे दे दिया जिसे उस ने बालों में चुपड़ लिया. फिर वहीं पास में रखे एक पुराने कंघे से खूब जमाजमा कर बाल संवारे और शीशे में स्वयं को अच्छी तरह निहार कर जांचापरखा कि सब ठीक है या कुछ कसर है. जब संतुष्ट हो गया तो बाहर की ओर चल दिया पर दरवाजे तक जा कर रुक गया.

हम सब समझ गए कि अब पैसों का नंबर है.

‘भाभी, सो गईं क्या?’ वह बड़े लाड़ से बोला.

‘नहीं, बोल, क्या है?’ मां ने जानबूझ कर अनजान बनते हुए कहा.

‘थोड़े से पैसे चाहिए थे,’ गोपी ने धीरेधीरे अपनी बात पूरी की.

‘क्यों, क्या करेगा पैसों का? अभी कल ही तो ले गया था हजामत बनवाने को. अब क्या जरूरत आन पड़ी?’ मां ने झुंझला कर कहा.

इस पर वह खुशामदी हंसी हंसने लगा और बोला, ‘तुम जानती तो हो भाभी, फिर क्यों हमारे मुंह से कहलवाना चाहती हो?’

उस की बात सुन कर मां को गुस्सा आ गया. वे बोलीं, ‘अब मेरे पास पैसे नहीं हैं. इस महीने तू 2 बार पैसे ले चुका है. अब क्या मुसीबत आ पड़ी? हजामत भी बनवा ली, अपनी चहेती को फिल्म भी दिखा लाया. अब क्या रह गया?’

मां को क्रोधित देख कर गोपी थोड़ा उदास हो गया, रुक कर बोला, ‘कमला का लड़का बीमार है, उसे डाक्टर को दिखाना है.’

‘तू तो पूरा पागल है. वह किसी न किसी बहाने तुझ से पैसे ऐंठती रहती है और तू भी मूर्ख बना उस की हर बात पर आंखें मूंद कर भरोसा कर के लुटता रहता है.’

‘नहीं, भाभी, वह सच कह रही है,’ गोपी दृढ़तापूर्वक बोला.

‘कितने पैसे चाहिए?’ मां ने हथियार डालते हुए पूछा क्योंकि मालूम था कि वह मानने वाला तो है नहीं.

‘बस, 20 रुपए दे दो, ज्यादा नहीं चाहिए,’ गोपी शीघ्रतापूर्वक बोला कि कहीं मां का इरादा न बदल जाए.

‘जा इंदु, इसे रुपए दे दे,’ मां बोलीं.

इंदु ने उसे 20 रुपए ला कर दे दिए और शरारत से बोली, ‘क्यों गोपी भैया, डाक्टर के यहां कौन से शो में जाओगे, दोपहर वाले या शाम वाले?’

आगे पढ़ें- वह हमेशा की तरह शाम को 6 बजे लौटा, कमला को

Special Ops Trailer: पहली बार परदे पर दिखेगी भारतीय संसद पर हुए आतंकी हमले की कहानी

2001 में भारतीय संसद पर हुए सबसे बड़े आतंकवादी हमले के मुख्य गुनाहगार की तलाश के 19 वर्ष की कहानी पर नीरज पांडे एक बहुत बड़ी रोमांचक, रहस्य व एक्शन प्रधान वेब सीरीज ‘‘स्पेशल ऑप्स’’ लेकर आ रहे हैं, जो कि ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘हॉट स्टार वीआई पी’’ पर 17 मार्च से सात भाषाआं में प्रसारित होगा. इसके आठ एपिसोड होंगे. इस वेब सीरीज का ट्रेलर 25 फरवरी को मुंबई के ट्रायडेंट होटल में भव्य समारोह में लॉन्च किया गया.

भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली बार 2001 में भारतीय संसद पर हुए आतंकी हमले को सेल्युलाइड पर उतारा गया है. आठ एपिसोड की यह श्रृंखला वास्तविक आतंकी हमलों और भारतीय खुफिया की भूमिका के वास्तविक घटनाक्रमों के साथ ही काल्पनिक कहानी भी है.

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इस वेब सीरीज की शुरूआत 2001 में भारतीय संसद पर हुए आतंकवादी हमले के साथ होती है और फिर 2006 व 2011 के आतंकी हमले सहित आए दिन कश्मीर में हो रहे आतंकी हमले भी समाहित हैं.

इस कहानी का मूल मकसद इन आतंकी हमलों के पीछे एकल मास्टरमाइंड का पीछा करना है,जो कि भारत के सबसे घातक दुश्मन के लिए भारतीय खुफिया में सबसे लंबे समय तक युद्धपोत बना रहा है.

कहानीः

‘स्पेशल ऑप्स’ की कहानी आर एंड एडब्ल्यू/रॉ एजेंट हिम्मत सिंह की यात्रा है. वह अपने करियर में बहुत जल्द देश में होने वाले कई आतंकवादी हमलों के बारे में एक सादृश्य बनाते हैं. विभिन्न हमलों के कुछ प्रमाण और वास्तविक अध्ययन और उनके तौर-तरीकों के आधार पर वह आश्वस्त होते हैं कि भारत में हुए व हो रहे आतंकी हमलों का मास्टर माइंड इखलाक नाम का एक व्यक्ति है. हिम्मत अपने कार्य बल के रूप में उल्लेखनीय रूप से कुशल फारूक,  रूहानी, जूही, बाला और अविनाश जैसे एजेंटों की एक टीम को तैनात करते हैं. इस टीम का एकमात्र उद्देश्य कदम दर कदम मास्टरमाइंड के करीब पहुंचना है.

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ट्रेलर लॉन्च के मौके पर हमने इस सीरीज की स्टार कास्ट से एक खास बातचीत की. आइए जानते हैं क्या कहा इन्होंने…

‘‘पहली बार भारतीय संसद पर हुआ आतंकी हमला सेल्यूलाइड पर..’’-नीरज पांडे

वेब सीरीज ‘‘स्पेशल ऑप्स’’ के निर्देशक नीरज पांडे ने कहा- “देखिए, यह एक रोमांचक व रहस्यप्रधान वेब सीरीज है. वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स’ ऐसी कहानी है, जिसे मैंने दस वर्ष पहले बनाने की सोची थी, हम इस पर एक लंबा सीरियल बनाना चाहते थे. यह एक बड़ा विचार है, जिसे आगे बढ़ाने और विकसित करने के लिए बहुत धैर्य और शोध की आवश्यकता थी. पर उस वक्त बात नहीं बनी.

फिर एक दिन स्टार इंडिया के हिंदी इंटरटेनमेंट के प्रेसिडेंट गौरव बनर्जी से बात हुई, तो तय हुआ कि इसे वेब सीरीज के रूप में ‘हॉट स्टार वीआईपी’ के लिए बनाया जाए. हमारे पास कहानी को प्रमुखता देने वाले नए और रोमांचक स्वरूपों के साथ इसे जीवन की कहानी से बड़ी वेब सीरीज बनाने के लिए एक शानदार टीम थी, जो पिछले दो दशकों से कई वास्तविक घटनाओं को एक साथ जोड़ती रही है.यह शो के कई बड़े पलों में से एक है.”

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‘‘अनूठी बुद्धिमत्ता का चित्रण..’’- के के मेनन

अभिनेता के के मेनन ने कहा- “इस वेब सीरीज में भारतीय बुद्धिमत्ता को अनूठे परिप्रेक्ष्य में पेश किया गया है. हमारे देश व समय के अंडरकवर एजेंट सही मायनों में अनसुने नायक हैं. यह आपके और मेरे जैसे दिखाई देते हैं. पूरी तरह से भीड़ का हिस्सा बन एक सामान्य जीवन जीते हैं. मगर किसी भी खतरे से राष्ट्र की रक्षा के लिए यह लगातार चौबीस घंटे ड्यूटी पर तैनात रहते हैं. ‘स्पेशल ऑप्स’ में ऐसे ही एजेंटों के जीवन के कुछ पल सामने लाने की कोशिश की गयी है, जो कई दुर्भाग्यपूर्ण हमलों के पीछे मास्टरमाइंड को पकड़ने की कोशिश करते हैं.‘‘

‘‘रियल इमोशन हैं..’’-दिव्या दत्ता

एक्ट्रेस दिव्या दत्ता ने कहा, ‘‘भारत के सबसे बड़े दुश्मन आतंक के खिलाफ सबसे लंबे समय तक के युद्ध के बारे में विशेष है. श्रृंखला की गतिशीलता, उपचार, तेज लेखन और एक तेज गति वाली कहानी ने इसे एक किनारे की श्रृंखला बनाने का वादा किया है, जो भारतीय स्क्रीन पर कभी नहीं देखा गया है. यहां तक कि बड़े पैमाने पर कलाकारों की टुकड़ी के साथ ‘स्पेशल ऑप्स’ में हर चरित्र को बारीक, जटिल और अच्छी तरह से सोचा गया है. इसमें रियल इमोशन को कैप्चर करते समय कहानी जिस तरह से आगे-पीछे होती है, उससे यह वेब सीरीज अपने आप में बहुत बड़ी हो जाती है.’’

इस वेब सीरीज के लेखक नीरज पांडे, दीपक किंगरानी और बेनजीर अली फिदा हैं. इन लेखकों ने भारतीय बुद्धिमत्ता के तरीकों पर शोध करने में कई वर्षों बिताए.

अलग-अलग जगहों पर हुई शूटिंग…

इस रोमांचक वेब सीरीज को मुंबई और दिल्ली के अलावा तुर्की, अजरबैजान और जॉर्डन सहित कई अंतरराष्ट्रीय स्थानों पर फिल्माया गया है.

बता दें कि नीरज पांडे निर्देशित और शिवम नायर द्वारा सह-निर्देशित इस वेब सीरीज को के के मेनन, दिव्या दत्ता, विनय पाठक, करण टैकर, सज्जाद डेलाफ्रूज, सना खान, सैयामी खेर, मेहर विज, विपुल गुप्ता, मुजम्मिल इब्राहिम, परमीत सेठी जैसे कलाकारों ने अपने अभिनय से संवारा है.

‘सदियों से आदिवासियों का शोषण होता रहा है’’- हेमंत सोरेन

आमतौर पर राजनेताओं के सरोकार राजनीति से हट कर नहीं होते लेकिन झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हैं जिस से उन में सभी की जिज्ञासा पैदा हो रही है. खुद को आम आदमी कहने वाले इस युवा मुख्यमंत्री के बारे में जानिए कुछ अहम बातें उन्हीं के शब्दों में.

आदिवासी बाहुल्य और अति पिछड़े राज्य  झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भले ही उम्र में 44 साल के हों लेकिन उन से मिलने पर लगता है कि आप कालेज के ऐसे किसी छात्र से मिल रहे हैं जो इन दिनों भारी-भरकम किताबों से घिरा पीएचडी कर रहा है. प्राकृतिक सहजता के साथसाथ जिज्ञासा भी उन के चेहरे का स्थायी भाव है जो उन्हें और आकर्षक बनाता है.

हाल ही में  झारखंड के दोबारा मुख्यमंत्री बने जेएमएम यानी  झारखंड मुक्ति मोरचा के मुखिया हेमंत सोरेन के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है. उन का आत्मविश्वास बताता है कि वे चुनौतियों से लड़ने को पूरी तरह तैयार और सक्षम हैं.

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उन के आत्मविश्वास की कुछ वजहें भी हैं. इस प्रतिनिधि ने राज्य की राजधानी रांची के कांके रोड स्थित मुख्यमंत्री आवास पर उन से अनौपचारिक व अंतरंग चर्चा की. उस चर्चा के प्रमुख अंश उन्हीं के शब्दों में यहां प्रस्तुत हैं-

पत्नी प्रेरणा और पिता आदर्श हैं

‘‘लंबे चुनावप्रचार से ले कर मुख्यमंत्री बन जाने के बाद तक मैं लगातार व्यस्त रहा और अब चुनौतियों से निबटने में जुट गया हूं. मैं परिवार को कम समय दे पा रहा हूं. अच्छी बात यह है कि परिवारजन इस बात को सम झते हैं कि  झारखंड की जनता ने मु झे जो महती जिम्मेदारी सौंपी है उस पर मु झे खरा उतर कर दिखाना है.

‘‘पत्नी कल्पना खासतौर से इस बात को सम झती हैं जो जिंदगी की हर लड़ाई में हर कदम पर मेरे साथ खड़ी रही हैं. सच कहूं तो वे मेरी प्रेरणा हैं. प्रचार के दिनों में मैं जब दौरों पर होता था तो वे कार्यकर्ताओं का पूरा ध्यान रखती थीं. उस दौरान मैं ने महसूस किया कि एक पत्नी अगर अच्छी मैनेजर हो तो पति की कई मुश्किलें दूर हो जाती हैं. कल्पना अपना खुद का स्कूल संचालित करती हैं. इस के बाद भी लगातार वे मेरा, मेरे खानेपीने का, कपड़ों का और हर बात का ध्यान रखे रहीं. आज भी वे इन सब बातों का पूरा खयाल रखती हैं.

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‘‘मेरे पिता शिबू सोरेन मेरे रोल मौडल हैं और वे सिर्फ मेरे ही नहीं, बल्कि पूरे  झारखंड के अभिभावक हैं. उन के जीवनभर के संघर्षों और पारिवारिक व राजनीतिक उतारचढ़ावों का मैं साक्षी हूं. मु झे इस बात की खुशी है कि उन के सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी राज्य की जनता ने मु झे सौंपी है. हालांकि राजनीति मेरे लिए नई बात नहीं है लेकिन यह व्यक्तिगत अनुभव जरूर है जिसे मैं आप से सा झा करना चाहूंगा कि उन के रहते मैं कभी विचलित नहीं हुआ. एक बेटे को इस से बड़ी सुरक्षा वाली बात कोई होती भी नहीं कि उस का पिता और परिवार हर वक्त उस के साथ खड़ा है. गुरुजी (शिबू सोेरेन) मेरे आदर्श हैं.

मुख्यमंत्री के रोल में

‘‘मुख्यमंत्री बनने का कोई अहंकार न तो पहले मु झे था और न ही आज है. मैं एक साधारण इंसान हूं, जो जानता है कि राज्य की जनता ने उस से अपार उम्मीदें लगा रखी हैं. हालफिलहाल मैं बड़ीबड़ी बातें या दावे नहीं करना चाहता लेकिन पूरे आत्मविश्वास से यह जरूर कह सकता हूं कि 2 वर्षों में राज्य के लिए मैं वह सब कर लूंगा जो मैं करना चाहता हूं.

‘‘मेरी पहली प्राथमिकता युवाओं को रोजगार मुहैया कराने और दूसरी शिक्षा व स्वास्थ्य की है. आदिवासी होने के नाते मैं  झारखंड की बहुसंख्यक आबादी की तकलीफें और दुश्वारियां जानता व सम झता हूं. मेरी पहली कोशिश रहेगी कि युवाओं को ज्यादा से ज्यादा रोजगार मिलें और हर बच्चा स्कूल जाए. जेएमएम पर सभी वर्गों ने भरोसा जताया है, इसलिए मेरी जिम्मेदारियां और भी बढ़ जाती हैं.

मजबूत है गठबंधन

‘‘जेएमएम और कांग्रेस का गठबंधन बेहद मजबूत है. गठबंधन के बारे में कुछ अफवाहें फैलती रहती हैं, जो निराधार होती हैं. दोनों दल वैचारिक रूप से काफी नजदीक हैं, इसीलिए उम्मीद से ज्यादा सीटें हमें मिलीं. इस गठबंधन में न कोई गांठ है और न ही किसी तरह का कोई मतभेद या मनभेद है.

‘‘ झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे ने विपक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर एक आस बंधाई है कि अगर भाजपा को उखाड़ फेंकना है तो मिल कर चुनाव लड़ना होगा. क्षेत्रीय दलों की अपनी

एक अलग अहमियत व पहुंच होती है. अलगअलग राज्यों में इस की अलगअलग वजहें हो सकती हैं. 2024 आतेआते मु झे लगता है कि परिदृश्य काफीकुछ बदल चुका होगा और भाजपा को देशवासी पूरी तरह खारिज कर देंगे.

आदिवासी हिंदू नहीं

‘‘आप दोटूक पूछ रहे हैं तो मैं भी दोटूक जवाब दे रहा हूं कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं. हां, यह सच है कि वे किसी धर्म, संप्रदाय या जाति से किसी तरह की नफरत नहीं करते. आदिवासी प्रकृति के उपासक हैं और आमतौर पर शांत रहते हैं. आदिवासियों के धर्म को ले कर मच रही खींचतान और घमासान फुजूल है. आदिवासी केवल आदिवासी हैं. उन का भोलापन और निश्च्छलता कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही.

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‘‘सदियों से आदिवासियों का तरहतरह से शोषण होता रहा है. इसे रोकना भी मेरी प्राथमिकता रहेगी. आप आदिवासी इलाके में देखिए कि वे कितने अभावों में गुजरबसर कर भी खुश रहते हैं. मेरे विचार में सभी को आदिवासियों से प्रेरणा लेनी चाहिए कि बिना कोई शिकवाशिकायत किए भी संतुष्ट रहा जा सकता है. इस समुदाय की बेहतरी के लिए मैं कृतसंकल्प हूं. इन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जाना जरूरी है.

एनआरसी और सीएए

‘‘ऐसे वक्त में जब देश पर आर्थिक संकट मंडरा रहा है तब केंद्र सरकार द्वारा एनआरसी और सीएए के जरिए लोगों को फिर से नोटबंदी की तरह कतार में खड़ा करना ज्यादती है.  झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश में इन को ले कर गुस्सा व्याप्त है. ये गैरजरूरी हैं और इन्हें लागू करना मेरी सम झ से परे है.

‘‘सीएए के विरोध से देश की सरकार अपनी पुलिस के माध्यम से निबट रही है. केंद्र के इस कदम को मैं लोकतांत्रिक नहीं मानता, यह कुछ ‘और’ ही है. नोटबंदी के दौरान मारे गए लोगों की जिम्मेदारी कौन लेगा.  झारखंड में ऐसे कानून लागू नहीं किए जाएंगे.

बांटती है भाजपा

‘‘ झारखंड में लोकतंत्र की जीत हुई है. भाजपा की कलई खुल गई है कि वह लोगों को बांटने का काम करती है. गांधीजी की बात करने वाले हिटलर के नक्शेकदम पर चलते हैं. यह तो शुरुआत है, आगेआगे देखिए होता है क्या…

बुक का आइडिया

‘‘मैं बचपन से ही पढ़ाकू प्रवृत्ति का रहा हूं. स्कूलकालेज के दिनों में खूब पढ़ता और दोस्तों संग मौजमस्ती भी करता था. अब हालात और मेरी भूमिका दोनों बदल गए हैं. वक्त काम करने का और बहुतकुछ कर दिखाने का है.

‘‘मु झे  झारखंड ही नहीं, बल्कि देशभर से शुभकामनाएं मिल रही हैं कि मैं बुके की जगह बुक चाहता हूं. एक अच्छी किताब या पत्रिका मनोरंजन भी करती है और ज्ञान भी बढ़ाती है. हमें अगर वास्तविकता से जोड़े रखते हुए हमारी रोजमर्राई परेशानियां हल कर सकती हैं तो वे किताबें और पत्रिकाएं हैं. मेरा विचार लाइब्रेरियां बनाने का है ताकि राज्य के लोग ज्यादा से ज्यादा पढ़ें और ज्ञान हासिल करें.

क्या पहली बार सैक्स करते समय ब्लीडिंग होनी जरूरी है और क्या दर्द भी होता है?

सवाल

मैं 25 वर्षीय अविवाहिता युवती हूं. मैं यह जानना चाहती हूं कि क्या प्रथम बार सैक्स करते समय ब्लीडिंग होनी जरूरी है और क्या उस समय दर्द भी होता है? मेरे मन में इस बात को ले कर अनेक डर व शंकाएं हैं. कृपया समाधान करें.

जवाब

पहली बार इंटरकोर्स के समय ब्लीडिंग हो यह जरूरी नहीं और न ही इसे वर्जिनिटी के साथ जोड़ें. कुछ लड़कियों को पहली बार सैक्स करते समय स्पौटिंग होती है, कुछ को कुछ घंटों तक ब्लीडिंग होती है तो कुछ को मासिकधर्म की तरह होती है. दरअसल, ब्लीडिंग होने का कारण सैक्स करते समय हाइमन का ब्रेक होना होता है. कई बार लड़कियों में हाइमन घुड़सवारी, मैस्ट्रूबेरेशन या टैंपून के प्रयोग से भी ब्रेक हो जाता है. सो, उन लड़कियों को फर्स्ट इंटरकोर्स के समय ब्लीडिंग नहीं होती. जहां तक पहली बार सैक्स के समय दर्द का सवाल है, वह भी तब होता है जब महिला शारीरिक व भावनात्मक रूप से पूरी तरह से तैयार न हो. अगर सैक्स से पहले फोरप्ले किया जाए और युवती इमोशनली और फिजिकली कंफर्टेबल हो तो दर्द नहीं होता. आप चाहें तो अपनी समस्या के लिए किसी गाइनीकोलौजिस्ट से भी संपर्क कर सकती हैं.

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बेहतर सैक्स के लिए यौन रोगों से बचिए

प्रतिभा की शादी को कई साल हो गए थे. समय पर 2 बच्चे भी हो गए पर कुछ समय के बाद प्रतिभा को लगा कि उस के अंग से कभी कभी तरल पदार्थ निकलता है. शुरुआत में प्रतिभा ने इसे मामूली समझ कर नजरअंदाज कर दिया. मगर कुछ दिनों बाद उसे महसूस हुआ कि इस तरल पदार्थ में बदबू भी है जिस से अंग में खुजली होती है. प्रतिभा ने यह बात स्त्रीरोग विशेषज्ञा को बताई. उस ने जांच कर के प्रतिभा से कहा कि उस को यौनरोग हो गया है, लेकिन इस में घबराने वाली कोई बात नहीं है. प्रतिभा ने तो समय पर डाक्टर को अपनी समस्या बता दी पर बहुत सारी औरतें प्रतिभा जैसी समझदार नहीं होतीं. वे इस तरह के रोगों को छिपाती हैं. पर यौनरोगों को कभी छिपाना नहीं चाहिए. दीपा जब अपने पति के साथ शारीरिक संबंध बनाती थी, तो उसे दर्द होता था. इस परेशानी के बारे में उस ने डाक्टर को बताया. डाक्टर ने दीपा के अंग की जांच कर के बताया कि उसे यौनरोग हो गया है. डाक्टर ने उस का इलाज किया. इस के बाद दीपा की बीमारी दूर हो गई.

प्रदीप को पेशाब के रास्ते में जलन होती थी. वह नीमहकीमों के चक्कर में पड़ गया पर उसे कोई लाभ नहीं हुआ. तब उस ने अच्छे डाक्टर से इस संबंध में बात की तो डाक्टर ने कुछ दवाएं लिखीं, जिन से प्रदीप को लाभ हुआ. डाक्टर ने प्रदीप को बताया कि उस को यौनरोग हो गया था. इस का इलाज नीमहकीमों से कराने के बजाय जानकार डाक्टरों से ही कराना चाहिए.

क्या होते हैं यौनरोग

मक्कड़ मैडिकल सैंटर, लखनऊ के डाक्टर गिरीश चंद्र मक्कड़ का कहना है कि यौनरोग शरीर के अंदरूनी अंग में होने वाली बीमारियों को कहा जाता है. ये पतिपत्नी के शारीरिक संपर्क करने से भी हो सकते हैं और बहुतों के साथ संबंध रखने से भी हो सकते हैं. अगर मां को कोई यौनरोग है, तो बच्चे का जन्म औपरेशन के जरिए कराना चाहिए. इस से बच्चा योनि के संपर्क में नहीं आता और यौनरोग से बच जाता है. कभीकभी यौनरोग इतना मामूली होता है कि उस के लक्षण नजर ही नहीं आते. इस के बाद भी इस के परिणाम घातक हो सकते हैं. इसलिए यौनरोग के मामूली लक्षण को भी नजरअंदाज न करें. मामूली यौनरोग कभीकभी खुद ठीक हो जाते हैं. पर इन के बैक्टीरिया शरीर में पड़े रहते हैं और कुछ समय बाद वे शरीर में तेजी से हमला करते हैं. यौनरोग झ्र शरीर के खुले और छिले स्थान वाली त्वचा से ही फैलते हैं.

हारपीज : यह बहुत ही सामान्य किस्म का यौनरोग है. इस में पेशाब करने में जलन होती है. पेशाब के साथ कई बार मवाद भी आता है. बारबार पेशाब जाने का मन करता है. किसीकिसी को बुखार भी हो जाता है. शौच जाने में भी परेशानी होेने लगती है. जिस को हारपीज होता है उस के जननांग में छोटेछोटे दाने हो जाते हैं. शुरुआत में यह अपनेआप ठीक हो जाता है, मगर यह दोबारा हो तो इलाज जरूर कराएं.

वाट्स : वाट्स में शरीर के तमाम हिस्सों में छोटीछोटी गांठें पड़ जाती हैं. वाट्स एचपीवी वायरस के चलते फैलता है. ये 70 प्रकार के होते हैं. ये गांठें अगर शरीर के बाहर हों और 10 मिलीमीटर के अंदर हों तो इन को जलाया जा सकता है. इस से बड़ी होने पर औपरेशन के जरिए हटाया जा सकता है. योनि में फैलने वाले वायरस को जेनेटल वाट्स कहते हैं. ये योनि में बच्चेदानी के द्वार पर हो जाते हैं. समय पर इलाज न हो तो इन का घाव कैंसर का रूप ले लेता है. इसलिए 35 साल की उम्र के बाद एचपीवी वायरस का कल्चर जरूर करा लें.

गनोरिया : इस रोग में पेशाब नली में घाव हो जाता है जिस से पेशाब नली में जलन होने लगती है. कई बार खून और मवाद भी आने लगता है. इस का इलाज ऐंटीबायोटिक दवाओं के जरिए किया जाता है. अगर यह रोग बारबार होता है, तो इस का घाव पेशाब नली को बंद कर देता है. इसे बाद में औपरेशन के जरिए ठीक किया जाता है. गनोरिया को सुजाक भी कहा जाता है. इस के होने पर तेज बुखार भी आता है. इस के बैक्टीरिया की जांच के लिए मवाद की फिल्म बनाई जाती है. शुरू में ही यह बीमारी पकड़ में आ जाए तो अच्छा रहता है.

सिफलिस : यह यौनरोग भी बैक्टीरिया के कारण फैलता है. यह यौन संबंधों के कारण ही फैलता है. इस रोग के चलते पुरुषों के अंग के ऊपर गांठ सी बन जाती है. कुछ समय के बाद यह ठीक भी हो जाती है. इस गांठ को शैंकर भी कहा जाता है. शैंकर से पानी ले कर माइक्रोस्कोप के सहारे देखा जाता है. पहली स्टेज पर माइक्रोस्कोप के सहारे ही बैक्टीरिया को देखा जा सकता है. इस बीमारी की दूसरी स्टेज पर शरीर में लाल दाने से पड़ जाते हैं. यह बीमारी कुछ समय के बाद शरीर के दूसरे अंगों को भी प्रभावित करने लगती है. इस बीमारी का इलाज तीसरी स्टेज के बाद संभव नहीं होता. यह शरीर की धमनियों को प्रभावित करती है. इस से धमनियां फट भी जाती हैं. यह रोग आदमी और औरत दोनों को हो सकता है. दवा और इंजैक्शन से इस का इलाज होता है.

क्लामेडिया : यह रोग योनि के द्वारा बच्चेदानी तक फैल जाता है. यह बांझपन का सब से बड़ा कारण होता है. बीमारी की शुरुआत में ही इलाज हो जाए तो अच्छा रहता है. क्लामेडिया के चलते औरतों को पेशाब में जलन, पेट दर्द, माहवारी के समय में दर्द, शौच के समय दर्द, बुखार आदि की शिकायत होने लगती है.

यौनरोगों से बचाव

अंग पर किसी भी तरह के छाले, खुजलाहट, दाने, कटनेछिलने और त्वचा के रंग में बदलाव की अनदेखी न करें.

जब भी शारीरिक संबंध बनाएं कंडोम का प्रयोग जरूर करें. यह यौनरोगों से बचाव का आसान तरीका है.

कंडोम का प्रयोग ठीक तरह से न करने पर भी यौनरोगों का खतरा बना रहता है.

ओरल सैक्स करने वालों को अपनेअपने अंग की साफसफाई का पूरा खयाल रखना चाहिए.

यौनरोग का इलाज शुरुआत में सस्ता और आसान होता है. शुरुआत में इस से शरीर को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचता है.

गर्भवती औरतों को अपनी जांच समयसमय पर करानी चाहिए ताकि उस से बच्चे को यौनरोग न लग सके.

नीमहकीमों के चक्कर में पड़ने के बजाय डाक्टर की सलाह से ही दवा लें.

अंग की साफसफाई से यौनरोगों से दूर रहा जा सकता है.

औरतों को यौनरोग ज्यादा होते हैं. अत: उन्हें पुरुषों से ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

यौनरोगी के संपर्क में जाने से बचें. बाथरूम की ठीक से साफसफाई न करने से भी एक व्यक्ति का यौनरोग दूसरों को लग सकता है.

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