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हमारी बुद्धिमान साहित्यिक सासूमां

बाजार की मंदी के चलते हमारी फैक्टरी में छंटनी हो गई. मैं उतरे मुंह जब घर पहुंचा तो देखा हमारी आदर्श महिला, हमारी एकमात्र पत्नी अपनी मां के साथ गरमागरम पकौड़े खा रही थी. बड़े मग में चाय भरी थी और उस की भाप उड़उड़ कर कमरे में खुशबू फैला रही थी.
हमारे उतरे चेहरे को देख कर हमारी सास ने कहा, ‘‘क्यों दामादजी, क्या हाल हैं? हमारे आने की कोई खुशी नहीं
हुई क्या?’’

हम ने चेहरे पर झूठी हंसी ला कर कहा, ‘‘ऐसी बात नहीं है.’’

‘‘फिर क्या बात है?’’ पकौड़े को पकौड़े जैसे मुंह में रखते हुए उन्होंने कहा. मैं जानता था कि वे बहुत तिकड़मी महिला हैं. पूरे महल्ले में उन की तूती बोलती है, लेकिन मेरी वे क्या मदद करेंगी? इसलिए मैं चुप था, तो वे फिर बोल उठीं, ‘‘बोलिए भी, यह क्या बासी भजिए जैसा मुंह उतार रखा है.’’
हम ने दिल पर पत्थर रख कर कहा, ‘‘आज हमारी कंपनी ने छंटनी कर के हमें हटा दिया.’’

‘‘हायहाय, यह क्या कह रहे हैं? वे मेरे लिए सोने का हार लाने वाले थे, उस का क्या होगा?’’ यह स्वर मेरी धर्म की पत्नी का था, उस की आवाज में दुख कम, हार न पाने का दर्द अधिक था. मेरी सास ने उसे आंखों ही आंखों में चुप रहने के लिए कहा. पत्नी वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गई. मुंह और आंखों पर पल्ला रख कर दुख प्रकट करने का अभिनय करने लगी.

मैं ने विस्तार से सासूजी को बताया कि आज कुल जमा 20 हजार रुपए की राशि दे कर हमें घर भेज दिया गया. वैसे भी हमारी नौकरी संविदा की थी. वैश्वीकरण के चलते हमारी कोई यूनियन भी नहीं है. इसलिए हम तो कौंट्रैक्ट बेस मजदूर श्रेणी में थे.

‘‘हूं,’’ ठंडी सांस ले कर सासूजी ने प्लेट का आखिरी पकौड़ा भी खा लिया और गहरे चिंतन के मूड में आ कर सोचने लगीं. फिर अचानक बोलीं, ‘‘आप कुल जमा 5 हजार रुपए खर्च कर के अपना धंधा (बिजनैस) शुरू कर सकते हैं.’’

‘‘क्या कह रही हैं आप? 5 हजार रुपए में तो जहर भी नहीं मिलता, फिर हम अपना बिजनैस कैसे शुरू करेंगे?’’ हम ने अपनी भोली आंखों से सासूजी को घूरते हुए प्रश्न का गोला दाग दिया.
‘‘आप विश्वास करें. बढि़या बिजनैस बतला रही हूं.’’
‘‘बाबा बना कर बैठाने का इरादा तो नहीं है?’’
‘‘कैसी बात करते हैं दामादजी.’’
‘‘फिर इतनी कम पूंजी में क्या होगा?’’
‘‘होता है, होता है, दामादजी, जब तक मूर्ख हैं, बुद्धिमान जीवित रहेंगे,’’ उन्होंने हंसते हुए अपनी बत्तीसी दिखलाई. वह तो ठीक था कि जोर से हंसी नहीं, वरना बत्तीसी गिर जाने की संभावना थी.

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सास की बातें सुन कर पत्नी ने भी साड़ी का पल्ला मुंह के सामने से हटा दिया और बड़ी आशाभरी दृष्टि से अपनी अम्माजी को देखने लगी. हम ने जब अपनी सहमति सासूजी को दे दी तो वे कह उठीं, ‘‘एक विज्ञापन देना होगा.’’

‘‘काहे का? ये बेरोजगार हो गए, उस का?’’ पत्नी ने बीच में प्रश्न किया तो जीवन में पहली बार हमारी सासूजी पत्नी पर नाराज हो कर कहने लगीं, ‘‘तू चुप कर, बीच में टोकते नहीं.’’
उसे डांट पड़ने पर हम मन ही मन खुश हो गए. पत्नी पकौड़ों की खाली प्लेटों को उठा कर रसोई में चली गई. सासूजी ने हमें बताना शुरू किया, ‘‘इन दिनों पटवारी से ले कर कलैक्टर तक, फुटपाथियों से ले कर फाइवस्टार मालिकों को एक ही शौक चढ़ा हुआ है.’’

‘‘काहे का?’’ हम ने भोलेपन से प्रश्न किया.
‘‘लेखक बनने का.’’
‘‘तो…?’’ हम ने फिर बात आगे बढ़ाते हुए पूछा.
‘‘तुम्हें एक विज्ञापन निकालना है कि नए लेखकों, कवियों, व्यंग्यकारों की पुस्तकें निशुल्क प्रकाशित की जाएंगी, बस,’’ कह कर वे थोड़ी देर के लिए चुप हो गईं.
‘‘लेकिन सासूजी, पुस्तक छापने का खर्च तो बहुत है, मुफ्त में कैसे छोपेंगे?’’
‘‘हम कहां छाप रहे हैं?’’
‘‘फिर कौन छापेगा?’’

‘‘सच में दामादजी, तुम बड़े भोले हो, अरे हम एक प्रकाशन गु्रप शुरू करते हैं. घर में टेबलकुरसी व परदे हैं ही, कबाड़ी की दुकान से 30-40 पुस्तकें खरीद कर अलमारी में सजा दें और विज्ञापन दे दें. बस, हो गया काम.’’
‘‘लेकिन फिर लेखक पांडुलिपियां भेजेंगे तो…?’’

‘‘अरे दामादजी, जब विज्ञापन दोगे तो पांडुलिपियां तो आएंगी ही न,’’ कहतेकहते सासूजी ने एक जोर से डकार ली, पूरे कमरे में चूहे के मरने जैसी बदबू फैल गई. अभी हम ने पूरा आइडिया सुना नहीं था, मजबूरी में सुनने के लिए मजबूर थे. सासूजी ने आगे बात बढ़ाई और कहा, ‘‘विज्ञापन के बाद ही फोन आने शुरू हो जाएंगे और पूरे घर में पांडुलिपियां ही पांडुलिपियां हो जाएंगी.’’
‘‘फिर?’’
‘‘बस, आज के लिए इतना ही अभ्यास काफी है. पहले यह काम कर लो, आगे की बातें मैं बिजनैस जमने पर बताऊंगी.’’
‘‘आप को लगता है इस में प्रौफिट है?’’
‘‘फाइव हंड्रैड परसैंट,’’ सासूजी ने फिर अपनी बत्तीसी दिखा कर अपनी बात कही.

हम ने भी आज्ञाकारी दामाद की तरह विज्ञापन दे दिया, ‘निशुल्क हिंदी सेवा हेतु पुस्तकों का प्रकाशन, पांडुलिपियां आमंत्रित हैं. हिंदी लेखकों एवं जिन की आज तक कोई पुस्तक नहीं छपी, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी. आदर्श प्रकाशन, हमेशा हिंदी सेवा हेतु तत्पर,’ आगे हम ने संपर्क का पता, टैलीफोन नंबर दे दिया.

2 दिन बाद पत्नी, सासूजी और मेरी पारी लग गई. सब को एक सा रटारटाया उत्तर देतेदेते कि ‘हम निशुल्क पुस्तकें छाप रहे हैं.’ किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था. 1-2 प्रतिष्ठित प्रकाशनों से हमें धमकी भी मिली लेकिन हम तो सासूजी पर भरोसा कर के आगे बढ़ रहे थे. एक सप्ताह बीततेबीतते पोस्टऔफिस से एक ट्रक आ कर घर के सामने ठहर गया जिस में पांडुलिपियां ही पांडुलिपियां थीं. हम ने मिल कर उन लिफाफों को जमाया. कुछ को खुले में छत पर पटक दिया था. एक माह में पूरा घर रचनाओं से भर गया था.
‘अब क्या करना है,’ हम यह सोच रहे थे कि अचानक एक फोन आया. चालाक दुकानदार की तरह हमारी सासूजी ने फोन उठाया, उधर से कोई बेचारा कवि बोल रहा था. सासूजी ने मोरचा संभाल कर कहा, ‘‘देखिए भगतजी, अभी हमारी कमेटी में तय होगा कि किस कविता संग्रह को पहले छापा जाए. हां, 10 दिनों बाद फोन कर लें.’’

फोन रख कर विजयी मुसकान के साथ सासूजी ने अपनी बेटी और मुझे देख कर कहा, ‘‘यही जवाब आप को उपन्यास, कथा संग्रह, नाटक, व्यंग्य संग्रह के लेखकों को भी देना है.’’
‘‘ठीक है,’’ आज्ञाकारी शिष्यों की तरह हम दोनों ने उत्तर दिया.

अब मेरी और पत्नी की ड्यूटी लग चुकी थी. हम बराबर यही जवाब देते थे कि ‘कमेटी निर्णय लेने वाली है.’ पूरे 10 दिनों बाद अचानक सासूजी के सुर बदल गए. वे किसी को समझा रही थीं, मैं ने सुना वे कह रही थीं, ‘देखिए, मनोहरजी, हमारे पास नाटकों की 400 से अधिक पांडुलिपियां हैं, जो पहले आया वह प्रथम क्रम में छपेगा. सो, आप का अभी नंबर नहीं आ पाएगा. फिर भी यदि…’’ कह कर सासूजी ने बात बीच में रोक दी.
‘‘जी हां, सच सोचा आप ने. यदि आप निशुल्क छपवाना नहीं चाहते हैं तो आप हमें 20 हजार रुपए भेज दें, हम 10 हजार रुपए अपनी ओर से मिला कर उसे छाप देंगे. 500 प्रतियां निशुल्क दी जाएंगी. क्या कहा, आप तैयार हैं, ठीक है. आप का स्वागत है. आप डीडी हमारे प्रकाशन या चतुरानन के नाम से भेज दें, पुस्तक 10 दिनों में आप के हाथों में होगी,’’ यह कह कर उन्होंने फोन रख दिया. पलट कर हमें किसी कुटिल राजनीतिज्ञ की तरह देखा.

हम ने कहा, ‘‘सासूजी, पुस्तक तो मात्र 10 हजार में छप जाती है?’’
‘‘हम क्या फोकट में गधाहम्माली करेंगे? 10 हजार मुनाफा होना चाहिए.’’
‘‘लेकिन हम उस पुस्तक का करेंगे क्या?’’
‘‘कुछ नहीं, 500 छाप कर उसी मनोहरजी को भेज देंगे. मैं ने जिस तरह बातें की हैं उसी तरह आप भी उत्तर देना.’’
‘‘ठीक है,’’ हम कह भी नहीं पाए कि फिर टैलीफोन की घंटी बजी. इस बार कोई कथाकार था. हम ने ही मोरचा संभाला और 20 हजार की जगह 25 हजार रुपए में सौदा पक्का कर दिया. यह सब देखसुन कर सासूजी बड़ी खुश हुईं.  सासूजी ने हमें आखिरी टिप देते हुए कहा, ‘‘एक बात और बता दूं, यदि किताब नहीं छापेंगे तो भी चलेगा.’’
‘‘ऐं, क्या मतलब?’’
‘‘अरे बकवास पुस्तकें छाप कर हम हिंदी भाषा की कब्र थोड़े ही खोदेंगे.’’
‘‘फिर उस के रुपए कैसे लौटाएंगे?’’
‘‘दामादजी, आप सच में भोले हैं, अरे पुस्तक प्रकाश के एग्रीमैंट में एकदम बारीक अक्षरों में शर्त डाल देंगे कि यदि कमेटी इसे अस्वीकृत करती है तो 50 प्रतिशत राशि ही लौटाई जाएगी. इस का सीधा अर्थ है कि 10 हजार तो अपने सूखे बचेंगे,’’ सासूजी ने बुक्का फाड़ कर हंसते हुए कहा. उन की बत्तीसी बाहर निकल ही आई थी लेकिन उन्होंने उसे अंदर दबा दिया था.

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देखतेदेखते हम आज श्रेष्ठ प्रकाशकों में आ गए हैं और नौकरी की गुलामी से भी बच गए. बैंक बैलेंस भी बढ़ गया है. पूरे समाज में इज्जत बनी है. ये सब हमें लेखकों, कवियों की नादानियों से प्राप्त हुआ है. माफ करें, गलत बोल दिया, ये सब हमें अपनी सासूमां द्वारा दिए गए आइडिए के चलते प्राप्त हुआ है. आज हम परिवार के साथ बहुत खुश हैं. हम तो यही चाहते हैं कि ऐसी बुद्धिमान गार्गी की तरह सासूमां सब को मिले, धन्यवाद.

चार्वाक के वंशज

पुलिस की नजर से बचे रहने में जो महारत नटवरलाल को थी उतनी शायद ही अंडरवर्ल्ड के किसी ग्लोबल खिलाड़ी की हो. यह कला उन्होंने जासूसी उपन्यासों से सीखी थी. हालांकि वे एक बैंककर्मी हैं लेकिन चार्वाक के अनुयायी बनने के बाद कई वर्षों से बैंक की ड्यूटी पर नहीं गए हैं.

चार्वाक को गुजरे हुए करीब ढाई हजार वर्ष हो चुके. लेकिन उस के दर्शन-‘खाओपीओ मौज करो, कर्ज ले कर भी घी पीयो’ पर अमल करने वालों की हमारे युग में भी अच्छीखासी तादाद है. संभव है उस के बहुत से वंशजों ने अपने पूर्वज का नाम भी न सुना हो. संभव है उन्हें यह ज्ञात न हो कि वे किस के बताए मार्ग पर चल रहे हैं. लेकिन इतना तय है कि उन की प्रतिबद्धता को देख कर चार्वाक की आत्मा (यदि होती है) जहां भी होगी हर्षित हो रही होगी, तो आइए मिलते हैं चार्वाक के एक वंशज से…

वे हमारे एक करीबी रिश्तेदार हैं. जीवन के यही कोई 48 वसंत देखे होंगे. उन की खासीयत यह है कि अभी तक कई करोड़ रुपए का कर्ज ले कर गाय का शुद्ध देशी घी पी चुके हैं. यह कर्ज उन्हें समयसमय पर अपने मित्रों और रिश्तेदारों से रियल एस्टेट के धंधे के निवेश के नाम पर प्राप्त हुआ है. वे निवेशकों का विश्वास जीतने के लिए अपने जीरो अकाउंट वाले खाते से ली हुई रकम के बराबर का पोस्टडेटेड चैक काट कर दे डालते हैं. अब लाभ के लोभ में पूंजी निवेश करने वालों को क्या पता कि रियल में उन का रियल एस्टेट का कोई धंधा नहीं है बल्कि उन के हैंडबैग में जो बड़ेबड़े भूखंडों के कागजात रहते हैं वे आसान शर्तों पर या दूसरे शब्दों में कहें तो झांसा दे कर कर्ज प्राप्त करने के मायावी उपकरण हैं.

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अब जरा उन के बैकग्राउंड के बारे में जान लीजिए…लेकिन नहीं, इस से पहले उन की वर्तमान स्थिति के बारे में जान लेना आवश्यक है. फिलहाल उन के कुछ चार्वाक विरोधी मित्र श्रेणी के कर्ज दाताओं ने उन पर धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज करा दिया है. उन पर गैर जमानती वारंट जारी हो चुका है. पुलिस उन्हें तलाश रही है और उन्हें भूमिगत होना पड़ता है. अर्ध भूमिगत तो वे हमेशा रहते हैं लेकिन ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर उन्हें पूरी तरह भूमिगत होना पड़ता है. इस बार भी यही हुआ है. वे कहां हैं, उन के परिजनों तक को पता नहीं.

फरार होने और पुलिस की नजर से बचे रहने में उन्हें जितनी महारत हासिल है, अंडरवर्ल्ड के किसी ग्लोबल खिलाड़ी को भी शायद ही हासिल हो. यह कला उन्होंने जासूसी उपन्यासों से सीखी है. वे उन का गहन अध्ययन करते हैं और काम की चीजों को कंठस्थ कर लेते हैं. स्वयं को अपडेट रखने के लिए उन्हें जानकारी रखनी पड़ती है कि किस सीरीज का नौवेल कब आ रहा है. काउंटर पर आते ही वे उसे खरीद लेते हैं और इस से पहले कि कोई दूसरा पाठक उसे पढ़े, वे उस के एकएक शब्द को चबा डालते हैं. अरेअरे, मैं ने चार्वाक के इस होनहार वंशज का नाम तो बताया ही नहीं. खैर, जाने दीजिए, नाम में क्या रखा है. चलिए, सहूलियत के लिए उन का नाम नटवरलाल रख लेते हैं.

वे असल में एक बैंक कर्मी हैं लेकिन चार्वाक के अनुयायी बनने के बाद कई वर्षों से बैंक की ड्यूटी पर नहीं गए हैं. फिर भी पता नहीं कैसे अपनी नौकरी बचा रखी है. शुरुआती दिनों में बैंक के ही 4-5 मित्रों के साथ मिल कर उन्होंने साइड बिजनैस के रूप में जमीन की खरीदबिक्री का धंधा शुरू किया था. पहले दौर में अच्छी कमाई भी हुई थी. लेकिन बाद में उन्हें लगा कि यह काम तो वे अकेले भी कर सकते हैं, तो लाभ बंटवारा क्यों किया जाए. बस, वे एकला चलने लगे. अकेले वे ज्यादा कमाई कर रहे हैं, यह दिखलाने के लिए उन्होंने अपने रहनसहन के स्तर को सुधारा. एक बढि़या कार खरीद ली. महंगे कपड़े पहनना, महंगे होटलों में ठहरना शुरू कर दिया. उन्हें पता था कि भेष से भीख मिलती है. फटेपुराने कपड़े पहने कटोरा ले कर भीख मांगने वाले को इस महंगाई के जमाने में भी लोग 1-2 रुपया से ज्यादा नहीं देते. जबकि कार और सूटबूट वाले भिखारी की भीख की गिनती ही 1 लाख रुपए से शुरू होती है.

उन्होंने कुछ बड़ा गेम खेलने का विचार किया. इस के लिए पूंजी की जरूरत थी. उन्होंने एक चिटफंड कंपनी खोली और 1 साल में रकम दोगुनी करने के दावे के साथ अपना कारोबार शुरू किया. देखते ही देखते एक अच्छी पूंजी इकट्ठी हो गई. एक अच्छी बात यह थी कि उन के पिता एक बड़े अधिकारी थे और सब की मदद करने वाले थे. अपने अधिकांश रिश्तेदारों व पारिवारिक मित्रों को उन्होंने कठिन समय में आर्थिक मदद दी थी. इसलिए उन के परिवार के प्रति लोगों में श्रद्धा थी.

पिता के देहांत के बाद लोगों ने नटवरलाल में उन की छवि देखनी शुरू की. जासूसी उपन्यासों के अध्ययन के जरिए नटवरलाल इस तथ्य को समझ चुके थे. उन्होंने तमाम रिश्तेदारों से जमीन के धंधे के नाम पर पैसा उठाना शुरू किया. जिस की जैसी आर्थिक स्थिति थी उस के मुताबिक वसूली की. उन सब को समझाया कि बैंक में रखने से क्या मिलेगा. धंधे में लगाइए और चुटकी बजाते लाख के करोड़ बनाइए. किसी के पास आपातस्थिति के लिए भी पैसा नहीं रहने दिया. इस तरह कर्ज मिलता गया, वे घी पीते गए. कुछ भूखंडों का एग्रीमैंट भी कराया लेकिन उसे बेचने और लोगों का पैसा लौटाने की चिंता नहीं की.

किसी ने पैसा लौटाने के लिए दबाव डाला तो नया कर्ज ले कर उसे कुछ थमा दिया. धीरेधीरे रिश्तेदार कंगाल हो गए तो मित्रों पर हाथ फेरना शुरू किया. कर्जदाताओं की गिनती खत्म हो गई और रकम वापसी का दबाव बढ़ने लगा तो वे अर्ध भूमिगत रहने लगे. जिस से चाहते मिलते जिस से नहीं मिलना होता उसे कहलवा देते कि नहीं हैं. इस जीवनशैली के कारण उन्होंने बैंक जाना भी बंद कर दिया. लीव विदाउट पे रहने लगे. समय ऐसा भी आया कि तगादेदार घर पहुंच कर गालीगलौज करने लगे. घर वाले परेशान हो गए लेकिन उन की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा. वे आसपास के शहरों में ज्यादा समय बिताने लगे. बड़ी कुशलता से वे सारे तगादेदारों को झांसा दे कर मस्ती काट रहे थे. लेकिन पिछले साल एक जरा सी भूल के कारण उन्हें 2 महीने जेल में काटने पड़े थे. बड़ी मुश्किल से आपसी समझौते के बाद उन्हें जमानत मिल पाई थी.

हुआ यों कि उन्होंने एक ताकतवर महिला चिकित्सक को मैडिकल कालेज के लिए जमीन दिलवाने के नाम पर 15 लाख रुपए बतौर एडवांस प्राप्त कर लिए थे. उस जमीन का उन्होंने कुछ वर्ष पहले ऐग्रीमैंट कराया था जिस की अवधि कब की समाप्त हो चुकी थी. पता नहीं कैसे तिथि में हेरफेर कर, कैसा मायाजाल बुन कर उन्होंने यह रकम निकलवा ली. उस में से कुछ अपने खर्च के लिए रखा कुछ अपने सहयोगियों के बीच बांट दिया. महिला चिकित्सक के पिता को जानकारी मिली तो उन्होंने कागजात की जांच कराई. असलियत सामने आ गई. अब महिला चिकित्सक ने रकम वापस मांगनी शुरू की तो नटवरलाल ने पहले तो मैडम से पैसा वापस करने के लिए कभी 1 महीने का कभी 2 महीने का समय मांगा. हर बार सांत्वना दी कि एक बड़ी डील होने वाली है. एकमुश्त पैसा लौटा देंगे. इस तरह पूरे डेढ़ साल निकाल लिए.

इस बीच घर वालों का दबाव पड़ा कि फरारी जीवन छोड़ दें और बैंक की नौकरी दोबारा जौइन कर लें. अपना तबादला कहीं और करा लें. बस, यही चूक हो गई. उन्होंने दूसरे जिले के एक कसबाई ब्रांच में तबादला करा लिया. मैडम के करीबी लोगों में कई आईपीएस और आईएएस अधिकारी थे. उन के जरिए मैडम ने पता लगा लिया कि नटवरलाल ने कहां जौइन किया है. एक दिन पुलिस बैंक पहुंची और उन्हें पकड़ कर उन के गृहजिला में ले आई. काफी पैरवी हुई लेकिन जमानत नहीं मिली. जेल जाना पड़ा. बाद में यह तय हुआ कि उन्हें तत्काल 10 लाख रुपए जमा करने होंगे, बाकी रकम 10 हजार रुपए प्रतिमाह देनी होगी जो उन के वेतन से सीधा ट्रांसफर हो जाएगी.

घर वालों ने किसी तरह पैसे जुटाए और उन्हें जेल से बाहर निकाला. एक मैडम ही का मामला होता तो वे दोबारा बैंक जौइन कर सकते थे लेकिन उन के तगादेदार तो कई दर्जन थे. अब सब केस करने लगते तो? उन्होंने तय किया कि बैंक नहीं जौइन करेंगे.

चार्वाक ने इस स्थिति के संबंध में क्या निर्देश दिए हैं उन्हें पता नहीं था. इधर मैडम ने शेष तगादेदारों की आंखें खोल दीं. उन्हें समझ में आ गया कि यह एक कारगर हथियार है. उन्होंने भी केस किए लेकिन नटवरलाल ने उन्हें मैनेज कर लिया. इस बार किसी तगड़े आदमी से पाला पड़ गया होगा. तभी उन का जोर नहीं चल पाया. पुलिस उन का क्या कर लेगी. नंगे का तो बड़े से बड़ा डौन भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

नटवरलाल की मुसीबतों का एक कारण वे खुद भी हैं. वे किसी तगादेदार को यह नहीं कहते कि वे अभी पैसा लौटाने की स्थिति में नहीं हैं. कुछ महीने का समय चाहिए. बल्कि उन्हें 2 दिन बाद किसी पते पर आ कर पैसे ले जाने का न्यौता दे डालते हैं. अगला उसी के मुताबिक अपने व्यवसायिक तगादेदारों को समय दे देता. वह जेब के पैसे खर्च कर उस जगह पर पहुंचता तो नटवरलाल का कहीं पता न चलता. मोबाइल भी स्विच औफ मिलता. बेचारा थकहार कर खाली हाथ वापस लौट आता. इस तरह के 2-4 अनुभवों के बाद वह नटवरलाल को सबक सिखाने के तरीके ढूंढ़ने लगता. नटवरलाल को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता.

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अपने फरारी जीवन के बावजूद वे अपने बालबच्चों का पूरा ध्यान रखते हैं. उन की पढ़ाईलिखाई ठीकठाक चलती रहे, इस के लिए व्यवस्था करते रहते हैं. पिछली जेलयात्रा के समय उन की कार बिक गई तो उन्होंने अपने एक परिचित की नई कार इस शर्त पर ले ली कि फाइनैंसर के लोन की किस्तें वे जमा करते जाएंगे. एकडेढ़ वर्ष तक उन्होंने कोई किस्त नहीं जमा की. प्राइवेट फाइनैंसर ने गाड़ी उठवा ली. गाड़ी मालिक ने किसी तरह पैसे की व्यवस्था कर कुछ किस्तें जमा कराईं और गाड़ी छुड़ाई. उन की बुरी ख्याति इतनी फैल चुकी है कि कर्ज देने को कोई तैयार नहीं होता. अपने चार्वाक धर्म का कैसे पालन करें, यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है. अब उन का अगला कदम या अंजाम क्या होगा, वे खुद भी नहीं जानते. भूमिगत जीवन में कोई गुल खिलाएंगे या आत्मसमर्पण करेंगे, कोई नहीं जानता, आप भी नहीं.

बदलते मौसम: आदित्य की जिंदगी में क्या बदलाव आ रहे थें? -भाग 4

‘‘थैंक्यू सर, पर दिक्कत यह है कि कुछ दिनों बाद मेरी बहन की शादी है

और मुझे छुट्टी लेनी पड़ेगी,’’ रोहित ने हिचकते हुए कहा.

‘‘कोई बात नहीं, प्रोजैक्ट साल में नहीं, डेढ़ साल में खत्म हो जाएगा. चिंता मत करो और अपनी बहन की शादी में बुलाना मत भूलना. एडवांस चाहिए तो ले लेना.’’

अवाक् रोहित सिर हिलाते हुए चला गया. आज तक जितना सर के बारे में सुना था उस से कहीं ज्यादा नरम दिल और अंडरस्टैंडिंग हैं वे तो. कैसे बिना कहे दूसरों की तकलीफों को समझ लेते हैं.

तभी फिर रंजन का फोन आया. ‘‘आदित्य, मोना के पति के नाम तुम ने जो वसीयत की थी, उसे भी तो बदलना होगा न? उस के भी कागज तैयार कर लाऊं?’’

‘‘हां, सब चीजें सैटेल हो जाएं तो मुझे तसल्ली हो जाएगी. निकुंज के नाम पर भी जमीनजायदाद करनी है. आएगा तो बताता हूं.’’

पोते का जिक्र आते ही एक बार फिर से वे जिंदगी के उन टुकड़ों को बटोरने की कोशिश करने लगे जो पीछे छूट गए थे. शेफाली के जाने के बाद गौरव, मोना और निकुंज में ही वे अपनी खुशियां तलाशने लगे. तब कोई 3 साल का होगा निकुंज, गौरव काम से जयपुर गया था. रात को हाइवे पर एक ट्रक ने ऐसी टक्कर मारी कि उस की कार 3-4 बार उलटती गई. गौरव की घटनास्थल पर ही मौत हो गई. इस से ज्यादा भयानक और क्या हो सकता है कि एक पिता अपने दोनों बेटों को खो दे और जवान बहू व नन्हे पोते को धीरज बंधाने को मजबूर हो. आदित्य को ऐसा करना पड़ा. मोना के वे पिता बन गए.

गोपाल शाम की चाय टेबल पर रख गया था. गोपाल के पीछेपीछे पुराना चपरासी रघुवीर भी चला आया. ‘‘साहब, आप के लिए एक जानेमाने बाबा की भभूत और प्रसाद लाया हूं. इन्हें ले लें, शायद कुछ फर्क पड़े. वैसे भी अगर आप कहें तो मैं उन बाबा से आप को मिलवा सकता हूं. वे चेहरा देख कर बता देते हैं कि क्या होगा. न हो तो आप घर पर हवन करवा लें.’’

‘‘रघुवीर, ये बाबा, पंडित कुछ कर पाते तो क्या जो हुआ वह न होता. ये सब केवल मूर्ख बनाते हैं. तुम्हें क्या लगता है इस भभूत को लगाने या प्रसाद खाने से सब ठीक हो जाएगा. ऐसा होता तो तुम्हारी बेटी को लकवा क्यों मारता? उस के लिए तो तुम रोज ही पूजा करते हो न? इन्हें तुम बाहर ले जाओ. मेरे औफिस में इन पाखंडों की कोई जगह नहीं है.’’

चाय पीतेपीते उन्हें याद आया कि निकुंज ने आज केक ले कर आने को कहा है. औफिस से सीधे उसी के पास चले जाएंगे. वैसे भी एक हफ्ता हो गया है उसे देखे. मोना की उम्र और अकेलापन उन्हें डराता रहता है. वैसे भी इस समाज में जवान बहू ससुर के साथ अगर रहे तो कई सवाल उठ खड़े होते हैं. मोना के लाख मना करने पर भी उन्होंने उस की दूसरी शादी कर दी और निकुंज को अपने पास रख लिया.

राज समझदार लड़का था और घर में केवल मां थीं. दोनों उन से और निकुंज से मिलने आते और जब निकुंज राज से घुलमिल गया तो वे उसे अपने साथ ले गए. वे चाह कर भी न रोक पाए, एक बेटे को मां से अलग करना मुमकिन नहीं था. पर नियति तो शायद उन की परीक्षाएं लेने को आतुर थी, इसलिए तो विवाह के 8 महीने बाद राज के अचानक सीने में दर्द उठा और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उस ने दम तोड़ दिया.

मोना वापस नहीं लौटी क्योंकि वह अपनी सास को नहीं छोड़ना चाहती थी. कुछ नहीं कर सके वे. अब तो निकुंज भी 5 साल का हो गया है. अपने दादू पर जान छिड़कता है. उस के जन्मदिन पर मिलने जा रहे थे कि सड़क पर भागते एक बच्चे को बचाने के प्रयास में ड्राइवर का संतुलन बिगड़ गया और कार साइड रेलिंग से टकरा गई. वे बाहर जा गिरे और एक पत्थर से टकराने से उन की टांगों में गहरी चोट आई. ड्राइवर को एक खरोंच तक नहीं आई. 20 दिन अस्पताल में रहे.

इस बीच, दरवाजा खुला तो देखा रंजन है. उसे देख उन के होंठों पर मुसकान थिरक उठी, ‘‘आ गया, मुझे चूना लगाने. बता, कितने कागज तैयार किए हैं. पैसे ऐंठने हैं तो कैसा भागाभागा आ गया.’’

‘‘यह देख, जो तू ने राज के नाम वसीयत की थी उसे बदल कर मोना के नाम कर दिया है और भाभी के शेयर्स और ज्वैलरी भी तू मोना को देना चाहता है. बिजनैस और घर निकुंज के नाम लिखा है, पर तेरे बाद उस की गार्जियन मोना.’’

‘‘हां ठीक है,’’ आदित्य ने पेपर पर साइन करते हुए कहा.

‘‘आदित्य, मुझे आज तक समझ नहीं आया कि तू कैसे इतने सारे जख्मों को सहता आ रहा है. कभी टीस नहीं हुई? कभी हताशा नहीं उपजी मन में?

मौत कैसा तांडव करती रही है तेरी जिंदगी में.’’

‘‘कैसी हताशा, रंजन? जख्म हैं, दुख है, पर मौत से क्या हारना. उस से क्या डरना. ऐसा तो नहीं है कि जीवन में हमेशा सुख ही रहेगा. हम आखिर ऐसी गारंटी ले कर चलते ही क्यों हैं कि दुख हमारे पास फटकेगा नहीं और सुख हमेशा बांहें फैलाए खड़ा रहेगा.

‘‘वह पीपल का पेड़ देख रहे हो न. इस वक्त कैसा हराभरा है. उस के मुलायम पत्ते हवा में लहरा रहे हैं, क्योंकि अभी वह खिल रहा है, वह सुख के हिंडोले में झूल रहा है. जब मौसम बदलेगा तो इसी पेड़ के पत्ते सूख कर गिर जाएंगे. वह कितना खाली हो जाएगा. तो क्या वह जीना छोड़ देगा? नहीं न. मौसम बदलेगा तो यह फिर हराभरा हो जाएगा. यह जीवन भी ऐसा ही है, तब मौत के सामने घुटने क्यों टेकें?’’

आदित्य व्हीलचेयर पर बैठे, रंजन ने उन की चेयर को पुश करना चाहा पर उन्होंने रोक दिया. स्वयं से चलाते हुए वे केबिन के बाहर आ गए. शाम के 7 बज रहे थे. ड्राइवर को केक शौप पर गाड़ी ले जाने को कह उन्होंने निकुंज को फोन मिलाया.

‘‘नमस्ते दादू,’’ निकुंज की मासूमियत से भरी चहकती आवाज सुन उन्हें लगा कि हरियाली और साफ मौसम की खुशबू दूर से भी महसूस की जा सकती है. उन्हें लगा कि निकुंज की नन्ही बांहें नई कोंपलों की तरह उन से लिपटी हुई हैं.

बदलते मौसम: आदित्य की जिंदगी में क्या बदलाव आ रहे थें? -भाग 3

सौरभ का चले जाना उसे शरीर के साथ मानसिक तौर पर भी आघात दे गया.

इंटरकौम बजा, ‘‘सर, फ्री हों तो आ सकता हूं?’’ मि. जय थे.

‘‘आइए, मि. जय, आ जाइए.’’

‘‘सर, ये 3 कांट्रैक्ट आप की अनुपस्थिति में साइन किए गए थे. इन्हें देख लीजिए.’’

कांट्रैक्ट पर नजर डालते हुए वे बोले, ‘‘मि. जय, ध्यान रखिएगा कि कांट्रैक्ट की शर्तों का पूरा पालन हो. मुझे क्लाइंट्स से कोई शिकायत सुनने को न मिले.’’

मि. जय ने आदित्य की ओर देख सहमति में सिर हिलाया. गे्रशर्ट और ब्लैक टाई में उन का व्यक्तित्व निखर रहा था. गोल्डन फ्रेम का चश्मा उन को बहुत सूट करता है. कौन कहेगा कि उन की उम्र 55 वर्ष है. 40 से ज्यादा के नहीं लगते हैं. स्मार्टनैस और लुक इंसान के नेक विचारों से भी आते हैं. होंठों पर हमेशा मुसकान खिली रहती है और चेहरे पर एक अजीब सी शांति. उन के पास आ कर लगता मानो हर तरफ जीवन हिलोरें ले रहा हो. इतनी जीवंतता…आखिर कैसे वे दुखों के साथ यों सामान्य रह पाते हैं?

‘‘एनी थिंग ऐल्स, मि. जय? बाई द वे, आप की बेटी के लिए कोई लड़का मिला? देखिए, जल्दबाजी मत करिएगा, आप की बेटी पढ़ीलिखी है, अच्छी नौकरी कर रही है. उपयुक्त साथी ही उसे मिलना चाहिए.’’

‘‘थैंक्स, सर,’’ मि. जय इतना ही बोल पाए. जिस इंसान की खुद की जिंदगी वीरान हो वह दूसरों की हर छोटी बात याद रखे तो उस के लिए मन में सम्मान के सिवा और कुछ आ ही नहीं सकता है.

3 बज रहे थे. आदित्य को अब थोड़ी थकान महसूस होने लगी थी. ऐक्सिडेंट हुए 1 महीना हो चुका था, पर अभी डाक्टर ने चलनेफिरने से मना किया था. गोपाल की मदद से वे कमरे में रखे दीवान पर लेट गए. लेटे तो बंद आंखों ने फिर से बीती यादों को सामने ला खड़ा किया. शेफाली गुमसुम रहने लगी थी. यहां तक कि गौरव के प्रति भी उदासीन हो गई थी. कमरे में अकेले बैठी रहती. वे कहीं चलने को कहते तो वह मना कर देती. अंदर की घुटन फिट्स के रूप में बाहर आने लगी. उसे मिर्गी के दौरे पड़ने लगे. जबतब चक्कर खा कर गिर जाती. किसी चीज की सुधबुध नहीं रहती थी. हंसना तो मानो भूल गई थी. जब उसे हार्टअटैक आया तो उन के होश ही उड़ गए थे. बेटे का जाना और फिर शेफाली का लगातार बीमार रहना… बेशक वे परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने पर विश्वास नहीं करते थे, पर दर्द तो उन्हें भी होता था.

लोगों ने सलाह दी कि गौरव की शादी कर दो, बहू आ जाएगी तो शेफाली का तो मन लगा रहेगा. वे नहीं चाहते थे कि गौरव की शादी इतनी जल्दी हो. वह एमबीए कर रहा था और अभी उसे कारोबार संभालने की समझ भी नहीं थी. इस से उस की पढ़ाई पर भी असर पड़ सकता था, पर शेफाली की मनोदशा देख वे मोना को बहू बना कर ले आए. कुछ समय के लिए परिवर्तन की लहर देखी थी उन्होंने शेफाली के अंदर. मोना उस का बहुत खयाल रखती थी. उसे जबरदस्ती बाहर घुमाने ले जाती. लेकिन सब बेकार ही गया. इधर, उन का कारोबार निरंतर बढ़ रहा था इसलिए गौरव पढ़ाई छोड़ कर उन की मदद करने लगा.

यह सब सोच ही रहे थे कि उन की टांगों में दर्द महसूस हुआ. दवा का समय भी हो गया था. हिम्मत कर वे खुद व्हीलचेयर पर बैठ गए. वे तो चाहते थे कि कोई सपोर्ट ले कर वे चलें, पर डाक्टर ने ही उन्हें कुछ समय ऐसा न करने की हिदायत दी थी. गोपाल ने आ कर दवा दी और ए सी के टैंप्रेचर को धीमा किया. कमरा कुछ ज्यादा ही ठंडा हो गया था. वापस चेयर पर आ कर बैठ गए. वे सोचने लगे कि कितना पेंडिंग वर्क पड़ा है…यों लेटने से काम नहीं चलेगा.

तभी मोबाइल बजा, ‘‘आदित्य, यह मैं क्या सुन रहा हूं. अभीअभी औफिस पहुंचा तो असिस्टैंट ने बताया कि तुम वसीयत में कुछ बदलाव करना चाहते हो? कितनी बार वसीयत बदलवाते रहोगे?’’ दूसरी ओर रंजन थे. आदित्य के वकील और गहरे मित्र भी.

‘‘यार, मैं वसीयत नहीं बदलवाऊंगा तो तुम्हारी कमाई कैसे होगी?’’ दोनों के ठहाके फोन पर गूंज उठे, ‘‘शेफाली के शेयर्स भी हैं, उन्हें भी ट्रांसफर करना है. ऐसा करो, शाम को औफिस चले आओ. गप्पें भी मार लेंगे और कुछ काम भी हो जाएगा. वैसे भी सारा दिन यहांवहां घूमते रहते हो, मोबाइल तक नहीं उठाते, इस बहाने कुछ काम ही कर लोगे,’’ आदित्य ने मजाकिया अंदाज में रंजन को छेड़ा.

‘‘आता हूं, पर शाम को बढि़या सा नाश्ता मंगा कर रखना.’’

वे दोनों कालेज के जमाने के दोस्त थे, इसलिए हंसीमजाक की उन दोनों के बीच कभी कोई सीमा न रही. दोनों जब साथ बैठते हैं तो तीसरे की उपस्थिति का भी भान नहीं रहता है. शादी के बाद जब भी शेफाली उन के साथ बैठती तो कुछ देर बाद ही उठ कर चली जाती थी और रंजन को छेड़ती थी, ‘क्या भाईसाहब, आप आते हैं तो मेरा पति पराया हो जाता है. आप शादी करने की गलती मत करना, मैं तो बरदाश्त कर लेती हूं, पता नहीं आप की पत्नी करेगी या नहीं.’ पर वे बहुत पहले की बातें हैं. बेटे के सदमे और बीमारी के कारण वे इतनी चिड़चिड़ी हो गई थीं कि उसे रंजन का आना तक अखरता था, एक तो आप के पास वैसे ही टाइम नहीं रहता है, उस पर से इसे घर पर बुला लेते हो. औफिस में ही अपनी महफिल जमाया कीजिए.

बहुत दिन तक शेफाली जीवित नहीं रही थी. पोता निकुंज उस समय 6 महीने का था, जब वह उन्हें छोड़ कर चली गई. रिक्तता पसर गई थी हर ओर, पर कहते हैं न कि सांसें जब तक हैं, इंसान को जीने के लिए जद्दोजहद करनी ही पड़ती है, इसलिए वे भी एक बार फिर से उठ खड़े हुए थे. अपनी व्यस्तता बढ़ा दी थी. आज तो सुबह से कोई न कोई उन के पास आ ही रहा था. जब उन्हें पता चला कि नए लड़के रोहित की वजह से उन्हें नया टैंडर मिला है तो उन्होंने उसे बुलाया, ‘‘रोहित, हालांकि मेरा और तुम्हारा परिचय ज्यादा नहीं है, पर तुम्हारी तारीफ राजन साहब से बहुत सुन चुका हूं. मैं चाहता हूं कि तुम ही इस प्रोजैक्ट को संभालो. आज से तुम्हें प्रोजैक्ट हेड बनाया जाता है.’’

आगे पढ़ें- रोहित सिर हिलाते हुए चला गया. आज तक जितना…

बदलते मौसम: आदित्य की जिंदगी में क्या बदलाव आ रहे थें? -भाग 2

राजन साहब फाइलें ले कर आए थे और लगभग 1 घंटे तक वे दोनों उन में डूबे रहे. पिछले 1 महीने की सारी प्रोग्रैस रिपोर्ट, फाइनैंशियल स्टेटमैंट, ट्रांजैक्शंस, सब देखे. तसल्ली इस बात की थी कि उन के न होने पर भी सबकुछ ठीक ढंग से हुआ था.

‘‘राजन साहब, नो डाउट, आप का मैनेजमैंट बहुत अच्छा है. हर काम बखूबी संभाला हुआ है आप ने. जहां आप जैसे ईमानदार व भरोसेमंद लोग हों वहां कंपनी कभी घाटे में जा ही नहीं सकती,’’ आदित्य ने उन्मुक्त ढंग से उन की प्रशंसा की.

‘‘सर, यह तो आप का बड़प्पन है कि आप गलतियों को भी नजरअंदाज कर देते हैं और सामने वाले को मौका देते हैं कि वह अपनी गलती सुधार ले. वैसे भी यह सब आप के मार्गदर्शन से ही संभव हो पाया है. वैसे, अभी आप कैसा फील कर रहे हैं? कमजोर तो हो ही गए हैं आप? रिकवर होने में समय लग जाएगा. अभी आप को थोड़ा और आराम करना चाहिए था.’’

‘‘मैं ठीक हूं, राजन साहब. कमजोरी भी भर जाएगी. बाकी अब इस बात के लिए घर पर तो बैठा नहीं जा सकता है. आप तो जानते ही हैं कि काम के बिना छटपटाहट होने लगती है मुझे. और फिर घर में मन ही कहां लगता है,’’ कहतेकहते वे अचानक चुप हो गए. इस तरह से किसी के सामने वे अपनी तकलीफों व दुखों का पिटारा खोल कर बैठना पसंद नहीं करते थे, इसलिए तुरंत अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर वे बोले, ‘‘जातेजाते गोपाल को भेज दीजिएगा.’’

गोपाल को कौफी लाने को कह वे फिर काम में डूब गए.

गोपाल कौफी ले आया था.

‘‘गोपाल, तुम्हारी बेटी की पढ़ाई कैसी चल रही है? 12वीं की परीक्षा देगी न इस बार? तुम्हारे पिताजी रिटायर होने वाले होंगे, तुम किसी बात की चिंता मत करना. बेटा पढ़ाई पूरी कर लेगा तो यहीं औफिस में लगा देंगे उसे.’’

गोपाल हाथ जोड़ कर उन के सामने नतमस्तक हो गया, ‘‘साहब, आप बड़े दयालु हैं. सब की दुखतकलीफ को ले कर चिंतित रहते हैं, फिर भी न जाने क्यों…’’ कहतेकहते वह चुप हो गया. क्या बोलने जा रहा था वह, मालिक के सामने उन के ही जख्मों को छीलने की हिमाकत कर रहा था.

‘‘ठीक है गोपाल, और कुछ चाहिए होगा तो बुला लूंगा,’’ आदित्य ने ही उसे उलझन से बाहर निकाला.

आखिर गोपाल की या किसी और की गलती भी क्या है. जो भी उन्हें जानता है, वह उन के आघातों से भी परिचित है. फिल्मी जीवन में जैसे एक के बाद एक घटनाएं घटित होती हैं, ऐसी असल जिंदगी में हों तो आश्चर्य

व नियति के खेल पर अचंभा होना स्वाभाविक ही है. फैमिली फोटोग्राफ में मुसकराती उन की पत्नी शेफाली और उन के दाएंबाएं 2 मजबूत खंभों की तरह खड़े उन के बेटे. शेफाली एक आम गृहिणी, पति खुश, बच्चे खुश और कोई चाह नहीं. हमेशा खिलखिलाती रहती. वे कभी परेशान होते तो झट उन के कंधों को दबा, बिना कुछ कहे जता देती कि फिक्र मत करना, मैं सदा तुम्हारे साथ हूं. न कभी किसी चीज का उलाहना दिया न शिकायत की.

विवाह के आरंभिक दिनों में उन का कारोबार नया था. तब बहुत पैसे नहीं थे उन के पास. फिर मांबाप, भाईबहन की जिम्मेदारी थी. तब भी शेफाली ने कभी पैसों की तंगी का रोना नहीं रोया. न ही पैसा आने के बाद वह सातवें आसमान में उड़ने लगी. एक प्रवाह में बहते हुए वह हर समय खुश रहा करती थी. तब किसे पता था कि एक दिन उस के होंठों से हंसी गायब हो जाएगी.

दरवाजे पर खटखट हुई.

‘‘सर, लंचटाइम हो गया है. खाना लगा दूं?’’ गोपाल ने पूछा.

खाना खातेखाते कमरे की खिड़की के बाहर खड़े पीपल के पेड़ पर उन की नजर गई. आज सुबह से ऐसी व्यस्तता थी कि उसे देखा ही नहीं था. कैसी तो हिम्मत आती है उसे देख कर. एक भव्यता और विस्तार का एहसास देता है, मानो किसी संबल से कम न हो. कितनी अडिगता से खड़ा रहता है यह पेड़ क्योंकि जानता है कि सुखदुख तो आतेजाते रहते हैं. गरमियों में उस की छांव को लोग पसंद करते हैं तो सर्दियों में उस के पत्ते झड़ते ही लोग उस से दूर भागते हैं.

सौरभ, उन के बड़े बेटे को भी कितना पसंद था यह पेड़. जब भी आता उस के पत्तों को अवश्य सहलाता. बीते दिन उन के मानसपटल पर छाने लगे थे. उस समय 16 बरस का था वह जब अचानक उस की तबीयत बिगड़ने लगी, हमेशा गला खराब रहता. शरीर में कमजोरी रहने लगी. पहले तो सोचा कि वैसी ही मौसमी बीमारी होगी. बाजार का उलटासीधा खाते हैं बच्चे, इसलिए गले में इन्फैक्शन हो गया होगा. पर जब इन्फैक्शन लगातार बना रहा तो टैस्ट कराने पर पता चला कि उसे गले का कैंसर है. शेफाली और वे दोनों ही सकते में आ गए थे. पर वे शेफाली को समझाते, ‘चिंता क्यों करती हो, शेफाली. आजकल टैक्नोलौजी इतनी एडवांस हो गई है कि इलाज संभव है. वरना विदेश में इलाज कराएंगे. तुम हिम्मत रखो.’ इलाज तो उन्होंने बहुत कराए पर सब व्यर्थ गया. उस की मौत ने तब पहली बार उन की खुशियों पर प्रहार किया था.

बेटे की मौत का गम शेफाली के लिए बरदाश्त करना संभव न था. वे तो दिनभर काम में डूबे रहते थे, इसलिए मन लग जाता था, पर शेफाली तो जैसे काठ की हो गई थी. दिनरात बस बेटे को याद कर रोती रहती. कहती, ‘सौरभ को जाना था तो वह आया ही क्यों था. पहले की तरह पैदा होते ही मर जाता तो कम से कम प्यार तो नहीं पनपता. क्यों सपने दिखाने के बाद यों इस तरह छोड़ कर चला गया.’

आदित्य उस के दर्द से भीगे चेहरे को हथेली में थाम उसे दिलासा देने की कोशिश करते. उन के एक बेटे की मृत्यु पैदा होते ही हो गई थी क्योंकि उस के दिल में छेद था. सौरभ की पैदाइश के समय भी बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, लेकिन वह स्वस्थ पैदा हुआ था. फिर गौरव के जन्म के समय औपरेशन करना पड़ा था. शेफाली एक बेटे को खोने के बाद दोनों बेटों को ले कर बहुत ही पजैसिव हो गई थी.

आगे पढ़ें- सौरभ का चले जाना उसे शरीर के साथ…

Yeh Rishta Kya Kehlata Hai फेम पंखुरी अवस्थी पहुंची Lucknow, देखें फोटोज

स्टार प्लस (Star Plus) का बेहद पौपुलर सीरियल ये रिश्ता क्या कहलाता है (Yeh Rishta Kya Kehelata Hai) लंबे समय से दर्शकों का फेवरेट बना हुआ है और लोगों को काफी एंटरटेन भी करता है. इस सीरियल में वेदिका (Vedika) का रोल अदा करने वाली एक्ट्रेस पंखुरी अवस्थी (Pankhuri Awasthy) अपने टेलेन्ट से दर्शक का दिल जीतने में कामयाब रही थीं और कुछ समय पहले ही पंखुरी ने इस सीरियल को अल्विदा कहा था. हाल ही में पंखुरी की कुछ फोटोज सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है जिसमें वे अपने मायके लखनऊ पहुंची है.

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Tumhi dekho naa.. yeh kya ho gaya! Suit set: @ambraee_

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पंखुरी अवस्थी (Pankhuri Awasthy) ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से कुछ फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर की है जिसे देख साफ पता चल रहा है कि वे अपने मायके यानी कि लखनऊ में खूब मस्ती कर रही हैं और साथ ही वे अपने घरवालों और दोस्तों के साथ क्वालिटी टाइम बिता रही हैं. इन फोटोज में पंखुरी ने फ्रौक स्टाइल सूट के साथ व्हाइट कलर की चुन्नी पहनी हुई है.

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पंखुरी की यह फोटोज उनके घर की छत की है जिसमें वे अपने दोस्तों के साथ खूब मस्ती करती नजर आ रही हैं. इन फोटोज के कैप्शन में पंखुरी ने लिखा है कि, “Tumhi dekho naa.. yeh kya ho gaya!”. ये कैप्शन देख ऐसा लग रहा है कि पंखुरी काफी अच्छे मूड में है. पंखुरी के फैंस भी उनकी इन फोटोज को काफी प्यार दे रहे हैं और साथ ही पंखुरी की तारीफ करते हुए लाइक्स और कमेंट्स की बरसात कर रहे हैं.

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खबरों की माने तो पंखुरी अवस्थी होली का जश्म मनाने के तुरंत बाद लखनऊ के लिए रवाना हो गई थी. इन फोटोज को देख ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगी की पंखुरी अपने काम से कुछ समय का ब्रेक लेकर अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ एक अच्छा समय बिताने गईं है.

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लवली का लवली गेम : भाग 1

कानपुर (साउथ) की एसपी रवीना त्यागी को एक मुखबिर ने जो जानकारी दी थी, वह वाकई चौंकाने वाली थी. एकबारगी तो उन्हें खबर पर विश्वास ही नहीं हुआ, पर इसे अविश्सनीय समझना भी ठीक नहीं था. अत: उन्होंने फोन द्वारा तत्काल सीओ (नजीराबाद) गीतांजलि सिंह को अपने कार्यालय आने को कहा.

कुछ देर बाद ही गीतांजलि सिंह एसपी (साउथ) रवीना त्यागी के कार्यालय पहुंच गईं. रवीना त्यागी ने गीतांजलि की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘गीतांजलि, नजीराबाद थाना क्षेत्र के लाजपत नगर के मकान नंबर 120/18 में हाईप्रोफाइल सैक्स रैकेट चलने की जानकारी मुझे मिली है.

रैकेट की संचालिका लवली चक्रवर्ती उर्फ बरखा मिश्रा है, जो सामाजिक संस्था की आड़ में यह धंधा करती है. यह भी पता चला है कि नजीराबाद थाना और चौकी के कुछ पुलिसकर्मी भी कालगर्ल्स को संरक्षण दे कर उन की मदद कर रहे हैं. आप इस मामले में जल्द से जल्द काररवाई करो. इस बात का खयाल रखना कि यह खबर लीक न हो.’’

आगे की काररवाई के लिए एसपी (साउथ) रवीना त्यागी ने एक टीम का भी गठन कर दिया. टीम में सीओ (नजीराबाद) गीतांजलि सिंह, सीओ (बाबूपुरवा) मनोज कुमार अग्रवाल, इंसपेक्टर मनोज रघुवंशी, महिला थानाप्रभारी अर्चना गौतम, महिला सिपाही कविता, पूजा, सरिता आदि को शामिल किया गया.

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24 नवंबर, 2019 की रात 8 बजे पुलिस टीम लाजपत नगर पहुंची और मकान नंबर 120/18 का दरवाजा खटखटाया. चंद मिनट बाद एक खूबसूरत महिला ने दरवाजा खोला. सामने पुलिस को देख कर वह बोली, ‘‘कहिए, आप लोगों का कैसे आना हुआ?’’

‘‘क्या आप का नाम लवली उर्फ बरखा मिश्रा है?’’ सीओ गीतांजलि सिंह ने पूछा.

‘‘जी हां, कहिए क्या बात है?’’ वह महिला बोली.

‘‘मैडम, पता चला है कि इस मकान में जिस्मफरोशी का धंधा चल रहा है.’’ सीओ गीतांजलि ने कहा.

यह सुन कर भी लवली उर्फ बरखा मिश्रा न डरी और न सहमी, बल्कि वह मुसकरा कर बोली, ‘‘आप जिस लवली या बरखा की तलाश में आई हैं, मैं वह नहीं हूं. मैं तो समाजसेविका हूं. भ्रष्टाचार निरोधक कमेटी की मैं वाइस प्रेसीडेंट हूं.’’ कहते हुए उस ने कमेटी का परिचयपत्र सीओ को दिखाया.

लवली उर्फ बरखा मिश्रा ने सीओ साहिबा को झांसे में लेने की पूरी कोशिश की लेकिन वह उस के दबाव में नहीं आईं. साथ आए पुलिसकर्मियों को साथ ले कर मकान के अंदर पहुंचीं तो वहां का नजारा कुछ और था.

पहले ही कमरे में एक युवक एक युवती के साथ आपत्तिजनक स्थिति में था. दूसरे कमरे में 3 अन्य युवतियां सजीसंवरी बैठी थीं. वे या तो ग्राहकों के इंतजार में थीं या फिर किसी होटल में ग्राहकों के लिए जाने वाली थीं.

सीओ गीतांजलि सिंह ने महिला पुलिसकर्मियों के सहयोग से संचालिका लवली उर्फ बरखा मिश्रा सहित चारों युवतियों को कस्टडी में ले लिया. जबकि इंसपेक्टर मनोज रघुवंशी ने युवक को दबोच लिया.

पुलिस ने फ्लैट की तलाशी ली तो वहां से 50 हजार रुपए नकद, शक्तिवर्द्धक दवाएं, कंडोम तथा अन्य आपत्तिजनक वस्तुएं बरामद हुईं. संचालिका बरखा मिश्रा के पास से प्रैस कार्ड, भ्रष्टाचार निरोधक कमेटी का कार्ड तथा आधार कार्ड व पैन कार्ड बरामद हुए. पुलिस बरामद सामान के साथ हिरासत में लिए गए युवक व युवतियों को थाना नजीराबाद ले आई.

सेक्स रैकेट का भंडाफोड़ होने की जानकारी मिलने पर एसएसपी अनंतदेव तिवारी तथा एसपी (साउथ) रवीना त्यागी भी नजीराबाद आ गईं. पुलिस अधिकारियों के समक्ष जब आरोपियों से पूछताछ की गई तो चौंकाने वाली जानकारी मिली.

देह व्यापार में लिप्त युवतियों में से एक ने अपना नाम सविता उर्फ विनीता, निवासी आर्यनगर, थाना स्वरूपनगर कानपुर बताया. दूसरी युवती ने अपना नाम नीतू चौधरी, मूल निवासी अमृतसर, पंजाब और वर्तमान पता दिल्ली बताया. तीसरी युवती ने अपना नाम पूजा कर्मकार निवासी करनाल (हरियाणा) बताया. चौथी युवती ने अपना नाम प्रीति आचार्य, मूल निवासी कोलकाता तथा वर्तमान पता लक्ष्मी नगर, दिल्ली बताया.

संचालिका लवली चक्रवर्ती उर्फ बरख मिश्रा ने अपना मूल निवास 14-बी, मधुर मिलन, ए-2 खार, मुंबई तथा वर्तमान पता 120/18 लाजपत नगर, नजीराबाद, कानपुर बताया.

अय्याशी करते पकड़े गए युवक ने अपना नाम सलमान, निवासी आजाद पार्क, चकेरी कानपुर नगर बताया. चमड़े का व्यवसाय करने वाले सलमान को रिहा कराने के लिए कई व्यापारियों, नेताओं व रसूखदार लोगों ने अपने स्तर से पुलिस अधिकारियों पर दबाव बनाया लेकिन वे नाकाम रहे. संचालिका लवली उर्फ बरखा मिश्रा भी देर रात तक मामले को निपटाने की डील करती रही लेकिन मामला वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में था,इसलिए यह डील नहीं हो सकी.

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गीतांजलि सिंह ने हिरासत में ली गई सविता उर्फ विनीता, नीतू चौधरी, पूजा कर्मकार, प्रीति आचार्य, लवली उर्फ बरखा मिश्रा तथा सलमान के विरुद्ध अनैतिक देह व्यापार अधिनियम 1956 की धारा 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. एसीपी ने इस केस की जांच सीओ (बाबूपुरवा) मनोज कुमार अग्रवाल को सौंप दी. सीओ मनोज कुमार ने आरोपियों से पूछताछ की तो सनसनीखेज कहानी प्रकाश में आई.

सेक्स रैकेट की संचालिका लवली उर्फ बरखा मिश्रा व अन्य आरोपियों के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो चौंकाने वाली बातें उजागर हुईं. बरखा मिश्रा का पूरा नेटवर्क औनलाइन चल रहा था.

उस ने कई वेबसाइट पर युवतियों की फोटो व मोबाइल नंबर अपलोड किए थे, जिन के जरिए ग्राहक संपर्क करते थे. यही नहीं, वाट्सऐप, फेसबुक के जरिए भी ग्राहकों को युवतियों की फोटो व मैसेज भेज कर संपर्क किया जाता था.

कानपुर नगर ही नहीं दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, बनारस, दिल्ली व मुंबई के दलालों के जरिए वह ग्राहकों की डिमांड पर रशियन व नेपाली युवतियों को भी मंगाती थी.

जिस के लिए वह युवतियों को अच्छाखासा पैसा चुकाती थी. बरखा को संरक्षण देने में कुछ मीडियाकर्मी, रसूखदार व प्रशासनिक अधिकारी भी लिप्त थे. समाजसेवा का लबादा ओढ़े कुछ सफेदपोश भी बरखा मिश्रा को संरक्षण देते थे तथा खुद भी रंगरलियां मनाते थे.

सेक्स रैकेट की संचालिका लवली उर्फ बरखा मिश्रा बचपन से ही बेहद खूबसूरत थी. साधारण परिवार में पली बरखा ने जब जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो उस के रूप में निखार आ गया. जब वह बनसंवर कर कालेज जाती तो मनचले युवक उस पर फब्तियां कसते. उस ने उन में से कुछ बौयफ्रैंड बना लिए थे, जो कालेज के छात्र थे. वह उन के साथ घूमतीफिरती और मौजमस्ती करती थी.

बरखा के जवान होने पर मांबाप ने उस की शादी कर दी. ससुराल में बरखा कुछ समय तक तो बहू बन कर रही, उस के बाद वह खुलने लगी. दरअसल बरखा ने जैसे सजीले युवक से शादी का सपना देखा था, उस का पति वैसा नहीं था. उस का पति दुकानदार था और उस की सीमित आमदनी थी. वह न तो पति से खुश थी और न उस की आमदनी से उस की जरूरतें पूरी होती थीं. जिस से घर में आए दिन कलह होने लगी.

पति चाहता था कि बरखा मर्यादा में रहे और देहरी न लांघे. लेकिन बरखा को बंधन मंजूर नहीं था. वह तो चंचल हिरणी की तरह विचरण करना चाहती थी. उसे घर का चूल्हाचौका और कठोर बंधन में रहना पसंद नहीं था. बस इन्हीं सब बातों को ले कर पति व बरखा के बीच झगड़ा बढ़ने लगा.

पति का साथ छोड़ने के बाद बरखा मिश्रा कौशलपुरी में किराए पर रहने लगी. वह पढ़ीलिखी व खूबसूरत थी. उसे विश्वास था कि जल्द ही उसे कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी और उस का जीवनयावन मजे से होने लगेगा.

इसी दिशा में उस ने कदम बढ़ाया और नौकरी की तलाश में जुट गई. वह जहां भी नौकरी के लिए जाती, वहां उसे नौकरी तो नहीं मिलती, लेकिन उस के शरीर को पाने की चाहत जरूर दिखती. उस ने सोचा कि जब शरीर ही बेचना है तो वह नौकरी क्यों करे.

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वह खूबसूरत और जवान थी. उसे ग्राहकों की कोई कमी की. शुरूशुरू में तो उसे इस धंधे में झिझक हुई, लेकिन कुछ समय बाद वह खुल गई. उस ने अपने जाल में कई लड़कियां फंसा लीं और सैक्स रैकेट चलाने लगी.

इस धंधे से उसे आमदनी होने लगी तो उस ने अपना कद और दायरा भी बढ़ा लिया. अब वह किराए पर फ्लैट लेती और नई उम्र की लड़कियों को सब्जबाग दिखा कर अपने जाल में फंसाती और देह धंधे में उतार देती. वह स्कूलकालेज की ऐसी लड़कियों को ज्यादा फंसाती थी, जो अभावों की जिंदगी गुजार रही होतीं.

बरखा खूबसूरत होने के साथसाथ मृदुभाषी भी थी. अपनी भाषाशैली से वह सामने वाले को जल्द प्रभावित कर लेती थी. इसी का फायदा उठा कर उस ने समाजसेवी नेताओं, मीडिया वालों व पुलिसकर्मियों तथा प्रशासनिक अधिकारियों से मधुर संबंध बना लिए. इन्हीं की मदद से वह बड़े मंच साझा करने लगी. पुलिस थानों में पंचायत करने लगी तथा शासनप्रशासन के कार्यों में भी दखल देने लगी. यही नहीं उस ने एक मीडियाकर्मी को ब्लैकमेल कर उस से प्रैस कार्ड भी बनवा लिया था. साथ ही कई सामाजिक संस्थाओं में पद भी हासिल कर लिए थे.

लवली उर्फ बरखा मिश्रा को देहव्यापार से कमाई हुई तो उस ने अपना दायरा और अधिक बढ़ा लिया. दिल्ली, मुंबई, आगरा व बनारस के कई बड़े दलालों से उस का संपर्क बन गया.

इन्हीं दलालों की मार्फत वह लड़कियों को शहर के बाहर भेजने लगी तथा डिमांड पर दलालों के जरिए विदेशी लड़कियों को शहर में बुला लेती थी.

रशियन व नेपाली बालाओं की उस के यहां ज्यादा डिमांड रहती थी. ये बालाएं हवाईजहाज से आतीं फिर हफ्ता भर रुक कर वापस चली जाती थीं. बरखा के अड्डे पर 5 से 50 हजार रुपए तक लड़की बुक होती थी. होटल व खानपान का खर्च अलग से.

बरखा मिश्रा देह व्यापार का पूरा नेटवर्क औनलाइन चलाने लगी थी. वाट्सऐप ग्रुप के अलावा उस ने लोकांटो नाम की एक वेबसाइट भी बना रखी थी. वेबसाइट पर उस ने अपने नंबर का प्रचार करते हुए लड़कियों की सप्लाई का विज्ञापन डाल रखा था. वहीं वाट्सऐप पर कई दलालों के अलावा कालगर्ल्स को भी जोड़ रखा था. वहां वे फोटो और लड़कियों की डिटेल्स क्लायंट को भेजी जाती थी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

चुनाव हारने के बाद

‘मैं ने पहले ही कहा था, चुनाव मत लड़ो, मत लड़ो, लेकिन आप मानते कहां हैं. आप ने तो सलाह नहीं मानने की कसम खा रखी है. 5 लाख रुपए पानी में बह गए. रुपया कीमती होता जा रहा है. भले ही डौलर के मुकाबले उस की साख गिरतीबढ़ती जा रही है. इसे देश का वित्तमंत्री जाने. हमारे लिए तो रुपए की
साख बनी हुई है. इतने रुपयों में बेटी के लिए अच्छेखासे गहने आ जाते.

ऊपर छत पर गुड्डा के लिए एक कमरा निकल आता. उस की पढ़ाई के लिए अलग से व्यवस्था होती. बाउंड्रीवाल की मरम्मत हो जाती. अबतब गिरने को है. चीन की दीवार तो है नहीं जो राष्ट्रीय धरोहर बन जाए. एक नई कार आ कर दरवाजे पर खड़ी हो जाती. पुरानी की बिदाई कर देते. ऐसा कुछ नहीं हो सका. आप के ऊपर चुनाव लड़ने का भूत सवार था. भभूत लगा कर बन गए दीवाने. इज्जत गई सो अलग. 5 लाख में 5 हजार भी नहीं बटोर सके. पूरा घरपरिवार हलकान रहा सो अलग.’ इतना कह कर वह शांत नहीं हुई. कौलबेल की घंटी बजी. वह दरवाजे की ओर बढ़ चली. दूध वाला आया था. मुझे राहत मिली. अब कुछ बोलने की मेरी पारी थी.

मैं ने बचाव की मुद्रा में कहा, ‘5 हजार में 55 कम थे. इस से क्या फर्क पड़ता है. चुनाव लड़ कर हमारी इज्जत बढ़ी है. हमारे लोकतंत्र को 65 वर्ष पूरे हो गए. 1952 से लगातार चुनाव हो रहे हैं. हमारे और तुम्हारे खानदान को मिला कर, मैं पहला व्यक्ति हूं जिस ने चुनाव लड़ा. खानदान में पहली

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बार चुनाव लड़ने का मजा कुछ और ही है. मेरा नाम तो सुर्खियों में है. हारे हुए और जीते हुए उम्मीदवार के बीच मेरी चर्चा लगातार हो रही है. यह भी एक बड़ी उपलब्धि है. तमाम अखबारों में मेरा जिक्र है. वरना हारे हुए कैंडिटेट को पूछता कौन है. वह तो हारते ही रद्दी की टोकरी में चला जाता है.’
पत्नी ध्यान से सुनती रही. मेरी बात खत्म होते ही वह खिलखिला कर हंसी. फिर सीरियस हो कर बोली, ‘हारने वाले की इतनी चर्चा क्यों है?’

मैं ने कहा, ‘जीतने वाला सिर्फ 1500 वोटों से जीता. हर चक्र में आगेपीछे का खेल चलता रहा. उम्मीदवारों के हृदय की धड़कन कमज्यादा होती रही. पीएम इन वेटिंग का जादू भी नहीं चला. 1000 वोट नोटा में चले गए. इस प्रकार मेरे वोट निर्णायक सिद्ध हुए. कोई कहता है मैं ने हारने वाले के वोट काटे. मैं चुनाव नहीं लड़ता तो हारने वाले को जीत मिलती. उस की जीत भी गई और मंत्री बनने की लालसा अधूरी रह गई. लालबत्ती का सुख दरवाजे तक आ कर लौट गया. जीतने वाला प्रत्याशी तो मेरा मुंह मीठा कर गया. अब समझीं, मेरी भूमिका कैसे निर्णायक रही. इसीलिए अखबारों की चर्चा में मैं बराबर बना हुआ हूं. मुझे मिले वोटों ने कमाल किया है, कमाल.’

पत्नी मेरे तर्कों से संतुष्ट नहीं हुई. चेहरे पर गुस्से के हावभाव दिख रहे थे. तुनक कर बोली, ‘आग लगे आप की ऐसी भूमिका और चर्चा को. जिस के लिए 5 लाख गंवाने पड़े. लाख दो लाख चले जाते तो कोई और बात होती. कमरतोड़ महंगाई के जमाने में इतनी बड़ी रकम खर्च कर अखबारों में बने रहना मुझे पसंद नहीं आया. मेरे भाइयों को बुलवा लिया. वे दोनों अपनाअपना कारोबार छोड़ कर दौड़े चले आए. पिताजी भी दामाद की मदद के लिए आ धमके. मैं कहती रह गई. आप की तबीयत ठीक नहीं. लेकिन मेरी कहां चलती है. कहने लगे, दामाद चुनाव लड़ रहा है. मैं यहां कैसे रह सकता हूं. दुनिया क्या कहेगी. जितना बन पड़ेगा, मदद करूंगा. मेरी सेहत अभी जनसंपर्क के लायक बनी हुई है.

‘दौड़धूप के बाद बीमार पड़ गए. अब मैं उन की सेवाचाकरी में हूं. आप को अखबारों की सुर्खियों से फुरसत नहीं,’ भड़ास निकालने के बाद पत्नी स्थिर हुई. आहिस्ते से बोली, ‘हमारे पास बेईमानी की कमाई तो है नहीं. मुझे तो रातदिन 5 लाख के सपने आते हैं. अभी भले लोगों के चुनाव लड़ने का समय नहीं आया है. मेरी समझ में तो यह भी नहीं आता कि अखबारी चर्चा से आप को क्या फायदा होने वाला है?’
मैं ने शतरंज के माहिर खिलाड़ी की तरह राजा को मात देने वाली मुद्रा में कहा, ‘अखबारी चर्चा के फायदे इतनी आसानी से समझ में आने वाले नहीं हैं. यह दूर की कौड़ी है. चुनाव लड़ने से मुझे जो लोकप्रियता मिली है, वह तो 20 साल से दुकानदारी करते हुए भी नहीं मिली. अभी तक मैं महल्ले का था. अब पूरा शहर जान गया है. यह जानपहचान मेरे कारोबार में काम आएगी. हो सकता है, इसी पहचान के सहारे मैं अपनी दुकानदारी बढ़ा सकूं. अब तो यह तय हो चुका है कि मैं खास दम रखता हूं. तभी तो कहावत बनी है, ‘दमादम मस्त कलंदर.’ मेरी हैसियत पांचहजारी तो हो चुकी है. तुम्हें मालूम है, आज कई ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपनी राजनीति पार्षद बन कर शुरू की. कोई पार्षद से मेयर बना, कोई विधायक बना, फिर मंत्री और एक दिन मुख्यमंत्री. शायद मेरी किस्मत में भी ऐसा ही योग हो.’

पत्नी बड़े ही मनोयोग से सुन रही थी. उसे सुनाने के लिए यह अनुकूल समय था.

मैं ने आगे कहा, ‘1 साल बाद नगर पालिका के चुनाव होने वाले हैं. संभव है, कोई पार्टी टिकट दे कर मुझे अपना उम्मीदवार बना दे. सफर की शुरुआत ऐसे ही होती है. गुमनाम उम्मीदवार चुनाव जीत रहा है. आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के चुनाव में तहलका मचा दिया है. शायद राजनीति में ईमानदारी का सिक्का चलन में लौट आया है. समझ लो, मेरे लिए यह चुनाव आने वाले कल की तैयारी थी,’ इतना कह कर मैं पत्नी की प्रतिक्रिया जानने को उत्सुक हो उठा.

पत्नी जवाब देने के लिए अपने भीतर से तैयार बैठी थी. वह तुरंत बोली, ‘आप ने तो भाषण देने की अभी से अच्छी प्रैक्टिस कर ली है. मुझे सुनने की प्रैक्टिस करनी होगी. तभी बात बनेगी. आप के विचार अच्छे हैं. अच्छे लोगों को घर से बाहर निकल कर राजनीति में आना चाहिए. लेकिन राजनीति में बेईमानी का बोलबाला जरूरत से ज्यादा है. झूठ पर सच का मुलम्मा चढ़ाया जाता है. तब आप अपनी ईमानदारी के बल पर, कैसे आगे बढ़ोगे और टिके रहोगे, यही तो यक्ष प्रश्न है.’

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इतना कह कर पत्नी मुसकराए बिना नहीं रह सकी.
मैं तुरंत मुसकरा नहीं सका. अपनी ईमानदारी पर हमला होते देख रहा था.
मुझे कबीरदास याद आए, जिन्होंने सैकड़ों साल पहले कहा था :
कबिरा कलियुग कठिन है,
साधु न मानै कोय.
कामी, क्रोधी मसखरा,
तिन को आदर होय.
समय अभी भी नहीं बदला है.

हाय! हाय! हम कहां से लाएं दस्तावेज

(एनआरसी, सीएए और एनपीआर से संकट में किन्नर समाज) 

दिल्ली में शंकर रोड की लालबत्ती पर जब कारें रुकती हैं, एक किन्नर कारों के शीशे खटका कर पैसा मांगता दिखता है. साड़ी-बिन्दी-चूड़ी में वह किन्नर हमेशा उसी चौराहे पर दिखता है. हर बार जब तक ट्रेफिक सिग्नल लाल रहता है, वह चार-छह गाड़ियों से पन्द्रह-बीस रुपया इकट्ठा कर ही लेता है और बदले में देने वाले के सिर पर हाथ फेर कर खुश रहने का आशीर्वाद देता है.

उस रोज मैंने अपनी गाड़ी सड़क किनारे पार्क के पास रोक दी. हरी बत्ती होते ही चौराहे का ट्रैफिक चल पड़ा और वह किन्नर अपनी साड़ी संभालता जल्दी से फुटपाथ पर चढ़ गया. मैंने गाड़ी से बाहर आकर इशारे से उसे बुलाया तो कुछ खास मिलने की हसरत में वह लपकता हुआ चला आया. मैंने पचास का नोट पर्स से निकाल कर उसके हाथ पर रख दिया. वह खुशी-खुशी मेरे सिर पर हाथ फेर कर बोला – खुश रहो, जोड़ी बनी रहे….

मैंने पूछा, ‘क्या नाम है?’

‘मुन्नी…’

‘दिन भर में कितना कमा लेती हो?’

‘यही सौ-दो सौ…’

‘कहां रहती हो?’

‘बड़े पार्क के कोने पर …’

‘इस चौराहे पर हमेशा तुम ही दिखती हो, कोई और नहीं…?’

‘यह मेरा इलाका, इसीलिए मैं ही दिखती… हमारे में इलाके बंटे हैं… दूसरा नहीं आता मेरे में…’

‘पढ़ी-लिखी हो?’

‘नहीं…’

‘एनआरसी और सीएए के बारे में सुना हैे?’

‘नहीं… क्या है ये?’

‘सरकार सबूत मांगने वाली है तुम्हारे हिन्दुस्तानी होने का… दस्तावेज मांगेगी… मां-बाप का पता ठिकाना मांगेगी… तब रहने देगी यहां… कुछ है तुम्हारे पास?’

‘सबूत…?’ आश्चर्य से उसकी आंखें चौड़ी हो गयीं. ‘मेरे पास कोई सबूत नहीं है… मां-बाप की तो शक्ल ही नहीं देखी…’

‘दिल्ली की ही हो?’

‘अब कहां पैदा हुए यह तो नहीं जानते… अपने गुरूभाई के साथ रहते हैं यहां… वह भी मेरे जैसा है…. अगले चौराहे पर भीख मांगता है…’

‘उसको तो पता होगा… सबूत होगा…’

‘नहीं… उसके पास भी कोई सबूत नहीं… कीड़े पड़े सरकार को जो हमसे सबूत मांगे… हाय, हाय, हम कहां से लाएंगे कोई सबूत…?’

लालबत्ती होते ही वह पल्लू संभालते ताली पीटते फिर चौराहे पर रुकती कारों की तरफ भागा. पेट की आग बुझाने के लिए इस तरह चौराहों पर भीख मांगते देश भर में मुन्नी जैसे लाखों किन्नर हैं, जो इसी देश के नागरिक हैं, इसी मिट्टी में पैदा हुए हैं, उनके पुरखे भी सदियों से भारत-भूमि पर रहते आये हैं, मगर इनके पास अपनी आइडेंटिटी प्रूफ करने का कोई दस्तावेज नहीं है. इनको तो पैदा होते ही मां-बाप ने बदनामी के डर से घर से बाहर फेंक  दिया. इनको नहीं मालूम कि ये कब और कहां पैदा हुए. इनका घर कहां है. इनके मां-बाप कौन हैं. ये भारत के नागरिक हैं यह साबित करने के लिए इनके पास कोई दस्तावेज नहीं है. कोई राशन कार्ड, वोटर कार्ड, आधार कार्ड, बर्थ सर्टिफिकेट, ड्राइविंग लाइसेंस, रेजिडेंस एड्रेस प्रूफ कुछ भी नहीं है, फिर भी हैं तो वे भारत के नागरिक ही. जिस मिट्टी में जन्में हैं उसी मिट्टी में मिलना चाहते हैं. कुत्ते-बिल्ली भी मरते दम तक अपना इलाका नहीं छोड़ते, उन्हें पकड़ कर कहीं और डाल आएं तो ढूंढते-ढूंढते वापस आ जाते हैं, फिर ये तो इन्सान हैं, अपनी जमीन से उखड़ कर कहां जाएंगे, कैसे जिएंगे, लेकिन मोदी सरकार को कागज चाहिए, नागरिकता सिद्ध करने वाले कागज. कागज न दिखाए तो वह गरीब, असहाय, निरीह, निरक्षर जनता के पैरों के नीचे से जमीन खींच लेगी. अमित शाह डंके की चोट पर कहते हैं कि एनआरसी होकर रहेगा, सीएए आकर रहेगा.

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असम में एनआरसी हुआ और 2000 किन्नरों से उनकी नागरिकता का अधिकार छीन लिया गया. असम में तैयार नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस (एनआरसी) में ट्रांसजेंडर समुदाय के दो हजार से ज्यादा लोगों के नाम दस्तावेजों की कमी के चलते  एनआरसी में शामिल नहीं हुआ. इन लोगों को न तो इनके मां-बाप का कुछ पता है, न घर का. इनके परिवारों ने तो इनके जन्म लेते ही इनसे नाता तोड़ लिया है, फिर कहां से लाएंगे ये अपने घर-परिवार का सबूत, अपने जन्म का सबूत, अपने हिन्दुस्तानी होने का सबूत?

असम देश का पहला राज्य है, जहां सीटिजन रजिस्टर लागू किया गया है. असम की पहली ट्रांसजेंडर जज स्वाती विधान बरुआ ने केन्द्र सरकार के इस क्रूर और अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को लेकर स्वाति विधान बरुआ की याचिका में कहा गया है कि एनआरसी में ‘अन्य’ का कॉलम नहीं दिया गया है. इसका मतलब साफ है कि ट्रांसजेंडर को पुरुष या महिला के रूप में अपना जेंडर बताना होगा, जो कि सम्भव नहीं है. इसके अलावा ज्यादातर ट्रांसजेंडर ऐसे हैं जिन्हें उनके घर वालों ने पैदा होते ही छोड़ दिया है और उनके पास 1971 से पहले का कोई दस्तावेज नहीं है, जो कि एनआरसी के लिए जरूरी बताया गया है.

बरुआ के मुुताबिक ट्रांसजेंडर समुदाय में मतदान की संख्या भी इसलिए कम रहती है क्योंकि इन लोगों के पास वोटर आईडी कार्ड तक नहीं हैं. ये देश के नागरिक होते हुए भी अपने मत का प्रयोग नहीं कर सकते हैं. वहीं सरकार द्वारा वोटर आईडी में जेंडर ऑप्शन भी नहीं बदले गये हैं. बरुआ ने कहा ‘मैं खुद थर्ड जेंडर ऑप्शन के तहत मतदान करना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं कर सकी. मुझ पर पुरुष श्रेणी के तहत मताधिकार का इस्तेमाल करने का दबाव बनाया गया. मैंने मुख्य चुनाव अधिकारी से भी संपर्क किया ताकि जेंडर सम्बन्धी मेरे कागजात सही हो जाएं, लेकिन मुझसे चुनाव के बाद आने के लिए कहा गया.’

जज स्वाति विधान बरुआ की याचिका पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने असम में अंतिम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से लगभग दो हजार ट्रांसजेंडरों को बाहर करने के केन्द्र और राज्य सरकार के फैसले पर दोनों सरकारों से जवाब मांगा है. मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने ट्रांसजेंडर जज स्वाती विधान बरुआ द्वारा दायर जनहित याचिका पर केन्द्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है.

गौरतलब है कि असम में एनआरसी की आखिरी लिस्ट पिछले साल अगस्त में आयी थी. इससे करीब 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया था, जिसमें 2000 ट्रांसजेंडर भी हैं. अब इन तमाम लोगों की उम्मीदें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं. जज स्वाति विधान बरुआ आल असम ट्रांसजेंडर एसोसिएशन (एएटीए) की संस्थापक भी हैं और असम की पहली ट्रांसजेंडर जज भी, वह कहती हैं, ‘एनआरसी से बाहर होने की वजह से ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों में आतंक पैदा हो गया है. यह लोग अब इस डर से सड़कों पर नहीं निकल रहे हैं कि कहीं सरकारी अधिकारी उनको पकड़ कर विदेशी घोषित करते हुए डिटेंशन सेंटर में ना भेज दें. बीते 31 अगस्त को एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद ट्रंसजेंडर समुदाय के लोग पकड़े जाने के डर से पत्रकारों से भी बातचीत नहीं कर रहे हैं. यह लोग बेहद आतंकित हैं.’

बरुआ आगे कहती हैं, ‘भीख मांगना ही आज इस तबके के लोगों का प्रमुख पेशा है, लेकिन अब डर की वजह से जब यह लोग सड़कों पर नहीं निकल रहे हैं तो इनके भूखों मरने की नौबत आ गयी है. जो लोग नाचना-गाना जानते हैं, वह महज शादी-ब्याह या बच्चे होने पर ही वहां नाच-गा कर बख्शीश वसूल रहे हैं.’ जज स्वाति आक्रोशित हैं और आरोप लगाती हैं कि किन्नर समुदाय के लोगों को पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और दूसरे कागजात मुहैया कराने की जिम्मेदारी राज्य सामाजिक कल्याण बोर्ड की थी, लेकिन उसने अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं की है.

एसोसिएशन के दस्तावेजों के मुताबिक राज्य में वर्ष 2011 में जहां ट्रांसजेंडरों की तादाद 11,374 थी, वहीं अब यह बढ़ कर 20 हजार तक पहुंच गयी है, लेकिन महज दो सौ ट्रांसजेंडरों के ही अपने घरवालों से संपर्क है, बाकियों को अपने घर-परिवार का कुछ पता नहीं है.

राजधानी गुवाहाटी निवासी एक ट्रांसजेंडर जोआना कहती हैं, ‘मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि परिवार के साथ मेरे रिश्ते कायम हैं, इसलिए एनआरसी की सुनवाई के दौरान नागरिकता सम्बन्धी दस्तावेज पेश करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन जिन लोगों के घरवालों ने उनसे नाता तोड़ लिया है, या पैदा होते ही उन्हें सड़क के किनारे फेंक दिया, या जिन्हें किन्नर समुदाय के लोग अपने साथ ले गये, उनके लिए तो अपनी नागरिकता साबित कर पाना असम्भव है.

भारतीय समाज, कानून और थर्ड जेंडर

भारत भौगोलिक रूप से एक विशाल देश है. क्षेत्रफल के हिसाब से भारत विश्व में सातवें स्थान पर है, जबकि जनसंख्या के आधार पर भारत का विश्व में दूसरा स्थान है. भारत की जनसंख्या सन् 2011 की जनगणना के अनुसार 121 करोड़ है. इसमें पुरुषों की संख्या 62,37,24,248 और महिलाओं की संख्या 58,64,69,174 है. भारत में लिंगानुपात 943 है अर्थात 1000 पुरुषों पर 943 महिलाएं हैं.

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 79.80 प्रतिशत हिन्दू, 14.23 प्रतिशत मुस्लिम, 2.3 प्रतिशत ईसाई, 1.72 प्रतिशत सिख, 0.70 प्रतिशत बौद्ध, 0.37 प्रतिशत जैन और 0.66 प्रतिशत अन्य निवास करते हैं. भारतीय सामाजिक संरचना में एक वर्ग और है जिसे किन्नरों के नाम से जाना जाता है, जो सामाजिक असमानता या भेदभाव से सर्वाधिक पीड़ित है. इसे तृतीय लिंग या थर्ड जेंडर के तहत रखा गया है. इस लिंग के साथ असमानता समाज में चरम पर है. किन्नरों के साथ समाज का कोई भी वर्ग समानता का व्यवहार नहीं करता है. लैंगिक भिन्नता का पता चलने के बाद उन्हें घर, परिवार, स्कूल, कॉलेज, कार्य स्थल आदि सभी जगहों पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

देश में हिन्दू धर्म की प्रमुखता होने के बावजूद देश का कोई एक राष्ट्रीय धर्म नहीं है. संविधान में भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया है. भारतीय संविधान में देश में निवास करने वाले सभी नागरिकों को समान अधिकार दिये गये हैं. भारतीय संविधान की प्रस्तावना कहती है कि –

‘हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं.’

भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद-12 से लेकर 35 तक यहां के नागरिकों के मूल अधिकारों के बारे में बताया गया है. अनुच्छेद-14 से लेकर 18 तक में सभी नागरिकों को समानता का अधिकार दिया गया है अर्थात धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के विभेद को रोका गया है. अनुच्छेद-19 से लेकर 22 तक नागरिकों की स्वतन्त्रता के बारे में है. अनुच्छेद 23 व 24 के अन्तर्गत शोषण के विरुद्ध मूल अधिकार दिये गये हैं. इसके अतिरिक्त समाज में समानता लाने के लिए संविधान के भाग 4 में राज्यों को कर्तव्य करने के निर्देश दिये गये हैं.

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अन्तरराष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर सभी को समानता का अधिकार प्राप्त होने के बावजूद लैंगिक आधार पर समाज में विभिन्नता, भेदभाव, शोषण, तिरस्कार का बोलबाला है और इससे सबसे ज्यादा प्रताड़ित किन्नर हैं.

किन्नरों का पुरातन इतिहास

किन्नर समुदाय को – हिजड़ा, अरावानिस, कोठी, जोगप्पा, शिव-शक्ति, मंगलामुखी जैसे अनेक नामों से जाना जाता है. अप्रैल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस समुदाय को तृतीय लिंग (थर्ड जेंडर) कह कर सम्बोधित किया है. भारतीय समाज में पुरातन काल से लिंगों का निर्धारण कठोर रूप से दो ही रूपों में हुआ है – महिला और पुरुष, किन्तु समाज में एक और वर्ग हमेशा से देखने को मिलता है, जिनके लिंग का निर्धारण निश्चित नहीं होता. ‘किन्नर’ शब्द ऐसे व्यक्तियों के लिए प्रयोग होता है जो निर्धारित लिंग (स्त्री या पुरुष) से असंगति दिखाते हैं. जिनकी शारीरिक विशेषताएं निर्धारित लिंगों से भिन्न होती है या जिनकी शारीरिक विशेषताओं के निर्धारण में असमंजस की स्थिति होती है. इन्हें ‘हिजड़ा’ भी कहा जाता है.

हिजड़ा उर्दू का शब्द है जो कि अरब मूल के शब्द ‘हिज्र’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘एक कबीले को छोड़ना’. इस शब्द-व्याख्या से ही स्पष्ट है कि सदियों पहले भी ऐसे बच्चों को परिवार खुद से अलग कर देता था. उसकी पहचान छीन लेता था. उन्हें समाज से बेदखल कर देता था.

किन्नरों की वास्तविक स्थिति की व्याख्या करने से पहले प्राचीन काल से चली आ रही उनकी स्थिति को समझना आवश्यक है. किन्नर मनुष्य जाति का हिस्सा हमेशा से रहे हैं. किन्नर समुदाय का अस्तित्व ई.पू. 9वीं शताब्दी से लिपिबद्ध है. हिन्दू, जैन, बौद्ध तथा वैदिक संस्कृति सभी में तीन लिंगों की बात होती है. वैदिक काल (1500-500 ईसा पूर्व) में तीन लिंगों की चर्चा की गयी है – पुरुष प्रकृति, महिला प्रकृति तथा तृतीय प्रकृति. प्राचीन भारतीय कानून, चिकित्सा विज्ञान, भाषा शास्त्र तथा ज्योतिष शास्त्र में भी तृतीय लिंग के बारे में चर्चा है. पुराणों में भी तीन लिंग बताये गये हैं – गन्धर्व, अप्सरा और किन्नर.  महाभारत में भी किन्नरों का उल्लेख मिलता है. अज्ञातवास के दौरान अर्जुन भी एक शाप के कारण साल भर किन्नर वृहन्नला के रूप में रहे थे. वहीं शिखंडी को भी किन्नर ही माना जाता है, जिसने महाभारत के युद्ध में पांडव सेना की ओर से लड़ाई लड़ी थी और जिसकी ओट लेकर अर्जुन ने भीष्म पितामह पर बाण चलाये थे. शिखंडी ही एक तरह से भीष्म की मृत्यु का कारण बना था.

मनुस्मृति (200 बीसी-200 एडी) में तृतीय लिंग की जैविक उत्पत्ति की व्याख्या कुछ इस प्रकार है – ‘पुरुष बीज के अधिक मात्रा में होने से नर शिशु बनता है. स्त्री बीज के अधिक मात्रा में होने से मादा शिशु बनता है और यदि दोनों बीजों की मात्रा बराबर रहती है तो तृतीय लिंग शिशु बनता है या नर-मादा जुड़वां बच्चे होते हैं.’

मुगल काल में समृद्ध थे किन्नर

मुगल काल में किन्नर समुदाय को विशिष्ट स्थान प्राप्त था. उनका राज-दरबार में काफी हस्तक्षेप रहता था. वह कुशल सलाहकार, प्रशासक तथा हरम के संरक्षक के पद पर तैनात थे. मुगल सल्तनत में इनकी वफादारी के लिए शासकों द्वारा इन्हें धन और जमीनें प्रदान की जाती थीं. ये लोग इज्जत के साथ समाज में जीवन बिताते थे, किन्तु ब्रिटिश काल की शुरुआत में किन्नर समुदाय को अनेकों राज्यों से अपनी सुरक्षा के लिए सहायता लेनी पड़ी थी. ब्रिटिश कानूनों ने इनसे जमीन के अधिकार छीन लिये थे. चूंकि इनका जैविक अधिकार खून के रिश्ते पर आधारित नहीं था, इस कारण किन्नरों के जीवन पर संकट आ गया. वे सड़क पर आ गये और भूखों मरने लगे. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे यह समुदाय अपराध में लिप्त होने लगा. चोरी, डकैती, अपहरण, उगाही इनका पेशा हो गया. इसकी रोकथाम के लिए सन् 1871 में ‘क्रिमिनल ट्राइब एक्ट’ लाया गया. इसमें सभी किन्नर समुदाय को शामिल किया गया और उनके लिए सजा का प्रावधान किया गया. हालांकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन् 1952 में यह कानून खत्म कर दिया गया.

वर्तमान हालात

सन् 2011 की जनगणना के आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में करीब 19 लाख किन्नर जनसंख्या है, जो कि कुल जनसंख्या का 0.15 प्रतिशत है. यह समुदाय आज भी सामाजिक बहिष्कार का शिकार है. जो आश्रय स्थल, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं सामान्यता सभी को मिल जाती हैं, इस समुदाय को हासिल नहीं हो पाती है. किन्नर समुदाय सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन, आर्थिक, राजनीतिक और निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर है. वह अपने परिवार और समाज से बहिष्कृत है. समाज के अन्य लोग इनसे दूरी बरतते हैं, इनसे बातचीत नहीं करते. इनको देखकर एक प्रकार की उपेक्षा और तिरस्कार व्यक्त करते हैं. ये वर्ग हिंसा का भी शिकार है. इन पर पुलिस का कहर आये-दिन टूटता है. इनमें से ज्यादातर अशिक्षित है और स्वास्थ्य सेवाओं तक भी उसकी बहुत सीमित पहुंच है. तमाम सरकार अस्पतालों में स्त्री और पुरुषों को देखने के लिए अलग-अलग व्यवस्था है, उनके लिए अलग वार्ड और अलग डॉक्टर भी हैं, जो उनकी समस्याओं को मनोवैज्ञानिक और संवेदनशीलता के लिहाज से देखते-समझते हैं, मगर किन्नरों के लिए देश के किसी अस्पताल में न तो अलग डॉक्टर हैं, न अलग वार्ड है और न ही मनोवैज्ञानिक और संवेदनशीलता के तहत उनका इलाज होता है. अक्सर इन्हें पुरुष डॉक्टर के पास भेज दिया जाता है, या पुरुष वार्ड में भर्ती किया जाता है. देश की सरकारें इस वर्ग के प्रति कितनी निर्मम रही हैं, यह इन बातों से ही साफ हो जाता है. इनकी शिक्षा के लिए कोई विशेष व्यवस्था सरकारी स्कूलों में नहीं है. यदि कोई किन्नर बच्चा स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए आता है, तो अन्य बच्चों और यहां तक कि टीचर्स और स्टाफ द्वारा उससे भेदभाव बरता जाता है, उनका मजाक उड़ाया जाता है, उन्हें मारापीटा जाता है. यही वजहें हैं कि अधिकांश किन्नर बच्चे दहशत में स्कूल जाना बंद कर देते हैं और अशिक्षित रह जाते हैं.

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नीड़ से उजड़े

आमतौर पर भारतीय समाज में यदि कोई नर शिशु अपनी अपेक्षित लैंगिक भूमिका से विपरीत आचरण करने लगता है, स्त्रियों के समान कपड़े पहनना, व्यवहार करना, बोलना  शुरू कर देता है तो परिवार वाले उसकी हालत को समझे बगैर उसे मारने-पीटने, डांटने या धमकी देने लगते हैं. कुछ परिवार तो समाज के मूल्यों के विपरीत लैंगिक आचरण के चलते अपने बच्चे को सभी अधिकारों से बेदखल कर देते हैं या उनका पूर्णतया त्याग कर देते हैं.

अधिकांश लोगों का मानना है कि घर में किन्नर बच्चा पैदा होने से परिवार को सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ता है. ऐसे बच्चे के कारण लोग उनका मजाक बनाते हैं. ऐसे बच्चे के विवाह के अवसर भी न के बराबर होते हैं. ऐसा बच्चा उनका वंश भी आगे नहीं बढ़ा सकता, इन तमाम कारणों को देखते हुए परिवार अपने किन्नर बच्चे को कहीं दूर छोड़ आता है, अथवा किन्नर समुदाय स्वयं ऐसे बच्चे को अपने साथ ले जाता है. परिवार भी बदनामी के डर से किन्नर बच्चे को उन्हीं को सौंप देते हैं. किन्नर उस बच्चे को अपनी बस्ती में लाकर उसका पालन-पोषण अपने ढंग से करते हैं और आजीविका चलाने के लिए उसे नाचना गाना सिखाते हैं. बच्चे को कभी नहीं बताया जाता है कि वह किस परिवार में पैदा हुआ या उसके माता-पिता कौन हैं, उसका धर्म क्या है, उसकी जाति क्या है आदि, आदि.

कुछ किन्नर बच्चे, जिन्हें उनके माता-पिता जन्म लेते ही अपने से अलग नहीं कर पाते, वह अन्य भाई-बहनों के साथ बड़े होते हुए माता-पिता द्वारा किये जाने वाले भेदभाव को देखकर आहत होते हैं. वे इस भेदभावपूर्ण व्यवहार को सहन नहीं कर पाते या अपने परिवार के लिए लज्जा का कारण न बनें इसलिए स्वयं ही घर को छोड़कर भाग जाते हैं. कम उम्र में घर छोड़ देने के कारण ये अशिक्षित रह जाते हैं, परिणामस्वरूप नौकरी पाने में या आजीविका चलाने में इन्हें कठिनाई आती है. साथ ही इनके पास अपनी आइडेंटिटी प्रूव करने का कोई पुर्जा नहीं होता है.

पहचान का संकट

कम उम्र में घर छोड़ देने के कारण किन्नर समुदाय के सामने पैसों की कमी की गम्भीर समस्या हमेशा बनी रहती है. शिक्षित न होने के कारण नौकरियां भी नहीं कर पाते और समाज के कुछ लोग किन्नर समुदाय का होने के कारण जानबूझकर इन्हें नौकरी पर नहीं रखते हैं. वे इन पर भरोसा नहीं कर पाते. इनके व्यवहार को उपेक्षा और संदेह की दृष्टि से देखते हैं. किन्नरों के पास स्वयं का रोजगार शुरू करने के लिए पैसा नहीं होता और बिना आइडेंटिटी प्रूफ के सरकार की तरफ से भी वह कोई सहायता प्राप्त नहीं कर पाते. आवश्यक प्रमाण पत्र जैसे – पहचान पत्र, आय प्रमाण पत्र, निवास स्थान पत्र, बैंक खाता, आधार कार्ड, पासपोर्ट इत्यादि न होने से नौकरी-रोजगार से दूर इस समुदाय के अधिकांश लोग भीख मांगने, नाचने गाने या वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर हैं.

आज देश का अधिकांश किन्नर समुदाय गरीब बस्तियों, तंग गलियों में अपना जीवनयापन कर रहा है. जहां मकानों में हवा तक आने-जाने की जगह नहीं है. समाज में हाशिये पर खड़े ये रोजाना किसी न किसी के हाथों प्रताड़ित, अपमानित और तिरस्कृत होते हैं. जनता और लोकतांत्रित तरीके से चुनी गयी सरकारों की उदासीनता और भेदभाव के कारण ये दरिद्रता, भीख मांगने व अपराध के दलदल में फंसते जा रहे हैं.

किन्नरों की प्रमुख समस्या ही ‘पहचान का संकट’ है. किन्नरों की पहचान ही अस्पष्ट है. अत: इन लोगों को आगे भी इसी से जुड़ी हुई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. जैसे बच्चा गोद लेने में या उत्तराधिकार की समस्या. कोई दस्तावेज न होने के कारण न तो यह कोई बच्चा गोद ले सकते हैं और न ही घर-जमीन आदि खरीद सकते हैं.

मानव अधिकार दिवस हर साल आता है और चला जाता है. मानव अधिकार के सक्रिय कार्यकर्ता पुलिस हिरासत में होने वाले उत्पीड़न के बारे में चर्चा करते हैं, वे बच्चों और महिलाओं के विरुद्ध होने वाले दुर्व्यवहार, बच्चों की तस्करी आदि के बारे में डिबेट करते हैं, लेकिन किन्नर समुदाय के अधिकारों के बारे में कभी कोई चर्चा नहीं होती है.

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एक अनुमान के अनुसार करीब पचास फीसदी किन्नर पूर्णत: अशिक्षित हैं. किन्नरों की सर्वाधिक संख्या मुंबई में है. जो वहां भीड़भाड़ वाली गंदी जगहों पर रहते हैं. इनकी कमाई का कोई निश्चित जरिया नहीं है. वे नाच-गा कर, भीक्षा मांग कर या वेश्यावत्ति के जरिए पैसा कमाते हैं. किन्नरों को सड़कों, चौराहों, बाजारों और समुद्र किनारे लोगों से पैसे मांगते देखा जाता है. ये दिनभर में बमुश्किल सौ-दो सौ रुपये तक कमा पाते हैं, जिनसे यह अपनी जरूरत का सामान भर खरीद सकते हैं. बहुत बड़ी तादात में किन्नर मुम्बई में तीस-चालीस सालों से रह रहे हैं, लेकिन अभी भी ज्यादातर के पास कोई पहचान पत्र, राशन कार्ड, निर्वाचन कार्ड नहीं है. इनके पास अपना घर नहीं है. ये समूहों में एक दूसरे का सहयोग करते हुए रहते हैं. तमाम शहरों के रेडलाइट एरिया में इन्हें ठौर मिलता है. भारतीय संविधान इनके अधिकारों के बारे में स्पष्ट रूप से अलग से कुछ नहीं कहता है. ऐसे में मोदी सरकार द्वारा थोपे जा रहे एनआरसी, सीएए या एनपीआर की कसौटी पर यह समुदाय दस्तावेजों के अभाव में किस तरह खरा उतरेगा? इस बात में संदेह नहीं, कि आने वाले वक्त में इस कानून के खिलाफ चल रहे देश व्यापी आन्दोलनों में यह तबका भी जल्द उतरेगा और तालियां पीट-पीट कर मोदी सरकार की भद्द उड़ाता दिखायी देगा.

ज्यादा पगार फसाद हजार

बीती 10 नवंबर को देशभर के प्रमुख अखबारों में राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड का एक छोटा सा विज्ञापन प्रकाशित हुआ था जिस में कुछ रिक्तियों के लिए आवेदनपत्र मंगाए गए हैं. यह बोर्ड भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत काम करता है.

इस विज्ञापन में 2 अहम पदों अपर निदेशक, चिकित्सा और निदेशक, गैरचिकित्सा का वेतनमान 1,23,100-2,15,800 था. पेबैंड 4 के बराबर इस पद के लिए ग्रेड पे 8,700 रुपए था. वेतन की इस सरकारी रामायण का सार इतना भर था कि डैपुटेशन यानी प्रतिनियुक्ति वाले इन पदों के लिए जो उम्मीदवार चुना जाएगा उसे लगभग 1 लाख 75 हजार रुपए पगार मिलेगी.

इतना आकर्षक और तगड़ा वेतन क्यों और काम कितना, इस बात का आकलन या तुलना किसी भी दूसरी सरकारी नौकरी से की जा सकती है कि सभी में बस मलाई ही मलाई है, जिस से जितना हो सके, चाट लो और पेटभरने के बाद चाहो तो लुढ़का भी दो.

क्या सरकार को इतना वेतन देना चाहिए, इस बात पर अलगअलग राय लोगों की हो सकती है, लेकिन इस बात पर शायद ही कोई इनकार में सिर हिलाएगा कि सरकारी नौकरी कोई भी हो, उस में पगार ज्यादा, सहूलियतें बेशुमार, मनमाफिक घूस, कम जिम्मेदारियों और उन से भी अहम बात कम काम होता है. इसलिए जहां भी सरकारी नौकरी दिखती है, लोग मधुमक्खियों की तरह टूट पड़ते हैं.

बात कहने की नहीं है, बल्कि सच भी है कि सरकारी नौकरी वाकई मुफ्त के लंगर की तरह होती है जिस में खाने का न तो कोई बिल आता है और न ही कोई रोकताटोकता है.

फायदे ही फायदे

हर कोई सरकारी नौकरी चाहता है ताकि इत्मीनान से जिंदगी गुजारी जा सके और नौकरी के बाद की जिंदगी यानी रिटायरमैंट के बाद मिलती पैंशन से बुढ़ापा भी सहूलियत से कटे.

यही वजह है कि सरकारी चपरासी या माली बनने के लिए भी पीएचडीधारक तक लाजशर्म छोड़ कतार में खड़े रहते हैं. यह देश की शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा या गिरता स्तर कम, बल्कि सरकारी नौकरी की मौज और लुत्फ उठाने का लालच ज्यादा है कि अगर सरकारी चपरासी, ड्राइवर या माली बनने से 30-40 हजार रुपए महीना पगार मिलती है, तो सौदा घाटे का नहीं.

देश के सभी शिक्षित युवा अगर स्वाभिमानी होते तो शायद यह नौबत न आती. लेकिन जहां शिक्षा का मकसद या पहली प्राथमिकता ही, जैसी भी हो सरकारी नौकरी हासिल करना हो, तो वहां किसी क्रांति की उम्मीद करना बेकार की बात है. हां, इस बात पर झींकने वालों को हल्ला मचाने वाले इफरात से मिल जाएंगे कि सरकारी नौकरी के लिए खूब घूस चलती है और बिना सिफारिश व दक्षिणा चढ़ाए तो आप चपरासी भी नहीं बन सकते. ऐसे में किसी परीक्षा बोर्ड के डायरैक्टर बनने या दूसरी किसी बड़ी नौकरी के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते होंगे, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.

यही लोग बेहतर जानतेसमझते हैं कि जिंदगीभर की गारंटी और काम न करने वाली सरकारी नौकरी के लिए अगर 2-4 लाख रुपए चढ़ाने भी पड़ें तो सौदा घाटे का नहीं, यह सोच कर तसल्ली कर लेंगे कि सालदोसाल नौकरी नहीं की या देर से शुरू की.

सरकारी नौकरी के फायदे किसी से छिपे नहीं हैं, जिस में पगार प्राइवेट सैक्टर के मुकाबले काफी ज्यादा है और काम न के बराबर है. घूस का प्रावधान तो हरेक सरकारी नौकरी में है ही, वहीं सहूलियतों की भरमार भी है. भविष्य सुनिश्चित करती पैंशन के अलावा चिकित्सा सुविधाएं, इफरात से मिलती छुट्टियां और हर साल कम से कम 8 फीसदी बढ़ती पगार भला किसे नहीं लुभाएगी.

इस सचाई को भोपाल के एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है जहां के 31 वर्षीय अविनाश ने एमटैक करने के बाद सरकारी हाईस्कूल में शिक्षक बनना पसंद किया और उस की सहपाठी व कजिन ज्योत्सना ने नामी प्राइवेट कंपनी टीसीएस में मुंबई में नौकरी की. इन दोनों का ही वेतन 40 हजार रुपए के लगभग है.

ज्योत्सना मुंबई के परेल में रहती है, नौकरी पर जाने के लिए उसे सुबह 6 बजे उठना पड़ता है और रात 8 से 10 बजे के बीच अपने फ्लैट में वापस आ पाती है, जिस का उस के हिस्से का किराया 10 हजार रुपए है. इस तरह लगभग 12 घंटे की नौकरी वह करती है और बमुश्किल 8 घंटे की नींद ले पाती है. बाकी के 4 घंटे ही उसे अपने लिए मिलते हैं, जिस से वह अपने दैनिक कामकाज निबटाती है और थोड़ाबहुत वक्त सोशल मीडिया पर गुजारती है.

उलट इस के, अविनाश घर से

25 किलोमीटर दूर सुबह 10 बजे खुलने वाले स्कूल में इत्मीनान से 12 बजे पहुंचता है और आमतौर पर 4 बजे घर के लिए चल देता है. इन 4 घंटों में कितना पढ़ाना है, यह वह खुद तय करता है, क्योंकि न तो प्रिंसिपल उस से कभी कुछ पूछता है और न ही शिक्षा विभाग का कोई अधिकारी कभी स्कूल में आता. अगर भूलेभटके कोई आ भी जाए तो चायनाश्ता कर और पंडों की तरह दक्षिणा अपनी झोली में डाल कर चलता बनता है.

ज्योत्सना और अविनाश की फोन पर अकसर बात होती है जिस में ज्योत्सना मुंबई की अपनी जिंदगी और नौकरी की दुश्वारियां बताती रहती है तो अविनाश उस की नादानी पर हंसता रहता है कि अगर वह भी उस की तरह सरकारी टीचर बनना कुबूल कर लेती तो आराम से घर में पड़ी रह कर अपने सेविंग अकाउंट में पैसा जमा कर रही होती. न तो यहां कोई टीम लीडर होता और न ही ही प्रोजैक्ट नाम की बला होती. यहां क्लाइंट विदेशों से नहीं आते, बल्कि देश के गरीब बच्चे होते हैं जो दिनभर हुड़दंग मचाते, मिडडे मील खा कर कूदतेफांदते घर लौट जाते हैं.

इन दोनों के बीच एकलौता फर्क इतना भर है कि ज्योत्सना मानती है कि उस के सामने अपार संभावनाएं हैं और अगर वह बेहतर काम का प्रदर्शन करेगी तो आज नहीं तो कल, कंपनी में ऊंचे पद पर होगी और अपनी पढ़ाई का सही इस्तेमाल करते योग्यता दिखा पाएगी, जबकि अविनाश के सामने ऐसी कोई चुनौती या लक्ष्य नहीं है. वह 6 घंटे सोशल मीडिया पर रहते टाइमपास यानी समय बरबाद करता है.

इन दिनों कौन बुद्धिमान है और कौन नादान, यह तय करने के हरेक के अपने पैमाने हो सकते हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर अविनाश ने बुद्धिमानीभरा रास्ता चुना था. इसी बात को दूसरे लफ्जों में कहें तो उस ने एक आसान और चुनौतीरहित जिंदगी चुनी थी जिस में कोई भागादौड़ी नहीं है, और न ही पैसों की कमी है. मम्मीपापा साथ हैं, उस के लिए हर सप्ताह एक नया रिश्ते वाला आता है. उस की खुद की कार है और नौकरी जाने की चिंता तो कतई नहीं है.

और मिलता बाजार भाव तो

अविनाश और ज्योत्सना के उदाहरण और तुलना का सरकार और बाजार से भी सीधा संबंध है. सरकार अपने कर्मचारियों को वेतन, वेतन आयोग की सिफारिशों और खुद के बनाए नियमकानूनों के तहत देती है जबकि इस रिवाज, जो अब रूढ़ी बनता जा रहा है, को बदलते वह अगर बाजार भाव से वेतन दे तो शायद ही कोई युवा सरकारी नौकरी प्राथमिकता में रखेगा.

खुद अविनाश मानता है कि प्राइवेट स्कूलों के टीचर उस से 5 गुना ज्यादा मेहनत और काम करते हैं और उन्हें उस से 5 गुना कम तनख्वाह मिलती है. यह एक शिक्षक का सही बाजार मूल्य है कि उसे प्रतिदिन 500 रुपए के लगभग दिए जाएं और काम या पढ़ाई ज्यादा से ज्यादा करवाई जाए.

हरेक सरकारी नौकरी पर यह पैमाना बराबरी से लागू होता है कि उस में काम कम और दाम ज्यादा है. घूस एक अतिरिक्त आमदनी है और सहूलियतों की भरमार है. इसीलिए सरकारी नौकरियों का आकर्षण बरकरार है. यह सब नहीं होता तो अविनाश भी किसी बड़े शहर में किसी सौफ्टवेयर कंपनी में हाड़तोड़ मेहनत कर नौकरी करते देश की तरक्की में अपना योगदान दे रहा होता.

केंद्र और राज्य सरकारों का एक बड़ा खर्च इन सफेद हाथियों को पालने का है, जिस के चलते देश की तरक्की में रोड़े पेश आते हैं. अगर वक्त पर सरकारी कर्मचारियों को तनख्वाह न मिले तो वे कामकाज ठप कर हायहाय करते सड़कों पर नारे लगाते नजर आते हैं. उलट इस के, प्राइवेट सैक्टर के कर्मचारियों को तनख्वाह देर से मिले तो भी वे अपना काम पहले की तरह करते रहते हैं. अब इसे उन की समझ कह लें, धैर्य या फिर मजबूरी, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता सिवा यह साबित होने के कि  हालात जैसे भी हों, वे काम करते हैं.

ज्यादा सरकारी वेतन एक भीषण विसंगति है, जिस का अब दूर होना जरूरी हो चला है, जिस तरह सरकार ने मजदूरों के भाव तय कर रखे हैं, अगर इसी तरह कर्मचारियों को दिहाड़ी से पगार दे तो देश से निकम्मापन दूर होते देर नहीं लगने वाली. किसी निदेशक को बजाय इतने मूल वेतन, ग्रेड पे और जीपी के, सीधे उस के काम के मुताबिक 2 हजार रुपए रोज दिए जाएं तो यह उस के साथ कोई ज्यादती नहीं होगी और न ही यह भी ज्यादती होगी कि जिस दिन वह काम पर न आए उस दिन की तनख्वाह काट ली जाए.

ज्यादा वेतन का काम के स्तर या गुणवत्ता से भी कोई संबंध नहीं है. सरकारी कालेज के एक प्रोफैसर को 7वां वेतनमान लागू होने के बाद औसतन डेढ़ लाख रुपए महीने मिल रहे हैं जबकि प्राइवेट कालेजों में उन्हीं के बराबर शिक्षित और अनुभवी प्राध्यापक 30-40 हजार रुपए में महीनेभर पढ़ा रहे हैं. यह हर कोई मानता है कि प्राइवेट कालेजों की पढ़ाई की गुणवत्ता सरकारी कालेजों से कहीं बेहतर है और वहां कक्षाएं भी नियमित लगती हैं, इसलिए छात्र ज्यादा फीस दे कर वहां पढ़ने जाना पसंद करते हैं.

ठीक उसी तरह सरकारी अस्पतालों में एक लाख रुपए महीने से ज्यादा वेतन वाले डाक्टरों के वक्त पर न आनेजाने की शिकायतें और खबरें आम हैं जिस से मरीज परेशान होते रहते हैं. उलट इस के, प्राइवेट अस्पतालों के डाक्टर या प्रैक्टिशनर्स नियमित रहते हैं जबकि उन्हें सरकारी डाक्टरों से ज्यादा आमदनी अपवादस्वरूप ही होती है.

आरक्षण कनैक्शन

तो फिर ज्यादा वेतन क्यों, जिस से दूसरी कई परेशानियां भी जुड़ी हैं. इन में सब से बड़ी और संवेदनशील जातिगत आरक्षण की है. प्राइवेट सैक्टर में आरक्षण की चर्चा तक नहीं होती. फिर विवाद उठ खड़े होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, लेकिन सरकारी नौकरियों में आरक्षण को ले कर आएदिन तरहतरह के फसाद खड़े होते रहते हैं. लोग सड़कों पर उतर कर धरनाप्रदर्शन करते हैं.

जाहिर है वहां मुफ्त के पैसे हैं जिन्हें कोई नहीं छोड़ना चाहता. सवर्ण चाहते हैं कि आरक्षण खत्म हो जिस से सारी सरकारी मलाई उन के हिस्से में ही आए. वहीं, आरक्षित वर्र्ग अपनी संवैधानिक भागीदारी छोड़ने के लिए तैयार नहीं है.

यह लड़ाई सामाजिक वैमनस्यता की कम, ब्रैड ऐंड बटर वाली ज्यादा है. अगर सरकार वेतन का तरीका बाजार के मुताबिक कर दे तो शायद ही आरक्षण कोई मुद्दा रह जाएगा.

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