नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा के आरोपियों से सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की भरपाई से संबंधित वसूली के लिये उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा सार्वजनिक स्थान पर लगाये गये पोस्टर को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और कोर्ट आमने सामने है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिंसा के आरोपियों के सडको पर लगे पोस्टर के संबंध में कहा कि ‘सडको पर किसी भी नागरिक का पोस्टर लगाना उनके सम्मान, निजता और स्वतंंत्रता के खिलाफ है. पब्लिक प्लेस पर संबंधित व्यक्ति की अनुमति के बिना फोटो या पोस्टर को लगाना गैर कानूनी है. यह निजता के अधिकार का भी उल्लघंन है.‘ कोर्ट ने लखनऊ प्रशासन और पुलिस की दलील पर नाराजगी जताते हुये कहा कि 16 मार्च तक यह पोस्टर सडको से हट जाने चाहिये.
चीफ जस्टिस की कोर्ट में चली सुनवाई में महाअधिवक्ता राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने अपनी दलील में कहा था कि सरकार के इस निणर्य से भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगेगी.उन्होने यह भी कहा कि ऐसे मामलों मे कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये. कोर्ट ने लखनऊ के जिलाधिकारी और पुलिस कमीश्नर को मामले की सुनवाई के समय कोर्ट में उपस्थित रहने को कहा था पर वह दोनो की कोर्ट में मौजूद नहीं रहे. डीएम की जगह पर एडीएम ईस्ट और पुलिस कमीश्नर की जगह पर डीसीपी नार्थ कोर्ट में मौजूद रहे.
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यह माना जा रहा था कि होली की छुटटी के खत्म होने के बाद बुधवार 11 मार्च को कोर्ट के फैसले के अनुसार प्रशासन लखनऊ की सडको से कोर्ट के फैसले कि अनुसार यह पोस्टर हटाना शुरू कर देगी. 11 मार्च को सभी की निगाहे इस ओर लगी थी.पर जिला प्रशासन ने यह पोस्टर हटाने के संबंध में कोई पक्ष नहीं रखा. औफ द रिकार्ड खबरों में यह बात सामने आ रही है कि उत्तर प्रदेश सरकार हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखेगी. इस वजह से पोस्टर हटाने के संबंध में कोई कदम नहीं उठाया गया है.
सार्वजनिक स्थल पर ऐसे मामले में इससे बडा कदम 2012 के विधानसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग के कहने पर प्रशासन ने उठाया था जब बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियों को पूरे प्रदेश में विधानसभा चुनाव तक रातोरात कपडों से ढक दिया गया था. बसपा के खिलाफ कई दलों ने चुनाव आयोग से शिकायत में कहा था कि हाथी कह मूर्तियों से बसपा का चुनाव प्रचार होगा. चुनाव आचार संहिता के आरोप में हाथी की मूर्तियों को ढक दिया गया. हाई कोर्ट के निजता कानून के उल्लघन मानते हुये लखनऊ की सडको से नागरिकता विरोधी हिंसा के जिम्मेदार लोगों के पोस्टर प्रशासन के द्वारा नहीं हटाये गये.
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इस मामले में जो हो गया वह ज्यादा अहम है या वह जो हो रहा है या कि फिर वो जो होना होना बाकी रह गया है , ये तीनों ही बातें एक दूसरे से कुछ इस तरह गुंथी हुई है कि इन्हें अभी अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि इस मामले को उलझाने बाले खुद ही कुछ ऐसे उलझ गए हैं कि गिट्टी अब उनसे सुलझाए नहीं सुलझ रही . मामला अब रहस्य रोमांच भरे सरीखे उपन्यास जैसा हो चला है जिसे तीन चौथाई पढ़ने के बाद पाठक समझ जाता है कि अब उसे अपने अंदाजे की पुष्टि भर करना है .
कहानी संक्षेप में कुछ यूं है कि मध्यप्रदेश कांग्रेस के एक दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी है और वे भाजपाई पुरोहितों के मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं कि आज किस चौघड़िए में उन्हें भगवा साफा पहनाया जाएगा . श्रीमंत के सामंती खिताब से नवाजे जाने बाले सिंधिया कोई ऐरे गैरे नेता नहीं हैं वे भाजपा और जनसंघ की संस्थापक सदस्य ग्वालियर राजघराने की महारानी विजयाराजे सिंधिया के नवासे हैं , अपने जमाने के धुरंधर और लोकप्रिय कांग्रेसी नेता माधवराव सिंधिया के बेटे है और भाजपा की दो धाकड़ नेत्रियों वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे के भतीजे हैं . ज्योतिरादित्य सिंधिया के गैरमामूली होने का एक प्रमाण यह भी है कि उनके साथ कांग्रेस के 22 और विधायकों ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है और 8 और विधायक इस्तीफा दे सकते हैं जिससे सवा साल पुरानी कांग्रेसी सरकार गिरने के कगार पर है .
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होली के दिन ही मध्यप्रदेश में उनके समर्थन में कितने छोटे बड़े कांग्रेसियों ने इस्तीफे दे दिये इस चिल्लर की गिनती अब बाद में होती रहेगी हालफिलहाल तो बड़े नोट यानि विधायक गिने जा रहे हैं कि कौन सा किसके बटुए में है . 4 दिन पहले तक मुख्यमंत्री कमलनाथ का बटुआ विधायकों से भरा था लेकिन अब उसमें 114 में से महज 88 विधायक बचे हैं हालांकि इनकी सियासी बाजार में कीमत धेले भर की भी नहीं रह गई है लेकिन दाद देनी पड़ेगी कारोबारी और हनुमान भक्त कमलनाथ की जो अभी तक इस बात पर अड़े हैं कि ये रु जल्द ही डालर की कीमत को पछाड़ देंगे .
कमलनाथ को जो ज्ञान अपनी जवानी में इमरजेंसी के दिनों में भी नहीं मिला होगा वह कल के छोरे ने एक झटके में मुफ्त के भाव दे दिया कि अंकल आपके गुरूर से ज्यादा अहम मेरी गैरत है , लिहाजा जै राम जी की . मैं तो चला राम भक्तों के साथ रामायण पढ़ने आप फिर से सवा करोड़ हनुमान चालीसा का पाठ करो . राम और हनुमान में से किसमे ज्यादा दम है यह आजकल में सामने आ जाएगा .
उधर परेशान राम भक्त भी हैं जिनहोने अपने सैकड़ा भर पैदलों को पुष्पक विमान में ठूंस कर कुरुक्षेत्र के आसपास कहीं शिफ्ट कर दिया है . कहा जा रहा है कि इनमें से कुछ ने कमलनाथ से टोकन भी ले लिया था कि संकट के वक्त में वे पाला बदल लेंगे लेकिन तब बात और थी अब खेल सिंधिया ने कुछ इस तरह बिगाड़ा है कि किसी की कुछ समझ ही नहीं आया और जब आया तब तक इस कलयुगी रामायण का उत्तरकाण्ड लिखा जाने लगा था .
पुराने जमाने के अखाड़ों में पट्ठों को पहलवान होने की डिग्री उसी वक्त दी जाती थी जब वे उस्ताद को धोबी पाट पछाड़ से चित कर देते थे . इधर तो पट्ठा एक नहीं बल्कि दो दो गुरुओं को गोबर और खुद को गुड साबित कर दीक्षांत समारोह के लिए दूसरी यूनिवर्सिटी में चला गया . कायदे से तो उसे होली के दिन इनके माथे पर गुलाल लगाना चाहिए थी लेकिन छोरा कालिख पोत गया . अब दोनों गुरु तिलमिला और बिलबिला रहे हैं कि यह तो खानदानी गद्दार यानि विश्वासघाती है फिर भी हम इसे देखना नहीं छोड़ेंगे . अब इन बुजुर्ग गुरुओं की मोतियाबिंदी आखो के पास देखने सिवाय गुबार और धूल के कुछ बचा ही नहीं है . इन्हीं मिचमिचाती आखों से वे जब सिंहासन भी जाते देख लेंगे तभी शायद उन्हें यकीन होगा कि यह द्वापर नहीं बल्कि कलयुग है जिसमें अभिमन्यु चक्रव्यूह में ही मर जाने की रस्म निभाने की मूर्खता नहीं करता .
दूसरे अभिशप्त गुरु जिनहोने ऋषि मुनियों की तरह ही वाणप्रस्थ की आयु में अपने से आधी उम्र की सुंदर युवती से दूसरा विवाह किया था उन दिग्विजय सिंह का नाम भी किसी पहचान का मोहताज नहीं जिन्हे बची खुची कांग्रेस को डुबोने का श्रेय हर कोई दे रहा है . ये गुरुजी तो इतने विद्वान और बिंदास हैं कि अस्त्र शस्त्र और मुकुट गिर जाने के बाद भी आल इस बेल ( थ्री ईडियट फेम ) का नारा लगाते माँ भवानी को गुमराह कर रहे हैं कि जब तक शरीर में प्राण हैं तब तक लड़ता रहूँगा . आप तो बस बदस्तूर राजमहल में बैठकर तमाशा देखो और अपनी आखों पर बंधी पट्टी मत खोल लेना इसी में युवराज का भला है , जो नई उम्र के इन चंद शोहदों की सोहबत में आकर जमीनी राजनीति करते भला बुरा और उंच नीच समझने की तमीज भूल बैठे थे .
उधर युवराज बेचारे महल के किस कमरे में दीवान पर लुढ़के किस विधि से अपना गम गलत कर रहे हैं इसकी फिक्र किसी को नहीं . वे तो बेचारे यह भी सलीके से नहीं सोच पा रहे होंगे कि मित्र ने द्रोह किया या मित्र के साथ द्रोह हुआ था जो उसने गदा छोडकर धनुष बाण उठा लिया .
गुरुओं के दूसरे चेले अखाड़े में चिल्ल पों करते और चिल्लाते एक दूसरे को और ज्यादा चिल्लाने उकसा रहे हैं मानों यह युद्ध अब चिल्लाने से ही जीता जा सकता है . एक बानर राज था बाली जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सामने बाले का आधा बल खींच लेता था इसलिए राम ने उसे छिपकर छल पूर्वक मारा . सिंधिया दोनों गुरुओं के साथ साथ इन चेलों को भी बलहीन कर गए हैं लेकिन छल से बचने समझदारी दिखाते सीधे रामदरबार में जाकर दंडवत हो गए . उन्होने यह तक नहीं सोचा कि आखिर वे जैसे भी हैं , हैं तो राजा और इन गंगू तेलियों के सामने बिछना उनकी शान के खिलाफ है फिर शायद उन्होने यह भी सोचा होगा कि यहाँ कौन सी आरती उतारी जा रही थी उल्टे गुरुजन तो कह रहे थे कि सड़क पर आकर जो बन पड़े सो कर ले . सोचा तो उन्होने यह भी होगा कि इन लोगों ने जब उनके पिता को भी नहीं बख्शा था तो उन्हें कैसे छोड़ देंगे लिहाजा राम की शरण में चला जाए गारंटेड उद्धार वहीं से मिलेगा .
अब इस सियासी गेंगवार का पटाक्षेप होना शेष है जिसमें यह तय होना है किसको क्या इनाम और बख्शीश दी जाएँ .
वह शाम भी उस ने जूली के साथ बिताई. पूरे समय जूली उस का आभार प्रकट करती रही. उस ने मनोज को कसम खिलाई कि वह भारत वापस जा कर उसे भूलेगा नहीं और हमेशा उसे फोन करेगा.
दूसरे दिन मनोज भारत के लिए वापस निकल आया. जूली ने आंखों में आंसू भर कर उसे भावभीनी विदाई दी. उस ने वादा किया कि वह जल्द से जल्द उसे पैसे वापस करेगी.
भारत वापस आने पर मनोज का हर रोज जूली से बात करने का सिलसिला जारी रहा. बातों से ही उसे पता चला कि जूली अपने घर लौट गई है और उस ने शौप खोल ली है. वह हर रोज अपने कार्य की प्रगति के बारे में उत्साह से उसे बताती, जैसे आज उस ने क्या खरीदा, उसे शौप में कैसे जमाया, लोग उस की दुकान पर आने लगे हैं, उसे उस के पैसे जल्द से जल्द चुकाने हैं इसलिए वह ज्यादा से ज्यादा मेहनत कर रही है.
इधर, दिन, हफ्ते, महीने बीत गए पर जूली ने मनोज का एक भी पैसा वापस नहीं किया. मनोज को तो भावेश, सुरेश और बाकी लोगों के पैसे वापस करने ही पड़े. दोनों अकसर उसे कहते कि उस ने धोखा खाया है. जूली ने उसे बेवकूफ बनाया है पर मनोज का मन यह मानने को तैयार नहीं होता. लेकिन आजकल वह जब भी जूली से पैसे लौटाने की बात करता, वह टालमटोल करने लगती, अपनी परेशानियां गिनाने लगती. फिर एक दिन अचानक जूली ने अपना फोन बंद कर दिया. मनोज महीनों उसे फोन लगाता रहा पर वह नंबर स्विच औफ ही आता. अब तो मनोज भी समझ गया कि उस ने धोखा खाया.
वह रातदिन जूली को गालियां देता और अपनी मूर्खता पर पछताता. ठगे जाने से वह बुरी तरह तिलमिला रहा था. उसे सब से ज्यादा जलन इस बात पर हो रही थी कि उस के दोस्त इस से बहुत कम पैसों में लड़कियों के साथ ऐश कर आए और वह इतना सारा पैसा खर्च कर के भी सूखा रह गया. बेकार की भावनात्मक सहानुभूति में पड़ कर अच्छाभला चूना लग गया.
2 साल बीत गए. जूली का अतापता नहीं था. मनोज भी उस कसक को जैसेतैसे कर के भूल गया था.
एक दिन मुंबई में उस का एक दोस्त उस से मिलने आया. दोनों औफिस में मनोज के केबिन में बैठ कर बातें कर रहे थे. बातों ही बातों में उस के दोस्त अजय ने उसे बताया कि वह हाल ही में थाईलैंड के पटाया शहर गया था. और उस के बाद अजय की कहानी सुन कर मनोज सन्न रह गया. उसे लगा कि जैसे अजय उस की ही कहानी सुना रहा है. उस की कहानी का प्रत्येक शब्द और घटना वही थी जो
2 साल पहले मनोज के साथ घटी थी.
मनोज के घाव हरे हो गए. उस ने अजय को अपनी आपबीती सुनाई. सुन कर अजय भी बुरी तरह चौंक गया. उस ने तुरंत जूली को फोन लगाया क्योंकि उस के पास उस का नया नंबर था ही. उस ने स्पीकर औन कर के जूली से बात की. जूली की आवाज सुनते ही मनोज उसे पहचान गया. उस ने अजय को इशारे से बताया कि यह वही है. अब तो अजय भी बौखला गया और मनोज का तो गुस्से से बुरा हाल हो गया. उस के अंदर लावा उबलने लगा. वह जूली को अनापशनाप बोलने लगा. पहले तो वह अचकचा गई फिर मनोज को पहचान गई. मनोज उसे गालियां देने लगा तो जूली को भी गुस्सा आ गया.
‘‘देखिए, मिस्टर मनोज, जबान संभाल कर बात करिए. आप को कोई हक नहीं बनता मुझे बुराभला बोलने का,’’ जूली तीखे स्वर में बोली.
‘‘धोखेबाज, एक तो धोखा देती हो ऊपर से तेवर दिखाती हो. उलटा चोर कोतवाल को डांटे,’’ मनोज तिलमिला कर बोला.
‘‘धोखेबाज कौन है यह अपनेआप से पूछो,’’ जूली कड़वे स्वर में बोली, ‘‘तुम मर्द लोग विदेश जा कर कम उम्र की लड़कियों के साथ रंगरलियां मनाने और ऐश करने के लिए सदा लालायित रहते हो. दूसरी लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ाने को आतुर रहते हो. लड़कियों के साथ घूमने और एंजौय करने, मौजमस्ती करते समय तुम्हें एक बार भी यह खयाल नहीं आता कि तुम अपनी पत्नियों के साथ धोखा कर रहे हो. लड़कियां तुम्हें हंस कर देख लें, तुम्हारे साथ मौजमस्ती कर लें तो तुम्हें अपना जीवन सार्थक और धन्य नजर आने लगता है. बोलो, तुम्हारा अंतर्मन एक बार भी तुम्हें कचोटता नहीं है?’’
फिर थोड़ा रुक कर –
‘‘मैं ने न तुम्हारी जेब काटी न बंदूक दिखा कर तुम्हें लूटा है. पैसे तुम ने अपनी मरजी से मुझे दिए थे.’’
‘‘लेकिन तुम ने पैसे वापस करने को तो कहा था न? उस का क्या?’’ मनोज गुस्से से बोला.
‘‘हां, कहा था. नहीं कहती तो क्या एक गरीब और असहाय लड़की की सहायता बिना किसी लालच के करते तुम लोग? नहीं, कभी नहीं करते. धोखा असल में मैं ने तुम्हें नहीं दिया, तुम्हारी गलत प्रवृत्ति ने तुम्हें दिया है. सचसच बताना, पैसा देने के बाद क्या तुम्हारे मन में मेरे साथ हमबिस्तर होने की तीव्र इच्छा नहीं हो रही थी? पैसे के एवज में क्या तुम लोग मेरा शरीर नहीं चाह रहे थे. वह तो मैं पूरे समय तुम्हें शराफत का वास्ता देती रही, इसलिए बच गई. और मैं तुम्हारी मर्यादा और चरित्र की झूठी तारीफें भी इसीलिए करती रहती थी कि तुम लोग अपनी हद में रहो.’’
जूली की बातों की सचाई ने मानो उन्हें नंगा कर दिया. दोनों एकदूसरे से नजरें चुराते हुए सिर नीचा कर के बैठे रहे और जूली बोलती रही.
‘‘सच कहूं तो पुरुषों को उन की प्रवृत्ति ही धोखा देती है. नया रोमांच, नया अनुभव पाने की इच्छा ही उन्हें डुबोती है. तुम लोग अपनी पत्नियों के प्रति वफादार होते नहीं और हमें गालियां देते हो. क्या बुरा करती हूं जो तुम जैसे मर्दों से पैसा ऐंठ कर मैं आज तक अपनी इज्जत बचाती आई हूं. आज के बाद मुझे कभी फोन मत करना क्योंकि यह नंबर मैं आज ही बंद कर दूंगी. अच्छा हुआ, जो अजय को भी सच पता चल गया. गुडबाय,’’ और जूली ने फोन काट दिया.
अजय और मनोज सन्न हो कर चुप बैठे थे, जूली ने उन्हें आईना दिखा दिया था. चिडि़यां खेत चुग चुकी थीं.
बच्चों और सासससुर व घर की देखभाल में लीन एक आदर्श भारतीय नारी. उस की पत्नी, मां और बहू के रूप में आदर्श भारतीय नारी थी. लेकिन वह मनोज के स्वभाव के अनुकूल नहीं थी.
मनोज मस्तमौला, खिलंदड़ स्वभाव का था. वह चाहता था कि मीरा भी उस के साथ दोस्तों की महफिलों में जाए, हंसीमस्ती करे, पार्टियां मनाए, कैंडललाइट डिनर करे, परंतु मीरा को यह सब पसंद नहीं था. उस के पीछे हर समय घर या बच्चों का कोई न कोई काम लगा ही रहता था और मनोज मन मसोस कर रह जाता.
मनोज के दोस्त लड़कियों के साथ अपनी दोस्ती और मौजमस्ती के किस्से सुनाते तो मनोज का दिल भी बल्लियों उछलने लगता था. पर क्या करे, उस के तो औफिस के उस विभाग में, जहां वह काम करता था, एक भी लड़की नहीं थी.
मगर अब जूली से मिलने के बाद मनोज के मन की रंगीनियां जागने लगी थीं. आज का कैंडललाइट डिनर उस के दिल को छू गया था. पैसे को हमेशा किफायत और संभाल कर खर्च करने वाला मनोज अब दिल खोल कर पैसा खर्च कर रहा था ताकि दिल की वर्षों से अधूरी पड़ी तमन्नाएं पूरी हो जाएं.
सुबह मनोज की आंख जल्दी खुल गई. वह देर तक जूली के बारे में सोचता हुआ पलंग पर पड़ा रहा. 8 बजे भावेश और सुरेश फिर से आ धमके मसाज के लिए. आज मनोज सहर्ष तैयार हो गया. तीनों फिर पहुंचे पार्लर. जूली व्यग्रता से मनोज की राह देख रही थी. वह लपक कर उस के पास आई और हाथ पकड़ कर उसे केबिन में ले गई.
आज मसाज के समय मनोज के मन में इच्छाओं के सर्प फन उठा रहे थे. नसों का लहू बारबार आवेश से तेज हो रहा था. पर जूली मसाज करते हुए पूरे समय मनोज के सचरित्र और सभ्यता, संस्कारों के गुण गाती रही, इसलिए वह कुछ बोल नहीं पाया. अपने मन को जबरदस्ती काबू में कर के रखा. आज उन लोगों को शहर से बाहर समुद्र के किनारे पेरासीलिंग के लिए जाना था. बे्रकफास्ट कर के वे लोग निकल जाएंगे और देर शाम को वापस आएंगे. सुनते ही जूली का चेहरा उतर गया तो मनोज ने उसे आश्वासन दिया कि वह डिनर उसी के साथ करेगा.
दिनभर के कार्यकलापों में मनोज बहुत थक चुका था. वह पलंग पर पड़े रहना चाहता था लेकिन जूली से मिलने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा था. गरमागरम पानी से नहा कर वह तैयार हो कर नियत समय पर नियत स्थान पर पहुंच गया. जूली वहां पहले से ही प्रतिक्षारत खड़ी थी. आज उसे देखते ही भावातिरेक में जूली ने उसे गले से लगा लिया. मनोज फड़क उठा. उस की सारी थकान दूर हो गई. देर तक वे पटाया की रंगीन चकाचौंध और मस्ती से भरी हुई सड़कों पर घूमते रहे. फिर एक रैस्टोरेंट में आ कर बैठ गए. वहां का माहौल मदहोश कर देने वाला था. डांसफ्लोर पर जोड़े एकदूसरे की बांहों में खोए हुए झूम रहे थे.
जूली ने मनोज से डांस का प्रस्ताव रखा. उसे तो मुंहमांगी मुराद मिल गई. वह झट से उठ बैठा. जूली के जवान और मस्ती में चूर शरीर के सान्निध्य में मनोज अपनी सुधबुध खो बैठा. वह इस नए अनुभव में पूरी तरह मदहोश हो गया. जूली का नशा उस पर पूरी तरह चढ़ चुका था. वह उस के जादू में गिरफ्तार हो गया.
डिनर करते समय जूली ने आंखों में आंसू भर कर फिर अपनी व्यथा सुनाई कि मातापिता की वृद्धावस्था और दवाइयों के बढ़ते खर्च के दबाव के चलते उस की मां ने कल फिर से उसे रेड जोन में जाने का आग्रह किया. कल उस की मां ने उसे बहुतकुछ उलटासीधा सुनाया कि उसे उन की जरा सी भी चिंता नहीं है, वह तो बस अपनेआप में ही मस्त है.
‘‘मैं उस गंदे धंधे में नहीं पड़ना चाहती मनोज, पर मां लगातार मुझ पर दबाव बनाती जा रही हैं. हर दूसरे दिन मुझे बुराभला कहती रहती हैं. मैं क्या करूं, इस से तो अच्छा है मैं आत्महत्या कर लूं,’’ जूली सुबकते हुए बोली.
‘‘नहींनहीं, जूली.’’ उस के हाथ पर सहानुभूति से अपना हाथ रखते हुए मनोज ने उसे सांत्वना दी, ‘‘ऐसे निराश नहीं होते. मैं जाने के पहले ऐसा इंतजाम कर जाऊंगा कि तुम्हें इस कीचड़ में न धंसना पड़े.’’
‘‘ओह मनोज, सच में. मैं ने अपने जीवन में तुम्हारे जैसा सच्चे और भले हृदय का आदमी नहीं देखा,’’ भावनाओं के अतिरेक में जूली ने मनोज का हाथ अपने दोनों हाथों से पकड़ कर चूम लिया.
उस रात होटल के कमरे में सोया मनोज सुबह होने तक इसी उधेड़बुन में पड़ा रहा कि क्या करे और क्या नहीं. एक क्षण उसे एहसास होता कि वह व्यर्थ ही जूली के चक्कर में पड़ गया है. 4 दिनों के लिए आया है, घूमेफिरे और लौट जाए. बेकार ही यह जंजाल उस ने अपने गले बांध लिया है. जिंदगी में दोबारा कभी उस से मुलाकात तो होगी नहीं, फिर इतना पैसा वह क्यों उस पर खर्च करने की सोच रहा है.
पर दूसरे ही क्षण उस का पुरुषत्व उसे धिक्कारता कि वह एक बेबस की मदद करने से कतरा रहा है. वह भी चंद पैसों के लिए. सच तो यह था कि वह गले तक जूली के आकर्षण में डूब चुका था. उस में पता नहीं ऐसा क्या था कि वह अपनेआप को जूली से तटस्थ नहीं रख पा रहा था. आखिर में उस ने यही तय किया कि वह जूली की मदद अवश्य करेगा. तब जा कर उसे नींद आई.
2 हजार डौलर मामूली रकम नहीं थी. दूसरे दिन भावेश, सुरेश और दोएक और दोस्तों के पास से इकट्ठा कर के मनोज ने ठीक 2 हजार डौलर जूली को दिए. क्षणभर को जूली हतप्रभ सी खड़ी डौलर्स को देखती रही, फिर मनोज के गले लग कर रोने लगी. उस की आंखों में खुशी के आंसू बह रहे थे. उस का स्पर्श पा कर मनोज के दिल में तरंगें उठने लगीं. मन में यह लालसा होने लगी कि काश, अब तो जूली खुश हो कर बस एक बार समर्पण कर दे. पर ऊपर से मर्यादावश वह कुछ बोल नहीं सका. अफसोस, जूली ने भी ऐसी कोई इच्छा नहीं जताई.
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‘‘लेकिन यहां पार्लरों में जिस तरह के लोग आते हैं तुम कब तक अपनेआप को बचा कर रख पाओगी?’’ मनोज ने पूछा.
‘‘हां, कभीकभी बहुत परेशानी में पड़ जाती हूं, बहुत डर लगता है. पर अब तक बची हुई हूं. इसीलिए जल्द से जल्द यहां से वापस जाना चाहती हूं क्योंकि आप जैसे शरीफ और सच्चे लोग हर रोज नहीं मिलते,’’ जूली ने एक बार फिर से मनोज की तारीफ की तो वह और अधिक खिल उठा.
‘‘पर तुम वापस जा कर करोगी क्या?’’ मनोज ने सवाल किया.
‘‘मैं एक गिफ्ट शौप खोलना चाहती हूं. मेरे छोटे से शहर में ज्यादा दुकानें नहीं हैं. अगर मैं शौप खोल पाई तो अपने परिवार का पालनपोषण करने के लायक अच्छा काम कर सकूंगी और फिर मुझे रेड जोन की जिल्लतभरी जिंदगी जीने की कोई जरूरत नहीं रहेगी,’’ जूली आशाभरी आवाज में बोली.
‘‘कितनी रकम की जरूरत है तुम्हें शौप खोलने के लिए?’’ मनोज के मुंह से न चाहते हुए भी जाने कैसे यह सवाल निकल गया.
‘‘2 हजार डौलर में एक अच्छी शौप गांव में खुल सकेगी,’’ जूली ने उत्साहित स्वर में जवाब दिया.
मनोज के गले में जैसे अचानक ही कुछ अटक गया. जूली उस की मनोदशा समझ कर गंभीर मगर रोंआसे स्वर में बोली, ‘‘मैं जानती हूं, यह बहुत बड़ी रकम है. और आज के युग में इतना बड़ा दिल किसी का नहीं होता कि बिना लड़की का इस्तेमाल कर के उसे एक तिनका भी दे दे. आजकल तो सब मर्द शरीर के लोलुप होते हैं. लड़की का जीभर कर इस्तेमाल किया और फिर उस के हाथ में चंद नोट पकड़ा दिए. बिना स्वार्थपूर्ति के महज इंसानियत के नाते लड़की की मदद करने वाले बड़े दिल के स्वार्थरहित सच्चे मर्द आजकल बचे ही कहां हैं.’’
जूली ने एक तीखी चुभती हुई नजर से मनोज को देखा. जूली के आक्षेप से मनोज के अंदर का मर्द तिलमिला गया. उसी क्षण उस के अहं ने सिर उठाया, ‘क्या तुम सच्चे और शरीफ मर्द नहीं हो?’
‘‘नहींनहीं, जूली, मर्दों के बारे में तुम्हारी यह धारणा सही नहीं है. सारे मर्द ऐसे शरीर लोलुप नहीं होते,’’ मनोज ने हड़बड़ा कर उत्तर दिया.
‘‘अरे जाने दीजिए, मनोजजी, मेरा तो रातदिन मर्दों से ही वास्ता पड़ता रहता है. मैं अच्छे से समझ चुकी हूं मर्दों की फितरत और नियत को,’’ जूली कड़वे स्वर में बोली.
‘‘नहीं जूली, तुम्हें मर्दों के बारे में गलत धारणा बना कर नहीं रखनी चाहिए. सारे मर्द एक जैसे नहीं होते,’’ मनोज गंभीर स्वर में बोला.
‘‘मेरा पाला तो आज तक कामुक पुरुषों से ही पड़ा है. मसाज करवाते समय ऐसीऐसी हरकतें करते हैं कि अपनेआप से ही घृणा होने लगती है,’’ जूली की आंखें छलछला आईं.
क्षणभर को मनोज को उस अनजान विदेशी लड़की से सच्ची सहानुभूति हो आई पर उस ने जल्द ही अपनेआप को संभाल लिया. कहीं सहानुभूति जताते ही यह पैसा न मांगने लगे. पर तभी मन के एक कोने में एक धिक्कार सी उठी कि उस से मसाज करवाने में बातें करने में उस के साथ रैस्टोरेंट में मिलने आने में उसे कोई एतराज नहीं है पर उस की मदद के नाम से वह कतरा रहा है. आखिर कहीं न कहीं वह एक कम उम्र खूबसूरत जवान लड़की के प्रति किसी प्रकार का तीव्र आकर्षण अपने मन में महसूस तो कर ही रहा है न.
शाम ढलने लगी थी.
‘‘अब आप कहां जाएंगे?’’ जूली उस से पूछ रही थी.
‘‘मैं सोच रहा हूं कि आज फ्री हूं तो पत्नी और बेटों के लिए कुछ शौपिंग कर लूं,’’ मनोज ने कहा, ‘‘यहां आसपास कोई मौल है क्या?’’
‘‘मौल में तो आप को सबकुछ बहुत महंगा मिलेगा. यहां से पास में ही एक लोकल मार्केट है. वहां क्वालिटी भी अच्छी मिलेगी और कीमतें भी मौल की अपेक्षा काफी कम हैं. यदि आप चाहें तो मैं आप को वहां ले जा सकती हूं. शाम को मैं फ्री हूं,’’ जूली ने प्रस्ताव रखा.
‘‘हांहां, क्यों नहीं. चलो, चलते हैं. अच्छा है मुझे एक खूबसूरत और अनुभवी गाइड मिल जाएगी,’’ अब की बार जूली का मन हलका करने के लिए मनोज ने उस की तारीफ कर दी. जूली का चेहरा खिल गया.
दोनों मार्केट की ओर निकल गए. मार्केट जाने वाली स्ट्रीट पर चारों ओर का वातावरण बड़ा ही उन्मुक्त था. हर ओर लड़केलड़कियां, औरतआदमी छोटेछोटे कपड़ों में एकदूसरे की कमर में हाथ डाले मस्ती में चूर दीनदुनिया से बेखबर अपने ही रंग में झूमते हुए घूम रहे थे. मनोज ने अपने जीवन में पहली बार ऐसी उन्मुक्तता देखी थी. उस का दिल यह सब रंगीनियां देख कर फड़कने लगा.
जूली उस के दिल की हालत समझ गई. उस ने मनोज की कमर में हाथ डाला और उस का हाथ अपने कंधे पर रख लिया और हंस पड़ी. फिर वह भी मनोज के साथ मस्त हो कर घूमने लगी. जूली के स्पर्श से मनोज का रोमरोम सुलगने लगा पर उस ने अपनेआप पर नियंत्रण रखा. हां, उस पर एक मीठी रूमानियत छाने लगी थी. एक लड़की के साथ इस तरह से घूमने का उस का पहला अनुभव था.
जूली ने सही कहा था. यहां पर सुंदर विदेशी वस्तुओं की भरमार थी और काफी सस्ती भी थीं. मनोज ने पत्नी और बच्चों के लिए ढेर सारी शौपिंग कर ली. जूली की आंखों में भी कुछ वस्तुओं को देख कर चमक उभर आई थी जिसे मनोज ने भांप लिया. उस ने जूली को भी वे चीजें खरीद दीं जिन्हें जूली ने बड़े उत्साह और खुशी से स्वीकार कर लिया.
उस रात मनोज ने एक रैस्टोरेंट में जूली के साथ कैंडललाइट डिनर किया. देर रात वह अपने होटल में वापस आया तब तक सब सो चुके थे. उस ने राहत की सांस ली. वरना भावेश और सुरेश व्यर्थ ही प्रश्नों की झड़ी लगा देते.
पलंग पर लेट कर भी मनोज की आंखों में नींद नहीं थी. बचपन से ही वह बौयज स्कूल और कालेज में पढ़ा था, इसलिए कभी लड़कियों से उस का संपर्क और दोस्ती नहीं रही. पढ़ाई के बाद नौकरी और फिर घर की जिम्मेदारियों के चलते मातापिता की मरजी की लड़की से शादी. यही घिसीपिटी कहानी रही उस के जीवन की. विवाह के बाद की जिंदगी भी बहुत ही आम और साधारण रही उस की. कोई नयापन नहीं, कोई रोमांच नहीं.
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किसी का दर्द उस से देखा नहीं जाता था, खासतौर पर लड़कियों का. मसाज का वक्त खत्म हो गया था. मनोज केबिन से निकलने के लिए कपड़े पहनने लगा. जूली का चेहरा उदास सा था, आंखें भरी हुई थीं.
‘‘पता नहीं क्यों, आप से मिलना बहुत अच्छा लगा. आप और लोगों से बहुत अलग हैं. मैं ने सुना था कि भारतीय लोग चरित्र और मन से बहुत सच्चे और अच्छे होते हैं. आज आप के रूप में देख भी लिया.’’
मनोज अपनी तारीफ सुन कर खुश हो गया.
‘‘अब आप से फिर मुलाकात कब होगी? आप पटाया में कब तक हैं?’’ जूली ने आतुर स्वर में पूछा.
‘‘अभी तो मैं 3 दिनों तक यहीं हूं. आज मीटिंग के बाद शाम को फ्री हूं,’’ मनोज ने बताया.
जूली की आंखों में चमक आ गई, ‘‘तो आज शाम को मिल सकते हो क्या?’’ उस ने आग्रहभरे स्वर में पूछा.
‘‘हां, ठीक है. शाम को 6 बजे मिलता हूं,’’ मनोज ने कहा तो जूली खुश हो गई. उस ने मनोज का मोबाइल नंबर ले लिया और अपना उसे दे दिया. जूली से विदा हो कर मनोज बाहर आ गया.
भावेश और सुरेश पहले से ही बाहर उस की राह देख रहे थे. उसे देखते ही दोनों आपस में रहस्यमय ढंग से एकदूसरे को देख कर मुसकराए.
‘‘क्यों बे, तू तो आने को तैयार नहीं था और अब सब से ज्यादा देर अंदर तू ही बैठा रहा,’’ भावेश ने उस की चुटकी ली.
‘‘क्या कर रहा था अंदर? मालिश या और कुछ?’’ सुरेश ने आंख दबाते हुए मनोज की चुटकी ली.
मनोज झेंप गया, ‘‘अरे यार, तुम लोग जैसा समझ रहे हो वैसा कुछ नहीं है.’’
‘‘हां बेटा, हम सब समझते हैं कि कैसा है,’’ दोनों ने उसे चिढ़ाया.
तीनों वापस होटल आ गए. नहाधो कर सब बे्रकफास्ट करने पहुंचे. फिर 11 बजे से मीटिंग शुरू हो गई. 2 बजे लंच के बाद फिर से मीटिंग हुई. साढ़े 4 बजे मीटिंग खत्म होने पर मनोज अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर औंधा पड़ गया. उसे कस कर नींद आ रही थी. अभी वह थोड़ी ही देर सोया होगा कि उस का मोबाइल बजने लगा.
फोन जूली का था. ‘‘क्या हुआ, आप सो रहे थे क्या? माफ कीजिएगा, मैं ने आप की नींद में खलल डाल दिया,’’ जूली क्षमायाचना करते हुए बोली.
‘‘अरे कोई बात नहीं, मैं बस उठ ही रहा था. कहो,’’ मनोज ने कोमल स्वर में कहा.
‘‘कुछ नहीं, मेरी ड्यूटी खत्म हो गई है. आप की याद आई तो सोचा फोन कर लूं,’’ मनोज के कोमल स्वर से उत्साहित हो कर जूली ने बात करनी शुरू की.
दोनों इधरउधर की बातें करने लगे. बातोंबातों में जूली ने मनोज से मिलने की और कुछ वक्त उस के साथ बिताने की इच्छा जाहिर की. कुछ देर सोचने के बाद मनोज ने 15 मिनट बाद मसाज पार्लर के बाहर मिलने का वादा किया.
15 मिनट बाद नए कपड़े पहन कर और ढेर सारा डियो लगा कर मनोज सब की नजरें बचाते हुए होटल से बाहर निकला. वह नहीं चाहता था कि उस
के साथ आए लोगों में से कोई उसे देख ले और टोके, खासतौर पर भावेश और सुरेश.
जूली पार्लर के बाहर ही खड़ी थी. मनोज को देखते ही उस का चेहरा खिल गया. दोनों पास के एक रैस्टोरेंट में जा कर बैठ गए. जूली ने मनोज के परिवार के बारे में पूछना शुरू किया.
‘‘मेरे घर में पत्नी और 2 बेटे हैं.’’
‘‘क्या करते हैं आप के बेटे? कौन सी क्लास में हैं?’’ जूली के स्वर में उत्सुकता थी.
‘‘बड़ा बेटा इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में है और छोटा बेटा प्रथम वर्ष में,’’ मनोज ने बताया.
‘‘अरे, आप तो बहुत यंग दिखते हैं. आप को देख कर लगता ही नहीं है कि आप के इतने बड़े बच्चे हैं,’’ जूली आश्चर्य से बोली, ‘‘काफी मैंटेन कर के रखा है आप ने अपनेआप को.’’
‘‘थैंक्यू सो मच,’’
मनोज का चेहरा खुशी से लाल हो गया. यह पहली बार हुआ था कि किसी लड़की ने उस की तारीफ की थी.
मनोज ने जूली की इच्छानुसार 2 कोल्ड डिं्रक और 2 बर्गर का और्डर दे दिया. फिर वह जूली से परिवार के बारे में बातें करने लगा.
‘‘तुम यहीं पटाया में रहती हो क्या?’’
‘‘नहीं, मैं बैंकौक के पास एक बहुत छोटे से शहर में रहती हूं,’’ जूली ने बताया.
‘‘फिर तुम यहां पटाया में कैसे आ गई?’’ मनोज ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘तुम्हारे घर में कौनकौन हैं?’’
‘‘मेरे घर में बूढ़े मातापिता और 2 बड़े भाई हैं. यहां पटाया में मैं अपना और मातापिता का भरणपोषण करने के लिए आई हूं,’’ जूली ने खिड़की से बाहर देखते हुए बताया.
‘‘जब तुम्हारे 2 बड़े भाई भी हैं तो तुम्हें यहां इतनी दूर आने की क्या जरूरत थी?’’ मनोज ने आश्चर्य से पूछा.
एक गहरी सांस ले कर जूली ने विस्तार से बताना प्रारंभ किया, ‘‘मेरे दोनों बड़े भाई शादी कर के मातापिता से अलग हो गए हैं. वे घर में एक पैसा भी नहीं देते. यहां तक कि घर में आते भी नहीं हैं. मेरे पिता और मां दोनों जिंदगीभर दूसरों के खेतों में मजदूरी कर के अपना घर चलाते रहे. भाइयों की पढ़ाई और शादी में उन की सारी जमापूंजी खत्म हो गई. अब हमारे पास खाना खाने के भी लाले पड़ गए. पिता अब काफी बूढ़े हो गए हैं और अधिक मजदूरी नहीं कर सकते.’’
‘‘तो तुम ने वहीं कोई नौकरी क्यों नहीं कर ली?’’ मनोज ने सवाल किया.
‘‘पैसों की कमी के कारण पिताजी मुझे ज्यादा पढ़ा नहीं पाए. वहां ऐसी कोई नौकरी नहीं मिली जिस से गुजारे लायक कमा पाऊं. इसलिए मां ने 6 महीने पहले मुझे यहां पटाया भेज दिया ताकि मसाज का काम सीख कर पैसा कमा सकूं. वे तो मुझ से बुरा काम करने पर भी जोर दे रही हैं क्योंकि उस में पैसा बहुत मिलता है. पटाया में हजारों लड़कियों इसी काम में लगी हैं और सैलानियों से अच्?छाखासा पैसा ऐंठती हैं,’’ जूली ने तिक्त स्वर में कहा.
‘‘फिर तुम अब तक…?’’ मनोज ने उस के चेहरे पर एक भेदभरी नजर डालते हुए पूछा.
‘‘नहीं,मैं अभी तक वर्जिन (कुंआरी) हूं,’’ जूली ने तपाक से उत्तर दिया,
‘‘मैं किसी भी कीमत पर रेड जोन में नहीं जाना चाहती, चाहे मर ही क्यों न जाऊं. मैं इज्जत की जिंदगी गुजारना चाहती हूं.’’
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कंपनी के खर्चे पर दोस्तों के साथ थाईलैंड जाना मनोज के लिए किसी सपने के पूरा होने जैसा था. वहां जा कर जूली से मिलने के बाद मनोज के मन की रंगीनियां जागने लगीं और नया अनुभव पाने की इच्छा में उस के साथ ऐसा क्या घटा कि वापस आ कर उसे लगा कि बेकार की भावनात्मक सहानुभूति में पड़ कर उसे अच्छाखासा चूना लग गया?
कंपनी मीटिंग के लिए थाईलैंड ले जाने वाली कंपनी की बात सुनते ही मनोज और उस के दोस्तों की बाछें खिल गईं. एक तो कंपनी के खर्चे पर विदेश जाने का मौका और वह भी थाईलैंड जैसी जगह, जहां पत्नी और बच्चों का झंझट नहीं. यानी सोने पर सुहागा. मनोज और उस के दोस्त सुरेश और भावेश तैयारियों में लग गए. वे दिन गिनने लगे. जाने के जोश में वे अतिरिक्त उत्साह से काम करने लगे. जाने का दिन भी आ गया. अहमदाबाद से तीनों मुंबई पहुंचे. कंपनी के देशभर के डीलर मुंबई में इकट्ठा होने वाले थे फिर वहां से सब इकट्ठा बैंकौक जाने वाले थे.
रात की फ्लाइट से सब बैंकौक पहुंचे और सुबह बस से पटाया पहुंचे. होटल पहुंच कर सब अपनेअपने कमरों में जा कर आराम करने लगे. मनोज को हफ्तेभर से बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी. वह थकान से निढाल हो कर पलंग पर लेट गया. लेटते ही उस को झपकी आ गई. आधे घंटे बाद ही रूम की बेल के बजने से उस की नींद खुल गई. उस ने झल्लाते हुए नींद में ही दरवाजा खोला.
भावेश और सुरेश तेजी से कमरे में आए और चहकते हुए बोले, ‘‘चल यार, थाई मसाज करवा कर आते हैं.’’
‘‘शामवाम को चलेंगे यार, अभी तो थोड़ा सोने दो, बहुत थक गया हूं,’’ मनोज ने पलंग पर लेटते हुए कहा.
‘‘अरे, शाम को तो ओपन शो देखने जाएंगे. मसाज का टाइम तो अभी ही है. फिर आने के बाद नाश्ता करेंगे,’’ सुरेश ने कहा.
‘‘अबे, तू यहां सोने आया है क्या. और थाई मसाज करवाने से तो सारी थकान उतर जाएगी,’’ भावेश ने सुरेश को देख कर आंख मारी.
‘‘और क्या, होटल के सामने वाली सड़क के उस पार ही तो मसाज पार्लर है,’’ सुरेश ने कहा.
‘‘तुम लोग जरा देर भी सोए नहीं क्या, मसाज पार्लर भी ढूंढ़ आए. गजब हो यारो तुम भी,’’ मनोज आश्चर्य से उठ बैठा.
सोने के लिए तो उम्र पड़ी है. यहां चार दिन तो ऐश कर लें. चलचल उठ जा और चिंता मत कर, हम भाभी को कुछ नहीं बताएंगे,’’ भावेश ने मनोज से चुटकी ली.
मनोज झेंप गया, ‘‘चलो, चलते हैं,’’ कह कर उठ गया.
तीनों होटल से बाहर निकले और रोड क्रौस कर ली. सामने ही रोज मसाज पार्लर था. तीनों पार्लर में चले गए. रिसैप्शन पर भड़कीले और कम कपड़ों में एक थाई लड़की खड़ी थी. उस ने मुसकरा कर तीनों का स्वागत किया. उस ने गहरे गले की शौर्ट ड्रैस पहन रखी थी. उस के आधे उभार ड्रैस से बाहर दिखाई दे रहे थे.
उसे देखते ही सुरेश और भावेश की बाछें खिल गईं. मीठीमीठी बातें कर के उस लड़की ने तीनों का मन जीत लिया. थाई मसाज के उस लड़की ने तीनों से कुल 2,400 भाट रखवा लिए. भाट थाइलैंड की करैंसी है. सुरेश, भावेश ने तो खुशी से पैसे दे दिए लेकिन मनोज को 800 भाट देते हुए थोड़ा बुरा लगा. इतना पैसा सिर्फ मसाज करवाने के लिए. इस से तो दोनों बच्चों के लिए या पत्नी मीरा के लिए अच्छी ड्रैसेज आ जातीं. थोड़ा भारी मन लिए हुए वह मसाज केबिन की ओर बढ़ा. उस के दोनों दोस्त पहले ही खुशी से फड़कते हुए केबिनों में जा चुके थे. मनोज ने भी एक केबिन का दरवाजा खोला और धड़कते हुए दिल से अंदर दाखिल हुआ.
केबिन में बड़ा रहस्यमय और सपनीला सा माहौल था. पीली नारंगी मद्धिम रोशनी. एकतरफ लाल रंग की सुगंधित मोमबत्तियां जल रही थीं. खुशबू और रोशनी का बड़ा दिलकश कौंबिनेशन था. मसाज बैड के पास एक 25-26 साल की खूबसूरत युवती खड़ी थी. वह चटक लाल रंग की शौर्ट बिना बांहों की ड्रैस पहने खड़ी थी. लाल रंग में उस का गोरा रंग गजब का खिला हुआ दिख रहा था. टाइट ड्रैस में से उस के सीने के उभार स्पष्ट दिख रहे थे. मनोज क्षणभर को अपनी सुधबुध खो कर लोलुप दृष्टि से उसे देखता रह गया. लड़की उस की हालत देख कर मुसकरा दी तो मनोज झेंप गया.
मसाज वाली लड़की ने इशारे से उसे कपड़े उतार कर बैड पर लेटने को कहा. मनोज उस के जादू में खोया या यंत्रवत कपड़े एक ओर रख कर बैड पर लेट गया. बैड की चादर मुलायम और मखमली थी. इतनी नर्म चादर मनोज ने अपने जीवन में पहली बार देखी थी. कमरे में मनोज को ऐसा लग रहा था कि वह किसी तिलिस्मी दुनिया में आ गया है. वह एक अनोखी रूमानी दुनिया में पहुंच गया. तभी लड़की ने एक सुगंधित तेल उस की पीठ पर लगा कर मसाज करना शुरू कर दिया.
लड़की के मादक स्पर्श से वह मदमस्त हो कर एक मादक खुमारी में खो गया. उस पर एक हलका सा नशा छाता जा रहा था. बंद कमरे में एक जवान लड़की के साथ एक रोमांटिक माहौल में मसाज करवाने का यह उस का पहला अनुभव था. 800 भाट खर्च होने का अफसोस जाता रहा. मसाज करीब 1 घंटे तक चला. थोड़ा नशा हलका होने पर जानपहचान बढ़ाने के मकसद से मनोज ने उस लड़की से बातचीत करनी शुरू कर दी. वह लड़की थोड़ीबहुत अंगरेजी बोल पा रही थी. मनोज ने उस से उस का नाम पूछा तो उस ने जूली बताया. मनोज ने उस की शिक्षा और घरपरिवार के बारे में बात की. वह 25 वर्ष की गे्रजुएट लड़की थी. उस का घर पटाया से दूर एक गांव में था. मातापिता बूढ़े थे. वह घर चलाने के लिए पटाया में यह काम कर रही थी.
न जाने उस के चेहरे और स्वर में ऐसी क्या पीड़ा थी, एक दर्द सा झलक रहा था कि मनोज का दिल पिघल गया. यों भी, वह कच्चे मन का भावुक इंसान था.
आगे पढ़ें- मसाज का वक्त खत्म हो गया था. मनोज केबिन से…
पिछले कई महीनों से मेरे वो (पतिदेव) परेशान दिखाई दे रहे थे. एक तो उन की कोई मल्टीनैशनल कंपनी थी, वह बंद होने वाली थी, दूसरे, स्वास्थ्य संबंधी कोई न कोई शिकायत बराबर बनी रहती थी. वे परेशान थे तो मैं भी परेशान रहती थी. एक बार मैं सड़क पर पैदल चली आ रही थी. दिमाग में पतिदेव का परेशान चेहरा घूम रहा था, तभी मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे एक व्यक्ति पर गई जोकि पिंजरा लिए हुए था. उस में एक तोता था. उस पर एक छोटा सा बोर्ड लगा रखा था, ‘प्रत्येक समस्या का हल तोता महाराज देता है.’
मैं उस के पास रुकी, अपनी समस्या बताई तो उस ने 50 रुपए का एक नोट मांगा. हम ने अपनी बचत में रखे 50 रुपए के नोट को दिया इस उम्मीद के साथ कि पता लग जाएगा कि हमारी खुशियों की मंजिल कितनी दूर है. नोट ले कर उस पिंजरे का मालिक खुश हो गया. उस ने पिंजरे का पल्ला खोला. सामने 2 दर्जन लिफाफे थे. तोता बाहर निकला, हमारा चेहरा देखा, मानो कह रहा हो, ‘अरी मूर्ख, मैं क्या तेरा भविष्य बतलाऊंगा? मैं तो पिंजरे में कैद हूं. कब इस बंधन से मुक्ति मिलेगी, मैं तो यही नहीं जानता हूं.’ लेकिन यह सब तो मुझे पहले ही सोच लेना था. अब तो 50 रुपए तोता वाले को जेब में जा चुके थे. तोते ने 1-2 मिनट बाद 1 लिफाफा उठाया और फिर अपने दड़बे में चला गया.
उस तोता वाले ने लिफाफा खोला और हमें कागज पढ़ने को दिया. लिखा था, ‘हिम्मत, साहस से काम लो तब परेशानियों से मुक्ति मिलेगी.’ यह तो मैं भी जानती थी लेकिन इस ज्ञान का रिवीजन 50 का नोट हमारी पौकेट से जाने के बाद मालूम पड़ा. मैं दुखी मन से आगे बढ़ गई. अभी भी पतिदेव का उदास चेहरा आंखों के सामने घूम रहा था. तब ही हमें भीड़ दिखाई दी. मैं उस भीड़ के पास जा पहुंची. देखा कि एक मोटातगड़ा सांड यानी बैल बीच में खड़ा था. उस से प्रश्न पूछे जा रहे थे. वह सब को उत्तर दे रहा था. कभी हां में सिर हिलाता, कभी नहीं में मुंह मटकाता. सब खड़ेखड़े उस की प्रशंसा कर रहे थे. प्रत्येक प्रश्न पर वह 100 रुपए वसूल रहा था. हम ने भी 100 का नोट दे कर अपने पति की राह में जो दुख हैं, उन के खत्म होेने के विषय में जानना चाहा. 100 का नोट पा कर वहां खड़ा सांड का मालिक खुश हो गया. हमें हिदायत दी गई थी कि सवाल मन ही मन में करना है. सो, मैं ने मन ही मन में प्रश्न किया कि हमारी परेशानियां कब दूर होंगी.
सांड हमारे सामने आ कर खड़ा हो गया और हमारा दिल जोरों से धड़कने लगा. सांड ने ऊपर से नीचे तक हमें घूरा और अपना सिर नहीं में हिला दिया. सांड का मालिक खुश हो गया. उस ने कहा, ‘‘बहनजी, आप ने जो सवाल किया उस पर इस ने कहा कि आप के दुश्मन आगे नहीं बढ़ पाएंगे, बधाई हो.’’
मैं मन ही मन दुखी हो गई थी कि उस ने बड़ा भयंकर जवाब दिया कि तुम्हारी परेशानियां समाप्त नहीं होंगी.
मैं दुखी मन लिए आगे बढ़ती गई, तभी मेरा नाम ले कर किसी ने आवाज दी, मैं रुक गई. मेरी पुरानी सहेली थी.
‘‘कैसी गुम हो कर चल रही थी?’’
‘‘थोड़ी परेशानी है,’’ मैं ने कहा.
‘‘तुझे मैं ने 4 आवाजें दीं, फिर दौड़ कर तेरा हाथ थामा, जब तू जागी,’’ मेरी सहेली शिकायत कर रही थी.
‘‘सौरी यार,’’ मैं ने उस से कहा, फिर मैं ने बताया कि किस तरह मैं परेशान चल रही हूं.
सुन कर उस ने तुरंत कहा, ‘‘चिंता मत करो, मेरे पास एक तांत्रिक बाबा का पता है. ये सब क्रियाएं तुम्हारे दुश्मनों ने तुम पर करवाई होंगी, वे सब ठीक कर देंगे.’’
मैं सुबह स्नान कर के सहेली के घर जा पहुंची, वह मुझे तांत्रिक बाबा के पास ले गई, उस ने तांत्रिक क्रिया करने के 1001 रुपए फीस के हम से ले लिए. पूरे दोपहर तक वह न जाने क्याक्या मंत्र पढ़ता रहा और फिर मुझे भभूत दे कर कहा, ‘इसे पति पर मसल देना और घर में फैला देना.’
उन का आदेश मान कर मैं थैला भर राख ले कर आई थी, पूरे घर में छिड़काव किया और बाकी बची राख को पति पर डालने गई तो वे नाराज हो उठे.
तांत्रिक ने बताया था कि यदि वे भभूत पूरे बदन पर न लगवाएं तो सौ प्रतिशत मान लेना कि उन पर चौंसठयोगिनी कन्याओं की क्रिया कर के मारण मंत्र बिगाड़ा तंत्र किया गया है.
तांत्रिक की बात सही निकली. पति राख को पूरे बदन पर लगाने से इनकार कर गए. मैं रोई, मनाया लेकिन साजन नहीं पिघले. रात सोलहशृंगार कर के मैं ने उन्हें लुभाया और जब वे मस्ती में डूबे हुए थे तब पलंग के नीचे रखी वह भभूत मैं ने मुट्ठी में भरकर उन के पूरे बदन पर फेंक दी. वे नाराज हो गए, विकराल रूप धारण कर के विकृत दिखाई देने लगे. ऐसे दिखाई दे रहे थे मानो फिल्मी भूत हों.
हमें उम्मीद थी किसी परिणाम की, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला और 20 दिनों तक वे अबोले रहे. हमारा पारिवारिक जीवन तहसनहस हो गया. मैं ने मन ही मन तांत्रिक को कोसा, गालियां दीं. लेकिन मेरे तो हजार रुपए जा चुके थे. मैं पति से अधिक चिंता में डूबी थी कि हमारी दूर की रिश्तेदार आईं, उन्होंने हमारी उदासी का कारण जाना और हंसने लगीं. फिर कह उठीं, ‘‘इतनी सी परेशानी से इतनी दुखी. अरे, एक तीर्थस्थली है गधीया बाबा की. वहां जाने पर सब दुखदलिद्र दूर हो जाते हैं.’’
मैं ने प्रश्न किया, ‘‘रुपए कितने लगते हैं?’’
‘‘अरी पगली, एक पैसा भी नहीं, भोजन मुफ्त में, फिर काम होने पर जो दान देना चाहो, देते रहना.’’
‘‘अपने देश में ऐसी जगह भी है?’’
‘‘अरी पगली, अपने देश में ऐसी ही जगहें हैं, जहां केवल चमत्कार ही चमत्कार होते हैं,’’ हमारी रिश्तेदार ने बताया.
हम ने पतिदेव को मनाया, अपने जेवर का 10 प्रतिशत हिस्सा बेच दिया और पतिदेव से हाथ जोड़ कर गधीया बाबा जाने की जिद की. रातदिन के खटराग सुनने से वे भी परेशान हो उठे और आखिर हमारे साथ जाने को तैयार हो गए.
हम जब उस समाधिस्थल पर पहुंचे तो तुरंत सेवक ने हमें घेर लिया. उन के ही द्वारा निर्माण किए गए विश्रामस्थल पर ले गए. स्नान करवाया और दर्शन के पूर्व मुफ्त का भोजन करने की सलाह दी. मैं गद्गद हो गई थी. भोजन के लिए पतिदेव लाइन में लगे, लाइन चीन की दीवार जैसी लंबी थी. मुझे तो भूख के मारे चक्कर आने लगे. सेवक ने हम से 100 रुपए लिए और जल्दी ही खाने का टोकन ला दिया. भोजन का टोकन लेने के बाद फिर भिखारियों की तरह भोजन लेने के लिए खड़े हो गए. बड़ी मुश्किल से भोजन किया. जब तक भोजन कर के निबटे तब तक समाधिस्थल के द्वार बंद हो चुके थे.
रात रुकने का चार्ज अदा करने के बाद फिर रातभर हम ने अपने खून को मच्छरों, खटमलों के हवाले कर के सुबह की प्रतीक्षा की. सुबह नींद लगी ही थी कि सेवक ने दरवाजा बजा कर हमें सोते से उठाया. जल्दी से नहाने का उपदेश दिया ताकि दर्शन हो सकें. ढेर सारी मनोकामनाएं लिए हम ने फटाफट स्नान किया. सुबह का सूरज निकला भी नहीं था कि हम समाधिस्थल की ओर मैराथन दौड़ में शामिल हो गए. जिसे देखो, भागा जा रहा था. कितने दुखी और श्रद्धालु लोग हैं, मैं यह सब सोच रही थी.
सेवक ने कानों में कहा, ‘‘यदि शीघ्र दर्शन करने हों तो 5001 रुपया लगेगा, वरना लाइन में लगने पर हो सकता है आप का नंबर आतेआते पट बंद हो जाएं.’’
मैं ने जब श्रद्धालुओं की भीड़ देखी तो सच मानिए, मुझे ऐसा लगा मानो कोई युद्धस्थल का शरणार्थियों से भरा मैदान हो. पतिदेव ने 5001 रुपए दिए और हम ने पीछे के द्वार से 1 मिनट में दर्शन कर लिए. अपनी मांगों का आवेदनपत्र भी मन ही मन समाधि मंत्री को दे दिया. मैं बड़ी खुश थी कि चलो, अब तो हमारे जीवन की समस्याएं सुलझ जाएंगी, लेकिन पतिदेव अकाउंट सैक्शन में हैं और हिसाबकिताब बड़ा कड़क करते हैं.
हम थकहार कर जब बैठे तो पतिदेव ने सेवक से प्रश्न किया, ‘‘करीब कितने लोग प्रतिदिन यहां आते हैं?’’
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पतिदेव की बात सुन कर उस ने बताया, ‘‘साहब, कम से कम 40 से 50 हजार लोग प्रतिदिन आते हैं. देखिए न, उन की मनोकामनाएं पूरी हुईं तो किसी ने सोने का सिंहासन चढ़ाया, किसी ने हीरे का मुकुट. समाधि बाबा सब के मन की इच्छा पूरी करते हैं.’’
‘‘सब की इच्छाएं?’’ पतिदेव ने दोबारा पूछा.
‘‘जी हां, साहब, सब की,’’ उस ने झट से जवाब दिया और अगले ग्राहक की प्रतीक्षा में बाहर देखने लगा.
‘‘यह गधीया बाबा का समाधिस्थल कब से है?’’
‘‘साहब, 20 साल से तो मैं देख रहा हूं,’’ सेवक ने श्रद्धा से भर कर कहा.
‘‘माना 20 वर्ष से ही सही, अब हिसाब लगाओ सेवकजी, 1 महीने में 6 लाख और सालभर में 72 लाख लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं तो 20 वर्षों में लगभग 20 करोड़ के लगभग जोड़ होता है. लेकिन आज भी देश में 85% लोग गरीबी भरा जीवन जी रहे हैं. उन की गरीबी, देश की अज्ञानता क्यों दूर नहीं हुई? फिर इन बाबाजी के अतिरिक्त आधा दर्जन और भी समाधि बाबा हैं, सब का हिसाब लगाऊं तो 1 साल में इस देश को विश्व का सब से सुखीसंपन्न देश हो जाना चाहिए था, जो आज तक नहीं हुआ,’’ फिर मेरी ओर देख कर उन्होंने कहा, ‘‘ये तांत्रिक, बाबा, समाधियों के चक्कर में तुम ने 10 हजार और बरबाद कर के एक परिवार को गरीब करवा दिया. अपने पर भरोसा करो. क्यों बाहर दौड़ लगा रही हो? मेरी एक नौकरी जाएगी तो दूसरी मिल जाएगी. ठीक से इलाज करवा लूंगा तो ठीक हो जाऊंगा. क्यों ऐसे पाखंडों में पड़ी हो? उठो और घर चलो. शांति, सुख हमें अपने घर में मिलेगा, समझीं,’’ कह कर वे खड़े हो गए.
मेरी भी आंखें खुल गईं. सच तो कह रहे हैं, इतनी समाधि, इतने बाबाओं के चलते देश गरीब होता जा रहा है और बाबाओं की समाधियां अमीर होती जा रही हैं.
मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया था. मैं ने पतिदेव से कहा, ‘‘घर लौट चलते हैं, हम मिल कर संघर्ष कर के अपना नया रास्ता बनाएंगे, मंजिल जरूर मिलेगी.’’
पतिदेव खुश हो गए. उस पाखंडी सेवक का चेहरा पीला पड़ गया था. वह नजरें नीची किए चुपचाप खिसक गया.