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सम्मानों की व्यथाकथा

कहने को तो हैं कलाकार और साहित्यकार, लेकिन इन का कम्बख्त पापी पेट कलासाहित्य से नहीं, सरकारी पुरस्कारों से भरता है. तभी तो ये कामधाम, लिखनापढ़ना छोड़ कर रुपए, सांठगांठ, नेतागीरी और दलाली के रास्ते पद्मश्री का जुगाड़ लगाने से गुरेज नहीं करते. लेकिन तमाम कोशिशें फेल हुईं और महाशय अस्पताल में भरती हैं. भला क्यों?

नए साल का शुभारंभ यानी पहला महीना जनवरी कई कारणों से कुछ लोगों के लिए बहुत दुखदायी बन कर आता है. जनवरी आते ही दिल की धड़कनों पर असर होने लगता है. सीने में दर्द, बेहोशी, ब्लडप्रैशर का अचानक बढ़ जाना आम बात है. दिल का दौरा पड़ने की नौबत आ जाती है. यह कोई पहेली नहीं हकीकत है.

बुद्धिजीवी किस्म के समाजसेवियों के लिए यह माह निराशा का संदेश ले कर आता है. लोककलाकारों की अस्मिता पर चोट कर उन्हें असहनीय दर्द दे जाता है. साहित्यकारों को मर्मांतक पीड़ा पहुंचाने में कोई कसर नहीं रखता. कड़कड़ाती ठंड की वजह से देश का बहुत बड़ा हिस्सा बर्फ की चादर ओढ़ लेता है लेकिन इधर दुख की चादर तनी हुई दिखाई देती है. जनवरी में गणतंत्रदिवस समारोह मनाते हैं. अपने गणतंत्र को फलताफूलता बनाए रखने की शपथ लेते हैं. इसी बीच पद्म पुरस्कारों की घोषणा हो जाती है. दुख के घने बादलों का बरसना यहीं से शुरू होता है.गोपीकृष्ण ‘गोपेश’ पिछले 4 दिनों से अस्पताल में थे. टीवी समाचार देखते वक्त सीने में हलका दर्द हुआ. दर्द बढ़ने पर आपातकक्ष तक जाना पड़ा. वहां से वार्ड में शिफ्ट हुए. आज लौटे हैं. पिछले

4 वर्षों से पद्मश्री सम्मान के पीछे हाथ धो कर पड़े हैं. दिसंबर से ले कर मध्य जनवरी तक उत्साहित रहते हैं. फिर उत्सुकता बढ़ती है. ऐसा आश्वासन मिला था कि सम्मान पाना पक्का समझ बैठे थे.

टीवी में समाचार देख कर झटका लगा. घोषणा में उन का नाम नदारद था. अर्धबेहोशी में अस्पताल जाना पड़ा. पिछले वर्ष भी बीमार पड़े थे. कुछ वर्षों से लिखनापढ़ना बंद है. सरकार के कई पुरस्कार समेट कर बैठे हैं. 2 साल के लिए लालबत्ती लगी कार मिली थी. ऐशोआराम की जिंदगी बिता चुके हैं. ‘गोपेश’ के लिए साहित्य, सीढ़ी से ज्यादा कुछ नहीं है. कुछ किताबें भी प्रकाशित हुई हैं जो दोयम दरजे की भी नहीं हैं. कूड़े का मंजर है. उसी के बल पर पद्मश्री पाने का सफर है.

लोककलाकार शीतलदास को भी करारा झटका लगा. ठुमकना भूल कर पद्मश्री के पीछे दीवाने बन गए. अच्छे कलाकार हैं. बचपन से साधना की. विरासत में बहुतकुछ मिला. आगे बढ़े. राजधानियों तक पहुंचे. कई देशों की यात्राएं कीं. मान, सम्मान, मैडल और राज्य सरकार का पुरस्कार बटोर चुके हैं. लेकिन पापी पेट, खाली का खाली.

3 लोककलाकारों को पद्म पुरस्कार मिल चुका है. ये अभागे हैं. अपने को हर साल कोसते हैं. पद्म पुरस्कार के चक्कर में अपने परफौर्मेंस का सत्यानाश कर बैठे. अब अस्पताल में हैं. हलका दौरा आया. मुख्यमंत्री के निर्देश पर अच्छी व्यवस्था हो गई है. दौरे का कारण डाक्टर ने डिप्रैशन बताया. जनवरी का महीना बेहद तकलीफदेह हो कर गुजरता है. सरकार किस की सिफारिश करे. कितने लोककलाकारों को संभाले. तराजू के मेढक की तरह संभलते नहीं. तौले, तो कैसे तौले?

एक लोककलाकार का और भी बुरा हाल है. 1 लाख रुपए दे बैठे. जमीन का कीमती टुकड़ा बेच कर रुपयों की व्यवस्था की. दलाल से सौदा हुआ. इधर पुरस्कार दिलाने के लिए दलाल भी सक्रिय हुए हैं. दिल्ली तक दौड़ लगाते हैं. पूरा एक गिरोह सक्रिय है. लोककलाकारों को ज्यादा फांसते हैं. आश्वासन की पुडि़या जेब में रख देते हैं. इस बार पूरा आश्वासन मिला था. अभी युवा हैं. सदमा झेल गए. 40 की उम्र पार नहीं कर पाए हैं. विदेश तो ठहरा गंगा घाट का पानी. सो पानी पी आए हैं. यानी विदेश हो आए. अच्छे कलाकार हैं. इस बार भी घोषणा से नाम गायब है.

पत्नी रोरो कर बेहाल है. कम उम्र में शादी हुई. बच्चे 20-22 के हो चले हैं. कहने लगे, ‘अंकल, पिताजी को बहुत समझाया. मानते नहीं. इतना कुछ मिल चुका है, जितना हमारी सात पुश्तों ने नहीं देखा होगा. फिर भी हर साल पद्मश्री के पीछे पड़ जाते हैं.’ उस की पत्नी स्वयं सिद्धहस्त लोककलाकार है. कहने लगी, ‘मैं हर साल समझाती हूं. मेरी समझाइश पर ध्यान नहीं देते. एक चुड़ैल है, जो इन को उकसाती है. एक बार विदेश हो आई है इन के साथ. 1 लाख रुपए दलाल को दे कर बैठे हैं. इतने में तो बेटी की शादी की तैयारी हो जाती. 30-35 ग्राम सोना आ ही जाता. 1 लाख रुपए और रखे हैं. कहते हैं कि पद्मश्री मिलने के बाद ऐसा जश्न मनाऊंगा कि पूरा खानदान याद रखेगा. मुख्यमंत्री को बुलाने की सोच कर बैठे हैं. जिस दिन से घोषणा हुई है, घर से बाहर नहीं निकले हैं.’

अक्तूबर माह भी पुरस्कार और सम्मान की लालसा में बैठेठाले लोगों के लिए खतरनाक साबित होता है. नवंबर में राज्योत्सव की शुरुआत होती है. अक्तूबर में घोषणाएं. राज्य सरकार के पुरस्कारों की संख्या कम नहीं है. 2 दर्जन के करीब हैं. भानुमति का पिटारा है. फिर भी कम पड़ते हैं. बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, समाजसेवियों व लोककलाकारों की छटपटाहट बढ़ती है. सीने में जकड़न, बेहोशी और हार्टअटैक के लक्षण वालों की संख्या भी बढ़ जाती है. यहां भी दलाल सक्रिय हैं. वे ऊंचे किस्म के सफेदपोश हैं. सिर्फ वाहनों में चलते हैं. बंगलों में पलते हैं. राज्य में जूरियों की लौबी तैयार हो गई है. बदलबदल कर वही चेहरे, जिन में दबंग युवा हैं. विशेषज्ञ टाइप के बुद्धिजीवी हैं. कुछ प्रतिष्ठित उम्रदराज हैं जिन का काम ही अब तथास्तु कहना है. मंत्रियों के वजनदार चमचे हैं. कुछ नारदमुनि की हैसियत वाले हैं जो लगातेबुझाते रहते हैं. पिछले कुछ वर्षों से ये लोग सम्मानों पर आखिरी मुहर लगाते हैं. फिर इन के ऊपर हाईकमान है जो रातोंरात किसी भी निर्णय को बदलने की क्षमता रखते हैं.

जूरियों का अपना दर्द है जो कुरेदने पर फूट कर बाहर निकलता है. इन में से कई सम्मान के हकदार हैं. लेकिन इन्हें रुतबेदार जूरी वगैरह बना कर संतुष्ट कर दिया जाता है. कई जूरी तो हर वर्ष अपने पद पर काबिज हो जाते हैं. हफ्तापंद्रह दिन स्वप्नलोक में गुजारते हैं. मोबाइल में सोते हैं, मोबाइल से जागते हैं. पारदर्शी बने रहते हैं. आप के चश्मे का लैंस ठीक हो तो इन की पारदर्शिता को तारतार होते देखा जा सकता है. पूरे प्रदेश में इन दिनों नूराकुश्ती का दृश्य दिखाई देता है. तुम मेरी प्रशंसा करो, मैं तुम्हारी प्रशंसा में लेख लिखता हूं. जरूरत पड़े तो थोड़ी आलोचना करो. मैं तुम्हारी आलोचना कर माहौल बनाऊंगा. जूरी लौबी, सम्मान पाने वालों की दुर्दशा देख कर सम्मान पाने का ख्वाब देखना ही छोड़ चुकी है.

रिटर्न गिफ्ट: भाग-3

पूरे 10 वर्ष बाद हरीश बाबू ने इस घर में पैर रखा. अम्मा और अपने बचपन, किशोरावस्था व जवानी की हजार स्मृतियों का दुशाला ओढ़े यह घर न तो बूढ़ा हुआ है न ही जर्जर. नियमित रखरखाव, रंगरोगन में झिलमिलाता, पूर्ण यौवन लिए मुसकराता उन के स्वागत में खड़ा हंस रहा है. जबकि वे इसी की गोद में जन्म ले कर बुढ़ापे की चपेट में आ गए हैं. तभी कोई पैरों पर पछाड़ खा आ गिरी और हाहाकार कर रो उठी.

वे बुरी तरह घबरा गए, ‘यह क्या मुसीबत?’ देखा नजर भर और पहले से भी ज्यादा घबरा गए. आतंक की एक सिहरन उन के पूरे शरीर में फैल गई, ‘यह तो मर गई है कब की, तो क्या उस की…?’

मुसीबत का नाम सत्या है जो 6 वर्ष पूर्व मृत घोषित हो चुकी है. वह कैसे शरीर धारण कर उन के पैरों के पास निर्मला को याद कर तड़पतड़प दहाड़ मार कर रो रही है और यह, जो दौड़ता आ कर खड़ेखड़े सुबक रहा है, वह भी तो हाथपैर तुड़वा, अपाहिज हो कर भी सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड के बिस्तर नंबर 5 से कहीं गायब हो गया था, उसी समय के आसपास. वे जागते हुए सुबहसवेरे, उजली धूप में खड़े हुए क्या सपना देख रहे हैं या आंखों का भ्रमजाल अथवा किसी जादूगर का रचा इंद्रजाल? पर नहीं, यह तो वास्तविकता है क्योंकि दोनों ने रोना बंद कर के उन को प्रणाम किया.

‘‘आइए, बाबूजी. चाय का पानी चढ़ा दे सत्या.’’

हरीश बाबू की आंखों के सामने 5 वर्ष पहले की वह शाम उभर आई. सत्या उन की पुरानी महरी की विधवा बेटी है. 11 वर्ष की उम्र में एक अधबूढ़े शराबी से महरी ने उस का ब्याह कर दिया था. निर्मला होती तो यह शादी नहीं होने देती पर उस समय वे दोनों छोटे साले के पास घूमने मुंबई गए थे. मुंबई से 1 महीने बाद लौटने पर सुना था कि सत्या की शादी हो गई. निर्मला द्वारा महरी को डांटतेफटकारते सुना था पर ध्यान नहीं दिया. नौकरचाकरों से लगावजुड़ाव नहीं था हरीश बाबू को. बस राजू ही थोड़ा उन के निकट आ गया है.

15 वर्ष की होतेहोते सत्या विधवा हो मां के पास लौट आई. सत्या तब महरी के साथ काम करने आती. निर्मला की लाड़ली थी वह. मां के मरने के बाद पूरा काम उस ने ही संभाला. पीछे वाली बस्ती में रहती थी. भाईभाभी को पूरी कमाई दे कर गाली और पिटाई ही मिलती उसे. जयपाल छोटी जाति का लड़का था, बस्ती से थोड़ा हट कर दलितों की बस्ती में रहता था. रिकशा चलाता था. दोनों में आतेजाते प्रेम हो गया. धीमरों को पता चला तो वे आगबबूला हो गए. धीमर ऊंची जाति है, ऊपर से विधवा. उस की ओर नजर उठाने की हिम्मत कैसे की दलित जाति के लड़के ने?

एक दिन दोनों को बात करते देख लिया उन लोगों ने. वे मार ही डालते जयपाल को पर राजू दौड़ता हुआ खबर ले कर आया तो निर्मला तुरंत पुलिस को फोन कर गाड़ी ले कर पहुंची. दोनों को बचा लाई. जयपाल की हालत गंभीर थी. उसे अस्पताल पहुंचाया. सत्या को अपने घर ले आई. घर में वह ही रहती थी. उधर, जयपाल की जान तो बच गई पर पैरों की इतनी हड्डियां टूटी थीं कि रिकशा चलाना दूर ठीक से चल भी नहीं पाएगा जीवनभर. अस्पताल से जिस दिन छुट्टी होनी थी उस से पहले ही वह जाने कहां चला गया. उस का पता ही नहीं चला.

सत्या को वास्तव में ही जयपाल से प्रेम हो गया था. जयपाल की खबर सुनते ही उस ने यमुना में डूब अपनी जान दे दी. भोर में ही घर से निकल गई थी. उस का शव तो नहीं मिला. घाट पर उस की साड़ी और चप्पलें पड़ी थीं. यमुना में बड़ेबड़े कछुए बड़ी संख्या में हैं. इंसान क्या हाथी के शरीर को भी घंटेभर में चट कर जाएं, यही हुआ होगा.

उस दिन भोर में निर्मला हफ्तेभर के लिए गांव आई थी राजू को ले कर. वह होती तो खोजखबर और भी कराती. सत्या व जयपाल की प्रेम कहानी का अंत ऐसे हुआ था.

वे यादों से बाहर आए और सोचने लगे, ‘अब सभी गांव वाले उन दोनों को भूल भी चुके हैं और वे दोनों ही यहां मौजूद हैं.’ राजू ने कहा, ‘‘अम्माजी ने दोनों की मंदिर में स्वयं खड़े हो कर विधिवत शादी करा दी थी, बाबूजी. अब वे दोनों पतिपत्नी हैं. घर में ही नीचे रहते हैं. सफाई वगैरह करते हैं. अम्माजी आती थीं तो उन की खूब सेवा करते थे दोनों.’’

हरीश बाबू को अचानक लगा कि निर्मला सामने आ खिलखिला पड़ी. मानो कह रही हो, ‘कहो, कैसी रही?’ जैसे कम उम्र में उन को बुद्धू बना निर्मला हंसते हुए कहती थी. तो यह चाय की दुकान, मृत सत्या और गायब जयपाल की जोड़ी यह सब तुम्हारा सरप्राइज है? काश तुम्हारे रहते मैं गांव आता तो…’ हरीश बाबू बुदबुदाए.

पूरा घर चमचमा रहा है. कहीं धूल का कण, मकड़ी का जाला, बगीचे में तिनकाभर खरपतवार, फालतू घास नहीं. सब साफसुथरा, सामने खिले, अधखिले फूलों की भरमार, पनपते स्वस्थ पौधे, पीछे क्यारियों में तैयार सब्जी या तैयार होते पौधे. उन का बैडरूम ऊपर है. उस के साथ लंबीचौड़ी बालकनी. उस के एक तरफ बेला दूसरी तरफ चमेली की बेल छाई है जिन की व्यवस्थित नियमित कटाईछंटाई होती है. निर्मला ने योजना बना कर दोनों को रोपा था. लजाई सी हरीश बाबू से बोली थी, ‘जब हम सोएंगे तो ये दोनों फूलती बेल हम को रातभर सुगंध देंगी.’

कितनी रातें, कभी चांदनी में, कभी तारों की छांव में उन्होंने यहां बैठ बातें करते बिताई हैं. वे बालकनी में आ कर खड़े हुए. चमेली की एक झुकी डाल ने उन के माथे को छुआ, चौंके, उन्हें लगा कि निर्मला ने प्यार किया. इस बीच सत्या चायबिस्कुट ले आई, ‘‘बाबूजी, कुनकुना पानी ला रही हूं. नहा लें, नाश्ता बनाती हूं.’’

उन्होंने स्नेह से देखा, ‘‘क्या बनाएगी?’’

‘‘मक्का पिसवा लाई हूं, उस के परांठे और आलूटमाटर की सब्जी. अम्माजी ने कई तरह के अचार डाले हैं, वे भी हैं.’’

‘‘जयपाल कुछ करता है?’’

उस ने सिर झुकाया, ‘‘अम्माजी ने 5 बीघा खेत खरीद दिया है, पैरों से चल नहीं पाता है ठीक से, पर बैठ कर निराई कर लेता है. बाकी काम के लिए एक नौकर रखा है.’’

‘‘पूरा घर तू अकेली साफ करती है?’’

उस ने फिर सिर हिलाया.

‘‘मैं हूं तो खाने के लिए महाराज को बुला ले.’’

झरझर रो पड़ी वह, ‘‘बाबूजी, मैं करमजली अम्माजी की न सेवा कर पाई न अंतिम दर्शन, अब आप की सेवा तो करने दो. अम्माजी की भैंस दूध दे रही हैं. ताजा मट्ठा और मक्खन है, नाश्ते में दूंगी.’’

उन्होंने सोचा, ‘तो इसलिए ही यहां से लौटते समय निर्मला के साथ सब्जी की टोकरी के साथ ताजा मक्खन और डब्बाभर असली घी जाता था.’

नाश्ता निबटा भी नहीं था कि घर में पूरा गांव उमड़ पड़ा. सब की आंखों में आंसू. निर्मला का सरप्राइज गिफ्ट बस गोकुल की चाय दुकान नहीं, सत्याजयपाल नहीं और भी हैं, रोते हुए गांव वालों ने कितने रहस्य के परदे खोले. किस की बेटी के ब्याह का पूरा खर्चा दिया, किस के बेटे की उच्च शिक्षा की व्यवस्था की, किस की बीमारी में डाक्टर को दिखा दवा का पूरा कोर्स दिलवाया, किसे बच्चा पालने के लिए सिलाई मशीन खरीद दी, किस की गिरवी पड़ी जमीन, घर छुड़ा सिर के ऊपर की छत बचाई, पेट की रोटी जुटाई. अवाक् हरीश बाबू के सामने पूरे गांव के गरीब लोग सुबक रहे थे निर्मला के शोक में.

सब को विदा कर अपने कमरे में आए. निर्मला के बड़े फोटो के ऊपर ताजे फूलों की माला देखी. सत्या रोज नहाधो कर पूजा कर माला पहनाती है. अचानक लगा निर्मला कहीं नहीं गई, इसी घर में इधरउधर बगीचा, खेत, घर के आंगन, बरामदा, रसोईघर, कमरा, बालकनी में शादी के बाद जैसी चंचल किशोरी थी उसी तरह फुदकती फिर रही है और उन को देख होंठों में हंस रही है. ‘देखा, कितने सारे सरप्राइज हैं तुम्हारे लिए यहां.’

वे पास आए. जैसा पहले करते थे वैसे ही तुनक कर बोले, ‘‘क्या समझती हो? मुझे हरा दोगी? कभी नहीं, अब मेरा भी सरप्राइज रिटर्न गिफ्ट देख लो.’’

उन्होंने बैड पर रखा मोबाइल फोन उठा कर बच्चों का नंबर मिलाया. दूसरे दिन भोर में ही सारे बच्चे, पोतेपोती, बेटीदामाद तक आ पहुंचे.

‘‘पापा, यह क्या अनर्थ कर रहे हैं आप?’’

‘‘कोई अनर्थ नहीं, यह मेरा जन्मस्थान है. मेरी अपनी जगह. इतने दिन सिर पर दायित्व था तुम लोगों की पढ़ाई, फिर ब्याहशादी, अपनी नौकरी. पर अब सब पूरा कर लिया है मैं ने. अब मुक्त हूं. अपने घर में रहूंगा.’’

‘‘पर हम सब आप को कैसे अकेला छोड़ दें. हमारा भी तो कुछ कर्तव्य बनता है.’’

‘‘किस ने कहा, मैं अकेला हूं. पूरा गांव, सत्या, जयपाल हैं. राजू गाड़ी के साथ रहेगा. जब चाहे शहर का चक्कर लगा आऊंगा और अम्मा हैं, निर्मला है, अकेला कहां हूं मैं?’’

सत्या ने आ कर कहा, ‘‘खाना लगा दिया है, ठंडा हो जाएगा.’’

सब नीचे उतर गए. लेकिन वे निर्मला की ओर देखते रहे. फिर मुसकराए और दो बोल बोले, ‘‘क्यों? कैसा रहा मेरा रिटर्न गिफ्ट?’’

 

रिटर्न गिफ्ट: भाग-2

‘‘मांजी तो हर महीने 1-2 चक्कर लगाती ही थीं, पूरी व्यवस्था है. मेरी मां हैं, बहन है खाने के लिए कोई परेशानी नहीं होगी.’’

नौकर की घर पर भी बहुत जरूरत थी तो सब मान गए.

गाड़ी ने गांव का रास्ता पकड़ा. हरीश बाबू का मन उदास हुआ. आज बेटों की सुविधा के लिए वे गांव चल पड़े और निर्मला विनती करती रही कि एक बार गांव चलो, देखो न तुम्हारे लिए कितने सारे सरप्राइज गिफ्ट जमा कर रखे हैं वहां. पर वे नहीं आए. न तो समय निकाला न मन ही था. कहतेकहते बेचारी निर्मला ही संसार छोड़ गई. उन्होंने मन ही मन निर्मला से क्षमायाचना की.

10 वर्ष बाद गांव आ रहे थे. अंतिम बार अम्मा का क्रियाकर्म करने आए थे बस. पर निर्मला का गांव से गठबंधन नहीं टूटा था. वह बराबर आती, 8-10 दिन रह भी जाती अकेली ही, बच्चे भी नहीं जाते थे. वह बड़े शहर कानपुर की पलीबढ़ी थी पर गांव से लगाव था उस को. हां, बच्चों और पति को कभी जबरदस्ती यहां लाने का झगड़ा नहीं किया. राजू को साथ ले आती, जब तक मन लगता, रहती, फिर लौट जाती. बच्चे हंसते, हरीश बाबू गुस्सा करते पर निर्मला ने आना नहीं छोड़ा.

10 वर्षों में विशेष परिवर्तन तो नहीं हुआ, बस इतना है कि बस्ता ले कर स्कूल जाते बच्चों की संख्या काफी बढ़ी है. पहले की तरह घर में पहने बनियाननेकर या मैलेकुचैले कपड़ों के साथ नंगे पैर कोई नहीं है. सब स्कूल डै्रस में हैं. पैरों में बिना मोजे के जूते हैं, कपड़ों पर इस्त्री नहीं, पर वे साफ धुले हैं और तेल चुपड़े बालों में कंघी हुई है. बच्चे साफसुथरे लग रहे हैं. कच्ची गड्ढेदार सड़क भी पक्की तारकोल की बन गई है. राजू ने पहली बार मुंह खोला, ‘‘यह सड़क मांजी के कारण ही बनी है.’’

चौंके बुरी तरह, अवाक् हो, बोले, ‘‘क्या कह रहा है? कैसे?’’

‘‘मांजी के भतीजे बहुत बड़े सरकारी अफसर बन कर आए थे न, तब उन से कह कर…’’

हां, 7-8 वर्ष पहले विमल यहां जिलाधिकारी था तो उसी से यह

10 किलोमीटर का रास्ता पक्का करवाया था निर्मला ने. तो यही उस का सरप्राइज गिफ्ट है. मन में थोड़ी शांति आई. गाड़ी बिना झटके खाए आराम से आगे फिसलती जा रही थी.

45 वर्ष के विवाहित जीवन में छोटामोटा मनमुटाव छोड़ गंभीर झगड़ा कभी नहीं हुआ निर्मला से. उस की सूझबूझ, दूरदर्शिता की कद्र करते थे, उस को मूल्य देते थे, प्रशंसा भी करते थे हरीश बाबू. उन्होंने सदा ही उस के निर्णय को माना है बस, 1 को छोड़. उस की इच्छा थी कि सेवानिवृत्ति के बाद दोनों गांव में आ कर शांति से जीवन जिएंगे. कहती थी, ‘अम्मा ने साम्राज्य छोड़ा है हम लोगों के लिए. हम को उसे ठीक से चलाना चाहिए. हम खेती कराएंगे, बागों का रखरखाव करेंगे, डेरी बनवाएंगे, मुरगी फार्म खोलेंगे तो देखना बुढ़ापे में भी कितने व्यस्त रहेंगे. मजा आएगा जीवन का. और शहर, बच्चे कौन दूर हैं? घंटेभर का ही तो रास्ता है, गाड़ी है, राजू है.’

पर वह उन को हिला नहीं पाई. अपनी ही जन्मभूमि के प्रति उन के अंदर कोई लगाव नहीं था. कुछ घंटों के लिए भी वे नहीं आए जबकि निर्मला नियम से आती, हफ्ताभर रह कर जाती, कितना कहती, ‘चलो न एक बार, देखो बहुत सारे सरप्राइज गिफ्ट रखे हैं मैं ने वहां तुम्हारे लिए.’

पता नहीं वे सब क्या थे? अब गांव जा भी रहे हैं हरीश बाबू तो निर्मला नहीं है, अकेले उन गिफ्टों को कौन दिखाएगा? वंचित ही रह गए वे निर्मला के रखे उन गिफ्टों से. हृदय की गहराई से गहरी सांस निकल हवा में जा मिली.

निर्मला में एक व्यक्तित्व था जो सब उस का सम्मान करते थे. घर की कुशल निर्देशिका थी. भाईभाई, देवरानीजेठानी में प्रेमसद्भाव बना हुआ है. इस परिवार की नींव वह इतनी मजबूत कर गई है कि वह हिलेगी नहीं, कम से कम इस पीढ़ी में तो नहीं.

हरीश बाबू को थोड़ी थकान लगने लगी, ‘‘राजू, और कितनी दूर है?’’

‘‘बस आ गए. बाबूजी, चाय पी लीजिए.’’

‘‘चाय? यहां कहां?’’

‘‘है सामने ही.’’

‘‘गांव में किसी ने स्टौल खोला है क्या?’’

‘‘जी, अपना गोकुल है, मुरारी चाचा का बेटा.’’

हरीश बाबू ने सोचा था झोंपड़ी में गंदे बरतन में काढ़ा जैसी चाय बेचता होगा पर पास आ चौंके, पक्की साफसुथरी दुकान है. गैस पर केतली, दूध, चाय, चीनी अलगअलग शीशे के शो केस में बिस्कुट, डबलरोटी, मक्खन. झूलते नमकीन के पैकेट और काउंटर के पीछे साफसुथरा कुरताजींस पहने एक नई उम्र का प्रियदर्शन लड़का गोकुल. यहां जब आखिरी बार आए थे तब दसएक वर्ष का बालक होगा, अब युवक है. उस ने गाड़ी देख पहचान लिया. दौड़ आया, दरवाजा खोल पैर छुए, झरझर रो पड़ा.

‘‘बाबूजी, अम्मऽऽऽ….’’

वे अवाक्, पर कुछ बोल नहीं पाए. वह आंसू पोंछ दौड़ कर लौट गया. उन्होंने देखा अलमारी खोल उस ने सुंदर पोर्सलीन के कपप्लेट निकाले और एक टी बैग. गरम पानी से कपप्लेट धो उस ने टी बैग डाल ताजी चाय बनाई. फिर दौड़ आया सुगंधित ताजी चाय ले. उन्होंने चाय ली, एक घूंट भरा, तारीफ की, ‘‘चाय अच्छी है.’’

वह हंसा, ‘‘अम्माजी आतेजाते पीती थीं. उन के लिए बढि़या चाय और कपप्लेट मंगा कर रखे हैं…’’

चौंके वे, पर कुछ बोले नहीं. प्याला खाली कर रख दिया. साथ में एक 10 रुपए का नोट. वह रो पड़ा.

‘‘बाबूजी, अम्मा ने जीवनभर की रोटी दी है. पैसा नहीं लूंगा.’’

चला गया आंसू पोंछता. उन की समझ में कुछ नहीं आया.

राजू ने गाड़ी स्टार्ट की.

‘‘इस ने पैसे क्यों नहीं लिए?’’

‘‘कैसे लेता बाबूजी, आवारा बच्चों की संगत में फंस गया था. मुरारी आ कर मांजी के पास रो पड़ा तो उन्होंने इसे बुला डांटा भी और समझाया भी. फिर अपने पैसों से यहां पक्की दुकान बनवा चाय की दुकान खुलवा दी. लंबी सड़क है इसलिए खूब चलती भी है. यह खेत मांजी ने रामभरोसे से खरीदा है, जहां दुकान है. आप का है यह खेत. अब सुधर गया है गोकुल, कमाई करता है खूब, घर पक्का बनवा लिया है.’’

हरीश बाबू अवाक्, निर्मला ने कभी बताया नहीं. नया खेत खरीदना, पक्का कमरा बना चाय की दुकान खोल एक बरबाद होते लड़के के जीवन को बचाना, ये तो बड़ीबड़ी बातें हैं पर उस ने कभी चर्चा नहीं की. इतना पैसा आया कहां से? तभी उन्हें ध्यान आया कि खेतबाग की आमदनी कम नहीं है. पहले कभी अम्मा ने हिसाब नहीं दिया, पीछे निर्मला ने भी नहीं. उन को ध्यान भी नहीं था कि यहां स्टेट बैंक की शाखा पहले से है, उसी में अम्मा का खाता था. निर्मला का भी होगा, तो खेत खरीद कर दुकान बनाने में निर्मला ने उन को परेशान नहीं किया होगा.

घर के सामने आते ही पुरानी स्मृतियां ताजा हो गईं. इसी घर में 15 वर्ष की निर्मला को ब्याह कर लाए थे

20 वर्ष की उम्र में. नईनई नौकरी थी, मथुरा में पोस्टिंग थी. इतनी कम उम्र में निर्मला को अकेली नहीं आने दिया था अम्मा ने, वैसे भी उस जमाने में शादी होते ही बेटे के साथ बहू को भेज देने का चलन नहीं था. मथुरा पास भी था तो वे शनिवार को आ कर सोमवार भोर में मथुरा लौटते थे. कोई असुविधा नहीं थी. जीप थी, सरकारी कोठी में सेवा के लिए सरकारी नौकर, माली थे.

राजू ने गाड़ी रोकी, उतर कर गेट खोला.

आगे पढ़ें- अम्मा और अपने बचपन, किशोरावस्था व जवानी की हजार स्मृतियों…

रिटर्न गिफ्ट: भाग-1

हरीश बाबू एकदम स्तब्ध रह गए. ऐसा सपने में भी नहीं सोचा था. उम्र भी आजकल के हिसाब से कुछ भी नहीं. अभी 1 वर्ष ही हुआ है सेवानिवृत्त हुए. 62वां वर्ष चल रहा है उन का. निर्मला उन से पूरे 5 वर्ष छोटी है. पिछले महीने जन्मदिन मनाया है धूमधाम से. सभी बच्चे आए थे, 2 बेटे, 1 बेटी. सभी संपन्न, प्रतिष्ठित और सुखी.

20 वर्ष की उम्र में निर्मला को ले कर आए थे गठजोड़े में बांध. वह 15 वर्ष की पहाड़ी नदी जैसी अल्हड़ किशोरी थी. गांव के माहौल की बात भूल, पल्ला सिर से उतार कर कमर में खोंस के गिलहरी की तरह चढ़ जाती थी पेड़ पर कच्चे आम तोड़ने. अम्मा ने कभी डांटा नहीं, स्नेह से हंसती थीं. वही निर्मला सारा जीवन उन को समर्पित रह कर इस उम्र में हरीश बाबू के साथ विश्वासघात कर गई.

हरीश बाबू अपनी नौकरी में मस्त थे. पूरा घर तो निर्मला ने संभाल रखा था, बच्चों की शिक्षासंस्कार, आगे चल कर उन का विवाह. कभी भी हरीश बाबू को कुछ नहीं करना पड़ा. नतीजतन, परिवार के बच्चों में अच्छे संस्कार यानी मातापिता के प्रति आदरसम्मान, भाईबहनों में प्रेमलगाव, बहुओं में सब के प्रति अपनापन आज भी जीवित हैं. सारा जीवन व्यस्तता में निकल गया.

सेवानिवृत्ति के बाद सोच रहे थे कि भारतदर्शन पर निकल पड़ेंगे. यहां तो दोनों बेटों का सम्मिलित परिवार है और दोनों बहुओं में बहुत प्यार है. इसलिए घर में कोई असुविधा नहीं होगी. दोनों मिलबैठ चयन कर रहे थे कि पहले कहां जाएं- जंगल, पहाड़ या समुद्र. निर्णय ले भी नहीं पाए कि निर्मला के मन में बेईमानी आ गई और वह उन को छोड़ कर चली गई. हार्ट स्पैशलिस्ट बेटा भी कुछ नहीं कर पाया मां को बचाने के लिए. इस समय ही पत्नी की सब से ज्यादा जरूरत होती है और इसी समय में वह उन को छोड़ कर इतनी दूर चली गई कि उन की आवाज भी वहां नहीं पहुंच सकती.

वैसे तो भरापूरा घर है, 4 पोतापोती, 2 बेटे, 2 बहुएं. बेटी भी अब बच्चों की छुट्टी होते ही पापा के पास दौड़ी आती पर यह अकेलापन तो उन का अपना है, उसे कौन पूरा करेगा? सुबह सुनहरी धूप में शरीर सेंकते हरीश बाबू लौन में बैठे थे. बेंत की कुरसीमेज, हरे रंग की. निर्मला की पसंद बहुत ही सुंदर थी, मानो कलाकार की पसंद हो.

उन की पहली पोस्टिंग आगरा थी, दूसरी मथुरा और इसी आगरामथुरा राजमार्ग के बीच में लगभग 10 किलोमीटर अंदर गांव में उन की पैतृक हवेली है. वहां से ही बाइक से वे काम पर आतेजाते थे.

आगरे की एक अभिजात कालोनी में उन का सुंदर घर बहुत पीछे बना है. सभी बच्चे बड़े हो गए. अब उन को स्कूल में डालने की समस्या आई. निर्मला बच्चों को अच्छे संस्थान में पढ़ाना चाहती थी, हरीश बाबू भी आगरा में पढ़े थे और उस समय पोस्ंिटग भी आगरा में थी. निर्मला ने ही यह जगह पसंद की थी. साथसाथ 2 प्लौट ले लिए. उसे खुला हुआ बड़ा सा घर और साथ में बागबगीचा चाहिए था. उसी की पसंद का घर बना, उस ने ही यहां फलफूल, सब्जी की क्यारियां हिसाब से लगाईं जो अब भरी जवानी पर हैं. पैतृक गांव में विशाल संपत्ति है, अम्मा ने वर्षों तक संभाला. उन के बाद कई बार बेचने की बात चली पर निर्मला ने नहीं बेचने दिया. वह खुद ही गाड़ी ले कर गांव आतीजाती थी. पूरी संपत्ति, घर, सब की देखभाल खुद ही करती. पहले उन से भी अनुरोध करती चलने का, पर वे नहीं जाते तो फिर उस ने कहना छोड़ दिया था.

पुराना ड्राइवर राजू उसी गांव का बेटा है. निर्मला ही भुखमरी के कगार से उसे उठा कर लाई थी. 10वीं पास करा कर और ड्राइविंग सिखा कर उसे अपना ड्राइवर रख लिया. वह निर्मला के साथ रहता था. असल में उसे गांव के घर, खेत, खलिहान से लगाव था. दोएक दिन रह कर आती थी. ब्याह हो कर इसी घर में आई थी.

सभी बच्चों का जन्म गांव में ही हुआ. बीच में 2 वर्ष पति विदेश गए थे तब वह अम्मा के साथ गांव में ही रही थी. अम्मा से बहुत लगाव था उस को, अम्मा भी बेटी की तरह प्यार करती थीं उसे. पर अम्मा आगरा में आ कर कभी नहीं रहीं, उन का मन पड़ा रहता घर, खेत और भैंसों में. आती भी थीं तो बच्चों के जन्मदिन या तीजत्योहार पर, दिनभर रह कर शाम को लौट जातीं. घंटेभर का ही तो रास्ता है.

एक दिन बेटी माधुरी आई, दोनों बेटे दीपेंद्र और रूपेंद्र भी साथ में थे.

‘‘पापा, एक बात कहनी है.’’

‘‘कहो.’’

तीनों कुरसी पर बैठ गए. दीपेंद्र ने कहा, ‘‘पापा, अब गांव की संपत्ति की देखभाल तो मुश्किल है. मां हैं नहीं, आप तो कुछ जानते नहीं हैं गांव के विषय में. अम्माजी के बाद मां ने ही संभाल रखा था.’’

‘‘हां, यह समस्या तो है.’’

‘‘कुछ लोग उस को लेना चाहते हैं. वे लोग आ भी रहे हैं, फोन भी कर रहे हैं.’’

थोड़ा अवाक् हुए, ‘‘हवेली, खेत, बाग सब?’’

‘‘नहींनहीं, करोड़ों का है सबकुछ. टुकड़ों में, कोई हवेली, कोई खेत, कोई बाग…’’

‘‘तो क्या तुम लोग…’’

‘‘जी पापा, उस को कौन संभालेगा अब. हमारे पास न समय है न जानकारी या अनुभव. आप को अकेला छोड़ नहीं सकते. ऐसे में इतनी बड़ी संपत्ति को लावारिस रहने देना…’’

बच्चों की बातों के औचित्य को समझा उन्होंने, ‘‘ठीक ही है, पर सब चीजों का अलगअलग ही सही, मूल्यांकन होना चाहिए. नहीं तो दो कौड़ी भी नहीं देगा कोई, औनेपौने में सबकुछ छोड़ देना बुद्धिमानी नहीं है.’’

‘‘पर हम तो कुछ भी नहीं जानते जमीन, मकान के विषय में. 4 दुधारू भैंस हैं. राजू कह रहा था, हरी ग्वाला लेना चाहता है बच्चों समेत. एकएक भैंस 10-12 हजार रुपए की है. हरी ने कहा है, सब के लिए 10 हजार देगा.’’

‘‘पागल है क्या?’’

‘‘यही तो समस्या है. मां के न रहने से सब यही सोच रहे हैं कि हम लोगों को न तो कुछ पता है और न हम वहां रहने जा रहे हैं तो पानी के मोल ले लो.’’

‘‘तो फिर?’’

थोड़ा झिझकते हुए बेटी ने कहा, ‘‘पापा, आप 2-1 दिन के लिए जा कर वैल्यूएशन करा आएं तो…’’

‘‘पर मैं…मैं कैसे वैल्यूएशन करूंगा. मुझे तो गजभर जमीन का भी कोई अंदाजा नहीं.’’

‘‘हां, आप को नहीं पता, सतीश 2 दिन के लिए जा कर सब देखभाल कर दाम लगा देगा, कहां है?’’

‘‘सतीश…?’’

‘‘जी पापा, उस का तो काम ही यही है, जमीनजायदाद खरीदना, बेचना.’’

‘‘ठीक है, चला जाऊंगा. उसे रख कर भी क्या होगा.’’

‘‘राजू साथ रहेगा. कोई असुविधा नहीं होगी. वह गांव का ही बेटा है, इस समय क्या दाम चल रहा है, उसे पता है.’’

भोर में ही निकले हरीश बाबू. धूप चढ़ने से पहले पहुंच जाएंगे. घर के नौकर को साथ भेज रही थीं बहुएं कि 2-4 दिन रहना पड़े तो खानेपीने की उन को असुविधा न हो. पर राजू ने ही मना किया.

आगे पढ़ें- नौकर की घर पर भी बहुत जरूरत थी तो सब…

गुरुदेव

दुनिया वालों को पापपुण्य, आत्मा, मुक्ति और मोहममता से दूर कर प्रसाद बांटते गुरुदेव की महिमा अपरंपार है. पर उपदेश कुशल बहुतेरे की तर्ज पर किस्तों में दक्षिणा लेते, कामुकता से लैस और धर्म के पक्के धंधेबाज गुरुदेव की शरण में जो भी आया, धन्य हो कर या कहें लुट कर ही लौटा. आप भी सुनिए जरा गुरुकंटालजी के प्रवचन.

वे जनता को देख कर मंदमंद मुसकराए और बोले, ‘‘तुम देह नहीं हो.’’ फिर अपनी देह की खुजली मिटाने के लिए खुजलाने लगे. फिर धर्मप्रिय जनता को संबोधित करते हुए बोले, ‘‘तुम शरीर नहीं हो, तुम आत्मा हो. आत्मा की अमरता को पहचानो. शरीर झूठ है.’’

एक भक्त ने पूछा, ‘‘शरीर असत्य है तो फिर असत्य और झूठे शरीर को भूख क्यों लगती है? क्या हमारी भूख भी झूठी है?’’

‘‘भूख इसलिए लगती है क्योंकि तुम शरीर में जीते हो. स्वयं को शरीर मानते हो. आत्मा को पहचानो. आत्मा को न भूख लगती है न प्यास.’’

भक्त बड़े भोले होते हैं, धर्मभीरु होते हैं. लेकिन जिज्ञासा है जो उन्हें गुरु के पास लाती है. भक्त ने पूछा, ‘‘महाराजजी, शरीर तो साक्षात है. दिख रहा है. शरीर की जरूरतें भी हैं, जिन की पूर्ति करनी जरूरी है. रोटी, कपड़ा और मकान तो चाहिए ही.’’

महाराजजी बोले, ‘‘ठीक है, रोटी, कपड़ा, मकान की जरूरत होती है लेकिन शरीर होने तक. जिस दिन आत्मा को पा लोगे उस दिन किसी भी चीज की जरूरत नहीं पड़ेगी.

‘‘महाराजजी, आत्मा को कैसे पाएं? कहां है आत्मा?’’ भक्त ने पूछा.

महाराजजी मन ही मन बुदबुदाए, ‘इस का तो मुझे भी पता नहीं.’ बोले, ‘‘शरीर के अंदर एक दिव्य प्रकाश है, वही आत्मा है. उस को जाननेपहचानने का अभ्यास करो.’’

‘‘गुरुदेव, कैसे?’’

‘‘मोहममता छोड़ो. जीभर कर दान करो. अपनी स्त्री और बच्चों से नहीं, ईश्वर से प्यार करो.’’

फिर एक भक्त की आवाज पर मोबाइल बंद किया. भक्त पूछ रहा था कि काम, क्रोध को वश में कैसे करें?

महाराजजी ने कहा, ‘‘देखो भाई, देश की आबादी 1 अरब के ऊपर हो गई है. आप लोग ब्रह्मचर्य  का पालन करें. वंश चलाने के लिए 1 औलाद बहुत है. अपनी स्त्री के साथ वर्ष में 1 बार संभोग करें, 6 माह में एक बार या फिर 1 माह में 1 बार. यह भी न कर सको तो एक कफन रख लो. अरे, जानवर भी वर्ष में ऋतुओं के आने पर प्रकृतिप्रेरित हो कर 1 बार कामक्रीड़ा करते हैं. क्या तुम लोग पशुओं से भी गएगुजरे हो? हे मनुष्य, काम पर नियंत्रण रखो तो क्रोध पर भी काबू पा लोगे. मैं गुरुमंत्र देता हूं. सतत जाप करो, प्रवचन समाप्त होते ही आप 1,100 रुपए प्रतिव्यक्ति जमा कर के पूजा का आसन, माला, फोटो ग्रहण कर जीवन को अनंत की यात्रा पर लगाओ.

‘‘भक्तजनो, मेरे प्यारे शिष्यो, शरीर को भूल कर अशरीरी हो जाओ. लोभ हो तो गुरु के चरणों में दान करो. काम सताए तो अपनी स्त्रियों को हमारे आश्रम में सेवाकार्य पर लगा दो. न पास रहेगा बांस न बजा पाओगे बांसुरी.’’

एक गरीब भक्त खड़ा हो कर बोला, ‘‘महाराजजी पेट की भूख का क्या करें?’’

महाराजजी को गुस्सा आ गया. बोले, ‘‘अजीब अभागा संसारी है. मैं देह से हटने की बात कर रहा हूं. यह पेट ले कर बैठा है,’’ फिर संभल कर बोले, ‘‘ठीक है पेट के लिए, परिवार के लिए कर्म करना तो जरूरी है ही लेकिन धर्म को मत भूलना पेट के चक्कर में. भूख तो जानवरों को भी लगती है लेकिन भूख के चक्कर में जानवर मत बनना. पेट के लिए ही मत जीना. अपनीअपनी सोचते रहोगे तो गुरु के बारे में कब सोचोगे. गुरु को पहले दान करना, भोजन खिलाना. उन के लिए जो बन सके यानी धन, वस्त्र, भोजन, दान का प्रबंध करना तभी भोजन करना सार्थक है.’’

महाराजजी ने यौवन के मद से चूर पास बैठी कुछ स्त्रियों को कामभरी नजरों से घूरा. धर्मांध स्त्रियों ने इसे महाराजजी की विशेष कृपादृष्टि मानी.

महाराजजी ने फिर भक्तों को देह की नश्वरता का ज्ञान दिया.

एक गरीब भक्त ने कहा, ‘‘महाराजजी, दीक्षा सामग्री के लिए 1,100 रुपए नहीं हैं.’’

महाराजजी क्रोधित हो गए. कहना तो चाह रहे थे कि सालो, झक मारने के लिए आए हो. हम यहां गला फाड़न के लिए आए हैं लेकिन शांत व्यापारी स्वर में बोले, ‘‘कोई बात नहीं, 2 किस्तों में दे देना. लेकिन तब 1,100 रुपए की जगह 1,200 रुपए लगेंगे. इसे सजा समझो या प्रसाद, जैसी तुम्हारी श्रद्धा.’’

भक्त तो प्रसाद ही समझेगा.

भक्तों को तो यह प्रवचन दिया कि तुम शरीर नहीं आत्मा हो और आत्मा को किसी चीज की जरूरत नहीं होती. पर जब उन के माथे पर पसीना आया तो पोंछ कर भक्तों से कहा, ‘‘एसी नहीं है क्या? कम से कम कूलर या पंखा ही चला दो.’’

इतना ही नहीं, उन्होंने सामने रखे छप्पन भोग खा कर एक गिलास लस्सी भी पी.

अब महाराजजी मंदमंद मुसकराए और अपने सचिव से कहा, ‘‘मेरे मकान का क्या हुआ?’’

सचिव ने पूछा, ‘‘महाराजजी, कौन से वाले मकान का? मुंबई, दिल्ली वाले तो कब के तैयार हैं.’’

‘‘अरे नहीं,’’ गुरुदेव ने खीजते हुए कहा, ‘‘वह शिमला वाले मकान का. और सुनो, कथाप्रवचन करने के लिए पीत वस्त्र कम से कम चमकदार तो लाते. खादी टाइप ले आए. चुभ रहे हैं. आगे से ध्यान रखना. थोड़ा तो स्टैंडर्ड मेनटेन करो. अब चैनलों पर आने लगा हूं मैं. और हां, विदेश यात्रा के लिए सूट महंगे और अच्छे से सिलवाना,’’ फिर अचानक उन्हें कुछ याद आया. उन्होंने अपने घर मोबाइल लगा कर पत्नी से बात की, ‘‘तुम्हारी याद तो हर घड़ी आती है लेकिन क्या करूं? कामधंधा भी तो जरूरी है. पैसा कमाऊंगा, तभी तो तुम्हारे लिए अच्छे कपड़ेगहने ले कर आऊंगा. आई मिस यू, आई लव यू. और सुनो, जमाना बड़ा खराब है, बच्चों की चिंता लगी रहती है, उन पर नजर रखना. देखना, बिगड़ें न. अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाया है. कहना, मन लगा कर पढें़. कुछ बन जाएं तो मेरा भी जीवन सार्थक हो जाए.’’

तभी उन की एक नवयौवना शिष्या आई और उन के कान में बोली, ‘‘महाराजजी, मेरा तो मासिकधर्म शुरू हो गया है. आज आप का मन न बहला पाऊंगी.’’

महाराजजी क्रोध में बोले, ‘‘तुम तो जानती हो कि मुझे रात में औरत चाहिए ही चाहिए. तुम नहीं तो किसी और को तैयार करो.’’

फिर उन्होंने अपने एक शिष्य को बुला कर कहा, ‘‘जलेबी खाने की बड़ी इच्छा हो रही है. लेकिन पेट में तिलभर जगह नहीं है. ऐसा कर, पाचक चूर्ण ला दे. थोड़ा खा लूं ताकि जलेबी के लिए जगह बना सकूं,’’ और फिर उन्होंने अपने भक्तों को जीभ के स्वाद पर नियंत्रण रखने संबंधी प्रवचन दिए.

प्रवचन समाप्त होने पर उन्होंने सचिव से कहा, ‘‘भाई, मेरी किडनी का औपरेशन विदेश में ही करवाने का प्रबंध करो.’’

अंत में महाराजजी अपने स्पैशल हैलिकौप्टर से उड़ गए. भक्त जयजयकार करते रहे. भीड़ में भगदड़ मचने से कुछ भक्त मर गए, कुछ घायल हो गए. जो बच गए उन्होंने गुरुकृपा जानी मरने में भी, बचने में भी, घायल होने में भी.

भक्तों की जय हो, गुरुदेव की जय हो.

काश ऐसा हो पाता भाग-3

उस समय उन दोनों को पता नहीं था कि झगड़े की वजह क्या है. सिर्फ आंसुओं से भरी उदास आंखों से सुधाकर के घर को देखते हुए वह गाड़ी में चढ़ी थी. प्रेम और घृणा, दोनों को ही जैसे उस ने बचपन में ही आत्मसात कर लिया था.

देहरादून से थोड़े समय बाद ही उस के पापा का ट्रांसफर मथुरा हो गया, जहां से उस ने स्नातक की परीक्षा पास की. अंगरेजी से एमए करने के लिए उस ने दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया और वहीं दिल्ली में होस्टल में रह कर अपनी पढ़ाई करने लगी थी.

एक दिन सहेलियों के बहुत आग्रह पर वह उन लोगों के साथ एक थिएटर में नाटक देखने आई थी. मुंबई से कोई नाटक मंडली आई थी, जिस के इस नाट्य प्रस्तुति की धूम थी. नाटक के छपे पात्र परिचय में सह नायक के रूप में सुधाकर शर्मा का नाम पढ़ कर चौंक गई.

‘कहीं यह वही सुधाकर तो नहीं,’ दिल के किसी कोने से एक आवाज उठी, ‘क्या यह संभव है. क्या एक ही नाम के अनेक लोग नहीं होते, जो वह अचानक ही पागलों की तरह उलटापुलटा सोचने लगी है.’

‘फिर भी मान लो, अगर वही हुआ तो,’ यह सोचते ही उस का सीना धड़क उठा.

उस से रहा नहीं गया. नाटक का शो खत्म होने के पहले ही वह ग्रीनरूम में चली गई और एक व्यक्ति से बोली, ‘मुझे सुधाकर शर्मा से मिलना है.’

‘वह नीले रंग की शर्ट पहने है, सुधाकर शर्मा,’ वह व्यक्ति बोला, ‘उस की ऐक्ंिटग पसंद आई न. बहुत अच्छा ऐक्टर है वह. मिल लो, बधाई दे दो.’

सुधाकर ने भी यही समझा था कि वह उस की ऐक्ंिटग की बधाई देने आई है. मगर सुमन ने उस से सीधेसीधे सवाल कर दिया, ‘आप के पिताजी का क्या नाम है?’

वह एकदम से हंस पड़ा.

‘ओ, तो आप मेरे पापा से मिलना चाहती हैं. मैं तो समझा कि आप मेरे अभिनय की प्रशंसा करने आई हैं. ऐसा लगता है कि आप को मेरा अभिनय पसंद नहीं आया. इसलिए आप मेरे पापा से मेरी शिकायत करना चाहती हैं. वैसे मेरे पिताजी का नाम विमल शर्मा है.’

‘और मेरा नाम सुमन है,’ वह उसे देखते हुए झट से बोल पड़ी, ‘तुम ने शायद मुझे पहचाना नहीं. मैं सुमन हूं. तुम लोग कोलकाता से मुंबई चले गए और हमलोग देहरादून पहुंच गए.’

‘अरे, सुमन तुम,’ सुधाकर ने झपट कर उस का हाथ पकड़ लिया, ‘यहां कैसे आईं? तुम्हारे मम्मीपापा देहरादून में कैसे हैं? तुम कैसी हो? क्या कर रही हो आजकल?’’

सवाल ही सवाल थे उस के पास.

‘देखो, रात बहुत हो गई है. मेरी सहेलियां मुझे न पा कर परेशान हो जाएंगी. सो, हम कल बात करेंगे. मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में अंगरेजी विषय से एमए की पढ़ाई कर रही हूं,’ वह शीघ्रतापूर्वक बोली, ‘तुम मेरा फोन नंबर रख लो. कल शाम कहीं कौफी पीते हुए बातें करेंगे.’

वापस होस्टल में लौटने के बाद भी वह चैन से कहां रह पाई थी और सारी रात उसी के बारे में सोचती रही थी. एक दुबलापतला किशोर अब सुंदर सुदर्शन, तेजस्वी युवक के रूप में बदल चुका था. कल वह उस से मिला तो क्या कहेगी. क्या बातें करेगी उस से. कहीं उस से मिल कर गलती तो नहीं की उस ने. क्या यह जरूरी है कि अतीत की राख को कुरेदा जाए.

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अगले दिन लगभग 9 बजे सुबह ही सुधाकर का फोन आ गया, ‘शाम को क्यों, क्या हम अभी नहीं मिल सकते? ऐसा करो कि हम आज एकसाथ सुबह का नाश्ता लेते हैं.’

‘मुझे विश्वविद्यालय जाना है,’ उस ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, ‘फाइनल ईयर की पढ़ाई है.’

‘क्या इतवार को भी विश्वविद्यालय खुला रहता है,’ उधर से हंसने की आवाज आई, ‘वैसे नहीं मिलना चाहती हो तो कोई बात नहीं मगर बहाना तो मत बनाओ.’

‘बहाना ही बनाना होता तो मैं तुम्हें भीड़ में से क्यों निकालती,’ वह बोली. वैसे उस का चौंकना स्वाभाविक था कि उसे बिलकुल खयाल न आया कि आज इतवार है. वह तो नियमित तैयारी कर विश्वविद्यालय जाने को तैयार बैठी थी. कोई बात नहीं. अभी बात करने में क्या हर्ज है.

उस ने मिलने के लिए विश्वविद्यालय के समीप एक रेस्तरां का नाम बता दिया.

‘कुछ संयोग कितने अप्रत्याशित होते हैं,’ सुधाकर उस से मुखातिब था, ‘अभी भी मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मैं तुम्हारे सामने बैठा हूं.’

‘वही तो मैं भी सोच रही हूं कि इस भीड़भाड़ भरी जिंदगी में हमारा मिलना कितना सुखद है. शायद यह हमारी हार्दिक इच्छा थी कि हम मिलें. और सुना है कि अंतर्मन में उठी तीव्र इच्छाशक्ति अवश्य फलीभूत होती है,’ सुमन एक सांस में बोल गई, ‘और इसलिए जब नाटक के पात्र परिचय में तुम्हारा नाम देखा तो मिलने की इच्छा बलवती हो गई.’

‘इस के लिए मैं तुम्हारा आभारी हूं.’

‘इस में आभार कैसा. इस में तो मेरा भी स्वार्थ था,’ वह बोली, ‘वैसे तुम ने अभिनय के क्षेत्र को अपना लिया है.’

‘अरे नहीं,’ सुधाकर झेंप कर बोला, ‘यह तो बस शौक के बहाने जीवन में एक चेंज सा आ जाता है. इसी बहाने नईनई जगह घूमने और नएनए लोगों से मिलने का मौका भी मिलता है. यह अलग बात है कि इस बार एक पुराने परिचित से मुलाकात हो गई.’

उस के इस परिहास पर दोनों एकसाथ हंस पड़े. उस दिन वे दोनों दिनभर एकसाथ रहे. नाश्ता, खाना, घूमनाफिरना सब चलता रहा. शाम को अपनी नाटक मंडली के साथ सुधाकर को राजधानी मेल से मुंबई वापस लौटना था. वह उसे स्टेशन तक छोड़ने साथ आई.

इस के बाद एक सिलसिला चल निकला. फोन पर अकसर बातें होने लगीं. अपनी सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर सुधाकर गाजियाबाद के एक संस्थान में नौकरी पा गया तो मिलनाजुलना भी होने लगा. तब तक वह भी एक विद्यालय में अंगरेजी की शिक्षिका के तौर पर जौब करने लगी थी.

इन 3 वर्षों के दौरान महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि न तो सुधाकर ने और न ही सुमन ने अपनेअपने परिवार की चर्चा की और न ही परिवार को इस बात की जानकारी दी थी. इन के परिवार के सामने इन का राज तो तब खुला जब सुमन के विवाह के लिए उस के घर में चर्चा चलने लगी. तब उस ने अपनी मां को सुधाकर के बारे में जानकारी दे दी और साफ कह दिया कि वह उस से विवाह करना चाहती है.

आगे पढ़ें- सुमन के मम्मीपापा को इस में आपत्ति नहीं थी मगर…

काश ऐसा हो पाता: भाग-2

‘मगर पूरब में हम जाएंगे कहां?’

‘सिक्किम और कहां,’ वह उसे चौंकाता हुआ सा बोला, ‘वहां तुम्हें भारत-चीन की सीमा भी दिखा देंगे.’

वह चौंक कर बैठ गई, ‘क्या सचमुच, वह भारत-चीन की सीमा देख सकती है. क्या आर्मी वाले उसे वहां जाने देंगे?’

‘और क्या,’ सुधाकर हंस पड़ा था, ‘वहां कोई युद्ध तो हो नहीं रहा, जो जाने नहीं देंगे. अलबत्ता तुम वहां चीनी सिपाहियों से हाथ भी मिला सकती हो, बातें भी कर सकती हो.’

‘आश्चर्य की बात है कि कोई आपत्ति नहीं करेगा.’

‘आपत्ति क्यों करेगा. भारत सरकार ने उस स्थान को पिकनिक स्पौट सा डैवलप कर रखा है,’ सुधाकर की हंसी छूट पड़ी, ‘लोग वहां कंचनजंघा के पहाड़ की बर्फ का लुत्फ लेने जाते हैं.’

दरअसल, सुधाकर की नाटकों में अभिनय की बेहद रुचि थी. दिल्ली में वह एक प्रतिष्ठित नाटक मंडली से शौकिया तौर पर जुड़ा हुआ था और उसी नाटक मंडली को सिलीगुड़ी में एक नाटक की प्रस्तुति करनी थी. इसीलिए वह उन लोगों के साथ सिलीगुड़ी जा रहा था. आमतौर पर वह अकेला ही जाता था मगर इस बार उस ने सुमन से पूछ ही लिया कि क्या वह साथ चलेगी.

‘सिलीगुड़ी से सिक्किम कोई

125 मील दूर है. दार्जिलिंग तो मैं कई बार घूम चुका. इस बार सिक्किम जाने का इरादा है. अगर तुम साथ चलो तो ठीक है. वहां हम भारत-चीन सीमा भी देख लेंगे.’

उस ने सहमति दे दी.

दिल्लीगुवाहाटी राजधानी एक्सप्रैस से वे सिलीगुड़ी पहुंचे.

दूसरे दिन ही सुधाकर की नाटक मंडली की प्रस्तुति थी. उस से निवृत्त हो कर अब वह स्वतंत्र था. उस ने सब से पहले ही कह रखा था कि वे सिक्किम जाएंगे.

अगले दिन सुबह 8 बजे सिक्किम की राजधानी गंगटोक के लिए वे बस में सवार हुए. सिलीगुड़ी से गंगटोक के 125 मील के हरियाली से आच्छादित, चक्करदार रास्ते ने जैसे उन्हें चकरा दिया था. साल, चीड़ और देवदार के आसमान छूते वृक्ष से जंगल पटा पड़ा था. उस ने इधर ही सुना था कि सिक्किम में और्किड के फूल की सैकड़ों प्रजातियां हैं, जो अपने मौसम में खिलने पर पूरे जंगल को अपने सौंदर्य के आगोश में समेट लेती हैं. मगर अभी सिर्फ लाल फूलों से गदराए पलाश के वृक्ष ही दिखाई दे रहे थे.

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लगभग 1 बजे वे सिक्किम की राजधानी गंगटोक पहुंच गए.

गंगटोक के प्रमुख बाजार में ही सुधाकर ने अपने एक मित्र के माध्यम से एक होटल में कमरा बुक करा लिया था. किसी शहर के पौश इलाके के मार्केट की भांति यहां की मुख्य मार्केट थी. अधिकांश गिफ्ट आइटम ही बिक रहे थे. कहने के लिए स्थानीय, मगर सभी में चीन निर्मित सामान भरे पड़े थे. और क्यों न हों, जब होली की पिचकारियां और दीवाली के दीए तक चीन में बन कर भारतीय बाजार में बिक रहे हैं तो यह तो चीन का सीमावर्ती राज्य है. यहां क्यों न बिकें चीन के खिलौने और उपहार सामग्री. वैसे अन्य सभी खाद्य अथवा स्टेशनरी सहित अन्य सामग्री भारतीय ही थी.

होटल का मैनेजर उन्हें सिक्किम के आसपास के पर्यटक स्थलों की जानकारी दे रहा था. मगर सुमन की इस में कोई रुचि न थी. वह तो बस सिर्फ नाथुला क्षेत्र की भारत-चीन सीमा को देखना चाहती थी.

‘आखिर वहां ऐसा है क्या जो तुम उसे ही पहले देखना चाहती हो,’ सुधाकर हंसते हुए बोला था, ‘वैसे भी तुम देहरादून में रह चुकी हो और कश्मीर की घाटियों व पहाड़ों को देख चुकी हो, इसलिए वहां की कोई चीज शायद ही तुम्हें आकर्षित कर सके.’

वह उसे क्या बताती कि उस नाथुला से उस का एक ऐसा संस्मरण जुड़ा है जो राष्ट्रीय महत्त्व का तो है ही, कुछकुछ उस का वैयक्तिक महत्त्व भी उस के लिए है.

टाटा सूमो स्टैंड पर गाडि़यों की लाइन लगी थी. उस के ड्राइवर और खलासी स्थानीय लोग ही थे. वह अचंभित थी यह देख कर कि इतने सारे लोग बर्फ से ढकी भारत-चीन सीमा देखने जा रहे हैं. सुधाकर ने चूंकि गाड़ी रिजर्व करा रखी थी इसलिए वे शीघ्र ही अपने गंतव्य की ओर चल पड़े.

चढ़ाई पर मंथर गति से गाड़ी बढ़ती जा रही थी. एक तरफ विशालकाय पहाड़ों की चोटियां तो दूसरी तरफ हजारों फुट गहरी खाई. जरा सी नजर चूकी नहीं नहीं कि गाड़ी गहरी खाइयों में जा गिरे. दूर से पर्वतों के रास्ते चित्रकारी किए त्रिभुजाकार सफेद रेखाओं से दिखते थे, जिन पर कतारबद्ध गाडि़यां रेंग रही थीं. पर्वत और घाटियां हरियाली से आच्छादित थे. अब सुमन को थोड़ी सिहरन होने लगी थी. कुछ ठंड से, कुछ भय से.

आखिरकार वह मंजिल आ ही गई जिस का उसे बेसब्री से इंतजार था. दूर पर्वतों की चोटियों पर सैनिक चौकियां दुर्ग सी बनी थीं. यही है वह ओल्ड सिल्क रूट, जिस के रास्ते फाहियान और ह्वेनसांग जैसे चीनी यात्री हजारों साल पूर्व भारत आए थे और यहां से महात्मा बुद्ध का शांति, सत्य और अहिंसा का संदेश ले कर वापस हुए थे.

यही कुछ तो हुआ था उस के और सुधाकर के परिवार के साथ. विभागीय प्रतिस्पर्धा में उन लोगों के पिता एकदूसरे के जानी दुश्मन बन चुके थे. एक ही जगह नौकरी और एक ही स्थान पर अगलबगल क्वार्टर्स थे उन के. मगर पास  रह कर भी कितने दूर. वे दोनों बचपन से एकदूसरे को जानते थे. एक ही विद्यालय में, एक ही बस में चढ़ कर आनाजाना होता था. मगर स्वार्थ और अहं की आंधी में सबकुछ स्वाहा होने लगा.

एक बार तो सुमन के पिता ने सुधाकर के पिता को लक्ष्य कर अपनी रिवौल्वर से गोली भी चला दी थी. यह संयोग ही था कि गोली उन्हें लगी नहीं और बाद में उन्होंने कोई प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं की.

इसी घटना के बाद उन दोनों का स्थानांतरण अलगअलग कर दिया गया था.कोलकाता से सुधाकर के पिता का ट्रांसफर मुंबई हो गया. जबकि वह अपने परिवार और पापा के साथ देहरादून चली आई थी. बचपन की वह मित्रता और प्रतिशोध की अग्नि की आंच को उस ने महसूस किया था. क्या होता जब सुधाकर के पिता को गोली लग जाती और वे नहीं रहते. तब क्या सुमन के पिता किसी जेल में सलाखों के पीछे होते अथवा फांसी पर लटका दिए जाते. और तब दोनों ही परिवार बरबाद हो जाते. यह तो सुधाकर के पापा की बुद्धिमानी थी कि उन्होंने कोई ऐक्शन नहीं लिया और चुप्पी साध ली. हालांकि उन्हें भड़काने वाले लोग बहुत थे मगर वे शांत ही रहे.

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काश ऐसा हो पाता: भाग-1

चारों तरफ से पर्वतों से घिरे नाथुला दुर्ग को सूर्य की रश्मियां जैसे अलौकिक आभा प्रदान कर रही थीं. वहां पहुंचते ही सुमन का मन अभिभूत हो गया. चारों तरफ हरियाली और उस पर छिटके हुए रूई के फाहे के समान बर्फ को देखना काफी सुखद था. एक तरफ भारतीय तिरंगा लहरा रहा था. कांटों की बाड़ के दूसरी तरफ के दुर्ग पर चीन का लाल ध्वज लहरा रहा था. हवा काफी तेज थी. लग रहा था कि ध्वज काफी मजबूती से

बंधे होंगे. वह कांटों की बाड़ की तरफ बढ़ चली.

‘‘आगे मत जाइए, मैडम,’’ एक भारतीय सैनिक ने उसे टोका, ‘‘चारों तरफ बारूदी सुरंगें बिछी हैं. जरा सी लापरवाही से वे फट सकती हैं.’’

उस के कदम वहीं ठिठक गए.

‘‘धन्यवाद,’’ वह मुसकरा कर बोली.

‘‘अरे भाई, उस चीनी सैनिक से बात करूं क्या?’’ सुधाकर बोला, ‘‘आप को कोई आपत्ति तो नहीं होगी?’’

‘‘भला मु झे क्या आपत्ति होगी,’’

वह सैनिक हंस कर बोला, ‘‘शायद वह आप की भाषा जानता हो. कर लीजिए बातचीत.’’

सुधाकर ने उस चीनी सैनिक से भाषा से कम, भावों से ज्यादा बातें कीं. वैसे भी वह सिविल विभाग का कुशल अभियंता ही नहीं, रंगमंच का पारंगत अभिनेता भी था. चीनी सैनिक भी जैसे उस के भावों को सम झ गया हो क्योंकि अब उस के सूखे, सपाट चेहरे पर मुसकराहट की लकीरें खिंचने लगी थीं.

मगर सुमन अभी भी उस स्थल को काफी गौर से देख रही थी. उस के पापा ने उसे बताया था कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के वक्त उस के चाचा यहीं शहीद हुए थे. यह अलग बात है कि बाकी मोरचे के मुकाबले यहां भारत की जीत हुई थी. और इसी कारण सुमन के चाचा का शव उन्हें मिल पाया था.

दूर किसी पर्यटक ने हांक लगाई, ‘हिंदी-चीनी, भाईभाई.’

‘ये चीनी कभी विश्वसनीय नहीं होते सुमन,’ उस के पापा का स्वर उस के मन- मस्तिष्क में गूंज रहा था, ‘घात और विश्वासघात यही इन्होंने सीखा है.’

‘फिर भी पापा, समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलाव आ ही जाते हैं.’

‘मैं ने कहां मना किया,’ वह शांत स्वर में बोले, ‘सब का अपनाअपना सच होता है. मैं ने अपने भाई का शव देखा है. कोई खास उम्र नहीं थी उस की. यही कोई 22-23 साल का रहा होगा. मेरे लिए तो ये चीनी हमेशा शत्रु की तरह ही रहेंगे, जिन्होंने मेरे भाई की बलि ले ली.’

‘‘क्या सोच रही हो,’’ सुधाकर मुसकरा कर बोला.

‘‘यही कि तुम मु झे अच्छी जगह ले आए,’’ सुमन बोली, ‘‘हालांकि यहां से मेरी एक दुखद याद जुड़ी है इसलिए यहां आने का मन न था.’’

‘‘तो तुम यहां आ चुकी हो?’’

‘‘अरे नहीं, यह मु झ से नहीं, बल्कि मेरे चाचाजी के साथ हुई घटना है. मेरे पापा ने बताया था कि 1962 के

भारत-चीन युद्ध के वक्त वे यहीं तैनात थे. इसी नाथुला नामक स्थान में तब भयंकर युद्ध हुआ था. अन्य मोरचों के विपरीत यहां भारतीय सेना विजयी रही थी. किंतु मेरे चाचाजी शहीद हो गए थे. मेरे घर में ड्राइंगरूम में उन्हीं की तो बड़ी सी तसवीर टंगी है. तुम ने तो वह तसवीर देखी भी है.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है,’’ सुधाकर मुसकरा कर बोला, ‘‘इसीलिए तुम यहां आना चाहती थीं.’’

पहाड़ों के बीच कांटेदार जालियां थीं. भारतीय और चीनी सिपाही अपनेअपने क्षेत्र में मुस्तैदी से डटे हुए चहलकदमी कर रहे थे. कभी उन के भाव सख्त हो जाते, तो कभी सहृदयता से भरपूर दिखते. गंगटोक शहर से गाडि़यों में भरभर कर लोगों के हुजूम आजा रहे थे. लगभग सभी के चेहरे रोमांच से परिपूर्ण थे. आखिर हों भी क्यों न, चीन के नाम भर से ही हर भारतीय उत्तेजित हो जाता है, शायद सतर्क भी. कौन जाने, ये कब किस पोजीशन पर आ जाएं.

कुछ पर्यटक दुर्ग के दूसरी तरफ इशारे से चीनी सैनिकों का अभिवादन करते. 1-2 चीनी सैनिक इशारे पर कांटों की बाड़ के पास आ खड़े हुए. कुछ पर्यटक उन से हाथ मिलाने लगे. सुमन ने भी सुधाकर के कहने पर उन से हाथ मिलाया. मानवीय स्पर्श इतना तरंगित करने वाला, इतना सुकूनदेह और इतना हसीन होगा, यह कल्पनातीत था.

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मगर यही युद्ध का समय हो तब. न हो रहा हो युद्ध, तनाव ही हो सिर्फ, तो क्या यही स्पर्श वह सुख दे सकेगा? शायद नहीं. मनुष्य के भाव समयसमय पर रूप बदलते हैं. और इसी के साथ बदल जाता है इतिहास. अचानक मौसम बदरंग होने लगा. कालेसफेद बादल घिरने लगे.

‘‘अरे, हमें जल्दी ही वापस लौटना होगा,’’ अचानक सुधाकर चिल्लाया, ‘‘बारिश की बूंदें गिरने लगी हैं.’’

यह वही सुमन थी, जिसे यहां आने का बिलकुल मन नहीं था. पर अभी उस का यहां से इतनी जल्दी जाने का मन नहीं कर रहा था. उसे काफी आश्चर्य हुआ. अभीअभी तो आसमान इतना साफ था कि सबकुछ साफ दिखाई दे रहा था. सूर्य चमक रहा था और अचानक ये कालेकाले मेघ कहां से घिर आए.

‘‘जल्दी वापस लौट जाइए, मैडम,’’ एक दूसरा भारतीय सैनिक उस से कह रहा था, ‘‘बारिश की ये बूंदें जल्दी ही बर्फ के रूप में गिरने लगेंगी. फिर वापस लौटना मुश्किल होगा.’’

‘‘हम लोग तो वापस लौटेंगे ही,’’ वह हंस कर बोली, ‘‘और आप लोग क्या करेंगे?’’

‘‘हम कहां जाएंगे, मैडम,’’ वह भी हंसता हुआ बोला, ‘‘हम तो देश की सेवा हेतु अपने कर्तव्य पथ पर हैं.’’

जिस बात का डर था वही हुआ. इधर वे गाड़ी में बैठे नहीं कि मूसलाधार बारिश शुरू हो गई और वे गाड़ी में ही कैद हो कर रह गए. बारिश कम हो तब तो रास्ता दिखे. थोड़ी देर बाद बारिश रुकी तो वातावरण में रूई के फाहे समान बर्फ के फाहे उड़ने लगे. गाड़ी का स्थानीय ड्राइवर ऐक्सपर्ट था.

‘‘आप घबराएं नहीं, मैडम,’’ वह बोला, ‘‘यह हमारे लिए रोज की बात है.’’

गाड़ी मंथर गति से, या यों कहें कि बैलगाड़ी की गति से आगे बढ़ रही थी. चारों तरफ एक अजीब सन्नाटा था. शायद किसी अनहोनी की आशंका से या और कुछ बात थी, वह सम झ नहीं पाई. ऐसा अकसर होता है कि जब हम किसी संभावित विपदा में फंस जाते हैं तो किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त हो जाते हैं. लेकिन यहां आने का निर्णय तो उसी का था. सुधाकर ने सिर्फ कहा भर था कि पश्चिम और उत्तरदक्षिण बहुत घूम लिए, अब जरा पूरब भी देख लिया जाए.

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सरकारी बाबू

जब से बाबू लोगन की नकेल कसने के लिए बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लगी है, हर बाबू के कान खड़े हो गए हैं. हालांकि घबराने की बात नहीं है क्योंकि इन्होंने समय का पाबंद होने के बजाय इस मशीन से निबटने का बेहतरीन आइडिया निकाल लिया है. क्या है वह आइडिया, जरा आप भी दिमागी घोड़े  दौड़ाइए.

हमारे सरकारी दफ्तर में सभी कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए उन के फिंगर इंप्रैशन और फोटो रिकौर्ड में लेने के बाद इलैक्ट्रौनिक ‘बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली’ की नई व्यवस्था चालू कर दी गई. नई व्यवस्था के बाद अब यदि हमारे दफ्तर के कर्मचारियों को ‘सरकारी पिंजरे में बंद पशुपक्षी’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी.

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पशु इसलिए क्योंकि हाथी, घोड़ों, कुत्तों, यहां तक कि गधे जैसा स्वभाव व व्यवहार करने वाले लोग भी यहां पाए जाते हैं, जो अपने अहंकार के आगे इंसान को इंसान नहीं समझते. पक्षी इसलिए कि यहां पर कोयल की सुरीली आवाज वाली और मोर जैसी सुंदर, आकर्षक, शृंगारयुक्त व सुडौल महिलाएं भी होती हैं और बगुला भगत तो एक नहीं कई होते हैं. विशेषकर जिन्हें अपने दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानांतरण व शीघ्र ही पदोन्नति पाने की चिंता होती है, उन्हें आला अधिकारियों का बगुला भगत बनते देर नहीं लगती.

कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए लगी बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली मशीन लगने के बाद एक कर्मचारी ने अपने साथियों से कहा, ‘‘साथियो, सुबह साढ़े 9 बजे बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर सभी लोग दफ्तर के गार्डन में पीछे की तरफ आ जाया करो. अब तो एकएक ताश की बाजी सुबहसुबह 10 से 11 के बीच में भी हो जाया करेगी और लंच टाइम में तो हमें कोई रोक ही नहीं सकता.’’

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दूसरे कर्मचारी ने भी चुसकी ली और बोला, ‘‘साथियो, बायोमीट्रिक मशीन में सुबहशाम अपनी हाजिरी के लिए उंगली (फिंगर इंप्रैशन) लगाना ठीक है, परंतु यदि गलती से भी कहीं और लगा दी तो अच्छा नहीं होगा. इसलिए इसे रास्ते चलते अपनी आदत मत बना लेना. गलती से भी यदि आप की उंगली भीड़भाड़ में किसी महिला के शरीर से टच हो गई तो जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है. पता होना चाहिए कि महिलाओं के संबंध में कानून व्यवस्था अब बहुत सख्त हो गई है.’’

लेखानुभाग में उपस्थित एक क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘साथियो, सुबहसवेरे बायोमीट्रिक मशीन में उंगली लगा कर सीधे ही सभी लोग सभागार में पहुंच जाया करो. थोड़ी गपशप और चायशाय हो जाया करेगी. काम तो 11 बजे से पहले नहीं शुरू हो पाएगा. जब तक सफाई कर्मचारी कक्ष का अच्छी तरह से झाड़ूपोंछा नहीं कर लेते तब तक हम तो अपने कक्ष में बिलकुल भी नहीं बैठ सकते.’’

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दूसरा क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘अरे यार, क्या बात करते हो, केवल गपशप और चायशाय से क्या होगा. मेरी राय में तो समय बिताने के लिए अब करना है कुछ नया काम, सुबहसुबह ही किसी कोने में इंटरनैट खोल कर बैठिए और देखिए तमाम ब्लू फिल्में.’’

उस के इतना कहते ही सभी ने जोरदार ठहाका लगाते हुए एक स्वर में कहा, ‘‘हां, आप ठीक कह रहे हैं, यही ठीक रहेगा.’’

दफ्तर में बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लग जाने के कारण संभ्रांत महिलाओं की चिंता थी कि सुबह साढ़े 9 बजे तक दफ्तर आने और शाम को 7 बजे से पहले न जाने पर उन के घर के कई काम अधूरे रह जाते हैं.

उन की समस्या सुन कर एक समझदार साथी ने अपनी महिला साथी की समस्या का समाधान कुछ इस प्रकार किया और बोला, ‘‘मैडम, आप तो एक इलैक्ट्रिक कुकिंग प्लेट, कुछ बरतन व जरूरी मसाले आदि ला कर यहीं अपनी अलमारी में रख लीजिए और सुबहसुबह साढ़े 9 बजे आ कर बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर तुरंत दफ्तर के पास वाली मार्केट चली जाया कीजिए और वहां से ताजी सब्जियां खरीद कर ले आया कीजिए. शाम तक उसे धो कर व काटकूट कर सायं 5 बजे के बाद उसे अपने दफ्तर के कक्ष में ही तैयार कर, यहीं से सब्जी पका कर ही 6 बजे के बाद घर ले जाया करें और पहुंचते ही चपातियां सेंक कर अपने परिवार के सदस्यों को सर्व कर दिया करें.’’

वे बोलीं, ‘‘कैसी बातें करते हैं, किसी अधिकारी ने देख लिया तो?’’

समझदार साथी ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘मैडम, इस में डरने वाली कोई बात नहीं है. जब अधिकारी अपने कक्ष में इलैक्ट्रिक कैटल और नाश्ते का सामान रख सकते हैं तो आप भला क्यों नहीं रख सकतीं. आप तो खांमखां डर रही हैं.’’

एक कर्मचारी ने बताया, ‘‘दफ्तर में जब से बायोमीट्रिक मशीन लगी है मैं ने तो अपने सुबह के टहलने के समय में परिवर्तन कर लिया है और यहां साढ़े

9 क्या, 9 बजे ही आ जाता हूं और हाजिरी मशीन में अपनी उंगली का इंप्रैशन लगा कर सीधे ही पास वाले गार्डन में जा कर 11 बजे तक चक्कर लगाता हूं और फिर दफ्तर लौट कर कैंटीन में चाय पीता हूं तब जा कर सीट पर बैठ कर 2-4 फाइलें निबटा देता हूं. तब तक लंच टाइम हो जाता है. इसी प्रकार शाम को पहले 5 बजे घर भाग जाया करता था. अब 4 बजे निकलता हूं और पास वाले सुपर मार्केट से शाम के 6 बजे तक सामान गाड़ी में डाल कर ले आता हूं और यहां आ कर मशीन में दफ्तर छोड़ने के लिए उंगली का इंप्रैशन लगाता हूं और वापस घर चला जाता हूं.’’

साथी बोला, ‘‘यार, तुम्हारे कमरे की लाइट व कंप्यूटर वगैरह कौन स्विच औफ करता है?’’

वह बोला, ‘‘मुझे उस की बिलकुल भी परवा नहीं है. प्रत्येक तल पर सुरक्षा संतरी किस लिए है. वह खुली देखता होगा तो खुद ही बंद कर देता होगा. आखिर उसे भी तो कुछ काम करना चाहिए…वह भी तो तनख्वाह लेता है.’’

सच कहूं तो मुझे तो अपने दफ्तर में बायोमीट्रिक मशीन द्वारा हाजिरी लगने से केवल एक लाभ ही दिखाई दे रहा है कि जिन सरकारी कर्मचारियों को अपने दफ्तर के कार्यदिवसों में खुलने का समय व बंद होने का समय मालूम ही नहीं था, इस बहाने उन्हें पता चल गया वरना पूरी 60 वर्ष की नौकरी हो जाती और वे रिटायर भी हो जाते, उन्हें सरकारी दफ्तर के प्रत्येक दिन का सही कार्यसमय ही न मालूम हो पाता.

बंदा तो पहले घर से ही देरी से दफ्तर आता था और जल्दी चला जाता था, इसलिए अपनी सीट पर नहीं मिलता था और अब अपने कार्यदिवसों में आता तो जल्दी है और प्रत्येक दिन जाता भी दफ्तर के समाप्त होने के निर्धारित समय के बाद है मगर फिर भी वह दिनभर सीट पर कम ही दिखता है. कहां जाता है और क्याक्या करता है, किसी को पता ही नहीं रहता.

जिस किसी से पूछो कि फलां कर्मचारी कहां है तो यही कहते मिलता है कि आए तो हैं लेकिन कहां हैं, पता नहीं. देखिए, उन का चश्मा और पैन तो उन की सीट पर रखा है और कंप्यूटर भी औन है न. बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन के कंप्यूटरीकृत सौफ्टवेयर में ताकझांक करने पर वह वहां सुबह साढ़े 9 बजे तक रोजाना ही दफ्तर आता है और शाम को भी सायं 6 बजे के बाद ही दफ्तर छोड़ता है. वहां लगे हुए उस के फिंगर इंप्रैशन व फोटो तो यही सत्यापित करते हैं. इसलिए दफ्तर के आला अधिकारियों द्वारा कभी भी उस की एक क्या, आधे दिन तक की भी, न तो छुट्टी काटी जा सकती है और न ही वेतन.

बेसमेंट में छिपा राज : भाग 2

पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- 

गिरधर एनक्लेव में एक के बाद एक पुलिस की गाडि़यां आने के कारण मुन्ना के मकान के बाहर कालोनी के लोगों की भीड़ जुट गई.

सीओ राकेश मिश्रा और एसडीएम के आने के बाद मोहल्ले के कुछ लोगों को गवाह बना कर उस जगह फर्श की खुदाई कराई गई, जहां ताजा प्लास्टर हुआ था.

करीब 4 फुट की खुदाई होते ही पुलिस की आंखें फटी रह गईं. 6 फुट गहरे और 2 फुट चौडे़ गड्ढे की मिट्टी निकाली तो वहां से एक लाश निकली. मजदूरों की मदद से वह लाश गड्ढे से बाहर निकाली. उस के चेहरेमोहरे से मिट्टी हटा कर देखा तो वह लाश पंकज की ही निकली. लाश देखते ही मनीष ‘मेरा भाई पंकज’ कहते हुए सिर पकड़ कर वहीं जमीन पर बैठ गया. पंकज के गले में रस्सी बंधी थी, जिस से जाहिर था कि उसी रस्सी से उस का गला दबाया गया था.

थोड़ी ही देर में पंकज का रूम पार्टनर संजय भी मौके पर आ गया. लाश के शरीर पर जो कपड़े थे, उन्हें देख कर संजय ने भी बता दिया कि पंकज यही कपड़े पहन कर 9 तारीख की सुबह घर से निकला था.

लाश मुन्ना के घर के बेसमेंट में मिली थी और मुन्ना अपने परिवार के साथ घर से लापता था. लिहाजा पहली नजर में यह शक हो रहा था कि कहीं न कहीं इस हत्या के पीछे मुन्ना और उस के परिवार का ही हाथ है.

सूचना पा कर एसएसपी सुधीर कुमार सिंह और एसपी (सिटी) मनीष कुमार मिश्रा भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

जरूरी जांच करने के बाद पंकज का शव पोस्टमार्टम के लिए गाजियाबाद की मोर्चरी भिजवा दिया. पंकज का शव मिलने की बात सुन कर उस के पिता और दूसरे रिश्तेदार भी गाजियाबाद आ गए.

इस बीच एसएसपी ने पूरा मामला जानने के बाद पंकज सिंह हत्याकांड की जांच के लिए सीओ डा. राकेश कुमार मिश्रा के निर्देशन में एक विशेष जांच टीम का गठन कर दिया. टीम में इंसपेक्टर जे.के. सिंह के अलावा एसआई जितेंद्र कुमार, राजीव बालियान, हैडकांस्टेबल कृष्णवीर, रविंद्र, कांस्टेबल संजीव सिंह, विपिन, प्रवेश और महिला हैडकांस्टेबल सुमित्रा को शामिल किया गया. टीम का नेतृत्व इंसपेक्टर जे.के. सिंह कर रहे थे.

जांच का काम हाथ में लेते ही इंसपेक्टर जे.के. सिंह ने रिपोर्ट में भादंवि की धारा 302 और जोड़ दी. टीम ने सब से पहले गिरधर एनक्लेव में लगे सीसीटीवी कैमरे की जांच कराई. एक फुटेज में पंकज सुबह करीब सवा 9 बजे लोअर पहने हुए सेब खाता हुआ कालोनी के बाहर से भीतर आता हुआ दिखा था. लेकिन उस के बाद वह कालोनी से बाहर की तरफ निकलते नहीं दिखा. इलाके के कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने भी पंकज को मुन्ना के घर की तरफ जाते देखा था.

जांचपड़ताल की इसी कड़ी में जब पंकज के मोबाइल की काल डिटेल्स की छानबीन की गई तो पता चला कि सुबह सवा 10 बजे पंकज के मोबाइल की लोकेशन झंडापुर टावर की थी. यह टावर गिरधर एनक्लेव के पीछे बने रेलवे ट्रैक के आसपास है. जो मुन्ना के घर के काफी समीप है. इस से यह बात स्पष्ट हो गई कि जिस समय पंकज के साथ कोई हादसा हुआ, उस समय वह या तो मुन्ना के घर के आसपास था या घर के भीतर था.

अब तक आए सभी साक्ष्य इस बात की गवाही दे रहे थे कि पंकज की हत्या मुन्ना और उस के परिवार के किसी सदस्य ने मिल कर की है.

पंकज की काल डिटेल्स में यह बात भी सामने आई कि पंकज के फोन पर अकसर मुन्ना की काल आतीजाती थी. पंकज और मुन्ना के वाट्सऐप पर भी मैसेज का काफी आदानप्रदान होता था, लेकिन वाट्सऐप चैट में क्या था, इसे जानने के लिए दोनों के मोबाइल फोन का होना जरूरी था.

पता चला कि मुन्ना बिहार के नवादा जिले का रहने वाला है. किसी तरह पुलिस ने मुन्ना का पता हासिल कर लिया, जिस के बाद इंसपेक्टर जे.के. सिंह ने एसआई राजीव बालियान और जितेंद्र कुमार की अगुवाई में एक टीम नवादा (बिहार) के लिए रवाना कर दी.

20 अक्तूबर को पुलिस टीम जब नवादा में मुन्ना के घर पहुंची, तो पता चला कि मुन्ना अपने परिवार के साथ अपने गांव में आया जरूर था, लेकिन 2 दिन पहले ही वह घर जाने की बात कह कर वापस चला गया.

काफी कुरेदने के बावजूद भी पुलिस टीम को मुन्ना के रिश्तेदारों से यह बात पता नहीं चल सकी कि मुन्ना इस समय कहां गया है. थकहार कर साहिबाबाद थाने की पुलिस टीम वापस लौट आई.

इसी दौरान साहिबाबाद थाने में एसएसआई प्रमोद कुमार की नियुक्ति हुई तो इंस्पेक्टर जे.के. सिंह से ले कर पंकज हत्याकांड की जांच का काम उन के सुपुर्द कर दिया गया. प्रमोद कुमार ने जांच का काम हाथ में लेते ही अब तक हुई जांच के बारे में पूरा अध्ययन किया.

जांच अधिकारी प्रमोद कुमार ने टीम के साथ उन तमाम संभावित ठिकानों पर दबिशें देनी शुरू कर दीं, जहां मुन्ना या उस के परिवार के मिलने की संभावना थी. लेकिन मुन्ना चालाक था. पुलिस जहां भी पहुंचती, वह उस से पहले ही उस ठिकाने से निकल लेता.

पुलिस को मुन्ना के कुछ ऐसे करीबी लोगों के मोबाइल नंबर मिल गए, जिन से मुन्ना के न सिर्फ कारोबारी संबंध थे, बल्कि वह उन के साथ काफी उठताबैठता भी था.

पुलिस ने उन नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया. आखिर इस से पुलिस को 2 नवंबर, 2019 को जानकारी मिली कि मुन्ना अपने परिवार के साथ साहिबाबाद रेलवे स्टेशन पर मौजूद है और वहां से वह ट्रेन पकड़ कर कोलकाता जाने वाला है.  पुलिस टीम तत्काल साहिबाबाद रेलवे स्टेशन पहुंच गई और उसे दबोच लिया.

दरअसल हुआ यूं था कि मुन्ना ने नोएडा में अपने एक दोस्त, जिस के औफिस में वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम देखता था, को फोन कर के अपने मुसीबत में होने की बात बताई. उस ने दोस्त से कुछ पैसे साहिबाबाद रेलवे स्टेशन पर भिजवाने के लिए कहा, जहां वह ट्रेन का इंतजार कर रहा था. पुलिस टीम ने जब मुन्ना के उस दोस्त से पूछताछ की तो उस ने सच उगल दिया और पुलिस मुन्ना तक पहुंच गई.

मुन्ना और उस के परिवार को थाने ला कर जब सीओ राकेश कुमार मिश्रा के समक्ष पूछताछ हुई तो कुछ ही देर में पंकज की हत्या का सच सामने आ गया. मुन्ना ने कबूल कर लिया कि उस ने अपनी पत्नी सुलेखा और छोटी बेटी अंकिता के साथ मिल कर पंकज की हत्या की थी.

मुन्ना, सुलेखा और अंकिता से पूछताछ के बाद पंकज हत्याकांड की जो कहानी सामने आई वह इस प्रकार निकली—

दिल्ली से सटे साहिबाबाद शहर में स्थित गिरधर एनक्लेव में रहने वाला हरिओम उर्फ मुन्ना कुछ साल पहले तक कबाड़ी का काम करता था. कबाड़ के काम से उसे खूब आमदनी हुई. जिस से उस ने गिरधर एनक्लेव में प्लौट खरीद कर उस पर 3 मंजिला मकान बना लिया. मकान के 2 मंजिल उस ने किराए पर दे दिए, जिस से अच्छीखासी आमदनी होने लगी.

3 साल पहले मुन्ना ने कबाड़ का काम बंद कर दिया और कुछ दिन खाली रहा. लेकिन 2 साल पहले उस ने नोएडा में अपने एक दोस्त, जो प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था, के दफ्तर पर जा कर बैठना शुरू कर दिया. जहां वह दोस्त के प्रौपर्टी डीलिंग के काम को संभालता था. प्रौपर्टी की जो डील वह खुद करता था उस में दोस्त को वह हिस्सा देता था.

मुन्ना के परिवार में पत्नी सुलेखा के अलावा 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. मुन्ना की सब से बड़ी बेटी अनीशा (21) अंकिता (19) बेटा दीपक (17) और राकेश (15) साल के हैं.

उस की सब से बड़ी बेटी अनीशा शारीरिक रूप से थोड़ी कमजोर थी और अकसर बीमार रहती थी. यही कारण रहा कि 2-3 साल पहले 10वीं पास करने के बाद उस की पढ़ाई छूट गई. उस से छोटी बेटी अंकिता स्वस्थ होने के साथ बेहद खूबसूरत भी थी. लेकिन बड़ी बहन के बीमार होने के कारण मुन्ना ने उस की तीमारदारी के लिए अंकिता की पढ़ाई भी 10वीं के बाद छुड़वा दी.

हालांकि दोनों बेटों की पढ़ाई लगातार जारी रही. बड़ा बेटा दीपक इस बार 12वीं कक्षा में था. पिछले साल जब अनीशा स्वस्थ हो गई तो मुन्ना ने अनीशा और अंकिता का एक साथ 11वीं कक्षा में एडमिशन करा दिया.

क्योंकि मुन्ना के चारों ही बच्चे पढ़नेलिखने में थोड़ा कमजोर थे. संयोग से सत्यम एनक्लेव में अपने साइबर कैफे में ट्यूशन पढ़ाने वाला पंकज सिंह एक दिन मुन्ना के संपर्क में आया. पता चला कि मुन्ना ने पंकज से अपने चारों बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के बारे में बात की.

करीब 5 महीने पहले मुन्ना के चारों बच्चे ट्यूशन पढ़ने के लिए पंकज के साइबर कैफे पर जाने लगे. पंकज सुबह करीब साढ़े 9 बजे तक साइबर कैफे खोल लेता था. इस के बाद वह साढ़े 12 बजे तक बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था. इस दौरान अगर कोई टाइपिंग का वर्क ले कर दुकान पर आ जाता, तो वह उस का भी काम कर देता था.

कुल मिला कर पंकज वकालत की पढ़ाई करने के साथसाथ अपना खर्च चलाने के लिए साइबर कैफे और ट्यूशन पढ़ाने का काम करता था, जिस से उस की जिंदगी आराम से गुजर रही थी. जब से मुन्ना के चारों बच्चे पंकज से ट्यूशन पढ़ने लगे थे, तब से उस के कालेज जाने के बाद चारों बच्चों में से ही कोई उस के साइबर कैफे पर बैठ कर उस का संचालन करते थे. शाम को कालेज से आने के बाद पंकज फिर साइबर कैफे संभाल लेता था.

पंकज पढ़ालिखा और आकर्षक व्यक्तित्व का नौजवान था. अंकिता यूं तो पंकज से उम्र में काफी छोटी थी लेकिन डीलडौल और अपने सुडौल बदन की वजह से वह एकदम जवान दिखती थी. न जाने कब और कैसे अंकिता ट्यूशन पढ़तेपढ़ते पंकज के करीब आती चली गई.

यही कारण था कि पंकज से जब भी एकांत में वह मिलती तो गाहेबगाहे पंकज से कुछ ऐसी निजी बातें करने लगती, जिस से धीरेधीरे पंकज भी उस की तरफ आकर्षित हो गया. जल्द ही उन दोनों की नजदीकियों ने प्रेम का रूप धारण कर लिया.

अब कुछ ऐसा होने लगा कि जब भी दोनों को थोड़ा सा एकांत मिलता तो वे एकदूसरे से प्यार भरी बातें करते. कभीकभी झूठ बोल कर अंकिता पंकज के साथ पिक्चर देखने भी चली जाती और पंकज उसे रेस्टोरेंट्स में लंच या डिनर कराने भी ले जाता.

इसी दौरान 3 महीने पहले अचानक पंकज के मकान मालिक ने रिपेयर कराने के लिए जब अपना फ्लैट खाली कराया तो अंकिता के कहने पर मुन्ना के तीसरे फ्लोर पर स्थित कमरे में आ कर रहने लगा. मुन्ना के घर में आ कर पंकज की अंकिता के साथ नजदीकी और ज्यादा बढ़ गई. दोनों के बीच कुछ ऐसे रिश्ते भी बन गए जो शादी से पहले एक लड़की और लड़के के बीच नहीं होने चाहिए.

हालांकि अभी तक मुन्ना या उस के परिवार के किसी सदस्य को दोनों के संबंध की भनक नहीं लगी थी. लेकिन 15 दिन बाद अचानक पंकज ने मुन्ना का मकान छोड़ दिया. वह नवीन त्यागी के मकान में जा कर रहने लगा.

मुन्ना के परिवार में मुन्ना के अलावा किसी के पास भी एंड्रायड मोबाइल फोन नहीं था. मुन्ना की पत्नी सुलेखा के पास मोबाइल फोन जरूर था, लेकिन वह भी साधारण फोन था. अगर परिवार में बच्चों को किसी से बात करनी होती थी तो वह अपने पिता या मां सुलेखा का फोन ही इस्तेमाल करते थे.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

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