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Social Story : बदला वेश बदला मन

Social Story : सेठ पूरनचंद बहुत ही कंजूस था. अपार धनदौलत होते हुए भी उस का दिल बहुत छोटा था. कभी किसी जरूरतमंद की उस ने सहायता नहीं की थी. वह सदा इसी तिकड़मबाजी में रहता कि किसी तरह उस की दौलत बढ़ती रहे. उस की इस कंजूसी की आदत के कारण उस के परिवार वाले भी उस से खिंचेखिंचे रहते थे. पर सेठ को किसी की परवा नहीं थी.

एक दिन सेठ पूरनचंद शाम को सदा की तरह टहलने निकला. चलतेचलते वह शहर से दूर निकल गया.

रास्ते में एक जगह उस ने देखा, एक चित्रकार बड़े मनोयोग से अपने सामने के दृश्य का चित्र बना रहा है. सेठ भी कुतूहलवश उस के पास चला गया. चित्रकार बड़े सधे हाथों से वह चित्र बना रहा था. सेठ प्रशंसा भरे स्वर में बोला, ‘‘वाह, बड़ा सजीव चित्र बनाया है तुम ने. क्या इनसान की तसवीरें भी बना लेते हो तुम?’’

‘‘जी हां,’’ चित्रकार मुसकराया, ‘‘क्या आप को अपनी तसवीर बनवानी है?’’

‘‘हां, बनवाना तो चाहता हूं पर तुम पैसे बहुत लोगे?’’

‘‘पर आप की जिंदगी की यादगार तसवीर भी तो बन जाएगी. अपनी तसवीर बनवाने के लिए आप को मुझे 3-4 घंटे का समय देना होगा. कल सुबह 8 बजे आप मेरी चित्रशाला में आ जाइए,’’ कहते हुए चित्रकार ने अपनी चित्रशाला का पता सेठ पूरनचंद को दे दिया.

अगले दिन सेठ पूरनचंद सजधज कर चित्रकार की चित्रशाला में पहुंचा. उस के गले में मोतीमाणिक के हार थे, हाथ में सोने की मूठ वाली छड़ी थी, पगड़ी में कलफ लगा हुआ था. चित्रकार ने सजेधजे सेठ को देखा तो बोला, ‘‘सेठजी, आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं?’’

‘‘हांहां, कहो,’’ सेठ बड़ी शालीनता से बोला.

‘‘जैसे आप हैं, वैसी तसवीर बनाने का तो फायदा नहीं. इस में कोई अनोखी बात भी नहीं होगी. तसवीर तो ऐसी बनवानी चाहिए जैसे आप दरअसल हैं ही नहीं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ सेठ उलझन में पड़ गया.

‘‘मतलब यह कि आप वह सामने दीवार पर टंगी तसवीर देख रहे हैं?’’

‘‘हां, ‘‘सेठ बोला, ‘‘किसी बड़े रईस की तसवीर मालूम पड़ती है. कोट पर सोने के बटन लगे हैं, सभी उंगलियों में हीरे या सोने की अंगूठियां हैं, कलाई पर कीमती घड़ी बंधी है.’’

‘‘यह असल में किसी रईस की नहीं, एक बेहद गरीब रिकशा चालक की तसवीर है,’’ चित्रकार मुसकराया, ‘‘और क्योंकि आप रईस हैं, इसलिए आप को गरीब भिखारी के वेश में तसवीर बनवानी चाहिए. जो भी उसे देखेगा, एक बार तो हक्काबक्का रह ही जाएगा.’’

’‘हां, कहते तो तुम ठीक हो,’’ सेठ को चित्रकार की बात पसंद आ गई, ‘‘तुम भिखारी के वेश में ही मेरी तसवीर बनाओ.’’

चित्रकार ने सेठ के कीमती वस्त्र व आभूषण उतरवा कर उसे एक चिथड़ा सा लपेटने को दे दिया. बाल बिखेर कर उन में धूल और घास फंसा दिए तथा शरीर को मैलाकुचैला प्रदर्शित करने के लिए मिट्टी लगा दी. फिर उस ने सेठ को एक लाठी पकड़ा कर कोने में खड़ा कर दिया और बोला, ‘‘सेठजी, मैं अब आप का चित्र बनाना आरंभ कर रहा हूं. बिना हिलेडुले खड़े रहिए. लगभग 3 घंटे लगेंगे आप का चित्र पूरा होने में.’’ सेठ ने सामने लगे शीशे में अपना प्रतिबिंब देखा तो मुसकरा कर बोला, ‘‘तुम ने तो कमाल का मेकअप कर दिया है. सचमुच मैं भिखारी ही लग रहा हूं. कौन कहेगा कि मैं शहर का सब से धनाढ्य सेठ पूरनचंद हूं?’’

चित्रकार ने चित्र बनाना प्रारंभ कर दिया था. इस दौरान चित्रकार का नौकर रघु भी आ गया और कमरे की सफाई करने लगा. बीचबीच में वह बुत की तरह खड़े सेठ पर भी नजर डाल लेता. कमरे में झाड़ू लगा कर वह रसोईघर में चला गया और बरतन मांज कर खाना बनाने लगा. काम करतेकरते उसे 3-4 घंटे हो गए थे. इस दौरान चित्रकार का काम पूरा हो गया. वह सेठ से बोला, ‘‘अभी रंग गीला है. चित्र में कुछ काम अभी बाकी है. आप कल आ कर अपनी तसवीर ले जाइएगा.’’ इस के बाद चित्रकार ने आवाज लगाई, ‘‘रघु, आ कर अपना वेतन ले जाओ.’’

रघु आया तो चित्रकार ने उसे 2 हजार रुपए दे दिए. इतने में चित्रकार से कोई मिलने आया तो वह बाहर चला गया. रघु अब भिखारी के वेश में खड़े सेठ के पास गया और बोला, ‘‘3 घंटे तक खड़ेखड़े तो तुम्हारी कमर अकड़ गई होगी भैया?’’ ‘‘हां,’’ सेठ ने अंगड़ाई ले कर बदन झटकाया और बोला, ‘‘हां भाई, मेरी तो सारी नसें अकड़ गई हैं.’’

‘‘मजबूरी जो न कराए सो थोड़ा. तुम तो बड़े ही गरीब और जरूरतमंद लगते हो. चित्रकार बाबू भला तुम्हारा चित्र बनाने के बदले तुम्हें 100-200 रुपए से ज्यादा क्या देंगे?’’

रघु की बात पर सेठ को मन ही मन हंसी आने लगी. वह समझ गया कि रघु उसे सचमुच भिखारी समझ रहा है. चित्रकार लोग अकसर चित्र बनाने के लिए भाड़े पर ऐसे गरीब जरूरतमंदों को ला कर उन के चित्र बनाते हैं और बदले में उन्हें थोड़ेबहुत रुपए दे देते हैं. तभी रघु ने जेब में हाथ डाला और 500 रुपए का नोट निकाल कर सेठ के हाथ पर रख दिया.

‘‘यह क्या है?’’ सेठ चौंक पड़ा.

‘‘ले लो भैया, तुम बड़े गरीब और जरूरतमंद लगते हो. गरीब तो मैं भी हूं, इसलिए इस से ज्यादा मदद करने की हालत में नहीं हूं. तुम इस नोट को रख लो.’’ फिर रघु वहां से चला गया. सेठ विस्मय से भरा वहीं खड़ा रह गया. वह सोच रहा था कि दुनिया में क्या ऐसे लोग भी होते हैं? यह चित्रकार का नौकर है. मात्र 2 हजार रुपए मिले हैं इसे वेतन के, लेकिन फिर भी इस ने बेझिझक मुझे 500 रुपए दे दिए. रघु गरीब बेशक है, पर दिल का अमीर है.

इस तरह की घटना सेठ पूरनचंद के साथ पहली बार घटी थी. इस का उस के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह अपने बारे में सोच कर स्वयं की रघु से तुलना करने लगा. उस के पास तो करोड़ों की दौलत है पर उस ने कभी किसी गरीब को 2 रुपए भी नहीं दिए. कभी किसी के दुख को नहीं समझा. सेठ का मन पश्चात्ताप से भर उठा. वह सोच रहा था कि अब तक का जीवन तो बीत गया पर अब बाकी का जीवन वह रघु द्वारा दिखाई राह पर चलते हुए बिताएगा. रघु को भी वह अपने कारखाने में अच्छे वेतन पर नौकरी देगा. Social Story

Romantic Story In Hindi : संदेशवाहक – शादी के बाद शिखा की जिंदगी में कैसे आया बदलाव?

Romantic Story In Hindi : नीरज से शिखा की शादी के समय महक अमेरिका गई हुई थी. जब वह लौटी, तब तक उन की शादी को 3 महीने बीत गए थे. अपनी सब से पक्की सहेली के आने की खुशी में शिखा ने अपने घर में एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया. शिखा ने पार्टी में नीरज के 3 खास दोस्तों और अपनी 3 पक्की सहेलियों को भी बुलाया.

जब करीब 9 बजे महक ने उन के ड्राइंगरूम में कदम रखा, तब तक सारे मेहमान आ चुके थे. शिखा और उस की सहेलियों के अलावा बाकी सब उस से पहली बार मिल रहे थे. उस पर पहली नजर डालते ही वे सब उस की सुंदरता देख कर मुग्ध हो उठे. ‘‘अति सुंदर’’, ये शब्द शिखा के पति नीरज के मुंह से निकले.

रवि, मोहित और विपिन की भी आंखें चमक उठीं और मुंह खुले के खुले रह गए. ‘‘शिखा, शादी कर के तो तू फिल्मी हीरोइन सी सुंदर हो गई है,’’ महक ने पहले शिखा को गले लगाया औैर फिर गोद में उठा कर 2 चक्कर भी लगा दिए.

फिर जब वह नीरज से भी गले लग कर मिली, तो शिखा ने उस के तीनों दोस्तों की आंखों में हैरानी के भावों को पैदा होते देखा. ‘‘जीजू, मसल्स तो बड़ी जबरदस्त बना रखी हैं,’’ महक ने बेहिचक नीरज के बाएं बाजू को दबाते हुए उस की तारीफ की, ‘‘लगता है तुम्हें भी मेरी तरह जिम जाने का शौक है. यू आर वैरी हैंडसम.’’

नीरज तो उसी पल से महक का फैन बन गया. उसे अपने सुंदर रंगरूप और मजबूत कदकाठी पर बहुत गुमान था. फिर महक रितु, गुंजन औैर नीमा से गले लग कर मिली. मोहित, रवि और विपिन से उस ने दोस्ताना अंदाज में हाथ मिलाया.

महक के पहुंचते ही पार्टी में जान पड़ गई थी. नीरज और उस के दोस्त उस की अदाओं के दीवाने हो गए थे. महक उन से यों खुल कर हंसबोल रही थी मानो उन्हें वर्षों से जानती हो. ‘‘बिना डांस के पार्टी में मजा नहीं आता,’’ उस के मुंह से इन शब्दों के निकलने की देर थी कि उन चारों ने फटाफट सोफा औैर मेज एक तरफ खिसका कर ड्राइंगरूम के बीच में डांस करने की जगह बना दी.

डांस कर रही महक का उत्साह देखते ही बनता था. उस ने नीरज और उस के तीनों दोस्तों के साथ जम कर डांस किया. ‘‘अरे, हम चारों भी इस पार्टी में शामिल हैं. हमारे साथ भी कोईर् खुशीखुशी डांस कर ले, यार,’’ गुंजन के इस मजाक पर सब ठहाका मार कर हंसे जरूर, पर उन चारों के आकर्षण का केंद्र तब भी महक ही बनी रही.

महक को किसी भी पुरुष का दिल जीतने की कला आती थी. उस की बड़ीबड़ी चंचल आंखों की चमक और दिलकश मुसकान में खो कर नीरज औैर उस के दोस्तों को समय बीतने का एहसास ही नहीं हो रहा था. ‘‘आज जीजू के पास हमारे लिए वक्त नहीं है. वैसे जब मिलते थे तो भंवरे की तरह हमारे इर्दगिर्द ही मंडराते रहते थे,’’ रितु की इस बात पर चारों सहेलियां खूब हंसीं.

‘‘आज मौका है, तो नीरज के बाकी दोस्तों से गपशप क्यों नहीं कर रही हो? ये अच्छे और काबिल लड़के फंसाने लायक हैं, सहेलियो,’’ शिखा ने उन्हें मजाकिया अंदाज में छेड़ा. ‘‘आज इन सब के पास महक के अलावा किसी और की तरफ देखने की फुरसत नहीं है,’’ अपनी बात कह कर नीमा ने ऐसा मुंह बनाया कि हंसतेहंसते उन सब के पेट में बल पड़ गए.

‘‘यह है वैसे हैरान करने वाली बात,’’ गुंजन ने सीरियस दिखने का नाटक किया, ‘‘महक से इन्हें कुछ नहीं मिलने वाला है, क्योंकि वह आज के बाद इन्हें भूल जाएगी और…’’ ‘‘किसी अगली पार्टी में होने वाली मुलाकात तक यह इन से कोई वास्ता नहीं रखेगी,’’ नीमा बोली.

‘‘हां, किसी अगली पार्टी में होने वाली मुलाकात में महक इन से फिर जम कर फ्लर्ट करेगी और पार्टी खत्म होते ही फिर इन्हें भुला देगी. लेकिन इन में से कोई भी इस के ऐसे व्यवहार से सबक नहीं सीखेगा. अगली मुलाकात होने पर ये फिर महक के इर्दगिर्द दुम हिलाते घूमने लगेंगे. है न यह हैरानी वाली बात?’’

‘‘और इधर हम इंतजार में खड़ी हैं,’’ नीमा ने नाटकीय अंदाज में गहरी सांस छोड़ी, ‘‘इन्हें अपना घर बसाना हो, तो हमारे पास आना चाहिए. इन के बच्चों की मम्मी बनने को हम तैयार हैं, पर इन बेवकूफों की दिलचस्पी हमेशा फ्लर्ट करने वाली महक जैसी औरतों में ही क्यों रहती है?’’

नीमा के अभिनय ने उस की सहेलियों को एक बार फिर जोर से हंसने पर मजबूर कर दिया. ‘‘शिखा, नीमा के इस सवाल का जवाब तू दे न. जीजू भी महक की तरह फ्लर्ट करने में ऐक्सपर्ट हैं. क्या तुझे उन की इस आदत पर कभी गुस्सा नहीं आता?’’ गुंजन ने मुसकराते हुए नीरज की शिकायत की.

‘‘मुझे तुम सब पर विश्वास है, इसीलिए मैं उन के तुम लोगों के साथ फ्लर्ट करने को अनदेखा करती हूं,’’ शिखा ने लापरवाही से कंधे उचकाते हुए जवाब दिया. ‘‘चल, हमारी बात तो अलग हो गई, लेकिन कल को जीजू किसी और फुलझड़ी के चक्कर में फंस गए, तब क्या करोगी?’’

‘‘मैं और नीरज उस फुलझड़ी का हुलिया बिगाड़ देंगे,’’ शिखा ने अपनी उंगलियां मोड़ कर पंजा बनाया और रितु का मुंह नोचने का अभिनय किया, तो उस बेचारी के मुंह से चीख ही निकल पड़़ी. ‘‘अब मैं चली खाना लगाने की तैयारी करने. तुम सब अपने जीजू और उन के दोस्तों को महक के रूपजाल से आजाद कराने की कोशिश करो,’’ शिखा हंसती हुई रसोईर्घर की तरफ बढ़ गई.

पार्र्टी का सारा खाना बाजार से आया था. सिर्फ बादामकिशमिश वाली खीर शिखा ने घर में बनाई थी. नीरज और उस के दोस्त महक का बहुत ज्यादा ध्यान रखे हुए थे. उस की प्लेट में कोईर् चीज खत्म होने से पहले ही इन के द्वारा पहुंचा दी जाती थी.

‘‘मुझे खीर नहीं आइसक्रीम खानी है,’’ खाना खत्म होने के बाद जब महक ने किसी बच्चे की तरह से मचलते हुए यह फरमाइश की, तो नीरज फौरन आइसक्रीम लाने को तैयार हो गया. ‘‘मुझे शाहजी की स्पैशल चौकोचिप्स खाने हैं,’’ महक ने उसे अपनी पसंद भी बता दी.‘‘यह शाहजी की दुकान कहां है?’’ नीरज बाहर जातेजाते ठिठक कर रुक गया.

‘‘मेरे फ्लैट के पास. किसी से भी पूछोगे, तो वह तुम्हें बता देगा.’’‘‘साली साहिबा, बहुत दूर जाना पड़ेगा पर तुम्हारी खातिर जरूर जाऊंगा. वैसे तुम गाइड बन कर मेरे साथ क्यों नहीं चलती हो?’’ ‘‘कैसे जाओगे?’’‘‘मोटरसाइकिल से.’’‘‘फास्ट ड्राइव करोगे?’’‘‘हवा से बातें करते चलूंगा.’’‘‘तो मैं चली जीजू के साथ बाइक राइड का आनंद लेने, दोस्तो,’’ महक खुशी से उछल कर खड़ी हुई और उन सब की तरफ हाथ हिलाने के बाद नीरज के साथ बाहर निकल गई.रास्ते में नीरज ने ऊंची आवाज में महक से कहा, ‘‘मेरा मन कौफी पीने को कर रहा है.’’

‘‘यहां कहीं अच्छी कौफी नहीं मिलती है,’’ महक उस के कान के पास मुंह ला कर चिल्लाई.‘‘तुम्हारे घर चलें?’’‘‘कौफी के चक्कर में ज्यादा देर हो जाएगी.’’‘‘तो हो जाने दो. कह देंगे कि पैट्रोल भरवाने चले गए थे और देर हो गई.’’महक ने कोई जवाब नहीं दिया, तो नीरज ने उस पर दबाव बनाया, ‘‘महक, मैं भी तो तुम्हारी आइसक्रीम खाने की फरमाइश को पूरा करने के लिए फौरन उठा खड़ा हुआ था. अब तुम भी 1 कप बढि़या कौफी पिला ही दो.’’

‘‘ठीक है,’’ महक का यह जवाब सुन कर नीरज के दिल की धड़कनें बढ़ती चली गईं.अपने फ्लैट में घुसते ही महक ने पहले किचन में जा कर कौफी के लिए पानी गरम होने को रखा और फिर बाथरूम में चली गई. उस के वहां से बाहर आने तक नीरज ने अपने मन की इच्छा पूरी करने की हिम्मत जुटा ली थी.

महक वापस रसोई घर में जाने लगी, तो नीरज उस का रास्ता रोक कर रोमांटिक लहजे में बोला, ‘‘तुम जैसी सुंदर और स्मार्ट लड़की के पीछे तो उस के चाहने वालों की लंबी लाइन होनी चाहिए. फिर मैं शिखा की इस बात को सच कैसे मान लूं कि तुम्हारा कोई प्रेमी नहीं है?’’‘‘जीजू, मेरे प्रेमी आतेजाते रहते हैं. मुझे शादी कभी नहीं करनी है, इसलिए स्थायी प्रेमी रखने का झंझट मैं नहीं पालती,’’ महक ने बेझिझक उस के सवाल का जवाब दे दिया.

‘‘क्या कभी इस बात से चिंतित नहीं होती हो कि जीवनसाथी के बिना भविष्य में खुद को कभी बहुत अकेली पाओगी?’’‘‘क्या अकेलेपन का एहसास जीवनसाथी पा लेने से खत्म हो जाता है, जीजू?’’‘‘शायद नहीं, पर जीवन में प्रेम के महत्त्व को तो तुम नकार नहीं सकती हो.’’

‘‘मेरा काम अस्थायी प्रेमियों से अच्छी तरह चल रहा है,’’ हंसती हुई महक रसोई में जाने लगी.नीरज ने अचानक उस का हाथ पकड़ कर पूछा, ‘‘और पहली मुलाकात में प्रेम हो जाने के बारे में क्या कहती हो?’’‘‘यह खतरनाक बीमारी किसे लग गई है?’’ महक अजीब से अंदाज में मुसकराने लगी.

‘‘मुझे.’’‘‘तब इस सवाल का जवाब तुम्हें शिखा देगी, जीजू.’’‘‘उसे बीच में क्यों ला रही हो?’’‘‘क्योंकि वह मेरी बैस्ट फ्रैंड है, सर,’’ महक ने उस की आंखों में देखते हुए कुछ भावुक हो कर जवाब दिया.‘‘मैं भी तुम्हारा बैस्ट फ्रैंड बनना चाहता हूं,’’ नीरज ने अचानक उसे खींच कर अपनी बांहों के घेरे में कैद कर लिया.‘‘क्या मुझे पाने के लिए तुम शिखा को धोखा देने को तैयार हो?’’‘‘उसे हम कुछ पता ही नहीं लगने देंगे, स्वीटहार्ट.’’

‘‘पत्नियों को देरसवेर सब मालूम पड़ जाता है, जीजू.’’‘‘हम ऐसा नहीं होने देंगे.’’‘‘देखो, शिखा को पता लग ही गया न कि तुम उस की सहेली रितु के साथ 2 बार डिनर पर जा चुके हो और 1 फिल्म भी तुम दोनों ने साथसाथ देखी है. इस जानकारी को तो तुम शिखा तक पहुंचने से नहीं रोक पाए.’’

उस की बात सुन कर नीरज फौरन परेशान नजर आने लगा और उस ने महक को अपनी बांहों की कैद से आजाद कर दिया. उसे बिलकुल अंदाजा नहीं था कि शिखा को उस के और रितु के बीच चल रहे अफेयर की जानकारी थी.‘‘न… न… सच को झुठलाने कीकोशिश मत करो, जीजू. जब तक मैं कौफी बना कर लाती हूं, तब तक ड्राइंगरूम में बैठ कर तुम इस नईजानकारी की रोशनी में पूरी स्थिति पर सोचविचार करो. अगर बाद में भी तुम्हारे मन में मेरा प्रेमी बनने की चाहत रही, तो हम इस बारे में चर्चा जरूर करेंगे,’’ महक ने मुसकराते हुए उसे ड्राइंगरूम की ओर धकेल दिया.

कुछ देर बाद महक ने थर्मस और ट्रे में रखे कपों के साथ ड्राइंगरूम में प्रवेश किया, तो सोचविचार में डूबा नीरज चौंक कर सीधा बैठ गया.‘‘इतने सारे कप क्यों लाई हो?’’ उस के चेहरे का रंग उड़ गया.‘‘कौफी सब पिएंगे न, जीजू,’’ महक शरारती अंदाज में मुसकरा पड़ी.‘‘सब कौन?’’

‘‘तुम्हारे दोस्त, शिखा और हम सहेलियां.’’‘‘वे यहां आ रहे हैं?’’‘‘मुझे नीमा ने फोन किया और जब मैं ने उसे बताया कि हम कौफी पीने जा रहे हैं, तो उन सब ने भी यहां आने का कार्यक्रम बना लिया. वे बस पहुंचने ही वाले होंगे.’’‘‘तुम ने मुझे फौरन क्यों नहीं बताई यह बात?’’ नीरज को गुस्सा आ गया.

‘‘उन सब का सामना करने से डर लग रहा है, जीजू? देखो, मैं तो बिलकुल सहज हूं,’’ महक की सहज मुसकान मानो नीरज का मजाक उड़ा रही थी.

‘‘तुम कुछ पागल हो क्या? तुम ने यह क्यों बताया कि हम यहां हैं? हम फौरन यहां से निकल कर आइसक्रीम लेते हुए घर लौट जाते. तुम ने बेकार के झंझट में फंसा दिया,’’ नीरज बहुत परेशान और चिंतित नजर आ रहा था.

‘‘मैं तुम्हारे डर को समझ सकती हूं, लेकिन मैं शिखा को समझा दूंगी कि…’’‘‘तुम्हारे समझाने से वह कुछ नहीं समझेगी, औरतों से हंसनेबोलने की मेरी आदत के कारण वह तो वैसे ही मुझ पर शक करती है. तुम्हें बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए था, महक.’’

‘‘इतना ज्यादा परेशान क्यों हो रहे हो, जीजू? हम जैसे फ्लर्ट करने के शौकीनों को ऐसी परिस्थितियों से नहीं डरना चाहिए. जाल फेंकते रहने से कभी न कभी तो शिकार फंसेगा ही. वह शिकार रितु हो, मैं होऊं या कोईर् और इस से क्या फर्क पड़ता है? शिखा तुम्हें छोड़ कर तो जाने से रही. जस्ट रिलैक्स, जीजू.’’

‘‘शटअप, मैं यहां से जा रहा हूं और मुझ से तुम भविष्य में कोई वास्ता मत रखना.’’नीरज उठा और हैलमेट उठा कर दरवाजे की तरफ चल पड़ा.‘‘जीजू, प्लीज रुको. मेरे हाथ की बनाई कौफी तो पीते जाओ.’’‘‘भाड़ में जाए कौफी.’’‘‘जीजू, मैं दोनों कप नहीं पी सकूंगी.’’

‘‘दोनों कप?’’ नीरज ठिठक कर पलटा तो उस ने महक को थर्मस उलटा कर के हिलाते देखा. सिर्फ 2 कपों में कौफी नजर आ रही थी. बाकी सब खाली रखे हुए थे.

‘‘तुम ने सिर्फ 2 कप कौफी बनाई है?’’ वह अचंभित नजर आ रहा था.‘‘हां जीजू, इस लाडली साली ने अपने जीजू से जो छोटा सा मजाक किया है, उस का बुरा मत मानना,’’ महक शरारती अंदाज में मुसकरा रही थी.‘‘यह छोटा मजाक था? मैं तुम्हारा गला घोंट दूंगा,’’ नीरज ने नाटकीय अंदाज में दांत पीसे.‘‘वैसा करने से पहले एक वादा तो कर लो, जीजू.’’‘‘कैसा वादा?’’

‘‘यही कि शिखा का सामना करने की बात सोच कर कुछ देर पहले तुम्हें जिस डर, चिंता और शर्मिंदगी के एहसास ने जकड़ा था, उसे तुम आजीवन याद रखोगे.’’‘‘बिलकुल याद रखूंगा, साली साहिबा. तुम ने तो आज मेरी जान ही निकाल दी थी,’’ निढाल सा नीरज सोफे पर बैठ गया.

‘‘मेरी जिंदगी में तो कोई जीवनसाथी आएगा ही नहीं, पर जीवनसाथी के होते हुए भी उस के दिल से दूर होने की पीड़ा तुम कभी नहीं भोगना चाहते हो, तो आज की रात का सबक न भूलना.’’‘‘शिखा की तरफ से एक संदेश मैं तुम्हें दे रही हूं. उसे पहले से अंदाजा था कि तुम मुझे अपने चक्कर में फंसाने की कोशिश जरूर करोगे. उस ने कहलवाया है कि वह तुम्हारी फ्लर्ट करने की आदत को तो बरदाश्त कर सकती है, लेकिन अगर तुम ने किसी दूसरी औरत से सचमुच संबंध बनाने की मूर्खता भविष्य में कभी की, तो तुम उसे हमेशा के लिए खो दोगे.’’

कुछ देर खामोश रहने के बाद नीरज ने संजीदा स्वर में पूछा, ‘‘क्या हमारे यहां आने की बात तुम शिखा को बताओगी?’’‘‘तुम ही बताओ कि उसे बताऊं या नहीं?’’‘‘बता ही देना, नहीं तो मेरा संदेश उस तक कैसे पहुंचेगा.’’‘‘तुम भी मुझे अपना संदेशवाहक बना रहे हो? वाह,’’ महक हंस पड़ी.

‘‘शिखा से कह देना कि मैं उस के विश्वास को कभी नहीं तोड़ूंगा.’’‘‘वैरी गुड, जीजू,’’ महक खुश हो गई, ‘‘तुम्हारे इस फैसले का स्वागत हम कौफी पी कर करते हैं,’’ महक ने नीरज के हाथ में कौफी का कप पकड़ा दिया.‘‘चीयर्स फौर युअर हैप्पी होम,’’ महक की इस शुभकामना ने नीरज के चेहरे को फूल सा खिला दिया था. Romantic Story In Hindi

Social Story In Hindi : मुलाकात का एक घंटा

Social Story In Hindi : एक ही साथ वे दोनों मेरे कमरे में दाखिल हुए. अस्पताल के अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा हुआ मैं उस घड़ी को मन ही मन कोस रहा था, जब मेरी मोटर बाइक के सामने अचानक गाय के आ जाने से यह दुर्घटना घटी. अचानक ब्रेक लगाने की कोशिश करते हुए मेरी बाइक फिसल गई और बाएं पैर की हड्डी टूटने के कारण मुझे यहां अस्पताल में भरती होना पड़ा.

‘‘कहिए, अब कैसे हैं?’’ उन में से एक ने मुझ से रुटीन प्रश्न किया.

‘‘अस्पताल में बिस्तर पर लेटा व्यक्ति भला कैसा हो सकता है? समय काटना है तो यहां पड़ा हूं. मैं तो बस यहां से निकलने की प्रतीक्षा कर रहा हूं,’’ मैं ने दर्दभरी हंसी से उन का स्वागत करते हुए कहा.

‘‘आप को भी थोड़ी सावधानी रखनी चाहिए थी. अब देखिए, हो गई न परेशानी. नगरनिगम तो अपनी जिम्मेदारी निभाता नहीं है, आवारा जानवरों को यों ही सड़कों पर दुर्घटना करने के लिए खुला छोड़ देता है. लेकिन हम तो थोड़ी सी सावधानी रख कर खुद को इन मुसीबतों से बचा सकते हैं,’’ दूसरे ने अपनी जिम्मेदारी निभाई.

‘‘अब किसे दोष दें? फिर अनहोनी को भला टाल भी कौन सकता है,’’ पहले ने तुरंत जड़ दिया.

लेकिन मेरी बात सुनने की उन दोनों में से किसी के पास भी फुर्सत नहीं थी. अब तक शायद वे अपनी जिम्मेदारी पूरी कर चुके थे और अब शायद उन के पास मेरे लिए वक्त नहीं था. वे आपस में बतियाने लगे थे.

‘‘और सुनाइए गुप्ताजी, बहुत दिनों में आप से मुलाकात हो रही है. यार, कहां गायब रहते हो? बिजनेस में से थोड़ा समय हम लोगों के लिए भी निकाल लिया करो. पर्सनली नहीं मिल सकते तो कम से कम फोन से तो बात कर ही सकते हो,’’ पहले ने दूसरे से कहा.

‘‘वर्माजी, फोन तो आप भी कर सकते हैं पर जहां तक मुझे याद है, पिछली बार शायद मैं ने ही आप को फोन किया था,’’ पहले की इस बात पर दूसरा भला क्यों चुप रहता.

‘‘हांहां, याद आया, आप को शायद इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में कुछ काम था. कह तो दिया था मैं ने सिंह को देख लेने के लिए. फिर क्या आप का काम हो गया था?’’ पहले ने अपनी याददाश्त पर जोर देते हुए कहा.

‘‘हां, वह काम तो खैर हो गया था. उस के बाद यही बात बताने के लिए मैं ने आप को फोन भी किया था, पर आप शायद उस वक्त बाथरूम में थे,’’ गुप्ता ने सफाई दी.

‘‘लैंडलाइन पर किया होगा. बाद में वाइफ शायद बताना भूल गई होंगी. वही तो मैं सोच रहा था कि उस के बाद से आप का कोई फोन ही नहीं आया. पता नहीं आप के काम का क्या हुआ? अब यदि आज यहां नहीं मिलते तो मैं आप को फोन लगाने ही वाला था,’’ पहले ने दरियादिली दिखाते हुए कहा.

‘‘और सुनाइए, घर में सब कैसे हैं? भाभीजी, बच्चे? कभी समय निकाल कर आइए न हमारे यहां. वाइफ भी कह रही थीं कि बहुत दिन हुए भाभीजी से मुलाकात नहीं हुई,’’ अब की बार दूसरे ने पहले को आमंत्रित कर के अपना कर्ज उतारा, वह शायद उस से अपनी घनिष्ठता बढ़ाने को उत्सुक था.

‘‘सब मजे में हैं. सब अपनीअपनी जिंदगी जी रहे हैं. बेटा इंजीनियरिंग के लिए इंदौर चला गया. बिटिया को अपनी पढ़ाई से ही फुर्सत नहीं है. अब बच गए हम दोनों. तो सच बताऊं गुप्ताजी, आजकल काम इतना बढ़ गया है कि समझ ही नहीं आता कि किस तरह समय निकालें. फिर भी हम लोग शीघ्र ही आप के घर आएंगे. इसी बहाने फैमिली गैदरिंग भी हो जाएगी,’’ पहले ने दूसरे के घर आने पर स्वीकृति दे कर मानो उस पर अपना एहसान जताया.

‘‘जरूर, जरूर, हम इंतजार करेंगे आप के आने का, मेरे परिवार को भी अच्छा लगेगा वरना तो अब ऐसा लगने लगा है कि लाइफ में काम के अलावा कुछ बाकी ही नहीं बचा है,’’ दूसरे ने पहले के कथन का समर्थन किया.

मैं चुपचाप उन की बातें सुन रहा था.

‘‘और सुनाइए, तिवारी मिलता है क्या? सुना है इन दिनों उस ने भी बहुत तरक्की कर  ली है,’’ पहले ने दूसरे से जानकारी लेनी चाही.

‘‘सुना तो मैं ने भी है लेकिन बहुत दिन हुए, कोई मुलाकात नहीं हुई. फोन पर अवश्य बातें होती हैं. हां, अभी पिछले दिनों स्टेशन पर जोशी मिला था. मैं अपनी यू.एस. वाली कजिन को छोड़ने के लिए वहां गया हुआ था. वह भी उसी ट्रेन से इंदौर जा रहा था. किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर बता रहा था. इन दिनों उस ने अपने वजन को कुछ ज्यादा ही बढ़ा लिया है,’’ दूसरे ने भी अपनी तरफ से बातचीत का सूत्र आगे बढ़ाया.

‘‘आजकल तो मल्टीनेशनल्स का ही जमाना है,’’ पहले ने अपनी ओर से जोड़ते हुए कहा.

‘‘पैकेज भी तो अच्छा दे रही हैं ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां,’’ दूसरे ने अपनी राय व्यक्त की.

‘‘बहुराष्ट्रीय कंपनियां पैसे तो देती हैं लेकिन काम भी खूब डट कर लेती हैं. आदमी चकरघिन्नी बन कर रह जाता है. उन में काम करने वाला आदमी मशीन बन कर रह जाता है. उस की अपनी तो जैसे कोई लाइफ ही नहीं रह जाती. एकएक सेकंड कंपनी के नाम समर्पित हो जाता है. सारे समय, चाहे वह परिवार के साथ आउटिंग पर हो या किसी सोशल फंक्शन में, कंपनी और टार्गेट उस के दिमाग में घूमते रहते हैं.’’

जाने कितनी देर तक वे कितनी और कितने लोगों की बातें करते रहे. अभी वे जाने और कितनी देर बातें करते तभी अचानक मुझे उन में से एक की आवाज सुनाई दी.

‘‘अरे, साढ़े 4 हो गए.’’

‘‘इस का मतलब हमें यहां आए 1 घंटे से अधिक का समय हो रहा है,’’ यह दूसरे की आवाज थी.

‘‘अब हमें चलना चाहिए,’’ पहले ने निर्णयात्मक स्वर में कहा.

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, घर में वाइफ इंतजार कर रही होंगी,’’ दूसरे ने सहमति जताते हुए कहा.

आम सहमति होने के बाद दोनों एक साथ उठे, मुझ से विदा मांगी और दरवाजे की ओर बढ़ गए.

मैं ने भी राहत की सांस ली.

अब मेरे कमरे में पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ था. मुझे ऐसा लगा जैसे अब कमरे में उस पोस्टर की कतई आवश्यकता नहीं है जिस के नीचे लिखा था, ‘‘कृपया शांति बनाए रखें.’’

एक और बात, वे एक घंटे बैठे, लेकिन मुझे कतई नहीं लगा कि वे मेरा हालचाल पूछने आए हों. लेकिन दूसरों के साथ दर्द बांटने में जरूर माहिर थे. जातेजाते दर्द बढ़ाते गए. उन की फालतू की बातें सोचसोच कर मैं अब उन के हिस्से का दर्द भी झेल रहा था. Social Story In Hindi

Love Story : चलो खुसरो अपने घर – प्रीति-सिद्धार्थ की हंसीठिठोली क्यों किसी को पसंद नहीं थी?

Love Story : सिद्धार्थ और प्रीति में आज फिर तूतू मैंमैं हो गई थी. ये इस घर की दरोदीवार के लिए कोई नई बात नहीं थी. दूसरे कमरे में सिद्धार्थ के मम्मीपापा और बड़ी बहन प्रगति चुपचाप बैठे हुए, ना चाहते हुए भी इस तमाशे का हिस्सा बने हुए थे.

सिद्धार्थ की मम्मी वीनू बोलीं, ‘‘ना जाने किस घड़ी में इस महारानी से शादी हुई थी. एक दिन भी मेरा बेटा सुकून की सांस नहीं ले सकता है.‘‘

बहन प्रगति बोली, ‘‘मम्मी तब तो सिद्धार्थ की आंखों में प्रीति की खूबसूरती और प्यार की पट्टी बंधी हुई थी. सच बात तो यह है, जो लड़की अपने मम्मीपापा की ना हुई, वह क्या किसी की होगी?‘‘

तभी भड़ाक से दरवाजा खुला और प्रीति मुंह फुलाए घर से बाहर निकल गई. क्याक्या सपने संजो कर उस ने शादी की थी, पर विवाह के पहले ही साल में रोमांस उन की शादी से काफूर हो गया था, जब प्रीति की बड़ी ननद प्रगति अपने पति का घर छोड़ कर आ गई थी.

प्रीति और सिद्धार्थ की हंसीठिठोली, छेड़छाड़ ना तो प्रगति को और ना ही वीनू को भाती थी. प्रीति क्या करे, उस के तो रिश्ते की अभी शुरुआत ही थी. पर प्रगति की खराब शादी, उन के प्रेमविवाह पर भारी पड़ती जा रही थी.
देखते ही देखते सारे प्यार के वादे शिकायतों में बदल गए थे. रहीसही कसर सिद्धार्थ की नौकरी जाने के बाद हो गई थी. सिद्धार्थ तो नौकरी जाने के कारण वैसे ही हताश हो गया था. साथ ही, घर पर बैठेबैठे वह रातदिन नकारात्मक विचारों से घिरा रहता था.

प्रीति अपने दफ्तर चली जाती थी, तो प्रगति ना जाने क्याक्या जहर सिद्धार्थ के जेहन में भरती रहती थी.
सिद्धार्थ को भी ये ही लगने लगा था कि प्रीति को लगता है कि वह उस के टुकड़े पर पल रहा है. अब वह भी प्रीति को कहता, ‘‘घर के काम को तो तुम हाथ भी नहीं लगाती हो? मेरी मम्मी और बहन तुम्हारी नौकरानी नही हैं.‘‘

अब प्रीति ने बस ये किया कि अपना खाना खुद बनाना शुरू कर दिया था. रातदिन की किचकिच से प्रीति तंग आ गई थी. उसे समझ आ गया था कि उस से एक गलत फैसला हो गया है. पर वह आज की व्यावहारिक लड़की थी, रोने के बजाय उस ने ऐसे रिश्ते से अलग होने का निर्णय ले लिया था. इसलिए प्रीति ने अपने दफ्तर के पास ही एक छोटा सा फ्लैट किराए पर ले लिया था.

जैसे ही प्रीति ने अलग घर में शिफ्ट होने की बात की, तो सिद्धार्थ के चेहरे पर आए राहत के भाव उस से छिपे ना रह सके. प्रीति थोड़ी सी आहत हो गई थी. उधर सिद्धार्थ की मम्मी को भी इस बार अपनी पसंद की लड़की लाने का मौका मिल गया था.

प्रीति के घर छोड़ने के एक हफ्ते बाद ही सिद्धार्थ की नौकरी लग गई थी. सिद्धार्थ की मम्मी ने खुश होते हुए कहा, ‘‘बेटा देखा तुम दोनों एकदूसरे के लिए बने ही नहीं थे. उस के जिंदगी से निकलते ही तुम्हारी नौकरी भी लग गई है.‘‘

प्रीति के घर छोड़ने के बाद सिद्धार्थ की जिंदगी सूनी, मगर शांत हो गई थी. उधर प्रीति की जिंदगी मे मयंक एक ठंडी हवा के झोंके की तरह ना जाने कहां से आ गया था. दोनों की मुलाकात एक कौमन फ्रैंड के यहां हुई थी. मयंक की शादी तो नहीं हुई थी, पर उस का दिल बहुत बुरी तरह टूटा हुआ था.

दोनों को धीरेधीरे एकदूजे का साथ भाने लगा था.
मयंक और प्रीति को साथ घूमतेफिरते देख कर, प्रीति की भाभी ने ही पहल की और प्रीति से कहा, ‘‘प्रीति, जब तुम्हें सिद्धार्थ के पास वापस नहीं जाना है तो उस रिश्ते को खत्म कर के ही आने वाली जिंदगी का स्वागत करो.‘‘

प्रीति सवालिया नजरों से भाभी से बोली, ‘‘भाभी, अगर इस बार भी मेरा चुनाव गलत निकला तो…?‘‘

भाभी बोली, ‘‘प्रीति, अगर तुम्हें सिद्धार्थ के पास वापस नहीं जाना है, तो क्यों ना उस रिश्ते से नजात पा लो.‘‘

प्रीति को भी भाभी की बात सही लगी. सिद्धार्थ के पास एक प्रेमी के रूप में दम तो था, पर पति के रूप में उस के पास रीढ़ की हड्डी नहीं थी. चाहे वह अकेली रहे, पर उस के पास वापस नहीं जाएगी.

मयंक प्रीति के फैसले को सुन कर खुश हो गया और बोला, ‘‘सोच तो मैं भी रहा था, पर फिर लगा कि हो सकता है, तुम उस रिश्ते को फिर से चांस देना चाहती हो, इसलिए चुप लगा गया.‘‘

सिद्धार्थ का परिवार भी लगातार उस पर तलाक लेने के लिए दबाव बना रहा था, पर सिद्धार्थ को समझ नहीं आ रहा था कि बात को मुद्दा बना कर प्रीति से डाइवोर्स ले.

उधर, सिद्धार्थ के परिवार ने पूरे जोरशोर से उस की दूसरी शादी की तैयारी शुरू कर दी थी. उन के अनुसार प्रीति अब उस की जिंदगी का बंद अध्याय है. सिद्धार्थ भी जिंदगी की नई शुरुआत करना चाहता था, इसलिए अपने दोस्त की सलाह पर वकील से मशवरा करने पहुंच गया था.

वकील कमलकांत 50 साल के अनुभवी वकील थे. सिद्धार्थ की बात सुन कर वे हंसते हुए बोले, ‘‘मसला भी क्या है… मसला तो कुछ खास नहीं है बरखुरदार. वैसे भी बिना किसी ठोस वजह के हमारे देश में तलाक नहीं होते हैं.‘‘

सिद्धार्थ बोला, ‘‘वकील साहब, कोई तो हल होगा.‘‘

वकील साहब बोले, ‘‘आपसी सहमति से तलाक हो सकता है या फिर कोई ऐसे सुबूत जुटाने पड़ेंगे, जो तुम्हारी पत्नी के खिलाफ इस्तेमाल कर सके.‘‘

सिद्धार्थ ये सब सोच ही रहा था कि प्रीति के वकील का तलाक का नोटिस आ गया. सिद्धार्थ ने चैन की सांस ली.

भले ही प्रीति उस की जिंदगी का हिस्सा नहीं थी, पर फिर भी वह कोई ऐसी बात नहीं करना चाहता था, जिस से प्रीति के आत्मसम्मान को ठेस लगे.

सिद्धार्थ के परिवार ने लड़की देखनी भी शुरू कर दी थी. उधर प्रीति ने भी नए घर के सपने सजाने शुरू कर दिए थे. दोनों ही पक्ष के वकीलों ने पूरी तसल्ली दी थी कि पहली ही तारीख में मामला हल हो जाएगा.

सिद्धार्थ ने अपने वकील को इस बात के लिए अच्छीखासी रकम दी थी. उधर प्रीति के वकील ने भी अपनी जेब गरम कर रखी थी.

पहली तारीख आई, परंतु जज नहीं बैठा और वह तारीख ऐसे ही चली गई. अब दूसरी तारीख पूरे 2 माह बाद की पड़ी थी. प्रीति को लगा था कि पहली तारीख पर जब कुछ हुआ ही नहीं, तो वकील को दोबारा फीस नहीं देनी पड़ेगी, परंतु वकील ने खींसे निपोरते हुए कहा, ‘‘मैडम, अपना बड़ा केस छोड़ कर, आप की समस्या को देखते हुए आप को डेट दिया हूं.‘‘

प्रीति ने फिर से 10,000 रुपए दिए. हालांकि उसे इस बार पैसा देना बहुत खल रहा था.

प्रीति और सिद्धार्थ पिछले 4 घंटे से प्रतीक्षा कर रहे थे. 4 घंटे बाद उन का नंबर आया, मगर जज ने फैसला नहीं सुनाया और आगे की तारीख दे दी थी.

जज ने अब 4 महीने बाद की नई तारीख दे दी थी. आज प्रीति और सिद्धार्थ दोनों ही बहुत हताश हो गए थे.

जब सिद्धार्थ घर पहुंचा, तो उस की मम्मी बोलीं, ‘‘अरे, कुछ लेदे कर एक महीने बाद की तारीख ले लो… आज ही तो तुम्हारी शादी की तारीख निकलवा कर आई हूं पंडितजी से.‘‘

उधर मयंक आतुर हो कर बोला, ‘‘प्रीति, घर वाले रातदिन शादी के लिए दबाव बना रहे हैं. अब कब तक बहाने बनाता रहूं?‘‘

उधर सिद्धार्थ ने इधरउधर से जज से जानपहचान निकलवानी शुरू कर दी थी. इस चक्कर में दलालों की जेब भी गरम करनी पड़ रही थी.

उधर मयंक और प्रीति भी दौड़धूप कर रहे थे. दोनों ही पक्ष जल्द से जल्द इस रिश्ते से छुटकारा चाहते थे, पर कानून के मसले भी अजीब थे.

4 माह में चक्कर काटकाट कर प्रीति और सिद्धार्थ दोनों के होश फाख्ता हो गए थे.

प्रीति तो एक दिन बोल भी उठी, ‘‘अगर मुझे पता होता कि आपसी सहमति से तलाक लेने में भी इतने झंझट हैं, तो मैं कभी ऐसा कदम नहीं उठाती.‘‘

मयंक प्रीति की बात सुन कर गुस्से में बोला, ‘‘मतलब, मैं ही बेवकूफ हूं.‘‘

सिद्धार्थ की मम्मी ने किसी तरह से शादी की तारीख आगे बढ़वा दी थी और उधर मयंक ने भी अपने परिवार से बस 4 महीने का समय मांगा था.

आज दोनों ही पक्ष को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थी. दोनों वकील की जिरह सुनने के पश्चात जज महोदय बोले, ‘‘अगर ऐसी छोटीछोटी बातों पर विवाह टूटने लगे, तो वैवाहिक संस्था से लोगों का विश्वास ही उठ जाएगा.‘‘

फैसला आ गया था. दोनों को एकसाथ 6 माह तक एकसाथ रहने की सलाह दी गई थी. अगर 6 माह बाद भी विचार नहीं मिलते, तो फिर इस पर विचार किया जाएगा.

जज महोदय बोले, ‘‘अब आप लोग अपने घर जा कर दोबारा से नई शुरुआत करें.‘‘

प्रीति और सिद्धार्थ दोनों ही सोच रहे थे कि वो जिंदगी में इतना आगे बढ़ चुके हैं कि अब कौन से घर जाएं?
वह घर, जो कानून की बैसाखियों के सहारे लड़खड़ा रहा है या वह घर, जो अब इस फैसले के पश्चात बसने से पहले ही उजड़ गया था.

दूर कहीं से आवाज आ रही थी, ‘‘चलो खुसरो घर अपने.‘‘

दोनों ही जन उस दोराहे पर खड़े थे, जहां से उन्हें आगे जाने की राह ही नहीं सूझ रही थी. Love Story

Family Story In Hindi : टिकुली – पराई बच्ची को अपनाते दंपति की दिल छूती कहानी

Family Story In Hindi : आदिल ने कमरे में धीरे से झांका. उस की पत्नी बुशरा 7 साल की टिकुली को सीने से लगाए आंख बंद कर लेटी थी. वह बुशरा का थका सा चेहरा देर तक खड़ा देखता रहा. रात को 2 बज रहे थे, पता नहीं बुशरा की आंख लगी है या यों ही आंख बंद कर लेटी है. वह खुद कहां सो पा रहा है.

टिकुली तो अब उस की भी जान है. पीले बल्ब की मद्धिम सी रोशनी में भी उस ने देखा, नन्हा सा चेहरा बुखार की तपिश से कैसा लाल सा हो रहा है. 2 दिन हो गए हैं, टिकुली तेज़ बुखार से तप रही है. बस्ती के एक कामचलाऊ डाक्टर ने दवाई तो दी है, कहा भी है, ‘ज़्यादा परेशानी की बात नहीं है. तीनचार दिनों में ठीक हो जाएगी.’ इतने में बुशरा ने आंखें खोलीं, देखा आदिल गुमसुम खड़ा पता नहीं क्या सोच रहा है. उस ने टिकुली को अपने सीने से धीरे से हटाया, उठ कर बाहर आई. आदिल ने पूछा, “बुखार कम लग रहा है?”

“हां, थोड़ी तपिश कम है, पर अभी भी है. पहले तो बदन जैसे जल सा रहा था. हाय, पता नहीं कब पहले की तरह चहकेगी, चहकेगी भी या नहीं, आदिल? कहीं नन्हें से दिल को सब बता कर हम से गलती तो नहीं हुई?”

“नहीं, बुशरा. कोई और बताए, इस से अच्छा था कि हम ही साफ़साफ़ बता दें. दूसरे धर्म की बच्ची को पालपोस रहे हैं, कुछ भी हो सकता था. कभी भी किसी परेशानी में पड़ सकते थे.”

टिकुली अभी तक बुशरा के सीने से लगी सोई हुई थी. बुशरा का उठ कर जाना उस ने महसूस किया, ज़रा सा हिलीडुली तो बुशरा फिर उसे अपने से लिपटा कर लेट गई. आदिल भी नीचे बिछे बिस्तर पर लेट गया.

बुशरा की आंखों में दूरदूर तक नींद नहीं थी. टिकुली के मुंह से जैसे ही निकला, ‘मां, पानी.’ बुशरा को लगा जैसे उस के बदन में किसी ने जान फूंक दी हो. ‘हांहां, मेरी बच्ची, ले,’ कह कर पास रखा गिलास उस के मुंह से लगा दिया. टिकुली ने अब भी उस की उंगली पकड़ रखी थी. 2 दिनों बाद अपनेआप पानी मांगा था. उस ने पूरा गिलास पानी पी लिया.

बुशरा ने पूछा, “ठीक लग रहा है, कुछ खाएगी?”

‘न’ में सिर हिला कर टिकुली फिर उस से चिपट गई, फिर उस के माथे पर हाथ रख कर पूछा, “मां, आप की टिकुली कहां गई?”

बुशरा मुसकरा दी, उसे सीने से भींच लिया, “यह रही मेरी टिकुली.”

“टिकुली लगाओ न, मां.”

“हां, ये ले,’ कहती हुई उस ने अपने तकिए पर लगी बिंदी उठा कर अपने माथे पर लगा ली. टिकुली ने बिंदी को सीधा किया, फिर निढाल लेट गई. अब तक आदिल भी टिकुली की आवाज़ सुन कर आ गया था, “कैसी है हमारी बिटिया?”

टिकुली कुछ बोली नहीं. बस, आंखें बंद किए लेटी रही. बुशरा ने कहा, “कमज़ोरी बहुत होगी.” फिर छू कर दोबारा देखा, “अभी तो बुखार तेज़ ही लग रहा है. सुबह तक उतरना चाहिए.”

“हां, तुम अब थोड़ा सो लो. ठीक हो जाएगी.”

आदिल फिर लेट गया. बुशरा को अभी टिकुली का बिंदी ठीक करना याद आ गया. इसे अपनी मां की याद आती होगी. 7 साल की ही है, तो क्या हुआ. कुछ तो याद होगा ही. इसे सब सच बता कर कोई गलती तो नहीं हुई? जब से सब बताया है, तभी से बुखार में पड़ी है. टिकुली को देखतेदेखते उस के सामने अर्शी का चेहरा घूम गया. आंखों से आंसुओं की झड़ी सी लग गई. रोतेरोते अचानक हिचकियां बंध गईं. टिकुली की नींद खुल गई. छोटेछोटे गरम हाथ बुशरा के गाल पर रख दिए, “मां, अर्शी याद आ गई?”

बुशरा ने हां में सिर हिला दिया, तुरंत अपने आंसू पोंछे, पूछा, “थोड़ा दूध पिएगी?”

टिकुली ने ‘हां’ में सिर हिलाया तो बुशरा ने तुरंत बिस्तर छोड़ा और उस के लिए दूध ले आई. फिर दोनों चुपचाप एकदूसरे से लिपटी लेट गईं.

टिकुली फिर सो गई. बुशरा को लगा, पानी भी खुद मांग कर पिया है, थोड़ा दूध भी लिया, शायद टिकुली को अब थोड़ा आराम हो रहा है. अर्शी भी जबजब बीमार हुई, ऐसे ही थोड़ाथोड़ा खानापीना शुरू करती तो बुशरा समझ जाती थी कि अर्शी ठीक हो रही है. बुशरा के कलेजे में अपनी बेटी को याद कर फिर एक हूक सी उठी. उस की आंखों के सामने 3 साल पहले का कोरोना महामारी का भयावह मंज़र घूम गया जब अपनी जान बचाना ही लोगों का एकमात्र उद्देश्य रह गया था. पता नहीं कैसे अर्शी इस की चपेट में आ गई थी.

सरकारी अस्पताल में कैसे डाक्टरों के आगे गिड़गिड़ा कर उस ने और आदिल ने अर्शी को एडमिट किया था. पूरे 4 दिन अस्पताल से दूर भूखेप्यासे खड़े रहते, बड़ी मुश्किल से एक बार अर्शी को देखने को किसी तरह घुस गए थे, तो वहीं एक कोने में फटेहाल से राधा और रमेश भी अपनी आखिरी सांसें ले रहे थे.

राधा समझ गई थी कि अर्शी के मातापिता बाहर ही खड़े रहते हैं. बड़ी मुश्किल से उस की बुशरा से थोड़ी बातचीत भी हुई थी. यह समय ऐसा था कि अपने भी अपने नहीं रहे थे या कह सकते हैं कि रह नहीं पा रहे थे. अपनों के लिए भी कोई कुछ चाहते हुए भी नहीं कर पा रहा था. जब राधा और रमेश को समझ आ गया कि वे नहीं बचेंगे तो राधा ने अपनी उखड़ती सांसों के साथ बुशरा के सामने हाथ जोड़ दिए, ‘बहन, हम दानापुर, बिहार से यहां कामधंधे के लिए आए थे. अब सब छूट रहा है. मेरी 4 साल की टिकुली कमरे पर अकेली है, भूखीप्यासी. पता नहीं कोई उसे खाना भी दे रहा होगा या नहीं. उसे तुम अपने पास रख लोगी?’ कह कर राधा ने अपने कमरे की चाबी बुशरा को सौंप दी थी.

‘आप के कोई रिश्तेदार?’

‘नहीं, टिकुली के पिताजी अनाथालय में पले हैं. मेरे मायके में भी कोई इसे देखने वाला नहीं बचा. यह महामारी सब को ले गई.’

उसी दिन अर्शी ने भी अंतिम सांस ली. रोतेकलपते आदिल और बुशरा को अर्शी का शव भी नहीं दिया गया था. यह ऐसा भयानक समय था कि किसी को यह देखने की फुरसत नहीं थी कि कौन मर रहा है, कौन घर जा रहा है. अफरातफरी का माहौल था. अस्पतालों में डाक्टर्स को घर गए हुए कईकई दिन बीत रहे थे. रातदिन, बस, एंबुलैंस की आवाज़ सुनाई देती. सूनी सड़कें. हर तरफ मौत की चुप्पी. इंसान घर से निकलते हुए डरता था कहीं मौत घात लगाए न बैठी हो.

ऐसी बीमारी कभी किसी ने देखी नहीं थी. ऐसे में अर्शी का दिल ही दिल में मातम मनाते आदिल और बुशरा सीधे राधा के कमरे पर पहुंचे. वहां आसपास के किसी घर से कोई टिकुली को खानापीना दे जाता था. जैसे ही बुशरा ने अकेली रह रही डरीसहमी टिकुली को देखा, वह उसे सीने से लगा कर रो पड़ी. उस से कहा, ‘बेटा, तुम्हारी मां ने हमें भेजा है. तुम्हारे मां, बाबा दोनों बहुत बीमार हैं. उन्हें ठीक होने में कुछ समय लगेगा. तब तक तुम हमारे साथ रहोगी.’  यह कह कर उस ने आदिल की तरफ इशारा किया था. आदिल ने स्नेह से उस के सिर पर अपना हाथ रख दिया था, ‘अब टिकुली हमारे साथ रहेगी.’

इस समय लोगों के पास दूसरों के घरों में, जिंदगी में तांकझांक करने का समय नहीं था. बुशरा और आदिल ने चुपचाप धीरेधीरे राधा का कमरा खाली कर दिया और टिकुली को अपनी बेटी मान कर अपने घर ले आए. जब बसें चलनी शुरू हो गईं तो थोड़े दिनों बाद अपना कमरा भी खाली कर के बनारस की इस बस्ती से काफी दूर एक और जगह अपना नया ठिकाना बना लिया. टिकुली कई दिन गुमसुम रही. पर बालमन जल्दी ही नई जगह रमना जानता है.

आदिल और बुशरा उस पर अपना इतना लाड़ उड़ेलते कि वह अब जल्दी ही उन से घुलमिल गई थी. अर्शी की याद बुशरा और आदिल को तड़पाती. वे अकेले में बैठ कर रो भी लेते पर टिकुली को देख कर फिर जीने की कोशिश करने में लगे थे.

धीरेधीरे महाविनाश के बाद जद्दोजहेद के साथ जीवन पटरी पर लौट रहा था. इस महामारी में हर वर्ग पर कहर टूटा था. अमीरों का पैसा भी उन की जान नहीं बचा पाया था. गरीबों पर गरीबी और बीमारी की दोहरी मार पड़ी थी. अब आदिल ने फिर एक फैक्ट्री में काम पर जाना शुरू कर दिया था. बुशरा भी छोटेमोटे काम करने लगी थी.

अर्शी की तरह टिकुली को पढ़ानेलिखाने की जिम्मेदारी भी उठानी थी. अर्शी और टिकुली एक ही उम्र की थीं. अर्शी के कपड़े पहन कर जब टिकुली आदिल और बुशरा के सामने खड़ी हो कर हंसती, खिलखिलाती, दोनों के आंसू बहते चले जाते. टिकुली ने एक दिन खुद ही बताया था, ‘पता है, मां, मुझे टिकुली क्यों कहते हैं, मां कहती थीं कि मुझे उन के माथे की टिकुली बहुत अच्छी लगती थी, मैं वही छेड़ती रहती थी, और खुद भी लगाती थी इसलिए मेरा नाम ही टिकुली पड़ गया.’ वह अपने ही नाम पर हंसती रहती.

टिकुली कई बार सोतेसोते चौंक कर उठ बैठती. अपनी मां को ढूंढ़ती. बुशरा उसे बहला लेती. धीरेधीरे वह बुशरा और आदिल के नए ठिकाने में रमती गई. बुशरा पहले बिंदी नहीं लगाती थी पर टिकुली कहीं से भी कुछ ला कर उस के माथे पर लगा देती, कहती, ‘मेरी मां बहुत अच्छी टिकुली लगाती हैं.’

टिकुली को अपनी मां इसी बात पर अकसर याद आती. बुशरा उस की ख़ुशी के लिए अपने माथे पर एक छोटी सी बिंदी लगा लेती.

एक दिन बुशरा और आदिल टिकुली को अपनी गोद में लिटा कर आपस में बात कर रहे थे. टिकुली बहुत ध्यान से सुन रही थी, ‘हम टिकुली को न हिंदू, न मुसलमान बनाने पर ज़ोर देंगे, उसे अच्छा इंसान बनाएंगे. उसे पढ़ालिखा कर उस के पैरों पर खड़ा कर देंगे. हम उसे किसी भी धर्म की बातों में फंसने ही नहीं देंगे. इस महामारी में कौन सा धर्म किस के काम आया है? हिंदू, मुसलमान, ईसाई सब तो चले गए, किस को कौन बचा पाया? हर धर्म का इंसान तड़पता चला गया है. लाशों तक का तो कोई ठिकाना न रहा. सच पूछो, आदिल, मैं तो जैसे अब नास्तिक सी होती जा रही हूं. बस, अपनी अर्शी जैसी टिकुली को अब डाक्टर ही बनाना है चाहे इस के लिए रातदिन मेहनत करनी पड़े.’

और अब 2 दिनों पहले ही बुशरा और आदिल ने आपस में बात की थी. आदिल ने कहा था, ‘बुशरा, टिकुली को अब बता दो कि उस के मातापिता नहीं रहे. थोड़ी और बड़ी हो गई तो फिर से नई बातों से घबरा न जाए. अभी तो एडजस्ट कर भी लेगी. हम से थोड़ी मिलजुल गई है. ईमानदारी से अब उसे समझा देते हैं.’

बुशरा ने भी अपनी सहमति दे दी थी. दोनों ने उस दिन टिकुली को बता दिया था कि उस के मातापिता नहीं बचे. अब वह हमेशा उन के साथ ही रहेगी. टिकुली चुपचाप बैठी रही थी, फिर रोई और रोतेरोते ही उसे बुखार चढ़ता चला गया था. 7 साल की बच्ची के लिए अब यह सब सहना कैसा होगा, वह ठीक हो कर क्या कहेगी, उन के साथ ख़ुशीख़ुशी रह लेगी या दुखी हो कर मजबूरी में रहेगी, क्या उसे इतने दिन में हम से प्यार नहीं हो गया होगा? अर्शी और टिकुली में कोई फर्क तो हम ने कभी समझा नहीं. आदिल और बुशरा के मन में बस यही सब चलता रहता.

बुशरा ने एक ठंडी सी सांस भरी तो टिकुली जाग गई. उस की हथेलियां बुशरा के गरदन पर टिकी थीं. हथेलियां कुछ भीगी सी लगीं, तो बुशरा चौंकी, शायद टिकुली का बुखार टूटा था, पसीना आ रहा था. वह उठ कर बैठ गई. टिकुली का माथा छुआ, पसीने से तर था. उस ने फौरन आदिल को आवाज़ दी, “आदिल, देखो तो. टिकुली का बुखार उतर रहा है, शायद.”

आदिल उठ कर आया, थर्मामीटर टिकुली की बांह में रखा. बुशरा ने अपनी आंखें पोंछीं जिन में अर्शी की याद में एक बार फिर नमी उतर आई थी. ऐसे ही तो बीमारी में अर्शी उस के साथ लिपटी रहती थी. टिकुली कभी आदिल को देख रही थी, कभी बुशरा को. कुछ बोली नहीं, तो बुशरा ने पूछा, “क्या हुआ, टिकुली?”

“तो फिर मेरे मांपिताजी मर गए? अब कभी नहीं आएंगे?”

“वे नहीं आएंगें, पर हम हैं न. तू अब हमेशा मेरे पास रहेगी.”

बुशरा और आदिल का दिल ज़ोर से धड़क रहा था. अब पता नहीं टिकुली क्या सोच रही होगी, कहीं शोर सा न मचा दे. आसपास वाले तो उसे उन की बेटी ही समझते थे. कहीं वे किसी बड़ी मुसीबत में न फंस जाएं. दोनों मन ही मन बहुत डर रहे थे. टिकुली की एक हरकत उन्हें जेल भी पहुंचा सकती थी जबकि उन्होंने कोई चोरी नहीं की थी. टिकुली के मातापिता ने ही उन्हें टिकुली सौंपी थी. पर उन के पास इस बात का कोई सुबूत तो था नहीं. दोनों की निगाहें टिकुली पर टिकी थीं. कमज़ोर सी आवाज़ में टिकुली ने कहा, “पिताजी, थर्मामीटर देखो न. कितनी देर हो गई.”

“अरे, वाह, बुखार तो बहुत कम हो गया,” थर्मामीटर देखते हुए आदिल ने खुश होते हुए कहा, “चलो, अब टिकुली को कुछ खिलाओ, बुशरा. उस ने कब से कुछ नहीं खाया है.”

बुशरा ने फौरन उस के लिए पतलीपतली खिचड़ी चढ़ा दी. जब तक खिचड़ी बनी, उसे अपने हाथों से सेब काट कर खिलाती रही. फिर खिचड़ी अपने हाथों से खिलाई.

धीरेधीरे टिकुली ठीक हो रही थी. आदिल ने काम पर जाना शुरू कर दिया. बुशरा अभी टिकुली की देखरेख के लिए घर पर ही थी. वह देख रही थी कि टिकुली ठीक तो हो रही है पर थोड़ा चुप सी रहती है. अब स्कूल खुलने लगे थे. पिछले कई महीने तो बच्चे घर में बंद ही रहे थे. अब सड़कों पर स्कूलबसें एक लंबे समय बाद दिखतीं.

कोरोना महामारी बच्चों के बचपन का बहुत ज़रूरी समय खा गई थी. अभी टिकुली का एडमिशन करवाना था. उस में कोई अड़चन न आ जाए, यह चिंता भी थी. इन सब से अलग टिकुली का थोड़ा चुप रह जाना दोनों को अखर रहा था. वे दोनों अपनी तरफ से टिकुली को संभलने के लिए समय दे रहे थे.

एक दिन बुशरा ने टिकुली को अपने पास लिटा लिया, प्यार से पूछा, “टिकुली, क्या सोचती रहती है? अब तो ठीक हो गई न? अब स्कूल जाना है?” टिकुली बुशरा को देखती रही, फिर पूछा, “मां, आप लोग तो मर नहीं जाओगे न?”

“क्या?” बुशरा हैरान सी उठ कर बैठ गई.

“मां, मुझे आजकल बहुत डर लगता है.”

“ओह्ह, मेरी बच्ची. क्याक्या सोचती रहती है. अरे, हम कहीं नहीं जा रहे हैं. अभी तुझे बहुत पढ़ानालिखाना है.”

“हां, और मुझे डाक्टर भी बनाना है न,” कहते हुए टिकुली जोश से उठ कर बैठ गई, तकिए पर लगी बुशरा की बिंदी को ठीक करते हुए उस से फिर लिपट गई. कुछ दिनों से घर में पसरा सन्नाटा दुम दबा कर कहीं भाग गया था.

Relationship Problems : शादी को एक साल ही हुआ है पर मुझे पति पर शक है

Relationship Problems : पति अकसर औफिशियल टूर पर हफ्तेदोहफ्ते के लिए बाहर जाते रहते हैं. वैसे तो सब ठीक है, पति मुझे बहुत प्यार करते हैं लेकिन फिर भी मुझे शक होता है कि घर से बाहर जा कर वे कहीं और फिजिकल रिलेशन तो नहीं बनाते. मैं पति के हिडेन सीक्रेट जानना चाहती हूं लेकिन इस तरह से कि उन्हें पता न चले.

जवाब : वैसे तो शक रिश्ते में खटास की पहली सीढ़ी है. मगर यह होने ही लगा है और आप पता करना चाहती हैं तो जब भी वे टूर से लौटें, उन का बरताव ध्यान से देखें. क्या पहले जैसा है या कुछ बदलाबदला लगता है? क्या वे मोबाइल छिपाने लगे हैं? अपना पासवर्ड बदलते हैं या कौल व मैसेज डिलीट कर देते हैं?

सफर के बारे में आराम से पूछें, बिना शक जताए पूछें- ‘कहां रुके थे’, ‘कौनकौन साथ गया था’, ‘होटल कैसा था’, ‘खाना कैसा था?’ झुठ बोलने वाले लोग बातों में फर्क करने लगते हैं या छोटी बातें भूल जाते हैं.

सोशल मीडिया और मोबाइल के डिजिटल निशान देखें. उन के फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया पर ध्यान दें. कोई लड़की बारबार लाइक, कमैंट या स्टोरी में दिख रही है क्या?

अगर आप को कभी उन का फोन मिलता है तो गूगल लोकेशन हिस्ट्री देख सकती हैं. इस से पता चलता है कि वे कहांकहां गए थे. ट्रूकौलर और मैसेज चैक करें अगर मौका मिले. ट्रूकौलर ऐप से यह पता चल सकता है कि अनजान नंबरों के पीछे किनकिन के नाम हैं.

अगर उन का फोन आप के हाथ लगता है तो वहाट्सऐप चैट, एसएमएस और कौल हिस्ट्री चुपचाप देख सकती हैं.अगर उन के आनेजाने के समय, कपड़ों की पसंद, खुशबू (परफ्यूम) या फोन पर बिजी रहने की आदत में अचानक बदलाव आ गया है तो ये संकेत हो सकते हैं कि कुछ अलग हो रहा है.

शक से ज्यादा जरूरी है विश्वास और संवाद. अगर आप का शक बढ़ता जा रहा है तो आप एक सही समय चुन कर शांतिपूर्वक बात कर सकती हैं बिना किसी इलजाम के. सिर्फ इतना कहें, ‘जब तुम दूर होते हो तो मैं थोड़ा अकेलापन महसूस करती हूं और मन में कई विचार आते हैं.’

इस से आप उन के दिल की बात जान सकती हैं और बिना लड़ाई के संबंध मजबूत कर सकती हैं. जब वह टूर पर हों तब भी हलकीफुलकी बातचीत या प्यारे मैसेज भेजें ताकि उन्हें लगे कि आप उन से जुड़ी हुई हैं.

कभीकभी ज्यादा शक करने से रिश्ते में दरार आ सकती है. इसलिए सब से जरूरी बात यह है कि आप खुद को मजबूत बनाएं. खुद पर भरोसा रखें और यह सोचें कि अगर कुछ सच में गलत है तो एक दिन सच सामने आ ही जाएगा.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Depression : मेरी बेटी डिप्रैशन की शिकार है और परेशान रहती है

Depression : उस की उम्र 29 साल है. पहले सब ठीक था लेकिन कालेज खत्म होने के साथ वह मोटी होती गई. जंक फूड ज्यादा खाना शुरू कर दिया. कुछ नहीं करती है. एंग्जाइटी की प्रौब्लम शुरू हो गई है. पढ़ीलिखी है. इंगलिश में एमए किया है. इंगलिश बहुत अच्छी लिखती व बोलती है. लेकिन कोई नौकरी करने को तैयार नहीं.

हम ने उस से बिजनैस स्टार्ट करने को कहा, जिस में उस का शौक है जैसे ब्यूटी प्रोडक्ट, नेल आर्ट. लेकिन कुछ नहीं करना चाहती. घर में पड़ी रहती है. अपनी बेसिरपैर की बातों से मुझे परेशान करती है. बहुत परेशान हूं, क्या करूं?

जवाब : आप का दुख और चिंता बिलकुल जायज है. एक मां के लिए यह बहुत तकलीफदेह होता है जब वह अपनी पढ़ीलिखी, समझदार बेटी को इस तरह उदास, डरी हुई और जीवन से अलगथलग देखती है. आप ने जो बताया, उस से लगता है कि आप की बेटी को डिप्रैशन (अवसाद) और एंग्जाइटी (चिंता की बीमारी) की समस्या हो सकती है. यह कोई ‘मूड खराब’ होने वाली बात नहीं है. यह एक मानसिक बीमारी है, जिस का इलाज संभव है.

बेटी से प्यार और धैर्य से बात करें. उस से गुस्से या ताने में बात न करें. एक शांत जगह पर बैठ कर धीरे से कहें, ‘मैं देख रही हूं कि तू कुछ समय से परेशान है. मैं तेरी मदद करना चाहती हूं. चलो, एक बार किसी अच्छे डाक्टर से मिलते हैं जो हमें ठीक से समझ सकेगा कि क्या हो रहा है.’

एक अच्छे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से उसे मिलवाएं. मानसिक समस्याओं के लिए इलाज होता है. काउंसलिंग (परामर्श) और जरूरत हो तो दवा से वह धीरेधीरे बेहतर महसूस कर सकती है.

उस की दिनचर्या में छोटीछोटी गतिविधियां जोड़ें. सुबह की सैर, पौधों की देखभाल, घर का हलका काम. ये सब उस की मानसिक स्थिति में धीरेधीरे सुधार ला सकते हैं.

अभी उस से नौकरी या बिजनैस शुरू करने की बात न करें, वह अभी इतना बड़ा कदम नहीं उठा पाएगी. जंक फूड की जगह हैल्दी खाना धीरेधीरे देना शुरू करें. मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध खाने से होता है. आप उसे बिना बोले घर पर ये चीजें उपलब्ध करा सकती हैं, कटे हुए फल, सूखे मेवे, दही या छाछ, हलका सूप या घर का खाना.

खुद का भी ध्यान रखें. मां का मानसिक तनाव भी बेटी पर असर करता है. किसी भरोसेमंद रिश्तेदार, दोस्त या काउंसलर से आप भी बात कर सकती हैं ताकि आप मानसिक रूप से मजबूत रहें. एक जरूरी बात, डिप्रैशन कोई कमजोरी नहीं है, यह एक बीमारी है, जैसे डायबिटीज या ब्लडप्रैशर होती है.

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Kajol And Rani Mukherjee : 183 करोड़ रुपए में बिका फिल्मिस्तान स्टूडियो

Kajol And Rani Mukherjee : फिल्मिस्तान स्टूडियो अपने भीतर कई कहानियां समेटे हुए है. ये कहानियां आज भी जिंदा हैं मगर जो फिल्मिस्तान पहले था, अब वह नहीं रहा.

1930 में ‘बौम्बे टौकीज’ के साथ अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले काजोल और रानी मुखर्जी के दादा शशधर मुखर्जी ने 1943 में अपने बहनोई व अभिनेता अशोक कुमार, संगीतकार मदन मोहन के पिता राय बहादुर चुन्नीलाल और ज्ञान मुखर्जी के साथ मिल कर बंबई (अब मुंबई) में अपने स्टूडियो ‘फिल्मिस्तान स्टूडियो’ की शुरुआत की थी. कहा जाता है कि 1943 में उस्मान अली खान ‘हैदराबाद के निजाम’ द्वारा दिया गया फंड भी फिल्मिस्तान स्टूडियो की स्थापना में लगा था.

इस स्टूडियो में फिल्मों की शूटिंग के लिए 14 सैट थे- गांव, जेल, मंदिर, बगीचा वगैरह सबकुछ था. इस के अलावा यहां गानों की रिकौर्डिंग, डबिंग, एडिटिंग आदि भी हुआ करती थी. लेकिन 3 जुलाई, 2025 को इस स्टूडियों को एक बिल्डर ‘आर्केड डैवलपर्स’ ने खरीद लिया. अब आर्केड बिल्डर यहां 2026 में 3,000 करोड़ रुपए का आलीशान गगनचुंबी इमारतों वाला प्रोजैक्ट शुरू करने वाला है. इस परियोजना में कथित तौर पर 50 मंजिलों वाले 2 ऊंचे टावरों में 3, 4 और 5 बीएचके आवासों के साथसाथ विशेष पेंटहाउस शामिल होंगे.

आर्केड डैवलपर्स के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अमित जैन ने इस खबर की पुष्टि अपने लिंक्डइन प्रोफाइल पर करते हुए लिखा, ‘यह सा?ा करते हुए रोमांचित हूं कि आर्केड डैवलपर्स ने एस वी रोड, गोरेगांव पश्चिम में प्रतिष्ठित 4 एकड़ के फिल्मिस्तान प्राइवेट लिमिटेड भूमि पार्सल को सफलतापूर्वक 183 करोड़ रुपए में हासिल कर लिया है. यह रणनीतिक अधिग्रहण मुंबई के सब से प्रसिद्ध पतों में से एक, जिसे फिल्मिस्तान स्टूडियो के नाम से जाना जाता है पर एक अल्ट्रालक्जरी आवासीय परियोजना का मार्ग प्रशस्त करता है.’

इसी के साथ हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग को आकार देने में मदद करने वाले स्टूडियो के एक युग का अंत हो गया. कभी अभिनेताओं, तकनीशियनों और प्रोडक्शन हाउस के लिए एक संपन्न आधार, गोरेगांव पश्चिम की यह संपत्ति अब अल्ट्रालक्जरी आवासीय टावरों में पुनर्विकास किए जाने के लिए तैयार है.

फिल्मिस्तान स्टूडियो मुंबई के गोरेगांव रेलवे स्टेशन से सिर्फ 5 मिनट की दूरी पर स्वामी विवेकानंद रोड पर मौजूद है. इस तरह अब गोरेगांव का यह अति मशहूर और 82 साल पुराना स्टूडियो हमेशा के लिए जमीन में मिलने जा रहा है.

यों तो फिल्मिस्तान स्टूडियो से काजोल व रानी मुखर्जी के परिवार का रिश्ता 1950 में ही खत्म हो गया था जब 1950 में शशधर मुखर्जी ने फिल्मिस्तान स्टूडियो को तोताराम जालान के हाथों बेच कर मुंबई के अंधेरी इलाके में अपना निजी स्टूडियो ‘फिल्मालय’ खड़ा कर लिया था.

शशधर मुखर्जी ने फिल्मालय स्टूडियो में ‘लव इन शिमला’ (1960) और ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ (1962) जैसी फिल्मों का निर्माण जारी रखा. अफसोस 1990 में शशधर मुखर्जी का निधन हो गया और 20 साल बाद उन के बेटों व पोतों ने ‘फिल्मालय स्टूडियो’ को बेच डाला था. अब वहां पर पीछे की तरफ एक सैट बना हुआ है, जहां कभीकभी इक्कादुक्का शूटिंग हुआ करती है. मतलब यह कि ‘फिल्मालय’ का सांकेतिक नाम अभी जिंदा है.

फिल्मिस्तान ने 1940 और 1950 के दशक में कई सफल हिट फिल्में बनाईं, जिन में ‘शहीद’ (1948), ‘शबनम’ (1949) और ‘सरगम’ (1950) जैसी हिट फिल्में और ‘अनारकली’ (1953) व ‘नागिन’ (1954) जैसी सफल फिल्में शामिल हैं. अन्य उल्लेखनीय फिल्में ‘जागृति’ (1954) थी, जिस ने 1956 में फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार जीता और ‘मुनीमजी’ (1955), ‘तुम सा नहीं देखा’ (1957) और ‘पेइंग गेस्ट’ (1957).

1964 में बनी और नितिन बोस द्वारा निर्देशित ‘दूज का चांद’ फिल्मिस्तान स्टूडियो से निकली आखिरी फिल्मों में से एक थी. उस के बाद फिल्मों का निर्माण बंद हो कर केवल एक स्टूडियो के रूप में इस जगह पर काम होता रहा. ‘रा.वन’ (2011) और ‘बौडीगार्ड’ (2011) सहित तमाम फिल्मों के अलावा यशराज फिल्म्स के टैलीविजन धारावाहिक ‘खोटे सिक्के’ और डांस रिऐलिटी शो ‘झलक दिखला जा’ की शूटिंग भी यहीं हुईं.

भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम काल के साक्षी रहे फिल्मिस्तान स्टूडियो के बिकने के बाद औल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को एक खुला पत्र लिख कर उन से इस विध्वंस को रोकने और सिनेमाई विरासत के प्रतीक कहे जाने वाले स्टूडियो की रक्षा करने का आग्रह किया है.

एसोसिएशन ने स्टूडियो को सार्वजनिक सांस्कृतिक संपत्ति के रूप में संरक्षित करने के लिए सरकारी प्रस्ताव लाने की भी मांग की है. वैसे, बौलीवुड का अधिकांश तबका औल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन के इस कदम को महज नौटंकी मान रहा है.

Family Story : बस हो गया – एक बहन को सही राह दिखाने की कथा

Family Story : आशी का रवैया रोहन के प्रति दिनोंदिन चिड़चिड़ा होता जा रहा था. फिर एक दिन रोहन ने आशी को बड़े भाई होने की ऐसी परिभाषा बताई कि उस की आंखें खुली की खुली रह गईं.

‘‘मौम, टूडे आई एम रियली वैरी हर्ट,’’ रोहन ने मां दिव्या से कहा.
‘‘क्यों, ऐसा क्या हुआ बेटा?’’
‘‘कल जो मैं ने होमवर्क किया था, किसी ने मेरी नोटबुक से सारा काटा हुआ था.’’
‘‘क्या कहा तुम ने, किसी ने काटा हुआ था?’’
‘‘हां मां.’’
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’
‘‘हुआ न,’’ रोहन ने मां को कौपी दिखाते हुए कहा.
‘‘कमाल है, यह किस ने किया?’’
‘‘यह तो मैं नहीं जानता लेकिन जिस ने भी किया है मैं उसे छोड़ूंगा नहीं.’’
‘‘बेटा, इतना गुस्सा ठीक नहीं. पहले पता तो करो, आखिर है कौन?’’
बात वहीं खत्म नहीं हुई, अगले दिन फिर ऐसा हुआ.
रोहन ने स्कूल से आने के बाद मां को कौपी दिखाते हुए फिर शिकायत की.
‘‘अरे, आज फिर?’’
‘‘रोहन, तुम ने क्लास में किसी से झगड़ा किया क्या?’’
‘‘नहीं मां. मैं किसी से बिना वजह क्यों झगड़ूंगा.’’
बात फिर आईगई हो गई. 3-4 दिनों तक ऐसा ही चलता रहा. रोहन परेशान रहा. रात के समय, डिनर के बाद, रोहन ने होमवर्क कर के बैग पैक कर दिया था और दूसरे कमरे में जा कर अपने दोस्त से मोबाइल पर बात करने लगा.

वापस आने पर देखता क्या है, उस की छोटी बहन आशी उस के बैग से नोट बुक निकाल कर, एक पैन से उस का किया हुआ होमवर्क काटे जा रही थी और बुदबुदा रही थी कि यह क्या किया तुम ने, तुम में इतनी भी समझ नहीं है. चलो, दोबारा करो. बारबार ऐसा ही बोले जा रही थी.

यह देख रोहन शौक्ड हुआ और आशी के पास जा कर कहा, ‘‘ओह, तो यह तुम हो, हर रोज यह तुम कर रही थीं? मैं कितना परेशान था, आशी. ऐसे क्यों किया तुम ने, मैं जानना चाहता हूं. आखिर क्यों, मुझ पता तो चले?’’
‘‘यह मैं ने आप से ही से तो सीखा है, भाई. आप भी तो ऐसे ही करते हो.’’
‘‘क्या कहा तुम ने, मैं और ऐसे ही करता हूं?’’
‘‘हां भाई, आप ऐसे ही करते हो.’’
‘‘यह क्या बोले जा रही हो, आशी. मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा?’’
‘‘बताती हूं, मैं जो होमवर्क करती हूं उसे देख कर आप ही तो कहते हो न, ‘कोई तो काम ढंग से कर लिया कर, कुछ भी ढंग से नहीं करती. चल, दोबारा कर,’ ऐसा बोल कर मेरी नोटबुक से सब काटपीट कर चले जाते हो और मैं स्तब्ध देखती रह जाती हूं. ऐसे ही तो करते हो आप. आप का यह सब करना मुझ को बिलकुल अच्छा नहीं लगता, कम से कम मेरी गलतियों को बताया तो होता. अब समझ आया, भाई आप को कि कैसा लगता है.’’

इतना कह आशी मुंह बना कर वहां से चली गई. रोहन खड़ा देखता रह गया, सोचने लगा, आशी मुझ से 3 साल छोटी है, उस के मन में मेरे लिए इतना गुस्सा भरा हुआ है. मुझे गलत लगा, तभी तो काटा. फिर कुछ सोचते हुए, हां, ठीक ही तो है, मैं भी आवेश में आ कर उस का सबकुछ किया-लिखा, काटपीट देता था. मुझे उसे उस की गलती बतानी चाहिए थी, फिर काटना चाहिए था. मैं ने कभी उसे समझने की कोशिश ही नहीं की. शायद, मेरा तरीका ठीक नहीं था. वह वही दोहरा रही थी जो मैं कर रहा था.

आशी के मन में मेरे प्रति जलन का कारण शायद यही है. वह जिद्दी और मनमरजी करने लगी है. मैं जब मां के साथ बैठना चाहता हूं तो वह मुझे मां के पास से भी हटा कर किसी तरह खुद मां के साथ बैठ जाती है और मुझे धक्का दे कर दूर कर देती है.

यही सोचतासोचता रोहन मां के पास जा कर बोला, ‘‘मां, मेरी नोटबुक से होमवर्क काटने वाला और कोई नहीं, अपनी आशी है.’’
‘‘अरे, आशी ऐसा क्यों करेगी?’’
‘‘किया है न मां.’’

रोहन ने वे सारी बातें अपनी मां को बताईं और कहा, ‘‘पता नहीं, मां. शायद इन सब बातों की वजह से आशी के मन में मेरे प्रति इतनी नैगेटिविटी है. वह मुझ से सीधे मुंह बात नहीं करती.
‘‘यह मेरी गलती है कि मुझे उस की नोटबुक से काटने से पहले उस को बताना चाहिए था कि तुम यहां गलत हो.’’
‘‘बेटे, अभी वह छोटी है, धीरेधीरे सब समझ जाएगी.’’
बात वहीं खत्म हो गई थी.
रोहन फिर आशी के पास गया, देखा, आशी बैग खोले बैठी थी. वह आशी के नजदीक जा कर बोला, ‘‘क्या कर रही हो, आशी?’’
रोहन की सुन, आशी ने तुनक कर कहा, ‘‘तुम्हें दिख नहीं रहा कि मैं पढ़ रही हूं.’’
‘‘दिख रहा है लेकिन क्या पढ़ रही हो?’’
‘‘तुम से मतलब? जाओ यहां से.’’
‘‘चला जाऊंगा, चला जाऊंगा, नाराज क्यों होती हो, तेरा भाई हूं मैं?’’
‘‘भाई, भाई की परिभाषा जानते हो?’’
‘‘जो भाई अपनी बहन को सब से ज्यादा प्यार करे वह भाई हूं मैं.’’
‘‘आप तो बस रहने ही दो.’’

इतना कह आशी अपना बैग उठा कर वहां से उठ कर दूसरे कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया.

रोहन स्तब्ध देखता रह गया. वह उठा और दूसरे रूम का दरवाजा धकेल कर आशी के बराबर में जा बैठा और आशी को प्यार से समझने की कोशिश करने लगा. लेकिन आशी के मन में रोहन के प्रति बहुत क्रोध था. उस ने क्रोध में आ कर अपना बैग उठा कर रोहन पर दे मारा.

रोहन सकपका गया. उसे आशी से ऐसी उम्मीद न थी. उसे चोट लगी. वह माथा पकड़ कर वहां से उठ खड़ा हुआ. बैग का बकसुआ उस के माथे पर जा लगा और खून बहने लगा. यह देख आशी डर गई और डर की वजह से जोरजोर से रोने लगी. रोने की आवाज सुन मां दौड़ी आई, यह देख वह स्तब्ध रह गई. रोहन के माथे पर खून देख पूछ बैठी, ‘‘यह सब क्या हो रहा है?’’
इतना कह मां ने मेड को फर्स्टएड बौक्स लाने को बोला.
‘‘तुम ने किया है न यह सब, आशी?’’ मां ने जानना चाहा. डर की वजह से आशी जवाब न दे कर मां से लिपट कर जोरोजोर से रोने लगी.

मां ने आशी को अपने से अलग करते हुए कहा, ‘‘कितना गलत किया है तुम ने, आशी? रोहन बड़ा भाई है तुम्हारा. भाई के साथ ऐसा करते हैं? अरे, भाईबहन तो एकदूसरे की परछाईं होते हैं.’’

रोहन ने मां से कहा, ‘‘मां, आशी से कुछ मत कहो. मैं इसे समझाने ही आया था लेकिन इस ने मेरी कुछ सुनी नहीं. लेकिन कोई बात नहीं, अब सब ठीक हो जाएगा. शायद मुझे चोट पहुंचा कर आशी का गुस्सा शांत हो गया होगा, आशी के मन का तूफान थम गया होगा.’’

इतना कह रोहन ने आशी से कहा, ‘‘तुम भाई की परिभाषा जानना चाह रही थीं न, भाई तो बहन की परछाईं होता है, भाई वह होता है जो बहन के साथ खुशियों और दुख को सांझ करता है. भाई बहन के खुश होने पर खुश और दुखी होने पर दुखी होता है. तुम मुझे जान से भी मार दोगी तो मेरे मुख से उफ तक न निकलेगी.’’

इस पर आशी ने कहा, ‘‘भाई, मेरा आप को चोट पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था. बस, हो गया.
‘‘अब से मैं आप की सारी बातें मानूंगी. आप तो मेरे भले के लिए ही कहते हो कि ठीक से पढ़ाई कर. आखिर एक बड़ा भाई ही अपनी छोटी बहन के भले के बारे में सोच सकता है.’’
इतना कह आशी ने मां के हाथ से फर्स्टएड बौक्स लिया और भाई की ड्रैसिंग करने लगी.

Romantic Story In Hindi : खजाने की चाबी – क्या वक्त की अहमियत को समझ सकी मीरा

Romantic Story In Hindi : जीवन की हर छोटीबड़ी खुशी को कल पर टालती थी मीरा पर वह कल कभी आता ही नहीं था. लेकिन आज वह समझ गई थी कि हर दिन, हर सुबह अपने साथ एक नया मौका ले कर आती है जिंदगी को महसूस करने का.

आज राजू की मां मीरा उस के कमरे की सफाई कर रही थी. परीक्षा खत्म हो गई थी, सोचा पुरानी किताबेंकौपियां कबाड़ी को दे दें. वैसे भी, इस साल राजू 12वीं पास कर चुका था. अब वह आगे की पढ़ाई के लिए होस्टल जाने वाला था. राजू का कमरा काफी भराभरा लगता था. मां फुरसत से उस के कमरे को साफ करने बैठी थी.

मीरा उस के पुराने खिलौनों को देख रही थी जो एकदम ही नए लग रहे थे. मीरा को याद आया कि जब भी राजू कहता कि मैं गिफ्ट में मिले खिलौने को खेलूं तो वह कहती कि फिर कभी खेलना, अभी निकालेगा तो बस 2 मिनट खेल कर गंदे कर देगा. देख, पैकेट में कितने अच्छे लगते हैं और उन खिलौनों को वह संभाल कर रख देती थी. आज राजू इतना बड़ा हो गया था कि शायद ये खिलौने, गिफ्ट में मिले हुए पैंसिल बौक्स, रंगीन चौक, टैडी और भी बहुतकुछ अब उस के काम के नहीं रह गए थे.

राजू की मां सोच रही थी, बेचारे राजू ने उसी समय खेल लिया होता तो कम से कम ऐसे नएनए खिलौने फेंकने तो न पड़ते. सोचतेसोचते वह सोच में डूबने लगी तो उस ने यह भी सोच ही लिया कि वह भी तो अपनी हर अच्छी साड़ी यों ही सहेज कर रखती है कहीं आनेजाने के लिए. हर अच्छी क्रौकरी वह रखती है मेहमानों के लिए और जब मेहमान आए हैं तो अकसर वह जल्दीजल्दी में उन्हीं कपप्लेटों में चायनाश्ता दे देती है जो रोज वाले होते हैं.

जीवन की हर छोटीबड़ी खुशी को वह कल पर टालती है और वह कल कभी आता ही नहीं है. अब इतना सब सोच कर उसे लगने लगा कि उस ने तो अपना जीवन बिलकुल भी नहीं जिया. सारी ख्वाहिशें जस की तस धरी हैं फुरसत के इंतजार में. जब भी सहेलियों ने पूछा किसी पिक्चर या पार्टी के लिए, कभी जा ही नहीं सकी. एक ही जवाब रहा उस का, फुरसत नहीं मिलती. अच्छी से अच्छी साड़ी कभी घूमने जाऊंगी तो पहनूंगी के चक्कर में धरी की धरी रह गई.

और ऐसे ही एक दिन जैसे वह राजू के खिलौने कबाड़ी को दे रही है वैसे ही उस की पूरी जिंदगी भी एक दिन बेकार ही रह जाएगी और वह भी अपने पसंदीदा सामान को रखेरखे बेकार कर देगी. सच तो यह है कि वह जिंदगी के कैनवास में भी मनमाफिक कोई रंग भर नहीं पाई.

इतना सोचते ही उस को एक तेज झटका लगा. उस ने सोचा, इसी पल से वह अपने आने वाले हर पल को भरपूर जिएगी.

वह कामधाम निबटा कर एक अच्छी सी साड़ी पहन कर निकल गई गार्डन में. वहां उसे उस की एक सहेली मिल गई. उस ने बोला, ‘‘क्या बात है, आज तू कैसे निकल आई, फुरसत मिल गई?’’ तो उस ने बड़े ही सलीके से कहा, ‘‘फुरसत मिलती नहीं, निकाली जाती है.’’ यह सुन कर मीरा की सहेली सोनिया ने कहा कि जय हो मीरा देवी की.

दोनों सहेलियों ने दिल खोल कर ठहाका लगाया और अपनी पसंदीदा पानीपूरी खा कर घर आ गईं. आज रात को खाना खाते हुए वह बड़ी ही प्रसन्न दिखाई दे रही थी.
पति ने उस के गले में अपनी बांहें डालते हुए कहा, ‘‘आज बड़ी ही खुश और सुंदर नजर आ रही हो, क्या कोई खजाना मिल गया है?’’

मीरा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘खजाना तो मेरे पास कब से ही था. आज उस खजाने की चाबी मिल गई है.’’ यह कह कर मीरा ने उस दिन का पूरा वृत्तांत पति को सुना दिया कि कैसे राजू का कमरा साफ करते हुए उस के नएनवेले खिलौनों को देख कर उस का अपनी जिंदगी जीने का नजरिया बदल गया.

अब चौंकने की बारी उस के पति सुशील की थी. उस ने मीरा से कहा, ‘‘मीरा, तुम्हारी बातों से मेरी भी आंखें खुल गई हैं. मैं भी तुम को कभी कहीं घुमानेफिराने नहीं ले जा सका. देखो, आज राजू भी होस्टल चला गया. मैं उस को भी कभी पिकनिक पर नहीं ले जा सका. कितना रोता था जब छोटा सा था कि पापा, संडे को घूमने चला करो न. किंतु मैं कभी थकावट, कभी काम का रोना ले कर बैठा रह गया.’’

सुनील आगे भावुक हो कर बोला, ‘‘मीरा, बीते दिनों को वापस तो नहीं ला सकते लेकिन आज से हर पल को भरपूर जिएंगे, यह वादा है और तुम को जो खजाने की चाबी मिली है न, उस को हर पल दिल खोल कर लुटाएंगे हम दोनों और जो सोनी का वेबकैम किसी खास मौके के इंतजार में धूल खा रहा है उस से हर दिन तुम्हारी तसवीर खींचूंगा.’’

मीरा अब सुनील के सीने से लग गई. शायद वह भी भावुक हो गई थी सुनील की बातों से.

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