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भारत भूमि युगे युगे : एक लाख में बनी बात 

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 22 मार्च को पुरी के जगन्नाथ मंदिर में पत्नी सविता के साथ गए तो मंदिर प्रबंधन द्वारा उन का भव्य स्वागत भी किया गया और उन्हें बिना किसी अड़ंगे के इस बार दर्शन भी करने दिए गए. गौरतलब है कि वे 18 मार्च, 2018 को भी इस मंदिर में गए थे, लेकिन तब मंदिर के सेवादारों ने उन के साथ दुर्व्यवहार किया था, जिस पर खूब हल्ला मचा था और कहा यह गया था कि दलित होने के चलते उन्हें जगन्नाथ का दर्शन नहीं करने दिया गया. इस बवाल पर राष्ट्रपति भवन की तरफ से नाराजगी भी व्यक्त की गई थी. तब दिलचस्प बात एक सेवादार दामोदर महासुआर द्वारा मीडिया के सामने यह आई कि राष्ट्रपति की तरफ से उन्हें एक रुपए की भी दक्षिणा नहीं मिली.

‘स्वाभिमानी’ राष्ट्रपति ने अपनी गलती सुधारते इस बार एक लाख रुपए दान में दे दिए. इस मंदिर के दरवाजे पर एक बोर्ड लगा रहता था कि शूद्रों का प्रवेश वर्जित है. आजकल शायद उसे फूलों से ढक रखा है या हटा दिया गया है. ऐसी जगह दलित गया ही क्यों चाहे राष्ट्रपति क्यों न हो, बड़ा सवाल है. भगवा मानव शास्त्री झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके बाबूलाल मरांडी स्कूली जीवन से ही आरएसएस से जुड़ गए थे. 2006 में उन का मन भगवा खेमे से उचट गया था लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में उन का दल झारखंड विकास मोरचा औंधेमुंह गिरा तो उन्होंने घरवापसी में ही भलाई समझी.

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भाजपा ने भी अतीत भूलते उन का स्वागत सुग्रीव सरीखा किया. अब मरांडी के पास इकलौता काम हेमंत सोरेन और उन की सरकार को कोसना है. ताजा मुद्दा आदिवासियों के हिंदू होने, न होने का है. जैसे ही हेमंत सोरेन ने एक बयान में यह कहा कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं तो मरांडी बिफर पड़े कि नहीं, वे तो हिंदू ही हैं और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कोई मानवशास्त्री नहीं हैं. बाबूलाल मरांडी सिर्फ आरएसएस की बिना पर आदिवासियों को हिंदू ठहरा रहे हैं, उन्हें इतिहासकारों सहित जबलपुर हाईकोर्ट का वह फैसला पढ़ लेना चाहिए जिस में कहा गया है कि वर्णव्यवस्था से दूर रहने के अलावा किन आधारों पर आदिवासी हिंदू नहीं हैं. दिल्ली फिर भी दूर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (संशोधन) विधेयक बिना किसी झं झट के राज्यसभा से भी पारित हो गया है. यानी अब दिल्ली पर असल हुकूमत एलजी यानी भाजपा की चलेगी और बाकायदा चुनी गई सरकार हर फैसले के लिए इन दोनों की मुहताज रहेगी. देखा जाए तो यह आप के लिए फायदे की बात है कि अब उसे कुछ नहीं करना जिस का ठीकरा वह मोदी इलेवन के सिर फोड़ सकती है. बेकायदे की बात यही है कि अब देश में वाकई लोकतंत्र के कोई खास माने नहीं रह गए हैं.

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उस की हैसियत हवेलियों में लटकी तसवीरों जैसी हो गई है. भाजपा को सम झ आ गया है कि केजरीवाल की लोकप्रियता की काट उस के पास है नहीं और वे बिना काम किए मानेंगे नहीं. लिहाजा, उस ने सौफ्ट हिटलरी तरीका चुना. बात उस के लिए शर्म की है भी कि वह तो दिल्ली में है लेकिन दिल्ली उस की नहीं है. सीरियल के बाहर अरुण गोविल बहुत प्रतिभाशाली अभिनेता कभी नहीं रहे. उन के हिस्से में हमेशा सी ग्रेड की ही फिल्में आईं जिन में उन्होंने सी ग्रेड की ही ऐक्ंिटग की. निराश हो कर वे वापस अपने गृहनगर रामनगर जाने ही वाले थे कि टीवी धारावाहिक ‘रामायण’ में रामानंद सागर ने उन्हें राम की भूमिका दे दी.

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धार्मिक धारावाहिकों में पात्रों को एक्टिंग कम डबिंग ज्यादा करनी पड़ती है, सो अरुण चल निकले. इस के बाद वे फिर बेरोजगार हो गए. सीता बनी दीपिका चिखलिया, हनुमान के रोल वाले दारा सिंह और रावण की भूमिका वाले अरविंद त्रिवेदी तो संसद तक पहुंच गए पर रामजी रह गए. अब उन की महत्त्वाकांक्षाएं फिर सिर उठाने लगीं, तो वे भाजपा में चले गए. यह और बात है कि वे अब भी हाशिए पर ही हैं. भाजपा में अब बाहरी फुरसतियों की तादाद बढ़ती जा रही है जिस के चलते वह अपने ही वजन से गिरने लगी है.

 बंगाल चुनाव में ‘राम नाम’ की लूट

बंगाल चुनाव में मुददा नौकरी, मंहगाई, बेरोजगारी, विकास, विदेष नीति, नागरिकता बिल और नागरिकता रजिस्टर का होना चाहिये था. यहा ‘जयश्री राम‘ का नारा लगाना और ना लगाना चुनावी मुददा रहा. भाजपा ने पूरे देश को बता दिया है कि उसका एजेंडा भक्ति का है. बंगाल के लोगों को भाजपा ने यह बताने का प्रयास किया कि अगर ममता बनर्जी की सरकार बनती है तो यहा हिन्दु सुरक्षित नहीं रहेगा. भाजपा अयोध्या में राममंदिर मसला निपटने के बाद भी देश को धार्मिक एजेंडे से बाहर नहीं जाने देना चाह रही. इसके पीछे वह अपनी खामियां छिपाने में सफल रहती है. राम मंदिर बनने के बाद भी वह राम के नाम को चुनावी मुददा बनाकर रखना चाहती है. यही भाजपा का चुनावी ‘ब्रह्मास्त्र’ है. इसकी आड में वह अपनी कमियों को ढकना चाहती है.

‘राम नाम की लूट है, लूट सको तो लूट‘ कबीरदास का यह सबसे मशहूर दोहा है. कबीरदास 15 वीं सदी के कवि थे. उनके इस दौर को भक्तिकाल कहा जाता है. कबीर को रहस्यवादी कवि और संत माना जाता है. कबीर को धर्म निरपेक्ष कवि माना जाता है. कबीर ने अपने दोहों में समाज में फैली कुरीतियों, अंधविष्वास और कर्मकांडों की आलोचना की है. ‘राम नाम की लूट है, लूट सको तो लूट‘ में कबीर ने राम के नाम के प्रयोग को लेकर दोहा लिखा है. 21 वीं सदी में भी कबीर का दोहा पूरी तरह से फिट है. 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव के समय यह देखने को मिला. 2014 से देष में सरकार चला रही भाजपा की केन्द्र सरकार बंगाल चुनाव में नौकरी, मंहगाई, बेरोजगारी, विकास और विदेश नीति को मुद्दा नहीं बनाया. मोदी सरकार की बहुउद्देष्यीय नागरिकता बिल और नागरिकता रजिस्टर तक की चर्चा बंगाल चुनाव में नहीं हुई.

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पौराणिक लडाईयों में तमाम सारे हथियारों के फेल हो जाने पर ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग किया जाता था. चुनावी लडाई में जब भारतीय जनता पार्टी के पास को हथियार नहीं दिख रहा था तो उसने राम नाम का ‘ब्रह्मास्त्र’ प्रयोग किया. बंगाल चुनाव में राम के नाम का प्रयोग करके भाजपा ने यह बता दिया है कि उसका एजेंडा भक्ति का है. वह देश में भक्तिकाल का रस फैलाना चाहती है. पूरा देश  भाजपा के भक्तिरस में डूब कर नौकरी, मंहगाई, बेरोजगारी, विकास और दूसरे मुददों पर बात करना छोड दे. इसके लिये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सबसे मुफिद चेहरा लगे. उनके भगवा वस्त्रों के सहारे भाजपा का भक्तिरस सबको अपनी ओर खीचने का काम कर रहा है.

बंगाल में ‘राम नाम’ का प्रयोग:  भाजपा ‘राम नाम‘ का प्रयोग अभी तक हिन्दी बोली वाले प्रदेशो में करती रही है. हिंदी बोली के प्रदेशो के बाहर बंगाल पहला बडा प्रदेश है. जहां भाजपा ने राम नाम का प्रयोग किया है. बंगाल में वामपंथी विचारधारा हमेशा से हावी रही. ममता बनर्जी की टीएमसी यानि तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथ को सत्ता से बाहर कर दिया. यहां धर्म कभी चुनाव का मुददा नहीं रहा. भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में पहली बार बंगाल में ‘रामनाम‘ के प्रयोग को करके देखा. यहां पर इस चुनाव में उसको भारी सफलता हासिल हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में टीएमसी को 34 सीटे मिली थी और भाजपा को 2 सीटे ही मिली थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह आंकडा बदल गया. भाजपा को 18 सीटे मिली. टीएमसी को 22 सीेटे मिली.

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लोकसभा चुनावों के प्रभाव को विधानसभा सीटो के हिसाब अनुमान लगाया गया तो भाजपा को 121 विधानसभा सीटों पर बढत दिखी. टीएमसी को 164 विधानसभा सीटों पर बढत दिखाई दी. सबसे चैंकाने वाली बात यह दिखी कि कांग्रेस और वामपंथी दल इस लडाई में पूरी तरह से सिमटते दिखे. दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड दे तो टीएमसी नेता ममता बनर्जी अकेली ऐसी नेता थी जो भाजपा के मुकाबले लडती दिख रही थी. भाजपा ने अपने हिसाब से पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में क्षेत्रिय राजनीति करने वाले दलों को ठिकाने लगाने में सफलता हासिल कर ली है.

पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, उत्तर प्रदेश  में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, बिहार में जदयू और राजद, दिल्ली में आम आदमी पार्टी भले ही विरोधी दल हो पर चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में उनकी आवाज कमजोर पड गई है. वह सडको पर उतर कर भाजपा का विरोध करने की हालत में नहीं है. ऐसे में बंगाल में ममता बनर्जी से ही यह उम्मीद की जा रही है कि वह ना केवल भाजपा के विरोध में मुखर होकर विपक्ष की मजबूत आवाज बनेगी बल्कि भाजपा के विजय रथ को हिन्दी प्रदेशो के बाहर होने वाले विस्तार को रोकेगी. भाजपा ने ममता के मुकाबले भी बंगाल में अपने ‘ब्रह्मास्त्र’ रामनाम के प्रयोग का ही सहारा लिया है. भाजपा ने पूरे देश को यह बता दिया है कि उसके ‘रामनाम’ के अलावा कुछ नहीं है. अगर बंगाल में भाजपा को सफलता मिलती है तो दक्षिण के राज्यों में भी इसका प्रयोग करेगी.

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‘राम नाम की लूट …‘भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों को यह लग रहा है कि जिस तरह से मुगल काल में भक्तिरस का प्रभाव डालकर जनता को भक्तिकाल में ले जाया गया था उसी तरह से 21 वीं सदी के इस युग में भी जनता को मुख्य मुददों से दूर रखने के लिये रामनाम का प्रयोग किया जा सकता है. केन्द्र में बहुमत की सरकार होने के कारण भाजपा को यह लाभ मिल गया कि वह संवैधानिक संस्थाओं और फैसलों पर अपना प्रभाव डाल सके. जिसके सहारे वह अपनी सत्ता और नीतियों का प्रसार अधिक से अधिक कर सके. विपक्षी दलों को कमजोर करने के लिये सबसे पहले उनकी आर्थिक हालत कमजोर की गई. ‘नोटबंदी‘ इसका सबसे बडा हथियार बनी.

इसके बाद ‘जीएसटी‘ और ‘आयकर‘ की नीतियों में बदलाव कर कारोबारियों को कब्जे में लिया गया. मजबूर कारोबारी अब केवल सत्ता पक्ष को ही चंदा देते है.एक तरफ देश भर के राजनीतिक दल आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हो गये है. दूसरी तरफ भाजपाआर्थिक रूप से इसी दौर में बेहद मजबूत हुई है. चुनावी लडाई में आर्थिक असंतुलन साफतौर पर देखा जा सकता है. भले ही इसके आंकडे सामने ना हो बंगाल चुनाव में भाजपा ने जिस तरह से प्रचार अभियान चलाया और बूथ लेवल तक मैनेज किया उससे आर्थिक मजबूती को समझा जा सकता है. भाजपा को यह लगता है कि मजबूत चुनाव प्रबंधन और राम के नाम का सहारा लेकर वह चुनावी लडाई जीत सकती है. बंगाल चुनाव का फैसला इस बात पर अंतिम मुहर लगा देगा.

धार्मिक माहौल
राम का नाम चुनावी वैतरणी को पार लगा सके इसके लिये भाजपा के कोई कोर कसर नहीं छोडा. भगवाधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सबसे अधिक चुनावी सभायें बंगाल में की गई. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित षाह के बाद योगी आदित्यनाथ सबसे बडे स्टार प्रचारक के रूप में चुनाव प्रचार करते रहे. मोदी और शाह की रैलियों में बयानों से लेकर सजावट तक में धार्मिक तानाबाना बुना गया. जिसकी वजह से चुनावी प्रचार किसी धार्मिक उत्सव सा दिख रहा था. भाजपा के राम नाम का मुकाबला करने के लिये टीएमसी नेता ममता बनर्जी को ‘देवी‘ की चर्चा करना जरूरी लगने लगा. बंगाल में जहां धर्म कभी चुनाव का मुददा नहीं रहा राम नाम लेकर भाजपा ने वहां धर्म को हावी करने का प्रयास किया.

राम नाम के प्रभाव में भाजपा इस कदर सम्मोहित हो गई कि उसे यह भी नहीं लगा कि ममता बनर्जी 10 साल से बंगाल की मुख्यमंत्री है. उनके खिलाफ सत्ताविरोधी मतो के रूझान को भी चुनावी हथियार बनाया जा सकता है. बंगाल का चुनाव विधानसभा का चुनाव है. जहां मुख्यमंत्री 10 साल के कामकाज को मुददा बनाया जा सकता था. भाजपा को शायद इस मुददे मेंकोई दम नहीं दिख रहा था. उसे यह भी लग रहा था कि अगर चुनावी प्रचार नौकरी, मंहगाई, बेरोजगारी, विकास, विदेश नीति, नागरिकता बिल और नागरिकता रजिस्टर के मुददे पर हुआ तो केन्द्र सरकार भी घेरे में आ जायेगी.

ऐसे में सबसे आसान यह था कि राम नाम को ही चुनावी मुददा बनाया जाय. चुनावी भाषणों में चर्चा रामनाम की रही. भाजपा के नेताओं ने अपने बयानों और भाषणों में खुद तो राम का नाम लेते रहे विपक्षी नेता पर सवाल उठा कर घेरते भी रहे. ममता बनर्जी ने चंडी क्यो किया ? यह सवाल भाजपा पूछने लगी. भाजपा ने इस सवाल को उठाया कि टीएमसी अगर जीतती है तो बंगाल में हिदू सुरक्षित नहीं रहेगा. प्रचार में धार्मिक महौल का वोट पर क्या प्रभाव पडेगा यह देखने वाली बात है.

जानें क्या है सतावरी लैक्टेशन सप्लीमेंट, जो नेचुरल तरीके से बढ़ाए मां का दूध

मां का दूध बच्चे के लिए सबकुछ होता है. जिससे उसकी पोषण संबंधी दिक्कतों को पूरा किया जाता है. इतना ही नहीं स्तनपान मां और बच्चों के बीच घनिष्ठता भी पैदा करता है. लेकिन यह तभी संभव है जब मां अपने बच्चे को सही मात्रा में दूध पिलाए.

कई बार अनेक कारणों से मां के स्तन में भरपूर मात्रा में दूध नहीं आ पाता है. जिसके कारण मां चाहकर भी दूध पिलाने में सक्षम नहीं हो पाती है. इसके लिए मां कई तरह कि कोशिश करती है लेकिन बहुत छोटा बच्चा बहुत मुश्किल से ही ऊपरी दूध पी पाता है.  क्योंकि यह दूध भारी होता है.

ऐसे में ये जरूरी हो जाता है कि मां अपने लैक्टेशन को आयुर्वेदिक तरीके से बढ़ाए जैसे Zandu का Striveda Satavari Lactation इसमें सतावरी जड़ी बूटी शामिल है जो मां के दूध को प्राकृतिक तरीके से बढ़ाता है. यह दूध की क्वालिटी को बढ़ाने के साथ- साथ बच्चों के विकास के लिए भी सहायक होता है.

मां के दूध को बढ़ाता है सातावरी जड़ी बूटी वाला लैक्टेशन सप्लीमेंट

क्या है सतावरी 

आपको बता दें कि सतावरी गैलेक्टोगैंग जड़ीबूटी है.जो मां के हार्मोनल बैंलेंस को ठीक करती है. यह सौ प्रतिशत शाकाहारी है. लोग इससे न जाने कितने वर्षों से जुड़े हुए हैं और इसके लड्डू और मीठी खिचड़ी बनाते हैं जो मां के लिए बहुत ज्यादा फायदेमंद होता है.

साथ ही इसमें मेथी दाना, सौफ, डेट्स, कोलियस ऐमबोइनईकस और मिल्क थीसल जैसे कई लाभकारी तत्व मौजूद हैं. आप इसे टेबलेट या पाउडर किसी भी फार्म में ले सकती हैं.

तो अपने बच्चे की सेहत के साथ मत कीजिए किसी भी तरह का समझौता और नेचुरल तरीके से ब्रेस्ट मिल्क बढ़ाने के लिए लीजिए सतावरी जड़ी बूटी वाला नेचुरल लैक्टेशन सप्लीमेंट.

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अक्षय कुमार का हाल ट्विंकल खन्ना ने इस अंदाज में पोस्ट कर बताया

कुछ दिनों पहले अक्षय कुमार ने अपने सोशल मीडिया के जरिए अपने फैंस को कोरोना होने की जानकारी दी थी.जिसके बाद से लगातार अक्षय के फैंस इस बात की चिंता जता रहे थे कि अक्षय कुमार की तबीयत में सुधार है या नहीं.

बता दें कि कुछ दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद से अब अक्षय कुमार अच्छा महसूस कर रहे हैं. उनकी पत्नी ट्विंकल खन्ना ने अक्षय कुमार की रिपोर्ट की जानकारी देते हुए बताया है कि अक्षय अब ठीक हैं. ट्विकल ने एक फनी कार्टून शेयर करते हुए कहा है कि अब अक्षय कुमार ठीक है.

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बता दें कि अक्षय कुमार अपनी फिल्म रामसेतु कि शूटिंग में व्यस्त थें, इस दौरान ही इन्हें कोरोना हुआ था. जिसके बाद इनके सभी को स्टार्स ने अपना चेकअप करवाया तो बाकी लोगों की रिपोर्ट निगेटीव आई.  हालांकि अक्षय कुमार अब ठीक है कोरोना से जंग जीत चुके हैं.

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इसके साथ ही वह कई सारे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. अक्षय कुमार रामसेतु के अलावा सूर्यवंशी,रक्षाबंधन के साथ कई नए फिल्म के प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं.

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इसके साथ ही उनकी अपकमिंग फिल्म पृथ्वीराज चौहान भी चर्चा में बनी हुई हैं. कुछ दिन घर में बीताने के बाद अक्षय कुमार फिर से अपने काम पर वापस आ जाएंगे.

‘गुम है किसी के प्यार में’: सेट के पीछे ऐसे मस्ती करती है चौहान फैमिली , देखें फोटोज

सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में ‘ इन दिनों देवयानी और पुलकित की शादी हो तो गई है लेकिन इसके साथ ही सई कि मुश्किलें भी बढ़ने वाली हैं. असल जिंदगी में भले ही चौहान परिवार में खूब उथल-पुथल मची है लेकिन ऑफस्क्रिन यह परिवार एक -दूसरे के साथ मस्ती करने का कोई मौका नहीं छोड़ते है.

सीरियल के सेट से बाहर आई तस्वीर इस बात का सीधा उदाहरण दे रहा है. सीरियल के लेटेस्ट एपिसोड़ में दिखाया गया था कि सई ने अपने जिद्द पर देवयानी और पुलकित की शादी करवा दी है. अब ऐसा लग रहा है कि मानो दोनों को खुदा ही मिल गया है.

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सेट के सामने से आई तस्वीर को देखने के बाद ऐसा लग रहा है कि पुलकित और देवयानि की कैमेस्ट्री देखते बन रही है.

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बता दें कि गुम है किसी के प्यार में नजर आने वाले पाखी और विराट असल जिंदगी में भी शादी करने वाले हैं. बीते दिन ही इन दोनों की सगाई हुई है. जिसके बाद अब जल्दी ही दोनों शादी के बंधन में बंधने वाले हैं.

इसी के साथ गुम है किसी के प्यार में सीरियल की मुश्किलें काफी ज्यादा बढ़ने वाली हैं. अब विराट इससे बदला लेने का कसम खा लेगा. लेकिन ये भी आपको पता है कि सई किसी के आगे झुकने वाली नहीं है. वह विराट के सामने भी नहीं झुकेगी.

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चौहान परिवार में खलबली मची हुई है. वैसे क्वालिटी टाइम मिलते ही सेट पर कलाकार एक -दूसरे के साथ वक्त बिताने का मौका नहीं छोड़ते हैं. ऐसे में सभी कलाकार एक होकर खूब सारी मस्ती करते हैं. जो कई बार फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होती है तो फैंस को काफी ज्यादा अच्छा लगता है.

 

जरा सी बात : प्रथा अपनी ही बातों में क्यों उलझती गई-भाग 1

प्रथा नहीं जानती थी कि जरा सी बात का बतंगड़ बन जाएगा. हालांकि अपने क्षणिक आवेश का उसे भी बहुत दुख है लेकिन अब तो बात काफी बिगङ चुकी है. वैसे भी विवाहित ननदों के तेवर सास से कम नहीं होते. फिर रजनी तो इस घर की लाड़ली छोटी बेटी थी. सब के स्नेह की इकलौती अधिकारी… उस के लिए ही नहीं बल्कि पूरे परिवार के लिए यह जरा सी बात भी बहुत बड़ी बात थी.

“हां, जरा सी बात ही तो थी… क्या हुआ जो आवेश में रजनी को एक थप्पड़ लग गया. उसे इतना तूल देने की कहां जरूरत थी?
“वैसे भी मैं ने किसी द्वेष से तो उसे थप्पड़ मारा नहीं था. मैं तो रजनी को अपनी छोटी बहन सा मान देती हूं. रजनी की जगह मेरी अपनी बहन होती तो क्या इसे पी नहीं जाती? लेकिन रजनी लाख बहन जैसी होगी, बहन तो नहीं है न इसीलिए परेशान कर रखा है,” प्रथा जितना सोचती उतना ही उलझती जाती, लेकिन मामले को सुलझाने का कोई सिरा उस के हाथ में नहीं आ रहा था.

दूसरा कोई मसला होता तो प्रथा पति भावेश को अपनी बगल में खड़ा पाती लेकिन यहां तो मामला उस की अपनी छोटी बहन का है, जिसे रजनी ने अपने स्वाभिमान से जोड़ लिया है. अब तो भावेश भी उस से नाराज है. किसकिस को मनाए… किसकिस को सफाई दे… प्रथा समझ नहीं पा रही थी.

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हालांकि भावावेश में ननद पर हाथ उठते ही तो प्रथा को अपनी गलती का एहसास हो गया था लेकिन वह जली हुई साड़ी बारबार उसे अपनी गलती नहीं मानने के लिए उकसा रही थी.

दरअसल, प्रथा को अपनी सहेली की शादी की सालगिरह पार्टी में जाना था. भावेश पहले ही तैयार हो कर उसे देर करने का ताना मार रहा था ऊपर से जो साड़ी वह पहनने की सोच रही थी वह आयरन नहीं की हुई थी.
छुट्टियों में मायके आई हुई ननद ने लाड़ दिखाते हुए भाभी की साड़ी को आयरन करने की जिम्मेदारी ले ली. प्रथा ननद पर रीझती हुई बाथरूम में घुस गई. इधर ननदोई जी का फोन आ गया और उधर रजनी बातों में डूब गई. बतरस में खोई रजनी आयरन को साड़ी पर से उठाना भूल गई और जब प्रथा बाथरूम से निकली तो अपनी साड़ी को जलती हुई देख कर वह होश खो बैठी. उस ने ननद को उस की गलती का एहसास कराने के लिए गुस्से में उस से मोबाइल छीनने की कोशिश की लेकिन आसन्न खतरे से अनजान रजनी के अचानक मुंह घुमा लेने से प्रथा का हाथ उस के गाल पर लग गया जिसे उस ने ‘थप्पड़’ कह कर पूरे घर को सिर पर उठा लिया.

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देखते ही देखते घर में ऐसा भूचाल आया जिसे किसी भी रिक्टर पैमाने पर नापा नहीं जा सकता. घर भर की लाड़ली बहू अचानक किसी खलनायिका सी अप्रिय हो गई.
मनहूसियत के सायों में भी कभी रूमानियत खिली है भला? प्रथा का पार्टी में जाना तो कैंसिल होना ही था, अब सासननद तो रसोई में घुसने से रही, क्योंकि वह तो पीड़ित पक्ष था. लिहाजा, प्रथा को ही रात के खाने में जुटना पड़ा.

खाने की मेज पर सब के मुंह चपातियों की तरह फूले हुए थे. ननद ने खाने की तरफ देखना तो दूर खाने की मेज पर आने तक से इनकार कर दिया. सास ने बहुत मनाया कि किसी तरह 2 कौर हलक से नीचे उतार ले लेकिन रूठी हुई रानियां भी भला वनवास से कम मानी हैं कभी?

रजनी की जिद थी कि भाभी उस से माफी मांगे. सिर्फ दिखावे भर की नहीं बल्कि पश्चाताप के आंसुओं से तर माफी. उधर प्रथा इसे अपनी गलती ही नहीं मान रही थी तो माफी और पश्चाताप का तो प्रश्न ही नहीं उठता. बल्कि वह तो चाह रही थी कि रजनी को उस की कीमती साड़ी जलाने का अफसोस करते हुए स्वयं उस से माफी मांगनी चाहिए.

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जिस तरह से एक घर में 2 महत्त्वाकांक्षाएं नहीं रह सकतीं, उसी तरह से यहां भी यह जरा सी बात अब प्रतिष्ठा का सवाल बनने लगी थी. रजनी अब यहां एक पल रुकने को तैयार नहीं थी. वहीं सास को डर था कि बात समधियाने तक जाएगी तो बेकार ही धूल उड़ेगी. किसी तरह सास उसे मामला सुलटने तक रुकने के लिए मना सकी. एक उम्मीद भी थी कि हो सकता है 1-2 दिनों में प्रथा को अपनी गलती का एहसास ही हो जाए.

ससुरजी का कमरा और सास की अध्यक्षता… देर रात तक चारों की मीटिंग चलती रही. प्रथा इस मीटिंग से बहिष्कृत थी. अपने कमरे में विचारों की तरह उथलपुथल हो रही प्रथा के लिए पति को अपने पक्ष में करना कठिन नहीं था. पुरुष की नाराजगी भला होती ही कितनी देर तक है… कामिनी स्त्री की पहल जितनी ही न… एक रति शस्त्र में ही पुरुष घुटनों पर आ जाता है लेकिन आज प्रथा इस अमोघबाण को चलाने के मूड में भी तो नहीं थी. वह भी देखना चाहती थी कि ससुरजी के कमरे में होने वाले मंथन से उस के हिस्से में क्या आता है? जानती थी कि हलाहल ही होगा लेकिन बस आधिकारिक घोषणा का इंतजार कर रही थी.

ढलती रात भावेश ने कमरे में प्रवेश किया. प्रथा जागते हुए भी सोने का नाटक करती रही. भावेश ने उस की कमर के गिर्द घेरा डाल दिया. प्रथा ने कसमसा कर अपना मुंह उस की तरफ घुमाया.

“प्रथा, तुम सुबह रजनी से माफी मांग लेना. बड़ी मुश्किल से उसे इस बात के लिए राजी कर पाए हैं कि वह इस बात को यहीं ख़त्म कर दे,” भावेश ने अपनी आवाज को यथासंभव धीरे रखा ताकि बात बैडरूम से बाहर न जाए.

ऐसे करें सांड़ की नस्ल की पहचान

लेखक-डा. योगेश कुमार सोनी

अकसर आप ने यह देखा होगा कि हीट या गरमी में आई हुई गायभैंसों में कृत्रिम गर्भाधान या एआई करने वाला पशुमित्र अपने साथ एक कंटेनर या पात्र ले कर चलता है, जिस में सीमन की स्ट्रा या वीर्य की नलियां एक गैस (तरल नाइट्रोजन) में संरक्षित होती है. वह उस में से एक नली निकालता है और उसे कुनकुने पानी में पिघला कर एक पाइप में डालता है और एआई गन के जरीए गाय या भैंस की बच्चेदानी में छोड़ देता है. उस के बाद उस पाइप में खाली स्ट्रा रह जाती है, जिसे वह फेंक देता है.

अगर उस पाइप में से खाली स्ट्रा को निकाल कर देखें, तो आप बाहर से यह पता लगा सकते हैं कि उस पशुमित्र या एआई करने वाले आदमी ने किस नस्ल के सांड़ के वीर्य या बीज का इस्तेमाल किया है.
सांड़ की नस्ल की पहचान 2 तरह से की जा सकती है :

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* स्ट्रा या नली के रंग द्वारा.
* स्ट्रा या नली पर अंकित इंगलिश के कोड द्वारा.
स्ट्रा या नली के रंग द्वारा सांड़ की नस्ल की पहचान : केंद्र सरकार ने सांड़ के वीर्य उत्पादन के बाद स्ट्रा की पहचान के लिए अलगअलग नस्लों के लिए स्ट्रा के अलगअलग रंग तय किए हैं, जिन्हें देख कर सांड़ की नस्ल का पता लगाया जा सकता है :
* होलस्टीन फे्रजियन (एचएफ)- गुलाबी रंग.
* एचएफ संकर (एचएफ क्रौस ब्रीड)-पिस्ता जैसा हरा रंग.
* जर्सी नस्ल-पीला रंग.
* जर्सी क्रौस ब्रीड-पीच या आड़ू जैसा रंग.
* देशी नस्ल-नारंगी रंग.
* सुनंदिनी नस्ल-नीला रंग.
* भैंस-सलेटी रंग.
कभीकभी ऊपर बताए गए रंगों में से कोई भी रंग उपलब्ध न होने पर वीर्य को पारदर्शी स्ट्रा में रखा जा सकता है.

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स्ट्रा या नली पर अंकित इंगलिश के कोड द्वारा : वीर्य की स्ट्रा या नली पर इंगलिश के अक्षरों में कुछ कोड छपे हुए होते हैं, जिस में सांड़ का नंबर, उस की नस्ल आदि की जानकारी होती है, जिन्हें देख कर सांड़ की नस्ल का पता लगाया जा सकता है :
जेवाई – जर्सी.
एचएफ – एचएफ.
सीबी एचएफ – एचएफ क्रौस.
सीबी जेवाई – जर्सी क्रौस.
एसयूएन – सुनंदिनी.
एसएएच – साहीवाल.
आरएस – लाल सिंधी.
केएएनके – कांकरेज.
जीआईआर- गिर.
टीएचएआर – थारपारकर.
आरएटीएचआई – राठी.
एचएआर – हरियाणा.
ओएनजीएल – अंगोल.
डीईओएनआई – देवनी.
डीएएनजीआई – डांगी.
एएमएचएल – अमृतमहल.
एमबीएफ – मुर्रा भैंस.
एसबीएफ – सूरती भैंस.
जेबीएफ – जाफराबादी भैंस.
एमएसएनबी – मेहसाणा भैंस.
एनएलआरवीबी – नीली रावी भैंस.
बीबीएफ – बन्नी भैंस.
बीडीबीएफ – भदावरी भैंस.
पीएनपीबी- पंधारपुरी भैंस.

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ऊपर बताए गए रंग और कोड के आधार पर पशुपालक सांड़ की नस्ल पहचान सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी स्ट्रा का रंग नारंगी है और
उस पर कोड एसएएच दर्ज है, तो नारंगी रंग से हमें यह पता चल गया कि यह तय रूप से देशी नस्ल के सांड़ का वीर्य है और कोड एसएएच से हमें पता चल गया कि यह साहीवाल नस्ल के सांड़ का बीज है.

जरा सी बात : प्रथा अपनी ही बातों में क्यों उलझती गई-भाग 3

झाड़ियों को बेतरतीब होने से पहले ही कतर देना ठीक रहता है. इसलिए प्रथा को एक सबक सिखाने के पक्ष में तो सभी थे.

“प्रथा, सुनो न…” रात को सोने से पहले भावेश ने स्वर पर चाशनी चढ़ाई. प्रथा ने सिर्फ आंखों से पूछा, “क्या है?”
“रजनी को सौरी बोल भी दो न, उस का बालहठ समझ कर. जरा सोचो, यदि यह बात उस की ससुराल चली गई तो वे लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे? खासकर तुम्हारे बारे में. तुम जानती हो न कि रजनी के ससुरजी तुम्हें कितना मान देते हैं,” भावेश ने निशाना साध कर चोट की.

निशाना लगा भी सही जगह पर लेकिन प्रहार अधिक दमदार न होने के कारण अपने लक्ष्य को बेध नहीं सका.

“इसे बालहठ नहीं इसे तिरिया हठ कहते हैं,” प्रथा ने ननद पर व्यंग्य कसते हुए पति के कमजोर ज्ञान पर तीर चला दिया. भावेश को पत्नी की बात खली तो बहुत लेकिन मौके की नजाकत को भांपते हुए उस ने इसे खुशीखुशी सह लिया.

“अरे हां, तुम तो साहित्य में मास्टर हो. एक कहावत सुनी ही होगी कि जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है. समझ लो कि आज अपनी जरूरतु है और हमें रजनी को मनाना है,” भावेश ने आवेश में प्रथा के हाथ पकड़ लिए.

कहावत के अनुसार उस में रजनी के पात्र की कल्पना कर के अनायास प्रथा के चेहरे पर मुसकान आ गई. भावेश को लगा मानो अब उस के प्रयास सही दिशा में जा रहे हैं. उस ने प्रथा को सारी बात बताते हुए उसे अपनी योजना में शामिल कर लिया.

रूठे हुए पतिपत्नी के मिलन के बीच एक प्यार भरी मनुहार की ही तो दूरी होती है. अभिसार के एक इसरार के साथ ही यह दूरी खत्म हो गई. शक्कर के दूध में घुलते ही उस की मिठास कई गुणा बढ़ जाती है.

अगली सुबह प्रथा को सब को गुनगुनाते हुए चाय बनाते देखा तो इस परिवर्तन पर किसी को यकीन नहीं हुआ. भावेश जरूर राजभरी पुलक के साथ मेज पर हाथों से तबला बजा रहा था. मांपापा उठ कर कमरे से बाहर आ चुके थे. रजनी अभी भी भीतर ही थी.

प्रथा ने 3 कप चाय बाहर रखे और 2 कप ले कर रजनी को उठाने चल दी. मांपापा की आंखें लगातार उस का पीछा कर रही थीं.

“आई एम सौरी रजनी… मुझे इस तरह व्यवहारीं नहीं करना चाहिए था. प्लीज मुझे माफ कर दो,” प्रथा ने बिस्तर में गुमसुम बैठी ननद के पास बैठते हुए कहा.

रजनी को सुबहसुबह इस माफीनामे की उम्मीद नहीं थी. वह अचकचा गई.

“कल तक मैं इसे जरा सी बात ही समझ रही थी और तुम्हारी जिद को तुम्हारा बचपना. लेकिन कल रात जब से मैं ने थप्पड़ मूवी देखी है तब से तुम्हारे दर्द को बहुत नजदीक से महसूस कर पा रही हूं. मैं इस बात से शर्मिंदा हूं कि एक स्त्री हो कर मैं तुम्हारे स्वाभिमान की रक्षा नहीं कर पाई. मैं सचमुच तुम से माफ़ी मांगती हूं… दिल से.”

रजनी ने देखा प्रथा की पलकें सचमुच नम थीं. उस ने एक पल सोचा और भाभी के गले में बांहें डाल दीं.

भावेश खुश था कि वह अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने में कामयाब हुआ. मांपापा खुश थे क्योंकि बेटी खुश थी और रजनी खुश थी क्योंकि एक स्त्री ने दूसरी स्त्री के स्वाभिमान को पोषित किया था.

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