बंगाल चुनाव में मुददा नौकरी, मंहगाई, बेरोजगारी, विकास, विदेष नीति, नागरिकता बिल और नागरिकता रजिस्टर का होना चाहिये था. यहा ‘जयश्री राम‘ का नारा लगाना और ना लगाना चुनावी मुददा रहा. भाजपा ने पूरे देश को बता दिया है कि उसका एजेंडा भक्ति का है. बंगाल के लोगों को भाजपा ने यह बताने का प्रयास किया कि अगर ममता बनर्जी की सरकार बनती है तो यहा हिन्दु सुरक्षित नहीं रहेगा. भाजपा अयोध्या में राममंदिर मसला निपटने के बाद भी देश को धार्मिक एजेंडे से बाहर नहीं जाने देना चाह रही. इसके पीछे वह अपनी खामियां छिपाने में सफल रहती है. राम मंदिर बनने के बाद भी वह राम के नाम को चुनावी मुददा बनाकर रखना चाहती है. यही भाजपा का चुनावी ‘ब्रह्मास्त्र’ है. इसकी आड में वह अपनी कमियों को ढकना चाहती है.

‘राम नाम की लूट है, लूट सको तो लूट‘ कबीरदास का यह सबसे मशहूर दोहा है. कबीरदास 15 वीं सदी के कवि थे. उनके इस दौर को भक्तिकाल कहा जाता है. कबीर को रहस्यवादी कवि और संत माना जाता है. कबीर को धर्म निरपेक्ष कवि माना जाता है. कबीर ने अपने दोहों में समाज में फैली कुरीतियों, अंधविष्वास और कर्मकांडों की आलोचना की है. ‘राम नाम की लूट है, लूट सको तो लूट‘ में कबीर ने राम के नाम के प्रयोग को लेकर दोहा लिखा है. 21 वीं सदी में भी कबीर का दोहा पूरी तरह से फिट है. 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव के समय यह देखने को मिला. 2014 से देष में सरकार चला रही भाजपा की केन्द्र सरकार बंगाल चुनाव में नौकरी, मंहगाई, बेरोजगारी, विकास और विदेश नीति को मुद्दा नहीं बनाया. मोदी सरकार की बहुउद्देष्यीय नागरिकता बिल और नागरिकता रजिस्टर तक की चर्चा बंगाल चुनाव में नहीं हुई.

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पौराणिक लडाईयों में तमाम सारे हथियारों के फेल हो जाने पर ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग किया जाता था. चुनावी लडाई में जब भारतीय जनता पार्टी के पास को हथियार नहीं दिख रहा था तो उसने राम नाम का ‘ब्रह्मास्त्र’ प्रयोग किया. बंगाल चुनाव में राम के नाम का प्रयोग करके भाजपा ने यह बता दिया है कि उसका एजेंडा भक्ति का है. वह देश में भक्तिकाल का रस फैलाना चाहती है. पूरा देश  भाजपा के भक्तिरस में डूब कर नौकरी, मंहगाई, बेरोजगारी, विकास और दूसरे मुददों पर बात करना छोड दे. इसके लिये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सबसे मुफिद चेहरा लगे. उनके भगवा वस्त्रों के सहारे भाजपा का भक्तिरस सबको अपनी ओर खीचने का काम कर रहा है.

बंगाल में ‘राम नाम’ का प्रयोग:  भाजपा ‘राम नाम‘ का प्रयोग अभी तक हिन्दी बोली वाले प्रदेशो में करती रही है. हिंदी बोली के प्रदेशो के बाहर बंगाल पहला बडा प्रदेश है. जहां भाजपा ने राम नाम का प्रयोग किया है. बंगाल में वामपंथी विचारधारा हमेशा से हावी रही. ममता बनर्जी की टीएमसी यानि तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथ को सत्ता से बाहर कर दिया. यहां धर्म कभी चुनाव का मुददा नहीं रहा. भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में पहली बार बंगाल में ‘रामनाम‘ के प्रयोग को करके देखा. यहां पर इस चुनाव में उसको भारी सफलता हासिल हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में टीएमसी को 34 सीटे मिली थी और भाजपा को 2 सीटे ही मिली थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह आंकडा बदल गया. भाजपा को 18 सीटे मिली. टीएमसी को 22 सीेटे मिली.

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लोकसभा चुनावों के प्रभाव को विधानसभा सीटो के हिसाब अनुमान लगाया गया तो भाजपा को 121 विधानसभा सीटों पर बढत दिखी. टीएमसी को 164 विधानसभा सीटों पर बढत दिखाई दी. सबसे चैंकाने वाली बात यह दिखी कि कांग्रेस और वामपंथी दल इस लडाई में पूरी तरह से सिमटते दिखे. दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड दे तो टीएमसी नेता ममता बनर्जी अकेली ऐसी नेता थी जो भाजपा के मुकाबले लडती दिख रही थी. भाजपा ने अपने हिसाब से पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में क्षेत्रिय राजनीति करने वाले दलों को ठिकाने लगाने में सफलता हासिल कर ली है.

पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, उत्तर प्रदेश  में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, बिहार में जदयू और राजद, दिल्ली में आम आदमी पार्टी भले ही विरोधी दल हो पर चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में उनकी आवाज कमजोर पड गई है. वह सडको पर उतर कर भाजपा का विरोध करने की हालत में नहीं है. ऐसे में बंगाल में ममता बनर्जी से ही यह उम्मीद की जा रही है कि वह ना केवल भाजपा के विरोध में मुखर होकर विपक्ष की मजबूत आवाज बनेगी बल्कि भाजपा के विजय रथ को हिन्दी प्रदेशो के बाहर होने वाले विस्तार को रोकेगी. भाजपा ने ममता के मुकाबले भी बंगाल में अपने ‘ब्रह्मास्त्र’ रामनाम के प्रयोग का ही सहारा लिया है. भाजपा ने पूरे देश को यह बता दिया है कि उसके ‘रामनाम’ के अलावा कुछ नहीं है. अगर बंगाल में भाजपा को सफलता मिलती है तो दक्षिण के राज्यों में भी इसका प्रयोग करेगी.

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‘राम नाम की लूट ...‘भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों को यह लग रहा है कि जिस तरह से मुगल काल में भक्तिरस का प्रभाव डालकर जनता को भक्तिकाल में ले जाया गया था उसी तरह से 21 वीं सदी के इस युग में भी जनता को मुख्य मुददों से दूर रखने के लिये रामनाम का प्रयोग किया जा सकता है. केन्द्र में बहुमत की सरकार होने के कारण भाजपा को यह लाभ मिल गया कि वह संवैधानिक संस्थाओं और फैसलों पर अपना प्रभाव डाल सके. जिसके सहारे वह अपनी सत्ता और नीतियों का प्रसार अधिक से अधिक कर सके. विपक्षी दलों को कमजोर करने के लिये सबसे पहले उनकी आर्थिक हालत कमजोर की गई. ‘नोटबंदी‘ इसका सबसे बडा हथियार बनी.

इसके बाद ‘जीएसटी‘ और ‘आयकर‘ की नीतियों में बदलाव कर कारोबारियों को कब्जे में लिया गया. मजबूर कारोबारी अब केवल सत्ता पक्ष को ही चंदा देते है.एक तरफ देश भर के राजनीतिक दल आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हो गये है. दूसरी तरफ भाजपाआर्थिक रूप से इसी दौर में बेहद मजबूत हुई है. चुनावी लडाई में आर्थिक असंतुलन साफतौर पर देखा जा सकता है. भले ही इसके आंकडे सामने ना हो बंगाल चुनाव में भाजपा ने जिस तरह से प्रचार अभियान चलाया और बूथ लेवल तक मैनेज किया उससे आर्थिक मजबूती को समझा जा सकता है. भाजपा को यह लगता है कि मजबूत चुनाव प्रबंधन और राम के नाम का सहारा लेकर वह चुनावी लडाई जीत सकती है. बंगाल चुनाव का फैसला इस बात पर अंतिम मुहर लगा देगा.

धार्मिक माहौल
राम का नाम चुनावी वैतरणी को पार लगा सके इसके लिये भाजपा के कोई कोर कसर नहीं छोडा. भगवाधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सबसे अधिक चुनावी सभायें बंगाल में की गई. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित षाह के बाद योगी आदित्यनाथ सबसे बडे स्टार प्रचारक के रूप में चुनाव प्रचार करते रहे. मोदी और शाह की रैलियों में बयानों से लेकर सजावट तक में धार्मिक तानाबाना बुना गया. जिसकी वजह से चुनावी प्रचार किसी धार्मिक उत्सव सा दिख रहा था. भाजपा के राम नाम का मुकाबला करने के लिये टीएमसी नेता ममता बनर्जी को ‘देवी‘ की चर्चा करना जरूरी लगने लगा. बंगाल में जहां धर्म कभी चुनाव का मुददा नहीं रहा राम नाम लेकर भाजपा ने वहां धर्म को हावी करने का प्रयास किया.

राम नाम के प्रभाव में भाजपा इस कदर सम्मोहित हो गई कि उसे यह भी नहीं लगा कि ममता बनर्जी 10 साल से बंगाल की मुख्यमंत्री है. उनके खिलाफ सत्ताविरोधी मतो के रूझान को भी चुनावी हथियार बनाया जा सकता है. बंगाल का चुनाव विधानसभा का चुनाव है. जहां मुख्यमंत्री 10 साल के कामकाज को मुददा बनाया जा सकता था. भाजपा को शायद इस मुददे मेंकोई दम नहीं दिख रहा था. उसे यह भी लग रहा था कि अगर चुनावी प्रचार नौकरी, मंहगाई, बेरोजगारी, विकास, विदेश नीति, नागरिकता बिल और नागरिकता रजिस्टर के मुददे पर हुआ तो केन्द्र सरकार भी घेरे में आ जायेगी.

ऐसे में सबसे आसान यह था कि राम नाम को ही चुनावी मुददा बनाया जाय. चुनावी भाषणों में चर्चा रामनाम की रही. भाजपा के नेताओं ने अपने बयानों और भाषणों में खुद तो राम का नाम लेते रहे विपक्षी नेता पर सवाल उठा कर घेरते भी रहे. ममता बनर्जी ने चंडी क्यो किया ? यह सवाल भाजपा पूछने लगी. भाजपा ने इस सवाल को उठाया कि टीएमसी अगर जीतती है तो बंगाल में हिदू सुरक्षित नहीं रहेगा. प्रचार में धार्मिक महौल का वोट पर क्या प्रभाव पडेगा यह देखने वाली बात है.

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