राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 22 मार्च को पुरी के जगन्नाथ मंदिर में पत्नी सविता के साथ गए तो मंदिर प्रबंधन द्वारा उन का भव्य स्वागत भी किया गया और उन्हें बिना किसी अड़ंगे के इस बार दर्शन भी करने दिए गए. गौरतलब है कि वे 18 मार्च, 2018 को भी इस मंदिर में गए थे, लेकिन तब मंदिर के सेवादारों ने उन के साथ दुर्व्यवहार किया था, जिस पर खूब हल्ला मचा था और कहा यह गया था कि दलित होने के चलते उन्हें जगन्नाथ का दर्शन नहीं करने दिया गया. इस बवाल पर राष्ट्रपति भवन की तरफ से नाराजगी भी व्यक्त की गई थी. तब दिलचस्प बात एक सेवादार दामोदर महासुआर द्वारा मीडिया के सामने यह आई कि राष्ट्रपति की तरफ से उन्हें एक रुपए की भी दक्षिणा नहीं मिली.

‘स्वाभिमानी’ राष्ट्रपति ने अपनी गलती सुधारते इस बार एक लाख रुपए दान में दे दिए. इस मंदिर के दरवाजे पर एक बोर्ड लगा रहता था कि शूद्रों का प्रवेश वर्जित है. आजकल शायद उसे फूलों से ढक रखा है या हटा दिया गया है. ऐसी जगह दलित गया ही क्यों चाहे राष्ट्रपति क्यों न हो, बड़ा सवाल है. भगवा मानव शास्त्री झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके बाबूलाल मरांडी स्कूली जीवन से ही आरएसएस से जुड़ गए थे. 2006 में उन का मन भगवा खेमे से उचट गया था लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में उन का दल झारखंड विकास मोरचा औंधेमुंह गिरा तो उन्होंने घरवापसी में ही भलाई समझी.

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भाजपा ने भी अतीत भूलते उन का स्वागत सुग्रीव सरीखा किया. अब मरांडी के पास इकलौता काम हेमंत सोरेन और उन की सरकार को कोसना है. ताजा मुद्दा आदिवासियों के हिंदू होने, न होने का है. जैसे ही हेमंत सोरेन ने एक बयान में यह कहा कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं तो मरांडी बिफर पड़े कि नहीं, वे तो हिंदू ही हैं और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कोई मानवशास्त्री नहीं हैं. बाबूलाल मरांडी सिर्फ आरएसएस की बिना पर आदिवासियों को हिंदू ठहरा रहे हैं, उन्हें इतिहासकारों सहित जबलपुर हाईकोर्ट का वह फैसला पढ़ लेना चाहिए जिस में कहा गया है कि वर्णव्यवस्था से दूर रहने के अलावा किन आधारों पर आदिवासी हिंदू नहीं हैं. दिल्ली फिर भी दूर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (संशोधन) विधेयक बिना किसी झं झट के राज्यसभा से भी पारित हो गया है. यानी अब दिल्ली पर असल हुकूमत एलजी यानी भाजपा की चलेगी और बाकायदा चुनी गई सरकार हर फैसले के लिए इन दोनों की मुहताज रहेगी. देखा जाए तो यह आप के लिए फायदे की बात है कि अब उसे कुछ नहीं करना जिस का ठीकरा वह मोदी इलेवन के सिर फोड़ सकती है. बेकायदे की बात यही है कि अब देश में वाकई लोकतंत्र के कोई खास माने नहीं रह गए हैं.

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