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GHKKPM: जिम्मेदारी की बोझ तले दबेगी सई, सामने आया प्रोमो

स्टार प्लस का सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ की कहानी दिलचस्प मोड़ ले चुकी है. शो में सई और विराट की शादी का ट्रैक दिखाया जा रहा है. फैंस को सीरियल में आ रहे ट्विस्ट और टर्न्स काफी पसंद आ रहे हैं. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं, शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो में अब तक आपने देखा, विराट और सई शिवानी के मंडप में शादी करने का फैसला करते हैं तो दूसरी तरफ भवानी सई के सामने एक शर्त रखती है कि उसे अपना करियर छोड़ना होगा. शो के आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि विराट झूठ बोलकर सई के साथ शादी कर लेगा.

 

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शादी के अगले दिन सई किचन में पहुंच जाएगी. और अपनी पहली रसोई की रस्म को पूरा करेगी. इस दौरान सई भवानी के लिए हलवा बनाएगी तो वहीं राजीव भी अपनी भवानी को खुश करने की पूरी कोशिश करेगा. राजीव और सई मिलकर चौहान परिवार के लिए खाना बनाएंगे.

 

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शो का एक नया प्रोमो सामने आया है, जिसमें दिखाया जा रहा है कि भवानी सई और विराट को कुलदेवी के मंदिर लेकर जाएगी. मंदिर जाने से पहले भवानी सई को अपनी पुश्तैनी साड़ी देगी. भवानी सई को अपने हाथों से तैयार करेगी भवानी फैसला करेगी कि वो सई को घर की सारी जिम्मेदारी देगी. ये सुनकर सई काफी परेशान हो जाएगी.

 

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वनराज के सामने खुलेगा बापूजी के बीमारी का राज, आएगा ये ट्विस्ट

टीवी सीरियल अनुपमा में इन दिनों हाईवोल्टेज ड्रामा चल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि अनुज अनुपमा को डेट पर ले जाता है. अनुज-अनुपमा की केमेस्ट्री दर्शकों को खूब पसंद आ रही है. डेट के दौरान अनुज अनुपमा को कॉलेज ले जाता है, जहां दोनों ने साथ में पढ़ाई की थी. शो के आने वाले एपिसोड में दिलचस्प मोड़ आने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

अनुपमा के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुज और अनुपमा दोनों कॉलेज के अन्दर जाकर अपने पुराने दिन को याद करते हैं. अनुपमा को पता चलता है कि अनुज ने उस इंसान को सजा दिया था, जिसने उसकी रैगिंग ली थी. इसके अलावा उसे ये भी पता चलता है कि इसके बाद ही एंटी रैगिंग अनुज ने कॉलेज में शुरू किया था. वह अनुज से वह सब कुछ बताने के लिए कहती है जो उसने कॉलेज के दिनों में उसके लिए किया है.

 

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तो दूसरी तरफ वनराज को बापूजी पर शक होता है कि वह कुछ छिपा रहे हैं. वनराज डायग्नोस्टिक सेंटर के कागजात को देख लेता है. लेकिन जब वो पेपर्स केमिस्ट को दिखाता है तो उसे पता चलता है कि ये सिर्फ विटामिन के लिए है. हालांकि रिपोर्ट बापूजी के पास होता है.

 

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शो में आप देखेंगे कि अनुपमा अनुज को बताती है कि तलाक के बाद वह फिर से प्यार में पड़ने से डर रही थी. आगे वो कहती है कि अब उसे अनुज को पाकर गर्व महसूस हो रहा है. दोनों संगीत और मेहंदी समारोह को ग्रैंड तरीके से सेलिब्रेट करने के लिए प्लान बनाते है.

 

महिला सुरक्षा को लेकर योगी सरकार अपना रही जीरो टॉलरेंस की नीति

ललितपुर मामले में योगी सरकार ने एसपी और डीएम को सख्‍त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं. जिसके चलते बुधवार को एसपी ने आरोपी थानाध्‍यक्ष को सस्‍पेंड कर दिया है. इसके साथ ही पूरा थाना लाइन हाजिर कर दिया गया है. एसओ समेत चार युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच की जा रही है. आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस टीमें लगातार छापेमारी कर रही हैं. महिलाओं की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध योगी सरकार ने इस मामले में दोषियों को सख्‍त से सख्‍त सजा देने के आदेश दिए हैं.

योगी सरकार महिला सुरक्षा को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रही है. महिला के खिलाफ होने वाले अपराध के मामले में सख्त कार्रवाई कर रही है. इसके साथ ही महिलाओं और बेटियों को अपनी शिकायतों के लेकर जिला या राज्य मुख्यालय स्तर पर उनको चक्कर काटने न काटने पड़े इसकी तैयारी कर ली गई है.

अब गांव, ब्लॉक और तहसील स्तर पर ही उनकी समस्याओं का समाधान मिलेगा. ब्लॉक, तहसील और थाना दिवसों में प्राथमिकता के आधार पर शिकायतों का समाधान होगा और गुणवत्ता के आधार पर शिकायतकर्ता की संतुष्टि ही आधार मानी जाएगी. महिला बीट पुलिस अधिकारी उनकी समस्‍याओं का निवारण करेंगी.

प्रदेश में सभी ग्राम पंचायतों में  महिला बीट पुलिस अधिकारियों को नियुक्‍त किया गया है. अब थाना दिवस में ये महिला बीट पुलिस अधिकारी महिलाओं से जुड़ी शिकायतों का निवारण करेंगी.

छह मई से शुरू होगा मिशन शक्त‍ि का चौथा चरण

महिला सुरक्षा, सम्‍मान और स्‍वावलंबन के लिए प्रतिबद्ध योगी सरकार के वृहद मिशन शक्ति अभियान के चौथे चरण की शुरूआत छह मई से होने जा रही है. मिशन शक्ति एक नए कलेवर में नजर आएगा.

प्रदेश में महिलाओं और बेटियों के उत्‍थान के और उनके सुरक्षा, सम्‍मान व स्‍वावलंबन के लिए शुरू किए गए इस म‍हाभियान से ग्रामीण व शहरी क्षेत्र की परिवेश से जुड़ी महिलाओं व बेटियों को संबल मिला है. ऐसे में मिशन शक्ति के बेहतर परिणामों के चलते योगी सरकार 2.0 में अभियान को गति देने की कवायद शुरू हो गई है.

महिला कल्याण विभाग के निदेशक मनोज राय ने बताया कि प्रदेश में योगी सरकार के पिछले कार्यकाल में मिशन शक्ति अभियान में सभी जिलों में वृहद जागरूकता अभियान चलाने संग स्‍वर्णिम योजनाओं से बेटियों और महिलाओं को जोड़ा गया था. इस बार भी प्रदेश के अलग अलग विभाग मिशन शक्ति के तहत विशेष कार्यक्रमों को आयोजित कराएंगे.

महिला कल्‍याण विभाग की ओर से अभियान के तहत महिलाओं और बच्‍चों के प्रति हिंसा से जुड़े विभिन्‍न कानूनों व प्रावधानों के बारे में लोगों जागरूक करने का कार्य सभी जिलों में किया जाएगा. जिसमें महिलाओं और बच्‍चों के साथ होने वाले उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, नशे में मारपीट, तस्करी, बाल विवाह,भेदभाव, बालश्रम अन्‍य शोषणों के विरूद्ध विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा.

झटका- भाग 2: निशा के दरवाजे पर कौन था?

संगीता के कुछ जवाब देने से पहले ही उस औरत ने फोन काट दिया. उस औरत ने अपना नंबर ब्लौक कर रखा था. वह वापस फोन भी नहीं कर सकती थी. फोन किसी लैंडलाइन से आया था.

वह जब फोन रख कर मुड़ी, तब बहुत गुस्से में थी. सीधे चल कर वह अंजलि के पास पहुंची और सारी बात उसे बता दी.

‘‘भाभी, बेकार में खुद को परेशान मत करो. वह स्त्री तुम्हें तंग करने के लिए ही छेड़ रही है,” अंजलि ने उसे शांत स्वर में समझाया.

‘‘कहिं वह सच ही न बोल रही हो,’’ संगीता की आंखों में भय और चिंता के भाव झलके.

‘‘अरे नहीं भाभी. मुझे विश्वास है कि भैया का किसी औरत से कोई गलत संबंध नहीं है.’’

अंजलि के समझाने से संगीता का मन बड़ी हद तक शांत हो गया. लेकिन यह भी सच था कि वह विवेक के औफिस से लौटने का इंतजार बेसब्री से कर रही थी.

उसे यह मालूम था कि उन की बिरादरी के मर्द अकसर दूसरी निचली बाजारू औरतों से संबंध बना लेते हैं. उस ने अपने चाचाओं, मौसाओं के बहुत किस्से सुने थे. उस के ससुर सरकारी नौकरी में थे और खासे सुधर गए थे.

शाम को उसे जबरदस्त धक्का लगा. विवेक की कमीज से उठती जनाना सैंट की महक कई फुट दूर खड़ी संगीता तक पहुंच कर उसे एकदम से रोंआसा कर गई.

पास में खड़ी अंजलि को बेहद चिंतित देख कर संगीता के मन में असुरक्षा का भाव और गहरा हो गया. “क्या हाल है तुम्हारा संगीता?” सोफे पर बैठते हुए विवेक ने मुसकराते हुए सवाल किया.

“कौन है यह औरत?” संगीता ने रोंआसे स्वर में उलटा उस से ही सवाल पूछा.

‘‘कौन औरत?’’ विवेक चौंक पड़ा.

‘‘वही औरत जिस से लिपटाचिपटी कर के आ रहे हो.’’

‘‘यह क्या बकवास कर रही हो?’’ विवेक गुस्सा हो उठा.

‘‘मुझ से छिपाइये मत.’’

‘‘मैं कुछ नहीं छिपा रहा हूं तुम से.’’

‘‘आप के कपड़ों से लेडीज सैंट की खुशबू क्यों और कैसे आ रही है?’’

विवेक ने अपनी कमीज को सूंघा. पहले माथे में बल डाल कर सोच में खोया रहा और फिर उलझनभरे लहजे में बोला, ‘‘बस की सीट पर मेरी बगल में एक औरत बैठी तो थी, पर मुझे ध्यान नहीं आता कि उस ने ऐसा सैंट लगाया हुआ था.’’

‘‘झूठ बोलने की कोशिश मत करिए. मुझे उस ने फोन पर पहले ही बता दिया था कि तुम्हारे शरीर से आज शाम उस की महक आएगी. मुझे क्यों धोखा दे रहे हैं आप?’’ संगीता की आंखों से आंसू बह निकले.

‘‘तुम पागल हो गई हो. मेरा किसी औरत से कोई संबंध नहीं है. मैं तुम्हें कैसे इस बात का विश्वास दिलाऊं?” विवेक भन्ना उठा.

संगीता की एकदम से रुलाई फूट पड़ी और वह कमरे की तरफ भाग गई. विवेक ने गहरी सांस खींची और दुखी अंदाज में अपनी पत्नी को समझानेमनाने उस के पीछे चला गया.

संगीता ने विवेक की एक न सुनी. नाराजगी दर्शाते हुए उस ने रात का खाना खाने से इनकार कर दिया. तब विवेक ने गुस्से से भर कर खूब जोर से डांट दिया.

अपने कमरे में आंसू बहा रही संगीता को संभालने की जिम्मेदारी अंजलि के कंधों पर आ पड़ी.

अंजलि की सिर्फ एक बात संगीता के दिल में जगह बना पाई. वह चाह कर भी उस बात की अहमियत को नजरअंदाज नहीं कर पाई.

‘‘भाभी, इस स्त्री की असलियत का पता तो हम चला ही लेंगे, पर आप मेरे एक सवाल का जवाब दोगी?’’ अंजलि बहुत गंभीर नजर आ रही थी.

‘‘पूछो.’’

‘‘भाभी, मान लेते हैं कि भैया की जिंदगी में उस औरत की जगह है. हमें उन्हें उस के चुंगल से भैया को छुड़ाना भी होगा, पर क्या आप उन से एक सवाल आत्मविश्वासभरे स्वर में पूछ पाओगी?’’

‘‘कौन सा सवाल?’’

‘‘यही कि मुझ में क्या कमी थी, जो आप को उस दूसरी स्त्री से संबंध बनाने पड़े?’’

संगीता से कोई जवाब देते नहीं बना. उस ने अपने गिरहबान में झांका तो पहली नजर में ही उसे अपने बदन में कई खामियां नजर आईं. जब से वह जवान हुई थी, उस के पीछे लडक़ों की लाइन लगी रही थी. विवेक से शादी भी पहली बार देखनेदिखाने में हो गई क्योंकि वह नौकरी भी कर रही थी और बेहद सुंदर थी.

‘‘मैं ने विवेक को खो दिया, तो जीतेजी मर जाऊंगी,’’ वह विलाप कर उठी.

‘‘भाभी, यों हौसला छोडऩे से काम नहीं बनेगा. अपनेआप को संभालो. मैं आप के साथ हूं न,’’ अंजलि ने संगीता का फौरन हौसला बढ़ाया.

‘‘मुझे क्या करना चाहिए?’’ संगीता के इस सवाल के जवाब में अंजलि उसे देर तक बहुत से सुझाव देती रही.

अपनी ननद की सलाहों पर चलने के कारण संगीता का महीनेभर में कायाकल्प हो गया. यूट्यूब पर उस ने बहुत से टिप्स देखे.

उस ने वजन कम कर के अपनी सेहत और अट्रैक्शन दोनों को बढ़ा लिए. सारा दिन अपने कमरे में बंद न रह कर वह घर के कामों में पूरा हाथ बंटाने लगी.

विवेक से उस के संबंध तनावपूर्ण ही बने रहे क्योंकि उस स्त्री के संगीता को किलसाने व अपमानित करने वाले फोन लगातार लैंडलाइन से आ रहे थे.

विवेक ने एक बार भी मना नहीं कि उस का किसी औरत से गलत चक्कर चल रहा था. इस विषय पर मौनयुद्ध चलने के कारण पतिपत्नी के बीच बोलचाल लगभग बंद चल रही थी.

फोन करने वाली स्त्री की पहचान ढूंढ़ निकालने का उपाय अंजलि को सूझा था. उस ने ट्रू कौलर से कोशिश की. 2 दिनों में ही वह कामयाब हो गई.

अंजलि ने उसे उस रात बताया, ‘‘उस स्त्री का नाम निशा है. अपने मातापिता के साथ रहती है. वह खुद भी अच्छी नौकरी करती है और उस के पिता भी काफी अमीर हैं. उस के आकर्षण से भैया को मुक्त करना आसान नहीं होगा, भाभी.’’

‘‘कैसे नहीं छोड़ेगी वह विवेक को? मैं उस का खून नहीं पी जाऊंगी,” संगीता को जोर से गुस्सा आ गया.

‘‘यह हुआ न बढिय़ा आत्मविश्वास,’’ अंजलि खुश हो गई, ‘‘हम कल ही उस के घर पहुंच कर उस की खबर लेते हैं.’’

‘‘मैं तैयार हूं,’’ संगीता की आंखों में डर, घबराहट, चिंता या असुरक्षा का कोई भाव मौजूद नहीं था.

कुदरत की देन है सैक्स

सैक्स की जरूरत कुदरत की देन है और जैसे ही लडक़ी को माहवारी शुरू हो और लडक़े का अंग खड़ा होने लगे वे सैक्स को तैयार हो जाते हैं. तमिलनाडू के तंजौर जिले में एक 12 साल के लडक़े को गिरफ्तार किया गया है क्योंकि 17 साल की एक लडक़ी को एक बच्चे हुआ जिस का जिम्मेदार वह लडक़े को बताती है. पुलिस जांच में जो भी निकले. सैक्स के मामलों में यह कोई अजीब बात नहीं है और दिल्ली के निर्भया कांड में एक नाबालिग ने जिस वहशी ढंग से चलती बस में लडक़ी का रेप किया था उस से यह लगा था कि वह 15-16 साल का लडक़ा अच्छाखासा खेलाखाला था.

अमेरिका में हुए एक सर्वे में पता चला कि जिन लडक़ों के साथ बचपन में दूसरे बड़े लोग सैक्स कर र लेते है उन्हें पकने से पहले ही मैक्स की आदत पड़ जाती है और वे शिकार की तलाश में लगने लगते हैं. यह कहना  कि हर लडक़ी से जबरदस्ती की जरूरत होती है, जरूरी नहीं. जिन लड़कियों के साथ घुटपन से बड़े चाहे घर के करीबी हों या बाहर वाले सैक्स खेल खेलते रहते हैं वे माहवारी पाने के बाद खुदबखुद तैयार होने लगती हैं.

जहां घर में पिता न हो या मां किसी और के साथ भाग जाए वहां इस के मौके बड़ जाते हैं. बिहार के सिवान जिले में 10 व 11 साल के 2 लडक़े 5 साल की लडक़ी का रेप करने पर पकड़े गए थे. बिहार के ही चंपारन में 11 साल के लडक़ ने 3 साल की लडक़ी का रेप कर डाला था. एक मामले में तो 7 साल के लडक़े को 6 साल की लडक़ी के साथ सैक्स खेल के लिए पकड़ कर जुवेलाइन बोर्ड के सामने लाया गया था.

यह सब कुदरती है पर अपने को पाकसाफ साबित करने के लिए हम सब किसी को दोष ठहराते रहते हैं. कभी फिल्मों को तो कभी पौर्न साइटों को जबकि हकीकत है कि सैक्स को हर धर्म में छूट छिपे ढंग से मिली है. महाभारत में ही एक कहानी एशूलकेश मुनि को जिस ने अप्सरा मेनका ने गंयावेराज से बिना शादी हुई एक बेटी को पालपोस कर बड़ा किया. कहानी इस……का एक सांप के काटे जाने की हैपर इतना साफ करती है कि पौराणिक युग में बिना शादी के बच्चे अक्सर पैदा होते रहते थे. आज तो हालात और खराब है.

छोटे लडक़ेलड़कियां 3-4 साल की उम्र में ही शिकार हो सकते है और एक चाकलेट, मिठाई खिलौने के लालच में खेलखेल में कुछ भी करने लगते हैं. ये सब जरा बड़े होते हैं तो बड़ों को सैक्स करते देखना मिल ही जाते है खासतौर पर जहां पूरा परिवार एक ही झोपड़े या एक कमरे के मकान में रहता हो. हम ऊपर से चाहे कितना कहते रहते हो कि धर्म तो इस तरह की बातों पर पाबंदी लगाता है पर हर धर्म में यह होता है और ये लोगों की पूजा तक आम बात है.

बच्चों को सैक्स से बांध कर रखना मांबाप के लिए बहुत मुश्किल है. वे हर समय बच्चों के सिर पर नहीं बैठ सकते. बच्चों को आजादी भी चाहिए होती है. फिर ज्यादातर घरों में खुल कर औरत के मांग को लेकर गालियां खुलकर दी जाती हैं और औरतें भी पीछे नहीं रहतीं. पशुओं तो सैक्स करते तो  सब देखते ही है और कुदरती तौर वर वजह जानने की 3-4 साल की आयु में शुरू हो जाती है.

हम ऊपर से सैक्स संबंधों को ले कर चाहे जितना शरीफ बनते हों पर बच्चों तक ये यह बिमारी गहरे वैसी है जैसेजैसे बच्चे अकेले रहने को मजबूर होते हैं, यह संबंध जबरन या इच्छा से बनने लगते हैं. उन मामलों की कमी नहीं है जहां मांबाप खुद अपने अबोध लड़कियों को महंतों के आश्रमों में छोड़ आते हैं. अमेरिका और यूरोप के चर्च हर साल लाखों डौलर मुआवजा उन मामलों में देते हैं जिन में पादरियों के लडक़ों के साथ हुए कुकर्म सामने आ जाते हैं.

छोटे घरों और भाईबहनों की कमी इस परेशानी को बढ़ा रही है क्योंकि गरीब हो या अमीर, बच्चों को अकेले या अनजानों के साथ छोडऩा पड़ रह है जो न जाने क्याक्या हरकतें करते हैं. इन मामलों में जेल नहीं डाक्टर और सलाहकार जरूरी है. दिक्कत यह है कि हमारे यहां हर बात के लिए या तो दानदक्षिणा बाले या मारपीट  का वर्दी वाले ही नजर आते हैं और दोनों खुद वहथी और कुछ भी कर सकते हैं. वे पीडि़त को और ज्यादा दुख भी बिा माथे पर पसीना लाए दे सकते हैं.

Mother’s Day 2022: सही खानपान और पोषण से रोकें PCOS का खतरा

आमतौर पर संक्षेप में पीसीओएस यानी पौलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम कही जाने वाली समस्या हार्मोन की गड़बड़ी है, जो मुख्य रूप से प्रजनन आयु की महिलाओं को प्रभावित करती है. यह एक मुश्किल स्थिति है जिस के चलते एक या दोनों अंडाशय बड़े हो जाते हैं और इन के बाहरी किनारों पर छोटी गांठें होती हैं.

पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं को अकसर या लंबे समय तक मासिक हो सकता है या उन में पुरुष हार्मोन (एंड्रोजन) का स्तर ज्यादा हो सकता है. इस के अलावा, अंडाशय में ढेरों तरल पदार्थ छोटी मात्रा में इकट्ठे हो सकते हैं और संभव है इस कारण नियमित रूप से अंडे जारी न हों.

पीसीओएस आमतौर पर कुछ खास कारणों से होता है, जैसे…

-हाइपर इनफ्लेमेशन

-एथनिसिटी प्रीडिसपोजिशन

-विटामिन डी का स्तर कम होना

-हाइपरएंड्रोगेनिज्म

आम चेतावनी संकेत पीसीओएस के लक्षण समय के साथ विकसित होते हैं. यह समय होता है पहले से ले कर अब तक का मासिक चक्र. इस के अलावा, ये लक्षण हर महिला में अलग होते हैं, ऐसा उस की जीवनशैली तथा शरीर पर निर्भर होता है. हालांकि कुछ बुनियादी लक्षण हैं जो यह तय कर सकते हैं कि महिला पीसीओएस की शिकार है.

पीरियड अनियमित या देर से होने पर कभीकभी ओव्यूलेशन नहीं होता है और इस कारण पीरियड्स नहीं हो पाते. अत्यधिक एंड्रोजन के परिणामस्वरूप चेहरे पर बाल, मुंहासे बढ़ जाते हैं. पुरुष हार्मोन के उच्च स्तर के कारण गंजापन भी हो सकता है.

पौलीसिस्टिक ओवरीज (अंडाशय) अल्ट्रासाउंड में देखे जाने पर अंडाशय बढ़े हुए दिखाई देते हैं और कई छोटी सिस्ट (गांठ) से घिरे होते हैं. द्य शरीर के कई हिस्से, जैसे गरदन और ब्रैस्ट के नीचे, पेट और थाइज के नीचे का रंग गाढ़ा हो जाना. वजन बढ़ना या वजन कम करने में परेशानी.

जोखिम घटक वैसे तो पीसीओएस का ठीकठीक कारण अभी भी अज्ञात है लेकिन बहुत संभावना है कि यह किसी जैनेटिक या पर्यावरणीय कारण से होता है. कुछ आम कारणों में शामिल हैं :

1 –आनुवंशिकता :

परिवार के सदस्यों को पीसीओएस हो या रहा हो तो ऐसी महिलाओं को इस के विरासत में मिलने का जोखिम ज्यादा है.

2अत्यधिक इंसुलिन :

जिन महिलाओं के परिवार में टाइप टू डायबिटीज का इतिहास है, उन में पीसीओएस विकसित होने की आशंका अधिक रहती है. अत्यधिक इंसुलिन, दरअसल, ओव्यूलेशन की प्रक्रिया को बाधित करती है जिस से यह स्थिति बनती है.

3-मोटापा :

व्यायाम न करने के कारण अधिक वजन और अस्वस्थ आहार पीसीओएस के लक्षणों की शुरुआत कर सकता है.

4-निम्न ग्रेड की सूजन :

पीसीओएस वाली ज्यादातर महिलाओं में अपेक्षाकृत निम्न ग्रेड की सूजन होती है जो पौलीसिस्टिक ओवरी (अंडाशय) को अधिक एंड्रोजन का उत्पादन करने के लिए प्रेरित करती है.

5- प्रबंधन :

31 साल की एक विवाहित महिला एक साल से गर्भधारण नहीं कर पा रही थी और उसे अनियमित मासिक, मुंहासे, शरीर पर अत्यधिक बाल होने जैसी शिकायत थी. वह मोटापे, चेहरे पर रोएं बढ़ने और हाइपोथायरौयड की शिकार थी. उस का ब्लडशुगर और प्रोलैक्टिन का स्तर सामान्य था. प्रजनन से संबंधित मामलों में चूंकि जीवनशैली की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है, इसलिए चिकित्सकों ने उसे जीवनशैली में संशोधन और 45 मिनट व्यायाम के साथ कम वसा वाला भोजन तथा दवाइयां लेने की सलाह दी.

पीसीओएस और बांझपन

महिलाओं में बांझपन के मामले में पीसीओएस सब से आम कारणों में से एक है और इसे समय पर प्रभावी तरीके से निबटाया जाना चाहिए. डाक्टर की बताई दवाओं का नियमित सेवन और सही वजन बनाए रखने से बांझपन ठीक करने में मदद मिल सकती है.

पीसीओएस के कारण होने वाले बांझपन से निबटने के कई तरीके हैं. इसलिए मरीज गर्भधारण से संबंधित जटिलताओं के बावजूद आईयूआई उपचार के पहले चक्र के दौरान गर्भधारण करने में नाकाम रही. वैसे तो पीसीओएस का कोई स्थायी उपचार नहीं है लेकिन हार्मोन का स्तर और वजन ठीक रखने से इसे कम करने में निश्चित रूप से मदद मिल सकती है.

अगर किसी को पीसीओएस होने का पता चले तो उसे अपना वजन ठीक रखने पर ध्यान देना चाहिए. यह नियमित व्यायाम और संतुलित स्वस्थ आहार से संभव है.

कई और तरीके हैं जिन में आहार और पोषण पीसीओएस को रोकने में सहायक हो सकता है.

  • उच्च फाइबर वाला भोजन, जिस में गोभी, ब्रोकली, अंकुरित अनाज, बादाम, सेम, मसूर, जामुन और कद्दू शामिल हैं, को इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ाने और शरीर में पाचन को धीमा करने के लिए शामिल किया जाना चाहिए.
  • टोफू, चिकन, मछली, टमाटर, अखरोट, पालक और जैतून का तेल जैसे लीन प्रोटीन के समृद्ध स्रोत भी शामिल किए जाने चाहिए.
  • परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थों, जैसे सफेद (मैदे की) ब्रैड, मीठा नाश्ता और पेय आदि को नहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
  • इनफ्लेमेटरी खाद्य पदार्थ, जैसे प्रसंस्कृत और लाल मांस (रैड मीट) से बचना चाहिए.
  • पास्ता और नूडल्स, जिन में सूजी, ड्यूरम आटा या ड्यूरम गेहूं के आटे के रूप में उन का मुख्य घटक होता है, ज्यादा कार्बोहाइड्रेट और कम फाइबर वाले होते हैं. इन के बजाय बीन्स या मसूर के आटे से बना पास्ता एक अच्छा विकल्प हो सकता है.
  • इस के अलावा, पीसीओएस को बनाए रखने में हमारी जीवनशैली की सीधी भूमिका हो सकती है. इसलिए यह सिफारिश भी की जाती है कि कम से कम 15 मिनट शारीरिक व्यायाम करने की आवश्यकता है.

स्वस्थ जीवनशैली बनाए रखने के अलावा यदि किसी में पीसीओएस के कोई लक्षण हों तो उसे स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए. इन लक्षणों की अज्ञानता या उपेक्षा स्थिति को और खतरनाक बना सकती है जो बांझपन (गर्भ धारण नहीं करने) का कारण बन सकती है.

Mother’s Day 2022- मिलन: भावना ने क्या निर्णय लिया?

प्रांजल और हिमालय दोनों बचपन से ही दोस्त रहे. नौकरी व विवाह के बाद भी उन की निकटता बनी रही. प्रांजल की पत्नी भावना को हिमालय की पत्नी रचना का साथ भी अच्छा लगता. दोनों मित्रों की पत्नियां जबतब बतियाती रहतीं. प्रांजल की दोनों बेटियां मीता व गीता अपनी पढ़ाई लगभग पूरी कर चुकी थीं और बेटा उज्ज्वल अभी डाक्टरी के तीसरे वर्ष में पढ़ रहा था.

मीता की शादी में हिमालय अपने बेटे सौरभ व बेटी ऋचा के साथ मुंबई यथासमय पहुंच गए थे. दोनों परिवार के बच्चे जब एकदूसरे के साथ रहे तो संबंध और भी पक्के हो गए.

एक दिन अचानक प्रांजल को हिमालय से अत्यंत दुखद समाचार मिला. उस की पत्नी रचना रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सीढि़यों से फिसल कर गिर जाने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गई है. प्रांजल और भावना के मुंबई पहुंचने से पहले ही रचना की मृत्यु हो गई.

बचपन के मित्र के कष्ट को समझते हुए भी प्रांजल और भावना संवेदना के दो शब्द के अलावा कुछ भी समझा नहीं पाए. हिमालय दुखी व नितांत अकेले रह गए थे. उन की बेटी ऋचा ससुराल में थी और सौरभ की भी नौकरी दूसरे शहर में थी. लौटते हुए हिमालय से वे कह कर आए थे, ‘जब भी मन करे हमारे पास आ जाया करना…मन कुछ बदल जाएगा.’

प्रांजल के बेटे उज्ज्वल के विवाह पर हिमालय मित्र के आग्रह पर कुछ पहले आए थे. मीता और गीता के विवाह में वह पत्नी रचना के साथ आए थे…वे दिन आंखों के सामने बारबार आ जाते. प्रांजल और भावना उन के दुख को समझ रहे थे अत: उन्हें हर तरह से व्यस्त रखने का प्रयास करते ताकि मित्र अपनी पीड़ा को कुछ सीमा तक भुला सके.

बाद में हिमालय का मन अपने अकेलेपन से बहुत उचाट होता तो वह प्रांजल के पास ही आ जाते.

मुश्किल से 2 साल गुजरे होंगे कि प्रांजल भी गंभीर रूप से बीमार हो गए और केवल एक माह की बीमारी के बाद भावना अकेली रह गई.

बेटियां और उज्ज्वल भावना को बारीबारी से अपने साथ ले भी गए पर वह 3-4 महीने में घूमफिर कर दोबारा अपने घरौंदे में वापस आ गई…पति के साथ सुखदुख की यादों के बीच.

उसे घर में हर तरफ प्रांजल ही दिखाई पड़ते…कभी ऐसा आभास होता कि प्रांजल किचन में उस के पीछे आ कर खड़े हैं और दूसरे ही क्षण उसे लगता…जैसे प्रांजल उसे समझा रहे हैं कि मैं तुम से दूर नहीं हूं भावना बल्कि तुम्हारे बिलकुल पास हूं…और भावना चौंक पड़ती.

भावना का अपने बच्चों के पास मन नहीं लगा. जब हिमालय ने यह सुना तो हिम्मत कर के कुछ दिन का अवकाश ले कर भावना के पास आए. उन्हें देख कर भावना बिफर पड़ी…प्रांजल की यादें जो ताजा हो गईं…जब रचना नहीं रही…और हिमालय आते तो प्रांजल बारबार भावना से कहते, ‘मैं चाहता हूं जो चीजें नाश्ते व भोजन में हिमालय को पसंद हैं…वही बनें. जब तक वह हमारे साथ है हम उस की ही पसंद का खाना व नाश्ता करेंगे.’

भावना प्रांजल की बात इसलिए नहीं रखती कि हिमालय उस के पति के दोस्त हैं…बल्कि इस का दूसरा कारण भी था कि रचना की मृत्यु से हिमालय के प्रति उसे गहरी सहानुभूति हो गई थी. लेकिन अब? अब सबकुछ परिवर्तित रूप में था…अब भावना किचन में घुसती ही नहीं. हिमालय ही जो कुछ बना सकते थे, बना लेते पर खाते दोनों साथसाथ.

भावना ने काफी समय तक बातें भी न के बराबर कीं. हिमालय कहते तो वह तटस्थ सी सुनती. जवाब नपेतुले शब्दों में देती.

हिमालय स्वयं चोट खाए हुए थे इसलिए भावना की पीड़ा को समझते थे. वह उसे समझाने का प्रयास जरूर करते, ‘‘जीवन मृत्यु में किसी का दखल नहीं चलता. इनसान खुद परिस्थितियों के अनुसार जीवन व्यतीत करने को मजबूर है. घाव कुछ हलका होने पर इनसान स्वयं अपने आसपास छोटीमोटी खुशियां खोजने का प्रयास करे. हमें इस तथ्य को अपना कर ही चलना होगा, भावनाजी.’’

भावना की आंखों से बस, आंसू टपकते रहते…वह बोलती कुछ नहीं. हिमालय जाने लगे तो भावना से यह वादा जरूर लिया कि वह अपने खानेपीने का पूरा ध्यान रखेगी. मन ठीक नहीं है तो क्या तन को स्वस्थ रखना जरूरी है.

समय के मरहम से भावना का घाव भरा तो हिमालय का जबतब आना उसे अच्छा लगने लगा…बातें भी करनी शुरू कर दीं. नाश्ताभोजन भी उन के पसंद का बनाने लगी. हिमालय को भी भावना के यहां आना अच्छा लगता.

मीता, गीता व उज्ज्वल भावना से मिलने आए हुए थे. तभी हिमालय भी आ गए थे. बेटियां चाह रही थीं कि मां उन के साथ या भाई के साथ चलें लेकिन भावना तैयार नहीं हुईं. उन का कहना था कि उन्हें अपने इसी घर में अच्छा लगता है.

बच्चे मां को समझ रहे थे…जहां उन्हें अच्छा लगे वहीं रहें. हां, उन्हें इस बात का अंदाजा जरूर लग गया था कि हिमालय अंकल के यहां रहने से मां के मन को कुछ ठीक लगता है. अंकल बरसों से उन के पारिवारिक मित्र रहे हैं और काफी समय उन लोगों ने साथसाथ गुजारा भी है. मीता और उज्ज्वल सोच रहे थे कि हिमालय अंकल जितना भी मां के साथ रह लेते हैं, कम से कम उतने समय तो वे लोग मां की तरफ से निश्चिंत से रहते हैं.

वैसे बच्चे चाहते कि उन में से कोई एक मां के पास अवश्य रहे लेकिन जब यह संभव नहीं था तो वे हिमालय अंकल पर ही निर्भर होने लगे और साग्रह उन से कहते भी, ‘‘अंकल, हम मां पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डालना चाहते पर आप से आग्रह करते हैं कि उन का हालचाल पूछते रहेंगे. हम लोग भी यथासंभव शीघ्र आने का प्रयास करते रहेंगे.’’

एक दिन हिमालय ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘भावना, मैं समझता हूं कि तुम्हारा कष्ट ऐसा है जिस का भागीदार कोई नहीं हो सकता. फिर भी हिम्मत कर के कह रहा हूं…यदि आप अपने जीवन में किसी हैसियत से मुझे शामिल करना चाहो तो मैं आप की शर्तों के साथ आप को स्वीकार करने को सहर्ष तैयार हूं. इस से न केवल एक को बल्कि दोनों को सहारा और बल मिलेगा.’’

थोड़ा विराम दे कर हिमालय ने पुन: कहा, ‘‘आप के हर निर्णय का मैं सम्मान करूंगा. आप इस बात से भी निश्चिंत रहिए कि हमारी दोस्ती के रिश्ते पर कोई आंच नहीं आएगी.’’

भावना ने पलक उठा कर हिमालय की तरफ देखा. वह मन से यही चाहती थी, हिमालय की बात अपनी जगह सही है. अब वह भी खुद को प्रांजल के अभाव में अकेली और बेसहारा अनुभव करती है. वह कोई गलत अथवा अनुचित कदम उठाना नहीं चाहती…उस के समक्ष उस का परिवार है, बच्चे हैं और सब से बड़ा समाज है. हिमालय की बात का कुछ जवाब दिए बिना वह किचन की तरफ बढ़ गई. हिमालय ने भी फिर कुछ कहा नहीं.

हिमालय के बेटे सौरभ व बेटी ऋचा को यह पता था कि जब से मां मरी हैं पिताजी बहुत दुखी, उदास व नितांत अकेले हैं. यह बात दोनों बच्चे अच्छी तरह जानते थे कि पापा को प्रांजल अंकल और भावना आंटी के यहां जाना हमेशा ही अच्छा लगता रहा, और आज जब आंटी नितांत अकेली व दुखी हो गई हैं, तब भी.

सौरभ ने ही ऋचा से कहा, ‘‘क्यों न हम भावना आंटी के मन का अंदाजा लगाने की कोशिश करें. यदि उन के मन में पापा के लिए कोई जगह होगी तो हम उन से जरूर कुछ कहना चाहेंगे. आंटी का साथ पा कर पापा के दिन भी अच्छे से गुजर सकेंगे.’’

सौरभ और ऋचा ने भावना के पास जाने का निश्चय किया. हिमालय, भावना के यहां ही थे. अचानक सौरभ को फोन से पता चला कि भावना आंटी को सीरियस बीमारी है फिर तो दोनों बहनभाई तुरंत ही वहां के लिए निकल पड़े. मीता, गीता तथा उज्ज्वल का परिवार सब पहुंच चुके थे.

दरअसल, कई दिनों से भावना का मन ठीक नहीं था. उलझन और अनिश्चय से भरा अंतर्मन समुद्र मंथन सा मथ रहा था…कभी हिमालय की बात और अपनत्वपूर्ण व्यवहार उसे अपनी तरफ खींचता तो कभी पति के साथ बिताए दिन यादों को झकझोर देते…तो कभी जीवन में आया अकेलापन भी अपना कोई साथी ढूंढ़ता…सब तरफ से घिरे मन को भावना ने अच्छी तरह से टटोला, परखा तो यही लगा कि पति के अभाव में वह कुछ सीमा तक अकेली और दुखी जरूर है पर उसे किसी और बात का अभाव नहीं है.

दूसरी बात, वह हर कदम अपने बच्चों और परिवार को साथ ले कर ही चलना चाहेगी…सोचती हुई भावना ने अपने मन में निश्चय किया कि हिमालय जैसे अब तक प्रांजल के दोस्त रहे बस, वही दोस्ती का रिश्ता अब भी बना रहेगा.

अपने फैसले से संतुष्ट भावना ने तय किया कि कल सुबह वह हिमालय को उन की उस दिन कही बात के बारे में अपना फैसला जरूर सुना देगी.

लेकिन मन में तनाव के चलते रात को भावना का रक्तचाप काफी बढ़ जाने से उसे जबरदस्त हार्ट अटैक पड़ गया. हिमालय ने फौरन उसे अस्पताल में भरती कराया. डाक्टरों ने 72 घंटे उसे आईसीयू में रखा था. एक सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद ही भावना घर आ सकी.

15 दिनों तक मां के साथ रहने के बाद आफिस व बच्चों के स्कूल के चलते मीता, गीता और उज्ज्वल वापस जाने की तैयारी में लग गए थे. हिमालय के दोनों बच्चे सौरभ व ऋचा तो 2 दिन बाद ही चले गए थे. उज्ज्वल ने मां को ले जाना चाहा लेकिन भावना अभी इस स्थिति में नहीं थी कि सफर कर सके. बच्चे जानते थे कि मां की सेवा में हिमालय अंकल का अहम स्थान रहा, वह अभी भी भावना को अकेली छोड़ कर जाने के लिए तैयार नहीं थे.

हिमालय का भावना के प्रति आत्मीयभाव व सहृदयता से की गई सेवा ने सिर्फ भावना के ही नहीं बल्कि दोनों के बच्चों के अंतर्मन को गहराइयों से छू लिया था. और अपनी मां व पिता के प्रति एक सुखद फैसला लेने को प्रेरित किया. जाने से पहले मीता और उज्ज्वल ने सौरभ और ऋचा से फोन पर लंबी बातचीत की. इसी के साथ उन्होंने अपने सोचे फैसले के प्रति मन को पक्का भी कर लिया.

एक दिन भावना ने देखा कि अचानक उस के बच्चों के साथ हिमालय के भी दोनों बच्चे आए हैं. उस ने सब से बेहद अनुनय के साथ कहा, ‘‘तुम सब ने तथा हिमालय अंकल ने मेरी बहुत सेवा की. शायद उन के यहां होने से ही मुझे दूसरा जीवन मिला है. यदि उस दिन हिमालय अंकल यहां न होते तो…’’

मीता ने मां के होंठों पर हाथ रख कर आगे बोलने से रोक दिया. अचानक उसे याद आया जब 11 दिसंबर को उस की शादी में हिमालय अंकल सपरिवार आए थे तो पापा ने उन से मुसकरा कर कहा था, ‘जानते हो हिमालय, मैं ने मीता की शादी के लिए यह दिन चुन कर क्यों रखा? यह बड़ा शुभ दिन है…हमारी भावना का जन्मदिन जो है.’

‘तो यह बात तुम ने आज तक मुझ से छिपा कर क्यों रखी? और साथ में यह भी भूल गए कि 11 दिसंबर को मेरा भी जन्मदिन होता है.’ हिमालय अंकल के इतना कहने के बाद प्रांजल ने खुश हो कर उन को बांहों में भर लिया था. फिर तो हिमालय अंकल और मां को बधाई देने वालों का घर में तांता सा लग गया था.

मीता ने कहा, ‘‘मां, जब से मेरी शादी हुई है मैं अपने विवाह की वर्षगांठ पर कभी आप के पास नहीं रही. इस बार मेरी दिली इच्छा है कि इस शुभ दिन का जश्न मैं और यश आप के साथ मनाएं. और मैं ने तो अपनी शादी की इस सालगिरह के लिए होटल भी बुक करा लिया है. कुछ खासखास मेहमानों के साथ हिमालय अंकल, सौरभ भैया तथा ऋचा भी रहेगी. मां, उस दिन आप का भी तो जन्मदिन होता है…हम दोनों यह दिन सुंदरता से एकसाथ मनाया करेंगे.’’

भावना को बेटी की बात सुन कर अच्छा लगा, इसी बहाने घर में कुछ दिन तो रौनक रहेगी. उसे याद था कि इस दिन हिमालय का भी जन्मदिन होता है, लेकिन उस ने मीता से इस का कोई जिक्र नहीं किया.

निश्चित दिन से एक दिन पहले ही ज्यादातर लोग आ गए, इसीलिए अगले दिन सुबह से ही घर में चहलपहल का माहौल बना हुआ था. जहां मीता और यश को सब बधाई दे रहे थे वहीं भावना और हिमालय भी अपनेअपने जन्मदिन की बधाई स्वीकार कर रहे थे.

संध्या समय घर के सभी लोग होटल पहुंच गए. होटल में आकर्षक सजावट की गई थी. एक तरफ शहनाई वादन की व्यवस्था की गई थी. विवाह की वर्षगांठ के मौके पर मीता और यश की जयमाल होने के साथ ही तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी. तभी मुसकराती मीता हिमालय के पास आ कर आग्रह पूर्वक बोली, ‘‘प्लीज अंकल, एक मिनट के लिए उधर मंच पर चलिए.’’

हिमालय भी बिना कुछ सोचेसमझे उस के साथ हो लिए. दूसरी तरफ ऋचा भावना को साथ ले कर मंच पर आई.

मीता और ऋचा ने आमनेसामने खड़े भावना और हिमालय के हाथों में बड़ा सा फूलों का हार पकड़ाते हुए हंस कर कहा, ‘‘जानते हैं अंकल और आंटी, आप इस का क्या करेंगे?’’

‘‘हां, तुम को और यशजी को शादी की वर्षगांठ की खुशी में पहनाना है,’’ हिमालय ने मुसकरा कर कहा.

‘‘नहीं, आज मम्मी का जन्मदिन है. इस उपलक्ष्य में यह हार आप उन को पहनाएंगे,’’ मीता ने हंस कर कहा.

‘‘और आंटी, आज मेरे पापा का भी जन्मदिन है,’’ मीता के कहने के तुरंत बाद ऋचा ने कहा, ‘‘इस खुशी में आप को हार पापा को पहनाना है.’’

अपनेअपने हाथों में हार पकड़े हिमालय और भावना आश्चर्य से भर कर बच्चों की तरफ देखने लगे. अपने लिए बच्चों की इस खूबसूरत कोशिश पर दोनों का दिल भर आया और उन्होंने बच्चों का मन रखने के लिए एकदूसरे को जयमाला पहना कर रस्म अदा कर दी.

मीता और ऋचा ने तालियां बजाते हुए सब के सामने कहा, ‘‘अब आप दोनों दोस्त से आगे एकदूसरे को स्वीकार कर के एक दूसरे के हो कर रहेंगे. हमारा यह प्रयास बस, आप लोगों को अपनी स्थायी पीड़ा और अकेलेपन से कुछ सीमा तक निजात दिलाने के लिए किया गया है.’’

बच्चों के साहस और प्रयास की सब ने मुक्त कंठ से सराहना की. तालियों की गड़गड़ाहट से होटल का हाल गूंज उठा. हिमालय ने अनुग्रहीत नजरों से बच्चों की तरफ देखा…जिन्होंने अत्यंत खूबसूरती से सब को साक्षी बना कर उन के मिलन को स्वीकार किया था.

Mother’s Day 2022: कुछ तो हुआ है

रात साढ़े 10 बजे मैं सोने की तैयारी कर रही थी कि पार्थ आया और मेरे व अनिल के बीच में आ कर लेट गया. अनिल ने हंसते हुए उसे छेड़ा, ‘‘तुम्हें सारा दिन टाइम नहीं मिला क्या, जो इस समय अपनी मम्मी की नींद खराब कर रहे हो?’’ पार्थ ने फौरन जवाब दिया, ‘‘मेरी मरजी. मेरी मां है. मेरा जब मन होगा उन के पास आऊंगा. ठीक है न, मम्मी?’’

मैं ने उसे अपने से लिपटा लिया, ‘‘और क्या, मेरा बच्चा है. जब उस का मन होगा, मेरे पास आएगा.’’ इतने में रिया भी मेरे दूसरी तरफ लेट कर  मुझ से लिपट गई थी. अब दोनों के बीच में थी मैं. अनिल ने फिर दोनों को चिढ़ाया, ‘‘जाओ भई, तुम लोग, अपनी मां को सोने दो. याद नहीं है डाक्टर ने इन्हें टाइम पर सोने के लिए कहा है.’’

इस बार रिया ने कहा, ‘‘यह हमारा फैमिली टाइम है न, पापा. इसी समय तो इकट्ठा होते हैं चारों. है न मां? दिनभर तो सब कुछ न कुछ करते रहते हैं, थोड़ा सा लेट हो जाएगा, तो चलेगा न, मां?’’ मैं ने सस्नेह कहा, ‘‘और क्या, जब तक मन करे रहो यहां, मुझे कोई जल्दी नहीं है सोने की.’’ ‘‘सच?’’ पार्थ की आंखें चमक उठीं, ‘‘देखा पापा, आप बेकार में मम्मी के सोने की रट लगा रहे हैं. वैसे मां, आप को कुछ तो हुआ है? है न रिया?’’

‘‘हां मां, कुछ तो हुआ है.’’

मैं बस मुसकरा कर रह गई. सवा 11 बजे तक हम चारों दिनभर की बातें करते रहे. यह हमारा रोज का नियम है. फिर बच्चे अपने कमरे में चले गए तो अनिल ने कहा, ‘‘अब सो जाओ जल्दी. तुम्हें लेटते ही नींद आती भी नहीं है. ये दोनों तुम्हारा सोना रोज लेट करते हैं.’’

‘‘तो क्या हुआ, जब नींद आएगी, सो ही जाऊंगी. नींद का क्या है जब आनी हो, आ ही जाएगी.’’

‘‘जया, ये तुम ही हो न. सचमुच, तुम्हें कुछ तो हो गया है. चलो, गुडनाइट.’’ इतना कह कर अनिल तो हमेशा की तरह लेटते ही सो गए. मैं रोज की तरह काफीकुछ सोचतीविचारती रही. बहुत कोशिश करती हूं अनिल की तरह हो जाऊं, आंख बंद करते ही नींद आ जाए. लेकिन नहीं, पता नहीं क्यों दिनभर की बातें इसी समय याद आती हैं.

दिन में तो मन घरगृहस्थी के कई कामों में उलझा रहता है, रात को लेटते ही पता नहीं किन खयालों में उलझती चली जाती हूं. अभी तो मैं यही सोचने लगी कि आजकल तो इन तीनों की जबान पर यही शब्द रहते हैं कि कुछ तो हो गया है मुझे. कितनी ही बातों पर मेरी प्रतिक्रिया देख कर तीनों का यह कहना कि मुझे कुछ हो गया है, याद कर के रात के इस अंधेरे में भी मेरे होंठों पर अनायास ही ऐसी मुसकराहट आ गई जिस में आंखों की नमी भी शामिल है.

मैं जानती हूं मुझ में हद से ज्यादा बदलाव आ गया है. मुझे तो साढ़े 10 बजे तक सो जाना, सुबह साढ़े 5 बजे तक उठना होता था, सैर पर जाना होता था, व्यायाम करना होता था, फिटनैस का नशा था मुझे. मेरा हर काम घड़ी की सूइयों से बंधा होता था.

उस में जरा सा भी परिवर्तन होने पर मेरा मूड खराब हो जाता था. मेरा खानपान, लाइफस्टाइल पूरी तरह से फिटनैस से जुड़ा रहा है हमेशा. लेकिन अब इन नियमों को एक तरफ रख अपने जीवन के इस मोड़ पर खुद को पूरी तरह से बदल एकएक पल को जी रही हूं. लगता है इस समय का एकएक पल कीमती है. कीमती ही क्या, बल्कि अनमोल है. एक पल भी खराब न होने पाए.

रिया ने अभीअभी सीए कर के औफिस जाना शुरू किया है. पार्थ बीकौम कर के जीमैट की तैयारी कर रहा है. पार्थ का सपना यही है कि वह विदेश जा कर पढ़ाई कर के वहीं सैटल होगा. उस ने साफसाफ कह दिया है कि वह यहां नहीं रहेगा. उस के कई अच्छे दोस्त बाहर जा चुके हैं. इस को भी बाहर जाने की धुन सवार है. उस की धुन में अनिल पूरी तरह से उस के साथ हैं.

मेरी इच्छा को देख कर रिया उसे बाहर सैटल होने के पक्ष में उत्साहित नहीं करती. बेटी है न, मां के कुछ कहे बिना ही मां के दिल का हाल जान लेती है. वह कई बार कहती है, ‘बाहर पढ़ने जरूर जाओ पर सैटल तो यहां भी अच्छी तरह से हो सकते हो न.’ उस के यह कहते ही दोनों में बहस हो जाती है. सो, रिया अब इस विषय पर चुप ही रहने लगी है.

पार्थ ने अपनी पढ़ाई में रातदिन एक कर रखा है. उस की लगन देख कर खुशी होती है पर जब कुछ महीनों बाद वह विदेश चला जाएगा तो…इस के आगे सोचने से मेरे दिल धड़कने लगता है, सांस थमती सी लगती है, जहां बैठी हूं, बैठी ही रह जाती हूं. शरीर की सारी ताकत जैसे इसी तो पर निचुड़ सी जाती है. पर अब जब मुझे यकीन हो गया है कि पार्थ को बाहर सैटल होने से कोई नहीं रोक पाएगा तो मैं ने इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया देनी छोड़ दी है. बस, इसी एहसास के साथ मुझे कुछ होता गया है.

ब जब यह स्पष्ट है कि रिया का विवाह तो 2-5 वर्षों में हो ही जाएगा और पार्थ विदेशी धरती पर उड़ान भरने की तैयारी कर ही रहा है तो मैं अब दिल को तसल्ली देने की निरर्थक कोशिश में इस समय का एकएक पल जी रही हूं. उस के बाद तो क्या होगा, यह सोचना तो मूर्खता है. पर मां हूं न, हार जाती हूं खुद को समझाने में. इसलिए खुद को बदलना ही विकल्प लगता है.

अब जब अनिल के टूर पर जाने के बाद पार्थ की फरमाइश शुरू हो जाती है कि ‘मम्मी, चलो न, पिज्जा और्डर करते हैं.’ तो मैं उसे अब पहले की तरह मना नहीं कर पाती. मैं अपनी हैल्दी डायट को एक किनारे रख सहमति देती हूं तो वह चहक उठता है, ‘वाह मम्मी, क्या हो गया है आप को.’ पहले मेरी शर्त होती थी, ‘मंगवा लो, पर मुझे मत कहना खाने के लिए, मैं नहीं खाऊंगी, इतनी कैलोरीज होती है, तुम्हीं खाओ.’ तो पार्थ बहुत नाराज होता था. वह कहता था, ‘एक दिन मेरे साथ खा लोगी तो कुछ हो नहीं जाएगा.’ मैं हमेशा हलकाफुलका खाना ही खाती थी. उस के कहने पर अब मैं भी उस के साथ बैठ कर खाती हूं. वह बहुत खुश होता है. अपने स्पैशल मील की फोटो खींच कर हमारी फैमिली के व्हाट्सऐप ग्रुप पर अनिल और रिया को दिखाने के लिए भेजता है. साथ में, मैसेज भी होता है, ‘‘देखो, मांबेटा कितना एंजौय कर रहे हैं.’’ फौरन रिया और अनिल का जवाब आता है, ‘‘कुछ हो गया है जया को’’, ‘‘मम्मी, क्या हो गया है आप को.’’

आजकल पार्थ कोचिंग जाता है र घर में भी पढ़ाई में व्यस्त रहता है. बीचबीच में उस की फरमाइशों का इंतजार रहने लगा है मुझे. कभी अचानक कहेगा, ‘मम्मी, चलो, आइसक्रीम खाने कूल कैंप चलते हैं.’ मैं उस की स्कूटी पर बैठ कर फौरन चल देती हूं. वह स्कूटी पर मेरे बैठने पर हैरान तो होता है क्योंकि कमरदर्द के चलते मेरी डाक्टर ने मुझे स्कूटी पर बैठने के लिए मना किया है. मुझे कोई झटका न लगे, इस बात की वह परवा करता है. कभी वह फ्रैंड्स के साथ फिल्म का नाइटशो देखने जाने की बात करता है तो मैं पहले की तरह मना नहीं कर पाती. अनिल तो कह भी देते हैं, ‘किसी बात के लिए तो कभी डांटो उसे.’ इस पर वह मुझ से लिपट जाता है. आजकल सुबह से रात तक मेरे मन में यही चलता रहता है कि कैसे रहती हैं वे मांएं जिन के बच्चे सात समंदर दूर जा कर बस जाते हैं. फोन पर या स्काइप पर बात कर के तसल्ली होती होगी?  बच्चों का यह स्पर्श, गले में बांहें डाल कर लिपट जाना, चिपटना, फरमाइश करना, उन का परेशान करना, उन का प्यार करना जब याद आता होगा, कैसे दिल को समझाती होंगी वे मांएं. आजकल मुझे अकेले रहना अच्छा लगने लगा है. आंखें कभी भी बरस पड़ती हैं, कोई देखने वाला तो नहीं होता न. किसी से मिलने पर, किसी फ्रैंड के साथ बैठने पर यही टौपिक छिड़ जाता है जिस से मैं आजकल बचती घूमती हूं.

कईकई दिनों तक मेरे किसी से न मिलने पर रिया टोक ही देती है, ‘मम्मी, जाया करो न किसी फ्रैंड से मिलने. क्यों इस के साथ हमेशा घर में बैठी रहती हो?’ सच तो यही है कि ऐसा लगता है कि किसी और के साथ तो कुछ दिनों बाद कभी भी बैठजाऊंगी, पार्थ के साथ फिर कहां समय मिलेगा. ये पल तो फिर कभी भी नहीं आएंगे न. जीवन की आपाधापी में फिर उस के पास समय कहां होगा. जानती भी हूं कि हर बच्चे को अपना जीवन अपने ढंग से जीने का अधिकार है. मैं ने खुद अपनी सहेलियों, जिन के बच्चे विदेश में हैं, को कई बार तसल्ली दी है कि खुद को व्यस्त रखो, बच्चों को अपना सपना पूरा करने दो, फोन पर तो बात होती ही है न, वगैरावगैरा. पर जब बात खुद पर आई है तो अपने दिल को समझाना, अपने कलेजे के टुकड़े से दूर होने के लिए खुद को तैयार करना आसान नहीं लग रहा.

मैं ने समय देखा, साढ़े 12 बज रहे थे. नींद का नामोनिशान नहीं था. फिर भी आंखें बंद कर ही लीं. कल फिर एकएक पल को जीना है, दिनभर फिर उस के आसपास रहना है, उस से जुड़े एकएक एहसास में डूबे अपने मन को समझाते हुए, उस की हर हरकत, हर जिद, हर स्पर्श, उस की मुसकराहट, उस की नाराजगी, उस की हर बात अपनी आंखों में समेटते हुए और कई बार उस की हैरतभरी आवाज में, ‘मां, आप को कुछ तो हुआ है,’ सुनते हुए.

Mother’s Day 2022- एक मां का पत्र: रेप पर बेटे से क्या कहना चाहती है मां?

‘‘प्रियविभोर,

‘‘शुभाशीष,

‘‘जब तुम्हें मेरा यह पत्र मिलेगा तो तुम्हें हैरानी अवश्य होगी कि मुझे अचानक क्या हो गया जो मैं ने तुम्हे यह पत्र भेजा है, जबकि रोज ही तो हम दोनों की बात फोन पर होती और समय मिलने पर तुम वैबकैम पर भी मुझ से बात कर लेते हो. फिर ई मेल और व्हाट्सऐप के इस जमाने में पत्र लिखता ही कौन है. चैट करना आसान है. इसलिए तुम्हारे चेहरे पर आए आश्चर्य के भावों को बिना देखे भी मैं महसूस कर पा रही हूं.

‘‘तुम्हें होस्टल गए अभी मात्र 2 महीने ही हुए हैं. इस से पहले 19 साल तक तुम मेरे पास थे. लेकिन मुझे यह लगता है कि आज जो मैं तुम से कहना चाहती हूं उसे कहने का यही उपयुक्त समय है, जब तुम मुझ से और परिवार से दूर रहे हो. जब तुम पास थे तब शायद इन बातों को तुम सही तरीके से समझ भी नहीं पाते. हर बात समय पर ही समझ आती है, हालांकि बचपन से ही मैं ने तुम्हें अच्छे संस्कार देने की कोशिश की है और मैं जानती भी हूं कि तुम उन संस्कारों का मान भी करते हो.

‘‘मेरे बेटे मुझे लगता है कि समाज इस समय जिस दौर से गुजर रहा है और आधुनिकीकरण की एक अलग ही तरह की परिभाषा गढ़ जिस तरह से आज की पीढ़ी ऐक्सपैरिमैंट करने के चक्कर में अपने संस्कारों को धूल चटा रही है, ऐसे में तुम्हें सही दिशा दिखाना मेरा कर्तव्य है.

‘‘होस्टल का माहौल घर जैसा नहीं होता और फिर वहां तुम्हारे नएनए दोस्त भी बन गए होंगे. उस के अपने आदर्श होंगे, सोच होगी, जिन के साथ हो सकता है तुम तालमेल न बैठा पाओ और सही मार्गदर्शन के अभाव में अपने लक्ष्य से भटक जाओ. भिन्न परिवेश से आए और बच्चों के जीवन जीने के पैमाने तुम से अलग हो सकते हैं.

‘‘हो सकता है तुम्हें उन की सोच पसंद न आए, हो सकता है उन्हें तुम्हारे विचार दकियानूसी लगें या वे तुम्हारी परवरिश का मजाक उड़ाएं. इस तरह का माहौल जब होता है तो भटक जाने की संभावना ज्यादा होती है.

‘‘यह तुम्हारा अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने और उस के बाद कैरियर पर फोकस करने का वक्त है. बस इसीलिए तुम से कुछ कहना चाहती हूं. तुम्हें मेरी बातें अजीब लग सकती हैं पर एक मां होने के नाते मैं उन बातों को अनदेखा नहीं कर सकती हूं.

‘‘मैं तुम्हें समझाना चाहती हूं कि क्यों जरूरी है हर लड़की का सम्मान करना. उसे उस के शरीर के परे जा कर देखना. बुरी संगत में पड़ कर कोई ऐसी हरकत मत करना जिस से तुम खुद से नजरें न मिला सको. हां, मैं रेप जैसी वहशीपन की बात कर रही हूं. कुछ पल का मजा लेने के लिए एक लड़की की पूरी जिंदगी बरबाद करना. उस के परिवार को दुख और अपमान में जीने को विवश कर देना कैसा सुख है?

‘‘जब किसी लड़की के साथ बलात्कार होता है तो एक पूरा परिवार, एक पूरी पीढ़ी उस के दंश का शिकार होती है. कभीकभी तो उम्र निकल जाती है उस पीड़ा से बाहर आने में. फिर भी उस लड़की के जीवन में पहले जैसा कुछ भी सामान्य नहीं हो पाता है.

‘‘विडंबना तो यह है कि जो पुरुष एक पिता, एक भाई, एक बेटा

और पति होता है वह अपने जीवन में आने वाली हर औरत की रक्षा करने की कोशिश करता है, उस के प्रति प्रोटैक्टिव रहता है तो फिर किसी अन्य औरत के साथ वह कैसे रेप करने की हिम्मत जुटा पाता है? क्या तुम अपनी बहन व दूसरे किसी की बहन में इस तरह का भेदभाव कर पाओगे?

‘‘बचपन में जब तुम देखते थे कि कोई तुम्हारी छोटी बहन को तंग कर रहा है तो कितना गुस्सा आता था तुम्हें. एक बार किसी लड़के ने खेलखेल में उस की चोटी खींच दी थी तो तुम आगबबूला हो गए थे कि आखिर उस की हिम्मत कैसे हुई ऐसा करने की? जब तुम किसी लड़की के साथ बुरा व्यवहार होते देखो या कभी तुम्हीं कुछ करना चाहो तो याद रखना वह भी किसी की बहन है और तब तुम खुद ही रुक जाओगे.

‘‘बेटा, रेप जैसा घिनौना कृत्य केवल औरतों से ही नहीं जुड़ा है, यह केवल उन की ही समस्या नहीं है, क्योंकि इस में 2 पक्ष शामिल होते हैं-एक दोषी और दूसरा पीडि़ता. मुझे यकीन है तुम्हें दिल्ली में हुए निर्भया गैंग रेप की बात याद होगी. जिस तरह की क्रूरता और वहशीपन देखने को मिला था उसे भूल पाना किसी केलिए संभव ही नहीं है. तब एक आश्चर्यजनक बात हुई थी. पूरा देश उस के विरोध में खड़ा हो गया था और विरोध करने वालों में पुरुष भी थे. तब कितने सवाल मन को झिंझोड़ गए थे कि आखिर ऐसा वहशीपन कहां से जन्म लेता है?

‘‘मानती हूं कि कामवासना ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है. औरत को मात्र भोग की वस्तु मानने से जन्म लेती है, उस पर पुरुष का अपना एकाधिकार मानने से जन्म लेती है. पुरुष जब उस के शरीर को रौंदता है तो वह उस की घृणा का पर्याय होता है तो यह घृणा आती कहां से है. जबकि हर पुरुष का जन्म एक औरत से ही होता है, वही उस का पालन करती है और उस के सुखदुख के पलों की साक्षी व बांटने वाली भी होती है.

‘‘जब सही समय आएगा तब तुम औरतपुरुष के सही संबंधों को खुद ही महसूस कर लोगे. सैक्स शब्द से तुम अपरिचित नहीं होगे बेटे, लेकिन इस खूबसूरत संबंध का रेप जैसे घिनौनेपन का सहारा लेना क्या तुम सही मान सकते हो…नहीं न…इसीलिए अगर अपने आसपास कभी ऐसा होते देखो तो बिना एक भी पल गंवाए उस का विरोध करना.

‘‘हमारे नेता, हमारे बुद्धिजीवी, हमारे समाज के तथाकथित सुधारक यह मानते हैं कि रेप के लिए खुद औरत ही जिम्मेदार होती है, क्योंकि वह देह दिखाने वाले कपड़े पहनती है, वह रात को देर तक बाहर रहती है, वह पुरुषों से दोस्ती करती है, जिस की वजह से बेचारे पुरुष बहक जाते हैं और उन से रेप हो जाता है.

‘‘औरत जिस तरह के कपड़े चाहे पहन कर आजादी से घूम सके, अपना मनचाहा कर सके, खुशी से जी सके और उन्मुक्त हो सांस ले सके. आखिर क्यों नहीं वह ताजा हवा को अपने भीतर उतरने दे सकती. सिर्फ इसलिए कि वह एक औरत है, क्योंकि उस की देह के कुछ हिस्से पुरुषों को आकर्षित करते हैं…

‘‘जब किसी लड़की के साथ बलात्कार होता है तो उस के ही चरित्र पर सवाल खड़ा कर उसे कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है. मानसिक व शारीरिक रूप से टूटी लड़की को ही इस के लिए दोषी माना जाता है और रेपिस्ट या तो कुछ दिनों में जेल से छूट जाता है या फिर उस का जुर्म साबित ही नहीं हो पाता है. त्रासदी तो यह है कि खुला घूमता वह रेपिस्ट फिर किसी मासूम को अपनी हवस का शिकार बनाता है.

‘‘लड़की अपनी इज्जत बचाने की खातिर चुप रहती है, वह अगर इस के खिलाफ शिकायत करती है तो अदालत में तरहतरह से उसे प्रताडि़त किया जाता है मानो एक बार बलात्कार हो गया तो अब किसी के साथ कभी भी संबंध बना लेने में हरज ही क्या है. उस से पूछा जाता है कहांकहां बलात्कारी ने तुम्हें छूआ था? क्या उस वक्त तुम्हें भी मजा आया था? तुम्हारी बिना मरजी के कोई तुम्हें हाथ नहीं लगा सकता. इस का मतलब है तुम ने ऐसा होने की छूट दी होगी…

‘‘मैं चाहती हूं कि तुम औरतों का सम्मान करो. उन्हें देखते समय उन के शरीर के उभारों पर नजर डालने के बजाय उन की योग्यता की प्रशंसा करो…अपनी मां से यह सब सुनना तुम्हें अजीब लग रहा होगा. सकुचाहट भी हो रही होगी.

‘‘प्रकृति ने स्त्री को भावुक, संवेदनशील, सहिष्णु व कोमल बनाया है और यही उस की सुंदरता व आकर्षण है और उस के इसी गुण को पुरुष अपने शारीरिक बल के आधार पर उस को स्त्री की कमजोरी समझ कर, अपने अहंकार व दंभ से उसे दबाना अपनी बहादुरी समझ बैठता है.

‘‘बलात्कार का सब से दुखद पहलू यह है कि पीडि़ता को शारीरिक और मानसिक कष्ट ही नहीं सामाजिक लांछन भी सहना पड़ता है. यह भयानक प्रताड़ना है. इसलिए मजबूरी में अकसर यह चुपचाप सह लिया जाता है. इस के लिए बदलाव मात्र कानूनों में ही नहीं सामाजिक मान्यताओं में भी लाना जरूरी है और आज की पीढ़ी को ही इस बदलाव को लाना होगा. यानी तुम भी उस बदलाव का एक हिस्सा बनोगे…

‘‘जब भी इस तरह की घटना देखो तो तुम्हारे अंदर रोष पैदा होना चाहिए. जिस समाज में रोष नहीं होता उस के लोग भुगतते रहते हैं, खासकर औरत…

‘‘आज मैं तुम से अपना एक सीक्रेट शेयर करना चाहती हूं. जानती हूं किसी भी मां के लिए अपने बेटे के सामने ऐसा राज रखना कितना अपमानजनक व पीड़ादायक हो सकता है. पर आज मुझे लगता है कि तुम्हारे साथ इसे बांटना जरूरी है. हो सकता है तुम यह जानने के बाद आक्रोश से भर जाओ या तुम इसे बरदाश्त न कर पाओ. वहां तुम्हें संभालने के लिए मैं नहीं हूं, पर मुझे विश्वास है कि तुम इतने लायक तो हो कि खुद को संभालोगे और इस बात को समझोगे भी. मुझे इस बात का भी डर है कि कहीं यह जानने के बाद मेरे प्रति तुम्हारे व्यवहार में अंतर न आ जाए. पर बेटा ये सब जानने के बाद कोई गलत कदम मत उठाना… संयम से काम लेना.

‘‘बेटा, जब मैं कालेज में पढ़ती थी तो एक लड़का मुझे चाहने लगा था. यह

एकतरफा प्यार था. मैं ने उसे खूब समझाया कि मैं उसे पसंद नहीं करती और वह मुझ से दूर रहे. पर शायद उस का मेरे प्रति वह प्यार एक जनून बन गया था. उस ने मुझ से कहा कि वह मेरी हां सुनने के लिए इंतजार करेगा. पर उस ने मेरा पीछा करना नहीं छोड़ा. मैं उसे देख रास्ता बदल लेती. मेरी तरफ से कोई पौजीटिव रिस्पौंस न पा वह आगबबूला हो गया और एक दिन जब मैं कालेज जा रही थी तो उस ने जबरदस्ती मुझे अपने स्कूटर पर बैठा लिया.

‘‘वह मुझे अपने किसी दोस्त के घर ले गया. मैं ने उस से बहुत अनुनयविनय की कि वह मुझे छोड़ दे पर वह नहीं माना बस एक ही बात कहता रहा कि अगर तुम मेरी नहीं हो सकती तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं होने दूंगा. मेरा विरोध बढ़ता देख उस ने मुझे मारना शुरू कर दिया. फिर मेरी अर्धबेहोशी की हालत में मेरा रेप किया.

‘‘तभी उस का दोस्त वहां आ गया. यह देख उस ने उसे बहुत मारा. उसे पता नहीं था कि यह दुष्कर्म करने के लिए उस ने उस के घर की चाबी ली थी. वह स्वयं को दोषी मान रहा था. मुझे उसी ने घर छोड़ा, जानते हो वह दोस्त कौन था…तुम्हारे पापा…हां बाद में उन्होंने ही मुझ से शादी की…पर उस दिन के बाद से आजतक कभी उस हादसे का जिक्र तक नहीं किया.

‘‘यह समझ लो मैं ने पत्र में जो भी कुछ तुम्हें कहना चाहा है, वह मेरा ही भोगा हुआ सच और पीड़ा है…

‘‘आशा है तुम्हें मेरी बातें समझ आ गई होंगी और एकदम साफसुथरी व सुलझी हुई दृष्टि के साथ तुम अब संबंधों को समझ पाओगे और लड़कियों का सम्मान भी करोगे. और यह भी आशा करती हूं कि मेरे प्रति तुम्हारे व्यवहार में कोई अंतर नहीं आएगा.

‘‘ढेर सारा प्यार

‘‘तुम्हारी मां.’’

Mother’s Day 2022: मां की डांट, बेटी का गुस्सा

बेटी को ले कर मां उस के बचपन से ही ओवर प्रोटैक्टिव होती है. मां नहीं चाहती जो परेशानी उस ने झेली, वह उस की बेटी भी झेले. यही कारण है कभी प्यार तो कभी डांट के जरिए वह बेटी को अपनी बात समझाती है. इस अनमोल रिश्ते की अहमियत मांबेटी दोनों को समझनी चाहिए.

अकसर बच्चे अपनी मां के सब से करीब होते हैं. उन के लिए मां सब से ऊपर होती हैं. लेकिन फिर भी मां की जरा सी डांट उन्हें गुस्से से आगबबूला कर देती है. मां और बेटी का रिश्ता घर में सब से अनूठा होता है. वे एकदूसरे के बाल बनाती हैं, साथ शौपिंग करती हैं, एकदूसरे को सौंदर्य टिप्स देती हैं और बीमार होने पर एकदूसरे का खयाल भी रखती हैं.

मां के लिए उस की बेटी अपने दूसरे जन्म के समान होती है, वह उसे जीवन की हर वह खुशी देना चाहती है जो उसे नहीं मिल पाई. बेटी के लिए मां आदर्श होती है, मां का स्नेह, प्यार बेटी की सब से बड़ी ताकत होती है. मां और बेटी का रिश्ता नोंकझोंक से भी भरा हुआ होता है. मां के पास डांट का हथियार होता है तो बेटी के पास मुंह फुलाने का. जब मां की चिंता व क्रोध, कठोर शब्दों में बदल कर बेटी पर अंगारे समान गिरता है तो इस वार के जवाब में वह गुस्से का सहारा लेती है. बेटी का गुस्सा भी कई स्तरों का होता है. पहला स्तर है, ‘नर्म गुस्सा.’ इस गुस्से में वह थोड़े नखरे दिखाती है, ना-नु करती है पर जल्दी मान जाती है. दूसरे स्तर का गुस्सा ‘ताने वाला गुस्सा’ होता है. इस गुस्से में वह मां से झगड़ती है, थोड़ा बुराभला कहती है और अपना नाम मां के मुंह से निकलता सुन भी ले तो राशनपानी ले कर उन पर चढ़ जाती है, ‘‘हां, मैं ही बेवकूफ हूं, भईया ही अच्छे हैं बस,’’ ‘‘मुझ से तो कोई प्यार नहीं करता. सब भईया को ही करते हैं,’’ कहकह कर कानों में दर्द करती है. तीसरे स्तर का गुस्सा ‘अनशन गुस्सा’ है. इस में बेटी भूखहड़ताल पर बैठती है. पूरा दिन उपवास और शाम को पापा के सामने से पानी पीपी कर निकलती है, तब तक जब तक पापा खाना खाने को नहीं बोलते. आखिर में मम्मीपापा के मनाने पर ही बेटी का उपवास टूटता है.

गुस्से का आखिरी पड़ाव थोड़ा चिंताजनक है. यह पड़ाव अकसर मांबेटी के रिश्तों में दूरियां पैदा करता है. कभीकभी मां अपनी बेटी से कुछ ऐसे शब्द बोल देती है जो बेटी के अंतर्मन को चोट पहुंचाते हैं. गुस्सा जब तक मुंह फुलाने, बातें सुनाने या शिकायत करने तक ही सीमित रहे तब तक सुरक्षित है, परंतु जब गुस्सा अपना आखिरी पड़ाव ले लेता है तो यह रिश्तों के लिए असुरक्षा पैदा कर देता है.

बेटी अगर मां से बात करना छोड़ देती है तो चाहे वह खाना खाए, दो शब्द बोले लेकिन उस की चहचहाहट, उस का लड़कपन कहीं खोने लगता है. बेटी का यह गुस्सा मां को दिखता तो है पर वह बातें सुना कर या उसे हलकाफुलका प्यार जता कर मना नहीं सकती.

इस नाराजगी और गुस्से को दूर करने के लिए बेटी को मां से और मां को बेटी से बैठ कर सभी कही गई बातों पर विचार करने की जरूरत होती है. जब तक आप बैठ कर अपनी मां से बात नहीं करेंगी तो शायद यह गुस्सा तो उड़ जाए लेकिन उस की बनाई दूरियां हमेशा वक्त के साथ गहराती रहेंगी.

अकसर जिन छोटीमोटी लड़ाइयों को हम नजरअंदाज कर देते हैं वे आगे बढ़ कर अपराध का रूप ले सकती हैं. आप अपनी मां से गुस्सा हैं, तो आप के मस्तिष्क में उन के लिए कड़वाहट भरना मुश्किल नहीं है, और कई बार यह कड़वाहट अपराधों का रूप ले लेती है.

जनवरी 2017 : मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के हबीबगंज इलाके के निवासी की 17 वर्षीया बेटी एक चिट्ठी छोड़ कर घर से भाग गई. घर से भागने का कारण मातापिता का बेटे को अधिक प्यार करना था. चिट्ठी में लड़की ने लिखा, ‘मुझे तलाशने की कोशिश मत करना, अब अपने बेटे को ही प्यार करना.’

अप्रैल 2018 : दिल्ली के कविनगर एरिया में एक बेटी ने अपनी ही मां की पीटपीट कर हत्या कर दी. हत्या का कारण बेटी के अपनी ही टीचर के साथ समलैंगिक संबंध थे, जिस का विरोध करने पर बेटी रश्मि राणा ने प्रेमिका टीचर निशा गौतम के साथ मिल कर मां को पीटपीट कर मार डाला.

दिसंबर 2018 : तमिलनाडु के थिरूवल्लूर में बेटी ने अपनी मां की चाकुओं से गोद कर केवल इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उस की मां उसे घर छोड़ कर भागने के लिए मना कर रही थी. बेटी देवी प्रिया को फेसबुक पर बने दोस्त विवेक से प्यार हो गया. उस ने विवेक और उस के दोस्तों के साथ घर छोड़ कर भागने का इरादा कर लिया था. मां के रोकने पर प्रिया ने उन का कत्ल कर दिया.

उपरोक्त मामले इस बात के गवाह हैं कि किस तरह मांबेटी के आपसी मतभेद विकराल रूप ले लेते हैं और सनसनीखेज अपराधों में बदल जाते हैं. इन मामलों में मां और बेटी के बीच पड़ी दरारों को साफसाफ देखा जा सकता है. पहले मामले में यदि बेटी ने अपनी मां से अपने मन की बात कही होती और उस की मां ने अपनी बेटी की बात सुनी होती तो शायद उसे घर छोड़ कर भागना नहीं पड़ता.

अकसर मातापिता के बेटे की तरफ झुकाव से बेटियां खुद को अनचाहा महसूस करने लगती हैं, परंतु अगर मां अपनी बेटी की व्यथा समझ उसे गले से लगा ले और उसे उतना ही प्यार दे जितना अपनी दूसरी संतान को दे रही है तो शायद वह अपनी बेटी को समय रहते रोक सकती.

दूसरे और तीसरे मामले में मां और बेटी के बीच बातचीत की कमी साफसाफ देखी जा सकती है. बेटी के प्रेम संबंधों पर मां ने उसे आराम से समझाने की कोशिश की होती या बेटी ने अपने प्रेम में अंधे न हो कर मां की बात समझी होती तो शायद मां को अपनी जिंदगी से हाथ न धोना पड़ता.

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