Download App

राजनीति से परे होगा ‘‘मुंबा इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’

सिनेमा महज मनोरंजन का साधन मात्र नहीं है. सिनेमा मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा का भी माध्यम है. सिनेमा जन जागृति का भी माध्यम है. तो वहीं सिनेमा अपने देश का सांस्कृतिक राजदूत भी है. इसी के चलते पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिल्म फेस्टिवल आयोजित करने का सिलसिला शुरू हुआ था. इसके पीछे मंशा यह थी कि एक जगह विश्व के हर देश की फिल्मों, उनके कलाकारों और फिल्मकारों से लोग परिचित हो सकेंगे. इसी सोच के चलते कॉन्स फिल्म फेस्टिवल सहित कई अंतरराष्ट्ीय फिल्म फेस्टिवल ने पूरे विश्व में अपनी धाक जमा रखी है.

मगर समय के साथ हर देश में कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के फिल्म फेस्टिवल आयोजित होने लगे. धीरे धीरे भारत जैसे देश में कुछ राज्यों में भी अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल आयोजित होने लगे. लेकिन हर फिल्म फेस्टिवल में कहीं न कहीं पॉलिटिक्स भी हावी होने लगी. यह पॉलिटिक्स कई स्तर पर होने लगी. इतना ही नहीं फिल्मकार की रचनात्मकता पर कुठाराघात करने के लिए कई फिल्म फेस्टिवल उनकी फिल्मों को पॉलिटिक्स का शिकार बनाने लगे.

पिछले दिनों भारत देश के एक राज्य में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के आयोजकों ने एक फिल्मकार की बेहतरीन फिल्म के साथ ऐसी पॉलिटिक्स की कि अब कुछ फिल्मकारों ने हर तरह की पॉलिटिक्स दूर रहने का निर्णय करते हुए एकदम अलग तरह का अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह शुरू करने की योजना बनाई.

जी हां! इस नए अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह का नाम ‘‘मुंबा इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल‘‘ रखा गया है. हाल ही में इसके ‘‘लोगो‘‘ का अनावरण मुंबई के सिनेपोलिस मल्टीप्लेक्स में किया गया. इस अवसर पर कई सिनेमा कर्मी मौजूद थे. मुंबा इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत 2023 में जनवरी माह के दूसरे सप्ताह से होगा. इसके संस्थापक सदस्य हैं-शेरोन प्रभाकर, सुधीर अत्तावर, त्रिविक्रम बेलथंगड़ी, संदीप सोपारकर और चैताली चटर्जी.

इस फेस्टिवल के ‘लोगो’ के अनवारण समारोह में अभिनेता स्व. ओमपुरी की पत्नी व लेखिका नंदिता पुरी,बॉलीवुड अदाकारा व शेरोन प्रभाकर की बेटी शाजान पद्मसी, कृष्णा भारद्वाज, रत्न प्रताप और विद्याधर शेट्टी भी मौजूद थे.

‘‘मुंबा इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ मूलतः सुधीर अत्तावर और शेरान प्रभाकर की दीमागी उपज है. इस अवसर पर इस नए फिल्म समारोह को शुरू करने की चर्चा चलने पर शैरोन प्रभाकर ने कहा-‘‘देखिए,लोग क्या कहेंगे? अरे इतने सारे फिल्म फेस्टिवल हो रहे हैं, ऐसे में यह नया फेस्टिवल कराने की जरूरत क्या है? जैसे सवालांे की मैं फिक्र नहीं करती. सच कह रही हॅूं कि मैं यह सब नहीं सोचती. आपको अपने सपने को पूरा करने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए. मुझे अपने जीवन में चुनौतियां पसंद रही हैं. मैं हमेशा रूटीन काम के खिलाफ जाकर मैं करती हूं।यह एक ऐसा ही फेस्टिवल है, जो सभी फिल्म फेस्टिवल से अलग, यूनिक, एक्साइटिंग होगा.हम महिलाएं मल्टी टास्कर होती हैं, सुबह उठने से लेकर रात तक हम दौड़ते रहते हैं. तो इस फेस्टिवल को नया रंग रूप देने में हम अपनी पूरी ताकत झांेक रहे हैं.’’

शेरान प्रभाकर ने आगे कहा-‘‘सिनेमा मेकिंग का पैशन रखने वालों ने घर बेचकर सिनेमा बनाया है. यह फेस्टिवल ऐसे ही जुनूनी फिल्म सर्जकों के लिए है. मैं कसम खाकर कहती हूँ कि हम इसके जरिए कुछ बेहतर, नया और अलग करने की कोशिश करेंगे.’’

जबकि सुधीर अत्तावर ने कहा- ‘‘इस फिल्म फेस्टिवल में हमने छह सेक्शन रखे हैं. पहली कैटगरी विश्व सिनेमा की है. दूसरी कैटगरी एलजीबीटी कम्युनिटी की है. एक कैटगरी महिला फिल्म सर्जकों की है. एक कैटगरी फिल्म इंस्टिट्यूट के लिए है. पांचवी कैटगरी में विज्ञापन फिल्में होगी और छठी कैटगरी मराठी सिनेमा के लिए होगा. एक सेक्शन डांस और म्यूजिक बेस्ड मूवीज का भी होगा.

जनवरी 2023 में मुम्बई में ही हमारे इस फेस्टिवल का आगाज होगा, जिसके लिए जुलाई 2022 से रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शुरू होगी. हम यहां स्पट करना चाहते है कि यह फेस्टिवल पैसे कमाने के लिए नहीं किया जा रहा है. यह फेस्टिवल पूरी तरह से शेरोन प्रभाकर के दिमाग की उपज है. इसमें कहीं कोई किसी भी प्रकार की पोलीटिक्स नहीं होगी.’’

मशहूर नृत्य निर्देशक संदीप सोपारकर ने इस अवसर पर कहा-‘‘ मुझे इस फेस्टिवल का हिस्सा बनाने के लिए मैं शेरान और सुधीर का तहेदिल से आभार व्यक्त करता हूं. 22 साल पहले जब मैं मुम्बई आया था, तो दूसरे दिन मैं मुंबा देवी के मंदिर का दर्शन करने गया और मैंने उनसे कहा कि आपके नाम पर इस शहर का नाम रखा गया है,ऐसा दिन कब आएगा जब मैं आपके नाम से जुड़ पाऊंगा. आज 22 साल बाद मैं ‘मुंबा इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ से जुड़कर काफी खुश हूं. इस महोत्सव में कई तरह के सेक्शन हमने रखे हैं. हमारा मकसद इस फेस्टिवल व सिनेमा के जरिए कल्चर को प्रमोट करना ही है.’’

त्रिविक्रम बेलथंगड़ी ने कहा-‘‘ जब सुधीर जी और शेरोन ने मुझसे इस फेस्टिवल के साथ जुड़ने के लिए कहा, तो मैंने तुरंत हामी भर दी. क्योंकि इसमें भी एक क्रिएटिव पॉसिबिलिटी है. इस फेस्टिवल के जरिए ऐसी फिल्मों को दिखाया जाएगा जिन्हें दर्शक कभी नहीं देख पाते. यह फेस्टिवल नए फिल्म मेकर्स के लिए भी द्वार खोलेगा.’’

अभिनेता स्व. ओमपुरी की पत्नी व लेखिका नंदिता पुरी ने कहा -‘‘इस फेस्टिवल के आयोजन के लिए पूरी टीम को दिल से ढेर सारी बधाई. शेरोन मेरी बड़ी अच्छी दोस्त हैं, मैं उनकी फैन भी हूँ, फेवरेट और अमेजिंग महिला है. सुधीर जी ने बड़ी अच्छी नियत के साथ इस फेस्टिवल की शुरुआत की है, उन्हें जब भी मेरी किसी बात के लिए जरूरत पड़ेगी मैं हाजिर रहूंगी. मैंने कई फिल्म फेस्टिवल के पीछे की गंदी राजनीति देखी है. हम ‘मुम्बा इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ को राजनीति से दूर रखेंगे.’’

हिंदी फिल्मों के साथ साथ तमिल और तेलुगु फिल्मों में भी अभिनय का जौहर दिखाने वाली शाजान पद्मसी ने कहा,‘इस फेस्टिवल के लिए सभी ने खूब मेहनत की है.मेरी मम्मी शेरोन इस फेस्टिवल के लिए अपना दिल और जान लगा रही हैं. सभी को बधाई और शुभकामनाएं.’’

आइसोलेशन या आजादी

मैं कोविड हॉस्पिटल के रिसेप्शन पर खड़ा था. हाथ में कोरोना निगेटिव की रिपोर्ट थी. आसपास कुछ लोग तालियां बजा कर उस का अभिनंदन कर रहे थे. दरअसल यह रिपोर्ट मेरे एक कमरे के उस जेल से आजादी का फरमान था जिस में मैं पिछले 10 दिनों से बंद था. मेरा अपराध था कोरोना पॉजिटिव होना और सजा के रूप में मुझे दिया गया था आइसोलेशन का दर्द.

आइसोलेशन के नाम पर मुझे न्यूनतम सुविधाओं वाले एक छोटे से कमरे में रखा गया था जहां रोशनी भी सहमसहम कर आती थी. उस कमरे का सूनापन मेरे दिल और दिमाग पर भी हावी हो गया था. वहां कोई मुझ से बात नहीं करता था न कोई नज़दीक आता था. खाना भी बस प्लेट में भर कर सरका दिया जाता था. मन लगाने वाला कोई साधन नहीं, कोई अपना कोई हमदर्द आसपास नहीं. बस था तो सिर्फ एक खाली कमरा और खामोश लम्हों की कैद में तड़पता मेरा दिल जो पुरानी यादों के साए में अपना मन बहलाने की कोशिश करता रहता था.

इन 10 दिनों की कैद में मैं ने याद किए थे बचपन के उन खूबसूरत दिनों को जब पूरी दुनिया को मैं अपनी मुट्ठी में कैद कर लेना चाहता था. पूरे दिन दौड़भाग, उछलकूद और फिर घर आ कर मां की गोद में सिमट जाना. तब मेरी यही दिनचर्या हुआ करती थी. उस दौर में मां के आंचल में कैद होना भी अच्छा लगता था क्यों कि इस से आजाद होना मेरे अपने हाथ में था.

सचमुच बहुत आसान था मां के प्यार से आजादी पा लेना. मुझे याद था आजादी का वह पहला कदम जब हॉस्टल के नाम पर मैं मां से दूर जा रहा था.

“बेटा, अपने शहर में भी तो अच्छे कॉलेज हैं. क्या दूसरे शहर जा कर हॉस्टल में रह कर ही पढ़ना जरूरी है ?” मां ने उदास स्वर में कहा था.

तब मां को पापा ने समझाया था ,” देखो प्रतिभा पढ़ाई तो हर जगह हो सकती है मगर तेरे बेटे के सपने बाहर जा कर ही पूरे होंगे क्यों कि वहां ए ग्रेड की पढ़ाई होती है.”

“पता नहीं नए लोगों के बीच अनजान शहर में कौन सा सपना पूरा हो जाएगा जो यहां नहीं होगा? मेरे बच्चे को ढंग का खाना भी नहीं मिलेगा और कोई पूछने वाला भी नहीं होगा कि किसी चीज की कमी तो नहीं.”

मां मुझे आजादी देना नहीं चाहती थी मगर मैं हर बंधन से आजाद हो कर दूर उड़ जाना चाहता था.

तब मैं ने मां के हाथों को अपने हाथ में ले कर कहा था,” मान जाओ न मां मेरे लिए…”

और मां ने भीगी पलकों के साथ मुझे वह आजादी दे दी थी. मैं हॉस्टल चला गया था. यह पहली आजादी थी मेरी. अपनी जिंदगी का बेहद खूबसूरत वक्त बिताया था मैं ने हॉस्टल में. पढ़ाई के बाद जल्द ही मुझे नौकरी भी मिल गई थी. नौकरी मिली तो शादी की बातें होने लगीं.

इधर अपने ऑफिस की एक लड़की प्रिया मुझे पसंद आ गई थी. वह दिखने में जितनी खूबसूरत थी दिमाग की भी उतनी ही तेज थी. बातें भी मजेदार किया करती. उस के कपड़े काफी स्टाइलिश और स्मार्ट होते जिन में उस का लुक निखर कर सामने आता. मैं उस पर से नजरें हटा ही नहीं पाता था.

एक दिन मैं ने उसे प्रपोज कर दिया. वह थोड़ा अचकचाई फिर उस ने भी मेरा प्यार स्वीकार कर लिया. यह बात मैं ने घर में बताई तो मेरे दादाजी और पिताजी भड़क उठे.

दादाजी ने स्पष्ट कहा,” ऐसा नहीं हो सकता. तू गैर जाति की लड़की से शादी करेगा तो हमारे नातेरिश्तेदार क्या बोलेंगे?”

मां ने दबी जबान से मेरा पक्ष लिया तो उन लोगों ने मम्मी को चुप करा दिया. तब मैं ने मां के आगे अपनी भड़ास निकालते हुए कहा था,” मां आप एक बात सुन लो. मुझे शादी इसी लड़की से करनी है चाहे कुछ भी हो जाए. आप ही बताओ आज के जमाने में भला जात धर्म की बात कौन देखता है? मैं नहीं मानता इन बंधनों को. अगर मुझे यह शादी नहीं करने दी गई तो मैं कभी भी खुश नहीं रह पाऊंगा.”

मां बहुत देर तक कुछ सोचती रहीं. फिर मेरी खुशी की खातिर मां ने पिताजी और दादा जी को मना लिया. उन्होंने पता नहीं दादा जी को ऐसा क्या समझाया कि वे शादी के लिए तुरंत मान गए. पिताजी ने भी फिर विरोध में एक शब्द भी नहीं कहा. इस तरह मां ने मुझे जातपांत और ऊंचनीच के उन बंधनों से आजादी दे कर प्रिया के साथ एक खूबसूरत जिंदगी की सौगात दी थी.

प्रिया दुल्हन बन कर मेरे घर आ गई थी. मां बहुत खुश थीं कि उन्हें अब एक बेटे के साथ बेटी भी मिल गई है मगर प्रिया के तो तेवर ही अलग निकले. उसे किसी भी काम में मां की थोड़ी सी भी दखलंदाजी बर्दाश्त के बाहर थी. मां कोई काम अपने तरीके से करने लगतीं तो तुरंत प्रिया वहां पहुंच जाती और मां को बिठा देती. मां धीरेधीरे खुद ही चुपचाप बैठी रहने लगी. वह काफी खामोश हो गई थीं.

इस बीच हमारे बेटे का जन्म हुआ तो पहली दफा मैं ने मां के चेहरे पर वह खुशी देखी जो आज तक नहीं देखी थी. अब तो मां पोते को गोद में लिए ही बैठी रहतीं. शुरू में तो प्रिया ने कुछ भी नहीं कहा क्यों कि उसे बच्चे को संभालने में मदद मिल जाती थी. बेटे के बाद हमारी बिटिया ने भी जन्म ले लिया. मां ने दोनों बच्चों की बहुत सेवा की थी. दोनों को एक साथ संभालना प्रिया के वश की बात नहीं थी. मां के कारण दोनों बच्चे अच्छे से पल रहे थे.

इधर एक दिन अचानक दिल का दौरा पड़ने से पिताजी चल बसे. मां अकेली रह गई थीं मगर बच्चों के साथ अपना दिल लगाए रखतीं. अब बेटा 6 साल का और बेटी 4 साल की हो गई थी. सब ठीक चल रहा था. मगर इधर कुछ समय से प्रिया फिर से मां के कारण झुंझलाई सी रहने लगी थी. वह अक्सर मुझ से मां की शिकायतें करती और मैं मां को बात सुनाता. मां खामोशी से सब सुनती रहतीं.

एक दिन तो हद ही हो गई जब प्रिया अपनी फेवरिट ड्रैस लिए मेरे पास आई और चिल्लाती हुई बोली,” यह देखो अपनी मां की करतूत. जानते हो न यह ड्रैस मुझे मेरी बहन ने कितने प्यार से दी थी. 5 हजार की ड्रैस है यह. पर तुम्हारी मां ने इसे जलाने में 5 सेकंड का समय भी नहीं लगाया.”

“यह क्या कह रही हो प्रिया? मां ने इसे जला दिया?”

“हां सुरेश, मां ने इसे जानबूझ कर जला दिया. मैं इसे पहन कर अपनी सहेली की एनिवर्सरी में जो जा रही थी. मेरी खुशी कहां देख सकती हैं वह? उन्हें तो बहाने चाहिए मुझे परेशान करने के.”

“ऐसा नहीं हैं प्रिया. हुआ क्या ठीक से बताओ. जल कैसे गई यह ड्रैस ?”

” देखो सुरेश, मैं ने इसे प्रेस कर के बेड पर पसार कर रखा था. वहीं पर मां तुम्हारे और अपने कपड़े प्रेस करने लगीं. मौका देख कर गर्म प्रेस इस तरह रखी कि मेरी ड्रैस का एक हिस्सा जल गया,” प्रिया ने इल्जाम लगाते हुए कहा.

“मां यह क्या किया आप ने? थोड़ी तो सावधानी रखनी चाहिए न,” सारी बात जाने बिना मैं मां पर ही बरस पड़ा था.

मां सहमी सी आवाज में बताने लगीं,” बेटा मैं जब प्रेस कर रही थी उसी समय गोलू खेलताखेलता उधर आया और गिर पड़ा. प्रेस किनारे खड़ी कर के मैं उसे उठाने के लिए दौड़ी कि इस बीच नेहा ने हाथ मारा होगा तभी प्रेस पास रखी ड्रैस पर गिर गई और कपड़ा जल गया. ”

मैं समझ समझ रहा था कि गलती मां की नहीं थी मगर प्रिया ने इस मामले को काफी तूल दिया. इसी तरह की और 2 -3 घटनाएं होने के बाद मैं ने प्रिया के कहने पर मां को घर के कोने में स्थित एक अलग छोटा सा कमरा दे दिया और समझा दिया कि आप अपने सारे काम यहीं किया करो. उस दिन के बाद से मां उसी छोटे से कमरे में अपना दिन गुजारने लगीं. मैं कभीकभी उन से मिलने जाता मगर मां पहले की तरह खुल कर बात नहीं करतीं. उन की खामोश आंखों में बहुत उदासी नजर आती मगर मैं इस का कारण नहीं समझ पाता था.

शायद समझना चाहता ही नहीं था. मैं घर की शांति का वास्ता दे कर उन्हें उसी कमरे में रहे आने की सिफारिश करता क्यों कि मुझे लगता था कि मां अपने कमरे में रह कर जब प्रिया से दूर रहेंगी तो दोनों के बीच लड़ाई होने का खतरा भी कम हो जाएगा. वैसे मैं समझता था कि लड़ती तो प्रिया ही है पर इस की वजह कहीं न कहीं मां की कोई चूक हुआ करती थी.

अपने कमरे में बंद हो कर धीरेधीरे मां प्रिया से ही नहीं बल्कि मुझ से और दोनों बच्चों से भी दूर होने लगी थीं. बच्चे शुरूशुरू में दादी के कमरे में जाते थे मगर धीरेधीरे प्रिया ने उन के वहां जाने पर बंदिशें लगानी शुरू कर दी थीं. वैसे भी बच्चे बड़े हो रहे थे और उन पर पढ़ाई का बोझ भी बढ़ता जा रहा था. इसलिए दादी उन के जीवन में कहीं नहीं रह गई थीं.

प्रिया मां को उन के कमरे में ही खाना दे आती. मां पूरे दिन उसी कमरे में चुपचाप बैठी रहतीं. कभी सो जातीं तो कभी टहलने लगतीं. उन के चेहरे की उदासी बढ़ती जा रही थी. मैं यह सब देखता था पर पर कभी भी इस उदासी का अर्थ समझ नहीं पाया था. यह नहीं सोच सका था कि मां के लिए यह एकांतवास कितना कठिन होगा.

पर आज जब मुझे 10 दिनों के एकांतवास से आजादी मिली तो समझ में आया कि हमेशा से मुझे हर तरह की आजादी देने वाली मां को मैं ने किस कदर कैद कर के रखा है. आज मैं समझ सकता हूं कि मां जब अकेली कमरे में बैठी खाना खाती होंगी तो दिल में कैसी हूक उठती होगी. कैसे निबाला गले में अटक जाता होगा. उस समय कोई उन की पीठ पर थपकी देने वाला भी नहीं होता होगा. खाना आधा पेट खा कर ही बिस्तर पर लुढ़क जाती होंगी. कभी आंखें नम होती होंगी तो कोई पूछने वाला नहीं होता होगा. बच्चों के साथ हंसने वाली मां हंसने को तरस जाती होंगी और पुराने दिनों की भूलभुलैया में खुद को मशगूल रखने की कोशिश में लग जाती होंगी. सुबह से शाम तक अपनी खिड़की के बाहर उछलकूद मचाते पक्षियों के झुंड में अपने दुखदर्द का भी कोई साथी ढूंढती रह जाती होंगी.

अस्पताल की सारी कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद मैं ने गाड़ी बुक की और घर के लिए निकल पड़ा. अचानक घर पहुंच कर मैं सब को सरप्राइज करना चाहता था खासकर अपनी मां को. आइसोलेशन के इन 10 दिनों में मैं ने बीती जिंदगी का हर अध्याय फिर से पढ़ा और समझा था. मुझे एहसास हो चुका था कि एकांतवास का दंश कितना भयानक होता है. मैं ने मन ही मन एक ठोस फैसला लिया और मेरा चेहरा संतोष से खिल उठा.

घर पहुंचा तो स्वागत में प्रिया और दोनों बच्चे आ कर खड़े हो गए. सब के चेहरे खुशी और उत्साह से खिले हुए थे. मगर हमेशा की तरह एक चेहरा गायब था. प्रिया और बच्चों को छोड़ मैं सीधा घर के उसी उपेक्षित से कोने वाले कमरे में गया. मां मुझे देख कर खुशी से चीख पड़ीं. वह दौड़ कर आईं और रोती हुई मुझे गले लगा लिया. मेरी आंखें भी भीग गई थीं. मैं झुका और उन के पांवों में पड़ कर देर तक रोता रहा. फिर उन्हें ले कर बाहर आया.

मैं ने पिछले कई सालों से आइसोलेशन का दर्द भोगती अपनी बूढ़ी मां से कहा,” मां आज से आप हम सबों के साथ एक ही जगह रहेंगी. आप अकेली एक कमरे में बंध कर नहीं रहेंगी. मां पूरा घर आप का है.”

मां विस्मित सी मेरी तरफ प्यार से देख रही थीं. आज प्रिया ने भी कुछ नहीं कहा. शायद मेरी अनुपस्थिति में दूर रहने का गम उस ने भी महसूस किया था. बच्चे खुशी से तालियां बजा रहे थे और मेरा दिल यह सोच कर बहुत सुकून महसूस कर रहा था कि आज पहली बार मैं ने मां को एकांतवास से आजादी दिलाई है. उधर मां को लग रहा था जैसे बेटे की नेगेटिव रिपोर्ट से उन की जिंदगी पॉजिटिव हो गई है.

पशुओं में खनिज लवण की महत्ता

हमारे देश में कोरोना की दूसरी लहर से स्थिति बदतर बनती जा रही थी, लेकिन सरकार भी टीकाकरण व अन्य संसाधनों के माध्यम से इस पर लगाम लगाने के लिए दृढ़ संकल्प दिखी. ऐसे में हम लोगों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि अफवाहों पर ध्यान न देते हुए कोविड प्रोटोकाल का पालन करते हुए कृषि और पशुपालन का काम सुचारु रूप से करें. साथ ही, पशुओं में खनिज लवण के महत्त्व के बारे में जानें.

पशुओं के लिए खनिज लवण का महत्त्व

पशुओं के लिए खनिज लवणों का उन के प्रजनन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है. शरीर में इन की कमी से तमाम तरह के रोग व समस्याएं पैदा हो जाती हैं. खनिज लवणों की कमी से पशुओं का प्रजनन तंत्र भी प्रभावित होता है, जिस से पशुओं में प्रजनन संबंधित विकार पैदा हो जाते हैं. जैसे, पशुओं का बारबार मद में आना, अधिक आयु हो जाने के बाद भी मद में न आना, ब्याने के बाद भी मद में न आना या देर से मद में आना या मद में आने के बाद मद का न रुकना वगैरह. इन विकारों के लिए उत्तरदायी कारणों में एक कारण खनिज लवणों की कमी भी है.

खनिज लवण हैं क्या?

किसी भी वस्तु के जलने पर जो राख बचती है, उसे भस्म या खनिज कहते हैं. यह बहुत ही थोड़ी मात्रा में प्रत्येक प्रकार के चारेदाने और शरीर के अकसर सभी अंगों में पाए जाते हैं.

प्राकृतिक रूप से तकरीबन 40 प्रकार के खनिज जीवजंतुओं के शरीर में पाए जाते हैं, लेकिन इस में से कुछ बहुत ही उपयोगी हैं, जिन की आवश्यकता पशु के आहार में होती है. शरीर की आवश्यकता के अनुसार खनिजों को

2 भागों में बांटते हैं. एक, जो खनिज लवण पशुओं के लिए अधिक मात्रा में आवश्यक है, जिन की मात्रा को हम ग्राम या प्रतिशत में जाहिर करते हैं, इन को प्रमुख खनिज कहते हैं. जैसे कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, सल्फर, मैगनीशियम और क्लोरीन.

दूसरे खनिज लवण वे होते हैं, जो पशु शरीर के लिए बहुत सूक्ष्म मात्रा में आवश्यक होते हैं, जिस को हम पीपीएम में जाहिर करते हैं, ऐसे खनिजों को सूक्ष्म या विरल खनिज कहते हैं, जैसे लोहा, जिंक, कोबाल्ट, कौपर, आयोडीन, मैगनीज, मौलीब्डेनम, सेलेनियम, निकल, सिलिकौन, टिन, वेनडियम.

यद्यपि दूसरे सूक्ष्म खनिज जैसे एल्यूमीनियम, आर्सेनिक, बेरियम, बोरोन, ग्रोमीन, कैडमियम भी शरीर में पाए जाते हैं, लेकिन शरीर में इस की भूमिका के बारे में अभी तक स्पष्ट जानकारी नहीं है.

इस प्रकार कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, सल्फर, मैगनीशियम, क्लोरीन, लोहा, तांबा, कोबाल्ट, मैगनीज, जिंक, आयोडीन आदि पशुओं के लिए आवश्यक खनिज लवण हैं, जो जीवन व स्वास्थ्य रक्षा के लिए आवश्यक हैं.

शरीर में पशुओं के लिए खनिज लवण के सामान्य काम की बात की जाए, तो कैल्शियम व फास्फोरस दांत व हड्डियों के बनने में आवश्यक हैं. दुधारू पशुओं के खून में कैल्शियम की कमी से दुग्ध ज्वर हो जाता है. सोडियम, पोटैशियम व क्लोरीन शरीर के द्रवों में परिसारक दबाव को ठीक बनाए रखते हैं और उन में अन्य गुणों का संतुलन स्थापित करते हैं.

खून में पोटैशियम, कैल्शियम और सोडियम का समुचित अनुपात हृदय की गति और अन्य चिकनी मांसपेशियों को उत्तेजित करने व उन में संकुचन की क्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक है.

लौह लवण लाल रक्त कणों में हीमोग्लोबिन बनाने में आवश्यक होता है, जिस के कारण खून में औक्सीजन लेने की शक्ति पैदा होती है. इस के अलावा पशुओं के लिए खनिज लवण या तो शरीर के कुछ आवश्यक भाग को बनाते हैं या एंजाइम पद्धति के आवश्यक तत्त्व बनाते हैं. इस के अतिरिक्त इन के कुछ विशेष काम भी होते हैं.

प्रजनन क्षमता को प्रभावित करने वाले पशुओं के लिए खनिज लवण की बात की जाए, तो बाजार में कई तरह के उत्पाद उपलब्ध हैं. ये मुख्यत: कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, तांबा, कोबाल्ट, मैगनीज, आयोडीन और जिंक हैं. इन तत्त्वों की कमी से पशुओं में मदहीनता अथवा बारबार मद में आना व गर्भधारण न करने की समस्याएं आती हैं.

आहार में कैल्शियम की कमी के कारण अंडाणु का निषेचन कठिन होता है और गर्भाशय पीला व शिथिल हो जाता है.

पशुओं के आहार में फास्फोरस की कमी से पशुओं में अंडोत्सर्ग कम होता है, इसलिए पशु का गर्भपात हो जाता है. अन्य सूक्ष्म खनिज लवण भी पशुओं में अंडोत्पादन, शुक्राणु उत्पादन, निषेचन, भ्रूण के विकास व बच्चा पैदा होने तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

मुरगियों में अंडा उत्पादन के लिए कैल्शियम सहित अन्य खनिज लवण बहुत आवश्यक हैं. इन के आहार में कैल्शियम की कमी से अच्छी गुणवत्ता वाले अंडे का उत्पादन प्रभावित होता है.

चारे में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, मिनरल्स और विटामिनों की क्षमता बढ़ाने और कमी पूरी करने के लिए भी खनिजों को नियमित रूप से देने पर उत्पादकता में कम से कम 25 फीसदी की बढ़ोतरी होती है, वजन तेजी से बढ़ता है, रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ती है और चारे पर भी खर्च कम आता है.

पशुपालकों को चाहिए कि इस तरह की समस्याओं को दूर रखने के लिए पशुओं को संतुलित आहार दें अर्थात पशुओं के दाने व चारे में शर्करा या कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण और विटामिनों का संतुलित मात्रा में होना बहुत जरूरी होता है. इन पोषक तत्त्वों के असंतुलित होने के कारण ही कुपोषण से जुड़े रोग पैदा होते हैं.

पशुओं के आहार में सूखे चारे के साथसाथ हरे चारे का होना आवश्यक है. केवल हरा चारा या केवल सूखा चारा नहीं देना चाहिए, कम से कम दोतिहाई सूखा चारा और एकतिहाई हरा चारा होना चाहिए.

जहां तक दाना देने की बात है, तो कोई एक प्रकार का दाना या खली नहीं देनी चाहिए, बल्कि इन का मिश्रण होना चाहिए.

यदि एक क्विंटल दाना तैयार करना है, तो 25 किलोग्राम खली, 35 किलोग्राम चोकर, 35 किलोग्राम मोटे अनाज का दलिया, 3 किलोग्राम खनिज लवण व 2 किलोग्राम नमक ले कर अच्छी तरह से मिला लेना चाहिए.

प्रौढ़ पशुओं को निर्वाह के लिए ऐसे मिश्रित दाने की एक नियमित मात्रा व अन्य कामों जैसे प्रजनन व गर्भ के लिए 1.5 किलोग्राम और दूध उत्पादन के लिए ढाई से 3 किलोग्राम दूध पर 1 किलोग्राम दाना निर्वाहक आहार के अतिरिक्त देना चाहिए.

इस प्रकार से दिए गए आहार से पशुओं में खनिज लवणों की कमी की अधिकांशत: पूर्ति हो जाती है, लेकिन फिर भी इन में से कुछ सूक्ष्म खनिज लवणों की कमी की पूर्ति नहीं हो पाती है, जिस के लिए पशुओं को अलग से खनिज लवण देने की आवश्यकता होती है, जो कि काफी लाभदायक और तेजी से नतीजा  देने वाला है, जिस को 60-70 ग्राम प्रतिदिन प्रति प्रौढ़ पशु को देना चाहिए.

डा. नगेंद्र कुमार त्रिपाठी

ज्योति- भाग 3: क्या सही था उसका भरोसा

लगभग 45 वर्ष का सुरेश नेकदिल इंसान था. सुमित ने उसे सदा हंसतेमुसकराते ही देखा था. मगर वह अपनी जिंदगी में एकदम अकेला है, इस बात का इल्म उसे आज ही हुआ.

इधर कुछ दिनों से रोहन बहुत परेशान था. औफिस में उस के साथ हो रहे भेदभाव ने उस की नींद उड़ा रखी थी. रोहन के वरिष्ठ मैनेजर ने रोहन के पद पर अपने किसी रिश्तेदार को रख लिया था और रोहन को दूसरा काम दे दिया गया जिस का न तो उसे खास अनुभव था न ही उस का मन उस काम में लग रहा था. अपने साथ हुई इस नाइंसाफी की शिकायत उस ने बड़े अधिकारियों से की, लेकिन उस की बातों को अनसुना कर दिया गया. नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह उस की शिकायतें दब कर रह गई थीं. आखिरकार, तंग आ कर उस ने नौकरी छोड़ दी.

दूसरी नौकरी की तलाश में सुबह का निकला रोहन देरशाम ही घर लौट पाता था. उस का दिनभर दफ्तरों के चक्कर लगाने में गुजर जाता. मगर नई नौकरी मिलना आसान नहीं था. कहीं मनमुताबिक तनख्वाह नहीं मिल रही थी तो कहीं काम उस की योग्यता के मुताबिक नहीं था. जिंदगी की कड़वी हकीकत जेब में पड़ी डिगरियों को मुंह चिढ़ा रही थी.

सुमित और मनीष ने रोहन की मदद करने के लिए अपने स्तर पर कोशिश की, मगर बात कहीं बन नहीं पा रही थी.

एक के बाद एक इंटरव्यू देदे कर रोहन का सब्र जवाब देने लगा था. अपने भविष्य की चिंता में उस का शरीर सूख कर कांटा हो चला था. पास में जो कुछ जमा पूंजी थी वह भी कब तक टिकती, 2 महीने से तो वह अपने हिस्से का किराया भी नहीं दे पा रहा था.

सुमित और मनीष उस की स्थिति समझ कर उसे कुछ कहते नहीं थे. मगर यों भी कब तक चलता.

सुबह का भूखाप्यासा रोहन एक दिन शाम को जब घर आया तो सारा बदन तप रहा था. उस के होंठ सूख रहे थे. उसे महसूस हुआ मानो शरीर में जान ही नहीं बची. ज्योति उसे कई दिनों से इस हालत में देख रही थी. इस वक्त वह शाम के खाने की तैयारी में जुटी थी. रोहन सुधबुध भुला कर मय जूते के बिस्तर पर निढाल पड़ गया.

ज्योति ने पास जा कर उस का माथा छुआ. रोहन को बहुत तेज बुखार था. वह पानी ले कर आई. उस ने रोहन को जरा सहारा दे कर उठाया और पानी का गिलास उस के मुंह से लगाया. ‘‘क्या हाल बना लिया है भैया आप ने अपना?’’

‘‘ज्योति, फ्रिज में दवाइयां रखी हैं, जरा मुझे ला कर दे दो,’’ अस्फुट स्वर में रोहन ने कहा.

दवाई खा कर रोहन फिर से लेट गया. सुबह से पेट में कुछ गया नहीं था, उसे उबकाई सी महसूस हुई. ‘‘रोहन भैया, पहले कुछ खा लो, फिर सो जाना,’’ हाथ में एक तश्तरी लिए ज्योति उस के पास आई.

रोहन को तकिए के सहारे बिठा कर ज्योति ने उसे चम्मच से खिचड़ी खिलाई बिलकुल किसी मां की तरह जैसे अपने बच्चों को खिलाती है.

रोहन को अपनी मां की याद आ गई. आज कई दिनों बाद उसी प्यार से किसी ने उसे खिलाया था. दूसरे दिन जब वह सो कर उठा तो उस की तबीयत में सुधार था. बुखार अब उतर चुका था, लेकिन कमजोरी की वजह से उसे चलनेफिरने में दिक्कत हो रही थी. सुमित और मनीष ने उसे कुछ दिन आराम करने की सलाह दी. साथ ही, हौसला भी बंधाया कि वह अकेला नहीं है.

ज्योति उस के लिए कभी दलिया तो कभी खिचड़ी पकाती और बड़े मनुहार से खिलाती. रोहन उसे अब दीदी बुलाने लगा था.

‘‘दीदी, आप को देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं फिलहाल, मगर वादा करता हूं नौकरी लगते ही आप का सारा पैसा चुका दूंगा,’’ रोहन ने ज्योति से कहा.

‘‘कैसी बातें कर रहे हो रोहन भैया. आप बस, जल्दी से ठीक हो जाओ. मैं आप से पैसे नहीं लूंगी.’’

‘‘लेकिन, मुझे इस तरह मुफ्त का खाने में शर्म आती है,’’ रोहन उदास था.

‘‘भैया, मेरी एक बेटी है 10 साल की, स्कूल जाती है. मेरा सपना है कि मेरी बेटी पढ़लिख कर कुछ बने. पर मेरे पास इतना वक्त नहीं कि उसे घर पर पढ़ा सकूं और उसे ट्यूशन भेजने की मेरी हैसियत नहीं है. घर का किराया, मुन्नी के स्कूल की फीस और राशनपानी के बाद बचता ही क्या है. अगर आप मेरी बेटी को ट्यूशन पढ़ा देंगे तो बड़ी मेहरबानी होगी. आप से मैं खाना बनाने के पैसे नहीं लूंगी, समझ लूंगी वही मेरी पगार है.’’

बात तो ठीक थी. रोहन को भला क्या परेशानी होती. रोज शाम मुन्नी अब अपनी मां के साथ आने लगी. रोहन उसे दिल लगा कर पढ़ाता.

ज्योति कई घरों में काम करती थी. उस ने अपनी जानपहचान के एक बड़े साहब को रोहन का बायोडाटा दिया. रोहन को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया. मेहनती और योग्य तो वह था ही, इस बार समय ने भी उस का साथ दिया और उस की नौकरी पक्की हो गई.

सुमित और मनीष भी खुश थे. रोहन सब से ज्यादा एहसानमंद ज्योति का था. जिस निस्वार्थ भाव से ज्योति ने उस की मदद की थी, रोहन के दिल में ज्योति का स्थान अब किसी सगी बहन से कम नहीं था. ज्योति भी रोहन की कामयाबी से खुश थी, साथ ही, उस की बेटी की पढ़ाई को ले कर चिंता भी हट चुकी थी. घर में जिस तरह बड़ी बहन का सम्मान होता है, कुछ ऐसा ही अब ज्योति का सुमित और उस के दोस्तों के घर में था.

ज्योति की उपस्थिति में ही बहुत बार नेहा मनीष से मिलने घर आती थी. शुरूशुरू में मनीष को कुछ झिझक हुई, मगर ज्योति अपने काम से मतलब रखती. वह दूसरी कामवाली बाइयों की तरह इन बातों को चुगली का साधन नहीं बनाती थी.

मनीष और नेहा की एक दिन किसी बात पर तूतूमैंमैं हो गई. ज्योति उस वक्त रसोई में अपना काम कर रही थी. दोनों की बातें उसे साफसाफ सुनाई दे रही थीं.

मनीष के व्यवहार से आहत, रोती हुई नेहा वहां से चली गई. उस के जाने के बाद मनीष भी गुमसुम बैठ गया.

ज्योति आमतौर पर ऐसे मामले में नहीं पड़ती थी. वह अपने काम से काम रखती थी, मगर नेहा और मनीष को इस तरह लड़ते देख कर उस से रहा नहीं गया. उस ने मनीष से पूछा तो मनीष ने बताया कि कुछ महीनों से शादी की बात को ले कर नेहा के साथ उस की खटपट चल रही है.

‘‘लेकिन भैया, इस में गलत क्या है? कभी न कभी तो आप नेहा दीदी से शादी करेंगे ही.’’

‘‘यह शादी होनी बहुत मुश्किल है ज्योति. तुम नहीं समझोगी, मेरे घर वाले जातपांत पर बहुत यकीन करते हैं और नेहा हमारी जाति की नहीं है.’’

‘‘वैसे तो मुझे आप के मामले में बोलने का कोई हक नहीं है मनीष भैया, मगर एक बात कहना चाहती हूं.’’

मनीष ने प्रश्नात्मक ढंग से उस की तरफ देखा.

‘‘मेरी बात का बुरा मत मानिए मनीष भैया. नेहा दीदी को तो आप बहुत पहले से जानते हैं, मगर जातपांत का खयाल आप को अब आ रहा है. मैं भी एक औरत हूं. मैं समझ सकती हूं कि नेहा दीदी को कैसा लग रहा होगा जब आप ने उन्हें शादी के लिए मना किया होगा. इतना आसान नहीं होता किसी भी लड़की के लिए इतने लंबे अरसे बाद अचानक संबंध तोड़ लेना. यह समाज सिर्फ लड़की पर ही उंगली उठाता है. आप दोनों के रिश्ते की बात जान कर क्या भविष्य में उन की शादी में अड़चन नहीं आएगी? क्या नेहा दीदी और आप एकदूसरे को भूल पाएंगे? जरा इन बातों को सोच कर देखिए.

जानकारी: मौड्यूलर किचन कब जरूरी

कई सालों से मौड्यूलर किचन का प्रचलन बढ़ा है. इस की मांग धीरेधीरे बढ़ती ही जा रही है. आज की महिलाएं इसे मौडर्न और स्टाइलिश सम?ाती हैं, इसलिए गृहणियां इसे अधिक चुनती हैं. इस की खासीयत यह है कि इस में कम जगह पर अधिक सामान सही तरीके से रखा जा सकता है. इस से कई सुविधाएं होती हैं जिन्हें बजट के अनुसार निर्धारित किया जा सकता है.

मुंबई जैसे शहर में जहां बहुत कम जगह में एक नहीं, दो परिवार साथ रहते हैं, किचन बहुत छोटा होता है. किचन के सामान को रखने में समस्या आती है. ऐसे में मौड्यूलर किचन बनाना जरूरी होता है. इस से सामान एक निश्चित स्थान पर रखे जा सकते हैं और फिर स्मार्ट कुकिंग की जा सकती है.

तकनीक का विकास जितनी तेजी से हो रहा है, उस का असर केवल बाहर ही नहीं, घर पर भी मौड्यूलर किचन के रूप में दिखाई पड़ रहा है. यह कौन्सैप्ट विदेशी है, लेकिन इस का प्रयोग भारत में भी खूब होने लगा है.

क्या है मौड्यूलर किचन

असल में मौड्यूलर किचन को कस्टोमाइज्ड किचन कहा जाता है. इस में व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार वस्तुओं को सैट कर सकता है. इस से कम समय में सामान रखा जा सकता है और काम जल्दी हो जाता है, लेकिन समयसमय पर इस की देखभाल न करने पर इस का असर विपरीत भी हो सकता है.

इस के अलावा मौड्यूलर किचन में नमी और गंध को सोखने की क्षमता होती है, जो चिमनी के सहारे होता है. इस में कैबिनेट और ड्रायर हलके होने की वजह से आसानी से संचालित किए जा सकते हैं.

चुनाव सही औप्शन का

  1. सिंथैटिक प्लास्टिक पौलीमर के रूप में होने की वजह से यह बहुत ज्यादा मजबूत होता है. मौड्यूलर किचन कैबिनेट बनाने के लिए यह बैस्ट मैटीरियल माना जाता है. इस के अलावा इन में कई आकर्षक रंग मिलते हैं जिसे इच्छानुसार चुना जा सकता है. मौड्यूलर किचन कई प्रकार के होते हैं.
  2. नैचुरल वुड, जो देखने में सुंदर पर समय के साथ नमी सोखती है और खराब हो जाती है, साथ ही महंगी होती है.
  3. कैबिनेट में लकड़ी के ऊपर प्लास्टिक शीट लगी होती है. यह लंबे समय तक चलती है. यह नमी नहीं सोख सकती और सस्ती होती है.
  4. नैचुरल लकड़ी के पतलेपतले टुकड़ों को जोड़ कर बनाई गई शीट विनियर्स कहलाता है. इस में सौलिड वुड के टुकड़े होने की वजह से यह रियल वुड की तरह दिखता और टिकाऊ होता है. धूप से रंग फीका हो जाता है, लकड़ी से सस्ता होता है.
  5. पीवीसी यानी पौलिविनाइल क्लोराइड टिकाऊ और कई रंगों में मिलता है. यह बहुत ज्यादा मजबूत होता है, इसलिए मौड्यूलर किचन कैबिनेट बनाने के लिए इस का प्रयोग अधिक किया जाता है.
  6. स्टेनलैस स्टील के प्रयोग मौड्यूलर किचन में करने से जंग और दाग नहीं लगता. इसे आसानी से साफ किया जा सकता है.
  7. एक्रेलिक का प्रयोग आजकल अधिक हो रहा है. यह नौन-टौक्सिक होती है, इस की चमक अधिक होने से किचन बड़ा दिखता है.

प्रभाव जलवायु का

आशापुरा इंटीरियर्स के आर्किटैक्ट विजय पिथाडिया कहते हैं, ‘‘मौड्यूलर किचन का यह कौन्सैप्ट विदेशों से आया है जो इंडिया की जलवायु में कई बार ठीक नहीं होता और जल्दी खराब हो जाता है. मौड्यूलर किचन देखने में सुंदर और स्टाइलिश लग सकता है पर इस की सही देखभाल करना बहुत जरूरी होता है. खासकर, रसोई में खाना बनाने वाला कोई दूसरा व्यक्ति हो तो समस्या बढ़ती है, क्योंकि विदेशी मैटीरियल से बने मौड्यूलर किचन में पानी लगने या सही देखभाल न करने से वह जल्दी खराब हो जाता है.’’

मौड्यूलर किचन का होना जरूरी

  1. अगर किचन छोटा हो तो चारों तरफ सामान फैला रहता है. ऐसे में मौड्यूलर किचन से सभी सामान को सही जगह रखा जा सकता है, जिस से खाना बनाने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाती है.
  2. बाजार में आजकल कई प्रकार के मौड्यूलर किचन मिलते हैं, जिसे व्यक्ति अपने बजट के अनुसार चुन सकते हैं और समयसमय पर इसे बदल कर नया लुक दिया जा सकता है.
  3. मौड्यूलर किचन को इंस्टौल करने में समय कम लगता है, बारबार शिफ्ट करने वालों के लिए यह आसान औप्शन है, क्योंकि इसे कहीं भी ले जाना आसान होता है और इसे फिर से एसेम्बल करना भी मुश्किल नहीं होता.
  4.  इस तरह के किचन में बजट कम होता है और भिन्नभिन्न प्रकार के औप्शन होने की वजह से व्यक्ति अपने बजट के अनुसार किचन को सजा सकता है. कम बजट में मौड्यूलर किचन के लिए व्यक्ति खुद इंस्ट्रक्शन को फौलो कर सामान को उचित स्थान पर इंस्टौल भी कर सकता है.
  5. इस का रखरखाव बहुत आसान होता है, लेकिन समयसमय पर इस की साफसफाई अच्छी तरह करने की आवश्यकता होती है.
  6. मौड्यूलर किचन को सही तरह से बनाने पर एलिगेंट, स्टाइलिस्ट और मौडर्न लुक आता है, जो व्यक्ति को सुकून देता है. इस में समयसमय पर फेरबदल भी किया जा सकता है.
  7. इसे रिपेयर करना आसान होता है. साथ ही, कम पैसे में इसे फिर से ठीक किया जा सकता है.

विजय कहते हैं, ‘‘जो लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर शिफ्ट होते रहते हैं उन के लिए मौड्यूलर किचन सही रहता है, क्योंकि कम लागत में केवल कुछ दिनों में ही इसे फिट कर लिया जा सकता है. एक स्थान पर रहने वाले व्यक्ति इसे लो डैंसिटी वाला मानते हैं. इंडियन प्रोडक्ट अधिकतर पीतल के होते हैं जबकि विदेशी प्रोडक्ट स्प्रिंग और गैल्वनाइज शीट के होते हैं. इंडियन प्रोडक्ट्स ?को प्रयोग कर बनाया गया मौड्यूलर किचन महंगा होने के बावजूद सब से अधिक टिकाऊ होता है.’’

वेटिंग रूम- भाग 3: सिद्धार्थ और जानकी की जिंदगी में क्या नया मोड़ आया

जानकी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मेरे चेहरे पर तो सब लिखा नहीं था, और आप तो मुझ से आज पहली बार मिले हैं, सब कैसे जानते भला? फिर भी एक बात अच्छी हुई है, इस बहाने कम से कम आप मेरा नाम तो जान गए.’’ सिद्धार्थ ने थोड़ा ?मुसकराते हुए अचरजभरे अंदाज में बोला, ‘‘या दैट्स राइट.’’ ‘‘तब से मैममैम कर रहे थे आप और हां, ये ‘डैड’ क्या होता है, अच्छेखासे जिंदा आदमी को डैड क्यों कहते हैं,’’ कहते हुए पहली बार जानकी खिलखिलाई. सिद्धार्थ अब थोड़ा सहज हो गया था. उसे जानकी से और विस्तार से पूछने में हिचक हो रही थी, लेकिन जिज्ञासा बढ़ रही थी, इसलिए उस ने पूछ ही लिया, ‘‘आप को देख कर लगता नहीं है कि आप अनाथालय में पलीबढ़ी हैं, आय मीन आप की एजुकेशन वगैरा?’’ ‘‘सब मानसी चाची ने ही करवाई. जब मैं छोटी थी तब लगभग 19-20 लड़कियां थीं ‘वात्सल्य’ में, सब अलगअलग उम्र की. सामान्यतया अनाथालय के बच्चों को वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें. हमारे यहां भी सभी लड़कियों को स्कूल तो भेजा गया. कोई 5वीं, कोई 8वीं तक पढ़ी, पर कोई भी 10वीं से ज्यादा पढ़ नहीं सकी. फिर उन्हें सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, अचारपापड़ बनाना जैसे छोटेछोटे काम सिखाए गए ताकि वे आत्मनिर्भर हो सकें. सिर्फ मैं ही थी जिस ने 12वीं तक पढ़ाई की. मेरी रुचि पढ़ाई में थी और मेरे मार्क्स व लगन देख कर मानसी चाची ने मुझे आगे पढ़ने दिया. अनाथालय में जो कुटीर उद्योग चलते थे उस से अनाथालय की थोड़ीबहुत कमाई भी होती थी. अनाथालय की सारी लड़कियां मेरी पढ़ाई के पक्ष में थीं और इस कमाई में से कुछ हिस्सा मेरी पढ़ाई के लिए मिलने लगा. मेरी भी जिम्मेदारी बढ़ गई. सब को मुझ से बहुत उम्मीदें हैं. मुझे उन लोगों के सपने पूरे करने हैं जिन्होंने न तो मुझे जन्म दिया है और न ही उन से कोई रिश्ता है. अपनों के लिए तो सभी करते हैं, जो परायों के लिए करे वही महान होता है. चूंकि साइंस की पढ़ाई काफी खर्चीली थी, सो मैं ने आर्ट्स का चुनाव किया, बीए किया, फिर इतिहास में एमए किया. फिर एक दिन अचानक इस लैक्चरर की पोस्ट के लिए इंटरव्यू कौल आई. वही इंटरव्यू देने पुणे गई थी.’’

‘‘फिर सैलेक्शन हो गया आप का?’’ अधीरता से सिद्धार्थ ने पूछा. जानकी ने बताया, ‘‘हां, 15 दिन में जौइन करना है.’’  इसी तरह से राजनीति, फिल्मों, बाजार आदि पर बातचीत करते समय कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला. लगभग 2:30 बजे जानकी की गाड़ी की घोषणा हुई. इन 5-6 घंटों की मुलाकात में दोनों ने एकदूसरे को इतना जान लिया था जैसे बरसों की पहचान हो. जानकी के जाने का समय हो चुका था लेकिन सिद्धार्थ उस का फोन नंबर लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. बस, इतना ही बोल पाया, ‘‘जानकीजी, पता नहीं लाइफ में फिर कभी हम मिलें न मिलें, लेकिन आप से मिल कर बहुत अच्छा लगा. आप के साथ बिताए ये 5-6 घंटे मेरे लिए प्रेरणा के स्रोत रहेंगे. मैं ने आज आप से बहुत कुछ सीखा है.’’

‘‘अरे भई, मैं इतनी भी महान नहीं हूं कि किसी की प्रेरणास्रोत बन सकूं. हो सकता है कि दुनिया में ऐसे भी लोग होंगे जो मुझ से भी खराब स्थिति में हों. मैं तो खुद अच्छा महसूस करती हूं कि जिन से मेरा कोई खून का रिश्ता नहीं है, उन्होंने मेरे जीवन को संवारा है. आप सर्वसाधन संपन्न हो कर भी अपनेआप को इतना बेचारा समझते हैं. मैं आप से यही कहना चाहूंगी कि जो हम से बेहतर हालात में रहते हैं, उन से प्रेरणा लो और जो हम से बेहतर हालात में रहते हैं, उन तक पहुंचने की कोशिश करो. यह मान कर चलना चाहिए कि जो हो रहा है, सब किसी एक की मरजी से हो रहा है और वह कभी किसी का गलत नहीं कर सकता. बस, हम ही ये बात समझ नहीं पाते. एनी वे, मैं चलती हूं, गुड बाय,’’ कह कर जानकी ने अपना बैग उठाया और जाने लगी. सिद्धार्थ ने सोचा ट्रेन तक ही सही कुछ समय और मिल जाएगा जानकी के साथ. और वह उस के पीछेपीछे दौड़ा. बोला, ‘‘जानकीजी, मैं आप को ट्रेन तक छोड़ देता हूं.’’

जानकी ने थोड़ी नानुकुर की लेकिन सिद्धार्थ की जिद पर उस ने अपना बैग उस के हाथ में दे दिया. जल्द ही ट्रेन प्लेटफौर्म पर आ गई और जानकी चली गई. सिद्धार्थ के लिए वक्त जैसे थम सा गया. जानकी से कोई जानपहचान नहीं, कोई दोस्ती नहीं, लेकिन एक अजीब सा रिश्ता बन गया था. पिछले 5-6 घंटों में उस ने अपने ?अंदर जितनी ऊर्जा महसूस की थी, अब उतना ही कमजोर महसूस कर रहाथा. भारी मन से वह वापस प्रतीक्षालय लौट आया. अब उस के लिए समय काटना बहुत मुश्किल हो गया था. जानकी का खयाल उस के दिमाग से एक मिनट के लिए भी जा नहीं रहा था. रहरह कर उसे जानकी की बातें याद आ रही थीं. अब उसे एहसास हो रहा था कि वह आज तक कितना गलत था. इतना साधन संपन्न होने के बाद भी वह कितना गरीब था. आज अचानक ही वह खुद को काफी शांत और सुलझा हुआ महसूस कर रहा था. उस के मातापिता ने आज तक जो कुछ उस के लिए किया था उस का महत्त्व उसे अब समझ में आ रहा था. उसे लगा, सच ही तो है कि पिता के व्यवसाय को बेटा आगे नहीं बढ़ाएगा तो उस के पिता की सारी मेहनत बरबाद हो जाएगी. लोग पहली सीढ़ी से शुरू करते हैं, उसे तो सीधे मंजिल ही मिल गई है. कितनी मुश्किलें हैं दुनिया में और वह खुद को बेचारा समझता था. वह आत्मग्लानि के सागर में गोते लगा रहा था. बारबार मन स्वयं को धिक्कार रहा था कि आज तक मैं ने क्याक्या खो दिया. मन विचारमग्न था तभी अगली गाड़ी की घोषणा हुई, जिस से सिद्धार्थ को पुणे जाना था.

अगले दिन सिद्धार्थ पुणे पहुंच गया. रात जाग कर काटी थी. अब काफी थकान महसूस हो रही थी और नींद न होने से भारीपन भी. जब घर पहुंचा तो पिताजी औफिस जा चुके थे. मां ने ही थोड़े हालचाल पूछे. नहाधो कर सिद्धार्थ ने खाना खाया और सो गया. जब जागा तो डैड, जो अब उस के लिए पापा हो गए थे, वापस आ चुके थे. नींद खुलते ही सिद्धार्थ के दिमाग में वही प्रतीक्षालय और जानकी घूमने लगे. रात को तीनों साथ बैठे. सिद्धार्थ के हावभाव बदले हुए थे. मातापिता को लगा सफर की थकान है. जो सैंपल सिद्धार्थ लाया था उस ने वह पापा को दिखाए और काफी लगन से उन की गुणवत्ता पर चर्चा करने लगा. वह क्या बोल रहा था, इस पर पापा का ध्यान ही नहीं था, वे तो विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि ये सब बातें सिद्धार्थ बोल रहा है जिसे उन के व्यवसाय में रत्ती भर भी रुचि नहीं है.

सिद्धार्थ बातों में इतना तल्लीन था कि समझ नहीं पाया कि पापा उसे निहार रहे हैं. रात का खाना खा कर वह फिर सोने चला गया. मातापिता दोनों ने इतने कम समय में सिद्धार्थ में बदलाव महसूस किया लेकिन कारण समझ नहीं सके. सिद्धार्थ के स्वभाव को जानते हुए उन के लिए इसे बदलाव समझना असंभव था.     

एलोपेसिया ग्रसित महिला का मजाक पड़ा महंगा

हौलीवुड के सुपरस्टार विल स्मिथ की इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है. इस की वजह खुद विल स्मिथ हैं जिन्होंने इस साल औस्कर फंक्शन के दौरान कौमेडियन और होस्ट क्रिस रौक को जोरदार थप्पड़ जड़ दिया क्योंकि उन्होंने विल स्मिथ की पत्नी जाडा पिंकेट स्मिथ, जो एलोपेसिया एरिएटा की शिकार है, को ले कर कुछ अभद्र मजाक किया. जिसे सुनते ही विल स्मिथ को गुस्सा आया और उन्होंने स्टेज पर क्रिस रौक को थप्पड़ जड़ दिया.

अपनी पत्नी के लिए इस तरह की ऐक्सेप्टेंस शायद विश्व में उन पुरुषों के लिए सीख है जो एलोपेसिया के शिकार अपनी पत्नी या गर्लफ्रैंड को नहीं अपनाते, उन्हें तलाक दे देते हैं या फिर उन से कोई संबंध नहीं रखते. हमारे देश में एलोपेसिया की शिकार महिलाओं या लड़कियों के लिए चुड़ैल, डायन, अपशगुनी आदि न जाने कितने शब्दों का प्रयोग किया जाता है जिन से व्यक्ति मानसिक रूप से पीडि़त हो कर आत्महत्या तक कर लेते हैं.

महसूस करती हूं गर्व

इस बारे में एलोपेसिया की शिकार केतकी जानी कहती हैं, ‘‘मैं विल स्मिथ की पत्नी के प्रति उन के पति की इस ऐक्सेप्टेंस को देख कर बहुत खुश हूं और औस्कर अवार्ड में एलोपेसिया या गंजेपन को ले कर मजाक करने की जो गलती क्रिस रौक्स ने की है उस का उन्हें सही जवाब मिल गया है और इस की गूंज पूरे विश्व में रहनी चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति एलोपेसिया के शिकार को पब्लिक प्लेटफौर्म पर भलाबुरा कहने की जुर्रत न करे.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘मु?ो जब से एलोपेसिया हुआ है, मेरे पति मु?ा से दूर रहने लगे हैं. मैं ने कई बार आत्महत्या की कोशिश की थी पर अपने बच्चों की वजह से मैं ने ऐसा नहीं किया. गर्व के साथ आगे आई और कई ब्यूटी अवार्ड जीती. मेरी दशा ऐसी हुई थी कि लोग मु?ो किसी शादीब्याह में जाने नहीं देते थे. मेरा चेहरा अगर सुबह उठ कर कोई देख ले तो उस का पूरा दिन खराब हो जाएगा, ऐसा वे कहते थे. इसलिए मु?ो औफिस टाइम में घर पर रहना या फिर सुबह जल्दी उठ कर औफिस जाना पड़ता था.’’

वे कहती हैं, ‘‘कुछ लोगों ने मु?ो इतना तक कहा है कि तुम कितनी बदनसीब हो, पति के होते हुए भी बाल चले गए. अभी मैं अपने बच्चों के साथ रहती हूं. पति ने पहले मु?ो विग पहनने की सलाह दी थी, पर मु?ो वह ठीक नहीं लगा, क्योंकि उस से गरमी अधिक लगती है और मैं बिना हेयर के अपनी जिंदगी से खुश हूं. शुरुआत में खुद को आईने में देखना बहुत मुश्किल था क्योंकि मेरे बाल पहले लंबे थे, लेकिन अब पूरी तरह से ?ाड़ चुके हैं.’’

तिरस्कृत हुई परिवार, समाज और धर्म द्वारा

केतकी जानी कहती हैं, ‘‘हमारे देश में किसी महिला के सिर पर केश न होने से पूरे घरपरिवार के लिए शर्म की बात होती है. सब उस का मजाक और तिरस्कार करते हैं. हमारे समाज में लोग सोचते हैं कि इस रोग से पीडि़त को शर्म से डूब मरना चाहिए या फिर घर के किसी कोने में चुपचाप विग, स्कार्फ और कैप लगा कर जिंदा रहना चाहिए, जो बहुत गलत है.’’

‘‘मैं पूरे एलोपेसिया ग्रुप के रोगियों को सपोर्ट देती हूं क्योंकि ऐसे बहुत बच्चे और महिलाएं हैं जिन्हें हमेशा तिरस्कृत होना पड़ता है. मेरे गु्रप में करोब सौ एलोपेसिया के मरीज हैं. स्कूल में पढ़ने वाले 13 साल के एक बच्चे को टीचर अलग बैठाती हैं. वह बच्चा हमेशा सहमासहमा रहता है. उस से कोई बात नहीं करता और खेलता तक नहीं है. कई बार वह घर पर आ कर रोता है. मैं उसे काउंसलिंग करती हूं.’’

क्या है एलोपेसिया

मुंबई की डर्मेटोलौजिस्ट डा. अप्रतिम गोयल कहती हैं, ‘‘एलोपेसिया के मरीज के साथ हमेशा ऐसा होता आया है, समाज और परिवार उन्हें ऐक्सैप्ट नहीं करना चाहते. असल में यह एक औटोइम्यून डिजीज है, जो कभी भी किसी को हो सकती है. इस में शरीर का इम्यून सिस्टम और सफेद रक्त कोशिकाएं, जिन का काम बीमारियों से लड़ना है, हेयर फौलिक्स पर ही हमला करने लगती हैं. इस की वजह से बाल तेजी से गिरने लगते हैं. कई मरीजों में सिर के कुछ हिस्सों से भी धब्बों की तरह बाल गायब होने लगते हैं. मेरे हिसाब से विल स्मिथ की पत्नी को ओफियासिस एलोपेसिया हुआ है, जिस का इलाज संभव नहीं होता.

‘‘इस के होने की वजह का कुछ खास पता नहीं चला है, लेकिन यह छूने से नहीं फैलती. यह बीमारी महिलाओं से अधिक पुरुषों को होती है. एलोपेसिया को सम?ाना आसान नहीं होता क्योंकि इस के कुछ खास लक्षण नहीं होते. अधिकतर लोगों को स्ट्रैस या किसी बीमारी की वजह से बाल ?ाड़ते हैं और वे इसे नौर्मल सम?ाते हैं. इस वजह से इसे रोकना नामुमकिन सा होता है क्योंकि यह बहुत जल्दी सक्रिय होती है और यह जेनेटिक भी हो सकती है.

‘‘यह बीमारी अधिकतर थायराइड, अस्थमा, मायस्थीनिया ग्रेविस आदि के मरीज में होने की संभावना अधिक होती है. एक हफ्ते में ही इस के पैच आने लगते हैं. यह मनोवैज्ञानिक तौर पर भी ग्रसित व्यक्ति को प्रभावित करती है. इस का इलाज आसान नहीं, लेकिन 30 प्रतिशत केसेज में बाल फिर से बिना इलाज के आ जाते हैं. लेकिन यह अनप्रेडिक्टिबल है.’’

एलोपेसिया कई प्रकार के होते हैं जो निम्न हैं

  • एलोपेसिया एरीएटा में सिर के सारे बाल गुच्छों में पैचेस बनाते हुए ?ाड़ते हैं, एक पैच भी हो सकता है या फिर छोटेछोटे पैचेस मिल कर पूरा गंजा भी कर सकते हैं.
  • एलोपेसिया एरिएटा से कई बार एलोपेसिया टोटालिस भी हो सकता है.
  • एलोपेसिया यूनिवर्सलिस में सिर के ही नहीं, बल्कि पूरे शरीर से बाल ?ाड़ जाते हैं.

इलाज

इस का कोई सही इलाज न होने की वजह से स्टेरौयड या कैंसर की दवाई देनी पड़ती है, जिस के साइड इफैक्ट बहुत अधिक और इफैक्ट कम होते हैं.

छुटकारा- भाग 3: पैंतरा पत्नी का

उस रात 10 बजे के करीब मयंक ने ममता को फोन किया. डर और घबराहट के कारण उस की आवाज कांप रही थी.

‘‘रितु ने खुद को बैडरूम में बंद कर लिया है. वो सिर्फ रोए जा रही है. अब तुम ही आ कर उसे समझाओ…’’ मयंक ने घबराए स्वर में उस से गुजारिश की.

‘‘क्यों रो रही है वो?’’

‘‘गुस्से में आ कर मैं ने उस पर हाथ उठा दिया था.’’

‘‘मेरे बारबार समझाने के बावजूद भी तुम ने ऐसी बेवकूफी क्यों की?’’

‘‘ये सब बातें बाद में भी हो सकती हैं. तुम जल्दी से यहां आ कर उसे…’’

‘‘मैं नहीं आ रही हूंमयंक. उस पागल ने अगर अपनी जान लेने की कोशिश कीतो मैं भी बेकार के झंझट में फंस जाऊंगी. जब तक उसे समझा ना लोतुम भी मुझ से दूर ही रहना,’’ बेहद चिंता से भरी ममता ने झटके से अपना फोन काटने के बाद उसे स्विच औफ भी कर दिया था.

उस रात रितु ने शयनकक्ष का दरवाजा तो घंटेभर बाद खोल दियापर उस की नाराजगी के चलते मयंक को ड्राइंगरूम में सोना पड़ा. रातभर ममता और मयंक दोनों ही ढंग से सो नहीं सकेपर रितु के खर्राटों की आवाज मयंक ने रात मेें कई बार सुनी थी.

अगले दिन शाम को ममता औफिस से घर लौटीतो उस ने कुछ दूरी से रितु को अपने घर की सीढ़ियों पर बैठे देख लिया. उस का सामना करने की हिम्मत वो अपने अंदर नहीं जुटा सकी और वापस घूम कर अपनी एक सहेली के घर चली गई.

जीएम से कह कर अगले दिन ही ममता ने मयंक के दूसरे विभाग में ट्रांसफर के और्डर निकलवा दिए. उस ने मयंक से मिलनाजुलना भी बंद कर दिया.

मयंक ने जब शाम को अपने ट्रांसफर की खबर रितु को सुनाईतो उस ने गहरी सांस खींचते हुए कहा, ‘‘अब मेरा मन शांत रह पाएगा.’’

‘‘अब तो उस औरत का फोन आने से तुम परेशान नहीं होगी?’’ मयंक ने उसे छाती से लगा कर सवाल पूछा.

रितु ने उस की आंखों में गहराई से झांका और एक रहस्यमयी सी मुसकान होंठों पर सजा कर बोली, ‘‘मैं अतीत को महत्व नहीं देती हूंजनाब. हमें तो बस एक ही बात का ध्यान रखना होगा.’’

‘‘किस बात का…?’’

‘‘अपने ड्राइंगरूम में हमें धीरे बोलना चाहिए. इस खिड़की के पास बाहर खड़ा हुआ इनसान अंदर की सारी बात सुन सकता है.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं…’’

‘‘देरसवेर समझ जाओगेजी. अभी तो मैं आप को आप का मनपसंद सूजी का हलवा बना कर खिलाती हूं,’’ रितु ने उस के गाल पर एक छोटा सा चुंबन अंकित किया और प्रसन्न अंदाज में रसोई की तरफ बढ़ गई.

कुछ दिन पहले ड्राइंगरूम की खिड़की के बाहर खड़े हो कर उस ने मयंक और समीर के बीच हुई बातचीत को सुन लिया था.

‘‘रितु के पास सोने का दिल हैसमीर. मैं उस के साथ बेवफाई नहीं कर सकता हूं. मेरी नौकरी जाए तो जाएपर मैं ममता के साथ अब कभी नहीं सोऊंगा,’’ मयंक की इस बात को सुनरितु ने अपनी सारी नाराजगी को भुला कर उस की सहायता करने का फैसला किया था.

मयंक के कैरियर को नुकसान पहुंचाए बिना उस ने ममता के चंगुल से उसे छुटकारा दिला दिया था. योजना बना कर उस ने ममता की सुखशांति को नष्ट कर दिया था. उस ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी कि उस से दूर रहने के लिए ममता ने मयंक को अपने से दूर करने का फैसला खुद ही कर लिया था.

आस्था का व्यापार

रमेश बाबू ने दफ्तर में घुसते ही सब को ताजा खबर यों सुनाई, ‘‘नरेंद्र को उस के बीवी-बच्चों ने घर से निकाल दिया.’’

‘‘3 दिन से दफ्तर भी नहीं आया,’’ राजेश ने बात आगे बढ़ाई.‘‘यह तो होना ही  था. गलत काम का परिणाम भी गलत ही होता है,’’ सुनील ने अपना ज्ञान प्रदर्शित किया.

‘‘आजकल नरेंद्र कहां रह रहा है?’’ सब ने एक स्वर में जिज्ञासा प्रकट की.‘‘रहेगा कहां? सुनने में आया है कि वह आजकल एक ब्राह्मणी के चक्कर में था. उसी के यहां रह रहा है.  त्रिपाठी का पड़ोसी बता रहा था कि उसी विधवा ब्राह्मणी के कारण घर में झगड़ा हुआ.’’‘‘यार, नरेंद्र ने तो हद ही कर दी, घर में जवान बेटेबहू होते हुए यह सब क्या अच्छा लगता है?’’ जितने मुंह उतनी बातें.

मैं अपनी फाइलों में सिर गड़ाए सब की बातें सुन रहा था. मुझे उन की बातों से जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ. मैं तो बहुत पहले से उस की करतूतों से परिचित था. शर्मा, ये लोग तो दफ्तर में बहुत बाद में आए. मैं ने और नरेंद्र ने बहुत लंबा समय साथसाथ बिताया है.

उन सब की बातें सुन कर मैं अतीत में खो गया.तब मैं दफ्तर में नयानया आया था. कम उम्र, अनुभव शून्य. मैं बड़ा घबराया सा रहता था. काम में गलतियां होना आम बात थी. उस समय दफ्तर में 4-5 लोग ही थे. 3 बाबू, 1 बड़े बाबू तथा 1 चपरासी. तब नरेंद्र ने मुझे काम करना सिखाया. मुझ में आत्मविश्वास जगाया. तभी से मैं उन का सम्मान करने लगा.

कई बार वे मुझे अपने घर भी ले गए. बहुत ही साधारण रहनसहन था उन का. बिलकुल एक दफ्तर के बाबू की तरह. पूरे महीने काम करने पर जो तनख्वाह मिलती थी, वह सैकड़े में ही होती थी. आजकल की तरह उस समय वेतन हजारों में कहां मिलता था? खींचतान कर महीना पूरा होता था. उस समय दफ्तरों के बाबुओं की स्थिति बड़ी दयनीय थी. नरेंद्रजी का बड़ा परिवार था. सब बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना तो दूर रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी कठिन था. उन के 2 लड़के 10वीं पास कर के दुकानों में नौकरी करने लगे थे. जवान लड़की दहेज के अभाव के कारण घर में कुंआरी बैठी थी. उन्हीं दिनों नरेंद्रजी के रहनसहन में एक बदलाव दिखा. वे पैंटशर्ट के स्थान पर धोतीकुरता पहन कर दफ्तर आने लगे. माथे पर बड़ा सा चंदन का टीका लगाए रखते. पूछने पर कहने लगे, ‘हमारे घर के पास ही एक पुजारीजी का?घर है. वे वृद्ध हैं, अत: सुबह उठ कर उन की मदद कर देता हूं तो वे मुझे प्रेम से यह टीका लगा देते हैं. इस में मेरा भी लाभ है, उन का भी लाभ है.’ इतना बता कर वे मुसकराने लगे.

इस के बाद से ही धीरेधीरे उन के विषय में कई समाचार छनछन कर दफ्तर में आने लगे. वे अधिकतर अवकाश पर रहने लगे. कोई आ कर बताता कि नरेंद्रजी पुजारी के घर के मालिक बन गए हैं. कभी सुनने में आता कि बूढ़ा पुजारी लापता हो गया है. जितने मुंह उतनी बातें.

कई दिन बाद नरेंद्रजी दफ्तर आए. बड़े थकेथके से लग रहे थे. पूछने पर कहने लगे, ‘पुजारीजी बीमार हो गए. उन्हीं की सेवाटहल में लगा हुआ था. पिछले सप्ताह उन की मृत्यु हो गई. मृत्यु से पूर्व उन्होंने मंदिर की सारी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर डाल दी.

‘अब तो जैसे भी होगा मुझे ही यह कार्य संभालना है. इसी कारण दफ्तर नहीं आ पाया. कुछ भी समझ में नहीं आ पा रहा है कि दफ्तर एवं मंदिर दोनों का काम कैसे संभाल पाऊंगा.’

‘सब संभल जाएगा आप परेशान न हो,’ मैं ने उन्हें सांत्वना दी. ऐसे ही कई माह बीत गए. एक दिन सुनील ने आ कर बताया, ‘यार, यह नरेंद्र बड़ा चमत्कारी निकला. मंदिर में तो रौनक लगी ही रहती है. मंदिर के आसपास ‘मंगल बाजार’ लगने लगा है. बाजार का सारा नियंत्रण नरेंद्र के हाथ में है. वे दुकानदारों से कमीशन वसूलते हैं. पैसा बरस रहा है.’

कोई समाचार लाता, ‘अरे, पुजारी अपनी मौत थोड़े ही मरा है. उसे तो नरेंद्र ने कागजों पर अंगूठा लगवा कर मार डाला.’

क्या सच है, क्या झूठ, कुछ समझ में नहीं आ रहा था. जितने मुंह उतनी बातें.

एक दिन रास्ते से पकड़ कर नरेंद्रजी मुझे मंदिर ले गए और पूरा मंदिर दिखाया. मंदिर परिसर में पुजारी का आवास देख कर मैं चकित रह गया. पांचसितारा होटलों वाली सभी सुविधाएं वहां मौजूद थीं. वहां का वैभव देख कर मुझे जरा भी संशय नहीं रहा कि दफ्तर के लोग झूठी अफवाएं फैला रहे हैं. ‘करोड़ों की संपत्ति क्या कभी सही रास्ते से प्राप्त होती है?’ मैं भी सोचने लगा.

सोने की मोटी चेन, सिल्क का कुरतापाजामा, पशमीना शाल और माथे पर लाल चंदन का तिलक. इसी वेशभूषा में अब नरेंद्रजी नजर आते थे. पत्नी भी सोने के भारीभारी गहने पहन कर सुबहशाम 108 दीपकों की आरती करती. साथ में प्रसाद का थाल लिए बच्चे, भक्तों की भीड़ को संभाल रहे होते. हनुमान की असीम कृपा चढ़ावे के रूप में नरेंद्रजी के आंगन में बरस रही थी.

उन के दोनों बेटों की पत्नियां संपन्न परिवारों से आई थीं. 8वीं पास पुत्री का विवाह बनारस के संपन्न कर्मकांडी ब्राह्मण के इंजीनियर लड़के से हो गया था. बड़ा सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा था उन का परिवार.

एक दिन दफ्तर आ कर नरेंद्रजी कहने लगे, अंगरेजी में एक विज्ञापन का मसौदा बना दो. जैसा प्राय: दक्षिण भारत के मंदिरों का इधर के अखबारों में छपता है : भगवान के चरणों में दक्षिणा भेजिए, दुखों से मुक्ति पाइए. बदले में मनीआर्डर प्राप्त होने पर कष्टों से मुक्ति के लिए भगवान के श्रीचरणों का प्रसाद एवं भभूति पार्सल द्वारा भेजी जाएगी. इस प्रकार का विज्ञापन लिखने को उन्होंने मुझ से कहा. मैं ने उन के निर्देशानुसार विज्ञापन का प्रारूप तैयार कर के उन्हें दे दिया.

जल्द ही उन का विज्ञापन दक्षिण भारत के अखबारों में छपने लगा. परिणामस्वरूप 100, 200 एवं 500 रुपए के मनीआर्डर प्राप्त होने लगे. आशीर्वाद स्वरूप नरेंद्रजी बजरंगबली का लाल चोला, सिंदूर, भक्तों को प्रसाद भिजवाने लगे. पूरी रात बैठ कर परिवार के लोग प्रसाद के पैकेट बनाते. हजारों की संख्या में मनीआर्डर आ रहे थे, उसी अनुपात में प्रसाद भेजा जा रहा था. जैसी दक्षिणा वैसा प्रसाद.

वे प्राय: मुझ से कहते कि इनसान को धोखा देना कितना सरल है. दुनिया में दुखी इनसान भरे पड़े हैं. हर दुखी व्यक्ति बस, एक बार मेरे झांसे में आ जाए, इस से ज्यादा की आवश्यकता नहीं है मुझे.

कई वर्ष तक उन का यह धंधा निर्बाध चलता रहा. आखिर में उन्होंने जब मनीआर्डर के बदले प्रसाद भेजना बंद कर दिया तब यह सिलसिला स्वत: ही बंद हो गया. उस समय तक वे अंधभक्तों को काफी लूट चुके थे.

नरेंद्रजी की बातें कभीकभी मुझे वितृष्णा से भर देतीं. मैं सोचता, ‘धर्म की आड़ में यह कैसा खेल खेला जा रहा है? आस्था के नाम पर लूटखसोट का व्यापार सदियों से चला आ रहा है. पाखंडी पंडेपुजारी बड़ी सफाई से इस खेल को खेल रहे हैं. दुखों में डूबा इनसान शांति पाने के लिए अपना सब कुछ लुटाने को तैयार रहता है. इसी का फायदा नरेंद्रजी जैसे अवसरवादी ब्राह्मण उठा रहे हैं.

नरेंद्रजी का रिटायरमैंट करीब आ रहा था. वे आजकल बहुत कम दफ्तर आते. उन्होंने अपने और भी काम फैला लिए थे. जैसे उन्होंने ब्राह्मणों की एक टीम बना ली थी जो घरघर जा कर पाठहवन आदि करवाते थे. तेरहवीं एवं बरसी पर जो दक्षिणा मिलती थी उस का बड़ा हिस्सा कमीशन के रूप में त्रिपाठीजी को मिलता था.

एक दिन दफ्तर में आ कर उन्होंने बताया कि उन्होंने जन्मपत्री बनाने का काम भी शुरू कर दिया है. कोई बनवाना चाहे तो बताना.

‘आप न तो संस्कृत जानते हैं न ज्योतिषशास्त्र, तब आप जन्मपत्री कैसे बना लेते हैं?’ मैं ने उत्सुकता से पूछा.

‘मैं एक ज्योतिषी से कमीशन पर जन्मपत्रियां बनवाता हूं. एक जन्मपत्री का 100 रुपए मुझे मिलता है. 25 रुपए पंडित को दे देता हूं. 4-5 जन्मपत्रियां हर रोज बनने के लिए आ जाती हैं. पूजापाठ के अन्य काम भी मंदिर के द्वारा ही आते हैं जो मैं अन्य ब्राह्मणों में बांट देता हूं. मेरा भी फायदा, उन का भी फायदा. है न फायदा ही फायदा,’ वे मुसकराने लगे.

उन की बातों से मैं स्तब्ध रह गया. इधर दफ्तर के लोग उन के निर्वासन को ले कर चर्चा करने में व्यस्त थे. मैं वर्तमान में लौट आया.

‘‘जिस विधवा ब्राह्मणी के कारण नरेंद्रजी घर से निकाले गए उस किस्से का ज्ञान मुझे बहुत पहले से था. वह विधवा और कोई नहीं, उन के परम मित्र की पत्नी है. यह बात भी नरेंद्रजी ने बहुत पहले मुझे बताई थी.

रघुवर दयाल मिश्र नाम था उन का. वे बहुत ही संपन्न परिवार से थे. संतानहीनता का दुख उन्हें चैन से न बैठने देता था. संतान के लिए क्या कुछ नहीं किया उन्होंने. पूजापाठ, तीर्थ, दानव्रत सभी कुछ कर चुके थे. संतान नहीं होनी थी, सो नहीं हुई. इसी दुख के कारण उन्होंने चारपाई पकड़ ली. बीमारी शारीरिक से अधिक मानसिक थी. कोई भी दवा कारगर नहीं हुई. रोग असाध्य हो गया जो उन की जान ले कर गया. उस समय नरेंद्रजी को मित्र की विधवा से बहुत सहानुभूति हुई. उन्हें सांत्वना देने वे प्राय: उन के घर जाते. सांत्वना कब आकर्षण में बदल गई, यह दोनों को ही बहुत बाद में पता चला.

दोस्त की पत्नी उन पर इतना विश्वास करने लगी कि उस ने अपना आलीशान मकान एवं जमाजमाया व्यवसाय नरेंद्रजी के नाम कर दिया. लोगों का क्या है वे तो यह भी कहने से नहीं चूके कि प्यार की आड़ में नरेंद्र ने विधवा को लूट लिया.

लोगों की बात गलत भी नहीं थी क्योंकि आजकल वे ज्यादातर उसी के घर पर रहते थे. पत्नी एवं बच्चों को उन का आचरण नागवार लगता था. आएदिन घर में कलह होती थी. उसी कलह का परिणाम था कि नरेंद्रजी को घर से निकाला गया. दरअसल, कोई भी स्त्री पति के सौ अपराध माफ कर सकती है पर अपने प्रति की गई उस की बेवफाई नहीं सह सकती.

‘अब क्या होगा नरेंद्र का?’ यह प्रश्न दफ्तर में सभी की जबान पर था. मैं चूंकि उन के काफी करीब था इसलिए इस का आभास मुझे पहले से ही था. परिणति तो अब जा कर हुई है.

हर स्किन पर सूट करे सेंसीबायो जैल फेसवाश

बात अगर चेहरे की आए तो कोई भी महिला इससे कोम्प्रोमाईज़ नहीं करना चाहती . क्योंकि चेहरे की खूबसूरती हमारी ओवरआल सुंदरता को बढ़ाने का काम जो करती है. फिर चाहे हम कैसा भी आउटफिट पहन लें, वे हमारे चेहरे पर फब ही जाता है. लेकिन अगर चेहरा बेजान व डल है, वे हाइड्रेट नहीं है, तो चाहे आप कितना भी अच्छा मेकअप कर लें या फिर आउटफिट्स पहन लें, वे आप पर सूट ही नहीं करेगा . ऐसे में बस आप मन ही मन यही सोच कर परेशान रहती हैं कि फेस पर कौन सा ब्यूटी ट्रीटमेंट किया जाए या कौन सा ब्यूटी प्रोडक्ट लगाया जाए , जिससे चेहरा साफ भी हो जाए , साथ ही स्किन पर मोइस्चर भी बना रहे. ऐसे में बायोडर्मा का सेंसीबायो जैल moussant आपकी स्किन के लिए मैजिक का काम करेगा. तो आइए जानते हैं इस बारे में.

– जेंटल क्लीन योर स्किन

स्किन पर जितने हार्श प्रोडक्ट लगाए जाते हैं , उतना ही स्किन का मोइस्चर खत्म होने लगता है. लेकिन आज मार्केट में हमारे सामने इतने ज्यादा ब्यूटी प्रोडक्ट्स मौजूद हैं कि हमारी स्किन प्रोब्लम हमारे सामने होते हुए भी हम ब्यूटी प्रोडक्ट्स का चुनाव ठीक से नहीं कर पाते हैं. जिसका नतीजा स्किन डल होने के साथ अपनी नेचुरल ब्यूटी को भी खोने लगती है. ऐसे में बायोडर्मा का सेंसीबायो जैल moussant आपकी स्किन को जेंटली क्लीन करके स्किन को लंबे समय तक हाइड्रेट रखने का भी काम करता है. साथ ही सेंसिटिव स्किन के लिए भी काफी सूटेबल है. यानि इसे लगाने के बाद न तो स्किन पर किसी तरह की कोई जलन होती है और न ही आंखों में.

क्यों है खास

इसमें ऐसे खास इंग्रीडिएंट्स का इस्तेमाल किया गया है, जो स्किन प्रोब्लम्स को ठीक करके स्किन के लिए किसी न्यूट्रिशन से कम नहीं होते हैं , जिससे स्किन इसके कुछ ही अप्लाई के बाद महक उठती है. आपको बता दें कि इसमें विटामिन इ , विटामिन सी की मौजूदगी, जो स्किन के कोलेजन निर्माण में मदद करने के साथ स्किन को यंग दिखाने का काम करती है. साथ ही स्किन के हैल्थी बैक्टीरिया , जो एनवायरर्मेंटल डैमेज से स्किन को बचाने का काम करते हैं , ऐसे में इसमें प्रीबायोटिक स्किन को न्यूट्रिशन प्रदान करके स्किन को हैल्दी रखने में मदद करते हैं. साथ ही इसमें एंटीओक्सीडैंट्स आपकी स्किन को फ्री रेडिकल्स व यूवी किरणों से बचाने का काम करते हैं . ये पावरफुल एंटीएजिंग का भी काम करते हैं. ऐसे में इसमें वो सभी इंग्रीडिएंट्स मौजूद हैं , जो स्किन को बिना कोई नुकसान पहुंचाए स्किन की हैल्थ के लिए काफी अहम हैं. ये स्किन की एपरडर्मिस यानि आउटर लेयर को क्लीन करके दागधब्बो को भी कम करते हैं , साथ ही सीबम सेक्रेशन को सीमित करते हैं . इसका सोप फ्री फार्मूला स्किन के पीएच लेवल को बैलेंस में रखता है.

सेंसिटिव स्किन को क्यों है खास केयर की जरूरत

2019 में फ्रंटियर ओफ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, 60 – 70 पर्सेंट महिलाओं की स्किन सेंसिटिव होती है. जिसकी वजह से स्किन में रेडनेस, डॉयनेस, इचिंग की समस्या सबसे ज्यादा देखने को मिलती है. क्योंकि सेंसिटिव स्किन नाज़ुक होने के कारण पोलुशन , स्ट्रेस व मेकअप से खुद को बचाने में ज्यादा सक्षम नहीं होती है. और अगर ऐसी स्किन पर हार्श व केमिकल वाले प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल ज्यादा किया जाता है तो स्किन ड्राई होकर स्किन की हालत और खराब हो सकती है. ऐसी स्किन की माइल्ड ब्यूटी प्रोडक्ट्स से केयर करने की जरूरत होती है. ऐसे में ये माइल्ड जैल फेसवाश, जिसका सोप फ्री फार्मूला स्किन पर बिना कोई साइड इफ़ेक्ट दिए स्किन को स्मूद बनाने का काम करता है. इसकी खास बात यह है ये है कि ये स्किन से सिर्फ गंदगी को रिमूव करता है न कि स्किन के नेचुरल आयल को.

बता दें कि ये जैल moussant नोन कोमेडिक और फ्रैग्रैंस फ्री है. यानि ये पोर्स को क्लोग नहीं करता, साथ ही इससे स्किन पर किसी भी तरह की कोई एलर्जी , जलन नहीं होती है. इसे आप सुबह व शाम इस्तेमाल करके कुछ ही हफ्तों में अपने चेहरे पर बेहतरीन रिजल्ट देख सकते हैं. .

बौक्स मैटर डीएएफ काम्प्लेक्स

इसका डीएएफ काम्प्लेक्स , ऐसे एक्टिव इंग्रेडिएंट्स से मिलकर बना है, जो सेंसिटिव स्किन की टोलरैंस क्षमता को बढ़ाने का काम करते हैं. इसमें है कोको ग्लूकोसीडजैसा एक्टिव इंग्रीडिएंट , जो फोमिंग एजेंट का काम करने के साथ नेचुरल होता है. जो स्किन को किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है. यानि हर स्किन के लिए पूरी तरह से सेफ है.

इन बातों का भी रखें ख्याल

– हमेशा ऐसे ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करें जो जेंटल हो.

– स्किन की क्लींजिंग व मॉइस्चराइजिंग जरूर करें.

– स्किन की बाहर से केयर करने के साथसाथ स्किन को अंदर से भी हैल्दी बनाने के लिए विटामिन्स, मिनरल्स से भरपूर डाइट लें.

– सेंसिटिव स्किन वालों को स्किन को टॉवल से क्लीन करने के बजाह फेसिअल क्लीनिंग वाइप्स से स्किन को क्लीन करने की कोशिश करनी चाहिए.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें