Download App

Women’s Freedom : औरतों के लिए धर्म है दुश्मन

Women’s Freedom : अफगानिस्तान में 1 सितंबर, 2025 को नंगरहार और कुनार प्रांत में आए भूकंप के चलते तकरीबन 1,400 लोग मारे गए और लगभग 4 हजार लोग घायल हुए. इन में मर्दों की तुलना में औरतें ज्यादा थीं. कुछ स्रोतों के अनुसार इस भूकंप में मरने वाले लोगों में 1250 औरतें थीं और सिर्फ 150 मर्द थे.

भूकंप के बाद तुरंत पहुंचे बचाव दल में सिर्फ पुरुष थे. ये पुरुष भूकंप में घायल, भीतों के नीचे दबी हुई औरतों के लिए गैरमैहरम ही थे. बचाव दल के पुरुषों को शरिया की शर्त मालूम थी. शरिया की सख्त हिदायत थी कि किसी पराई स्त्री को नहीं छूना. बचाव दल ने भूकंप के मलबों से पुरुषों, किशोरों को तो निकाला मगर बच्चियों, महिलाओं को छोड़ दिया इसलिए कि क़ानूनन पराया शख्स किसी महिला को छू नहीं सकता.

भूकंप के वक़्त 90 प्रतिशत मर्द घरों से बाहर थे. भूकंप की खबर से मर्द इलाकों तक पहुंचे लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. कुछ औरतें मलबों के नीचे घुट कर दम तोड़ चुकी थीं तो कुछ औरतें अपनी बच्चियों को बचाने की खातिर खुद ही मलबों के ढेर को हटाने में लगी थीं.

‘द डेली मेल’ के अनुसार तालिबान शासन के तहत ‘नो स्किन कौन्टैक्ट’ नियम के कारण मलबे में दबी महिलाओं को बचाने में देरी हुई जिस से महिलाओं की मृत्यु दर बढ़ी.

यह वही अफगानिस्तान है जहां लड़कियों को 6वीं कक्षा के बाद पढ़ने की इजाजत नहीं है. बिना पुरुष साथी के महिला यात्रा नहीं कर सकती है. उन्हें नौकरी की इजाजत नहीं है. सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे को ढकना अनिवार्य है. राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पर रोक है. औरतों के लिए खेलना, नाचना और संगीत पर बैन है.

अफगानिस्तान एक उदाहरण है. जहां भी धर्म लोकतंत्र पर जीत हासिल करता है वहां सब से पहले औरतों को ही कंट्रोल किया जाता है. लोकतंत्र में औरत और मर्द बराबर होते हैं लेकिन धर्म हमेशा पितृसत्ता को मजबूती देता है जिस में औरतें दोयम दर्जे की नागरिक बन कर पुरुषों की गुलाम बन जाती हैं. यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि औरतों के लिए सभी धर्म लगभग एकजैसे ही हैं.  Women’s Freedom

Jannat Zubair : 50 मिलियन फैंस वाली इंस्टा सैंसेशन

Jannat Zubair : जन्नत जुबैर रहमानी वह हस्ती है जिस ने इंडियन टीवी और सोशल मीडिया दोनों पर अपनी खास जगह बनाई. बचपन से शुरू हुआ उस का ऐक्टिंग सफर आज ग्लैमर, पौपुलैरिटी और डिजिटल स्टारडम का परफैक्ट मिक्सचर बन चुका है. लेकिन जहां नाम और शोहरत है, वहीं कंट्रोवर्सी और चुनौतियां भी हैं.

“मेरे लिए काम सिर्फ कैरियर नहीं, एक पैशन है. हर रोल मुझे कुछ नया सिखाता है.” यह कहना है जन्नत जुबैर रहमानी का, जिस का टीवी की मासूम सी बच्ची से ले कर आज के सोशल मीडिया सेंसेशन तक का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं.

वर्ष 2009 में छोटे परदे पर डैब्यू करने वाली जन्नत ने बहुत जल्दी अपने टैलेंट से इंडस्ट्री में जगह बना ली थी. ‘फुलवा’ जैसे पौपुलर सीरियल से ले कर ‘क्या होगा निम्मो का’ और ‘तू आशिकी’ जैसे हिट शो तक, जन्नत ने साबित किया कि उम्र सिर्फ एक नंबर है, टैलेंट मायने रखता है.

29 अगस्त, 2001 को मुंबई में जन्मी जन्नत ने बहुत छोटी उम्र से ही ऐक्टिंग की दुनिया में कदम रख दिया था. उस का पहला टैलीविजन शो ‘दिल मिल गए’ (2009) था. लेकिन असली पहचान उसे 2011 में आए शो ‘फुलवा’ से मिली, जिस में उस की इनोसेंट ऐक्टिंग ने दर्शकों का दिल जीत लिया. इस के बाद उस ने ‘भारत का वीरपुत्र- महाराणा प्रताप’ और ‘तू आशिकी’ जैसे शोज में अपनी दमदार परफौर्मेंस से खुद को साबित किया. रिऐलिटी शो में भी उस ने हिस्सा लिया – ‘खतरों के खिलाड़ी 12’ (2022) में चौथी पोज़ीशन और ‘द ट्रेटर्स इंडिया’ (2025) में वह 8वीं पोजीशन पर रही.

हाल ही में उस ने ‘लाफ्टर शेफ्स’ सीजन 2 में एंट्री ली, जिस से शो की पौपुलैरिटी और बढ़ गई. टीवी के बाद जन्नत ने म्यूज़िक वीडियोज में भी इंट्री मारी. उस के कई हिट म्यूज़िक वीडियो आए हैं, जैसे इश्क फर्ज़ी, चाल गजब है, कायफा हालुका, बाबू शोना मोना, वतन याद रहेगा आदि.

उस के कई गाने यूट्यूब पर मिलियन्स में व्यूज पा चुके हैं. टिकटौक (बैन से पहले) पर उस की पौपुलैरिटी का लैवल इतना ऊंचा था कि वो इंडिया की टौप क्रिएटर्स में गिनी जाती थी. फैंस उस के फैशन, ब्यूटी और लाइफस्टाइल अपडेट्स को फौलो करते हैं. उस की सोशल मीडिया पौपुलैरिटी इतनी थी कि इंस्टाग्राम पर उस के 50 मिलियन यानी 5 करोड़ से अधिक फौलोअर्स हो गए. उसे सोशल मीडिया की नई क्वीन घोषित कर दिया गया, यहां तक कि शाहरुख खान को भी उस ने पीछे छोड़ दिया. उस के फौलोअर्स उसे सिर्फ एक ऐक्ट्रैस नहीं, बल्कि एक फैशन आइकन और यूथ मोटिवेटर भी मानते हैं.

यही वजह है कि वह ब्रैंड एंडोर्समैंट की दुनिया में भी बड़ी डिमांड में है.

जन्नत की इंस्टाग्राम कंटैंट स्ट्रेटेजी

जन्नत अकसर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जैसे मौर्निंग रूटीन, शौपिंग स्प्री, या फैमिली मोमैंट्स (भाईबहन के जोक्स, मां के ताने) को शेयर करती हैं जो उन के फौलोअर्स को ‘अपने जैसा’ महसूस करवाता है.

#ReelKarofeelKaro जैसे ट्रैंड्स में उन की सक्रिय भागीदारी मिलियंस व्यूज तक पहुंचती है. यह उन की वायरल पावर और जेनजी से जुड़ने की क्षमता दिखाती है.

उन के जीवन में परिवार का अहम रोल दिखता है. भाई आयान और मातापिता के साथ मिल कर बनाई गई मस्ती और प्यारभरी पोस्ट्स, जैसे ‘लिपस्टिक प्रैंक’ बहुत वायरल होती हैं और यूजर्स से इमोशनली जुड़ती हैं.

इंस्टाग्राम पर पोस्ट शेयर करते वक्त जन्नत सावधानी से कंटैंट का चुनाव करती हैं क्योंकि उन की औडियंस उम्र में युवा हैं. गलत जानकारी या व्यवहार से बचने के लिए वे जिम्मेदार तरीके से पोस्ट करती हैं.

जन्नत केवल उसी ब्रैंड के साथ कोलैब करती हैं जो उन के दर्शकों के लिए आसपास से जुड़ा और औथेंटिक लगे. यह उन की ब्रैंड स्ट्रेटेजी का अहम हिस्सा है.

मीडिया रिकौर्ड और सोशल स्ट्रैंथ

उन की रील्स अकसर लाखों में व्यूज लेती हैं जो उन्हें एक डिजिटल पावरहाउस बनाता है. उन्होंने गिनीज बुक औफ़ वर्ल्ड रिकौर्ड्स (सब से कम उम्र में 4 करोड़ फौलोअर्स पाने वाली) भी बनाया था.

हालांकि जन्नत के पास टैलेंट और पौपुलैरिटी दोनों हैं लेकिन हर स्टार के हिस्से में कुछ क्रिटिसिज़्म भी आते हैं. सोशल मीडिया पर ज्यादा ऐक्टिव रहने के कारण उन्हें ट्रोल्स और नैगेटिव कमैंट्स का भी सामना करना पड़ता है.

जन्नत पर कई बार ओवरब्रैंडिंग का आरोप लगता है क्योंकि उन का कंटैंट कई बार बहुत स्पौन्सर्ड और कम पर्सनल लगता है. जन्नत कई ब्रैंड्स के साथ एकसाथ जुड़ी रहती हैं जैसे नायका, मेबेलियोन, विवो, अमेजन आदि. यह ओवरप्रमोशन कभीकभी उन के फीड को कम पर्सनल और ज्यादा ‘शौपिंग कैटलोलौ’ जैसा बना देता है.

ओटीटी और फिल्म्स में उन के प्रोजैक्ट्स सीमित रहे हैं, जिस से कुछ लोगों का मानना है कि उन का टैलेंट पूरी तरह से एक्सप्लोर नहीं हो पा रहा. टीवी और फिल्मों में उन का रोल चयन अभी तक ज़्यादातर रोमांटिक या स्वीटगर्ल टाइप रहा है. क्रिटिक्स मानते हैं कि अगर वे ग्रे शेड या ज्यादा इंटेंस रोल ट्राई करें तो उन की ऐक्टिंग स्किल्स ज्यादा सामने आएंगी. रील्स में ट्रैंडिंग सौंग्स और ट्रांजिशन का इस्तेमाल ज्यादा होने से क्रिएटिविटी थोड़ी रिपिटेटिव लग सकती है. फैंस जो कुछ नया या एक्सपैरिमैंटल देखना चाहते हैं, उन के लिए यह थोड़ा बोरिंग हो सकता है.

जन्नत ज़ुबैर टैलेंटेड, पौपुलर और स्मार्ट ब्रैंड मैनेजर हैं, लेकिन अगर वे असली लाइफ कंटैंट और नए रोल चौइसेज पर ज्यादा ध्यान दें, ब्रैंड प्रमोशन को बैलेंस करें और क्रिएटिव रेंज बढ़ाएं तो वे सिर्फ सोशल मीडिया स्टार नहीं, बल्कि एक दमदार ऐक्ट्रेस व लंबे समय तक टिकने वाली पब्लिक फिगर बन सकती हैं.  Jannat Zubair

Family Story : तुम्हारे अपनों के लिए – क्या रिश्तों का यह तानाबाना यों ही उलझा रहा

Family Story : दिल्ली से भोपाल तक का सफर  बहुत लंबा नहीं है, लेकिन भैया से मिलने की चाह में श्रेया को वह रात काफी लंबी लगी थी. ज्यादा खुशी और दुख दोनों में ही आंखों से नींद उड़ जाती है. बस, वही हाल दिल्ली से भोपाल आते हुए श्रेया का होता है. नींद उस की आंखों से कोसों दूर भाग जाती है. रातभर अपनी बर्थ पर करवटें बदलते हुए वह हर स्टेशन पर झांक कर देखती है.

‘भोपाल आ तो नहीं गया?’

‘अभी कितनी दूर है?’

जैसेतैसे सफर खत्म हुआ और टे्रन भोपाल पहुंची. खिड़की से ही उसे भैया दिख गए. वे फोन पर बातें कर रहे थे. ट्रेन रुकते ही भैया लपक कर डब्बे में उस की बर्थ ढूंढ़ते हुए आ गए. श्रेया बड़े भैया से लिपट गई. उस की आंखें भीग गईं. उस के बड़े भाई श्रेयस की आंखें भी छोटी बहन को देखते ही छलक गईं.

दोनों स्टेशन से बाहर निकले और कार में बैठ कर घर की ओर चल दिए. श्रेया भाई से बातें करने के साथ ही एकएक सड़क और आसपास की हर एक घरदुकान को बड़े कुतूहल से देख रही थी. वह अकसर ही भाई के यहां आती रहती थी. जहां बचपन गुजरा हो उस जगह का मोह सब चीजों से ऊपर ही होता है. जल्दी ही कार उन के पुश्तैनी मकान के आगे रुकी. श्रेया ने नजरभर घर को देखा और भैया के साथ अंदर चली गई.

रसोई से श्रेया के पसंदीदा व्यंजनों की खुशबू आ रही थी. कार की आवाज सुनते ही उस की भाभी स्नेहा लपक कर बाहर आई.

‘‘भाभी, कैसी हो?’’ श्रेया भाभी स्नेह के गले में बांहें डाल कर झूल गई.

‘‘इतनी बड़ी हो गई पर अभी तक बचपना नहीं गया,’’ स्नेहा ने प्यार से उस का गाल थपथपाते हुए कहा.

‘‘मैं कितनी भी बड़ी हो जाऊं मगर तुम्हारी तो बेटी ही रहूंगी न भाभी,’’ श्रेया ने लाड़ से कहा.

‘‘वह तो है. जा अपने कमरे में जा कर फ्रैश हो जा, मैं नाश्ता लगाती हूं,’’ स्नेहा बोली. श्रेया अपने कमरे में चली आई.

2 साल हो गए उस की शादी को लेकिन उस का कमरा आज भी बिलकुल वैसा का वैसा ही है. समय पर कमरे की सफाई हो जाती है. शादी के पहले की उस की जो भी चीजें, किताबें, सामान था सब ज्यों का त्यों करीने से रखा था. श्रेया का मन अपनी भाभी के लिए आदर से भर उठा. भैया उस से पूरे 10 साल बड़े थे. वह 12वीं में ही थी कि मां चल बसी. जल्दी ही पिताजी भी चले गए. भैयाभाभी ने ही उसे मांबाप का प्यार दिया और शादी की.

श्रेया बाहर आई तो टेबल पर नाश्ता लग चुका था. सारी चीजें उस की पसंद की बनी थीं, सूजी का हलवा, पनीर के पकौड़े व फ्रूट क्रीम नाश्ता करने के बाद तीनों बैठ कर बातें करने लगे.

दोपहर को श्रेया के दोनों भतीजे 7 साल का अंकुर और 4 साल का अंशु स्कूल से लौटे, तो बूआ को देख कर वे खुशी से उछल गए. श्रेया दोनों को साथ ले कर अपने कमरे में चली गई और उन के लिए लाई चीजें उन्हें दिखाने लगी.

रात को दोनों भतीजे श्रेया के साथ ही सोते थे. स्नेहा जब अपने काम निबटा कर कमरे में आई तो उस ने देखा कि श्रेयस तकिये से पीठ टिकाए बैठे हैं.

‘‘क्या बात है, किस चिंता में डूबे हुए हैं इतना?’’ स्नेहा ने पास बैठते हुए पूछा.

‘‘कुछ नहीं, बस, श्रेया के लिए ही परेशान हूं. उस का बारबार इस तरह यहां चले आना, ऐसा बचपना ठीक नहीं है,’’ श्रेयस ने चिंता जाहिर की.

‘‘अभी छोटी है, समझ जाएगी,’’ स्नेहा ने दिलासा दिया.

‘‘स्नेहा, अब इतनी छोटी भी नहीं रही वह. सारंग भी आखिर कब तक सहन करेगा. तुम समझाओ न उसे. तुम्हारे तो बहुत नजदीक है वह.’’

‘‘हां, नजदीक तो है लेकिन उस के साथ जो समस्या है उस विषय पर मेरा उस के साथ बात करना ठीक नहीं रहेगा. कुछ रिश्ते बहुत नाजुक डोर से बंधे होते हैं. इस बारे में तो आप ही उस से बात करना,’’ स्नेहा ने श्रेयस को समझाते हुए कहा.

‘‘शायद तुम ठीक कहती हो, मैं ही मौका देख कर बात करता हूं उस से,’’ श्रेयस ने कहा.

आंख बंद कर के वह पलंग पर लेट गया, लेकिन नींद तो आंखों से कोसों दूर थी. 2 साल हो गए श्रेया और सारंग की शादी को. सारंग बहुत अच्छा और समझदार लड़का है. श्रेया को प्यार भी बहुत करता है. दोनों ही एकदूसरे के साथ बहुत खुश थे. परंतु अपने वैवाहिक जीवन में श्रेया ने खुद ही समस्या खड़ी कर ली.

सारंग दिल्ली में एक मल्टीनैशनल कंपनी में उच्चपद पर आसीन है. उस के मातापिता उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर में रहते हैं. सारंग पढ़ाई में बहुत तेज था. वह दिल्ली में रह कर पढ़ा और वहीं जौब भी लग गई. भले ही उस का उठनाबैठना दिल्ली के उच्चवर्ग के साथ है, मगर वह खुद जमीन से जुड़ा हुआ है.

श्रेया अपने जीवन में बस, सारंग का साथ चाहती है. उसे सारंग की फैमिली, मातापिता, बहनजीजा सब बैकवर्ड लगते हैं. वह न तो उन लोगों का अपने घर आनाजाना पसंद करती है और न ही सारंग का वहां जाना उसे पसंद है. दीवाली पर भी श्रेया खुद तो अपनी ससुराल जाती नहीं है और सारंग को भी जाने नहीं देती. हर त्योहार वह चाहती है कि सारंग भोपाल आ कर मनाए. राखी व भाईदूज पर भी सारंग सालभर से घर नहीं जा पाया है. इस वजह से वह अंदर ही अंदर घुटता रहता है.

अब तो उस के घर वालों को भी श्रेया का स्वभाव समझ आ गया है इसलिए वे भी खुद उस से कटेकटे रहने लगे हैं. लेकिन सारंग बेचारा तो 2 पाटों के बीच पिस रहा है. वह श्रेया से भी बहुत प्यार करता है और अपने घर वालों से भी. उस के घर वाले इतने भले लोग हैं कि उन्होंने सारंग से यही कहा कि उन की चिंता वह न करे, बस, श्रेया को खुश रखे.

लेकिन श्रेया है कि खुश नहीं है. तब भी उसे यही लगता है कि सारंग उस से ज्यादा अपने घर वालों की परवा करता है. श्रेया से तो उसे प्यार है ही नहीं. सारंग के प्रति श्रेया यही सोच पाले बैठी है. मगर उसे यह समझ नहीं आता कि घर वालों से अलग रह कर सारंग गुमसुम सा क्यों न रहेगा. बस, उसे यही शिकायत है कि वह तो सारंग के लिए सबकुछ करती है, तब भी सारंग खुश नहीं है और वह उस की जरा भी कद्र नहीं करता.

आजकल श्रेया इसी दुख में जबतब भोपाल आ जाती है. श्रेयस को बहन का घर आना बुरा नहीं लगता, लेकिन वह अपने घर को उपेक्षित कर के और सारंग के प्रति मन में गांठ बांध कर आती है, वह ठीक नहीं है.

सारंग के आगे श्रेयस खुद को अपराधी महसूस करता है, क्योंकि उस की बहन की वजह से वह अपने मांबाप से दूर हो रहा है.

दूसरे दिन औफिस से आ कर जब  श्रेयस चाय पी चुका तो स्नेहा ने  उसे इशारा किया कि दोनों बच्चों को पार्क में ले जाने के बहाने एकांत में बैठ कर वह श्रेया से बात करे. श्रेयस दोनों बच्चों और श्रेया के साथ पार्क में चला आया. दोनों बच्चे आते ही दूसरे बच्चों के साथ खेलने और झूला झूलने में मगन हो गए. श्रेयस और श्रेया पास ही एक बैंच पर बैठ कर दोनों को देखने लगे.

‘‘सारंग से कुछ बात हुई? कैसा है वह?’’ श्रेयस ने बात शुरू की.

‘‘नहीं, कोई बात नहीं, कोई फोन नहीं. उसे मेरी फिक्र होती तो मुझे बारबार यहां भाग कर आने का मन क्यों होता.’’ श्रेया उदास हो गई.

‘‘ये भी तुम्हारा ही घर है. जब चाहो, जितनी भी बार चाहो, आ जाओ. लेकिन सारंग को तुम्हारी फिक्र नहीं है, ऐसी गलतफहमी मन में मत पालो, श्रेया.’’

‘‘तो आप ही बताइए, मुझे यहां आए 2 दिन हो गए हैं, एक बार भी उस का फोन नहीं आया. उस ने यह तक नहीं पूछा कि मैं पहुंच गई या नहीं. अब मैं और क्या सोचूं.’’ श्रेया बोली.

‘‘तो क्या तुम ने भी उसे मैसेज डाला या फोन किया कि तुम पहुंच गई. तुम भी तो कर सकती थी. और यह मत सोचो कि उसे तुम्हारी फिक्र नहीं है. कल तुम्हारी ट्रेन पहुंचने से पहले से ही उस के फोन आ रहे थे कि मैं स्टेशन पहुंचा या नहीं, तुम ठीक से पहुंच गई कि नहीं,’’ श्रेयस ने बताया, ‘‘तुम ही उसे गलत समझ रही हो.’’

‘‘मैं गलत नहीं समझ रही भैया. आप भाभी से कितने अटैच्ड हो, उन का हर कहा मानते हो. मगर सारंग को तो वह मुझ से लगाव है नहीं,’’ श्रेया की आवाज में उदासी थी.

‘‘रिश्तों में प्यार एकतरफा नहीं होता श्रेया, पाने से पहले हमें खुद देना पड़ता है. तुम सिर्फ लेना चाह रही हो, देना नहीं.’’

‘‘भैया, मैं क्या कमी करती हूं सारंग के लिए, उस के कपड़े धोना, उस का पसंदीदा खाना बनाना, उस का पूरा ध्यान रखती हूं और अब इस से ज्यादा क्या करूं?’’ श्रेया ने तुनक कर कहा.

‘‘शादी के बाद लड़की सिर्फ पति के साथ ही नहीं जुड़ती है, बल्कि उस के पूरे परिवार के साथ भी जुड़ती है. तुम्हारी समस्या यह है कि तुम परिवार के नाम पर सिर्फ और सिर्फ सारंग को ही चाहती हो, उस के घर वालों को अपनाना नहीं चाहती. तुम ने उस बेचारे को अनाथ बना कर रख दिया है. उसे उस के अपनों से अलगथलग कर दिया है. फिर तुम उम्मीद करती हो कि वह तुम से दिल से अटैच्ड रहे? तब भी वह अभी तक तो तुम से बहुत प्यार करता है श्रेया, लेकिन अगर तुम्हारा ऐसा ही रवैया रहा तो जल्दी ही वह तुम से दूर हो जाएगा,’’ श्रेयस ने उसे समझाते हुए कहा.

‘‘भैया, मैं ने सारंग से शादी की है, उस के बैकवर्ड घर वालों के साथ नहीं,’’ श्रेया की आवाज में अहं की झलक थी.

‘‘ऐसी मतलबी सोच रख कर चलने से रिश्ते नहीं निभाए जाते श्रेया,’’ श्रेयस की आवाज में बहन की सोच पर गहरा अफसोस छलक रहा था, ‘‘जीवनसाथी के दिल को जीतने के रास्ते बहुत सी राहों से गुजरते हैं, उन में सब से महत्त्वपूर्ण उस के अपने हैं. तुम सारंग के मन पर तभी राज कर सकती हो, जब उस के अपनों के मन को अपने प्यार से जीत लोगी.’’

‘‘मुझे किसी का मन जीतने की जरूरत नहीं है,’’ श्रेया रूखे स्वर में बोली.

‘‘फिर तो तुम बहुत जल्दी ही सारंग को खो दोगी और ताउम्र उस के प्यार के लिए तरसती रहोगी,’’ श्रेयस सख्ती से बोला, ‘‘अच्छा श्रेया, जैसा व्यवहार तुम सारंग के घर वालों के साथ करती हो, वैसे ही अवहेलना स्नेहा तुम्हारी करने लगे तो तब तुम्हें कैसा लगेगा?’’

‘‘भैया…’’ श्रेया अवाक हो कर उस का मुंह देखने लगी.

‘‘मैं सच बताऊं, मैं स्नेहा से क्यों इतना अटैच्ड हूं, क्यों उस पर इतना भरोसा करता हूं? क्योंकि वह तुम पर और मेरे बाकी अपनों पर जान छिड़कती है. मुझ से भी ज्यादा तुम सब से वह प्यार करती है. तुम जब भी आने वाली होती हो, वह अलार्म लगा कर सोती है ताकि तुम्हें स्टेशन लेने जाने में मुझे देरी न हो जाए. तुम्हारा कमरा भी पिछले 2 वर्षों से उसी की जिद से वैसा का वैसा रखा गया है ताकि तुम्हें कभी यह न लगे कि यहां किसी भी तरह से हम लोगों में या परिस्थितियों में फर्क आ गया है. तुम जब भी आओ, तुम्हें वही माहौल और घर मिले. उस की सोच भी तुम्हारी तरह होती तो क्या आज तुम बारबार यहां आ पाती, क्या मैं ही उस से इतना प्यार कर पाता?

‘‘जितना प्यार मैं स्नेहा से करता हूं श्रेया, बिना मांगे, बिना कहे उस ने उस से कहीं अधिक मुझे और मेरे अपनों को दिया है. तुम्हें तो फिर भी कुछ न दे कर बहुतकुछ मिल रहा है अब तक. अफसोस यह है कि तुम सिर्फ स्नेहा का प्राप्य देख रही हो पर अपनी छोटी सोच के चलते तुम यह देखना भूल गई कि उस ने इस घर में पैर रखते ही हम सब को कितना अधिक दिया है.

‘‘सारी जिम्मेदारियां उस ने कितनी कुशलता से निभाई हैं. औरत पति से पूरा लगाव, पूरी तवज्जुह चाहती है तो उसे भी पति के अपनों को पूरी तवज्जुह और प्यार देना आना चाहिए. स्नेहा ने यह बात समझी, तभी वह सब को साथ ले कर सब का प्यार, सम्मान और साथ पा रही है. मगर तुम ने…’’ एक गहरी सांस ले कर श्रेयस चुप हो गया.

अंधेरा घिरने लगा था. दोनों बच्चों को ले कर वे घर आ गए. दूसरे दिन चाय की ट्रे ले कर श्रेयस और स्नेहा गैलरी में आए तो देखा  श्रेया फोन पर बात कर रही थी. ‘‘न, न, अम्मा, कोई बहाना नहीं चलेगा. इस बार की दीवाली आप सब हमारे साथ ही मनाएंगे, बस.’’ अम्मा आगे कुछ बोलती उस से पहले श्रेया ने अम्मा की बात काटते हुए कहा, ‘‘इस बार मैं भैयाभाभी को भी अपने पास दिल्ली बुला लूंगी तो एकसाथ सब की भाईदूज एक ही जगह हो जाएगी और हां, गुड्डी से कहिए, लहंगा व पायल न खरीदे, मैं यहां ले कर रखूंगी.

‘‘और अम्मा, आते समय मेरे लिए मावे वाली गुझिया और अनरसे जरूर बना कर लाइएगा. मुझे आप के हाथ के बने बहुत पसंद हैं. अच्छा अम्मा रखती हूं, बाबूजी को प्रणाम कहिएगा. गुड्डी स्कूल से आ जाए, फिर शाम को उस से बात करती हूं.’’

स्नेहा और श्रेयस ने संतोषभरी मुसकान के साथ एकदूसरे की ओर देखा और दोनों की आंखें भीग गईं. अब श्रेया को सारंग से कभी कोई शिकायत नहीं होगी क्योंकि वह उस के अपनों का महत्त्व जान कर उन की कद्र करना सीख गई थी.  Family Story 

Social Story In Hindi : ब्लैकमेल -आखिर क्यों वह मीरा की छवि खराब करना चाहता था?

Social Story In Hindi : आज मीरा की शादी हो रही होती यदि उस के एक सहकर्मी ने उस की जिंदगी में जहर न घोल दिया होता. अपने मोबाइल पर कैलेंडर चैक करते हुए उस ने देखा, आज के दिन उस ने कैलेंडर में सैट कर रखा था,‘नए जीवन में प्रवेश.’ पर नए जीवन में प्रवेश का सपना सपना ही रह गया. और ऐसा हुआ एक सहकर्मी के कारण जिसे वह अपना करीबी दोस्त मानती थी. उस के मानस पटल पर सारी घटना चलचित्र की भांति आती चली गई…

मीरा के मोबाइल की घंटी बजी थी. उस ने मोबाइल उठा कर देखा था,‘आशीष कौलिंग…’

“हैलो, आशीष गुड मौर्निंग,” उस ने मोबाइल औन कर कहा.

“गुड मौर्निंग मीरा. कैसी हो?” आशीष ने पूछा. उस की आवाज में वह खनक नहीं थी जो हमेशा रहती थी.

“ठीक हूं, अपना बताओ. सुबहसुबह कौल किया रविवार के दिन? और तुम कुछ चिंतित मालूम हो रहे हो. सब खैरियत तो है न…”

“एक बैड न्यूज है,” आशीष ने चिंतित स्वर में कहा.

“क्या?” मीरा के मन में कई आशंकाएं जन्म ले चुकी थीं. कोई दुर्घटना हुई क्या, किसी की मौत हो गई क्या?”

“मेरे इंस्टाग्राम पर किसी ने तुम्हारी आईडी से तुम्हारा न्यूड फोटो भेजा है. कह नहीं सकता कि यह तुम्हारी फोटो है या फोटोशौप से बनाई गई. पर जिस ने भी भेजा है जरूर वह तुम्हारा अहित करने की फिराक में है और कई लोगों को इस तरह के फोटो भेज रहा होगा. पहले भी 1-2 लोग दबे स्वर में तुम्हारे अश्लील व्यवहार की बातें कर रहे थे. पहले तो मैं ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया पर इंस्टाग्राम पर तुम्हारे द्वारा भेजे गए अश्लील फोटो और संदेश से मैं समझ गया कि वे क्यों ऐसी बातें कर रहे थे. जरूर किसी ने तुम्हारा आईडी हैक किया है,” आशीष एक ही सांस में बोल गया.

“क्या? मुझे वह फोटो फौरवर्ड करो तो,” मीरा का दिल धक से रह गया.

सुना तो था उस ने कि लोगों के आईडी हैक कर सोशल मीडिया का दुरुपयोग किया जाता है पर कभी सोचा न था कि उस के साथ भी कभी ऐसा होगा.

“फोटो फौरवर्ड करने की आवश्यकता नहीं है, तुम अपना इंस्टाग्राम चैक करो, उस में सैंड मैसेज पर यह दिख जाएगा,“ आशीष ने कहा.

“मैं अभी चैक करती हूं, ”कह कर मीरा ने मोबाइल डिसकनैक्ट कर दिया.

मीरा सोशल मेडिया पर थी तो जरूर पर सक्रिय नहीं थी. उस की रुचि सोशल मीडिया में कुछ खास नहीं थी. कुछ ही पल में मीरा ने इंस्टाग्राम पर अपना आईडी चैक किया. कई लोगों के मैसेज पड़े थे उस पर. उस के आईडी से उस के कई परिचितों को उस का अश्लील फोटो भेजे गए थे. फोटो देख कर चौंक गई मीरा. यह निश्चित रूप से उस का फोटो नहीं था. किसी ने उस के चेहरे को किसी अश्लील चित्र के साथ जोड़ दिया था. पर किस ने और क्यों, वह समझ नहीं पाई.

फिर उस ने अपना फेसबुक खाता देखा. वहां भी यही स्थिति थी. कई ऐसे चैट थे जो उस ने किए ही नहीं थे. कई करीबी मित्रों ने चैट के जवाब में उसे सलाह भी दी थी कि उस का यह व्यवहार ठीक नहीं है और उस के लिए यह बड़ा ही विनाशकारी साबित होगा. पर कुछ ने काफी रस लिया था और जिस किसी ने हैक किया था उस के अकाउंट को उस ने भी वैसा ही जवाब उस की ओर से दिया था.

शाम तक एक और झटका लगा उसे जब उस के मंगेतर मनोज ने फोन कर बताया कि वह सगाई तोड़ रहा है. वह कुछ पूछ पाती इस से पहले ही उस ने फोन डिसकनैक्ट कर दिया. निश्चित रूप से यह इस अश्लील फोटो के कारण ही था. उस ने मनोज को समझाने के लिए फिर से फोन किया पर मनोज ने पहले तो फोन को डिसकनैक्ट कर दिया और बाद में उसे ब्लौक कर दिया.

इस का मतलब साफ है कि मनोज को भी किसी ने वह फोटो भेज दिया है. पर वह कौन हो सकता है? एकाएक उसे खयाल आया कि आज से 2 महीने पहले उस का सहकर्मी सुरेश ने उस से शादी का प्रस्ताव रखा था. सुरेश से उस की अच्छी बनती थी. वह उसे अपने दोस्त के रूप में देखती थी और बड़ी बेबाकी से उस के साथ पेश आती थी. औफिस में तो उस के साथ काम करती ही थी, कभीकभी बाहर कौफी पीने या स्नैक्स लेने भी जाया करती थी. पर वह सुरेश को सिर्फ और सिर्फ एक अच्छे सहकर्मी के रूप में देखती थी. शायद सुरेश के मन में उस के प्रति आकर्षण हो गया था. मजाक ही मजाक में वह कई बार उसे इशारा भी कर चुका था. पर वह उस के हर बात को मजाक में टाल दिया करती थी.

एक दिन सुरेश ने बड़ी ही गंभीरता से उस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा था. पहले हंसी थी मीरा. पर जब सुरेश को गंभीर देखा तो उस ने साफसाफ कहा था, “देखो सुरेश, मैं तुम्हें एक अच्छे सहकर्मी के रूप में देखती हूं. तुम्हारे साथ शादी के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती.”

“लेकिन क्यों? कितना खुश रहते हैं हम साथसाथ. और मैं वादा करता हूं कि तुम्हें हमेशा खुश रखूंगा,“ गंभीरतापूर्वक कहा था सुरेश ने.

“क्यों का कोई जवाब नहीं है मेरे पास. पर मित्रता और शादी 2 अलगअलग मामले हैं. मैं ने समझा था कि तुम मजाक कर रहे हो. पर मैं देख रही हूं कि तुम गंभीर हो. मैं भी पूरी गंभीरता के साथ कह रही हूं कि मैं तुम से शादी नहीं कर सकती. हां, दोस्त हम सदा के लिए रहेंगे.”

उस दिन के बाद सुरेश उस का दोस्त भी नहीं रह गया था. वह उस से दूरदूर रहने लगा था. पहले उस ने उसे समझाने की कोशिश की थी, पर जब सुरेश नहीं माना तो उस ने उसे अपनी जिंदगी से बाहर कर दिया. औफिस के काम से सिर्फ काम भर का संपर्क रह गया था उस से. पहले की तरह साथसाथ घूमना, हंसनाबोलना नहीं होता था. करीब 6 महीने बीत गए होंगे इस बात को.

नजदीकी पुलिस स्टेशन में जा कर मीरा ने रिपोर्ट लिखवाई थी और सुरेश पर संदेह जताया था. पुलिस ने जांच की तो पता चला कि उस ने ही किसी को पैसे दे कर उस के इंस्टाग्राम और फेसबुक खाते को हैक करवा कर उस की ओर से अश्लील फोटो और संदेश भेज दिया था, जिस के कारण न सिर्फ उस की बदनामी हुई थी बल्कि उस की सगाई भी टूट गई थी.

ऐसे भी सहकर्मी होते हैं दुनिया में जो साथसाथ काम करते हैं और अपनी बात नहीं मानने पर किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो जाते हैं. उस का जीवन तो उस ने बिगाड़ ही दिया है. खुद भी पुलिस से भागाभागा फिर रहा है. अपनी जिंदगी भी बिगाड़ ली है उस ने.

अपने मोबाइल के कैलेंडर से उस ने ‘नए जीवन में प्रवेश’ विवरण को डिलीट कर दिया और आह भर कर मोबाइल को एक ओर रख दिया. पर इतना ही काफी नहीं था. सुरेश को उस के किए की सजा मिलनी ही चाहिए और वह इस के लिए कोई न कोई उपाय जरूर करेगी. सब से पहला उपाय तो यह है कि पुलिस को उस का पता बताना होगा. सुरेश ने सोशल मीडिया के द्वारा उसे बदनाम किया है तो वह उसे उस के पुराने संबंध को आधार बना कर उसे पकड़वाएगी.

जब सुरेश से उस की दोस्ती थी तो वह उस के साथ सबकुछ शेयर करता था और उसे पता था कि अभी वह कहांकहां हो सकता है. उस ने आशीष को कौल किया, “आशीष, मेरी सहायता करो. मुझे अंदाजा है कि सुरेश अभी कहां हो सकता है. बस, तुम एक बार देखो वह उन स्थानों में से कहां छिपा है. जैसे ही पता चले मुझे फोन करना. मैं पुलिस को ले कर आऊंगी.”

“जरूर, जहां तक संभव होगा मैं सहायता करूंगा,” आशा के अनुसार आशीष ने कहा.

पहले 2 जगहों पर तो सुरेश नहीं मिला पर तीसरे जगह वह मौजूद था. वह स्थान उस का ननिहाल था. आशीष ने वहां से उसे फोन कर उसे बता दिया. मीरा ने पुलिस को जानकारी दी और आननफानन में सुरेश थाने में था. सुरेश अपने किए पर पछतावा कर रहा था और मीरा से हाथ जोड़ कर माफी मांग रहा था. वह आगे से ऐसी गलती न करने की बात कहते हुए गिड़गिड़ा कर केस वापस करने के लिए अनुरोध करने लगा. पर मीरा अपने फैसले पर दृढ़ थी.

मामले की चर्चा सभी ओर होने लगी तो उस के पूर्व मंगेतर की समझ में बात आई कि उस ने मीरा के साथ गलत व्यवहार किया है. उस ने अपने व्यवहार के लिए माफी मांगी और शादी करने की इच्छा जताई. पर मीरा का दृष्टिकोण साफ था,” मनोज, जो व्यक्ति अपनी होने वाली पत्नी पर विश्वास नहीं कर सकता, उस की बात सुने बिना उसे ब्लौक कर सकता है, उस के साथ जीवन बिताना मेरे लिए संभव नहीं है. तुम अपनी पसंद की लड़की ढूंढ़ लो और मुझे माफ करो.”  Social Story In Hindi

Hindi Love Stories : मुआवजा – राकेश की पत्नी उसे आखिर क्या दे गई

Hindi Love Stories : अचानक दिल्ली में जब उस हवाई दुर्घटना के बारे में सुना तो एकाएक विश्वास ही नहीं हुआ. मैं तो बड़ी बेसब्री से कमला की प्रतीक्षा कर रही थी कि अचानक यह हादसा हो गया.

कमला शादी के बाद पहली बार दिल्ली अपने मातापिता के पास आ रही थी. 5 साल पहले उस की शादी हुई थी और शादी के कुछ महीने बाद ही वह अपने पति के पास मांट्रियल चली गई थी. इसी बीच उस की गोद में एक बेटी भी आ गई थी. दिल्ली में उस का मायका हमारे घर से थोड़ी ही दूरी पर था.

मैं पिछले 8 महीने से अपने पति और बच्चों के साथ दिल्ली में ही थी. मेरे पति भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली में अतिथि प्राध्यापक के रूप में काम कर रहे थे. कमला से मिले काफी दिन हो गए थे. मैं मांट्रियल की सब खोजखबर कमला से जानने के लिए उस की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही थी.

कमला के पिता के घर हम अफसोस जाहिर करने गए. उस के मातापिता और परिवार के अन्य सदस्यों का बुरा हाल था. वे तो उसे पति के घर जाने के बाद एक बार देख भी नहीं पाए थे और अब क्या से क्या हो गया था.

कमला के पति राकेश को एअर लाइंस ने दुर्घटना स्थल तक जाने की सब सुविधाएं प्रदान की थीं. वह चाहता तो उस कंपनी के खर्चे पर भारत आ कर पत्नी और बेटी का दाहसंस्कार कर सकता था पर वह नहीं आया.

राकेश ने जब कमला के पिता को फोन किया, तब हम उन के घर पर ही थे. बेचारे राकेश से आग्रह कर के हार गए, पर वह दिल्ली आने को राजी नहीं हुआ. खैर, वह करते भी क्या. जमाई पर किस का हक होता है और अब तो उन की बेटी भी इस दुनिया में नहीं रही थी तो फिर वह उस को किस अधिकार से दिल्ली आने के लिए बाध्य करते.

एअर लाइंस के अधिकारी दुर्घटना में मरे यात्रियों के निकट संबंधियों से मुआवजे के बारे में बातचीत कर रहे थे. यह विषय कितना दुखद हो सकता है, इस का अनुमान तो वही लगा सकते हैं जो कभी ऐसी परिस्थिति से गुजरे हों. कैसे किसी विधवा स्त्री को समझाया जाए कि उस के पति की मृत्यु का मुआवजा चंद हजार डालर ही है. कैसे किसी पति को सांत्वना दें कि उस की पत्नी का मुआवजा इसलिए कम होगा, क्योंकि वह अपने पति पर निर्भर थी. जो इनसान हमें प्राणों से भी प्यारे लगते हैं, उन के जीवन का मूल्य एअरलाइंस कुछ हजार डालर ही लगाती है.

राकेश से जब एअरलाइंस के अधिकारियों ने उस की पत्नी और बच्ची की मृत्यु पर मुआवजे की बातचीत की तो वह क्रोध और दुख से कांप उठा. उस ने साफसाफ कह दिया कि इस दुर्घटना के लिए हवाई जहाज का पायलट जिम्मेदार था. वह अपनी बच्ची और पत्नी की मृत्यु के लिए मुआवजे की एक कौड़ी भी नहीं चाहता परंतु वह एअरलाइंस पर मुकदमा चलाएगा, चाहे उसे इस के लिए भीख ही क्यों न मांगनी पड़े. वह कचहरी में कंपनी को हवाई दुर्घटना के लिए जिम्मेदार ठहरा कर ही रहेगा.

एअरलाइंस के अधिकारी राकेश को धीरज बंधाने की कोशिश कर रहे थे. अगर वास्तव में राकेश कानून का सहारा लेगा तो मुकदमा जीत जाने पर कंपनी की कहीं अधिक हानि हो सकती थी. कंपनी के अधिकारी उस के इर्दगिर्द घूमते रहे, पर उस ने मुआवजे के फार्म पर हस्ताक्षर नहीं किए. शेष जितने भी यात्रियों की मृत्यु हुई थी, लगभग हर किसी के परिवार के सदस्यों ने मुआवजे के फार्म भर दिए थे. शायद राकेश ही ऐसा था जो बिना फार्म भरे मांट्रियल वापस आ गया था. एअरलाइंस के मांट्रियल कार्यालय के अधिकारियों को राकेश को राजी करने का काम सौंप दिया गया था.

राकेश और कमला से हमारी मुलाकात कुछ वर्ष पहले हुई थी. कमला तो काफी खुशमिजाज थी, पर राकेश हमें अधिक मिलनसार नहीं लगा. वैसे तो उसे कनाडा में रहते हुए कई साल हो गए थे और मांट्रियल में भी वह पिछले 7 सालों से था, पर उस की यहां पर इक्कादुक्का लोगों से ही मित्रता थी.

एक बार बाजार में कमला मिल गई.

मैंने जब उस से कहा कि मेरे घर चलो तो वह आनाकानी करने लगी. खैर, मैं आग्रह कर के उसे अपने घर ले आई. बातों ही बातों में पता चला कि बचपन में हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थीं. वह मुझ से मिल कर बहुत खुश हुई.

यह सुन कर मुझे बहुत अजीब लगा जब कमला ने बताया कि वह जब से भारत से आई है, किसी भी भारतीय के घर नहीं गई है और न ही उस ने कभी किसी को अपने घर बुलाया है. मैं ने जब उन को अपने घर खाने का निमंत्रण दिया तो वह आनाकानी करने लगी. कहने लगी, ‘‘पता नहीं, राकेशजी शाम को खाली भी होंगे या नहीं.’’

मैंने जिद की तो वह मान गई परंतु यह कह कर कि अगर नहीं आ सके तो हम बुरा नहीं मानें. उस की बातों से लगा कि जैसे बेचारी पति की आदतों से परेशान है. पति अगर मिलनसार न हो तो पत्नी तो बेचारी बस जीवनभर घुटघुट कर ही मर जाए.

शाम को पतिपत्नी हमारे घर खाने पर आए. कमला तो बहुत खुश थी. मेरे साथ रसोई में हाथ बंटा रही थी, परंतु राकेश कुछ खिंचाखिंचा सा था. हमें ऐसा लगा कि वह कनाडा में अपनेआप को किसी विदेशी सा ही समझता है.

कमला और राकेश के यहां हमारा कभीकभार आनाजाना होने लगा. हम तो उन दोनों को पार्टियों में ही बुलाते थे, पर वे हमें बस अकेले ही सपरिवार आमंत्रित करते थे. हमारे घर की पार्टियों में उन की मुलाकात हमारे बहुत से मित्रों से होती थी. उन में से कुछ ने तो कमला और राकेश को खाने पर भी बुलाया था, पर वे नहीं गए. कोई बहाना बना कर टाल गए थे. जब उन की बच्ची पैदा हुई तो उस के लिए हमारे अलावा शायद ही किसी और ने उपहार दिया हो. हम भी बस एक ही बार जा पाए थे.

दिल्ली से जब हम मांट्रियल वापस आ रहे थे, सारे रास्ते मन उखड़ाउखड़ा सा था. इतने महीने दिल्ली में बिताने के बाद घर वालों से बिछुड़ने का दुख भी था. दिल के एक कोने में अपने घर जल्दी पहुंचने की इच्छा भी थी. कमला और उस की बच्ची रीता का खयाल भी रहरह कर दिल में उठ रहा था. बेचारा राकेश किस तरह कमला और रीता के बिना जीवन बिता रहा होगा. हमारे बच्चे तो रीता से कितना हिलमिल गए थे. उन को तो वह गुडि़या सी लगती थी.

मांट्रियल पहुंचने के अगले दिन हम दोनों राकेश से मिलने गए. मैं ने कमला के पिता का दिया हुआ पत्र राकेश को दे दिया. राकेश काफी उदास दिखाई दे रहा था. वह बेचारा बहुत कम लोगों को जानता था. थोड़े से लोग ही उस के घर पर अफसोस करने आए थे.

वह गंभीर स्वर में बोला, ‘‘हर समय कमला और रीता की याद सताती रहती है. कुछ दिल बहलेगा, इसलिए 1-2 दिन में वापस काम पर जाने की सोच रहा हूं.’’

राकेश के पास हम कुछ देर बैठ कर लौट आए.

दोचार दिन में हमारे सब मित्रों को मालूम हो गया कि हम वापस आ गए हैं. फिर क्या था, फोन पर फोन आने लगे. मेरी लगभग सभी सहेलियां मुझ से मिलने आईं. वे सब इस बात से परेशान थीं कि कनाडा के डाक कर्मचारियों की हड़ताल के कारण पत्र आदि आने भी बंद हो गए हैं.

एक शाम दीपक हमारे घर आए. उन्हें अकेले देख कर मैं ने शिकायत के लहजे में कहा, ‘‘क्यों भाई साहब, अकेले ही आ गए. भाभीजी को भी साथ ले आते.’’

‘‘मैं तो राकेश के घर जा रहा था. सोचा, आप लोगों से मिलता जाऊं और दिल्ली की मिठाई भी खाता जाऊं. तुम्हारी भाभी तो मुझे मिठाई को हाथ भी नहीं लगाने देंगी.’’

‘‘मैं भी बस आप को थोड़ी सी मिठाई चखाऊंगी. मुझे भाभीजी से डांट नहीं खानी है.’’

मैं रसोई में चाय बनाने चली गई.

दीपक मेरे पति से बोले, ‘‘साहब, डाक कर्मचारियों की हड़ताल ने परेशान कर रखा है. देखिए, यह चेक देने मुझे राकेश के पास खुद ही जाना पड़ रहा है.’’

‘‘किस तरह का चेक है, भाई साहब,’’ मैं रसोई में चाय और कुछ मिठाई ट्रे में रख कर ले आई और चाय परोसने लगी.

‘‘राकेश ने कमला के भारत जाते समय उस का हवाई अड्डे पर 2 लाख डालर का बीमा करा लिया था. यह चेक उसी बीमे का भुगतान है. कभी हाथ पर रखा है 2 लाख डालर का चेक,’’ दीपक ने मुसकराते हुए कोट की जेब से एक लिफाफा निकाला.

लगभग आधा घंटा बैठ कर दीपक राकेश को चेक देने चले गए. उस शाम हम दोनों पतिपत्नी यही सोचते रहे कि राकेश 2 लाख डालर का क्या करेगा. हमारे जानपहचान वालों में शायद ही कोई ऐसा हो जो पत्नी का हवाई यात्रा करते समय बीमा कराता हो. पुरुष तो फिर भी करा लेते हैं, पर पत्नी के लिए तो कोई भी नहीं सोचता. खैर, यह तो राकेश और कमला की अपनी इच्छा रही होगी. यह भी तो हो सकता है कि मजाक के लिए ही उन दोनों ने ऐसा किया हो, पर राकेश हंसीमजाक के लिए तो कुछ भी नहीं करता.

हम मांट्रियल में अपने जीवन में व्यस्त हो गए थे. सोमवार से शुक्रवार तक काम और बच्चों का स्कूल. शनिवार को खरीदारी और पार्टियां तथा रविवार को बस आराम या कभीकभी किसी परिचित के घर चले जाते.

राकेश से कभीकभी फोन पर मेरे पति बात कर लेते थे. हालांकि उस की चर्चा पार्टियों में कभीकभी ही होती थी. हमारे मित्र हम से ही उस के बारे में पूछते थे. लगता था, जैसे वह बाकी सब लोगों के लिए एक अजनबी सा ही हो.

एक बार दीपक बातों ही बातों में कह गए थे, ‘‘राकेश अपनी बीवी और बच्ची के लिए एअरलाइंस से मुआवजे के रूप में बहुत बड़ी रकम की मांग कर रहा है और जिद पर अड़ा है. अब तो उस के पास 2 लाख डालर की नकद रकम भी है. एअरलाइंस के खिलाफ मुकदमा न कर दे. वैसे कंपनी इस मामले को कचहरी तक पहुंचने नहीं देना चाहती और समझौता करने की कोशिश कर रही है. राकेश शायद हवाई दुर्घटना से पीडि़त अन्य लोगों की तुलना में कई गुना मुआवजा हवाई कंपनी से हासिल करने में सफल हो जाएगा.’’

जैसा कि होता है, हम भी कमला और रीता को भूल सा गए थे. राकेश तो कभी हम लोगों के करीब आ ही नहीं पाया था. हम ने एकदो बार उसे अपने घर बुलाया भी, परंतु वह नहीं आया, हम उस से मिलने उस के घर भी गए, पर अधिक बातें न हो सकीं.

डाक विभाग के कर्मचारियों की हड़ताल काफी दिन चली. जब हड़ताल समाप्त हुई तो हमें बहुत खुशी हुई. हड़ताल खत्म होते ही डाकघरों में पड़े पुराने पत्र, टेलीफोन और बिजली आदि के बिल आने चालू हो गए.

एक दिन दिल्ली से हमारे मांट्रियल पहुंचने के पश्चात पहला पत्र आया. लिफाफा भारी लग रहा था. उस में अम्मां का काफी लंबा पत्र था. एक और लिफाफा भी था, जिसे कनाडा से ही मेरे नाम भेजा गया था. हमारे दिल्ली से चले आने के बाद वहां पहुंचा होगा, इसलिए अम्मां ने हमें भेज दिया.

मैं ने जब लिफाफा खोला तो आश्चर्यचकित रह गई. पत्र कमला का था. मेरा मन उदास हो गया क्योंकि कमला अब इस दुनिया में नहीं थी. मैं पत्र पढ़ने लगी :

प्रिय रत्ना दीदी,

आपका पत्र मिला. मेरा कुछ ऐसा कार्यक्रम बन गया है कि जब आप मांट्रियल वापस आएंगी, तब मैं दिल्ली से कानपुर पहुंच चुकी होऊंगी. मेरी माताजी से आप को मेरे दिल्ली पहुंचने की तारीख का पता चल ही गया होगा. शायद आप को यह नहीं पता कि मैं जिद कर के दिल्ली पहुंचने के एक दिन बाद ही कानपुर अपनी बड़ी बहन के पास चली जाऊंगी. इस का कारण यह है कि आप मुझ से मिलने अवश्य मेरी माताजी के घर आएंगी, पर मैं आप से मिलने का साहस नहीं जुटा पा रही हूं. अब हम शायद कभी नहीं मिल पाएंगी क्योंकि मैं अब मांट्रियल कभी नहीं लौटूंगी.

मेरे इस निर्णय का राकेश को भी पता नहीं है. हां, इस का सौ प्रतिशत उत्तरदायी वही है. हमारी शादी हुए 5 साल से ऊपर हो गए हैं, पर उस ने शायद ही कभी पति का प्यार मुझे दिया हो. राकेश ने मुझे घर की नौकरानी से अधिक कभी कुछ नहीं समझा. शादी के इतने वर्ष बीत जाने पर भी उस ने कभी मेरे लिए कोई साड़ी, गहना या छोटा सा उपहार भी नहीं खरीदा. मेरी बात को छोडि़ए रीता को भी उस ने कभी प्यार से चूमा तक नहीं, गोद में खिलाना तो दूर की बात है.

आपने देखा ही होगा कि राकेश कितना नीरस व्यक्ति है. परंतु वास्तव में वह बहुत खुशमिजाज है, और उस की यह खुशी बस अपनी महिला मित्रों तक ही सीमित है. उस ने अपने जीवन के इस रूप से मुझे हमेशा अनजान ही रखा. खुद ऐश करने के लिए उस के पास पैसे हैं, परंतु अपनी बेटी के लिए ढंग का फ्राक खरीदने के लिए पैसे की कमी है. वह हमेशा मुझे इतने कम पैसे देता है कि घर का खर्च भी मुश्किल से चलता है.

मैं कभी राकेश को पकड़ तो नहीं पाई परंतु जानती हूं कि कई लड़कियों के साथ उस का संपर्क है. मुझे प्रमाण तो नहीं मिल पाया, पर एक पत्नी को ऐसी बातें तो मालूम हो ही जाती हैं. मैं ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, पर हर बार उस से मार ही खाई. मेरे भारत जाने के लिए हवाई जहाज के टिकट के पैसे खर्च करने के लिए कभी वह राजी नहीं हुआ. इस बार जब पिताजी ने टिकट भेज दिया तो मैं दिल्ली आ पा रही हूं.

प्रत्येक लड़की के मातापिता अपनी बेटी के लिए अच्छे से अच्छा वर खोजने की कोशिश करते हैं. मेरे मातापिता ने भी इतना दहेज दिया था कि राकेश के घर वाले खुशी से फूले नहीं समा रहे थे. मेरे दहेज की सारी चीजों और नकद रुपयों से उन्होंने थोड़े दिनों बाद ही राकेश की छोटी बहन की शादी कर दी थी.

राकेश ने अपने घर वालों के दबाव में आ कर मुझ से शादी की थी. उसे मैं कभी भी अपने लायक नहीं लगी, क्योंकि मैं एक सीधीसादी आकर्षण- रहित महिला हूं. मुझे कहीं अपने साथ ले जाने में भी उसे आपत्ति होती थी. बेचारी रीता भी रंगरूप में मुझ पर गई है. इसी कारण उसे कभी राकेश से पिता का प्यार नहीं मिला.

मैं तो शायद किसी भी साधारण व्यक्ति को पति के रूप में पा कर प्रसन्न रहती. कम से कम मेरे जीवन में हीन- भावना तो न घर कर पाती. राकेश मेरे लिए उपयुक्त वर भी न था. उस ने मुझ से शादी खूब सारा दहेज पाने के लिए की थी. वह उसे मिल गया. उस के बाद उस के जीवन में मेरा कोई महत्त्व न था. शारीरिक आवश्यकताएं तो वह घर के बाहर पूरी कर ही लेता था. मैं तो बस रीता के लिए ही उस के साथ विवाहित जीवन की परिधि में असहाय की तरह जीवन बिताने का प्रयास कर रही थी.

अब मैंने निश्चय कर लिया है कि जब विवाहित हो कर भी अविवाहिता का ही जीवन बिताना है तो क्यों न अपने मातापिता के पास ही रहूं. कम से कम उन का प्यार और सहयोग तो मुझे मिलेगा ही. मुझे मालूम है, मेरे मातापिता मुझे समझाने की कोशिश करेंगे, पर जब मैं उन्हें अपनी पीठ पर उभरे राकेश की मार के काले निशान दिखाऊंगी तो वे शायद कुछ न कहेंगे. मेरे जीवन के पिछले 5 साल कैसे बीते हैं, यह मेरा दिल ही जानता है. पर उन दिनों आप ने जो मुझे प्यार और स्नेह दिया, उस ने मुझे मानसिक संतुलन खो देने से बचा लिया. मैं जीवन भर आप की आभारी रहूंगी.

आपकी कमला.

कमला का पत्र पढ़ कर मेरी आंखों में आंसू उमड़ आए. राकेश का जो रूप कमला के पत्र से प्रकट हुआ, उस की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी. मांट्रियल आने के बाद राकेश से हम 2-3 बार मिले थे.

हमेशा ऐसा ही लगा, जैसे उस के ऊपर दुख का पहाड़ टूट पड़ा है. यह सब क्या उस का दिखावा था, ताकि वह एअरलाइंस से अधिक मुआवजा वसूल कर सके. 2 लाख डालर तो उस की

जेब में आ ही चुके थे. अभी पता नहीं उसे मुआवजे के रूप में और कितने मिलेंगे?

कितना दुखभरा जीवन था कमला और उस की बच्ची का. जब तक जीवित रहीं छोटीछोटी चीजों के लिए तरसती रहीं क्योंकि राकेश आमदनी का अधिक भाग अपनी ऐयाशी पर खर्च कर देता था. मृत्यु के बाद भी दोनों राकेश के लिए आशातीत मुआवजे की रकम का प्रबंध कर गईं.

कह नहीं सकती कि राकेश एकांत के क्षणों में कमला और रीता की मृत्यु पर दुखी होता है अथवा प्रसन्न. उस का निजी जीवन पहले की तरह चल रहा है या कमला के रास्ते से हमेशा के लिए हट जाने के कारण वह और भी अधिक ऐशोआराम में डूब गया है.

वैसे राकेश जैसे व्यक्ति के बारे में मैं सोचना नहीं चाहती. कमला और उस की बेटी तो शायद राकेश का अतीत बन गई होंगी, पर उन दोनों की स्मृति मेरे मन से कभी नहीं जाएगी.

राकेश को तो मुआवजा मिल ही जाएगा, पर वह जीवन भर कमला का कर्जदार रहेगा. उसे कमला  के जीवन के दुख भरे वर्षों का मुआवजा कभी न कभी किसी न किसी रूप में तो चुकाना ही पड़ेगा. Hindi Love Stories 

Romantic Story In Hindi : क्या यही प्यार है – जेबा और राहिल के प्यार की कहानी

Romantic Story In Hindi : जेबा की बरात आने वाली थी. सभी पूरी तैयारी के साथ बरात के आने का इंतजार कर रहे थे कि तभी जेबा का आशिक राहिल कहीं से अचानक आंगन में आ गया. ‘‘आप डरें नहीं. मैं कुछ गड़बड़ करने नहीं आया हूं. मैं तो सिर्फ जेबा से मिलने आया हूं. आज से वह किसी दूसरे की हो जाएगी. प्लीज, मुझे उस से आखिरी बार मिल लेने दें,’’ आंगन में खड़ी औरतों से इतना कहने के बाद राहिल सीधा जेबा के कमरे में घुस गया, जिस में वह दुलहन बनी बैठी थी.

‘‘जेबा, यह तो मेरी शराफत है, जो तुम्हें किसी और की होते देख रहा हूं, वरना किस में इतनी हिम्मत थी कि जो तुम को मुझ से जुदा कर देता. ‘‘खैर, मैं तुम से यह कहने आया हूं कि हम दो जिस्म जरूर हैं, लेकिन जान एक है. कोई दूसरा तुम्हारे सिर्फ तन पर हक जमा सकता है, लेकिन मन पर नहीं. मुझे पूरा यकीन है कि तुम मुझे कभी नहीं भूलोगी…’’

इतना कहने के बाद राहिल अपना मुंह जेबा के कान के पास ले जा कर धीरे से बोला, ‘‘तुम अपनी मांग में कभी सिंदूर मत भरना. मैं भी तुम से वादा करता हूं कि जिंदगीभर किसी दूसरी लड़की की तरफ नजर नहीं उठाऊंगा. ‘‘अच्छा जेबा, अब मैं चलता हूं. तुम हमेशा खुश रहो,’’ इतना कह कर राहिल उस कमरे से चला गया.

राहिल के जाने के बाद सब ने राहत की सांस ली, मगर दिलों में यह खटका बना रहा कि वह कमबख्त कहीं निकाह के वक्त आ कर किसी तरह की हंगामेबाजी न शुरू कर दे. इन हालात से निबटने के लिए जेबा के घर वालों ने पूरी तैयारी कर रखी थी. पर सबकुछ शांति से पूरा हो गया और जेबा अपने हमसफर शबाब के साथ

एक नई जिंदगी शुरू करने के लिए रवाना हो गई. वैसे तो सबकुछ ठीक हो गया था, लेकिन जेबा और उस के घर वाले अंदर ही अंदर काफी परेशान थे कि राहिल न जाने कब क्या कर बैठे.

जेबा और राहिल एकदूसरे को चुपकेचुपके चाहते आ रहे थे. इस सचाई से परदा तब उठा, जब जेबा की शादी शबाब के साथ तय कर दी गई. राहिल को जब इस बात का पता चला, तो उस के दिल की धड़कन जैसे थम सी गई.

कभी जी चाहता कि जेबा को ले कर कहीं भाग जाए, तो कभी उस के बाप का खून कर देने का मन करता. कभी यह विचार आता कि वह अपना और जेबा का खात्मा कर डाले. वह तो जेबा की सूझबूझ थी, जो पागल हाथी जैसे राहिल को किसी तरह काबू में किए थी. ‘‘आखिर मुझ में क्या कमी है, जो जेबा को मुझ से दूर किया जा रहा है?’’ एक दिन राहिल जेबा के अब्बा हशमत अली से उलझ पड़ा.

‘‘कमी यह है कि तुम दिमाग से ज्यादा दिल की सुनते हो और जज्बाती हो. सब से बड़ी कमी तो तुम में यह है कि तुम दूसरों पर मुहताज हो. जो खुद मुहताज हो, वह भला दूसरों को क्या दे सकता है,’’ हशमत अली की साफगोई राहिल को बेहद कड़वी लगी, फिर भी जवाब में वह खामोश रहा. राहिल एक बेरोजगार और भावुक किस्म का नौजवान था. बाप के पास जो दौलत थी, बस उसी पर उस की जिंदगी का दारोमदार था. वह अपनी जिंदगी के प्रति कभी संजीदा नजर नहीं आया.

शौहर के रूप में शबाब को पा कर जेबा बहुत खुश थी. एक भले व संजीदा शौहर की सारी खूबियां उस में कूटकूट कर भरी थीं. शबाब जेबा का पूरा खयाल रखता कि उसे किसी तरह की तकलीफ न पहुंचने पाए. मगर जेबा ही इस मामले में नाकाम थी, क्योंकि वह पूरे तनमन से चाह कर भी अपने शौहर के आगे खुद को पेश नहीं कर पाती थी.

जेबा इस बात को ले कर डरीसहमी रहती कि अपने शौहर से पहले वह किसी और की थी. कभीकभी उसे राहिल के दीवानेपन से भी डर लगता. वह जानती थी कि राहिल जुनून में आ कर किसी भी हद को पार कर सकता है, इसीलिए वह चाह कर भी शबाब को अपने प्यार से दूर रखती थी. सब से बड़ी बात तो यह थी कि जेबा ने आज तक शबाब के नाम का सिंदूर अपनी मांग में नहीं लगाया, जो शबाब को अच्छा नहीं लग रहा था.

राहिल ने जेबा को इस बात के लिए मना कर के उस की शादीशुदा जिंदगी पर कितना बड़ा जुल्म ढाया था. जेबा राहिल के गुस्से से शबाब को बचाने के लिए ही अपनी मांग को सिंदूर से नहीं सजाती थी. शादी के 2 दिन बाद ही जेबा की सूनी मांग को देख कर शबाब पूछ बैठा, ‘‘अरे, यह क्या जेबा, तुम्हारी मांग में सिंदूर क्यों नहीं है?’’

जेबा ने बड़े प्यार से शबाब को समझाया, ‘‘असल में सिंदूर से मुझे एलर्जी है. बचपन में गुड्डेगुडि़यों का ब्याह रचाने के दौरान गुड्डे की अम्मां बनी लड़की ने खेलखेल में मेरी मांग में सिंदूर डाल दिया था. इस के कुछ समय बाद ही मेरे सिर में खुजली होने लगी थी और मैं चकरा कर गिर पड़ी थी. तब से मैं सिंदूर से काफी दूर रहने लगी हूं.’’ जेबा की दलील सुन लेने के बाद शबाब चुप तो हो गया था, लेकिन उसे कुछ अटपटा सा जरूर लगा था.

सास व ननदें जेबा को मांग में सिंदूर डालने की कहतेकहते थक चुकी थीं, लेकिन उस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. इस बात को ले कर परिवार में मनमुटाव सा रहने लगा था. इस से पहले कि जेबा की जिद और ससुराल वालों की नाराजगी कोई गंभीर रूप लेती, एक दिन अचानक घटी एक घटना ने जेबा की सारी उलझनों को पलभर में ही सुलझा दिया.

राहिल ने जेबा के किसी करीबी रिश्तेदार के हाथों उस के पास एक खत भेजा, जिस में लिखा था: ‘जेबा, मैं तुम्हारे दिलोदिमाग पर हुकूमत तो नहीं कर सका, लेकिन उस पर नाजायज ढंग से कब्जा कर के तुम्हें ब्लैकमेल जरूर करता रहा. अब इस बात का एहसास मुझे पूरी तरह से होने लगा है. ‘मुझे दुख है कि मेरी घटिया सोच का शिकार हो कर तुम घुटनभरी जिंदगी जी रही हो और धीरेधीरे अपने ससुराल वालों की नजरों में गिरती जा रही हो. मुझे माफ कर दो. तुम ने सही कहा था कि मेरा यह गैरसंजीदापन कभी मुझे महंगा पड़ सकता है.

‘एक खुशखबरी सुनो. मैं शादी करने जा रहा हूं. वह भी एक ऐसी लड़की के साथ, जो मुझ जैसे किसी सड़कछाप आशिक के जुल्म का शिकार हो चुकी है. जानती हो, इस तरह की लड़की को अपना हमसफर बना कर मैं क्या करना चाहता हूं? मैं अपने गुनाह की सजा कम करना चाहता हूं. ‘शादी के बाद भी तुम पर अपना नाजायज हक जमा कर मैं ने गुनाह नहीं तो और क्या किया है. तुम मेरी दीवानगी का खौफ अपने जेहन से बिलकुल निकाल दो और पूरे तनमन से शबाब की बीवी बन कर जिंदगी गुजारो. आज से अपनी मांग सूनी मत रखना.

‘तुम्हारा नाचीज, राहिल.’ खत पढ़ लेने के बाद जेबा खुद को इतना हलका महसूस कर रही थी, मानो उस की छाती पर से कोई बहुत बड़ा बोझ हट गया हो. Romantic Story In Hindi 

Family Story In Hindi : अपनों के शहर में अकेली

Family Story In Hindi : बहुत देर से कोई बस नहीं आई. मैं खड़ेखड़े उकता गई. एक अजीब सी सुस्ती ने मुझे घेर लिया. मेरे आसपास लोग खड़े थे, बतिया रहे थे, कुछ इधरउधर विचर रहे थे. मैं उन सब से निर्विकार अपने अकेलेपन से जूझ रही थी. निगाह तो जिधर से बस आनी थी उधर चिपक सी गई थी. मन में एक प्रश्न यह भी उठ रहा था कि मैं जा क्यों रही हूं? न अम्मा, न बाबूजी, कोई भी तो मेरा इंतजार नहीं कर रहा है. तो क्या लौट जाऊं? पर यहां अकेली कमरे में क्या करूंगी. होली का त्योहार है, आलमारी ठीक कर लूंगी, कपड़े धो कर प्रैस करने का समय मिल जाएगा. 4 दिनों की छुट्टी है. समय ही समय है. सब अपने घरपरिवार में होली मना रहे होंगे. किसी के यहां जाना भी अजीब लगेगा…नहीं, चली ही जाती हूं. क्या देहरादून जाऊं शीला के पास? एकाएक मन शीला के पास जाने के लिए मचल उठा.

शीला, मेरी प्यारी सखी. हमारी जौइनिंग एक ही दिन की है. दोनों ने पढ़ाई पूरी ही की थी कि लोक सेवा आयोग से सीधी भरती के तहत हम इंटर कालेज में प्रवक्ता पद पर नियुक्त हो गए. प्रथम तैनाती अल्मोड़ा में मिली.

अल्मोड़ा एक सुंदर पहाड़ी शहर है जहां कसबाई संस्कृति की चुलबुलाहट है. सुंदर आबोहवा, रमणीक पर्यटन स्थल, खूबसूरत मंदिर, आकार बदलते झरने, उपनिवेश राज के स्मृति चिह्न, और भी बहुत कुछ. खिली धूप और खुली हवा. ठंडा है किंतु घुटा हुआ नहीं. मैदानी क्षेत्रों की न धुंध न कोहरा. सबकुछ स्वच्छनिर्मल. जल्दी ही हमारा मन वहां रम गया.

दोनों पढ़ने वाले थे. शीघ्र ही हमारी दोस्ती परवान चढ़ने लगी. साथ भोजन करने से खाने का रस बना रहा. पहाड़ी जगह, सीधेसरल जन, रंग बदलते मौसम, रसीले फल और शाम को टहलना, सेहत तो बननी ही थी.

स्कूल की बंधीबंधाई दिनचर्या के उपरांत कुछ शौपिंग, कुछ बतियाना, स्फूर्तिपूर्वक लगता था. अन्यथा स्कूल का माहौल, बाप रे, ऐडमिशन, टाइमटेबल, लगातार वादन, होमवर्क, यूनिट टैस्ट, छमाही, सालाना, कौपियां, रिजल्ट, प्रतियोगिता, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सदन, पत्रिका, संचयिका, अभिभावक संघ, बैठकें, प्रीबोर्ड, बोर्ड परीक्षा, गृह परीक्षा, प्रैक्टिकल्स…उफ, कहीं कुछ चूक हो जाए तो दुनियाभर की फजीहत. इन सब के बाद सवा महीने की गरमियों की छुट्टी. अधिकांश उड़ जाते अपने स्थायी बसेरों की ओर. मैं भी अल्मोड़ा के शीतल मनोहारी वायुमंडल को त्याग तपते आगरा में अम्माबाबूजी की शीतल छांव में जाने को बेताब रहती.

अम्माबाबूजी की दवा, खुराक, सामाजिक व्यवहार, कपड़ों की खरीदारी में कब ग्रीष्मावकाश फुर्र हो जाता, कुछ पता ही नहीं चलता. आतेआते भी, ‘मैं जल्दी आऊंगी,’ कह कर ही निकल पाती.

बीच में कुछ दिन देहरादून में दीदी और जीजाजी के पास रहती. वे भी इंतजार सा करते रहते. दीदी कमजोर थीं, 3 बच्चे छोटेछोटे. किसी भी जरूरत पर मुझे जाना पड़ता था. मेरे बारबार चक्कर काटने से शीला खीझ जाती. एक दिन तो फट पड़ी.

गजब की ठंड थी. पहाडि़यां बर्फ से लकदक हो गई थीं. रुकरुक कर होती बारिश ने सब को घरों में रहने को मजबूर सा कर दिया था. बर्फीली हवा ने पूरी वादी को अपने आगोश में ले लिया था. मैं छुट्टी की अप्लीकेशन और लैब की चाबी लिए शीला के घर की ओर चल दी. दरवाजा खटखटाया. कुछ देर यों ही खड़ी रही. शीला को आने में समय लगा. बिस्तर में रही होगी. हाथ में बैग देखते ही बोली, ‘इस मौसम में, इतनी ठंड में चिडि़या भी घोंसले में दुबकी है और एक तू है जो बर्फीली हवा की तरह बेचैन है.’‘देहरादून से जीजाजी का फोन आया है. हनी को चोट लग गई है. शायद औपरेशन कराना पड़े.’

‘तेरे तो कई औपरेशन कर दिए इस बुलावे ने,’ शीला ने बात पूरी सुने बिना जिस विद्रूपता से मेरे हाथ से चाबी और अप्लीकेशन झपट कर दरवाजा खटाक से बंद किया, बरसों बाद भी उस का कसैलापन धमनियों में बहते खून में तिरने लगता है. शीला की बात से नहीं, हनी के व्यवहार से.

पिछली बार जब मैं उबाऊ और मैले सफर के बाद देहरादून पहुंची तो बड़ी देर तक हनी और बहू मिलने नहीं आए. हनी के मुख से निकले वाक्य ‘मौसी फिर आ गई हैं’ ने अनायास मुझ से मेरा साक्षात्कार करा दिया. ऐसा नहीं था कि उन की आंखों में धूमिल होती प्रसन्नता की चमक और लुप्त होते उत्साह को मैं महसूस नहीं कर रही थी किंतु मैं अपने भ्रमजाल से बाहर ही नहीं आ पा रही थी. सबकुछ बदल रहा था, केवल मैं रुकी हुई थी. शीला ठीक कहती थी, ‘निकल इस व्यामोह से, सब की अपनी जिंदगी है. किसी को तेरी जरूरत नहीं. सब फायदा उठा रहे हैं. अपनी सुध ले.’

मुझे बेचैनी सी होने लगी. बैग से पानी की बोतल निकाली. कुछ घूंट पिए. इस बीच एक बस आई थी. ठसाठस भरी. मैं अपनी जगह से हिल भी नहीं पाई. लोग सरकती बस में लटकते, चिपकते और झूलते चले गए.

धीरेधीरे मुझे लगने लगा कि अम्माबाबूजी की मुझ पर निर्भरता बढ़ती जा रही थी. वे हर चीज के लिए मेरी राह देखने लगे. मुझे गर्व होने लगा, अपने लंबे भाइयों का कद छोटा होते देख. उन को यह जताने मेंमुझे पुलक का अनुभव होने लगा कि मेरे रहते हुए अम्माबाबूजी को किसी बात की कोई कमी नहीं है, उन्हें बेटों की कोई दरकार नहीं. भाईभतीजे कुछ खिंचेखिंचे रहने लगे थे. भाभियां कुछ ज्यादा चुप हो गईं. पर मैं ने कब परवा की. बीचबीच में बाबूजी मुझे इशारा करते थे परंतु मैं ने बात को छूने की कभी कोशिश ही नहीं की.

आज अम्माबाबूजी नहीं हैं. बादलों का वह झुंड टुकड़ेटुकड़े हो गया जिसे मैं ने शाश्वत समझ लिया था.

पहले बाबूजी गए. 93 वर्ष की उम्र में भरेपूरे परिवार के बीच जब उन की अरथी उठी तो सब ने उन्हें अच्छा कहा. उसी कोलाहल में एक दबा स्वर यह भी उभरा कि बेटी को अनब्याहा छोड़ गए. कोई और समय होता तो मैं उस शख्स से भिड़ जाती. पर अब लगता है, अम्माबाबूजी बुजुर्ग हो गए थे किंतु असहाय नहीं थे. उन्होंने मेरे रिश्ते की सरगरमी कभी नहीं दिखाई. जैसे उन्होंने यह मान लिया था कि मैं विवाह करूंगी ही नहीं.

मेरी समवयस्का सखी शीला के घर से जबतब उस के लिए रिश्ते के प्रस्ताव आते रहते. एक रूमानियत उस की आंखों में तैरने लगी थी. बोलती तो जैसे परागकण झर रहे हों, चेहरे का आकर्षण दिन पर दिन बढ़ने लगा था. वह मुझ से बहुतकुछ कहना चाहती थी पर मेरे लिए तो जैसे वह लोक था ही नहीं. आखिर, वह मुझ से छिटक गई और अकेले ही अपने कल्पनालोक में विचरने लगी.

फिर एकाएक एक दिन उस ने मेरे हाथ में अपनी शादी का कार्ड रख दिया- शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते…मैं पंक्ति को पढ़ती जाती और अर्थ ढूंढ़ती जाती. शीला खीझ गई, ‘मेरी शादी है. फुरसत मिले तो आ जाना. मैं आज जा रही हूं.’ मैं उसे देखती रह गई.

शादी के बाद शीला वर्षभर यहां और रही. उस के पति शेखर ने पूरा जोर लगा दिया उस का देहरादून तबादला कराने में. शेखर वहां ‘सर्वे औफ इंडिया’ में अधिकारी थे. कोशिश करतेकरते भी सालभर लग गया. इस बीच वे शीला के पास यहां आते रहे. जब शेखर यहां आते तो मेरी एक सीमारेखा खिंच जाती. परंतु शीला मेरा पहले से भी अधिक खयाल रखने लगती. कोशिश करती कि मैं खाना अकेले न बनाऊं. मैं न जाती तो खाना पहुंचा देती. बहुत मना करती तो दालसब्जी तो जरूर दे जाती. शेखर के स्वभाव में गंभीरता दिखती थी इसलिए मिलने से बचती रही. लेकिन इस गंभीरता के नीचे सहृदयता की निर्मल धारा बह रही है, यह धीरेधीरे पता चला. अपनेआप झिझक कम होती चली गई और उन में मुझे एक शुभचिंतक नजर आने लगा.

इसी दौरान शेखर ने मुझे अरविंद के बारे में बताया, जो उन्हीं के औफिस में देहरादून में कार्यरत था. एक सरकारी कार्य के बहाने उसे अल्मोड़ा बुला कर मेरी मुलाकात भी करा दी. अरविंद ने मुझे आकर्षित किया. अपने प्रति भी उस की रुचि अनुभव की. शेखर और शीला के दांपत्य के शृंगार का सौंदर्य देख चुकी थी. मैं विवाह के लिए उत्कंठित हो गई. शीला का भी आग्रह बढ़ता गया. कई प्रकार से वह मुझे समझाती.

‘अम्माबाबूजी हमेशा नहीं रहेंगे. पीतपर्ण हैं…कभी भी झर जाएंगे. फिर वे अपना जीवन जी चुके हैं. बिंदु, तू बाद में पछताएगी. सोच ले.’

‘ठीक है, अम्माबाबूजी को मैं नहीं छोड़ पाऊंगी पर इस संबंध में तुम मेरे जीजाजी से बात करो,’ मैं ने अप्रत्यक्ष रूप से अपनी स्वीकृति दे दी.

शीला हर्षित हो गई जैसे उसे कोई निधि मिल गई हो. तुरतफुरत उस ने शेखर की जीजाजी से बात करा दी. जीजाजी ने जिस उखड़ेपन से बात की वह शेखर के उत्साह को क्षीण करने के लिए काफी थी. वह बात नहीं थी, कटाक्ष था.

‘अच्छा, तो हमारी साली के रिश्ते की बातें इतनी सार्वजनिक हो गई हैं. आप उस की कलीग शीला के पति बोल रहे हैं न. किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है. घर में बिंदु के बहुत हितैषी हैं.’

शीला अपने पति के अपमान से तिलमिला गई. रोंआसी हो कहने लगी, ‘बिंदु, तेरे जीजाजी कभी तेरी शादी नहीं होने देंगे. अम्माबाबूजी के बस की बात नहीं और भाइयों की हद से तू निकल चुकी है. तुझे स्वयं फैसला लेना होगा.’
पर मैं तो अपने बारे में कभी फैसला ले ही नहीं पाई. धीरेधीरे बात काल के गर्भ में समा गई. शेखर और शीला ने फिर कभी मेरे रिश्ते की बात नहीं की. पर हां, उन्होंने मुझे देहरादून में जमीन या फ्लैट खरीदने को दोएक बार अवश्य कहा.

‘बिंदु, जमीन के दाम बढ़ते जा रहे हैं. तू समय रहते देहरादून में अपना मकान पक्का कर ले. अपना ठिकाना तो होना चाहिए.’

मैं चौंक गई. मैं और मकान. मैं पलट कर बोली, ‘देहरादून में मेरे दीदीजीजाजी हैं. एक जीजाजी सहारनपुर में हैं. मेरे लिए मकानों की कमी नहीं है.’

अब सबकुछ मेरी आंखों के सामने है. पिछली बार देहरादून गई तो सीधे शीला के पास चली गई थी. शीला प्रसन्न हुई, उस से अधिक हैरान. उस के 2 सुंदर बच्चे हमेशा की तरह मुझ से चिपक गए. उन के लिए जो लाई थी, उन्हें पकड़ा दिया. शीला बिगड़ी. मैं चुप रही. शीला कुछ ढूंढ़ने लगी. बच्चों को लौन में खेलने भेज दिया.

‘बिंदु, कुछ परेशान लग रही है. सब ठीक है न?’

मेरा गला भर आया. स्वयं पर दया आने का यह विचित्र अनुभव था. शब्द नहीं निकल पाए. शीला पानी ले आई.

‘अच्छा, पहले पानी पी ले. थोड़ा आराम कर ले,’ कह कर शीला रसोई की ओर जाने लगी. मैं ने रोक दिया.

‘शीला, शेखर से कहना कि मेरे लिए कोई छोटा सा फ्लैट देख लें…’

शीला फट पड़ी, ‘अब आया तुझे होश. जब पहले कहा था कि अपने लिए मकान देख ले तब तो तू ने कहा था कि मेरे बहुत सारे मकान हैं. कहां गए वे सारे मकान? अब याद आ रही है मकान खरीदने की, वह भी देहरादून में.’

शीला और उस के पति ने मकान ढूंढ़ने की कवायद शुरू कर दी. जमीन भी देखी, जमीन शहर से बहुत दूर थी, अकेली प्रौढ़ा के लिए ठीक नहीं लगा और शहर में फ्लैट बहुत महंगे थे. धीरेधीरे दोनों चीजें मेरी पहुंच से बहुत दूर चली गईं.

अब अम्मा भी नहीं रहीं. बाबूजी के जाने के 6 वर्ष बाद अम्मा भी छोड़ कर चली गईं. ऐसा लगने लगा कि जैसे मेरे जीवन का उद्देश्य ही खत्म हो गया. अब कहां जाऊं? सचमुच एक व्यामोह में कैद थी मैं. अब भ्रम टूटा तो 52 वर्ष की फिसलती उम्र के साथ अकेली खड़ी हूं…

भीड़ में कुछ हलचल हुई. शायद कोई बस आ रही है. बैग संभाल लिए. बस आ गई. रेले में मैं भी यंत्रवत सी बस में चढ़ गई. मंजिल हो न हो, सफर तो है ही.  Family Story In Hindi

Social Story : कराटे वाला चाणक्य – कैसे बन गया पूरा कालेज विनय का चहेता

Social Story : विनय शरीर से दुबलापतला था. मगर उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह भीतर से बहुत मजबूत है. कराटे सीखने के इरादे ने ही उसे भीतर से भी काफी मजबूत बना दिया था. मन और बुद्धि का भी वह धनी था.

‘‘सर,’’ कमरे में प्रवेश कर विनय राजन सर से बोला.

‘‘कहो, कौन हो तुम? क्या चाहते हो,’’ राजन सर ने पूछा.

प्रश्नों की इस बौछार से जरा भी विचलित हुए बिना विनय बोला, ‘‘सर, मैं कराटे सीखना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कहा, कराटे? यह शरीर ले कर तुम कराटे सीखना चाहते हो,’’ राजन सर मजाकिया मूड में हंस कर बोले.

‘‘हां, सर. क्या मैं कराटे नहीं सीख सकता?’’ विनय ने पूछा.

‘‘नहीं, पहले खापी कर अपने शरीर को मजबूत बनाओ, तब आना. अभी तो एक बच्चा भी तुम्हें गिरा सकता है,’’ कह कर राजन सर अखबार पढ़ने लगे.

‘‘सर, मैं इतना कमजोर भी नहीं हूं,’’ विनय बोला.

‘‘कैसे मान लूं?’’

यह सुनते ही विनय ने अपने एक हाथ की मुट्ठी बांध ली और फिर बोला, ‘‘सर, मेरी इस मुट्ठी को खोलिए.’’

सुन कर राजन सर मुसकराए मगर कुछ ही देर में उन की मुसकराहट गायब हो गई. विनय की मुट्ठी खोलने में उन के पसीने छूटने लगे. तब कुछ ही क्षणों बाद विनय ने खुद ही अपनी मुट्ठी खोल ली.

राजन सर के मुंह से केवल इतना ही निकला, ‘‘वंडरफुल, तुम कल से टे्रनिंग सैंटर पर आ सकते हो लेकिन इस ढीलीढाली धोती में नहीं. अच्छा होगा कि तुम पाजामा पहन कर आओ.’’

विनय ने झुक कर उन के पैर छुए, फिर बाहर निकल आया. राजन सर चकित हो कर जाते हुए विनय को देखते रहे.

विनय नियमित रूप से राजन सर के यहां आने लगा. कालेज में किसी को इस की भनक तक नहीं लगी. अब भी वह उन के लिए एक कार्टून मात्र था, क्योंकि जब वह पहले दिन कालेज आया तो उस का हुलिया कुछ ऐसा ही था. सिर पर छोटे बालों के बीच गांठ लगी एक लंबी सी चुटिया, ढीलाढाला कुरता पैरों में मोटर टायर की देसी चप्पल.

सब से पहले उस का सामना कालेज के एक शरारती छात्र राजेंद्र से हुआ. उस ने इन शब्दों से उस का स्वागत किया, ‘‘कहिए, मिस्टर चाणक्य, यहां नंद वंश का कौन है जो इस लंबी चुटिया में गांठ लगा कर आए हो? गांठ खोलो तो लहराती चुटिया और भी अच्छी लगेगी.’’

सुनते ही उस के पीछे खड़ी छात्रछात्राओं की भीड़ ठठा कर हंस पड़ी. विनय ने कोई उत्तर नहीं दिया. केवल मुसकरा कर रह गया. यह जरूर हुआ कि उस दिन से सभी शरारती छात्रछात्राओं को उसे मिस्टर चाणक्य कहने में मजा आने लगा.

वैसे धीरेधीरे विनय ने खुद को वहां के माहौल में ढाल लिया. सिर पर गांठ लगी चुटिया के कारण उस का नया नाम चाणक्य पड़ गया.

विनय की क्लास में अधिकतर छात्रछात्राएं बड़े घरों से थे. कैंटीन में उन का नाश्ता मिठाई, समोसे, कौफी आदि से होता था. उन के कपड़े भी मौडर्न और सुपर स्टाइल के होते थे. मामूली कपड़ों वाला विनय तो सिर्फ चाय पी कर ही उठ जाता था. इसीलिए लड़केलड़कियां उस के पास बैठने में अपनी तौहीन समझते थे. विशेष रूप से वीणा और शीला को तो उस से बात तक करने में शर्म आती थी. मगर विनय इन सब से दूर पता नहीं किस दुनिया में खोया रहता था.

राजेंद्र, नरेश, वीणा और शीला की दोस्ती पूरे कालेज में मशहूर थी. राजेंद्र और नरेश भी संपन्न घरों से थे. वे कालेज की कैंटीन यहां तक कि बाहर भी अकसर वे साथसाथ घूमतेफिरते थे.

उस दिन परीक्षा के फौर्म और फीस जमा हो रही थी, नाम पुकारे जाने पर विनय भी फौर्म व फीस ले कर पहुंचा. क्लर्क ने पैसे गिनने के बाद विनय से पूछा, ‘‘यह क्या, डेढ़ सौ रुपए कम क्यों हैं? क्या तुम ने नोटिस बोर्ड पर कल बढ़ी हुई फीस के बारे में नहीं पढ़ा?’’

‘‘नहीं सर, मेरी मां की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए मैं जल्दी घर चला गया था. इसी कारण मैं नोटिस बोर्ड नहीं पढ़ पाया. सौरी सर,’’ विनय बोला.

‘‘देखो, मैं इतना कर सकता हूं कि फौर्म और पैसे तो अभी रख लेता हूं, लेकिन कल बाकी पैसे जमा कर देना वरना तुम्हारा फौर्म रुक जाएगा,’’ क्लर्क ने चेतावनी भरे स्वर में विनय से कहा.

वीणा शीला के कान में फुसफुसाई, ‘‘यार, तेरे पर्स में तो पैसे हैं, इसे देदे तो आज ही इस का फौर्म जमा हो जाएगा.’’

शीला बोली, ‘‘क्यों दे दूं? 10-20 रुपए की बात होती तो दे भी देती, डेढ़ सौ रुपए की उधारी यह चाणक्य महाशय चुकता कर भी पाएंगे,’’ वीणा चुप लगा गई.

विनय शाम को भारी मन से कालेज से बाहर निकला, कल कहां से आएंगे डेढ़ सौ रुपए, घर में तो मां की दवा के लिए ही मुश्किल आन खड़ी होती है. कभी यह भी सोचता कि क्यों कराटे सीखने में उस ने इतने पैसे बरबाद कर दिए. इसी सोच में डूबा विनय यह भी भूल गया कि वह साइकिल पकड़े पैदल ही चल रहा है.

तभी एक स्कूटी पर वीणा और शीला उस की बगल से गुजरीं. दोनों स्कूटी पर कालेज आयाजाया करती थीं. विनय ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया.

मगर तुरंत ही वह चौंक पड़ा. एक बाइक पर सवार 3 आवारा लड़के अश्लील हरकतें करते हुए वीणा व शीला का पीछा कर रहे थे. किसी अनिष्ट की आशंका से वह साइकिल से उन का पीछा करने लगा.

उस ने देखा, वे दोनों उन आवारा लड़कों से पीछा छुड़ाने के लिए स्कूटी की रफ्तार बढ़ाती जा रही थीं. मगर वे भी बाइक की रफ्तार उसी तरह बढ़ा रहे थे. उस रफ्तार में साइकिल से उन का पीछा करना मुश्किल था फिर भी वह जीजान से उन के पीछे लगा रहा.

इत्तफाक से एक जगह जाम लगा हुआ था. इस से बाइक की रफ्तार कुछ धीमी हो गई. यह देखते ही विनय ने साइकिल और तेज कर दी. वह सोच चुका था कि अब उसे क्या करना है. करीब पहुंचते ही उस ने साइकिल से बाइक पर एक जोरदार टक्कर मारी. बाइक तुरंत लड़खड़ा कर गिर पड़ी, उसी के साथ वे तीनों भी नीचे जमीन पर गिर गए.

‘‘सौरी, भाईसाहब. अचानक मेरी साइकिल के बे्रक फेल हो गए,’’ विनय बोला. मगर तभी उन्होंने विनय को लड़कियों को हाथ से भाग जाने का इशारा करते देख लिया. वे उस की चालाकी समझ गए. उन्होंने अपने एक साथी को विनय से निबटने के लिए छोड़ उन लड़कियों को घेर लिया.

विनय के लिए अब काम आसान हो गया था. उस ने कराटे के दोएक वार में ही युवक को इस तरह चित्त कर दिया कि वह फिर उठने लायक ही नहीं रहा.

उधर विनय जब उन लोगों के पास पहुंचा तो देखा कि वहां भारी भीड़ इकट्ठी हो गई थी. उन आवारा लड़कों ने वीणा और शीला के दुपट्टे फाड़ कर फेंक दिए थे. वे दोनों चीख रही थीं. मगर भीड़ मूकदर्शक बनी खड़ी थी. गुंडों के भय से कोई आगे आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. कहीं उन के पास हथियार हुए तो? तभी विनय की नजर भीड़ में खड़े राजेंद्र और नरेश पर पड़ी. इस समय वे भी भीड़ का हिस्सा बने हुए थे जैसे कि वे वीणा और शीला को पहचानते ही न हों.

विनय के लिए अब खुद को रोकना मुश्किल हो गया. वह ललकारता हुआ बाइकर्स पर टूट पड़ा. एक मामूली से लड़के के इस साहस से प्रभावित हो कर भीड़ में मौजूद लोग भी उन पर टूट पड़े और उन की अच्छीखासी पिटाई करने के बाद तीनों को पुलिस को सौंप दिया. विनय ने एक नजर वीणा और शीला पर डाली तो उन की आंखों में कृतज्ञता के आंसू झलक रहे थे. मगर विनय वहां एक मिनट के लिए भी नहीं रुका, क्योंकि उसे मां के लिए दवा भी तो ले जानी थी.

अगले दिन न चाहते हुए भी मां की दवा के लिए रखे पैसों में से विनय ने डेढ़ सौ रुपए निकाल लिए. विनय के कालेज पहुंचने से पहले ही उस के इस साहसिक कारनामे की सूचना पूरे कालेज को लग चुकी थी. मगर सब से पहले वह फीस के बाकी पैसे ले कर औफिस में गया, लेकिन वह चकित रह गया जब क्लर्क ने उसे बताया, ‘‘नहीं, इन्हें और कल दिए हुए पैसों को भी वापस रख लो. तुम्हारी पूरी फीस किसी और ने जमा कर दी है.’’

‘‘मगर सर, किस ने?’’

‘‘जमा करने वाले ने नाम न बताने की शर्त पर ऐसा किया है.’’

विनय समझ गया. उस ने शीला और वीणा की ओर देखा. उन की आंखें नीचे झुकी हुई थीं. पहले तो उस ने सारे पैसे उन्हें लौटाने की बात सोची, मगर फिर मां की बीमारी का खयाल कर फिलहाल उस ने चुप रहना ही ठीक समझा.

प्रिंसिपल के नोटिस पर मध्यावकाश में 10 मिनट के लिए कालेज के सभी छात्र और टीचर हौल में पहुंचे. प्रिंसिपल बोले, ‘‘आप लोग यहां बुलाए जाने का उद्देश्य तो समझ ही रहे होंगे. मैं चाहता हूं कि आप सब के सामने उस छात्र को उपस्थित करूं जिस ने इस कालेज का नाम रोशन किया है. आप ने व्यंग्य से उसे चाणक्य नाम दिया है. इतिहास में एक ही चाणक्य पैदा हुआ है. मगर विनय ने कल जिस साहस का परिचय दिया, वह किसी चाणक्य से कम नहीं है. इतिहास का चाणक्य कूटनीति में पारंगत था और हमारा चाणक्य बेमिसाल साहस का धनी है. उस का कराटे का ज्ञान कल खूब काम आया. आओ विनय, लोग तुम्हारे मुख से भी दो शब्द सुनना चाहते हैं.’’

प्रिंसिपल के पीछे खड़ा विनय सामने आ कर बोला, ‘‘आदरणीय गुरुजन और साथियो, मुझे आप से केवल दो बातें कहनी हैं. पहली यह कि अपनी माताबहनों के साथ आवारा लड़कों द्वारा अश्लील हरकतें करते देख चुप न रहें, भीड़ के साथ आप भी मूकदर्शक न बनें. आवारा लड़कों में कोई बल नहीं होता. आप उन्हें ललकारते हुए आगे बढ़ें. विश्वास कीजिए, आप की हिम्मत देख भीड़ भी उन्हें मजा चखाने आगे आ जाएगी.

‘‘दूसरी बात यह कि आप किसी को भी सोचसमझ कर ही अपना दोस्त बनाएं. दोस्त भरोसेमंद और संकट में काम आने वाला हो.’’

पूरे कालेज ने तालियों से विनय के इन शब्दों का स्वागत किया.

परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ. विनय पूरे कालेज में अव्वल आया. उस की इस सफलता पर बधाई देने वालों में सब से पहले उस के घर पहुंचने वाली वीणा और शीला थीं. उन के भीतर आया बदलाव बिना कुछ बोले ही उन के चेहरे पर साफ झलक रहा था.  Social Story 

Indian Tennis : लौन टेनिस में इसलिए बहुत पीछे पहुंच गया भारत

Indian Tennis : यह ठीक है कि लौन टेनिस पैसे वालों और अभिजात्यों का खेल है लेकिन याद यह भी रखा जाना चाहिए कि कभी क्रिकेट के भी यही हाल थे पर जैसे ही गली कूचों में यह खेला जाने लगा तो सभी वर्गों की भागीदारी इस में बढ़ी और आमदनी में हिस्सेदारी भी बढ़ी. क्यों लौन टेनिस में ऐसा होना मुमकिन नहीं दिख रहा.

6 और 7 अगस्त को न्यूयौर्क सिटी का लगभग 23 हजार दर्शकों की क्षमता वाला आर्थर एश स्टेडियम ठसाठस भरा था. लौन टेनिस की सब से अहम प्रतिस्पर्धा यूएस ओपन को देखने दर्शकों ने सब से सस्ता 28,303 रुपए का टिकिट भी ख़रीदा था और सब से महंगा 14 लाख रुपए से भी ज्यादा का भी लिया था जो लौन टेनिस और खासतौर से इस प्रतिस्पर्धा के प्रति अमेरिकियों के जूनून को भी दिखाता है.

विमेंस फाइनल 6 अगस्त को खेला गया था जिस में अमेरिका की अमांडा अनीसिमोवा का मुकाबला बेलारूस की तेजतर्रार आर्यना सबालेंका से था. इस कड़े मुकाबले में सबालेंका ने अनिसिमोवा को 6-3 7-6 ( 7-3 ) से शिकस्त देते लगातार दूसरी बार यह ख़िताब और 44 करोड़ रुपए की इनामी राशि दोनों अपने नाम कर लिए.

पहले सेट में जो मुकाबला उबाऊ और एकतरफा रहा था, दूसरे सेट में रोमांचक मोड़ पर पहुंचा था जिस में सबालेंका के सामने असहाय नजर आ रहीं अनिसिमोवा को दर्शकों का लगातार प्रोत्साहन मिल रहा था. अमेरिकी दर्शक किसी भी सूरत में उन्हें जीतते देखना चाह रहे थे. दूसरे सेट में स्कोर जब 6 – 6 की बराबरी पर आया तब ऐसा लग भी रहा था कि अनिसिमोवा को घरेलू माहौल का फायदा मिल रहा है. लेकिन हिम्मत न हारते हुए टाई ब्रेकर में सबालेंका ने न केवल अनिसिमोवा की सर्विस कई बार ब्रेक की बल्कि अपने तेज शौट्स के आगे भी उन्हें कोर्ट में दाएंबाएं नचाते हारने को मजबूर कर दिया.

यही हाल शुरू में मेंस फाइनल में भी दिख रहा था, जब पहले सेट में स्पेन के कार्लोस अल्कराज ने इटली के यानिक सिनर को 6-2 से पछाड़ दिया था. इस सेट को देखते हुए लग नहीं रहा था कि सिनर कोई बड़ी और कड़ी चुनौती पेश कर पा रहे हैं. लेकिन दूसरे सेट में शानदार वापसी करते हुए उन्होंने अल्कराज को 6-3 से हराया तो लगा कि मुकाबला लम्बा चलेगा. पर तीसरे सेट में वे फिर लड़खड़ा गए और अल्कराज ने उन्हें 6-1 पर रोक दिया.

चौथे और निर्णायक सेट में जरुर सिनर जोश में दिखे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अल्कराज ने कड़े संघर्ष के बाद यह सेट 6-4 से जीत कर ट्राफी और 44 करोड़ रुपए समेट लिए साथ ही नम्बर बन की रैंक भी हथिया ली.

फुस्स हुई भारतीय चुनौती

सिंगल्स में तो कोई भारतीय क्वालीफाई ही नहीं कर पाया था लेकिन डबल्स में भारत के रोहन बोपन्ना और युकी भाम्बरी ने थोड़ा दम दिखा कर भारत की लाज हाजिरी दर्ज कराने की रस्म निभाते रख ली थी. युकी के पार्टनर थे न्यूजीलैंड के माइकल वीनस, इन दोनों ने मिल कर मेंस डबल में सेमी फाइनल तक का सफर तय किया लेकिन वहां ब्रिटिश जोड़ी से हार गए. नील स्कुप्सकी और जो सेलिस्बरी की जोड़ी ने कड़े मुकाबले में इंडो कीवी जोड़ी को 7-6 6-7 4-6 से शिकस्त देने में कामयाबी हासिल कर ली. युकी का यह पहला ग्रैंड स्लेम सेमी फाइनल था जिस के लिए उन्हें एक करोड़ 4 लाख रुपए मिले.

भविष्य के लिए युकी एक संभावना बन कर उभरे हैं लेकिन सीनियर खिलाड़ी तमिलनाडु के रोहन बोपन्ना और उन के जोड़ीदार मोनाको के रोमेन अर्नोड़ो की पहले ही सेट में करारी हार से यह भी लगा कि भारतीय खिलाड़ी मुकाबला सिंगल हो या डबल कैरियर के शुरूआती दौर में ही थोड़ा दमखम दिखा पाते हैं फिर थकान का शिकार हो कर पहले दूसरे राउंड में फुस्स हो कर रह जाते हैं. इस जोड़ी को अमरीकी जोड़ी रौबर्ट कैश और जेम्स ट्रेसी ने 6-4 6-3 से हराया.

45 साल के हो रहे रोहन में अब दमखम नहीं बचा है हालांकि डबल्स में उन का प्रदर्शन संतोषजनक रहा है, लेकिन चौंकाने वाला कभी नहीं रहा. डेविस कप में भी उन का खेल मध्यम यानी कामचलाऊ ही रहा है. यूएस ओपन की इस शर्मनाक हार के बाद उन के सन्यास लेने की अटकलें लगाई जा रही हैं जो उन्हें अब ले भी लेना चाहिए वजह अब वे बूढ़े हो चुके हैं और 15 साल में लगभग 50 करोड़ रुपए भी टेनिस की अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं से कमा चुके हैं.

इस टूर्नामेंट में पहले राउंड में ही बाहर होने के बाद भी उन्हें लगभग सवा लाख रुपए की इनामी राशि मिली है. अब उन की कोशिश अपनी टेनिस अकादमी के जरिये देश के लिए अच्छे खिलाड़ी देने की होनी चाहिए.

नए उभरते भारतीय खिलाड़ी भी कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए. अनिरुद्ध चंद्रशेखर और विजय सुंदर प्रशांत मेंस डबल का पहला राउंड जीतने के बाद दूसरे राउंड में हार गए. इसी तरह अर्जुन कढ़े भी मेंस डबल में पहले ही राउंड में बाहर हो गए. एन श्रीराम भी मेंस डबल में कब किस से हार कर बाहर हो गए इस की खबर तक किसी को पढ़ने नहीं मिली. यह नजारा भारत में लौन टेनिस की दयनीय होती हालत का ही उदहारण है, नहीं तो एक दौर वह भी था जब भारतीय खिलाड़ी ग्रैंड स्लेम टूर्नामेंट्स में अपने अकेले की दम पर दुनिया भर का ध्यान अपनी तरफ खींचने में सफल रहते थे.

कभी इन्होंने गाड़े थे झंडे

वह 60 के दशक की शुरुआत थी जब 1960 में ही लौन टेनिस का महाकुम्भ कहे जाने वाले विम्बलडन में रमनाथन कृष्णन ने सेमी फाइनल तक पहुंचते हुए भारतीय परचम लहराया था. इस जीत को इत्तफाक ही माना जाता अगर कृष्णन लगातार दूसरे साल भी सेमी फाइनल तक का सफर तय करने में कामयाब नहीं होते. इतना ही नहीं 1960 में ही वे फ्रेंच ओपन के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे थे. सेमी फाइनल में भी वे उस दौर के धुरंधर नील फ्रेजर से हारे थे. सेमी फाइनल तक का सफर तय करने के लिए उन्होंने जिन 5 खिलाड़ियों के मंसूबे ध्वस्त किए थे उन में एंड्रेस गिमेनो और जान पियर्स भी शामिल थे.

1961 के सेमी फाइनल में भी वे राड लेवर जैसे दिग्गज से हारे थे. इन्ही लेवर को उन्होंने 1959 के डेविस कप में धूल चटाई थी. तब टेनिस की दुनिया में कृष्णन के चर्चे आम होने लगे थे. भारत के लिहाज से ये उपलाब्धियां असाधारण ही थीं जिन्होंने दूसरे उभरते खिलाड़ियों का उत्साह ही बढ़ाया था. इन में एक जानामाना नाम विजय अमृतराज का है जो विम्बलडन मेंस सिंगल के क्वार्टर फाइनल तक दो बार 1973 और 1981 में पहुंचे थे.

आज जिस यूएस ओपन के सिंगल में खेलने कोई भारतीय क्वालीफाई भी नहीं कर पाया विजय अमृतराज 1973 में उस के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे थे. विम्बलडन 1976 में उन की जोड़ी जिमी कानर्स के साथ थी जो मेंस डबल में सेमी फाइनल तक पहुंची थी. आनंद अमृतराज ने भी इसी दौर में झंडे गाड़े हालांकि सिंगल्स में वे कभी क्वार्टर फाइनल तक नहीं पहुंच पाए थे. लेकिन तीसरे दौर तक का सफर वे इत्मिनान से तय कर लेते थे.

अमृतराज बंधुओं के बाद 15 साल तक उल्लेखनीय कुछ नहीं हुआ पर 90 के दशक में लिएंडर पेस की धमक से एक बार फिर से भारतीय चुनौती डबल्स में ही सही जोरदार तरीके से चमकी. कृष्णन और अमृतराज युगों की उपलाब्धियों को याद दिलाया उन के 8 मेंस डबल खिताबों और कुल 54 डबल्स खिताबों ने जिन में 1999 का विम्बलडन भी शामिल है. इस में उन के पार्टनर महेश भूपति थे.

मिक्स डबल में उन्होंने 3 बार फ्रेंच ओपन का खिताब झटका जिन में उन की जोड़ीदार मार्टिना हिंगिस जैसी नामचीन खिलाड़ी थीं. मिक्स डबल में उन की जोड़ीदार मार्टिना नवरातिलोवा और लिसा रेमंड भी रहीं जिन के जिक्र के बगैर टेनिस पूरा नहीं होता. हिंगिस के साथ उन्होंने 2015 में यूएस ओपन मिक्स डबल अपना नाम किया था और इस के 7 साल पहले कारा ब्लेक के साथ यही करिश्मा कर दिखाया था.

पेस की उपलब्धियां देखें तो मौजूदा खिलाड़ी उन के सामने कहीं नहीं टिकते. 1996 के ओलम्पिक में उन्होंने भारत को कांस्य पदक दिलाया था अलावा इस के वे पहले भारतीय हैं जिस ने सभी चारों यानी विम्बलडन, फ्रेंच, यूएस व आस्ट्रेलियन ओपन ग्रैंड स्लेम जीते. एशियाई खेलों में भी उन की चमक देखने को मिली थी जब उन्होंने मिक्स डबल में सानिया मिर्जा के साथ गोल्ड मेडल भारत की झोली में डाला था. 2006 के ही दोहा ओलम्पिक में महेश भूपति के साथ मेंस डबल भी जीता था. इस जोड़ी को विदेशी मीडिया ने इंडियन एक्सप्रेस नाम दिया था.

फिर दौर आया सानिया मिर्जा युग का जिस से लौन टेनिस में महिलाओं की भागीदारी सामने आई. सानिया और मार्टिना हिंगिस की जोड़ी ने 2015 में इतना धमाल मचाया था कि उसे `सतिना` का टाइटल दे दिया गया था. इस साल इस जोड़ी ने विम्बलडन और यूएस ओपन के ख़िताब अपने नाम कर तहलका मचा दिया था. 2016 का आस्ट्रेलियन ओपन भी इस जोड़ी ने जीता था. सानिया ने अपने कैरियर में 3 मिक्स डबल भी अपनी झोली में डाल सनसनी मचा दी थी. पेस के बाद वह दूसरी भारतीय खिलाड़ी थीं जिस ने चारों ग्रैंड स्लेम जीते थे. विमेंस डबल में सानिया को दुनिया भर में पहली रैंकिंग मिली थी जिस से भारत का नाम टेनिस की दुनिया में एक चुनौती के तौर पर गिना जाने लगा था.

लिएंडर पेस और सानिया मिर्जा को 4 अहम पुरुस्कार पद्म श्री, पद्म भूषण, अर्जुन पुरुस्कार और राजीव गांधी खेल रत्न मिले थे तब लौन टेनिस की लोकप्रियता चरम पर थी और भारतीय खिलाड़ियों की उपलाब्धियों ने हर किसी की दिलचस्पी इस में बढ़ाई थी. पर यह दिलचस्पी क्रिकेट सरीखी भागीदारी में तब्दील नहीं हो पाई.

इसलिए पिछड़े टेनिस में

इस की अहम वजह यह रही कि क्रिकेट लौन टेनिस के मुकाबले सस्ता खेल है जिस की पिच महल्ले के छोटे ग्राउंड्स और गलियों में भी बन जाती है. उलट इस के टेनिस महंगा और मसल्स पावर वाला खेल है और हर कहीं नहीं खेला जा सकता. दूसरे इस पर 60 के दशक से ही दक्षिण भारत का दबदबा रहा कृष्णन और अमृतराज बंधुओं से ले कर लिएंडर पेस और सानिया मिर्जा तक दक्षिणी राज्यों से आए. उत्तर भारत यानी हिंदी पट्टी में इसे न तो कोई प्रोत्साहन मिला और न ही विस्तार मिला.

सरकारी उदासीनता भी इस की एक बड़ी वजह रही और कोर्ट की कमी भी रही, हालांकि अब दिल्ली, लखनऊ, भोपाल और जयपुर जैसे शहरों में लौन टेनिस के प्रशिक्षण केंद्र अकादमियां और कोर्ट्स हैं लेकिन वे सब क्लब स्तर तक ही सिमटे हैं. स्कूल कालेजों के किशोर और युवाओं ने लौन टेनिस का नाम भर सुना है कभी इस का रैकेट उन्होंने हाथ में ले कर नहीं देखा. यूएस ओपन 2025 में भी दक्षिण भारत के खिलाड़ी ही दिखे लेकिन वे कुछ नतीजे नहीं दे पाए. हौकी से तुलना करें तो यह मैदानी खेल उत्तर और मध्य भारत के कब्जे में रहा जबकि फुटबाल पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत के प्रभाव और वर्चस्व में रहा.

एक क्रिकेट छोड़ देश सभी खेलों में पिछड़ रहा है तो जाहिर है क्षेत्रवाद इस की वजह है. लौन टेनिस में खोया गौरव अब केवल साउथ के भरोसे हासिल नहीं किया जा सकता क्योंकि वहां से निकले खिलाड़ी अब यूरोप और अमेरिका को टक्कर नहीं दे पा रहे हैं. जरूरत इस बात की है कि टेनिस को गली महल्ले स्तर तक लोकप्रिय बनाया जाए लेकिन ऐसा होना हालफिलहाल तो संभव नहीं दिख रहा. Indian Tennis

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें