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Bihar Elections : चुनाव के बाद नीतीश कुमार का होगा क्या

Bihar Elections : बिहार में अगर किसी बात की सब से ज्यादा चर्चा है वह यह कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा. नीतीश कुमार अब पहले जैसे नजर नहीं आते, उन का राजनीतिक ग्राफ उन के स्वास्थय की तरह तेजी से गिर रहा है.

243 विधान सभा सीटों वाले बिहार के विधान सभा चुनाव पर सब की नजर है. उत्सुकता दो बातों को ले कर सब से अधिक है, पहली कि कौन बनेगा बिहार का मुख्यमंत्री, दूसरी की नीतीश कुमार का क्या होगा ? नीतीश कुमार 9 बार बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. बिहार में सब से लंबे समय तक बने रहने वाले वह मुख्यमंत्री हैं. 2025 के विधानसभा चुनाव को ले कर अब यह आंकलन निकल कर सामने आ रहा है कि नीतीश कुमार का गेम ओवर हो चुका है. इस का लाभ भाजपा की जगह पर प्रशांत किशोर और चिराग पासवान के खाते में जा रहा है. ऐसे में एक अहम सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रशांत किशोर और चिराग पासवान में से कोई एक नीतीश कुमार की जगह लेने जा रहा है. इस बात का फैसला विधानसभा चुनाव में मिलने वाली सीटों से होगा.

इतना तय है कि भाजपा की सरकार बने या न बने बिहार की राजनीति में अब नीतीश कुमार का दबदबा खत्म होने जा रहा है. बिहार के जातीय समीकरण को देखें तो नीतीश कुमार का कोई बड़ा जनाधार नहीं रहा है. इस के बाद भी वह बिहार की राजनीति में सब से असर डालने वाले नेता रहे हैं. अपनी पलटी मारने की कला में माहिर नीतीश कुमार की अपनी छवि साफसुथरी रही है. परिवारवाद से दूर रही है. यह राजनीति का वह दौर है जहां अपने दल और राजनीति को बचाए रखने के लिए परिवार का सहारा जरूरी होता है. नीतीश कुमार का जदयू, मायावती की बसपा, ममता बनर्जी की टीएससी इस का खामियाजा भुगतेगी.

लंबी पारी खेलने वाले खिलाड़ी रहे हैं नीतीश कुमार

नीतीश कुमार की राजनीति जयप्रकाश नारायण की समाजवादी विचारधारा के साथ शुरू हुई. पिछड़ों की अगुवाई करने वाले लालू प्रसाद यादव को हाशिए पर ढकेलने के लिए ऊंची जातियों ने नीतीश कुमार का प्रयोग किया. नीतीश कुमार की पैदाइश 1 मार्च 1951 को बिहार में नालंदा जिले के कल्याण बीघा गांव में हुई थी. नीतीश ने बिहार कालेज औफ इंजीनियरिंग (एनआईटी पटना) से इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की और कुछ समय तक बिहार स्टेट इलैक्ट्रिसिटी बोर्ड में नौकरी की थी. यहां नौकरी छोड़ कर राजनीति में सक्रिय हो गए.

नीतीश कुमार पिछड़े वर्ग की कुर्मी जाति के हैं. उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ कर 1975 में राजनीति में प्रवेश किया और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़ गए. नीतीश कुमार 1977 और 1980 का विधानसभा हार गए. 1985 में पहली बार उन को जीत मिली. इस के बाद युवा लोकदल के अध्यक्ष और बाद में जनता दल के प्रदेश सचिव बन गए. 1990 में केन्द्र की चन्द्रशेखर सरकार वह पहली बार केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री बने.

1991 में वह एक बार फिर लोकसभा के लिए चुने गए. इस साल ही जनता दल का राष्ट्रीय सचिव भी चुना गया. 1989 और 2000 में वह बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीता. जनता दल का साथ छोड़ कर समता पार्टी से 1989-1999 में वह भाजपा की अटल सरकार में केन्द्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री बने. 2005 में बिहार विधानसभा के चुनाव में नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाइटेड नाम से अपनी पार्टी बना ली थी.

लालू यादव के जंगलराज और परिवारवाद के खिलाफ जनता को विकास का वादा कर के चुनाव जीतने में सफल रहे. भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बन गए. 2010 में फिर मुख्यमंत्री के चुनाव हुए. इस में नीतीश को भारी जीत मिली. अब तक नीतीश को भाजपा की जरूरत खत्म हो गई थी तो वह भाजपा से अलग हो गए.

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश ने भाजपा से नाता तोड़ कर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ महागठबंधन कर लिया. चुनाव में महागठबंधन की जीत के बाद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री और राजद नेता लालू प्रसाद यादव के बेटे और तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बन गए. नीतीश और तेजस्वी यादव के बीच संबंधों की खींचतान के कारण महागठबंधन में विवाद शुरू हुआ था.

20 महीने में पुरानी महागठबंधन सरकार गिर गई तो नीतीश कुमार पाला बदल कर वापस भाजपा की तरफ आ गए. 2020 में वह एनडीए गठबंधन में शामिल हुए और मुख्यमंत्री पद की पुनः शपथ ली. भाजपा के सहयोग से सरकार चलाने लगे. कहानी यही खत्म नहीं होती है. 2022 में भाजपा और नीतीश फिर अलग हो जाते हैं. इस के बाद नीतीश वापस लालू यादव के साथ आते हैं और मुख्यमंत्री बने रहते हैं. 2023 में लोकसभा चुनाव के पहले वह लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़ कर वापस भाजपा के साथ आते हैं. तब से अब तक वह भाजपा के साथ है और बिहार चुनाव उनके मुख्यमंत्री रहते लड़ा जा रहा है.

नीतीश कुमार सेहत को ले कर तमाम सवाल उठ रहे हैं. वैसे उन की उम्र 74 साल ही है. उन के समकक्ष नरेंद्र मोदी 2029 में भी लोकसभा चुनाव में भाजपा की अगुवाई करने का दम भर रहे हैं. नीतीश उतने फिट नहीं हैं. उन के तमाम ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं जिस में वह कहना करना कुछ चाह रहे हैं पर हो कुछ और जा रहा है. बिहार विधान सभा चुनावी प्रचार में उन की भूमिका न के बराबर दिख रही है. इसीलिए यह आंकलन हो रहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार का ‘गेम ओवर’ हो जाएगा.

प्रशांत किशोर कई बार कह चुके हैं कि नीतीश कुमार गंभीर मानसिक बीमारी के शिकार हैं. वह अपने बगल बैठे व्यक्ति का नाम याद नहीं रख पाते. प्रशांत किशोर यह भी कहते हैं कि अगर कोई मानहानि का दावा करना चाहे तो कर सकता है. बिहार की राजनीति के दूसरे जानकार भी उन को मुखौटा मुख्यमंत्री कहते हैं.

असल में नीतीश की खामी का परिणाम भाजपा को भी भुगतना पड़ सकता है. नीतीश कुमार ही उन का चेहरा हैं, जो भाजपा को सत्ता के करीब लाते हैं. और बीमारी जिस के कारण महत्वपूर्ण कार्यक्रम तक छूट जा रहे हैं. ऐसे में चुनाव प्रचार से भी अगर नीतीश कुमार दूर रह गए तो एनडीए के चुनावी प्रदर्शन पर भी इस का असर पड़ेगा.

एनडीए में शामिल छोटे दलों ने पहले से ही डिमांड का पहाड़ खड़ा कर रखा है. तब ये सौ फीसदी स्ट्राइक रेट वाली पार्टियां हिस्सेदारी की सीमा हर हाल में पाना चाहेंगी. ये स्थितियां महागठबंधन की लड़ाई को अतिरिक्त ताकत दे जाएगा. एनडीए में नीतीश कुमार के विकल्प को ले कर कोई चेहरा भी नहीं है. भाजपा चुनाव के पहले नीतीश कुमार के नाम को ले कर कोई बदलाव भी करने की हालत में नहीं है. ऐसे में नीतीश कुमार भाजपा के लिए एक बोझ साबित हो रहे हैं. जिन को साथ ले कर दौड़ने का मतलब है रेस हारना और इन को छोड़ कर अलग दौड़ लगाने का मतलब भी रेस हारना ही है. Bihar Elections

Romantic Story In Hindi : मेरी डोर कोई खींचे – दो प्रेमियों की अधूरी प्रेम कहानी

Romantic Story In Hindi : ट्रक से सामान उतरवातेउतरवाते रचना थक कर चूर हो गई थी. यों तो यह पैकर्स वालों की जिम्मेदारी थी, फिर भी अपने जीवनभर की बसीबसाई गृहस्थी को यों एक ट्रक में समाते देखना और फिर भागते हुए ट्रक में उस का हिचकोले लेना, यह सब झेलना भी कोईर् कम धैर्य का काम नहीं था. उस का मन तब तक ट्रक में ही अटका रहा था जब तक वह सहीसलामत अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच गया था.

खैर, रचना के लिए यह कोई नया तजरबा नहीं था. तबादले का दंश तो वह अपने पिता के साथ बचपन से ही झेलती आ रही थी. हां, इसे दंश कहना ही उचित होगा क्योंकि इस की तकलीफ तो वही जानता है जो इसे भुगतता है. रचना को यह बिलकुल पसंद नहीं था क्योंकि स्थानांतरण से होने वाले दुष्परिणामों से वह भलीभांति परिचित थी.

बाकी सब बातों की परवा न कर के जिस बात से रचना सब से ज्यादा विचलित रहती थी वह यही थी कि पुराने साथी एकाएक छूट जाते हैं, सभी दोस्त, साथी गलीमहल्लों के रिश्ते पलक झपकते ही पराए हो जाते हैं और हम खानाबदोशों की तरह अपना तंबू दूसरे शहर में तानने को मजबूर हो जाते हैं. अजनबी शहर, उस के तौरतरीके अपनाने में काफी दिक्कत आती है.

नए शहर में कोई परिचित चेहरा नजर नहीं आता. वह दुखसुख की बात करे तो किस से? घर जाए तो किस के और अपने घर बुलाए तो भी किसे? नया शहर, नया घर उसे काटने को दौड़ता था.

सौरभ यानी रचना के पति को इस से विशेष फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि उन को तो आते ही ड्यूटी जौइन करनी होती थी और वे व्यस्त हो जाते थे. यही हाल बेटे पर्व और बेटी पूजा का था. वे भी अपने नए स्कूल व नई कौपीकिताबों में खो जाते थे. रह जाती थी तो रचना घर में बिलकुल अकेली, अपने अकेलेपन से जूझती.

यह तो भला हो नई तकनीक का, जिस ने अकेलेपन को दूर करने के कई साधन निकाल रखे हैं. रचना उठतेबैठते फेसबुक व व्हाट्सऐप के जन्मदाताओं का आभार व्यक्त करना नहीं भूलती थी. उस की नजर में लोगों से जुड़ने के ये साधन अकेलापन तो काटते ही हैं, साथसाथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी प्रदान करते हैं, खासकर स्त्रियों को. घर की चारदीवारी में रह कर भी वह अपने मन की बात इन के जरिए कर सकती है.

दिनचर्या से निवृत्त होने के बाद रोज की तरह रचना अपना स्मार्टफोन ले कर बैठ गई. उस में एक फ्रैंडरिक्वैस्ट थी, नाम पढ़ते ही वह चौंक गई-नीरज सक्सेना. उस ने बड़ी उत्सुकता से उस की प्रोफाइल खोली तो खुशी व आश्चर्य से झूम उठी. ‘अरे, यह तो वही नीरज है जो मेरे साथ पढ़ता था,’ उस के मुंह से निकला. पापा का अचानक से ट्रांसफर हो जाने के कारण वह किसी को अपना पता नहीं दे पाई थी और नतीजा यह था कि फेयरवैल पार्टी के बाद आज तक किसी पुराने सहपाठी से नहीं मिल पाई थी.

उस के अंतर्मन का एक कोना अभी भी खाली था जिस में वह सिर्फ और सिर्फ अपनी पुरानी यादों को समेट कर रखना चाहती थी और आज नीरज की ओर से भेजी गई फ्रैंडरिक्वैस्ट दिल के उसी कोने में उतर गई थी. उस ने फ्रैंडरिक्वैस्ट स्वीकार कर ली.

फिर तो बातों का सिलसिला चल निकला और जब भी मौका मिलता, दोनों पुराने दिनों की बातों में डूब जाया करते थे. बातों ही बातों में उसे पता चला कि नीरज भी इसी शहर में रहता है और यहीं आसपास रहता है.

रचना ने सौरभ को भी यह बात बताईतो सौरभ ने कहा, ‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है, तुम सदा शिकायत करती थी कि आप के तो इतने पुराने दोस्त हैं, मेरा कोई नहीं, अब तो खुश हो न? किसी दिन घर बुलाओ उन्हें.’’

एक दिन रचना ने नीरज को घर आने का न्योता दिया. इस के बाद बातों के साथसाथ मिलनेजुलने का सिलसिला भी शुरू हो गया. नीरज को जब भी फुरसत मिलती, वह रचना से बात कर लेता और घर भी आ जाता था.

नीरज अकसर अकेला ही आता था, तो एक दिन सौरभ बोले, ‘‘भई, क्या बात है, आप एक बार भी भाभीजी व बच्चों को नहीं लाए. उन को भी लाया कीजिए.’’

यह सुन कर नीरज बोला, ‘‘अवश्य लाता, यदि वे होते तो?’’

क्या मतलब, तुम ने अभी तक शादी नहीं की, सौरभ ने चुटकी काटी जबकि  रचना सौरभ को बता चुकी थी कि वह शादीशुदा है और एक बेटे का बाप भी है.

सौरभ की बात सुन कर नीरज झेंप कर बोला, ‘‘मेरा कहने का मतलब था- यदि वे यहां होते. प्रिय व संदीप अभी यहां शिफ्ट नहीं हुए हैं, स्कूल में ऐडमिशन की दिक्कत की वजह से ऐसा करना पड़ा.’’

‘‘ठीक कह रहे हो तुम, बड़े शहरों में किसी अच्छे स्कूल में ऐडमिशन करवाना भी कम टेढ़ी खीर नहीं है. हम ने भी बहुत पापड़ बेले हैं बच्चों के ऐडमिशन के लिए.’’

अब सौरभ और नीरज में भी दोस्ती हो गई थी और स्थिति यह थी कि कई बार नीरज बिना न्योते के भी खाने के समय आ जाता था. नीरज के घर में आने से रचना बहुत खुश रहती थी और बहुत ही मानमनुहार से उस की खातिरदारी भी करती थी.

एक बार खाने के समय जब नीरज के बारबार मना करने पर भी रचना ने एक चपाती परोस दी तो सौरभ से रहा नहीं गया और वे बोले, ‘‘खा लो भैया, इतनी खुशामद तो ये मेरी भी नहीं करती.’’

बात साधारण थी पर रचना को यह चेतावनी सी प्रतीत हुई. पतिपत्नी के नाजुक रिश्ते में कभीकभी ऐसी छोटीछोटी बातें भी नासूर बन जाती हैं, इस का एहसास था उसे. उस दिन के बाद से वह हर वक्त यह खयाल भी रखती कि उस के किसी भी व्यवहार के लिए सौरभ को टोकना न पड़े क्योंकि रिश्तों में पड़ी गांठ सुलझाने में हम अकसर खुद ही उलझ जाते हैं.

एक शाम जब सौरभ औफिस से आए तो बोले, ‘‘आई एम सौरी, रचना, मुझे कंपनी की ओर से 15 दिनों के टूर पर अमेरिका जाना पड़ेगा. मेरा मन तो नहीं है कि मैं तुम्हें इस नए शहर में इस तरह अकेले छोड़ कर जाऊं पर क्या करूं, बहुत जरूरी है, जाना ही पड़ेगा.’’

यह सुन कर रचना को उदासी व चिंता की परछाइयों ने घेर लिया. वह धम्म से पलंग पर बैठ गई और रोंआसा हो कर बोली, ‘‘अभी तो मैं यहां ठीक तरह से सैटल भी नहीं हुई हूं. आप तो जानते ही हैं कि आसपड़ोस वाले सब अपने हाल में मस्त रहते हैं. किसी को किसी की परवा नहीं है यहां. ऐसे में 15 दिन अकेली कैसे रह पाऊंगी.’’

‘‘ओह, डोंट वरी, आई नो यू विल मैनेज इट. मुझे तुम पर पूरा भरोसा है.’’

और फिर दूसरे दिन ही सौरभ अमेरिका चले गए और रचना अकेली रह गई. यों तो रचना घर में रोज अकेली ही रहती थी पर इस उम्मीद के साथ कि शाम को सौरभ आएंगे. आज वह उम्मीद नहीं थी, इसलिए घर में उस सूनेपन का एहसास अधिक हो रहा था.

खैर, वक्त तो काटना ही था. बच्चों के साथ व्यस्त रह कर, कुछ घरेलू कामकाज निबटा कर रचना अपना जी लगाए रखती. पर बच्चे भी पापा के बिना बड़े अनमने हो रहे थे. नन्हीं पूजा ने तो शायद इसे दिल से ही लगा लिया था. सौरभ के जाने के बाद उस का खानापीना काफी कम हो गया था. वह रोज पूछती, ‘पापा कब आएंगे?’ और रचना चाह कर भी उसे खुश नहीं रख पाती थी.

एक शाम पूजा को बुखार आ गया. बुखार मामूली था, इसलिए रचना ने घर पर रखी बुखार की दवा दे दी. फिर समझाबुझा कर कुछ खिला कर सुला दिया. आधी रात को पूजा के कसमसाने से रचना की नींद खुली तो उस ने देखा, पूजा का बदन बुखार से तप रहा था. रचना झट से थर्मामीटर ले आई. बुखार 104 डिगरी था. रचना के होशोहवास उड़ गए. इतना तेज बुखार, वह रोने लगी पर फिर हौसला कर के उस ने सौरभ को फोन मिलाया.

संयोग से सौरभ ने फोन तुरंत रिसीव किया. रचना ने रोतेरोते सौरभ को सारी बात बताई.

सौरभ ने कहा, ‘‘घबराओ मत, पूजा को तुरंत डाक्टर के पास ले कर जाओ.’’

रचना ने कहा, ‘‘आप जानते हैं न, यहां रात के 12 बज रहे हैं. गाड़ी खराब है. एकमात्र पड़ोसी बाहर गए हैं. मैं और किसी को जानती भी तो नहीं इस शहर में.’’

‘‘नीरज, हां, नीरज है न, उसे कौल करो. वह तुम्हारी जरूर मदद करेगा.’’

‘‘पर सौरभ, इतनी रात, मैं अकेली, क्या नीरज को बुलाना ठीक रहेगा?’’

‘‘इस में ठीकगलत क्या है? पूजा बीमार है. उसे डाक्टर को दिखाना जरूरी है. बस, इस समय यही सोचना जरूरी है.’’

‘‘पर फिर भी…’’

‘‘तुम किस असमंजस में पड़ गईं? अरे, नीरज अच्छा इंसान है. 2-4 मुलाकातों में ही मैं उसे जान गया हूं. तुम उसे कौल करो, मुझे किसी की परवा नहीं. तुम इसे मेरी सलाह मानो या आदेश.’’

‘‘ठीक है, मैं कौल करती हूं.’’ रचना ने कह तो दिया पर सोच में पड़ गई. रात को 12 बजे नीरज को कौल कर के बुलाना उसे बड़ा अटपटा लग रहा था. वह सोचती रही, और कुछ देर यों ही बुत बन कर बैठी रही.

पर कौल करना जरूरी था, वह यह भी जानती थी. सो, उस ने फोन हाथ में लिया और नंबर डायल किया. घंटी गई और किसी ने उसे काट दिया. आवाज आई, ‘यह नंबर अभी व्यस्त है…’ उस ने फिर डायल किया. फिर वही आवाज आई.

अब क्या करूं, वह तो फोन ही रिसीव नहीं कर रहा. चलो, एक बार और कोशिश करती हूं, यह सोच कर वह रिडायल कर ही रही थी कि कौलबैल बजी.

इतनी रात, कौन हो सकता है? रचना यह सोच कर घबरा गई, ‘तभी उस के लैंडलाइन फोन की घंटी बजी. उस ने डरतेडरते फोन रिसीव किया.

‘‘हैलो रचना, मैं नीरज, दरवाजा खोलो, मैं बाहर खड़ा हूं.’’

रचना को बड़ा आश्चर्य हुआ. नीरज ने तो मेरा फोन रिसीव ही नहीं किया. फिर यह यहां कैसे आया. पर उस ने दरवाजा खोल दिया.

‘‘कहां है पूजा?’’ नीरज ने अंदर आते ही पूछा. स्तंभित सी रचना ने पूजा के कमरे की ओर इशारा कर दिया.

नीरज ने पूजा को गोद में उठाया और बोला, ‘‘घर को लौक करो. हम पूजा को डाक्टर के पास ले चलते हैं. ज्यादा देर करना ठीक नहीं है.’’

गाड़ी चलातेचलाते नीरज ने कहा, ‘‘यह तो अच्छा हुआ कि आज मैं ने सौरभजी का कौल रिसीव कर लिया वरना रात को तो मैं घोड़े बेच कर सोता हूं और कई बार तो फोन भी स्विच औफ कर देता हूं.’’

अब रहस्य पर से परदा उठ चुका था यानी कि उस के कौल से पहले ही सौरभ का कौल पहुंच चुका था नीरज के पास.

पूजा को डाक्टर को दिखा कर, आवश्यक दवाइयां ले कर रचना ने नीरज को धन्यवाद कह कर विदा कर दिया और फिर सौरभ को फोन लगाया.

इस से पहले कि सौरभ कुछ बोलता, रचना बोली, ‘‘धन्यवाद, हमारा इतना ध्यान रखने के लिए और मुझ पर इतना विश्वास करने के लिए. इतना विश्वास तो शायद मुझे भी खुद पर नहीं है, तभी तो मुझे नीरज को फोन करने के लिए इतना सोचना पड़ा.’’

सौरभ बोले, ‘‘मुझे धन्यवाद कैसा? यह तो आदानप्रदान है. तुम भी तो मुझे परदेश में इसी विश्वास के साथ आने देती हो कि मैं लौट कर तुम्हारे पास अवश्य आऊंगा. तो क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता. यह विश्वास नहीं, प्यार है.’’ Romantic Story In Hindi 

Hindi Love Stories : प्‍यार का अल्‍पविराम

Hindi Love Stories : शादी के 10 साल के बाद प्रेम क्या मर जाता है? रिश्ता भी विवाहित जोड़े क्या यंत्रचालित ढंग से निभाने लगते हैं? अब यह सब विवाहितों पर लागू होता है अथवा नहीं, यह तो वे ही जानें, स्वरा और आलोक के लिए तो यह पूर्णतया सत्य है. स्वरा और आलोक के विवाह को 9 साल से कुछ महीने ज्यादा ही हो गए थे. उन का एक 8 साल का प्यारा बेटा शिव था. आलोक एक उच्च पद पर कार्यरत था, इसलिए घर में वह सब कुछ मौजूद था, जो उसे आधुनिक और संपन्न बनाता था. शिव के जन्म के बाद स्वरा ने अपनी स्कूल की जौब छोड़ दी थी और अब जब शिव तीसरी कक्षा का छात्र है, वह अपना खाली समय शौपिंग, गौसिप वगैरह में गुजारती. आज वह घर में ही थी और इधरउधर की बातें सोचतेसोचते थक गई थी. शिव के आने में काफी समय था अभी. और आलोक के आने का कोई तय समय नहीं था. जब बैठेबैठे ऊब गई तो महाराज को खाना क्या बनाना है, बता कर गाड़ी ले कर निकल गई.

मौल में घूमते हुए उस का ध्यान कई जोड़ों पर गया. कितना समय बीत गया था आलोक और उसे ऐसे घूमे हुए. अब तो आलोक रोमांटिक बातों पर हंसता है और फैमिली आउटिंग को टालता है. प्रेम भी वे मशीनी तरीके से करते हैं और इस प्रेम का दिन भी फिक्स हो गया है, शनिवार की रात. अब तो हालत यह हो गई है कि शनिवार की रात जब आलोक उस की तरफ बढ़ता, तो उसे उबकाई आ जाती. वह कोई न कोई बहाना बनाने की कोशिश करती. कभीकभी वह जीत जाती, तो कभीकभी आलोक जीत जाता. तब वह सोचती कि प्रेम क्या कभी तय कर के किया जाता है? वह तो एक उन्माद की तरह आता है और सुख दे जाता है. लेकिन आलोक को यह बात कौन समझाए? वह तो प्रेम भी अपनी मीटिंग की तरह करने लगा था. ऐसा पहले तो नहीं था. क्या उसे अपना बाकी जीवन ऐसे ही गुजारना होगा?

 

‘‘मैडम, ऐक्सक्यूज मी, आप एक फौर्म भर देंगी?’’ एक युवक उस के पास आ कर बोला, तो उस की विचारों की तंद्रा भंग हुई और वह वर्तमान दुनिया में लौट आई.

‘‘क्या है यह?’’

‘‘यह हमारी कंपनी की स्पैशल स्कीम है. सभी फौर्म में से एक सिलैक्ट होगा और उसे भरने वाले को 3 दिन और 2 रातों का गोवा का पैकेज मिलेगा.’’

‘‘बाद में आना, अभी मैं बिजी हूं,’’ स्वरा ने उसे टालते हुए कहा.

‘‘परंतु मैं तो बिलकुल फ्री हूं,’’ कोई अचानक उन के बीच आ कर बोला तो स्वरा और वह लड़का दोनों चौंक गए.

अरे यह तो कमल है, उस के कालेज के दिनों का सहपाठी. स्वरा को याद आया, कितना स्मार्ट हो गया है यह लल्लू. फिर उस लड़के से उस का नंबर ले कर स्वरा ने उसे बाद में आने को कहा.

उस लड़के के जाने के बाद स्वरा और कमल मौल में ही एक रैस्टोरैंट में बैठे तो बात करतेकरते कब शाम हो गई उन्हें पता ही नहीं चला. अगले दिन मिलने का वादा कर के स्वरा घर आ गई, परंतु घर आ कर भी कमल की बातों को भूल नहीं पा रही थी. कितने दिनों के बाद किसी ने उस की इस तरह से तारीफ की थी. रात में खाना खा कर अभी वह लेटी ही थी कि फोन की घंटी बजी. फोन कमल का था. उस ने सोचा कि कमल को डांट दे कि अभी फोन करने का क्या मतलब? परंतु कर नहीं पाई. उन की बात जब खत्म हुई तो पता चला कि रात का 1 बज गया है.

फिर तो यह रोज का सिलसिला बन गया. या तो वे दिन में मिल लेते या घंटों फोन पर बातें करते रहते. स्वरा काफी खुश रहने लगी थी, क्योंकि कमल और उस की सोच काफी मिलती थी. वह कमल से उन सभी टौपिक पर बात करती, जिन पर वह अकेली बैठे सोचती रहती. फिर उसे लगता कि कमल आलोक से कितना अलग, कितना संवेदनशील है. ऐसा होने से दोनों ही एकदूसरे का साथ ज्यादा से ज्यादा चाहने लगे थे. एक दिन कमल ने अचानक स्वरा को फोन कर के मौल में बुला लिया और वह पहुंची तो बोला, ‘‘स्वरा, कल मैं कंपनी के काम से न्यू जर्सी जा रहा हूं. 1 महीने बाद आऊंगा.’’

‘‘क्या इतने दिन…’’

‘‘हां, लगेंगे तो इतने ही दिन. जाना तो मैं भी नहीं चाहता था पर तुम तो जानती ही हो मेरे बिजनैस की प्रौब्लम.’’

‘‘नहींनहीं कमल तुम जरूर जाओ. हम फोन पर तो बात करते रहेंगे.’’

‘‘स्वरा, मैं एक बात सोच रहा था.’’

‘‘हां, बोलो.’’

‘‘जाने से पहले तुम्हारे साथ कुछ वक्त गुजारना चाहता था.’’

‘‘गुजार तो रहे हो.’’

‘‘नहीं, ऐसे नहीं अकेले कहीं… तुम समझ रही हो न?’’

कुछ सोच कर स्वरा ने कहा, ‘‘बोलो, कहां चलें?’’

‘‘तुम कोई सवाल मत करो, बस चलो. मुझ पर तुम्हें भरोसा तो है न?’’

‘‘चलो, फिर चलें.’’

कमल ने गाड़ी एक आलीशान होटल के सामने रोकी.

‘‘ये कहां आ गए हम?’’ स्वरा गाड़ी से उतरते हुए बोली. वह खुद को असहज महसूस कर रही थी.

‘‘स्वरा, मुझे तुम से जो बात करनी है, उस के लिए एकांत जरूरी है.’’

होटल की लौबी से कमरे तक पहुंचने का रास्ता स्वरा को काफी लंबा महसूस हो रहा था, परंतु वह अंदर से एक अलग रोमांच का भी अनुभव कर रही थी. शादी के पहले कालेज बंक कर के जब स्वरा आलोक से मिलने जाया करती थी, तब भी कुछ ऐसा ही महसूस करती थी. परंतु एक अंतर यह था कि तब उस के कदम तेजी से बढ़ते थे, लेकिन आज बड़ी मुश्किल से उठ रहे थे.

‘‘आओ स्वरा, अंदर आओ. कहां खो गईं, भरोसा तो है न मुझ पर?’’

‘‘कमल, यह तुम ने दूसरी बार पूछा है. औफकोर्स है यार. न होता तो यहां तक आती क्या?’’

अंदर पहुंच कर कमल ने स्वरा को बिस्तर पर बैठाया और खुद उस के घुटनों के पास नीचे बैठ गया.

‘‘यह क्या कमल, तुम यहां क्यों बैठ रहे हो?’’

‘‘मुझे यहीं बैठने दो स्वरा, क्योंकि मुझे जो कहना है वह मैं तुम्हारी आंखों में आंखें डाल कर कहना चाहता हूं.’’

‘‘ऐसा क्या?’’

‘‘स्वरा, तुम से मिलने से पहले मैं सोचता था कि मेरी जिंदगी यों ही कट जाएगी. औफिस से घर व घर से औफिस. और एक ऐसी बीवी जो मुझ से ज्यादा किट्टी पार्टी और शौपिंग में रुचि रखती है. मैं शायद अपने दोनों बेटों की खातिर जी रहा था यह जिंदगी. लेकिन तुम मिलीं तो सब कुछ बदल गया. हम दोनों शादी की बेमजा जिंदगी में कैद हैं, इसलिए मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं,’’ ऐसा कहते हुए कमल स्वरा के एकदम करीब आ गया. इतना करीब कि उस की गरम सांसें स्वरा के कोमल

कपोलों को सुलगाने लगीं. स्वरा ने इस क्षण के आने के बारे में सोचा न हो ऐसा न था. वह सोचती थी कि जब यह क्षण आएगा तो वह रोमांचित हो जाएगी. जो रिक्तता उस की शादीशुदा जिंदगी में आ गई थी, शायद वह भर जाएगी. परंतु यह क्या? कमल का पास आना उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगा. उसे ऐसा लगा जैसे आलोक की कोई बहुत प्यारी चीज, कमल उस से छीनना चाहता है और वह ऐसा होने नहीं देना चाहती. उसी पल उस को यह भी एहसास हुआ कि अंदरूनी रूप से तो वह कभी भी आलोक से दूर हुई ही नहीं थी.

एक झटके में वह कमल को पीछे कर के खड़ी हो गई.

‘‘क्या हुआ स्वरा, मुझ से कोई भूल हो गई?’’

‘‘भूल, नहीं कमल, हुआ तो यह है कि तुम्हारी वजह से मैं समझ पाई कि मैं आलोक से कितना प्यार करती हूं. हमारी शादी में एक अल्पविराम जरूर लग गया था, परंतु प्रयास कर के मैं उसे हटा दूंगी. अल्पविराम को पूर्णविराम समझने की भूल से उबारने के लिए धन्यवाद दोस्त.’’

कमल को जड़ छोड़ कर स्वरा होटल से बाहर आ गई और औटो में बैठ कर उस ने 3 फोन किए. पहला, टूअर पैकेज वाले लड़के को और उस से गोवा की अगले हफ्ते की बुकिंग करवाई. दूसरा, अपनी मां को ताकि शिव उस पूरे हफ्ते किसी भरोसेमंद के पास रहे और तीसरा फोन किया आलोक को. Hindi Love Stories 

Family Story : मोक्ष – ठकुराइन के देहावसान की खबर सुनते ही चौबेजी क्यों खुश हो उठे ?

Family Story : चौबेजी पूजा से उठे ही थे, खबर मिली कि ठकुराइन अम्मा का देहावसान हो गया है. खबर सुनते ही अचानक उन के चमकते गालों की लालिमा और सुर्ख हो गई. होंठों पर मुसकान भी उभर आई. पत्नी पास ही खड़ी थी. मुसकराते हुए उस से पूछा, ‘‘अजी सुनती हो, ठकुराइन अम्मा नहीं रहीं, अच्छा मौका मिला है. तुम्हें जो चाहिए बता दो. फिर मत कहना कि कोई इच्छा अधूरी रह गई.’’

पत्नी खुशीखुशी कंगन, साड़ी जैसी अनगिनत मुरादें बताने लगी लेकिन चौबेजी को जल्दी थी इसलिए ठकुराइन की हवेली की तरफ दौड़ लिए. रास्ते में पूछताछ भी करते गए कि कब कैसे क्या हुआ है. जब वे हवेली पहुंचे तब तक वहां भारी भीड़ जमा हो चुकी थी. उन्हें अपनी लेटलतीफी पर गहरा अफसोस हुआ. वहां दर्जनभर पंडेपुजारी उन से पूर्व ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके थे. वैसे तो ठकुराइन उन्हीं की जजमान थीं, लेकिन अवसर कौन चूकता है. चील, कौए, गिद्ध जैसे शवों पर टूट पड़ते हैं ठीक वैसा ही नजारा इस समय हवेली में भी था.

ठकुराइन की उम्र लगभग 75-80 साल की रही होगी. भरापूरा परिवार, सम्मानित, धनाढ्य खानदान, खुद उन का समाज में खूब रुतबा था. खैर, बिना समय गंवाए चौबेजी ने मोरचा संभाला और ठकुराइन के बड़े बेटे केदार सिंह से मुखातिब हुए. कुरते की जेब से पंचांग निकाल कर, तुरुप का इक्का उछाला, ‘‘अम्माजी का देहांत कब हुआ है?’’

केदार सिंह ने सुबह का समय बताया तो चौबेजी चिहुंक कर बोले, ‘‘भला हो इस परिवार का,’’ उन के चेहरे पर चिंता और घबराहट के सधे हुए भाव स्पष्ट नजर आने लगे.

ठकुराइन का पूरा परिवार चौबेजी को विस्मयभरी नजरों से घूरने लगा. चौबेजी अपनी तरंग में बोलते चले गए, ‘‘बेटा, बुरा मत मानना लेकिन यह महाअपशकुन हुआ है तुम्हारे घर में. पंचक, अमावस और शनिवार के दिन ब्रह्ममुहूर्त में अचानक यों देह त्याग. यह शुभ संकेत नहीं है.’’

केदार सिंह ने डरते हुए पूछा, ‘‘क्या किया जाए, चौबेजी?’’

कुछ सोचते हुए गंभीर स्वर में चौबेजी बोले, ‘‘खर्चा होगा. दाहसंस्कार शास्त्रोक्त ढंग से कराना पड़ेगा, अन्यथा अनर्थ हो सकता है.’’

ठकुराइन का पूरा परिवार चौबेजी की हां में हां मिलाने लगा. अपना सिक्का जमता देख चौबेजी ने अपने आसपास खड़े अन्य पंडों पर नजर डाली. तुरंत सब ने उन की बात का समर्थन किया. कुछ पलों के लिए माहौल में भय और खामोशी छा गई. केदार सिंह ने फौरन सहमति देते हुए चौबेजी को दाहसंस्कार की पूरी जिम्मेदारी सौंप दी. पंडों की पूरी मंडली अब चौबेजी के नेतृत्व में क्रियाकर्म की तैयारी में जुट गई. वैकुंठी (अरथी), चंदन की लकड़ी, देशी घी, पूजन सामग्री के नाम पर पूरे 51 हजार रुपए ऐंठ लिए गए. जो चेले सामान लेने गए उन्हें चौबेजी ने पहले ही संकेत कर दिया कि 2 पीपे देशी घी के पहले ही उन के घर पहुंचा दिए जाएं. वहां सामान संभालने या गिनती करने की भला फुरसत किसे थी.

ठकुराइन के मृत शरीर को वैकुंठी पर रखने का समय आया तो उन के परिवार की महिलाएं उन के जेवरात हटाने लगीं. चौबेजी ने फौरन हस्तक्षेप करते हुए टोका, ‘‘अरे, आप अपने खानदान की परंपरा और रुतबे का कुछ तो खयाल रखो. ऐसे नंगीबूची विदा करोगे अपनी अम्मा को? शास्त्रों में विधान है कि बिना स्वर्णाभूषणों के तो दाहसंस्कार संभव ही नहीं. इस तरह उन्हें मोक्ष कैसे मिल पाएगा?’’

बड़ी बहू ने पूछा, ‘‘फिर इन आभूषणों का क्या होगा?’’

चौबेजी ने उचित समय पर गरम लोहे पर चोट मारते हुए कहा, ‘‘जजमान, ये जेवरात तो क्रियाकर्म कराने वाले पंडों को मिलते हैं. तभी तो अम्माजी का मोक्ष संभव होगा.’’

लेकिन महंगाई के जमाने में ठकुराइन का परिवार इतने कीमती जेवर छोड़ने को तैयार न था. तर्कवितर्क होते रहे और अंत में मोलतोल के बाद चैन, अंगूठी, टौप्स और पायजेब पर बात डन हो गई. चौबेजी की आंखें चमकने लगी थीं. मन प्रसन्न था. आखिर अब समय आया था जब उन का दांव लगा था.

दरअसल, पिछले कुछ सालों में इन्हीं ठकुराइन ने उन की दुकानदारी बंद करवा दी थी. एक छोटी सी घटना को ले कर पंडों का विवाद ठकुराइन से क्या हुआ कि महिला होते हुए भी उन्होंने बड़ा क्रांतिकारी प्रतिरोध किया. घर के दरवाजे पंडेपुजारियों के लिए बंद करवा दिए और पूजापाठ के नाम पर होने वाली लूट को उन्होंने सख्ती से रोक दिया था.

कितने बुरे दिन निकले थे इस जमात के. मिन्नतें करने, माफी मांगने पर भी ठकुराइन का दिल नहीं पसीजा था. लेकिन चौबेजी को लग रहा था कि अब संयोग से लक्ष्मी स्वयं छप्पर फाड़ कर उन के घर आने वाली है. अब यह विडंबना ही थी कि ठकुराइन का पूरा परिवार पंडेपुजारियों के आगे बेबस था. इस का कारण श्रद्धा से ज्यादा मौत के प्रति मानव मन का स्वाभाविक भय था.

बहरहाल, दाहसंस्कार का कार्य निबट गया. शहर के पंडेपुजारियों की खूब कमाई हो गई. मजे की बात यह रही

कि रोजरोज आपस में लड़ने वाले पंडेपुजारियों में इस घटना पर अस्थायी एकता स्थापित हो गई. वैसे भी सामूहिक स्वार्थ के लिए विरोधियों में एकता होना कोई नई बात भी नहीं थी. दाहसंस्कार के बाद तेरहवीं और सत्तरहवीं तक उन सब का जमघट हवेली पर लगा रहा. चौबेजी और उन की मंडली सुबह से शाम तक हवेली में अपनी सेवाएं देने लगी. प्रवचन, कीर्तन, शास्त्रपुराणों का वाचन दिनभर चलता. चौबेजी ने अपने प्रवचन से श्रोताओं को बड़े सुंदर ढंग से समझाने का पूरा प्रयास किया कि इस समयावधि में मृतक परिवार द्वारा ‘जीवात्मा’ के मोक्ष के लिए क्याक्या उपक्रम किए जाने चाहिए. इस आयोजन से मिल रही संतुष्टि से ठकुराइन का पूरा परिवार नतमस्तक था. उन के मन में अब कोई संशय नहीं रह गया था कि ठकुराइन को मोक्ष नहीं मिलेगा. हवेली की तिजोरियां खुल चुकी थीं और ऐसे लोगों में मलाई चाटने की होड़ लगी रही. तेरहवीं की तैयारी जोरों पर थी. साथ ही चौबेजी छमाही और बरसी की रस्म भी लगेहाथों निबटा देना चाहते थे. समझदारी इसी में होती है कि संवेदनाओं को उचित समय पर ही ‘कैश’ करवा लेना चाहिए. शायद चौबेजी की यही मंशा रही होगी.

रात का समय था. चौबेजी चारपाई पर लेटे थे. पास बैठी अर्द्धांगिनी उन्हें समझाते हुए कह रही थी, ‘‘सुनो जी, अगर पट जाए तो आप अपने लिए एक गरम कोट भी मांग लो. छोटे बेटे की बरात में आप भी कोट पहन कर खूब जमोगे. दूसरे, बबलू कब से बाइक लेने को कह रहा है, फिर मेरा भी…’’ ऐसी बातें सुन कर चौबेजी के मुख पर मुसकान और गहरी हो गई.

दूसरे दिन सुबह हवेली जाते ही चौबेजी ने तेरहवीं के दिन की पूजापाठ, दानदक्षिणा की सूची केदार सिंह को सौंप दी. चौबेजी की नजर में सूची संक्षिप्त थी लेकिन उस में काफी कुछ था. 51 ब्राह्मणों का भोज, वस्त्र, दक्षिणास्वरूप 1,100 रुपए प्रति ब्राह्मण के सुझाव के अलावा वस्त्राभूषण समेत घरगृहस्थी के तमाम सामान लिखे थे जैसे गद्दे, रजाई, पलंग, बरतन इत्यादि. लेकिन सूची में गरम कोट और बाइक की डिमांड देख केदार सिंह का माथा ठनका.

चौबेजी की कलाकारी की अब गहन परीक्षा होनी थी. ठकुराइन के परिवार को इस अटपटी बात पर संतुष्ट करने के लिए चौबेजी ने अपनी बात कुछ इस तरह रखी, ‘‘जजमानों के कल्याण और शुभत्व की रक्षा के लिए यह सब जरूरी है. आप बाइक की बात को गलत न समझें क्योंकि जीवात्मा द्वारा वैतरणी पार कर मोक्षगामी होना गाय की पूंछ पकड़ कर ही संभव है लेकिन आधुनिक जमाने में हम पंडे भी शहर में गाय कैसे पाल सकते हैं? उस के विकल्प के लिए बाइक सर्वोत्तम साधन है.

वह हमारे काम भी आएगी और पूरा सदुपयोग भी होगा. इसलिए ठकुराइन की आत्मा को मुक्ति मिल सकेगी. गरम कोट भी इसीलिए लिखा है. सर्दी, गरमी, वर्षा तीनों ऋतुओं का खयाल तो रखना पड़ता है न? जो भी हमें दोगे वह सीधा ठकुराइन अम्मा की आत्मा को प्राप्त होगा, फिर दानदक्षिणा में जजमान को ज्यादा तर्कवितर्क नहीं करना चाहिए वरना श्रद्धा विलुप्त हो जाती है.’’

ठकुराइन का परिवार कुछ विरोध करता उस से पूर्व ही मंडली के सदस्य चौबेजी की बात का समर्थन करने लग गए. 1,100 रुपए की दक्षिणा की तजवीज सुनते ही चौबेजी के चेलेचपाटे समवेत स्वर में ठकुराइन के परिवार को संतुष्ट करने में जुट गए.

तेरहवीं और सत्तरहवीं की रस्में पूरी हो गईं. लगेहाथों छमाही और बरसी का कार्यक्रम भी संपन्न हो गया. चौबेजी समेत सभी पंडेपुजारी ठकुराइन के परिवार को खूब आशीष दे रहे थे. इस आयोजन में सभी को यथायोग्य माल मिल चुका था. सब मस्त थे. कारण, जिस में जितनी योग्यता, कलाकारी या हुनर था उस ने उसी के अनुरूप पा लिया था. ठकुराइन का मोक्ष हुआ या नहीं, यह तो अलग बात है लेकिन मोक्ष दिलाने वालों की खूब चांदी हो गई. यह मोक्ष कितने लाख में मिला, यह चौबेजी ही जानें. Family Story 

Social Story : ऐसा भी होता है – ट्रेन में रखे लावारिस ब्रीफकेस का माजरा क्या था

Social Story : ‘‘भाई साहब, यह ब्रीफकेस आप का है क्या?’’ सनतकुमार समाचार- पत्र की खबरों में डूबे हुए थे कि यह प्रश्न सुन कर चौंक गए.

‘‘जी नहीं, मेरा नहीं है,’’ उन्होंने प्रश्नकर्त्ता के मुख पर प्रश्नवाचक दृष्टि डाली. उन से प्रश्न करने वाला 25-30 साल का एक सुदर्शन युवक था.

‘‘फिर किस का है यह ब्रीफकेस?’’ युवक पुन: चीखा था. इस बार उस के साथ कुछ और स्वर जुड़ गए थे.

‘‘किस का है, किस का है? यह पूछपूछ कर क्यों पूरी ट्रेन को सिर पर उठा रखा है. जिस का है वह खुद ले जाएगा,’’ सनतकुमार को यह व्यवधान अखर रहा था.

‘‘अजी, किसी को ले जाना होता तो इसे यहां छोड़ता ही क्यों? यह ब्रीफकेस सरलता से हमारा पीछा नहीं छोड़ने वाला. यह तो हम सब को ले कर जाएगा,’’ ऊपरी शायिका से घबराहटपूर्ण स्वर में बोल कर एक महिला नीचे कूदी थीं, ‘‘किस का है, चिल्लाने से कोई लाभ नहीं है. उठा कर इसे बाहर फेंको नहीं तो यह हम सब को ऊपर पहुंचा देगा,’’ बदहवास स्वर में बोल कर महिला ने सीट के नीचे से अपना सूटकेस खींचा और डब्बे के द्वार की ओर लपकी थीं.

‘‘कहां जा रही हैं आप? स्टेशन आने में तो अभी देर है,’’ सनतकुमार महिला के सूटकेस से अपना पैर बचाते हुए बोले थे.

‘‘मैं दूसरे डब्बे में जा रही हूं…इस लावारिस ब्रीफकेस से दूर,’’ महिला सूटकेस सहित वातानुकूलित डब्बे से बाहर निकल गई थीं.

‘लावारिस ब्रीफकेस?’ यह बात एक हलकी सरसराहट के साथ सारे डब्बे में फैल गई थी. यात्रियों में हलचल सी मच गई. सभी उस डब्बे से निकलने का प्रयत्न करने लगे.

‘‘आप क्या समझती हैं? आप दूसरे डब्बे में जा कर सुरक्षित हो जाएंगी? यहां विस्फोट हुआ तो पूरी ट्रेन में आग लग जाएगी,’’ सनतकुमार एक और महिला को भागते देख बोले थे.

‘‘वही तो मैं कह रहा हूं, यहां से भागने से क्या होगा. इस ब्रीफकेस का कुछ करो. मुझे तो इस में से टकटक का स्वर भी सुनाई दे रहा है. पता नहीं क्या होने वाला है. यहां तो किसी भी क्षण विस्फोट हो सकता है,’’ एक अन्य शायिका पर अब तक गहरी नींद सो रहा व्यक्ति अचानक उठ खड़ा हुआ था.

‘‘करना क्या है. इस ब्रीफकेस को उठा कर बाहर फेंक दो,’’ कोई बोला था.

‘‘आप ही कर दीजिए न इस शुभ काम को,’’ सनतकुमार ने आग्रह किया था.

‘‘क्या कहने आप की चतुराई के. केवल आप को ही अपनी जान प्यारी है… आप स्वयं ही क्यों नहीं फेंक देते.’’

‘‘आपस में लड़ने से क्या हाथ लगेगा? आप दोनों ठीक कह रहे हैं. इस लावारिस ब्रीफकेस को हाथ लगाना ठीक नहीं है. इसे हिलानेडुलाने से विस्फोट होने का खतरा है,’’ साथ की शायिका से विद्याभूषणजी चिल्लाए थे.

‘‘फिर क्या सुझाव है आप का?’’ सनतकुमार ने व्यंग्य किया था.

‘‘सरकार की तरह हम भी एक समिति का गठन कर लेते हैं. समिति जो भी सुझाव देगी उसी पर अमल कर लेंगे,’’ एक अन्य सुझाव आया था.

‘‘यह उपहास करने का समय है श्रीमान? समिति बनाई तो वह केवल हमारे लिए मुआवजे की घोषणा करेगी,’’ विद्याभूषण अचानक क्रोधित हो उठे थे.

‘‘कृपया शांति बनाए रखें. यदि यह उपहास करने का समय नहीं है तो क्रोध में होशहवास खो बैठने का भी नहीं है. आप ही कहिए न क्या करें,’’ सनतकुमार ने विद्या- भूषण को शांत करने का प्रयास किया था.

‘‘करना क्या है जंजीर खींच देते हैं. सब अपने सामान के साथ तैयार रहें. ट्रेन के रुकते ही नीचे कूद पड़ेंगे.’’

चुस्तदुरुस्त सुदर्शन नामक युवक लपक कर जंजीर तक पहुंचा और जंजीर पकड़ कर लटक गया था.

‘‘अरे, यह क्या? पूरी शक्ति लगाने पर भी जंजीर टस से मस नहीं हो रही. यह तो कोई बहुत बड़ा षड्यंत्र लगता है. आतंकवादियों ने बम रखने से पहले जंजीर को नाकाम कर दिया है जिस से ट्रेन रोकी न जा सके,’’ सुदर्शन भेद भरे स्वर में बोला था.

‘‘अब क्या होगा?’’ कुछ कमजोर मन वाले यात्री रोने लगे थे. उन्हें रोते देख कर अन्य यात्री भी रोनी सूरत बना कर बैठ गए. कुछ अन्य प्रार्थना में डूब गए थे.

‘‘कृपया शांति बनाए रखें, घबराने की आवश्यकता नहीं है. बड़ी सुपरफास्ट ट्रेन है यह. इस का हर डब्बा एकदूसरे से जुड़ा हुआ है. हमें बड़ी युक्ति से काम लेना होगा,’’ विद्याभूषण अपनी बर्थ पर लेटेलेटे निर्देश दे रहे थे.

तभी किसी ने चुटकी ली, ‘‘बाबू, आप को जो कुछ कहना है, नीचे आ कर कहें, अब आप की बर्थ को कोई खतरा नहीं है.’’

‘‘हम योजनाबद्ध तरीके से काम करेंगे,’’ नीचे उतर कर विद्याभूषण ने सुझाव दिया, ‘‘सभी पुरुष यात्री एक तरफ आ जाएं. हम 5 यात्रियों के समूह बनाएंगे.

‘‘मैं, सनतकुमार, सुदर्शन, 2 और आ जाइए, नाम बताइए…अच्छा, अमल और धु्रव, यह ठीक है. हम सब इंजन तक चालक को सूचित करने जाएंगे. दूसरा दल गार्ड के डब्बे तक जाएगा, गार्ड को सूचित करने, तीसरा दल लोगों को सामान के साथ तैयार रखेगा, जिस से कि ट्रेन के रुकते ही सब नीचे कूद जाएं. महिलाओं के 2 दल प्राथमिक चिकित्सा के लिए तैयार रहें,’’ विद्याभूषण अपनी बात समाप्त करते इस से पहले ही रेलवे पुलिस के 2 सिपाही, जिन के कंधों पर ट्रेन की रक्षा का भार था, वहां आ पहुंचे थे.

‘‘आप बिलकुल सही समय पर आए हैं. देखिए वह ब्रीफकेस,’’ विद्याभूषणजी ने पुलिस वालों को दूर से ही ब्रीफकेस दिखा दिया था.

‘‘क्या है यह?’’ एक सिपाही ने अपनी बंदूक से खटखट का स्वर निकालते हुए प्रश्न किया था.

‘‘यह भी आप को बताना पड़ेगा? यह ब्रीफकेस बम है. आप शीघ्र ही इसे नाकाम कर के हम सब के प्राणों की रक्षा कीजिए.’’

‘‘बम? आप को कैसे पता कि इस में बम है?’’ एक पुलिसकर्मी ने प्रश्न किया था.

‘‘अजी कल रात से ब्रीफकेस लावारिस पड़ा है. उस में से टिकटिक की आवाज भी आ रही है और आप कहते हैं कि हमें कैसे पता? अब तो इसे नाकाम कर दीजिए,’’ सनतकुमार बोले थे.

‘‘अरे, तो जंजीर खींचिए…बम नाकाम करने का विशेष दल आ कर बम को नाकाम करेगा.’’

‘‘जंजीर खींची थी हम ने पर ट्रेन नहीं रुकी.’’

‘‘अच्छा, यह तो बहुत चिंता की बात है,’’ दोनों सिपाही समवेत स्वर में बोले थे.

‘‘अब आप ही हमारी सहायता कर सकते हैं. किसी भी तरह इस बम को नाकाम कर के हमारी जान बचाइए.’’

‘‘काश, हम ऐसा कर सकते. हमें बम नाकाम करना नहीं आता, हमें सिखाया ही नहीं गया,’’ दोनों सिपाहियों ने तुरंत ही सभी यात्रियों का भ्रम तोड़ दिया था.

कुछ महिला यात्री डबडबाई आंखों से शून्य में ताक रही थीं. कुछ अन्य बच्चों के साथ प्रार्थना में लीन हो गई थीं.

‘‘हमें जाना ही होगा,’’ विद्याभूषण बोले थे, ‘‘सभी दल अपना कार्य प्रारंभ कर दीजिए. हमारे पास समय बहुत कम है.’’

डरेसहमे से दोनों दल 2 विभिन्न दिशाओं में चल पड़े थे और जाते हुए हर डब्बे के सहयात्रियों को रहस्यमय ब्रीफकेस के बारे में सूचित करते गए थे.

बम विस्फोट की आशंका से ट्रेन में भगदड़ मच गई थी. सभी यात्री कम से कम एक बार उस ब्रीफकेस के दर्शन कर अपने नयनों को तृप्त कर लेना चाहते थे. शेष अपना सामान बांध कर अवसर मिलते ही ट्रेन से कूद जाना चाहते थे.

कुछ समझदार यात्री रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था को कोस रहे थे, जिस ने हर ट्रेन में बम निरोधक दल की व्यवस्था न करने की बड़ी भूल की थी.

गार्ड के डब्बे की ओर जाने वाले दल को मार्ग में ही एक मोबाइल वाले सज्जन मिल गए थे. उन्होंने चटपट अपने जीवन पर मंडराते खतरे की सूचना अपने परिवार को दे दी थी और परिवार ने तुरंत ही अगले स्टेशन के स्टेशन मास्टर को सूचित कर दिया था.

फिर क्या था? केवल स्टेशन पर ही नहीं पूरे रेलवे विभाग में हड़कंप मच गया. ट्रेन जब तक वहां रुकी बम डिस्पोजल स्क्वैड, एंबुलैंस आदि सभी सुविधाएं उपस्थित थीं.

ट्रेन रुकने से पहले ही लोगों ने अपना सामान बाहर फेंकना प्रारंभ कर दिया और अधिकतर यात्री ट्रेन से कूद कर अपने हाथपांव तुड़वा बैठे थे.

गार्ड के डब्बे की ओर जाने वाले दस्ते का काम बीच में ही छोड़ कर सनतकुमारजी का दस्ता जब वापस लौटा तो उन की पत्नी रत्ना चैन से गहरी नींद में डूबी थीं.

सनतकुमार ने घबराहट में उन्हें झिंझोड़ डाला था :

‘‘तुम ने तो कुंभकर्ण को भी मात कर दिया. किसी भी क्षण ट्रेन में बम विस्फोट हो सकता है,’’ चीखते हुए अपना सामान बाहर फेंक कर उन्होंने पत्नी रत्ना को डब्बे से बाहर धकेल दिया था.

‘‘हे ऊपर वाले, तेरा बहुतबहुत धन्यवाद, जान बच गई, चलो, अब अपना सामान संभाल लो,’’ सनतकुमार ने पत्नी को आदेश दे कर इधरउधर नजर दौड़ाई थी.

घबराहट में ट्रेन से कूदे लोगों को भारी चोटें आई थीं. उन की मूर्खता पर सनतकुमार खुल कर हंसे थे.

इधरउधर का जायजा ले कर सनतकुमार लौटे तो रत्ना परेशान सी ट्रेन की ओर जा रही थीं.

‘‘कहां जा रही हो? ट्रेन में कभी भी विस्फोट हो सकता है. वैसे भी ट्रेन में यात्रियों को जाने की इजाजत नहीं है. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया है.’’

‘‘सारा सामान है पर उस काले ब्रीफकेस का कहीं पता नहीं है.’’

‘‘कौन सा काला ब्रीफकेस?’’

‘‘वही जिस में मैं ने अपने जेवर रखे थे और आप ने कहा था कि उसे अपनी निगरानी में संभाल कर रखेंगे.’’

‘‘तो क्या वह ब्रीफकेस हमारा था?’’ सनतकुमार सिर पकड़ कर बैठ गए.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘क्या होना है, तुम और तुम्हारी नींद, ट्रेन में इतना हंगामा मचा और तुम चैन की नींद सोती रहीं.’’

‘‘मुझे क्या पता था कि आप अपने ही ब्रीफकेस को नहीं पहचान पाओगे. मेरी तो थकान से आंख लग गई थी ऊपर से आप ने नींद की गोली खिला दी थी. पर आप तो जागते हुए भी सो रहे थे,’’ रत्ना रोंआसी हो उठी थीं.

‘‘भूल जाओ सबकुछ, अब कुछ नहीं हो सकता,’’ सनतकुमार ने हथियार डाल दिए थे.

‘‘क्यों नहीं हो सकता? मैं अभी जा कर कहती हूं कि वह हमारा ब्रीफकेस है उस में मेरे 2 लाख के गहने हैं.’’

‘‘चुप रहो, एक शब्द भी मुंह से मत निकालना, अब कुछ कहा तो न जाने कौन सी मुसीबत गले पड़ेगी.’’

पर रत्ना दौड़ कर ट्रेन तक गई थीं.

‘‘भैया, वह ब्रीफकेस?’’ उन्होंने डब्बे के द्वार पर खड़े पुलिसकर्मी से पूछा था.

‘‘आप क्यों चिंता करती हैं? उस में रखे बम को नाकाम करने की जिम्मेदारी बम निरोधक दस्ते की है. वे बड़ी सावधानी से उसे ले गए हैं,’’ पुलिसकर्मी ने सूचित किया था.

रत्ना बोझिल कदमों से पति के पास लौट आई थीं. ट्रेन के सभी यात्रियों को उन के गंतव्य तक पहुंचाने का प्रबंध किया गया था. सनतकुमार और रत्ना पूरे रास्ते मुंह लटाए बैठे रहे थे. सभी यात्री आतंकियों को कोस रहे थे. पर वे दोनों मौन थे.

विस्फोट हुआ अवश्य था पर ट्रेन में नहीं सनतकुमार और रत्ना के जीवन में. Social Story 

Social Story In Hindi : जीवन और नाटक – माहिका ने क्यों किया चोरी छिपे विवाह ?

Social Story In Hindi : ‘‘माहिका बेटे, देख तो कौन आया है. जल्दी से गरम पकौड़े और चाय बना ला. चाय बढि़या मसालेदार बनाना.’’ जूही ने अपनी बेटी को पुकारा और फिर से अपनी सहेली नीलम के साथ बातचीत में व्यस्त हो गई.

‘‘रहने दे न. परीक्षा सिर पर है, पढ़ रही होगी बेचारी. मैं तुम्हें लड़कियों के फोटो दिखाने आई हूं. पंकज अगले माह 25 का हो जाएगा. जितनी जल्दी शादी हो जाए अच्छा है. उस के बाद उस की छोटी बहन नीना का विवाह भी करना है. ले यह फोटो देख और बता तुझे कौन सी पसंद है,’’ नीलम ने हाथ में पकड़ा लिफाफा जूही की ओर बढ़ाया. देर तक दोनों बारीबारी से फोटो देख कर मीनमेख निकालती रहीं.

कुछ देर बाद जूही ने 2 फोटो निकाल कर नीलम को थमा दिए.

‘‘दोनों ही अच्छी लग रही हैं. वैसे भी हमारेतुम्हारे पसंद करने से क्या होता है. पसंद तो पंकज की पूछो. महत्त्व तो पंकज की पसंद का है. है कि नहीं? हमारीतुम्हारी पसंद को कौन पूछता है. यों भी फोटो से किसी के बारे में कितना पता लग सकता है. असली परख तो आमनेसामने बैठ कर ही हो सकती है.’’

तब तक माहिका पकौड़े और चाय ले कर आ गई थी.

‘‘सच कहूं जूही, तेरी बेटी बड़ी गुणवान है, जिस घर में जाएगी उस का तो जीवन सफल हो जाएगा,’’ नीलम ने गरमगरम पकौड़े मुंह में रखते हुए प्रशंसा की झड़ी लगा दी.

‘‘माहिका तू भी तो बता अपनी पसंद,’’ नीलम ने माहिका की ओर फोटो बढ़ाए.

‘‘आंटी मैं भला क्या बताऊंगी. यह तो आप बड़े लोगों का काम है.’’ माहिका धीमे स्वर में बोल कर मुड़ गई.

‘‘ठीक ही तो कह रही है, बच्चों को इन सब बातों की समझ कहां. वैसे भी परीक्षा की तैयारी में जुटी है.’’ जूही बोली.

‘‘तुझे नहीं लगता कि आजकल माहिका बहुत गुमसुम सी रहने लगी है. पहले तो अकसर आ जाती थी, दुनिया भर की बातें करती थी, घर के काम में भी हाथ बंटा देती थी, पर अब तो सामने पड़ने पर भी कतरा कर निकल जाती है.’’

‘‘इस उम्र में ऐसा ही होता है. मुझ से भी कहां बात करती है. किसी काम को कहो तो कर देगी. दिन भर लैपटौप या फोन से चिपकी रहेगी. इन सब चीजों ने तो हमारे बच्चों को ही हम से छीन लिया है.’’

‘‘सो तो है पर हमारा भी तो अधिकतर समय फोन पर ही गुजरता है,’’ जूही ऐसी अदा से बोली कि दोनों सहेलियां खिलखिला कर हंसीं.

नीलम को विदा करते ही जूही काम में जुट गई.

‘‘नीलम आती है तो जाने का नाम ही नहीं लेती. रजत के आने का समय हो गया है. अभी तक खाना भी नहीं बना है. रजत का कुछ भरोसा नहीं. कभी चाय पीते हैं, तो कभी सीधे खाना मांग लेते हैं,’’ जूही स्वयं से ही बातें कर रही थी.

‘‘माहिका तुम अब तक फोन से ही चिपकी हुई हो. यह क्या तुम तो रो रही हो. क्या हुआ?’’ माहिका का स्वर सुन कर जूही उस के कमरे में पहुंची थी.

‘‘कुछ नहीं अपनी सहेली स्नेहा से बात कर रही थी, तो आंखों में आंसू आ गए.’’

‘‘क्यों क्या हुआ? सब ठीक तो है.’’

‘‘कहां ठीक है. बेचारी बड़ी मुसीबत में है.’’

‘‘कैसी मुसीबत?’’

‘‘लगभग 4 वर्ष पहले उस ने सब से छिप कर मंदिर में विवाह कर लिया था. पर अब उस का पति दूसरी शादी कर रहा है.’’

‘‘क्या कह रही है? स्नेहा ने 4 वर्ष पहले ही विवाह कर लिया था? उस के मातापिता को पता है या नहीं?’’

‘‘किसी को पता नहीं है.’’

‘‘दोनों साथ रहते हैं क्या?’’

‘‘नहीं विवाह होते ही दोनों अपने घर लौट कर पढ़ाई में व्यस्त हो गए.’’

‘‘दोनों के बीच संबंध बने हैं क्या?’’

‘‘नहीं, इसीलिए तो दूसरा विवाह कर रहा है.’’

‘‘इस तरह छिप कर विवाह करने की क्या आवश्यकता थी. आजकल की लड़कियां भी बिना सोचेसमझे कुछ भी करती हैं. स्नेहा के मातापिता को पता लगा तो उन पर क्या बीतेगी?’’ जूही चिंतित स्वर में बोली.

‘‘पता नहीं आप ही बताओ अब वह क्या करे?’’

‘‘चुल्लू भर पानी में डूब मरे और क्या. उस ने तो अपने मातापिता को कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.’’

‘‘थोड़ी ही देर में यहां आ रही है स्नेहा. आप ही उसे समझा देना.’’

‘‘यहां क्या करने आ रही है? उस से कहो अपने मातापिता से बात करे. वे ही कोई रास्ता निकालेंगे.’’ मांबेटी का वार्तालाप शायद कुछ और देर चलता कि तभी दरवाजे की घंटी बजी और स्नेहा ने प्रवेश किया.

दोनों सहेलियां एकदूसरे के गले लिपट कर खूब रोईं. जूही सब कुछ चुपचाप देखती रहीं. समझ में नहीं आया कि क्या करे.

‘‘अब रोनेधोने से क्या होगा. अपने कमरे में चल कर बैठो मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

‘‘नहीं आंटी, कुछ नहीं चाहिए. मेरी चिंता तो केवल यही है कि इस समस्या का समाधान कैसे निकलेगा?’’ स्नेहा गंभीर स्वर में बोली.

‘‘सच कहूं, स्नेहा मुझे तुम से यह आशा नहीं थी.’’

‘‘पर मैं ने किया क्या है?’’

‘‘लो और करने को रह क्या गया है. तुम्हें छिप कर विवाह करने की क्या जरूरत थी.’’

‘‘मैं ने छिप कर विवाह नहीं किया आंटी? आप को अवश्य कोई गलतफहमी हुई है.’’

‘‘समझती हूं मैं. पर मेरी मानो और जो हो गया सो हो गया, अब सब कुछ अपने मातापिता को बता दो.’’

‘‘मेरे मातापिता का इस से कोई लेनादेना नहीं है. वैसे भी मैं उन से कोई बात नहीं छिपाती. इस समय तो मुझे माहिका की चिंता सता रही है. आप को ही कोई राह निकालनी पड़ेगी जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

‘‘साफसाफ कहो न पहेलियां क्यों बुझा रही हो.’’

‘‘आंटी माहिका ने जो कुछ किया वह निरा बचपना था. जब तक उसे अपनी गलती समझ में आई, देर हो चुकी थी. मुझे भी लगा कि देरसबेर पंकज इसे स्वीकार कर लेगा पर यहां तो उल्टी गंगा बह रही है. माहिका बेचारी हर साल पंकज के लिए करवाचौथ का व्रत करती रही पर वह नहीं पसीजा. अब बेचारी माहिका करे भी तो क्या?’’

‘‘तुम कहना क्या चाहती हो? विवाह तुम ने नहीं माहिका ने किया था?’’

‘‘वही तो. चलिए आप की समझ में तो आया. अभी तक तो आप मुझे ही दोष दिए जा रही थीं.’’ स्नेहा हंस दी.

‘‘यह मैं क्या सुन रही हूं. माहिका इतनी बड़ी बात छिपा गईं तुम? हम ने क्याक्या आशाएं लगा रखी थीं और तुम ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा. अब यह और बता दो कि किस से रचाया था तुम ने यह अद्भुत विवाह.’’

‘‘पंकज से.’’

‘‘कौन पंकज? नीलम का बेटा?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘नीलम जानती है यह सब?’’

‘‘मुझे नहीं पता.’’

‘‘पता क्या है तुझे कमबख्त. राखी बांधती थी तू उस को. मुझे अब सब समझ में आ रहा है इसीलिए तू करवाचौथ का व्रत करने का नाटक करती थी. तेरे पापा को पता चला तो हम दोनों को जान से ही मार देंगे. उन्हें तो वैसे भी उस परिवार से मेरा मेलजोल बिलकुल पसंद नहीं है,’’ वे क्रोध में बोलीं और माहिका को बुरी तरह धुन डाला.

‘‘आंटी क्या कर रही हो? माना उस से गलती हुई है पर उस के लिए आप उस की जान तो नहीं ले सकतीं.’’ स्नेहा चीखी.

जूही कोई उत्तर दे पातीं उस से पहले ही माहिका के पापा रजत ने घर में प्रवेश किया. उन के आते ही घर में सन्नाटा छा गया. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि बात कहां से शुरू करें.

‘‘स्नेहा बेटे, कब आईं तुम और बताओ पढ़ाई कैसी चल रही है?’’ बात रजत ने ही शुरू की.

‘‘जी ठीक चल रही है.’’

‘‘आज बड़ी शांति है घर में. जूही एक कप चाय पिला दो, बहुत थक गया हूं.’’ उत्तर में जूही सिसक उठीं.

‘‘क्या हुआ? इस तरह रो क्यों रही हो. कुछ तो कहो.’’

‘‘कहनेसुनने को बचा ही क्या है, माहिका ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा.’’

‘‘क्या किया है उस ने?’’

‘‘उस ने विवाह कर लिया है.’’

‘‘क्यों मजाक करती हो. कब किया उस ने विवाह?’’

‘‘4 साल पहले किसी मंदिर में.’’

‘‘और हम से पूछा तक नहीं?’’ रजत हैरानपरेशान स्वर में बोले.

‘‘हम हैं कौन उस के जो हम से पूछती?’’

‘‘तो ठीक है, हम उस के विवाह को मानते ही नहीं. 4 साल पहले वह मात्र 15 वर्ष की थी. हमारी आज्ञा के बिना विवाह कर कैसे सकती थी. हम ने उस के उज्ज्वल भविष्य के सपने देखे हैं. उन का क्या?’’ रजत बाबू नाराज स्वर में बोले. कुछ देर तक सब सकते में थे. कोई कुछ नहीं बोला. फिर अचानक माहिका जोर से रो पड़ी.

‘‘अब क्या हुआ?’’

‘‘पापा, मैं पंकज के बिना नहीं रह सकती. भारतीय नारी का विवाह जीवन में एकबार ही होता है.’’

‘‘किस भारतीय नारी की बात कर रही हो तुम? आजकल रोज विवाह और तलाक हो रहे हैं. जिस तरह पंकज के बिना 19 साल से रह रही हो, आगे भी रहोगी.’’

‘‘देखा स्नेहा मैं न कहती थी. पापा भी बिलकुल पंकज की भाषा बोल रहे हैं. पर मेरे पास अपने विवाह के पक्के सबूत हैं.’’

‘‘कौन से सुबूत हैं तुम्हारे पास,’’ रजत ने प्रश्न किया.

‘‘विवाह का फोटो है. गवाह के रूप में स्नेहा है और पंकज के कुछ मित्र भी विवाह के समय मंदिर में थे.’’

‘‘अच्छा फोटो भी है? बड़ा पक्का काम किया है तुम ने. ले कर तो आओ वह फोटो.’’ माहिका लपक कर गई और फोटो ले आई. रजत ने फोटो के टुकड़ेटुकड़े कर के रद्दी की टोकरी में डाल दिए.

‘‘कहां है अब सुबूत और स्नेहा बेटे बुरा मत मानना. तुम माहिका की बड़ी अच्छी मित्र हो जो उस के साथ खड़ी हो. पर इस समय अपने घर जाओ. जब हम यह समस्या सुलझा लें तब आना. केवल एक विनती है तुम से कि इन बातों का जिक्र किसी से मत करना.’’

‘‘जी, अंकल.’’ स्नेहा चुपचाप उठ कर बाहर निकल गई.

‘‘यह क्या किया आप ने? मैं तो सोच रही थी स्नेहा के साथ पंकज के घर जाएंगे. वही तो जीताजागत सुबूत है.’’ जूही जो अब तक इस सदमे से उबर नहीं पाई थीं आंसू पोंछते हुए बोलीं.

‘‘मुझे शर्म आती है कि इतना बड़ा कांड हो गया और हम दोनों को इस की भनक तक नहीं लगी. हमारा मुख्य उद्देश्य है माहिका को इस भंवर से निकालना वह भी इस तरह कि किसी को इस संबंध में कुछ पता न चले. हम कहीं किसी के घर नहीं जा रहे, न कोई सुबूत पेश करेंगे. माहिका जब तक अपनी पढ़ाई पूरी कर के अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता.’’

‘‘मुझे नहीं लगता पंकज का परिवार इतने लंबे समय तक प्रतीक्षा करेगा. नीलम तो आज ही बहुत सारे फोटो ले कर आई थी मुझे दिखाने.’’

‘‘समझा, तो यह खेल खेल रहे हैं वे लोग. तुम ने यह सोच भी कैसे लिया कि माहिका का विवाह पंकज से संभव है. मैं ने उसे दसियों बार नशे में चूर पब से बाहर निकलते देखा है. पढ़ाईलिखाई में जीरो पर गुंडागर्दी में सब से आगे.’’

‘‘पर इन का विवाह तो 4 वर्ष पहले ही हो चुका है.’’

‘‘फिल्मों और नाटकों में अभिनेता अलगअलग पात्रों से कई विवाह करते हैं, तो क्या यह जीवन भर का नाता हो जाता है. समझ लो माहिका ने भी ऐसे ही किसी नाटक के पात्र का अभिनय किया था और एक चेतावनी तुम दोनों के लिए, उस परिवार से आप दोनों कोई संबंध नहीं रखेंगे. फोन पर भी नहीं. माहिका जैसी मेधावी लड़की का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. मैं नहीं चाहता कि वह बेकार के पचड़ों में पड़ कर अपना जीवन तबाह कर ले,’’ रजत दोनों से कठोर स्वर में बोले. मृदुभाषी रजत का वह रूप न तो कभी जूही ने देखा था और न ही कभी माहिका ने. दोनों ने सिर हिला कर स्वीकृति दे दी.

कुछ माह ही बीते होंगे कि एक दिन रजत ने सारे परिवार को यह कह कर चौंका दिया कि वे सिंगापुर जा रहे हैं. वहां उन्हें नौकरी मिल गई है. जूही और माहिका चुप रह गईं पर उन का 15 वर्षीय पुत्र विपिन प्रसन्नता से उछल पड़ा.

‘‘मैं अभी अपने मित्रों को फोन करता हूं.’’ वह चहका.

‘‘नहीं, मैं नहीं चाहता कि किसी को पता चले कि हम कहां गए हैं.’’ रजत सख्ती से बोले.

‘‘क्यों पापा?’’

‘‘बेटे हमारे सामने एक बड़ी समस्या आ खड़ी हुई है. जब तक उस का हल नहीं मिल जाता हमें सावधानी से काम लेना पड़ेगा. इसीलिए हम चुपचाप जाएंगे बिना किसी को बताए.’’

तभी उन्हें पास ही माहिका के सुबकने का स्वर सुनाई पड़ा. जूही उसे शांत करने का प्रयत्न कर रही थी.

‘‘माहिका, इधर तो आओ. क्या हुआ बेटे?’’

‘‘कुछ नहीं पापा, आप की बात सुन कर लगा आप अब भी मुझ पर विश्वास नहीं करते,’’ माहिका आंसुओं के बीच बोली.

‘‘तुम ने जो किया उस के बाद विश्वास करना क्या इतना सरल है माहिका? विश्वास जमने में सदियां लग जाती हैं पर टूटने में कुछ क्षण. बस एक बात पर सदा विश्वास रखना कि तुम्हारे पापा तुम्हें इतना प्यार करते हैं कि तुम्हारे हितों की रक्षा के लिए किसी सीमा तक भी जा सकते हैं.’’

‘‘पापा मुझे माफ कर दीजिए मैं ने आप को बहुत दुख पहुंचाया है,’’ माहिका फूटफूट कर रो पड़ी. सारे गिलेशिकवे उस के आंसुओं में बह गए. Social Story In Hindi 

Family Story In Hindi : आया – तुषार को कैसे मिली आजादी ?

Family Story In Hindi : तुषार का तबादला मुंबई हुआ तो  रश्मि यह सोच कर खुश हो उठी कि चलो इसी बहाने फिल्मी कलाकारों से मुलाकात हो जाएगी, वैसे कहां मुंबई घूमने जा सकते थे.

तुषार ने मुंबई आ कर पहले कंपनी का कार्यभार संभाला फिर बरेली जा कर पत्नी व बेटे को ले आया.इधरउधर घूमते हुए पूरा महीना निकल गया, धीरेधीरे दंपती को महंगाई व एकाकीपन खलने लगा. उन के आसपास हिंदीभाषी लोग न हो कर महाराष्ट्र के लोग अधिक थे, जिन की बोली  अलग तरह की थी.

काफी मशक्कत के बाद उन्हें तीसरे माले पर एक कमरे का फ्लैट मिला था, जिस के आगे के बरामदे में उन्होंने रसोई व बैठने का स्थान बना लिया था.

रश्मि ने सोचा था कि मुंबई में ऐसा घर होगा जहां से उसे समुद्र दिखाई देगा, पर यहां से तो सिर्फ झुग्गीझोंपडि़यां ही दिखाई देती हैं.

तुषार रश्मि को चिढ़ाता, ‘‘मैडम, असली मुंबई तो यही है, मछुआरे व मजदूर झुग्गीझोंपडि़यों में नहीं रहेंगे तो क्या महलों में रहेंगे.’’

जब कभी मछलियों की महक आती तो रश्मि नाक सिकोड़ती. घर की सफाई एवं बरतन धोने के लिए काम वाली बाई रखी तो रश्मि को उस से भी मछली की बदबू आती हुई महसूस हुई. उस ने उसी दिन बाई को काम से हटा दिया. रश्मि के लिए गर्भावस्था की हालत में घर के काम की समस्या पैदा हो गई. नीचे जा कर सागभाजी खरीदना, दूध लाना, 3 वर्ष के गोलू को तैयार कर के स्कूल भेजना, फिर घर के सारे काम कर के तुषार की पसंद का भोजन बनाना अब रश्मि के वश का नहीं था. तुषार भी रात को अकसर देर से लौटता था.

तुषार ने मां को आने के लिए पत्र लिखा, तो मां ने अपनी असमर्थता जताई कि तुम्हारे पिताजी अकसर बीमार रहते हैं, उन की देखभाल कौन करेगा. फिर तुम्हारे एक कमरे के घर में न सोने की जगह है न बैठने की.

तुषार ने अपनी पहचान वालों से एक अच्छी नौकरानी तलाश करने को कहा पर रश्मि को कोई पसंद नहीं आई. तुषार ने अखबार में विज्ञापन दे दिया, फिर कई काम वाली बाइयां आईं और चली गईं.

एक सुबह एक अधेड़ औरत ने आ कर उन का दरवाजा खटखटाया और पूछा कि आप को काम वाली बाई चाहिए?

‘‘हां, हां, कहां है.’’

‘‘मैं ही हूं.’’

तुषार व रश्मि दोनों ही उसे देखते रह गए. हिंदी बोलने वाली वह औरत साधारण  मगर साफसुथरे कपडे़ पहने हुए थी.

‘‘मैं घर के सभी काम कर लेती हूं. सभी प्रकार का खाना बना लेती हूं पर मैं रात में नहीं रुक पाऊंगी.’’

‘‘ठीक है, तुम रात में मत रुकना. तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘लक्ष्मी.’’

‘‘देखो लक्ष्मी, हमारी छोटी सी गृहस्थी है इसलिए अधिक काम नहीं है पर हम साफसफाई का अधिक ध्यान रखते हैं,’’ रश्मि बोली.

‘‘बीबीजी, आप को शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.’’

लक्ष्मी ने प्रतिमाह 3 हजार रुपए वेतन मांगा, पर थोड़ी नानुकुर के बाद वह ढाई हजार रुपए पर तैयार हो गई और उसी दिन से वह काम में जुट गई, पूरे घर की पहले सफाईधुलाई की, फिर कढ़ीचावल बनाए और गोलू की मालिश कर के उसे नहलाया.

तुषार व रश्मि दोनों ही लक्ष्मी के काम से बेहद प्रभावित हो गए. यद्यपि उन्होंने लक्ष्मी से उस का पता तक भी नहीं पूछा था.

लक्ष्मी शाम को जब चली गई तो दंपती उस के बारे में देर तक बातें करते रहे.

तुषार व रश्मि आश्वस्त होते चले गए जैसे लक्ष्मी उन की मां हो. वे दोनों उस का सम्मान करने लगे. लक्ष्मी परिवार के सदस्य की भांति रहने लगी.

सुबह आने के साथ ही सब को चाय बना कर देना, गोलू को रिकशे तक छोड़ कर आना, तुषार को 9 बजे तक नाश्ता व लंच बाक्स तैयार कर के देना, रश्मि को फलों का रस निकाल कर देना, यह सब कार्य लक्ष्मी हवा की भांति फुर्ती से करती रहती थी.

लक्ष्मी वाकई कमाल का भोजन बनाना जानती थी. रश्मि ने उस से ढोकला, डोसा बनाना सीखा. भांतिभांति के अचार चटनियां बनानी सीखीं.

‘‘ऐसा लगता है अम्मां, आप ने कुकिंग स्कूल चलाया है?’’ एक दिन मजाक में रश्मि ने पूछा था.

‘‘हां, मैं सिलाईकढ़ाई का भी स्कूल चला चुकी हूं्.’’

रश्मि मुसकराती मन में सोचती रहती कि उसे तो बढ़चढ़ कर बोलने की आदत है.

डिलीवरी के लिए रश्मि को अस्पताल में दाखिल कराया गया तो लक्ष्मी रात को अस्पताल में रहने लगी.

तुषार और अधिक आश्वस्त हो गया. उस ने मां को फोन कर दिया कि तुम पिताजी की देखभाल करो, यहां लक्ष्मी ने सब संभाल लिया है.

रश्मि को बेटी पैदा हुई.

तीसरे दिन रश्मि नन्ही सी गुडि़या को ले कर घर लौटी. लक्ष्मी ने उसे नहलाधुला कर बिस्तर पर लिटा दिया और हरीरा बना कर रश्मि को पिलाया.

‘‘लक्ष्मी अम्मां, आप ने मेरी सास की कमी पूरी कर दी,’’ कृतज्ञ हो रश्मि बोली थी.

‘‘तुम मेरी बेटी जैसी हो. मैं तुम्हारा नमक खा रही हूं तो फर्ज निभाना मेरा कर्तव्य है.’’

तुषार ने भी लक्ष्मी की खूब प्रशंसा की.

एक शाम तुषार, रश्मि व बच्ची को ले कर डाक्टर को दिखाने गया तो रास्ते में लोकल ट्रेन का एक्सीडेंट हो जाने के कारण दंपती को घर लौटने में रात के 12 बज गए.

घर में ताला लगा देख दोनों अवाक् रह गए. अपने पास रखी दूसरी चाबी से उन्होंने ताला खोला व आसपास नजरें दौड़ा कर लक्ष्मी को तलाश करने लगे.

चिंता की बात यह थी कि लक्ष्मी, गोलू को भी अपने साथ ले गई थी.

तुषार व रश्मि के मन में लक्ष्मी के प्रति आक्रोश उमड़ पड़ा था. रश्मि बोली, ‘‘यह लक्ष्मी भी अजीब नौकरानी है, एक रात यहीं रह जाती तो क्या हो जाता, गोलू को क्यों ले गई.’’

बच्चे की चिंता पतिपत्नी को काटने लगी. पता नहीं लक्ष्मी का घर किस प्रकार का होगा, गोलू चैन से सो पाएगा या नहीं.

पूरी रात चिंता में गुजारने के पश्चात जब सुबह होने पर भी लक्ष्मी अपने निर्धारित समय पर नहीं लौटी तो रश्मि रोने लगी, ‘‘नौकरानी मेरे बेटे को चोरी कर के ले गई, पता नहीं मेरा गोलू किस हाल में होगा.’’

तुषार को भी यही लग रहा था कि लक्ष्मी ने जानबूझ कर गोलू का अपहरण कर लिया है. नौकरों का क्या विश्वास, बच्चे को कहीं बेच दें या फिर मोटी रकम की मांग करें.

लक्ष्मी के प्रति शक बढ़ने का कारण यह भी था कि वह प्रतिदिन उस वक्त तक आ जाती थी.

रश्मि के रोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग जमा हो कर कारण पूछने लगे. फिर सब लोग तुषार को पुलिस को सूचित करने की सलाह देने लगे.

तुषार को भी यही उचित लगा. वह गोलू की तसवीर ले कर पुलिस थाने जा पहुंचा.

लक्ष्मी के खिलाफ बेटे के अपहरण की रिपोर्ट पुलिस थाने में दर्ज करा कर वह लौटा तो पुलिस वाले भी साथ आ गए और रश्मि से पूछताछ करने लगे.

रश्मि रोरो कर लक्ष्मी के प्रति आक्रोश उगले जा रही थी.

पुलिस वाले तुषार व रश्मि का ही दोष निकालने लगे कि उन्होंने लक्ष्मी का फोटो क्यों नहीं लिया, बायोडाटा क्यों नहीं बनवाया, न उस के रहने का ठिकाना देखा, जबकि नौकर रखते वक्त यह सावधानियां आवश्यक हुआ करती हैं.

अब इतनी बड़ी मुंबई में एक औरत की खोज, रेत के ढेर में सुई खोजने के समान है.

अभी यह सब हो ही रहा था कि अकस्मात लक्ष्मी आ गई, सब भौचक्के से रह गए.

‘‘हमारा गोलू कहां है?’’ तुषार व रश्मि एकसाथ बोले.

लक्ष्मी की रंगत उड़ी हुई थी, जैसे रात भर सो न पाई हो, फिर लोगों की भीड़ व पुलिस वालों को देख कर वह हक्की- बक्की सी रह गई थी.

‘‘बताती क्यों नहीं, कहां है इन का बेटा, तू कहां छोड़ कर आई है उसे?’’ पुलिस वाले लक्ष्मी को डांटने लगे.

‘‘अस्पताल में,’’ लक्ष्मी रोने लगी.

‘‘अस्पताल में…’’ तुषार के मुंह से निकला.

‘‘हां साब, आप का बेटा अस्पताल में है. कल जब आप लोग चले गए थे तो गोलू सीढि़यों पर से गिर पड़ा. मैं उसे तुरंत अस्पताल ले गई, अब वह बिलकुल ठीक है. मैं उसे दूध, बिस्कुट खिला कर आई हूं. पर साब, यहां पुलिस आई है, आप ने पुलिस बुला ली…मेरे ऊपर शक किया… मुझे चोर समझा,’’ लक्ष्मी रोतेरोते आवेश में भर उठी.

‘‘मैं मेहनत कर के खाती हूं, किसी पर बोझ नहीं बनती, आप लोगों से अपनापन पा कर लगा, आप के साथ ही जीवन गुजर जाएगा… मैं गोलू को कितना प्यार करती हूं, क्या आप नहीं जानते, फिर भी आप ने…’’

‘‘लक्ष्मी अम्मां, हमें माफ कर दो, हम ने तुम्हें गलत समझ लिया था,’’ तुषार व रश्मि लक्ष्मी के सामने अपने को छोटा समझ रहे थे.

‘‘साब, अब मैं यहां नहीं रहूंगी, कोई दूसरी नौकरी ढूंढ़ लूंगी पर जाने से पहले मैं आप को आप के बेटे से मिलाना ठीक समझती हूं, आप सब मेरे साथ अस्पताल चलिए.’’

तुषार, लक्ष्मी, कुछ पड़ोसी व पुलिस वाले लक्ष्मी के साथ अस्पताल पहुंच गए. वहां गोलू को देख दंपती को राहत मिली.

गोलू के माथे पर पट्टी बंधी हुई थी और पैर पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था.

डाक्टर ने बताया कि लक्ष्मी ने अपने कानों की सोने की बालियां बेच कर गोलू के लिए दवाएं खरीदी थीं.

‘‘साब, आप का बेटा आप को मिल गया, अब मैं जा रही हूं.’’

तुषार और रश्मि दोनों लक्ष्मी के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए, ‘‘माफ कर दो अम्मां, हमें छोड़ कर मत जाओ.’’

दोनों पतिपत्नी इतनी अच्छी आया को खोना नहीं चाहते थे इसलिए बारबार आग्रह कर के उन्होंने उसे रोक लिया.

लक्ष्मी भी खुश हो उठी कि जब आप लोग मुझे इतना मानसम्मान दे रहे हैं, रुकने का इतना आग्रह कर रहे हैं तो मैं यहीं रुक जाती हूं.

‘‘साब, मेरा मुंबई का घर नहीं देखोगे,’’ एक दिन लक्ष्मी ने आग्रह किया.

तुषार व रश्मि उस के साथ गए. वह एक साधारण वृद्धाश्रम था, जिस के बरामदे में लक्ष्मी का बिस्तर लगा हुआ था.

आश्रम वालों ने उन्हें बताया कि लक्ष्मी अपने वेतन का कुछ हिस्सा आश्रम को दान कर देती है और रातों को जागजाग कर वहां रहने वाले लाचार बूढ़ों की सेवा करती है.

अब तुषार व रश्मि के मन में लक्ष्मी के प्रति मानसम्मान और भी बढ़ गया था.

लक्ष्मी के जीवन की परतें एकएक कर के खुलती गईं. उस विधवा औरत ने अपने बेटे को पालने के लिए भारी संघर्ष किए मगर बहू ने अपने व्यवहार से उसे आहत कर दिया था, अत: वह अपने बेटे- बहू से अलग इस वृद्धाश्रम में रह रही थी.

‘‘संघर्ष ही तो जीवन है,’’ लक्ष्मी, मुसकरा रही थी. Family Story In Hindi 

Hindi Kavita : तुम

Hindi Kavita : तुम

जब भी मेरे पास आना

पूरा आना

आधे-अधूरे आने से

ना तो मित्रता में

स्पंदन होता है

ना रिश्तेदारी

साँस ले पाती है

अपनेपन की हृदय गति

असंतुलित सी हो जाती है

जब भी आना

भावों का,भावनाओं का

सौंदर्य का,प्रेम का

गुलदस्ता लाना

मन में सजाकर

और हाँ

समय के साथ आना

जब भी वक़्त मिले आना

ज़रूर आना पर

जब भी

जिस रूप में भी आना

पूरा आना

तुम।

लेखक : अनिल कुमार मिश्र

Exclusive Interview : सिंड्रेला दास – ‘मैं अगले ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना चाहती हूँ’

Exclusive Interview : 15 वर्षीय टेबल टेनिस स्टार सिंड्रेला दास का अगला लक्ष्य ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना है। सिंड्रेला ने अपने सपनों और सफलता के बारे में और क्या बताया? सुरंजन दे द्वारा साक्षात्कार।

कोलकाता, बंगाल और देश का नाम रोशन करने के लिए वह अपनी कोशिशें जारी रखे हुए हैं। इस बार उनका लक्ष्य अगले ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना है। लेकिन वह कदम दर कदम आगे बढ़ते हुए उस मुकाम तक पहुँचना चाहती हैं। इसलिए, वह अभी से इसकी तैयारी कर रही हैं। हालांकि, अपने व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद, 15 वर्षीय टेबल टेनिस स्टार सिंड्रेला दास ने अपने सपनों और सफलताओं के बारे में जानकारी साझा करने के लिए समय निकाला।

आपने अपने टेबल टेनिस करियर की शुरुआत कैसे की?

मैंने पहली बार टेबल टेनिस रैकेट पकड़ना तब सीखा जब मैं सिर्फ़ चार साल की थी। मेरे पिताजी के पास एक टेबल टेनिस बैट था, और मुझे उससे खेलना बहुत पसंद था। मैं घंटों दीवार पर गेंद मारती रहती थी। इसी तरह मैंने अभ्यास शुरू किया। बाद में, मेरे माता-पिता ( सुष्मिता और सुप्रिय ) ने मेरा दाखिला एक स्थानीय ( बाघायतीन ) टेबल टेनिस क्लब में करवा दिया। तैराकी, चित्रकारी, गायन और नृत्य के साथ-साथ, मैं खुद को सक्रिय रखने के लिए टेबल टेनिस की ओर भी आकर्षित हुई। जब मैं आठ साल की थी, तो मैंने एक स्थानीय टेबल टेनिस टूर्नामेंट में भाग लिया और अंततः चैंपियन बनी। चूँकि यह जूनियर स्तर का टूर्नामेंट था, इसलिए इसमें कोई लैंगिक भेदभाव नहीं था, मैंने लड़के और लड़कियों दोनों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा की। उस टूर्नामेंट ने सचमुच मेरी ज़िंदगी बदल दी। मुझे आज भी याद है कि मैंने अपने माता-पिता से कहा था कि मुझे यह खेल बहुत पसंद है।

आपको अपना करियर शुरू करने के लिए किसने प्रेरित किया?

मैंने 9 साल की उम्र में अपने कोच सौम्यदीप रॉय सर और पॉलमी घटक मैडम के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण शुरू किया। उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षण मेरे टेबल टेनिस के सफ़र में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उनके प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और सकारात्मक दृष्टिकोण ने मुझे अपनी क्षमता पर विश्वास दिलाया। तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं सिर्फ़ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि एक पेशेवर खिलाड़ी बनना चाहती हूँ। मुझ पर उनके विश्वास ने मुझे बड़े सपने देखने और खुद को पूरी तरह से इस खेल के लिए समर्पित करने का आत्मविश्वास दिया। अंतर्राष्ट्रीय कोच वांग मन्यु अब मेरे आदर्श गुरुओं में से एक हैं।

खेल जगत में आपने सफलता कैसे हासिल की?

मैंने कई विश्व टेबल टेनिस युवा स्पर्धाओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 7 स्वर्ण, 8 रजत और 7 कांस्य पदक जीते हैं। हाल ही में, मैंने काठमांडू में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय चैंपियनशिप में सीनियर टीम स्पर्धा में टीम इंडिया के लिए स्वर्ण पदक भी जीता। घरेलू सर्किट पर, मैंने राष्ट्रीय रैंकिंग स्पर्धाओं में कई पोडियम फिनिश के साथ लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है। मैं ‘अंडर 17 गर्ल्स सिंगल्स’ (2023) में राष्ट्रीय चैंपियन बनी। मैंने सीनियर नेशनल्स (2024) में कांस्य पदक जीतकर भी अपनी पहचान बनाई। मुझे वर्ष के सबसे होनहार खिलाड़ी के लिए ‘मास्टर डी. वर्ल्ड ट्रॉफी’ से भी सम्मानित किया गया। हाल ही में ‘कलकत्ता जर्नलिस्ट्स क्लब’ ने मुझे रजत पदक से सम्मानित किया।

वर्तमान में, मैं भारत में ‘अंडर 17’ और ‘अंडर 19’ लड़कियों की श्रेणियों में नंबर 1 और महिला वर्ग में नंबर 9 पर हूँ। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, मेरी विश्व रैंकिंग 15 (अंडर 17-महिला), 25 (अंडर 19-महिला) और 182 (महिला) है।

क्या आपने अपने करियर में कभी किसी चुनौती का सामना किया है?

किसी भी खिलाड़ी के लिए, सबसे कठिन संघर्ष हमेशा मैदान पर नहीं, बल्कि चोटों से उबरने में होता है। मैंने इसका अनुभव बहुत छोटी उम्र में किया था, जब सिर्फ़ 11 साल की उम्र में एक फिटनेस सेशन के दौरान मेरी दाहिनी कलाई टूट गई थी। टेबल से दूर रहना मेरे लिए बहुत तकलीफ़देह था। सिर्फ़ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी। मैं कई बार बेचैन, चिंतित और असहाय महसूस करती थी। लेकिन उस दौर ने मुझे धैर्य, दृढ़ता और मज़बूती से लड़ने का महत्व सिखाया।

आज भी छोटी-मोटी चोटें मेरी परीक्षा लेती हैं। कभी-कभी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए मुझे मानसिक तनाव से गुज़रना पड़ता है। ऐसे क्षणों में, मैं खुद को याद दिलाती हूँ कि रुकावटें अस्थायी होती हैं, लेकिन उनसे उबरने की इच्छाशक्ति स्थायी होती है। हर चुनौती मुझे और मज़बूत, ज़्यादा आशावादी और अपने सपनों को पूरा करने के लिए और ज़्यादा दृढ़ बनाती है।

अपने करियर में मुझे जो सबसे बड़ा दबाव महसूस होता है, वह है नियमित अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन की ज़रूरत, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने के लिए बेहद ज़रूरी है। आर्थिक रूप से, यह बहुत चुनौतीपूर्ण है। उस मुश्किल घड़ी में, धानुका धुनसेरी ग्रुप के सीके धानुका आगे आए और मेरी हर संभव मदद की। चाहे मुझे उन्नत प्रशिक्षण के लिए ऑस्ट्रिया भेजना हो, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने का अवसर देना हो, या मुझे नवीनतम प्रशिक्षण उपकरण उपलब्ध कराना हो, धानुका सर ने सभी व्यवस्थाएँ कीं। अब, मैं ओजीक्यू (ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट) के लिए और भी ज़्यादा आश्वस्त महसूस करती हूँ। धानुका सर और ओजीक्यू, दोनों ही मेरे सपने के करीब पहुँचने में मेरी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

भविष्य में आप और क्या हासिल करना चाहते हैं?

मेरा सबसे बड़ा सपना ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना है, लेकिन मैं कदम दर कदम आगे बढ़ते हुए उस मुकाम तक पहुँचना चाहती हूँ। मेरा पहला लक्ष्य यूथ एशियन गेम्स, आईटीटीएफ यूथ वर्ल्ड चैंपियनशिप और यूथ ओलंपिक में पदक जीतना है। इसके बाद, मेरा लक्ष्य एशियन गेम्स और ओलंपिक गेम्स में पोडियम फिनिश हासिल करना है और अंततः, मैं दुनिया में नंबर 1 बनना चाहती हूँ। इसके साथ ही, मैं जितनी बार संभव हो, सीनियर राष्ट्रीय चैंपियन भी बनना चाहती हूँ।

आपके आगामी टूर्नामेंट कौन से हैं?

घरेलू मैदान पर राष्ट्रीय चैंपियनशिप के साथ-साथ, मैं चार राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंटों में भी भाग लूंगी। मैं तीनों श्रेणियों – अंडर-17, अंडर-19 और महिला टीम में भाग लूंगी। अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम के अनुसार, मैं सितंबर में संयुक्त राज्य अमेरिका में दो टूर्नामेंटों में भाग लूँगा, उसके बाद अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में बहरीन में तीसरे युवा एशियाई खेलों में भाग लूंगी। वर्ष का समापन नवंबर के अंत में रोमानिया में विश्व युवा चैंपियनशिप के साथ होगा। घरेलू कैलेंडर के आधार पर, मैं अक्टूबर के मध्य में मोंटेनेग्रो में दो डब्ल्यूटीटी स्पर्धाओं में भाग ले सकती हूं।

आप अपनी पीढ़ी के उन लोगों को क्या संदेश देंगे जो अभी खेल में कदम रख रहे हैं?

सफलता रातोंरात नहीं मिलती। भले ही कोई देख न रहा हो, लेकिन जब दूसरे आराम कर रहे हों, तब आप घंटों प्रशिक्षण में जो समय लगाते हैं, उसका फल आपको अपने त्याग और इस विश्वास से मिलेगा कि हर छोटा कदम आपको आपके सपनों के करीब ले जाएगा। ऐसा ही होगा। और सिर्फ़ पदक ही नहीं, बल्कि एक खेल प्रेमी बनें। और हाँ, मैं आपको बता दूँ कि असफलता का मतलब अंत नहीं है, बल्कि याद रखें कि असफलता आपको ऐसे सबक सिखाती है जो आपको और मज़बूत बनाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने देश का प्रतिनिधित्व करना सबसे बड़ा सम्मान है और हर प्रशिक्षण सत्र उस सपने की ओर एक कदम है।

मेरा मानना है कि खेल हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं और हमें जीत और हार, दोनों को सकारात्मक तरीके से स्वीकार करना सिखाते हैं। इसलिए आगे बढ़िए, अनुशासित रहिए और खुद पर विश्वास रखिए। साथ ही, दूसरों को भी प्रेरित कीजिए।

आपको अपने माता-पिता से क्या लाभ या मदद मिली है?

मेरे पूरे सफ़र में मेरे माता-पिता मेरी सबसे बड़ी ताकत रहे हैं। शुरू से ही, उन्होंने मेरे सपनों पर विश्वास किया और हर संभव तरीके से मेरा साथ दिया। कई बार मुश्किल हालात भी आए—चाहे चोट लगना हो, कोई बड़ी हार हो, या पढ़ाई के साथ खेल को संतुलित करना हो—वे हमेशा मेरे साथ खड़े रहे, मुझे प्रेरित किया और मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। मुझे पूरा विश्वास है कि अब तक मैंने जो कुछ भी हासिल किया है, वह मेरे माता-पिता के निरंतर त्याग, प्रोत्साहन और बिना शर्त प्यार की बदौलत है।

आप खेल और पढ़ाई दोनों को एक साथ कैसे मैनेज करते हैं?

आठवीं कक्षा तक, मैं टेबल टेनिस की ट्रेनिंग के साथ-साथ नियमित रूप से स्कूल भी जाती थी। लेकिन जैसे-जैसे मेरा खेल का स्तर बढ़ता गया, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना वाकई मुश्किल होता गया। फिर भी, मैंने समय प्रबंधन के ज़रिए सब कुछ मैनेज किया क्योंकि मेरा दृढ़ विश्वास है कि शिक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है। यह मेरी सोच को तेज़ करती है और मेरी समग्र सफलता सुनिश्चित करने में मदद करती है। मुझे यह भी लगता है कि शिक्षा मेरे कौशल को बेहतर बनाती है, जिससे मुझे अपने प्रतिद्वंद्वी के खेल का बेहतर विश्लेषण करने और टेबल पर जवाबी रणनीति बनाने में मदद मिलती है। इसलिए, टेबल टेनिस में लगातार कड़ी प्रतिस्पर्धा जारी रखने के अलावा, मैं अब ग्यारहवीं कक्षा में कड़ी मेहनत से पढ़ाई कर रही हूँ।

मुझे फुचका (पानीपुरी/गोलगप्पे) खाना बहुत पसंद है। मुझे ग्रेवी वाला चिकन और चिकन स्टू बहुत पसंद है। लेकिन ज़्यादातर मैं उबली हुई सब्ज़ियाँ खाती हूँ। हाँ, अभ्यास के दौरान मैं अंडे, केले और सूखे मेवे ज़रूर खाती हूँ। लेकिन अगर मैं चाहूँ भी, तो दोस्तों के साथ घूमने-फिरने का ज़्यादा समय नहीं मिल पाता।

इसे भी पढ़ें 

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एक नज़र में

‘National Achievements’

2025

राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट, वडोदरा अंडर-17 बालिका एकल – स्वर्ण और अंडर-19 बालिका एकल – स्वर्ण

2024-2025

जूनियर और युवा राष्ट्रीय – अंडर-19 बालिका टीम स्पर्धा – स्वर्ण

राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट, बेंगलुरु – अंडर-17 बालिका एकल – स्वर्ण और अंडर-19 बालिका एकल – कांस्य

राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट, गोवा – अंडर-17 बालिका एकल – स्वर्ण

राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट, तिरुवनंतपुरम – अंडर-17 बालिका एकल – स्वर्ण और अंडर-19 बालिका एकल – स्वर्ण

वरिष्ठ राष्ट्रीय – महिला एकल – कांस्य

2023-2024

जूनियर और युवा राष्ट्रीय – अंडर-17 बालिका एकल – स्वर्ण और अंडर-19 बालिका युगल – रजत

राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट, हैदराबाद – अंडर-15 बालिका एकल – स्वर्ण

राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट, पंचकुला – अंडर-15 बालिका एकल – स्वर्ण

राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट, वडोदरा – अंडर-15 बालिका एकल – स्वर्ण, अंडर-17 बालिका एकल – स्वर्ण और अंडर-19 बालिका एकल – स्वर्ण

राष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंट, विजयवाड़ा – अंडर-17 बालिका एकल – स्वर्ण

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International Achievements

2025

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय चैंपियनशिप, काठमांडू – सीनियर टीम – स्वर्ण

डब्ल्यूटीटी युवा दावेदार, अल्माटी – अंडर-17 बालिका एकल – कांस्य

डब्ल्यूटीटी युवा दावेदार, मेट्ज़ – अंडर-17 बालिका एकल – रजत

डब्ल्यूटीटी युवा दावेदार, प्रिस्टिना – अंडर-17 बालिका एकल – कांस्य और अंडर-19 बालिका युगल – रजत

2024

डब्ल्यूटीटी यूथ कंटेंडर्स, दमन – अंडर-15 बालिका एकल – कांस्य और अंडर-17 बालिका एकल – रजत

डब्ल्यूटीटी यूथ कंटेंडर्स, लिग्नानो, इटली – अंडर-15 बालिका एकल – स्वर्ण और अंडर-17 बालिका एकल – कांस्य

डब्ल्यूटीटी यूथ कंटेंडर्स, स्ज़ोम्बथेली – अंडर-17 बालिका एकल – कांस्य

डब्ल्यूटीटी यूथ कंटेंडर्स, दोहा – अंडर-19 बालिका एकल – कांस्य, अंडर-15 बालिका युगल – रजत और अंडर-15 मिश्रित युगल – रजत

दक्षिण एशियाई युवा टेबल टेनिस चैम्पियनशिप, श्रीलंका – अंडर-15 बालिका एकल – स्वर्ण, अंडर-15 बालिका टीम – स्वर्ण और अंडर-15 मिश्रित युगल – स्वर्ण

डब्ल्यूटीटी यूथ कंटेंडर्स, अल्जीरिया – अंडर-15 बालिका एकल – स्वर्ण, अंडर-15 मिश्रित युगल – कांस्य

डब्ल्यूटीटी यूथ कंटेंडर्स, लीमा – अंडर-15 बालिका एकल – रजत, अंडर-15 बालिका युगल – रजत और अंडर-15 मिश्रित युगल – स्वर्ण

डब्ल्यूटीटी यूथ कंटेंडर्स, ट्यूनीशिया – अंडर-15 बालिका एकल – रजत

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Hindi Poem : हां तुम!

Hindi Poem : मैंने चाहा है तुमको

मेरी चाहतों में तुम।

गुजरे कल में तुम

उगते सूरज में तुम।

बहती हवाओं में तुम

बरसते बादलों में तुम।

खिलते फूलों में तुम

ढलती शामों में तुम।

हां तुम!

मन की सुंदरता

तन का सुंदर रूप।

लब तेरे मधुशाला

हर अंग पुष्प की माला।

स्वप्न की परी  तुम

हो यौवन रस का अमृत  प्याला।

हां तुम!

तुम जीवन ज्योति

तुम करुणा तुम भक्ति

तुम ही मेरा बंधन।

मेरा इश्क तुम

मेरी जान तुम

मेरा हर लम्हा तुमसे

तुम ही मेरा दर्पण।

हां तुम!

बेचैन दिल तन्हा मन

तस्वीर तेरी चूमते नयन।

मिलकर तुमसे  लिपटूंँ मैं ऐसे

जैसे चंदन से लिपटे भुजंग।

मेरा ख्वाब मेरी हकीकत

मेरी चाहत मेरा जूनू

हां तुम!

लेखक : बाल कृष्ण मिश्रा

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