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Hindi Social Story: बाड़- अविनाश की पत्नी क्यों नहीं जाना चाहती थी गांव?

Hindi Social Story: “यार, वीकेंड फौर्म हाउस में गुजारते हैं इस बार, कैसा रहेगा?”अविनाश ने पत्नी सुलभा से पूछा.

“वाह, बढ़िया रहेगा. 24 घंटे इस पौल्यूशन में रह कर दम घुटने लगता है. बच्चों की भी आउटिंग हो जाएगी,” सुलभा ने खुशी से हामी भरी।

“अरे सुनो, तुम्हें बताना भूल गया था, बाबूजी का फोन आया था गांव से कि कुछ समय हम उन के साथ गांव में रहें, बोलो क्या कहती हो? फौर्म हाउस की बजाए अपने गांव, अपने खेत बच्चों को दिखा लाएं? वहां का आनंद ही कुछ और होगा,” अचानक अविनाश ने कुछ सोचते हुए कहा.

“अरे नहीं, अभी तो फौर्म हाउस ही चलो, गांववांव फिर कभी चलेंगे, मैं मेरी फ्रैंड ऐश्वर्या से भी कह दूंगी कि वह भी अरुण के साथ चलने की तैयारी कर ले, काफी समय से उस के साथ वक्त नहीं गुज़ारा है. सुनो ननकू से अभी से बोल दो कि वह पास के गांव के सरपंच से बुलौक कार्ट मांग लाए, बच्चों को बुलौक कार्ट राइडिंग का मजा भी आ जाएगा,” सुलभा ने साफ मना कर दिया.

“ठीक है भाई, अब बनावट हम लोगों पर इस कदर हावी है कि बनावटी फौर्म ही भाता है, वास्तविकता से तो हमारे रिश्ते टूटते ही जा रहे हैं. बनावटी फौर्म, दिखावटी रिश्ते, चलो चलते हैं फौर्म हाउस,” अविनाश बनावटी हंसी हंसते हुए बोला. Hindi Social Story.

Hindi Story: सांझ की बाती- स्त्री की अलग मानसिकता उजागर करती कथा

Hindi Story: मनाली सम्यक और अपने बीच किसी को नहीं आने देना चाहती थी. यहां तक कि अपना बच्चा भी. सम्यक हैरान था मनाली की इस सोच और उस रूप को देख कर.

अब और कितना इंतजार करूं, मनाली, तुम कब लौटोगी?

कब सम झोगी खुद को? कब तुम नासम झी के बीहड़ से हमारे पास वापस आओगी? थक गया हूं मैं इन

21 सालों में तुम्हे संभालतेसंभालते. कभीकभी लगता है, मैं भी तुम्हारी तरह नासम झ बन जाऊं? भूल जाऊं इस घर को, घर के हर एक पल को, प्रेम को, रिश्ते की तड़प को, तुम्हें सब भूल जाऊं और निकल जाऊं इस रेतीले तूफान को पार कर आगे किसी नि र्झर की तलाश में.

मगर ज्यों अपनी बेटी किशा को देखता हूं, देखता हूं एक मां के रूप में तुम्हें, मनाली, तो पैर मेरे खुद ही इस रेत के भंवर में धंसते जाते हैं. कैसे छोड़ जाऊं तुम दोनों को अकेला यहां. कोई चारा नहीं कि यहीं बैठ तुम्हारा इंतजार करता रहूं मैं.

सवाल खाने को दौड़ते हैं मु झे कि कब तक? आज भी तुम वहीं गई हो जहां जाना कतई सही नहीं. फिर किशा परेशान होगी, उस की पढ़ाई बाधित होगी.

‘‘पापा.’’

वह देखो, बिटिया आ गई कालेज से. अब मैं क्या जवाब दूंगा उसे, यही कि उस की मां वह सब कर रही है जिस की चिंता इस उम्र में बेटियों को ले कर मां को होती है. मैं सब जानता हूं, मगर तुम्हें रोक नहीं पा रहा. तुम ने अपनी नासम झी, जिद और ईर्ष्या में विनाशलीला रच रखी है, मनाली. इसे रोकने की कला मु झ में नहीं.

‘‘पापा, आज मां फिर गईं वहां.’’

‘‘लगता तो है, बिट्टो. मैं अब ये सब  झेलने से बाज आना चाहता हूं. छोड़ दे उसे उस के हाल पर, उस के दिमाग की हालत मु झे सही नहीं लगती. वरना इतना सुखी संसार छोड़…’’

‘‘आप उदास न हो, पापा. मैं मम्मा को फिर से हमारी जिंदगी में वापस लाऊंगी, हमेशा के लिए.’’

‘‘राधा दीदी ने पास्ता बनाया है तेरे लिए. रात के डिनर में मैं ने तेरी पसंद का वेज मंचूरियन, पनीर टिक्का बनवा रखे हैं उस से.’’

डैड डार्लिंग, जी करता है आप के सिर के चांद को चूम लूं.’’

‘‘अरेअरे, कैसे गले में  झूल जाती है, पगली. चल तू पास्ता ले, मैं बढि़या कौफी बनाता हूं, दोनों के लिए.’’

मनाली, अब अकेले ही जीना सीख गया हूं. बिटिया भी मु झ में ही मां को ढूंढ़ कर खुश होना सीख गई है. नियमित दिनचर्या में हम दोनों ही मशीन की तरह अभ्यस्त हैं. औफिस से घर लौटने की जल्दी रहती है मु झे.

कालेज से लौट कर किशा इस घर की दीवारों से अकेली न टकराती रहे, वक्त की सूइयां उस पर तंज न कसें, रोजरोज की तनहाईभरी बेरुखी से तंग आ कर वह गलत राह की ओर न मुड़ जाए, इसलिए मां की सी बेचैनी लिए उस का पापा औफिस से घर की ओर भाग पड़ता है. मगर, सोचो जरा मनाली, मेरे लिए कितना मुश्किलभरा होता होगा अकसर औफिस का अधूरा काम घर लाते हुए.

किशा भी अपनी पढ़ाई, प्रोजैक्ट और जिंदगी की व्यस्तताओं के बीच तुम्हें ले कर किस तनाव से गुजरती है.

तुम हमें कभी सम झने की कोशिश

ही नहीं करतीं मनाली. कितनी

परतों के हम बापबेटी ने मुखौटे डाल रखे हैं अपनेअपने किरदारों पर ताकि तुम्हारे दिए दर्द एकदूसरे को नजर न आएं.

शादी के बाद तुम्हें सारे सुख दूंगा, इसी वादे के साथ मैं ने तुम्हें दिल के सिंहासन पर बैठाया. यह आलीशान 6 कमरों वाला डुप्लैक्स बनवाया कि तुम एक रानी की तरह रह सको, हिरणी की तरह कुलांचें भरो, बुलबुल की तरह मेरी जिंदगी के बगीचे में गीत गाओ और फिर वसंत का अनुराग जब चरम पर आया तो हमारी बेटी किशा का आना हमारी जिंदगी में सपनीला संगीत सा गूंज उठा.

तुम इतनी घबरा क्यों गईं, मनाली. जैसे खेलतेखेलते अचानक डर कर भागने लगी, क्यों किशा को आते देख इतनी विचलित हो गईं, मनाली?

‘‘पापा, मम्मा आ गईं. वही आदमी अपनी कार में मम्मा को छोड़ गया. पापा, पापा सो गए क्या?’’

मैं मुखौटा लगाए था. क्या कहूं उस से. अपनी पीड़ा उसे दिखा कर खुद कितना लज्जित होऊं. पुरुष का, पति का, पिता का, कब कौन सा मुखौटा लगाता हूं, उतारता हूं, हिसाब नहीं रख पाता, मनाली.

और ये नन्ही 20 साल की किशा भी तो. क्या यह नहीं सम झी कि मैं जानबू झ कर नींद का लिहाफ ओढ़े था? वह चली गई थी. मैं सोने की कोशिश में था कि सुबह औफिस जाऊं तो तुम्हारी विलासिता के लिए संसाधन जुटें.

48 की उम्र में मेरे सिर के उड़े बालों को मेरा आईना मेरा उड़ा हुआ चैन कहता है. ठीक ही तो है. वीरान लंबी रातें मेरे कानों में सिसकियां भरती रहती हैं और मैं इधरउधर करवट लेते, बस, तुम से ही बातें करता रहता हूं. ये जो मैं ने इतना बड़ा घर बनवाया- सोचा तो नहीं था कि बिस्तर मेरा यों खाली पड़ा रहेगा तुम्हारे बिना. मैं ने तो भरोसे का स्पेस पैदा करना चाहा, तुम ने उस स्पेस को दूरी बना डाला.

तुम तो ऐसी नहीं थीं, मनाली. मैं तो तुम्हारा सबकुछ था.

बारबार मु झे वे दिन याद आते हैं जब तुम 19 साल की कालेज में फर्स्ट ईयर की स्टूडैंट थीं. तुम्हारे कालेज के 25वें वार्षिकोत्सव में उन पूर्व छात्रों को भी बुलाया गया था जिन्होंने पिछले 5 सालों में कालेज से निकल कर जिंदगी में खास मुकाम पाया था. हालांकि मैं उस कालेज से 4 साल पहले ही निकल चुका था लेकिन इस साल बैंकिंग सैक्टर में ऊंचे पद पर चयन के बाद एक अच्छी सी छुट्टी बिताने के मूड में था. ऐसे में जब अपने पुराने कालेज के उत्सव में बुलावा आया तो ‘एक ब्रेक हो जाए’ की सोच पर मैं वहां पहुंचा.

उस शाम एक चुलबुली, स्मार्ट और खूबसूरत खिलती सी कली को देख मैं मुग्ध सा होने लगा. मैं मंत्रमुग्ध सा तुम्हें देखता रहा था, मनाली. उस फंक्शन में तुम्हारी डांस की अदायगी और संगीत की प्रस्तुति कैसी रही, वैसे, यह जानने की टोह लिए तुम भी तो मेरी आंखों में बारबार  झांक लेती थीं.

मंच पर तुम्हारी प्रस्तुति के वक्त या आसपास तुम्हारे आनेजाने के वक्त, कुरसी की पहली कतार में बैठा मैं तुम्हें अपनी अनुभूतियों में लगातार सोखता रहा.

रात के 10 बजे गए थे.

तुम अपनी कालेज बस में होस्टल लौटने वाली थीं. मैं ने यह मौका गंवाना उचित न सम झा. जैसेतैसे मैं ने अपनी  िझ झक तोड़ी और तुम्हारे पास पहुंचा. जैसे ग्लेशियर पिघल कर मेरा रोमरोम बहा ले जा रहा था. नजदीक से तुम्हें देखा. खूबसूरती की पारिजात पुष्प थीं तुम. सांचे में ढली, निखरी, कौतुक और यौवन से भरपूर, आंखों में हिरणी सी चंचलता, होंठों पर शरारतभरी मुसकान देख मु झे लगा कि मैं इस बहुमूल्य हीरे को गोद में उठा कर कहीं भाग पड़ूं.

मैं ने अपनी धड़कनों को काबू में रखने की भरपूर कोशिश करते हुए कहा, ‘नाम बताओगी?’

‘मु झे क्या पता?’

‘क्यों, अपना नाम नहीं पता?’

‘हां, मेरा नाम मु झे पता है, आप किस का नाम पूछ रहे हैं, यह तो नहीं पता न मु झे.’ और वह खिलखिलाना तुम्हारा. मेरा मन अमृत से सराबोर हो गया था.

‘ओहो,बहुत नटखट हो. तुम्हारा नाम?’

‘मनाली. और आप? सम्यक श्रेष्ठ?’

‘सम्यक प्रसाद, श्रेष्ठ नहीं.’

‘क्यों, सर तो बारबार अनाउंस कर रहे थे हमारे कालेज के श्रेष्ठ विद्यार्थी रहे सम्यक आदिआदि.’

और फिर तुम्हारा वह खिलखिलाना. अब तो लग रहा था चुलबुली दुष्ट पुडि़या को अपने पौकेट में भर कर दौड़ जाऊं, उसे बिस्तर पर डाल कर उसे खूब चूमूं और पूछूं कि क्यों, और करेगी शैतानी? फिर वह कुछ और शरारत करे इस से पहले मैं उस के होंठों को अपने होंठों में कस लूं.

इतना कुछ सोचता हुआ मैं शांत,  झेंपता सा खड़ा, इतना ही कह पाया, ‘अपना मोबाइल नंबर दोगी?’

तुम ने जल्द अपना मोबाइल नंबर दिया और बस पर चढ़ गईं. फर्स्ट ईयर की स्टूडैंट थीं, गर्ल्स होस्टल में अत्यधिक अनुशासन था. सम झता था मैं कि तुम से मिलना आसान नहीं. दिन बीतते गए, तुम उतावली होती गईं.

यद्यपि हमारी व्यक्तिगत मुलाकातें कम ही होतीं लेकिन फोन के माध्यम से हम लगातार करीब आते रहे. नौकरी के सिलसिले में इंदौर में था मैं. वहां रह कर तुम्हारे शरारती अंदाज, चुलबुलेपन और बचपने को बहुत मिस करता. मैं भोपाल अपने घर आता तो था, लेकिन तुम्हारा होस्टल के नियम तोड़ मु झ से छिप कर मिलना मु झे गवारा न होता और तुम छटपटा जातीं.

अपने घर में बड़ा भाई होने की वजह से छोटी बहन की शादी का जिम्मा भी मु झ पर ही था पर तुम सम झना कहां चाहती थीं, मनाली. बारबार तुम्हारा बेचैन हो जाना मेरे धीरज को भी कम कर जाता. मेरी बहन को अभी शादी की जल्दी नहीं थी जबकि तुम हमारे मिलन को ले कर मु झ पर लगातार दबाव बनाती रहीं.

आखिर में पिताजी और मां के आज्ञाकारी पुत्र ने घर में अपनी मजबूरी बता ही दी. दरअसल, बहन अभी पीएचडी करना चाह रही थी, उसे आगे कई प्रतियोगी परीक्षाएं भी देनी थीं. पारंपरिक परिवार में बड़ा भाई होने के नाते विवाहयोग्य बहन का ब्याह किए बिना खुद की शादी करने की सोचना मुश्किल था. बेटे को विजातीय लड़की से प्रेम है और स्वयं आगे बढ़ कर खुद की शादी की बात कर रहा है, जबकि छोटी बहन विवाहयोग्य है. परिवार की मर्यादा को मैं ने ठेस पहुंचाई तो मातापिता दोनों ने ही मु झ से बोलचाल बंद कर दी.

उधर स्नातक का तीसरा वर्ष शुरू होते ही तुम्हारे घरवाले तुम्हारे लिए योग्य वर की तलाश में लग गए. शायद उन्हें तुम्हारे प्रेम में होने की भनक लग गई थी. खबर सुनाई तुम ने तो मैं बेचैन हो गया था. मगर एक ब्राह्मण कन्या को चाहने मात्र से अपनी पत्नी कैसे बना लूं, जबकि समाज ने जाति के कट्टर कानूनों के कांटे बिछा रखे थे मेरी राह पर. तुम्हारे फाइनल रिजल्ट के बाद तुम्हारे साथ तुम्हारे घर लखनऊ गया था, मनाली. नौकरी में ऊंचा पद, महीने की मोटी तनख्वाह, रहने को उम्दा फ्लैट पूरी जानकारी के बाद तुम्हारे घरवालों के जातिकार्ड कुछ हद तक अपना असर खोने लगे. तुम्हारी मां को मेरी स्मार्ट पर्सनैलिटी भी खूब जंच गई थी. बाद में, एक लंबी बातचीत की प्रणाली से हम एक हो गए.

22 साल की लड़की को जब मैं घर लाया तब मैं 28 का था. तुम पलपल जिद ठानतीं, शौक पालतीं, रोतींठुमकतीं, अपनी मरजी से जीना चाहतीं, मैं तुम्हारे नखरों को अपने प्यार से खूब सिर चढ़ाता. इन सब के बीच बैंक की ओर से अच्छी कालोनी में दिए गए फ्लैट को मैं एक सुकूनभरे घर की शक्ल देने में जुटा रहा.

तुम अपने परिवार की इकलौती बेटी, नाजनखरे में पलीं, मैं अपने घर

का बड़ा, घर के प्रति जिम्मेदारी मु झ में ग्लानि की भावना भरती लेकिन तुम्हें पाने का सुख मु झे सबकुछ भूल कर रहने को बाध्य करता.

बहन की शादी पक्की हुई तो खबर मिलते ही मु झे जाना पड़ा. तुम से शादी में आने को कितना मनुहार किया था मैं ने. तुम मेरे घरवालों से कुछ चिढ़ी सी थीं, न आईं. सोचा था, शादी के खुशगवार माहौल में तुम्हें उन के बीच ले जा कर रख दूंगा तो तुम्हारी प्यारी सूरत और भोली व नटखट अदा पर मां वारी जाएंगी लेकिन तुम ने यह होने न दिया. बहन की शादी की रस्म निभाते हुए तुम्हें ले कर पहली बार मन में एक कचोट सी हुई.

इतने प्यार और सम्मान के बाद भी तुम ने मेरी गुजारिश न मानी.

रात के 10 बज रहे थे, ब्याह का अनुष्ठान चल ही रहा था कि गाइनीकोलौजिस्ट डा. अनुजा का इंदौर से फोन आ गया.

तुम वहां एबौर्शन के लिए गई थीं. डाक्टर ने पति की रजामंदी चाही तो तुम ने कहा कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं?

इतना बड़ा  झूठ तुम ने उस दिन क्यों बोला था, मनाली? मैं तो जानता भी नहीं था कि तुम मेरे प्यार की निशानी अपने गर्भ में पाल रही हो. वह तो भला हो डा. अनुजा का जिन्होंने तुम से फौर्म भरवा कर उस में मेरा नंबर भी लिखवा लिया था और दूसरे दिन तुम्हें आने को कह कर मु झे नंबर मिला लिया था. प्रेम से सींची नई कोंपल को तुम मसल देना चाह रही थीं, आखिर क्यों?

मैं बहन के विदा होते ही तुरंत इंदौर के लिए निकल पड़ा. सभी से इतना ही कहा कि तुम्हारी तबीयत खराब हो गई है.

उस दिन भी डाक्टर ने तुम्हें किसी बहाने से लौटा दिया था, ताकि मैं आ कर भलाबुरा सम झ लूं.

डाक्टर से जानकारी मिली कि तुम अच्छेभले बच्चे की मां बनने वाली हो. 5वें महीने का गर्भ अब शुरू होने ही वाला है. मैं तो खुशी से चौगुना हो गया था लेकिन पल में तुम्हारी बात सोच मैं फूटे गुब्बारे की तरह मायूस भी हो गया.

बिना किसी ठोस कारण के जो मां बच्चे की पहली हलचल को मसल देना चाहती है, क्या उसे बच्चे से कभी प्रेम हो पाएगा?

मैं परेशान था बहुत लेकिन मैं ने धीरज नहीं खोया. तुम्हें रात को पुचकारते हुए पूछा कि तुम ने ऐसा कदम क्यों उठाया तो तुम  झल्ला उठीं.

‘मैं अभी बच्चे का नखरा नहीं उठा सकती. बच्चे पालना मेरे वश की

बात नहीं.’

‘मैं पाल दूंगा, उसे मारने का सोच भी कैसे लिया?’

‘बच्चा मेरे पेट में है, मेरा हक है.’

‘मनाली, मैं तुम्हें न कानून बताना चाहता हूं, न सामाजिक न्याय और रीतिनीति की बातें. इतना तो कहना बनता ही है कि मेरे प्यार की निशानी का तुम्हारी जिंदगी में कोई मोल न ठहरा. यह बच्चा हमारे रिश्ते को कितना मजबूत करेगा, यह तुम सम झ नहीं पाईं?’

‘ये हम दोनों के रिश्ते के बीच मुसीबत बन कर आ रहा है.’

‘क्या कहती हो तुम?’ मैं चीख उठा था. अपने बच्चे के बारे में ऐसी मनहूस बातें मैं दोबारा सुनना नहीं चाहता. तुम मां हो या?’

मेरी अनकही बातों का मर्म सम झ तुम मु झ से दूर हट गईं. फिर कहा, ‘देखा, इसी की वजह से इतना कलह है. मैं स्तब्ध था. यह कैसी लड़की से पाला पड़ा है मु झे.’

मैंने सम झाने की नाकाम कोशिश की.

‘मनाली, 23 की हो तुम. बच्चा स्वस्थ है और तुम भी. मैं भी इस स्थिति में हूं कि बच्चे को अच्छी परवरिश दे पाऊं. तो फिर, क्यों न लाएं इस बच्चे को?’

‘अभीअभी तो हमारी शादी हुई है.

3 साल कितनी तड़पी हूं तुम्हें पाने के लिए. अभी तो मेरे सारे सपने, सारे शौक अधूरे हैं. बच्चा आ गया तो मैं जिम्मेदारी से बंध जाऊंगी. तुम मु झ पर अपना कानून थोपोगे. यह नहीं खाना, यहां नहीं जाना आदि. नहीं, मैं अभी बच्चा नहीं चाहती.’’

बड़ा बेबस सा मैं तुम्हारे हर नखरे उठाने की गारंटी देते हुए आखिर एक शर्त पर राजी कर ही लिया तुम्हें कि बच्चे पालने की जिम्मेदारी मैं उठा लूंगा.

अब तो हर पल हर सपना मेरा तुम्हारे पेट के इर्दगिर्द ही इकट्ठा हो गया था पर तुम तो जैसे एक मशीन बन गई थीं बच्चे के लिए. कई बार तुम्हारी बेतुकी बातें मु झे हैरान कर देतीं. याद है, तुम्हें मेला घुमाने ले गया था. वहां  झूले देख कर तुम मचल उठीं. मैं ने मना किया तो बच्चे को कोसने लगीं. बाहरी खानों पर कुछ पाबंदी लगाई मैं ने तो बच्चे का दोष. प्रतिपल तुम्हें जब भी एहतियात के लिए कहता, तुम बच्चे को कोसने लगतीं. मैं अंदर तक आहत था. बच्चे के आने की सोच मैं घबरा जाता.

मेरी नन्ही परी किशा आ चुकी थी. साल कुछ बीत चुके थे. अब वह स्कूल जाने लगी थी. डाइपर से स्कूल ड्रैस तक का सफर निभाते हुए मैं पूरी तरह ‘मां’ बन चुका था.

बच्ची के साथ जितना वक्त मु झे देना पड़ता उतना वक्त तुम मु झ से कटीकटी रहतीं.

टीनऐज की बच्ची को मां की जरूरत थी, मनाली. मेरे अनुरोध पर तुम उसे कुछ मदद तो कर देतीं लेकिन मां के रूप में तुम ने उसे सिर्फ खी झ, ईर्ष्या और अवसाद ही दिए. किशा भी अब तक सम झ चुकी थी कि तुम प्रतिद्वंद्वी बन कर हरपल उस के अस्तित्व को चुनौती दे रही थीं. सच कहूं तो अगर मैं अपने विशुद्ध स्नेह से उसे न सींचता, वह मानसिक रूप से बीमार हो जाती.

करवट ले कर सोने की कोशिश में छटपटाता सा मैं बिस्तर पर उठ बैठा. सोचा, पानी पी आऊं. 2 साल से तुम ने अपना कमरा भी मु झ से अलग कर लिया था. बेटी के प्रति मेरा जुड़ाव तुम्हें इतना नागवार गुजरा कि किशा के आने के बाद से ही तुम ने मु झ से कोफ्तभरे रिश्ते बना लिए.

रात के 12 बज रहे थे. बेटी के कमरे में  झांका तो वह लैपटौप पर कुछ कर रही थी. मैं गया तो उस ने मु झे पास बुला लिया.

‘‘बेटा, सोईं नहीं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कैसे सोऊं, पापा. जब तक आप दोनों को फिर से एक न कर दूं?’’

‘‘यह अब क्या संभव होगा?’’

‘‘सब संभव कर दूंगी. यह देखिए, पापा.’’

‘‘यह तो वीडियो है, मनाली मंच पर गाना गा रही है. यह उस के पास वही आदमी है जिस के साथ मनाली आजकल खूब घूमफिर रही है.’’

‘‘हां, अर्णव आचार्य. संगीत नृत्य अकादमी का हैड.’’

‘‘कितनी बेशर्मी से मनाली के साथ डांस कर रहा है.’’

‘‘पापा, शांत हो जाइए, सब सही होने की दिशा में है. मेरे साथ पढ़ती है अरुणा. उसे गाने में दिलचस्पी थी. मैं ने सु झाया था कि वह इस आचार्य की अकादमी जौइन कर ले, उन के काफी प्रोग्राम होते हैं, उसे लाइमलाइट मिलेगा.

‘‘उस ने वहां जौइन किया तो मैं ने मां के साथ उसे फेसबुक फ्रैंड होने की सलाह दी. उस ने मानी मेरी बात और उसी ने सारे वीडियोऔडियो मु झे भेजे हैं. मम्मा हम दोनों को तो अपने साथ रखेंगी नहीं. उन का भला तो हमें ही देखना है न, पापा.’’

‘‘कुछ सीखे, करे वह, यह तो मैं हमेशा ही चाहता रहा लेकिन उस ने अर्थ का अनर्थ कर दिया.’’

‘‘आप को सम झती हूं, पापा. मगर मम्मा कुछ सीखनेकरने को बाहर नहीं जाती, वह बाहर हमें सबक सिखाने, खुद की ईर्ष्या की आग का इलाज ढूंढ़ने जाती है, वह हमें जला कर खुद शांति पाना चाहती है. और अब, मां के दिमागी फितूर को भांप कर मौके का फायदा उठाना चाह रहा है अर्णव आचार्य.

‘‘बदले की आग में जलते हुए उस ने बाहर खुशियां ढूंढ़नी चाहीं, उस ने आचार्य को सच्चा हमदर्द मान आप के प्रति अपनी भावनाओं को उस से कहती रही तो आचार्य ने उसे मूर्ख जान मोहरा बना लिया. वह कहते हैं न, पापा, सावन के अंधे को हर ओर हरा ही दिखाई देता है. एक आप को छोड़ कर सारी दुनिया मां को हरी लगने लगी थी. पर पापा, अब मम्मा के साथ कुछ भी सही नहीं है.

‘‘फेसबुक में भी वह कई बार धोखा शब्द का जिक्र कर चुकी है. खैर, कुछ तहकीकात बाकी है, आप को जल्द ही अच्छी खबर सुनाऊंगी.’’

‘‘सो जा बेटा, मु झे सब्जबाग मत दिखा.’’

‘‘आप सो जाओ, पापा. मैं सोचती

हूं कुछ.’’

मैं सोने तो चला गया लेकिन क्या सचमुच सो पाया. तुम प्रोग्राम के नाम पर आएदिन इस आचार्य के साथ बाहर चली जाती हो, अलग से घूमतीफिरती हो, क्या कभी सम झ नहीं पातीं, मनाली, कि एक 36 साल का शादीशुदा आदमी 43 साल की महिला को इतनी तवज्जुह क्यों दे रहा है. मानता हूं, तुम अब भी रम्या हो, काम्या हो, सुगठित और आर्कषक हो, लेकिन टेलैंट और सौंदर्य की कमी उस अकादमी में है भी तो नहीं.

सुबह पता चला किशा ने कालेज से

छुट्टी ली है. शायद अब वह इस समस्या को सुल झाने को प्रतिबद्ध है. किशा तुम से बात करने गई है. मेरी सारी इंद्रियां तुम्हारे कमरे में जा कर एकत्रित हो गई हैं. मैं तुम दोनों की बातों पर अपना ध्यान केंद्रित करता हूं.

‘‘मम्मा, तुम मु झे बेशक अपना न सम झो लेकिन मैं तुम्हारी बेटी हूं, इस सच को आप  झुठला नहीं सकतीं. इसी सच के नाते मैं सम झ सकती हूं कि आप तकलीफ में हो.’’

‘‘कोई तकलीफ नहीं, तुम जाओ.’’

‘‘मम्मा, कल आप अपना सोने का हार बेच आईं.’’

मु झ से रहा नहीं गया, मनाली. मैं तुम्हारे कमरे के सामने आ खड़ा हुआ, दरवाजे की ओट से तुम्हारा सफेद पड़ा चेहरा आसानी से देखता रहा. तुम अब भी मानने को तैयार न थीं.

‘‘कौन सा हार? बकवास मत करो.’’

‘‘मम्मा, आप ने हार बेचा और

30 हजार रुपए अर्णव को दिए.’’

‘‘एक थप्पड़ लगाऊंगी,’’ मनाली चीख पड़ी.

‘‘औडियो सुनो मम्मा, किसी ने रिकौर्ड कर के भेजा है मु झे.

‘‘अर्णव के कंधे पर सिर रख कर आप ने हमारे प्यार के नीड़ को तोड़ने की भरपूर कोशिश की, सम झ ही नहीं पाईं कि आप को इतनी ऐयाशी करवा रहा है, होटलों में रख कर आप के पीछे इतना खर्च कर रहा है, आप को मंच दे रहा है तो सबकुछ निस्वार्थ? और आप ने अपनी कोख की बेटी से भी निस्वार्थ प्रेम नहीं किया? औडियो में आप दोनों की बात साफ है, सुनो.’’

मनाली, मेरे कानों में गरम लोहे पिघल रहे थे. आचार्य साफ कह रहा था-

‘मु झे खुश करो, शरीर से, दिल से, पैसे से वरना भुगतने को तैयार रहो.’

वह तुम से अभी 3 लाख रुपए की मांग कर रहा था. तुम्हारे गिड़गिड़ाने की आवाजें मेरे दिल पर सौसौ हथौड़े चला रही थीं.

‘‘अब भी कुछ बाकी है क्या, मम्मा?’’ किशा की तेज गंभीर आवाज सुनाई पड़ी.

ममता के अनुशासन तले तुम्हारा कद कितना छोटा हो गया था, मनाली. तुम सिर  झुका कर उदास बैठी थीं. जैसे तुम वापस आना चाहती थीं लेकिन मैं तैयार नहीं था, मनाली.

‘‘अब आज से घर से निकलना बंद है, मम्मा आप का.’’

‘‘अर्णव मानेगा नहीं.’’

‘‘उसे मनाना मु झे अच्छी तरह आता है. आप, बस, घर में रहो, मम्मा. वरना, मु झे सख्ती करनी पड़ेगी.’’

किशा आज हमारे घर की बागडोर संभाल वाकई शक्तिस्वरूपा बन गई थी. औफिस तो चला गया था मैं, शाम को किशा को फोन किया तो सारे पासे पलट चुके थे.

किशा अपने 5 लड़के दोस्तों और

3 सहेलियों के साथ आचार्य के अकादमी पहुंची थी. वह भी तब जब सुबह वह वहां अकेला था. सभी ने मिल कर आचार्य के खिलाफ इकट्ठे सूबूतों को उसे दिखा कर धमकाया कि मनालीजी को दोबारा कौन्टैक्ट करने की कोशिश की तो हड्डीपसली तो तोड़ कर रखी ही जाएगी, सारी बातें पुलिस की क्राइम ब्रांच को पहुंचेंगी. पूरा अकादमी को चौपट कर

दिया जाएगा.’’

डराने वाले डरते भी कम नहीं. तीनपांच लाख रुपए के लिए कोई अपनी इज्जत और व्यापार दांव पर नहीं लगाता.

आचार्य की पूंछ सिकुड़ चुकी थी.

मैं बेहद खुश सा घर आ रहा था कि किशा का फिर फोन आ गया और उस ने बाहर कौफी शौप में तुरंत मु झ से मिलने की बात कही.

कुछ देर बाद हम कौफी शौप में बैठे बातें कर रहे थे. बल्कि किशा ही बात कर रही थी. उस ने कहा, ‘‘मेरी मम्मा ऐसी ही हैं, बेहद अपरिपक्व, वे आप से इतना प्यार करती हैं कि अपनी बेटी से भी आप को सा झा नहीं कर पातीं. गुस्सा न हो कर उसे सम झने की कोशिश करो, पापा. उन के बचपने से ही तो आप ने प्यार किया था, अब बदलाव की अपेक्षा क्यों? न बदलें, रहेंगी तो मेरी मम्मा और आप का प्यार ही न? वादा करो, आज से ठीक वैसा ही वक्त बिताओगे मम्मा के साथ जैसा मेरे जन्म से पहले बिताया करते थे. मैं अब बड़ी हो गई हूं, पापा. अब मु झे भी अपनी जिंदगी खुद सम झने दो. आप मम्मा पर ध्यान दो.’’

मनाली, मैं अभिभूत था. ये हमारी वही बच्ची थी जिसे ममता का आंचल न मिला था.

घर आया तो देखा तुम अपने बिस्तर पर उदास सोई पड़ी थीं. हम दोनों बापबेटी जा कर तुम्हारे अगलबगल सो गए. तुम अंचभित थीं. रो पड़ीं तुम. फिर कहा, ‘‘मु झे माफ कर दो तुम दोनों.’’

किशा ने मेरी ओर देखा, उस की आंखों में मेरे लिए जैसे आदेश था. मैं ने मनाली के गले में अपनी बांहें डाल कर कहा, ‘‘ये लो डाली बेडि़यां, अब कभी हिलना भी मत.’’

आंखों में पुरानी चमक लिए तुम ने मेरी ओर देखा. मैं ने तुम्हारे ललाट पर अपने होंठों की निशानी रखी. किशा ने भी तुरंत वही किया, जो मैं ने किया. फिर वह खिलखिला पड़ी. तुम भावविभोर हो किशा से लिपट गईं. कितने सब्र के बाद आज मु झे यह दृश्य दिखा था.

सांझ ढलने को थी. अंधियारा फैलने से पहले बिटिया ने बाती बन कर हमारा जग रोशन कर दिया था. Hindi Story.

Hindi Satire: व्यंग्य- सड़क तो हमारे बाप की भी है

Hindi Satire:

लेखक: गोविंद सेन

भई, आजकल तो लोग कार को ऐसे पार्क करते हैं जैसे मुगलों ने सड़कें उन की खातिर बनवाई हों. कोई गली, कोई नुक्कड़, कोई मोड़… सब ‘पार्किंग जोन’ घोषित हो चुके हैं. अगर किसी ने टोका तो  जवाब साफ- ‘सड़क क्या तेरे बाप की है?’

हम, हमारी, हमारे आदि शब्द बहुत शक्तिवर्धक होते हैं. इन से अनेक समस्याओं का निदान चुटकी बजाते ही हो जाता है. सुल्टे सिंह कार लाए तो उल्टे सिंह को अपनी शान खतरे में जान पड़ी. उन्होंने आव देखा न ताव, किस्त से कार उठा लाए और उसे हाथी की तरह अपने घर के सामने खड़ी कर दी.

उल्टे सिंह ने शान से पंडित जी से उस की विधि-विधान से पूजा करवाई. उस ने सोचा कि आजकल तो हवाई जहाज से ले कर चंद्रयान तक की पूजा करवाई जाती है. हम कार की पूजा क्यों न करवाएं. कोई यह न सम झे कि हम धर्मप्रेमी नहीं हैं. पूजा की प्रक्रिया में बेदाग श्वेतवर्णी कार पर सिंदूर से बेडौल सतिया भी बनवा लिया. प्रसाद में पाव-भर मिठाई का प्रसाद बांट कर पड़ोसियों को निपटा दिया.

सोशल मीडिया पर भी उन्होंने ‘कारदिखाई’की रस्म अदा कर दी थी. लोग सम झ लें कि हम भी कार वाले हो गए हैं. सुल्टे सिंह को मिठाई का एक टुकड़ा दे कर इस भाव से देखा कि हम भी अब कार वाले हो गए हैं, बे-कार नहीं रहे. उन्होंने सुल्टे सिंह से कहा-‘कार तो हम 4 महीने पहले ही ले आते लेकिन सोचा कि लाएंगे तो फिर अच्छी कार ही लाएंगे. थोड़ा अधिक पैसा तो जरूर लगा लेकिन कार अच्छी आ गई.’ उन के सामने वे अपनी महंगी कार का बखान करना न भूले.

उन्होंने सुल्टे सिंह की कार पर उड़ती हुई नजर डाली जैसे कह रहे हों कि यह क्या पुराने मॉडल की कार उठा लाए. बकरी के नाम पर कुत्ते का बच्चा. बेच क्यों नहीं देते. हमारी तरह नए मॉडल की कार क्यों नहीं लाते. सुल्टे सिंह उल्टे सिंह के भावों को भांप गया. सुल्टे सिंह ने उल्टे सिंह को खा जाने वाली नजरों से देखा जैसे वे उन्हें मिठाई नहीं, जहर देने आए हों. मन में आया कि इस मिठाईरूपी प्रसाद को इन्हीं के सामने कुत्ते को खिला दें पर सुल्टे सिंह धर्मप्रेमी थे, प्रसाद का अपमान न कर सके.

कार को सुल्टे सिंह ने घर के सामने सड़क पर ऐसे पार्क की जैसे सड़क उन के बाप की ही हो. सड़क कालोनी के नक्शे में 20 फुट थी लेकिन हकीकत में वह कहीं 9 तो कहीं 8 तो कहीं 5 फुट की ही रह जाती थी. सब ने 5 से 8 फुट तक सड़क को अपने बाप की सम झ कर उस पर अपना स्थायी कब्जा कर लिया था. किसी ने फर्सियां रख दी थीं. किसी ने सीमेंट से पक्का कर लिया था. किसी ने बाउंड्री वॉल बना ली थी. किसी ने लोहे का 6 फुट लंबा एंगल का स्टैंड रख दिया था.

एक ने बाहर चबूतरा बना कर सिंदूरी रंग में पुते कोई देव स्थापित कर त्रिशूल गाड़ दिया था. वहां गाहे-बगाहे अगरबत्ती खोंसते रहते थे. हाथ जोड़ और आँखें मींच कर खड़े रहते थे. उन के घर के भीतर भी एक पूजा घर था. कालोनी में 3 पूजाघर थे लेकिन उन के मन में इतना भक्ति भाव भरा था कि वे अपने चारों ओर पूजाघर चाहते थे.

अस्थायी कब्जे की तो कोई सीमा ही नहीं थी. अपने दोपहिया वाहन वहीं सड़क पर टिका कर भूल जाना आम बात हो गई थी. किसी को कोई असुविधा हो तो हो, सड़क हमारे बाप की है. बेचारे भूखे सूअर, गाएं और आवारा कुत्ते वाहनों के बीच में मुश्किल से अपना रास्ता बना पाते थे. वे मूक प्राणी मनुष्यों के साथ जैसे-तैसे एडजस्ट कर रहे थे. वे उन्हें क्या कहते. वे मनुष्यों के लालच को  झेलने को अभिशप्त थे.

उल्टे सिंह को अपनी कार को थोड़ा दूर रखना पड़ रहा था. अपने चार मंजिला मकान में उन्होंने पार्किंग बनाने की मूर्खता नहीं की. उन्होंने नीचे से ऊपर तक मकान को किराएदारों से भर दिया था. हर महीने हर कमरा पैसा बरसा रहा था. कार पार्किंग बनाते तो वह 2 कमरों की जगह खा जाती. कार रखने के लिए सड़क हैं न. उल्टे सिंह अच्छी तरह से जानता था कि सड़क सब की नहीं, उस के अपने बाप की ही है.

एक दोपहर एक कुत्ता आकस्मिक रूप से आया और टांग ऊंची कर के बेदाग कार पर मूत्र विसर्जन कर उसे पवित्र कर गया. जब तक उल्टे सिंह कुत्ते को इस पवित्र कर्म से रोकते, वह अपना काम कर चुका था. उल्टे सिंह की मेहनत जल कर राख हो गई.

उन के हाथ में यदि बंदूक होती तो वे कुत्ते को तुरंत गोली मार देते. कुत्ता शान से यह सोचते हुए निकल गया कि सड़क सिर्फ सुल्टे सिंह-उल्टे सिंह की ही नहीं, हमारे बाप की भी है. हमारे बाप की सड़क पर कार रखोगे तो हम यही करेंगे, जनाब. Hindi Satire.

Hindi Family Story: विलास बहू- अमेरिका से लौट कर विलास मोहिनी का…

Hindi Family Story:

सरिता, बीस साल पहले, नवंबर (प्रथम) 2005

अमेरिका से लौट कर विलास मोहिनी का बदला रूप देख कर चकित रह गया और जब उस पर अपना अधिकार जताना चाहा तो मोहिनी ने पतिपत्नी की जो परिभाषा उसे बतलाई उस से वह घर में ही मात्र एक अतिथि बन कर रह गया.

जमींदार घराने का इकलौता चांद था विलास. सोने पर सुहागा यह कि आईआईटी से इंजीनियरिंग करने के बाद उस ने आईआईएम हैदराबाद से एमबीए की परीक्षा गोल्ड मैडल ले कर पास की थी. मल्टीनैशनल कंपनियों से ले कर बड़बड़े धनकुबेर और नौकरशाह उस के लिए पलकें बिछाए बैठे थे. कई सुंदरसलोनी युवतियों के मातापिता या अभिभावकों में विलास की मुंहमांगी कीमत अदा करने की होड़ सी लगी हुई थी.

ललिता को पसंद आई अपने बचपन की सहेली रुक्मणि की इंटर पास बेटी मोहनी. संचार माध्यमों के विशेषज्ञ विलास के मन में जीवनसंगिनी के रूप में किसी हाईटैक बाला की मूर्ति स्थापित थी. विलास ने दबे स्वर में मां से अपनी इच्छा जाहिर भी की थी.

‘‘बेटा, मुझे जिंदगी में कभी कोई सुख नहीं मिला. तेरे पिता तुझे दुनिया में अकेला छोड़ गए थे. अपनी नौकरी के चक्कर में तू भी मेरे साथ गांव में नहीं रह सकता. कम से कम मुझे कुछ दिनों तक बहू का सुख तो भोग लेने दे. अगर तू अपनी तरह हाईटैक लड़की ले आया तो वह एक दिन भी मेरे साथ गांव में नहीं टिकेगी,’’ ललिता के तर्क ने विलास के सारे तर्कों को पराजित कर दिया था.

शादी के 2 साल बाद ही विधवा हुई मां ने विलास को पालने के लिए अपनी सारी इच्छाओं की बलि दे दी थी. अब उन की अकेली इच्छा ढेर सारे पोतेपोतियों को खिलाने की थी. विलास जानता था कि उस की सोच वाली बीवी मां की इच्छा पूरी नहीं कर सकती, इसलिए उस ने हथियार डाल दिए थे.

मिलन रात्रि की बेला पर विलास ने नख से शिख तक स्वर्णाभूषणों से सजी मोहिनी के सुंदरसलोने चेहरे को देखा तो अपलक देखता ही रह गया. उस को इस तरह टकटकी लगा कर घूरते हुए देख कर मोहिनी की पलकें लाज से झकी जा रही थीं. घबराहट में पैर के अंगूठे से फर्श को कुरेदने का असफल प्रयास करती हुई वह लाजवंती, मां, की पहली सीख ही भूल गई कि पति का प्रथम स्पर्श उस के चरणों को छू कर करना है, उसे याद ही न रहा.

विलास को भी कहां कुछ पता था. हां, अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए किसी अनाड़ी की भांति वह मोहिनी के शरीर से भारीभरकम आभूषणों का बोझ कम करने लगा लेकिन 4 तोले के रत्नजडि़त मांगटीके को केशों से अलग करने में ही उस की सारी प्रबंधन योग्यता असफल सिद्ध हो गईर्. टीके के साथ कई केश भी उखड़ कर हाथ में आ गए तो कंचनकाया की सिसकारी पर वह झेंप कर रह गया.

रूपगर्विता की नथ के साथ काफी माथापच्ची करने के बाद भी जब उसे खोलने की तरकीब समझ में न आई तो उस के कंठ में पड़े 20-20 तोले के चंद्रहार और रत्नहार को उतार कर उस ने राहत की सांस ली. बावजूद उस के आसानी से खुलने की सफलता के बाद वह मोहिनी के हाथों की उंगलियों में फंसी हथफूलों की लडि़यों से उलझ कर रह गया. एकएक लड़ी को सुलझना उसे गणित के जटिल प्रश्नों को सुलझने से भी कठिन लग रहा था.

संगिनी के स्पर्श की ऊष्मा विलास के तनमन को बेचैन करती जा रही थी. एक झटके के साथ कमरे में पड़ी 50 तोले की करधनी को उछाल कर फेंकने के बाद उस ने जब मोहिनी के चेहरे की ओर देखा तो कसमसा कर रह गया. भारीभरकम नथ और कानों में झल रहे बड़बड़े कर्णफूल अभी भी मुंह चिढ़ा रहे थे.

‘‘उफ, यह क्या बेवकूफी है. तुम से किस ने इतने सारे जेवर पहनने के लिए कहा था,’’ न चाहते हुए भी वह झल्ला उठा.

पहली ही रात में पति के इस तेवर को देख कर घबराहट में मोहिनी के चेहरे की लाली कुछ और बढ़ गई और माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आईं. विलास को भी अपनी गलती का एहसास हो गया था. सो, पसीने की उन बूंदों को पोंछते हुए उस ने एक भरपूर चुंबन पत्नी के चेहरे पर जड़ दिया. उस की अनुगूंज मोहिनी के तनमन में गूंज गई और 2 अलगथलग पथिकों को एक होते देर न लगी.

तृप्ति के सागर में गोते लगाने के बाद विलास गहरी निद्रा की आगोश में चला गया. सुबह चूडि़यों की खनखनाहट सुन उस की नींद खुली. जमींदार घराने की बहू पूर्ण शृंगार किए सामने खड़ी थी. उस के तन पर रात से भी अधिक आभूषण चमक रहे थे.

‘‘नीचे चलिए, मांजी काफी देर से नाश्ते के लिए आप की प्रतीक्षा कर रही हैं,’’ लाज से बोझिल अपनी पलकों को ऊपर उठाते हुए मोहिनी ने कहा.

‘‘तुम ने फिर इतने सारे जेवर क्यों पहन लिए?’’ बिना किसी भूमिका के विलास ने सीधा प्रश्न किया.

‘‘मांजी ने पहनाए हैं,’’ आनंद के अतिरेक में डूबी मोहिनी ने बताया.

‘‘मुझे उलझन होती है, उतारो इन्हें,’’ विलास झल्ला उठा.

‘‘ये मांजी का आशीर्वाद और मेरे सुहाग की निशानी है,’’ नववधू सहम उठी.

‘‘तुम्हें जीवन सुहाग की निशानी के साथ नहीं, सुहाग के साथ गुजारना है और तुम्हारे सुहाग को यह सब तामझम पसंद नहीं है, अच्छी तरह समझ लो,’’ विलास ने तेज स्वर में कहा और तौलिया उठा कर नहाने चला गया.

विलास के मन में जीवनसाथी के रूप में जींसटौप पहनने वाली आधुनिका की छवि कैद थी. भारीभरकम साड़ी और आभूषणों से एक दिन में ही उस का मन घबरा उठा था. उधर मोहिनी उस माहौल से आई थी जहां सोने के गहने ही नारी की प्रतिष्ठा के प्रतीक माने जाते हैं. अपनी हैसियत से वंचित होना दुख का स्वाभाविक कारण है. मोहिनी भला अपवाद कैसे हो सकती थी. सिसकारियां भरते हुए वह पति की आज्ञा का पालन करने लगी.

उस की सिसकारियों की गूंज ललिता के कानों तक पहुंच गई थी. मन में अनेक आशंकाएं लिए जब वह विलास के कमरे में पहुंची तब मोहिनी अपने शरीर का अंतिम आभूषण उतार रही थी.

‘‘बहू, यह क्या अपशकुन कर रही हो. सुहागन हो कर शृंगारहीन?’’ ललिता का स्वर कांप उठा.

‘‘मांजी, यह इन की आज्ञा है,’’ मोहिनी फफक उठी.

असलियत जान ललिता ने विलास को खूब फटकारा और अपने हाथों से एकएक आभूषण पहना कर बहू को किसी राजकुमारी की भांति सजा दिया. विलास की एक न सुनी. मोहिनी उच्चशिक्षित विलास के मानसिक स्तर की न थी, फिर भी उस ने यह सोच कर समझता कर लिया था कि वह उसे अपने अनुकूल ढाल लेगा लेकिन मोहिनी उस के बजाय मांजी के अनुकूल ढलती जा रही थी.

विलास का मन करता कि पत्नी को ले कर कहीं घूमने जाए किंतु उसे घर में रह कर मांजी की सेवा करने में ज्यादा आनंद आता था. वह चाहता था कि मोहिनी उस के साथ संगीत की तेज धुनों पर नाचेगाए लेकिन उसे घर के मंदिर में भजन गाने में ज्यादा आनंद आता था. विलास की इच्छा मोहिनी को आधुनिका बनाने की थी लेकिन उसे कर्तव्यों और परंपराओं का पालन करने में असीम शांति मिलती थी.

मनपसंद बहू पा कर ललिता धन्य हो उठी थीं तो विलास का मन उचटने लगा था. वह छुट्टियां खत्म होने से पहले ही दिल्ली लौट गया. मां को बताया कि कंपनी उसे कुछ दिनों के लिए अमेरिका भेज रही है, इसलिए ट्रेनिंग करना जरूरी है. भोलीभाली मोहिनी पति के मन की बात भांप न सकी थी.

दिन, सप्ताह कर के 3 महीने बीत गए. ललिता रोज पूछतीं, ‘‘विलास बहू, क्या कोई चिट्ठी आई?’’

विलास बहू इनकार में सिर हिला देती और कहती, ‘‘मांजी, बहुत काम होगा. चिट्ठी लिखने का समय न निकाल पाते होंगे.’’

एक दिन चिट्ठी भी आ गई, लिखा था कि अमेरिका की एक कंपनी में नौकरी मिल गई है. अगले सप्ताह वहां जा रहा हूं. अंत में विलास ने मां से सफलता का आशीर्वाद मांगा था.

सन्न रह गईं ललिता. 4-6 महीने के लिए अमेरिका जाने की बात और थी लेकिन वहां नौकरी करने का मतलब था कि बेटा अब वापस नहीं आएगा.

‘‘विलास बहू, तैयारी कर. कल ही दिल्ली चलना है,’’ ललिता ने फैसला सुनाया.

‘‘किसलिए?’’

‘‘विलास को रोकने. वह मुझ से और तुझ से मिले बिना भला कैसे जा सकता है. उसे रोकना होगा,’’ ललिता ने इस उम्मीद से कहा मानो विलास बहू के मन की बात कह रही हों.

‘‘वे आप के बेटे हैं. आप को उन के पास जाने का हक है,’’ विलास बहू ने धीमे स्वर में कहा.

‘‘और तेरा हक?’’

‘‘मेरा हक यह है कि वे मुझे लेने आएं, तभी जाऊंगी,’’ स्वाभिमानिनी ने फैसला सुनाया.

सास ने बहुत ऊंचनीच समझई पर विलास बहू न मानी तो न मानी. एक ही रट थी कि अपना हक भीख में नहीं लेगी. जिस की जिम्मेदारी है वह निभाए तो ठीक, न निभाए तो जिस देहरी पर डोली आई है वहीं जिंदगी काट देगी.

बहू की बातों ने मां का स्वाभिमान भी जगा दिया था. न विलास ने बुलाया और न ही वह मिलने गई. उस ने आशीर्वाद मांगा था, सो, पत्र लिख कर आशीर्वाद भेज दिया.

विलास चला गया लेकिन विलास बहू ने घर की जिम्मेदारी बखूबी संभाल ली थी. भंडारगृह से ले कर अनाजगोदाम तक का पूरा हिसाब सौंप कर ललिता निश्चिंत हो गई थीं. क्या बनना है, क्या खाना है से ले कर खेतों में क्या बोना है और कब फसल बेचनी है, सारी बातें नौकर और मुनीम अब उसी से पूछने लगे थे. विलास बहू की योग्यता से हुलस कर अकसर ललिता कहतीं कि तू बहू नहीं, बेटा है मेरा.

तर्कों को व्यावहारिकता की कसौटी पर कसती हुई एक दिन मोहिनी बोली, ‘‘जानती हैं मांजी, वे हमें छोड़ कर क्यों चले गए?’’

‘‘समय खराब था उस का,’’ ललिता ठंडी सांस भर कर बोलीं, ‘‘हीरे को पहचान न सका.’’

‘‘हीरा तो कोयला होता है, मांजी, अगर उसे तराशा न जाए तो न पहचानने का दोष भला दूसरे पर कैसे लगाया जा सकता है?’’ विलास बहू के चेहरे पर दर्द की रेखाएं उभर आईं.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बताइए, मांजी, क्या कमी है मेरे अंदर? रंग, रूप, गुण, आकर्षण… क्या कुछ नहीं है मेरे पास,’’ विलास बहू ने सास की आंखों में झंका. वहां असमंजस के भाव देख कर बोली, ‘‘बस, एक ही कमी थी मुझ में. समय के साथ न चल सकी. उन की जरूरत के मुताबिक खुद को न ढाल सकी लेकिन मैं चाहती हूं किसी और के साथ ऐसा न हो, इसलिए मैं…’’

कहतेकहते मोहिनी रुक गई. ललिता बहुत ध्यान से बहू की बात सुन रही थीं. उसे चुप होता देख बोलीं, ‘‘इसलिए क्या कहना चाहती हो तुम?’’

‘‘इस पूरे इलाके में लड़कियों के लिए एक भी डिगरी कालेज नहीं है. मांजी, हमारे पास किसी चीज की कमी भी नहीं है. अगर आप इजाजत दें तो पिताजी के नाम एक डिग्री कालेज यहां खोल दिया जाए,’’ विलास बहू ने मन की इच्छा बताई.

ललिता को सोच में डूबा देख मोहिनी बोली, ‘‘मांजी, क्या सोचने लगीं?’’

‘‘मैं स्कूल खोलने की अनुमति एक शर्त पर दे सकती हूं कि तुझे भी उस में पढ़ना होगा.’’

‘‘मैं भला कैसे पढ़ सकती हूं,’’ विलास बहू का स्वर कांप उठा.

‘‘बेटा, अभी तेरी उम्र ही क्या है. अगर मैं तुझे ब्याह कर न ले आती और रुक्मणि तुझे पढ़ाने के लिए शहर भेजने की हिम्मत जुटा पाती तो अभी तू पढ़ ही रही होती,’’ ललिता ने स्नेह से विलास बहू के सिर पर हाथ फेरा.

‘‘तब की बात और होती, मांजी, लेकिन अब शादी के बाद…’’

बहू की बात बीच में ही काट कर ललिता बोली थीं, ‘‘तुझे पढ़ना होगा बहू और विलास से ज्यादा पढ़ना होगा. यह साबित करना होगा कि तू किसी मामले में उस से कम नहीं है.’’

इतना कहतेकहते ललिता की आंखों से आंसू टपकने लगे. उन के मन में इस बात की फांस थी कि उन के ही कारण बेटा, बहू को छोड़ गया है. उसे पढ़ालिखा कर अब वे अपना प्रायश्चित्त करना चाहती थीं.

अगले ही दिन सासबहू शहर पहुंच गईं. विलास बहू ने शहर के सब से बड़े आर्किटैक्ट से बात की. ललिता ने पुरखों के खजाने का मुंह खोल दिया. देखतेदेखते ही कालेज का भवन बनने लगा. विलास बहू ने दिन देखा न रात, बस, एक ही धुन समाई थी कि इस साल कालेज शुरू कर देना है. वह अपने एक पुराने प्राध्यापक पांडेजी को बुला लाई. कालेज चलाने की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी गई.

सत्र शुरू होते ही विलास बहू ने भी बीएससी में दाखिला ले किया. वह एक छात्रा की तरह हर रोज कक्षाओं में जाती और खाली समय में कालेज का प्रबंधन संभालती. वह कालेज में कंप्यूटर की कक्षाएं भी शुरू करना चाहती थी पर ललिता काफी खर्चा कर चुकी थीं. कंप्यूटर खरीदने के लिए अब उन के पास पैसे न थे.

इस के अलावा गांव में बिजली और टैलीफोन भी न था लेकिन कहते हैं न जहां चाह वहां राह. विलास बहू ने अपनी 50 तोले की करधनी बेच दी. एक जनरेटर और 4 लैपटाप आ गए. दूसरी लड़कियों के साथ वह खुद भी कंप्यूटर सीखने में जुट गई. उस की लगन देख कर सभी दंग थे. प्रधानाचार्य पांडेजी तो कहते कि विलास बहू मोहिनी साधना कर रही है.

देखते ही देखते 5 साल कब बीत गए, पता ही न चला. प्रथम श्रेणी में एमएससी की परीक्षा उत्तीर्ण कर विलास बहू उर्फ मोहिनी राय चौधरी अब उसी कालेज में लैक्चरर हो गई थी लेकिन लड़कियों से ले कर टीचर स्टाफ तक के लोग उसे मैडम के बजाय विलास बहू ही कहते थे. मोहिनी राय चौधरी को भी इस में कोई आपत्ति न थी.

अमेरिका जाने के बाद के सालों में बढ़ते समय के साथ विलास के पत्रों की घटती संख्या शून्य तक पहुंच गई. फिर एक दिन विलास का नहीं, उस के वकील का पत्र आया. वह अमेरिका में अपनी एक सहयोगी नैंसी से शादी करना चाहता था, इसलिए उसे मोहिनी से तलाक चाहिए था. नोटिस देखते ही ललिता हायहाय कर उठीं लेकिन विलास बहू ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की.

‘‘वह इस तरह दूसरी शादी कर तेरी तपस्या भंग नहीं कर सकता. कुछ कर बेटा. इस नोटिस का जवाब भेज. सुना है विदेश की कोर्टकचहरी में सही न्याय मिलता है. तुझे न्याय जरूर मिलेगा,’’ ललिता कंद्रन कर उठीं.

‘‘मांजी, कोर्ट के आदेश से जमीनजायदाद हासिल की जाती है, दांपत्य सुख नहीं,’’ विलास बहू ने उत्तर दिया और अपने कमरे में चली गई.

ललिता ने मुनीम को बुला कर आदेश दिया, ‘‘शहर जा कर विलास को फोन करो कि मेरी तबीयत बहुत खराब है. अगर फौरन न आया तो अंतिम दर्शन भी न कर पाएगा.’’

मुनीम समझ गया कि जरूर कोई अनहोनी हो गई है, फौरन शहर चला गया. लौट कर बताया कि विलास बाबू अगली उड़ान पकड़ कर भारत आ रहे हैं. परसों तक गांव पहुंच जाएंगे.

ललिता ने हुलसते हुए विलास बहू को खबर सुनाई, ‘‘एक बार वह नालायक आ जाए, फिर कभी वापस नहीं जाने दूंगी. तेरे कदमों में बांध कर न डाल दिया तो मेरा नाम बदल देना.’’

‘‘मांजी, यह आप ने अच्छा नहीं किया. झठ के सहारे गढ़े गए संबंध कभी प्रगाढ़ नहीं हो सकते,’’ विलास बहू ने धीमे स्वर में कहा.

‘‘अरे, तेरी मति मारी गई है. पति दूसरा ब्याह करने की सोच रहा है और तू पत्थर बनी बैठी है,’’ ललिता फट पड़ीं और उस दिन उन्होंने विलास बहू को खूब खरीखोटी सुनाई.

वह सिर झका कर चुपचाप सुनती रही. एक भी शब्द मुंह से नहीं निकाला. मांजी का दर्द समझती थी. कुछ कह कर उसे और नहीं बढ़ाना चाहती थी.

जिस दिन विलास को आना था, मोहिनी में कोई आतुरता न थी. हमेशा की ही तरह उठी. रसोई में जा कर विलास की पसंद का खाना बनाया और किताबें उठा कर कालेज चली गई.

शाम का धुंधलका होने पर घर के सामने एक जीप आ कर रुकी. ललिता दौड़ कर बाहर आईं. विलास जीप से नीचे उतर रहा था. उन्हें देखते ही चौंक पड़ा, ‘‘मां, तुम ठीक तो हो. मुनीमजी कह रहे थे कि…’’

‘‘भीतर चल, फिर सब बतलाती हूं,’’ ललिता ने हुलस कर उस की बांह थामी और भीतर लिवा लाईं.

विलास अब तक असलियत समझ गया था. मोहिनी पर नजर पड़ते ही फट पड़ा, ‘‘तो इस के कहने पर तुम ने झठा फोन करवाया था.’’

‘‘मैं ने परसों ही ईमेल कर दिया था कि मांजी की तबीयत बिलकुल ठीक है, आप अगर अपने घर आना चाहें तो आराम से आएं,’’ मोहिनी ने धीमे स्वर में सफाई दी.

‘‘ईमेल,’’ विलास ने दांत भींचे, फिर बोला, ‘‘जानती हो ईमेल क्या होता है, किसी पत्रिका में नाम पढ़ लिया और सोचती हो कि मैं रोब खा जाऊंगा?’’

‘‘बहू, अपने ‘लौलीपौप’ पर दुनियाभर में ईमेलसीमेल भेजती रहती है,’’ ललिता ने फौरन बहू का पक्ष लिया.

‘‘मांजी, लौलीपौप नहीं लैपटौप से ईमेल किया जाता है,’’ मोहिनी ने धीमे स्वर में संशोधन किया.

विलास बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहता था, इसलिए चुप हो गया. मोहिनी ने उस का सामान अपने कमरे में लगवा दिया. अपना सामान एक दिन पहले ही उस ने वहां से हटवा दिया था.

विलास जब कमरे में पहुंचा तो उस का लैपटौप मेज पर रखा हुआ था. दुनिया से संपर्क बना रहे, इसलिए वह अमेरिका से उसे साथ ले कर आया था. 2 दिन से उसे अपना मेल चैक करने का अवसर ही नहीं मिल पाया था. लैपटौप खोल कर उस ने लौगइन किया और इंटरनैट से जुड़ गया. ईमेल खाता खोलते ही वह चौंक पड़ा, पहला मैसेज मोहिनीञ्चयाहूडौटकौम से था. तारीख परसों की ही थी.

आश्चर्य से स्क्रीन को देखते हुए उस ने माउस क्लिक किया. अगले ही पल ईमेल खुल गया. मोहिनी ने सही कहा था. उस ने परसों ही उसे असलियत से अवगत करा दिया था लेकिन जल्दी में उस ने ही ईमेल को नहीं देखा था. अब वह सोच में पड़ गया. मोहिनी और ईमेल? रसोई की चारदीवारी में कैद औरत का लैपटौप, कंप्यूटर और इंटरनैट से क्या संबंध? उस का दिमाग चकरा कर रह गया.

इसी कमरे में उस का और मोहिनी का प्रथम मिलन हुआ था. इसी कमरे में उसे छोड़ कर गया था. तब से दुनिया काफी बदल गई थी. आज इस कमरे में वह अकेला बिस्तर पर पड़ा करवटें बदल रहा था. बहुत मुश्किलों के बाद नींद आ सकी.

सुबह जब उठा तो धूप निकल आई थी. उस का मंजनब्रश और कुरतापाजामा मेज पर रखा था. तैयार हो कर नीचे आया तो ललिता नाश्ते के लिए उस की प्रतीक्षा कर रही थीं, उन्होंने फौरन

2 प्लेटें लगा दीं.

‘‘मोहनी, नाश्ता नहीं करेगी क्या?’’ उस ने इधरउधर देखते हुए पूछा.

‘‘वह विद्यालय गई है,’’ ललिता ने प्लेट उस के आगे बढ़ाते हुए बताया. ‘चौधरी कृष्णबिहारी राय गर्ल्स डिग्री कालेज’, कभी नाम सुना है उस का? मोहिनी लैक्चरर है उस में,’’ ललिता का स्वर तेज हो गया.

‘‘यह तो पिताजी का नाम है. उन के नाम का स्कूल किस ने खोला और मोहिनी उस में कैसे पढ़ा सकती है. वह तो…’’ विलास चाह कर भी अपना वाक्य पूरा नहीं कर सका.

‘‘वह तो गंवार और जाहिल है,’’ ललिता ने विलास का अधूरा वाक्य पूरा किया, फिर फट पड़ीं, ‘‘इतने सालों में तू ने पलट कर भी नहीं देखा कि हम लोग जिंदा हैं या मुर्दा, और आज पूछता है कि पिताजी के नाम का स्कूल किस ने खोला. जो काम तुझे करना चाहिए था वह बहू कर रही है. तेरे नाम का झठा सिंदूर लगा कर वह तेरे पुरखों का नाम रोशन कर रही है और तू उसे तलाक देने की सोच रहा है. तेरी हिम्मत कैसे हुई नोटिस भेजने की.’’

‘‘मां, मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहता,’’ विलास ने नाश्ते की प्लेट खिसका दी और मेज से उठ गया. ललिता उसे रोकती रहीं लेकिन वह तेजी से बाहर निकल आया.

तेज कदमों से चलता हुआ विलास डिग्री कालेज के भवन के करीब पहुंचा. प्रवेश द्वार के ऊपर बड़े से बोर्ड पर ‘चौधरी कृष्णाबिहारी राय गर्ल्स डिग्री कालेज’लिखा हुआ था. थोड़ी दूरी पर ‘ललिता महिला छात्रावास’ की इमारत थी. आश्चर्य से देखते हुए विलास कालेज के भीतर घुसने लगा.

‘‘बाबू साहब, यह लड़कियों का स्कूल है. आप भीतर नहीं जा सकते,’’ द्वार पर खड़े सुरक्षाकर्मी ने उसे रोक दिया.

विलास पलभर के लिए हड़बड़ाया, फिर संभलते हुए बोला, ‘‘मुझे कुछ जरूरी काम है.’’

‘‘बहूजी की आज्ञा है कि जिस को भी काम हो वह कालेज समय के बाद आए,’’ सुरक्षाकर्मी ने टका सा उत्तर दिया.

‘‘कौन बहूजी? वे कैसी औरत हैं?’’ विलास ने पूछा.

‘‘औरत? अरे, ये यहां के जमींदार की बहू हैं. उन का बेटा उन्हें ब्याह कर लाया था लेकिन अभागा हीरे को पहचान न सका. बहूजी ने न केवल खुद की पढ़ाई पूरी की बल्कि पूरे इलाके की लड़कियों की किस्मत बदल कर रख दी है,’’ सुरक्षाकर्मी ने बताया. उस के स्वर से मोहिनी के प्रति अपार श्रद्धा टपक रही थी.

तसवीर काफीकुछ साफ हो चुकी थी. काफी देर तक इधरउधर भटकने के बाद जब विलास घर पहुंचा तो मुनीमजी एक मेटाडोर से कुछ सामान उतरवा रहे थे.

‘‘यह क्या है?’’ विलास ने यों ही पूछ लिया.

‘‘एसी. बहूजी कह रही थीं कि आप इतने साल अमेरिका में रहे हैं. यहां की गरमी में दिक्कत होगी. इसलिए शहर से मंगवाया है,’’ मुनीमजी ने बताया.

विलास को कोई जवाब नहीं सूझ. चुपचाप भीतर चला आया. किंतु आज उस के आश्चर्य का अंत न था. बैठक के बगल वाले कमरे में प्रबंधक की तख्ती लगी हुई थी. कल रात के अंधेरे में वह उसे देख न सका था. उत्सुकतावश दरवाजा खोल कर वह भीतर पहुंचा.

विशालकाय मेज के पीछे पिताजी की आदमकद तसवीर लगी हुई थी. एक कोने में रखा छोटा सा कंप्यूटर आधुनिकता की गवाही दे रहा था तो अलमारी में करीने से सजी बहुमूल्य पुस्तकें अपनी स्वामिनी की रुचि की साक्षी थीं.

विलास को अपना व्यक्तित्व अब काफी बौना लगने लगा था. चंद सालों में मोहिनी ने वह कर दिखलाया जिस की वह कल्पना भी नहीं कर सकता था. उस की सोच से परे बिलकुल नवीन मोहिनी उस के सामने खड़ी थी और उस में उस का सामना कर पाने का साहस न था. वह चुपचाप आ कर अपने कक्ष में लेट गया.

कालेज से लौट कर मोहिनी ने जल्दीजल्दी खाना लगवाया, फिर मांजी और विलास को बुलवाया. विलास ने देखा मेज पर उस की ही पसंद की चीजें सजी हुई थीं. उस ने मोहिनी की ओर देखा, फिर बोला, ‘‘तुम्हारा बहुतबहुत धन्यवाद.’’

‘‘किस बात का?’’

‘‘तुम ने इस घर के लिए, गांव के लिए इतना कुछ किया.’’

‘‘मेरा जो फर्ज था, मैं ने किया. इस में धन्यवाद की क्या बात. आप छोटीछोटी बातें सोच कर परेशान मत होइए, खाना खाइए,’’ मोहिनी ने थाली विलास की ओर बढ़ाते हुए कहा.

कभीकभी दिन, रात से भी भयानक होता है. रात तो फिर भी कट जाती है लेकिन दिन नहीं बीतता है. विलास के लिए एकएक पल भारी हो रहा था. समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे. मांजी, मोहिनी और नैंसी सब गड्डमड्ड हुए जा रहे थे. बेचैनी जब उस की बढ़ गई तो एक बार फिर घर से बाहर निकल आया. खेत, खलिहान, बागबगीचे, तालाब हर जगह भटक आया पर कहीं भी मन को शांति न मिली.

रात का खाना भी उस से नहीं खाया गया. किसी तरह कुछ कौर ठूंस कर अपने कमरे में लौट आया. जब मन शांत न हो तो नींद भी कहां आती है. रात के 12 बज चुके थे. जब विलास से रहा नहीं गया तो चुपचाप कमरे से बाहर निकल आया. सोचा, छत पर खुली हवा में शायद कुछ शांति मिल सकेगी. सीढि़यों पर उस ने पांव रखा ही था कि बगल के कमरे की खुली खिड़की पर नजर पड़ते ही ठिठक गया.

कमरे के भीतर मोहिनी सोई हुई थी. खुली खिड़की से चांद की किरणें उस के मासूम चेहरे से अठखेलियां कर रही थीं. चांदनी में नहाया मोहिनी का चेहरा पूर्णमासी के चांद की भांति खिला हुआ था. उस की मांग में जगमगा रहा सिंदूर उस की गरिमा को कुछ और ही बढ़ा रहा था.

यह सिंदूर तो उस के नाम का है. विलास के मन में अनायास ही भावनाओं का ज्वार आया. उस ने सीढि़यों से अपने पांव पीछे खींच लिए और दरवाजे के करीब आ गया. हाथ के दबाव मात्र से दरवाजा खुल गया.

पलंग के समीप पहुंच विलास मोहिनी के चेहरे को निहारने लगा. वह आज भी उतनी ही आकर्षक प्रतीत को रही थी जितनी प्रथम रात्रि को थी. उस की दूध की तरह सफेद त्वचा, सुराहीदार गरदन, धौंकनी की तरह ऊपरनीचे हो रही छाती और कमल के डंठल की तरह पतली कमर आज भी किसी विश्वामित्र की तपस्या भंग करने में सक्षम थीं.

मोहिनी के रूप से सम्मोहित विलास ने आगे बढ़ कर उस के चेहरे को दोनों हाथों में सहेजा और उस के अधरों पर भरपूर चुंबन अंकित कर दिया.

‘‘कौन है?’’ वह भयभीत हिरणी सी व्याकुल हो उठ बैठी.

‘‘मैं हूं, तुम्हारा विलास,’’ कांपते होंठों से स्वर निकले.

‘‘आप, यहां क्या कर रहे हैं?’’ आश्चर्यचकित स्वर कांप उठा.

‘‘प्रश्न मत करो?’’ चुप रहने के संकेत के साथ प्यासी बांहों के बंधन आगे बढ़े.

‘‘मुझे स्पर्श करने का प्रयास भी मत करिएगा. दूर रहिए मुझ से,’’ शांत स्वर में अशांति गूंज उठी.

‘‘मैं पति हूं तुम्हारा. मेरा अधिकार बनता है तुम पर,’’ विलास की व्यग्रता अधीरता में बदलने लगी थी.

‘‘किस अधिकार की बात करते हैं आप. वह अधिकार जो चुटकीभर सिंदूर ने दिया था? वह अधिकार जो 7 फेरों ने दिया था? वह अधिकार जो मोतियों के मंगलसूत्र ने दिया था? वे सारे अधिकार तो तलाक का नोटिस भेज कर आप ने खो दिए हैं?’’ वर्षों से दबा आक्रोश ज्वालामुखी बन धधक उठा.

भौचक्का विलास हतप्रभ रह गया. ऐसी स्थिति की उस ने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी. बरस रही मोहिनी को शांत कर पाने का नैतिक साहस उस में शेष न बचा था.

शब्दों के बाण कक्ष की दीवारों को भेद कर मांजी के कानों तक पहुंच गए थे. कोई भी मां बेटे को हताहत होता नहीं देख सकती. फौरन बेटे की मदद को आ पहुंचीं और डपटते हुए बोलीं, ‘‘यह कैसा अनर्थ मचा रही हो. अभी तलाक नहीं हुआ है, इस नाते विलास अभी भी तुम्हारा पति है.’’

‘‘जो पुरुष पराई स्त्री का हो गया वह मेरे लिए पर पुरुष समान है और मैं किसी गैरपुरुष की छाया भी अपने तन पर न पड़ने दूंगी.’’

‘‘यह मेरा बेटा है, इस घर का स्वामी.’’

‘‘मैं भी इस घर की स्वामिनी हूं लेकिन जो यह कर के लौटे हैं अगर वह मैं कर के लौटती तो क्या आप मुझे स्वीकार कर पातीं?’’ मोहिनी ने सीधे मांजी की आंखों में झंका.

मांजी ने घबरा कर आंखें बंद कर लीं. जीवन की एकमात्र साध बंद आंखों के सामने तैरने लगी तो झली फैला कर बोलीं, ‘‘बहू, मैं ने हमेशा तेरा कहना माना है. बस, तू मेरी एक इच्छा पूरी कर दे. मरने से पहले मैं इस घर के वंशज को गोद में खिलाना चाहती हूं.’’

‘‘ठीक है, मांजी, जैसी आप की आज्ञा,’’ मोहिनी ने सास की आंखों में जल उठे आशाओं के दीप को देखा, फिर आगे बोली, ‘‘लोगों की व्यंग्यभरी मुसकान जब आप के उस वंशज से पूछेगी कि समंदर पार रहने वाला उस का बाप एक ही रात में कितना बड़ा आशीर्वाद दे गया जो यह हवेली जगमगा उठी तब मैं क्या जवाब दूंगी? यह बता दीजिए, फिर मुझे आप की सारी आज्ञाएं शिरोधार्य हैं.’’

अपने होंठों को दांतों से दाब कर मांजी सिसक पड़ीं. विलास बहू के एक प्रश्न ने हजारों प्रश्नों के व्यूह की रचना कर दी थी जिसे भेद पाने की सामर्थ्य उन में न थी. विवशता गंगा की धार बन बह निकली.

मोहिनी मांजी के दिल की पीड़ा को जानती थी. सो, दर्दभरे स्वर में बोली, ‘‘मांजी, मैं अपने साथ हुए अन्याय को सह सकती हूं किंतु नारी होने के नाते दूसरी नारी के साथ अन्याय करने में सहभागिता नहीं कर सकती.’’

बहू की बातों का अर्थ मांजी की समझ में नहीं आया तो उन्होंने अर्थभरी दृष्टि से उस की ओर देखा. मोहिनी ने विलास पर एक उचटती हुई दृष्टि डाली, फिर बोली, ‘‘आप के बेटे ने अब नैंसी का हाथ थामा है और उस ने बहुत विश्वास के साथ इन्हें आप के पास भेजा है, ऐसे में यदि मैं आप के बेटे की इच्छापूर्ति करती हूं तो क्या वह दूर बैठी उस नारी के साथ विश्वासघात नहीं होगा? यदि ऐसा हुआ तो फिर आप की बहू और उस विदेशी बाला में क्या फर्क रह जाएगा. यदि ये आप का बेटा बन कर आए होते तो मैं इन्हें सिरआंखों पर बैठाती लेकिन जिस रूप में ये आए हैं, यदि उस में मैं इन की क्षणिक इच्छा की पूर्ति करती हूं तो किसी राहगीर को क्षणिक विश्राम प्रदान करने वाली गणिका के व्यापार और औरत की इज्जत में क्या फर्क रह जाएगा.’’

‘‘बस कर बेटा, बस कर. तू जो कर रही है, सोच रही है यही सच है और बाकी सब झठ,’’ मांजी पूरी शक्ति से बहू के सीने से लिपट गईं. उन की आंखों से गिरने वाली एकएक बूंद सच्ची थी.

विलास बहू के घर में विलास मेहमान हो चुका था. अतिथि के अधिकारों का अतिक्रमण करने का साहस उस में शेष नहीं बचा था. पराए हो चुके अपने शरीर को घसीटते हुए वह कमरे से बाहर जाने लगा. मांजी की सिसकियां उसे जल्द से जल्द यहां से दूर चले जाने का आदेश दे रही थीं. Hindi Family Story.

इन्हें आजमाइए:

पुराने अखबार के खास पन्ने जैसे कार्टून, पुरानी हैडलाइन या इंग्लिश टाइप पेज ले कर गिफ्ट रैप बनाएं. ऊपर से कलरफुल रिबन लगा दें. हट के और क्रिएटिव गिफ्ट पैक बन जाएगा.

बोतल में पानी ठंडा रखना हो तो फ्रीजर में आधा पानी भर के बोतल रख दें. सुबह बोतल पानी से पूरी भर दें. पानी पूरा दिन ठंडा रहेगा.

एक पुराने मोजे में कपूर, लौंग, इलायची डाल कर उसे बांध दें और अलमारी में टांग दें. न बदबू, न कीड़े. बस, अलमारी में एक देसी फ्रैशनैस रहेगी.

नीबू का रस निकालना हो लेकिन नीबू सख्त है तो उसे 15 सेकंड माइक्रोवेव में घुमा दो या 1 मिनट गरम पानी में डाल दो, फिर निचोड़ो, पूरा रस निकलेगा.

थोड़ा सा शैंपू पानी में घोल कर शीशे पर पोंछ दो, धुंध नहीं जमेगी. बाथरूम के मिरर के लिए बैस्ट ट्रिक.

घर में जहां चींटियां आ रही हैं, वहां थोड़ा नमक या हल्दी छिड़क दो. चींटियां तुरंत रास्ता बदल लेंगी.

लाइट न हो तो मोबाइल की टौर्च को पानी की बोतल के नीचे रख दें. पूरी जगह रोशनी से भर जाएगी.

प्याज को 15 मिनट फ्रीजर में रख कर काटिए, आंखों से पानी नहीं आएगा.

Relationship Guilt: मैं न चाह कर भी पति के भरोसे को चोट पहुंचा रही हूं

Relationship Guilt: सवाल – “मैं न चाह कर भी पति के भरोसे को चोट पहुंचा रही हूं. शादी को 9 साल हो चुके हैं. मेरे पति बहुत अच्छे इंसान हैं- समझदार, ईमानदार और परिवार को लेकर बेहद संवेदनशील. हमारी जिंदगी शांत और व्यवस्थित चल रही थी जब तक कि मेरे कॉलेज का एक पुराना दोस्त, आरव, मेरे संपर्क में नहीं आया. आरव और मैं कॉलेज के दिनों में बहुत अच्छे मित्र थे. हमारा रिश्ता कभी प्रेम का नहीं था लेकिन हम एक-दूसरे के बेहद करीब थे. फिर जिंदगी के उतार-चढ़ाव में संपर्क टूट गया. कुछ महीने पहले उस ने सोशल मीडिया पर मुझे ढूंढ़ लिया. शुरू में बस पुराने दिनों की बातें हुईं- हंसी-मजाक, यादें, दोस्ती का सुकून. पर धीरे-धीरे मैं महसूस करने लगी कि मैं हर छोटी बात उसे बताना चाहती हूं जैसे पहले बताया करती थी.  मेरे पति को इस बात का पता है, वे बाहर से बहुत संयमित हैं. मैं उन की आंखों में एक अजीब सी बेचैनी देखती हूं. कभी-कभी वे पूछ लेते हैं, ‘आज भी उस से बात हुई?’ और जब मैं ‘हां’ कहती हूं, तो माहौल भारी हो जाता है. मुझे इस दोस्ती को तोड़ देना चाहिए या पति से ज्यादा स्पष्ट हो कर बात करनी चाहिए, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा क्योंकि मेरा दिल और मेरा विवेक दोनों अलग-अलग दिशाओं में हैं?”

जवाब – आप के और आरव के बीच जो सहजता थी वह आप के जीवन का सच्चा और सुंदर हिस्सा है. पर अब आप की जिंदगी में एक और रिश्ता है जो आप के अस्तित्व के साथ जुड़ा है, न कि केवल भावनाओं से. जब किसी पुराने साथी की मौजूदगी हमारे आज के सुकून को हिला दे तो यह संकेत होता है कि सीमाएं धुंधली होने लगी हैं. आप का पहला कदम यही होना चाहिए कि आप खुद से ईमानदार रहें. अपने दिल से पूछिए, क्या आप इस दोस्ती में सिर्फ पुरानी यादें तलाश रही हैं या कोई भावनात्मक रिक्तता भर रही हैं? अगर जवाब दूसरा है तो आप को इस खालीपन का सामना अपने पति के साथ करना होगा, न कि किसी और के साथ. अपने पति से खुल कर बात कीजिए, लेकिन सफाई के अंदाज में नहीं, सच्चाई के साथ. कहिए, ‘मुझे महसूस हो रहा है कि तुम्हें असहजता हो रही है और मैं तुम्हारे भरोसे को आहत नहीं करना चाहती.  जहां तक आरव की बात है, रिश्ते का मूल्यांकन समय के साथ कीजिए. कभी-कभी हमें पुरानी यादें सहेजनी चाहिए लेकिन उन्हें वर्तमान पर हावी नहीं होने देना चाहिए. अगर आप को लगता है कि यह संबंध आप के वैवाहिक जीवन में उलझन ला रहा है तो एक सम्मानजनक दूरी बनाना गलत नहीं.

सवाल – “मैं घर में खुद को मेहमान सा महसूस करने लगी हूं. मेरी शादी को 6 साल हो चुके हैं. मेरे पति बेहद शांत और जिम्मेदार व्यक्ति हैं. शुरुआत में हमारा रिश्ता बहुत अच्छा था. हम दोनों नौकरी करते हैं पर पिछले एक साल में धीरे-धीरे मुझे लगने लगा है कि हमारे बीच एक तीसरा रिश्ता खड़ा हो गया है जो हम से कुछ नहीं कहता लेकिन सब कुछ बदल देता है. मेरी सास मुझ से सीधी नाराज नहीं रहतीं लेकिन हर बात में संकेतों के जरिए मुझे यह महसूस कराती हैं कि मैं उन के बेटे के जीवन में जरूरत से ज्यादा जगह घेर रही हूं. जब मैं किसी चीज का सुझाव देती हूं तो वे कहती हैं, ‘तुम तो नई हो, तुम्हें क्या पता हमारे घर का तरीका.’ कभी-कभी वे मेरे पति से कह देती हैं, ‘पहले से तुम कितने बदल गए हो?’ इन बातों का असर मेरे पति पर भी पड़ने लगा है. वे अब पहले की तरह खुल कर बात नहीं करते. जब मैं किसी बात की शिकायत करती हूं तो कहते हैं, ‘मां बूढ़ी हैं, ज्यादा मत सोचो.’  क्या मैं ही ज्यादा संवेदनशील हूं या सच में मेरी सास हमारे बीच एक अदृश्य दीवार बना रही हैं? मैं चाहती हूं कि घर में शांति रहे और रिश्ता भी न टूटे लेकिन यह संतुलन कैसे बनाऊं?”

जवाब – सब से पहले यह सम झिए कि सास के व्यवहार का उद्देश्य हमेशा रिश्ता तोड़ना नहीं होता. कई बार उन के भीतर यह डर होता है कि बेटे के विवाह के बाद उन की भूमिका घट रही है. वे इसे शब्दों में नहीं कहतीं पर हर टिप्पणी में वही असुरक्षा झलकती है. इसलिए, इस स्थिति को सिर्फ प्रतिस्पर्धा की नजर से देखने के बजाय मनोवैज्ञानिक संतुलन के रूप में समझिए. अब बात आप के पति की. उन्हें दोष देने के बजाय उन से यह स्वीकारोक्ति मांगिए कि आप दोनों एक टीम हैं. कभी-कभी पुरुषों को यह बात समझने में समय लगता है कि ‘बीच में न बोलना’ भी एक तरह का पक्ष लेना होता है. एक शाम सहज रूप से कहिए, ‘मैं जानती हूं, तुम्हारे लिए मां की भावनाएं सब से अहम हैं लेकिन जब मैं अकेली महसूस करती हूं तो चाहती हूं कि तुम मुझे भी परिवार का हिस्सा बनाओ, न कि किसी स्थिति का कारण.’ यह बात उन्हें रक्षात्मक नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करेगी. सास के साथ अपने रिश्ते में सम्मान बनाए रखिए लेकिन हर बार चुप रहना भी सही नहीं. जब वे कुछ ऐसा कहें जो आप को चुभे तो बिना  झगड़े के मुस्कुरा कर कहिए, ‘मांजी, मैं सीख रही हूं, थोड़ा वक्त लगेगा. आखिर, मैं भी तो आप के घर की नई बेटी हूं.’ धीरेधीरे जब उन्हें यह एहसास होगा कि आप उन का स्थान नहीं छीन रहीं तो उन का बचाव भाव भी कम होगा. और आप के पति, अगर वे यह देखेंगे कि आप ने तकरार नहीं, बल्कि समझदारी से स्थिति संभाली है तो वे और मजबूती से आप के साथ खड़े होंगे. – कंचन Relationship Guilt.

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पता: कंचन, सरिता, ई-8, झंडेवाला एस्टेट, नई दिल्ली-55.

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Hindi Family Story: मजबूत दरख़्त- उमा अपनी संतान को लेकर क्या सोचती थी?

Hindi Family Story: राहुल का असली रूप देख कर उमा आज बुरी तरह टूट गई थी. उस ने सपने में भी ऐसे सच की कल्पना नहीं की थी. ‘यारो, असली चांदी तो मेरी है, घर में एक कमाऊ व ख़िलाऊ बीवी है और बाहर तो तमाम अप्सराएं हैं.’ अपने 4 दोस्तों के साथ ड्रिंक करता राहुल आज सारे सच ऐसे उगल रहा था जैसे किसी ने उसे सच बोलने वाली मशीन में फिट कर दिया हो.

‘मेरा शुरू से यही सपना था कि एक बेहद ख़ूबसूरत, पैसे वाली कमाऊ लड़की को अपनी बीवी बनाऊं. बीवी तो ख़ूबसूरत नहीं मिल सकी पर कमाऊ तो मिल ही गई, ऊपर से बढ़िया से सेवा भी करती है. अब रही बात ख़ूबसूरती की, तो वह तो बाहर मिल ही जाती है.’ राहुल की यह बात सुन कर उस के सभी दोस्त ताली मार कर हंस पड़े.

ऐसी तमाम बातों को सुनने के बाद लड़खड़ाती उमा ख़ुद को संभालते हुए मां के कमरे में गई. वह इस वक्त मां की गोद में सिर रख कर फूटफूट कर रोना चाहती थी. वह चाहती थी कि मां को राहुल का सारा सच बता दे पर वह ऐसा नही कर सकी. मां कमरे में सोई हुईं थीं. आज कई दिनों बाद मां को नींद आई थी. पापा के गुजरने के बाद उमा मां को बहुत मुश्किल से संभाल पाई थी.

मां को सोता देख उमा उसी कमरे में उन के पलंग के पास पड़ी एक कुरसी पर ख़ुद को समेटती हुई बैठ गई और पापा की माला टंगी तसवीर को देख कर फूटफूट कर रो पड़ी, फिर फुसफुसाती रही, ‘पापा, आप ने सच कहा था कि राहुल अच्छा लड़का नहीं हैं, उस ने मीठीमीठी, प्यारभरी बातें कर के मुझे अपने जाल में फंसा लिया है.

‘वह मुझ से नहीं, आप की दौलत और मेरी कमाई से प्यार करता है, पापा. आप को पता है, उस ने मुझे बदसूरत कहा, आप की परी को उस ने बदसूरत कहा, पापा.’

सारी रात उमा ऐसे ही रोतीरोती पापा की तसवीर से बातें करती रही, बीचबीच में कभी वह मां को देखती तो कभी अपने 7 साल के बेटे विभु को देखती. नशे में धुंध राहुल कब सोया और कब उस के दोस्त गए, उमा ने किसी बात का कोई ध्यान न दिया.

रोज़ की तरह सुबह उठ कर उनींदी सी आंखों को मलती उमा रोज़मर्रा के कामों में लग गई. विभु का और खुद का टिफिन बना कर, मां और राहुल का नाश्ता तैयार कर के उमा विभु को स्कूल छोड़ती हुई अपने औफिस चली गई.

हैरानपरेशान और रातभर जागने वाली शक़्ल देख कर जब उस की बेहद अच्छी सहेली प्रिया, जोकि उस के साथ काम करती थी, ने उमा से पूछा, “उमा, आर यू ओके?”

“हम्म… मैं ठीक हूं,” लैपटौप पर काम करती, जम्हाई लेती उमा बोली तो प्रिया ने कहा, “लग तो नहीं रहा कि तुम ठीक हो?”

दोनों के बीच कुछ देर तक ख़ामोशी ठहरी रही. कुछ देर बाद शब्दों में बंध कर उमा के संवाद बोले, “धोखा दिया उस ने.”

“किस ने?” प्रिया ने गंभीरता से पूछा.

“राहुल ने, और किस ने, उसे पता था कि हम 2 बहनें हैं और हमारे पापा के पास ठीकठाक पैसा है. बड़ी बहन पहले से अच्छे घर में ब्याही है तो राहुल के हिसाब से वह तो पापा का हिस्सा नहीं लेगी. सारा हिस्सा छोटी बहन यानी मेरा होगा. यही सोच कर राहुल ने छोटीमोटी नौकरी कर के, खुद को स्वावलंबी बता कर मुझ जैसी कमाऊ लड़की से शादी की.” यह कहती हुई उमा रोंआसी हो गई.

“क्या कह रही हो, तुम? तुम्हें कोई गलतफ़हमी हुई होगी, वरना राहुल तो उस दिन अंकल की डैथ के बाद आंटी को और तुझे कितने अच्छे से संभाल रहा था. वह तो आंटी और तेरे लिए अपना घरपरिवार सब छोड़ कर यहां चला आया ताकि आंटी अकेली न रहें.”

प्रिया की इस बात पर उमा बोली, “वो सब राहुल का ड्रामा था. उस ने पूरा नाटक पहले से लिख रखा था.” यह कहते हुए उमा ने अपना हाथ माथे पर रख लिया.

“तो अब क्या?” प्रिया ने उसे पानी की बोतल देते हुए पूछा.

“अब क्या, जो जैसा चल रहा है वैसा ही चलता रहेगा. राहुल यही समझेगा कि मुझे उस के नाटक के बारे कुछ भी पता नहीं है,” उमा ने घूंटभर पानी पीते हुए कहा.

“पर यार, तुम सैल्फ डिपेंडैंट लड़की हो. तुम जो चाहे निर्णय ले सकती हो. फिर क्यों ऐसे धोखेबाज़ को झेलना?” प्रिया ने लैपटौप पर अपने काम पर भी जऱा सा ध्यान देते हुए कहा.

“उस को झेलने का कारण हैं मां. पहले ही वे पापा के जाने का सदमा झेल रही हैं. और अब एक और सदमा? नहीं प्रिया, मुझ में अब मां को खोने की हिम्मत नहीं है, यार,” यह कहती हुई उमा ने फिर माथे पर हाथ रख लिया.

बेमन से औफिस का काम करते हुए उसे आज का दिन बहुत भारी लगा. काम ख़त्म कर वह घर गई तो यह क्या? घर के बाहर एक भरा हुआ बैग और उस के ऊपर एक लिफ़ाफा रखा था. उमा ने ज़ल्दी से वह लिफ़ाफा उठाया और उस के अंदर रखा काग़ज़ निकाल कर देखा, जिस पर लिखा था- ‘तुम क्या सोचते हो? तुम एक लड़की और उस के परिवार वालों को आराम से धोखा देते रहोगे? बेटा, उमा के पिता चले गए तो क्या, उस की मां अभी जिंदा हैं. अब तुम एक बात समझ लो, इस बैग में मैं ने तुम्हारे सारा सामान रख दिया है, इसे उठाओ और चुपचाप हमारी दुनिया से दूर हो जाओ, तालाक़ के कागज़ तुम्हें भेज दिए जाएंगे.’

और उस कागज़ के सब से नीचे लिखा था. ‘उमा की मां.’

मैं डोरबेल बजाती, इस के पहले ही मां ने मेरे लिए दरवाज़ा खोल दिया. मैं, ताकतवर दरख़्त जैसी अपनी मां से दरख़्त की बेल की तरह लिपट गई और अपनी आंखों की तरलता से मां का आंचल भिगोने लगी. कुछ देर तक मां ने मुझे रोने दिया, फिर मां मेरी हथेलियों को पकड़ती हुईं मुझ से बोलीं- “तू क्या सोचती थी, तू बस मां को समझती है, मैं भी तुझे समझती हूं, बेटा. उस दिन जब तू आधीरात फुसफुसाती हुई अपने पापा की तसवीर से बातें कर रही थी न, मैं वहीं लेटीलेटी सब सुन रही थी. तेरा नाम उमा हम ने यही सोच कर रखा था कि तू हमेशा शक्ति बन कर जीवन जिएगी. तू, तू कमज़ोर कैसे पड़ गई, बेटा?

“निकाल फेंक उस राक्षस को अपने जीवन से और अपने मन में ख़ुद के लिए कोई पछतावा, कोई शिकवा मत रख.” मां के ये शब्द सुन कर मैं जैसे फिर से जी उठी. मुझे अब समझ आया कि मेरी मां उतनी कमज़ोर नहीं जितना मैं उन्हें समझती थी. मेरी मां तो एक मज़बूत दरख़्त थीं जो बुरे से बुरे तूफानों से लड़ना जानती थीं और अपनी शाखाओं को सुरक्षित रखना भी. Hindi Family Story.

Hindi Family Story: जो बोलूं मुंह पर बोलूं- नेता जी गुस्से में क्यों थे?

Hindi Family Story: यों तो पीठ पीछे बोलने वालों से ज्यादा अच्छे मुंह पर बात कहने वाले होते हैं पर यह साफगोई हरदम अच्छी नहीं. कभी-कभी शुगर कोटेड पिल्स की भी जरूरत पड़ती है. ज्यादातर लोग उन्हें ही पसंद करते हैं जो जब भी बोलते हैं मुंह पर बोलते हैं. मुझे भी मुंह पर बोलने वाले लोग अच्छे लगते हैं. मुंह पर बोलने के लिए साहस चाहिए. पीठ पीछे बोलने वालों में कायरता की दुर्गंध आती है. वे अपनी बात घुमा-फिरा कर कहते हैं और बात जब पकड़ में आ जाती है तब सकपकाते हुए कहते हैं,

‘‘मेरा कहने का मतलब यह नहीं था. मेरी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है.’’ अपने देश के नेता इस के बेहतरीन उदाहरण हैं क्योंकि उन की बात जब भी पकड़ में आती है तो वे यही कहते हैं कि मेरी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है. मेरे कहने का आशय यह नहीं था. वे असंतुलित हो कर अपना आपा खो बैठते हैं तथा अनाप-शनाप बातें करते रहते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं होता. अर्थ का अनर्थ हो जाता है और वे ‘जो भी बोलूं मुंह पर बोलूं’ कथन के शिकार हो जाते हैं. ‘‘मैं किसी से नहीं डरता. मैं जो भी बोलता हूं मुंह पर बोलता हूं. खेल के नाम पर करोड़ों की बोगस खरीदारी हुई.

लाखों की हेराफेरी हुई. लोगों के पेट का पानी हिला भी नहीं, न किसी ने डकार ही ली. सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, वे किस मुंह से बोलेंगे, उन के मुंह में तो स्वार्थ के नोट ठुंसे पड़े हैं.’’ ‘‘तुम्हें अपनी हिस्सेदारी नहीं मिली क्या? तुम भी तो समिति में थे,’’ मैं ने उन्हें छेड़ते हुए कहा. वे नाराज हो गए. ‘‘भैया, कीचड़ में पत्थर फेंकने से अपने ही कपड़े दागदार होते हैं. मैं जो भी कहता हूं मुंह पर कहता हूं. मैं ने पहले ही आयोजकों को आगाह किया था कि खेल का आयोजन मत कराओ. मगर मेरी सुनता कौन है. अब आग से हाथ जलने लगे तो कराहने लगे,’’ नेताजी गुस्से में बोलने लगे. मैं उन के कहने का अर्थ समझ गया. जब जांच आयोग का फंदा कसा जाने लगता है तब मुंह पर बोलने वाले लोग पतली गली ढूंढने लगते हैं.

गंदगी से अटी सड़क पर चीखेंगे तो लोग उन पर लट्ठ ले कर टूट नहीं पड़ेंगे. उन का मानना है सड़क और गली में यही तो अंतर है. गली निवासियों को अपनी रोजी-रोटी के जुगाड़ से फुरसत नहीं है तो अरबों रुपए के खेल आयोजन में किस मुंह से रुचि लेंगे? उन की निगाह में तो भ्रष्टाचार एक राष्ट्रीय खेल है. खेल खेलने की चीज है. इधर खेला उधर भूल गए. मुंह पर बोलने वालों की सूची में मेरी अर्धांगिनी विजया का नाम भी जुड़ने लगा है. मेरी छुईमुई सी विज्जू अब सिर पर पल्ला नहीं डालती, पड़ोसियों पर अपनी प्रगति की शेखी बघारती है, ‘‘नहीं मिसेज शर्मा, मैं न, जो भी बोलती हूं मुंह पर बोलती हूं.

मेरा मुंह पर बोलना उन्हें भी अच्छा लगता है. पहले मैं भी आम घरेलू औरतों की तरह उन की पीठ पीछे बोलती थी. मगर मुझे जब यह महसूस हुआ कि यह तो अपने परिवार का मामला है, आम लोगों के बीच उजागर करने से क्या फायदा है. अपनी ही हंसी उड़ेगी, इज्जत जाएगी. आपस में गलतफहमी भी बढ़ती है. ‘‘बहनजी, तब से हम ने प्रण कर लिया है कि जो भी शिकवा-शिकायत रहेगी मुंह पर बोल कर समाप्त कर लेंगे. 2 मिनट जरूर बुरा लगेगा मगर घर-परिवार में तो शांति बनी रहेगी. गर्व होगा कि हमें भी मुंह पर बोलना आता है.’’ विवाह के कुछ वर्ष बाद तक पति-पत्नी एक-दूसरे के मुंह पर बोलने से परहेज रखते हैं कि कोई बुरा न मान जाए. पति दफ्तर की बातें छिपाता है तो पत्नी गृहस्थी के हित में घर की बात पचा जाती है और घर की दीवार को हिलने से बचाती है.

हकीकत जब सामने आती है तब अविश्वास की जड़ें अपनी पकड़ मजबूत करती हैं. अनबन व मतभेद के कड़वे फल फलने लगते हैं. जो बोलूं, मुंह पर बोलूं का रंग विजया के ऊपर इस कदर चढ़ने लगा कि वह परिवार की मर्यादा को भूलने लगी. तब मुझे लगा कि मुंह पर बोलने वाले अति उत्साही प्रवृत्ति के होते हैं. अपने को दूसरे लोगों से सुपर समझते हैं. वे अपनी बात कहने में किसी का लिहाज नहीं करते. वे भूल जाते हैं कि वे कहां पर बोल रहे हैं? क्या बोल रहे हैं? कैसे बोल रहे हैं? उन के कहने के क्या दुष्परिणाम सामने आएंगे? स्कूल से बेटे बंटी की परीक्षा का नतीजा आया. मार्कशीट देख कर विजया गुस्से से बम हो गई. हत्थे से बुरी तरह उखड़ गई थी. उस ने बंटी को गुस्से में आवाज दी तो वह थरथर कांपता अपनी मम्मी से पूछने लगा, ‘‘क्या हुआ, मम्मी?’’ ‘‘तू मेरे साथ अभी स्कूल चल.

वह टीचर अपने को क्या समझती है…उस के मुंह पर उस के सारे कामों का भंडाफोड़ न किया तो मैं भी विजया नहीं. मेरा जन्म विजय प्राप्ति के लिए ही हुआ है,’’ बेटे का हाथ पकड़ कर वह स्कूल की ओर बढ़ गई. मैं ने उस से कहा, ‘‘विज्जू, मैं भी तुम्हारे साथ चलूं?’’ मेरी ज्वालामुखी विजया फूट पड़ी और बोली, ‘‘मैं जो भी बोलूं, मुंह पर बोलूं. सुन सकते हो तो सुनो, तुम से कुछ होता जाता तो है नहीं, तुम स्कूल जा कर टीचर की शिकायत इसलिए नहीं करते कि कहीं टीचर बुरा न मान जाए व बंटी को कम नंबर न दे दे. आप तो घर पर ही रह कर कलम घिसते रहो जी,’’ कहती वह घर की चौखट लांघ गई. मैं ने महसूस किया कि तेज आंधी को तो एकबारगी रोका जा सकता है मगर मुंह पर बोलने वाली विजया को कतई रोका नहीं जा सकता. विजया ने आ कर मुझे बताया कि टीचर के मुंह पर उस ने क्या-क्या नहीं कहा,

‘‘आप अपने को समझती क्या हैं. शासन से पूरी पगार लेती हो और पढ़ाई के नाम पर जीरो. ‘‘बच्चों पर ट्यूशन पढ़ने के लिए दबाव डालती हो. जब बच्चों को हम घर पर पढ़ा रहे हैं तो स्कूल में मोटी-तगड़ी फीस देने का क्या लाभ है? आप लोग स्कूल में मोबाइल पर घंटों गप्पें लड़ाती हो. स्वेटर के फंदे डालती फिरती हो. मैं आप के मुंह पर बोलती हूं कि मैं आप की लिखित शिकायत उच्च अधिकारी से करूंगी.’’ विजया की तरह मुंह पर बोलने वालों की व्यक्तिगत धारणा यही रहती है कि वे क्रांति का शंखनाद कर रहे हैं मगर वे नादान नहीं जानते कि वे वाकई में क्या कर रहे हैं. मुंह पर बोलने का अर्थ है मन की भड़ास निकालना. मुंह पर बोलने मात्र से क्रांति नहीं आती. मुंह पर बोलने वालों से लोग रास्ता काटने लगते हैं.

पता नहीं मुंह पर बोलने के पत्थर कब उन के सिर फोड़ दें. मुंह पर बोलने वालों की जबान पर आलोचना अपने बोरिया-बिस्तर के साथ विराजमान रहती है. वे कमजोर लोगों को अपनी जबान का शिकार बनाते हैं. मुंह पर बोलने वालों ने कभी भी किसी दबंग के सामने अपना मुंह नहीं खोला. कई बार मेरे मन में विचार आए कि विजया से कहूं, ‘‘विज्जू बेगम, हरदम मुंह पर बोलना अच्छा नहीं होता. मुंह पर बोलने की टॉफी को शिष्टता के रैपर में लपेट कर भी तो दिया जा सकता है. किस-किस के मुंह पर बोलती फिरोगी. तुम्हारी तरह हर कोई कबीर नहीं बन सकता. विवेक, संतुलन, धैर्य की जरूरत पड़ती है मुंह पर बोलने वालों को.

कबीर ने ऐसे ही नहीं लिख दिया, ‘बुरा जो खोजन मैं चला बुरा न मिलयो कोय, जो दिल ढूंढ़ा आप ना मुझ सा बुरा न कोय.’ मगर मैं शांत ही रहा. विजया के मुंह पर बोलने का साहस तो मुझ में न था इसलिए सोचा, ‘जो भी बोलूं मुंह पर बोलूं’ विषय पर व्यंग्य लिख डालूं व पत्नी को समर्पित कर दूं कि अपनी आलोचना सहते समय कैसा लगता है. द्य सूक्तियां असफलता जानबूझकर ऐसा काम न करें जिस से झुकना पड़े और असफलता पर असफलता मिलती जाए.

समझ थोड़े में समझना चाहिए और देर तक सुनना चाहिए. कार्य हर कार्य उचित माध्यम से करना चाहिए. छलांग मार कर ऊपर जाने की प्रवृत्ति नुकसानदेह रहती है. दुश्मनी दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे कि जब कभी फिर दोस्त बन जाएं तो आप शर्मिंदा न हों. बातें अकसर छोटी-छोटी बातें गले में अटक जाती हैं, जिन का परिणाम बड़ा गंभीर निकलता है. जिंदगी शांत और तनाव रहित जिंदगी के लिए यह आवश्यक है कि छोटी-मोटी अड़चनों को महसूस ही न किया जाए. अनुभव अनुभव के बराबर कोई और शिक्षा नहीं. कार्य और उत्तरदायित्व से ही आदमी सीखता है. गलतियों और कमियों का सामूहिक नाम ही अनुभव है. बिना घुटने छिले साइकिल चलाना भी नहीं आता. Hindi Family Story.

Hindi Family Story: गलती- आखिर कविता से क्या गलती हुई?

Hindi Family Story: उस ने अपने मोबाइल फोन में ह्वाट्सऐप पर उस तसवीर को देखा. उस के नंगे बदन पर उस का मकान मालिक सवार हो कर बेशर्मों की तरह सामने देख रहा था. साथ में धमकी भी दी गई थी कि इस तरह की अनेक तस्वीरें और वीडियो हैं उस के पास. इज्जत प्यारी है तो रकम दे दो.

यह ह्वाट्सऐप मैसेज आया था उस की मकान मालकिन सारंगा के फोन से. एक औरत हो कर दूसरी औरत को वह कैसे इस तरह परेशान कर सकती है? अभी तक तो कविता यही जानती थी कि उस की मकान मालकिन सारंगा को इस बारे में कुछ भी नहीं पता. बस, मकान मालिक घनश्याम और उस के बीच ही यह बात है. या फिर यह भी हो सकता है कि सारंगा के फोन से घनश्याम ने ही ह्वाट्सऐप पर मैसेज भेजा हो.

कविता अपने 3 साल के बच्चे को गोद में उठा कर मकान मालकिन से मिलने चल दी. वह अपने मकान मालिक के ही घर के अहाते में एक कोने में बने 2 छोटे कमरों के मकान में रहती थी.

मकान मालकिन बरामदे में ही

मिल गईं.

‘‘दीदी, यह क्या है?’’ कविता

ने पूछा.

‘‘तुम्हें नहीं पता? 2 साल से मजे मार रही हो और अब अनजान बन रही हो,’’ मकान मालकिन बोलीं.

‘‘लेकिन, मैं ने क्या किया है? घनश्यामजी ने ही तो मेरे साथ जोरजबरदस्ती की है.’’

‘‘मुझे कहानी नहीं सुननी. साढ़े 5 लाख रुपए दे दो, मैं सारी तसवीरें हटा दूंगी.’’

‘‘दीदी, आप एक औरत हो कर…’’

‘‘फालतू बातें करने का वक्त नहीं है मेरे पास. मैं 2 दिन की मुहलत दे रही हूं.’’

‘‘लेकिन, मेरे पास इतने पैसे कहां से…’’

‘‘बस, अब तू जा. 2 दिन बाद ही अपना मुंह दिखाना… अगर मुंह दिखाने के काबिल रहेगी तब.’’

कविता परेशान सी अपने कमरे में वापस आ गई. उस के दिमाग में पिछले 2 साल की घटनाएं किसी फिल्म की तरह कौंधने लगीं…

कविता 2 साल पहले गांव से ठाणे आई थी. उस का पति रामप्रसाद ठेले पर छोटामोटा सामान बेचता था. घनश्याम के घर में उसे किराए पर 2 छोटेछोटे कमरों का मकान मिल गया था. वहीं वह अपने 6 महीने के बच्चे और पति के साथ रहने लगी थी.

सबकुछ सही चल रहा था. एक दिन जब रामप्रसाद ठेला ले कर सामान बेचने चला गया था तो घनश्याम उस के घर में आया था. थोड़ी देर इधरउधर की बातें करने के बाद उस ने कविता को अपने आगोश में भरने की कोशिश की थी.

जब कविता ने विरोध किया तो घनश्याम ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाल कर उस के 6 महीने के बच्चे के सिर पर तान दी थी और कहा था, ‘बोल क्या चाहती है? बच्चे की मौत? और इस के बाद तेरे पति की बारी आएगी.’

कोई चारा न देख रोतीसुबकती कविता घनश्याम की बात मानती रही थी. यह सिलसिला 2 साल तक चलता रहा था. मौका देख कर घनश्याम उस के पास चला आता था. 1-2 बार कविता ने घर बंद कर चुपचाप अंदर ही पड़े रहने की कोशिश की थी, पर कब तक वह घर में बंद रहती. ऊपर से घनश्याम ने उस की बेहूदा तसवीर भी खींच ली थी जिन्हें वह सभी को दिखाने की धमकी देता रहता था.

इन हालात से बचने के लिए कविता ने कई बार अपने पति को घर बदलने के लिए कहा भी था पर रामप्रसाद उसे यह कह कर चुप कर देता था कि ठाणे जैसे शहर में इतना सस्ता और महफूज मकान कहां मिलेगा? वह सबकुछ कहना चाहती थी पर कह नहीं पाती थी.

पर आज की धमकी के बाद चुप रहना मुमकिन नहीं था. कविता की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. इतने पैसे जुटाना उस के बस में नहीं था. यह ठीक है कि रामप्रसाद ने मेहनत कर काफी पैसे कमा लिए हैं, पर इस लालची की मांग वे कब तक पूरी करते रहेंगे. फिर पैसे तो रामप्रसाद के खाते में हैं. वह एक दुकान लेने के जुगाड़ में है. जब रामप्रसाद को यह बात मालूम होगी तो वह उसे ही कुसूरवार ठहराएगा.

रामप्रसाद रोजाना दोपहर 2 बजे ठेला ले कर वापस आ जाता था और खाना खा कर एक घंटा सोता था. मुन्ने के साथ खेलता, फिर दोबारा 4 बजे ठेला ले कर निकलता और रात 9 बजे के बाद लौटता था.

‘‘आज खाना नहीं बनाया क्या?’’ रामप्रसाद की आवाज सुन कर कविता चौंक पड़ी. वह कुछ देर रामप्रसाद को उदास आंखों से देखती रही, फिर फफक कर रो पड़ी.

‘‘क्या हुआ? कोई बुरी खबर मिली है क्या? घर पर तो सब ठीक हैं न?’’ रामप्रसाद ने पूछा.

जवाब में कविता ने ह्वाट्सऐप पर आई तसवीर को दिखा दिया और सारी बात बता दी.

‘‘तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’ रामप्रसाद ने पूछा.

कविता हैरान थी कि रामप्रसाद गुस्सा न कर हमदर्दी की बातें कर रहा है. इस बात से उसे काफी राहत भी मिली. उस ने सारी बातें रामप्रसाद को बताईं कि किस तरह घनश्याम ने मुन्ने के सिर पर रिवौल्वर सटा दिया था और उसे भी मारने की बात कर रहा था.

रामप्रसाद कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘इस में तुम्हारी गलती सिर्फ इतनी ही है कि तुम ने पहले ही दिन मुझे यह बात नहीं बताई. खैर, बेटे और पति की जान बचाने के लिए तुम ने ऐसा किया, पर इन की मांग के आगे झुकने का मतलब है जिंदगीभर इन की गुलामी करना. मैं अभी थाने में रिपोर्ट लिखवाता हूं.’’

रामप्रसाद उसी वक्त थाने जा कर रिपोर्ट लिखा आया. जैसे ही घनश्याम और उस की पत्नी को इस की भनक लगी वे घर बंद कर फरार हो गए.

कविता ने रात में रामप्रसाद से कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई.’’

‘‘माफी की कोई बात ही नहीं है. तुम ने जो कुछ किया अपने बच्चे और पति की जान बचाने के लिए किया. गलती बस यही कर दी तुम ने कि सही समय पर मुझे नहीं बताया. अगर पहले ही दिन मुझे बता दिया होता तो 2 साल तक तुम्हें यह दर्द न सहना पड़ता.’’

कविता को बड़ा फख्र हुआ अपने पति पर जो इन हालात में भी इतने सुलझे तरीके से बरताव कर रहा था. साथ ही उसे अपनी गलती का अफसोस भी हुआ कि पहले ही दिन उस ने यह बात अपने पति को क्यों नहीं बता दी. उस ने बेफिक्र हो कर अपने पति के सीने पर सिर रख दिया. Hindi Family Story.

Hindi Story: प्यार और दौलत- मोहिनी का प्यार क्या परवान चढ़ पाया?

Hindi Story: आंगन में धमधम की आवाज से मोहिनी यह समझ गई कि रामजीवन आ गया है. अपने यकीन को पुख्ता करने के लिए वह उठी और देखा कि आंगन में एक मिट्टी का ढेला पड़ा है, क्योंकि आज रामजीवन के आने पर इसी इशारे का वादा था.

रामजीवन और मोहिनी का प्यार परवान पर था. रामजीवन के बगैर मोहिनी एक पल भी नहीं रहना चाहती थी. लेकिन मोहिनी के घर वाले रामजीवन की कहानी जानते थे. रामजीवन सही आदमी नहीं था. वह झोलाछाप डाक्टरी के अलावा और भी गैरकानूनी धंधे करता था. उस ने दहेज के लालच में अपनी बीवी तक को मार डाला था. लेकिन न जाने मोहिनी पर रामजीवन का कौन सा जादू छाया था.

वैसे रामजीवन था तो मोहिनी की बिरादरी का ही, मगर मोहिनी के घर वाले अपनी बेटी पर उस की छाया भी नहीं पड़ने देना चाहते थे. मोहिनी का पूरा परिवार पढ़ालिखा था. भाई भी नौकरी करते थे और खुद मोहिनी भी इंटर पास थी.

रामजीवन को आया जान मोहिनी घर के जेवर व नकदी एक थैले में डाल कर छत पर चढ़ गई. घर के सभी लोग सो रहे थे. सारे गांव में सन्नाटा था. आज गली के कुत्तों को भी नींद आ गई थी. उन का भूंकना बंद था. वह धीरेधीरे चलती हुई पिछवाड़े की मुंड़ेर पर पहुंच गई. रामजीवन वहीं खड़ा इंतजार कर रहा था. मोहिनी रामजीवन की बांहों में जल्द से जल्द समा जाना चाहती थी. पड़ोस की खपरैल से होते हुए वह रामजीवन के बहुत नजदीक पहुंच गई.

रामजीवन ने उस का थैला थामा और उसे एक ओर रख कर अपने हाथों का सहारा दे कर मोहिनी को भी नीचे उतार लिया. रात आधी से ज्यादा बीत गई थी. दोनों सारी रात चलते रहे. सुबह होने तक वे एक काफी सुनसान जगह पर आ कर रुक गए.

सवेरा हो गया था. जहां वे लोग रुके थे, वहीं पास में ही रामजीवन का खेत था, जहां रामजीवन के खास साथी डेरा डाल कर रहते थे. मोहिनी को वहीं छोड़ रामजीवन अपने एक साथी को ले आया. उस साथी को मोहिनी के पास बैठा कर रामजीवन खुद खाना लाने के बहाने एक ओर चला गया.

जातेजाते रामजीवन ने मोहिनी से झोले में क्याक्या है, जानना चाहा था. तब मोहिनी ने बताया था कि 80 हजार की नकदी और सोनेचांदी के जेवर हैं. एक नजर थैले पर डाल मोहिनी को तसल्ली देते हुए वह बोला, ‘‘इसे मैं अपने साथ लिए जा रहा हूं. कुछ नकद का और इंतजाम कर के मैं शाम तक आ जाऊंगा, फिर कहीं दूर चले जाएंगे.’’

वहां बैठा साथी, जिस का नाम शंकर था, उन की बातें गौर से सुन रहा था. शंकर जानता था कि आज ठाकुर सोने की चिडि़या फांस कर लाए हैं लेकिन वह चुप था. दिन बीता रात आई लेकिन रामजीवन नहीं आया. अब शंकर से रहा नहीं गया. वह बोला, ‘‘कहां रहती हैं आप?’’

‘‘किशनपुर में,’’ मोहिनी ने जवाब दिया. ‘‘अच्छा, जहां मालिक डाक्टरी करते हैं?’’ शंकर ने पूछा.

मोहिनी चुप रही. शंकर ने फिर पूछा, ‘‘क्या नाम है आप का?’’

‘‘मोहिनी,’’ उस ने छोटा सा जवाब दिया. ‘‘जैसा नाम वैसा गुण,’’ शंकर कहे बिना नहीं रह सका. सचमुच वह रात में चांदनी की तरह चमक रही थी.

शंकर ने पूछा, ‘‘घर क्यों छोड़ा आप ने?’’

मोहिनी ने लजा कर कहा, ‘‘तुम्हारे मालिक के साथ रहने के लिए.’’ शंकर मन ही मन सोच रहा था, ‘अजब जादू चलाया है मालिक ने. न जाने क्या हाल होगा इस का?’ फिर उस ने सोचा, ‘बेवकूफ लड़की, तू ने ठीक नहीं किया. मांबाप हमेशा अपनी औलाद का भला ही चाहते हैं, बुरा तो सपने में भी नहीं सोच सकते. कसाई भी अपने बच्चों को खुश व सुखी देखना चाहते हैं.’

मन ही मन शंकर चुप ही रहा. इसी दौरान किसी के पैरों की आहट से उन का ध्यान बंटा. रात के 10 बजे होंगे. दोनों चौकन्ने हो गए. दूर कहीं सियार की डरावनी आवाज सुनाई दे रही थी.

पास आता एक चेहरा अब साफ दिखाई दे रहा था, यह रामजीवन ही था. नजदीक आ कर रामजीवन शंकर को एक ओर ले गया, जहां उस ने शंकर की छाती पर रामपुरी चाकू रख दिया. शंकर के पैरों तले जमीन खिसकने लगी, सामने मौत जो खड़ी थी. उस का हलक सूख गया था. रामजीवन ने कहा, ‘‘मरना चाहते हो कि…’’

शंकर की सूखी जबान से खरखराती आवाज निकली, ‘‘म… म… म… मालिक.’’ ‘‘ले चाकू और मार दे उस लड़की को. नहीं तो तू भी फंसेगा और मैं भी. पुलिस हम दोनों को ढूंढ़ रही है,’’ रामजीवन ने धीरे से, पर कड़कती आवाज में कहा.

‘‘न… न… नहीं मालिक, यह काम मैं नहीं कर पाऊंगा. मैं ने कभी मुरगी तक नहीं…’’ शंकर हकलाया. ‘‘तो ले, तू ही मरने को…’’

शंकर अब तक संभल चुका था. वह सहमते हुए बोला, ‘‘मालिक, चाहे मुझे मार दो, मगर मुझ से यह काम नहीं होगा.’’ रामजीवन कुछ ढीला हो कर बोला, ‘‘एक शर्त पर तू बचेगा. तू किसी से कुछ नहीं कहेगा. जो मैं कहूंगा वही करेगा.’’

‘‘हर शर्त मंजूर है मालिक,’’ शंकर ने डरते हुए कहा. ‘‘आओ,’’ ऐसा कहते हुए रामजीवन मोहिनी के पास गया. शंकर दूर खड़ा अनहोनी का अंदाजा लगा रहा था.

रामजीवन मोहिनी को एक टीले की ओर ले गया. दूर झींगुरों की आवाज से रात और भी डरावनी हो रही थी. प्यार में अंधी मोहिनी चहकती हुई उस की ओर बड़ी अदा से बलखाती सी जाने लगी, क्योंकि उसे लग रहा था कि टीले की ओट में वह उसे बहुत प्यार करेगा. उस की भरी जवानी का रस पीएगा. आज कई दिनों बाद सबकुछ करने का एक अच्छा मौका जो मिला है. वह रामजीवन की बांहों में समा जाने को मचल रही थी.

मगर यह क्या, जैसे ही मोहिनी रामजीवन के गले लगी तो आसमान कांप उठा. रामजीवन ने प्यार करने के बजाय एक हाथ से मोहिनी के जिगर में रामपुरी चाकू घुसेड़ दिया और दूसरे हाथ से उस का मुंह कस कर दबोच लिया. मोहिनी चीख भी नहीं सकी. उस की चीख अंदर ही अंदर दब कर रह गई. जब वह निढाल हो गई, तब कहीं रामजीवन ने उसे छोड़ा. शंकर चुपचाप एक कसाई के हाथों गऊ जैसी मोहिनी को हलाल होते देख रहा था.

जिस के जिस्म से खेला, जो लाखों की दौलत ले कर घरपरिवार, रिश्तेदारों को छोड़ कर आ गई थी, आज उसी मोहिनी के लिए रामजीवन कालिया नाग बन गया था. ‘‘खड़ेखड़े क्या देख रहा है? ले, इस की लाश उठा उधर से,’’ रामजीवन की आवाज से शंकर सोते सा जगा और मशीन की तरह उस ने मोहिनी को एक तरफ से उठा लिया. फिर दोनों उसे एक ढलान पर ले गए.

ढलान में एक गहरा गड्ढा देख कर शंकर समझ गया कि रामजीवन अभी तक क्या कर रहा था. उसी गड्ढे में मोहिनी को हमेशा के लिए दफना दिया गया मानो प्यार की दौलत ही दफना दी हो. Hindi Story.

Hindi Kahani: लौट जाओ अमला- ट्रेन में बैठी लड़की घबराई हुई क्यों थी?

Hindi Kahani: सुपरफास्ट नीलांचल एक्सप्रेस से मैं दिल्ली आ रहा था. लखनऊ एक सरकारी काम से आया था. वैसे तो मैं उत्तर प्रदेश सरकार का नौकर हूं लेकिन रहता दिल्ली में हूं. दिल्ली स्थित उत्तर प्रदेश राज्य अतिथि गृह में विशेष कार्याधिकारी के पद पर कार्यरत हूं.

इस यात्रा के दौरान मेरे साथ कुछ ऐसी घटनाएं घटित हुईं जिन्हें अप्रत्याशित कहा जा सकता है. मसलन, लखनऊ में मुझे जिन अधिकारी से मिलना था उन की पत्नी को जानलेवा दिल का दौरा पड़ गया. बेचारी पूरे 3 दिन तक जीवन और मृत्यु के बीच हिचकोले खाती हुई किसी तरह जीवित परिवार वालों के बीच लौट सकी थीं. वे अधिकारी भद्र पुरुष थे. पत्नी की बीमारी से फारिग होते ही उन्होंने पूरे 10 घंटे लगातार परिश्रम कर के मेरी उस योजना को अंतिम रूप प्रदान कर दिया जिस के लिए मैं लखनऊ आया था.

वापसी हेतु ऐन दशहरे के दिन ही मैं ट्रेन पकड़ सका. गाड़ी अपने निर्धारित समय पर लखनऊ से छूटी, लेकिन उन्नाव से पहले सोनिक स्टेशन पर वह अंगद के पांव की तरह अड़ गई. पता चला कि कंप्यूटर द्वारा संचालित सिग्नल व्यवस्था फेल हो गई है.

प्रथम श्रेणी के कूपे में मैं नितांत अकेला था. कानपुर पहुंचने से पहले ही मैं ने अपने थर्मस को नींबू पानी से भर दिया था. लगता था कि आज के दिन मुझे कोई सहयात्री नहीं मिलेगा. एक बार अच्छी तरह पढ़ी हुई पत्रिका को फिर पढ़ते हुए दिल्ली तक की यात्रा पूरी करनी पड़ेगी. वैसे मुझे पूरी उम्मीद थी कि मेरा बेटा कार ले कर मुझे लेने स्टेशन आएगा. मैं ने लखनऊ से ही उसे फोन कर दिया था कि मैं नीलांचल एक्सप्रेस से दिल्ली पहुंच रहा हूं.

खैर, सिग्नल पर हरी बत्ती जल चुकी थी और ट्रेन ने बहुत हौले से रेंगना प्रारंभ किया ही था कि एक यात्री मेरे कूपे का दरवाजा खटखटाने लगा. मैं ने उठ कर शटर खोला. सामने एक छोटी सी अटैची थामे एक लड़की खड़ी हुई थी. गेहुआं रंग, लंबे, छरहरे बदन तथा सामान्य से कुछ अच्छे नैन-नक्श वाली इस लड़की को देख कर मुझे बड़ी निराशा हुई. सोचा, कोई आदमी होता तो उस के साथ बतियाते हुए दिल्ली तक का सफर आराम से कट सकता था.

लड़की ने सामने 2 नंबर की बर्थ पर अटैची रखते हुए मुझ से पूछा, ‘‘चाचाजी, अगर इजाजत हो तो मैं कूपे का दरवाजा बंद कर दूं?’’

अब चौंकने की बारी मेरी थी. ट्रेन अब तक प्लेटफॉर्म छोड़ कर काफी आगे निकल चुकी थी. मुझ में और इस लड़की की आयु में अच्छा-खासा अंतर था. लगभग इसी आयु की मेरी बेटी संध्या का विवाह हो चुका था. फिर भी आदमी आदमी ही होता है और औरत औरत. उन के आदिम और मूल रिश्तों पर बिरलों का ही बस चलता है. इस रिश्ते के बाद के अन्य सभी रिश्ते आदमी ने बनाए हैं, लेकिन वह भी…

‘‘यदि आप असुरक्षा न महसूस करें तो कूपे का दरवाजा बंद कर सकती हैं,’’ मैं ने उत्तर दिया.

लड़की धीरे से बुदबुदाई, ‘सुरक्षा, असुरक्षा वगैरह मैं बहुत पीछे अपने घर छोड़ आई हूं,’ फिर उस ने कूपे का दरवाजा बंद कर दिया तथा अपनी सीट से लगी खिड़की के बाहर झांकने लगी. लड़की मुझे कुछ परेशान, घबराई हुई सी लग रही थी. इस मौसम में कोई पसीना आने जैसी बात न थी, फिर भी वह रूमाल से माथे पर बार बार उभर रही पसीने की बूंदों को पोंछ रही थी.

गोविंदपुरी और पनकी स्टेशन निकल गए. लड़की ने अपना मुख मेरी ओर घुमाया. अब तक उस का पसीना काफी कुछ सूख चुका था.

‘‘चाचाजी, क्या मैं आप के थर्मस से थोड़ा सा पानी ले सकती हूं?’’

मैं ने उत्तर दिया, ‘‘उस में पानी नहीं है.’’

‘‘प्यास के मारे मेरा गला सूख रहा है.’’

‘‘बेटी, इस में सिर्फ नींबू पानी है.’’

‘‘अच्छा, थोड़ा सा दे दीजिए.’’

वह नींबू पानी का एक गिलास गटागट पी गई. 10 मिनट के बाद उस ने फिर थर्मस की ओर देखा. मैं ने उसे 1 गिलास भर कर और दिया, जिसे वह धीरे धीरे पीती रही. अब वह अपेक्षाकृत सामान्य दिखाई देने लगी थी.

‘‘दिल्ली में किस जगह पर जाना है तुम्हें?’’ मैं ने बात करने की गरज से पूछा.

‘‘आप ने कैसे जाना कि मैं दिल्ली जा रही हूं?’’

‘‘बड़ी आसानी से,’’ मैं ने सहजता के साथ उत्तर दिया, ‘‘यह ट्रेन कानपुर से चलकर दिल्ली ही रुकती है.’’

‘‘ओह…’’

‘‘लेकिन तुम ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया, बेटी?’’

अब उसकी झिझक मिटने लगी थी. उस ने उत्तर दिया, ‘‘नहीं मालूम कि मुझे कहां, किस जगह जाना है.’’

‘‘और तुम अकेली सफर कर रही हो.’’

‘‘हां, दिल्ली मैं अपने जीवन में पहली बार जा रही हूं.’’

मुझे लगा कि कहीं कोई न कोई गड़बड़ जरूर है. यह लड़की शायद अपने आप को किसी बड़े संकट में डालने जा रही है.

‘‘बेटी,’’ मैं ने स्पष्टवादिता से काम लेते हुए पूछा, ‘‘पहले बात को ठीक तरह से समझे, फिर जवाब दो. मैं कह रहा था कि यह ट्रेन रात को करीब डेढ़ बजे दिल्ली पहुंचेगी और तुम्हें यह तक पता नहीं कि कहां जाओगी, किस के साथ रहोगी.’’

‘‘नई दिल्ली स्टेशन पर राकेश मुझे लेने आएगा.’’

‘‘कौन राकेश?’’

‘‘राकेश मेरा प्रेम, मेरी जिंदगी, मेरा सबकुछ है.’’

‘‘तो तुम अपने घर से भाग कर आ रही हो?’’

फिल्मी संवाद की शैली में उस ने उत्तर दिया, ‘‘आप जो भी, जैसा भी चाहें निष्कर्ष निकाल सकते हैं. लेकिन मैं भाग कर नहीं जा रही हूं. मैं एक नया घर बनाने, एक नई जिंदगी शुरू करने जा रही हूं.’’

‘‘दिल्ली में नया घर, नई जिंदगी?’’ कुछ रुक कर मैं ने अगला सवाल किया, ‘‘तुम्हारी उम्र क्या है?’’

‘‘18 वर्ष और कुछ दिन. हाईस्कूल का प्रमाणपत्र है मेरे पास.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि तुम कानूनी कीलकांटे से पूरी तरह से लैस हो कर अपने घर से निकली हो. फिलहाल इस बात को जाने दो. यह बताओ, तुम पढ़ी कहां तक हो?’’

‘‘इंटरमीडिएट, प्रथम श्रेणी, मुझे

3 विषयों में विशेष योग्यता मिली है.’’

‘‘अरे, तुम्हारे सामने चिकनी सड़क जैसा उज्ज्वल भविष्य फैला हुआ है. फिर तुम यह सब क्या करने जा रही हो?’’

‘‘चाचाजी, मुझे कोई प्यार नहीं करता, न पिताजी और न ही मां. दोनों की अपनी अलग दुनिया है…किटी, पपलू, ब्रिज, क्लब, देर रात तक चलने वाली कौकटेल पार्टियां. मेरे अलावा दोनों को सब कुछ अच्छा लगता है. उन दोनों की एक एक बात मैं अच्छी तरह से जानती समझती हूं. लेकिन घटिया बातें अपने मुंह से आप के सामने कहना क्या आसान होगा.

‘‘चाचाजी, घर के नौकरों के साथ मैंने अपना बचपन बिताया है. मेरे माता पिता या तो घर में होते ही नहीं हैं और यदि होते भी हैं तो अपने अपने शयनकक्ष में सोए पड़े होते हैं. अब मैं कैसे कहूं कि मुझे बचपन में ही खराब, बहुत खराब हो जाना चाहिए था. यह करिश्मा ही है कि मैं आज तक ठीकठाक हूं.’’

अकस्मात मुझे लगा कि चारों तरफ फैलती जा रही शून्यता के बीच मेरी प्यारी बेटी संध्या मुझ से बातें कर रही है.

‘‘बेटी, तुम्हारा नाम जान सकता हूं?’’

‘‘अमला नाम है मेरा.’’

‘‘राकेश को कैसे जानती हो?’’

‘‘मेरे मोहल्ले का लड़का है. कॉलेज में मुझ से आगे था. एम ए कर चुका है.’’

‘‘वह करता क्या है?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘तो फिर दिल्ली में तुम दोनों खाओगे क्या, रहोगे कहां? मैं तो समझ था कि राकेश दिल्ली में कोई नौकरी करता होगा. उस के पास रहने का अपना कोई ठिकाना होगा.’’

‘‘दिल्ली में हम सिले सिलाए कपड़ों का व्यवसाय करेंगे. सुना है कि दिल्ली में यदि अच्छे संपर्क सूत्र बन जाएं तो विदेशों में तैयार वस्त्र निर्यात कर के लाखों के वारे न्यारे किए जा सकते हैं.’’

‘‘ठीक सुना है तुम ने बेटी,’’ मेरा मन भीग चला था, ‘‘जरूर लाखों के वारे न्यारे किए जा सकते हैं यदि संपर्क सूत्र अच्छा हो जाए तो. लेकिन संपर्क सूत्र का अर्थ जानती हो तुम?’’

‘‘हां, क्यों नहीं. संपर्क सूत्र बढ़ने का अर्थ है, लोगों से जान पहचान हो जाना.’’

‘‘नहीं,’’ मैं ने कठोरता से कहा, ‘‘कभीकभी इस शब्द के अर्थ बदल भी जाते हैं यानी शून्य अर्जित करने के लिए अपने आप को अकारण मिटा डालना. एक ऐसी नदी बन जाना जिसका उद्गम तो होता है किंतु कोई सम्मानजनक अंत नहीं होता.’’

गाजियाबाद स्टेशन निकल चुका था. हम दिल्ली के निकट पहुंच रहे थे. मैं बहुत असमंजस की स्थिति में था. मैं अमला से कुछ कहना चाहता था, लेकिन क्या कहना चाहता था, क्यों कहना चाहता था, इस की कोई साफ तस्वीर उभर कर मेरे मस्तिष्क में नहीं आ रही थी.

‘‘लेकिन बेटी, व्यापार के लिए धन चाहिए. कितना रुपया होगा तुम लोगों के पास?’’

‘‘राकेश के पास क्या है, एक तरह से कुछ भी नहीं,’’ अमला ने उत्तर दिया, ‘‘वह कह रहा था कि मैं अपनी मां के कुछ जेवर तथा पिताजी की सेफ से व्यापार लायक कुछ रुपए ले चलूं. आखिर बाद में वह सब कुछ मेरा और बड़े भैया का ही तो होगा. कल मिलने वाली चीज को आज ले लेने में क्या हर्ज है.’’

मुझे कुछ और पूछने का अवसर दिए बगैर वह कहती गई, ‘‘लेकिन मैं उन सब से घृणा करती हूं. उन का रुपया, पैसा, जेवर आदि मैं अपने भावी जीवन में कोई भी ऐसी चीज रखना नहीं चाहती जिस में माता पिता की स्मृति जुड़ती हो. मैं अपने साथ जेब खर्च से बचाए हुए 100 रुपयों के अलावा और कुछ ले कर नहीं आई. मैं ने राकेश से साफ साफ कह दिया था कि हम अपना आने वाला जीवन अपने हाथों अपने साधनों से बनाएंगे.’’

‘‘तुम्हारी यह बात क्या राकेश को अच्छी लगी थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘शायद नहीं,’’ उस ने कुछ सोचा, थोड़ा झिझकी, फिर बोली, ‘‘बल्कि वह जेवर तथा रुपया न लाने की बात पर काफी नाराज भी हुआ था.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या, वह दोनों आंखें मूंदे सोचता रहा. फिर मुझ से बोला, ‘अमला, जब तुम साथ हो तो सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा.’’’

‘‘कैसे ठीक हो जाएगा, तुम ने उस से साफ साफ पूछा नहीं. कहानी, उपन्यास तथा फिल्मों में सब कुछ अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन वास्तविक जीवन में आदमी को अपने विवेक व अपने श्रम से सब कुछ ठीक करना पड़ता है.’’

‘‘आप समझते क्यों नहीं,’’ फिर कुछ रुक कर वह बोली, ‘‘मुझेउस पर पूरा विश्वास है.’’

‘‘फिर भी बेटी, मैं ने आज तक अविश्वासघात होते नहीं देखा. जब भी घात हुआ विश्वास के साथ ही हुआ है. और मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे साथ कुछ ऐसा हो.’’

ट्रेन यमुना के पुल से गुजर रही थी. हमारे पास समय बहुत कम बचा था. रात के 1 बज कर 35 मिनट हो चुके थे.

मैं ने हिम्मत बटोर कर अमला से पूछा, ‘‘बेटी, मुझ पर भरोसा रख कर क्या मेरी एक बात मानोगी?’’

‘‘हांहां, कहिए?’’

‘‘आज रात तुम मेरे घर चलो. तुम्हारे राकेश को भी हम अपने साथ ले चलेंगे.’’

‘‘मगर?’’

‘‘अगरमगर मत करो, हां कह दो. आगे बढ़ कर हम लौट नहीं सकते परंतु तुम जहां हो, वहीं रुक जाओ. वहां तुम अपनी चाची के साथ सोना…’’

न जाने किस प्रेरणा से अमला मेरी बेटी संध्या की तरह मेरे प्रति आज्ञाकारिणी हो गई. बोली, ‘‘ठीक है, जब आप इतनी जिद कर रहे हैं तो आप की बात मान ही लेती हूं.’’

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के निकास द्वार पर राकेश अपने दोस्तों के साथ खड़ा था. लंबे तगड़े, छोटी छोटी खसखसी दाढ़ी तथा बारीक तराशे बालों वाले राकेश के दोस्त मुझे अजीब लगे. राकेश ने मुझे अनदेखा करते हुए कहा, ‘‘अमला, चलो टैक्सी में बैठो. हम होटल चलते हैं. पहले ही काफी देर हो चुकी है.’’

राकेश को अपना परिचयपत्र थमाते हुए मैं ने कहा, ‘‘अमला मेरे साथ जा रही है. कल तुम मेरे घर आना. बाकी की बातें वहीं करेंगे.’’

तीनों दाढ़ी वाले सफेदपोश मेरा रास्ता रोक कर लाललाल आंखों से मुझे घूर रहे थे. इसी बीच मेरा बेटा आ पहुंचा था. उन तीनों में से एक मुझ से बोला, ‘‘यह लड़की लखनऊ से दिल्ली आप के मकान में सोने के लिए नहीं आई है.’’

उन तीनों को देख कर अमला के होश उड़ते दिखाई दे रहे थे. वह दृढ़तापूर्वक बोली, ‘‘राकेश, मैं चाचा जी के घर ही रहूंगी. तुम कल मुझ से इन के यहां ही मिलना.’’

मुझे लगा कि कुछ दंगा फसाद होने वाला है और मेरा बेटा इस सब के लिए अपने आप को तैयार कर रहा है. इसी बीच भागते हुए 2 सिपाही हमारे पास आए. मुझे कुछ कहने का अवसर दिए बिना अमला ने उन सिपाहियों से कहा, ‘‘कृपया हमें हमारे घर पहुंचने में मदद कीजिए. मैं नहीं जानती कि ये लोग कौन हैं और क्यों मेरा रास्ता रोक रहे हैं.’’

मैं ने भी उन्हें अपना परिचय दिया. वे हमें हमारी कार तक पहुंचा गए. न जाने क्यों राकेश इस दौरान मौन रहा.

अगले दिन राकेश के दोस्तों के धमकी भरे फोन आने के बाद अमला को पूरी तरह एहसास हुआ कि वह अजगरों के मुंह में जाने से बाल बाल बची है.

बाकी का काम मेरी पत्नी ने किया. उस ने अमला से कहा, ‘‘मेरी मुन्नी, आदमी का दुख दीपक की तरह होता है. वह खुद अपने आप को पल पल जला कर दूसरों को प्रकाश देता रहता है. लौट जाओ अपने घर. स्वयं जल कर अपने घर को अपनी ज्योति से आलोकित कर दो.’’

‘‘लेकिन चाचा जी, मैं कैसे, किस मुंह से वापस जाऊं.’’

‘‘तुम्हारी वापसी, यानी कि पूरे मान सम्मान के साथ वापसी, हमारा काम है. जैसे भी हो, इसे हम करेंगे,’’ मेरी पत्नी उसकी पीठ सहलाते हुए बोली, ‘‘जीना, जीते रहना जिंदगी की शर्त है. जब साथ चलने वाला कोई न मिले तो वीरानगी को अपना हमसफर बना लो. मेरी बेटी, तुम मंजिल तक जरूर पहुंच जाओगी.’’

अमला को मैं 4 दिनों बाद उस के घर वापस पहुंचा आया. उस के माता पिता को मैं ने टेलीफोन से पहले ही सब कुछ समझ दिया था.

पिछले 5 साल से उस के पत्र मेरे तथा मेरी पत्नी के नाम आते रहते हैं. अभी कल ही उस का पत्र मेरी पत्नी के पास आया है, ‘चाचीजी, मैं केंद्रीय सचिवालय की सेवाओं हेतु चुन ली गई हूं. जब तक कोई दूसरी व्यवस्था नहीं हो जाती, मैं आप लोगों के साथ ही रहूंगी.’

मेरी पत्नी मुसकरा कर मुझ से कहती है, ‘‘अब तक एक थी, अब हुक्म बजाने वाली एक और ?हो गई. चलूं, कमरा ठीक करूं. आखिर हुक्म तो हुक्म ही है.’’ Hindi Kahani.

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