Download App

Gen Z Special: सच बताना- जेन जी के खुलेपन को बयां करती कहानी

Gen Z Special: जेन जी के खुलेपन और दबंग रवैये से अनीता पहले ही काफी परेशान थी, मगर जब बेटी ने जेनरेशन अल्फा और बीटा का जिक्र छेड़ा तो वह सोच में पड़ गई.

रात के 9 बज रहे थे. मुंबई के बोरीवली इलाके के एक थ्री बीएचके फ्लैट में डाइनिंग टेबल पर खाना लग चुका था. केतन ऑफिस से आ कर अभी फ्रेश हो रहे थे. उन की पत्नी अनीता काफी तनाव में दिख रही थीं. दरअसल अनीता का मन हो रहा है कि आज वे केतन से अपनी बेटी कुहू को इतनी डांट पड़वाएं कि वह सुधर जाए. आज अनीता मन ही मन जेन जी को कोस रही थीं. हर तरफ इस जेन जी के बिगड़ने का जो शोर मचा है, उस से वे पूरी तरह सहमत हैं. एकदम लापरवाह जेनरेशन बेकार जेन जी, किसी काम की नहीं. कुहू को ही देख लो, अपने में ही गुम. अनीता से रहा नहीं गया. वह बोल ही पड़ीं, ‘‘तुम पर इतना गुस्सा आ रहा है कि क्या कहूं. हर समय हाथ में फोन. अब तो बाथरूम में भी फोन ले कर जाती हो. दिमाग खराब हो गया है इस जनरेशन का. अब भी देखो फोन से नजर ही नहीं हट रही है तुम्हारी. जरा भी शर्म नहीं. इधर देखो, क्या कह रही हूं मैं तुम से?’’ अनीता का चेहरा बेटी को डांटते हुए गुस्से से लाल हो रहा था.  ‘‘क्या बोल रही हो, मम्मी? किसी भी बात पर गुस्सा शुरू कर देती हो. ऐसा नया क्या हो गया है. लो, पापा भी फ्रेश हो कर आ गए. चलो मम्मी, शांति से डिनर करने दो. क्या बनाया है, कुछ बोरिंग तो नहीं है?’’ केतन ने गंभीरता से पत्नी के तमतमाए चेहरे को निहारा और फिर आराम से डोंगे के ढक्कन हटा-हटा कर देखते हुए अपनी इकलौती बेटी कुहू को घूरा, ‘‘थोड़ा ढंग से रहा करो, कुहू?’’ ‘‘मतलब?’’ जवाब अनीता ने दिया, ‘‘इसे बस अपनी पॉकेट मनी, दोस्तों के साथ घूमना पता है, हाथ में हर समय फोन और उल्टे जवाब. घर के किसी काम में कोई रुचि नहीं. कालेज से आ गई तो बस अपने रूम में बंद.’’ ‘‘मम्मी, मैं तो जवाब देती हूं आप को, पता नहीं क्यों आप को उल्टे लगते हैं? पहले तो आप कहती थीं कि मुझे अपने दिल की बात कहने की पूरी छूट है और काम के लिए आप के पास 2 हाउस हैल्प हैं. अच्छा बताओ, मुझसे क्या करवाना है? अभी झाड़ू लगा दूं, बोलो, बोलो?’’ कुहू ने ऐसे भोलेपन से कहा कि अनीता और केतन उसे घूरते हुए खाना निकालने लगे. अचानक कुहू बुरी तरह तुनकी, ‘‘फिर वही दाल और गोभी की सब्जी?’’ केतन ने घूरा, ‘‘यह तुम्हारा रोज का तमाशा है, कुहू. जो बने, चुपचाप खा लिया करो.’’ ‘‘जो मेरी पसंद का नहीं होगा, मैं नहीं खाऊंगी. मैं अपने लिए अभी कुछ ऑर्डर कर लूंगी.’’ ‘‘कुहू, रोज-रोज बाहर का खाना हेल्थ के लिए अच्छा नहीं है, जो बना है, खा लो.’’ ‘‘रोजरोज ये दाल-सब्जी खा कर अगर हेल्थ अच्छी रहती है तो मैं बीमार होना पसंद करूंगी, मम्मी.’’ ‘‘एक हम थे, जो बनता था, चुपचाप खा लेते थे.’’ ‘‘पर सच बताना मम्मी, क्या आप का मन नहीं करता था कि कुछ नया और अच्छा भी खा लें?’’ ‘‘तुम्हारे नानाजी क्लर्क थे तो उन की सैलरी में जो बनता था, हमें उतना ही बहुत लगता था.’’ ‘‘हां, तो मेरे पापा क्लर्क नहीं हैं न. अच्छा-भला कमाते हैं. मैं ऐसा खाना हर दूसरे दिन नहीं खाऊंगी. दोदो हाउसहैल्प हैं, कुछ अच्छा बनवा लिया करो.’’ ‘‘कितनी जुबान लड़ाती है यह जेनरेशन,’’ अनीता ने केतन को देखते हुए दुखी स्वर में कहा.   केतन ने आंखों में दुख के भाव लिए डाइनिंग टेबल पर तन कर बैठी बेटी को देखा, कहा, ‘‘घर का सादा खाना अच्छा रहता है, कुहू.’’ ‘‘तो आप खा लो. मैं ने अपने लिए एक फ्रेंकी और जूस ऑर्डर कर दिया है,’’ कुहू ने खुश होते हुए कहा, ‘‘मैं आप लोगों को हेल्दी खाना खाते हुए देखूंगी. देखो पापा, मैं आप को खुशी से कंपनी दे रही हूं. मेरा आर्डर आ जाएगा तो आप दोनों भी मु झे शांति से खाने देना. आई लाइक पीस व्हेन हैविंग माय डिनर. और बाय द वे, अपनी भजन मंडली में जाते हुए तो बोल जाती हो, ‘कुछ ऑर्डर कर लेना, मेरा तो वहां के प्रसाद से ही पेट भर जाता है.’’ अनीता का मन हुआ, अभी एक थप्पड़ कुहू को रसीद दे, पर फिर दिन-भर के थके पति को देखा और चुप-चाप खाने लगीं. जल्दी ही डोरबेल बजी, कुहू का भी ऑर्डर आ गया. ‘‘वाहवाह, क्या खुशबू है,’’ चहकती हुई कुहू ने अपना ऑर्डर किया फूड अपनी प्लेट में रखा, बाइट लेने से पहले मम्मी-पापा से कहा,  ‘‘टेस्ट करोगे?’’ दोनों ने मना कर दिया. पतली-दुबली, गुड़िया जैसी प्यारी कुहू जरा सी तो थी, जितना शोर खाने के लिए मचाया था, उतना तो खाना भी नहीं था. आधा खा कर ही वह छोड़ने लगी. उस ने कहा, ‘‘कोई टेस्ट करेगा? मेरा पेट भर गया है. बहुत टेस्टी है.’’ ‘‘लाओ इधर, बस, पहले ऑर्डर करना, फिर वेस्ट करना. पैसे की कोई वैल्यू ही नहीं.’’ केतन और अनीता ने गुस्से से पहले कुहू को घूरा, फिर फ्रैंकी खाने लगे. कुहू उन्हें ध्यान से देख रही थी. जब वे खा चुके तब कुहू बोली, ‘‘सच बताना, पापा, यह मम्मी के खाने से ज्यादा टेस्टी था न?’’ अब केतन को हंसी आ गई तो कुहू ने अपनी मम्मी को छेड़ा, ‘‘आप तो रोज पापा को नखरे दिखा दिखा कर बस 2 रोटी खाती हैं, आज तो फ्रेंकी और जूस सब पी गईं, सच बोल दो, मेरी मां, खाना तो यही बढि़या है न?’’ अनीता ने उस की बात का कोई जवाब नहीं दिया. आज वे सचमुच कुहू से नाराज थीं, ‘‘केतन, तुम्हें पता है, यह आज कॉलेज नहीं गई थी. यह दोस्तों के साथ मूवी देख कर आई.’’ ‘‘क्या?’’ केतन ने जोर से पूछा.  ‘‘हां, पापा. मुझसे मेरे फ्रेंड्स ने कहा कि जब मंगलवार को मूवी के टिकट्स हर जगह इतने सस्ते होते हैं तो वीकेंड का क्यों वेट करें, क्यों फालतू खर्च करना है. मुझे वह आइडिया बहुत अच्छा लगा तो हम ‘सैयारा’ देखने चले गए.’’ ‘‘इतनी गलत हरकत और वह भी इतनी बेकार मूवी के लिए?’’ ‘‘पापा, पहली बात तो यह है कि आप की जेनरेशन को यह बेकार लग रही है, हमें तो अच्छी लगी और दूसरी बात यह कि आप ने भी तो कभी स्कूल छोड़ कर कुछ किया ही होगा न. सच बताना, मजा आता था न?’’ ‘‘क्या बेकार की बातें करती हो, कुहू?’’ ‘‘एक तो आप लोगों के साथ प्रॉब्लम यह है कि आप लोग अपने दिन भूल गए हो. हम जो करते हैं, यह सब आप कर चुके हो. हम फोन में कुछ देखते रहते हैं, आप लोग भी तो टीवी में वह क्या बताया था आप ने, कोई चित्रहार हुआ करता था न, वह शौक से देखते थे न? संडे की मूवी का इंतजार रहता था न?  ‘‘दादू बता रहे थे कि स्कूल छोड़ कर खेलने पर आप बहुत पिटे हैं पर खेलने में मजा आता था न? सच बताना, पापा. आप लोग पता नहीं क्यों हमारे सामने इतने आदर्श बन कर खुद को प्रेजेंट करते हो? बस, फर्क यह है कि सोशल मीडिया के कारण हमारा जरा पता चल जाता है, आप लोगों का बहुत कुछ छिपा रह जाता था, है न मम्मी?’’ कुहू ने मां को आंख मारी तो अनीता ने अपने माथे पर हाथ मारा पर थोड़ा सा मुस्कुरा भी दीं. ‘‘देखो मम्मी-पापा, गलतियां तो आप ने भी की हैं. हम से भी होती होंगी पर कभी गिर भी गए तो उठ कर खड़े होना भी सीख लेंगे. अरे हां, नानी ने भी तो बताया था कि आप नाना से छिप-छिप कर फिल्मी गानों पर डांस करती थीं. ‘‘नानी तो फिर भी नाना से आप की शिकायत नहीं करती थीं. एक आप हैं, पापा के सामने मेरी शिकायतों का पुलिंदा खोल कर बैठ जाती हैं. बी लाइक नानी. चलो, अब आप की डाइनिंग टेबल साफ करवा देती हूं, एक-दो तानों से बच जाऊंगी. वैसे, सच बताना मम्मी-पापा, मेरी बातों में लॉजिक तो होता है, है न?’’ इठला कर चलती हुई कुहू बर्तन उठा कर किचन की तरफ जाने लगी. अनीता केतन को देख कर इशारा कर रही थीं, इस का कुछ नहीं हो सकता, बोल भी पड़ीं, ‘‘मैं ही अपनी एनर्जी वेस्ट करती हूं, यह और इस के लॉजिक.’’  किचन से फिर खुशनुमा सी आवाज आ रही थी, ‘‘पर मेरे साथ बातों में मजा तो आता है न, मम्मी पापा, सच बताना?’’ फिर कुहू किचन से आई और जोर जोर से हंसते हुए कहने लगी, ‘‘और हां, सावधान, हमारे बाद आ रही है जेनरेशन अल्फा और उस के बाद जेनरेशन बीटा.’’ केतन और अनीता ने पहले एक-दूसरे को देखा, फिर हंस पड़े. कुहू कह रही थी, ‘‘फिर कुछ सालों बाद आप लोग हमें अच्छा कह रहे होंगे कि बेचारी जेन जी ही ठीक थी. वैसे, सच बताना, हम से डरते तो हैं लोग, है न?’’ अब अनीता हंस रही थीं, ‘‘तुम्हें क्या क्या सच बताएं, छोड़ो.’’ अब कुहू से उन का ध्यान हट चुका था, अब दोनों के दिमाग में चकरघिन्नी काटता टॉपिक था- जनरेशन अल्फा और जनरेशन बीटा! Gen Z Special.

Husband and Wife Relationship: पति-पत्नी किस हद तक शेयर करें अपना पासवर्ड?

Husband and Wife Relationship: 4-6 अक्षरों वाले पासवर्ड शब्द ने आजकल लगभग हर घर में कलह सी मचा रखी है. यह ऐसा कोड है जिसे कोई दूसरे को बिलकुल भी बताना नहीं चाहता. चाहे पतिपत्नी हों, मातापिता हों, बच्चे हों, भाईबहन हों या फिर कोई दूसरा रिश्ता हो, हर रिश्ते को आजकल स्पेस चाहिए और इस स्पेस का सीधा संबंध पासवर्ड से है.

तकनीक के इस दौर में जीवन की हर समस्या के समाधान के लिए ऐप्स मौजूद हैं. आप बोर हो रहे हैं, आप को कोई साथी चाहिए, ध्यान करना है, डेट करनी है, मनोरंजन करना है, यात्रा करनी है, कुकिंग सीखनी है या गेम खेलना है, हर कार्य के लिए गूगल बाबा पर ऐप उपलब्ध है. आप को मोबाइल पर एक क्लिक करना है और ऐप को इंस्टौल करना है. चंद मिनटों में ही आप की समस्या सौल्व हो जाएगी.

इन सभी ऐप्स में अपना पर्सनल पासवर्ड डालने की सुविधा होती है. साधारण भाषा में यदि हम सम झना चाहें तो किसी भी गैजेट या ऐप में पासवर्ड डालने का तात्पर्य है कि वह इंसान उस गैजेट या ऐप को दूसरे किसी भी व्यक्ति से शेयर नहीं करना चाहता.

कुछ समय पहले तक दरवाज़े, सूटकेस और लौकर आदि में पासवर्ड लगाए जाते थे और ये पासवर्ड घर के सभी लोगों को पता होते थे क्योंकि इस में व्यक्तिगत कुछ भी नहीं होता था परंतु आजकल तकनीक और वर्किंग कपल का दौर है जिस में घर के हर सदस्य का अपना मोबाइल, लैपटौप और टैब होता है और सभी अपने गैजेट को अपनी पसंद व जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल करते हैं. साथ ही, वे परिवार के अन्य सदस्यों से उम्मीद करते हैं कि वे उन के निजी गैजेट में ताका झांकी न करें.

रिश्तों में सर्वोपरि आता है पति व पत्नी का रिश्ता जिन्हें एकदूसरे का अर्धांगी कहा जाता है. पतिपत्नी विवाह के समय अग्नि को साक्षी मान कर सात वचनों द्वारा जीवनभर साथ निभाने की कसमें खाते हैं, जिन में एक वचन यह भी होता है कि वे आपस में कोई दुरावछिपाव नहीं रखेंगे. यों तो आमतौर पर यह वचन हमेशा कहने के लिए ही होते रहे हैं परंतु वर्तमान में तो इस वचनों का कोई महत्त्व रह ही नहीं गया. इसे अपडेट किया जाना चाहिए कि आवश्यकतानुसार पतिपत्नी आपस में दुरावछिपाव का व्यवहार भी कर सकते हैं.

वे भी चाहते हैं कि उन के मोबाइल, लैपटौप और टैब के पासवर्ड को जानने का पत्नी या पति भी प्रयास न करें. कई बार स्पेस न देने के कारण पतिपत्नी का आपसी रिश्ता दम तोड़ने भी लगता है.

अब अनामिका का ही उदाहरण ले लीजिए- अनामिका और उस के पति में अकसर एकदूसरे के मोबाइल के पासवर्ड को ले कर बहस हो जाती है. एक दिन जब अनामिका ने अपने पति का नया मोबाइल उठा कर देखना चाहा तो पासवर्ड होने से वह खुला ही नहीं. जैसे ही पति बाथरूम से बाहर निकले तो वह बोली, ‘‘इस का पासवर्ड क्या है, बताओ जरा?’’

‘‘तुम्हें मेरे मोबाइल का पासवर्ड क्यों जानना है?’’

‘‘अरे, बता दोगे तो क्या हो जाएगा. मैं भी तुम्हारा मोबाइल देखना चाहती हूं.’’

‘‘क्यों तुम्हारे पास मोबाइल नहीं है क्या, जो मेरा मोबाइल देखना है तुम्हें?’’

‘‘अब तो मैं जरूर देखूंगी. आखिर, तुम क्या छिपा रहे हो?’’ बस, इसी बात पर दोनों में बहस हो गई और आगे जा कर इस बहस ने काफी उग्र रूप धारण कर लिया. अनामिका को लग रहा था कि जरूर उस के पति के मोबाइल में ऐसा कुछ है जिसे उस का पति उसे दिखाना नहीं चाहता.

एक मल्टीनैशनल कंपनी में एचआर की पोस्ट पर काम कर रही 35 वर्षीया कल्याणी की कुछ महीने पहले ही शादी हुई है. वह कहती है, ‘‘हर इंसानी रिश्ते को स्पेस चाहिए होता है. यदि मेरा पति मेरे साथ अपने रिश्ते को बखूबी निभा रहा है, हमारे बीच में अच्छी अंडरस्टैंडिंग है तो मु झे उस के पर्सनल स्पेस में जाने की कोई जरूरत नहीं है. वह अपनी दुनिया में मस्त और मैं अपनी दुनिया में. पर हां, अगर वह कभी मेरे पर्सनल स्पेस में  झांकने की कोशिश करेगा तो फिर मैं भी उस के पर्सनल स्पेस से रूबरू होना चाहूंगी.’’

वहीं, एक कालेज में 40 वर्षीया प्रोफैसर नेहा कहती हैं, ‘‘भारतीय समाज प्रारंभ से ही पुरुषप्रधान रहा है, यहां पर पति को तो पत्नी की सारी बातें, सारे पासवर्ड जानने का अधिकार है परंतु यदि पत्नी ने पासवर्ड मांग भी लिया या उन का मोबाइल देख लिया तो पुरुषों की त्योरियां चढ़ जाती हैं.’’ वे आगे कहती हैं, ‘‘आप ही बताइए, मु झे यदि शक है कि मेरे पति को पोर्न देखने की लत है और उस से मेरा दांपत्य जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है तो क्या मैं चुपचाप बैठी रहूं या फिर पासवर्ड मांग कर उस ऐप को अनइंस्टौल कर दूं और पति को एक अच्छे साइकोलौजिस्ट के पास ले कर जाऊं.’’

वास्तव में किसी भी इलैक्ट्रौनिक गैजेट या उस की ऐप्स का पासवर्ड आजकल युवावर्ग के दांपत्य जीवन में  झगड़े की बहुत बड़ी वजह है. चूंकि पति और पत्नी परिवार की मुख्य धुरी होते हैं, परिवार को चलाने वाले भी वे दोनों ही होते हैं, उन के बीच में होने वाले  झगड़ों का असर बच्चे और परिवार के अन्य सदस्यों के साथसाथ उन दोनों की व्यक्तिगत प्रगति पर भी पड़ता है. तकनीक के इस युग में पतिपत्नी के बीच एक सीमा तक स्पेस का होना भी बेहद जरूरी है, इसलिए पासवर्ड को ले कर भी कुछ सीमाएं होनी जरूरी हैं.

टौक्सिक न बनने पाए

रोहित और रीना की कुछ समय पूर्व ही शादी हुई है. दोनों की अरेंज मैरिज थी पर दोनों ही अपनी शादी से बेहद खुश हैं. अपनी रिलेशनशिप के बारे में रीना कहती है, ‘‘यों तो हमारे बीच में सबकुछ ठीक है परंतु मुझे रोहित की एक आदत बिलकुल भी पसंद नहीं है, वह मेरे मोबाइल को दिन में दस बार चैक करता है. ठीक है मैं ने उसे अपना पासवर्ड बता दिया है लेकिन इस का मतलब यह तो नहीं कि वह पूरे समय मेरे मोबाइल को ही देखता रहे. मेरा कुछ भी पर्सनल न रहे.’’

रिलेशनशिप काउंसलर निधि तिवारी कहती हैं, ‘‘पतिपत्नी का संबंध अद्भुत नाजुक डोर से बंधा होता है, इसलिए यदि आप को लग रहा है कि मोबाइल के पासवर्ड न बताने से आप का रिश्ता टौक्सिक हो रहा है तो इसे जितना जल्दी हो सके खत्म करने की कोशिश कीजिए क्योंकि कोई भी गैजेट इंसानी रिश्ते से ऊपर नहीं हो सकता.’’

रिलेशनशिप न हो प्रभावित

एक बैंक में मैनेजर 35 वर्षीय सत्यम कहते हैं, ‘‘मेरी और रूही की 6 साल पहले लव मैरिज हुई थी. हम ने परिवार वालों के विरुद्ध जा कर शादी की थी. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. एक साल पहले मेरे एक दोस्त के कहने पर मैं ने एक डेटिंग ऐप इंस्टौल कर ली थी. हालांकि, मैं ने कभी उसे यूज नहीं किया.  एक दिन रूही ने मेरे फोन में उस ऐप को देख लिया. मैं ने उसे बारबार भरोसा दिलाया कि यह सिर्फ इंस्टौल है, मैं ने कभी यूज नहीं किया है, यहां तक कि उसे पासवर्ड भी बता दिया लेकिन उसे मेरी किसी बात पर भरोसा नहीं हुआ. बस, एक साल से हम सिर्फ घर में नाम के लिए रह रहे हैं.’’

रिलेशनशिप काउंसलर निधि तिवारी कहतीं हैं, ‘‘किसी भी गलती में हमेशा माफी की गुंजाइश रखनी ही चाहिए ताकि आपसी रिश्ता सलामत रहे.’’

स्पेस है बहुत जरूरी

एक युवा पत्रकार आकांक्षा कहतीं हैं, ‘‘आजकल बच्चों तक को तो स्पेस की जरूरत होती है, फिर पति व पत्नी के रिश्ते में क्यों नहीं. पतिपत्नी के रिश्ते की सब से जरूरी बात है उन के बीच का विश्वास. यदि वह ही नहीं है तो ही उन के बीच में पासवर्ड मुद्दा बनेगा वरना दोनों में से किसी को भी एकदूसरे के पासवर्ड या हम मोबाइल में क्या करते हैं इसे जानने की जरूरत ही नहीं होगी. आज के समय में दोनों को ही एकदूसरे को स्पेस देना ही चाहिए, सबकुछ ठीक है तो क्या जरूरत है बिना वजह उल झने की. तुम भी खुश, हम भी खुश.’’

ट्रांसपेरैंसी रखें

पतिपत्नी के रिश्ते में संदेह या शक के लिए कोई जगह नहीं होती. सो, आपस में पारदर्शिता जरूर रखें. सोनालिका का पति हर रात को मोबाइल पर ‘तीन पत्ती’ गेम खेलता था. सोनाली के पूछने पर पति ने कहा, ‘‘पूरे दिन वर्क का इतना अधिक प्रैशर रहता है कि हमें सांस लेने की फुरसत तक नहीं होती, इसलिए औफिस के ही कुछ दोस्त मिल कर रात को एक घंटे ‘तीन पत्ती’ या अन्य कोई गेम खेलते हैं.’’ इस से सोनालिका संतुष्ट हो गई परंतु यदि उस का पति कुछ छिपाने की कोशिश करता तो उन का रिश्ता प्रभावित हो सकता था.

कोई भी हो, हर इंसान को अपने पर्सनल स्पेस की जरूरत होती है. भले ही हम पतिपत्नी ही क्यों न हों, लेकिन परस्पर एकदूसरे की निजता का सम्मान करना भी हमारा दायित्व है. सुखद दांपत्य जीवन के लिए जरूरी तत्त्व है विश्वास. इसे किसी भी स्थिति में खत्म नहीं होने देना चाहिए.

यदि पासवर्ड बताने से आप के पार्टनर को संतुष्टि मिलती है, शक और संदेह खत्म हो जाता है तो बताने में कोई नुकसान नहीं है लेकिन ऐसे में दूसरे पार्टनर की भी जिम्मेदारी है कि वह हर दिन या फिर दिन में दसियों बार मोबाइल चैक करने की कोशिश न करे. किसी भी मामले में यदि आप का पार्टनर अपनी गलती स्वीकार कर रहा है तो भी मुद्दे को अनावश्यक खींचने से बचना चाहिए ताकि दांपत्य जीवन प्रभावित न हो. सब से प्रमुख बात यह है कि यदि पतिपत्नी के बीच में कहीं भी संदेह के अंकुर पनप रहे हैं तो दोनों की ही जिम्मेदारी है कि उन अंकुरों को पौधा बनने से पहले ही नष्ट कर दिया जाए.

रिश्तों में संतुलन बनाएं

पतिपत्नी पासवर्ड साझा करने के बजाय भरोसे पर बातचीत करें. कौन सी जानकारी साझा करनी है और कौन सी नहीं, इसे आपसी सहमति से तय करें. यदि पार्टनर पासवर्ड नहीं देना चाहता तो इसे बेईमानी न समझें. रिश्ते की नींव पासवर्ड नहीं, संवाद और सम्मान से बनती है.

पासवर्ड अपनेआप में गलत या सही नहीं होते-यह सिर्फ एक सुरक्षा का साधन है. लेकिन जब यह भरोसे की कसौटी बन जाए तो रिश्ते की जड़ें हिलने लगती हैं.

 

पतिपत्नी के रिश्ते को मजेदार बनाने के 20 अनोखे टिप्स

१.            सप्ताह में एक बार ‘डेट नाइट’ प्लान करें. चाहे घर पर ही मोमबत्ती जला कर डिनर करें या बाहर जाएं, एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताना जरूरी है.

२.            रैंडम ‘आई लव यू’ मैसेज भेजें. बिना किसी खास वजह के प्यारभरे मैसेज भेजें, यह पार्टनर को स्पैशल महसूस कराता है.

३.            एकदूसरे का फोन कभीकभी चैक किए बिना इस्तेमाल करें. इस से ट्रांसपेरैंसी और भरोसा बढ़ता है.

४.            सुबह की चाय या कौफी एकसाथ पिएं. दिन की शुरुआत साथ करने से रिश्ता और गहरा होता है.

५.            कभीकभी सरप्राइज प्लान करें. अचानक उन का पसंदीदा खाना बना कर या कोई छोटा सा गिफ्ट दे कर उन्हें खुश करें.

६.            एकदूसरे को निकनेम (प्यारे नाम) दें. यह रिश्ते में मिठास लाता है और प्यार को बनाए रखता है.

७.            साथ में पुरानी फोटो देखें और यादें ताजा करें. इस से पुरानी यादें ताजा होंगी और प्यार ज्यादा बढ़ेगा.

८.            बेवजह एकदूसरे की तारीफ करें. आज तुम बहुत अच्छे लग रहे हो या तुम्हारी हंसी बहुत प्यारी है जैसी बातें कहें.

९.            कभीकभी पार्टनर के लिए कुछ स्पैशल लिखें. एक छोटा सा नोट या प्यारभरा खत छिपा कर दें.

१०.         सोने से पहले एकदूसरे से दिनभर की बातें शेयर करें. इस से इमोशनल कनैक्शन मजबूत होता है.

११.         एकदूसरे के घरवालों और दोस्तों का सम्मान करें. यह रिश्ते को और मजबूत बनाता है.

१२.         कभीकभी किचन में साथ में खाना बनाएं. इस से आपसी बौंडिंग मजबूत होती है और मस्ती भी होती है.

१३.         पार्टनर के बचपन की कहानियां सुनें और उन के परिवार के बारे में जानें. इस से रिश्ता गहरा होगा.

१४.         मिल कर एक ‘बकेट लिस्ट’ बनाएं. दोनों साथ में कौनकौन सी चीजें करना चाहते हैं, यह लिस्ट बनाएं और पूरा करें.

१५.         रात को सोने से पहले प्यारभरी बातें करें. दिन की टैंशन भूल कर प्यार से सोएं.

१६.         संडे को लेजी डे बनाएं. पूरा दिन साथ में मस्ती करें, बिना किसी जिम्मेदारी के.

१७.         हर साल एकसाथ ट्रिप प्लान करें. नई जगहों पर जाना रिलेशनशिप को मजेदार और ऐक्साइटिंग बनाता है.

१८.         खुलेआम एकदूसरे से प्यार का इजहार करें. जैसे दोस्तों के सामने या सोशल मीडिया पर प्यारभरी पोस्ट डालें.

१९.         एकदूसरे की छोटीछोटी बातें याद रखें. पार्टनर को क्या पसंद है, उन की कोई खास आदत या ड्रीम, इस से वे खास महसूस करेंगे.

२०.         साथ में मूवी नाइट रखें. रोमांटिक या कौमेडी फिल्म देख कर मजे करें.

इन छोटेछोटे बदलावों से आप का रिश्ता सिर्फ मजबूत ही नहीं बल्कि मजेदार और रोमांटिक भी बना रहेगा. किरण आहूजा. Husband and Wife Relationship.

Gen Z Special: राजनीतिक विचारधारा से अलग-थलग हैं जेन जी

Gen Z Special: दुनियाभर की जेन जी यानी नए युवाओं की खेप अपने आंदोलनों की बुनियाद पूरी तरह सोशल मीडिया को आधार बना कर तैयार कर रही है, यह आधार ही अपनेआप में समस्याओं से घिरा है जो कुछ टैक जायंट्स के हाथों में कैद है, जिस में कोई विचारधारात्मक संघर्ष फलफूल ही नहीं सकता.

भारत में ‘जेन जी’ का फैलाव सभी राज्यों में 20 से 32 फीसदी तक है. हिंदीभाषी राज्यों में यह 30-32 फीसदी तक है. इन में उत्तर का जम्मूकश्मीर भी है. बिहार सर्वाधिक 32 फीसदी, दक्षिण-पश्चिम के राज्यों में सिर्फ 22-27 प्रतिशत तक का फैलाव है. बंगाल, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में यह फैलाव सब से कम 24-21 फीसदी है. वहीं, देश का जेन जी औसत 27.1 फीसदी है और देश की जनसंख्या के हिसाब से जेन जी की गिनती 32-35 करोड़ की है. जेन जी को जनरेशन जूमर्स भी कहते हैं.

वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी को जेन जी कहते हैं. इन की उम्र 13 से 28 साल के बीच है. यानी, जिन की उम्र 18 साल से ऊपर है, जेन जी के वे लोग वोट डालने का हक रखते हैं. कालेज और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव न होने से जेन जी वाली पीढ़ी के अंदर राजनीतिक सम झ का पूरी तरह से अभाव हो गया है. राजनीति और समाजसेवा के नाम पर इस पीढ़ी को पूरी तरह से पूजापाठी बना दिया गया है.

यह पीढ़ी कांवड़ यात्रा और धार्मिक आयोजनों में पूरी तरह से शामिल दिखती है. पूजापाठ और दूसरे रीतिरिवाजों में जेन जी युवा शामिल होते हैं. ये पिछली पीढ़ी की युवाओं की तरह तर्क नहीं करते. इस का सब से बड़ा कारण यह है कि इन की पढ़ाई स्कूलों से ले कर घर तक ऐसे हुई है जहां तर्क नहीं किए जाते. एक सवाल के 4 जवाब लिखे होते हैं, उन में से एक सही होता है. स्कूली किताबों के अलावा जेन जी वाली पीढ़ी ने ज्यादा साहित्य नहीं पढ़ा है.

नेपाल बना उदाहरण

ऐसे में उन की कोई अपनी न तो राजनीतिक विचारधारा है और न ही सम झ जिस से छात्रसंघ चुनावों को ले कर उधर से कोई मांग भी नहीं उठ रही. इस से यह साफ सम झा जा सकता है कि वोट दे कर सरकार बनाने वाली एक बड़ी आबादी को राजनीतिक विमर्श का पता ही नहीं है. उस ने नेताओं के नाम सुने हैं, उन के विचारों के बारे में उसे पता नहीं है.

नेपाल में जो हुआ उस को भी देखें तो यह साफतौर पर पता चलता है कि पूरे आंदोलन की कोई एक दिशा नहीं थी. आंदोलन पूरी तरह से भटका हुआ था. हिंसा का बोलबाला था. इस की वजह यह थी कि नेपाल ने अपने यहां के युवाओं को राजनीति से जोड़ा ही नहीं. नेपाल में तख्तापलट को जेन जी आंदोलन नाम दिया गया. यह पीढ़ी उस दौर में पैदा हुई जब इंटरनैट का प्रभाव काफी बढ़ गया था. ये सोशल मीडिया पर सक्रिय हुए और किताबों से दूर होते गए.

जेन जी के पहले वाली पीढ़ी ‘मिलेनियल्स’ यानी जो 1981 से 1997 के बीच पैदा हुए या इन से पहले की पीढ़ी जेन एक्स जो 1965 से 1980 के बीच पैदा हुई थी, की जिम्मदारी थी कि वे जेन जी के अंदर उन गुणों को भरते कि जिस से उन में समाज के प्रति रचनात्मक विचारों का संचार होता. जेन जी को सोशल मीडिया की पैदाइश माना जाता है और सोशल मीडिया पर बैन के बाद ही नेपाल में सत्ता के खिलाफ विद्रोह हुआ. इस के बाद वहां जेन जी कुछ रचनात्मक कर सकेगा, इस पर सवालिया निशान हैं.

नेपाल में विरोध का एक दूसरा कारण नैपो किड्स भी था. इस का मतलब नेपाल के नेताओं के बच्चों की तसवीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर आ रहे थे. जनता को यह लगने लगा था कि यहां फिर से वंश और परिवारवाद शुरू हो जाएगा. ये लोग देख रहे थे कि नैपो किड्स किस तरीके से आरामदायक जीवन जी रहे थे. दूसरी तरफ देश के बाकी युवा अपने जीवन की तुलना उस से कर रहे थे कि उन का जीवन किस दयनीय स्थिति में बीत रहा है.

जेन जी में परिपक्वता की कमी है. उन की दिशा तय नहीं है. इस वजह से नेपाल की राह आसान नहीं लगती है. इन की कोई अपनी एक राय थी, ये क्या चाहते थे यह भी स्पष्ट नहीं था. इन का अपना कोई नेता नहीं था. इन की अपनी कोई स्पष्ट मांग नहीं थी. जैसेजैसे लोग जुट रहे थे, इन के अंदर बदलाव दिख रहा था. नेपाल में चुनाव के बाद बनी सरकार को देख सम झ आएगा कि देश संभालने के लिए जेन जी ने क्या काम किया है.

सोशल मीडिया की पावर कितनी ताकतवर?

युवा अपनी आवाज को देश और देश से बाहर पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीख चुके हैं. ये एक नई राजनीतिक संस्कृति को जन्म दे रही है. खांटी राजनीतिक दलों के लिए ये सम झने की बात है. ये जेन जी पीढ़ी देश की राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था को किस दिशा में ले जाएगी, साफ नहीं है. सोशल मीडिया की पावर एक बुलबुले ही तरह की है. यह किसी दूसरे के हाथ में खेलने जैसी है. नेपाल से पहले कई देशों में ऐसा बदलाव जेन जी कर चुके हैं. उन को देखें तो साफ है कि देश को संभालने और चलाने की ताकत जेन जी में नहीं है. नेपाल में देश संभालने के लिए 74 साल की रिटायर सुशीला कार्की को सामने आना पड़ा, जिन का जन्म 7 जून, 1952 को हुआ था.

नेपाल से पहले श्रीलंका की जेन जी ने सोशल मीडिया का उपयोग कर के श्रीलंका की संसद ने सर्वसम्मति से पूर्व राष्ट्रपति और उन के परिवारों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित किया. यह कदम देश में 2022 के गंभीर आर्थिक संकट के बाद जनता के असंतोष को देखते हुए लिया गया, जब महंगाई और आवश्यक वस्तुओं की कमी के कारण व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे. जुलाई 2022 को श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे पहले मालदीव और फिर सिंगापुर रवाना हो गए थे. राजपक्षे ने सिंगापुर से ही ईमेल के जरिए अपना त्यागपत्र भेज दिया था. देश से भागने के लगभग 2 महीने बाद गोटाबाया राजपक्षे 2 सितंबर, 2022 को श्रीलंका वापस आ गए.

जुलाई 2024 में जेन जी पीढ़ी ने बंगलादेश में भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को ले कर ढाका में प्रदर्शन किए. उन्होंने अपनी बात को व्यापक स्तर पर उठाने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग किया. युवाओं के असंतोष ने तत्कालीन पीएम शेख हसीना को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया. हिंसक प्रदर्शनों के बाद उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी. 8 अगस्त, 2104 को वहां अंतरिम सरकार बनी. इस के बाद बंगलादेश के हाल खराब होते गए. छात्रों के प्रदर्शनों पर और सुरक्षाबलों की कार्रवाई में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए.

मई 2025 में जेन जी ने मंगोलिया के प्रधानमंत्री लुव्सन्नामस्रे ओयुन-एर्डीन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर विरोध प्रदर्शन किए. प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री के बेटे द्वारा किए गए अत्यधिक खर्चों के खिलाफ आवाज उठाई. दरअसल, ओयुन एर्डीन के सत्ता में आने के बाद से मंगोलिया में भ्रष्टाचार की स्थिति और बिगड़ गई थी. प्रदर्शनों के बाद 3 जून को संसद में पीएम विश्वास मत हार गए और उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा.

धर्म और सोशल मीडिया में उलझे जेन जी

भारत में 18-19 साल के मतदाताओं की संख्या 1.82 करोड़ है. 20 से 29 साल के वोटर 19.74 करोड़ हैं. यानी, करीबकरीब 22 करोड़ वोटर जेन जी वाले हैं. जबकि, जनसंख्या 32-35 करोड़ बताई जा रही है. करीबकरीब 25 फीसदी वोटर जेन जी है. भारत में युवाओं ने राजनीति में बदलाव किए हैं. इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण ने जब जेपी आंदोलन शुरू किया था तब उन के साथ बड़ी संख्या में युवा ही थे. वे एक समाजवादी विचारधारा के साथ आंदोलन कर रहे थे. जेन जी वाले आंदोलन से वे आंदोलन अलग था तब सामने नेता होते थे, पीछे युवा होते थे.

जेन जी को अगर राजनीतिक सफलता हासिल करनी है तो उन को केवल सोशल मीडिया पर निर्भर नहीं रहना होगा. सोशल मीडिया तो कुछ पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली है. वे जब चाहेंगे, इस की डोर खींच लेंगे और पूरे आंदोलन की हवा निकाल देंगे.

सोशल मीडिया के पास अपने विचार नहीं हैं. ऐसे में वह रचनात्मक काम करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकती. जेन जी वोटर्स को भी सर्तक रहने की जरूरत है कि वे किसी बहकावे में आ कर कदम न उठाएं बल्कि सोचविचार कर काम करें ताकि उन की ऊर्जा का लाभ देश और समाज को मिले न कि सोशल मीडिया का प्लेटफौर्म चलाने वाले कुछ पूजीपतियों को.

जिस तरह से धर्म एक घुट्टी पिला कर युवाओं को कांवड यात्रा और पूजापाठ में लगाता है जिस से कि उस की धर्म की दुकानदारी चलती रहे उसी तरह से सोशल मीडिया भी करती है. धर्म के नाम पर होने वाली दुकानदारी का लाभ पंडित बिचैलियों को जाता है तो सोशल मीडिया का लाभ दूसरे देशों में बैठे पूंजीपतियों को. दोनों में एक और समानता ये है कि ये दोनों ही युवाओं को काहिल बना कर उन का उपयोग करते हैं. धर्म के नाम पर सत्ता ऐसे ही पलटती है जैसे सोशल मीडिया के नाम पर हो रहा है. Gen Z Special.

Gen Z Special: जेन जी मांगे अपना अधिकार

Gen Z Special: जेन जी युवाओं के पास कई चैलेंजेस हैं. यह पीढ़ी पिछली पीढि़यों की तरह सिद्धांतवादी या आदर्शवादी नहीं रही. यह प्रैक्टिकल बातों में यकीन रखती है मगर समस्याएं जस की तस हैं जो पहले के युवाओं ने फेस कीं. दुनियाभर में बेरोजगारी एक बहुत बड़ा मुद्दा है. नेपाल का जेन जी आंदोलन बहुतकुछ कहता है. भारत के विभिन्न राज्यों में आजकल युवा आंदोलनरत हैं. इस के पीछे बेरोजगारी, परीक्षाओं में पेपर लीक, महिलाओं से दुर्व्यवहार और हत्या जैसे कई अलगअलग कारण हैं. बीते वर्षों में देश में बेरोजगारी की दर बहुत अधिक बढ़ी है? यों तो अर्थव्यवस्था के मजबूत होने की बात कही जाती है लेकिन युवाओं में फैली बेरोजगारी से हम आंखें नहीं चुरा सकते.

सरकारी नौकरियों में पदों की संख्या बहुत कम है. रिटायर होने वाले कर्मचारियों के स्थान पर नई भरतियां बंद हैं. लाखों पद खाली हैं पर उन जगहों संविदा या आउटसोर्स से ही काम चलाया जा रहा है, जिस से विभागों की कार्यप्रणाली पर बहुत असर पड़ा है. वहीं, प्राइवेट सैक्टर में तो हाल बहुत ही बुरा है. कोरोना के समय लाखों लोगों ने अपनी नौकरियां गंवाईं. आज भी कंपनियां कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं.

2024 को जैमिनी युग का नाम दिया गया था. गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई के अनुसार यह आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस तकनीकी पर आधारित लैंग्वेज मौडल है. विभिन्न संस्थाओं में इंजीनियरिंग के छात्रों की परीक्षाएं लगभग हो चुकी हैं. 15 लाख के लगभग छात्र हर साल होते हैं पर नौकरी एक से डेढ़ फीसदी छात्रों को ही मिलती है. आईआईएम के छात्रों को नौकरी नसीब नहीं हो रही. विश्वविद्यालय से पासआउट होने वाले छात्रों का भी यही हाल है. अर्थव्यवस्था बढ़ती तो रोजगार के द्वार अवश्य खुलते.

इकोनौमिक टाइम्स के अनुसार 26 सालों में नौकरियों में सब से ज्यादा कटौती हुई. रेलवे, पुलिस, पोस्टऔफिस में ढेरों पद खाली हैं. ईपीएफ में जुड़ने वाले कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है. कर्मचारियों पर काम का बो झ बहुत है, सो वे दूसरी नौकरी की तलाश में हैं. काम के घंटे बढ़ रहे हैं जबकि मनोवैज्ञानिक काम के घंटों के बीच आराम की वकालत करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय संगठन और मानव विकास संस्थान की नई रिपोर्ट ‘इंडिया अपौंइंटमैंट रिपोर्ट 2024’ के अनुसार देश में नियमित वेतन पाने वाले और स्वरोजगार में लगे लोगों की वास्तविक कमाई में पिछले एक दशक के दौरान गिरावट आई है. यह आंकलन मुद्रा स्फीति की दर के आधार पर आधारित है.

आईआईटी मुंबई के 36 प्रतिशत पासआउट हुए छात्रों को पिछले साल नौकरी नहीं मिली. द टाइम्स औफ इंडिया समेत कई प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में यह रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी.

भारत ने वैश्विक परिदृश्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देश के रूप में अपनी स्थिति बना ली है. आप्रवासी भारतीयों ने वर्ष 2022 में लगभग एक अरब अमेरिकी डौलर भारत में भेजे. यह राशि 2021 में भेजी गई राशि की तुलना में 12 फीसदी अधिक थी. एच1बी वीजा शुरू होने के बाद हमारे युवाओं के लिए अमेरिका जाना एक सपना हो गया है. वहां की नस्लभेदी नीति भी युवाओं को सोचने को मजबूर कर रही है.

2-3 वर्षों पहले कोरोना के दंश से जू झती चीन की अर्थव्यवस्था को पछाड़ने की बात भी आई. हमें यह नहीं भूलना है कि चीन एक साम्यवादी राष्ट्र है. इस व्यवस्था में आर्थिक वर्चस्व के निजी प्रतिमान ध्वस्त कर उत्पादन के साधनों पर समूचे समाज का स्वामित्व माना जाता है. चीन के साम्यवाद के उलट भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां हर आदमी को आगे बढ़ने की स्वतंत्रता और अपनी योग्यता के अनुसार व्यवसाय चुनने की आजादी है लेकिन स्याह पक्ष यह है कि आजादी के 75 वर्षों बाद भी आज सभी को समान शिक्षा और रोजगार के अवसर नहीं मिल पाए हैं.

हमारे मध्य और उच्चमध्य वर्ग के युवाओं के लिए देश में रोजगार एक बहुत बड़ा मसला है. बैंकिंग, फाइनैंशियल सर्विस और इंश्योरैंस सैक्टर में जेन जी की संख्या बीते 2 सालों में लगभग दोगुनी हो गई है.

2023 में अगर यह 12 फीसदी थी तो 2025 में 23 प्रतिशत हो गई है. यह वर्कप्लेस कलर के प्रति दृष्टिकोण में आए बदलाव को दिखाता है लेकिन इस के पीछे एक गौर करने वाली बात यह है कि बीटैक किए हुए छात्र, जिन्होंने 4 साल का डिग्री कोर्स किया है, भी इन क्षेत्रों में जा रहे हैं क्योंकि नौकरी की मारामारी है और आईटी सैक्टर में अनिश्चितता है. भारत की अधिकतर पीढ़ी बुढ़ापे की ओर अग्रसर है, इसलिए जेन जी उम्मीद और चुनौतियों की पीढ़ी बन कर उभर रही है. आज समाज, राजनीति, शिक्षा, रोजगार और संस्कृति को प्रभावित करने में यह वर्ग निर्णायक भूमिका अदा कर रहा है.

रोजगार की चुनौती

डिजिटल युग में जन्मी इस पीढ़ी को स्काइप, व्हाट्सऐप, वीडियो कौल या दूसरे डिजिटल चमत्कार कोई आश्चर्य नहीं लगते. इन का अधिकतर समय मोबाइल और लैपटौप में बीतता है.

इन की जेब में नोट और सिक्के नहीं होते. ये डिजिटल पेमैंट पर भरोसा रखते हैं. आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस, मेटावर्स जैसी तकनीकी इन्हें लुभा रही है. बेरोजगारी का इतना बुरा हाल तब है जब यह पीढ़ी सरकारी नौकरी की तरफ नहीं ताकती है. यह अपना स्टार्टअप खड़ा करने में यकीन रखती है. इस की तकनीकी कौशल और दक्षता अद्भुत है. कोडिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग, एडिटिंग, डिजिटल मार्केटिंग इन के लिए बड़ा आसान है. ये युवा अच्छे सौफ्टवेयर डैवलपर हैं पर रोजगार की चुनौती कदमकदम पर इन्हें बेबस करती है. अवसर की कमी, प्रतिस्पर्धा की चुनौती, इंग्लिश की अनिवार्यता इन सब पर दबाव बना रही है.

अगर अवसर मिले तो यह पीढ़ी नेतृत्व करना और फैसला लेना भी जानती है. यह टीवी डिबेट के दौरान नेताओं से खरेखरे प्रश्न पूछने का माद्दा रखती है. जहां पिछली पीढ़ी रील्स और मीम्स बना कर अपनी प्रतिभा का भौंडा प्रदर्शन करती है, वहीं युवा इन तकनीकों के माध्यम से गंभीर संदेश देने का इरादा लिए हुए हैं. ये नौकरी के दौरान लर्निंग को भी महत्त्व देते हैं.

आज के युवा सिद्धांत की जगह व्यावहारिक अनुभव पर ज्यादा टिकते हैं. शिक्षा की गुणवत्ता ने इन्हें निराश किया है. ये मात्र औपचारिक डिग्री के खिलाफ हैं. वर्कप्लेस में उन की खुशी और सुरक्षा को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है. सुरक्षा शारीरिक ही नहीं बल्कि आर्थिक और मानसिक भी होती है.

आज भारत दुनिया के सब से युवा देशों में गिना जाता है. हमारी आधी आबादी 35 साल से कम उम्र के लोगों की है. विश्व की बड़ी आईटी कंपनियों का नेतृत्व भारतीय युवा कर रहे हैं लेकिन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अवसरों की असमानता जैसे कारण भारत समेत पड़ोसी देशों में असंतोष पैदा कर रहे हैं.

इन की मांगों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अगर भारत की बात करें तो आने वाले समय में इन युवाओं का प्रतिशत सब से अधिक होगा, इन्हें उच्च स्थान दिलाना जरूरी है. ये अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल कर भारत को वैश्विक बाजार में अव्वल लाने की कूवत रखते हैं. ट्रंप लाख पहरे लगा दें, अपने देश में सुविधा मिले तो ये यहीं से दुनिया को नचा देंगे. Gen Z Special.

Gen Z Special: तेज दिमाग, टैक कंट्रोल, तनाव भारी, जीरो अनुशासन, अकेलापन

लेखिका  : गायत्री ठाकुर व मिनी सिंह

Gen Z Special: जेनरेशन जेड यानी जेन जी अकेलेपन, डिजिटल लत और पहचान संकट से जूझ रही है जिस की जड़ें माता पिता की व्यस्तता व अनदेखी करने वाली परवरिश में हैं.

दरअसल जेन जी की असल समस्या उस खालीपन की है जिसे तकनीक ने तो जरूर भरा लेकिन भावनाओं ने नहीं. इसी खालीपन का एहसास उन्हें भटका रहा है.

भारत के अहम पड़ोसी देश नेपाल के काठमांडू में युवा इस कदर भड़के कि सियासी बवाल मच गया. काठमांडू में हिंसा सोशल मीडिया पर बैन, भ्रष्टाचार और आर्थिक मंदी को ले कर हुई. नेपाल सरकार की ओर से फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे 26 सोशल मीडिया अकाउंट्स पर प्रतिबंध लगाने से वहां के युवा भड़क गए. उन युवाओं ने 8 सितंबर को ‘जेनरेशन जेड रिवोल्यूशन’ के नाम से प्रदर्शन शुरू किया, जिस में 22 लोगों की जानें चली गईं और 200 के करीब घायल हुए.

नेपाल में जो प्रदर्शन हुए उसे जेन जी आंदोलन इसलिए कहा गया क्योंकि उस में सब से बड़ी भागीदारी युवाओं की थी, खासकर, 18 से 25 साल की उस पीढ़ी की जिसे जेनरेशन जेड यानी जेन जी कहा जाता है. नेपाल की जेन जी पीढ़ी इस बात से आक्रोशित थी कि सत्ता में बैठे लोग अपने बच्चों को तो ऐशोआराम वाली जिंदगी दे रहे हैं जबकि आम लोग बदहाली का जीवन बिताने को मजबूर हैं. जेन जी का कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि ईमानदार व पारदर्शी शासन का वादा कर के सत्ता में आते हैं लेकिन सत्ता पाने के बाद सारे वादे भूल जाते हैं.

जेन जी कौन?

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह जेन जी या जेनरेशन जेड कौन सी पीढ़ी है जिस का जिक्र हर व्यक्ति की जबां पर है तो जेनरेशन जेड जिसे जूमर्स के रूप में भी जाना जाता है, यह वह पीढ़ी है जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई है. इस पीढ़ी में 13 से 28 साल तक के युवा आते हैं. यह आधुनिक पीढ़ियों में सब से युवा और डिजिटल रूप में जन्मी पीढ़ी मानी जाती है.

यह पीढ़ी मिलेनियल्स (जेन वाई 1981-1996) के बाद आती है. जेनरेशन जेड को ‘डिजिटल नेटिव्स’ भी कहा जाता है. जेन जी वाले ऐसी दुनिया में पलेबढ़े हैं जिस में इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया हमेशा मौजूद रहे हैं. जेनरेशन जेड वाले कई मायनों में काबिल हैं. इन की सब से बड़ी खूबी यह है कि ये मल्टीटास्किंग, रचनात्मक, तकनीक प्रेमी हैं और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं. ये लोग सामाजिक मुद्दों पर खुल कर बात करते हैं और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ बोलने की ताकत रखते हैं. इसी वजह से जब नेपाल सरकार ने सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाई तो सब से ज्यादा नाराजगी जेन जी में दिखी.

जेन जी कई काम एकसाथ कर सकते हैं, जैसे वीडियो देखना, दोस्तों के साथ चैट करना और साथ में कोई अन्य कार्य भी. वर्तमान में देश में 35 करोड़ से ज्यादा लोग जेन जी, जूमर्स हैं जो टैक्नोलौजी फ्रैंडली हैं. ऐसे में अगर आप इन लोगों को हलके में लेते हैं तो आप गलती कर रहे हैं क्योंकि आज का समय टैक्नोलौजी का है और तकरीबन हर टैक्नोलौजी में परिवर्तन हो रहे हैं. जेनरेशन जेड वाले इस बदलाव को बहुत जल्दी सीख लेते हैं और इस का यूज वे पेशेवरों की तरह करते हैं.

बड़ों के लिए इस जेनरेशन को समझाना आसान नहीं रह गया है. बेंगलुरु के एक परिवार की 14 वर्षीया सोनम (बदला हुआ नाम) का कहना है कि उस के मातापिता दोनों सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं, उन के पास उसे देने के लिए

समय नहीं है. वह अपने अकेलेपन और तनाव को कम करने के लिए दिन में 8 से 10 घंटे सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स पर बिताती है.

दिल्ली के एक 16 वर्षीय किशोर आरव (बदला हुआ नाम) ने एक साक्षात्कार में बताया कि माता पिता दोनों कॉर्पोरेट नौकरियों में हैं, रात 9 बजे से पहले घर नहीं आते. वह अपनी समस्याएं दोस्तों या सोशल मीडिया पर साझ करता है, जिस के कारण उसे कई बार गलत सलाह मिली या साइबर बुलिंग का सामना करना पड़ा.

वर्ष 2023 के एक सर्वे में भारत के 70 फीसदी से ज्यादा जेन जी युवाओं का कहना है कि उन के माता पिता उन की मेंटल हेल्थ या कैरियर की चिंताओं को पूरी तरह नहीं समझते.

बेंगलुरु की ही 19 वर्षीया अनन्या (बदला हुआ नाम) का कहना है, ‘‘मेरे मातापिता रातभर फोन इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं, क्योंकि वे इसे आजकल का ट्रैंड मानते हैं.’’

2022 के एक सर्वे में जेनरेशन जेड के 60 फीसदी युवाओं ने स्वीकार किया कि वे अपने फोन के बिना खुद को खोया हुआ महसूस करते हैं और उन में यह लत अभिभावकों की निगरानी की कमी के कारण बढ़ रही है. सोशल मीडिया की लत से नींद की कमी, खराब शैक्षिक प्रदर्शन और सामाजिक अलगाव की समस्या बढ़ रही है.

एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि भारत में 60 फीसदी से अधिक माता पिता अपने बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने में असमर्थ हैं क्योंकि वे अपने कैरियर और आर्थिक दबाव में इतना अधिक घिरे रहते हैं कि उन के पास बच्चों को देने के लिए योग्य वक्त ही नहीं रहता. परिणाम यह होता है कि जेन जेड के बच्चे भावनात्मक समर्थन और मार्गदर्शन के लिए माता पिता के बजाय सोशल मीडिया की ओर रुख कर लेते हैं. इस से उन में आत्मविश्वास की कमी, तनाव और असुरक्षा की भावना बढ़ी है.

अभिभावक अकसर बच्चों के सोशल मीडिया प्रयोग को नियंत्रित करने में असफल रहते हैं या फिर इसे पूरी तरह नजरअंदाज करते हैं. जर्नल ऑफ चाइल्ड साइकोलॉजी 2020 के एक अध्ययन में पाया गया कि जिन परिवारों में अभिभावक बच्चों के ऑनलाइन समय की निगरानी नहीं करते, वहां डिजिटल व्यसन की संभावना 40 फीसदी अधिक होती है. भारत में कई माता पिता तकनीकी जागरूकता की कमी के कारण बच्चों को स्मार्टफोन दे देते हैं, बिना उचित दिशा निर्देश के.

जेन जी का सोशल मीडिया से गहरा नाता

‘जेनरेशन जेड’ वाले बच्चे सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं. जेन जी युवा अपने आसपास हमेशा इंटरनेट की उपलब्धता चाहते हैं, क्योंकि वे अपने हर सवाल का जवाब इंटरनेट के जरिए आसानी से खोज लेते हैं. कनेक्टिविटी इन के जीवन में व्याप्त है. दोस्ती से ले कर रिश्तों, समाचार, मनोरंजन, खरीदारी और यहां तक कि इन के बातचीत करने के तरीके तक बदल गए हैं.

इन के सब से लोकप्रिय ऐप्स स्नैपचैट, इंस्टाग्राम और मैसेजिंग ऐप, किक आदि हैं. एक युवा किशोर के इंस्टाग्राम पर कम से कम 150 फॉलोअर्स होते हैं और वे स्नैपचैट पर लगभग आधा से एक घंटा बिताते हैं. जेन जी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी होते हैं जो वीडियो या पोस्ट को इंटरनेट की मदद से लोगों तक जानकारी पहुंचाते हैं और उन्हें प्रभावित करते हैं.

2023 के एक सर्वे में 30 फीसदी युवाओं ने बताया कि उन के माता पिता उन के सोशल मीडिया प्रयोग से अनजान हैं.

हिंदी के एक अखबार में ब्रिटिश वेबसाइट ‘डेली मेल’ में पब्लिश हुई एक स्टडी का जिक्र किया गया जिस में बताया गया कि आज की पीढ़ी का ब्रेन साइज 100 साल पहले पैदा हुए लोगों के मुकाबले ज्यादा बड़ा है, लेकिन युवा पीढ़ी के आईक्यू लेवल में पहले की पीढ़ियों के मुकाबले कमी देखने को मिली है. स्टडी में यह दावा किया गया कि युवा पीढ़ी के आईक्यू स्कोर में काफी गिरावट है (हालांकि ब्रेन के बड़े या छोटे साइज और आईक्यू लेवल का कोई संबंध नहीं है लेकिन स्कोर में गिरावट चिंता का विषय है). शोधकर्ताओं ने इस का कारण फोन और इंटरनेट पर अत्यधिक निर्भरता को बताया है.

जेन जी की उंगलियां दिमाग की तरह तेज दौड़ती हैं

जेनरेशन जेड वालों का दिमाग काफी तेज दौड़ता है. इंटरनेट की दुनिया में इन की उंगलियां मोबाइल और लैपटॉप पर ऐसे थिरकती हैं जैसे कीबोर्ड से इन का पुराना नाता हो. आज के युवा व किशोर मोबाइल या लैपटॉप पर कुछ सर्च या टाइप कर रहे होते हैं तो पलक झपकते ही ये इसे पूरी तरह से अपनी कमांड में ले लेते हैं लेकिन यह भी सच है कि इस पीढ़ी के बच्चे ज्यादा तनाव में रहते हैं. अकसर छोटी छोटी बातों से ये लोग तनाव में आ जाते हैं.

सिक्स सैकंड्स की स्टेट ऑफ द हार्ट रिपोर्ट 2024, जोकि दुनिया का सब से बड़ी भावनात्मक बुद्धिमत्ता पूर्ण है, को तैयार करने के लिए 129 देशों से डाटा लिया गया.

इस में पाया गया कि जेनरेशन जेड में भावनात्मक बुद्धिमत्ता के सभी 8 कौशलों में 2019 से 2023 तक महत्त्वपूर्ण गिरावट आई है. विशेष रूप से जेन जेड में बर्नआउट बढ़ा है, जो व्यक्तिगत बुद्धि की कमी (भावनाओं का प्रबंध न कर पाना) और पारस्परिक बुद्धि की कमी (टीमवर्क और संवाद में कठिनाई) से जुड़ा है. इस का कारण डिजिटल वातावरण, सोशल मीडिया का अधिक उपयोग और पारंपरिक सामाजिक कौशलों का अभाव है.

हौवर्ड गार्डनर ने अपने बहुबुद्धि सिद्धांत में 8 प्रकार की बुद्धि बताई हैं जिन में भाषाई बुद्धि, तार्किक बुद्धि, स्थानिक बुद्धि, शारीरिक गतिज बुद्धि, संगीतात्मक बुद्धि, पारस्परिक बुद्धि यानी दूसरों की भावनाओं व प्रेरणाओं को समझने की क्षमता, अंत: वैयक्तिक बुद्धि यानी अपनी भावनाओं, उद्देश्यों और इच्छाओं को समझने की क्षमता आदि शामिल हैं.

जनरेशन जेड में पारस्परिक बुद्धि – दूसरों की भावनाओं, प्रेरणाओं को समझने की क्षमता तथा अंत: वैयक्तिक बुद्धि- अपनी भावनाओं, उद्देश्यों और इच्छाओं को समझने की क्षमता में कमी पाई गई है.

तनावग्रस्त और चिंतित पीढ़ी

जेनरेशन जेड वाले दुनियाभर में डिप्रेशन और चिंता का सामना कर रहे हैं. मिलेनियल्स की तुलना में जेन जी काफी उदास जनरेशन है. कई स्टडी में बताया गया है कि जेन जी युवा काफी तनाव में रहते हैं.

भारत की सब से बड़ी बीमा कंपनियों में से एक आईसीआईसीआई लोम्बार्ड की एक स्टडी में पता चला है कि जनरेशन जेड और मिलेनियल्स वाले भारतीयों के पिछली पीढ़ियों के मुकाबले ज्यादा तनाव व चिंता ग्रस्त होने का खतरा है.

जनरेशन जेड युवाओं की ऑनलाइन बातचीत में समय बिताने की मजबूरी उन के समाजीकरण की प्रक्रिया को कमजोर कर रही है. माता पिता के पास उन के लिए पर्याप्त समय नहीं है जिस से उन में सामाजिक और पारिवारिक अलगाव पैदा हो रहे हैं.

साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार 70 फीसदी से अधिक जनरेशन जेड के किशोरों ने बताया कि वे अपने माता पिता के साथ खुल कर बात नहीं कर पाते क्योंकि माता पिता या तो काम में व्यस्त रहते हैं या फोन पर समय बिताते हैं. इस का जेनरेशन जेड के सेल्फ कॉन्सेप्ट पर भी असर पड़ा है, क्योंकि समाजीकरण व्यक्ति को सामाजिक दुनिया में एकीकृत करने और उन के स्व अवधारणा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

दूसरी ओर खराब जीवनशैली ने उन की शारीरिक-गतिज बुद्धि, अपने शरीर का उपयोग कर के किसी कार्य को करने की क्षमता, जैसे डांस या खेल को प्रभावित किया है. रात को देर तक जागना, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधि का अभाव उन के दिमाग और शरीर दोनों को प्रभावित कर रहा है.

एक स्टडी के मुताबिक, करीब 77 फीसदी लोगों में तनाव का कम से कम एक लक्षण देखा गया है. हर तीन में एक भारतीय युवा जेन जी, तनाव और घबराहट से जूझ रहा है. इस से यह स्पष्ट है कि युवा वर्ग इन मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से ज्यादा प्रभावित है. रिपोर्ट में और कुछ चिंताजनक रुझन भी उजागर हुए हैं.

जनरेशन जेड और मिलेनियल्स में सहनशक्ति में कमी देखी गई है. ये किसी भी बात पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं, जिस से कई बार गलतफहमी पैदा हो सकती है. इस के अलावा कई बार ये बहुत ज्यादा रक्षात्मक रवैया अपना सकते हैं और असहमत होने पर निष्क्रिय रूप से आक्रामक बन जाते हैं. इन पीढ़ियों वाले सच बात बोलने से नहीं डरते और अपने हक के लिए लड़ना जानते हैं.

दुखी होने के कारण क्या?

जेन जी के दुखी होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सब से बड़ा कारण सोशल मीडिया और स्मार्टफोन है. जेन जी युवा अपना अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं. सोशल मीडिया पर वे रील्स, फोटोज, स्टोरीज, अपना लाइफस्टाइल शो ज्यादा अपलोड करते हैं.

अपलोड करने के बाद वे बार बार चेक करते हैं कि उन्हें कितने लाइक और कमैंट्स मिले, कितने व्यूज हुए और यह सिलसिला घंटों तक चलता है और जब परिणाम उन के मनमुताबिक नहीं आता तब वे निराशा से भर उठते हैं. फिर धीरे धीरे डिप्रेशन और एंग्जायटी के शिकार बनते चले जाते हैं. उन्हें फिर कुछ अच्छा नहीं लगता. उन्हें लगता है कि दूसरे लोगों की जिंदगी उन से ज्यादा बेहतर है. सोशल मीडिया पर वे अपनी तुलना लोगों से कर के दुखी होते हैं कि वे हम से ज्यादा खुश हैं.

दिल्ली की एक किशोरी रिया ने बताया कि उस के माता पिता दोनों कॉर्पोरेट नौकरियों में व्यस्त रहते हैं और वह अपनी समस्याओं को इंस्टाग्राम पर दोस्तों के साथ साझ करती है क्योंकि उसे घर पर सुनने वाला कोई नहीं मिलता.

पहले घरों में किताबें, विश्वकोश और ज्ञान से भरे इनसाइक्लोपीडिया हुआ करते थे. बच्चे किताबों के बीच बड़े होते थे, जिस से उन की जिज्ञासा बढ़ती थी. आज के डिजिटल युग में देखें तो पेरेंट्स ने किताबों को घर से लगभग गायब सा कर दिया है.

आर्थिक और जॉब की भी चिंता

25 साल की मेघना को इस बात का तनाव है कि उस ने अपने कैरियर के लिए बहुत मेहनत की लेकिन उसे लगता है उस की मेहनत के अनुसार उसे परिणाम प्राप्त नहीं हुए. वहीं, उस के कई दोस्त, जो उस से पढ़ने में कम तेज थे, जिंदगी को एंजॉय भी कर रहे हैं और उस से ज्यादा सफल भी हैं.

26 साल के सचिन का कहना है कि उस की कालेज की ज्यादातर पढ़ाई कोरोना महामारी के दौरान हुई. जब सब ठीक होने लगा तो उस की जौब लग गई. अब उसे लगता है कि कार्यस्थल पर बहुत सारे लोग टौक्सिक हैं, जहां वह वर्कलाइफ संतुलन नहीं बना पा रहा है. उसे यह भी लगता है कि हरकोई उस से ज्यादा खुश और अच्छी जिंदगी जी रहा है.

24 वर्षीया स्नेहा, जो कालेज की छात्रा है, कहती है, ‘‘मेरी मां कहती हैं, मेरी उम्र में उन की शादी हो गई थी और बच्चे भी हो गए थे.’’ लेकिन स्नेहा शादी और बच्चे की झंझटों में नहीं उलझना चाहती क्योंकि उस ने अपनी मां को घरगृहस्थी में पिसते देखा है. उसे अपनी जिंदगी ऐसी नहीं बनानी है. इस बात के लिए अपने पेरेंट्स को वह कैसे समझए, उसे यह समझ नहीं आता.

अकसर लोग इस कुंठा में जीते हैं कि जैसा उस ने चाहा था, उसे मिल नहीं पाया, या जो मिला, वह उस के लिए बेहतर नहीं है. इस के अलावा युवा अकसर अपने दोस्तों, रिश्तेदारों या अपने किसी आदर्शों, जैसे नामी शख्सियत, इन्फ्लुएंसरों और बड़े लोगों से अपनी तुलना कर के अपने आप को कम आंकने लगते हैं या दुखी हो जाते हैं, जिस वजह से उन में स्वाभिमान की भावना कम होने लगती है और आत्मसम्मान कमजोर पड़ने लगता है.

स्मार्टफोन ने जितनी सुविधाएं दी हैं उन से कहीं ज्यादा यह डिवाइस जी का जंजाल बन चुका है. भारत से ले कर दुनियाभर में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की वजह से हो रहे नुकसान को ले कर स्टडीज और रिसर्च होती रहती हैं. एक्सपर्ट लगातार फोन और सोशल मीडिया के इस्तेमाल को ले कर अलर्ट करते रहते हैं.

12 अक्टूबर, 2024 को द लैंसेट जर्नल में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिस में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर द्वारा युवाओं के दिमाग और उन की मेंटल हेल्थ पर पड़ रहे बुरे असर को ले कर आगाह किया गया था. भारत में अजीबोगरीब रील्स बना रहे कुछ इन्फ्लुएंसर्स युवाओं के साथ साथ छोटे बच्चों की मेंटल हैल्थ के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं, जिस के चलते युवा न केवल नेगेटिव चीजों की तरफ बढ़ रहे हैं बल्कि उन में सुसाइड टेंडेंसी भी बढ़ रही है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 36 फीसदी से ज्यादा जेन जी युवा लगातार ऑनलाइन रहने के चलते बाहरी या अनजान लोगों के संपर्क में रहते हैं. 11 फीसदी में स्मार्टफोन या सोशल मीडिया का नशा जैसे लक्षण मिल रहे हैं. वहीं, इतने ही जेन जी युवा ऐसे हैं जो अगर सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं या कुछ देर भी अपने फोन से दूर रहते हैं तो उन में मूड ओफ या एंग्जाइटी के लक्षण दिखाई देते हैं.

10 से 24 साल के युवाओं में इलनैस का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है. फोन और सोशल मीडिया की वजह से परिवारों, दोस्तों यहां तक कि खाने की टेबल पर बैठे लोगों में भी कन्वर्सेशन की कमी देखी जा रही है क्योंकि वे सभी एक साथ फोन चलाते हैं.

अमेरिका के न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट मैथ्यू सोलिट कहते हैं कि मोबाइल पर बात करने की आदतों के चलते जेन जी पीढ़ी में फेस टू फेस बातचीत कम हो गई है. अब उन की आदत नहीं रही कि वे परिवार में भी किसी की आंख का इशारा समझ सकें. वे आमतौर पर किसी भी तरह के हावभाव को समझ नहीं पाते हैं. वैसे, इसे भावनाहीन होना तो नहीं कहेंगे लेकिन उन की आंखें हर तरह के भावों से उदासीन होने लगी हैं. ये डिजिटल प्रभाव अगली पीढ़ी ‘जेन-अल्फा’ में भयानक हो सकते हैं.

महामारी का भी असर

फोरेंसिक न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट और मनोविज्ञान प्रोफेसर जूडी, जोकि कैलिफोर्निया के पेप्परडाइन यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं, कहती हैं कि कोरोना महामारी ने भी गहरा असर छोड़ा है. जेनरेशन जेड के कई बच्चों ने एक साल तक हर दिन साथियों के साथ बातचीत करने के अवसर खो दिए थे, जो भावनात्मक सामंजस्य और सामाजिक आत्मविश्वास बनने के लिए जरूरी होते हैं. डा. जूडी के अनुसार, अध्ययनों से पता चला है कि महामारी ने जेन जेड में सामाजिक दूरी की दर को बढ़ा दिया है और उन्हें हर तरह की सामाजिक परिस्थितियों में पहले से अधिक असहजता का अनुभव हुआ है.

घूरती है जनरेशन जेड

जनरेशन जेड का खाली आंखों से देखना दुनियाभर में ‘जेन जी का घूरना’ टैगलाइन से ट्रैंड कर रहा है. सोशल मीडिया में इसे ले कर चर्चा छिड़ गई है कि जेन जी की आंखें हर बात के जवाब में सिर्फ घूरती क्यों हैं? मैथ्यू सोलिट कहते हैं कि डिजिटल पीढ़ी की आमने सामने की मुलाकातों में कमी आई है. कई युवा तो टेक्स्ट या इमोजी के जरिए अपनी बात कहने में ज्यादा सहज होते हैं. यह अगली पीढ़ी के लिए सामाजिक चिंता का एक बड़ा कारण हो सकता है.

जिम्मेदार माता पिता

द्य युवा और किशोर बच्चों में फोन की लत के जिम्मेदार काफी हद तक माता पिता भी हैं. अकसर देखा गया है कि पेरेंट्स अपने बच्चों की जिद पर उन्हें महंगे से महंगा फोन खरीद कर दे देते हैं. वे एक बार यह नहीं सोचते कि क्या सच में बच्चों को फोन की जरूरत है.

द्य माता पिता अपने बच्चों को बिजी करने के लिए फोन पकड़ा देते हैं. बच्चों को स्कूल में फोन ले जाने की मनाही होती है, फिर भी ले कर जाते हैं. सो, माता पिता को यह देखने की जरूरत है कि उन के बच्चे कर क्या रहे हैं. बच्चे देर रात तक फोन पर क्या देखते हैं, यह देखने की जिम्मेदारी माता पिता की ही तो है.

द्य कोलकाता की 22 साल की अंकिता पर उस के परिवार ने शादी के लिए दबाव डाला क्योंकि उन के समाज में इस उम्र तक शादी हो जानी चाहिए. अंकिता का कहना है, ‘‘मैं अपने करियर और जिंदगी पर फोकस करना चाहती हूं जबकि पेरेंट्स शादी के लिए दबाव डाल रहे हैं.’’

द्य पेरेंट्स की यह मानसिकता जेन जेड को अपनी पहचान बनाने से रोकती है, उन्हें परंपराओं के नाम पर ऐसे नियम मानने पड़ते हैं जो आज के समय में प्रासंगिक नहीं हैं.

दिल्ली की 18 वर्षीया नेहा ने बताया कि उस के माता पिता की लगातार तुलना और टॉप रैंक की उम्मीद ने उसे तनावग्रस्त कर दिया.

लखनऊ की 20 वर्षीया प्रिया का कहना है कि उस के माता पिता ने उस के करियर, उस की महत्वाकांक्षाओं, फैशन डिजाइनिंग को खारिज कर दिया, क्योंकि वे लड़कियों के लिए इसे अनुचित मानते थे.

यूएनआईसीईएफ इंडिया 2023 की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि 35 फीसदी युवा अपने माता पिता की रूढ़िगत सोच से परेशान हैं.

इंडियन जर्नल ऑफ सोशल सायकेट्री 2022 में पाया गया कि माता पिता की रूढ़िगत अपेक्षाएं युवाओं में पहचान संकट को बढ़ा रही हैं.

भारत की सच्चाई यह है कि करीब 140 करोड़ की आबादी में 27.2 प्रतिशत 15 साल से 29 साल के युवा हैं. इन में से अधिकांश की स्मार्टफोन तक पहुंच है और उस के माध्यम से बेलगाम सोशल मीडिया तक.

जान जोखिम में डालते हैं

सोशल मीडिया पर रोजाना ऐसे कई वीडियो देखने को मिल जाते हैं जिन में किशोर व युवा अपनी जान जोखिम में डाल कर रील बनाते हैं. कोई ट्रेन की पटरियों के बीच लेट कर कर तो कोई हाईवे पर खतरनाक स्टंट कर के खुद को हीरो साबित करने पर तुला है, लेकिन कई बार इस से दूसरों की जान भी आफत में आ जाती है.

भारत में कई ऐसे चर्चित मामलों को उदाहरण के रूप में बताया गया है जिन में युवाओं व किशोरों की सोशल मीडिया की वजह से खौफनाक मौत हो चुकी है. कई युवा इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया पर लाइव खुदकुशी कर के दिखाते हैं, क्योंकि किसी का प्यार में दिल टूट गया होता है तो कोई कम फॉलोअर्स और व्यूज के कारण दुखी होते हैं तो वहीं कोई जिंदगी से निराश हो चुका होता है. सो, वे खुद की मौत का लाइव वीडियो बना कर अपनी जान दे देते हैं.

सरकार कितनी जिम्मेदार?

भारत में जेनरेशन जेड में सोशल मीडिया के बढ़ते चलन के लिए केवल सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. यह एक बहुआयामी सामाजिक-तकनीकी परिवर्तन है लेकिन सरकार की नीतियां अप्रत्यक्ष रूप से इसे प्रभावित कर सकती हैं.

सोशल मीडिया के लोकप्रिय होने के मुख्य कारण इंटरनेट और स्मार्टफोन का व्यापक उपयोग, युवा पीढ़ी की डिजिटल साक्षरता और संचार व मनोरंजन की प्राथमिकता में बदलाव हैं. सरकार पर सोशल मीडिया के उपयोग को विनियमित करने और इस के नकारात्मक प्रभावों को कम करने की जिम्मेदारी है, न कि इस के प्रसार के लिए.

टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (टीआरएआई) के मुताबिक, भारत में इंटरनेट कनेक्शन के साथ स्मार्टफोन की संख्या 100 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है. शहरी इलाकों में स्मार्टफोन का घनत्व आबादी के मुकाबले 128 फीसदी ज्यादा है तो ग्रामीण भारत में फरवरी 2024 तक यह 58 फीसदी तक पहुंच चुका था. Gen Z Special

Hindi Social Story: गुमनाम है कोई – एक अमर रिश्ता – गुरु और शिष्या का

Hindi Social Story: नीलू ने सुमन मैम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारा था। वे उसके लिए एक आदर्श, परोपकारी रूप थीं। उन्हीं मैम को भिखारिन के लिबास में देखकर वह सन्न रह गई थी।

“पक्का ही ये तो मैम ही हैं!” नीलू ने एक बार फिर उन्हें गौर से देखा।

उसे याद आया कि जब उसने 12वीं में टॉप किया था, तब वह मैम से मिलने उनके ऑफिस में गई थी। वैसे, मैम बहुत कड़क स्वभाव की और अनुशासनप्रिय थीं, इसलिए हर कोई उनसे ऐसे ही नहीं मिल सकता था। लेकिन वह चूँकि स्कूल की होशियार छात्राओं में शामिल थी और मैम उसे मार्गदर्शन देती रहती थीं, इसलिए उसने उनसे मिलने का निश्चय किया।

बाहर चपरासी बैठा रहता था।

“क्या है?”

“मुझे मैम से मिलना है।”

“अरे, मैम स्टूडेंट्स से नहीं मिलतीं, तुम इतना भी नहीं जानती?” — उसने बेरुखी से कहा।

“हाँ, लेकिन मुझे उन्हें धन्यवाद बोलना है। मैंने कक्षा 12वीं की परीक्षा पास कर ली है और अब स्कूल से विदा ले रही हूँ।”

“तो बहुत सारी छात्राओं ने 12वीं पास की है, क्या मैम सब से मिलेंगी?”

मुझे समझ में आ गया था कि यह मुझे मैम के ऑफिस के अंदर नहीं जाने देगा, इसलिए मैंने बाहर से ही आवाज लगा दी थी —

“मैम, मैं नीलू हूँ, मुझसे मिलिए।”

मेरे आवाज लगाने पर चपरासी हड़बड़ा गया था।

“ओके, अंदर आ जाओ।”

जैसे ही मैम ने अंदर आने को कहा, मैं बेधड़क ऑफिस का दरवाजा खोलकर अंदर चली गई।

मैम ने आसमानी रंग की साड़ी पहनी हुई थी, बालों का जूड़ा बनाया हुआ था, जिसके एक कोने में सफेद पारिजात का फूल लगा था। वैसे तो मैम का रंग सांवला ही था, पर वे बहुत खूबसूरत लगती थीं। एक बड़ी सी टेबल थी, जिसके एक ओर करीने से फाइलें सजी हुई थीं और सामने कुछ कागज़ रखे थे जिन्हें मैम पढ़ रही थीं। इसी टेबल पर उनकी नेमप्लेट रखी थी —

“सुमन।”

वे केवल इतना ही नाम लिखती थीं — न नाम के आगे ‘सुश्री’ और न नाम के बाद उपनाम।

मेरे ऑफिस के अंदर प्रवेश करते ही उन्होंने अपनी आँखों पर लगा चश्मा उतारकर गले में लटका लिया। उनके चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई।

“मेरे स्कूल की होनहार छात्रा नीलू, यस!”

“जी मैम,” कहकर मैं उनके पैर छूने के लिए आगे बढ़ी, लेकिन उन्होंने मुझे गले से लगा लिया —

“अरे, हमारे यहाँ बेटियों को गले से लगाकर रखा जाता है। तुम भी मेरी बेटी ही तो हो।”

उनका स्नेहभरा स्पर्श पाकर मुझे बहुत अच्छा लगा, मातृत्व का भाव महसूस हुआ। उन्होंने अपनी टेबल की दराज खोलकर मिठाई निकाली —

“ये लो, मीठा खाओ।”

उन्होंने पूरे स्नेह से मुझे मीठा खिलाया और मेरी पीठ पर हाथ फेरा,

“अभी तुम्हारे जीवन के बहुत सारे इम्तिहान बाकी हैं। तुम मेरी स्टूडेंट हो, मुझे उम्मीद है कि तुम हर इम्तिहान में टॉप करती रहोगी। गुडलक!”

मैम के ऑफिस से बाहर निकलते समय मैं यही सोच रही थी कि मैम तो इतनी सरल और सहज हैं, फिर वे कड़क मैडम की छवि क्यों बनाए रखती हैं।

मैं भी उन्हें इसी रूप में ही जानती रही हूँ। इस स्कूल में मेरा एडमिशन कक्षा एक में हुआ था, यानी मैं यहाँ बारह सालों से पढ़ रही थी और मैम भी स्कूल में पहले क्लास टीचर रहीं, फिर यहीं प्रिंसिपल बन गईं।

स्कूल में उनका अनुशासन बहुत प्रसिद्ध था। इसलिए हर अभिभावक चाहता था कि उसकी बच्ची का एडमिशन इसी स्कूल में हो। वे पढ़ाई पर पूरा ध्यान देती थीं — कोई भी छात्रा या शिक्षक लापरवाही नहीं कर सकता था। क्लास विधिवत लगती, और वे खुद भी दिनभर पूरे स्कूल का निरीक्षण करती रहतीं। कोई शिक्षक अनुपस्थित होता, तो वे उसकी क्लास में जाकर पढ़ाने लगतीं। हर विषय वे सहजता से पढ़ा लेती थीं।

वे छात्राओं से प्यार भी बहुत करतीं और उनकी मदद भी करती रहतीं।

“सुनो प्रिया, तुम शाम को मेरे घर आ जाना। मुझे लगता है कि तुम्हें गणित पढ़ने में दिक्कत हो रही है।”

उनकी आवाज भले ही कड़क होती, पर उसमें सामने वाले के प्रति चिंता झलकती।

वे अपने घर पर ऐसे सभी छात्राओं को पढ़ातीं, पर कोई शुल्क नहीं लेतीं।

“अरे, तुम मेरी बेटी हो — तुम्हें पढ़ाने का शुल्क लेंगे क्या?”

वे सभी को चाय-नाश्ता भी करातीं।

उनके घर में एक बेटा और एक बेटी थी। वे दोनों उनके स्कूल में नहीं पढ़ते थे। उनका एडमिशन उन्होंने जानबूझकर दूसरे स्कूल में कराया था। अपने स्कूल जाने से पहले वे दोनों को उनके स्कूल छोड़ने जातीं, फिर अपने स्कूल आतीं। इस चक्कर में उन्हें अपने घर से जल्दी निकलना पड़ता, पर शाम को वे उन्हें भी पढ़ाती थीं।

वे अपने दोनों बच्चों को गोद में बिठा लेतीं और उनके सिर पर हाथ फेरते हुए पूरे लाड़ से पढ़ाती रहतीं।

कक्षा 12वीं पास करने के बाद उनके दोनों बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चले गए थे। अब वे अपने घर में अकेली पड़ गई थीं। उनके पति के बारे में कोई कुछ नहीं जानता था और न ही उन्होंने कभी इस पर बात की।

नीलू ने एक बार फिर देखा — ये तो वाकई मैम ही हैं, पर यहाँ कैसे और इस हाल में!

वह तो स्कूल से निकलने के बाद मैम से मिली ही नहीं थी, इसलिए उसे उनकी बाकी ज़िंदगी के बारे में कुछ पता नहीं था। उसका ट्रांसफर इस शहर में कुछ ही दिनों पहले हुआ था।

अपनी आदत के अनुसार जॉइनिंग लेकर पूरे शहर का चक्कर लगाने और शहर के मिज़ाज को समझने के लिए वह निकली थी। उसके साथ अफसरों की पूरी टीम थी।

वह यहाँ पहली बार डीएम बनकर आई थी, इसलिए उसके मन में उत्साह भी था। रेलवे स्टेशन की ओर उसकी गाड़ियाँ निकल पड़ी थीं।

अपनी कार की खिड़की से झाँकते हुए उसने मैम को फटी साड़ी और गंदे से कंबल में ओढ़े भिखारियों की लाइन में बैठे देखा। उसने अपनी गाड़ी रुकवा ली।

सारे अधिकारी अपनी-अपनी गाड़ियों से बाहर निकल आए, पर वह अपनी गाड़ी में बैठी अभी भी मैम की ओर ही देख रही थी।

चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ चुकी थीं। हमेशा खिला रहने वाला उनका चेहरा अब उदासी के बोझ से दबा हुआ था। पर बालों का जूड़ा अब भी वैसा ही बना था जैसा मैम तब बनाती थीं — बस, अब उनके बालों में सफेदी आ चुकी थी।

नीलू को बाहर बैठे भिखारियों की ओर देखते हुए उसके साथ आए अफसर घबरा गए। पुलिस अफसरों को लग रहा था कि यहाँ बैठे भिखारियों की वजह से उन्हें डाँट पड़ने वाली है। सो, वे हड़बड़ी में भिखारियों को भगाने की कोशिश करने लगे।

एक पुलिस अधिकारी ने अपने हाथ में डंडा थाम लिया था। जैसे ही नीलू की निगाह उस अधिकारी पर गई, वह बिफर पड़ी। गुस्से में गाड़ी का गेट खोलकर बाहर निकल आई।

“शट अप! क्या बदतमीज़ी है?”

नीलू ने भिखारियों को मारने के लिए उठे हाथ को जोर से पकड़ लिया था।

पुलिस अफसर घबरा गया —

“वो… मैम… वो…”

“आई डोंट लाइक इट, यू कैन गो!”

उसके हाथ से छीना डंडा नीलू ने गुस्से में नीचे फेंक दिया।

“सॉरी मैम,” पुलिस अधिकारी को समझ में नहीं आ रहा था कि उससे गलती क्या हो गई है। समझ में तो साथ चल रहे दूसरे अधिकारियों को भी नहीं आ रहा था।

पुलिस वालों के चिल्लाने की आवाज़ और डंडा मारने की हरकत से भयभीत होकर वहाँ बैठे भिखारी भागने लगे। लेकिन वह बैठी रही — जिसे नीलू अपनी मैम समझ रही थी।

एकाएक वह उठी और उसने एक पुलिस वाले का हाथ पकड़ लिया —

“हाउ डेयर यू!”

उसने गुस्से के साथ पुलिस वाले की ओर देखा।

पुलिस वाला चौंक गया। उसने तो उम्मीद भी नहीं की थी कि कोई भिखारिन उससे अंग्रेज़ी में बात करेगी।

“चल हट यहाँ से, बड़ी अंग्रेज़ी बोलने वाली आई है!”

पुलिस वाले के पास धैर्य कहाँ होता है — आम आदमी उसके लिए आम ही होता है, फिर वह तो भिखारिन थी।

“यू शट अप! बोलने की तमीज़ नहीं है तुम्हें?”

अबकी बार वह जोर से दहाड़ी। उसकी चिल्लाने की आवाज़, चारों ओर उठ रहे शोर के बावजूद, सबको सुनाई दे गई थी।

नीलू को भी आवाज़ सुनाई दे चुकी थी — “यह तो मैम की ही आवाज़ है!”

अब नीलू को पूरा यकीन हो गया कि वह भिखारिन उसकी टीचर ही हैं।

जिस पुलिस वाले को उसने जोर से डांटा था, वह कुछ देर तक शांत रहा, फिर उसे एहसास हुआ कि एक भिखारिन ने उसकी बेइज़्जती कर दी है। अब उसका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुँचा। उसने अपने हाथ में रखी लाठी को घुमा दिया।

इससे पहले कि उसकी लाठी भिखारिन के शरीर को छूती, नीलू ने उसे अपने हाथों से रोक लिया।

पुलिस वाला सकपका गया। डीएम उसकी ओर ख़ूंखार निगाहों से देख रही थीं।

“नालायक! तुम्हें वर्दी ऐसे ही अत्याचार करने के लिए दी जाती है क्या?”

चारों ओर बिखरे अधिकारी अब वहाँ सिमट आए थे।

“सॉरी मैम!” — एसपी ने माफी माँगी।

यह डीएम नई आई थीं, इसलिए किसी को भी उनके स्वभाव का अंदाज़ा नहीं था। अधिकारी अकसर अपने बड़े अधिकारी के रुख़ के अनुसार अपनी कार्यशैली बदलते रहते हैं।

एसपी ने ‘सॉरी’ बोला, पर डीएम का गुस्सा शांत नहीं हुआ —

“ये कौन है? इसे मेरे ऑफिस में पेश करो!”

वे गुस्से के कारण ज़्यादा कुछ बोल नहीं पा रही थीं।

वैसे भी, नीलू एक संवेदनशील अधिकारी थी। उसे गरीबों पर अत्याचार होते देखना कभी अच्छा नहीं लगता था।

इससे पहले, ट्रेनिंग के दौरान जब वह एक शहर में एसडीएम के पद पर नियुक्त थी, तब उसने एक पटवारी को नौकरी से निलंबित कर बर्खास्त करने की सिफारिश कर दी थी — सिर्फ इसलिए कि उसने एक बेसहारा महिला की ज़मीन हड़पकर दूसरे के नाम पर दर्ज कर दी थी।

वह बुजुर्ग महिला रोती-बिलखती उसके ऑफिस पहुँची थी। उसकी सिसकियाँ सुनकर नीलू खुद अपने ऑफिस से बाहर आई।

“क्या हुआ, अम्मा?” — नीलू अकसर बुजुर्ग महिलाओं को ‘अम्मा’ कहकर बुलाती थी।

अम्मा कहने में आत्मीयता झलकती थी। उसने प्यार से बुजुर्ग महिला के सिर पर हाथ फेरा, चपरासी से पानी मंगवाया और उसे पिलाया। अधिकारी का स्नेह पाकर उस बुजुर्ग महिला की आँखों से आँसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

नीलू ने सारी बातें सुनीं, फिर उस पटवारी को बुलाकर तहसीलदार को एक घंटे में जांच रिपोर्ट देने का आदेश दिया। तब तक नीलू ने उस बुजुर्ग महिला को अपने चेंबर में बैठा रखा।

बाहर से खाना मंगवाकर उसे खिलाया —

“अम्मा, आप तो अब तब ही जाएँगी जब आपकी ज़मीन आपको मिल जाएगी।”

“हां बिटिया, मेरे पास और कुछ है ही नहीं। इस ज़मीन का चारा काटकर ही अपने खाने की व्यवस्था कर लेती हूँ।”

उसकी आवाज़ के दर्द ने नीलू को अंदर तक हिला दिया।

नीलू ने तत्काल जनपद पंचायत के सीईओ को उस महिला की ‘निराश्रित पेंशन योजना’ और ‘गरीबी रेखा राशन कार्ड’ बनाने का आदेश दिया।

दोपहर तक तहसीलदार ने पटवारी की बेईमानी की पूरी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। साथ ही, नई बही बनवाकर एसडीएम के सामने रख दी। कार्यपालन अधिकारी भी निराश्रित पेंशन और नीला राशन कार्ड लेकर आ गया।

वह महिला भावविभोर होकर नीलू के पैरों पर गिर पड़ी। नीलू ने उसे उठाकर गले से लगा लिया —

“अम्मा, मैं तो आपकी ही बेटी हूँ न! मुझे स्कूल में मेरी मैम ने यही सिखाया था — यह मेरी ड्यूटी है, मैंने कोई एहसान नहीं किया।”

नीलू के गले लगकर वह बुजुर्ग महिला बहुत देर तक रोती रही। नीलू उसके सिर पर हाथ फेरती रही। उसे बहुत अच्छा लग रहा था — मानो उसने आज अपने गुरु का ऋण चुका दिया हो।

तहसीलदार ने अपनी गाड़ी में बैठाकर उस महिला को उसके गाँव तक छोड़ा और गाँव वालों को समझा दिया कि अगर उन्होंने उस महिला के साथ कोई हरकत की तो “हमारी मैडम खाल खींच लेंगी।”

जब उसका कलेक्टर बनने का ट्रांसफर ऑर्डर आया, तो नीलू उस बुजुर्ग महिला के गाँव गई थी।

“अम्मा, अब मैं दूसरे शहर जा रही हूँ। आपका आशीर्वाद बना रहे।”

उन्होंने नीलू को अपनी आगोश में भर लिया। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे — मानो वे अपनी बिटिया को विदा कर रही हों।

यहाँ घटी घटना ने नीलू को गुस्से से भर दिया था। वह तो वैसे भी किसी पर अत्याचार देख नहीं सकती थी — और फिर जिस महिला से वह पुलिस वाला बदतमीज़ी कर रहा था, वे उसकी मैम थीं!

नीलू के गुस्से को वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने महसूस कर लिया था।

वह भिखारिन भी भारी गुस्से के साथ अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह बोलती जा रही थी। वहाँ उपस्थित सभी लोग हैरान थे — एक भिखारिन इतनी अकड़ के साथ अंग्रेज़ी कैसे बोल सकती है!

नीलू ने एक बार फिर मैम की ओर देखा। वे भी उसी की ओर देख रही थीं।

अचानक नीलू दौड़ी और उस भिखारिन को अपनी आगोश में भर लिया —

“मैम! मैम!”

बहुत देर से दबे नीलू के आँसू अब बह निकले थे।

भिखारिन चौंक गई। उसे कतई उम्मीद नहीं थी कि कोई अफसर उसे यूँ गले लगा लेगी। उसने नीलू की आवाज़ सुनी — वह पहचानने की कोशिश कर रही थी।

भिखारिन सकपका गई —

“हू आर यू?”

अबकी बार उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था।

“मैम, मैं… मुझे देखो तो!”

भिखारिन ने ध्यान से उसकी ओर देखा, पर पहचान नहीं पाई।

पहचानती भी कैसे? नीलू अब बड़ी हो चुकी थी। उन्होंने तो उसे हमेशा स्कूल की यूनिफ़ॉर्म में ही देखा था — दो चोटियाँ, गले तक सलीके से लिपटा दुपट्टा।

वह बहुत छोटी थी तब। एक बार वह केवल एक चोटी बनाकर स्कूल आई थी।

प्रार्थना के समय ही मैम ने आवाज़ लगाई —

“नीलू, मेरे ऑफिस में आओ।”

सभी छात्राओं को लगा, आज नीलू की क्लास लगने वाली है, क्योंकि मैम बहुत गुस्से में हैं।

वह भी डरते-डरते उनके ऑफिस पहुँची।

मैम ने उसे देखा — गुस्से में ही थीं।

“इधर आओ।”

वह डरते हुए उनके पास जा खड़ी हुई।

मैम ने अपनी टेबल की दराज़ खोली तो नीलू और डर गई। उसे लगा कि मैम अब रूल निकालेंगी और हथेली पर मारेंगी।

“सॉरी, मुझसे गलती हो गई मैम, मुझे माफ़ कर दो।” — उसके आँसू निकल आए।

“क्या गलती हुई है, जानती हो, या ऐसे ही माफ़ी मांग रही हो?”

नीलू सचमुच नहीं जानती थी कि गलती क्या है।

“नहीं, पर कोई न कोई गलती तो अवश्य हुई है। इस बार माफ़ कर दो, फिर कभी गलती नहीं करूँगी।”

डर के मारे नीलू ने आँखें बंद कर लीं।

“ओके, तुम इस स्कूल की टॉपर छात्रा हो, इसलिए इस बार माफ़ कर रही हूँ, पर अगली बार नहीं करूंगी, समझीं?”

“जी मैम।”

नीलू ने आँखें खोलीं — मैम उसकी चोटी खोल रही थीं। उन्होंने कंघी से उसके बाल सँवारे और दो चोटियाँ बना दीं।

“स्कूल में दो चोटी करके ही आने का नियम है, अगली बार ध्यान रखना।”

नीलू को अब समझ में आया कि उसकी गलती क्या थी।

“जी मैम।”

एकाएक मैम ने उसे गले से लगा लिया —

“तुम मेरी बेटी जैसी हो।”

और हँस दीं।

नीलू उस भिखारिन को देख रही थी और भिखारिन नीलू को।

आसपास खड़े किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा है।

चारों ओर एक अजीब सी निस्तब्धता छा गई थी।

“नो, नो… मैं नहीं जानती तुम्हें।”

भिखारिन अपने दिमाग पर ज़ोर डाल रही थी।

नीलू मुस्कराई —

“मैम, मैं… नीलू! याद कीजिए, आपके स्कूल की टॉपर — जिसे आप अपनी बिटिया कहती थीं।”

कुछ देर तक शांति रही, फिर भिखारिन बोली —

“यस… ओह! माई डॉटर, नीलू!”

अब उसके चेहरे पर अपनापन झलकने लगा।

“जी मैम।”

नीलू के चेहरे पर संतोष के भाव थे।

दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को देखती रहीं, फिर भिखारिन दौड़कर नीलू के गले लग गई —

“माई डॉटर!”

उसकी आँखों से आँसुओं की बाढ़ आ गई।

उसे गले लगाकर नीलू की आँखें भी बरसने लगीं।

भीड़ में मौजूद कई लोगों की आँखें भी नम थीं।

नीलू मैम को अपने साथ गाड़ी में बिठाकर अपने बंगले पर ले आई।

वैसे तो उसके मन में यह जानने की उत्सुकता थी कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थिति आ गई कि मैम को भीख मांगनी पड़ी —

पर नीलू ने पहले उन्हें पूरा आराम करने दिया।

नहाकर, तैयार होकर सुमन पहले जैसी लगने लगीं। उनके चेहरे का तेज़ लौट आया।

नीलू ने उन्हें आसमानी रंग की वही साड़ी दी — जिसमें वे हमेशा बहुत सुंदर लगती थीं।

सुमन ने पहले जैसी ही जूड़ा बनाकर बालों में कंघी की, चश्मा लगाया — अब उन्हें देखकर कोई यकीन नहीं कर सकता था कि वे वही भिखारिन हैं।

रात के भोजन पर दोनों साथ बैठीं।

नीलू वैसे भी अकेली रहती थी — उसके पति दूसरे जिले में कलेक्टर थे, और माता-पिता कभी-कभी ही आते थे।

“अब कैसी हैं, मैम आप?” — नीलू ने बातचीत शुरू की।

उसने अपने यहाँ तक पहुँचने की पूरी कहानी सुनाई —

कैसे उसने जीवन में सुमन मैम के आदर्शों को अपनाया और पहले ही प्रयास में UPSC परीक्षा पास की।

सुमन भावुक हो गईं। उनकी आँखों से आँसू झरने लगे।

अब बारी सुमन की थी —

“रिटायरमेंट के समय तक दोनों बच्चे विदेश जा चुके थे। वे वहीं बस गए।

मैं जिस गर्ल्स स्कूल में थी, उसके बुज़ुर्ग मालिक का निधन हो गया। उनके बेटे सौरभ ने स्कूल संभाल लिया।

धीरे-धीरे मुझे पता चला कि वह स्कूल की कुछ लड़कियों को अपने घर बुलाता है। फिर वे लड़कियाँ गायब हो जातीं।

मैंने सारी कड़ियाँ जोड़नी शुरू कीं और महसूस किया कि सौरभ ही इसमें शामिल है।

मैंने उसे समझाया —

‘देखो सौरभ, तुम मेरे बेटे जैसे हो। तुम्हारे पिता की बहुत प्रतिष्ठा रही है, इसलिए मैं चाहती हूँ कि तुम यह गलत काम छोड़ दो।’

सौरभ घबरा गया। बोला — ‘ऐसी कोई बात नहीं, मैडम। आप सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दें।’

मैंने कहा — ‘मैं सब जानती हूँ। अगर तुमने यह काम नहीं छोड़ा, तो मैं पुलिस में जाऊँगी।’

उसने धमकी दी — ‘आप अपने काम से काम रखें, वरना…’

और वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

मैंने उसी समय इस्तीफ़ा दे दिया।

सौरभ डर गया कि कहीं मैं सब बता न दूँ। उसने अपने दोस्त एसपी के साथ मिलकर मुझ पर ही आरोप लगवा दिए —

‘प्राचार्या लड़कियों की ट्रैफिकिंग करती हैं!’

जब यह ख़बर फैली, मैं रातों-रात शहर छोड़कर चली आई।

तब से भिखारिन का वेश धारण कर यहाँ रह रही थी।”

नीलू स्तब्ध थी।

उसे याद आया — उसी शहर का नया एसपी उसका क्लासमेट है।

उसने तुरंत पीए से कहा, “एसपी मयंक को कॉल मिलाओ।”

“हैलो मयंक, मैं नीलू — डीएम बोल रही हूँ।”

“ओह! नीलू जी! आप तो हमेशा होशियार थीं। कैसी हैं?”

“ठीक हूँ। पर एक ज़रूरी बात करनी है।”

नीलू ने सारी बातें विस्तार से बता दीं।

मयंक बोला — “हाँ, उस स्कूल में गर्ल्स ट्रैफिकिंग की शिकायत है। पुलिस जांच कर रही है। पर आपकी मैम मुख्य आरोपी हैं।”

“वो मेरे साथ हैं — मेरे बंगले पर। तुम उनकी बातों के आधार पर जांच करो।”

“ओके। लेकिन मैम को कहीं मत जाने देना जब तक जांच पूरी न हो जाए।”

“वे यहीं रहेंगी।”

तीन दिन बाद मयंक का फ़ोन आया —

“नीलू मैम, आपकी मैम की सारी बातें सही निकलीं। सौरभ को गिरफ्तार कर लिया गया है।”

यह सुनकर नीलू ने जब मैम को बताया कि वे आरोपमुक्त हो चुकी हैं, तो सुमन की आँखों से आँसू झरने लगे।

“बिटिया, तूने आज अपना गुरु-ऋण चुका दिया। वरना मैं लाख चिल्लाती रहती, कोई मेरी बात नहीं सुनता।”

नीलू ने उन्हें गले से लगा लिया —

“आपने ही तो मुझे सिखाया था सच्चाई और न्याय के रास्ते पर चलना, मैम। अब आप कहीं नहीं जाएँगी — हमेशा मेरे साथ रहेंगी।”

दोनों माँ-बेटी की तरह एक-दूसरे की बाँहों में थीं —

आँसू थे, भावनाएँ थीं, और एक अमर रिश्ता — गुरु और शिष्या का। Hindi Social Story.

Hindi Family Story: पलाश के फूल- क्यों टूटा सुमेर और सरोज का रिश्ता?

Hindi Family Story: ट्रेन की खिडक़ी से बाहर देखतेदेखते मन विभोर सा हो रहा था. पूरा जंगल पलाश के फूलों से लदालदा चंपई रंग में रंगा हुआ लग रहा था. बचपन में जब भी होली नजदीक आती थी तो सब बड़ों को कहते सुनते थे कि जंगल से पलाश के फूल लाएंगे और उन से होली के रंग तैयार करेंगे. सच में ये रंग हैं ही इतने रंगीले, देख कर मन को खूब लुभाते हैं और सारी फिजा को रंगीन कर देते हैं.

मेरे जीवन में भी यही रंग समाया है जब से सुमेर की प्रीत मन में जगी है. मन तो नहीं था उन्हें छोड क़र आने को और वे भी तो कैसे तड़प कर बोले थे- ‘मत जाओ सरोज, मैं इतने दिन तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा.’

पर पगफेरी के लिए भी न आती तो लोग क्या कहते और मम्मीपापा का भी तो मन करता होगा बिटिया से मिलने का. ये रिश्ते भी कैसे पल में बदल जाते हैं कि जिस से कभी जानपहचान भी न थी, आज वही मन का मीत है, सब से प्यारा है, दिल का सहारा है. मुझे तो पहली ही नजर में सुमेर भा गए थे. देखनेदिखाने की रस्मों के बीच कब दिल मेरे पहलू से निकल कर उन का बन बैठा, पता ही नहीं चला. प्रीत ने अनछुए मन को ऐसा छुआ कि अब कुछ नहीं भाता था. सारे वक्त खोईखाई सी रहने लगी थी. मन उन्हीं की यादों में खोया रहता.

पिछले साल यही तो दिन थे जब होली नजदीक आ रही थी. सगाई के बंधन में बंधे हम दोनों पूरी तरह एकदूसरे की प्रीत के रंग से सराबोर थे. सुमेर रोज शाम को औफिस से लौटते ही मुझे फोन करते और लगभग एकडेढ़ घंटे तक हम दोनों एकदूसरे की बातों में खो जाते. उस रोज शाम होते ही मुझे उन की याद सताने लगी पर उन का फोन नहीं आया और जब मैं ने फोन किया तो कवरेज क्षेत्र से बाहर बता रहा था. मन की बेचैनी और अधीरता बढ़ती जा रही थी और कुछ आशंकाएं भी होने लगीं. जो हमें सब से प्यारा होता है उस के बारे में अकसर हम डरने लगते हैं, अपनी जान से ज्यादा उस की फिक्र करने लगते हैं. मन घबरा कर उलटासीधा सोच रहा था.

‘न जाने क्या हुआ होगा, फोन क्यों नहीं लग रहा, कहीं कुछ…नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मैं ने अपने इस विचार को झटक दिया और फिर से कोशिश की पर अब भी उन का फोन नहीं लगा. जब बेचैनीहद से ज्यादा बढ़ गई तो मैं ने उस के परिवार की सब से करीबी दोस्त यानी उस की भाभी और मेरी प्यारी जेठानी को फोन करना उचित जाना क्योंकि वही हमारी हमउम्र और राजदार थीं. उन के बारे में सुमेर अकसर बताया करता था. सो, मैं ने उन्हें फोन किया.

मेरी आवाज सुनकर ही वे मेरी परेशानी भांप गईं और हंसती हुई बोलीं, ‘क्या हुआ देवरानी जी, आज देवरजी से बात नहीं हुई क्या जो इतनी बेचैन हो?’

मैं ने सकपकाते हुए कहा, ‘भाभी, सुमेर का फोन नहीं लग रहा, वे ठीक तो हैं न?’

‘वह बिलकुल ठीक हैं, सरोज. असल में सुमेर अपने दोस्तों के साथ पार्टी में गया है. उस ने मुझ से कहा था तुम्हें बता दूं पर मैं भूल गई, सौरी.’

इतना सुनते ही मेरी आंखों से गंगाजमुना बहने लगी. बहुत गुस्सा आ रहा था सुमेर पर. मेरी भावनाओं की कोई कद्र ही नहीं उसे. जब अभी यह हाल है, आगे क्या होगा. दिल के भीतर कुछ टूट कर बिखरता सा लगा. उस शाम मैं ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था. रोरो कर सूजी हुई आंखें ले कर मम्मी के पास गई तो मम्मी हैरान रह गईं.

‘क्या हुआ, तेरी आंखें क्यों सूजी हुई हैं, रोर्ई है क्या?’ मम्मी ने बड़े प्यार से मुझे अपने पास बैठाया और सिर पर हाथ फेरती हुई बोलीं, ‘क्या बात है, हमेशा खिलखिलाती रहने वाली हमारी गुडिय़ा रानी आज इतनी उदास कैसे है?’

‘मम्मी, आप यह सगाई तोड़ दो, मैं सुमेर से शादी नहीं करूंगी,’ मैं ने आंसू पोंछते हुए कहा.

‘सगाई तोड़ दो? क्या कह रही है तू, होश में तो है न?’

‘हां मां, मैं पूरे होश में हूं. मैं उस से शादी नहीं करूंगी. उसे मेरी भावनाओं की कद्र नहीं. आज संडे था, मैं ने सारे दिन उस के फोन का इंतजार किया और शाम को खुद फोन किया तो पता चला वह अपने दोस्तों के साथ पार्टी में गया है. यहां मैं इंतजार कर रही हूं और वह है कि… उसे अभी से मेरी परवा नहीं, तो शादी के बाद क्या होगा, बोलो मम्मी?’ यह कह कर मैं ने अपना सिर मम्मी की गोद में रख दिया.

मम्मी मेरे बालों को हौलेहौले सहलाने लगीं, बोलीं, ‘सुन बिटिया, ये रिश्ते बहुत नाजुक होते हैं, बिलकुल रेशम की डोरी की तरह, जरा से खिंचाव से टूट जाते हैं. हम स्त्रियां धैर्य और सहनशीलता की पर्याय मानी जाती हैं. क्या हुआ अगर आज सुमेर दोस्तों के साथ पार्टी में चला गया, रोज तो वह तुझ से बात करता है न. वह तुझ से प्यार करता है पर उस की भी अपनी जिंदगी है. और फिर, अभी शादी नहीं हुई, तो वह आजाद भी है. तू देखना, शादी के बाद वह कैसे अपनी जिम्मेदारी निभाता है.’

मां ने मुझे बहुत समझाया. पर मैं अपनी जिद पर अड़ी रही. किसी के समझाने का मुझ पर असर नहीं हो रहा था. सुमेर पार्टी से देररात घर आया और आते ही सुमन भाभी ने उन्हें मेरे फोन के बारे में बताया. पर उसे मेरी नाराजगी का अंदाजा नहीं था, इसलिए उस ने इस बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया और सो गया. फिर सुबह उठते ही औफिस चला गया. औफिस की व्यस्तता में उसे ध्यान नहीं आया. शाम को औफिस से लौटने के बाद उस ने मुझे फोन लगाया. पर मैं ने नहीं उठाया.

उधर फोन बज रहा था और इधर मेरी आंखें बरस रही थीं. जब बहुत देर तक फोन बजता रहा तो मैं ने गुस्से में फोन स्विचऔफ कर दिया. सुबह देखा, तो व्हाट्सऐप पर उस के मैसेज थे.

‘हाय सरोज, कैसी हो? भाभी ने तुम्हारे फोन के बारे में बताया था पर पार्टी से आने में देर हो गई थी, इसलिए सो गया. औफिस में बिजी था, इसलिए शाम को तुम्हें फोन किया. पर तुम ने फोन नहीं उठाया.’

‘क्या हुआ? नाराज हो मुझ से?’

मैं ने मैसेज पढ़ कर फोन पटक दिया. शाम को मम्मी के फोन पर उस का फोन आया तो मम्मी ने अपना फोन मुझे पकड़ा दिया. वह हलोहलो कर रहा था पर मैं ने बात नहीं की. वह कह रहा था- ‘सरोज कैसी हो? मैं जानता हूं तुम फोन पर हो. कुछ तो बोलो, तुम्हारी मीठी आवाज सुने हुए पूरे 2 दिन हो गए. इतने से कुसूर की इतनी बड़ी सजा क्यों दे रही हो मुझे? मुझ से बात करो, प्लीज.’

पर मैं ने बिना कुछ बोले ही मम्मी का फोन उन्हें लौटा दिया और अपनी सहेली के घर चली गई. उस के बाद कुछ दिनों तक उस का फोन नहीं आया और मैं ने भी नहीं किया. मां झुंझला कर कहती रहीं, ‘पता नहीं क्या जिद पकड़ी है इस लडक़ी ने. अरे, इतना अच्छा लडक़ा है, मना रहा था. लेकिन यह मानी नहीं. बस, अकड़ती जा रही है.’

‘मम्मी, मैं आप की बेटी हूं और आप हो कि उसी की तरफदारी करती रहती हो?’ मैं तुनक कर कहा तो मम्मी डांटने लगीं.

‘जो सही है उसी का पक्ष ले रही हूं मैं. इतना भी क्या अकड़ ले कर बैठी है. कल तेरी जेठानी का फोन आया था, कह रही थी, सुमेर आजकल बहुत उदास रहने लगा है.’

यह सुन कर अच्छा महसूस हुआ कि मेरी नाराजगी का असर हो रहा है. पर फिर भी अकड़ी रही.

होली वाले दिन सुबह आंख खुली और बिस्तर से उतरने के लिए पैर नीचे रखे, तो हैरान रह गई. पलाश के ढेर सारे फूल जमीन पर बिछे हुए थे. मैं उन पर पैर रख कर चलने लगी तो देखा ये फूलों की बिछावन गार्डन तक जा रही थी और गार्डन में लगे झूले तक थी और झूला भी फूलों से सजा हुआ था. मैं आश्चर्य से भरी आंखें मलती फूलों पर चलतीचलती झूले पर जा कर बैठी ही थी कि किसी ने पीछे से आ कर मेरे गालों पर गुलाल मल दिया. पीछे मुड़ कर देखा, सुमेर और उस के दोस्त खड़े थे और मुझे देख कर मुसकरा रहे थे.

एक दोस्त बोला, ‘भाभीजी, सुना है आप हम से और हमारे दोस्त से बहुत नाराज हैं?’

मैं ने सकपकाते हुए कहा, ‘नहीं तो.’ और मैं मुसकरा दी.

‘अब नानुकुर मत कीजिए, भाभी. आप को पता भी है, हमारे दोस्त की क्या हालत हो गई है? बेचारा देवदास बन कर रह गया है, देखिए,’ दूसरा दोस्त बोला.

मैं ने सुमेर की ओर देखा तो वह नाटक में मुंह लटका कर खड़ा था. यह देख कर मुझे जोर से हंसी आ गई.

तीसरा दोस्त बोला, ‘अरे भाभीजी, आप को मनाने के लिए हम सब ने मिल कर कितनी मेहनत की है, पता भी है आप को? कल जंगल जा कर जितने भी पलाश के फूल मिले, तोड़ लाए और आज जल्दी उठ कर आप के लिए फूलों की डगर बनाई. अब तो मान जाइए.’

मैं जरा सी मुसकराई तो जैसे उन सब को ग्रीन सिग्नल मिल गया और सब ने मिल कर मुझे रंग डाला. मैं ने भी अपनी पिचकारी से उन सब को खूब भिगोया. हमारे प्रेम की शुरुआत की होली सच में यादगार बन गई. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: सरकार बदलने की तैयारी

Hindi Social Story: बहुत सालों से लोगों को पता ही नहीं था कि यहां कोई म्युनिसिपैलिटी भी है. अगर कोई बीमारी आती भी, तो कुछ दिनों बाद खुद ही खत्म हो जाती. धूल और गंदगी को हवा उड़ा ले जाती. पानी से लबालब नालियां खुद ही कुछ दिनों बाद खाली हो जाती थीं. म्युनिसिपैलिटी को ज्यादा कुछ करने की जरूरत ही न पड़ती. लेकिन 15 अगस्त आने से पहले ही अचानक दृश्य बदलने लगा.

देश आजादी का 75वां अमृत महोत्सव मना रहा था. देशभर में हिमालय से कन्याकुमारी तक लोगों में जोश था. म्युनिसिपल कौर्पोरेशन भी उत्साह से भर उठा. सारी सड़कों पर झाड़ू लगाई जाने लगी, नालियों का कचरा साफ होने लगा और हर महल्ले में घरघर झंडे लगाए जाने लगे.

लोग झंडे ले कर गातेबजाते धूमधाम से आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे थे. म्युनिसिपैलिटी के चेयरमैन बालकनी में खड़े हो कर संतोषपूर्वक कह रहे थे, ‘इस महान अवसर पर हम ने भी काफीकुछ कर लिया.’

कमेटी के जो सदस्य उन के साथ थे उन में से एकदो ने उन की आंखों में आंसू भी देखे. उन्होंने सेना के जवानों को कंबल बेच कर बड़े पैसे बनाए थे और बाद में उन पैसों का उपयोग चेयरमैन का पद प्राप्त करने में किया था.

मैं चेयरमैन के दफ्तर अकसर आताजाता रहता था. 15 अगस्त बीत चुका था. हफ्तेभर बाद जब झंडे वगैरह उतार लिए गए तो मैं उन से मिलने गया. लेकिन उन के चेहरे पर बहुत ज्यादा खुशी दिखाई नहीं दे रही थी. इतना उदास देख मैं उन से पूछ पड़ा, “क्या बात है, चेयरमैन साहब?”

कहने लगे, “मुझे ऐसा लगता है कि हम ने अभी बहुतकुछ नहीं किया है.”

“किस के लिए?”

“इस महत्त्वपूर्ण दिन की महिमा और बढ़ाने के लिए.” इतना कह कर वे कुछ देर तक सोचते रहे, फिर कहने लगे, “जो भी हो, मैं इस महोत्सव के लिए कुछ और काम करूंगा.”

इस के लिए उन्होंने कमेटी की विशेष मीटिंग बुलवाई, काफी देर तक भाषणबाजी चलती रही. उस के बाद सब ने फैसला किया कि आजादी के इस अमृत महोत्सव पर शहर की सभी सड़कों और पार्को का नाम बदल कर महापुरुषों के नाम पर रख दिए जाएंगे.

इस महत्त्वपूर्ण दिन की महिमा बढ़ाने के लिए काम भी जल्द ही शुरू हो गए. सभी सड़कों और पार्कों के नाम बदल दिए गए. लेकिन 10 दिनों में ही हालात और बिगड़ गए. नए नामों के कारण यह बताना मुश्किल हो गया कि कौन सी जगह कहां है. ईस्ट रोड, मालगोदाम रोड, विनायक स्ट्रीट, मार्केट रोड, ग्रीन पार्क, रोहनिया चौराहा आदि सभी नाम खत्म हो गए. इन के स्थान पर नए नाम आ गए.

नए नामों ने लोगों की परेशानियां और बढ़ा दीं. दोचार जगहों के एक ही नाम रख दिए गए. वो सभी मंत्रियों, उपमंत्रियों व काउंसिल सदस्यों के नाम पर रखे गए. इस से लोगों के सामने एक नई परेशानी शुरू हो गई. चिट्ठियां जहां पहुंचनी चाहिए, वहां न पहुंच कर पता नहीं कहांकहां पहुंच जाती थीं. लोग ठीक से बता नहीं पाते थे कि वे कहां रह रहे हैं. पुराने परिचित नामों के बदल जाने से शहर जंगल में बदल गया. लेकिन चेयरमैन साहब बहुत खुश थे क्योंकि इसी बहाने उन को करोड़ों का बजट मिल गया था.

शिवम फेरे वाला दिनभर सब्जी बेचता और शाम को सिनेमा रोड पर खोमचे लगाता. गली, महल्ले के नाम बदल जाने से उसे भी परेशानी होने लगी थी. सुबह जब मुरगा बाग देता तब वह उठ बैठता. कभीकभी वह 3 बजे ही उठ जाता. उसे लगता कि सवेरा हो गया. उसी समय से दिनभर के लिए काम पर लग जाया करता. सवेरे ही मंडी जा कर हरीहरी सब्जियां ले आता. इस महंगाई के दौर में हर सब्जी महंगी हो गई थी. पैट्रोलडीजल महंगा होने के कारण सब्जियों के दाम में आग लगी हुई थी. महंगी सब्जी कौन खरीदता. गरीब लोगों के बस की तो बात ही नहीं थी. पालक जो पहले 2 रुपए किलो बिकती थी वह आज 40 रुपए किलो हो गई थी. आलू पहले जो 5 रुपए किलो थी, आज 25 रुपए किलो हो गया. इस महंगाई ने गरीबों की तो कमर तोड़ दी थी.

शिवम दिनभर गलीगली ठेले पर सब्जी बेचने के बाद शाम को उस जगह पहुंचता था जहां वह रोज अपना खोमचा लगाया करता था. उस के ग्राहक उसे बहुत चाहते भी थे. वे कहते, ‘ऐसी कोई जगह नहीं है जहां 3 रुपए में चाय और 10 रुपए में भरपेट भोजन मिल जाता था. सभी टूटेफूटे पुरानी बैंच पर ही बैठ कर खाना खाने लगते थे. उस के ग्राहकों को पूरा अधिकार था कि वे पहले चीजों को देख ले फिर ले कर खाएं. उसे पता रहता था कि कौन सा गाड़ी वाला कितनी चपाती ले रहा है. बस व ट्रक वाले भी वहीं आ कर अपना पेट भरते थे. उस के ज्यादातर ग्राहक फुटपाथ के लोग थे. बूट पौलिश करने वाला सोनू कभीकभी तो मुफ्त में ही दोचार चपाती खा लेता था. लेकिन शिवम उस को कुछ न बोलता. उस के मन में बच्चों के लिए विशेष प्यार था.

सोनू की उम्र 12 साल की थी. वह थैली में ब्रश और पौलिश लटकाए लोगों के गंदे जूतों की तरफ देख कर बोलता, ‘बूट पौलिश करा लो साहब, एकदम साइनिंग ला देंगे.’

कभीकभी लोग बूट पौलिश तो करा लेते थे लेकिन पैसे देते समय किचकिच करने लगते थे. बच्चा समझ कर पैसे कम देते थे. ज्यादा विरोध करने पर हाथ भी उठा लेते थे. जब कोई मोटा आसामी बूट पौलिश कराने के बाद पैसे देने में इधरउधर करता तो उस का मन होता कि चिल्ला कर कहे, ‘इस गरीब को जरा ज्यादा दे देने से तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा.’ लेकिन वह कर ही क्या सकता था. गुंडाराज जो था.

एक अंधा भिखारी, होटल के सामने दिनभर भीख मांगता. शाम को उस के पास आता और दिनभर में इकट्ठी रकम में से कुछ उसे दे कर खाना खा लेता. वह लकड़ी बेचने वाली औरत, लकड़ी के बंडल बेच कर कुछ पैसे में ही भरपेट भोजन कर लेती. उस क्षेत्र के सभी छोटेबड़े लोग, जो मामूली कामधंधे कर के अपनी रोजीरोटी चलाते थे, शाम को उसी के पास आ कर बैठते और भरपूर खाना खा कर जाते. उस को यह चिंता नहीं थी कि कौन पैसा दे रहा है या नहीं. इसी में वह खुश रहता था कि उस के कारण सब का पेट भर जाता था. गरीबों का आशीर्वाद ही उस के लिए सब से बड़ा धन था.

रात को जब वह घर पहुंचता, उस की बीवी उस के हाथ से खाली बरतन ले लेती. कमीज में हाथ डाल कर थैली निकाल लेती और तुरंत पैसे गिनने लगती. बातबात में लड़ने लगती और कहती, ‘तुम सुबह 500 रुपए का सामान लाए थे उस में से बस इतनी ही आमदनी हुई.’ वह कुछ न बोलता. जानता था कि यह आमदनी नहीं बल्कि इस में लोगों का आशीर्वाद छिपा है. फिर थकामांदा चुपचाप फुटपाथ पर सो जाता.

नींद में अकसर उसे पुलिस वालों के सपने आते. उस जगह से खोमचा हटाने के लिए उसे परेशान करते. कभीकभी तो सपने में ही गुस्से में वह बड़बड़ाने लगता, ‘आप लोग गरीबों को जीने नहीं देंगे.’

एक दिन उस का सपना सही में सच हो गया. हैल्थ औफिसर उस के पास आया और कहने लगा, ‘ये चीजें तुम शीशे में ढक कर रखा करो वरना मैं किसी दिन यह सब फिकवा दूंगा.’ जब वह उन की जेब का पेट भर देता, तो अधिकारी का गुस्सा शांत हो जाता.

शिवम वास्तव में सफाई के किसी भी नियम का पालन नहीं करता था. फिर भी उस के ग्राहक उन चीज़ों को खाते थे और कुछ भी नहीं होता. बल्कि उस की दुकान पर और भी ज्यादा भीड़ जुटने लगी थी. इस तरह शिवम की जिंदगी बड़े आराम से कट रही थी.

अचानक एक दिन उस के जीवन में एक नया मोड़ आया. जब वह अपना सामान ले कर आया तो कुछ लोग शोर मचा रहे थे. लोग उस से कहने लगे कि इस जगह को खाली कर दो. ऐसा तो उस के साथ हर दूसरेतीसरे दिन होता था. इसलिए उस ने लोगों की बातों को अनसुनी कर दिया. तभी थोड़ी देर में बुलडोजर आया और झुग्गीझोंपड़ियों को तहसनहस कर के चला गया. उस की दुनिया उजड़ गई थी. वही पुलिस वाले उसे डंडे मार कर भगा रहे थे जिस की वह जेब भरता था.

तभी दौड़ता हुआ बूट पौलिश वाला लड़का उस के पास आया और कहने लगा, ‘उधर देखो, पता नहीं किस बात के लिए लोग चिल्ला रहे हैं. कुछ लोग कह रहे थे कि ये लोग वोट मांगने के लिए परचे बांट रहे थे, तभी किसी ने एक पत्थर फेंक दिया. वह पत्थर चिनगारी का काम कर गया. फिर लोग एकदूसरे को मारनेपीटने लगे और मुर्दाबाद…मुर्दाबाद… के नारे लगाने लगे.

सोडा वाटर की बोतलें एकदूसरे के ऊपर फेंकी जाने लगीं. कुछ आदमी बाजार की दुकानों में घुस गए और दुकानें बंद करवाने लगे. घंटेभर में बाजार लड़ाई का मैदान बन गया. थोड़ी देर में पुलिस भी आ गई. लेकिन इस से हालत और भी बिगड़ गए.

इसी बीच तीसरा पक्ष भी खड़ा हो गया. जो दुकानें बंद नहीं हुई थीं उन दुकानों को लूट लिया गया. पुलिस खड़ी तमाशा देखती रही. पास का सिनेमाघर भी एकदम खाली हो गया. कुछ लोगों हाथों में चाकू ले कर दौड़दौड़ कर हमला करने लगे. फिर पुलिस लाठियां और टियर गैस का इस्तेमाल करने लगी.

उस के बाद गोलियां भी चलने लगीं. हजारों लोग घायल हो गए और बीसों लोग मारे गए. लेकिन दूसरे दिन अखबार में केवल 5 लोग के घायल होने और एक आदमी के ही मरने की खबर छपी थी. विपक्ष सरकार से सीबीआई जांच कराने की मांग करने लगा. क्या पुलिस का गोलियां चलाना जायज था, हादसा रोकने के लिए पुलिस ने क्या बंदोबस्त किए थे, तरहतरह की बहस न्यूज चैनलों पर होने लगीं.

शिवम का धंधा बंद हो चुका था. अब वह सब्जी भी नहीं बेच सकता था क्योंकि शहर में कर्फ्यू लग गया था. उस का 5 साल का छोटा बेटा पूछ रहा था, ‘पापा, ये सब क्या हो रहा है?’

उस का जवाब था, ‘बेटे, सरकार बदलने की तैयारी हो रही.’ Hindi Social Story.

Hindi Social Story: छोटी बातें- इंसान कभी अपना बचपन छोड़ना नहीं चाहता

Hindi Social Story: मेरी एक पोती है. कुछ दिन हुए उस का जन्मदिन मनाया गया था. इस तरह वह अब 6 वर्ष से ज्यादा उम्र की हो गई है. उस की और मेरी बहुत छनती है. मेरे भीतर जो एक छोटा सा लड़का छिपा हुआ है वह उस के साथ बहुत खेलती है. उस के भीतर जो एक प्रौढ़ दिमाग है उस के साथ मैं वादविवाद कर सकता हूं. जब वह हमारे पास होती है तो उस का सारा संसार इस घर तक ही सीमित हो कर रह जाता है. जब वह चली जाती है तो फिर फोन पर बड़ी संक्षिप्त बात करती है. खुद कभी फोन नहीं करती. हम करें तो छोटी सी बात और फिर ‘बाय’ कह कर फोन रख देती है.

आज अचानक उस का फोन आ गया. मैं ने पूछा तो बोली, ‘‘बस, यूं ही फोन कर दिया.’’

‘‘क्या तुम स्कूल नहीं गईं?’’

‘‘नहीं, आज छुट्टी थी.’’

‘‘तो फिर हमारे पास आ जाओ. लेने आ जाऊं?’’

‘‘नहीं. मम्मी घर पर नहीं हैं. उन की छुट्टी नहीं.’’

‘‘तो उन को फोन पर बता दो या मैं उन को फोन कर देता हूं.’’

‘‘नहीं, मैं आना नहीं चाहती.’’

‘‘तो क्या कर रही हो?’’

‘‘वह जो कापी आप ने दी थी ना, उस पर लिख रही हूं.’’

‘‘कौन सी कापी?’’

‘‘वही स्क्रैप बुक जिस में हर सफे पर एक जैसे आदमी का नाम लिखना होता है, जो मुझे सब से ज्यादा अच्छा लगता हो.’’

‘‘तो लिख लिया?’’

‘‘सिर्फ 3 नाम लिखे हैं. सब से पहले सफे पर आप का. दूसरे  सफे पर मम्मी का, तीसरे पर नानी का…बस.’’

मैं ने सोचा, बाप के नाम का क्या हुआ, दादी के नाम का क्या हुआ? वह उसे इतना प्यार करती है. बेचारी को बहुत बुरा लगेगा. किंतु यह तो दिल की बात है. मेरी पोती की सूची, स्वयं उस के द्वारा तैयार की गई थी. किसी ने उसे कुछ बताया व सिखाया नहीं था. फिर मैं ने कहा, ‘‘उस के साथ उन लोगों की तसवीरें भी लगा देना.’’

‘‘आप के पास अपनी लेटेस्ट तसवीर है?’’

मैं ने कल ही तसवीर खिंचवाई थी. अच्छी नहीं आई थी. अब मेरी तसवीरें उतनी अच्छी नहीं आतीं जितनी जवानी के दिनों में आती थीं. न जाने आजकल के कैमरों को क्या हो गया है.

‘‘हां, है,’’ मैं ने उत्तर दिया. फिर मैं ने सलाह दी, ‘‘उन लोगों के जन्म की तारीख भी लिखना.’’

‘‘उन को अपने जन्म की तारीख कैसे याद होगी?’’

‘‘सब को याद होती है.’’

‘‘नहीं, जब वह पैदा हुए थे तो बहुत छोटे थे न, छोटे बच्चों को तो अपने जन्म की तारीख का पता नहीं होता.’’

‘‘बाद में लोग बता देते हैं.’’

‘‘आप कब पैदा हुए?’’

‘‘23 मार्च 1933’’

‘‘अरे, इतना पहले? तब तो आप पुराने जमाने के हुए ना?’’

‘‘हां,’’ मैं ने कहा.

मुझे एक धक्का सा लगा. वह मुझे बूढ़ा कह रही थी बल्कि उस से भी ज्यादा प्राचीन काल का मानस, मानो मुझे किसी पुरातत्त्ववेत्ता ने कहीं से खोज निकाला हो.

‘‘तो फिर आप को नए जमाने की बातें कैसे मालूम हैं?’’

‘‘तुम्हारे द्वारा. तुम जो नए जमाने की हो. मुझे तुम से सब कुछ मालूम हो जाता है.’’

‘‘इसीलिए आप मेरे मित्र बनते हो?’’ उस ने बड़े गर्व से कहा.

‘‘हां, इसीलिए.’’

उसे मैं ने यह नहीं बताया कि वह मुझे हर मुलाकात में नया जीवन देती है. मुझे जीवित रखती है. यह बातें शायद उस के लिए ज्यादा गाढ़ी, ज्यादा दार्शनिक हो जातीं. तत्त्व ज्ञान और दर्शन भी आयु के अनुसार उचित शब्दों में समझाना चाहिए.

इस के पश्चात मैं चाहता था कि उस से कहूं कि वह जिन लोगों को प्यार करती है और जिन के नाम उस ने अपनी स्क्रैप बुक में लिखे हैं उन की उन खूबियों के बारे में लिखे जिन के कारण वह उसे अच्छे लगते हैं ताकि वह उस के मनोरंजन का विषय बन सके और बाद में फिर जब उस के अपने बच्चे हों तो उन की मानसिक वृद्धि और विस्तार का साधन बन सके.

इतने में उस ने सवाल किया, ‘‘आप के मरने की तारीख क्या होगी?’’

‘‘वह तो मुझे मालूम नहीं. मौत तो किसी समय भी हो सकती है. इसी समय और देर से भी. वह तो बाद में लिखी जा सकती है.’’

‘‘आप में से पहले कौन जाएगा, आप या दादी?’’

‘‘शायद मैं. परंतु कुछ कहा नहीं जा सकता.’’

‘‘आप क्यों?’’

‘‘क्योंकि साधारण- तया मर्द लोग पहले मरते हैं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि वह उम्र में बड़े होते हैं.’’

‘‘परंतु अनिश से तो मैं बड़ी हूं.’’

मैं हंस पड़ा. अनिश उस का चचेरा भाई है. उस से 2 वर्ष छोटा और आजकल दोनों की बड़ी गहरी दोस्ती है.

‘‘तो क्या तुम अनिश से शादी करोगी?’’

मैं ने पूछा. ‘‘हां,’’ उस ने ऐसे अंदाज में कहा मानो फैसला हो चुका है और हमें मालूम होना चाहिए था.

‘‘परंतु अभी तो तुम बहुत छोटी हो. शादी तो बड़े हो कर होती है. हो सकता है कि तुम्हें बाद में कोई और लड़का अच्छा लगने लगे.’’

‘‘अच्छा,’’ उस ने हठ नहीं किया. वह कभी हठ नहीं करती. उचित तर्क हो तो उसे मान लेती है.

‘‘अच्छा, तो लोग मरते क्यों हैं?’’

इस प्रश्न का उत्तर तो अभी तक कोई नहीं दे सका है, बल्कि अनगिनत लोगों ने जरूरत से ज्यादा उत्तर देने की कोशिश की है और वह भी मरने से पहले. जिस बात का निजी अनुभव न हो उस के बारे में मुझे कुछ कहना पसंद नहीं. वह तो ‘सिद्धांत’ बन जाता है और मैं ‘सिद्धांतों’ से बच कर रहता हूं. लेकिन यह भी तो एक ‘सिद्धांत’ है.

बहरहाल, इस समय सवाल मेरी पोती के सवाल के जवाब का था और उस का कोई संतोषजनक उत्तर मेरे पास नहीं था, फिर भी मैं उसे निराश नहीं कर सकता था. मुझे एक आसान सा उत्तर सूझा. मैं ने कहा, ‘‘क्योंकि लोग बीमार हो जाते हैं.’’

‘‘बीमार तो मैं भी हुई थी, पिछले महीने.’’

‘‘नहीं, ऐसीवैसी बीमारी नहीं. बहुत गंभीर किस्म की बीमारी.’’

‘‘इस का मतलब कि बीमार नहीं होना चाहिए.’’

‘‘हां.’’

‘‘तो आप भी बीमार न होना.’’

‘‘कोशिश तो यही करता हूं.’’

‘‘आप भी बीमार न होना और मैं भी बीमार नहीं होऊंगी.’’

‘‘ठीक है.’’

‘‘तो फिर अगले इतवार को आप से मिलूंगी. आप की तसवीर भी ले लूंगी. हां, दादी से भी कहना कि वह भी बीमार न हों, नहीं तो खाना कौन खिलाएगा.’’

‘‘अच्छा, तो मैं दादी तक तुम्हारा संदेश पहुंचा दूंगा.’’

‘‘अच्छा, बाय.’’

अब मुझे अगले हफ्ते तक जिंदा रहना है ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी की यह कड़ी कायम रह सके. Hindi Social Story.

Hindi Family Story: कैसा डॉक्टर- जब मेरी एक सच्चे डॉक्टर से हुई मलाकात

Hindi Family Story: एक परीक्षा में विशेष जानकारी के प्रश्नपत्र में एक प्रश्न था, ‘किन लोगों के मित्र कम होते हैं?’ एक चतुर परीक्षार्थी ने उत्तर लिखा, ‘डाक्टर और पुलिस, क्योंकि डाक्टर से मिलने पर फीस देनी पड़ती है और पुलिस की न दोस्ती अच्छी, न दुश्मनी अच्छी.’ इस सचाई का कटु अनुभव मुझे तब हुआ जब मेरे एक साधारण आपरेशन के बाद डाक्टर ने कहा कि हर माह में 6 बार हालत की रिपोर्ट देते रहें. सो आज पहली बार मैं रिपोर्ट दिखाने गया तो नर्स की पोशाक पहने चेंबर के द्वार पर बैठी परिचारिका ने 300 रुपए मांगे. मैं ने उसे समझाया, ‘‘डाक्टर बाबू ने खाली हालत की रिपोर्ट देने के लिए बुलाया है. तब फीस क्यों?

मुझे अपनी जांच तो करानी नहीं.’’ परिचारिका ने कहा, ‘‘उन से मिलने की फीस 300 रुपए है.’’ ‘‘उन के दर्शन की भी?’’ ‘‘यस.’’ ‘‘गले में आला लटका कर ऐसी ठगी?’’ परिचारिका की भौंहें तन गईं. बोली, ‘‘क्या कहा?’’ मैं ने कहा, ‘‘पता नहीं. चमड़े की जबान फिसल गई. सो न जाने कम्बख्त क्या बक गई मैडम. यह लीजिए 300 रुपए.’’ कई दिन से मेरे सिर में दर्द हो रहा था. एक मित्र ने कहा, ‘‘डा. दास को दिखाओ. नामी डाक्टर हैं. ठीक कर देंगे.’’ मैं उन से मिला, तो वे गुस्साए दिखे. शायद पत्नी से लड़झगड़ कर आए थे.

मुझे देखते ही भौंहें तान कर पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’ उन के चीख कर पूछने से दर्द और बढ़ गया. कहा, ‘‘कई दिन से सिर में दर्द है, सर.’’ ‘‘अभी तक कहां थे?’’ ‘‘दिन में दफ्तर, रात में घर सर.’’ वह क्रोधित हो उठे. बोले, ‘‘अब तक क्यों नहीं आए?’’ ‘‘तब दर्द नहीं था, सर.’’ उन्होंने बिना मेरी शारीरिक जांच किए पैड पर कुछ लिख कर देते हुए कहा, ‘‘यह जांच करा कर रिपोर्ट ले कर आओ. तब इलाज होगा.’’ पैड पर सब से नीचे लिखा था, ‘सत्यम डायग्नोसिस सेंटर.’ मैं ने अर्ज किया, ‘‘सर, हम ‘स्वास्तिक’ में जांच कराते हैं. वहीं से करवा लाएं?’’ ‘‘नो नो, स्वास्तिक के इंस्ट्रूमेंट 40 साल पुराने हैं. ठीक रिजल्ट नहीं देते.’’ मैं ने स्वास्तिक के मालिक रायजी से दास बाबू की बातें बताईं. उन्होंने कहा, ‘‘यह कमीशन का चक्कर है शर्माजी, हम जांच कराने के एवज में डाक्टरों को 40 प्रतिशत कमीशन देते हैं.

‘सत्यम’ नया है. वह 60 प्रतिशत दे रहा है.’’ फिर उन्होंने डाक्टर का लिखा परचा देखा. ई सी जी, चेस्ट का एक्स रे, सोनोग्राफी, रक्त परीक्षण. उन्होंने पूछा, ‘‘आखिर आप को हुआ क्या है?’’ ‘‘सिर दर्द. कई दिन से भोग रहा हूं.’’ ‘‘और उस डाक्टर से इलाज कराने गए थे, जो खुद सिर दर्द का इलाज मेरे मित्र होम्योपैथिक डाक्टर सुरेका से करा रहा है.’’ मैं चौंका, ‘‘एलोपैथिक डाक्टर खुद का इलाज होम्योपैथिक डाक्टर से. आश्चर्य है.’’ 2 माह बाद- सर्दी का मौसम था. ठंड लग गई थी. खांसी और कफ बढ़ गया था. डा. मनोहर का बहुत नाम सुना था. उन्होंने आले से छाती और पीठ की जांच की. फिर चिंतित मुद्रा में पूछा, ‘‘आप के आगेपीछे कौन है?’’ मैं ने पीछे मुड़ कर देखते हुए कहा, ‘‘आगे तो आप हैं सर, पीछे रोगी बैठे हैं.’’ डा. मनोहर को गुस्सा आ गया. मुझे मुक्का दिखा कर मेज पर मारते हुए कहा, ‘‘मजाक करते हैं.’’

‘‘कतई नहीं सर, आप से मजाक? सोचा भी नहीं जा सकता. मजाक साले से किया जाता है? जो मेरे सौभाग्य से 3 हैं. जवाब देने में मुझ से क्या गलती हुई? बताइए?’’ अब उन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. बोले, ‘‘इलाज कराना है तो सहीसही उत्तर दें.’’ ‘‘ठीक है. पूछिए, सर.’’ ‘‘क्या कफ के साथ खून जाता है?’’ ‘‘कतई नहीं.’’ ‘‘क्या हमेशा ज्वर बना रहता है?’’ ‘‘जी नहीं.’’ ‘‘क्या खांसी आते 3 सप्ताह हो गए?’’ ‘‘जी, हां. 2 माह.’’ ‘‘समझ में आ गया.’’ ‘‘क्या, सर?’’ ‘‘3 सप्ताह से अधिक खांसी, टी.बी. का लक्षण.’’ ‘‘मगर हमारे एक मित्र को पैदायशी खांसी है जो भलाचंगा है. उस ने कफ की जांच कराई. कुछ खराबी नहीं निकली.’’ ‘‘जांच गलत हुई होगी. उस की छोड़ें, अपनी सोचें. इलाज कराना है?’’ मैं डर गया, लगा यह डाक्टर मुझे टी.बी. का मरीज मान रहा है. भागो, मैं ने उन्हें छोटी उंगली दिखा कर कहा, ‘‘सर, हिस्सू.’’ वह समझ गए. बोले, ‘‘बाहर, बाईं ओर.’’ बाहर निकल कर मैं सांप की तरह ऐसा सरपट भागा, जैसे कोई खदेड़ रहा हो. रास्ते में मेरे एक परिचित मिल गए. पूछा, ‘‘बेतहाशा क्यों भाग रहे हो?’’ मैं ने कारण बताया. उस ने पूछा, ‘‘अब कहां जा रहे हो?’’ ‘‘डा. दयाल के यहां.

बहुत नाम सुना है उन का.’’ ‘‘भूल कर न जाना. उस ने एक परिचित का दाहिना गुर्दा बेच खाया है.’’ मैं घबराया, ‘‘तब कहां जाऊं?’’ ‘‘वह जो सामने बिना कलई की मैलीकुचैली बिल्ंिडग दिखाई दे रही है वहां डा. ब्रह्म बैठते हैं. छलकपट से दूर. सेवाभावना से इलाज करने वाले.’’ मुझे हंसी आ गई, ‘‘घरभरू डाक्टर और सेवाभावना.’’ मित्र ने समझाया, ‘‘मित्र, सब डाक्टर एक से नहीं होते. कुछ सेवाभावी और उपकारी भी होते हैं, जिन का फर्ज कम खर्च में रोगी को चंगा करना होता है. डा. ब्रह्म उन्हीं में से हैं. हमारे परिवार का इलाज वही करते हैं.’’ डाक्टर ब्रह्म का मकान बनने के बाद शायद उस में आज तक कलई नहीं हुई थी. रोगियों के बैठने की बेंच की टूटी एक टांग की जगह ईंटें लगी हुईं. बुजुर्ग डाक्टर साहब बिना गद्दी वाली काठ की पुरानी कुरसी पर बैठे थे. यह सब देख कर लगा, गलत जगह पर आ गया.

यहां तो मेरे सिवा एक भी रोगी नहीं है. मित्र कहीं डाक्टर से कमीशन तो नहीं लेता? खैर, आ गया हूं तो इन्हें भी आजमा लूं. आले से छाती और पीठ की जांच करने के बाद डाक्टर बाबू ने मुसकरा कर कहा, ‘‘चिंता न करें. मौसम बदलने पर खांसी और कफ का बढ़ना आम बात है. एक सिरप लिखे देता हूं. 5-6 दिन लेने पर ठीक हो जाएंगे.’’ मैं ने पूछा, ‘‘सर, कोई जांच करानी होगी?’’ उन्होंने पूछा, ‘‘पैसे ज्यादा हैं क्या?’’ ‘‘नहीं सर, दूसरे डाक्टर 4-5 टेस्ट जरूर करवाते हैं. चाहे पैर के तलवों में दर्द हो या सिर में.’’ ‘‘हर किसी के इलाज का अपनाअपना तरीका है. मैं जरूरत पड़ने पर ही जांच कराता हूं.’’ मैं फीस के रूप में 100 का नोट देने लगा, तो उन्होंने कहा, ‘‘इतना नहीं, सिर्फ 10 रुपए.’’ मैं चौंका और बोला, ‘‘आजकल नए डाक्टर 100 से कम नहीं लेते. ऊपर से जांच करने वाले सेंटरों और दवा बेचने वालों से कमीशन.

आप जैसे सीनियर डाक्टर तो 300 से ज्यादा ही लेते हैं. जो डाक्टर जितनी ज्यादा फीस लेता है वह उतना ही बड़ा कहलाता है. भले ही उस के इलाज से रोग और बढ़ जाता हो.’’ ‘‘दूसरे क्या करते हैं, मुझे नहीं मालूम. मैं तो अपनी दिवंगत माता के आदेश का पालन कर रहा हूं.’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘कैसा आदेश, सर?’’ ‘‘तब मैं 12 साल का था. पिताजी गुजर गए थे. उन के शोक में माताजी सख्त बीमार पड़ गईं. कई डाक्टरों ने इलाज किया. कोई फायदा नहीं हुआ. लोगों ने मशहूर डा. वर्मा को दिखाने को कहा. उन की फीस बहुत ज्यादा थी, जो हम नहीं दे सकते थे. ‘‘मैं उन के पांव पकड़ कर बहुत गिड़गिड़ाया, मगर वह नहीं पसीजे. उस समय वह मुझे डाक्टर नहीं, कसाई लगे.

जब वह फीस लिए बगैर नहीं गए तो मां ने आदेश दिया, ‘बेटा, नानानानी के पास रह कर डाक्टरी पढ़ना और डाक्टर बन जाने के बाद रोगियों से 10 रुपए से ज्यादा फीस कभी न लेना.’ ‘‘बस, मां के उसी आदेश का पालन कर रहा हूं. अकेला हूं. शादी नहीं की. करता तो पत्नी को कष्ट होता. गुजरबसर के साथ रोगियों की सेवा भी हो जाती है. मेरे लिए यही बड़ा संतोष है.’’ उन की बातें सुन कर मेरी आंखें छलछला आईं. सोचने लगा, दुनिया में आज भी श्रवण कुमारों की कमी नहीं है. उन के चरण छू कर मैं ने कहा, ‘‘आप महान हैं सर, मुझे आज पता चला कि आप जैसे सेवाभावी डाक्टर भी हैं.’’ Hindi Family Story.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें