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Delhi Blast: राजधानी में बम ब्लास्ट

Delhi Blast: लाल किले पर किए गए ब्लास्ट से एक बार फिर यह दोहरा दिया गया है कि धर्म के दुकानदार आम लोगों को धर्म की कल्पित कहानियों के सहारे किस तरह मरने-मारने के लिए, आज के साइंस, तकनीक, तर्क, ज्ञान के युग में भी, बहकाने में सफल हैं. इस ब्लास्ट में ब्लास्ट करने वालों ने अपनी जान भी दी और दूसरों की भी ली सिर्फ इसलिए कि उन से कहा गया कि जान से बड़ा धर्म है.

सदियों से धर्म के नाम पर जितना खून बहाया गया उतना जमीन, जोरू और जर के लिए नहीं. असल में, जर, जमीन, जोरू के किस्सों के बहाने अपना उल्लू धर्म ने ही सीधा किया है.

जो जानकारी अब तक मिली है उस के अनुसार अच्छी-भली मेडिकल की पढ़ाई करने वालों को धर्म के ठेकेदारों ने विस्फोटक सामग्री जमा करने को तैयार कर लिया, पैसा भी जमा करवाया और फिर जोखिम ले कर अपने परिवारों को सदा के लिए जेलों में डाल देने वाला काम- जान दे कर जानें ले कर- करवा लिया.

जिस तरह आजकल एक बार फिर दुनियाभर में धर्म का व्यापार बढ़ रहा है और कमजोर युवा धर्म के प्रचारकों के चक्कर में आ जाते हैं, उस से साफ है कि विज्ञान और तकनीक ने जो सुविधाएं पिछले 300-400 सालों में मानव को दीं, उन पर धर्मगुरु पानी फेर देने में सफल हो रहे हैं. जिस दिन दिल्ली के लालकिले के पास बम विस्फोट हुआ उस के अगले दिन पाकिस्तान के इस्लामाबाद में बम विस्फोट हुआ जिसमें भारत का हाथ होना लगभग नामुमकिन है. दिल्ली और इस्लामाबाद दोनों जगह धर्म का नाम ले कर सुसाइड बॉम्बरों ने कहर ढहाया जिन्हें धर्म के नाम पर पट्टी पढ़ाई गई थी.

आज फिर पूरा विश्व धार्मिक विवादों में फंसा है जैसे पहले यूरोप बड़ी लड़ाइयों में फंसा रहता था और हर बार नई तकनीक का इस्तेमाल धर्म की जड़ें गहरी करने के लिए करता रहा है बजाय लोगों को सुख और सुरक्षा देने के.

यह दुनिया के व्यापारियों, उद्योगपतियों और वैज्ञानिकों की खुशी की बात है कि इसी दौरान लोकतंत्र की भावना पैदा हुई जिस में शासक धर्म की दुकानों को चलाने वालों से सत्ता छीन कर देशों का प्रबंध करने वाले बनते चले गए. हालांकि, आज भी आयतुल्लाओं, मौलवियों, पादरियों, पोपों, स्वामियों, गुरुओं की ज्यादा चलती है.

आज का मानव अगर 200-400 या 1,200 साल पहले के मानव से ज्यादा सुखी है, सुरक्षित है, पक्के मकानों में रहता है, स्वस्थ रहता है, आंधी तूफान से बचता है, सर्दी-गरमी से उसे फर्क नहीं पड़ता तो धर्मों के कारण नहीं बल्कि विज्ञान, तकनीक और लोकतंत्र के कारण है. सभी धर्म आज फिर से मानव को पुरातन काल की ओर धकेल रहे हैं.

पाकिस्तान, अफगानिस्तान के सहारे पूरा अरब क्षेत्र भाग कर यूरोप में गए अपने लोगों के बल पर आतंक मचा रहे है, अमेरिका में मागा गुट चर्च के क्रॉस को सिर पर रख कर सरकारी तंत्र को अपनों से हिंसा के लिए तैयार कर रहा है, भारत में धर्म के नाम पर नए धर्म-शहर पनप रहे हैं. पहले के शहरों में नई-नई धर्म की दुकानें खुल रही हैं. जो अपने-अपने भक्तों को दूसरों के खिलाफ खड़ा कर रही हैं. नुकसान आम आदमी का हो रहा है. पैसा तो जा ही रहा है, विवादों में बिना कारण जानें जा रही हैं, बस, धर्म की दुकानें चलती रहें, फलती-फूलती रहें. Delhi Blast.

Home Shifting Guide: नए घर का सफर कैसे बने सुगम?

Home Shifting Guide: घर बदलना हमेशा थोड़ा थकाने वाला होता है, लेकिन सही तैयारी से यह काम बिना तनाव के बहुत आसान हो सकता है. आइए हम आप को बता देते हैं.

रागिनी के पति सिद्धार्थ ने जब से उसे फ़ोन कर के बताया है कि नैनीताल में उन को नया घर मिल गया है और अब शिफ्टिंग की तैयारी शुरू करो, तब से रागिनी खुश तो बहुत है मगर चिंतित भी काफी है. दरअसल नोएडा में अपने सास-ससुर के घर में रहते हुए उस को 22 साल से ज्यादा हो चुके हैं. इन 22 सालों में उस ने घर के लिए बहुतेरी चीजें खरीदीं. सास ने पहले ही घर भर रखा था और रागिनी खुद भी दहेज़ में काफी सामान लाई थी. उस के मायके से आया बहुतेरा सामान तो आज तक उपयोग में नहीं आया. पलंगों के बौक्स में वैसे का वैसा ही धरा है. मगर मार्केट में कोई नई चीज आई नहीं कि खरीद ली गई. सिद्धार्थ को भी खरीदारी का खूब शौक है और उस के दोनों बच्चों को भी आए दिन नई-नई चीजें चाहिए होती थीं.

सासससुर के देहांत के बाद रागिनी के दोनों बेटे पढ़ाई के लिए भले ही बोर्डिंग स्कूल चले गए हैं, मगर उन के कमरे उन के सामान से भरे पड़े हैं. यहां तक कि उन के बचपन के खिलौने तक रागिनी ने संभाल कर रख रखे हैं. अब नैनीताल वाले नए घर में रागिनी क्याक्या ले जाए और क्याक्या छोड़ जाए, समझ में नहीं आ रहा है. जिस भी चीज को छोड़ने का सोचती है उस चीज से जुड़ी यादें ताजा हो जाती हैं, भावनाएं बलवती हो जाती हैं और फिर उस का मूड बदल जाता है.

सिद्धार्थ ने कहा है कि सारा फालतू सामान निकाल कर कबाड़ी वाले को बेच देना मगर रागिनी को कुछ भी फ़ालतू का नहीं लग रहा है. क्या निकाले? सोचा जो साड़ियां कभी नहीं पहनी पहले उन्हें निकाल कर अपनी अलमारी थोड़ी हलकी कर लें, मगर जब साड़ियों का ढेर सामने लग गया तो सोचने लगी, ‘भले ये साड़ियां मैं ने नहीं पहनी या कम पहनी, मगर कामवाली को इतनी महंगी साड़ियां कैसे दे दूं? इस से तो अच्छा नैनीताल पहुंच कर मैं इन के सूट सिलवा लूं. कितनी हैवी साड़ियां हैं और कितनी सुंदर हैं. अम्मा की साड़ियां भी तो कितनी सुंदर हैं. गोटे लगा कर उन के भी हैवी सूट बन सकते हैं. बेटों की शादियां होंगी, रिश्तेदारों के बच्चों की शादियां होंगी तो ये हैवी सूट काम आएंगे. सोच कर रागिनी ने सारी साड़ियां फिर वापस अलमारी में सजा दीं. कबाड़ी को बेचने के लिए वह किचन से कुछ आड़ेतिरछे एलुमिनियम और ताम्बे के बर्तन, प्लास्टिक की बोतलें और जार आदि ही निकाल सकी.

दो हफ्ते बाद जब सिद्धार्थ घर की रजिस्ट्री वगैरा करवा के नैनीताल से लौटे तो उन्होंने रागिनी की बात सुन कर माथा पीट लिया. रागिनी कह रही थी कि सारा सामान नैनीताल ले चलते हैं. कुछ भी ऐसा नहीं है जो फेंका जा सके.

”वो घर इस घर से छोटा है. यह चार ट्रक सामान वहां नहीं अटेगा, आधे से ज्यादा निकालना होगा तब हम वहां शिफ्ट हो सकेंगे.” सिद्धार्थ ने गुस्से में कहा.

”मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है कि क्या निकाल कर फेंक दूं. हर चीज कीमती है. तुम को जो ठीक लगे फेंक दो.” कह कर रागिनी भी गुस्से से उठ कर किचन में चली गई.

आखिर सिद्धार्थ ने ही लिस्ट बनानी शुरू की. जो सामान नया और मजबूत था वह अलग किया. पुराने पलंग, अलमारी, फ्रिज, एयर कंडीशन, कार्पेट जैसा काफी सामान ओएलएक्स पर बेचने के लिए डाला. कुछ की फोटो दोस्तों को भेजीं, यदि उन को कुछ लेना हो तो बताएं. काफी बर्तन और कपड़े कामवाली को और जमादार को दिए. टूटे-फूटे इलेक्ट्रॉनिक्स के सामान से भरे डिब्बों को लोहे के दाम पर बेचा. छत पर लगे तीन दर्जन गमलों और प्लांट्स को सामने वाले पार्क का माली फ्री में ले गया. बच्चों के पुराने कपड़े और खिलौने अनाथाश्रम में भिजवाए. करीब महीने भर की मेहनत के बाद आखिरकार दो ट्रक सामान बचा जो नए घर में शिफ्ट हुआ.

रागिनी और सिद्धार्थ जैसी समस्या अनेक लोगों के सामने आती है. खासतौर पर सरकारी नौकरी करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों के परिवार तो इस समस्या से हर चार-पांच साल में दो-चार होते हैं क्योंकि उन की ट्रांसफरेबल जौब्स होती हैं. घर बदलने पर सामान शिफ्ट करना अकसर जितना आसान लगता है, उतना होता नहीं है. इस दौरान कई तरह की व्यावहारिक और मानसिक परेशानियां सामने आती हैं. अव्वल तो यही समझ में नहीं आता कि क्या ले चलें और क्या छोड़ दें. ऐसे में मानसिक तनाव और अव्यवस्था अपनी चरम पर पहुंच जाती है. पूरे घर का रुटीन बिगड़ जाता है. कई दिन तक घर बिखरा हुआ रहता है. कामकाजी लोगों के लिए तो इस काम के लिए समय निकालना ही मुश्किल हो जाता है. घर बदलना हमेशा थोड़ा थकाने वाला होता है, लेकिन सही तैयारी से यह काम बिना तनाव के बहुत आसान हो सकता है. आइये हम आप को देते हैं बिना तनाव के शिफ्टिंग के लिए बेहतरीन और व्यावहारिक टिप्स –

2-3 हफ्ते पहले से प्लानिंग करें

एक लिस्ट बना लें कि क्या-क्या पैक करना है, किस दिन मूव करना है, किसे कॉल करना है. इस के लिए रोज 20-30 मिनट समय निकालें, तो आखिरी दिन हड़बड़ी नहीं होगी.

गैर-जरूरी सामान पहले अलग करें

शिफ्टिंग के दौरान 20–30% सामान ऐसा मिलता है जिस की भविष्य में जरूरत ही नहीं होती. तो इमोशनल हुए बिना ऐसे सामान को बाहर कर दें.

कमरे-वार पैकिंग करें

सामान की पैकिंग पहले कम इस्तेमाल वाले कमरे से शुरू करें, जैसे स्टोर और गेस्ट रूम से. इस के बाद ड्राइंग रूम और डाइनिंग रूम का सामान पैक करें. पैकिंग करते समय हर बॉक्स पर छोटा-छोटा लिखें कि यह किस कमरे का सामान है और इस के अंदर क्या-क्या है.

जरूरी सामान का एक “एसेंशियल बौक्स” तैयार करें. पहली रात और अगली सुबह काम आने वाली चीजें अलग से रखें. कपड़ों का एक जोड़ा, मोबाइल चार्जर, ब्रश/पेस्ट, साबुन, दवाईयां, पानी की बोतल, टावल और जरूरी कागजात एक अलग बॉक्स में रखें. इस का फायदा यह होगा कि नए घर में सारे बौक्स तुरंत खोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

फ्रैजाइल सामान को अच्छे से पैक करें. ग्लास, क्रोकरी, शोपीस को 2-3 लेयर बबल-रैप में पैक करें. नीचे भारी, ऊपर हल्का सामान रखें. बॉक्स पर बड़े अक्षरों में लिखें: “FRAGILE – HANDLE WITH CARE”

इलेक्ट्रॉनिक सामान और फर्नीचर की फोटो पहले खींच लें. टीवी, वाशिंग मशीन, वायरिंग कनेक्शन की फोटो दोबारा सेट करने में मदद करेगी. फर्नीचर को खोलने से पहले उसकी फोटो रखने से री-असेंबल करना आसान होता है.

पैकिंग मैटेरियल पहले ही ले आएं

कार्डबोर्ड बॉक्स, बबल रैप, पैकिंग टेप, मार्कर, प्लास्टिक शीट, स्ट्रेच फिल्म आदि काफी मात्रा में पहले ही खरीद कर रख लें. इन से पैकिंग जल्दी और सुरक्षित होती है.

एक अच्छी मूविंग कंपनी चुनें

सस्ती कंपनी चुनने की बजाय भरोसेमंद कंपनी चुनें, जिन का कुछ नाम हो. ऐसी कंपनी सामान सुरक्षित और समय से पहुंचा देती हैं और मार्केट में अपना नाम खराब नहीं होने देती हैं. अग्रिम बुकिंग कराने से रेट में भी कुछ कमी कर देती हैं.

मूविंग वाले दिन खुद ज्यादा काम न करें बल्कि केवल जरूरी निर्देश ही दें. बाकी जिम्मेदारी मूविंग कंपनी के कर्मचारियों पर छोड़ दें. वे अपने तरीके से सामान को ट्रक में अपलोड कर लेंगे. आप आराम से बस उनके काम को सुपरवाइज करें. भारी सामान खुद उठाने की कोशिश न करें. वरना नए घर में कमर दर्द ले कर पहुंचेंगे. Home Shifting Guide.

Hindi Family Story: गवाही का सम्मन- जब कालगर्ल के साथ पकड़ा गया एक सांसद

Hindi Family Story: उस शहर का रेलवे स्टेशन जितना छोटा था, शहर भी उसी के मुताबिक छोटा था. अपना बैग संभाले अनुपम रेलवे स्टेशन से बाहर निकला. उस के हाथ में कंप्यूटर से निकला रेलवे टिकट था, मगर उस टिकट को चैक करने के लिए कोई रेलवे मुलाजिम या अफसर गेट पर मौजूद न था.

रेलवे स्टेशन की इमारत काफी पुरानी अंगरेजों के जमाने की थी, मगर मजबूत भी थी. एक खोजी पत्रकार की नजर रखता अनुपम अपनी आंखों से सब नोट कर रहा था.

रेलवे स्टेशन के बाहर इक्कादुक्का रिकशे वाले खड़े थे. एक तांगे वाला तांगे से घोड़ा खोल कर उसे चारा खिला रहा था. अभी सुबह के 11 ही बजे थे.

यह छोटा शहर या बड़ा कसबा एक महानगर से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर था. सुबहसवेरे जाने वाली पैसेंजर रेलगाडि़यों से मासिक पास बनवा कर सफर करने वाले मुसाफिर हजारों थे. इन्हीं मुसाफिरों के जरीए चलती थी इन तांगे वालों की रोजीरोटी.

अनुपम एक रिकशे वाले के पास पहुंचा और बोला, ‘‘शहर चलोगे?’’

‘‘कहां बाबूजी?’’ अधेड़ उम्र के उस रिकशा वाले ने पूछा.

अनुपम ने अपनी कमीज की ऊपरी जेब में हाथ डाला और एक मुड़ातुड़ा पुरजा निकाल कर उस पर लिखा पता पढ़ा, ‘‘अग्रवाल धर्मशाला, बड़ा बाजार.’’

रिकशा वाले ने कहा, ‘‘बाबूजी, अग्रवाल धर्मशाला तो कभी की ढह कर बंद हो गई है.’’

‘‘यहां और कोई धर्मशाला या होटल नहीं है?’’

‘‘नहीं साहब, न तो यहां कोई होटल है और न धर्मशाला. हां, एक सरकारी रैस्ट हाउस है. नहर के दूसरी तरफ है. वैसे, आप को यहां क्या काम है?’’

‘‘परसों यहां एक सैमिनार हो रहा है. मैं उस की रिपोर्टिंग के लिए आया हूं. मैं एक बड़े अखबार का संवाददाता हूं,’’ अनुपम ने कहा.

‘‘मगर साहब, सैमिनार तो परसों है. आप 2 दिन पहले यहां क्या करेंगे?’’ रिकशा वाला हैरानी से उस की तरफ देख रहा था.

‘‘मेरा अखबार इस कसबे के बारे में एक फीचर छापना चाहता है. मैं यहां से थोड़ी जानकारी इकट्ठा करना चाहता हूं,’’ अनुपम बोला.

रिकशा वाले की समझ में कुछ आया, कुछ नहीं. वह बोला, ‘‘साहब, आप बैठो. मैं आप को रैस्ट हाउस छोड़ आता हूं.’’ कसबे की सड़कें साफसुथरी थीं. इक्कादुक्का आटोरिकशा भी चलते दिख रहे थे. हर तरह की दुकानें थीं.

रैस्ट हाउस ज्यादा दूर नहीं था. नहर काफी चौड़ी और पक्की थी. 10 रुपए का नोट रिकशा वाले को थमा कर अनुपम उतर गया. रैस्ट हाउस साफसुथरा था.

‘‘कहिए सर?’’ छोटे से रिसैप्शन काउंटर पर बैठे एक सांवले रंग के ज्यादा उम्र के आदमी ने बेपरवाही से पूछा.

‘‘मैं एक अखबार का संवाददाता हूं. परसों यहां एक सैमिनार हो रहा है. उस की रिपोर्टिंग करनी है. मैं यहां ठहरना चाहता हूं.’’

‘‘ठीक है सर,’’ एक बड़ा सा रजिस्टर खोलते हुए उस आदमी ने कहा, फिर रजिस्टर को उस की तरफ सरकाते हुए उस के खानों में सब जानकारी भरने का इशारा किया.

‘‘यहां खानेपीने का क्या इंतजाम है?’’ अनुपम ने पूछा.

‘‘सब इंतजाम है. जैसा खाना आप चाहें, सब मिल जाएगा,’’ उस आदमी की आवाज में न कोई जोश था, न कोई दिलचस्पी.

अनुपम रजिस्टर में जानकारी भर चुका था. इस के बाद रिसैप्शन पर आदमी ने उस को चाबी थमाते हुए एक कमरे की तरफ इशारा किया.

कमरा साफसुथरा था. बिस्तर पर बिछी चादर भी धुली थी, जो एक सरकारी रैस्ट हाउस के लिहाज से हैरानी की बात थी. इस की वजह जो बाद में मालूम हुई, यह थी कि उस रैस्ट हाउस में बड़े सरकारी अफसरों, इलाके के विधायक, लोकसभा सदस्य, सत्तारूढ़ और विपक्ष की पार्टियों के नेताओं का आनाजाना लगा रहता था.

अनुपम खाना खा कर सो गया. दोपहर बाद तैयार हो कर अपना कैमरा संभाले वह पैदल ही कसबे की सैर को निकल पड़ा.

इस तरह की छोटीमोटी जानकारियां अपनी डायरी में दर्ज कर फोटो खींचता शाम ढले अनुपम पैदल ही रैस्ट हाउस लौट आया. खाने से पहले बैरे ने इशारे में उस से पूछा कि क्या शराब चाहिए? उस के मना करने पर बैरे को थोड़ी हैरानी हुई कि अखबार वाला हो कर भी वह शराब नहीं पीता है.

आधी रात को शोर सुन कर अनुपम की नींद खुल गई. वह आंखें मलता हुआ उठा और दरवाजा खोला. साथ वाले कमरे के दरवाजे के बाहर भीड़ जमा थी. कुछ पुलिस वाले भी मौजूद थे.

‘‘ये एमपी साहब देखने में शरीफ हैं, पर हैं असल में पूरे आशिक मिजाज,’’ एक देहाती से दिखने वाले आदमी ने दूसरे को कहा.

उस की बात सुन कर अनुपम चौंक पड़ा. वह पाजामे और बनियान में था. वह लपक कर अंदर गया, कमीज पहनी, अपना मोबाइल फोन और कैमरा उठा लिया. बाहर आ कर वह भी भीड़ का हिस्सा बन कर माजरा देखने लगा.

‘‘लो, फोटोग्राफर भी आ गया,’’ अनुपम को देख कर कोई बोला.

‘‘आधी रात को फोटोग्राफर को भी खबर हो गई,’’ एक पुलिस वाला बोला.

इस पर अनुपम से अब चुप न रहा गया. वह बोला, ‘‘मैं फोटोग्राफर नहीं अखबार वाला हूं. मैं साथ के कमरे में ठहरा हुआ हूं. शोर सुन कर यहां आ गया.’’

‘‘यह तो और भी अच्छा हुआ. अखबार वाला फोटो और खबर भी अखबार में छाप देगा,’’ एक आदमी जोश से बोला.

‘यहां क्या हो गया है?’ अचानक कई लोगों ने एकसाथ सवाल किए.

‘‘इलाके का सांसद एक कालगर्ल के साथ अंदर मौजूद है. बारबार खटखटाने पर भी वह दरवाजा नहीं खोल रहा है.’’ यह सुन कर अनुपम ने कैमरा संभाल लिया.

पुलिस वाले दरवाजा खटखटा रहे थे, पर अंदर से कोई जवाब नहीं मिल रहा था.

‘‘दरवाजा खोल दो, नहीं तो तोड़ देंगे,’’ इस धमकी के बाद अंदर की बत्ती जल उठी. थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला. नशे में धुत्त सिर्फ कच्छा पहने एक अधेड़ आदमी ने थरथराती आवाज में कहा, ‘‘कौन हो तुम लोग? जानते नहीं कि मैं इलाके का सांसद हूं. सब को अंदर करवा दूंगा.’’

इस पर बाहर जमा भीड़ गुस्सा हो गई. पुलिस वाले को एक तरफ धकेल कर कुछ लोग आगे बढ़े और उस सांसद को बाहर खींच कर उसे पीटने लगे.

कुछ लोग अंदर जा घुसे. तकरीबन अधनंगी काफी छोटी उम्र की एक लड़की डरीसहमी एक तरफ खड़ी थी. उस को भी बाहर खींच लिया गया. उस की भी पिटाई होने लगी.

‘‘अरे, यह अखबार वाला क्यों चुपचाप खड़ा है? फोटो क्यों नहीं खींचता?’’ कोई चीखा, तो अनुपम चौंक पड़ा. उस के कैमरे की फ्लैश लाइट बारबार चमकने लगी.

पुलिस वाले चुपचाप खड़े तमाशा देखते रहे. मामला एक लोकसभा सदस्य का था और वह भी सत्तारूढ़ दल के सांसद का. बात ऊपर तक जा सकती थी. लिहाजा, पुलिस वाले डंडा फटकारते हुए आगे बढ़ आए.

तब तक वह सांसद काफी पिट चुका था. लड़की की अच्छी धुनाई हुई थी. लोगों का गुस्सा अब ठंडा पड़ गया था.

सांसद को कमरे में ले जाया गया. उन्हें कपड़े पहनाए गए. लड़की भी कपड़े पहनने लगी. अपने कैमरे के साथसाथ अनुपम अपने मोबाइल फोन से भी काफी फोटो खींच चुका था.

सांसद अपनी बड़ी गाड़ी में वहां आए थे. साथ में ड्राइवर के अलावा सिक्योरिटी के लिए बौडीगार्ड भी था. सभी को थाने ले जाया गया. उन पर मुकदमा बनाया गया. भीड़ में से कइयों को गवाह बनाया गया. अनुपम को भी चश्मदीद गवाह बनाया गया.

सांसद को रातभर थाने में बंद रहना पड़ा. वजह यह थी कि एक तो मामला खुल गया था. दूसरे, विपक्षी दलों के छुटभैए नेता चश्मदीद गवाह थे. तीसरे, फौरन मामला दबाने पर जनता भड़क सकती थी.अगले दिन सांसद को अदालत में पेश किया गया. उन के खिलाफ नारेबाजी करने वालों में विपक्षी दलों से ज्यादा उन की अपनी पार्टी के लोग थे.

मजिस्ट्रेट ने सांसद को 15 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजा और लड़की को नारी निकेतन भेज दिया. सभी गवाहों के नाम रिकौर्ड में ले लिए गए. उन को ताकीद की गई कि जब भी गवाही का सम्मन मिले, उन को गवाही देने आना होगा.

अनुपम ने अपने अखबार को रात को मोबाइल फोन से फोटो और सारी खबर एसएमएस से कर दी और फोन पर भी बता दिया था.अखबार ने यह खबर प्रमुखता से छापी थी.

सैमिनार में हिस्सा ले कर अनुपम वापस लौट आया. अपने महकमे के इंचार्ज दिनेश को उस ने जोशजोश में सब बताया और कहा कि जल्द ही उसे गवाही का सम्मन आएगा और वह गवाही देने जाएगा.

इस पर दिनेश ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम एक अनाड़ी पत्रकार हो. ऐसे मामले में ज्यादा जोश नहीं दिखाते हैं. तुम्हें कोई सम्मन नहीं आएगा. थोड़े दिनों बाद मामला ठंडा पड़ जाएगा. जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है. वह समय बीतने के साथ सब भूल जाती है.’’

‘‘मगर विपक्षी दलों के नेता भी गवाह हैं. क्या वे मामला ठंडा पड़ने देंगे?’’ अनुपम ने पूछा.

‘‘थोड़े समय तक हलचल रहेगी, फिर मामला ठंडा हो जाएगा. सभी दलों के नेता इस तरह की करतूतों में फंसते रहते हैं. एकदूसरे से काम पड़ता रहता है, इसलिए कोई भी मामला गंभीर रूप नहीं लेता,’’ दिनेश ने कहा.

‘‘मगर, मेरे पास फोटो हैं.’’

‘‘तुम इस में एक पार्टी नहीं बने हो. न वादी हो, न प्रतिवादी. जब तक तुम्हें गवाही के लिए न बुलाएं, तुम खुद कुछ नहीं कर सकते.’’

फिर हफ्ते पर हफ्ते बीत गए. महीने बीत गए. गवाही का सम्मन कभी नहीं आया. कसबे के लोगों को भी याद नहीं रहा कि यहां एक सांसद कालगर्ल के साथ पकड़ा गया था. धीरेधीरे अनुपम भी इस कांड को भूल गया. Hindi Family Story.

Hindi Family Story: मैं पुरुष हूं- बलात्कार पीड़िता को त्यागना क्या पौरुषता है?

Hindi Family Story: मिसेज मेहता 20 साल की बेटी आलिया के साथ व्यस्त थीं. वे आज अपनी साड़ियों को अलमारी से बाहर निकाल रही थीं. साड़ियों को एक बार धूप में सुखाने का इरादा था उन का.

““क्या मम्मी, आप ने तो सारा घर ही कबाड़ कर रखा है,”” मिसेज मेहता का 24-वर्षीय बेटा तरुण बोला.

““अरे बेटे, मैं अपनी अलमारी सही कर रही हूं. मेरी इतनी महंगीमहंगी साड़ियां हैं, इन्हें भी तो देखरेख चाहिए.””

““ये इतनी भारी साड़ियां आप लोग कैसे संभाल लेती हो भला?”” तरुण ने कहा.

““यह सब हमारी संस्कृति की निशानी है,” मिसेज मेहता ने इठलाते हुए कहा.

““अब भला साड़ियों से हमारी संस्कृति का क्या लेनादेना मां? एक बदन ढकने के लिए 5 मीटर लंबी साड़ी लपेटने में भला कौन सी संस्कृति साबित होती है?”” तरुण ने चिढ़ते हु

““अब तुम्हारे मुंह कौन लगे. जब तेरी घरवाली आएगी तब बात करूंगी तुझ से,” ”मां ने हंसते हुए कहा.

तरुण बैंक में कैशियर के पद पर काम कर रहा था और अपनी सहकर्मी माधवी से प्यार करता था. दोनों ने साथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं. पर माधवी से शादी को ले कर तरूण हमेशा ही शंकालु रहता था क्योंकि माधवी नए जमाने की लड़की थी जो बिंदास अंदाज में जीती थी. उसे मोटरसाइकिल चलाना पसंद था और अपनी आवाज को बुलंद करना भी उसे अच्छी तरह आता था. उस की यही बात तरुण को संशय में डालती थी कि हो सकता है कि माधवी मां की पसंद पर खरी न उतरे.

“आजकल की लड़कियों को देखो, टौप के अंदर से ब्रा की पट्टी दिखाने से उन्हें कोई परहेज नहीं है. हमारे समय में तो मजाल है कि कोई जान भी पाता कि हम ने अंदर क्या पहन रखा है.”

मां की इस तरह की बातें सुन कर तो तरुण का मन और भी फीका हो जाता था.

माधवी के पापा को लास्ट स्टेज का कैंसर था, इसलिए वे माधवी की शादी जल्द से जल्द कर देना चाहते थे. माधवी भी तरुण पर दबाव बना रही थी कि वह भी घर में अपनी शादी की बात चलाए.

माधवी के बारबार कहने पर एक दिन तरुण ने मां को माधवी के बारे में बताया और माधवी का फोटो भी दिखा दिया.

फोटो देख कर तो मां ने कुछ नहीं कहा पर ऐसा लगा कि माधवी जैसी मौडर्न लड़की को वे अपनी बहू नहीं बनाना चाहती हैं.

““मां, वैसे माधवी घरेलू लड़की ही है. हां, उस के नैननक्श जरूर ऐसे हैं जिन से वह मौडर्न और अकड़ू टाइप की लगती है,”” माधवी की तारीफ का समा बांध दिया था तरुण ने.

तरुण के पिता तो बचपन में ही गुजर गए थे. तब से ले कर आज तक मिसेज मेहता अपना जीवन आलिया और तरुण के लिए ही तो गुजार रही हैं.

तरुण की मां उस की हर पसंद व नापसंद का ध्यान रखती थीं. जवान होते बच्चों की भावनाएं बहुत तीव्र होती हैं और अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए वे कोई भी कदम उठाने से पीछे नहीं हटते.

मां ने आलिया से सवालिया नजरों में ही पूछ लिया कि “यह लड़की तेरी भाभी के रूप में कैसी लगेगी?” आलिया ने भी इशारों में ही बता दिया. आलिया के इस खामोश जवाब का मतलब मां अच्छी तरह समझ गई थीं.

आलिया वैसे भी अकसर खामोश ही रहती थी. उस की इस खामोशी को लोग घमंडी की उपमा देते थे.

आलिया की सहज और मूक स्वीकृति पा कर मां ने भी माधवी से तरुण की शादी करने की इच्छा जाहिर की.

तरुण खुशीखुशी 2 दिनों बाद ही माधवी को घर ले आया. माधवी आज पीले रंग के सलवार सूट में थी. उस ने अपने बालों को खुला छोड़ा हुआ था जो बारबार उस के माथे पर गिर जाते थे और जिन्हें बड़ी अदा से सही करती थी वह.

माधवी से मां ने दोचार सवालजवाब किए और उस के घरेलू हालात के बारे में जानकारी हासिल की. माधवी ने उन्हें बताया कि घर में उस के मांबाप और माधवी ही रहते हैं और पापा कैंसर से पीड़ित हैं, इसलिए घर चलाने का जिम्मा भी उसी पर आ पड़ा है.

इसी प्रकार की औपचारिक बातों के बाद माधवी ने मां और आलिया से विदा ली.

माधवी के जाने के बाद तरुण अपनी मां का निर्णय जानने के लिए मचला जा रहा था. मां ने इस सस्पैंस को थोड़ी देर बनाए रखना उचित समझा. लेकिन तरुण की हालत देख कर उन्होंने हंसते हुए इस रिश्ते के लिए हामी भर दी थी.

तरुण ने तुरंत ही माधवी के मोबाइल पर व्हाट्सऐप मैसेज कर दिया कि मां शादी के लिए तैयार हो गई हैं. अब, बस, जल्दी से तारीख तय कर लेते हैं. मैसेज देख कर माधवी भी खुशी से फूले नहीं समा रही थी. उस की शादी से उस के मांबाप के मन से एक बोझ भी हट जाने वाला था.

अगले दिन बैंक से निकलने के बाद तरुण और माधवी कैफे में गए और अपने भविष्य की तमाम योजनाओं पर विचार करने लगे. दोनों की आंखों में रोमांस और रोमांच का सागर लहरा रहा था.

वापसी में शाम ज्यादा हो गई थी और अंधेरा घिर आया था. तरुण ने माधवी को खुद ही उस के घर तक छोड़ने का मन बनाया और अपनी बाइक पर उस को बैठा कर चल दिया.

बैंक से माधवी के घर की ओर जाते हुए एक पुलिया पड़ती थी जहां पर आवागमन कुछ कम हो जाता था. वहां पर पहुंचते ही तरुण की बाइक पंक्चर हो गई.

“शिट मैन…..पंक्चर हो गई. मेकैनिक देखना पड़ेगा.” इधरउधर नजर दौड़ाने लगा था तरुण. ठीक उसी समय वहां पर 3-4 मुस्टंडे कहीं से प्रकट हो गए. वे सब शराब के नशे में थे. तरुण चौकन्ना हो गया था कि तभी उस के सिर के पीछे किसी ने डंडे से वार किया. बेहोश होने लगा था तरुण. इसी बीच, बाकी के 2 मुस्टंडों ने माधवी को पकड़ लिया और सड़क के किनारे खड़ी एक कार में ले जा कर जबरन उस के साथ बारीबारी मुंह काला करने लगे.

तरुण बेहोश था. माधवी उन गुंडों की हवस का शिकार बनती रही और उस के बाद वे गुंडे उन दोनों को उसी अवस्था में सड़क के किनारे छोड़ कर चले गए. जब उसे होश आया, तब तक माधवी का सबकुछ लुट चुका था. आतेजाते लोगों ने उन दोनों पर नजर डाली. कुछ ने उन के वीडियो भी बनाए. पर मदद किसी ने भी नहीं की. उन्हें मदद तब ही मिल पाई जब पुलिस की पैट्रोलिंग जीप वहां से गुजरी.

तमाम सवालात के बाद पुलिस ने माधवी को अस्पताल में भरती कराया और तरुण को प्राथमिक उपचार के बाद घर जाने दिया गया.

तरुण के दिलोदिमाग पर जोरदार झटका लगा था पर 10 दिनों तक घर में रुकने के बाद उस ने पहले की तरह ही अपने काम पर जाना शुरू कर दिया. पर उस ने माधवी की खोजखबर लेना उचित नहीं समझा.

माधवी सदमे में थी. पर घर की जिम्मेदारियां निभाने के लिए वह बैंक भी आने लगी और पहले की तरह ही काम भी संभाल लिया. माधवी ने जिंदगी की पुरानी लय पाने की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए. पर इस सफर में उसे अब तरुण का साथ नहीं मिल पा रहा था. वह माधवी की तरफ देखता भी नहीं था, बात करना तो बहुत दूर की बात थी.

माधवी के स्त्रीमन ने बहुत जल्दी ताड़ लिया कि तरुण उस के साथ ऐसा रूखा व्यवहार क्यों कर रहा है, पर बेचारी कर क्या सकती थी. वह अब एक बलात्कार पीड़िता थी. चुपचाप अपने को काम में बिजी कर लिया था माधवी ने.

कुछ समय बीता, तो मां ने तरुण से माधवी के बारे में पूछा, ““आजकल तू माधवी की बात नहीं करता. तुम लोगों ने शादी की तारीख फाइनल की या नहीं?””

““कैसी बातें करती हो मां. अब क्या मैं उस के साथ शादी करूंगा? मेरा मतलब है कि उस का बलात्कार हो चुका है. बलात्कार पीड़िता से कहीं कोई शादी भी करता है भला? म….मैं समाज से कुछ अलग तो नहीं? ”

मां के चेहरे पर कई रंग आनेजाने लगे. उन की आंखों में कई सवाल उमड़ आए थे.

“लगता है मेरी परवरिश में ही कुछ कमी रह गई. ”मन ही मन बुदबुदा उठी थी मां. उन की आंखों की कोर नम हो चली थी जिसे उन्होंने तरुण से बड़ी सफाई से छिपा लिया और बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गईं.

“बलात्कार किसी के भी साथ हो सकता है मेरे साथ, आलिया के साथ… तो क्या तब भी तरुण उसे ऐसे ही त्याग देगा जैसे उस ने माधवी को छोड़ दिया है? हां, एक पुरुष ही तो है वह, जो हमेशा ही दूध का धुला होता है.”

कई तरह के सवाल मां के जेहन में उमड़ आए और कुछ कसैली यादें उन के मन को खट्टा करने लगीं.

5 साल पहले की ही तो बात है. उन दिनों तरुण ट्रेनिंग करने के लिए शहर से बाहर गया हुआ था. आलिया को अचानक बुखार आ गया था. डाक्टर को दिखा कर दवा तो ले आई थीं मिसेज मेहता पर आज सुबह से फिर बुखार तेज हो गया था. डाक्टर से फोन पर उन्होंने संपर्क किया तो उस ने एक दूसरी टेबलेट का नाम बताते हुए कहा कि यह टेबलेट आसपास के मैडिकल स्टोर से ले कर खिला दीजिए, आराम मिल जाएगा.

वे नुक्कड़ वाले मैडिकल स्टोर पर दवाई लेने ही तो गई थीं कि पीछे से किसी ने आलिया के कमरे का दरवाजा खटकाया था. आलिया ने अनमने मन से दरवाजा खोला, तो सामने बगल में रहने वाले 55 साल के अंकल थे. अंकल को यह पता था कि आलिया घर में अकेली है और इसी का लाभ उस ने उठाया, बुखार में तप रही आलिया का बलात्कार कर दिया. जब वे घर पहुंचीं तो आलिया फर्श पर पड़ी हुई थी. बड़ी मुश्किल से ही अपने ऊपर हुए अत्याचार को कह पाई थी आलिया. उन्होंने उसे सीने से लगा लिया और वे दोनों सुबकते रहे थे. पूरे 3 दिन तक फ्लैट का दरवाजा तक नहीं खुला. बदनामी के डर से पुलिस में भी रिपोर्ट नहीं लिखवाई. तरुण से भी नहीं बताया और आननफानन दूसरा फ्लैट तलाश कर लिया था और बगैर तरुण के आने का इंतजार किए ही फ्लैट बदल भी लिया था.

इस राज को अपने सीने में हमेशा के लिए दफन कर लिया था मिसेज मेहता ने. पर आज, तरुण की बातें सुन कर उन के घाव हरे हो गए थे और दर्द भी उभर आया था. पर वे चुप नहीं रहेंगी. उन्होंने आंसू पोछे और तरूण के सामने जा कर खड़ी हो गईं.

““अगर माधवी का रेप हो गया तो क्या वह जूठी हो गई? क्या वह अब माधवी नहीं रही?” मां तेज सांसें ले रही थीं.

““हां मां, भला मैं अपनेआप को ही किसी की जूठन क्यों खिलाऊं?” लापरवाही दिखा रहा था तरुण.

““पर भला इस में माधवी का क्या दोष है?”

““हो सकता है मां. पर ये सब बातें फिल्मों में ही अच्छी लगती हैं. मैं जानबूझ कर तो मक्खी नहीं निगल सकता न.””

““पर दोष तो उन लोगों का है जो इस घृणित कृत्य के लिए जिम्मेदार हैं, न कि माधवी का.””

मां और तरुण में बहस जारी थी. मां लगातार तरूण को समझाने की कोशिश कर रही थीं. पर तरुण की अपनी ही दलीलें थीं. काफी देर बाद भी जब तरुण टस से मस न हुआ तब मां ने उसे वह राज बताना जरूरी समझ लिया था जो अभी तक छिपाए रखा था.

““और अगर किसी ने तेरी बहन आलिया का बलात्कार किया हो तो क्या तब भी तेरी बातों में ऐसी ही कड़वाहट रहेगी? ”

““क्या मतलब है आप का, मां?”

““मतलब साफ है. आलिया का रेप हमारे फ्लैट के पड़ोस में रहने वाले उस 55 साल के बूढ़े ने किया और तब से आलिया किसी के साथ भी सहज नहीं हो पाती और गुमसुम रहती है. तुम्हें समझ नहीं आता वह इतनी चुप क्यों रहती है? अब क्या इस में आलिया का दोष था? क्या हम आलिया को सिर्फ इस बात के लिए छोड़ दें कि वह किसी पुरुष की वहशी मानसिकता का शिकार हो चुकी है?” ”मां लगातार बोलते जा रही थीं. इस समय वे सिर्फ तरुण की मां नहीं थीं बल्कि उन तमाम औरतों का प्रतिनिधित्व कर रही थीं जो बलात्कार का शिकार होती हैं.

तरुण कोने में खड़ी आलिया की तरफ बढ़ा. आलिया की आंखों से आंसू बह रहे थे. तरुण को आता देख वह झट से कमरे में घुस गई और भड़ाक से दरवाजा बंद कर लिया.

तरुण कभी रोती हुई मां की तरफ देखता, तो कभी आलिया के कमरे के बंद दरवाजे की तरफ. उस के दिमाग में माधवी का चेहरा घूमने लगा था.

अगले दिन शाम को बैंक से तरुण का फोन आया, ““मां मुझे आने में देर हो जाएगी. आज मैं और माधवी मैरिज प्लानर के पास जा रहे हैं अपनी शादी की तैयारी के लिए. Hindi Family Story.

Hindi Romantic Story: दूरियां- बाप-बेटे के रिश्ते में दरार क्यों आ रही थी?

Hindi Romantic Story: ‘‘नेहा बेटा, जरा ड्राइंगरूम की सेंटर टेबल पर रखी मैगजीन देना. पढ़ूंगा तो थोड़ा टाइम पास हो जाएगा,’’ उमाशंकर ने अपने कमरे से आवाज लगाई.

आरामकुरसी पर वह लगभग लेटे ही हुए थे और खुद उठ कर बाहर जाने का उन का मन नहीं हुआ. पता नहीं, क्यों आज इतनी उदासी हावी है…खालीपन तो पत्नी के जाने के बाद से उन के अंदर समा चुका है, पर कट गई थी जिंदगी बच्चों को पालते हुए.

शांता की तसवीर की ओर उन्होंने देखा… बाहर ड्रांगरूम में नहीं लगाई थी उन्होंने वह तसवीर, उसे अपने पास रखना चाहते थे, वैसे ही जैसे इस कमरे में वह उन के साथ रहा करती थी, जाने से पहले.

नेहा तो उन की एक आवाज पर बचपन से ही दौड़दौड़ कर काम करने की आदी है. शांता के गुजर जाने के बाद वह उस पर ही पूरी तरह से निर्भर हो गए थे. बेटा तो शुरू से ही उन से दूर रहा था. पहले पढ़ाई के कारण होस्टल में और फिर बाद में नौकरी के कारण दूसरे शहर में.

एक सहज रिश्ता या कहें कंफर्ट लेवल उस के साथ बन नहीं पाया था. हालांकि वह जब भी आता था, पापा की हर चीज का खयाल रखता था, जरूरत की चीजें जुटा कर जाता था ताकि पापा और नेहा को कोई परेशानी न हो.

बेटे ने जब भी उन के पास आना चाहा, न जाने क्यों वह एक कदम पीछे हट जाते थे- एक अबूझ सी दीवार खींच दी थी उन्होंने. किसी शिकायत या नाराजगी की वजह से ऐसा नहीं था, और कारण वह खुद भी समझ नहीं पाए थे और न ही बेटा.

शांता की मौत की वजह वह नहीं था, फिर भी उन्हें लगता था कि अगर वह उन छुट्टियों में घर आ जाता तो शांता कुछ दिन और जी लेती. होस्टल में फुटबाल खेलते हुए उस के पांव में फ्रैक्चर हो गया था और उस के लिए यात्रा करना असंभव सा था…छोटा ही तो था, छठी क्लास में. घर से दूर था, इसलिए चोट लगने पर घबरा गया था. बारबार उसे बुखार आ रहा था और अकेले भेजना संभव नहीं था, और उमाशंकर शांता को ऐसी हालत में नन्ही नेहा के भरोसे उसे लेने भी नहीं जा सकते थे.

 

यह मलाल भी उन्हें हमेशा सताता रहा कि काश, वह चले जाते तो मां जातेजाते अपने बेटे को देख तो लेती. वह 2 साल से कैंसर जूझ रही थी, तभी तो तरुण को होस्टल भेजने का निर्णय लिया गया था. यही तय हुआ था कि 2 साल बाद जब नेहा 5वीं जमात में आ जाएगी, उसे भी होस्टल भेज देंगे.

आखिरी दिनों में नेहा को सीने से चिपकाए शांता तरुण को ही याद करती रही थीं.

तरुण ने भी बड़े होने के बाद नेहा से कहा था, “पापा मुझे लेने आ जाते या किसी को भेज देते तो मैं मां से मिल तो लेता.”

नेहा जो समय से पहले ही बड़ी हो गई थी, इस प्रकरण से हमेशा बचने की ही कोशिश करती थी. बेकार में दुख को और क्यों बढ़ाया जाए, किस की गलती थी, किस ने क्या नहीं किया… इसी पर अगर अटके रहोगे तो आगे कैसे बढ़ोगे. मां को तो जाना ही था…दोष देने और खुद को दोषी मानना फिजूल है. तभी से वह उन दोनों के बीच की कड़ी बन गई थी…चाहे, अनचाहे.

पापा को ले कर हालांकि तरुण ने कभी भी विरोधात्मक रवैया नहीं रखा था और न ही नेहा को ले कर कोई द्वेष था मन में. भाईबहन में खूब प्यार था और एक सहज रिश्ता भी. रूठनामनाना, लड़ाईझगड़ा और अपनी बातें शेयर करना…जैसा कि आम भाईबहन के बीच होता है. लेकिन पापा और भाई की यही कोशिश रहती कि उस के द्वारा एकदूसरे तक बात पहुंच जाए.

यह कहना गलत न होगा कि नेहा पापा और भाई के बीच एक सेतु का काम करती थी. उस के माध्यम से अपनीअपनी बात एकदूसरे तक पहुंचाना उन दोनों को ही आसान लगता था. कभीकभी नेहा को लगता था कि उस की वजह से ही पितापुत्र दो किनारों पर छिटके रहे, वह ऐसी नदी बन गई, जिस की लहरें दोनों किनारों पर जा कर बहाव को यहांवहां धकेलती रहती हैं. लेकिन दोनों किनारों के बहाव को चाह कर भी आपस में एक कर पाने में असमर्थ रही है.

बचपन की बात अलग है, तब उसे उन दोनों के बीच माध्यम बनने में बहुत आनंद आता था, लगता था कि वह बहुत समझदार है. मां भी बहुत हंसा करती थी कि देखो छुटकी को बड़ा बनने में कितना आनंद आता है. अरे, अभी से क्यों इन पचड़ों में पड़ती है, बड़े होने पर तो जिम्मेदारियों के भारीभारी बोझ उठाने ही पड़ते हैं, वह अकसर कहती. लेकिन उसे तो पापा और भाई दोनों पर रोब झाड़ने में बहुत मजा आता था.

पर, अब जिंदगी और रिश्तों के मर्म को समझने के बाद उसे एहसास हो चुका था कि उस का माध्यम बने रहना कितना गलत है. दूरियां तभी खत्म होंगी, जब वह बीच में नहीं होगी. पर उस के बिना जीने की कल्पना दोनों ही नहीं करना चाहते थे. नदी बस निर्विघ्न बहती रहे तो रिश्ता रीतेगा नहीं, सूखेगा नहीं.

आवाज लगाने के बाद उमाशंकर को अपनी भूल का एहसास हुआ. नेहा तो अब है ही नहीं यहां.

‘‘ये लीजिए पापाजी,’’ अनुभा ने जैसे ही उन की आवाज सुनी, मैगजीन ले कर तुरंत उन के कमरे में उपस्थित हो गई.

‘‘पापाजी, और कुछ चाहिए…?’’ उस ने बहुत ही शालीनता से पूछा.

‘‘नहीं. कुछ चाहिए होगा तो खुद ले लूंगा. भूल गया था पलभर को कि नेहा नहीं है,’’ तिरस्कार, कटुता, क्रोध मिश्रित तीक्ष्ण स्वर और चेहरे पर फैली कठोरता… इस तरह की प्रतिक्रिया और व्यवहार की अनुभा को आदत हो गई है अब. पापा उस से सीधे मुंह बात नहीं करते… कोई बात नहीं, पर वह अपना फर्ज निभाने में कभी पीछे नहीं हटती.

अनुभा समझती है कि नेहा की कमी उन्हें खलती है, इसलिए बहुत खिन्न रहने लगे हैं. आखिर बरसों से नेहा पर निर्भर रहे हैं, वह उन की हर आदत से परिचित है, जानती है कि उन्हें कब क्या चाहिए.

रिटायर होने के बाद से तो वे छोटीछोटी बातों पर ज्यादा ही उखड़ने लगे हैं. शुरुआत में अनुभा को बुरा लगता था, पर अब नहीं.

शादी हुए डेढ़ साल ही हुए हैं, और एक साल से नेहा यहां नहीं है. पता नहीं, क्यों दूसरे शहर की नौकरी को उस ने प्राथमिकता दी, जबकि यहां भी औफर थे उस के पास नौकरी के. कुछकुछ तो वह इस की वजह समझती थी, नेहा कोई भी फैसला बिना सोचेसमझे नहीं करती थी.

अनुभा ने तब मन ही मन उसे सराहा भी था, पर उस के जाने की बात वह सहम भी गई थी. कैसे संभालेगी वह घर को…पितापुत्र के बीच पसरे ठंडेपन को… कितने कम शब्दों में संवाद होता है, बाप रे, वह तो अपने पापा से इतनी बातें करती थी कि सब उसे चैटरबौक्स कहते हैं. उस का भाई भी तो पापा से ही चिपका रहता है और मां दिखावटी गुस्सा करती हैं कि मां से तो तुम दोनों को कोई लगाव ही नहीं है… पर भीतर ही भीतर बहुत खुशी महसूस करती है.

बच्चों का पिता से लगाव होना ज्यादा जरूरी है, क्योंकि मां से प्यार और आत्मीयता का संबंध सहज और स्वाभाविक ही होता है, उस के लिए प्रयत्न नहीं करने पड़ते.

उस पर ठहरी वह एक विजातीय लड़की. बेटे ने लवमैरिज की, यह बात भी पापा को बहुत खटकती है, अनुभा जानती है.

वह तो नेहा ने स्थिति को संभाल लिया था, वरना तरुण उसे ले कर अलग हो जाने पर आमादा हो गया था. दोनों के बीच सेतु बन रिश्तों पर किसी तरह पैबंद लगा दिया था.

अनुभा भी शादी के बाद नेहा पर बिलकुल निर्भर थी. ननदभाभी से ज्यादा उन के बीच दोस्त का रिश्ता अधिक था. जब उस ने तरुण से शादी करने का फैसला लिया था तो मां के मन में आशंकाएं थीं, ‘इतने समय से नेहा ही घर संभालती आ रही है. पूरा राज है उस का. कहीं वह तुम्हें तुम्हारे अधिकारों से वंचित न कर दे. तरुण भी तो उस की कोई बात नहीं टालता है, जबकि है उस से छोटी. कहीं सास बनने की कोशिश न करे, संभल कर रहना और अपने अधिकार न छोड़ना. कुंआरी ननद वैसे भी जी का जंजाल होती है.’

अनुभा को न तो अपने अधिकार पाने के लिए लड़ना पड़ा और न ही उसे लगा कि नेहा निरंकुश शासन करना चाहती है.

हनीमून से जब वे लौट कर आए थे और सहमे कदमों से जब अनुभा ने रसोई में कदम रखा था तो घर की चाबियों का गुच्छा उसे थमाते हुए नेहा ने कहा था, ‘‘भाभी संभालो अपना घर. बहुत निभा लीं मैं ने जिम्मेदारियां. थोड़ा मैं भी जी लूं.

“अरुण को, पापा को जैसे चाहे संभालो, पर मुझे मुक्ति दे दो. आप की सहायता करने को हमेशा तत्पर रहूंगी. ऐसे टिप्स भी दूंगी, जिन से आप इन 2 मिसाइलों से निबट भी लेंगी. बचपन से बड़े पैतरे अपनाने पड़े हैं तो सब दिमाग में रजिस्टर्ड हो चुके हैं. सब आप को दे दूंगी, ताकि मेरा दिमाग खाली हो और उस में कुछ नई और फ्रेश चीजें भरें,’’ मुसकराते हुए जिस अंदाज से नेहा ने कहा था, उस से अनुभा को जहां हंसी आ गई थी, वहीं सारा भय भी दूर हो गया था. नाहक ही कुंआरी ननदों को बदनाम किया जाता है… उन से अच्छी सहेली और कौन हो सकती है ससुराल में.

उस के बाद नेहा ने जैसे एक बैक सीट ले ली थी और अनुभा ने मोरचा संभाल लिया था.

पापा को अनुभा को दिल से स्वीकारने और बेटी जैसा सम्मान व स्नेह मिलने के लिए नेहा को यही सही लगा था कि वह एक दूरी बना ले. इस से नेहा पर पापा की निर्भरता कम होगी, साथ ही अनुभा को वह समझ पाएंगे और तरुण को भी. सेतु नहीं होगा तो खुद ही संवाद स्थापित करना होगा उन दोनों को.

‘‘भाभी, आप उन दोनों के बीच सेतु बनने की गलती मत करना. आप को बहुतकुछ नजरअंदाज करना होगा. बेशक इन लोगों को लगे कि आप उन की उपेक्षा कर रही हैं,’’ नेहा ने कहा था तो अनुभा ने उस का माथा चूम लिया था.

2-3 साल ही तो छोटी है उस से, पर एक ठोस संबल उसे भी चाहिए होता ही होगा.

‘‘लाओ, तुम्हारे बालों में तेल लगा देती हूं,’’ अनुभा ने कहा था, तो नेहा झट से अपने लंबे बालों को खोल कर फर्श पर बैठ गई थी.

‘‘कोई पैम्पर करे तो कितना अच्छा लगता है,’’ तब अनुभा ने उसे अपनी गोदी में लिटा लिया था.

‘‘भाभी, लगता है मानो मां की गोद में लेटी हूं. तरस गई थी इस लाड़ के लिए. लोगों को लगता है कि घर की सत्ता मेरे हाथ में है, इसलिए मैं खुशनसीब हूं, किसी की हिम्मत नहीं कि रोकेटोके, पर उन्हें कौन समझाए कि रोकनाटोकना, प्रतिबंध लगाना या डांट सुनना कितना अच्छा लगता है, तब यह नहीं लगता कि हम किसी जिम्मेदारी के नीचे दबे हैं.’’

दूरियां कभीकभी कितनी अच्छी हो सकती हैं, अनुभा को एहसास हो रहा था. नेहा के जाने के बाद उसे बहुत दिक्कतें आईं.

पितापुत्र के बीच अकसर छाया रहने वाला मौन और बातबात पर पापा का उसे अपमानित करना, उस की गलतियां निकालना और विजातीय होने के कारण उस की सही बात को भी गलत ठहराना.

अनुभा ने भी ठान लिया था कि वह कभी पापा की बात को नहीं काटेगी, अपमान का घूंट पीना उस के लिए कोई आसान नहीं था, पर तरुण और नेहा के सहयोग से उस ने धैर्य की कुछ घुट्टी यहां पी ली थी और कुछ वह अपने साथ सहनशीलता को एक तरह से दहेज में ही ले कर आई थी.

मां ने यह पाठ बचपन से पढ़ाया था, क्योंकि वह इतना तो जानती थी कि चाहे आप कितना ही क्यों न पढ़लिख जाएं, कितने ही पुरुषों से आगे क्यों न निकल जाएं, सहनशीलता की आवश्यकता हर मोड़ पर पड़ती है गृहस्थी चलाने के लिए. शायद इसे वह परंपरा ही मानती थी.

वह चुपचाप पापा के सारे काम करती, समय पर उन को खाना देती, दवा देती और सुबहशाम सैर करने के लिए जिद कर के भेजती.

वह कुछ अलग नहीं कर रही थी, ऐसा तो वह अपने मायके में भी करती थी. केवल रिश्ते का नाम यहां अलग था, पर रिश्ता तो वही था, पिता का.
उस से गलतियां होती थीं, स्वाभाविक ही है, तो क्या हुआ, नेहा कहती, ‘‘ज्यादा मत सोचो भाभी, बहुत गड़बड़ हुई तो मैं अपनी जिम्मेदारी से भागूंगी नहीं.

“यह मत सोचना कि मैं ने अपनी आजादी पाने के लिए यह कदम उठाया… मैं तो केवल आप को उस घर में आप का अधिकार दिलाना चाहती हूं.

“पापा को थोड़ा सक्रिय भी होना पड़ेगा, वरना जंग लग जाएगी उन के शरीर में और फिर मन में. असहाय और अकेले होने की भावना से खुद को ही आहत करते रहेंगे और दूसरे पर निर्भर हो जाएंगे हर काम के लिए. उन्हें मन की उदासी से निकल कर पहले खुद के लिए और फिर दूसरों के लिए जीना सीखना होगा.

“अपने को दोषी मान कर और आत्मप्रताड़ना और स्वयं पर दया करते रहना, उन का स्वभाव सा बन गया है. हम केवल मदद कर सकते हैं, पर निकलना उन्हें खुद ही होगा…फिर चाहे उन्हें कुछ झटके ही क्यों न देने पड़ें.

“आसान नहीं है. पर भाभी, अब तो मुझे भी वह फोन पर बहुतकुछ सुना देते हैं. मजा आता है, कम से मुझे पैडस्टल से तो उतार रहे हैं.

“अब थोड़ी कम थकान महसूस करती हूं. पर, आप को थकाने के लिए सौरी. चलो भैया से थकान उतरवा लेना,’’ हंसी थी वह जोर से, तो अनुभा के चेहरे पर लाली छा गई थी.

जब रोज एक ही स्थिति से गुजरना पड़े तो वह आदत बन जाती है और फिर खलती नहीं है. उमाशंकर के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था. देख रहे थे कि बेटाबहू उन का कितना ध्यान रखते हैं. बेटे के साथ संवाद बढ़ गया था, क्योंकि अनुभा ने सेतु बनने से साफ मना कर दिया था. फिर नाराजगी करें तो भी किस बात पर, कब तक बेवजह नुक्स निकालते रहेंगे.

जब वह पार्क में सैर करने जाते हैं तो देखतेसुनते तो हैं कि बूढ़े मांबाप के साथ कितना बुरा व्यवहार करते हैं बेटाबहू… कुछ तो खाने के लिए तरसते रहते हैं. न समय पर खाना मिलता है, न दवा. और पैसे के लिए भी हाथ फैलाते रहो. महानगरीय जीवन की त्रासदी से अवगत हैं वह… भाग्यशाली हैं कि उन की दशा सुखद है. पेंशन का पैसा बैंक में ही पड़ा रहता है. जब जो चाहे खरीद लेते हैं, खर्च कर लेते हैं. तरुण तो एक बार कहने पर ही सारी चीजें जुटा देता है.

नेहा नहीं है तब भी जिंदगी मजे से कट रही है उन की. जब इनसान आत्ममंथन करने लगता है तो दिमाग में लगे जाले साफ होने लगते हैं.

पितापुत्र के बीच खिंची दीवार धीरेधीरे ही सही दरकने लगी थी. बहू बेटी नहीं बन सकती, यह मानने वाले उमाशंकर उसे  बहू का दर्जा देने लगे थे, उस के विजातीय होने के बावजूद.

नेहा ने जो दूरियां बनाई थीं, वे अनुभा को, तरुण को उन के पास ला रही थीं.

‘‘नेहा…’’ उमाशंकर ने जैसे ही आवाज लगाई तो उसे गले में ही रोक लिया. कमरे के भीतर ही सिमट गया नेहा का नाम.

‘‘अनुभा, मैं आज शाम को खिचड़ी ही खाऊंगा, साथ में सूप बना देना, अगर दिक्कत न हो तो…’’ रसोई के दरवाजे पर खड़े उमाशंकर ने धीमे स्वर में कहा. झिझक थी उन के स्वर में. समझती है अनुभा, वक्त लगेगा दूरियां खत्म होने में. एकएक कदम की दूरी ही बेशक तय हो, पर शुरुआत तो हो गई है.

वह इंतजार करेगी, जब पापा उसे बहू नहीं बेटी समझेंगे.

नेहा भी तो कब से उस दिन का इंतजार कर रही है. वह जानबूझ कर आती नहीं है मिलने भी कि कहीं पापा उसे देख फिर अनुभा के प्रति कठोर न हो जाएं.

‘‘बहुत ग्लानि होती है कई बार भाभी, मेरी वजह से आप को इतना सब झेलना पड़ रहा है,’’ कल जब अनुभा से बात हुई थी, तो नेहा ने कहा था.

‘‘गिल्टफीलिंग से बाहर निकलो, नेहा. सब ठीक हो जाएगा. आ जाओ थोड़े दिनों के लिए. तरुण भी मिस कर रहे हैं तुम्हें.’’

अनुभा ने सोचा कल ही नेहा को फोन कर के कहेगी कि उसे आ जाना चाहिए मिलने, बेटी है वह घर की. अनुभा को अधिकार दिलाने के चक्कर में अपना हक और अपने हिस्से के प्यार को क्यों छोड़ रही है वह…वह तो कितना तड़प रही है सब से मिलने के लिए. फोन पर चाहे जितनी बात कर लो, पर आमनेसामने बैठ कर बात करने का मजा ही कुछ और होता है. सारी भावनाएं चेहरे पर दिखती हैं तब.

‘‘अरे पापा बिलकुल बन जाएगा, मैं भी आज खिचड़ी ही खाऊंगा और साथ में सूप… वाह मजा आ जाएगा,’’ तरुण उन के साथ आ कर खड़ा हो गया था. दोनों साथसाथ खड़े थे. अपनेपन की एक सोंधी खुशबू खिचड़ी के लिए बनाए तड़के के साथ उठी और अनुभा को लगा जैसे आज देहरी पार कर उस ने सचमुच अपने घर में प्रवेश किया. Hindi Romantic Story.

Hindi Family Story: क्या मिला?- घर परिवार के बोझ को उठाते-उठाते वह खुद को भूल गई

Hindi Family Story: अब मैं 70 साल की हो गई. एकदम अकेली हूं. अकेलापन ही मेरी सब से बड़ी त्रासदी मुझे लगती है. अपनी जिंदगी को मुड़ कर देखती हूं तो हर एक पन्ना ही बड़ा विचित्र है. मेरे मम्मीपापा के हम 2 ही बच्चे थे. एक मैं और मेरा एक छोटा भाई. हमारा बड़ा सुखी परिवार. पापा साधारण सी पोस्ट पर थे, पर उन की सरकारी नौकरी थी.

मैं पढ़ने में होशियार थी. मुझे पापा डाक्टर बनाना चाहते थे और मैं भी यही चाहती थी. मैं ने मेहनत भी की और उस जमाने में इतना कंपीटिशन भी नहीं था. अतः मेरा सलेक्शन इसी शहर में मेडिकल में हो गया. पापा भी बड़े प्रसन्न. मैं भी खुश.

मेडिकल पास करते ही पापा को मेरी शादी की चिंता हो गई. किसी ने एक डाक्टर लड़का बताया. पापा को पसंद आ गया. दहेज वगैरह भी तय हो गया.

लड़का भी डाक्टर था तो क्या मैं भी तो डाक्टर थी. परंतु पारंपरिक परिवार होने के कारण मैं भी कुछ कह नहीं पाई. शादी हो गई. ससुराल में पहले ही उन लोगों को पता था कि यह लड़का दुबई जाएगा. यह बात उन्होंने हम से छुपाई थी. पर लड़की वाले की मजबूरी… क्या कर सकते थे.

मैं पीहर आई और नौकरी करने लगी. लड़का 6 महीने बाद आएगा और मुझे ले जाएगा, यह तय हो चुका था. उन दिनों मोबाइल वगैरह तो होता नहीं था. घरों में लैंडलाइन भी नहीं होता था. चिट्ठीपत्री ही आती थी.

पति महोदय ने पत्र में लिखा, मैं सालभर बाद आऊंगा. पीहर वालों ने सब्र किया. हिंदू गरीब परिवार का बाप और क्या कर सकता था? मैं तीजत्योहार पर ससुराल जाती. मुझे बहुत अजीब सा लगने लगा. मेरे पतिदेव का एक महीने में एक पत्र  आता. वो भी धीरेधीरे बंद होने लगा. ससुराल वालों ने कहा कि वह बहुत बिजी है. उस को आने में 2 साल लग सकते हैं.

मेरे पिताजी का माथा ठनका. एक कमजोर अशक्त लड़की का पिता क्या कर सकता है. हमारे कोई दूर के रिश्तेदार के एक जानकार दुबई में थे. उन से पता लगाया तो पता चला कि उस महाशय ने तो वहां की एक नर्स से शादी कर ली है और अपना घर बसा लिया है. यह सुन कर तो हमारे परिवार पर बिजली ही गिर गई. हम सब ने किसी तरह इस बात को सहन कर लिया.

पापा को बहुत जबरदस्त सदमा लगा. इस सदमे की सहन न कर पाने के कारण उन्हें हार्ट अटैक हो गया. गरीबी में और आटा गीला. घर में मैं ही बड़ी थी और मैं ने ही परिवार को संभाला. किसी तरह पति से डाइवोर्स लिया. भाई को पढ़ाया और उस की नौकरी भी लग गई. हमें लगा कि हमारे अच्छे दिन आ गए. हम ने एक अच्छी लड़की देख कर भैया की शादी कर दी.

मुझे लगा कि अब भैया मम्मी को संभाल लेगा. भैया और भाभी जोधपुर में सैटल हो गए थे. मैं ने सोचा कि जो हुआ उस को टाल नहीं सकते. पर, अब मैं आगे की पढ़ाई करूं, ऐसा सोच ही रही थी. मेरी पोस्टिंग जयपुर में थी. इसलिए मैं यहां आई, तो अम्मां को साथ ले कर आई. भैया की नईनई शादी हुई है, उन्हें आराम से रहने दो.

मैं भी अपने एमडी प्रवेश परीक्षा की तैयारी में लगी. राजीखुशी का पत्र भैयाभाभी भेजते थे. अम्मां भी खुश थीं. उन का मन जरूर नहीं लगता था. मैं ने कहा, ‘‘अभी थोड़े दिन यहीं रहो, फिर आप चली जाना.‘‘ ‘‘ठीक है. मुझे लगता है कि थोड़े दिन मैं बहू के पास भी रहूं.‘‘

‘‘अम्मां थोड़े दिन उन को अकेले भी एंजौय करने दो. नईनई शादी हुई है. फिर तो तुम्हें जाना ही है.‘‘
इस तरह 6 महीने बीत गए. एक खुशखबरी आई. भैया ने लिखा कि तुम्हारी भाभी पेट से है. तुम जल्दी बूआ बनने वाली हो. अम्मां दादी.

इस खबर से अम्मां और मैं बहुत प्रसन्न हुए. चलो, घर में एक बच्चा आ जाएगा और अम्मां का मन पंख लगा कर उड़ने लगा. ‘‘मैं तो बहू के पास जाऊंगी,‘‘ अम्मां जिद करने लगी. मैं ने अम्मां को समझाया, ‘‘अम्मां, अभी मुझे छुट्टी नहीं मिलेगी? जैसे ही छुट्टी मिलेगी, मैं आप को छोड़ आऊंगी. भैया को हम बुलाएंगे तो भाभी अकेली रहेंगी. इस समय यह ठीक नहीं है.‘‘

वे भी मान गईं. हमें क्या पता था कि हमारी जिंदगी में एक बहुत बड़ा भूचाल आने वाला है. मैं ने तो अपने स्टाफ के सदस्यों और अड़ोसीपड़ोसी को मिठाई मंगा कर खिलाई. अम्मां ने पास के मंदिर में जा कर प्रसाद भी चढ़ाया. परंतु एक बड़ा वज्रपात एक महीने के अंदर ही हुआ.

हमारे पड़ोस में एक इंजीनियर रहते थे. उन के घर रात 10 बजे एक ट्रंक काल आया. मुझे बुलाया. जाते ही खबर को सुन कर रोतेरोते मेरा बुरा हाल था. मेरे भाई का एक्सीडेंट हो गया. वह बहुत सीरियस था और अस्पताल में भरती था.

अम्मां बारबार पूछ रही थीं कि क्या बात है, पर मैं उन्हें बता नहीं पाई. यदि बता देती तो जोधपुर तक उन्हें ले जाना ही मुश्किल था. पड़ोसियों ने मना भी किया कि आप अम्मां को मत बताइए.

अम्मां को मैं ने कहा कि भाभी को देखने चलते हैं. अम्मां ने पूछा, ‘‘अचानक ही क्यों सोचा तुम ने? क्या बात हुई है? हम तो बाद में जाने वाले थे?‘‘

किसी तरह जोधपुर पहुंचे. वहां हमारे लिए और बड़ा वज्रपात इंतजार कर रहा था. भैया का देहांत हो गया. शादी हुए सिर्फ 9 महीने हुए थे.

भाभी की तो दुनिया ही उजड़ गई. अम्मां का तो सबकुछ लुट गया. मैं क्या करूं, क्या ना करूं, कुछ समझ नहीं आया. अम्मां को संभालूं या भाभी को या अपनेआप को?

मुझे तो अपने कर्तव्य को संभालना है. क्रियाकर्म पूरा करने के बाद मैं भाभी और अम्मां को साथ ले कर जयपुर आ गई. मुझे तो नौकरी करनी थी. इन सब को संभालना था. भाभी की डिलीवरी करानी थी.

भाभी और अम्मां को मैं बारबार समझाती.

मैं तो अपना दुख भूल चुकी. अब यही दुख बहुत बड़ा लग रहा था. मुझ पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. उन दिनों वेतन भी ज्यादा नहीं होता था.

मकान का किराया चुकाते हुए 3 प्राणी तो हम थे और चौथा आने वाला था. नौकरी करते हुए पूरे घर को संभालना था.

अम्मां भी एक के बाद एक सदमा लगने से बीमार रहने लगीं. उन की दवाई का खर्चा भी मुझे ही उठाना था.

मैं एमडी की पढ़ाईलिखाई वगैरह सब भूल कर इन समस्याओं में फंस गई. भाभी के पीहर वालों ने भी ध्यान नहीं दिया. उन की मम्मी पहले ही मर चुकी थी. उन की भाभी थीं और पापा बीमार थे. ऐसे में किसी ने उन्हें नहीं बुलाया. मैं ही उन्हें आश्वासन देती रही. उन्हें अपने पीहर की याद आती और उन्हें बुरा लगता कि पापा ने भी मुझे याद नहीं किया. अब उस के पापा ना आर्थिक रूप से संपन्न थे और ना ही शारीरिक रूप से. वे भला क्या करते? यह बात तो मेरी समझ में आ गई थी.

अम्मां को भी लगता कि सारा भार मेरी बेटी पर ही आ गया. बेटी पहले से दुखी है. मैं अम्मां को भी समझाती. इस छोटी उम्र में ही मैं बहुत बड़ी हो गई थी. मैं बुजुर्ग बन गई थी.

भाभी की ड्यू डेट पास में आने पर अम्मां और भाभी मुझ से कहते, ‘‘आप छुट्टी ले लो. हमें डर लगता है?‘‘

‘‘अभी से छुट्टी ले लूं. डिलीवरी के बाद भी तो लेनी है?‘‘

बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया. रात को परेशानी हुई तो मैं भाभी को ले कर अस्पताल गई और उन्हें भरती कराया. अस्पताल वालों को पता ही था कि मैं डाक्टर हूं. उन्होंने कहा कि आप ही बच्चे को लो. सब से पहले मैं ने ही उठाया. प्यारी सी लड़की हुई थी.

सुन कर भाभी को अच्छा नहीं लगा. वह कहने लगी, ‘‘लड़का होता तो मेरा सहारा ही बनता.‘‘

‘‘भाभी, आप तो पढ़ीलिखी हो कर कैसी बातें कर रही हैं? आप बेटी की चिंता मत करो. उसे मैं पालूंगी.‘‘

उस का ज्यादा ध्यान मैं ने ही रखा. भाभी को अस्पताल से घर लाते ही मैं ने कहा, ‘‘भाभी, आप भी बीएड कर लो, ताकि नौकरी लग जाए.‘‘

विधवा कोटे से उन्हें तुरंत बीएड में जगह मिल गई. बच्चे को छोड़ वह कालेज जाने लगी. दिन में बच्ची को अम्मां देखतीं. अस्पताल से आने के बाद उस की जिम्मेदारी मेरी थी. पर, मैं ने खुशीखुशी इस जिम्मेदारी को निभाया ही नहीं, बल्कि मुझे उस बच्ची से विशेष स्नेह हो गया. बच्ची भी मुझे मम्मी कहने लगी.

नौकरानी रखने लायक हमारी स्थिति नहीं थी. सारा बोझ मुझ पर ही था. किसी तरह भाभी का बीएड पूरा हुआ और उन्हें नौकरी मिल गई. मुझे थोड़ी संतुष्टि हुई. पर पहली पोस्टिंग अपने गांव में मिली. भाभी बच्ची को छोड़ कर चली गई. हफ्ते में या छुट्टी के दिन ही भाभी आती. बच्ची का रुझान अपनी मम्मी की ओर से हट कर पूरी तरह से मेरी ओर और अम्मां की तरफ ही था. हम भी खुश ही थे.

पर, मुझे लगा कि भाभी अभी छोटी है. वह पूरी जिंदगी कैसे अकेली रहेगी?

मैं ने भाभी से बात की. भाभी रितु बोली, ‘‘मुझे बच्चे के साथ कौन स्वीकार करेगा?‘‘

मैं ने कहा, ‘‘तुम गुड़िया की चिंता मत करो. उसे हम पाल लेंगे.‘‘

उस के बाद मैं ने भाभी रितु के लिए वर ढूंढ़ना शुरू किया. माधव नाम के एक आदमी ने भाभी से शादी करने की इच्छा प्रकट की. हम लोग खुश हुए. पर उस ने भी शर्त रख दी कि रितु भाभी अपनी बेटी को ले कर नहीं आएगी, क्योंकि उन के पहले ही एक लड़की थी.

मैं ने तो साफ कह दिया, ‘‘आप इस बात की चिंता ना करें. मैं बिटिया को संभाल लूंगी. मैं उसे पालपोस कर बड़ा करूंगी.‘‘

उस पर माधव राजी हो गया और यह भी कहा कि आप को भी आप के भाई की कमी महसूस नहीं होने दूंगा.

सुन कर मुझे भी बहुत अच्छा लगा. शुरू में माधव और रितु अकसर आतेजाते रहे. अम्मां को भी अच्छा लगता था, मुझे भी अच्छा लगता था. मैं भी माधव को भैया मान राखी बांधने लगी. सब ठीकठाक ही चल रहा था.

उन्होंने कोई जिम्मेदारी नहीं उठाई, परंतु अपने शहर से हमारे घर पिकनिक मनाने जैसे आ जाते थे. इस पर भी अम्मां और मैं खुश थे.

जब भी वे आते भाभी रितु को अपनी बेटी मान अम्मां उन्हें तिलक कर के दोनों को साड़ी, मिठाई, कपड़े आदि देतीं.

अब गुड़िया बड़ी हो गई. वह पढ़ने लगी. पढ़ने में वह होशियार निकली. उस ने पीएचडी की. उस के लिए मैं ने लड़का ढूंढा. अच्छा लड़का राज भी मिल गया. लड़कालड़की दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. अब लड़के वाले चाहते थे कि उन के शहर में ही आ कर शादी करें.

मैं उस बात के लिए राजी हो गई. मैं ने सब का टिकट कराया. कम से कम 50 लोग थे. सब का टिकट एसी सेकंड क्लास में कराया. भाभी रितु और माधव मेहमान जैसे हाथ हिलाते हुए आए.

यहां तक भी कोई बात नहीं. उस के बाद उन्होंने ससुराल वालों से मेरी बुराई शुरू कर दी. यह क्यों किया, मेरी समझ के बाहर की बात है. अम्मां को यह बात बिलकुल सहन नहीं हुई. मैं ने तो जिंदगी में सिवाय दुख के कुछ देखा ही नहीं. किसी ने मुझ से प्रेम के दो शब्द नहीं बोले और ना ही किसी ने मुझे कोई आर्थिक सहायता दी.

मुझे लगा, मुझे सब को देने के लिए ही ऊपर वाले ने पैदा किया है, लेने के लिए नहीं. पेड़ सब को फल देता है, वह स्वयं नहीं खाता. मुझे भी पेड़ बनाने के बदले ऊपर वाले ने मनुष्यरूपी पेड़ का रूप दे दिया लगता है.

मुझे भी लगने लगा कि देने में ही सुख है, खुशी है, संतुष्टि है, लेने में क्या रखा है?

मैं ने भी अपना ध्यान भक्ति की ओर मोड़ लिया. अस्पताल जाना, मंदिर जाना, बाजार से सौदा लाना वगैरह.

गुड़िया की ससुराल तो उत्तर प्रदेश में थी, परंतु दामाद राज की पोस्टिंग चेन्नई में थी. शादी के बाद 3 महीने तक गुड़िया नहीं आई. चिट्ठीपत्री बराबर आती रही. अब तो घर में फोन भी लग गया था. फोन पर भी बात हो जाती. मैं ने कहा कि गुड़िया खुश है. उस को जब अपनी मम्मी के बारे में पता चला, तो उसे भी बहुत बुरा लगा. फिर हमारा संबंध उन से बिलकुल कट गया.

3 महीने बाद गुड़िया चेन्नई से आई. मैं भी खुश थी कि बच्ची देश के अंदर ही है, कभी भी कोई बात हो, तुरंत आ जाएगी. इस बात को सोच कर मैं बड़ी आश्वस्त थी. पर गुड़िया ने आते ही कहा, ‘‘राज का सलेक्शन विदेश में हो गया है.‘‘

इस सदमे को कैसे बरदाश्त करूं? पुरानी बातें याद आने लगीं. क्या इस बच्ची के साथ भी मेरे जैसे ही होगा? मेरे मन में एक अनोखा सा डर बैठ गया. मैं गुड़िया से कह न पाई, पर अंदर ही अंदर घुटती ही रही.

शुरू में राज अकेले ही गए और मेरा डर मैं किस से कहूं? पर गुड़िया और राज में अंडरस्टैंडिंग बहुत अच्छी थी. बराबर फोन आते. मेल आता था. गुड़िया प्रसन्न थी. मैं अपने डर को अंदर ही अंदर महसूस कर रही थी.

फिर 6 महीने बाद राज आए और गुड़िया को ले गए. मुझे बहुत तसल्ली हुई. पर अम्मां गुड़िया के वियोग को सहन न कर पाईं. उस के बाद अम्मां निरंतर बीमार रहने लगीं.

अम्मां का जो थोड़ाबहुत सहारा था, वह भी खत्म हो गया. उन की देखभाल का भार और बढ़ गया.

एक साल बाद फिर गुड़िया आई. तब वह 2 महीने की प्रेग्नेंट थी. राज ने फिर अपनी नौकरी बदल ली. अब कनाडा से अरब कंट्री में चला गया. वहां राज सिर्फ सालभर के लिए कौंट्रैक्ट में गया था. अब तो गुड़िया को ले जाने का ही प्रश्न नहीं था. गुड़िया प्रेग्नेंट थी.

क्या आप मेरी स्थिति को समझ सकेंगे? मैं कितने मानसिक तनावों से गुजर रही थी, इस की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता. मैं किस से कहती? अम्मां समझने लायक स्थिति में नहीं थीं. गुड़िया को कह कर उसे परेशान नहीं करना चाहती थी. इस समय वैसे ही वह प्रेग्नेंट थी. उसे परेशान करना तो पाप है. गुड़िया इन सब बातों से अनजान थी.

डाक्टर ने गुड़िया को बेड रेस्ट के लिए कह दिया था. अतः वह ससुराल भी जा नहीं सकती थी. उस की सासननद आ कर कभी उस को देख कर जाते. उन के आने से मेरी परेशानी ही बढ़ती, पर मैं क्या करूं? अपनी समस्या को कैसे बताऊं? गुड़िया की मम्मी ने तो पहले ही अपना पल्ला झाड़ लिया था.

मैं जिम्मेदारी से भागना नहीं चाहती थी, परंतु विभिन्न प्रकार की आशंकाओं से मैं घिरी हुई थी. मैं ने कभी कोई खुशी की बात तो देखी नहीं, हमेशा ही मेरे साथ धोखा ही होता रहा. मुझे लगने लगा कि मेरी काली छाया मेरी गुड़िया पर ना पड़े. पर, मैं इसे किसी को कह भी नहीं सकती. अंदर ही अंदर मैं परेशान हो रही थी. उसी समय मेरे मेनोपोज का भी था.

इस बीच अम्मां का देहांत हो गया.

गुड़िया का ड्यू डेट भी आ गया और उस ने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया. मैं खुश तो थी, पर जब तक उस के पति ने आ कर बच्चे को नहीं देखा, मेरे अंदर अजीब सी परेशानी होती रही थी.

जब गुड़िया का पति आ कर बच्चे को देख कर खुश हुआ, तब मुझे तसल्ली आई.

अब तो गुड़िया अपने पति के साथ विदेश में बस गई और मैं अकेली रह गई. यदि गुड़िया अपने देश में होती तो मुझ से मिलने आती रहती, पर विदेश में रहने के कारण साल में एक बार ही आ पाती. फिर भी मुझे तसल्ली थी. अब कोरोना की वजह से सालभर से ज्यादा हो गया, वह नहीं आई. और अभी आने की संभावना भी इस कोरोना के कारण दिखाई नहीं दे रही, पर मैं ने एक लड़की को पढ़ालिखा कर उस की शादी कर दी. भाभी की भी शादी कर दी. यह तसल्ली मुझे है. पर बुढ़ापे में रिटायर होने के बाद अकेलापन मुझे खाने को दौड़ता है. इस को एक भुक्तभोगी ही जान सकता है.

अब आप ही बताइए कि मेरी क्या गलती थी, जो पूरी जिंदगी मैं ने इतनी तकलीफ पाई? क्या लड़की होना मेरा गुनाह था? लड़का होना और मेरी जिंदगी से खेलना मेरे पति के लड़का होने का घमंड? उस को सभी छूट…? यह बात मेरी समझ में नहीं आई? आप की समझ में आई तो मुझे बता दें. Hindi Family Story.

Hindi Family Story: यह कैसा धर्म है- किस अंधविश्वास में जी रहा था संजय?

Hindi Family Story: ‘‘यह क्या? इस उम्र में प्याज और अंडा खाने लगी हो, प्रभु के चरणों में ध्यान लगाओ, सारे पाप दूर हो जाएंगे,’’ संजय ने अपनी पत्नी को ताना मारा, ‘‘सारी उम्र तो तुम ने इन चीजों को हाथ नहीं लगाया और अब न जाने कैसे इन का स्वाद आने लगा है तुम्हें. पहले जब मैं खाता था तो तुम्हें ही इस पर आपत्ति होती थी. अब तुम कहां इन चक्करों में पड़ रही हो. ईश्वरभक्ति करो, बस. सारी बीमारियां दूर हो जाएंगी.’’ ‘‘मेरी मजबूरी है, इसलिए खा रही हूं. यह बात तुम्हें भी पता है कि डाक्टर ने कहा है कि शरीर में विटामिन सी और डी की कमी हो गई है. जिस से हड्डियों में इन्फैक्शन हो गया है.

घुटनों और कमर में दर्द की वजह से ठीक से चल तक नहीं पाती हूं. वैजिटेरियन डाइट से ये विटामिन कहां मिलते हैं. आप जानते हुए भी ताना देने से बाज नहीं आ रहे हैं. प्याज और अंडा खाना अगर पाप होता तो दुनियाभर के अधिकांश लोग पापी कहलाते. इस बात का प्रभुभक्ति से क्या ताल्लुक? ‘‘वैसे, आप मुझे बताओगे कि मैं ने कौन से पाप किए हैं? रही बात प्रभु के चरणों में ध्यान लगाने की और तुम यह कहो कि सारा दिन बैठ कर भजन करूं या तुम्हारी तरह टीवी पर आने वाले बाबाओं के प्रवचन या उन का कथावाचन सुनूं तो मैं इसे जरूरी नहीं समझती.

निठल्ले लोग धर्म की आड़ में अपने दोषों को छिपाने के लिए सारे दिन ऐसे प्रोग्राम देख खुद को जस्टिफाई करने की कोशिश करते हैं.’’ शगुन लगातार बोलती गई, मानो आज वह मन में बरसों से दबाए ज्वालामुखी को फटने देने के लिए तैयार हो. ‘‘शगुन, कुछ ज्यादा नहीं बोल रही हो तुम?’’ चिढ़ते हुए संजय ने कहा, ‘‘मुझ से ज्यादा बकवास करने की जरूरत नहीं है. मुझे पता है कि क्या सही है और क्या गलत. कितना ज्ञान और सुकून प्राप्त होता है प्रवचन सुन कर. प्रवचनों को सुनने से ही तो पापों से मुक्ति मिलती है.’’ ‘‘तो मानते हो न कि तुम ने पाप किए हैं?

झूठ बोलना, किसी का दिल दुखाना या बुरे काम करना जितना पाप है उतना ही अपनी जिम्मेदारियां न निभाना भी पाप है. सच बात तो यह है कि इस तरह से तुम्हारा टाइम पास हो जाता है और अपने को झूठा दिलासा भी दे लेते हो कि मैं तो सारा दिन ईश्वरभक्ति में लीन रहता हूं. अपने आलसी स्वभाव की वजह से तुम तो सारे काम छोड़ कर बैठ गए हो. बिजनैस पर ध्यान देना तक छोड़ दिया, तो वह चौपट होना ही था. ‘‘मेरी नौकरी से घर चल रहा है. लेकिन आजकल एक व्यक्ति की कमाई से क्या होता है. जब तक बच्चे सैटल नहीं हो जाते, तब तक तो उन्हें संभालना तुम्हारी ही जिम्मेदारी है.

मेरी जिम्मेदारी तो खैर तुम क्या उठाओगे. क्या तुम्हारा भगवान कहता है कि तुम उस की पूजा करना चाहते हो तो सब काम छोड़ कर बैठ जाओ. सबकुछ अपनेआप मिल जाएगा.’’ ‘‘ज्यादा भाषण न झाड़ो, अपनी औकात में रहो. और जो तुम कमाने का ताना दे रही हो, तो इस के लिए तुम्हें ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है, भगवान सब संभाल लेंगे.’’ संजय ने आज से पहले शगुन की बात कब सुनी थी जो अब सुनते. वे तो सदा ही उस की अवमानना करते आए थे. शगुन की बातबात पर बेइज्जती करना, बच्चों के सामने उस की खिल्ली उड़ाना और बाहर वालों के सामने उस का अपमान करना तो जैसे उन के लिए आम बात थी. शादी के बाद ही शगुन को पता चल गया था कि संजय रुढि़वादी सोच का व्यक्ति है जो कामचोर होने के साथसाथ बीवी की कमाई पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है पर उसे समान दर्जा देने में उस का अहम आड़े आता है. शादी के बाद तो संजय अकसर उस पर हाथ भी उठा देते थे.

गालियां देना, उस के हर काम में कमियां निकालना तो जैसे वे अपना हक समझते थे. ‘पुरुष हूं, जो चाहे कर सकता हूं’ की सोच ही उन्हें शायद घुट्टी में पिलाई गई थी. न खुद हंसना, न ही किसी की खुशी उन्हें बरदाश्त थी. यहां तक कि वे बच्चों के साथ मजाक तक करने से कतराते थे. शगुन के अंदर बीतते वक्त के साथ एक खीझ भरती गई थी कि आखिर संजय क्यों नहीं आम लोगों की तरह व्यवहार करते हैं. होटल में खाना खाना हो या कभी मूवी देखने जाना हो या घर पर किसी मेहमान को ही आना हो, हर बात उन्हें खलती थी. किसी के घर या फंक्शन में जाने की बात सुन कर ही चिढ़ जाते.

अपनी बात जारी रखते हुए संजय आगे बोले, ‘‘रोजरोज मुझ से इस बात पर बहस करने की जरूरत नहीं और न ही काम करने के लिए कहने की, मैं अपने और भगवान के बीच किसी को नहीं आने दूंगा. वही सब संभालेंगे.’’ ‘‘हां हां, सब भगवान ही संभालेंगे, पर उन को जिंदा रखने के लिए कर्म भी हम मनुष्यों को ही करना पड़ता है. मंदिरमसजिद क्या अपनेआप पेड़ों की तरह उग आते हैं. रोटी सामने रखी हो पर निवाला तभी मुंह में जाएगा जब उसे खुद तोड़ कर खाया जाए. संजय, अब भी संभल जाओ. अभी हमारी उम्र ही क्या हुई है. तुम 49 के हो और मैं 45 की. हमारी शादीशुदा जिंदगी को अपनी पलायन करने वाली सोच से बरबाद मत करो. पलायन करने से कोई मोक्षवोक्ष नहीं मिलता.

कर्म करने से ही मुक्ति मिलती है. ‘‘मैं तो अपनी नौकरी, बीमारी और घर के कामों की वजह से ज्यादा समय नहीं निकाल सकती, पर तुम तो सारा दिन घर में बैठे रहते हो. तुम बच्चों पर थोड़ा ध्यान दो वरना उन का कैरियर बरबाद हो जाएगा. उन के साथ बात किया करो, हंसा करो और उन्हें टीवी पर इन बाजारू प्रवचनों को देखने के लिए उकसाना बंद करो. नीरज को देखो, वह भी तुम्हारे साथ टीवी देखता रहता है या सोता रहता है. इस बार इसे 12वीं का एग्जाम देना है, पढ़ेगा नहीं तो पास कैसे होगा. कहीं ऐडमिशन कैसे होगा. आजकल कंपीटिशन कितना टफ हो गया है.’’ ‘‘उस की चिंता तुम मत करो. भगवान उसे पास कर देंगे. तुम्हारी बेटी नीरा तो दिनरात पढ़ती है, उसी से तुम तसल्ली रख लो.

नीरज के मामले में दखल मत दो. नहीं पढ़ेगा तो मेरा बिजनैस संभाल लेगा.’’ ‘‘बस करो संजय, यह राग अलापना. अरे, पढ़ेगा नहीं तो भगवान क्या आ कर उस के पेपर सौल्व कर देंगे. क्यों मूर्खों जैसी बातें करते हो. तुम्हें पढ़नेलिखने या तरक्की करने की इच्छा नहीं है तो नीरज को भी अपने जैसा क्यों बनाना चाहते हो, कैसे पिता हो तुम.’’ शगुन का मन कर रहा था कि वह संजय को झ्ंिझोड़ डाले, आखिर क्यों वे अपने ही बच्चों को अंधविश्वास के कुएं में ढकेलना चाहते हैं. ‘‘बेकार की बातों में उलझने के बजाय मेरे साथ वृंदावन चला करो. वहां घर इसीलिए तो बनाया है ताकि वहां जा कर मैं प्रभु के चरणों में पड़ा रहूं और अपना आगे का जीवन सुधार सकूं. यह जन्म तो कट गया, अगला जन्म सुधारना है, तो बस सारे दिन ईश्वर की पूजा किया करो, तुम्हें भी मैं यही सलाह दूंगा.’’ ‘‘मैं भी वृंदावन चली गई तो बिना नौकरी के घर कैसे चलेगा? बेटी की शादी कौन करेगा? बेटे को कौन संभालेगा?

तुम्हारे खर्चे कौन उठाएगा? तुम्हें रोज शराब पीने की लत है, उस के लिए भी पैसे क्या भगवान देगा? रोज शराब पीते हो तो क्या तुम्हारा ईश्वर इस की तुम्हें इजाजत देता है. वृंदावन जाते हो तो कौन सा शराब पीना छोड़ देते हो. बस, तुम्हें तो अपने दायित्वों से भागने का बहाना चाहिए. ‘‘सब से बड़ी बात तो यह है कि ईश्वर से लौ लगाने वाले शांत रहते हैं, उन्हें क्रोध नहीं आता, वे किसी पर चिल्लाते नहीं हैं या उन का अपमान नहीं करते हैं. इतने सालों से तुम बाबाओं के प्रवचन सुन रहे हो, पर तुम में तो रत्तीभर भी बदलाव नहीं आया. गुस्सा करना और हमेशा चिढ़े रहना कहां छोड़ा है तुम ने. क्या फायदा ऐसे धर्म का जो दूसरों को दुख पहुंचाए या कर्तव्यों से विमुख करे.

‘‘धर्म के नाम पर तुम दान करते हो कि पुण्य मिलेगा, पर सोचा है कि बच्चों की कितनी जरूरतों का तुम गला घोंटते हो. और देखा जाए तो धर्म के नाम पर जो लाखों रुपए का चढ़ावा चढ़ाया जाता है, भला उस की क्या जरूरत है. भगवान को सोने का मुकुट दे कर आखिर इंसान क्या साबित करना चाहता है? अपनी बेवकूफी और क्या. धर्म के नाम पर चढ़ाए गए चढ़ावे अगर हम अपनी जरूरतों पर खर्च करें तो ज्यादा सुख मिलेगा. धार्मिक स्थलों पर जा कर देखो तो, आजकल सब पंडेपुजारी कारोबारी हो गए हैं.’’ ‘‘मम्मी, रहने दो न. बेकार बहस करने से क्या फायदा. पापा इस समय होश में नहीं हैं,’’ नीरज ने बात बढ़ती देख बीचबचाव करने की कोशिश की.

‘‘बेटा, तुझे ले कर मैं कितनी परेशान रहती हूं, यह नहीं बता सकती. डर लगता है कि कहीं तू अपने पापा के कदमों पर न चले,’’ शगुन की आंखें भर आई थीं. ‘‘चुप हो जा, तेरी जबान कुछ ज्यादा ही चलने लगी है. मुझे नहीं रहना तेरे साथ. जब देखो तब भूंकती रहती है. चला जाऊंगा हमेशा के लिए वृंदावन, फिर संभाल लेना बच्चों को. अपनेआप को कुछ ज्यादा ही स्मार्ट व पढ़ीलिखी समझती है,’’ संजय का तेज थप्पड़ शगुन के गाल पर पड़ा. संजय के इस व्यवहार से थरथरा गई शगुन. शराब पीने से हुई उस की लाल आंखें और डगमगाते कदमों को देख उस के दोनों बच्चे कांप गए. आखिर वे धर्म का ही पालन कर रहे थे कि औरत पाप की गठरी है, पैरों की जूती है. संजय का वीभत्स रूप और निरंतर उस के मुंह से निकलती गालियां सुन नीरा चुप न रह सकी. ‘‘अच्छा यही होगा पापा कि आप यहां से चले जाओ. जहां मन है, चले जाओ. आप के इस रूप को देख धर्म और ईश्वर पर से हमारा विश्वास उठ गया है.

प्यार की जगह आप ने हम में जो घृणा भर दी है, उस से हम दूर ही रहना चाहते हैं,’’ नीरा बोल पड़ी. ‘‘तू भी अपनी मां की जबान बोलने लगी है,’’ संजय ने उसे मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि नीरज ने उस का हाथ पकड़ लिया. ‘‘खबरदार पापा, जो आप ने दीदी या मम्मी पर हाथ उठाया,’’ नीरज क्रोधित होते हुए बोला. ‘‘अरे, तू तो मेरा राजा बेटा है न, चल हम बापबेटे दोनों यहां नहीं रहेंगे,’’ संजय की आवाज की लड़खड़ाहट की वजह से उन से ठीक से बोला नहीं जा रहा था. वे बिस्तर पर गिर गए. ‘‘मुझे कहीं नहीं जाना. पर बेहतर यही होगा कि आप यहां से चले जाएं.

हमें आप के झूठे पाखंडों और धर्म के नाम पर बनाए खोखले आदर्शों के साए तले नहीं जीना. आप जैसे जीना चाहते हैं, जिएं, पर अपनी बेकार की बातों को हम पर थोपने की कोशिश न करें. अब बहुत हो गया. और नहीं सहेंगे हम,’’ नीरज ने शगुन और नीरा को कस कर अपने से चिपका लिया था मानो वह उन्हें चिंतामुक्त रहने का आश्वासन दे रहा हो. Hindi Family Story.

Hindi Family Story: खलनायक- क्या हो पाई कविता और गौरव की शादी?

Hindi Family Story: विवाह की 10वीं वर्षगांठ के निमंत्रणपत्र छप कर अभीअभी आए थे. कविता बड़े चाव से उन्हें उलटपलट कर देख रही थी. साथ ही सोच रही थी कि जल्दी से एक सूची तैयार कर ले और नाम, पते लिख कर इन्हें डाक में भेज दे. ज्यादा दिन तो बचे नहीं थे. कुछ निमंत्रणपत्र स्वयं बांटने जाना होगा, कुछ गौरव अकेले ही देने जाएंगे. हां, कुछ कार्ड ऐसे भी होंगे जिन्हें ले कर वह अके जाएगी.

सोचतेसोचते कविता को उन पंडितजी की याद आई जिन्होंने उस के विवाह के समय उस के ‘मांगलिक’ होने के कारण इस विवाह के असफल होने की आशंका प्रकट की थी. पंडितजी के संदेह के कारण दोनों परिवारों में उलझनें पैदा हो गई थीं. ताईजी ने तो अपने इन पंडितजी की बातों से प्रभावित हो कर कई पूजापाठ करवा डाले थे.

एकएक कर के कविता को अपने विवाह से संबंधित सभी छोटीबड़ी घटनाएं याद आने लगीं. कितना तनाव सहा था उस के परिवार वालों ने विवाह के 1 माह पूर्व. उस समय यदि गौरव ने आधुनिक एवं तर्कसंगत विचारों से अपने परिवार वालों को समझायाबुझाया न होता तो हो चुका था यह विवाह. कविता को जब गौरव, उस के मातापिता एवं ताईजी देखने आए थे तो सभी को दोनों की जोड़ी ऐसी जंची कि पहली बार में ही हां हो गई. गौरव के पिता नंदकिशोर का अपना व्यवसाय था. अच्छाखासा पैसा था. परिवार में गौरव के मातापिता, एक बहन और एक ताईजी थीं. कुछ वर्ष पूर्व ताऊजी की मृत्यु हो गई थी.

ताईजी बिलकुल अकेली हो गई थीं, उन की अपनी कोई संतान न थी. गौरव और उस की बहन गरिमा ही उन का सर्वस्व थे. गौरव तो वैसे ही उन की आंख का तारा था. बच्चे ताईजी को बड़ी मां कह कर पुकारते और उन्हें सचमुच में ही बड़ी मां का सम्मान भी देते. गौरव के मातापिता भी ताईजी को ही घर का मुखिया मानते थे. घर में छोटेबड़े सभी निर्णय उन की सम्मति से ही लिए जाते थे.

जैसा कि प्राय: होता है, लड़की पसंद आने के कुछ दिन पश्चात छोटीमोटी रस्म कर के रिश्ता पक्का कर दिया गया. इस बीच गौरव और कविता कभीकभार एकदूसरे से मिलने लगे. दोनों के मातापिता को इस में कोई आपत्ति भी न थी. वे स्वयं भी पढ़ेलिखे थे और स्वतंत्र विचारों के थे. बच्चों को ऊंची शिक्षा देने के साथसाथ अपना पूर्ण विश्वास भी उन्होंने बच्चों को दिया था. अत: गौरव का आनाजाना बड़े सहज रूप में स्वीकार कर लिया गया था. पंडितजी से शगुन और विवाह का मुहूर्त निकलवाने ताईजी ही गई थीं. पंडितजी ने कन्या और वर दोनों की जन्मपत्री की मांग की थी.

दूसरे दिन कविता के घर यह संदेशा भिजवाया गया कि कन्या की जन्मपत्री भिजवाई जाए ताकि वर की जन्मपत्री से मिला कर उस के अनुसार ही विवाह का मुहूर्त निकाला जाए. कविता के मातापिता को भला इस में क्या आपत्ति हो सकती थी, उन्होंने वैसा ही किया.

3 दिन पश्चात ताईजी स्वयं कविता के घर आईं. अपने भावी समधी से वे अनुरोध भरे स्वर में बोलीं, ‘‘कविता के पक्ष में ‘मंगलग्रह’ भारी है. इस के लिए हमारे पंडितजी का कहना है कि आप के घर में कविता द्वारा 3 दिन पूजा करवा ली जाए तो इस ग्रह का प्रकोप कम हो सकता है. आप को कष्ट तो होगा, लेकिन मैं समझती हूं कि हमें यह करवा ही लेना चाहिए.’’

कविता के मातापिता ने इस बात को अधिक तूल न देते हुए अपनी सहमति दे दी और 3 दिन के अनुष्ठान की सारी जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार कर ली. 2 दिन आराम से गुजर गए और कविता ने भी पूरी निष्ठा से इस अनुष्ठान में भाग लिया. तीसरे दिन प्रात: ही फोन की घंटी बजी और लगा कि कविता के पिता फोन पर बात करतेकरते थोड़े झुंझला से रहे हैं.

फोन रख कर उन्होंने बताया, ‘‘ताईजी के कोई स्वामीजी पधारे हैं. ताईजी ने उन को कविता और गौरव की जन्मकुंडली आदि दिखा कर उन की राय पूछी थी. स्वामीजी ने कहा है कि इस ग्रह को शांत करने के लिए 3 दिन नहीं, पूरे 1 सप्ताह तक पूजा करनी चाहिए और उस के उपरांत कन्या के हाथ से बड़ी मात्रा में 7 प्रकार के अन्न, अन्य वस्तुएं एवं नकद राशि का दान करवाना चाहिए. ताईजी ने हमें ऐसा ही करने का आदेश दिया है.’’

यह सब सुन कर कविता को अच्छा नहीं लगा. एक तो घर में वैसे ही विवाह के कारण काम बढ़ा हुआ था, जिस पर दिनरात पंडितों के पूजापाठ, उन के खानेपीने का प्रबंध और उन की देखभाल. वह बेहद परेशान हो उठी.  कविता जानती थी कि दानदक्षिणा की जो सूची बताई गई है उस में भी पिताजी का काफी खर्च होगा. वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे. लेकिन मां के चेहरे पर कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने ही जैसेतैसे पति और बेटी को समझाबुझा कर धीरज न खोने के लिए राजी किया. उन की व्यावहारिक बुद्धि यही कहती थी कि लड़की वालों को थोड़ाबहुत झुकना ही पड़ता है.

इस बीच गौरव भी अपनी और अपने मातापिता की ओर से कविता के घर वालों से उन्हें परेशान करने के लिए क्षमा मांगने आया. वह जानता था कि यह सब ढकोसला है, लेकिन ताईजी की भावनाओं और उन की ममता की कद्र करते हुए वह उन्हें दुखी नहीं करना चाहता था. इसलिए वह भी इस में सहयोग देने के लिए राजी हो गया था, वरना वह और उस के मातापिता किसी भी कारण से कविता के परिवार वालों को अनुचित कष्ट नहीं देना चाहते थे.

लेकिन अभी एक और प्रहार बाकी था. किसी ने यह भी बता दिया था कि इस अनुष्ठान के पश्चात कन्या का एक झूठमूठ का विवाह बकरे या भेड़ से करवाना जरूरी है क्योंकि मंगल की जो कुदृष्टि पूजा के बाद भी बच जाएगी, वह उसी पर पड़ेगी. उस के पश्चात कविता और गौरव का विवाह बड़ी धूमधाम से होगा और उन का वैवाहिक जीवन संपूर्ण रूप से निष्कंटक हो जाएगा.  ताईजी यह संदेश ले कर स्वयं आई थीं. उस समय कविता घर पर नहीं थी. जब वह आई और उस ने यह बेहूदा प्रस्ताव सुना तो बौखला उठी. उसे समझ नहीं आया कि वह क्या करे. पहली बार उस ने गौरव को अपनी ओर से इस में सम्मिलित करने का सोचा.

उस ने गौरव से मिल कर उसे सारी बात बताई. गौरव की भी वही प्रतिक्रिया हुई, जिस की कविता को आशा थी. वह सीधा घर गया और अपने परिवार वालों को अपना निर्णय सुना डाला, ‘‘यदि आप इन सब ढकोसलों को और बढ़ावा देंगे या मानेंगे तो मैं कविता तो क्या, किसी भी अन्य लड़की से विवाह नहीं करूंगा और जीवन भर अविवाहित रहूंगा. मैं आप को दुखी नहीं करना चाहता, आप की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता, नहीं तो मैं पूजा करने की बात पर ही आप को रोक देता. लेकिन अब तो हद ही हो गई है. आप लोगों को मैं ने अपना फैसला सुना दिया है. अब आगे आप की इच्छा.’’

ताईजी का रोरो कर बुरा हाल था. उन्हें तो यही चिंता खाए जा रही थी कि कविता के ‘मांगलिक’ होने से गौरव का अनिष्ट न हो, लेकिन गौरव उन की बात समझने की कोशिश ही नहीं कर रहा था. उस का कहना था, ‘‘यह झूठमूठ का विवाह कर लेने से कविता का क्या बिगड़ जाएगा?’’  उधर कविता को भी गौरव ने यही पट्टी पढ़ाई थी कि तुम पर कैसा भी दबाव डाला जाए, तुम टस से मस न होना, भले ही कितनी मिन्नतें करें, जबरदस्ती करें, किसी भी दशा में तुम अपना फैसला न बदलना. भला कहीं मनुष्यों के विवाह जानवरों से भी होते हैं. भले ही यह झूठमूठ का ही क्यों न हो.

कविता तो वैसे ही ताईजी के इस प्रस्ताव को सुन कर आपे से बाहर हो रही थी. उस पर गौरव ने उस की बात को सम्मान दे कर उस की हिम्मत को बढ़ाया था. साथ ही गौरव ने यह भी बता दिया था कि उस के मातापिता को कविता बहुत पसंद है और वे इन ढकोसलों में विश्वास नहीं करते. इसलिए ताईजी को समझाने में उस के मातापिता भी सहायता करेंगे. वैसे ताईजी को यह स्वीकार ही नहीं होगा कि गौरव जीवन भर अविवाहित रहे. वे तो न जाने कितने वर्षों से उस के विवाह के सपने देख रही थीं और उस की बहू के लिए उन्होंने अच्छे से अच्छे जेवर सहेज कर रखे हुए थे.

लेकिन पुरानी रूढि़यों में जकड़ी अशिक्षित ताईजी एक अनजान भय से ग्रस्त इन पाखंडों और लालची पंडितों की बातों में आ गई थीं. गौरव ने कविता को बता दिया था कि धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा और अगर फिर भी ताईजी ने स्वीकृति न दी तो दोनों के मातापिता की स्वीकृति तो है ही, वे चुपचाप शादी कर लेंगे.

कविता को गौरव की बातों ने बहुत बड़ा सहारा दिया था. पर क्या ताईजी ऐसे ही मान गई थीं? घर छोड़ जाने और आजीवन विवाह न करने की गौरव द्वारा दी गई धमकियों ने अपना रंग दिखाया और 4 महीने का समय नष्ट कर के अंत में कविता और गौरव का विवाह बड़ी धूमधाम से हो गया.

कविता एक भरपूर गृहस्थी के हर सुख से संपन्न थी. धनसंपत्ति, अच्छा पति, बढि़या स्कूलों में पढ़ते लाड़ले बच्चे और अपने सासससुर की वह दुलारी बहू थी. बस, उस के वैवाहिक जीवन का एक खलनायक था, ‘मंगल ग्रह’ जिस पर गौरव की सहायता एवं प्रोत्साहन से कविता ने विजय पाई थी. कभीकभी परिवार के सभी सदस्य मंगल ग्रह की पूजा और नकली विवाह की बातें याद करते हैं तो ताईजी सब से अधिक दिल खोल कर हंसतीं. काफी देर से अकेली बैठी कविता इन्हीं मधुर स्मृतियों में खोई हुई थी. फोन की घंटी ने उसे चौंका कर इन स्मृतियों से बाहर निकाला.

फोन पर बात करने के बाद उस ने अपना कार्यक्रम निश्चित किया और यही तय किया कि अपने सफल विवाह की 10वीं वर्षगांठ का सब से पहला निमंत्रणपत्र वह आज ही पंडितजी को देने स्वयं जाएगी, ऐसा निर्णय लेते ही उस के चेहरे पर एक शरारत भरी मुसकान उभर आई. Hindi Family Story.

Culture and Pollution: संस्कृति के नाम पर गंदगी और प्रदूषण जायज क्यों?

Culture and Pollution:

पहला सवाल- क्या हम कभी सुधर सकते हैं?

दूसरा सवाल- संस्कृति के नाम पर गंदगी और प्रदूषण जायज क्यों?

प्रसिद्ध भारतीय पत्रकार, स्तंभकार, लेखिका, राजनीतिज्ञ और वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने एक्स पर जोय ञ्चजोयदास का एक वीडियो शेयर कर लिखा, ‘‘विदेशों में बसे भारतीय प्रवासी समुदाय को कभी मेहनती, कानून का पालन करने वाले और गरिमामयी माना जाता था. दुख की बात है कि अब यह बदल गया है.’’

जोय ने अपने वीडियो के साथ कैप्शन में लिखा था, ‘‘23 अक्टूबर को भारतीय अमेरिका में दिवाली मना रहे थे. वहां की पुलिस और अग्निशमन विभाग भी इस उत्सव में शामिल होने आए और उन्होंने होली खेली.’’

Culture and Pollution

दरअसल अमेरिका की सड़कों पर दिवाली मनाने उतरे भारतीय पूरी सड़क पर पटाखों का कचरा फैला रहे थे जैसे वे भारत में करते हैं. भारत में तो उन के इस कृत्य को धार्मिक कारनामा माना जाता है. दीवाली की अगली सुबह तमाम सड़कें पटाखों का बारूद और जले हुए कागज व पटाखों के खोखोंं से पटी पड़ी होती हैं. वातावरण पटाखों की बदबू से भरा होता है. यह हमारी भारतीय संस्कृति और धर्म है, जो अमेरिकी पुलिस को कतई रास नहीं आई और उन्होंने फायर ब्रिगेड बुलवा कर दिवाली मना रहे लोगों समेत पूरी सड़क पर जल रहे पटाखों पर ठंडे पानी की मोटी फुहारें छोड़ दिवाली को होली में बदल दिया.

विदेशों में सफाई का अनुशासन सरकार से ज्यादा नागरिकों के भीतर से आता है. वहां का बच्चा स्कूल में यह सीखता है कि सार्वजनिक स्थान उस का अपना घर है. कोई भी व्यक्ति सड़क पर कुछ फेंकता है, तो आसपास के लोग उसे तुरंत टोक देते हैं. सामाजिक शर्म वहां का सब से बड़ा नियंत्रण है. मगर हम भारतीय उन के साफ-सुथरे देश में पहुंच कर वहां भी अपने गंदे संस्कार दिखाना नहीं भूलते.

पानी की खाली बोतलें, चिप्स के खाली रैपर, घर का कूड़ा-करकट सब की नजर बचा कर हमें सड़कों पर ही फेंकना है. ऐसा करने के बाद हमें बड़ी तसल्ली का एहसास होता है. सुकून सा मिलता है. जैसे, कोई बच्चा माली की नजर बचा कर अमरूद के बाग से अमरूद तोड़ लाए. उस चोरी में जो आनंद उसे आता है, कुछ वैसा ही आनंद हमें सब की नजर बचा कर सड़क पर कूड़ा फेंकने में आता है क्योंकि हमारे संस्कार ही वैसे हैं. क्या हम कभी सुधर सकते हैं? Culture and Pollution.

Indian Economy: सरित प्रवाह- गरीब का फटा कोट

Indian Economy: भाजपा नेता व देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितना ही विकसित भारत का ढोल बजा लें, लेकिन ऐसा लगता नहीं कि यह देश गरीब देशों की बिरादरी से कभी उबर पाएगा. अगर आबादी 142 करोड़ से बढ़ कर अगले पांच-सात सालों में 155 करोड़ हो जाए और भारत तीसरे नंबर की विश्व अर्थव्यवस्था बन जाए तो भी आम आदमी गरीब ही रहेगा.

देश में करोड़दोकरोड़ की गाडि़यों की कमी नहीं है. देश में 10-20 नहीं, 50-60 करोड़ रुपए के रिहायशी मकानों की कमी नहीं है. देश में ऐसे रैस्तरांओं की कमी नहीं है जहां 4 जनों का खाना 8-10 रुपए हजार का होता है. सिनेमाहालों में 4 जनों का परिवार जाए और सिर्फ पौपकौर्न खाए तो 2,500 से 3,000 रुपए लग जाते हैं, फिर भी कुछ सीटें भर जाती हैं, यह भी दिख रहा है.

पर ढोल पीटने वाले उन स्लमों को नहीं देख रहे जो मुंबई के 50 मंजिले मकानों के अहाते में बने हुए हैं जहां 4 जनों का एक परिवार पूरा महीना 20-25 हजार रुपए में गुजारा करता है. देश के गांवों में 80 करोड़ लोगों को खाना मुफ्त दिया जा रहा है और यह खाना महज 5 किलो अनाज प्रतिव्यक्ति मिलता है जिस में केंद्र सरकार 5 सालों (2024-28) के लिए प्रोजैक्टिड 11.80 लाख करोड़ रुपए खर्च कर रही है जो करदाताओं के पैसे हैं. इस खर्च में ढुलाई व वितरण का खर्च शामिल है.

सवाल यह है कि क्या तीसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था का ढोल 142 करोड़ में से 82 करोड़ भूखों के बल पर बजाया जा सकता है? यह देश और दुनिया के सामने नितांत बेईमानी है.

1980 में भारत और चीन में हर व्यक्ति बराबर का गरीब था. आज 40 वर्षों बाद चीनी व्यक्ति के पास एक भारतीय से औसतन 8 गुना ज्यादा पैसा है. वहां प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की जरूरत ही नहीं है. अपने को चीन से बराबरी करने के लिए भारत सरकार खुलेहाथों बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव को पैसा दे रही है पर इस पैसे से कई गुना चीन दे कर इन देशों को अपने साथ कर लेता है क्योंकि ये देश जानते हैं कि उन के गरीब नागरिक भी औसत भारतीय गरीब नागरिक से कहीं बेहतर हाल में हैं.

मालदीव, श्रीलंका और अब बंगलादेश में राजनीतिक उथलपुथल हुई तो वहां के हजारोंलाखों नागरिक भारत नहीं आए. बंगलादेश में भारत समर्थक शेख हसीना की सरकार को जनता ने उखाड़ फेंका और शेख हसीना के घर में घुस कर अंडरगार्मेंट्स तक का खुला वीडियो बना कर लूट ले गए तो भी मुसलमानों को तो छोडि़ए, बंगलादेशी हिंदू भी लाखों में कोलकाता नहीं पहुंचे हैं.

भारत के बारे में वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट, जिसे भारतीय मूल के इंदरमीत गिल ने तैयार की है, में साफ कहा गया है कि भेदभाव के चलते राजनीतिक फैसलों और भेदभावपूर्ण कानून व भेदभावपूर्ण शासकीय व्यवस्था के कारण भारत जैसे कई देश जहां हैं, वहीं रहेंगे और वहां जो भी जीवनस्तर सुधरेगा वह उस टैक्नोलौजी के कारण सुधरेगा जो वे महंगे दामों पर खरीदेंगे चाहे उस का इस्तेमाल आधाअधूरा ही करें.

अगर आज भारतीय प्रधानमंत्री 8,000 करोड़ रुपए के दोदो विमानों में और कई करोड़ की विशेष बुलेटप्रूफ गाडि़यों में सफर कर रहे हैं तो इसलिए कि 82 करोड़ गरीब घरों के युवा विदेश जा कर, वहां घटिया से घटिया नौकरी कर,

120-125 अरब डौलर कमा कर भारत भेज रहे हैं जिस से अमीरों की शान बढ़ रही है और भारत सरकार का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ रहा है. वरना आज भी जो हम निर्यात कर रहे हैं वह खनिज या खेती उत्पाद हैं, मशीनें टैक्नोलौजी नहीं. इन के बलबूते हम तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था का ढोल तो पीटते रहेंगे पर आम आदमी मासिक 5 किलो अनाज पाने की लाइन में ही लगा रहेगा.

हमारे यहां हरेक को सुरक्षा चाहिए और जातिव्यवस्था इसे देने का अव्वल काम करती है. सुप्रीम कोर्ट या प्राइम मिनिस्टर औफिस को देख लें, 90 फीसदी फैसले लेने वाले ऊंची जातियों के ही हैं. वे पूरी व्यवस्था को अपनी उंगलियों के इशारों पर चला रहे हैं. इन में बहुत से विदेश से पढ़ कर आए हैं और लगभग सभी के बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं.

देश में उन्नति या तो मुट्ठीभर-

1 प्रतिशत लोग- कर रहे हैं या मंदिर और उन से जुड़े व्यवसाय कर रहे हैं. पूजापाठ पर 82 करोड़ वे लोग भी ढेरों खर्च कर डालते हैं जो भीख मांग कर खाते हैं क्योंकि प्रधानमंत्री से ले कर गांव के प्रधान तक सभी यही कहते हैं कि पेट भरेगा, कपड़े मिलेंगे, सुख मिलेगा तो मंदिरों में घंटों पूजा कर के, मूर्तियों के आगे लेट कर, मंदिरों पर सोने के शिखर बना कर मिलेगा और दानदक्षिणा से मिलेगा. सो, तकरीबन पूरा देश निर्माण में नहीं, पूजापाठ में लगा है. हिंदुओं की देखादेखी मसजिदें, गुरुद्वारे, चर्च और बौद्ध मंदिर भी चमकने लगे हैं और सभी के अंधभक्त गरीब से गरीब रह गए हैं.

किसी दिन का अखबार उठा कर देख लें, आधी खबरें धर्म से जुड़ी होंगी. भगवानों को भी अपने प्रचार की इतनी भूख है जितनी मौजूदा प्रधानमंत्री को फोटो खिंचाने की. मीडिया में यही दिखता है, गरीब का फटा कोट नहीं.

पतन की ओर

जैसेजैसे अमेरिका का पतन तेज हो रहा है, दुनिया के कई देशों में यह महसूस किया जा रहा है कि अमेरिकी पतन का कारण वहां बढ़ती धार्मिकता है. आस्ट्रेलिया में हाल में हुए सर्वे से पता चला है कि 1998 में जहां 72 फीसदी लोग कहते थे कि सरकारी स्कूलों में धर्म की शिक्षा दी जाए वहीं 2025 में उन की संख्या घट कर 50 फीसदी रह गई है और 50 फीसदी लोग धार्मिक शिक्षा न देने के पक्ष में हैं.

अमेरिका के सरकारी स्कूल, जिन्हें वहां की लोकल काउंटी चलाती हैं और जो पब्लिक स्कूल कहलाते हैं, अब खिचड़ी स्कूल हैं जहां मध्य व निम्न आय वर्ग के घरों के हर रंग, धर्म, देश, जाति के बच्चे आ रहे हैं. इन स्कूलों पर सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी द्वारा धार्मिक शिक्षा देने का दबाव डाला जा रहा है और कई संस्थानों में वैज्ञानिक शिक्षा की जगह बाइबिलजनित दुराज्ञान को बच्चों पर थोपा जा रहा है.

धार्मिक शिक्षा का समर्थन करने में आधुनिक मीडिया ने बड़ा योगदान दिया है. विज्ञान और टैक्नोलौजी पर आधारित होने के बावजूद आज का मीडिया धर्म का जम कर अपरोक्ष प्रचार कर रहा है. मीडिया में ईसाई प्रीस्टों के प्रवचनों को जम कर प्रसारित किया जा रहा है. फिल्मों में क्रौस पहने हीरोहीरोइन, चर्च के सीन, चर्च में विवाह, मृत्यु पर चर्च की मौजदूगी बड़ी शानोशौकत से दिखाई जा रही हैं, जो धर्म को एक नई शक्ति दे रहे हैं.

धर्म का प्रभाव पिछले तीनचार हजार वर्षों से लगातार बढ़ता जा रहा था पर जब विज्ञान और विचारों की क्रांति शुरू हुई तो धर्म के शिकार आम गरीब लोगों, खासतौर पर अमीर व गरीब दोनों की औरतों, को नया माहौल मिलने लगा जिस से वे पुरुष की संपत्ति बनना बंद होने लगीं. पुरुषों ने नए विज्ञान का उपयोग चर्च को ढाल बना कर किया है और धर्म को पिछले दरवाजे से समाज पर फिर थोप दिया है.

प्रथम और द्वितीय युद्ध धर्म के कारण लड़े गए थे. अमेरिका ने कोल्ड वार में कम्युनिज्म का विरोध लोकतंत्र के लिए कम कम्युनिज्म की अधार्मिकता के कारण ज्यादा किया था क्योंकि अमेरिका रूस में और्थोडौक्स धर्म की पुनर्स्थापना चाहता था. कई सदियों तक लोकतांत्रिक भावनाओं का पहरेदार रहा अमेरिका पिछले 50-60 सालों के दौरान धीरेधीरे गोरे-काले के भेद को बनाए रखने के लिए चर्च का इस्तेमाल करने लगा था. अमेरिका में चर्च तो अब औरतों के वोटों के अधिकार को भी कम किए जाने की वकालत करने लगा है.

आस्ट्रेलिया अब अगर इस 2000 साल पुराने धार्मिक लबादे को ओढ़ने से इनकार कर रहा है तो अच्छी बात है पर वह अमेरिका की टैक कंपनियों के खिलाफ जा पाएगा, इस में संदेह है. अमेरिका की टैक कंपनियां ही नहीं, फार्मा कंपनियां भी अब उन लोगों के चंगुल में हैं जो धार्मिक हैं और ईश्वरीय न्याय को मानवीय बुद्धि व नैतिकता से ऊपर सम झते हैं. इस में औरतें पिसेंगी, यह पक्का है. इस का वीभत्स रूप अफगानिस्तान, ईरान में दिख ही रहा है. भारत में औरतों को कलश यात्राओं और मंदिरों की लंबी लाइनों में धकेला जा रहा है. आस्ट्रेलिया क्या धर्म के प्रभाव से बचेगा, इस में संशय है.

एफआईआर के पीछे

आजकल टीवी हो या प्रिंट, किसी भी आपराधिक मामले में एफआईआर दर्ज कराना ही बड़ी हैडलाइन बनती है और यह दर्शाया जाता है कि अब तथाकथित अभियोगी शिकंजे में आ गया. जबकि, कानून की व्यवस्था इस से अलग है. एफआईआर या प्राथमिकी दर्ज होने का मतलब सिर्फ इतना होता है कि किसी व्यक्ति पर संदेह है कि उस ने कुछ आपराधिक कृत्य किया है और पुलिस व अदालतें जांच कर पता करेंगी कि वह कृत्य अपराध की श्रेणी में आता है या नहीं.

अब पूरा देश जानता है कि अदालत वर्षों की सुनवाई के बाद चाहे अभियोगी को पूरी तरह बरी कर दें, सजा तो अदालतें उस को अपने चक्कर लगवाने में दे ही देंगी. बीचबीच में पुलिस सिर्फ पूछताछ के लिए कभीकभार पकड़ कर दसपांच दिनों के लिए बंद कर सकती है चाहे बाद में वह ‘अपराधी’ छूट जाए और दोषमुक्त हो जाए.

इंग्लिश में इसे ‘प्रोसैस इज पनिशमैंट’ कहा जाने लगा है कि अदालती कार्रवाई ही सजा है. और अब तो मीडिया व जनता भी एफआईआर दर्ज होने के बाद संबंधित को अपराधी होना मानने लगी है.

सर्वोच्च न्यायालय बारबार कहता है कि ‘बेल नौट जेल’ संविधान की मूलभावना है लेकिन फिर भी जमानत के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे मामलों में कितनी ही बार अग्रिम जमानत या पूरी जमानत देने से इनकार कर दिया जाता है. सुप्रीम कोर्ट खुद दोहरी बातें करती है. एक तरफ वह कानून व्यवस्था बनाए रखने का बहाना बनाती है तो दूसरी ओर संविधान के लिए अधिकारों को गिनाती है.

पुलिस को हर एफआईआर में बड़ा मजा आता है क्योंकि उस के बाद उस के हक अपार हो जाते हैं. जो पहुंच वाले होते हैं वे प्राथमिकी दर्ज न हो, इस जुगाड़ में लगे रहते हैं. पुलिस बहुत मामलों में अपना सही या गलत या एकदम साजिशाना व्यवहार करते हुए प्राथमिकी दर्ज करने और उस पर अमल करने के हक का इस्तेमाल करती हैं.

जनता के लिए प्राथमिकी इसलिए चौंकाने वाली होने लगी है क्योंकि किसी भी मामले में प्राथमिकी दर्ज होते ही पासपोर्ट, आधारकार्ड, पैनकार्ड, बैंक अकाउंट, विदेश यात्रा, चुनाव लड़ना सब खतरे में पड़ जाता है. हर जगह इस प्राथमिकी, जिस में दर्ज अपराध आरोपी ने किया, यह साबित नहीं होता, का हवाला दे कर खिलाफ रिपोर्ट तैयार की जा सकती है.

शासन, पुलिस और अदालतों ने जनता के हक छीनने के लिए एफआईआर यानी प्राथमिकी को मजबूती देने के वास्ते दशकों की मेहनत से एक साजिशाना स्कीम तैयार की है जिस ने मुगलों, मराठों और अंगरेजों के तानाशाही शासन को भी फीका कर दिया है. प्राथमिकी को भाव देने में अदालतों ने बड़े जतन से जमानतें ठुकराई हैं और अच्छेभले लोगों को बदबूदार, अपराधियों से ठूंसी जेलों में हफ्तों नहीं बल्कि महीनों रखा है. संविधान को कुचलने की यह ‘सफल’ तकनीक अद्भुत है. Indian Economy.

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