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Illegal Immigrants : यूथ का अमेरिका में घुसना और अब भगाया जाना

Illegal Immigrants : मोबाइल कल्चर ने देश के युवा को किस तरह निकम्मा बना दिया है और किस तरह वे रील्स की जिंदगी को असली जिंदगी समझने लगे हैं, यह अमेरिका के नए खब्ती, डिक्टेटर टाइप प्रैसिडैंट डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इल्लीगल इमीग्रैंट्स को देश से निकालने की लाइन में लगे 104 इंडियन यूथ्स को इंडिया भेजने से पता चल रहा है. इन यूथ्स में 33 गुजरात के हैं, 33 हरियाणा के और 31 पंजाब के.

इन सभी यूथ ने घरवालों की जमापूंजी खर्च करा कर इल्लीगल तरीके से अमेरिका में घुसने की प्लानिंग की थी. और जब ग्राहक हो तो सप्लायर्स आ ही जाते हैं. मैनपावर का काम कर रहे ट्रैवल एजेंट युवाओं के पेरैंट्स से भारत में किस्तों में पैसे लेते रहते थे और अलगअलग देशों से होते हुए ये युवा अमेरिका में इल्लीगल तरीके से घुसेड़ दिए गए. अब पकड़े गए.

इन 104 भारतियों को हथकड़ियां पहना कर अमेरिकी मिलिट्री प्लेन से भारत लाया गया. अहमदाबाद न ले जा कर हवाई जहाज को अमृतसर में उतारा गया जहां आम आदमी पार्टी की सरकार है ताकि गुजरात मौडल की इज्जत थोड़ी बची रहे. लेकिन आज सोशल मीडिया इतना तेज है कि असली बातें नकली व लुभावनी बातों के बीच से निकल ही आती हैं. अमेरिकी मिलिट्री प्लेन के अमृतसर के हवाई अड्डे पर उतरने की रील्स सामने आईं तो सोशल मीडिया ने उन रील्स की पोल खोल दी जिन में कौंपटन जैसे शहरों में 60 फीसदी इडियंस के होने की बात बताई जाती है और अमेरिका या दूसरे देशों में इंडियन ओरिजिन के बड़ेबड़े नेताओं के होने के दावे किए जाते हैं.

यह ठीक है कि इंडियन यूथ टैलेंट में किसी से कम नहीं है पर जब कोई देश उन्हें न बुलाए तो वहां जबरदस्ती चोरीछिपे छिप जाना और पूरी वहां की पौपुलेशन में घुलमिल जाना किसी भी ढंग से सही नहीं कहा जा सकता.

वे यूथ असल में रील्र्स के दीवाने उसी तरह हैं जैसे पुराने किस्म के लोग कुंभ जैसे स्टंटस के दीवाने हैं. उन्हें लगता है कि अगर इतने लोग ऐक्सेस पा रहे हैं या कुछ कर रहे हैं तो सही ही होगा. सोशल मीडिया अपनी रिपीटीटिव कैपेसिटी से यूथ की एनालिसिस और ट्रुथ ढूंढ़ने की इंस्टिंक्ट को खत्म कर देता है.

जैसे लोग कुंभ जाते समय यह भूलते रहे कि एक दिन में 1 करोड़ लोग कैसे छोटी सी जगह में डुबकी लगा सकते हैं वैसे ही सोशल मीडिया के स्लेव भूल गए कि भारत से यूरोप या अमेरिका जाना नेपाल जाने की तरह नहीं है. वहां जाने के रस्ते में न सिर्फ बड़े सुदर बीच में हैं बल्कि होस्टाइल कंट्रोल सिस्टम भी है.

इल्लीगल इमीग्रैंट्स को बाहर निकालना डोनाल्ड ट्रंप का वैसा ही हथियार है जैसा नरेंद्र मोदी का अपने देश के मुसलिम नागरिकों को परेशान कर हिंदुओं के वोटों का अपनी पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण करना एक हथियार है. डोनाल्ड ट्रंप 7,50,000 इल्लीगल इंडियंस को भारत भेज पाएंगे, इस में शक है क्योंकि हर बार भारीभरकम सी-17 मिलिट्री प्लेन को आधा खाली भेजना आसान और कम खर्चीला नहीं है.

इन यूथ्स को बहकाने के लिए सोशल मीडिया पूरी तरह रिस्पौंसिबल है क्योंकि इस में फैक्ट और फिक्शन को इस तरह मिक्स कर दिया गया है कि पहले के धर्मभीरु लोगों की तरह आज का यूथ साइंस, टैक्नोलौजी पढ़ कर भी बेवकूफ बन कर रह गया है. होश संभालते ही वह मोबाइल का गुलाम हो जाता है और सोशल मीडिया पर वही उसे दिखता है जो फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब उसे दिखाना चाहते हैं. इन सब प्लेटफौर्मों का काम है कि देखने वालों को वही दिखाया जाए और बारबार दिखाया जाए जो वे देखना चाहते हैं.

देश से डंकी बन कर निकले यूथ्स की पहली बड़ी खेप सुर्खियां बन कर लौटी है तो शायद यूथ्स के ब्रेन में अब यह अक्ल आ जाए कि जिंदगी स्क्रीन से बाहर प्रैक्टिकली बहुत बेरहम है. चमकदमक के पीछे जो जिंदगी है वह भारत के बदबूदार, बेरोजगारी से भरे, बिखरे शहरों से कम बदतर नहीं है.

New Trend : देसी कम्युनिटी में जेनजी का शोऔफ कल्चर

New Trend : आज की पीढ़ी हर कदम पर दिखावा करने वाली है. क्या सच में दुनिया के सामने दिखावा जरूरी है? क्या आप इन ट्रैंड्स को फौलो नहीं करेंगे तो सोसाइटी आप को नकारा समझेगी? दोस्तों के सामने कूल बनने का सब से महंगा तरीका है जेनजी में शोऔफ का कल्चर.

सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में मंदिर में फूल बेचने वाली एक महिला और उस का बेटा मोबाइल स्टोर पर कैश के साथ आईफोन खरीद रहे थे. खरीदारी के बारे में पूछा गया, तो मां ने बताया कि उस का बेटा आईफोन खरीदने की जिद में तीन दिन की भूख हड़ताल पर चला गया था. वीडियो को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया, जिस पर ज्यादातर लोगों ने बेटे को अपनी मां की मेहनत की कमाई को फोन पर खर्च करने के लिए फटकार लगाई.

इस वाकेआ पर ‘घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने’ वाली कहावत बिलकुल सटीक बैठती है. और यही हाल भारत के लगभग सभी जेनजी (1998 से 2012 के बीच पैदा होने वाले) का है. आज यह पीढ़ी शोऔफ के नशे में चूर है. यह खुद को व्यक्त करने, फैशन, स्टाइल और लाइफस्टाइल को सोशल मीडिया पर दिखाने के मामले में हमेशा ऐक्टिव रहती है.

आज की यंग जेनरेशन खुद को सोसाइटी में फिट करने में जुटी पड़ी है. अपनी बराबरी, किसी हाईफाई पर्सनैलिटी से कर बैठते हैं और सोचते हैं कि काश, वे भी ऐसे बन जाएं. वे उन का लाइफस्टाइल कौपी करने की कोशिश करते हैं और ऐसे में खुद की फाइनैंशियल कंडीशन पर ध्यान न दे कर हवाबाजी करने लगते हैं.

हाल ही में मशहूर पंजाबी सिंगर दिलजीत दोसांझ और कोल्डप्ले के कौंसर्ट्स पूरे भारत में हुए. इन कौंसर्ट्स का क्रेज इतना ज्यादा था कि इस के टिकट मिनटों में बिक गए थे. बुकिंग के दौरान ‘बुक माय शो’ की वैबसाइट क्रैश हो गई और इन के टिकट की कीमतों ने हर किसी को हैरान कर दिया. टिकटों की कीमत 38 हजार रुपए से शुरू हो कर 3 लाख रुपए तक थी. इस के बावजूद लोग इसे खरीदने के लिए पागल हुए जा रहे थे. ये सब किस लिए? क्या इन कौंसर्ट्स में न जाने से उन का अस्तित्व नहीं रहेगा या सोसाइटी उन्हें अपनाएगी नहीं? इस का जवाब एक ही है कि वे सोशल मीडिया में ‘कूल’ दिखेंगे.

आज की पीढ़ी हर कदम पर दिखावा करने वाली है. क्या सच में दुनिया के सामने दिखावा जरूरी है? आज की डेट में इस सवाल का जवाब हर किसी की प्रायोरिटी पर डिपैंड करता है, क्योंकि हम एक मैटीरियलिस्टिक वर्ल्ड में रह रहे हैं. आज की पीढ़ी बहुत अलग है. ब्रैंडों पर बहुत खर्च करती है. युवा सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में रह रहे हैं.

हमें लगता है कि वे पैसा बरबाद कर रहे हैं और अगर उन्हें नौकरी के बिना कठिन समय का सामना करना पड़ा तो वे क्या करेंगे? लेकिन वे सोचते हैं कि उन्हें एक जीवन मिला है, इसलिए उन्हें हर चीज का आनंद लेना होगा. कोरोना के बाद से यंग जेनरेशन को लगता है कि पैसे से कुछ भी खरीदा जा सकता है और सोसायटी में इस का शोऔफ करने से उन्हें सैटिस्फैक्शन का एहसास होता है. सोशल स्टेटस बरकरार रखने के लिए दिखावा करना जरूरी हो गया है.

इन कारणों से जेनजी है शोऔफ में चूर-

· सोशल मीडिया का प्रभाव : जेनजी सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब आदि पर बहुत ऐक्टिव होते हैं. इन प्लेटफौर्म्स पर लोग अपनी जिंदगी के ‘बेस्ट’ मोमैंट्स साझा करते हैं, ताकि वे लाइक्स, कमैंट्स, और फौलोअर्स पा सकें. यह डिजिटल दुनिया में खुद को दिखाने और वैलिडेशन पाने का तरीका बन गया है.

· स्मार्टफोन और टैक्नोलौजी का असर : जेनजी के पास हमेशा स्मार्टफोन और इंटरनैट का एक्सेस होता है, जिस से वे हर समय अपडेट रहते हैं और नए ट्रैंड्स और फैशन से जुड़ते हैं.

· सोशल वैलिडेशन की चाह : सोशल मीडिया पर दिखावे के साथ जुड़ा हुआ एक कारण यह भी हो सकता है कि जेनजी अपने समाज में या अपने दोस्तों के बीच वैलिडेशन पाने की कोशिश करते हैं. वे दिखाते हैं कि वे ट्रैंड्स के साथ हैं या उन का जीवन ‘परफैक्ट’ है, ताकि वे दूसरों से अच्छा महसूस कर सकें.

एक दोस्त ने आईफोन लिया तो बाकियों के मन भी आ जाता है कि यह तो अब पूरे कैंपस में कूल दिखेगा और हम भौंडे. इसी होड़ में बाकी भी इस दिखावे का हिस्सा बन जाते हैं.

· इन्फ्लुएंसर कल्चर : आजकल बहुत से जेनजी लोग सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर के रूप में काम कर रहे हैं. उन के लिए दिखावा करना एक तरह से अपनी ब्रैंड को प्रमोट करने का हिस्सा बन चुका है. वे जिस तरह से अपनी जिंदगी और चीजें पेश करते हैं, वे उन के फौलोअर्स को अट्रैक्ट करने के लिए होती हैं. ऐसे इन्फ्लुएंसर लोगों को गुमराह कर के अपने फेक वर्ल्ड को प्रमोट करते हैं.

इंडियन ऐक्ट्रेस लारा दत्ता ने हाल में युवाओं को एन्करेज करते हुए एक इंटरव्यू में कहा, “मैं दुनियाभर के युवाओं को यह बताना चाहती हूं कि आप जिन इन्फ्लुएंसर को देखते हैं, जिन में हम (सैलिब्रिटीज) भी शामिल हैं, जिन का जीवन अद्भुत है, यह जरूरी नहीं कि वे चीजें हमारी हों या हम ने अपने दम पर हासिल की हों.”

बहुत सारे ऐक्टरऐक्ट्रेस हर पार्टी या इवैंट में बहुत अच्छे से सजधज कर आते हैं, डिजाइनर कपड़े पहनते हैं. वह सारा हेयर और मेकअप और शानदार गहने आदि सब उधार लिया हुआ होता है. बाद में वह सब वापस चला जाता है. इसलिए इस पर विश्वास न करें. यह रिऐलिटी नहीं है. युवा लोग शोऔफ और सोशल वैलिडेशन में फंस गए हैं. वे वह कर रहे हैं जो सोशल मीडिया उन को परोस रहा रहा है. उन्होंने युवाओं से इसे इग्नोर करने की सलाह दी है.

एक सोसाइटी में सुमित, अजय और अमन खास दोस्त हैं. तीनों कालेज में पढ़ते हैं. एक दिन सुमित ने न्यू कार ला कर अपने दरवाजे पर खड़ी कर दी. हवाबाजी मारने के लिए अपने दोनों दोस्तों को कार दिखाने के लिए बुलाया और सब के बीच कूल बन गया. उस की न्यू कार देख कर अजय ललचा गया और सोचने लगा, मैं भी पापा से बोल कर इस से अच्छी कार लूंगा. वहीं कुछ दिनों बाद अमन ने अपना बर्थडे एक क्लब में सैलिब्रेट किया. उस के बाद से अब हर साल ये तीनों दोस्त अपना बर्थडे किसी महंगे रैस्टोरैंट या क्लब में ही सैलिब्रेट करते हैं. यानी, ये अब एक तरह का ट्रैंड बन चुका है कि कोई भी पड़ोसी या दोस्त कुछ करता है तो उस के पीछे बाकी लोग भी होड़ में जुट जाते हैं, चाहे उन की जेब अलाउ करे या न.

आज जेनजी में एक तरह का ‘फोमो’, जिसे फियर औफ मिसिंग आउट कहा जाता है, पैदा हो रहा है. यह सोशल मीडिया की देन है. आएदिन एक नया ट्रैंड मार्केट में देखने को मिलता है, जैसे हाल ही में यूट्यूबर मिस्टर बीस्ट की ब्रैंड फीस्टेबल्स जब भारत में लौंच हुई तो लोग इसे खरीदने के लिए इतने पागल हुए जैसे लंगर बंट रहा हो. अगर इन के प्राइस की बात करें तो आप अपना सिर पकड़ लेंगे. इस के 35 ग्राम चौकलेट का रेट 400 रुपए है और एक आधा लिटर ड्रिंक का रेट 900 रुपय है. इस के बावजूद भारी मात्रा में यूथ ने इसे खरीदा और सोशल मीडिया पर फ्लेक्स करने से चूके नहीं. आखिरकार, खरीदा ही इसलिए था.

आजकल जेनजी अपने कैरियर, रिलेशनशिप, फैमिली प्रैशर आदि से जूझ रहा है. वेह अकसर अपने डिसीजन को ले कर कन्फ्यूज रहता है. ऐसे में उस का साथ देती है रिटेल थेरैपी. मन उदास होने पर झट से शौपिंग मौल चले गए, कुछ सामान खरीद लिया या घर बैठे ही और्डर कर दिया. इस तरह की टैक्निक उन्हें खुशी देती है. इसे ही रिटेल थेरैपी कहा जाता है.

हालांकि यह हरेक की चौइस है कि वह अपन मरजी से कुछ भी खरीदे या जितना मरजी खर्चा करे. लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि हमारी इच्छाओं का कोई अंत नहीं है. दूसरों की बराबरी या सोशल वैलिडेशन पैसे और समय दोनों की बरबादी है.

लेखिका : कुमकुम

Public Relations : क्रिकेट से ले कर फिल्मों तक में बढ़ता पीआर कल्चर

Public Relations : बौलीवुड कलाकार हों, क्रिकेटर हों या फिर हों सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, सभी की चकाचौंधभरी दुनिया के बारे में जानने के लिए सभी उत्सुक रहते हैं, खासकर इन की पर्सनल लाइफ के बारे में. बाहर खबरों में क्या जाए, इस के लिए ये पीआर रखते हैं. जहां इस से कुछ का फायदा होता है, वहीं कुछ को भारी नुकसान उठाने पड़ते हैं.

जब किसी फिल्म के प्रमोशन की योजना बनाई जाती है तो पीआर (पब्लिक रिलेशंस) एजेंसी यह सुनिश्चित करती है कि विभिन्न प्लेटफौर्म्स पर उसे कवरेज मिले. फिल्म में नजर आने वाले सितारों के इंटरव्यू की योजना बनाने से ले कर उन के बारे में खबरें छपवाने तक, सब पीआर एजेंसी का काम होता है.

इस दौरान सितारों की छवि को विशेष रूप से ध्यान में रखा जाता है. पीआर एजेंटों का काम फिल्म के निर्माण के दौरान से ही शुरू हो जाता है. पीआर एजेंट फिल्म की रिलीज से पहले और बाद में दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए प्रचार स्टंट करते हैं. पीआर एजेंसी का मकसद सिर्फ इतना होता है कि जो ऐक्टर अपनी पहली फिल्म में काम करने वाले हैं, उन के बारे में पब्लिक पहले से कुछ जानती हो या उन की ब्रैंडिंग इस तरह की जाए कि फिल्म हिट होने से पहले ही पब्लिक की नजर में वह ऐक्टर हिट हो जाए.

क्रिकेटर्स के लिए क्या काम करती है पीआर एजेंसी

क्रिकेटर अकसर अपनी सार्वजनिक छवि, विज्ञापन, सोशल मीडिया उपस्थिति और मीडिया इंटरैक्शन को मैनेज करने के लिए पीआर एजेंसियों के साथ कोलैबोरेट (साथ मिल कर काम) करते हैं. पीआर एजेंसियां क्रिकेटरों को एक साफसुथरी पब्लिक इमेज बनाए रखने में मदद करती हैं, उन की मार्केट वैल्यू को बढ़ाती हैं और उन्हें शीर्ष ब्रैंडों से जोड़ कर आकर्षक विज्ञापन सौदों पर बातचीत करती हैं, जिस से क्रिकेटरों की कमाई के साधन बढ़ जाते हैं.

पीआर एजेंसी को एक व्यक्ति या बहुत से व्यक्ति मिल कर चलाते हैं, जिसे क्लाइंट को फेमस करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, जनता को अपने क्लाइंट से रूबरू कराना, ताकि वे पब्लिक के लिए अनजान न रहें बल्कि उन का चेहरा ही उन की मूवी की पहचान बने. ये पीआर एजेंसी चलाने वाले अपने क्लाइंट की अच्छी बातों को बड़ाचढ़ा कर जनता के सामने पेश करते हैं और उन की पब्लिसिटी करते हैं.

जैसे नवाजुद्दीन सिद्दीकी की बात करें तो वे अपनी फिल्म के लिए बहुत कम पीआर का सहारा लेते हैं. यही वजह है कि उन की फिल्म कब आई, इस के बारे में लोगों को कम ही जानकारी होती है, जैसा हाल ही में उन की फिल्म ‘अफवाह’ के साथ हुआ. वह फिल्म कब आई और चली गई, किसी को पता न चला. लेकिन वे अपनी पीआर जरूर करवाते हैं. उन्हें ग्राउंडेड पर्सन, साधारण और गरीब दिखाने की खूब रील्स चलाई जाती हैं, उन के स्ट्रगल के किस्से खूब उछाले जाते हैं, जैसे पंकज त्रिपाठी अकसर अपने लिए पब्लिसिटी करवाते हैं.

दूसरी ओर शाहरुख खान की ‘पठान’ का पीआर कुछ इस तरह से किया गया कि लोगों के मुंह पर इस फिल्म के आने से पहले ही इस का नाम चढ़ गया. इसी का नतीजा था कि इस फिल्म ने काफी अच्छा बिजनैस किया.

पीआर एजेंसी वाले किस तरह अपने क्लाइंट को फेमस करते हैं?

हम सभी को यह लगता है कि जब फिल्म बन जाती है तो रिलीज डेट से कुछ दिनों पहले ही फिल्म के ऐक्टर अपनी फिल्म का प्रमोशन करने के लिए कई प्लेटफौर्म पर जाते हैं. लेकिन सच यह है कि यह काम फिल्म बनने के बाद नहीं बल्कि कलाकारों की कास्टिंग होने से पहले ही प्रीप्रोडक्शन के दौरान शुरू कर दिया जाता है. फिल्म के ऐक्टर की हर छोटीबड़ी बात को जनता के बीच लाया जाता है, ताकि वह ऐक्टर पहले ही जनता के बीच लोकप्रिय हो जाए.

जब प्रोडक्शन और पोस्ट-प्रोडक्शन की बारी आती है तो फिल्म के सेट से सितारों की तसवीरें सामने लाई जाती हैं. उन के वीडियो पीआर एजेंसी वाले हर सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर डाल देते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक उन की जानकारी पहुंच सके, ताकि उन की फिल्म में कहानी में दम हो या न वह फिल्म ऐक्टर के नाम पर चल जाए. सितारों के सोशल मीडिया अकाउंट पर जानकारी साझा की जाती है जिस से ज्यादा दर्शकों तक आसानी से पहुंचा जा सके.

इस के अलावा, जानबूझ कर ये पीआर एजेंसी वाले अपने क्लाइंट से कई तरह के सोशल वर्क करवाते हैं और इस का प्रचार बढ़चढ़ कर किया जाता है. जैसे अगर उन्होंने किसी गरीब बच्चे की छोटीसी मदद की हो, तो वे उसे पूरी कवरेज देते हैं और हाईलाइट करते हैं.

पहले और आज के पीआर कल्चर में काफी बदलाव

पीआर कल्चर बढ़ता जा रहा है. यह इतने खराब तरीके से बढ़ रहा है कि यह इंसान का पूरा कैरेक्टर ही चेंज कर देता है. पीआर कल्चर पहले भी था. पीआर के जरिए सैलिब्रिटीज केवल अपनी बात जनता तक पहुंचाते थे. वे खुद ओपन इंटरव्यू देते थे, लोगों से मिलते थे, ताकि लोग सीधे उन से जुड़ सकें. लेकिन अब उस में काफी बदलाव आ गया है. पीआर पब्लिसिटी में आधे से ज्यादा झूठ होता है, फेक होता है, क्योंकि अब यह मात्र पैसा कमाने का आसान जरिया बन गया है. क्रिकेट खेलना और फिल्मों में काम करने के अलावा यह सैलिब्रिटीज का एक साइड बिजनैस बन गया है, जिस के लिए वे खुद और पीआर एजेंसी किसी भी हद तक जा सकते हैं.

सैलिब्रिटीज अपनी मार्केट बनाए रखने के लिए पीआर का सहारा लेते हैं. वे एकदूसरे को गिराने की फ़िराक में रहते हैं. क्रिकेटर विराट कोहली का अपना पीआर है और रोहित शर्मा का अपना. ये स्टार पीआर के सहारे ट्वीट करवाते हैं, सोशल मीडिया पर बज बनवाते हैं. ये ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि इन से इन की मार्केट जुड़ी हुई है. रोहित शर्मा की जब तक मार्केट में बात रहेगी, उस का हल्ला रहेगा, तब तक उसे मार्केट यानी बिसनैस मिलता रहेगा, एड मिलते रहेंगे. ये सब इंटरकनैक्ट होता है. ये सब पब्लिसिटी का गेम है. जो क्रिकेटर या ऐक्टर फ्लौप हैं, चल नहीं पा रहे मगर उन का पीआर अच्छा है, तो उन का नाम मार्केट में बना रहता है.

जैसे विराट कोहली चल ही नहीं रहा है. साल में एक मैच में चल जाता है, तो बहुत हल्ला हो जाता है. लेकिन उस की पीआर इतनी स्ट्रौंग है कि उस का ग्राउंड में रहना ही खबर है, उस का चलनाफिरना, हंसनाबोलना खबर है. इस तरह की मार्केटिंग इन्हें रिटायर होने नहीं दे रही और नए प्लेयर्स को आने नहीं दे रही. अगर रिटायर हो गए तो इन की मार्केट वैल्यू डाउन हो जाएगी. जब ये ग्राउंड में नहीं होंगे, खेलने नहीं जाएंगे, तो लोग इन के बारे में बात क्यों करेंगे. इन्हें देखने भी नहीं जाएंगे. इस तरह ये पीआर स्पोर्ट्समैनशिप को खराब कर रहे हैं. इन सब के पीआर हैं.

पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धौनी का अपना पीआर है. धौनी रिटायर हो चुके हैं लेकिन आईपीएल से रिटायर नहीं हुए हैं. वे पीआर का सहारा ले कर खुद के सिम्प्लिसिटी होने का बखान करवाते हैं. दिक्कत यह है कि मार्केट का प्रैशर इतना है कि वे रिटायर ही नहीं हो पा रहे बावजूद इस के कि वे ठीक से भाग नहीं पाते, घुटनों में तकलीफ रहती है. यही वजह भी है कि वे खेलने भी 7वें या 8वें नंबर पर आते हैं. लेकिन पीआर इतना धांसू है कि उन्हें सैल्फलेस प्लेयर कह प्रचारित किया जाता है, कहा जाता है कि वे यंग प्लेयर्स को मौका देते हैं.

सवाल यह कि जब आप में खेलने की कैपेसिटी नहीं है, तो खेल क्यों रहे हैं? आप इसलिए खेल रहे हैं क्योंकि पीआर आप को खिलवा रहा है. वह इसलिए खिलवा रहा है क्योंकि आप खेलेंगे तो आप का मार्केट बना रहेगा. आप खेलेंगे तो आप पर पैसा लगेगा, लोग सट्टा भी लगाएंगे, आप को एड मिलेगा. यह सब एकदूसरे से जुड़ा हुआ है. हार्दिक पंड्या का पीआर है. हर क्रिकेटर का पीआर है. आप में स्किल्स हैं या नहीं, आप चल रहे हैं या नहीं, आप फौर्म में हैं या नहीं— यह बात नहीं रह गई. आप का पीआर स्ट्रौंग है, आप की चर्चाएं पीआर चलवा रहा है, आप का बज है तो आप मैदान में हैं. इस बात को इस से समझा जा सकता है कि आजकल ग्राउंड में क्रिकेट से ज्यादा फुजूल का ड्रामा देखने को मिलता है.

ज्यादा पीआर करने के नुकसान

बहुत ज्यादा पीआर करने के अपने ही नुकसान हैं. नए आए ऐक्टर्स पीआर पर इतने निर्भर हो जाते हैं कि वे ऐक्टिंग की तरफ ध्यान ही नहीं दे पाते. इन से फिर जो स्किल्स निकलनी भी थीं, वे नहीं निकल पातीं. इन्होंने हर जगह बढ़चढ़ कर इतना अपने को दिखा दिया कि फिर ये लोग एक्सपैक्टेशन को मैच ही नहीं कर पाते. इस से इन का फायदा कम, नुकसान ज्यादा हो रहा है.

इन को लगता है, ‘हम तो चर्चा में आ गए हैं, हमारा पीआर इतना स्ट्रौंग है, हम को ये चर्चाएं बनाए रखती हैं.’ आप अपनी ब्रैंडिंग तो बड़ी कर लेते हो लेकिन आप की लिमिटेशन इतनी कम होती है कि आप पेशे में खरे नहीं उतर पाते. आप फिर छोटे रोल के लायक भी नहीं रह जाते, क्योंकि पब्लिक इमेज के चलते छोटे रोल आप करेंगे और बड़े रोल अपनी कमजोर स्किल्स के आधार पर मिलेंगे नहीं.

जैसे, ऐक्टर टाइगर श्राफ है. इसे जबरदस्ती का हीरो बनाया जा रहा है. आया था बड़ा धूमधाम कर के, उछलकूद कर रहा था, गुलाटियां कर रहा था. अंत में वह फ्लौप ही हुआ. उस के पास उछलने और ऐक्शन के अलावा कोई स्किल नहीं है. कोई डायरैक्टर टाइगर से इमोशनल सीन नहीं करवा सकता. टाइगर की शुरुआत में जो एकदो फिल्में आईं, उन में उसे बड़ाचढ़ा कर दिखाया गया कि इसे तो ताइक्वांडो आता है, यह अगला सुपरस्टार ह. मगर आगे फुस्स हो गया.

पीआर बताता रहा कि ये कलाबाजियां करता है, इसे फाइटिंग अच्छी आती है. अच्छा दिखता है तो सर्कस या एमएमए उस के लिए अच्छा प्रोफैशन हो सकता है. फिल्म में जा रहे हो, तो आप को ऐक्टिंग सही से आनी ही चाहिए. लेकिन उसे यही नहीं आती.

इसी का नतीजा है कि टाइगर श्राफ की पिछली कुछ फिल्में टिकट खिड़की पर बुरी तरह पिटी हैं. इन में ‘बड़े मियां छोटे मियां’, ‘गणपथ’ और ‘हीरोपंती 2’ जैसी फिल्मों के नाम शामिल हैं. उन की आखिरी हिट फिल्म थी ‘बागी 3’, जो 2020 में आई थी. वह भी जबरदस्ती की हिट थी. अब टाइगर के पास कोई भी फिल्म नहीं बची है. प्रोड्यूसर्स उसे अपनी फीस घटाने की सलाह दे रहे हैं, क्योंकि उस की मार्केट वैल्यू पिछले कुछ समय में बहुत गिरी है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह पीआर के नीचे दब गया. वह अपनी स्ट्रैटजी नहीं समझ पा रहा.

जाह्नवी कपूर, वरुण धवन भी फ्लौप ही हो रहे हैं. जितना पीआर ने इन्हें हाइप दिया होता है उतना ही जल्दी ये मुंह के बल गिरते हैं. सैफ अली खान के बेटे इब्राहिम अली खान, आमिर खान के सुपुत्र जुनैद खान, श्रीदेवी की बेटी खुशी कपूर, अजय देवगन के भतीजे अमन देवगन, रवीना टंडन की बेटी राशा और अमीरों के अमीर खानदान से आने वाले वीर पहाड़िया- इन सभी को देख ऐसा लग रहा है जैसे इन का बौलीवुड में डैब्यू नहीं हो रहा, बल्कि इन सभी नेपो किड्स की लौंचिंग हो रही है. जैसे ये अब चांद पर पहुंचने वाले हैं. दिक्कत यह है कि ये ऐक्टिंग करने आए हैं मगर औडियंस कंफ्यूज है कि किस की ऐक्टिंग ज्यादा खराब है.

इन नेपो किड्स का आपस में ही कंपैरिजन हो रहा है. पता नहीं कहां से अचानक ही सभी के इंस्टाग्राम की फीड में इन नेपो किड्स की पेड पीआर वाली रील्स आने लग जाती हैं. अभी अमन देवगन और राशा का पीआर चल ही रहा था, उन की मूवी ‘आज़ाद’ का पीआर अभी खत्म भी नहीं हुआ था, उस से पहले ही ‘स्काई फोर्स’ मूवी ने फ़ोर्सफुली बनाए जा रहे ऐक्टर वीर पहाड़िया की पीआर स्टार्ट हो गई.

राशा का पीआर इस तरह चल रहा है कि उसे कैटरीना कैफ़ से कंपेयर किया जा रहा है. हालांकि कैटरीना आज भी ऐक्टिंग सीख रही है लेकिन फिर भी वह इस से तो काफी अच्छी ऐक्टिंग कर लेती है. इन पीआर एजेंसियों ने इन नेपो किड्स के लिए इतना माहौल बना दिया है कि वे ज्यादा ऐक्टिंग अच्छी कर के करेंगे भी क्या? उन्हें पता है, हमारा कंपीटिशन तो अनन्या पांडे है. सो, अच्छी ऐक्टिंग करने का फायदा भी क्या?

राशा अभी 19 साल की हैं और उन का कैरियर स्टार्ट भी हो गया है. जस्ट स्कूल खत्म हुआ और उस के वैकेशन शुरू हुए. इस वैकेशन में उस ने एक मूवी भी फिनिश कर डाली. वहीं, देश में अकसर युवा पूरी जिंदगी सरकारी नौकरी की तैयारी करते हुए बूढ़े हो जाते हैं और फिर भी उन्हें नौकरी नहीं मिलती.

हीरो वीर पहाड़िया का पीआर उलटा पड़ा, बुरी तरह ट्रोल हुए

अभिनेता वीर पहाड़िया हाल ही में ‘स्काई फ़ोर्स’ फिल्म में नजर आए हैं. उन के नानाजी एक्स सीएम रहे हैं. उन के पापा बड़े बिजनेसमैन हैं. उन का अंबानियों के साथ उठनाबैठना है. उन की अच्छीखासी लौबी है. वह पहली ही फिल्म 150 करोड़ की करता है. वह ऐसा है, जो पहली बार परदे पर आता है, जिसे इतनी बड़ी फिल्म मिल गई, इतने बड़े बजट की. वह भी अक्षय कुमार के अपोजिट.

फिल्म में उस की चाहे जैसी भी ऐक्टिंग है, उस ने सोशल मीडिया में अपने पीआर पर काफी खर्चा किया. यही वजह है कि हर जगह वही छाया हुआ है. भले ही वह फिल्मों में चले या न, सोर्स औफ इनकम तो बना ही लेगा. क्या ऐसा ही औरी के साथ नहीं है. जबरदस्ती का इन्फ्लुएंसर है. अपनी पीआर करा के वायरल इन्फ्लुएंसर बन गया, वरना उस के पास ऐसा कौन सा टैलेंट है कि कोई उसे देखे.

मगर हकीकत यह है कि वीर की ओवर पीआर के चलते उस का फायदा कम, नुक़सान ज्यादा हुआ है. सारी पीआर एजेंसियों ने मिल कर सोशल मीडिया पर ऐसी गंद मचाई कि इस इंसान को हीरो नहीं, जोकर बना कर छोड़ दिया. हर मीम पेज की पहली पसंद बन गया है वीर. आधे लोगों को तो पता भी नहीं है कि इस के साथ ‘स्काई फ़ोर्स’ में अक्षय कुमार भी हैं. अक्षय कुमार भी बोल रहा होगा, ‘भला हो ऐसी पीआर एजेंसियों का, जिन्होंने अक्षय कुमार के फ्लौप होने का ठप्पा वीर पहाड़िया के सिर पर लगा दिया.’

इतने लोगों का पेड प्रमोशन सोशल मीडिया पर देखा है, पर इस इंसान के साथ जो हो रहा है, वह नहीं देखा. इस मूवी एवरेज थी. अगर यह बंदा अपनी मार्केटिंग खुद न करवाता, तो हो सकता है कि लोग इस की तारीफ करते. लोगों को खुद से डिसाइड करने दो कि उन्हें आप की ऐक्टिंग कैसी लगती है. आप फिल्म का प्रमोशन करो, न कि अपना. फिल्म अच्छी होगी, आप का काम अच्छा होगा तो लोग खुद तारीफ करेंगे. मगर वीर का पीआर पहली ही फिल्म से उसे सुपरस्टार बताने लगा.
जाहिर है, उन्हें भी अब तक पता चल गया होगा कि जो भी पीआर एजेंसी उस ने हायर कीं, वे उस के कैरियर के लिए डिज़ास्टर साबित हुईं और उस का पैसा पूरी तरह से वेस्ट हो गया है.

रवीना टंडन की बेटी राशा ने भी पीआर में बहुत पैसा लगाया है. आमिर खान का बेटा जुनेद खान, शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान जब ये मूवी में आए, तो बस हर तरफ वही दिख रहे थे. जब इन की कोई चीज आती है, तो हर तरफ सिर्फ यही दिखते हैं. दरअसल ये लोगों के दिमाग को काबू में कर लेते हैं. ये लोग अपना पीआर कुछ इस तरह करवाते हैं कि ये पूरे टाइम चर्चा में बने रहें. इन का फोकस ऐक्टिंग से ज्यादा पीआर पर होता है.

लेकिन आमिर खान का बेटा जुनैद खान अपनी पहली फिल्म ‘महाराज’ से चर्चा में था. उस में उस ने ठीकठाक ऐक्टिंग की थी. उस की मूवी की तारीफ़ भी हुई. लेकिन औडियंस का फीडबैक इस तक नहीं पहुंचा, वरना ‘लवयापा’ जैसी मूवी सेलैक्ट करने से पहले दस बार सोचता. इन पीआर एजेंसियों को हायर करना भी काफी बुरा है. इन एजेंसियों ने इस मूवी को फ्लौप बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अगर लोग जुनैद खान और खुशी कपूर की प्रमोशनल रील्स न देखते, तो गलती से कपल्स टाइम पास करने थिएटर में पहुंच भी जाते. लेकिन औडियंस को एक डिस्क्लेमर मिल गया. अब वे इस मूवी को अपने रिस्क पर ही देखेंगे.

सच तो यह है कि इन नेपो किड्स को अपने पीआर से ज्यादा अपनी ऐक्टिंग और मूवी के सेलैक्शन पर ध्यान देना चाहिए. अगर इन की फिल्में अच्छी होंगी, तो लोग अपनेआप ही इन्हें प्यार देंगे. पब्लिक अपनेआप ही इन लोगों की फैन बन जाएगी. रणबीर कपूर इस का अच्छा उदाहरण हैं. उन की फर्स्ट फिल्म ‘सांवरिया’ फ्लौप हुई थी, लेकिन उस के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और बाद में अपनी बेहतरीन मूवीज से यह साबित कर दिया कि वे नेपो किड तो हैं लेकिन साथ ही बेहतरीन ऐक्टर भी हैं. उन्होंने दरअसल चैलेंजिंग रोल किए और दर्शकों को यह यकीन दिलाने में सफल हुए कि वे अच्छे ऐक्टर हैं. अपनी ऐक्टिंग के दम पर ही उन्होंने अपनी फैनफौलोइंग क्रिएट की है.

युवाओं को पीआर के इस खेल को समझना चाहिए

आज के टाइम में सोशल मीडिया पर जो दिख रहा है वह सारा कंटैंट पैसा लगा कर या पीआर के जरिए करवाया जा रहा है. अगर कोई गाना पसंद आता है, तो उस की पब्लिसिटी में काफी मोटी रकम खर्च कर दी जाती है. इतनी बार आप को वह गाना दिखाई और सुनाई देगा कि आप की जबान पर वह अपनेआप चढ़ जाएगा. गाना दिमाग में बैठ जाएगा, लिरिक्स आप के मुंह पर चढ़ जाएंगे, चाहे वह कितना भी खराब क्यों न हो. युवाओं को समझदारी रखनी है कि इन फालतू चीजों में अपना टाइम वेस्ट न करें. आप जो ये सब चीजें देख रहे हैं, बहुत सारा कंटैंट प्लांटेड तरीके से सोशल मीडिया पर फैलाया जाता है. आप इंटरनैट से सिर्फ वही खोजें जो आप के काम का है.

Hindi Story : वक्त का पहिया – सोच बदलते मातापिता की कथा

Hindi Story : ‘‘आज फिर कालेज में सेजल के साथ थी?’’ मां ने तीखी आवाज में निधि से पूछा.

‘‘ओ हो, मां, एक ही क्लास में तो हैं, बातचीत तो हो ही जाती है, अच्छी लड़की है.’’

‘‘बसबस,’’ मां ने वहीं टोक दिया, ‘‘मैं सब जानती हूं कितनी अच्छी है. कल भी एक लड़का उसे घर छोड़ने आया था, उस की मां भी उस लड़के से हंसहंस के बातें कर रही थी.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ निधि बोली.

‘‘अब तू हमें सिखाएगी सही क्या है?’’ मां गुस्से से बोलीं, ’’घर वालों ने इतनी छूट दे रखी है, एक दिन सिर पकड़ कर रोएंगे.’’

निधि चुपचाप अपने कमरे में चली गई. मां से बहस करने का मतलब था घर में छोटेमोटे तूफान का आना. पिताजी के आने का समय भी हो गया था. निधि ने चुप रहना ही ठीक समझा.

सेजल हमारी कालोनी में रहती है. स्मार्ट और कौन्फिडैंट.

‘‘मुझे तो अच्छी लगती है, पता नहीं मां उस के पीछे क्यों पड़ी रहती हैं,’’ निधि अपनी छोटी बहन निकिता से धीरेधीरे बात कर रही थी. परीक्षाएं सिर पर थीं. सब पढ़ाई में व्यस्त हो गए. कुछ दिनों के लिए सेजल का टौपिक भी बंद हुआ.

घरवालों द्वारा निधि के लिए लड़के की तलाश भी शुरू हो गई थी पर किसी न किसी वजह से बात बन नहीं पा रही थी. वक्त अपनी गति से चलता रहा, रिजल्ट का दिन भी आ गया. निधि 90 प्रतिशत लाई थी. घर में सब खुश थे. निधि के मातापिता सुबह की सैर करते हुए लोगों से बधाइयां बटोर रहे थे.

‘‘मैं ने कहा था न सेजल का ध्यान पढ़ाई में नहीं है, सिर्फ 70 प्रतिशत लाई है,’’ निधि की मां निधि के पापा को बता रही थीं. निधि के मन में आया कि कह दे ‘मां, 70 प्रतिशत भी अच्छे नंबर हैं’ पर फिर कुछ सोच कर चुप रही.

सेजल और निधि ने एक ही कालेज में एमए में दाखिला ले लिया और दोनों एक बार फिर साथ हो गईं. एक दिन निधि के पिता आलोकनाथ बोले, ‘‘बेटी का फाइनल हो जाए फिर इस की शादी करवा देंगे.’’

‘‘हां, क्यों नहीं, पर सोचनेभर से कुछ न होगा,’’ मां बोलीं.

‘‘कोशिश तो कर ही रहा हूं. अच्छे लड़कों को तो दहेज भी अच्छा चाहिए. कितने भी कानून बन जाएं पर यह दहेज का रिवाज कभी नहीं बदलेगा.’’

निधि फाइनल ईयर में आ गई थी. अब उस के मातापिता को चिंता होने लगी थी कि इस साल निकिता भी बीए में आ जाएगी और अब तो दोनों बराबर की लगने लगी हैं. इस सोचविचार के बीच ही दरवाजे की घंटी घनघना उठी.

दरवाजा खोला तो सामने सेजल की मां खड़ी थीं, बेटी के विवाह का निमंत्रण पत्र ले कर.

निधि की मां ने अनमने ढंग से बधाई दी और घर के भीतर आने को कहा, लेकिन जरा जल्दी में हूं कह कर वे बाहर से ही चली गईं. कार्ड ले कर निधि की मां अंदर आईं और पति को कार्ड दिखाते हुए बोलीं, ‘‘मैं तो कहती ही थी, लड़की के रंगढंग ठीक नहीं, पहले से ही लड़के के साथ घूमतीफिरती थी. लड़का भी घर आताजाता था.’’

‘‘कौन लड़का?’’ निधि के पिता ने पूछा.

‘‘अरे, वही रेहान, उसी से तो हो रही है शादी.’’

निधि भी कालेज से आ गई थी. बोली, ‘‘अच्छा है मां, जोड़ी खूब जंचेगी.’’ मां भुनभुनाती हुई रसोई की तरफ चल पड़ीं.

सेजल का विवाह हो गया. निधि ने आगे पढ़ाई जारी रखी. अब तो निकिता भी कालेज में आ गई थी. ‘निधि के पापा कुछ सोचिए,’ पत्नी आएदिन आलोकनाथजी को उलाहना देतीं.

‘‘चिंता मत करो निधि की मां, कल ही दीनानाथजी से बात हुई है. एक अच्छे घर का रिश्ता बता रहे हैं, आज ही उन से बात करता हूं.’’

लड़के वालों से मिल के उन के आने का दिन तय हुआ. निधि के मातापिता आज खुश नजर आ रहे थे. मेहमानों के स्वागत की तैयारियां चल रही थीं. दीनानाथजी ठीक समय पर लड़के और उस के मातापिता को ले कर पहुंच गए. दोनों परिवारों में अच्छे से बातचीत हुई, उन की कोई डिमांड भी नहीं थी. लड़का भी स्मार्ट था, सब खुश थे. जाते हुए लड़के की मां कहने लगीं, ‘‘हम घर जा कर आपस में विचारविमर्श कर फिर आप को बताते हैं.’’

‘‘ठीक है जी,’’ निधि के मातापिता ने हाथ जोड़ कर कहा. शाम से ही फोन का इंतजार होने लगा. रात करीब 8 बजे फोन की घंटी बजी. आलोकनाथजी ने लपक कर फोन उठाया. उधर से आवाज आई, ‘‘नमस्तेजी, आप की बेटी अच्छी है और समझदार भी लेकिन कौन्फिडैंट नहीं है, हमारा बेटा एक कौन्फिडैंट लड़की चाहता है, इसलिए हम माफी चाहते हैं.’’

आलोकनाथजी के हाथ से फोन का रिसीवर छूट गया.

‘‘क्या कहा जी?’’ पत्नी भागते हुए आईं और इस से पहले कि आलोकनाथजी कुछ बताते दरवाजे की घंटी बज उठी. निधि ने दरवाजा खोला. सामने सेजल की मां हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए खड़ी थीं और बोलीं, ’’मुंह मीठा कीजिए, सेजल के बेटा हुआ है.’’

अब सोचने की बारी निधि के मातापिता की थी. ‘वक्त के साथ हमें भी बदलना चाहिए था शायद.’ दोनों पतिपत्नी एकदूसरे को देखते हुए मन ही मन शायद यही समझा रहे थे. वैसे काफी वक्त हाथ से निकल गया था लेकिन कोशिश तो की जा सकती थी.

Emotional Story : दरवाजा खोल दो मां – क्या हुआ था उस दिन सपन के साथ ?

Emotional Story : 10वीं क्लास तक स्मिता पढ़ने में बहुत तेज थी. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था, पर 10वीं के बाद उसके कदम लड़खड़ाने लगे थे. उस को पता नहीं क्यों पढ़ाईलिखाई के बजाय बाहर की दुनिया अपनी ओर खींचने लगी थी. इन्हीं सब वजहों के चलते वह पास में रहने वाली अपनी सहेली सीमा के भाई सपन के चक्कर में फंस गई थी. वह अकसर सीमा से मिलने के बहाने वहां जाती और वे दोनों खूब हंसीमजाक करते थे.

एक दिन सपन ने स्मिता से पूछा, ‘‘तुम ने कभी भूतों को देखा है?’’

‘‘तुम जो हो… तुम से भी बड़ा कोई भूत हो सकता है भला?’’ स्मिता ने हंसते हुए मजाकिया लहजे में जवाब दिया.

सपन को ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी, इसलिए अपनी बात को आगे रखते हुए पूछा, ‘‘चुड़ैल से तो जरूर सामना हुआ होगा?’’

‘‘नहीं, ऐसा कभी नहीं हुआ है. तुम न जाने क्या बोले जा रहे हो,’’ स्मिता ने खीजते हुए कहा.

तब सपन उसे एक कमरे में ले कर गया और कहा, ‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो…’’ कहते हुए स्मिता को कुरसी पर बैठा कर उस का हाथ उठा कर हथेली को चेहरे के सामने रखने को कहा, फिर बोला, ‘‘बीच की उंगली को गौर से देखो…’’ आगे कहा, ‘‘अब तुम्हारी उंगलियां फैल रही हैं और आंखें भारी हो रही हैं.’’

स्मिता वैसा ही करती गई और वही महसूस करने की कोशिश भी करती गई. थोड़ी देर में उस की आंखें बंद हो गईं. फिर स्मिता को एक जगह लेटने को बोला गया और वह उठ कर वहां लेट गई.

सपन ने कहा, ‘‘तुम अपने घर पर हो. एक चुड़ैल तुम्हारे पीछे पड़ी है. वह तुम्हारा खून पीना चाहती है. देखो… देखो… वह तुम्हारे नजदीक आ रही है. स्मिता, तुम डर रही हो.’’

स्मिता को सच में चुड़ैल दिखने लगी. वह बुरी तरह कांप रही थी. तभी सपन बोला, ‘‘तुम्हें क्या दिख रहा है?’’

स्मिता ने जोकुछ भी देखा या समझने की कोशिश की, वह डरतेडरते बता दिया. वह यकीन कर चुकी थी कि चुड़ैल जैसा डरावना कुछ होता है, जो उस को मारना चाहता है.

‘‘प्लीज, मुझे बचाओ. मैं मरना

नहीं चाहती,’’ कहते हुए वह जोरजोर से रोने लगी.

सपन मन ही मन बहुत खुश था. सबकुछ उस की सोच के मुताबिक चल रहा था.

सपन ने बड़े ही प्यार से कहा, ‘‘डरो नहीं, मैं हूं न. मेरे एक जानने वाले पंडित हैं. उन से बात कर के बताता हूं. ऐसा करो कि तुम 2 घंटे में मुझे यहीं मिलना.’’

‘‘ठीक है,’’ कहते हुए जैसे ही स्मिता मुड़ी, सपन ने उसे टोका, ‘‘और हां, तुम को किसी से कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है. मुझ पर यकीन रखना. सब सही होगा.’’

स्मिता घर तो आ गई, पर वे 2 घंटे बहुत ही मुश्किल से कटे. पर उसे सपन पर यकीन था कि वह कुछ न कुछ तो जरूर करेगा.

जैसे ही समय हुआ, स्मिता फौरन सपन के पास पहुंच गई.

सपन तो जैसे इंतजार ही कर रहा था. उस को देखते ही बोला, ‘‘स्मिता, काम तो हो जाएगा, पर…’’

‘‘पर क्या सपन?’’ स्मिता ने डरते हुए पूछा.

‘‘यही कि इस काम के लिए कुछ रुपए और जेवर की जरूरत पड़ेगी. पंडितजी ने खर्चा बताया है. तकरीबन 5,000 रुपए मांगे हैं. पूजा करानी होगी.’’

‘‘5,000 रुपए? अरे, मेरे पास तो 500 रुपए भी नहीं हैं और मैं जेवर कहां से लाऊंगी?’’ स्मिता ने अपनी बात रखी.

‘‘मैं नहीं जानता. मेरे पास तुम्हें चुड़ैल से बचाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है,’’ थोड़ी देर कुछ सोचने का दिखावा करते हुए सपन बोला, ‘‘तुम्हारी मां के जेवर होंगे न? वे ले आओ.’’

‘‘पर… कैसे? वे तो मां के पास हैं,’’ स्मिता ने कहा.

‘‘तुम्हें अपनी मां के सब जेवर मुझे ला कर देने होंगे…’’ सपन ने जोर देते हुए कहा, ‘‘अरे, डरती क्यों हो? काम होने पर वापस ले लेना.’’

स्मिता बोली, ‘‘वे मैं कैसे ला सकती हूं? उन्हें तो मां हर वक्त अपनी तिजोरी में रखती हैं.’’

‘‘मैं नहीं जानता कि तुम यह सब कैसे करोगी. लेकिन तुम को करना ही पड़ेगा. मुझे उस चुड़ैल से बचाने की पूजा करनी है, नहीं तो वह तुम्हें जान से मार देगी.

‘‘अगर तुम जेवर नहीं लाई तो बस समझ लो कि तब मैं तुम्हें जान से मार दूंगा, क्योंकि पंडित ने कहा है कि तुम्हारी जान के बदले वह चुड़ैल मेरी जान ले लेगी और मुझे अपनी जान थोड़े ही देनी है.’’

उसी शाम स्मिता ने अपनी मां से कहा, ‘‘मां, आज मैं आप का हार पहन कर देखूंगी.’’

स्मिता की मां बोलीं, ‘‘चल हट पगली कहीं की. हार पहनेगी. बड़ी तो हो जा. तेरी शादी में तुझे दे दूंगी.’’

स्मिता को रातभर नींद नहीं आई. थोड़ा सोती भी तो अजीबअजीब से सपने दिखाई देते.

अगले दिन सीमा स्मिता के पास आ कर बोली, ‘‘भैया ने जो चीज तुझ से मंगवाई थी, अब उस की जरूरत नहीं रह गई है. वे सिर्फ तुम्हें बुला रहे हैं.’’

जब स्मिता ने यह सुना तो उसे बहुत खुशी हुई. वह भागती हुई गई तो सपन उसे एक छोटी सी कोठरी में ले गया और बोला, ‘‘अब जेवर की जरूरत नहीं रही. चुड़ैल को तो मैं ने काबू में कर लिया है. चल, तुझे दिखाऊं.’’

स्मिता ने कहा, ‘‘मैं नहीं देखना चाहती.’’

सपन बोला, ‘‘तू डरती क्यों है?’’

यह कह कर उस ने स्मिता का चुंबन ले लिया. स्मिता को उस का चुंबन लेना अच्छा लगा.

थोड़ी देर बाद सपन बोला, ‘‘आज रात को जब सब सो जाएं तो बाहर के दरवाजे की कुंडी चुपचाप से खोल देना. समझ तो गई न कि मैं क्या कहना चाहता हूं? लेकिन किसी को पता न चले, नहीं तो तेरे पिताजी तेरी खाल उतार देंगे.’’

स्मिता ने एकदम से पूछा, ‘‘इस से क्या होगा?’’

सपन ने कहा, ‘‘जिस बात की तुम्हें समझ नहीं, उसे जानने से क्या होगा?’’

स्मिता ने सोचा, ‘जेवर लाने का काम बड़ा मुश्किल था. लेकिन यह काम तो फिर भी आसान है.’

‘‘अगर तू ने यह काम नहीं किया तो चुड़ैल तेरा खून पी जाएगी,’’ सपन ने एक बार फिर डराया.

तब स्मिता ने कहा, ‘‘यह तो बताओ कि दरवाजा खोलने से होगा क्या?’’

‘‘अभी नहीं कल बताऊंगा. बस तुम कुंडी खोल देना,’’ सपन ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा.

‘‘खोल दूंगी,’’ स्मिता ने चलते हुए कहा.

‘‘ठाकुरजी को हाथ में ले कर बोलो कि जैसा मैं बोल रहा हूं, तुम वही करोगी?’’ सपन ने जोर दे कर कहा.

स्मिता ने ठाकुर की मूर्ति को हाथ में ले कर कहा, ‘‘मैं दरवाजा खोल दूंगी.’’

पर सपन को तो अभी भी यकीन नहीं था. पता नहीं क्यों वह फिर से बोला, ‘‘मां की कसम है तुम्हें.

कसम खा?’’

आज न जाने क्यों स्मिता बहुत मजबूर महसूस कर रही थी. वह धीरे से बोली, ‘‘मां की कसम.’’

जब स्मिता घर गई तो उस की मां ने पूछा, ‘‘तेरा मुंह इतना लाल क्यों हो रहा है?’’

जब मां ने स्मिता को छू कर देखा तो उसे तेज बुखार था. उन्होंने स्मिता को बिस्तर पर लिटा दिया. शाम के शायद 7 बजे थे.

स्मिता के पिता पलंग पर बैठे हुए खाना खा रहे थे. स्मिता पलंग पर पड़ीपड़ी बड़बड़ाए जा रही थी.

जब स्मिता को थर्मामीटर लगाया गया, उस को 102 डिगरी बुखार था. रात के 9 बजतेबजते स्मिता की हालत बहुत खराब हो गई. फौरन डाक्टर को बुलाया गया. स्मिता को दवा दी गई.

स्मिता के पिताजी के दोस्त भी आ गए थे. स्मिता फिर भी बड़बड़ाए जा रही थी, पर उस पर किसी परिवार वाले का ध्यान नहीं जा रहा था.

स्मिता को बिस्तर पर लेटेलेटे, सिर्फ दरवाजा और उस की कुंडी ही दिखाई दे रही थी या उसे चुड़ैल का डर दिखाई दे रहा था. कभीकभी उसे सपन का भी चेहरा दिखाई पड़ता था. उसे लग रहा था, जैसे चारों लोग उसी के आसपास घूम रहे हैं और तभी वह जोर से चीखी, ‘‘मां, मुझे बचाओ.’’

‘‘क्या बात है बेटी?’’ मां ने घबरा कर पूछा.

‘‘दरवाजे की कुंडी खोल दो मां. मां, तुम्हें मेरी कसम. दरवाजे की कुंडी खोल दो, नहीं तो चुड़ैल मुझे मार देगी.

‘‘मां, तुम दरवाजे को खोल दो. मां, मैं अच्छी तो हो जाऊंगी न? मां तुम्हें मेरी कसम,’’ स्मिता बड़बड़ाए जा

रही थी.

स्मिता के पिताजी ने कहा, ‘‘लगता है, लड़की बहुत डरी हुई है.’’

स्मिता की बत्तीसी भिंच गई थी. शरीर अकड़ने लगा था. यह सब स्मिता को नहीं पता चला. वह बारबार उठ कर भाग रही थी, जोरजोर से चीख रही थी, ‘‘मां, दरवाजा खोल दो. खोल दो, मां. दरवाजा खोल दो,’’ और उस के बाद वह जोरजोर से रोने लगी.

मां ने कहा, ‘‘बेटी, बात क्या है? बता तो सही? क्या सपन ने कहा है ऐसा करने को?’’

‘‘हां मां, खोल दो नहीं तो एक चुड़ैल आ कर मेरा खून पी जाएगी,’’ स्मिता ने डरी हुई आवाज में कहा.

अब उस के पिताजी के कान खड़े हो गए. उन्होंने फिर से पूछा, ‘‘साफसाफ बताओ, बात क्या है?’’

‘‘पिताजी, मुझे अपनी गोद में लिटा लीजिए, नहीं तो मैं…

‘‘पिताजी, सपन ने कहा है कि जब सब सो जाएं तो चुपके से दरवाजा खोल देना. अगर दरवाजा नहीं खोला तो चुड़ैल मेरा खून पी जाएगी.’’

वहीं ड्राइंगरूम में बैठेबैठे ही स्मिता के पिताजी ने किसी को फोन किया था. शायद पुलिस को. थोड़ी देर में कुछ पुलिस वाले सादा वरदी में एकएक कर के चुपचाप उस के मकान में आ कर दुबक गए और दरवाजे की कुंडी खोल दी गई.

रात के तकरीबन 2 बजे जब स्मिता तकरीबन बेहोशी में थी तो उसे कुछ शोर सुनाई दे रहा था. पर तभी वह बेहोश हो गई. आगे क्या हुआ ठीक से उस को मालूम नहीं. पर जब उसे होश आया तो घर वालों ने बताया कि 5 लोग पकड़े गए हैं.

सब से ज्यादा चौंकाने वाली बात यह कि इन पकड़े गए लोगों में से एक सपन और एक चोरों के गैंग का आदमी भी था जिस के ऊपर सरकारी इनाम था.

बाद में वह इनाम स्मिता को मिला. स्मिता 10 दिनों के बाद अच्छी हो गई.

अब स्मिता के अंदर इतना आत्मविश्वास पैदा हो गया था कि एक क्या वह तो कई चुड़ैलों की गरदन पकड़ कर तोड़ सकती थी.

Love Story : इमोशनल अत्याचार – रक्षिता को किस मोड़ पर ले गई जिंदगी ?

Love Story : रक्षिता का सामाजिक बहिष्कार तो मानो हो ही चुका था. रहीसही कसर उस के दोस्त वरुण ने पूरी कर दी थी. रक्षिता को ऐसा लग रहा था कि वह जैसे कोई सपना देख रही हो. 20 दिनों में उस की जिंदगी तहसनहस हो चुकी थी.

20 दिनों पहले रक्षिता के पापा की हार्टअटैक से मौत हो चुकी थी. पापा की मौत के बाद भाई ने अपना असली रंग दिखा दिया. कहते हैं सफलता मिलने के बाद इंसान अपना असली रंग दिखाता है, लेकिन यहां तो दुख की घड़ी में भाई ने रक्षिता को अपना असली चेहरा दिखा दिया था.

अब क्या किया जाए. मां पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह चुकी थी. दादी की भी एक साल पहले मृत्यु हो गई थी. रक्षिता ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे ऐसे दिन भी देखने पड़ेंगे.

रिश्तेदारों के सामने भाई ने हाथ नचा कर पुष्टि कर दी थी कि रक्षिता की वजह से ही पापा की मृत्यु हुई. बूआ, जो उसे बहुत मानती थीं, ने भी साफ कह दिया था, ‘ऐसी लड़की से वे कोई नाता नहीं रखना चाहतीं.’

उस के भाई ने उस से साफतौर पर कह दिया था, ‘अब घर वापस आने की जरूरत नहीं है. तुम्हारी शादी पर खर्च करने की मेरी कोई मंशा नहीं है.’ उस ने दिल्ली जाने का टिकट उस के हाथ में थमा दिया.

‘कोई बात नहीं, कम से कम वरुण तो साथ देगा ही. अब जब समस्या आ ही गई है तो समाधान भी ढूंढ़ना ही पड़ेगा,’ अपनी आंखें पोंछते हुए रक्षिता ने मन ही मन सोचा.

दिल्ली आ कर उस ने दोबारा औफिस जौइन कर लिया. रक्षिता ने वरुण से मिलने की काफी कोशिश की पर वरुण ने उस से दोबारा मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. रक्षिता ने सोचा कि हो सकता है वरुण औफिस के काम में बिजी हो.

एक दिन जब कैंटीन में रक्षिता की सपना से मुलाकात हुई तब उसे हकीकत मालूम हुई. सपना ने बताया, ‘‘रक्षिता, मैं तुम्हें एक बात बताना चाहती हूं. उम्मीद है कि तुम इसे हलके में नहीं लोगी.’’

‘‘पर बताओ तो सही बात क्या है,’’ रक्षिता परेशान होते हुए बोली.

‘‘वरुण कह रहा था कि तुम्हारे रोनेधोने की कहानियां सुनने का स्टेमिना उस में नहीं है.’’

यह सुनते ही रक्षिता के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं. अब उसे मालूम हो गया था कि वरुण उस से कटाकटा सा क्यों रहता है. उस के प्यार ने ही तो उसे हिम्मत बंधाई थी. उसी के बलबूते उस ने अपने भाई की बातों का बहिष्कार किया था. उस से लड़ी थी, लेकिन अब तो सारी उम्मीदें चकनाचूर होती नजर आ रही थीं.

वरुण के प्यार में वह काफी आगे बढ़ चुकी थी.

पापा की मृत्यु ने उसे अंदर तक झकझोर दिया था. उस के बाद भाई ने और अब वरुण की बेवफाई ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया था.

उस के मन में अब तरहतरह के खयाल आ रहे थे. अब क्या होगा. कौन शादी करेगा उस से. पापा की मृत्यु के बाद उन की नौकरी उस के भाई को मिल चुकी थी. घर और थोड़ीबहुत प्रौपर्टी पर भाई ने पहले ही अपना कब्जा जमा लिया था. रिश्तेदारों ने भी भाई का ही साथ दिया था. अब रक्षिता को पता चल गया था कि वह दुनिया में अकेली है. उस का संघर्ष सही माने में अब शुरू हुआ है.

पहली बार पता चला कि लड़के सामाजिक सुरक्षा, भावनात्मक सुरक्षा, रिश्तों की सुरक्षा के साथ पैदा होते हैं. खाली हाथ तो सिर्फ लड़कियां ही पैदा होती हैं.

लोग रक्षिता को लैक्चर देते कि तुम खुद सफल हो कर दिखाओ ताकि वरुण तुम्हें छोड़ने के निर्णय को ले कर पछताए. पर वह किसकिस को समझाए. ऐसा तो फिल्मों में ही संभव है. और रिश्तों की सुरक्षा के बिना वह कितना व क्या कर लेगी.

धीरेधीरे समय बीतने लगा और रक्षिता ने अब किसी प्राइवेट इंस्टिट्यूट में इवनिंग क्लासेस ले कर एलएलबी की पढ़ाई शुरू कर दी. उस ने सोचा कि एक डिगरी भी हो जाएगी और खाली समय भी आराम से कट जाएगा.

नीलेश से उस की वहीं मुलाकात हुई थी. लेकिन वह अब लड़कों से इतना उकता चुकी थी कि उन से बातें करने में भी कतराती थी. नीलेश एक अंगरेजी अखबार में काम करता था. एमबीए करने के बाद उस ने एक दैनिक न्यूजपेपर के विज्ञापन विभाग में नौकरी जौइन की थी. अब एलएलबी की पढ़ाई रक्षिता के साथ कर रहा था.

अब तक बेवकूफ बनी रक्षिता को इतनी समझ आ चुकी थी कि जिंदगी बिताने के लिए एक साथी की अहम जरूरत होती है और इस के लिए जरूरी नहीं कि उसे प्यार किया जाए. प्यार का दिखावा भी किया जा सकता है लेकिन फिर से दिल लगा बैठी तो पता नहीं कितनी तकलीफ होगी.

नीलेश से उस का मेलजोल इस कदर बढ़ा कि धीरेधीरे बात शादी तक पहुंच गई. दिखावा ही सही, पर रक्षिता ने शादी करने में देरी नहीं की. नीलेश की मां ने भी खुलेदिल से रक्षिता को स्वीकार किया. सब ने प्रेमविवाह होने के बावजूद उस का खूब स्वागत किया था और भरपूर प्यार दिया था. पर रक्षिता ने मन की गांठें नहीं खोलीं. उसे लगता था कि एक बार भावनात्मक रूप से जुड़ गई तो गई काम से.

उस के व्यवहार से ससुराल में सभी खुश थे. गलती से भी उस ने कोई कटु शब्द नहीं बोला था. उसे गुस्सा आता ही नहीं था. बातचीत वह बहुत ज्यादा नहीं करती थी. जब भी कोई किसी की बुराई शुरू करता तो वह वहां से खिसक जाती थी.

लेकिन उस की आंखें उस दिन खुलीं जब नीलेश की मां अपनी बहन को बता रही थी, ‘‘बड़ा शौक था मुझे अपनी बहू में बेटी ढूंढ़ने का. वह तो बिलकुल मशीन है. आज तक मैं उस की सास ही हूं, मां नहीं बन पाई.’’

यह सुन कर रक्षिता अपने इमोशंस रोक न सकी और उस पर हुए इमोशनल अत्याचार आंसू बन कर बहने लगे. आंसुओं के साथ बहुतकुछ बह रहा था.

Hindi Kahani : घरौंदा – रेखा की आंखे क्या कहती है ?

Hindi Kahani : दिल्ली से उस के पति का तबादला जब हैदराबाद की वायुसेना अकादमी में हुआ था तब उस ने उस नई जगह के बारे में उत्सुकतावश पति से कई प्रश्न पूछ डाले थे. उस के पति अरुण ने बताया था कि अकादमी हैदराबाद से करीब 40 किलोमीटर दूर है. वायुसैनिकों के परिवारों के अलावा वहां और कोई नहीं रहता. काफी शांत जगह है. यह सुन कर रेखा काफी प्रसन्न हुई थी. स्वभाव से वह संकोचप्रिय थी. उसे संगीत और पुस्तकों में बहुत रुचि थी. उस ने सोचा, चलो, 3 साल तो मशीनी, शहरी जिंदगी से दूर एकांत में गुजरेंगे.

अकादमी में पहुंचते ही घर मिल गया था, यह सब से बड़ी बात थी. बच्चों का स्कूल, पति का दफ्तर सब नजदीक ही थे. बढि़या पुस्तकालय था और मैस, कैंटीन भी अच्छी थी. पर इसी कैंटीन से उस के हृदय के फफोलों की शुरुआत हुई थी. वहां पहुंचने के दूसरे ही दिन उसे कुछ जरूरी कागजात स्पीड पोस्ट करने थे, इसलिए उन्हें बैग में रख कर कुछ सामान लेने के लिए वह कैंटीन में पहुंची. सामान खरीद चुकने के बाद घड़ी देखी तो एक बजने को था. अभी खाना नहीं बना था. बच्चे और पति डेढ़ बजे खाने के लिए घर आने वाले थे. सुबह से ही नए घर में सामान जमाने में वह इतनी व्यस्त थी कि समय ही न मिला था. कैंटीन के एक कर्मचारी से उस ने पूछा, ‘‘यहां नजदीक कोई पोस्ट औफिस है क्या?’’

‘‘नहीं, पोस्ट औफिस तो….’’

तभी उस के पास खड़े एक व्यक्ति, जो वेशभूषा से अधिकारी ही लगता था, ने उस से अंगरेजी में पूछा था, ‘‘क्या मैं आप की मदद कर सकता हूं? मैं उधर ही जा रहा हूं.’’ थोड़ी सी झिझक के साथ ही उस के साथ चल दी थी और उस के प्रति आभार प्रदर्शित किया था. रेखा शायद वह बात भूल भी जाती क्योंकि नील के व्यक्तित्व में कोई असाधारण बात नहीं थी लेकिन उसी शाम को नील उस के पति से मिलने आया था और फिर उन लोगों में दोस्ती हो गई थी. नील देखने में साधारण ही था, पर उस का हंसमुख मिजाज, संगीत में रुचि, किताबीभाषा में रसीली बातें करने की आदत और सब से बढ़ कर लोगों की अच्छाइयों को सराहने की उस की तत्परता, इन सब गुणों से रेखा, पता नहीं कब, दोस्ती कर उस के बहुत करीब पहुंच गई थी. नील की पत्नी, अपने बच्चों के साथ बेंगलुरु में रहती थी. वह अपने पिता की इकलौती बेटी थी और विशाल संपत्ति की मालकिन. अपनी संपत्ति को वह बड़ी कुशलता से संभालती थी. बच्चे वहीं पढ़ते थे. छुट्टियों में वे नील के पास आ जाते या नील बेंगलुरु चला जाता. लोगों ने उस के और उस की पत्नी के बारे में अनेक अफवाहें फैला रखी थीं. कोई कहता, ‘बड़ी घमंडी औरत है, नील को तो अपनी जूती के बराबर भी नहीं समझती.’ दूसरा कहता, ‘नहीं भई, नील तो दूसरी लड़की को चाहता था, लेकिन पढ़ाई का खर्चा दे कर उस के ससुर ने उसे खरीद लिया.’ स्त्रियां कहतीं, ‘वह इस के साथ कैसे खुश रह सकती है? उसे तो विविधता पसंद है.’

लेकिन नील इन सब अफवाहों से अलग था. वह जिस तरह सब से मेलजोल रखता था, उसे देख कर यह सोचना भी असंभव लगता कि उस की पत्नी से पटती नहीं होगी. रेखा को इन अफवाहों की परवा नहीं थी. दूसरों की त्रुटियों में उसे कोई रुचि नहीं थी. जल्दी ही उसे अपने मन की गहराइयों में छिपी बात का पता लग गया था, और तब गहरे पानी में डूबने वाले व्यक्ति की सी घुटन उस ने महसूस की थी. ‘यह क्या हो गया?’ यही वह अपनेआप से पूछती रहती थी. रेखा को पति से कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि वह उसे प्यार ही करती आई थी. अपने बच्चों से, अपने घर से उसे बेहद लगाव था. शायद इसी को वह प्यार समझती थी. लेकिन अब 40 की उम्र के करीब पहुंच कर उस के मन ने जो विद्रोह कर दिया था, उस से वह परेशान हो गईर् थी. वह नील से मिलने का बहाना ढूंढ़ती रहती. उसे देखते ही रेखा के शरीर में एक विद्युतलहरी सी दौड़ जाती. नील के साथ बात करने में उसे एक विचित्र आनंद मिलता, और सब से अजीब बात तो यह थी कि नील की भी वैसी ही हालत थी. रेखा उस की आंखों का प्यार, याचना, स्नेह, परवशता-सब समझ लेती थी और नील भी उस की स्थिति समझता था.

वहां के मुक्त वातावरण में लोगों का ध्यान इस तरफ जाना आसान नहीं था. और इसी कारण से दोनों दूसरों से छिप कर मानसिक साहचर्य की खोज में रहते और मौका मिलते ही, उस साहचर्य का आनंद ले लेते. अजीब हालत थी. जब मन नील की प्रतीक्षा में मग्न रहता, तभी न जाने कौन उसे धिक्कारने लगता. कई बार वह नील से दूर रहने का निर्णय लेती पर दूसरे ही क्षण न जाने कैसे अपने ही निर्णय को भूल जाती और नील की स्मृति में खो जाती. रेखा अरुण से भी लज्जित थी. अरुण की नील से अच्छी दोस्ती थी. वह अकसर उसे खाने पर या पिकनिक के लिए बुला लाता. ऐसे मौकों पर जब वह मुग्ध सी नील की बातों में खो जाती, तब मन का कोई कोना उसे बुरी तरह धिक्कारता. रेखा के दिमाग पर इन सब का बहुत बुरा असर पड़ रहा था. न तो वह हैदराबाद छोड़ कर कहीं जाने को तैयार थी, न हैदराबाद में वह सुखी थी. कई बार वह छोटी सी बात के लिए जमीनआसमान एक कर देती और किसी के जरा सा कुछ कहने पर रो देती. अरुण ने कईर् बार कहा, ‘‘तुम अपनी बहन सुधा के पास 15-20 दिनों के लिए चली जाओ, रेखा. शायद तुम बहुत थक गई हो, वहां थोड़ा अच्छा महसूस करोगी.’’

रेखा की आंखें, इन प्यारभरी बातों से भरभर आतीं, लेकिन बच्चों के स्कूल का बहाना कर के वह टाल जाती. ऐसे में उस ने नील के तबादले की बात सुनी. उस का हृदय धक से रह गया. इस की कल्पना तो उस ने या नील ने कभी नहीं की थी. हालांकि दोनों में से एक को तो अकादमी छोड़ कर पहले जाना ही था. अब क्या होगा? रेखा सोचती रही, ‘इतनीजल्दी?’ एक दिन नील का मैसेज आया. उस ने स्पष्ट शब्दों में पूछा था, ‘‘क्या तुम अरुण को छोड़ कर मेरे साथ आ सकती हो?’’ बहुत संभव है कि फिर हमें एक साथ, एक जगह, रहने का मौका कभी न मिले. मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा, पता नहीं. पर, मैं तुम्हें मजबूर भी नहीं करूंगा. सोच कर मुझे बताना. सिर्फ हां या न कहने से मैं समझ जाऊंगा. मुझे कभी कोईर् शिकायत नहीं होगी.’’ रखा ने मैसेज कई बार पढ़ा. हर शब्द जलते अंगारे की तरह उस के दिल पर फफोले उगा रहा था. आगे के लिए बहुत सपने थे. अरुण से भी बेहतर आदमी के साथ एक सुलझा हुआ जीवन बिताने का निमंत्रण था.

और पीछे…17 साल से तिनकातिनका इकट्ठा कर के बनाया हुआ छोटा सा घरौंदा था. प्यारेप्यारे बच्चे थे, खूबियों और खामियों से भरपूर मगर प्यार करने वाला पति था. सामाजिक प्रतिष्ठा थी, और बच्चों का भविष्य उस पर निर्भर था.

लकिन उन्हीं के साथ, उसी घरौंदे में विलीन हो चुका उस का अपना निजी व्यक्तित्व था. कितने टूटे हुए सपने थे, कितनी राख हो चुकी उम्मीदें थीं. बहुत से छोटेबड़े घाव थे. अब भी याद आने पर उन में से कभीकभी खून बहता है. चाहे प्रौढ़त्व ने अब उसे उन सब दुखों पर हंसना सिखा दिया हो पर यौवन के कितने अमूल्य क्षणों का इसी पति की जिद के लिए, उस के परिवार के लिए उस ने गला घोंट लिया. शायद नील के साथ का जीवन इन बंधनों से मुक्त होगा. शायद वहां साहचर्य का सच्चा सुख मिलेगा. शायद… लेकिन पता नहीं. अरुण के साथ कई वर्ष गुजारने के बाद अब वह क्या नील की कमजोरियों से भी प्यार कर सकेगी? क्या बच्चों को भूल सकेगी? नील की पत्नी, उस के बच्चे, अरुण, अपने बच्चे-इन सब की तरफ उठने वाली उंगलियां क्या वह सह सकेगी?

नहीं…नहीं…इतनी शक्ति अब उस के पास नहीं बची है. काश, नील पहले मिलता. रेखा रोई. खूब रोई. कई दिन उलझनों में फंसी रही. उस शाम जब उस ने अरुण के  साथ पार्टी वाले हौल में प्रवेश किया तो उस की आंखें नील को ढूंढ़ रही थीं. उस का मन शांत था, होंठों पर उदास मुसकान थी. डीजे की धूम मची थी. सुंदर कपड़ों में लिपटी कितनी सुंदरियां थिरक रही थीं. पाम के गमले रंगबिरंगे लट्टुओं से चमक रहे थे और खिड़की के पास रखे हुए लैंप स्टैंड के पास नील खड़ा था हाथ में शराब का गिलास लिए, आकर्षक भविष्य के सपनों, आत्मविश्वास और आशंका के मिलेजुले भावों में डूबताउतराता सा. अरुण के साथ रेखा वहां चली गई. ‘‘आप के लिए क्या लाऊं?’’ नील ने पूछा. रेखा ने उस की आंखों में झांक कर कहा, ‘‘नहीं, कुछ नहीं, मैं शराब नहीं पीती.’’

नील कुछ समझा नहीं, हंस कर बोला, ‘‘मैं तो जानता हूं आप शराब नहीं पीतीं, पर और कुछ?’’

‘‘नहीं, मैं फिर एक बार कह रही हूं, नहीं,’’ रेखा ने कहा और वहां से दूर चली गई. अरुण आश्चर्य से देखता रहा लेकिन नील सबकुछ समझ गया था.

Best Hindi Story : निर्णय – रजनी को क्यों कोई पढ़ने नहीं देता था ?

Best Hindi Story : रजनी कब से बस स्टैंड पर खड़ी थी. घंटों उसे इस तरह से अकेले खड़े देख कर आसपास के शोहदे इकट्ठे होने लगे थे. अचानक एक आया और उस के बगल से धक्का सा मारता हुआ निकल गया. रजनी खिसिया कर रह गई. अपनी इस हालत पर रोना आ गया उसे. उसे लगा, वह इसी लायक है. कब से खड़ी है. अनिश्चय की अवस्था थी तो यहां तक आई ही क्यों? अब क्या करे, कहां जाए, लौट जाए. अभी भी क्या बिगड़ा है. घर जा कर निर्भय से कह देगी कि यों ही कहीं निकल गई थी. उसे क्या पता चलेगा कि रजनी के मन में क्या चल रहा था और वह क्या सोच कर घर से निकली थी. लौटने का रास्ता तो अभी भी खुला ही है. परंतु वापस लौटने का अर्थ है उन्हीं स्थितियों में पुन: वापस लौट जाना जिन से वह दूर भाग जाना चाहती है. क्या वह मायके जाने वाली बस में चढ़े? बस स्टौप पर खड़ेखड़े ही उस को अपना अतीत याद आ गया.

5 भाईबहनों में तीसरे नंबर की रजनी की सुंदरता ही उस की सब से बड़ी पूंजी थी. उस के खिले हुए गोरे रंग के आगे सूरज की धूप भी फीकी लगती. बचपन से ही घरबाहर के लोगों की बातों से उस के अंदर अपनी इस विशिष्टता का एहसास हो गया था. उस ने पढ़ाई में परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं समझी.

सुंदर लड़कियों को पढ़ने की क्या जरूरत? उन के सपनों का राजकुमार तो घोड़े पर सवार हो कर आता है, फिल्मी हीरो की तरह ले जाता है और जीवन भर उन के लिए पलकपांवड़े बिछा कर रखता है. यही सुंदर सा ख्वाब रजनी का भी था. उस के पापा भी लड़कियों को ज्यादा शिक्षित करने और बड़ी उम्र तक घर बिठाए रखने के हिमायती नहीं थे. 18 वर्ष की होतेहोते उस के लिए योग्य वर की खोज शुरू हो गई थी. बड़ी लड़की की शादी तो उन्होंने 18 वर्ष की उम्र में ही कर दी थी.

रजनी की सोच भी इस स्तर से ऊंची न उठ पाई. किसी तरह से इंटर पास कर घर बैठ कर अपने लिए योग्य वर मिलने का इंतजार करने लगी. इतना अवश्य हुआ कि उस ने स्वयं को सिलाईकढ़ाई व पाककला में निपुण कर लिया था. घर के कामकाज में कुशल रजनी मां की लाड़ली थी. एक दिन रजनी इस घर को छोड़ कर चली जाएगी, यह सोच कर ही मां का कलेजा कांप जाता. पर यथार्थ तो यही था. मां जानती थीं कि आज नहीं तो कल, रजनी को जाना ही है.

आज रजनी को देखने कुछ लोग आ रहे थे. छोटी बहन कितनी उत्साहित है. रजनी कम बेचैन नहीं है. उसे देखने आने वाला कैसा होगा, उस से क्याक्या पूछेगा, यही सब सोच रही है. वह अच्छी लगे, इस के लिए खुद को उस ने ढंग से सजायासंवारा है. सुंदर सलोनी रजनी से कौन ब्याह करना न चाहेगा, उसे खुद पर पूरा विश्वास था और हुआ भी ऐसा ही.

निर्भय उसे देखने आया और एक ही नजर में हां कर गया. वह खुद सांवला था और गोरीचिट्टी रजनी को देखते ही अपनेआप को भूल गया.

सांवले या काले लड़कों को गोरी दुलहन की बड़ी चाह होती है और लड़कों का कोई रंग थोड़े ही देखा जाता है. नानी कहती थीं लड़का तो घी का लड्डू होता है, टेढ़ा भी हो तो भी कोई बात नहीं. रजनी भी इसी सोच का एक हिस्सा थी. अपनी खुद की सोच विकसित करने का न उसे माहौल मिला था न उस में खुद इस की क्षमता थी. बस, समय के बहाव में बहती चली गई और जैसा होता गया उसे स्वीकारती गई. इसी तरह ब्याह कर रजनी निर्भय के घर आ गई.

बड़ा सा संयुक्त परिवार था निर्भय का. सास, ससुर, जेठ, जेठानी, देवर, ननद कोई सा रिश्ता बाकी न था. रजनी से सभी को बड़ी अपेक्षाएं थीं. सुघड़, कार्यकुशल, सब का आदरसम्मान करने वाली बहू की छवि सब रजनी में देखना चाहते थे. रजनी भी सब की अपेक्षाओं पर खरी उतरने के प्रयास में लग गई. पर इन सब के बीच उस का एक निजी अस्तित्व भी था, मन में बसी इच्छाएं भी थीं.

निर्भय के साथ समय बिताने, घूमनेफिरने जैसी सहज इच्छाएं थीं जो हर नईनवेली के दिल में विवाह के शुरू के दिनों में होती हैं. परंतु शादी के शुरू के दिनों में ही रजनी के समक्ष निर्भय का व्यक्तित्व उजागर हो गया. परिवार के लोग, परिचित उसे मस्तमौला कहते. जहां जाता वहीं का हो कर रह जाता. घर पर कोई उस का इंतजार कर रहा है, परिवार के लोग उस से कुछ अपेक्षाएं रखते हैं, इन सब बातों का उसे कोई खयाल न था. नईनवेली पत्नी के प्रति भी उसे आकर्षण न था. बस, सारा दिन बिता कर रात को घर आ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेता. खाना भी बाहर खा आता. वह रजनी को चाहता तो था पर उस चाहत को अभिव्यक्त करना और रजनी की भावनाओं को समझने व उन्हें महत्त्व देने की न उस में समझ थी न इच्छा.

संयुक्त परिवार में रहते हुए पत्नी को ले कर कहीं घूमने जाने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाता. परिवार के अन्य सदस्यों के साथ ही रजनी का समय कटता. यहांवहां घूमते रहना निर्भय का शगल था. उस ने ठेकेदारी के लिए रजिस्ट्रेशन करा रखा था. काम मिलने के लिए अफसरों के साथ लगा रहता. विभागीय अधिकारियों को भी अपने चारों ओर घूमने वाले कारिंदे चाहिए होते हैं, सो वे निर्भय को अपने साथ लिए रहते. आवश्यकअनावश्यक वे जहां भी दौरे पर जाते निर्भय को बुलावा आ जाता और निर्भय साथ चल देता. दिन या समय की उसे कोई चिंता न रहती.

रजनी सोचती, यदि इसी तरह जीवन काटना था तो निर्भय ने उस से विवाह ही क्यों किया. रजनी मायके जाती, चाहे जितने दिन रह आए, वह कभी उसे लिवाने न आता. हमेशा वह अपने भाई के साथ ही वापस आती. ससुराल आ कर फिर उसी माहौल में कुछ समय में ही उस का मन विरक्त हो जाता और फिर वह मायके आ जाती. और कोई ठिकाना तो था नहीं.

अकेली कहां जाती. इतनी शिक्षा और आत्मविश्वास भी नहीं था कि वह खुद के बूते कुछ करने की सोचती. रजनी मन मसोस कर रह जाती. क्यों उस ने मन लगा कर पढ़ाई नहीं की. आज वह अपने पैरों पर खड़ी होती तो इस तरह मुहताज न होती. कभी ससुराल कभी मायके के बीच पेंडुलम बनी रजनी को अपना जीवन इतना व्यर्थ लगने लगा कि कई बार आत्महत्या जैसे विचार भी उस के मन में आने लगे थे.

मायके आ कर रजनी मम्मी, पापा, भाई, बहनों के साथ स्वयं को खुश रखने की कोशिश करती, सब के अनुसार खुद को ढाल कर चलने की कोशिश करती ताकि उस का बारबार मायके आना किसी को अखरे नहीं. मां उस की मनोस्थिति को समझती थीं. परंतु फिर भी, जब मन उकता जाता तो वह फिर ससुराल लौट जाती, यही उस के जीवन का ढर्रा बन गया था.

liteनिर्भय की बहुत ज्यादा कमाई नहीं थी कि वह पत्नी को आर्थिक रूप से ही खुश रख सके. इसी तरह 10 वर्ष बीत गए. घिसटतीघिसटती रसहीन जिंदगी. रजनी का लावण्य भी फीका पड़ गया. पर इतना अवश्य हो गया कि नन्हा अभिनव उस की गोद में आ गया. रजनी का समय अभिनव के प्यारदुलार, देखभाल में कटने लगा. उसे लगा जैसे उस के जीवन के वसंत में नए पुष्प खिल गए हों. बेटे के जन्म से निर्भय के व्यक्तित्व में भी कुछ स्थायित्व आया. वह अब घर पर ज्यादा समय देने लगा.

रजनी को लगा अब उस का जीवन व्यवस्थित हो जाएगा. पर अभिनव अभी 6 माह का भी नहीं हुआ था कि निर्भय फिर वही अपनी पुरानी जीवनशैली पर लौट आया. सुबह जाता तो फिर पता ही न होता कब लौटेगा, कहां गया है, कहां खाना खाया, कहां रहा, कुछ बताने की उसे आवश्यकता नहीं थी. रजनी कुछ पूछने की कोशिश करती तो उसे चुप करा देता. औरत को इतना अधिकार कहां कि पति से पूछताछ करे.

कभीकभी तो वह कईकई दिन वापस न आता. कोई स्थायी कामधंधा करने की वह सोचता नहीं. रजनी के ससुर ने अनेक बार उसे घर के पास ही जनरल स्टोर की दुकान खोल लेने की सलाह दी पर उस ने कभी उन की बात पर ध्यान न दिया. निर्भय को तो बड़ेबडे़ अफसरों के साथ घूमने, गेस्टहाउसों में रुकने, साहबों की पत्नियों की चाटुकारिता करने की आदत पड़ गई थी. घरपरिवार के साथ स्थायित्व के साथ रहना उसे सुहाता नहीं था.

पत्नी, बच्चे की उसे कोई चिंता न थी. वे तो परिवार के सदस्यों के साथ सुरक्षित थे ही. जीवित रहने, पेट भरने के सिवा भी पत्नी की कुछ इच्छाएं होती हैं, इस बात पर निर्भय अपना दिमाग जाया ही नहीं करना चाहता था.

रजनी सोचती कि वह क्या करे, उस का जीवन क्या बन कर रह गया है. अकेली वह कुछ कर नहीं सकती. पति का साथ उस के हिस्से में नहीं है. अपने बच्चे को वह अच्छी परवरिश कैसे देगी. उसे अच्छे स्कूल में कैसे पढ़ाएगी. रजनी का दिमाग जैसे फटने लगता. अगर वह आत्महत्या कर लेगी तो अभिनव का क्या होगा? वह अपनेआप को संभालने की कोशिश करती परंतु लौट कर फिर उसी उलझन में उलझ जाती.

रजनी के पिता बीमार पड़ गए तो वह मायके आई थी. उस की दीदी, जीजाजी में कुछ अनबन चल रही थी. अचानक हालात इतने बिगड़ गए कि दीदी ने चूहे मारने की दवा खा ली. 3 बच्चों को बिलखता छोड़ वह इस संसार से विदा हो गई. जीजाजी पुलिस केस में फंस गए. रजनी आई तो बीमार पिता को देखने थी, पर यहां दीदी के बच्चों की देखभाल में व्यस्त हो गई. अपने पारिवारिक जीवन से तो उसे पहले ही कोई लगाव न था और अब तो अभिनव, दीदी के बच्चों के बीच वह भूल ही गई कि उस का अपना एक पति और ससुराल भी है. याद रखने योग्य कुछ ऐसा था भी नहीं, जो स्मृतियों में जिंदा रहता. इसलिए आसानी से भूल भी गई. अब तो यही घर उसे अपना लगने लगा. पतिव्रता, शादीशुदा जैसे शब्दों के माने समझने को उस का दिल तैयार ही न होता.

6 माह होने को आए, रजनी ससुराल नहीं गई. लेकिन निर्भय आज उसे लेने आ रहा था. क्या वह वापस चली जाए? क्या निर्भय बदल गया होगा? अगर वह चली गई तो दीदी के बच्चों का क्या होगा जिन्होंने उसे अपनी मां का दरजा दे दिया है.

सवालों की उधेड़बुन के बीच रजनी वापस आ गई निर्भय के घर. आखिर वह उस की पत्नी है. उस का असली घर तो यही है. निर्भय अभिनव का पिता है. 15 दिन भी नहीं बीते कि रजनी को महसूस हो गया कि यहां कुछ भी नहीं बदला है. निर्भय वही है. उसे रजनी की कोई परवा नहीं है. उसे वापस लेने तो वह इसलिए चला गया था क्योंकि लोगों के सवालों का जवाब देतेदेते वह परेशान हो गया था और घर वालों का बड़ा दबाव था. पर रजनी तो वापस फिर उसी कैदखाने में आ गई जहां न उस के होने का कोई महत्त्व है और न उस के अस्तित्व का किसी को एहसास है.

आज रजनी इस बस स्टौप पर खड़ी है, वापस जाने के लिए. दीदी के बच्चों की देखभाल के लिए कोई नहीं है. सब से ज्यादा, वहां उस के होने का कोई महत्त्व तो है. वह हाड़मांस की कोई पुतली नहीं है, जीतीजागती इंसान है. उस का अपना एक अस्तित्व है. निर्भय के साथ सारा जीवन इस तरह से काटने की कल्पना से ही उसे घबराहट होने लगती. नहीं, वह निर्भय के पास वापस नहीं जाएगी. वह वहीं जाएगी जहां उस की कद्र है, उस के होने का कोई महत्त्व है और जहां लोगों को उस की जरूरत है. रजनी अपना बैग उठा कर बस में चढ़ गई.

Romantic Story : कितने दिल – रमन जी क्यों इतनी मेहनत कर रहे थे ?

Romantic Story :  ‘‘किसी ने क्या खूब कहा है कि जो रिश्ते बनने होते हैं बन ही  जाते हैं, नियति के छिपे हुए आशयों को कौन जान सका है. इस का शाहकार और कारोबार ऐसा है कि अनजानों को कैसे भी और कहीं भी मिला सकता है.‘‘

वे दोनों भी तकरीबन एक महीने से एकदूसरे को जानने लगे थे. रोज शाम को अपनेअपने घर से टहलने निकलते और पार्क में बतियाते.

आज भी दोनों ने एकदूसरे को देखा और मुसकरा कर अभिवादन किया.‘‘तो सुबह से ही सब सही रहा आज,‘‘ रमा ने पूछ लिया, तो रमनजी ने ‘‘हां‘‘ कह कर जवाब दिया.

और फिर दोनों में सिलसिलेवार मीठीमीठी गपशप भी शुरू हो गई.रमा उन से 5 साल छोटी थी, मगर उन की बातें गौर से सुनती और अपना विचार व्यक्त करती.

रमनजी ने उस को बताया था कि वो परिवार से बहुत ही नाखुश रहने लगे हैं क्योंकि सब को अपनीअपनी ही सूझती है. सब की अपनी मनपसंद दुनिया और अपने मनपसंद अंदाज हैं.

रमनजी का स्वभाव ही ऐसा था कि जब भी गपशप करते तो अचानक ही पोंगा पंडित जैसी बातें करने लगते. वे कहते, ‘‘रमाजी पता है, तो वह तुरंत कहती ‘जी, नहीं…नहीं’ पता है.

तब भी वे बगैर हंसे अपनी रौ में बोलते रहते, ‘‘इस दुनिया में दो ही पुण्य फल हैं – एक, तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा, तुम जो चाहो वह मिल जाए.‘‘

यह सुन कर रमाजी खूब हंसने लगतीं, तो रमनजी अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहते, “प्रभु की शरण में सब समाधान मिल जाता है. परमात्मा में रमा हुआ मन और तीर्थ में दानपुण्य करने वाले को सभी तरह की शंका का समाधान मिल जाता है.‘‘

“और हां रमाजी सुनिए, यह जो जीवन है वो भले ही कितना भी लंबा हो, नास्तिक बन कर और उस परमात्मा को भूल कर छोटा भी किया जा सकता है.‘‘

यह सब सुन कर रमाजी अपनी हंसी दबा कर कहतीं, ‘‘अच्छाजी, तो आप का आश्रम कहां है? जरा दीक्षा लेनी थी.‘‘

यह सुन कर रमनजी काफी गंभीर और उदास हो जाते, तो वे मन बदलने को कुछ लतीफे सुनाने लगतीं. वे उन से कहतीं, ‘‘गुरुजी, जो तुम को हो पसंद वही बात करेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो तो रात कहेंगे…‘‘

उक्त गीत में नायक नायिका से क्या कहना चाहता है, संक्षेप में भावार्थ बताओ रमनजी…रमनजी सवाल सुन कर बिलकुल सकपका ही जाते. वे बहुत सोचते, पर उन से तो उत्तर देते ही नहीं बनता था.

रमाजी कुछ पल बाद खुद ही कह देतीं, ‘‘रमनजी, इस गाने में नायक नायिका से कह रहा है कि ठीक है, तुम से माथा फोड़ी कौन करे.‘‘उस के बाद दोनों ही जोरदार ठहाके लगाते.

अकसर रमनजी उपदेशक हो जाते. वे कहते कि मेरे मन में ईश्वर प्रेम भरा है और मैं तुम को भी यही सलाह इसलिए नहीं दे रहा कि मैं बहुत समझदार हूं, बल्कि मैं ने गलतियां तुम से ज्यादा की हैं. और इस राह में जा कर ही मुझे सुकून मिला है इसलिए.

तो रमाजी भी किसी वामपंथी की मानिंद बोल उठतीं, ‘‘रमनजी, 3 बातों पर निर्भर करता है हमारा भरोसा. हमारा अपना सीमित विवेक, हम पर सामाजिक दबाव और आत्मनियंत्रण का अभाव.‘‘

अब इस में मैं ने अपने भरोसे की चीज तो पा ली है और खुश हूं कि हां, वो कौन सी चीज ढूंढी, यह तो समझने वालों ने समझ ही लिया होगा, मगर रमनजी तब भी रमाजी के मन को नहीं समझ पाते थे.

रमनजी की भारीभरकम बातें सुन कर पहलेपहल रमा को ऐसा लगता था कि वे शायद बहुत बड़े कुनबे का बोझ ढो रहे होंगे. बहुत सहा होगा और इसीलिए अब उन को उदासी ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है.

फिर एक दिन रमा ने जरा खुल कर ही जानना चाहा कि या इलाही आखिर ये माजरा क्या है. रमा उन से बोलीं कि मैं अब 60 पूरे कर रही हूं और मैं 65 ऐसा कह कर रमनजी हंस दिए.

‘‘मेरा मतलब यह है कि मेरे बेटेबहू मुझे कहते हैं जवान बूढी,‘‘ हंसते हुए रमाजी ने कहा.

‘‘अच्छा… अच्छा,‘‘ रमनजी ने गरदन हिला कर जवाब दिया. वे जराजरा सा मुसकरा भी दिए.

‘‘मैं जानना चाहती हूं कि आप को कितने लोग मिल कर इतना दुखी कर रहे हैं कि आप परेशान ही नजर आते हो,‘‘ रमाजी ने गंभीरता से पूछा.

रमाजी में बहुत ही आत्मीयता थी. वो रमनजी के साथ बहुत चाहत से बात करती थीं. यही कारण था कि रमनजी ने बिना किसी संकोच के सब बता दिया कि वे सेवानिवृत्ति बस कंडक्टर रहे हैं और इकलौते बेटे को 5 साल की उम्र से उन्होंने अपने दम पर ही पाला. कभी सिगरेट, शराब, सुपारी, पान, तंबाकू किसी को हाथ तक नहीं लगाने दिया.

पिछले साल ही बेटे का विवाह हो गया है. आज स्थिति ऐसी है कि वह और उस की पत्नी बस अपने ही हाल में मगन हैं. बहू एक स्टोर चलाती है और बेटा जूतेचप्पल की दुकान. दोनों का अलगअलग अपना काम है और बहुत अच्छा चल रहा है.

‘‘ओह, तो यह बात है. आप को यह महसूस हो रहा है कि अब आप की कोई पूछ ही नहीं रही है न,‘‘ रमा ने कहा. “मगर, पूछ तो अब आप की नजर में भी कम ही हो गई होगी. अब आप को यह पता लग गया कि मैं बस कंडक्टर था,” रमनजी फिर उदास हो गए.

उन की इस बात पर रमाजी हंस पडीं और बोलीं कि कोई भी काम छोटा नहीं होता. दूसरा, आप हर बात पर उदासी को अपने पास मत बुलाया कीजिए. यह थकान की जननी है और थकान बिन बुलाए ही बीमारियों को आप के शरीर में प्रवेश करा देती है.

“आप को पता नहीं कि मैं खुद भी ऐसी ही हूं, मगर मेरा यह अंदाज ऐसा है कि फिर भी मेरे बेटेबहू मुझ को बहुत प्यार करते हैं, क्योंकि मैं मन की  बिलकुल साफ हूं.

“मैं ने 20 साल की उम्र में प्रेम विवाह किया और 22 साल की उम्र में पति को उस की प्रेमिका के पास छोड़ कर अपने बेटे को साथ ले कर निकल पड़ी. उस के बाद पलट कर भी नहीं देखा कि उस बेवफा ने बाकी जिंदगी क्या किया और कितनी प्रेमिकाएं बनाईं, कितनों का जीना दूभर किया.‘‘

‘‘मैं मातापिता के पास आ कर रहने लगी और 22 साल की उम्र से बेटे की परवरिश के साथ ही बचत पर अपना पूरा ध्यान लगा दिया.‘‘

‘‘मेरा बेटा सरकारी स्कूल और कालेज में ही पढ़ा है. अब वह एक शिक्षक है और पूरी तरह से सुखी है. ‘‘हां, तो मैं बता रही थी कि मेरे पीहर मे बगीचे हैं, जिन में 50 आम के  पेड़ हैं, 50 कटहल, और इतने ही जामुन और आंवले के. मैं ने इन की पहरेदारी का काम किया और पापा ने मुझे बाकायदा पूरा वेतन दिया.

‘‘जब मेरा बेटा 10वीं में आया, तो मेरे पास पूरे 20 लाख रुपए की पूंजी थी. मेरे भाई और भाभी ने मुझे कहीं जाने नहीं दिया.

‘‘मेरी उन से कभी अनबन नही हुई. वे हमेशा मुझे चाहते रहे क्योंकि उन के बच्चों को मेरे बेटे के रूप मे एक मार्गदर्शक मिल रहा था. और मेरी वो पूंजी बढती गई.‘‘

‘‘मगर, बेटे की नौकरी पक्की हो गई थी और उस ने विवाह का इरादा कर लिया था, इसलिए हम लोग यहां इस कालोनी में रहने लगे. पिछले साल ही मेरे बेटे का विवाह हुआ है.

‘‘अपनी बढ़िया बचत से और जीवनशैली के बल पर ही मैं आज करोड़पति हूं, मगर सादगी से रहती हूं. अपना सब काम खुद करती हूं और कभी भी उदास नहीं रहती.

‘‘पर, आप तो हर बात पर गमगीन हो जाते हैं. इतने दिनों से आप की व्यथा सुन कर मुझे तो यही लगता है कि आप पर बहुत ही अत्याचार किया जा रहा है. इस तरह आप लगातार दुख में भरे रहे तो दुनिया से जल्दी ही विदा हो जाओगे.

‘‘आप हर बात पर परेशान रहते हो. यह मुझ को बहुत विचलित कर देता है. सुनो…मेरे मन में

एक आइडिया आया है. “आप एक काम करो. मैं कुछ दिन के लिए आप के घर चलती हूं. वहां का माहौल बदलने की कोशिश करूंगी. मैं तो हर जगह सामंजस्य बना लेती हूं. मैं 20 साल पीहर में रही हूं.‘‘‘‘मगर, आप को ऐसे कैसे…? कोई तो वजह होगी ना मेरे घर चलने की. वहां मैं क्या कहूंगा?‘‘ रमनजी बोले.

‘‘अरे, बहुत ही आसान है. मेरी बात गौर से सुनो. आज आप एक गरम पट्टी बांध कर घर वापस जाओ. कह देना कि यह कलाई अब अचानक ही सुन्न हो गई है. कोई सहारा देने वाला तो चाहिए ना. जो हाथ पकड़ कर जरा संभाल ले.‘‘

‘‘फिर मैं आप के दोस्त की  कोई रिश्तेदार हूं. आप कह देना कि बुढ़िया है, मगर ईमानदार है. मेरा पूरा ध्यान रख लेगी वगैरह. वे भी सोचेंगे कि चलो, सही है बैठेबैठे सहायिका भी मिल गई.‘‘

‘‘कोशिश कर के देखता हूं,‘‘ रमनजी ने कहा और पास के मेडिकल स्टोर से गरम पट्टी खरीद कर अपने घर की  तरफ जाने वाली गली में चले गए.

रमाजी का तीर निशाने पर लगा. एक सप्ताह की तैयारी कर रमाजी उन के घर पहुंच गई थीं.रमाजी के आने से पहले रमनजी के बेटेबहू ने उन की एक अलग ही इमेज बना रखी थी और उन को एक अति साधारण महिला समझा था, मगर जब आमनासामना हुआ तो रमाजी का आकर्षक व्यक्तित्व देख कर उन्होंने रमाजी के पैर छू लिए.

यह देख रमाजी ने भी खूब दिल से आशीर्वाद दिया. रमाजी को तो पहली नजर में रमनजी के बेटेबहू बहुत ही अच्छे लगे.खैर, सब की अपनीअपनी समझ होती है, यह सोच कर रमाजी किसी निर्णय पर नहीं पहुंचीं और सब आने वाले  समय पर छोड़ दिया.

अगले दिन सुबह से ही रमाजी ने मोरचा संभाल लिया था. रमनजी अपनी कलाई वाले दर्द पर कायम थे और बहुत ही अच्छा अभिनय कर रहे थे.

रमाजी को सुबह जल्दी उठने की आदत थी, इसलिए सब के जागने तक वे नहाधो कर चमक रही थीं, वे खुद चाय पी चुकी थीं, रमनजी को भी 2 बार चाय मिल गई थी. साथ ही, वो हलवा और पोहे का नाश्ता तैयार कर चुकी थीं.

यह देख बेटेबहू भौंचक थे. इतना लजीज नाश्ता कर के वे दोनों गदगद थे. बेटाबहू दोनों अपने काम पर निकले तो रमनजी ने हाथ चलाया और रसोई में बरतन धोने लगे. रमाजी ने बहुत मना किया तो वो जिद कर के मदद करने लगे क्योंकि वो जानते थे कि 3 दिन तक बाई छुट्टी पर रहेगी.

शाम को बेटेबहू रमाजी को कह कर गए थे कि आज वो बाहर से पावभाजी ले कर आएंगे, इसलिए रमाजी भी पूरी तरह निश्चिंत रहीं और आराम से बाकी काम करती रहीं. उन्होंने आलू के चिप्स बना दिए और साबूदाने के पापड़, गमलों की  सफाई कर दी.

एक ही दिन में रमाजी की इतनी मेहनत देख कर रमनजी का परिवार हैरत में था. रात को सब ने मिलजुल कर पावभाजी का आनंद लिया.रमनजी और रमाजी रोज शाम को लंबी सैर पर जा रहे थे. कुछ जानने वालों ने अजीब निगाहों से देखा, मगर दोनों ने इस की परवाह नहीं की.

इसी तरह पूरा एक सप्ताह निकल गया. कहां गुजर गया, कुछ पता ही न चला.रमनजी और उन के बेटेबहू रमाजी के दिल से प्रशंसक  हो चुके थे. वो चाहते थे कि रमाजी वहां कुछ दिन और रहें. ऐसा देख रमनजी का चेहरा निखर उठा था. उन की उदासी जाने कहां चली गई थी. बेटेबहू उन से बहुत प्रेम से बात करते थे. वातावरण बहुत ही खुशनुमा हो गया था.

रमाजी अपने मकसद में कामयाब रहीं. उन को कुछ सिल्क की  साड़ियां  उपहार में मिलीं, क्योंकि रमाजी ने रुपए लेने से मना कर दिया था.रमाजी वहां से चली गईं और रमनजी को शाम की सैर पर आने को कह गईं. पर, शाम को रमाजी सैर पर नहीं आ सकीं.

रमनजी को उन्होंने संदेश भेजा कि वो सपरिवार 2 दिन के लिए कहीं बाहर जा रही हैं.रमनजी ने अपना मन संभाला, मगर तकरीबन एक सप्ताह गुजर गया और रमाजी नहीं आईं. रमनजी के किसी संदेश का जवाब भी नहीं दिया.

रमनजी को फोन करते हुए कुछ संकोच होने लगा, तो वह मन मसोस कर रह गए. पूरा महीना ऐसे ही निकल गया. लगता था, रमनजी और बूढ़े हो गए थे.मगर वो रमाजी के बनाए आलू के चिप्स और पापड़ खाते तो लगता कि रमाजी यहीं पर हैं और उन से बातें कर रही हैं.

एक शाम उन का मन सैर पर जाने का हुआ ही नहीं. वो नहीं गए. अचानक देखते क्या हैं कि रमाजी उन के घर के दरवाजे पर आ कर खड़ी हो गई हैं. वे एकदम हैरान रह गए. अरे, ये क्या हुआ. पीछेपीछे उन के बेटेबहू भी आ गए. अब तो रमनजी को सदमा लगा. वो अपनी जगह से खड़े हो गए.

बहू ने कहा कि रमाजी अब यहां एक महीना रहेंगी. और हम उन के गुलाम बन कर रहेंगे.रमनजी ने कारण जानना चाहा, तो बहू ने बताया कि उस की छोटी बहन अभी होम साइंस पढ़ रही है. उस को कालेज के अंतिम प्रोजैक्ट में अनुभवी महिला के साथ समय बिताना है, डायरी बनानी है इसलिए…‘‘

‘‘ओ हो अच्छा… बहुत अच्छा,’’ बहू बहुत ही सही निर्णय. कहते समय रमनजी के चेहरे पर लाली आ गई. मगर उन के परिवार से बात कर ली. वो अचानक पूछ बैठे.  परिवार मना कैसे करता. मेरी बहन और रमा आंटी तो फेसबुक दोस्त हैं. और रमाजी का परिवार तो समाजसेवा का  शौकीन है. है ना रमा आंटी,‘‘

रमनजी की बहू चहक उठी. रमाजी ने अपने व्यवहार की दौलत से अपने जीवन में कितने सारे दिल जीत लिए थे.

National Highway : असुविधाओं पर टोल टैक्स?

National Highway : जम्मूकश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को एक अहम आदेश में कहा है कि यदि राजमार्ग पर उचित रखरखाव नहीं है और निर्माण का काम चल रहा है तो वहां यात्रियों से टोल वसूलना अनुचित है.

डेढ़दो दशक पीछे अगर आप सड़क मार्ग से एक शहर से दूसरे शहर जाते थे तो एक्सप्रेसवे के मुकाबले समय भले कुछ ज्यादा लगता था मगर रास्ते भर ढाबे पर रुकरुक कर खाना और चाय पानी का लुत्फ़ उठाते हुए गंतव्य पर पहुंचना बहुत रोमांचक होता था. वो ढाबे पर असली घी में तड़की पंचमेल दाल और तंदूर से निकली गरमगरम रोटी जिस पर मक्खन की एक टिकिया रखी होती थी, आज सोचो तो मुंह में पानी भर आता है.

कभीकभी तो रास्ते में पड़ने वाले खेतखलिहानों में गाड़ी रोक कर फोटो शूट भी कर लेते थे. गन्ने के खेत मिल गए तो दोचार गन्ने तुड़वा कर गाड़ी में रख लिए और रास्ते भर चूसते गए. आम के मौसम में हाईवे के किनारे आम के ढेर लगाए बैठे किसानों से कितने सस्ते में मीठे रसीले आम खरीद लिए जाते थे. 10-15 किलो से कम तो लेते ही न थे. गाड़ी की डिग्गी खुशबूदार आमों से भर जाती थी. ये आम रिश्तेदारों और दोस्तों में भी बांटे जाते थे. शहतूत, जामुन, सेब, खुबानी जैसे फल भी हाईवे के किनारे खूब बिकते और बहुत सस्ते होते थे. क्योंकि बीच में कोई दलाल नहीं होता था. किसान ने अपने खेत से फल तोड़े और सड़क पर बेचने बैठ गया. शाम तक जेब नोटों से भर जाती थी, दूसरे दिन फिर ताजे फल तोड़े और बेचने बैठ गए. किसान और ग्राहक दोनों खुश.

अब हाईवे पर ऐसे नज़ारे ढूंढने से भी नहीं मिलते. तमाम बड़े शहरों को एक्सप्रेस वे द्वारा जोड़ कर शंघाई जैसा लुक देने की हसरत में मोदी सरकार ने किसानों और हाईवे से गुजरने वाले यात्रियों दोनों का नुकसान ही किया है. एक तो किसानों की कृषि भूमि अधिग्रहित कर कर के ऊंचेऊंचे एक्सप्रेसवे बना दिए गए हैं और लगातार बनाए जा रहे हैं, जिन पर किसान अपने फल, सब्जी, लकड़ी का सामान आदि बेचने के लिए नहीं बैठ सकता. दूसरे जिन किसानों की जमीनों पर ये एक्सप्रेसवे बने हैं, उन एक्सप्रेसवे पर वे किसान ही नहीं चल सकते. क्योंकि उन पर तो फर्राटा भरती बड़ीबड़ी लग्जरी गाड़ियां दौड़ती हैं, जिन के बीच ना तो किसानों के ट्रैक्टर चल सकते हैं और ना उन गरीबों की साइकिलें या मोटरसाइकिलें, उन के लिए इन एक्सप्रेसवेज के नीचे धूल उड़ाती कच्ची सड़कें पड़ी हैं जो बारिशों में कीचड़ से भर जाती हैं और गर्मियों में गर्द उड़ाती हैं. अमीरों की मोटरों के लिए बने एक्सप्रेसवे तो चमकाए जाते हैं मगर गरीब की सड़क के बड़ेबड़े गड्ढे सरकार को कभी नजर नहीं आते. इन एक्सप्रेसवे ने समाज में अमीर और गरीब की खाई को और ज्यादा चौड़ा कर दिया है.

एक्सप्रेसवे का जाल पूरे देश में बिछाने की मोदी सरकार की इच्छा ने उस वर्ग, जिन की कार रखने की हैसियत है, को भी कुछ ख़ास फायदा नहीं पहुंचाया है. फायदा बस इतना भर है कि एक्सप्रेसवे से जाने पर यात्रा के कुछ घंटे बच जाते हैं और कुछ पेट्रोलडीजल बच जाता है, मगर यात्रा का आनंद जरा भी नहीं आता. निशा अपने पति आनंद के साथ आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे पर अपनी कार से जा रही थीं. निशा को अचानक उल्टी हो गई. पानी की जरूरत हुई मगर आनंद को गाड़ी में पानी की बोतल नहीं मिली. शायद निशा रखना भूल गई थी. दूरदूर तक पानी मिलने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी. 50 किलोमीटर के बाद एक शानदार चमचमाता जलपानगृह नजर आया जहां रुक कर निशा ने अपना हाथ मुंह धोया. इस जलपानगृह पर खानेपीने के सामान के दाम इतने ज्यादा थे कि दोनों ने चिप्स के दो पैकेट से ही काम चलाया.

खानेपीने की समस्या के अलावा एक्सप्रेसवे पर गाड़ियों की रफ़्तार इतनी ज्यादा होती है कि आयदिन भयानक एक्सीडैंट होते हैं, खासतौर पर सर्दियों के दिनों में जब हाईवे गहरे कोहरे में ढंके होते हैं. यमुना एक्सप्रेस वे हो, या आगरालखनऊ एक्सप्रेसवे, इन पर आएदिन भयंकर एक्सीडैंट होते हैं. और चिकित्सा सुविधा जल्द मिलने की कोई व्यवस्था नहीं है. ज्यादातर घायल अस्पताल तक पहुंचते पहुंचते दम तोड़ देते हैं.

एक्सप्रेसवे पर जो सब से बड़ी समस्या है, वह है टोल टैक्स, जो दिनप्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है. इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि गुणवत्ता की सेवा दिए बिना टैक्स वसूलना उपभोक्ता के साथ अन्याय है. यह बात हर सरकारी व निजी महकमे पर लागू होती है. लेकिन यथार्थ में ऐसा होता नहीं है और बेहतर सेवा के बिना टैक्स वसूलने के खिलाफ लोग लोक अदालतों से ले कर विभिन्न अदालतों के दरवाजे खटखटाते रहते हैं.

हाल ही में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को एक अहम आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि यदि राजमार्ग पर उचित रखरखाव नहीं है और निर्माण का काम चल रहा है तो वहां यात्रियों से टोल वसूलना अनुचित है.

कोर्ट ने एनएच-44 के पठानकोट से उधमपुर तक के खंड में खराब सड़कों के कारण एनएचएआई को टोल शुल्क में 80 प्रतिशक की कमी करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि जब सड़कों पर निर्माण कार्य चल रहा है, जिन पर गड्ढे, मोड़ और रुकावटें हैं और जो उपयोग के योग्य नहीं हैं तो यात्रियों से पूरा टोल शुल्क वसूलना गलत है.

जब यात्रा असुविधाजनक है तो पूरा टोल लेना ना सिर्फ अनुचित है बल्कि यह एक निष्पक्ष सेवा का उल्लंघन है. टोल केवल तब लिया जाता है जब सड़कें अच्छी स्थिति में हों और उन पर यात्रियों को यात्रा करने में कोई कठिनाई न हो.

इस से पहले सुप्रीम कोर्ट भी एक्सप्रेसवे पर टोल चार्ज को ले कर टिप्पणी कर चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘अगर सड़कें खराब हैं तो इस पर सफर करने वाले टोल टैक्स भी क्यों दें? आम आदमी इस का खामियाजा क्यों भुगते? सरकार को इस की भरपाई करनी चाहिए.’ हालांकि सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का असर न तब हुआ और न अब हो रहा है, क्योंकि खस्ताहाल हाइवे के बावजूद आम जनता टोल टैक्स देने के लिए मजबूर है.

गौरतलब है कि टोल टैक्स एक तरह का अप्रत्यक्ष कर है, जो नैशनल और स्टेट हाइवे पर इसलिए लिया जाता है, ताकि सरकार अच्छी सड़कें मुहैया करा सके, लेकिन आएदिन ऐसे समाचार हमें पढ़ने को मिलते हैं कि हाइवे जर्जर हैं, फिर भी टोल टैक्स की वसूली निरंतर जारी है. टोल टैक्स के मकडज़ाल से आम आदमी निकल भी पाएगा या नहीं, इस की कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि टोल टैक्स घटने के बजाय सालदरसाल बढ़ता जा रहा है. दूसरा, टोल टैक्स प्लाजा की अव्यवस्थाओं से वाहन चालकों को रोजाना जूझना पड़ रहा है. फास्टैग में एडवांस पैसे देने के बावजूद अधिकांश वाहन चालक हाईवे पर चलते समय स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं.

एक छोटा सा उदाहरण राजस्थान के मनोहरपुर टोल प्लाजा का है. सितंबर 2024 में सूचना के अधिकार (आरटीआई) से पता चला था कि 1900 करोड़ में बने हाइवे के 8000 करोड़ रुपए टोल टैक्स के रूप में वसूले जा चुके हैं. अब आप ही बताइए 1900 करोड़ की सड़क के 8000 करोड़ किस हिसाब से वसूल लिए गए? शायद आम आदमी सरकार के इस गणित को समझ न पाए. देश में अभी करीब 980 टोल प्लाजा नेशनल हाईवे पर चल रहे हैं. महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में सब से अधिक नैशनल हाइवे हैं और राजस्थान तीसरे नंबर पर आता है, लेकिन टोल टैक्स वसूली में राजस्थान सब से ऊपर है.

सबसे अधिक 142 टोल टैक्स प्लाजा राजस्थान में चल रहे हैं. कमाल की बात यह है कि 457 टोल प्लाजा तो पिछले 5 साल में शुरू हुए हैं. इस में भी राजस्थान जैसा राज्य सब से ऊपर है. यहां पिछले 5 साल में 58 टोल प्लाजा शुरू हुए हैं. दरअसल, टोल टैक्स प्लाजा का मकसद सड़क निर्माण और रखरखाव से जुड़ा हुआ है. यदि हाईवे को बेहतर क्वालिटी में बनाए रखना है तो वाहन चालकों से टोल टैक्स वसूला जाता है, ताकि बेहतर और सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित की जा सके. इस में कोई हर्ज भी नहीं है, बशर्ते हाइवे उस क्वालिटी का हो. परंतु, स्थिति यह है कि हाइवे पर टोल टैक्स प्लाजा जैसेजैसे बढ़ रहे हैं, वैसेवैसे व्यवस्थाओं की पोल भी खुल रही है. जब वाहनों की संख्या टोल टैक्स प्लाजा पर बढ़ने लगी तो सरकार फास्टैग को लेकर आई, यानी टोल टैक्स प्लाजा पर गाड़ी बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सीधा निकल जाएगी, वाहन चालक के खाते से टोल टैक्स कट जाएगा, लेकिन फास्टैग भी पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो रहा है.

टोल टैक्स प्लाजा से गुजरना वाहन चालकों के लिए किसी पीड़ा से कम नहीं है. अधिकांश टोल टैक्स प्लाजा पर आधी लेन अकसर बंद रहती हैं. फास्टैग के बावजूद टोल कर्मी वाहन को आगेपीछे कराता है और बटन दबा कर वाहन को पास कराता है. यदि किसी वाहन का फास्टैग सही से काम नहीं कर रहा तो पीछेखड़े वाहन चालक परेशान होते हैं. इस व्यवस्था को दुरुस्त नहीं किया जा रहा है. अब सरकार के नए फास्टैग नियमों के तहत कम बैलेंस, देरी से भुगतान या ब्लैक लिस्टेड टैग वाले यूजर पर अतिरिक्त जुर्माना लग रहा है. यदि वाहन टोल पार करने से पहले 60 मिनट से अधिक समय तक फास्टैग निष्क्रिय रहता है और वाहन के टोल पार करने के 10 मिनट बाद तक निष्क्रिय रहता है तो लेनदेन अस्वीकार कर दिया जाएगा. सिस्टम ऐसे भुगतानों को अस्वीकार कर देगा. नए दिशा-निर्देशों के अनुसार यदि वाहन के टोल रीडर से गुजरने के समय से 15 मिनट से अधिक समय के बाद टोल लेन-देन अपडेट होता है तो फास्टैग यूजर को अतिरिक्त शुल्क देना पड़ सकता है, यानी सारा भार टैक्स पेयर पर है. वैसे, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के नियम के मुताबिक अगर कोई गाड़ी 10 सेकंड से अधिक तक टोल टैक्स की कतार में फंसी रहती है तो उसे टोल टैक्स का भुगतान किए बिना जाने दिया जाना चाहिए, लेकिन ऐसे कितने उदाहरण हैं कि जब ऐसे नियम के तहत किसी गाड़ी से टोल टैक्स न वसूला गया हो?

पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि अब फास्टैग से आगे बढ़ कर सरकार ग्लोबल नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम तकनीक से टोल टैक्स वसूली का प्लान बना रही है. इस सिस्टम की मदद से टोल रोड पर वाहनों की आवाजाही को ट्रैक किया जाता है और हाईवे पर यात्रा की दूरी के आधार पर टोल टैक्स कट जाता है, लेकिन यह सिस्टम पूर्ण रूप से कब लागू होगा, इस से जनता को क्या वाकई राहत मिलेगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है. सरकार ने पिछले कुछ सालों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी भरकम निवेश किया है. नएनए हाईवे बनाए जा रहे हैं. एक्सप्रेसवे बनाए जा रहे हैं. देश की प्रगति के लिए यह एक सुखद चीज है, लेकिन टोल टैक्स के बहाने जनता की जेब से जरूरत से ज्यादा पैसा निकालना कहां तक उचित है?

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