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Hindi Story : प्रेम की सूरत – क्या वह अपनी खूबसूरती के जाल में खुद फंस गई ?

Hindi Story : उस का कद लंबा था. अभिनेत्रियों जैसे नयन और रंग जैसे दूध और गुलाब का मिश्रण. वह लोगों की अपने इर्दगिर्द घूमती नजरों की परवा किए बिना बाजार में शौपिंग कर रही थी. उस के दोनों हाथ बैगों से भरे थे.

पिछले आधे घंटे में उस के पापा का 4 बार फोन आ चुका था और हर बार वह बस इतना बोलती, ‘‘पापा, बस 10 मिनट और.’’

आखिरकार वह बाजार की गली से बाहर मेन रोड पर खड़ी गाड़ी के पास पहुंची और सामान गाड़ी की डिकी में रखने लगी.

मौल से शौपिंग करने के बाद प्रीति थक गई थी. लंबी, पतली प्रीति देखने में बेहद खूबसूरत थी. उस का गोरा रंग उसे और मोहक बना देता था. उस के लंबे बाल बड़े सलीके से उस के मुंह पर गिर रहे थे.

उसी वक्त एक मोटरसाइकिल उस के करीब आ कर रुकी.

बाइकसवार ने जैसे ही हैल्मैट उतारा, वह चिल्लाई, ‘‘अब क्या लेने आए हो? अब तो मैं शौपिंग कर भी चुकी. 2 घंटे पहले फोन किया था. मैं कपड़े तुम्हारी पसंद के लेना चाहती थी मगर सब सत्यानाश कर दिया.’’

‘‘आ ही तो रहा था, मगर जैसे ही औफिस से निकला, बौस गेट पर आ धमका. उस को पता चल जाता तो डिसमिस कर देता. छिप कर आना पड़ता है, और रही बात पसंद की, वह तो हम दोनों की एकजैसी ही है.’’

‘‘राहुल, कब तक बहकाते रहोगे? प्रेम की बड़ीबड़ी बातें करते हो और जब भी तुम्हारी जरूरत पड़ी, बेवक्त ही मिले,’’ वह आगे बोली, ‘‘सरप्राइज भी तो देना था तुम्हें.’’

‘‘कैसा सरप्राइज?’’

‘‘मुझे देखने लड़के वाले आ रहे हैं?’’

सुनते ही राहुल के चेहरे का रंग जैसे उड़ गया. उस ने हाथ में थामा हैल्मैट बाइक के ऊपर रखा और प्रीति के पास जा कर उस का हाथ थाम कर बोला, ‘‘प्रीति, मजाक की भी हद होती है. लेट क्या हो गया, तुम तो जान लेने पर ही आ गईं.’’

‘‘क्या करूं, तुम्हारे बिना किसी काम में दिल जो नहीं लगता? जाने कितने लड़कों में नुक्स निकाल कर अभी तक तुम्हारे इंतजार में बैठी हूं. मगर कब तक?’’

‘‘बस, एक साल और, बहन की शादी हो जाए, फिर ले जाऊंगा तुम को दुलहन बना कर.’’

प्रीति ने गहरी सांस ली. उस ने धीरे से राहुल की पकड़ से अपना हाथ आजाद किया और गाड़ी में बैठ कर चल दी. जिस गति पर गाड़ी दौड़ रही थी उसी गति से पुरानी यादें प्रीति के दिमाग में आजा रही थीं.

राहुल 4 साल पहले अचानक से उस के जीवन में आया था तब, जब उस ने कालेज में दाखिला लिया था. कालेज की रैगिंग प्रथा से उस की जान बचाने वाला राहुल ही था. राहुल की इस दरियादिली ने प्रीति के दिल में राहुल के लिए एक अलग जगह बना दी थी. वे दोनों अकसर एकसाथ रहने लगे. कालेज कैंटीन तो ऐसी जगह थी जहां खाली समय में दोनों रोज घंटों बातें करते रहते. महीनों तक उन में से किसी ने उस प्रेम का इजहार न किया जो पता नहीं कब दोस्ती से प्रेम में बदल गया था. राहुल कुछ था भी ऐसा कि उस की दिलकश अंदाज में की गईं बातें सब को उस का दीवाना बना देती थीं. प्रीति तो उसे पहले दिन ही अपना दिल दे बैठी थी.

एक दिन दोनों कैंटीन में साथ बैठे बातें कर रहे थे कि राहुल ने कहा, ‘‘2 महीने बाद परीक्षा हो जाएगी और मैं चला जाऊंगा.’’

‘‘कहां?’’ प्रीति खोई सी बोली.

‘‘घर और कहां? आखिरी साल है मेरा. परीक्षा के बाद तो जाना ही होगा.’’

‘‘मेरा क्या होगा?’’ पहली बार प्रीति ने राहुल का हाथ थाम कर पूछा. राहुल ने भी दोनों हाथों से उस का हाथ थाम लिया.

प्रीति की नजर झुक गई थी. उस ने अप्रत्यक्ष रूप से प्रेम का इजहार जो कर दिया था. फिर परीक्षा हो गई और साथ जीनेमरने का वादा कर राहुल ने कालेज छोड़ दिया. अब जब भी दोनों को समय मिलता, किसी पार्क या होटल में मिल लेते.

कभीकभी राहुल काम से छुट्टी ले कर उसे सिनेमा दिखाने ले जाता. कालेज आने और जाने तक तो दोनों साथ ही रहते. जिंदगी बड़ी हंसीखुशी गुजर रही थी. इस बीच, एक दिन उस के पापा ने खबर दी कि उस के लिए एक रिश्ता आया है. लड़का सरकारी डाक्टर था. लेकिन प्रीति ने लड़के को बिना देखे ही रिजैक्ट कर दिया था. उस के बाद तो यह सिलसिला चल पड़ा.

हर महीने रिश्ते वाले आते और प्रीति कोई न कोई बहाना बना कर मना कर देती.

एक दिन पापा ने मम्मी से कह कर पुछवाया कि वह किसी लड़के को पसंद करती हो, तो बता दे. लेकिन, प्रीति ने राहुल का जिक्र नहीं किया क्योंकि वह एक प्राइवेट कंपनी में छोटा सा मुलाजिम जो था.

प्रीति खयालों में इस कदर खोई थी कि उसे पता ही न चला कि कब गाड़ी गलत रास्ते पर चली गई. उस ने आसपास गौर से देखा, बहुत दूर निकल आई थी. खुलाखुला सा रोड संकरी गली में कब तबदील हो गया, उसे तो आभास ही न हुआ. किसी से रास्ता पूछने की गरज में उस ने इधरउधर नजर दौड़ाई तो कुछ फासले पर 2 लड़के सिगरेट फूंकते दिखे. उस ने गाड़ी वहीं रोक दी और पैदल उन के पास पहुंची. दिन था इसलिए उसे जरा भी भय महसूस न हुआ, मगर अपनी ओर आते उन लड़कों के बदलते हावभाव देख कर गलती का एहसास हुआ.

‘‘मोहननगर जाना था, रास्ता भटक गई हूं. प्लीज हैल्प,’’ प्रीति ने विनयपूर्ण लहजे में कहा.

प्रीति उन लड़कों की आंखों में बिल्ली के जैसे भाव देख कर सिहर उठी. दोपहर का वक्त था और कालोनी की सड़कें सुनसान पड़ी थीं. तसल्ली यह कि दिन ही तो है.

एक लड़का सिगरेट फेंक कर आगे बढ़ा और अपने शिकार पर झपट पड़ने जैसे भाव छिपाता सहानुभूतिपूर्ण लहजे में बोला, ‘‘आगे से राइट टर्न ले कर फिर लैफ्ट ले कर मेन रोड आ जाएगा, वहां से सीधे मोहननगर चली जाओगी.’’ उन लड़कों का आभार जता कर प्रीति गाड़ी में बैठ कर बताई दिशा में चल दी.

वह सोच रही थी कि कितने सज्जन थे वे लड़के और वह खामखां डर रही थी. आगे मोड़ घूमते ही सड़क इतनी तंग हो गई कि बराबर में साइकिल तक की जगह न थी. शुक्र था कि आवाजाही नहीं थी. पता नहीं कालोनी में कोई रहता भी था या नहीं.

फिर सामने वह मोड़ दिखा जिस के बाद मेन रोड आ जाना था. प्रीति ने राहत की सांस ली. फिर जैसे ही गाड़ी मोड़ पर दाएं मुड़ी, प्रीति का गला खुश्क हो गया और पैडल पर रखे पांव में कंपन होने लगा.

मोड़ घूमते ही सड़क 4 कदम आगे एक मकान के दरवाजे पर बंद थी.

उस ने पलभर कुछ सोच कर गाड़ी को रिवर्स करने के लिए पीछे गरदन घुमाई तो पीछे मोटरसाइकिल खड़ी दिखी. उस ने हौर्न बजाया, लेकिन कोई नहीं था. अचानक बगल से किसी ने दरवाजा खोल कर उस के मुंह पर हाथ रखा और अगले पल चेतना लुप्त हो गई.

आंख खुली तो उस ने खुद को अस्पताल के बैड पर पड़े पाया. उस का सारा शरीर ऐसे दुख रहा था जैसे उस के शरीर के ऊपर से कोई भारी वाहन गुजर गया हो.

धीरेधीरे चेतना लौटी तो उसे याद आने लगा कि वह किसी अनजान जगह किन्हीं अनजान बांहों के शिकंजे में फंस गई थी. आगे जो उस के साथ बीती उस की कल्पना मात्र से वह सिहर उठी.

तभी मां के हाथ का स्पर्श अपने माथे पर महसूस कर आंखें छलछला आईं.

‘‘मत रो, बेटी. जो हुआ वह एक दुर्घटना थी. हम चाहते हैं कि तू इस बात को भुला कर नई जिंदगी की शुरुआत करे,’’ कहतेकहते मां जोर से सिसकने लगी.

प्रीति अब होश में थी. जैसेजैसे उसे अपने साथ बीती घटना याद आती वैसेवैसे उस का दिल बैठता जाता. जीवन की सारी उम्मीदें, सारे सपने छोटी सी घटना की भेंट चढ़ गए थे. बस, बाकी बची थी तो एक शून्यता जिस के सहारे इतना बड़ा जीवन बिताना किसी तप से कम न था.

3 दिनों बाद अस्पताल से घर लौट आई. जो लोग उस के रिश्ते की बात करते थे, उसे देखने तक न आए. संकेत साफ था.

दिनभर प्रीति घर से बाहर न निकलती. अंधेरा घिर आता जब टैरेस पर खड़े हो कर बाहर की दुनिया को नजर भर कर देखती.

एक सुबह वह कमरे में लेटी थी. पापा और मम्मी बाहर बैठे वस्तुस्थिति पर विलाप करते गुमसुम बैठे थे. उस ने सुना, दरवाजे पर दस्तक हुई थी.

पिछले 10 दिनों में पहली बार था कि कोई उस घर में आया था.

पता नहीं किस ने दरवाजा खोला होगा. बाहर कोई वार्त्तालाप भी न हुआ, जिस से प्रीति अनुमान लगाती कि कौन आया था.

फिर कमरे में कोई दाखिल हुआ तो वह सिमट कर उठ बैठी. उस ने डरतेझिझकते सिर उठाया. राहुल उस के करीब खड़ा था हाथ में प्रीति की पसंद के फूल थामे. पीछे दरवाजे पर मम्मीपापा खामोश जड़वत खड़े थे.

राहुल ने फूल प्रीति के करीब बैड पर रख दिए और एक किनारे पर बैठ गया.

‘‘मैं काम के सिलसिले में शहर से बाहर था. कल ही लौटा हूं. काश कि मैं बाहर न गया होता? ऐसा हम अकसर सोचते हैं, हम सोचते हैं कि हम हर जगह रह कर किसी भी अनहोनी को होने से रोक देंगे. यह सोचना अपनेआप को दिलासा देने की कोशिश के सिवा कुछ नहीं. एक घटना जीवन की दशा और दिशा दोनों को बदल देती है लेकिन जिधर भी दिशा मिले, चलते जाना है, यही जीवन है. मैं काफी मुसीबतों के दौर से गुजरा हूं. अब कुछ कमा रहा हूं और इस मुकाम पर हूं कि जीवन को ले कर सपने बुन सकूं. मैं सपने बुनता हूं और उन सपनों में हमेशा तुम रही हो, प्रीति. मैं चाहता हूं कि वे सपने जस के तस रहें, जिन में हंसतीमुसकराती प्रीति हो. ऐसी मायूस और हारी हुई नहीं,’’ कहतेकहते राहुल भावुक हो गया. उस ने प्रीति का हाथ थाम लिया.

एक पल के लिए प्रीति को कुछ समझ न आया कि क्या प्रतिक्रिया दे. लेकिन राहुल के बेइंतहा प्रेम को देख कर उस की आंखें भर आईं. वह राहुल से लिपट कर रो पड़ी. दिल में दबी उम्मीदों के ऊपर पड़ी पश्चात्ताप की बर्फ आंसुओं के रूप में बह रही थी.

लेखक – धीरज राणा भायला

Hindi Kahani : यह जीवन है – लतिका को अम्मा बाबूजी का आना क्यों पसंद नहीं था?

Hindi Kahani : “आज औफिस में फोन आया था बाबूजी का. अगले सोमवार को वे और अम्मां आ रहे हैं,” पति हिमांशु से यह सूचना पा कर लतिका खुश नहीं हुई.

आंखें तरेर कर उस ने पति को देखा. फिर भौं सिकोड़ कर बोली, ‘‘तुम ने क्या कहा?’’

‘‘मैं…मैं क्या कहता भला. भई, वे आ रहे हैं, तो आ रहे हैं. मेरे कुछ कहने का सवाल ही कहां उठता है?’’

‘‘पर हम ने तो उन्हें बुलाया नहीं.’’

‘‘कमाल की बात करती हो तुम भी, लतिका. भला मांबाप को अपने बेटबहू के पास उन के बुलावे पर ही आना चाहिए. अरे, घर है उन का, जब जी चाहे आएं.’’

‘‘और लड़कियों की परीक्षा का क्या होगा, जो सिर पर है. तुम ने यह क्यों नहीं कहा कि अगले हफ्ते से बेटियों के एग्जाम हैं.’’

‘‘मैं नहीं कह सकता. तुम चाहो, तो कह दो,’’ तौलिया उठा कर बाथरूम में घुसता हुआ हिमांशु बोला.

‘‘हांहां, क्यों नहीं. हर बुरी बात कहने मैं जाऊं और बुरी बनी रहूं. तुम अच्छे बने रहना. अरे, मैं उन्हें वैसे ही कहां पसंद हूं.’’

पर तब तक पत्नी के शोर से बचने के लिए हिमांशु बाथरूम का शौवर चालू कर चुका था.

बीच के 3 दिन बेहद किचकिच में बीते. हिमांशु के सामने उठतेबैठते लतिका का यही रोना रहता कि अम्मांबाबूजी आ रहे हैं, पर रहेंगे कहां. 2 कमरे वाले फ्लैट में उन का बिस्तर लगेगा कहां. फिर सवेरे से अम्मां अपना भजन चालू कर देंगी, ‘हुआ सवेरा, चिडिय़ां जागीं, तुम भी अब जग जाओ.’ भला ऐसे में बच्चियां अपनी पढ़ाई कर पाएंगी, वह भी इंजीनियरिंग के कंपीटिशन की. हिमांशु का कहना था कि वे हमारे घर सालों बाद आ रहे हैं. पूरा घर है. ड्राइंगरूम है, उसी में रात में एक चारपाई डाल दी जाएगी. एक तख्त पड़ा ही है वहां. हम दोनों वहां सो जाएंगे. अम्मांबाबूजी बेडरूम में सो जाएंगे.

हिमांशु के पिता कैलाशनाथ को रिटायर हुए 10 साल हो गए थे. उस के बाद वे अपने शहर सीतापुर के मकान में चले गए थे. थोड़ी सी खेती थी. पहले तो बटिया यानी हिस्से में दे रखी थी पर अब खुद देखते हैं. उन के 2 बेटे हैं. एक दिल्ली में हिमांशु, दूसरा चेन्नई में सुयश. हिमांशु के पास दिल्ली आने की उन की इच्छा बहुत दिनों से थी. सिर्फ एक बार चेन्नई गए थे. रेल का लंबा सफर मुश्किल हो गया था, इसलिए फिर दोबारा नहीं गए. दिल्ली तो फिर भी पास था. सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे, इसलिए पैंशन मिल जाती थी.

लतिका के साथ रहने का मौका उन को कम ही मिला था. शादी के बाद ही वह हिमांशु के पास दिल्ली आ गई थी. दोनों बेटियां भी दिल्ली में हुईं. तब कैलाशनाथ नौकरी में थे. बेटियों के होने पर हिमांशु की मां शांति देवी कुछ दिनों के लिए बहू के पास आ गई थीं पर लतिका की गृहस्थी में वे ज्यादा रचबस न पाईं. लतिका ने अपनी मां को भी बुला लिया था. हर बात में उन्हीं का दखल रहता. मायूस हो कर शांति देवी पति के पास लौट आई थीं. उस के बाद किसी त्योहार पर ही वे लोग मिलते थे. शांति देवी भी नापतौल कर बहू से बोलतीं. उन्हीं के आने के समाचार से लतिका बेचैन हो उठी थी.

सोमवार को हिमांशु स्टेशन जा कर अम्मांबाबूजी को लिवा लाएगा. उस की दोनों बेटियां किम और केतकी अलग मुंह बनाए घूम रही थीं. मां से उन्हें पता चल गया था कि गांव से बाबादादी आ रहे हैं. कितना नुकसान होगा पढ़ाई का. वे यही राग अलापती रहतीं. हिमांशु तंग आ चुका था, इन की बकबक से.

ऊब कर उस ने कह दिया, ‘क्या जिन के घरों में बच्चों के बाबादादी रहते हैं, वे बच्चे जाहिल रहते हैं. अगर हम सब एक घर में एक ही साथ रह रहे होते तो क्या करतीं तुम लोग. अच्छा तमाशा खड़ा कर दिया है. मेरे मातापिता आ रहे हैं. वे तुम सब के भी कुछ लगते हैं. जैसी मां वैसी बेटियां.’

 

हिमांशु का इतना कहना काफी था. लतिका मुंह सुजा बैठी. जिस दिन कैलाशनाथ और शांति देवी आए, उस दिन भी उस का मुंह सूजा ही रहा. हां, उन के पैर छू कर वह चायनाश्ता जरूर रख गई, पास बैठी भी रही. शांति देवी ने दोनों बेटियों को बुला कर प्यार किया. उन से उन की पढ़ाई के बारे में बातें कीं. वे उन दोनों के लिए सूट का कपड़ा लाई थीं. कैलाशनाथ 2 बड़ी चौकलेट लाए थे. तोहफा पा कर तो बच्चियां खुश हो गईं.

दादी के गले में बाहें डाल कर वे झूल गईं तो लतिका ने उन्हें घूर कर देखा. मां के तेवर देख कर लड़कियां पढऩे का बहाना कर वहां से खिसक लीं. खाना भी लतिका ने अच्छा बनाया था. सास को खीर पंसद थी, सो उस ने खीर भी बनाई थी. सोने की बात चली तो कैलाशनाथ और शांति देवी ने बेडरूम में सोने से मना कर दिया. कहने लगे, यहीं बैठक में सो जाएंगे.

दूसरे दिन 4 बजे ही खटपट सुन कर लतिका की नींद खुल गई. साथ वाले बाथरूम से आवाजें आ रही थीं. जरूर अम्मांबाबूजी उठ गए होंगे. लतिका मुंह ढंक कर फिर सो गई. सुबह जब वह बाथरूम में गई तो देख कर दंग रह गई. पूरा बाथरूम साफसुथरा, चमक रहा था. कोनाकोना साफ हो गया था. वैसे तो बाई रोज ही बाथरूम साफ करती थी पर इस तरह से तो कभी साफ नहीं हुआ था. बाहर निकली तो देखा बाबूजी सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे हैं और अम्मां माला फेर रही हैं. मन ही मन वे कुछ बुदबुदा रही थीं.

लतिका को देख कर वे मुसकराईं, ‘‘बहू, हम दोनों ने चाय पी ली है. अब तुम हमारे लिए न बनाना.’’

2 दिन में ही लतिका ने महसूस कर लिया कि वह जिस चीज से घबरा रही थी, वैसा कुछ भी नहीं है. सास काफी मदद कर देती हैं. सुबह की सब्जी काटना, दूध वाले से दूध लेना, शाम की सब्जी काटना, दूध वाले से दूध लेना. शाम की सब्जी लाना बाबूजी ने अपने जिम्मे ले लिया था. यही नहीं, सामान लाने का पैसा भी न लेते थे वे. शाम को मांबाबूजी दोनों ही सामने वाले पार्क में चले जाते. लड़कियां भी दादाजी के पास बैठ कर खूब बातें करतीं. हिमांशु खुश था कि परिवार में शांति कायम है.

रात को सोते समय हिमांशु ने लतिका को छेड़ दिया, ‘‘अम्मांबाबूजी को आए काफी दिन हो गए.’’

‘‘तो क्या हुआ,’’ लतिका फौरन बोल पड़ी, ‘‘अच्छा, यह बताओ, बाबूजी अपने मकान का क्या करेंगे, उस में दोनों भाइयों का हिस्सा लगेगा या सिर्फ तुम्हारा?’’

‘‘जाऊं पूछने?’’

लतिका चिढ़ गई, ‘‘तुम तो हर वक्त गुस्से में रहते हो. किसी भी बात का सीधा जवाब नहीं देते.’’

‘‘तुम बात ही ऐसी करती हो. अरे, बाबूजी का पुश्तैनी मकान है. काफी हिस्सा तो बाबूजी ने अपने पैसे से बनवाया है. वे जो चाहे उस का करें.’’

‘‘वाह, भूल गए क्या. जब किम के इंजीनियरिंग दाखिले के लिए हम ने एक लाख रुपया मांगा था, उन्होंने मना कर दिया था. पैसे होते तो आज किम का इंजीनियरिंग का दूसरा साल होता. एक साल ड्रौप करने की वजह से दोनों बहनें एकसाथ इंजीनियरिंग में बैठ रही हैं,’’ लतिका रोंआसी हो उठी.

‘‘वह प्राइवेट कालेज था, लतिका. केतकी इस बार पहली बार कंपीटिशन दे रही है और किम दूसरी बार. अब तुम देखना जब ये बेटियां अपनी मेहनत से सेलैक्ट होंगी तो इन की खुशी का मजा ही कुछ और होगा. फिर इतना पैसा एकसाथ बाबूजी देते कहां से?’’

‘‘मकान बेच कर. बच्चों के लिए इतना तो कर ही सकते थे?’

बहस करना फुजूल समझ हिमांशु करवट बदल कर सो गया.

एक दिन हिमांशु दफ्तर से लौटा तो उस का चेहरा उतरा हुआ था. पता चला उस ने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया है. दिया क्या, दिलवाया गया है. घर का वातावरण बोझिल हो गया. लतिका तो सिर पकड़ कर बैठ गई. 20-25 हजार रुपए प्रति महीने कमाने वाले परिवार में कई चीजों की किस्तें भरी जा रही थीं. कार और फ्लैट की किस्तें तो अभी काफी देनी थीं. लतिका अपनी सास के पास पहुंच कर रोने लगी. कैलाशनाथ भी परेशान हो गए.

दूसरे दिन तो एक अजीब ही बात हो गई. कहां तो अम्मांबाबूजी अभी होली तक रुकने वाले थे, कहां अचानक ही सुबहसुबह वे चले गए. हिमांशु परेशान सा सिर हाथों में दिए बैठा रहा. कंपनी ने अभी हरजाना भी नहीं दिया था. तब तक कैसे चलेगा सबकुछ.

‘‘लो, चले गए न तुम्हारे मातापिता तुम्हें मुसीबत में छोड़ कर. इसी का दम भरते थे?’’ लतिका को मौका मिल गया था बोलने का.

हिमांशु खुद नहीं समझ पा रहा था अम्मांबाबूजी ने ऐसा क्यों किया. उस की मुसीबत में बजाय उस का हौसला बढ़ाने के वे खुद चले गए. बस, चलतेचलते यही कहा कि गांव जा रहे हैं. लतिका ने कहा भी, घर फोन कर के पता करो पर हिमांशु ने मना कर दिया. अब कैसे भी हो, परेशानी खुद उठाएंगे. अम्मांबाबूजी भी तो सबकुछ जानते हैं. वह उन से कुछ कहने नहीं जाएगा. पूरे घर में कई रोज मातम सा छाया रहा. एक हफ्ता बीत गया, न अम्मांबाबूजी लौटे न उन का कोई फोन आया.

अचानक एक रोज सुबहसुबह अम्मांबाबूजी लौट आए. लतिका हैरानी से उन्हें मुंह बनाए देखती रही. हिमांशु भी गुस्से में भरा उठ कर बाहर आ गया. वह कुछ सुनाने जा ही रहा था कि अम्मां ने एक बैग ला कर उस के हाथ पर रख दिया.

‘‘यह क्या है?’’ उस ने नजरें ऊपर उठा कर पूछा.

‘‘रुपए, तुम्हारे प्लैट की किस्तों के बाकी रुपए,’’ बाबूजी बोले.

‘‘पर बाबूजी, यह सब आप कैसे लाए?’’

‘‘घर बेच कर.’’

‘‘घर बेच कर,’’ हिमाशं आवेश में उठ कर खड़ा हो गया, ‘‘पर वह तो पुश्तैनी मकान था. आप ने उसे बेचने से मना किया था?’’

‘‘उस समय की जरूरत और आज की जरूरत में जमीनआसमान का फर्क है, बेटा. उस समय तुम यह मकान बेच कर बेटी का एडमिशन इंजीनियरिंग कालेज में करवाना चाहते थे. आज अगर मैं मकान न बेचता तो तुम्हारा फ्लैट हाथ से चला जाता.’’

‘‘बाबूजी,’’ हिमांशु की आंखें भर आईं.

‘‘हां, बेटा. हम तुम्हें छोड़ कर कहीं चले नहीं गए थे. पैसे के इंतजाम के लिए ही गए थे. मकान तुम्हारी मां के नाम था, सो उन का भी जाना जरूरी था. बेटेबेटियों का एडमिशन उन की योग्यता पर होने दो. योग्यता के बल पर पाई गई चीज का आनंद ही कुछ और होता है.’’

हिमांशु ने लतिका की तरफ देखा जिस की आंखों में खुशी और पछतावे के आंसू थे.

‘‘एक बात याद रखो, बेटा. आज प्राइवेट नौकरियों का कोई भरोसा नहीं है. ये आज अच्छी हैं, लालच देती हैं, ढेर सारा पैसा देती हैं. पर कल जब इन्हें कोई तुम से लायक मिल जाता है तो तुम्हें मक्खी सा निकाल फेंक देती हैं. अपना खर्च, अपनी हैसियत के मुताबिक करना सीखो. एक पुराना नियम है, कर्ज लेना हो तो सिर्फ 2 मौकों पर लो. एक, बच्चे की पढ़ाई के लिए; दूसरा, बेटी की शादी के लिए. ये हमारे जमाने की बातें हैं. शायद आज के समय में खरी न उतरें.

‘‘मैं तुम्हें नसीहत नहीं दे रहा हूं. तुम्हारे सामने 2 बेटियां हैं. पहले उन की पढ़ाई और शादी के लिए पैसे इकट्ठे करो. घर की विलासिता की चीजें तो बहुत छोटी आवश्यकता होती हैं.’’

दोपहर तक कैलाशनाथ और शांति देवी ने अपना सामान बांध लिया.

लतिका हैरानपरेशान हो कर पूछ बैठी, ‘‘अम्मां, आप कहां जा रही हैं. अब हम सब साथ ही रहेंगे.’’

‘‘नहीं, बहू,’’ अम्मां मधुर स्वर में बोलीं, ‘‘हमारा दूरदूर रहना ही अच्छा है. तुम ने और मैं ने एक लंबा समय अलगअलग बिताया है. मैं ने तुम्हारी सहायता की है तो इस का मतलब यह नहीं कि मैं तुम्हारे साथ तुम्हारी गृहस्थी में रहूं. हम कभी मिलेंगे तो ज्यादा प्यार और अपनापन बना रहेगा. हिमांशु का हौसला बढ़ाती रहना. उसे जल्दी ही नौकरी मिल जाएगी. इतनी सारी डिग्रियां हैं उस के पास. जीवन में उतारचढ़ाव तो आते ही रहते हैं. उन से हिम्मत नहीं हारते. यही तो जीवन है, बहू.’’

‘‘पर, मांजी…’’

‘‘देखो, बेटी,’’ अब की कैलाशनाथ बोल पड़े, ‘‘मन छोटा हो तो बड़े से बड़ा घर भी आदमी को छोटा लगने लगता है. एक अरसे से हम अलगअलग रह रहे हैं. अब एकदूसरे के साथ रह कर एडजस्ट करने में दोनों को परेशानी होगी. खैर, छोड़ो न बातों को. तुम, हिमांशु और बच्चियां खुश रहो, यही कामना है.’’

‘‘पर आप रहेंगे कहां?’’

‘‘वहीं, जहां रहते थे. भई, मकान वह नहीं रहा पर गांव तो अपना ही है अभी. सरकारी मुलाजिम रहा हूं. पैंशन पाता हूं और इतनी पाता हूं कि किराए का मकान ले कर रह सकूं, समझीं.’’

हिमांशु और लतिका निरुत्तर खड़े रह गए.

Romantic Story : पांचवां मौसम – क्या वो अपने पहले प्यार का साथ पा सकी

Romantic Story : ‘‘आज नीरा बेटी ने पूरे डिवीजन में फर्स्ट आ कर अपने स्कूल का ही नहीं, गांव का नाम भी रोशन किया है,’’ मुखिया सत्यम चौधरी चौरसिया, मिडिल स्कूल के ग्राउंड में भाषण दे रहे थे. स्टेज पर मुखियाजी के साथ स्कूल के सभी टीचर, गांव के कुछ खास लोग और कुछ स्टूडेंट भी थे.

आज पहली बार चौरसिया मिडिल स्कूल से कोई लड़की फर्स्ट आई थी जिस कारण यहां के लड़केलड़कियों में खास उत्साह था.

मुखियाजी आगे बोले, ‘‘आजतक हमारे गांव की कोई भी लड़की हाईस्कूल तक नहीं पहुंची है. लेकिन इस बार सूरज सिंह की बेटी नीरा, इस रिकार्ड को तोड़ कर आगे पढ़ाई करेगी.’’ इस बार भी तालियों की जोरदार गड़गड़ाहट उभरी.

लेकिन यह खुशी हमारे स्कूल के एक लड़के को नहीं भा रही थी. वह था निर्मोही. निर्मोही मेरा चचेरा भाई था. वह स्वभाव से जिद्दी और पढ़ने में औसत था. उसे नीरा का टौप करना चुभ गया था. हालांकि वह उस का दीवाना था. निर्मोही के दिल में जलन थी कि कहीं नीरा हाईस्कूल की हीरोइन बन कर उसे भुला न दे.

आज गांव में हर जगह सूरज बाबू की बेटी नीरा की ही चर्चा चल रही थी. उस ने किसी फिल्म की हीरोइन की तरह किशोरों के दिल पर कब्जा कर लिया था. आज हरेक मां अपनी बेटी को नीरा जैसी बनने के लिए उत्साहित कर रही थी. अगर कहा जाए कि नीरा सब लड़कियों की आदर्श बन चुकी थी, तो शायद गलत न होगा.

वक्त धीरेधीरे मौसम को अपने रंगों में रंगने लगा. चारों तरफ का वातावरण इतना गरम था कि लोग पसीने से तरबतर हो रहे थे. तभी छुट्टी की घंटी बजी. सभी लड़के दौड़तेभागते बाहर आने लगे. कुछ देर बाद लड़कियों की टोली निकली, उस के ठीक बीचोंबीच स्कूल की हीरोइन नीरा बल खा कर चल रही थी. वह ऐसी लग रही थी, जैसे तारों में चांद. नीरा जैसे ही स्कूल से बाहर निकली, निराला चौधरी को देख कर खिल उठी.

नीरा, निराला के पास पहुंची और बोली, ‘‘बिकू भैया, आप यहां?’’

बिकू निराला का उपनाम था. निराला बोला, ‘‘मैं मोटर- साइकिल से घर जा रहा था. सोचा, तुझे भी लेता चलूं.’’

फिर दोनों बाइक पर एकदूसरे से चिपट कर बैठ गए. बाइक दौड़ने लगी. सभी लड़केलड़कियां नीरा के इस स्टाइल पर कमेंट करते हुए अपनेअपने रास्ते हो लिए. मैं और निर्मोही भाई वहीं खड़ेखड़े नीरा की इस बेहयाई को देखते रहे.

नीरा आंखों से ओझल हो गई तो मैं निर्मोही भाई के कंधे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘क्या देखते हो भैया, भाभी अपने भाई के साथ कूच कर गई.’’

इस पर निर्मोही भाई गुस्से में बोला, ‘‘बिकूवा उस का भैया नहीं, सैंया है.’’

मैं ने उन को पुचकारा, ‘‘रिलैक्स भैया, देर हो रही है. अब हम लोगों को भी चलना चाहिए.’’

फिर हम दोनों अपनीअपनी साइकिल पर सवार हो कर चल दिए. रास्ते में निर्मोही भाई ने बताया कि बिकूवा अपने ही गांव का रहने वाला है. शहर में उस का अपना घर है, जिस में वह स्टूडियो और टेलीफोन बूथ खोले हुए है. वह धनी बाप का बेटा है. उस के बाप के पास 1 टै्रक्टर और 2 मोटरसाइकिल हैं. बिकूवा अपने बाप का पैसा खूबसूरत लड़कियों को पटाने में पानी की तरह बहाता है.

वक्त के साथसाथ निराला और नीरा का प्यार भी रंग बदलने लगा. कुछ पता ही नहीं चला कि निराला और नीरा कब भाईबहन से दोस्त और दोस्त से प्रेमीप्रेमिका बन गए. इस के बाद दोनों एकदूसरे को पतिपत्नी के रूप में देखने का वादा करने लगे.

धीरेधीरे इन दोनों के प्यार की चर्चा गरम होने लगी. निर्मोही भाई भी इस बात को पूरी तरह फैला रहे थे. कब नीरा हाईस्कूल गई, कब उस पर निराला का जादू चला और कब उस की लवस्टोरी स्कूल से बाजार और बाजार से गांव के घरों तक पहुंची, कुछ पता ही नहीं चला. अब गांव की लड़कियां, जिन के दिल में कभी उस के लिए स्नेह हुआ करता था, अब वही उसे देख कर ताना कसने लगीं कि मिसेज निराला चौधरी आ रही हैं.

कोई कहता कि आज नीरा बिकूवा के स्टूडियो में फोटो खिंचवाने गई थी. कोई कहता, आज वह बिकूवा के साथ रेस्टोरेंट जा रही थी. आज वह बिकूवा के साथ यहां जा रही थी, आज वहां जा रही थी. ऐसी ही अनापशनाप बातें उस के बारे में सुनने को मिलतीं. लेकिन बात इतनी बढ़ जाने के बाद भी उस के घरवालों को जैसे कुछ पता ही नहीं था या फिर उन लोगों को नीरा पर विश्वास था कि नीरा जो कुछ भी करेगी उस से उस के परिवार का नाम रोशन ही होगा.

एक दिन जब निर्मोही भाई से बरदाश्त नहीं हुआ तो जा कर नीरा के मातापिता को उस की लवस्टोरी सुनाने लगे, वे लोग उस पर बरस पड़े. वहां का माहौल मरनेमारने वाला हो गया. लेकिन निर्मोही भाई भी तो हीरो थे. उन में हार मानने वाली कोई बात ही नहीं थी.

गांव में जातिवाद का बोलबाला होने से स्कूल का माहौल भी गरम होता जा रहा था. स्कूल के छात्र 2 गुटों में बंट चुके थे. एक गुट के मुखिया निर्मोही भाई थे तो दूसरे के ब्रजेश. लेकिन उस गुट का असली नेता निराला था. दोनों गुटों में रोजाना कुछ न कुछ झड़प होती ही रहती.

उन्हीं दिनों 2 और नई छात्राएं मीनू, मौसम और एक नए छात्र शशिभूषण ने भी क्लास में दाखिला लिया.

जब मैडम ने हम लोगों से उन का परिचय करवाया तो उन दोनों कमसिन बालाओं को देख कर मेरी नीयत में भी खोट आने लगा. मुझे भी एक गर्लफ्रैंड की कमी खलने लगी. खलती भी क्यों नहीं. वे दोनों लाजवाब और बेमिसाल थीं. लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस ने मेरे दिल में आग लगाई है उस का दिल मुझ से भी ज्यादा जल रहा है. मैं मौसम की बात कर रहा हूं. वह अकसर कोई न कोई बहाना बना कर मुझ से कुछ न कुछ पूछ ही लेती. कुछ कह भी देती. उधर मीनू तो निर्मोही भाई की दीवानी बन चुकी थी. पर मीनू का दीवाना शशिभूषण था.

अब एक नजर फिर देखिए, शशिभूषण दीवाना था मीनू का. मीनू दीवानी थी, निर्मोही की. निर्मोही नीरा के पीछे दौड़ता था. नीरा निराला के संग बेहाल थी, इन पांचों की प्रेमलीला देख कर मुझे क्या, आप को भी ताज्जुब होगा. मगर मेरे और मौसम के प्यार में ठहराव था. हम दोनों की एकदूसरे के प्रति अटूट प्रेम की भावना थी. तब ही तो चंद दिनों में ही मैं मौसम का प्यार पा कर इतना बदल गया कि मेरे घरवालों को भी ताज्जुब होने लगा. मैं और मौसम अकसर टाइम से आधा घंटा पहले स्कूल पहुंच जाते और फिर क्लास में बैठ कर ढेर सारी बातें किया करते.

उधर नीरा को मीनू और मौसम से बेहद जलन होने लगी क्योंकि ये दोनों लड़कियां नीरा को हर क्षेत्र में मात दे सकती थीं और दे भी रही थीं. वैसे तो पहले से ही स्कूल में नीरा की छवि धुंधली होने लगी थी लेकिन मीनू और मौसम के आने से नीरा की हालत और भी खराब हो गई. पढ़ाई के क्षेत्र में जो नीरा कभी अपनी सब से अलग पहचान रखती थी, आज वही निराला के साथ पहचान बढ़ा कर अपनी पहचान पूरी तरह भुला चुकी थी. जिन टीचर्स व स्टूडेंट्स का दिल कभी नीरा के लिए प्रेम से लबालब हुआ करता था, आज वही उसे गिरी नजर से देखते.

उन्हीं दिनों मेरे पापा का तबादला हो गया. मैं अपने पूरे परिवार के साथ गांव से शहर में आ गया. उन दिनों हमारा स्कूल भी बंद था, जिस कारण मैं अपने सब से अजीज दोस्त मौसम को कुछ नहीं बता पाया. अब मेरी पढ़ाई यहीं होने लगी. पर मेरे दिलोदिमाग पर हमेशा मौसम की तसवीर छाई रहती. शहर की चमकदमक भी मुझे मौसम के बिना फीकीफीकी लगती.

शुरूशुरू में मेरा यह हाल था कि मुझे यहां चारों तरफ मौसम ही मौसम नजर आती थी. हर खूबसूरत लड़की में मुझे मौसम नजर आती थी.

एक दिन तो मौसम की याद ने मुझे इतना बेकल कर दिया कि मैं ने अपने स्कूल की सीनियर छात्रा सुप्रिया का हाथ पकड़ कर उसे ‘मौसम’ के नाम से पुकारा. बदले में मेरे गाल पर एक जोरदार चांटा लगा, तब कहीं जा कर मुझे होश आया.

इसी तरह चांटा खाता और आंसू बहाता मैं अपनी पढ़ाई करने लगा. वक्त के साथसाथ मौसम की याद भी कम होने लगी. लेकिन जब कभी मैं अकेला होता तो सबकुछ भुला कर अतीत की खाई में गोते लगाने लगता.

धीरेधीरे 2 साल गुजर गए.

आज मैं बहुत खुश हूं. आज पापा ने मुझ से वादा किया है कि परीक्षा खत्म होने के बाद हम लोग 1 महीने के लिए घर चलेंगे. लेकिन परीक्षा में तो अभी पूरे 25 दिन बाकी हैं. फिर कम से कम 10 दिन परीक्षा चलेगी. तब घर जाएंगे. अभी भी बहुत इंतजार करना पड़ेगा.

किसी तरह इंतजार खत्म हुआ और परीक्षा के बाद हम लोग घर के लिए रवाना हो गए. गांव पहुंचने पर मैं सब से पहले दौड़ता हुआ घर पहुंचा. मैं ने सब को प्रणाम किया. फिर निर्मोही भाई को ढूंढ़ने लगा. घर, छत, बगीचा, पान की दुकान, हर जगह खोजा, मगर निर्मोही भाई नहीं मिले. अंत में मैं मायूस हो कर अपने पुराने अड्डे की तरफ चल पड़ा. मेरे घर के सामने एक नदी बहती है, जिस के ठीक बीचोंबीच एक छोटा सा टापू है, यही हम दोनों का पुराना अड्डा रहा है.

हम दोनों रोजाना लगभग 2-3 घंटे यहां बैठ कर बातें किया करते थे. आज फिर इतने दिनों बाद मेरे कदम उसी तरफ बढ़ रहे थे. मैं ने मन ही मन फैसला किया कि भाई से सब से पहले मौसम के बारे में पूछना है. फिर कोई बात होगी. मौसम का खयाल मन में आते ही एक अजीब सी गुदगुदी होने लगी. तभी दोनाली की आवाज से मैं ठिठक गया.

कुछ ही दूरी पर भाई बैठेबैठे निशाना साध रहे थे. काली जींस, काली टीशर्ट, बड़ीबड़ी दाढ़ी, हाथ में दोनाली. भाई देखने में ऐसा लगते थे मानो कोई खूंखार आतंकवादी हों. भाई का यह रूप देख कर मैं सकपका गया. जो कभी बीड़ी का बंडल तक नहीं छूता था, आज वह गांजा पी रहा था. मुझे देख कर भाई की आंखों में एक चमक जगी. पर पलक झपकते ही उस की जगह वही पहले वाली उदासी छा गई. कुछ पल हम दोनों भाई एकदूसरे को देखते रहे, फिर गले लग कर रो पड़े.

जब हिचकियां थमीं तो पूछा, ‘‘भैया, यह क्या हाल बना रखा है?’’

जवाब में उन्होंने एक जोरदार कहकहा लगाया. मानो बहुत खुश हों. लेकिन उन की हंसी से दर्द का फव्वारा छूट रहा था. जुदाई की बू आ रही थी.

जब हंसी थमी तो वह बोले, ‘‘भाई, तू ने अच्छा किया जो शहर चला गया. तेरे जाने के बाद तो यहां सबकुछ बदलने लगा. नीरा और बिकूवा की प्रेमलीला ने तो समाज का हर बंधन तोड़ दिया. लेकिन अफसोस, बेचारों की लीला ज्यादा दिन तक नहीं चली. आज से कोई 6 महीना पहले उन दोनों का एक्सीडेंट हो गया. नीरा का चेहरा एक्सीडेंट में इस तरह झुलस गया कि अब कोई भी उस की तरफ देखता तक नहीं.’’

थोड़ा रुक कर भाई फिर बोले, ‘‘बिकूवा का तो सिर्फ एक ही हाथ रह गया है. अब वह सारा दिन अपने बूथ में बैठा फोन नंबर दबाता रहता है. शशिभूषण और मीनू की अगले महीने सगाई होने वाली है…’’

‘‘लेकिन मीनू तो आप को…’’ मेरे मुंह से अचानक निकला.

‘‘हां, मीनू मुझे बहुत चाहती थी. लेकिन मैं ने उस के प्यार का हमेशा अपमान किया. अब मैं सोचता हूं कि काश, मैं ने नीरा के बदले मीनू से प्यार किया होता. तब शायद ये दिन देखने को न मिलते.’’

फिर हम दोनों के बीच थोड़ी देर के लिए गहरी चुप्पी छा गई.

इस के बाद भाई को थोड़ा रिलैक्स मूड में देख कर मैं ने मौसम के बारे में पूछा. इस पर एक बार फिर उन की आंखें नम हो गईं. मेरा दिल अनजानी आशंका से कांप उठा.

मेरे दोबारा पूछने पर भाई बोले, ‘‘तुम तो जानते ही हो कि मौसम मारवाड़ी परिवार से थी. तुम्हारे जाने के कुछ ही दिनों बाद मौसम के पापा को बिजनेस में काफी घाटा हुआ. वह यहां की सारी प्रापर्टी बेच कर अपने गांव राजस्थान चले गए.’’

इतना सुनते ही मेरी आंखों के आगे दुनिया घूमने लगी. वर्षों से छिपाया हुआ प्यार, आंसुओं के रूप में बह निकला.

हम दोनों भाई छुट्टी के दिनों में साथसाथ रहे. पता नहीं कब 1 महीना गुजर गया और फिर हम लोग शहर आने के लिए तैयार हो गए. इस बार हमारे साथ निर्मोही भाई भी थे.

शहर आ कर निर्मोही भाई जीतोड़ पढ़ाई करने लगे. वह मैट्रिक की परीक्षा में अपने स्कूल में फर्स्ट आए.

आज 3 साल बाद पापा मुझे इंजीनियरिंग और भाई को मेडिकल की तैयारी के लिए कोटा भेज रहे थे. मैं बहुत खुश था, क्योंकि आज मुझे कोटा यानी राजस्थान जाने का मौका मिल रहा था. मौसम का घर भी राजस्थान में है. इसीलिए इतने दिनों बाद मन में एक नई आशा जगी थी.

मैं भाई के साथ राजस्थान आ गया. यहां मैं हरेक लड़की में अपनी मौसम को तलाशने लगा. लेकिन 1 साल गुजर जाने के बाद भी मुझे मेरी मौसम नहीं मिली. अब हम दोनों भाइयों के सिर पर पढ़ाई का बोझ बढ़ने लगा था. लेकिन जहां भाई पढ़ाई को अपनी महबूबा बना चुके थे, वहीं मैं अपनी महबूबा की तलाश में अपने लक्ष्य से दूर जा रहा था. फिर परीक्षा भी हो गई. रिजल्ट आया तो भाई का सिलेक्शन मेडिकल के लिए हो गया, लेकिन मैं लटक गया.

मुझे फिर से तैयारी करने के लिए 1 साल का मौका मिला है और इस बार मैं भी जीतोड़ मेहनत कर रहा हूं. लेकिन फिर भी कभी अकेले में बैठता हूं तो मौसम की याद तड़पाने लगती है. वर्ष के चारों मौसम आते हैं और चले जाते हैं. पर मेरी आंखों को तो इंतजार है, 5वें मौसम का. पता नहीं कब मेरा 5वां मौसम आएगा, जिस में मैं अपनी मौसम से मिलूंगा.

Best Hindi Story : पैंशन – अतुल भाभी की कौन सी सच्चाई को छुपा रहा था?

Best Hindi Story : ‘ट्रिनट्रिन…’

अतुल औफिस जाने के लिए तैयार हो ही रहा था कि तभी मोबाइल की घंटी बज गई. एक पल को वह झुंझला सा गया. औफिस में आज वैसे भी बहुत काम था, ऊपर से ये फोन… उस ने एक उड़ती हुई नजर कलाई में बंधी घड़ी पर डाली, “पौने 10 बज चुके हैं…”

चिंता और परेशानी की लकीरें अतुल के माथे पर उभर आईं. उस ने जल्दी से दूसरे पैर को भी जूते में घुसाया और शर्ट की ऊपर की जेब में रखे मोबाइल को टटोला. सुशीला भाभी… इस वक्त… वह भी इतने दिनों बाद…? न जाने क्यों अचानक से दिल की धौंकनी की रफ्तार बढ़ गई थी. जब से भैया इस दुनिया से गए हैं तब से एक अजीब सा डर उस के मन में बैठ गया था. अतुल वहीं पास पड़े सोफे में धंस गया.

‘हैलो अतुल भइया, मैं बोल रही हूं…’

“प्रणाम भाभी, कैसी हो आप? घर में सब ठीक तो है न?”

‘वैसे तो सब ठीक है, पर दिनेश…’

“क्या हुआ दिनेश को…? सब ठीक तो है न भाभी?”

भाभी का गला दिनेश का नाम लेते ही न जाने क्यों रुंध गया.

सुशीला भाभी नकुल भैया की पत्नी थी. आज से लगभग 7 साल पहले एक सड़क दुर्घटना में भइया की मृत्यु हो गई थी. घर भर में खुशियों का दीप जलाने वाले भैया की तसवीर के आगे दीपक जलता देख न जाने क्यों कलेजा कट कर रह जाता था. भइया अपने पीछे भाभी और 3 बच्चों को छोड़ कर गए थे.

भइया की अचानक हुई मृत्यु से भाभी की तो मानो दुनिया ही उजड़ गई. 2 बच्चे स्कूल जाते थे और दिनेश ने अभी पिछले साल ही कालेज में प्रवेश लिया था. भइया अपनी छोटी सी दुनिया में बहुत खुश थे. भइया एक सरकारी महकमे में प्रथम श्रेणी के अधिकारी थे. घर में सुखसुविधा की सारी चीजें उपलब्ध थीं. भाभी पहननेओढ़ने और घूमने की बहुत शौकीन थी. जब भी वे कहीं से घूम कर आती तो वहां से की गई खरीदारी और बातों का पुलिंदा ले कर निशा के पास बैठ जाती.

अतुल एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक की नौकरी कर रहा था. वैसे तो किसी भी चीज की कोई कमी न थी, पर भइया जैसे ठाठबाट भी नहीं थे. भइया की शानोशौकत और लाल बत्ती गाड़ी देख कर निशा अकसर मुझ से लड़ने बैठ जाती, पर…

‘हैलो, हैलो… भइया, आप मेरी बात सुन रहे हैं न.’

अतुल जैसे सोते से जागा, “जी भाभी…”

‘पता नहीं भइया, दिनेश को क्या हो गया है? दिनभर गुमसुम सा बैठा रहता है, कुछ पूछो तो फूटफूट कर रोने लगता है. मैं ने सोचा कि औफिस की कोई परेशानी होगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं है. आज इस बात को 15-20 दिन हो गए, पर कुछ भी सुधार नहीं है. मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं, कहां जाऊं… रातरात भर न जाने क्या सोचता रहता है.’

‘‘भाभी, धीरज रखिए. आप ने पहले क्यों नहीं बताया? मैं भी इधर बोर्ड के इम्तिहानों में ड्यूटी लग जाने से बिजी था. आप को फोन भी नहीं कर पाया, पर आप को तोे करना चाहिए था.’’

अतुल ने कुछ शिकायती लहजे में कहा. अतुल की आवाज सुन कर निशा भी कमरे में आ गई.

भाभी का स्वर मद्धिम पड़ गया, ‘अतुल भइया, दिनेश की हालत सुन कर मेरे मम्मीपापा से रहा नहीं गया, वे तो एक हफ्ते से यहीं पड़े हैं और परसों घबरा कर मेरा भाई भी आ गया.’

भाभी की बात सुन कर अतुल के दिल को बड़ा धक्का लगा. भाभी उसे 5 किलोमीटर की दूरी पर सूचित नहीं कर
सकी और वहां उन के मांबाप और भाई 300 किलोमीटर की दूरी से आ गए. क्रोध का बुलबुला जितनी तेजी से उभरा, उतनी ही तेजी से न जाने कहां लुप्त हो गया.

“ठीक है भाभी, मैं शाम को आता हूं,” कह कर अतुल ने फोन रख दिया.

निशा की तीर सी निगाहें उस के ऊपर ही थीं. कुछ देर तक वह अतुल को ही देखती रही. अभी कुछ दिन पहले ही तो वो भाभी के प्रति नाराजगी जाहिर कर रहा था.

बच्चे तो उस वक्त छोटे थे, पर भाभी वो कैसे सब भूल गई. कभी भूल से भी वे फोन भी नहीं करती.

“…तो कब जा रहे हैं?” उस के कथन में एक व्यंग्यात्मक चुभन थी.

अतुल शायद उस की सवालिया आंखों से बचना चाहता था. उस ने सिर
झुकाए हुए ही उस के सवाल का जवाब दिया, “निशा, दिनेश की तबीयत कुछ ठीक नहीं है, भाभी काफी परेशान हैं. मुझे जाना…”

“क्यों? मायके वाले कहां हैं…? हम से पहले तो उन को खबर की जाती है, आज क्या हुआ?”

“निशा, तुम औरतों को कुछ समझ नहीं आता. न समय देखती हो और न मौका. जब देखो तब शुरू हो जाती हो. दिक्कत होगी तभी फोन किया है.”

निशा अतुल की बातों को सुन तिलमिला सी गई, “तुम मर्दों के भी समझ में कुछ नहीं आता. कल तक भाभी ऐसी हैं, वैसी हैं… आज वही बात मैं ने कह दी तो गलत हो गई. 20 साल गुजार दिए आप के साथ, पर जब खुद के परिवार की बात आती है, तो मैं बाहर वाली ही बन कर रह जाती हूं.”

निशा लगातार बड़बड़ा रही थी, पर अतुल ने उस की बात का कोई जवाब नहीं दिया. अतुल ने मोटरसाइकिल की चाबी उठाई और औफिस की ओर चल दिया.

आज औफिस में काम करने में मन नहीं लग रहा था. भाभी की आवाज कानों में गूंज रही थी, ‘भैया, दिनेश की तबीयत ठीक नहीं है.’

अतुल की आंखों के सामने साढ़े 7 साल पहले का वह मंजर एक बार फिर घूम गया, जब भइया की मृत देह पर पछाड़े खाती हुई भाभी और बच्चों ने उस से पूछा था कि अब उन का क्या होगा? भइया की इंश्योरैंस पौलिसी दिलाने के लिए अतुल को न जाने कितने पापड़ बेलने पड़े थे. दफ्तर के चक्कर लगातेलगाते उस के जूते घिस गए थे. अफसरों के हाथपैर जोड़जोड़ कर किसी तरह दिनेश की मर्सी ग्राउंड’ पर नौकरी लगवाई थी, पर आज…

तबीयत ठीक न होने का बहाना कर के अतुल औफिस से जल्दी ही निकल गया था. अतुल ने मोटरसाइकिल भाभी की तरफ मोड़ ली.

अतुल भाभी के घर पहुंचा, तो घर के गेट पर से ही लोहबान और अगरबत्ती की महक आ रही थी. घर में पूजा है और भाभी ने हमें बुलाया तक नहीं… एक विचार ने उस के दिमाग में जन्म लिया ही था, उस ने सिर झटक कर उसे वही गेट के बाहर छोड़ दिया और अतुल धड़धड़ाते हुए घर में घुस गया.

घर का मंजर कुछ और ही था. दिनेश आंखें बंद किए बैठा था और पंडितजी जोरशोर से मंत्रोच्चार कर आहुतियां हवनकुंड में डाल रहे थे. यह मंजर देख अतुल कुछ देर के लिए स्तब्ध रह गया. तभी भाभी की नजर अतुल पर पड़ी और वह उसे दूसरे कमरे में ले कर चली गई.

नकुल भैया फोटोफ्रेम में मुसकरा रहे थे. अतुल कुछ पूछता, उस से पहले हाथ में पानी का गिलास पकड़ाते हुए भाभी ने कहा, ‘‘मेरी मम्मी ने पंडितजी को दिखाया था, तो उन्होंने बताया कि किसी बाहरी हवा के प्रभाव से दिनेश की यह हालत हो गई है. शायद किसी ने कुछ कर दिया है.’’

भाभी की निगाह में एक अजीब सा संदेह था, जैसे वह अतुल से ही कुछ पूछना चाह रही हो.

अतुल ने वितृष्णा से मुंह फेर लिया. अतुल सोच रहा था कि अच्छा हुआ निशा को साथ नहीं लाया, वरना वह तो…

तभी पंडितजी ने आरती के लिए पुकार लगाई, उन की पुकार सुन कर अतुल भी सभी के साथ आरती में शामिल होने के लिए उठ गया. प्रसाद वितरण के साथ सभी अपनेअपने कामों में लग गए.

अतुल ने भइया के सासससुर के पैर छुए और उन के पास ही बैठ गया. भाभी चाय बनाने चली गई और भाभी के मातापिता बुढ़ापे का रोना रो कर कमरे में आराम करने चले गए. अतुल बैठक में अकेला ही रह गया. कितना बदल गया था सबकुछ… जिस घर में हंसी के ठहाके लगते थे, आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था.

एक अजीब सी अजनबियत का अहसास हो रहा था. निशा और वह भैया के जीवित रहते हमेशा आते रहते थे, पर वक्त के साथ कितना कुछ बदल गया था. भैया की तसवीर अचानक से उसे धुंधली सी दिखाई देने लगी थी. तभी किसी के पैर की आहट के आभास से वो सतर्क हो गया और पैंट की बाईं जेब से रूमाल निकाल कर आंखें पोछ लीं.

यह तो दिनेश था, फूल सा चेहरा कुम्हला कर छोटा सा हो गया था. अभी कुछ ही दिन पहले तो वह बाजार में मिला था. अतुल जब भी उसे देखता था, तो उसे भइया की याद आ जाती. भइया ने न जाने क्याक्या सपने देखे थे उस के लिए, पर आज वह उन की जगह पर क्लर्की कर रहा था. यह सोच कर अतुल का मन न जाने कैसा हो गया.

“कैसे हो दिनेश?”

न जाने क्या सोच कर उस की आंखें भर आईं. अतुल ने बड़े प्यार से उस के कंधे पर हाथ रखा, बहुत दिनों से दिल में घुमड़ता हुआ दर्द का सैलाब आज सारे बंधन को तोड़ कर निकलने को बेताब था. दिनेश फूटफूट कर रो पड़ा. कुछ देर तक वह वैसा ही रोता रहा. अतुल ने भी उसे चुप कराने का प्रयास नहीं किया. उस की हिचकी बंध गई थी. अचानक से वह उठा और कमरे के बाहर चला गया.

अतुल बड़ी देर तक असमंजस की स्थिति में बैठा रहा, तभी दिनेश हाथ में कागज का एक टुकड़ा ले कर अतुल के पास आया और बोला, ‘‘चाचाजी, ये औफिस से 20 दिन पहले एक पत्र आया था. पापा की मृत्यु के साढ़े 7 साल हो गए हैं. अजेश और बृजेश भी अब बालिग हो गए हैं, पापा की पैंशन अब आधी हो जाएगी. इस महंगाई के दौर में आधी पैंशन और मेरी नाममात्र की तनख्वाह के साथ 2 बेरोजगार भाइयों और एक विधवा मां का गुजारा भला कैसे होगा?”

अतुल निःशब्द उसे देखता रह गया. शायद उस के सवालों का जवाब किसी के पास नहीं था.

Best Hindi Story : वक्त के धमाके – कथा एक नौजवान के टूटतेबिखरते सपनों की

Best Hindi Story : विदेश जा कर कुछ बनने का सपना रवि ने बचपन से ही देखा था पर सीमित साधनों की वजह से उसे लगता था कि शायद उस का सपना कभी साकार नहीं हो पाएगा. वक्त ने उस का साथ दिया और एक ऐसा जरिया निकल आया कि वह न केवल जापान पहुंच गया बल्कि उसे एक ऐसा दोस्त मिल गया जिस ने उस की जिंदगी को एक नई दिशा दे दी.

एक तरफ प्रशांत महासागर की अथाह गहराइयां और दूसरी ओर माउंट फूजी की बर्फ से ढकी गगनचुंबी चोटियों के बीच दूर तक फैली हरियाली का सीना चीरती हुई ‘शिनकानसेन’ (बुलेट ट्रेन का जापानी नाम) तेज रफ्तार से भागती जा रही थी. आरक्षित कोच की शानदार सीट पर सिर रखे, आंखें बंद किए रवि का मन उस से भी तेज गति से अतीत की ओर भाग रहा था.

तकरीबन 1 साल हुआ जब उस से रवि की मुलाकात हुई थी. बी.ए. प्रथम वर्ष की परीक्षा परिणाम का अखबार हाथ में आते ही पिताजी ने आसमान सिर पर उठा लिया था. मां ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन उन का फैसला पत्थर की लकीर जो था. चंद जरूरी कपड़े साथ में ले जाने की उसे इजाजत मिली थी. घर से निकलते समय अपने ही जन से नजरें मिलाने की भी उस में हिम्मत न थी. आखिर उन की तकलीफों से वह वाकिफ था.

सरकारी महकमे का एक ईमानदार बाबू किस प्रकार परिवार की गाड़ी खींचता था, उस से छिपा तो न था. बड़ा बेटा होने के नाते उस से उम्मीदें भी बहुत थीं. ‘पढ़ नहीं सकते हो तो महकमे से लोन ले कर एक छोटीमोटी दुकान खुलवा सकता हूं’, कहा था पिताजी ने, लेकिन वह जिंदगी जीना उस का ख्वाब होता तब न. बचपन से एक ही सपना पाल रखा था कि विदेश जाऊंगा, कुछ बनूंगा.

जून की तपती दोपहरी में कुछ सुकून के पल तलाश करने के लिए वह दिल्ली स्थित ‘जापान कल्चरल सेंटर’ के बाहर एक पेड़ की छांव में बैठा ही था कि तभी गेट से एक जापानी बाला बाहर आई और फुटपाथ के पास खड़ी हो गई. उसे शायद किसी टैक्सी का इंतजार था. भीषण गरमी से उस का सफेद दूध सा दमकता चेहरा लाल हो गया था. उस जापानी युवती को परेशान देख कर रवि के मन में परमार्थ की भावना जागी. कुछ ठिठकते कदमों के साथ उस के थोड़ा नजदीक गया और धड़कते दिल से अंगरेजी में पूछा कि क्या तुम अंगरेजी में बातचीत कर सकती हो. उस ने बेहद पतली आवाज में अंगरेजी में जवाब दिया, ‘यस अफकोर्स.’ और इसी के साथ ही उस में साहस का संचार हुआ, बोला, ‘डू यू नीड ऐनी हेल्प?’ ‘नो थैंक्स, एक्चुली आई अराइव्ड हियर लास्ट नाइट एंड बाई टुमारो मार्निंग आई हैव टु फ्लाई फौर जयपुर, सो ड्यूरिंग दीज फ्यू आवर्स आई विश टू सी सम गुड प्लेसिज हियर.’

उस की बातें खत्म होने से पहले वह बोल उठा, ‘इफ यू डोंट माइंड एंड फील कंफर्टेबल, इट वुड बी माई प्लेजर टु शो यू सम ब्यूटीफुल एंड हिस्टोरिकल प्लेसिज?’

एक पल के लिए गहरी खामोशी छा गई थी, उस युवती के मुंह से निकलने वाली हां या ना पर रवि के पूरे सपने पल भर टिके रहे. ‘ओह श्योर,’ ने रवि की तंद्रा भंग की और वह सातवें आसमान पर जा पहुंचा था.

शाम होतेहोते दिल्ली की वे तमाम ऐतिहासिक चीजें रवि ने जापानी युवती को दिखाईं जिन से एक पर्यटक वाकई अभिभूत हो उठता है. रवि के लिए सब से महत्त्वपूर्ण था उस का सुखद सामीप्य. एक वाक्य बोलने से पहले उस के खूबसूरत होंठों से जो खिलखिलाहट उभरती थी और बातोंबातों में रवि की नाक को पकड़ कर हिला देने का जो उस का अंदाज था, उस ने उसे रवि के दिल के बेहद करीब पहुंचा दिया.

दिल्ली के कई पर्यटन स्थलों को देखतेदेखते उन्हें शाम हो गई. दोनों को भूख लगी थी. एक अच्छे रेस्तरां में खाना खाने के बाद वे टहलते हुए इंडिया गेट की ओर निकल गए थे. चांदनी चारों ओर बिखरी थी, बोट क्लब की ओर से आती ठंडी हवाएं, माहौल को और भी खुशनुमा बना रही थीं. चलतेचलते मिकी ने उस की उंगलियों को अपनी हथेली में भर कर बहुत ही गंभीर स्वर में कहा था, ‘रवि, मैं दुनिया के बहुत से देशों में गई हूं और अनेक दोस्त भी बनाए हैं लेकिन तुम वास्तव में उन दोस्तों में एक बेहतरीन दोस्त हो. मैं तुम्हारे देश से मधुर यादों को ले कर जापान जाऊंगी. मेरी इच्छा है कि तुम जापान आओ. भविष्य में यदि तुम कभी अपने देश को छोड़ कर जापान आने के लिए मानसिक रूप से तैयार होना तो मुझे लिखना, मैं तुम्हारे लिए टिकट और वीजा के लिए जरूरी पेपर भेज दूंगी. कल सुबह 8 बजे से पहले तुम मुझे पार्क होटल के रिसेप्शन पर आ कर मिलना. मैं तुम्हें अपना जापान का पता व टेलीफोन नंबर दे दूंगी.’

बहुत मुश्किल से रवि तब  सिर्फ ‘यस’ बोल सका था. चेतना जा चुकी थी वह सिर्फ जड़वत सा खड़ा रह गया था. शायद इतनी बड़ी खुशी का बोझ उस से उठाया नहीं जा रहा था. बचपन का एक सपना शायद सच होने जा रहा था. तभी उस की नाक को पकड़ कर मिकी ने हिलाया तो मानो वह नींद से जाग गया.

‘रवि, अब तुम जाओ, उम्मीद करती हूं कि कल सुबह मुलाकात होगी.’ इतना कह कर मिकी चली गई थी और रवि उस के कदमों की आखिरी आवाज भी सुनने को बेचैन ठगा सा वहीं खड़ा रहा.

कुछ देर बाद रवि अपने ठिकाने पर जा कर सो गया. वह पास की एक बेंच पर लेट गया था. रात सरकती रही और वह मिकी और अपने भविष्य के बारे में सोचता ही जा रहा था. सोचतेसोचते कब आंख लग गई पता ही नहीं चला और सुबह आंख खुली रवि ने सब से पहले घड़ी को देखा तो 8 बज चुके थे. वह हांफते हुए होटल के रिसेप्शन पर पहुंचा तो पता चला कि मिकी की फ्लाइट 8.45 बजे की थी और वह 8 बजे से पहले ही होटल से जा चुकी थी. जिस बेल ब्वाय ने उस का कमरा साफ किया था उस ने बताया कि मिकी काफी देर तक लौबी में बैठी थी. उस की मायूस निगाहें मानो किसी को तलाश रही थीं.

रवि को लगा कि उस का सबकुछ लुट चुका है. वह भीतर से बिलकुल टूट गया, फिर भी उसे जीना है क्योंकि अब तो उसे जिंदगी का मकसद मिल गया था. मिकी को पाने की एक अटूट चाहत ने उस के भीतर जन्म ले लिया था.

हलके झटके के साथ ट्रेन रुकी तो रवि ने आंखें खोलीं और उस का मन अतीत से वर्तमान में आ गया. एक सहयात्री ने रवि के पूछने पर बताया कि यह हमामातसुचो स्टेशन है. लगभग आधा सफर खत्म हो चुका है. भारत के स्टेशनों से कितना भिन्न, जगमगाता प्लेटफार्म, कोई शोरशराबा नहीं, इतना साफसुथरा फर्श कि पैर भी रखने को दिल न करे. उतरने और चढ़ने वालों का अनुशासन देख जापान की सभ्यता से रवि थोड़ाबहुत परिचित हो रहा था. ट्रेन सरकने लगी और कुछ ही क्षणों में फिर तूफानी रफ्तार पकड़ ली. रवि एक बार फिर आंखें बंद कर अतीत में खो गया.

तब दोचार दिन तलाश करने पर रवि को पास ही के एक छोटे से रेस्तरां में काम मिल गया था जिस से पेट की भूख और छत की समस्या का हल हो गया. लगभग रोजाना समय निकाल कर एक उम्मीद दिल में लिए रवि उसी पेड़ के नीचे आ बैठता था. इस दौरान उस ने बहुत जापानी चेहरे देखे लेकिन वह चेहरा दोबारा देखने की चाहत लिए एक साल गुजर गया.

ऐसे ही एक दिन शाम को रवि पेड़ के नीचे उदास बैठा था कि तभी एक आटोरिकशा ब्रेक की तेज आवाज के साथ आ कर रुका तो उस की तंद्रा भंग हुई. रवि ने देखा कि एक जापानी नौजवान आटो से उतरा और आटो वाले को किराया देने के बाद अपने मोटे से पर्स को तंग जींस की पिछली जेब में खोंस कर लापरवाह ढंग से सीढि़यों की तरफ बढ़ा. महज 2 सीढि़यां चढ़ते ही उस युवक का पर्स जेब से निकल कर वहीं गिर गया, लेकिन उस से अनजान वह जापानी नौजवान आगे बढ़ता गया. रवि ने आसपास किसी को न देख कर धीरे से जा कर पर्स उठाया और पेड़ के नीचे आ कर उसे खोल कर देखा तो उस में हजार के नोट भरे थे. धड़कते दिल से रवि ने उसे तुरंत बंद किया. उस के अनुमान से लगभग 40-50 नोट रहे होंगे. इस का मतलब भारतीय करेंसी में तो ये लाखों में होंगे. एक पल को उस के दिमाग में आया कि ये रुपए अगर वह पिताजी को जा कर दे दे तो उन की तमाम परेशानियां दूर हो सकती हैं, लेकिन दूसरे ही पल उस की आत्मा धिक्कार उठी कि रवि, यदि यह धन तुम ने अपने पास रखा तो शायद जीवन भर अपने को माफ न कर सकोगे. इस को वापस करना होगा. तभी बेचैनी की हालत में वह जापानी नौजवान बाहर आता दिखाई पड़ा. उस की निगाहें जमीन के भीतर से भी कुछ निकाल लेने को आतुर थीं. रवि हौले से उस के करीब आ कर बोला, ‘एक्सक्यूज मी, आई हैव योर वालेट. यू ड्राप्ड इट हियर,’ कह कर पर्स उस के हाथों में थमा दिया.

उस जापानी नौजवान के चेहरे पर जो खुशी और कृतज्ञता के भाव आए और धन्यवाद से संबंधित जितने भी शब्द उसे आते थे, कहे. उन्हें सुन कर रवि गौरवान्वित हो उठा था. पर्स निकाल कर युवक ने चंद नोट उसे थमाने चाहे थे, लेकिन उस ने जो किया था उस के बदले में कुछ पैसे ले कर खुद से शर्मिंदा नहीं होना चाहता था. रवि की ऐसी अभि- व्यक्ति को सुन कर जापानी नौजवान ने आश्चर्यमिश्रित ढंग से उस की ओर देखा और बोला, ‘आई एम वेरी मच इंप्रेस्ड, मे आई डू समथिंग फौर यू?’

इसी सवाल का तो रवि को इंतजार था और एक झटके में उस के मुंह से निकला, ‘आई विश टु कम टु जापान?’

एक पल को उन दोनों के बीच गहरी खामोशी छा गई. फिर उस जापानी नौजवान ने धीरे से रवि के कंधे पर हाथ रख कर बोला, ‘डू यू नो एनी रेस्टोरेंट अराउंड दिस एरिया? आई एम हंग्री.’

करीब 5 मिनट पैदल चलते ही रवि का रेस्टोरेंट था, संयोग से कोने की एक मेज खाली थी. उस ने रवि को जबरदस्ती अपने पास बिठाया और भोजन के दौरान ही रवि ने अपनी जिंदगी के हर पहलू, हर सपने को खोल कर उस के सामने रख दिया.

इस दौरान जापानी नौजवान कुछ भी नहीं बोला, सिर्फ खाता रहा और रवि की बातें सुनता रहा. भोजन समाप्त करने के बाद वह रवि को अपने बारे में बताने लगा. अभी हाल ही में उस की शादी हुई है और करीब एक बरस पहले उस के पिता प्लास्टिक के एक छोटेमोटे कारखाने को उस के कंधों पर छोड़ कर हार्टअटैक से चल बसे थे.

पिछले एक साल में उस के अथक परिश्रम से उस की ‘खायशा’ (कंपनी) की काफी तरक्की हुई. घूमनेफिरने का उसे बचपन से शौक है, इसलिए काम की जिम्मेदारी अपनी पत्नी को सौंप कर वह एक सप्ताह की भारत यात्रा पर निकल पड़ा था. एक पल रुक कर उस ने गिलास में रखा पानी पीया और आगे बताने लगा कि आने वाले दिनों में उस की कंपनी में काफी काम बढ़ने वाला है, लिहाजा उसे कुछ नए कर्मचारियों की जरूरत है. अगर तुम लंबे अरसे तक जापान में रहना चाहते हो और मेरे साथ काम करना पसंद करो तो मैं तुम्हें अपनी कंपनी में जगह दे सकता हूं, लेकिन जापान में बहुत मेहनत से काम करना होता है, जहां तक तुम्हारी ईमानदारी का सवाल है उस से तो मैं परिचित हो चुका हूं और तमाम नसीहतें देता चला गया.

रवि के कानों में सीटियां बज रही थीं. एक साल में दूसरी बार ऐसा अवसर आया था. वह अपनी सुध खो बैठा था ‘व्हाट डू यू डिसाइड?’ चौंक कर यथार्थ में आया रवि उस का हाथ थाम कर थरथराते होंठों से सिर्फ इतना बोल सका, ‘आई विल डू माई बेस्ट.’

मेरे ऐसे भाग्य होंगे, यह मैं ने सोचा न था. उस के रेस्तरां का पता नोट कर वह जापानी नौजवान बोला, ‘आई हैव टु फ्लाई फौर मुंबई टुनाइट एंड आफ्टर स्पेंडिंग 2 डेज ओवर दियर आई विल बी बैक टु जापान, सून आई विल सेंड औल द डाक्यूमेंट्स, सो जस्ट वेट फौर माई लेटर.’ उसे टैक्सी में बिठा कर एक उमंग मन में लिए रवि तब वापस रेस्तरां में आ गया था. भीड़ बढ़ने लगी थी.

उस जापानी नौजवान के जाने के बाद हरेक दिन रवि के लिए एक बरस की तरह गुजरा और ठीक 15वें दिन रेस्टोरेंट के काउंटर पर कैशियर ने उसे बड़ा सा लिफाफा पकड़ाया. एक कोने में जापान लिखा देख वह भागता हुआ अंदर गया और कांपती उंगलियों से लिफाफा खोला. वीजा से संबंधित सारे कागजात और एक ‘ओपन डेटेड’ एयर टिकट था. छोटे से पत्र में उस ने लिखा था कि शीघ्र आने की कोशिश करो.

खुशी के मारे उस की आंखों में आंसू आ गए. आगे के 10 दिन तूफान की सी तेजी से गुजरे. लगातार 5 दिन तक जापानी दूतावास के चक्कर काटने के बाद वीजा मिला और फिर जाने का समय आ गया था. पिताजी के स्नेहयुक्त नसीहत भरे अल्फाज ‘बेटा रवि, ईमानदारी का साथ मत छोड़ना तो खुशियां तुम से दूर नहीं रह पाएंगी,’ को रवि ने आत्मसात कर लिया था. छोटी बहन को सीने से लगा कर द्रवित हृदय से विदा ली थी.

ओसाका इंटरनेशनल एअरपोर्ट से क्लियरेंस की तमाम औपचारिकताएं पूरी होने के बाद उसे कार्यक्रम के अनुसार ओसाका स्टेशन से टोकियो के लिए बुलेट ट्रेन पर सफर करना था.

आंखें खुलीं तो रवि अतीत से बाहर आया. बाहर अंधेरा हो चला था. दूर टिमटिमाती रोशनियां दिखाई पड़ने लगी थीं. सहयात्री ने बताया कि टोकियो आने वाला है. फ्रेश होने की नीयत से रवि टायलेट गया. जब वह बाहर आया तो चारों तरफ जगमगाता शहर था. ट्रेन टोकियो में प्रवेश कर चुकी थी. आगामी कुछ ही मिनटों में ट्रेन रवि के अंतिम पड़ाव यानी वेनो स्टेशन पर पहुंचने वाली थी.

पश्चिम के दरवाजे से बाहर निकलते ही आरक्षण काउंटर के पास वह जापानी नौजवान रवि का इंतजार कर रहा था. दोनों गले मिले. रवि को उस ने बताया कि महज 10 मिनट की दूरी पर उस का अपार्टमेंट है. जगमगाता शहर और उस पर से आतिशबाजियों का मंजर (कुछ ही दूर पर बहती सुमिदा नदी के तट पर हर साल इसी दिन आतिशबाजी का उत्सव होता है जिसे ‘हानाबी’ कहते हैं) किसी भी नए इनसान को भौंचक कर देने के लिए पर्याप्त था.

कार उस शानदार अपार्टमेंट के पोर्च में जा लगी थी. रवि अब कुछ थकान का अनुभव कर रहा था. ड्राइंगरूम से अटैच्ड बाथरूम में गरम पानी के बाथटब में नहा कर रवि ने थकान उतारी और जब फ्रेश हो कर बाहर निकला तो देखा वह जापानी नौजवान अपना पसंदीदा पेय ले कर बैठा था. रवि ने सिर्फ एक कप कौफी पीने की इच्छा जाहिर की.

वह अंदर गया और रवि सोफे की पुश्त पर सिर टिका कर आंखें बंद कर दिल के उस हिस्से को छूने लगा जिस पर मिकी का नाम लिखा था. किसी भी सूरत में उसे ढूढ़ना होगा, रवि ने सोचा.

‘‘मि. रवि, प्लीज मीट टु माई वाइफ, मिकी,’’ और साथ में बेहद पतली आवाज में ‘हेलो’ के स्वर ने रवि की तंद्रा भंग की. झटके के साथ आंखें खोलीं और वह चेहरा जिसे रवि करोड़ों में भी पहचान सकता था, उस के सामने था. उस की मिकी उस के सामने खड़ी थी. नजरें मिलाते ही मिकी ने आंखें जमीन में गाड़ दी थीं. बहुत संयम के साथ वह सिर्फ ‘हेलो’ बोल सका था. दोस्त से मुखातिब हो कर बोला, ‘आई एम सौरी, ड्यू टु जेटलैक (टाइम जोन बदलने से होने वाली भारी थकान) आई एम फीलिंग अनवेल,’ इतना कह कर रवि सोफे में धंस सा गया. दूर सुमिदा नदी के तट पर हानाबी के धमाके कानों में गूंज रहे थे.

Emotional Story : झूठ कहा था उस ने – शादी के दिन अनीता की ऐसी क्या मजबूरी थी ?

Emotional Story : अनीता नाम बताया था उस ने. उम्र करीब 40 वर्ष, सिंपल साड़ी, लंबी चोटी, चेहरे पर कोई मेकअप नहीं. आंखों में एक अजीब सा कुतुहल जो उसे खास बनाता था.

2-4 दिनों से देख रहा हूं उसे. हमारी यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफैसर बन कर आई है और मैं अर्थशास्त्र पढ़ाता हूं. साहित्य में रुचि होने की वजह से मैं अकसर लाइब्रेरी में 1-2 घंटे बिताता हूं. वह भी अकसर वहीं बैठी दिख जाती.

एक दिन मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या आप भी साहित्य में रुचि रखती हैं?’’

‘‘जी हां, बड़ेबड़े कवियों की कविताएं और शायरी पढ़ना खासतौर पर पसंद है. मैं भी छोटीमोटी कविताएं लिख लेती हूं.’’

‘‘वाह तब तो खूब जमेगी हमारी,’’ मैं उत्साहित हो कर बोला.

उस की आंखों में भी चमक उभर आई थी. हमारी बनने लगी. अकसर हम लोग लाइब्रेरी में पुरानी किताबें निकालते और फिर घंटों चर्चा करते. व्याख्याओं के लिए लाइब्रेरी में 2 कमरे अलग थे, जिन में शीशे के दरवाजे थे, ताकि बातचीत से दूसरे डिस्टर्ब न हों.

एक दिन मैं ने सवाल दागा, ‘‘मैं ने अकसर देखा है आप घंटों यहां रुक जाती हैं. घर में पति वगैरह इतंजार…’’ मैं ने जानबूझ कर वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

वह हंस पड़ी, ‘‘नहीं, मेरे घर में पति नाम का जीव नहीं जो चाबुक ले कर मेरा इंतजार कर रहा हो.’’

‘‘चाबुक ले कर?’’ मैं हंसा.

‘‘जी हां, पति चाबुक ले कर इंतजार करे या फूल ले कर, मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं, क्योंकि मैं कुंआरी हूं.’’

‘‘कुंआरी?’’ मैं चौंका और फिर कुरसी उस के करीब खिसका ली, ‘‘यानी आप ने अब तक शादी नहीं की. मगर क्यों?’’

‘‘कभी पढ़ने का जनून रहा तो कभी पढ़ाने का… शायद एक वजह यह भी है कि आप जैसा कायदे का शख्स मुझे मिला ही नहीं.’’

‘‘तो क्या मैं आप को मिलता और प्रपोज करता तो आप मुझ से शादी कर लेतीं?’’ मैं ने शरारती लहजे में कहा.

‘‘सोचती तो जरूर,’’ उस ने भी आंखें नचाते हुए कहा.

‘‘वैसे आप को बता दूं घर में मेरा भी कोई इंतजार करने वाली नहीं.’’

‘‘क्या आप भी कुंआरे हैं.’’

‘‘कुंआरा तो नहीं पर अकेला जरूर हूं. बीवी शादी के 2 साल बाद ही एक दुर्घटना में…’’

‘‘उफ, सौरी… तो आप ने दूसरी शादी क्यों नहीं की? कोई बच्चा है?’’

‘‘हां, बेटा है. बैंगलुरु में पढ़ रहा है.

अभी तक बीवी को नहीं भूल पाया हूं,’’ कहते हुए मैं उठ खड़ा हुआ, ‘‘मेरी क्लास का समय हो रहा है. चलता हूं,’’ कह मैं चला आया.

उस पल अपनी बीवी का खयाल मुझे उद्वेलित कर गया था. मैं स्वयं को संभाल नहीं पाया था, इसलिए चला आया. मेरी संवेदनशीलता को उस ने भी महसूस किया था.

अगले दिन वह स्वयं ही मुझ से बात करने आ गई.

बोली, ‘‘आई एम सौरी…

आप वाइफ की बात करते हुए काफी इमोशनल हो गए थे.’’

‘‘हां, दरअसल मैं उस से बहुत प्यार करता था… उस के बाद बेटे को मैं ने ही संभाला. आज वह भी मुझ से दूर है तो थोड़ा दिल भर आया था.

‘‘मैं समझ सकती हूं. वैसे मुझे लग रहा है कि आप संवेदनशील होने के साथसाथ बहुत प्यारे इनसान भी हैं. मुझे इस तरह के लोग बहुत पसंद हैं.’’

‘‘ओके तो… आप मुझे लाइक करने लगी हैं,’’ उस की बात का रुख अपनी फेवर में करने का प्रयास करते हुए मैं हंस पड़ा. वह कुछ बोली नहीं. बस नजरों से स्वीकृति देती हुई मुसकरा दी.

माहौल में रोमानियत सी छा गई. मैं ने धीरे से उस का हाथ अपने हाथों में ले लिया और फिर दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे.

समान रुचि और एकजैसे हालात होने के साथसाथ एकदूसरे को पसंद करने की वजह से हम अब अकसर खाली समय साथ ही बिताने लगे थे. मैं अकसर उस के खयालों में गुम रहने लगा. न चाहते हुए भी लाइब्रेरी के चक्कर लगाता.

44 साल की उम्र में आशिकों जैसी अपनी हालत और हरकतें देख कर मुझे हंसी भी आती और मन में एक महका सा एहसास भी जगता.

कई महीने इसी तरह बीत गए. वक्त के साथ हम एकदूसरे के काफी करीब आ गए थे. वह मुझे अच्छी तरह समझने लगी थी. पर मैं अकसर सोचता कि क्या मैं भी उसे समझ पाया हूं? जब मैं उस के पास नहीं होता तो अकसर उसे गुमसुम बैठा देखता जबकि मैं उसे सदा मुसकराता देखना चाहता था.

एक दिन मैं ने उस से कह ही दिया, ‘‘अनीता, क्या तुम्हें नहीं लगता कि अब हमें शादी कर लेनी चाहिए? तुम कहो तो तुम्हारे मातापिता से मिलने आ जाऊं?’’

सुन कर वह एकटक मुझे देखने लगी. उस के चेहरे पर एक पल को उदासीनता सी फैल गई. मुझे डर लगा कि कहीं वह मेरा प्रस्ताव अस्वीकार न कर दे. पर अगले ही पल वह मुसकराती हुई बोली, ‘‘दरअसल, मेरे पापा तो बिजनैस के सिलसिले में विदेश गए हुए हैं. मम्मी अकेली मिल कर क्या करेंगी? ऐसा करते हैं कुछ दिन रुक जाते हैं. फिर तुम मेरे घर आ जाना.’’

मुझे क्या ऐतराज हो सकता था? अत: सहज स्वीकृति दे दी. उस दिन वह काफी देर तक मुझे अपने घर वालों के बारे में बताती रही. मैं आंखों में आंखें डाले उस की बातें सुनता रहा.

वह अपने पापा के काफी करीब थी. कहने लगी, ‘‘मेरे पापा मुझ पर जान छिड़कते हैं. यदि मेरी आंखों में नमी भी नजर आ जाए तो वे अपने सारे काम छोड़ कर मुझे मनाने और खुश करने में लग जाते हैं… जब तक मैं हंस न दूं उन्हें चैन नहीं मिलता.’’

‘‘अच्छा तो तुम्हारे पापा क्या बिजनैस करते हैं?’’

‘‘ऐक्सपोर्टइंपोर्ट का बिजनैस है.’’

‘‘ओके और मम्मी?’’

‘‘मम्मी हाउसवाइफ हैं. घर को इतने करीने से सजा कर रखती हैं कि तुम देख कर दंग रह जाओगे. कोई भी चीज इधर से उधर हो जाए तो समझ जाना कि उन के गुस्से से बच नहीं सकोगे.’’

‘‘अच्छा तो मुझे इस बात का खयाल रखना होगा,’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा तो वह मेरे सीने से लग गई. मैं ने देखा उस की आंखें भर आई थीं.

‘‘क्या हुआ,’’ मैं ने पूछा, पर वह कुछ नहीं बोली.

‘‘बहुत प्यार करती हो अपने पेरैंट्स से… तभी शादी का इरादा नहीं,’’ मैं ने कहा.

मेरी बात सुन कर वह हंस पड़ी, ‘‘हां शायद मैं अपने पेरैंट्स को छोड़ कर कहीं जाना ही नहीं चाहती.’’

‘‘चिंता न करो, तुम कहोगी तो हम उन्हें भी साथ ले चलेंगे… वे हमारे साथ रहेंगे. ठीक है न?’’

वह कुछ नहीं बोली. बस प्यार भरी नजरों से मुझे देखती रही. मुझे लगा जैसे उसे मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा. पर मैं ने भी अपने मन में दृढ़ फैसला कर लिया कि अनीता के मातापिता को अपने साथ रखूंगा. आखिर उस के पेरैंट्स मेरे भी तो पेरैंट्स हुए न.

पेरैंट्स के अलावा अनीता अकसर अपने भाई और भाभी का जिक्र भी करती थी. उस ने एक दिन विस्तार से सारी बात बताई कि उस का एक ही भाई है, जो उसे बेहद प्यार करता है. मगर भाभी का स्वभाव कुछ ठीक नहीं. भाभी ने शादी के बाद से भाई को अपने नियंत्रण में रखा हुआ है.

‘‘चलो, आज मैं तुम्हारे घर वालों से मिल लेता हूं,’’ एक दिन फिर मैं ने अनीता से कहा तो वह थोड़ी खामोश हो गई. फिर बोली, ‘‘कुछ महीनों के लिए पापा के साथ मम्मी भी गई हैं… वैसे मैं ने उन से तुम्हारी सारी बातें शेयर की हैं… उन्हें इस शादी से कोई ऐतराज नहीं. मैं ने उन्हें आप का फोटो भी दिखाया है… ऐसा करते हैं नितिन, मैं तुम्हारे घर वालों से मिल लेती हूं.’’

‘‘मेरा बेटा भी फिलहाल घर पर नहीं है,’’ मैं ने कहा.

‘‘यह तो बड़ी मुश्किल है. पर देखो, मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी…’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब तुम शादी की तारीख तय करो. तब तक मम्मीपापा भी आ जाएंगे.’’

‘‘हां, यह ठीक रहेगा. मगर तुम एक बार फिर सोच लो. शादी के लिए पूरी तरह तैयार हो न?’’

‘‘बिलकुल… मैं तनमनधन से आप की बनने को तैयार हूं,’’ अनीता ने हंसते हुए कहा तो मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा.

उस रात मैं बड़ी देर तक जागता रहा. अनीता ही मेरे खयालों में छाई रही. रहरह कर उस का चेहरा मेरी आंखों के सामने आ जाता. दिल में एक भय भी था कि कहीं उस के मातापिता तैयार नहीं हुए तो? भाईभाभी ने किसी बात पर ऐतराज किया तो? मगर अनीता की संशयरहित हां ने मेरी हिम्मत बढ़ाई थी. मैं ने ठीक 12 बजे अनीता को फोन किया.

‘‘अगले महीने की पहली तारीख को हम सदा के लिए एक हो जाएंगे. कैसा रहेगा?’’

‘‘बहुत अच्छा… तुम यह डेट फाइनल कर लो.’’

‘‘मगर तुम्हारे मम्मीपापा और भाई? वे लोग पहुंच तो जाएंगे न?’’

‘‘मैं उन्हें अभी बता देती हूं,’’ खुशी से चहकती हुई अनीता ने कहा तो मेरी सारी शंकाएं दूर हो गईं.

अगले ही दिन मैं ने अपने खास लोगों को शादी की सूचना दे दी. बेटे से तो यह बात बहुत पहले ही शेयर कर ली थी. वह बहुत खुश था. हम ने तय किया कि कोर्ट मैरिज कर के रिश्तेदारों को पार्टी दे देंगे.

धीरेधीरे समय गुजरता गया. शादी का दिन करीब आ गया. यूनिवर्सिटी में भी सब को इस की सूचना मिल चुकी थी. हमारे रिश्ते से सब खुश थे.

शादी से 1 सप्ताह पहले जब मैं ने अनीता से उस के घर वालों के बारे में पूछा तो वह बोली कि सब आ जाएंगे…

मैं ने अपनी सहमति दे दी. शादी का दिन भी आ गया. मेरा बेटा 4 दिन पहले आ चुका था. हम घर से सीधे कोर्ट जाने वाले थे. इसी पार्टी में मेरे और अनीता के सभी परिचितों और रिश्तेदारों को मिलना था. वैसे मेरे बहुत ज्यादा रिश्तेदार शहर में नहीं थे और शहर से बाहर के रिश्तेदारों को मैं ने बुलाया नहीं था. अनीता ने अपने रिश्तेदारों के बारे में कुछ ज्यादा नहीं बताया था.

ठीक 11 बजे हमें कोर्ट पहुंचना था. मैं 10 बजे ही पहुंच गया. 11 बज गए पर अनीता नहीं आई. फोन किया तो फोन व्यस्त मिला. मैं बेचैनी से उस का इंतजार करने लगा. करीब 12 बजे अनीता अपनी 2-3 महिला मित्रों के साथ आई. एक वृद्ध आंटी और उन का बेटा भी था. मैं अनीता को अलग ले जा कर उस के घर वालों के बारे में पूछने लगा.

वह थोड़ी घबराई हुई सी थी. बोली, ‘‘मम्मीपापा और भाई सब एकसाथ आ रहे हैं… ट्रेन लेट हो गई है. अब वे टैक्सी कर के आएंगे.’’

‘‘चलो फिर हम उन का इंतजार कर लेते हैं. मैं ने कहा तो वह खामोशी से बैठ गई. करीब 1 घंटा और गुजर गया. इस बीच अनीता ने 2-3 बार अपने घर वालों से बात की. वे रास्ते में ही थे.

‘‘नितिन अभी मम्मीपापा को आने में 2-3 घंटे और लग जाएंगे.’’

मैं ने स्थिति की गंभीरता समझते हुए उस की बात सहर्ष स्वीकार कर ली. हम ने कागजी काररवाई पूरी कर ली. एकदूसरे को वरमाला पहना कर पतिपत्नी बन गए. पर मन में कसक रह गई कि अनीता के घर वाले नहीं पहुंच पाए. अनीता भी बेचैन सी थी. 2 घंटे बीत गए. मैं ने अनीता की तरफ प्रश्नवाचक नजरों से देखा तो वह फिर फोन मिलाने लगी.

अचानक मैं ने देखा कि बात करतेकरते वह रोंआसी सी हो गई.

मैं दौड़ कर उस के पास गया, ‘‘क्या हुआ अनीता? सब ठीक तो है?’’

‘‘नहीं, कुछ भी ठीक नहीं,’’ वह परेशान स्वर में बोली, ‘‘मेरे मम्मीपापा का ऐक्सीडैंट हो गया है. वे जिस टैक्सी से आ रहे थे वह किसी गाड़ी से टकरा गई. भाई है उन के पास. वह उन्हें अस्पताल ले गया है. मैं अस्पताल हो कर आती हूं.’’

‘‘नहीं रुको, मैं भी चल रहा हूं,’’ मैं ने कहा तो वह एकदम असहज होती हुई बोली, ‘‘अरे नहीं नितिन, आप मेहमानोें को संभालो. मैं अकेली चली जाऊंगी. सब कुछ अकेले हैंडल करने की आदत है मुझे.’’

‘‘आदत है तो अच्छी बात है अनीता. पर अब मैं चलूंगा तुम्हारे साथ. मेहमानों को विजय देखा लेगा. बेटा जरा गाड़ी निकालना. हम अभी आते हैं,’’ मैं ने कहा और बेटे को सारी जिम्मेदारी सौंप अनीता के साथ निकल पड़ा.

रास्ते में अनीता बहुत गुमसुम और परेशान थी. मैं उस की स्थिति समझ रहा था.

‘‘अनीता, ऐक्सीडैंट नोएडा में हुआ है. अब बताओ कि उन्हें किस अस्पताल में दाखिल कराया गया है? हम नोएडा पहुंचने वाले हैं,’’ गाड़ी चलाते हुए मैं ने पूछा तो वह कुछ देर खामोश सी मुझे देखती रही. फिर धीरे से बोली, ‘‘सिटी अस्पताल.’’

मैं ने तेजी से गाड़ी सिटी अस्पताल की तरफ मोड़ दी.

‘‘अनीता, फोन कर के पूछो कि अब उन की तबीयत कैसी है? चोट कहांकहां लगी है? कोई सीरियस बात तो नहीं… और हां, यह भी पूछो कि उन्हें किस वार्ड में रखा गया है?’’

मेरी बात सुन कर भी वह खामोश रही. उसे परेशान देख मुझे भी बहुत दुख हो रहा था. अत: मैं भी खामोश हो गया.

गाड़ी अस्पताल तक पहुंच गई तो मैं ने फिर वही बात दोहराई, ‘‘अनीता प्लीज, अपने भाई से पूछा कि वे किस वार्ड में हैं?’’

वह खामोश रही तो मैं घबरा गया. उसे झंझोड़ता हुआ बोला, ‘‘अनीता तुम मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दे रही? बताओ अनीता क्या हुआ तुम्हें? तुम्हारे मम्मीपापा कहां हैं?’’

अचानक अनीता फूटफूट कर रो पड़ी, ‘‘कहीं नहीं हैं मेरे मम्मीपापा… कहीं नहीं हैं… मैं अकेली हूं इस दुनिया में बिलकुल अकेली. कोई नहीं है मेरा.’’

उसे रोता देख मैं घबरा गया. बोला, ‘‘यह क्या कह रही हो तुम? मम्मीपापा ठीक हो जाएंगे… चिंता न करो अनीता. मैं चल रहा हूं न तुम्हारे साथ… तुम बस बताओ, उन्हें किस वार्ड में रखा है.’’

अनीता मेरी तरफ देखती रही. फिर भीगी पलकें पोंछती हुई बोली, ‘‘मैं ने तुम से झूठ कहा था नितिन. मेरे मम्मीपापा बचपन में ही मर गए थे… कोई भाईबहन नहीं हैं. एक बूआ थीं, जिन्होंने मुझे पालापोसा. फिर वे भी इस दुनिया से चली गईं… सालों से बिलकुल अकेली जिंदगी जी रही हूं. मैं ने तुम से झूठ कहा था कि मेरा एक परिवार है… मुझे माफ कर दो प्लीज.’’

मैं हैरान सा उसे देखता रहा. फिर पूछा, ‘‘पर ऐसा करने की वजह?’’

‘‘क्योंकि मैं तुम्हें बहुत चाहती हूं नितिन. मुझे लगता था कि यदि मैं ने सच बता दिया तो तुम मुझे छोड़ कर चले जाओगे… प्लीज मुझ से नाराज न होना नितिन… आई लव यू.’’

मुझे अनीता पर कतई गुस्सा नहीं आ रहा था. उलटा उस के लिए सहानुभूति महसूस हो रही थी. अत: मैं ने कहा, ‘‘झूठी कहानियां गढ़ने की कोई जरूरत नहीं थी अनीता… मैं तो खुद अकेला हूं… तुम्हारी तकलीफ कैसे नहीं समझूंगा? और हां, मैं वादा करता हूं आज के बाद तुम्हें परिवार की कभी कमी महसूस नहीं होने दूंगा… मैं हूं न तुम्हारा परिवार… हम दोनों अकेले हैं… मिल जाएंगे तो खुद परिवार बन जाएगा.’’

अनीता के चेहरे पर विश्वास की लकीरें खिंच आई थीं. उस ने सुकून के साथ अपना सिर मेरे सीने पर टिका दिया. मैं ने गाड़ी डा. संदीप के क्लीनिक की तरफ मोड़ ली. वे मेरे सहपाठी और जानेमाने मनोचिकित्सक हैं. यदि जरूरत महसूस हुई तो वे अनीता की काउंसलिंग कर उसे नई जिंदगी की बेहतर शुरुआत के लिए पूरी तरह तैयार कर देंगे.

Box Office : ‘क्रेजी’ और ‘सुपरबौयज औफ मालेगांव’ को नहीं मिले दर्शक

Box Office : इस हफ्ते दो नई फिल्में रिलीज हुईं, कहानी व एक्सपेरिमेंट के लिहाज से काफी बेहतर मानी गई मगर दर्शक नसीब नहीं हो पाए. जानिए कौन सी फिल्म हैं और क्या कारोबार है अब तक.

फरवरी माह के अंतिम यानी कि चौथे सप्ताह, 28 फरवरी को रिलीज हुई दोनों फिल्में ‘क्रेजी’ और ‘सुपरब्वौयज औफ मालेगांव’ को दर्शक न मिलने से बौलीवुड में एक नई बहस छिड़ गई है कि अब दर्शक अच्छे कंटैंट, अच्छी कहानी वाली फिल्में देखना ही नहीं चाहता. जबकि हकीकत यह है कि इस तरह की बात करने वाले लोगों के लिए ‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा’ वाली कहावत ही फिट बैठती है. मगर इन दो फिल्मों के साथ ही तीसरे सप्ताह रिलीज हुई ‘मेरे हसबैंड की बीवी’ के उतर जाने का कुछ फायदा 14 फरवरी को रिलीज हुई ‘छावा’ को मिल गया. ‘छावा’ के निर्माता के दावे पर यकीन किया जाए तो ‘छावा’ ने तीसरे सप्ताह भर में लगभग 80 करोड़ रुपए इकट्ठा कर लिए.

सब से पहले चौथे सप्ताह, 28 फरवरी को रिलीज हुई फिल्म ‘क्रेजी’ की बात. इस फिल्म के लेखक व निर्देशक गिरीश कोहली वही शख्स हैं, जिन्होंने कभी ‘मौम’ और ‘केसरी’ फिल्में लिखी थीं. गिरीश कोहली ने इस बार लेखन के साथ निर्देशन भी कर लिया. फिल्म ‘क्रेजी’ के हीरो सोहम शाह हैं.

इस फिल्म में इस के अलावा केवल एक लड़की का अंत में 5 मिनट का किरदार है. सब से बड़ा सवाल यह है कि सोहम शाह को कितने लोग पहचानते हैं? 20 करोड़ की लागत में बनी यह फिल्म पूरे 7 दिन के अंदर बामुश्किल 6 करोड़ रुपए ही इकट्ठा कर सकी. इस में से निर्माता की जेब में केवल 2 करोड़ रुपए ही जाएंगे. इतनी बुरी तरह से फिल्म के असफल होने के लिए इस के निर्माता यानी कि सोहम शाह ही दोषी हैं.

सोहम शाह ने 2018 में हौरर फिल्म ‘तुम्बाड़’ का निर्माण व उस में अभिनय किया था. जिस ने उस वक्त बौक्स औफिस पर पानी तक नहीं मांगा था लेकिन 2024 में जब ‘तुम्बाड़ को री रिलीज किया गया तो उस वक्त हौरर फिल्मों का जमाना चल रहा था. ‘स्त्री 2’ स्फल हो चुकी थी. इस वजह से ‘तुम्बाड़’ ने री रिलीज पर अच्छे पैसे कमा लिए तो सोहम शाह को लगा कि अब ‘क्रेजी’ भी चल जाएगी.

‘क्रेजी’ हौरर जौनर की फिल्म नहीं है. दूसरी बात फिल्म एक अहम मुद्दे पर बनी है, पर यह मुद्दा फिल्म में अंतिम 10 मिनट में उभर कर आता है. हालांकि फिल्म काफी ग्रिपिंग है और अंत तक बांधे रखती है. पूरी कहानी मोबाइल पर हो रही बातचीत से उजागर होती है. कहानी के स्तर पर काफी झोलझाल व गलती है. सोहम शाह को कोई नहीं पहचानता. अपने घमंड में चूर सोहम शाह ने फिल्म को प्रचारित ही नहीं किया. केवल ट्रेलर लौंच किया गया.

फिल्म के लेखक व निर्देशक गिरीश कोहली भी मीडिया से छिपते नजर आए. ऐसे में लोगों को पता ही नहीं चला कि ‘क्रेजी’ क्या है, किस तरह की फिल्म है. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर दर्शक इस तरह की फिल्म से दूर ही रहेगा. पर यह खुद की गलती पर गौर करने की बजाय सारा ढीकारा दर्शक पर मढ़ रहे हैं.

बौलीवुड के गलियारों में चर्चा है कि फिल्म ‘क्रेजी’ ने बौक्स औफिस पर केवल एक करोड़ रुपए ही कमाए, बाकी तो निर्माता ने अपनी जेब से लगा दिए. सच तो सोहम शाह ही बेहतर बता सकते हैं.

दूसरी फिल्म फरहान अख्तर की कंपनी ‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’ निर्मित ‘‘सुपरबौयज औफ मालेगांव’ है. यह फिल्म अच्छी बनी है जब मालेगांव में फिल्म इंडस्ट्री शुरू हुई थी, तब जो मालेगांव की हालत थी, उसी हूबहू चित्रित किया गया. फिल्म में इमोशंस भी हैं. पर बात वही कि ‘जंगल में मोर नाचा किस ने देखा.’

इस फिल्म का कोई प्रचार नहीं हुआ. लोगों को पता ही नहीं लगा कि इस तरह की कोई फिल्म आ रही है. मालेगांव में एक फिल्म इंडस्ट्री पनपी थी, इस बात को फिल्म उद्योग या बौलीवुड से जुडे़ लोग ही जानते हैं. आम दर्शकों को इस के बारे में कुछ नहीं पता. इस फिल्म में लगभग सभी मेथड कलाकार हैं. मगर इस फिल्म के लेखक, निर्देशक व कलाकार में से किसी ने भी इस फिल्म का कोई प्रचार नहीं किया. परिणामतः 20 करोड़ की लागत में बनी यह फिल्म 7 दिन में दो करोड़ रुपए ही कमा सकी, इस में से निर्माता की जेब में कुछ भी नहीं जाएगा.

Artifical Intelligence : कंप्यूटर, इंटरनैट और एआई के बाद

Artifical Intelligence : कंप्यूटर जमाजोड़ करने के लिए जाने जाते थे. टैक्नोलौजी की प्रगति के साथ धीरेधीरे कंप्यूटर अब आप के द्वारा डाले गए मैसेज, लेख, शोध ग्रंथ, रिपोर्ट, इतिहास, विज्ञान, ज्योग्राफी सब पढ़ना ही नहीं सीख गए हैं बल्कि किसी भी पूछे गए सवाल पर, जो जानकारी इंटरनैट में तैर रही है उस को खंगाल कर, जवाब देने में भी सक्षम हो गए हैं. आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस इसी को संक्षेप में कहते हैं. हालांकि, कंप्यूटर वैज्ञानिकों की नजर में आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस यानी एआई के और भी बहुत से मतलब हैं.

एक आम आदमी की याददाश्त और किसी भी तरह के तथ्यों को जांचपरख कर किसी भी निर्णय पर पहुंचने की क्षमता अब आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस वाले कंप्यूटरों में लगातार बढ़ रही है और वे सारी दुनिया की किताबों का ज्ञान पढ़ सकते हैं क्योंकि लोगों ने धीरेधीरे सारी किताबों को कंप्यूटर की बाइनरी भाषा में पहले ही डाल दिया है.

आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस के टूल पासवर्डों को भेदते हुए जानकारी के गहरे स्रोतों के पीछे तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं क्योंकि उन्हें जिन लोगों ने कोड किया है उन्होंने हजारों नहीं बल्कि करोड़ों पैटर्नों की गिनती की कला कंप्टूटर को पहले से सिखा रखी है.

यह समझ लें कि जैसे एक युग में घोड़े और बैल को स्टीम इंजन ने पछाड़ कर निरर्थक साबित करने के साथ सिर्फ सजावटी बना दिया था वैसे ही मानव मस्तिष्क को गौण बनाने की क्षमता आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस में है.

जब आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस को मशीनों से जोड़ा जाएगा तो वे शायद मानवों से ज्यादा अच्छा काम कर सकेंगे क्योंकि मानव मस्तिष्क की अपनी सीमाएं होती हैं, उसे भूख भी लगती है, नींद भी आती है, वह बोर भी होता है, थकता भी है. जब मानव मस्तिष्क तेज है तो वह आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस तैयार करेगा लेकिन बाद में आराम से सोएगा.

आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस को मशीनों में डालने से वह बहुत सी बल्कि अरबों नौकरियों को खा सकता है. आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस को बनाने वाले करोड़पति, अरबपति नहीं, खरबपति हो जाएंगे. उन की कंपनियां तो अमीर होंगी ही, उन में काम करने वाले सिर्फ एक कमरे में बंद रह कर ही काफी अमीर बन जाएंगे, बड़ेबड़े उद्योगपतियों से भी ज्यादा.

दुनिया अमीरीगरीबी का जो भेदभाव देखती रही है, वह अगले सालों में उस से कहीं ज्यादा दिख सकता है पर तब गरीब भूखा न होगा, बेघर न होगा. उस को भरपूर खाना, सुविधाएं मिलेंगी, नहीं मिलेगी तो शायद स्वतंत्रताएं नहीं मिलेंगी क्योंकि उन के विरोध करने की क्षमता आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस पहले ही हड़प लेगी.

अगले साल दुनिया में एक और बदलाव होगा लेकिन उस का आम आदमीऔरत और घरपरिवार पर क्या असर पड़ेगा, फिलहाल इस पर अभी नहीं कहा जा सकता.

Illegal Immigrants : यूथ का अमेरिका में घुसना और अब भगाया जाना

Illegal Immigrants : मोबाइल कल्चर ने देश के युवा को किस तरह निकम्मा बना दिया है और किस तरह वे रील्स की जिंदगी को असली जिंदगी समझने लगे हैं, यह अमेरिका के नए खब्ती, डिक्टेटर टाइप प्रैसिडैंट डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इल्लीगल इमीग्रैंट्स को देश से निकालने की लाइन में लगे 104 इंडियन यूथ्स को इंडिया भेजने से पता चल रहा है. इन यूथ्स में 33 गुजरात के हैं, 33 हरियाणा के और 31 पंजाब के.

इन सभी यूथ ने घरवालों की जमापूंजी खर्च करा कर इल्लीगल तरीके से अमेरिका में घुसने की प्लानिंग की थी. और जब ग्राहक हो तो सप्लायर्स आ ही जाते हैं. मैनपावर का काम कर रहे ट्रैवल एजेंट युवाओं के पेरैंट्स से भारत में किस्तों में पैसे लेते रहते थे और अलगअलग देशों से होते हुए ये युवा अमेरिका में इल्लीगल तरीके से घुसेड़ दिए गए. अब पकड़े गए.

इन 104 भारतियों को हथकड़ियां पहना कर अमेरिकी मिलिट्री प्लेन से भारत लाया गया. अहमदाबाद न ले जा कर हवाई जहाज को अमृतसर में उतारा गया जहां आम आदमी पार्टी की सरकार है ताकि गुजरात मौडल की इज्जत थोड़ी बची रहे. लेकिन आज सोशल मीडिया इतना तेज है कि असली बातें नकली व लुभावनी बातों के बीच से निकल ही आती हैं. अमेरिकी मिलिट्री प्लेन के अमृतसर के हवाई अड्डे पर उतरने की रील्स सामने आईं तो सोशल मीडिया ने उन रील्स की पोल खोल दी जिन में कौंपटन जैसे शहरों में 60 फीसदी इडियंस के होने की बात बताई जाती है और अमेरिका या दूसरे देशों में इंडियन ओरिजिन के बड़ेबड़े नेताओं के होने के दावे किए जाते हैं.

यह ठीक है कि इंडियन यूथ टैलेंट में किसी से कम नहीं है पर जब कोई देश उन्हें न बुलाए तो वहां जबरदस्ती चोरीछिपे छिप जाना और पूरी वहां की पौपुलेशन में घुलमिल जाना किसी भी ढंग से सही नहीं कहा जा सकता.

वे यूथ असल में रील्र्स के दीवाने उसी तरह हैं जैसे पुराने किस्म के लोग कुंभ जैसे स्टंटस के दीवाने हैं. उन्हें लगता है कि अगर इतने लोग ऐक्सेस पा रहे हैं या कुछ कर रहे हैं तो सही ही होगा. सोशल मीडिया अपनी रिपीटीटिव कैपेसिटी से यूथ की एनालिसिस और ट्रुथ ढूंढ़ने की इंस्टिंक्ट को खत्म कर देता है.

जैसे लोग कुंभ जाते समय यह भूलते रहे कि एक दिन में 1 करोड़ लोग कैसे छोटी सी जगह में डुबकी लगा सकते हैं वैसे ही सोशल मीडिया के स्लेव भूल गए कि भारत से यूरोप या अमेरिका जाना नेपाल जाने की तरह नहीं है. वहां जाने के रस्ते में न सिर्फ बड़े सुदर बीच में हैं बल्कि होस्टाइल कंट्रोल सिस्टम भी है.

इल्लीगल इमीग्रैंट्स को बाहर निकालना डोनाल्ड ट्रंप का वैसा ही हथियार है जैसा नरेंद्र मोदी का अपने देश के मुसलिम नागरिकों को परेशान कर हिंदुओं के वोटों का अपनी पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण करना एक हथियार है. डोनाल्ड ट्रंप 7,50,000 इल्लीगल इंडियंस को भारत भेज पाएंगे, इस में शक है क्योंकि हर बार भारीभरकम सी-17 मिलिट्री प्लेन को आधा खाली भेजना आसान और कम खर्चीला नहीं है.

इन यूथ्स को बहकाने के लिए सोशल मीडिया पूरी तरह रिस्पौंसिबल है क्योंकि इस में फैक्ट और फिक्शन को इस तरह मिक्स कर दिया गया है कि पहले के धर्मभीरु लोगों की तरह आज का यूथ साइंस, टैक्नोलौजी पढ़ कर भी बेवकूफ बन कर रह गया है. होश संभालते ही वह मोबाइल का गुलाम हो जाता है और सोशल मीडिया पर वही उसे दिखता है जो फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब उसे दिखाना चाहते हैं. इन सब प्लेटफौर्मों का काम है कि देखने वालों को वही दिखाया जाए और बारबार दिखाया जाए जो वे देखना चाहते हैं.

देश से डंकी बन कर निकले यूथ्स की पहली बड़ी खेप सुर्खियां बन कर लौटी है तो शायद यूथ्स के ब्रेन में अब यह अक्ल आ जाए कि जिंदगी स्क्रीन से बाहर प्रैक्टिकली बहुत बेरहम है. चमकदमक के पीछे जो जिंदगी है वह भारत के बदबूदार, बेरोजगारी से भरे, बिखरे शहरों से कम बदतर नहीं है.

New Trend : देसी कम्युनिटी में जेनजी का शोऔफ कल्चर

New Trend : आज की पीढ़ी हर कदम पर दिखावा करने वाली है. क्या सच में दुनिया के सामने दिखावा जरूरी है? क्या आप इन ट्रैंड्स को फौलो नहीं करेंगे तो सोसाइटी आप को नकारा समझेगी? दोस्तों के सामने कूल बनने का सब से महंगा तरीका है जेनजी में शोऔफ का कल्चर.

सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में मंदिर में फूल बेचने वाली एक महिला और उस का बेटा मोबाइल स्टोर पर कैश के साथ आईफोन खरीद रहे थे. खरीदारी के बारे में पूछा गया, तो मां ने बताया कि उस का बेटा आईफोन खरीदने की जिद में तीन दिन की भूख हड़ताल पर चला गया था. वीडियो को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया, जिस पर ज्यादातर लोगों ने बेटे को अपनी मां की मेहनत की कमाई को फोन पर खर्च करने के लिए फटकार लगाई.

इस वाकेआ पर ‘घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने’ वाली कहावत बिलकुल सटीक बैठती है. और यही हाल भारत के लगभग सभी जेनजी (1998 से 2012 के बीच पैदा होने वाले) का है. आज यह पीढ़ी शोऔफ के नशे में चूर है. यह खुद को व्यक्त करने, फैशन, स्टाइल और लाइफस्टाइल को सोशल मीडिया पर दिखाने के मामले में हमेशा ऐक्टिव रहती है.

आज की यंग जेनरेशन खुद को सोसाइटी में फिट करने में जुटी पड़ी है. अपनी बराबरी, किसी हाईफाई पर्सनैलिटी से कर बैठते हैं और सोचते हैं कि काश, वे भी ऐसे बन जाएं. वे उन का लाइफस्टाइल कौपी करने की कोशिश करते हैं और ऐसे में खुद की फाइनैंशियल कंडीशन पर ध्यान न दे कर हवाबाजी करने लगते हैं.

हाल ही में मशहूर पंजाबी सिंगर दिलजीत दोसांझ और कोल्डप्ले के कौंसर्ट्स पूरे भारत में हुए. इन कौंसर्ट्स का क्रेज इतना ज्यादा था कि इस के टिकट मिनटों में बिक गए थे. बुकिंग के दौरान ‘बुक माय शो’ की वैबसाइट क्रैश हो गई और इन के टिकट की कीमतों ने हर किसी को हैरान कर दिया. टिकटों की कीमत 38 हजार रुपए से शुरू हो कर 3 लाख रुपए तक थी. इस के बावजूद लोग इसे खरीदने के लिए पागल हुए जा रहे थे. ये सब किस लिए? क्या इन कौंसर्ट्स में न जाने से उन का अस्तित्व नहीं रहेगा या सोसाइटी उन्हें अपनाएगी नहीं? इस का जवाब एक ही है कि वे सोशल मीडिया में ‘कूल’ दिखेंगे.

आज की पीढ़ी हर कदम पर दिखावा करने वाली है. क्या सच में दुनिया के सामने दिखावा जरूरी है? आज की डेट में इस सवाल का जवाब हर किसी की प्रायोरिटी पर डिपैंड करता है, क्योंकि हम एक मैटीरियलिस्टिक वर्ल्ड में रह रहे हैं. आज की पीढ़ी बहुत अलग है. ब्रैंडों पर बहुत खर्च करती है. युवा सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में रह रहे हैं.

हमें लगता है कि वे पैसा बरबाद कर रहे हैं और अगर उन्हें नौकरी के बिना कठिन समय का सामना करना पड़ा तो वे क्या करेंगे? लेकिन वे सोचते हैं कि उन्हें एक जीवन मिला है, इसलिए उन्हें हर चीज का आनंद लेना होगा. कोरोना के बाद से यंग जेनरेशन को लगता है कि पैसे से कुछ भी खरीदा जा सकता है और सोसायटी में इस का शोऔफ करने से उन्हें सैटिस्फैक्शन का एहसास होता है. सोशल स्टेटस बरकरार रखने के लिए दिखावा करना जरूरी हो गया है.

इन कारणों से जेनजी है शोऔफ में चूर-

· सोशल मीडिया का प्रभाव : जेनजी सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब आदि पर बहुत ऐक्टिव होते हैं. इन प्लेटफौर्म्स पर लोग अपनी जिंदगी के ‘बेस्ट’ मोमैंट्स साझा करते हैं, ताकि वे लाइक्स, कमैंट्स, और फौलोअर्स पा सकें. यह डिजिटल दुनिया में खुद को दिखाने और वैलिडेशन पाने का तरीका बन गया है.

· स्मार्टफोन और टैक्नोलौजी का असर : जेनजी के पास हमेशा स्मार्टफोन और इंटरनैट का एक्सेस होता है, जिस से वे हर समय अपडेट रहते हैं और नए ट्रैंड्स और फैशन से जुड़ते हैं.

· सोशल वैलिडेशन की चाह : सोशल मीडिया पर दिखावे के साथ जुड़ा हुआ एक कारण यह भी हो सकता है कि जेनजी अपने समाज में या अपने दोस्तों के बीच वैलिडेशन पाने की कोशिश करते हैं. वे दिखाते हैं कि वे ट्रैंड्स के साथ हैं या उन का जीवन ‘परफैक्ट’ है, ताकि वे दूसरों से अच्छा महसूस कर सकें.

एक दोस्त ने आईफोन लिया तो बाकियों के मन भी आ जाता है कि यह तो अब पूरे कैंपस में कूल दिखेगा और हम भौंडे. इसी होड़ में बाकी भी इस दिखावे का हिस्सा बन जाते हैं.

· इन्फ्लुएंसर कल्चर : आजकल बहुत से जेनजी लोग सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर के रूप में काम कर रहे हैं. उन के लिए दिखावा करना एक तरह से अपनी ब्रैंड को प्रमोट करने का हिस्सा बन चुका है. वे जिस तरह से अपनी जिंदगी और चीजें पेश करते हैं, वे उन के फौलोअर्स को अट्रैक्ट करने के लिए होती हैं. ऐसे इन्फ्लुएंसर लोगों को गुमराह कर के अपने फेक वर्ल्ड को प्रमोट करते हैं.

इंडियन ऐक्ट्रेस लारा दत्ता ने हाल में युवाओं को एन्करेज करते हुए एक इंटरव्यू में कहा, “मैं दुनियाभर के युवाओं को यह बताना चाहती हूं कि आप जिन इन्फ्लुएंसर को देखते हैं, जिन में हम (सैलिब्रिटीज) भी शामिल हैं, जिन का जीवन अद्भुत है, यह जरूरी नहीं कि वे चीजें हमारी हों या हम ने अपने दम पर हासिल की हों.”

बहुत सारे ऐक्टरऐक्ट्रेस हर पार्टी या इवैंट में बहुत अच्छे से सजधज कर आते हैं, डिजाइनर कपड़े पहनते हैं. वह सारा हेयर और मेकअप और शानदार गहने आदि सब उधार लिया हुआ होता है. बाद में वह सब वापस चला जाता है. इसलिए इस पर विश्वास न करें. यह रिऐलिटी नहीं है. युवा लोग शोऔफ और सोशल वैलिडेशन में फंस गए हैं. वे वह कर रहे हैं जो सोशल मीडिया उन को परोस रहा रहा है. उन्होंने युवाओं से इसे इग्नोर करने की सलाह दी है.

एक सोसाइटी में सुमित, अजय और अमन खास दोस्त हैं. तीनों कालेज में पढ़ते हैं. एक दिन सुमित ने न्यू कार ला कर अपने दरवाजे पर खड़ी कर दी. हवाबाजी मारने के लिए अपने दोनों दोस्तों को कार दिखाने के लिए बुलाया और सब के बीच कूल बन गया. उस की न्यू कार देख कर अजय ललचा गया और सोचने लगा, मैं भी पापा से बोल कर इस से अच्छी कार लूंगा. वहीं कुछ दिनों बाद अमन ने अपना बर्थडे एक क्लब में सैलिब्रेट किया. उस के बाद से अब हर साल ये तीनों दोस्त अपना बर्थडे किसी महंगे रैस्टोरैंट या क्लब में ही सैलिब्रेट करते हैं. यानी, ये अब एक तरह का ट्रैंड बन चुका है कि कोई भी पड़ोसी या दोस्त कुछ करता है तो उस के पीछे बाकी लोग भी होड़ में जुट जाते हैं, चाहे उन की जेब अलाउ करे या न.

आज जेनजी में एक तरह का ‘फोमो’, जिसे फियर औफ मिसिंग आउट कहा जाता है, पैदा हो रहा है. यह सोशल मीडिया की देन है. आएदिन एक नया ट्रैंड मार्केट में देखने को मिलता है, जैसे हाल ही में यूट्यूबर मिस्टर बीस्ट की ब्रैंड फीस्टेबल्स जब भारत में लौंच हुई तो लोग इसे खरीदने के लिए इतने पागल हुए जैसे लंगर बंट रहा हो. अगर इन के प्राइस की बात करें तो आप अपना सिर पकड़ लेंगे. इस के 35 ग्राम चौकलेट का रेट 400 रुपए है और एक आधा लिटर ड्रिंक का रेट 900 रुपय है. इस के बावजूद भारी मात्रा में यूथ ने इसे खरीदा और सोशल मीडिया पर फ्लेक्स करने से चूके नहीं. आखिरकार, खरीदा ही इसलिए था.

आजकल जेनजी अपने कैरियर, रिलेशनशिप, फैमिली प्रैशर आदि से जूझ रहा है. वेह अकसर अपने डिसीजन को ले कर कन्फ्यूज रहता है. ऐसे में उस का साथ देती है रिटेल थेरैपी. मन उदास होने पर झट से शौपिंग मौल चले गए, कुछ सामान खरीद लिया या घर बैठे ही और्डर कर दिया. इस तरह की टैक्निक उन्हें खुशी देती है. इसे ही रिटेल थेरैपी कहा जाता है.

हालांकि यह हरेक की चौइस है कि वह अपन मरजी से कुछ भी खरीदे या जितना मरजी खर्चा करे. लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि हमारी इच्छाओं का कोई अंत नहीं है. दूसरों की बराबरी या सोशल वैलिडेशन पैसे और समय दोनों की बरबादी है.

लेखिका : कुमकुम

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