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स्मार्टफोन की इन समस्याओं से आप घर बैठे पा सकते हैं छुटकारा

गूगल प्लेस्टोर से एप डाउनलोड न होना.

फोन में एप क्रैश होना.

इंटरनल मेमोरी कम होने की वजह से नई चीजें सेव करने में दिक्कत पेश आना.

फोन पुराना होने पर अक्सर यूजर को इस तरह की समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. ज्यादातर मामलों में वे फोन को ठीक कराने के लिए सर्विस सेंटर दौड़ते हैं. हालांकि सेटिंग में मामूली बदलाव करके घर बैठे भी इन समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है. ऐसे ही कुछ उपायों के बारे में जानिए.

  1. प्लेस्टोर से एप डाउनलोड न होना

बिना ‘क्लीनर’ के लंबे समय तक फोन का इस्तेमाल करने पर गूगल प्लेस्टोर में इतना कचरा जम जाता है कि नए एप डाउनलोड ही नहीं होते. इस समस्या से निजात पाने के लिए फोन को स्विच औफ कर दोबारा औन करें. इसके बाद उसकी ‘सेटिंग्स’ में जाएं. यहां देखें कि फोन में जो तारीख और समय नजर आ रहा है, वह सही है या नहीं. अगर नहीं है तो उसे ठीक करें.

फिर ‘सेटिंग्स’ में लौटकर ‘एप्स’ या ‘एप्लीकेशन मैनेजर’ के विकल्प पर क्लिक करें. इससे गूगल प्लेस्टोर का विकल्प दिखने लगेगा. उसके रास्ते ‘क्लियर कैशे’ के विकल्प पर जाएं और कैशे आइटम को डिलीट कर दें. अगर गूगल प्लेस्टोर से एप डाउनलोड करने में इसके बाद भी दिक्कत आए तो ‘एप्लीकेशन मैनेजर’ के जरिए ‘गूगल प्लेस्टोर’ पर जाकर ‘अनइंस्टौल अपडेट’ के विकल्प पर क्लिक कर दें.

इससे ‘एप्लीकेशन मैनेजर’ प्लेस्टोर के ‘फैक्ट्री वर्जन’ पर जाने की अनुमति मांगेगा. ‘ओके’ पर क्लिक कर उसे मंजूरी दे दें और गूगल प्लेस्टोर खोलें. इंटरनेट कनेक्शन ऑन करने पर प्लेस्टोर खुद अपडेट हो जाएगा. साथ ही उससे एप्लीकेशन भी पहले की तरह डाउनलोड होने लगेंगे.

प्लेस्टोर एकमात्र जरिया नहीं

एंड्रौयड फोन में एप्लीकेशन डाउनलोड करने का एकमात्र जरिया गूगल प्लेस्टोर ही नहीं है. यूजर किसी भी एप की वेबसाइट पर जाकर फोन में उसकी एपीके फाइल डाउनलोड कर सकते हैं. इससे संबंधित एप खुद ब-खुद फोन में आ जाएगा. हालांकि गूगल प्लेस्टोर के बजाय किसी वेबसाइट से एप्लीकेशन डाउनलोड करने से पहले यूजर को फोन की सेटिंग में कुछ बदलाव करने पड़ते हैं.

इसके लिए सबसे पहले ‘सेटिंग्स’ में दिए ‘प्राइवेसी’ के विकल्प पर जाएं. यहां नीचे की तरफ ‘अननोन सोर्सेज’ का विकल्प दिखेगा. उस पर क्लिक करने पर अन्य वेबसाइट से एप डाउनलोड करने की सुविधा हासिल हो जाएगी.

  1. फोन हैंग होना, इंटरनेट धीमा चलना

फोन में जितने ज्यादा एप होते हैं, कैशे आइटम (cache item) भी उतने अधिक बनते हैं. इन फाइलों की वजह से स्मार्टफोन का प्रोसेसर तो धीमा हो ही जाता है, साथ में इंटरनेट चलाने में भी दिक्कत पेश आती है. फोन और इंटरनेट की स्पीड बेहतर बनाए रखने के लिए ‘कैशे आइटम’ को समय-समय पर डिलीट करते रहना चाहिए.

इसके लिए फोन की ‘सेटिंग्स’ में दिए ‘स्टोरेज’ के विकल्प पर जाएं. उसमें ‘क्लीयर कैशे’ का विकल्प नजर आएगा. उस पर क्लिक करके कैशे आइटम को फोन से हटा दें. इसके अलावा अपने फोन की इंटरनल मेमोरी को फुल न होने दें. इससे भी इंटरनेट की स्पीड प्रभावित होती है. अतिरिक्त डाटा को क्लाउड में सेव कर लें.

गैरजरूरी एप ऐसे बंद करें

स्मार्टफोन में मौजूद अधिकतर एप्लीकेशन उसके औन होते ही चलने लगते हैं, जबकि इनमें से ज्यादातर एप की प्रोसेसिंग गैरजरूरी होती है. इसका असर न सिर्फ बैटरी पर पड़ता है, बल्कि फोन का काम भी धीमा हो जाता है.

गैरजरूरी एप को डिसेबल करने के लिए फोन की ‘सेटिंग्स’ में जाएं और वहां मौजूद ‘एप’ के विकल्प पर क्लिक करें. इसके बाद ऊपर दिए गए मेन्यू के जरिए ‘रनिंग’ का विकल्प खोलें. इसमें देख लें कि कौन-से एप काम के हैं और कौन-से गैरजरूरी. काम वाले एप पर टिक कर दें और गैरजरूरी एप को डिसेबल.

  1. नई फाइलों का सेव न होना

इंटरनल मेमोरी भरने पर अक्सर फोन में नई चीजें सहेजने में दिक्कत आती है. हालांकि यूजर चाहें तो क्लाउड स्टोरेज में औटो बैकअप बनाकर, कैशे आइटम को डिलीट करके और कुछ एप व डाटा को एसडी कार्ड में ट्रांसफर करके इंटरनल मेमोरी में जगह खाली रख सकते हैं.

एसडी कार्ड में करें ट्रांसफर

फोन की इंटरनल मेमोरी भरने पर फोटो, वीडियो और अन्य डाटा को एसडी कार्ड में ट्रांसफर किया जा सकता है. इसके लिए फोन की ‘सेटिंग्स’ में दिए ‘स्टोरेज’ के विकल्प पर जाएं. यहां नीचे की तरफ ‘मूव मीडिया’ का विकल्प नजर आएगा. उस पर क्लिक करके फोन मेमोरी में मौजूद वीडियो, फोटो और गानों को एसडी कार्ड में ट्रांसफर कर सकते हैं.

क्लाउड स्टोरेज में औटो सेव

इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए भी फोन की ‘सेटिंग्स’ में जाएं. यहां ‘बैकअप एंड रीसेट’ का विकल्प मिलेगा. इसे चुनने पर ‘बैकअप माई डाटा’ और ‘ऑटोमेटिक रीस्टोर’ के विकल्प नजर आएंगे. दोनों पर क्लिक कर दें. फिर ‘सेटिंग्स’ पर लौटें. वहां गूगल अकाउंट पर एप डाटा और फोटो, वीडियो व औडियो फाइल का बैकअप बनाने का विकल्प मिलेगा. इस पर क्लिक करने के बाद डाटा अपने आप गूगल ड्राइव में सेव होने लगेगा.

नौकरी चली गई है तो न हों परेशान, PF अकाउंट चलाएगा आपका खर्च

आजकल प्राइवेट सेक्टर में नौकरी को लेकर अनिश्चतता बढ़ गई है. ऐसे में अगर किसी भी वजह से आपकी नौकरी चली जाती है और आपको तुरंत नई नौकरी नहीं मिलती है. तो आपको जरूरी खर्च के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है.

अब आपका प्रौविडेंट फंड अकाउंट बेरोजगारी में आपका खर्च चलाएगा. यानी आपको पीएफ अकाउंट से जरूरतें पूरी करने के लिए पैसे भी मिल जाएगा और आपका पीएफ अकाउंट भी बना रहेगा.

नौकरी जाने पर एक माह में निकाल सकेंगे पीएफ का 75 फीसदी पैसा

पीएफ विड्राअल के नए नियम के तहत अगर किसी मेंबर की नौकरी चली जाती है तो वह 1 माह के बाद पीएफ अकाउंट से 75 फीसदी पैसा निकाल सकता है. इससे वह बेरोजगारी के दौरान अपनी जरूरतें पूरी कर सकता है.

इस तरह से मेंबर पीएफ अकाउंट  से पैसा भी निकाल सकता है और उसके अकाउंट में 25 फीसदी रकम बचेगी. नई नौकरी मिलने पर उसके पीएफ अकाउंट में कंट्रीब्यूशन फिर से शुरू हो जाएगा.

पहले पैसा निकालने पर बंद हो जाता था पीएफ अकाउंट

पहले के नियमों के तहत अगर कोई मेंबर 2 माह तक बेराजगार रहता था तो वह अपने पीएफ का पैसा निकाल सकता था. हालांकि उस समय मेंबर को पीएफ से पूरा पैसा निकालना पड़ता था. इसके बाद उसका पीएफ अकाउंट बंद हो जाता था. इससे नई नौकरी मिलने पर मेंबर को नया पीएफ अकाउंट खुलवाना पड़ता था.

ईपीएफओ ने क्यों लिया यह फैसला

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ईपीएफओ का कहना है कि मेंबर्स को नौकरी चली जाने पर जरूरी खर्च के लिए पीएफ से पैसा निकालना पड़ता था. आंशिक विड्राअल की सुविधा न होने के कारण मेंबर्स को पीएफ से पूरा पैसा निकालना पड़ता था. भले ही उसे पूरे पैसे की जरूरत न हो. इस तरह से उसका पीएफ अकाउंट बंद हो जाता था. मेंबर्स को इससे नुकसान हो रहा था. और इसकी वजह से उसके पीएफ अकाउंट में इतना पैसा जमा जमा हो पाता था जो उसके रिटायरमेंट के बाद की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो.

EPFO ने लिया था निर्णय

जून में हुई इम्‍प्‍लायज प्रोविडेंड फंड और्गनाइजेशन (EPFO) के सेंट्रल बोर्ड औफ ट्रस्‍टी की बैठक में यह फैसला लिया गया था. 6 दिसंबर को लेबर मिनिस्ट्री ने इस संदर्भ में अधिसूचना जारी कर दी है.

रोजगार मिलने के बाद चालू हो जाएगा अकाउंट

75 फीसदी पैसा निकालने के बाद ईपीएफओ में अकाउंट रहना एक बड़ी सुविधा है, जिसे रोजगार मिलने के बाद फिर से चालू किया जा सकता है.

60 फीसदी का था प्रस्‍ताव

हालांकि पहले यह प्रस्‍ताव रखा गया था कि बेरोजगार होने पर एक माह बाद 60 फीसदी राशि निकालने की इजाजत दी जाए, लेकिन सीबीटी ने यह लिमिट बढ़ा कर 75 फीसदी कर दी.

अहम बात मोदी का डर खत्म होना है

हिन्दी पट्टी के जिन तीन अहम राज्यों में कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने शपथ ली, उनमें कल तक नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलना किसी ईश निंदा से कम नहीं माना जाता था. इन्हीं राज्यों से साल 2013 से मोदी लहर शुरू हुई थी जो 2014 में एक आंधी में तब्दील हो गई थी. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो सालों बाद कांग्रेसी सरकारें हैं और लोग खुलकर बोलने लगे हैं. लोकतंत्र के असल माने भी यही हैं कि जनता अपनी बात बिना किसी डर के कहे, लेकिन हो यह रहा था कि किसी की हिम्मत नरेंद्र मोदी के बेतुके फैसलों पर भी अपनी राय या प्रतिक्रिया देने तक की नहीं पड़ रही थी.

नोट बंदी के फैसले पर जिसने करोड़ों लोगों को परेशान कर दिया और लाखों को बेरोजगार कर दिया कोई कुछ नहीं बोला था. मोदी भक्तों ने इसे दूरगामी नतीजे देने वाला प्रचारित किया था, यह वह वक्त था जब लोग मन ही मन सुलग रहे थे. इस आक्रोश को आंदोलन में तब्दील होने से रोकने खुद नरेंद्र मोदी मंच से रो दिये थे. इस पर भावुक जनता ने उन्हें माफ कर दिया था और तमाम बातों विवादों और बहसों के बीच आई गई हो गई थी.

भगवा खेमे ने इस घटना से कोई सबक सीखने के बजाय यह मान लिया था कि ब्रांड मोदी का मैजिक बरकरार है और नरेंद्र मोदी एक विकल्पहीन नेता हैं. कई भाजपाइयों ने तो उन्हें अवतार और भगवान तक कहना शुरू कर दिया था. अब तक मोदी भक्तों की खासी फौज भी तैयार हो गई थी, जो यह बताती रहती थी कि सही मानों में भारतीय या हिन्दू प्रधानमंत्री तो पहली बार मिला है जो देश की तकदीर और तस्वीर बदलकर रख देगा, जरुरत उसे सहयोग देने और उसकी हां में हां मिलाते रहने की है.

पांच फीसदी कट्टर हिंदुओं का यह वर्ग मीडिया और सोशल मीडिया पर अभी भी सक्रिय है जो बाकी 95 फीसदी भारतीयों को आगाह कर रहा है कि अब अगर 2019 में मोदी को पीएम नहीं बनाया तो इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं होगा और हिन्दू धर्म व जाति दोनों मिट जाएंगे. यह वर्ग दरअसल में महत्वपूर्ण है जिसका प्रचार तंत्र और तरीका बेहद आक्रामक और खौफनाक भी है. यह कहता है कि पैसा चला जाये तो कोई गम नहीं, लेकिन पैसा बचाने की शर्त पर धर्म को लुप्त नहीं होने देंगे. हैरत की बात यह कि इन सनातनी लोगों को धर्म की रक्षा के लिए सिर्फ मोदी ही चाहिए कोई और नहीं.

जीएसटी महंगाई और मोब लिंचिंग जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दों पर खामोश रहने वाले इन कट्टरवादियों की आंखे तीन राज्यों के नतीजों ने खोल दी हैं कि सवर्णवाद का अल्पकालीन दौर जा रहा है और लोगों के दिलोदिमाग से नरेंद्र मोदी का खौफ लिहाज या सम्मान जो भी कह समझ लें खत्म हो रहा है. क्योंकि लोकतांत्रिक लिहाज से वे काफी कमजोर साबित हो रहे हैं. हर कोई मानने लगा है कि हिन्दी पट्टी की 280 में से अगर 100 लोकसभा सीटें भी भाजपा ले जाये तो बात बहुत बड़ी होगी.

अक्सर मौजूदा विश्लेषण ही आखिरी नतीजा होता है यह बात भी तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों से उजागर हुई है जिनमें भाजपा के खारिज होने की अटकलें चुनावी सुगबुगाहट के साथ ही लगना शुरू हो गई थीं, इस लिहाज से तो भाजपा की राह काफी मुश्किल है. लोग खुला माहौल चाहते हैं और उसकी कीमत अदा करने भी तैयार हैं. सार ये कि देश पांच फीसदी कट्टरवादियों के हाथ से छुड़ाकर 95 फीसदी उन लोगों के हाथ में देना चाहते हैं जो धर्म को एच्छिक मानते हैं थोपते नहीं. ये लोग मानते हैं कि पूजा पाठ, राम मंदिर निर्माण, जातिवाद, भेदभाव और मूर्तिवाद से तरक्की नहीं हो सकती.

अब यह भाजपा और नरेंद्र मोदी के समझने की बात और बारी है कि वे क्या फैसला लेते हैं जिनके पास वक्त कम है और काम ज्यादा हैं.

निर्देशक रेमो डिसूजा ने उठाया देश को आग से बचाने का जिम्मा

कुछ वर्ष पहले नृत्य निर्देशक से निर्देशक बने रेमो डिसूजा की फिल्म ‘‘ए बी सी डी’’ की शूटिंग मुंबई स्थित फिल्मसिटी स्टूडियो के अंदर ‘रिलायंस स्टूडियो’ के सेट पर चल रही थी. सेट पर फिल्म की युनिट के सदस्य, जूनियर आर्टिस्ट व डांसर्स को मिलाकर हजारों लोग मौजूद थे.

इसी दौरान अचानक शौर्ट सर्किट के चलते आग लग गयी. इन सबके बीच रेमो डिसूजा व उनके साथी किसी तरह सभी को सेट से बाहर निकालने में कामयाब रहे. मगर फायर ब्रिगेड के पहुंचने से पहले ही पूरा सेट जलकर राख हो गया था.

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इस कारण तकरीबन एक करोड़ रूपए का नुकसान हुआ था. और एक माह तक शूटिंग भी रूकी रही थी. उस वक्त रेमो डिसूजा चाहकर भी सेट पर लगी आग बुझाने के लिए कुछ नही कर पाए थे. मगर अब रेमो डिसूजा ने ‘‘ब्रांड्स डैडी’’ के रोशन मिश्रा के साथ मिलकर पूरे भारत को आग की दुर्घटना से सुरक्षित बनाने का बीड़ा उठाया है.

इस ‘औटो फायर बौल’ की खासियत यह है कि अगर कहीं आग लग जाए, तो इस बौल को आग में फेंक दीजिए, बौल में मौजूद केमिकल से चंद सेकंड में ही आग बुझ जाएगी.

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वास्तव में ‘‘ब्रांड्स डैडी’’ कंपनी के रोशन मिश्रा ने लगभग छह माह पहले आग को कुछ सेकंड के अंदर ही बुझाने के नए उपकरण के रूप में इस बौल का इजाद किया था, जिसे उन्होने ‘औटो फायर बौल’ नाम दिया. आग बुझाने वाले इस बौल का वीडियो एक चैनल पर देखकर रेमो डिसूजा काफी प्रभावित हुए और उन्होने इसके वीडियो को अपने इंस्टाग्राम पेज पर पोस्ट कर दिया. कुछ समय बाद रेमो डिसूजा के इंस्टाग्राम पेज पर इस वीडियो को देखकर ‘ब्रांड्स डैडी’ के रोशन मिश्रा ने रेमो डिसूजा से मुलाकात की.

फिर दोनों ने मिलकर इसके माध्यम से पूरे देश को आग से सुरक्षित बनाने के लिए एक मुहीम चलाने का निर्णय लेकर हाथ मिला लिया. इसी मुहीम को गति देने के लिए हाल ही में रेमो डिसूजा ने ‘‘ब्रांड्स डैडी’’ के रोशन मिश्रा के साथ मिलकर मुंबई के पांच सितारा होटल जे डब्लू मैरिएट में ‘‘औटो फायर बौल’’ के लोकार्पण का भव्य समारोह आयोजित किया, जहां पत्रकारों के साथ ही कुछ आम नागरिकों को भी निमंत्रित किया गया था.

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इस अवसर पर रेमो डिसूजा ने पत्रकारों से कहा – ‘‘मेरी फिल्म एबीसीडी की शूटिंग के दौरान सेट पर आग लग गई थी. उस वक्त सेट पर जूनियर कलाकार, डांसर्स व युनिट के सदस्यों को मिलाकर करीबन एक हजार लोग मौजूद थे, हम सभी को सुरक्षित बचाने में कामयाब हुए थे. लेकिन फायर ब्रिगेड के आने तक पूरा सेट जल चुका था. यदि उस वक्त सेट पर यह ‘औटो फायर बौल’ होता, तो शायद हम आग पर जल्दी काबू पा सकते थे. मैंने खुद इस बौल के साथ डेमो वाला वीडियो फिल्माया है. इस बौल में कुछ ऐसी गैस हैं, जो आग को ठंडा कर देती हैं. जैसे ही आग में इस बौल को फेंका जाता है, वैसे ही यह बौल खुदबखुद फट जाता है. इसे घर के अंदर, कार के अंदर या बाइक में भी रखा जा सकता है और कहींं भी किसी भी चीज में आग लगने पर चंद सेकंड में उस आग को बुझाया जा सकता है. इस ‘औटो फायर बौल’ का वजन महज एक किलो 300 ग्राम है. इसका उपयोग करने के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की जरूरत नही है. पांच साल का बच्चा भी इसका इस्तेमाल कर आग बुझा सकता है.

इसलिए मैंने इस बौल को आम लोगों तक पहुंचाने व इसे एक मुहीम बनाने के लिए अपनी फिल्म के नाम के अनुरूप ही इसे नाम दिया है – ‘एनी बडी कैन डील फायर’. यानी कि कोई भी आग पर काबू पा सकता है.’’

इस अवसर पर ‘‘ब्रांड्स डैडी’’ के रोशन मिश्रा ने कहा – ‘‘ हाल के दिनों में देखें, तो सिर्फ मुंबई में आग लगने की हजारों घटनाएं सामने आई हैं. इन घटनाओं में आग से मुंबई के आम नागरिकों के साथ साथ फायर ब्रिग्रेड के कई जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. ज्यादातर मामलों में कारण लोगों को आग पर काबू पाने की जानकारी न होना और मुंबई के भयानक ट्रैफिक के चलते फायर बिग्रेड का समय से न पहुंच पाना है. ऐसे में यह ‘औटो फायर बौल’ आग पर काबू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.’’

‘‘औटो फायर बौल’’ की कीमत पांच हजार रुपए है. और इस बौल की पांच वर्ष की गारंटी है. मगर रेमो डिसूजा ने इस मुहीम से जुड़कर एक नई योजना शुरू करायी है. इसके तहत पांच हजार रुपए में इस ‘औटो फायर बौल’ को खरीदने के बाद यदि पांच वर्ष तक इसका उपयोग नहीं किया गया, तो पांच वर्ष बाद यह बौल कंपनी को वापस करके उसके बदले में कंपनी से नया बौल मुफ्त में लिया जा सकेगा, जोकि अगले पांच वर्ष के लिए होगा. यह प्रक्रिया सतत चलती रहेगी.

पाकिस्तान के सबसे बड़े फिल्म फेस्टिवल में क्या कर रहा है बौलीवुड?

भारत और पाकिस्तान में एक ही फिल्मी जबान बोली जाती है और दर्शक भी दोनों तरफ का सिनेमा पसंद करते हैं. लेकिन आपसी संबंधों की कडवाहट के चलते कई भारतीय फिल्में वहां बैन हो जाती हैं जबकि मुंबई से कुछ पाकिस्तानी कलाकारों को कड़वे अनुभव से गुजरना पड़ा. बावजूद इसके दोनों देशों एक फिल्म मेकर्स आपसी संबंधों को सुधारने के क्रम अपनी तरफ से छोटी मोटी पहल करते रहते हैं.

इसी पहल का नतीजा है कि पाकिस्तान फिल्म फेस्टिवल में कई भारतीय फिल्मी हस्तियां बतौर चीफ गेस्ट शामिल हो रही हैं. बता दें कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा फिल्म त्योहार, एआरवाई फिल्म फेस्टिवल अगले साल 25 से 28 जनवरी तक कराची में आयोजित किया जाएगा.

बौलीवुड के पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माताओं राहुल मित्रा और तिग्मांशु धुलिया के साथ लोकप्रिय अभिनेता संजय मिश्रा को इस फिल्मोत्सव में ‘गेस्ट ऑफ औनर’ दिया जाएगा. पाकिस्तान के सबसे बड़ा सेटेलाइट टीवी नेटवर्क एआरवाई डिजिटल नेटवर्क, जिसे 100 देशों में देखा जाता है, ही एआरवाई फिल्म फेस्टिवल का आयोजन कर रहा है.

इस महोत्सव का उद्देश्य युवाओं और फिल्म निर्माण के प्रति उत्साही लोगों को साथ एक साथ लाने और कला के रूप में उन्हें अपना जुनून दिखाने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करना है. यह एक एक मंच होगा, जहां फिल्म और मीडिया उद्योग के प्रसिद्ध हस्तियों के साथ प्रतिभागी अपना ज्ञान और अनुभव साझा कर पाएंगे, जिससे पाकिस्तानी सिनेमा और स्थानीय फिल्म निर्माताओं को प्रोत्साहन मिलेगा.

इस मौके पर बौलीवुड के सेलिब्रिटीज के कई मंचों पर अपनी बातरखने और अपने पाकिस्तानी समकक्षों से बातचीत करने की उम्मीद है. बौलीवुड की इस तिकड़ी के साथ दिल्ली दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के राम किशोर पारचा भी होंगे.

उल्लेखनीय है कि फिलहाल तिग्मांशु धुलिया बतौर एक्टर अपनी अगली रिलीज होने वाली फिल्म ‘जीरो’ को लेकर भी चर्चा में, जिसमें उन्होंने शाहरुख खान के पिता की भूमिका निभाई है, जबकि मार्च में उनके निर्देशन से सजी फिल्म ‘मिलन टौकीज’ भी रिलीज होने के लिए तैयार है.

वहीं, निर्माता राहुल मित्रा फिलहाल संजय दत्त, नरगिस फाखरी, राहुल देव अभिनीत अपनी अगली बड़ी फिल्म ‘टोरबाज’ को खत्म करने में जुटे हैं, जिसमें मित्रा भी एक अफगान सेना जनरल की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

बहरहाल पाकिस्तान में इस तरह के फेस्टिवल का आयोजन वहां के कलाकारों के लिए भी प्रोत्साहन का मंच होगा क्योंकि वहां भी सिनेमा को कट्टरपंथी सोच से लड़ना पड़ता है और इस तरह के फेस्टिवल मंच मंच के जरिये काफी फिल्म मेकर्स को हौसला मिलता है. दुनिया भर के कला के लोग जमा होते हैं और सकरी मुलाजिम भी. अब ऐसे में उम्मीद तो यही करनी चाहिए कि भारत में इस तरह के फेस्टिवल में पाक कलाकारों को बायकौट करने के बजाए उनका स्वागत किया जाए.

दूसरी शादी, जाति की आजादी

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर की बात है. एक बिजनैसमैन के बेटे अनूप की शादी तय हो रही थी. परिवार ने लड़की की जातिबिरादरी और दहेज में  क्याक्या मिलेगा, इस सब की छानबीन कर ली थी. लड़का डाक्टर था. जहां वह नौकरी कर रहा था वहीं काम कर रही एक नर्स सरला से उस का प्रेमसंबंध चल रहा था. सरला और अनूप ने शादी करने का मन बना रखा था.

घर वालों के दबाव में आ कर अनूप ने उन की पसंद की लड़की ज्योति से शादी की बात मान ली थी. ज्योति गोरखपुर की रहने वाली थी, इसलिए शादी के लिए वह परिवार सहित कानपुर ही आ गई थी. जिस दिन अनूप और ज्योति की शादी होने वाली थी उसी दिन अनूप की प्रेमिका सरला भी वहां आ गई और पंडाल पर पहुंच कर हंगामा करने लगी. यह देख कर ज्योति और उस के घर वालों ने शादी करने से इनकार कर दिया. तब अनूप को शादी सरला के साथ ही करनी पड़ी. अनूप के घर वालों ने सरला से उस की जाति के बारे में कोई सवाल भी नहीं किया.

प्रदेश की नौकरशाही और राजनीति में दखल रखने वाले लोगों को ही लें, तो लगेगा कि दूसरी शादी में जाति का सवाल नहीं उठता है. एक बड़े अफसर हैं, उन की शादी जब पढ़ रहे थे तब उन की ही जाति की एक लड़की के साथ हुई थी. उस समय उन की आयु 20 और पत्नी की

18 साल रही होगी. पति तो पढ़लिख कर आगे बढ़ता गया, लेकिन पत्नी घरेलू कामकाज और बच्चों में फंस गई. दोनों के रहनसहन में भी बदलाव आ गया. पत्नी अब पति के मुकाबले कहीं ठहर नहीं पा रही थी.

अफसर बन गए पति के पास पैसों की कमी नहीं थी. उन्होंने लखनऊ में पत्नी के लिए एक बड़ा मकान बनवा दिया और उसे बच्चों के साथ रहने दिया. खुद वे एक पिछड़ी जाति की कम उम्र महिला के साथ दूसरे जिले में रहने लगे. जब उन के बेटे और बेटी की शादी हो गई तो ऊंची जाति के इस अफसर ने पिछड़ी जाति की इस महिला से शादी कर ली.

हर तबके में बदलाव

समाज के एक और प्रतिष्ठित आदमी का मामला यों है. इन का ताल्लुक एक बड़े घराने से है. कम उम्र में ही इन की शादी अपनी ही बिरादरी की ऊंची हैसियत वाली लड़की से हो गई. समय के साथसाथ दोनों के बीच 2 बच्चे भी पैदा हुए. बच्चे बड़े हो गए और होस्टल में पढ़ने लगे. मांबाप अकेले हो गए. इन के बीच तनाव बढ़ गया. तनाव लगातार बढ़ता गया और समय ऐसा भी आया कि दोनों अलगअलग रहने लगे. घरपरिवार के लोगों ने दोनों के बीच सुलह करने की काफी कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी. बच्चे अपनी मां को ही दोष देने लगे.

इस बीच, एक गैरबिरादरी की महिला का परिवार में आना हुआ. इस महिला ने पति का दिल तो जीत ही लिया था, कुछ ही दिनों में बच्चे और दूसरे परिचित भी उस के प्रशंसक हो गए. पति ने पहली पत्नी को तलाक दिया और गैरबिरादरी वाली दूसरी महिला को पत्नी बना कर घर में रख लिया. घरपरिवार और बच्चों ने किसी प्रकार के जाति और धर्म की बात नहीं की.

इसी तरह का एक मामला पिछड़ी जाति के एक बड़े नेता का है. इन का विवाह भी कम उम्र में अपनी बिरादरी की लड़की के साथ हो गया था. काफी समय तक दोनों के बीच अच्छे संबंध रहे. इन के बच्चे भी हुए. कुछ साल पहले ये अपनी गांव वाली पत्नी को छोड़ कर चले आए और शहर में सवर्ण बिरादरी की एक महिला को अपने घर में रख लिया.

भले ही लोगों के सामने इन दोनों लोगों ने शादी न की हो, लेकिन वह पत्नी की तरह रह रही है. ऐसे मामले समाज के हर वर्ग में मिल सकते हैं. समाज में रूढि़वादिता के चलते भले ही लोग गैरबिरादरी को सही न मानते हों, लेकिन जब दूसरी शादी करने का मौका आता है तो कोई भी आदमी बिरादरी की बात नहीं करता. इस के कारणों की जब पड़ताल की गई तो कई बातें सामने आईं.

खत्म होता समाज का दबाव

पहली शादी के समय लड़का परिवार के दबाव में होता है. इसलिए गैरबिरादरी में शादी करने की बात वह सोच ही नहीं सकता. जब दूसरी शादी वह करता है तब तक वह सामाजिक व आर्थिकरूप से मजबूत हो जाता है.

उसे समाज की परवा नहीं रहती है. ऊपर जिन नेता और अधिकारी का जिक्र किया गया है वे समाज के सम्मानित वर्ग का हिस्सा हैं. उन के साथ बैठ कर हर आदमी को अच्छा लगता है, इसलिए उन के काम की कोई आलोचना नहीं करता. आज वे अपनेअपने जातीय व सामाजिक संगठनों में जाते हैं, उन्हें सम्मान सहित बैठाया जाता है. उन से कोई नहीं पूछता कि  तुम ने गैरबिरादरी में शादी क्यों की है.

दूसरी शादी में पहले प्यार होता है और फिर शादी की बात आती है. इसलिए जाति का मामला सामने नहीं आता है.

समाजसेवी ब्रजेंद्र राय कहते हैं, ‘‘यह एक आम बात है कि दूसरी पत्नी में जाति की बात नहीं उठती है. मेरे गांव में एक ऊंची जाति के बड़े आदमी रहते थे. उन की पहली शादी के लिए पंडितों ने गुणवान लड़की को तलाश करने के लिए पूरा जोर लगा दिया. लड़की मिली जो गुणवान नजर आ रही थी.

‘‘शादी के कुछ समय बाद ही लड़ाईझगड़ा शुरू हो गया. परेशान हो कर पति ने गांव के बाहर एक छोटा सा घर बना कर रहना शुरू कर दिया. इस बीच एक औरत उस के करीब आई जो निचली जाति से ताल्लुक रखती थी. यह औरत एक दिन दूसरी पत्नी का हक पा गई. गांव के लोगों ने कोई विरोध नहीं किया.’’

जाति नहीं, जरूरी है समझदारी

शादी की सफलता  लिए जातिबिरादरी जैसी चीज की जरूरत नहीं होती है. पतिपत्नी को इस बात की समझ होनी चाहिए कि शादी के बाद किस तरह जीवन जिया जाता है. परेशानी की बात यह है कि जातिबिरादरी और धर्म के लोग युवाओं को जिंदगी कैसे जीनी है, यह नहीं सिखाते.

वे चाहते हैं कि पतिपत्नी किसी न किसी तरह लड़ाईझगड़े में उलझे रहें. पतिपत्नी की लड़ाई के चलते ही धर्म की दुकानदारी चलती है. पतिपत्नी के बीच लड़ाई होने पर सब से पहले लोग पुजारी, साधुसंत या तांत्रिक के पास जाते हैं. इन में से ज्यादातर लोग पतिपत्नी के बीच लड़ाई का फायदा उठाते हैं. कुछ तांत्रिक तो इस झगड़े की आड़ में औरत के साथ शारीरिक संबंध भी बना लेते हैं. पिछले कुछ सालों में इस तरह के तमाम मामले सामने आए हैं.

पतिपत्नी के बीच का झगड़ा सुलझाने के लिए थाने और कचहरी में भी भीड़ लगी हुई है. जो पैसा मेहनत कर के कमाया जाता है वह पतिपत्नी द्वारा अपनी लड़ाई लड़ने में लुटाया जा रहा है. इस के बाद भी दोनों को किसी तरह का कोई आराम नहीं मिलता है. सरकार कानून बना कर इस तरह के झगड़ों को सुलझाने की कोशिश करती है, लेकिन इस से परेशानी और बढ़ जाती है.

कितना कारगर है कानून

रीता नामक एक महिला का अपने पति विवेक के साथ मनमुटाव हो गया. उस ने यह बात अपने घर में बताई. घर के लोगों ने पारिवारिक अदालत की शरण में जाने की सलाह दी. रीता ने वैसा ही किया. पति विवेक को नोटिस भेज दिया गया. यह बात उसे बुरी लगी. उस ने पारिवारिक अदालत की लड़ाई तो लड़ ली, लेकिन पत्नी को कभी अपनाने की बात नहीं मानी. वह कहता है, ‘‘मैं ने उस दिन ही फैसला कर लिया था कि अपनी पत्नी को नहीं अपनाऊंगा जिस दिन अदालत का नोटिस आया था.’’

किसी भी तरह के कानून के सहारे पतिपत्नी के बीच समझौता नहीं कराया जा सकता. जरूरत इस बात की है कि दोनों को जिंदगी बसर करने का तरीका सिखाया जाए. दूसरी शादी का मामला बहुत कम ही तलाक तक जाता है.

वकील प्रेमप्रकाश सक्सेना कहते हैं, ‘‘मैं ने जितने भी दूसरे विवाह अदालत में कराए हैं, किसी में भी बिरादरी की बात सामने नहीं आई. दूसरी शादी को पहले समाज और कानून अच्छी नजरों से नहीं देखते थे, लेकिन अब उस के प्रति नजरिया बदल रहा है.’’

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्त्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि दूसरी पत्नी भी गुजारे की हकदार है. इस तरह कई मामलों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि जाति का सवाल दूसरी शादी में कोई माने नहीं रखता. दूसरी शादियों में ज्यादातर मामले गैरबिरादी के ही होते हैं.

कैरामल कस्टर्ड

सामग्री

– 1/2 कप चीनी

– 3 अंडे फेंटे हुए

– 1/3 कप चीनी

– 1 1/2 छोटे चम्मच वैनिला

– 2 कप दूध उबला

– जायफल

– गार्निशिंग के लिए मिंट स्प्रिंग.

विधि

– एक भारी तले वाले बरतन में चीनी डाल उसे कम हीट पर ओवन में सुनहरा होने तक पिघलाएं.

– फिर सीरप को 4 मोल्ड्स में भर कर ओवन में 10 मिनट हार्ड होने के लिए रखें.

– एक मीडियम बाउल में अंडे, चीनी, वैनिला ऐसैंस और जायफल डाल कर अच्छी तरह मिलाएं.

– इस मिक्स्चर को छलनी से छान कर मोल्ड्स में तीन चौथाई भरें. फिर ओवन रैक पर रैक्टैंगुलर पैन ले कर उस में भरे मोल्ड्स रखें. (पैन में गरम पानी डालें).

– फिर उसे तब तक पकाएं जब तक कि उस में से चाकू आसानी से बाहर न निकल जाए. फिर स्पैचुला की मदद से कस्टर्ड को किनारों से बाहर निकालें और मोल्ड के ऊपर प्लेट रख उस पर डिश को पलटें.

– अब तैयार कैरामल सीरप को सौस की तरह कस्टर्ड के किनारों पर डाल कर मिंट स्प्रिंग से गार्निश कर सर्व करें.

दिल के मरीज ठंड में रहें सावधान

सर्दी में दिल के मरीजों के लिए जोखिम काफी बढ़ जाता है. कई चिकित्सकों का मानना है कि इस दौरान दिल का दौरा पड़ने के ज्यादा मामले सामने आते हैं. खास तौर पर सुबह में क्योंकि उस वक्त रक्त वाहिकाएं सिम्पेथेटिक ओवर एक्टिविटी के कारण संकुचित होती हैं. वहीं अगर वातावरण में धुआं हो तो जोखिम दोगुना हो जाता है. चिकित्सकों के मुताबिक, सर्दियों में हवा की धीमी गति और हवा में नमी के स्तर बढ़ जाती है. इस कारण हवा की स्थिति खराब हो जाती है, क्योंकि प्रदूषक तत्व हवा में बने रहेंगे और इधर-उधर फैल नहीं पाते.

एक अध्ययन के मुताबिक, वायु और धुंए का मिश्रण सेहत का सबसे ज्यादा नुकसान करते हैं. धुएं और धुंध के इस मिश्रण को स्मौग कहते हैं. स्मौग दिल के दौरे का महत्वपूर्ण कारण है. इस दौरान दिल के मरीजों के लिए जान का खतरा बढ़ जाता है.

जानकारों का माने तो स्मौग से होने वाले नुकसानों में आंखों में लालिमा, खांसी या गले में जलन, सांस लेने में कठिनाई प्रमुख है. स्मौग से तीव्र अस्थमा के दौरे पड़ सकते हैं, साथ ही यह दिल के दौरे, स्ट्रोक, एरिदमिया को भी बढ़ा सकता है. बच्चे, वृद्ध, मधुमेह, हृदय और फेफड़ों की बीमारियों वाले रोगी विशेष रूप से स्मौग के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति संवेदनशील होते हैं और इसलिए खुद को बचाने के लिए इन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए.

एक्ने से छुटकारा पाने के लिए लगाएं सौल्ट स्क्रब

सौल्‍ट स्क्रब, एक्‍ने की समस्‍या को ठीक करने के लिये बहुत ही अच्‍छा माना जाता है. आप सौल्‍ट को अपने चेहरे को साफ करने के लिये इस्तेमाल कर सकती हैं. अगर आपको एक्‍ने से छुटकारा पाना है तो हमारे बताए गए इन तरीको का इस्‍तमाल करें.

साल्‍ट स्क्रब

नहाने के बाद एक बूंद एप्सेम साल्‍ट और स्क्रब को अपनी हथे‍ली में ले कर चेहरे पर लगाएं. इसे गोलाई में लगाएं जिससे स्‍किन से डेड स्‍किन साफ हो जाए और पोर खुल जाएं. अगर नाक के पास ज्‍यादा ब्‍लैकहेड्स हैं तो वहां पर हल्‍के हल्‍के रगड़िये. आप इस सौल्‍ट स्क्रब को हफ्ते में एक या दो बार प्रयोग कर सकती हैं.

सौल्‍ट एंड औयल स्क्रब

अपनी स्‍किन को साफ करने के लिये सौल्‍ट में कुछ अच्‍छे किसम के तेल जैसे, लेवेंडर, पिपरमिंट या रोजमेरी का तेल मिलाइये. इसे महीने में केवल एक बार ही प्रयोग कीजिये. ऐसा करने से आपके चेहरे के पिंपल गायब होने लगेगे.

एप्सेम सौल्‍ट एंड क्‍लीजिंग मिल्‍क

अगर आपकी स्‍किन ड्राई है तो एप्सेम सौल्‍ट में क्‍लीजिंग मिल्‍क मिला दीजिये. क्‍लीजिंग मिल्‍क से चेहरे में नमी आएगी और रैश भी नहीं पडे़गे. अगर ड्राई स्‍किन पर एप्सेम सौल्‍ट का प्रयोग अकेले ही किया जाए तो इससे रैशेज पडने की संभावना होती है. इसलिये हमेशा बॉडी लोशन या क्‍लीजिंग मिल्‍क डाल कर ही प्रयोग करें.

शहद और एप्सेम सौल्‍ट स्क्रब

यह स्क्रब सन टैनिंग और एक्‍ने को एक साथ कम करने में सहायक होती है. शहद स्‍किन को लाइट करता है और नमी पहुंचार कर एक्‍ने से राहत दिलाता है. आप चाहें तो इसमें दही को मिला कर फेस मास्‍क भी तैयार कर सकती हैं.

एप्सेम सौल्‍ट एंड लेमन स्क्रब

यह एक प्रभावी स्क्रब है जो कि मिनट भर में तैयार हो जाता है. नींबू की कुछ बूंद सौल्‍ट स्क्रब में डालें और चेहरे को स्क्रब करें. इससे पिंपल, डेड स्‍किन और ब्‍लैकहेड तथा वाइटहेड आसानी से साफ हो जाता है.

मंजिल (भाग-6) : और फिर जो पुरवा के साथ हुआ

पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

सुहास की बहन श्वेता को देखने लड़के वाले आते हैं. इंजीनियर लड़के गौरव से श्वेता का विवाह तय हो जाता है. मिठाई  के डब्बे के साथ बहन की सगाई का निमंत्रण ले कर सुहास सहाय साहब के घर जाता है. घर पर बीमार सहाय साहब का हालचाल पूछने उन के मित्र आए होते हैं. सहाय साहब सुहास की तारीफ करते हुए सब को बताते हैं कि वह उस के लिए मोटरपार्ट्स की दुकान खुलवा रहे हैं. सुहास अपनी तारीफ सुन कर खुश होता है.

श्वेता की सगाई पर आए सहाय साहब के परिवार से मकरंद वर्मा परिवार के सभी सदस्य उत्साहपूर्वक मिलते हैं. दोनों परिवार वाले सुहास और पुरवा के रिश्ते से खुश थे.

समय तेजी से गुजरता रहा. सुहास व्यापार शुरू कर देता है, लेकिन कई बार काम के लिए बंध कर बैठना उस के लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि किसी भी जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था.

अंतत: श्वेता के विवाह का दिन आ जाता है. उस दिन पुरवा का सजाधजा रूप देख कर सुहास दीवाना हो जाता है. पुरवा से शीघ्र विवाह करने के लिए सुहास दुकान पर मन लगा कर काम करने लगता है. यह सब देख सहाय साहब खुश थे. आखिरकार वह एक दिन वर्मा साहब के घर पुरवा का रिश्ता ले कर पहुंच जाते हैं. सभी की मौजूदगी और खुशी से पुरवासुहास का रिश्ता पक्का हो जाता है और शीघ्र ही धूमधाम से विवाह हो जाता है.

सुहागसेज पर दोनों हजारों सपने संजोते हैं और हनीमून पर ऊटी जाते हैं. वापस आने पर घर में सब उन का स्वागत करते हैं. इधर श्वेता से बात करने पर पुरवा को पता चलता है कि बड़े परिवार के कारण वह ससुराल में नाखुश है. उधर अपनी व्यवहारकुशलता से पुरवा ससुराल में जल्द ही सब से घुलमिल जाती है.

पुरवा महसूस कर रही थी कि सुहास का ध्यान समाजसेवा में अधिक रहता है. वह दूसरों की मदद के लिए दुकान पर भी ध्यान न देता.

एक दिन श्वेता ससुराल से लड़झगड़ कर मायके आती है. पुरवा के समझाने पर वह उलटा पुरवा को ही सुहास द्वारा कुछ न कमाने का ताना देती है. यह बात सच थी इसीलिए पुरवा सब चुपचाप सुन लेती है लेकिन अब उस के दिमाग में श्वेता के शब्द गूंज रहे थे.

अब आगे…

श्वेता तो अपने मम्मीपापा के बहुत समझानेबुझाने पर वापस ससुराल चली गई पर पुरवा का मन अशांत कर गई थी. ऊपर से वह निरंतर ठीकठाक दिखने का प्रयास कर रही थी पर मन के तहखाने में चुपके से कोई विषैला जंतु जैसे घुस कर बैठ गया था.

अपनेआप से पुरवा तर्कवितर्क करती कि क्या श्वेता ने सच कहा था? मन उत्तर देता, नहीं, वह अलग रहने की बात सोच भी नहीं सकती. अपने मम्मीपापा के घर में भी उसे नितांत अकेलापन लगता था. इसीलिए यहां की हलचल उसे अच्छी लगती है. ऐसे में अलग रहने की बात वह कभी नहीं सोच सकती थी, पर दंश तो श्वेता की दूसरी बात का चुभा था.

सुहास क्या सचमुच पैसा कमाना नहीं चाहता है? क्या इसीलिए समाजसेवा का बहाना कर के इधरउधर भागता रहता है? इतने दिनों में एक बार भी तो उस ने अपनी कमाई रकम का कुछ भी हिस्सा पुरवा के हाथों में नहीं रखा. कहता है सारी कमाई व्यापार बढ़ाने में जा रही है, तो क्या सदा वह अपने पिता के पैसे के सहारे ही जीवन व्यतीत करेगा?

वह बारबार अपने को समझाती थी कि यह सब व्यर्थ की बातें नहीं सोचे, पर मन है जो बारबार समझाने पर भी स्थिर होना ही नहीं चाहता है.

इसी ऊहापोह में एक दिन वह सुहास से कह बैठी, ‘‘सब के पति माह की पहली तारीख को अपनी पत्नी के हाथ पर अपनी आय रखते हैं पर तुम ने अभी तक मुझे कुछ भी नहीं दिया.’’

सुहास ने पहले तो उसे ध्यान से देखा फिर हंस कर बोला, ‘‘मैं ने अपनेआप को ही तुम्हारे कदमों में रख दिया है फिर रुपएपैसे की क्या औकात है.’’

‘‘तुम मजाक के मूड में हो पर मैं गंभीर हूं. सुहास, हर पत्नी की यह चाहत होती है कि उस का पति उसे गृहलक्ष्मी समझ कर अपनी आय का कुछ अंश तो अवश्य सौंपे.’’

‘‘लगता है कि श्वेता की बात को तुम दिल से लगा बैठी हो,’’ सुहास भी अचानक गंभीर हो उठा.

‘‘चाहे यह सच हो पर विचारणीय भी है,’’ पुरवा ने कहा.

सुहास ने पत्नी को मनाने के उद्देश्य से बहुत प्यार से उस के गाल थपथपा दिए और बोला, ‘‘देखो, पुरवा, यह शौक मुझे भी है कि मैं अपनी पत्नी को अपनी सारी कमाई दूं पर अभी इतनी आय तो है नहीं और जो आय है वह किराए में, नौकर के वेतन में और नया माल लाने में चली जाती है. कुछ अधिक आय होगी तब मैं फैक्टरी भी डालना चाहूंगा,’’ सुहास ने उसे प्यार से बांहों में भर लिया, ‘‘क्या तुम सदा एक दुकानदार की पत्नी बनी रहना पसंद करोगी?’’

पुरवा उस की बात समझ गई थी, धीरे से बोली, ‘‘मैं सब समझ गई हूं पर सुहास, यहां मां से अपने खर्च के लिए रुपए लेते भी मुझे शर्म आती है.’’

‘‘मां से कैसी शर्म. मुझे भी तो वही अभी तक जेबखर्च देती रही हैं. मेरी मम्मी बहुत अच्छी हैं, इन सब बातों में अपना मन खराब मत करो,’’ सुहास ने समझाया.

अचानक पुरवा बोली, ‘‘सुनो, सुहास, मुझे नौकरी मिल सकती है, अंध महाविद्यालय में एक जगह खाली है. बस, यही होगा कि फिर मुझे नियम से जाना पड़ेगा,’’  पुरवा ने सुहास को और मां को अपने खर्च से बचाने का सुझाव सा दिया.

सुहास फिर गंभीर हो उठा और बोला, ‘‘मम्मी से बात करनी पड़ेगी तभी बताएंगे.’’

कई दिनों से मां सुहास से कह रही थीं कि पुरवा को कहीं घुमा लाए या सिनेमा दिखा लाए. पुरवा को महसूस हो रहा था कि कुछ दिनों से मां कुछ अधिक ही उस का ध्यान रख रही हैं. कहीं इसलिए तो नहीं कि उस ने नौकरी की बात कर के उन के सम्मान को ठेस पहुंचाई है.

सोमवार को दुकान बंद रहती थी इसीलिए वह सारा दिन सुहास ने पुरवा के नाम लिख दिया था. सुबह ही कह दिया था कि आज का दिन वह घर से बाहर पुरवा के साथ ही व्यतीत करेगा. पुरवा को भी घूमने का यह प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा था. इसीलिए अपनी साडि़यां खोल कर उस ने सुहास से पूछा, ‘‘सुहास, मैं कौन सी साड़ी पहनूं?’’

सुहास उसी समय नहा कर आया था. तौलिया पलंग पर फेंक कर पुरवा को बांहों में भर लिया और बोला, ‘‘तुम्हारे ऊपर तो सभी कुछ खिलता है. कुछ भी पहन लो.’’

‘‘नहीं, तुम जो बताओगे वही पहनूंगी,’’ पुरवा ने जिद की तो सुहास ने एक नारंगी रंग की साड़ी पर हाथ रख दिया फिर बोला, ‘‘आज एक नई साड़ी भी खरीद लेना.’’

‘‘क्यों?’’ पुरवा ने उस की पसंद की साड़ी अलग करते हुए कहा, ‘‘बहुत साडि़यां हैं, क्या होगा और ले कर.’’

सुहास ने फिर अपनी नाक उस के गालों पर रगड़ते हुए हंस कर कहा, ‘‘क्योंकि हर अच्छे पति और प्रेमी को अपनी पत्नी को हमेशा अच्छीअच्छी भेंट देते रहना चाहिए.’’

‘‘ताकि उस की पत्नी, पति की किसी भी गलत बात पर उंगली न उठाए,’’ पुरवा ने मुसकराते हुए शरारत से कहा.

सुहास कुछ कहने ही जा रहा था कि द्वार पर दस्तक हुई और बेला अंदर आ गई.

‘‘अरे, भाभी आप,’’ सुहास जो लगातार पुरवा को छेड़ रहा था, लजा कर बोला. पुरवा भी झेंप कर अलग हो गई.

‘‘आइए, भाभीजी,’’ पुरवा ने अपनी साडि़यां समेटते हुए कहा.

बेला पलंग पर ही बैठ गई. बहुत थकीथकी सी लग रही थी पर हंसते हुए बोली, ‘‘लगता है कहीं जाने का कार्यक्रम है?’’

‘‘हां भाभी, आज इसे बहुत दिनों बाद घुमाने ले जाने का कार्यक्रम है,’’ सुहास बोला, ‘‘और आप सुनाइए. घर पर सब ठीक- ठाक है न?’’

बेला कुछ संकोच में भर उठी, जैसे सोच रही हो कि कहे या न कहे, बोली, ‘‘हां, ठीक ही हैं.’’

‘‘मैं चाय लाती हूं,’’ पुरवा अचानक कमरे से बाहर चली गई. जाने क्यों बेला को देखते ही उसे लगा था कि अब वह कहीं नहीं जा पाएगी, इसीलिए चाय का बहाना कर के बाहर चली गई थी.

सुहास ने फिर कहा, ‘‘भाभी, लगता है कुछ परेशानी है.’’

‘‘नहीं सुहास, हमारे यहां तो कुछ न कुछ चलता ही रहता है. मैं तो बस, मिलने ही आई थी,’’ बेला का उन दोनों के कार्यक्रम में खलल डालने का कोई विचार नहीं था.

सुहास, बेला के निकट बैठ गया और उस की हथेली प्यार से अपनी हथेलियों में थाम कर बोला, ‘‘भाभी, शादी हो जाने से क्या मैं इतना पराया हो गया हूं कि आप अपनी परेशानी मुझ से छिपा रही हैं.’’

‘‘नहीं सुहास, तुम सब का तो हमें बहुत सहारा है,’’ बेला बोली.

‘‘तो बताइए न भाभी. आप भी बहुत कमजोर सी लग रही हैं.’’

बेला अचानक रोंआसी हो उठी. बोली, ‘‘भैया, बात यह है कि एक सप्ताह पहले मां को मैं अपने पास ले आई थी. तब तो ठीकठाक थीं. तुम्हारे भाई साहब को टूर पर जाना था सो 2 दिन पहले वह चले गए.’’

‘‘अच्छा. आजकल मैं जल्दी पहुंच नहीं पाता हूं तो पता ही नहीं चला,’’ सुहास बोला, ‘‘फिर क्या हुआ, भाभी?’’

बेला की घबराहट स्पष्ट दिखाई दे रही थी. बोली, ‘‘कल रात मां की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई. उन्हें अस्पताल में भरती किया तो पता चला कि अपेंडिक्स है और आपरेशन करना पड़ेगा.’’

‘‘अरे, आप रात ही फोन कर देतीं,’’ सुहास ने दोबारा सांत्वना देने के लिए बेला की हथेलियां थाम लीं.

‘‘नहीं भैया, हर समय आप को कष्ट देना अच्छा नहीं लगता है. बस, इतना कर दो कि कुछ रुपए का प्रबंध करवा दो. आज बैंक की भी हड़ताल है. आपरेशन के लिए पैसे जमा करवाने हैं.’’

‘‘वह तो सब हो जाएगा, भाभी,’’ सुहास ने कहा. तभी पुरवा चाय ले कर आ गई. पुरवा को देखते ही सुहास ने बेला की हथेलियों की पकड़ छोड़ दी. बेला अनायास ही संकोच से भर उठी थी. पुरवा को कुछ अच्छा नहीं लगा था पर अपने मन को संयत रखते हुए उस ने कहा, ‘‘क्या बात है भाभीजी, आप बहुत परेशान हैं.’’

बेला के बोलने से पहले ही सुहास बोला, ‘‘हां पुरवा, हमें अभी भाभी के साथ जाना होगा. भाई साहब टूर पर गए हैं और भाभी की मां का आपरेशन है.’’

‘‘नहींनहीं, सुहास भैया,’’ बेला पुरवा के चेहरे को देख कर कुछ घबरा सी गई, ‘‘तुम पुरवा के साथ घूमने का कार्यक्रम मत बिगाड़ो. हमें तो बस, रुपए की समस्या आ पड़ी है.’’

‘‘वह भी हो जाएगा भाभी, अभी मम्मी से कह कर लाता हूं पर आपरेशन के समय किसी पुरुष का होना भी बहुत जरूरी है,’’ वह निश्ंिचत हो कर उठ खड़ा हुआ और पुरवा की तरफ देख कर बोला, ‘‘भाभी, हमारी पुरवा बहुत समझदार है. उस के साथ का कार्यक्रम फिर किसी दिन बन जाएगा.’’

पुरवा शांत भाव से खड़ी रही. उसे कुछ कहनेसुनने का अवसर ही कहां दिया था सुहास ने. उस ने संयत स्वर में बेला को चाय देते हुए कहा, ‘‘आप हमारे कार्यक्रम की चिंता मत कीजिए, लीजिए, चाय पी कर ताजा हो लीजिए, तब तक ये रुपए ले कर आ जाएंगे.’’

बेला उस की इन बातों से कुछ संतुष्ट दिखी. थोड़ी देर में दोनों ही चले गए और पुरवा अपनी साडि़यां संभालती वहीं खड़ी रह गई. तभी मां वहां पर आ गईं. पुरवा को उदास देख कर धीरे से बोलीं, ‘‘किसी को मुसीबत में देख नहीं सकता है वह. इनसानियत का तकाजा भी यही था बेटा. तुम तैयार हो जाओ, आज हम दोनों शौपिंग के लिए जाएंगे.’’

‘‘लेकिन मुझे कुछ खरीदना नहीं है, मम्मीजी,’’ पुरवा ने उदासी से कहा.

‘‘लेकिन मुझे तो बहुत कुछ खरीदना है. तैयार हो जाओ, मैं ड्राइवर को गाड़ी निकालने को कहती हूं.’’

मां कमरे से बाहर चली गईं और उदास पुरवा फिर से एक साड़ी खींचने लगी.

कई दिनों तक सुहास बहुत व्यस्त रहा. उसे अपनी दुकान पर जाने का समय भी कम ही मिलता था. पुरवा एकांत में अकसर सोचती थी कि अभी तो हमारे विवाह को कुछ ही महीने गुजरे हैं. सुहास के पास कोई नौकरी भी नहीं है, व्यापार में भी उस का मन नहीं लगता है, फिर भी मेरे लिए उस के पास समय नहीं है.

व्यथित हृदय जाने किनकिन दिशाओं में विचरण करता रहता है. पुरवा का मन भी बहुत भटकने लगा था. कभी सोचती कि सुहास भी तो उन्हीं पतियों की तरह नहीं है जो पत्नी को बस, एक जरूरत की वस्तु मानते हैं पर सुहास जब भी उस के निकट होता तो मन फिर उमंगों से भर उठता. अपनी उलटीसीधी सोच पर स्वयं ही उसे पछतावा भी होता.

उस दिन मां ने बाजार में उस से पूछपूछ कर बहुत सी वस्तुएं उस के लिए खरीद दी थीं. साडि़यां, मेकअप का सामान और कई तरह के इत्र. पुरवा को वह सब पा कर बहुत खुश होना चाहिए था पर वैसा हुआ नहीं. उसे बराबर लगता रहा कि यह सब उसे बहलाने का प्रयास है या शायद सुहास की कमी पर परदा डाला जा रहा है. फिर स्वयं ही चौंक उठती, यह क्या होता जा रहा है उसे. सुहास को उस ने सबकुछ जानतेबूझते प्यार किया है और अब उस में कमी खोजने बैठ जाती है. आखिर, एक दिन उस ने सुहास से फिर कहा, ‘‘मैं नौकरी करना चाहती हूं.’’

सुहास कुछ देर अनसुनी करता रहा, फिर पुरवा ने कुछ क्रोध से कहा, ‘‘सुहास, मैं इतनी देर से तुम से कुछ कह रही हूं.’’

‘‘बहुत फालतू सी बात कह रही हो. मम्मा और पापा नहीं मानेंगे, यह तुम जान चुकी हो,’’ सुहास ने यह बातें जिस ढंग से कही थीं उस से पुरवा एक पल को स्तंभित रह गई. उस आवाज में प्रेमी सुहास का स्वर नहीं था, बल्कि एक पति का दर्प बोल रहा था. सुहास ने ही आगे कहा, ‘‘तुम लगातार यह दिखाना चाहती हो कि हम लोग तुम्हारा खर्च नहीं उठा पा रहे हैं, इसलिए तुम खुद नौकरी कर के अपना जेबखर्च निकालोगी.’’

‘‘यह गलत है. मैं बस, तब तक नौकरी करना चाहती हूं जब तक तुम अपने व्यापार में जम नहीं जाते,’’ पुरवा ने दृढ़ शब्दों में कहा.

‘‘यानी कि तुम मेरी सहायता करना चाहती हो, तो फिर मम्मी और पापा का क्या, जो हर समय मुझे सहायता करना चाहते हैं.’’

‘‘काश, तुम अपने इस सहारे पर लज्जा महसूस करते और अपनी जिम्मेदारी को पहचान पाते,’’ पुरवा ने भी क्रोध में कहा.

‘‘औरत का चरित्र पहचानना बहुत ही कठिन है,’’ सुहास कुछ खीज से बोला, ‘‘अपने मातापिता से सहायता लेने में कैसा आदर्शवाद. ऐसा दंभ पालने का मैं शौकीन नहीं हूं.’’

सुहास कमरे से बाहर चला गया और पुरवा परेशान सी उसे देखती रह गई. यह पति के साथ उस की पहली झड़प थी. उस का मन बहुत व्याकुल हो उठा. यह अचानक जो हो गया, क्या उस ने इतनी गलत बात कह दी थी, इसलिए ऐसा हो गया.

वह सोच में डूब गई. आजकल तो सभी स्त्रियां नौकरी करती हैं. कोई बुरा नहीं मानता तो सुहास क्यों इतना परेशान हो जाता है. मानव जीवन में स्वाभिमान का भी कुछ महत्त्व होता है. यह क्या रस्मों की जंजीरों से जकड़ने की बात होती है. और स्वाभिमान व घमंड तो एकदम अलगअलग भावनाएं हैं.

उस दिन पुरवा दिन भर बहुत व्याकुल रही. सुहास बिना बताए ही कहीं चला गया था. मां ने खाने के समय दुकान पर फोन किया पर वह वहां भी नहीं था. मां ने परिहास करते हुए कहा, ‘‘लग गया होगा कहीं जगत सेवा में. उस का सब से बड़ा शौक तो यही है.’’

पुरवा को जाने क्यों वह परिहास अच्छा नहीं लगा. मन में अनजाने ही एक प्रश्न उभरा, ‘यह शौक है या जीवन के उत्तरदायित्व से दूर भागने का बहाना,’ पर ऊपर से वह शांत रही.

शाम को अचानक ही श्वेता आ गई. गौरव भी साथ में था, दोनों बहुत प्रसन्न लग रहे थे. श्वेता हंसहंस कर बता रही थी कि वह दोनों एक लंबे ट्रिप पर सिंगापुर जा रहे हैं. गौरव को आफिस की तरफ से जाना है और वह श्वेता को भी घुमाने के विचार से ले जा रहा है.

श्वेता को खुश देख कर सभी संतुष्ट थे. बहुत दिनों बाद श्वेता को सब ने इस तरह से हंसतेबोलते देखा था. उस की प्रसन्नता देख कर पुरवा भी अपनी उदासी भूल गई थी. एकांत में मिलते ही पुरवा ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘आज तो हमारी ननद रानी एकदम आकाश में उड़ रही हैं.’’

‘‘हां भाभी, मैं बहुत खुश हूं. आप ने मुझे बहुत अच्छी सीख दी थी. जानती हैं भाभी, सिंगापुर मैं किस तरह जा पा रही हूं.’’

श्वेता की इस खुशी में भी पुरवा को शंका सी कौंध गई थी फिर भी धैर्य से बोली, ‘‘सुनूं तो जरा कि कैसे जा पा रही हो.’’

‘‘हाय भाभी, मेरी सास बहुत अच्छी हैं,’’ श्वेता पुरवा के गले लग गई.

‘‘सास तो मेरी भी बहुत अच्छी हैं,’’ पुरवा ने सहर्ष कहा. श्वेता की खुशी सहज ही है, यह पुरवा जान चुकी थी.

श्वेता पलंग के ऊपर पालथी मार कर बैठ गई और बोली, ‘‘ये मुझे ले थोड़े ही जा रहे थे. वह तो मम्मीजी ने इन से जोर दे कर कहा कि इतना अच्छा मौका है, उसे भी घुमा कर लाओ.’’

पुरवा मुसकरा दी, बोली, ‘‘मां तो मां ही होती हैं, चाहे वह सास का रूप ले लें या मां ही हों. जानती हो श्वेता, तुम्हारे भैया जब बहुत दिनों तक मुझे कहीं घुमाने नहीं ले जाते हैं तब मम्मीजी स्वयं ही मुझे अपने साथ बाहर ले जाती हैं.’’

‘‘हां भाभी, ऐसा ही होता है. अब मैं भी सोचती हूं, यदि सब साथ नहीं होते और ये मुझे कभी पूछना कम कर देते तो कौन इन्हें इन के कर्तव्य की याद दिलाता.’’

पुरवा हंस दी. सोचने लगी, पता नहीं यहां पर मम्मी व पापा सुहास को उस की जिम्मेदारियों के प्रति कितना सतर्क करते हैं कितना नहीं. पर पत्नी होने के नाते यदि वह सुहास का संबल बनना चाहती है तो उसे घर की मर्यादा की डोर से वह क्यों बांधना चाहता है.

कई दिनों से पुरवा का मन बहुत खराब सा हो रहा था. न कुछ खाने की इच्छा होती थी न कुछ काम करने की. समय मिलते ही निढाल हो कर पड़ जाती थी. सुहास ने 1-2 बार पूछा, ‘‘क्या बात है, हरदम उदास बनी रहती हो.’’

पुरवा का मन हुआ कि कहे, हमारे प्यार का मौसम जो इतनी जल्दी बीत गया तो अब उदास तो रहना ही है, पर कहा कुछ नहीं. सुहास ने ही पुन: कहा, ‘‘कुछ दिन को तुम अपने मम्मीपापा के पास क्यों नहीं हो आतीं, मन बदल जाएगा.’’

तभी मां कमरे में आ गईं और बोलीं, ‘‘सुहास, तुम्हें पुरवा के लिए बिलकुल समय नहीं मिलता है, यह अच्छी बात नहीं है.’’

‘‘देखती तो हैं मम्मी, कितना व्यस्त रहता हूं.’’

‘‘कहां व्यस्त रहता है, यही तो पूछ रही हूं. दुकान पर तो अकसर गायब ही रहता है,’’ मां के स्वर में झुंझलाहट थी जो पुरवा को अच्छी लगी.

सुहास मां की बात पर हंस दिया और बोला, ‘‘अब मम्मा, इतनी जल्दी आदतें थोड़े ही बदल जाती हैं. मेरे पड़ोसी दुकानदार सूर्यभानजी को दिल का दौरा पड़ा था, अस्पताल में हैं, उन के लिए भी समय निकालना पड़ता है न.’’

‘‘क्यों, तुम्हारे सिवा उन का और कोई नहीं है जो उन की व उन की दुकान की देखभाल कर सके.’’

मां के स्वर की तल्खी पुरवा पहली बार सुन रही थी. वह जानती है कि सुहास दया का सागर है, पर कई बार अनावश्यक दया भी नई मुसीबतों को जन्म दे जाती है. मां ने ही आगे कहा, ‘‘उन के 2 बेटे हैं, नौकरचाकर हैं, 3 भाई हैं, तुम्हें लगातार अपनी दुकान छोड़ वहीं जमे रहने की क्या जरूरत है?’’

‘‘सौरी, मम्मा,’’ सुहास मां को मनाने का उपक्रम करने लगा, ‘‘अभी जाता हूं न, सीधा दुकान पर ही जाऊंगा.’’

‘‘चलो, नाश्ता कर लो,’’ मां ने दोनों को आदेश दिया और कमरे से बाहर निकल गईं.

नाश्ते की मेज पर एक हादसा और हो गया. पुरवा ने जैसे ही आमलेट का पहला टुकड़ा मुंह में रखा, उस का जी मिचलाने लगा. उस ने कांटा चुपचाप प्लेट में रख कर दलिया का डोंगा अपनी तरफ खींचा तो मां का ध्यान उधर चला गया. बोलीं, ‘‘क्या हुआ पुरवा, आमलेट अच्छा नहीं है?’’

पुरवा ने कुछ परेशानी से उन की तरफ देखा और बोली, ‘‘पता नहीं मम्मीजी, इसे खा कर जी सा मिचला रहा है.’’

मां ने बहुत ध्यान से पुरवा को देखा. तब तक पुरवा एक चम्मच दलिया खा चुकी थी, पर दलिया खा कर भी उसे उबकाई महसूस हुई तो वह सीधा वाश- बेसिन की ओर भागी.

मां ने अर्थपूर्ण दृष्टि सुहास पर टिका दी और मुसकरा कर बोलीं, ‘‘सुहास, दुकान पर बाद में जाना, पुरवा को पहले डाक्टर के पास ले जाओ.’’

‘‘लेकिन उसे क्या हुआ, अच्छीभली तो है,’’ सुहास टोस्ट कुतरते हुए बोला.

‘‘कुछ खाया नहीं जा रहा है उस से. देखो तो जा कर, शायद उलटी आई है उसे,’’ मां ने सुहास को उठने पर जोर दिया और मजाक के स्वर में बोलीं, ‘‘सारी सेवा बाहर वालों की ही नहीं की जाती है, घर के लोगों के लिए भी कभी भागदौड़ करनी पड़ती है.’’

सुहास परेशान सा वाशबेसिन की ओर बढ़ गया और मां ने वर्मा साहब से मुसकराते हुए कहा, ‘‘बधाई हो आप को, घर में शायद नया मेहमान आने वाला है.’’

सुहास जब से पुरवा को डाक्टर के पास से दिखा कर लाया था तब से ही जानपहचान वालों में उत्साह सा फैल गया था. पुरवा को बहुत आश्चर्य भी हो रहा था कि इतनी जल्दी बाहर वालों को कैसे पता चल गया कि वह गर्भवती है.

सब नातेरिश्तेदार एक के बाद एक कर घर आ रहे थे और मिठाई का शोर मचा रहे थे. कोई कहता, ‘‘आंटी, खाली मिठाई नहीं चलेगी, हमें तो पूरी दावत चाहिए.’’

कोई कहता, ‘‘मिसेज वर्मा, एक बात है. साल के अंदर ही पोता आने वाला है. यह बहुत शुभ शगुन है. बड़ी भाग्यशाली है आप की बहू.’’

पुरवा सोच में डूब जाती, इस में भाग्यशाली होने की क्या बात है, जिन्हें कुछ वर्षों के बाद होता है, भाग्यशाली तो वह ही होते हैं. यह क्या कि जीवन अभी शुरू हुआ और ठीक से संभलना भी नहीं आया कि जिम्मेदारी सिर पर आ पड़ी.

सब से आश्चर्यजनक बात तो पुरवा को तब सुनने में आई जब उस के मम्मी और पापा फलमिठाई ले कर आए. मम्मी प्रसन्नता से फूली नहीं समा रही थीं. मां से वे अत्यंत गद्गद भाव से कह रही थीं, ‘‘बहनजी, हमारे यहां तो इस तरह की खुशी पहली बार हो रही है. एक बेटा रहा नहीं, दूसरा विदेश में बैठा है. जाहिर है, पुरवा की शादी के बाद अब पहली बार ही हम नानानानी बनने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे.’’

‘‘आप ठीक कह रही हैं मिसेज सहाय, हम तो पहले भी दादादादी बन चुके हैं पर फिर भी सुहास छोटा बेटा है. लाडला भी बहुत रहा है, तो इस की खुशी भी कम नहीं है,’’ मां ने भी उत्साह से कहा.

पापा और मम्मी का उत्साह देख कर पुरवा को भी अपने अंदर एक विचित्र सी प्रसन्नता की अनुभूति हो रही थी. तभी मम्मी ने एकदम नई सी बात सुनाई. मां से बोलीं, ‘‘आप को क्या बताऊं मिसेज वर्मा. हमारे एक जानपहचान वाले के यहां उन की बेटी का विवाह है. जब से उन्हें पता चला कि पुरवा गर्भवती है, वह बारबार कहती हैं, ‘बहनजी, आप की बेटी के विवाह में जो हलवाई बैठा था, वही हमें चाहिए. कितना भाग्यवान है वह कि जिस बेटी की शादी में मिठाइयां बनाईं वही बेटी साल के अंदर ही मां बनने वाली है,’’’ सुहास इस बात पर बहुत जोर से हंसा था और पुरवा इस बात पर हैरान भी थी और खुश भी हो रही थी. सुहास ने तभी पुरवा के कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘मेहनत किसी की और भाग्यवान कोई और कहला रहा है.’’

‘‘हिश…’’ पुरवा लजा कर उठ गई. जब मम्मीपापा एकांत में मिले तो उस ने पूछा, ‘‘आप सब को यह इतनी जल्दी पता कैसे चल गया?’’

पापा मंदमंद मुसकराने लगे. मम्मी ने हंस कर कहा, ‘‘तुम्हें यह भी नहीं मालूम. सुहास ही तो सब को फोन पर बता रहा है.’’

‘‘क्या?’’ पुरवा आश्चर्य से भर उठी.

सुहास के अंतर्मन में यह कैसा बालक छिपा बैठा है. अपना सुख, अपना दुख मन के अंदर छिपा नहीं पाता है. इसी तरह दूसरों का दुख भी उस से सहन नहीं होता है. किसी के भी सुख में सुहास सब से अधिक खुश हो उठता है. पुरवा जब भी इन बातों को सोचती है तब सुहास का भोलापन उसे सुखद आश्चर्य से भर देता है.

-क्रमश:

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