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ख्वाबों का हश्र ऐसा भी देखा है…

जिंदगियां रोज कई जीता हूं मैं,

इनमें कोई मेरी है पूछता हूं मैं.

एक रात जो टूट गई थी बेसबब

हर रात बिछड़ी नींद ढ़ूंढ़ता हूं मैं.

ख्वाबों का हश्र ऐसा भी देखा है

पलकें बंद करने से डरता हूं मैं.

अधूरेपन का अहसास हमेशा रहा

तुझसे खुद को पूरा करता हूं मैं.

उजड़ना, बिखरना नसीब मेरा

ए मरूधर, बस यूं ही संवरता हूं मैं…

सुष्मिता सेन के घर गूंजेगी शहनाई

बौलीवुड एक्ट्रेस सुष्मिता सेन के घर शहनाई बजने वाली है, जी हां सही सुना आपने. लेकिन ये शहनाई सुष्मिता सेन की नहीं है बल्कि उनके छोटे भाई राजीव सेन बहुत जल्द दूल्हा बनने वाले हैं. राजीव सेन टीवी एक्ट्रेस चारू असोपा के साथ शादी करने जा रहे हैं. इसकी जानकरी सुष्मिता सेन ने खुद सोशल मीडिया के जरिए अपने फैंस को दी हैं.

पूर्व मिस यूनिवर्स और एक्ट्रेस सुष्मिता सेन ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा- उसने शादी के लिए हां कह दी हैं. आप मेरे राजा भैया हो… आप दुनिया के सबसे लकी लड़के हो. इस खूबसूरत परी को हमारे जीवन में लाने के लिए शुक्रिया. अब मैं, आप दोनों की शादी का इंतजार नहीं कर सकती. मैं आपके शादी में डांस करुंगी.

सेटर्सः विषय के साथ न्याय करने में विफल

 

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इंगेजमेंट रिंग पहन बौयफेंड संग पोज देती दिखी सुष्मिता सेन, कई तरह के सवाल पूछ रहे हैं फैंसइस खबर के साथ सुष्मिता सेन ने सोशल मीडिया पर जो तस्वीर शेयर की है वो तेजी से वायरल हो रही है. कुछ घंटो पहले शेयर इस फोटो को अब तक एक लाख से ज्यादा लोग लाइक का चुके हैं.

 

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ब्लैंकः सिर्फ सनी देओल के फैंस ही खुश होंगे

आपको बता दें, सुष्मिता के छोटे भाई राजीव सेन टीवी सीरियल ‘मेरे अंगने में’ की एक्ट्रेस के साथ शादी के बंधन में बंधने वाले है. इस टीवी शो में चारू असोपा बहुत छोटे से किरदार में नजर आई थी. इस सीरियल के साथ- साथ चारू असोपा ये रिश्ता क्या कहलाता है, संगिनी में भी दिखाई दी थी. इस फोटो के साथ सुष्मिता ने दूसरी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर शेयर की है. दूसरी वायलर हो रही फोटो में सुष्मिता के साथ बौयफ्रेंड रोहमन शौल, भाई राजीव सेन और भाई की मंगेतर चारू हैं. इस फोटो के साथ सुष्मिता ने कैप्शन में लिखा- ‘परिवार, सर्कल औफ लव, मैं तुम सबसे बहुत बहुत प्यार करती हूं. आपका शुक्रिया.

हक न मांगें बेटियां!

हक न मांगें बेटियां!

पिता की संपत्ति में बेटियों का हक

क्या कहता है कानून

साल 2005 में संशोधन होने के पहले हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत प्रौपर्टी में बेटे और बेटियों के अधिकार अलग-अलग हुआ करते थे. इसमें बेटों को पिता की संपत्ति पर पूरा हक दिया जाता था, जबकि बेटियों का सिर्फ शादी होने तक ही इस पर अधिकार रहता था. विवाह के बाद बेटी को पति के परिवार का हिस्सा माना जाता था.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 में शादीशुदा बेटियों का अब उनके पिता की संपत्ति पर अधिकार हैं.
9 सितंबर 2005 को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005, जो हिंदुओं के बीच संपत्ति का बंटवारा करता है, में संशोधन कर दिया गया. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के मुताबिक लड़की चाहे कुंवारी हो या शादीशुदा, वह पिता की संपत्ति में हिस्सेदार मानी जाएगी. इतना ही नहीं उसे पिता की संपत्ति का प्रबंधक भी बनाया जा सकता है. इस संशोधन के तहत बेटियों को वही अधिकार दिए गए, जो पहले बेटों तक सीमित थे. हालांकि बेटियों को इस संशोधन का लाभ तभी मिलेगा, जब उनके पिता का निधन 9 सितंबर 2005 के बाद हुआ हो. इसके अलावा बेटी सहभागीदार तभी बन सकती है, जब पिता और बेटी दोनों 9 सितंबर 2005 को जीवित हों.

मेरी कोई जाति भी नहीं

संशोधन से पहले पैतृक संपत्ति का सांकेतिक बंटवारा पहले पिता और पुत्रों के बीच  होता था और पिता के हिस्से आई संपत्ति का फिर से बराबर बंटवारा पुत्र-पुत्रियों (भाई-बहनों) के बीच होता था.

मान लें कि पिता के तीन पुत्र और दो पुत्रियां हैं और पिता के हिस्से आई पैतृक संपत्ति 100 रुपये की है, तो यह यह माना जाता था कि अगर बंटवारा होता तो पिता और तीन पुत्रों को 25-25 रुपये मिलते. फिर पिता के हिस्से में आये 25 रुपयों का बंटवारा तीनों पुत्रों और दोनों पुत्रियों के बीच पांच-पांच रुपये बराबर बांट दिया जाता. मतलब तीन बेटों को 25+5=30×3=90 रुपये और बेटियों को 5×2=10 रुपये मिलते. संशोधन के बाद पांचों भाई-बहनों को 100÷5=20 रुपये मिलेंगे या मिलने चाहिए. अधिकांश ‘उदार बहनें’ स्वेच्छा से अपना हिस्सा अभी भी नहीं लेतीं.

औरतें ‘बेवफा’ होने के लिए मजबूर क्यों हो जाती हैं?

घर और घाट

मेरे पति आकाश का देहांत हो गया था. उम्र 35 की भी नहीं हुई थी. उन्हें कोई लंबी बीमारी नहीं थी. बस, अचानक दिल का दौरा पड़ा और उन की मृत्यु हो गई. अभी तक तो मित्रगण आते रहे थे, लेकिन पति के देहांत के बाद कोई नहीं आया. इस में उन का भी दोष नहीं. वहां की जिंदगी थी ही इतनी व्यस्त.

पहली 3 रातें मेरे साथ किरण सोई थी. अब से रातें अकेले ही गुजारनी थीं. शायद हफ्ता गुजरने तक दिन भी अकेले बिताने होंगे. क्या करूंगी, कहां रहूंगी, कुछ सोचा नहीं था.

यों तो कहने को मेरी ननद भी अमेरिका में ही रहती थीं लेकिन वह ऐसे मौके पर भी नहीं आई थीं. साल भर पहले कुछ देर के लिए आई थीं. तब मुझ से कह गई थीं, ‘रीता, आकाश बचपन से बड़ा विनोदप्रिय किस्म का है. तुम्हें दोष नहीं देती, लेकिन आकाश को कुछ हो गया तो भुगतोगी तुम ही. तुम लोगों की शादी को 10 बरस हो गए. देखती हूं पहले आकाश की हंसी जाती रही. फिर माथे पर अकसर बल पड़े रहने लगे. साथ ही वह चुप भी रहने लगा. 5 बरस से सिगरेट और शराब का सहारा भी लेने लगा है. रक्तचाप से शुरुआत हुई तनाव की. उस का कोलेस्ट्राल का स्तर ज्यादा है…’

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मुझे तो लगता है उन को और कुछ नहीं था, बस, दीदी ही की टोकाटाकी खा गई थी. उन से मेरा सुख नहीं देखा गया था.

रहरह कर अतीत मेरे दिमाग में घूमने लगा.

मैं ने दशकों से बहुओं के ऊपर होते हुए अत्याचारों को देखतेसुनते मन में ठान ली थी कि मैं कभी अपने ऊपर किसी की ज्यादती नहीं होने दूंगी. अगर आप जुल्म न सहें तो कोई कर ही कैसे सकता है. इस तरह समस्या जड़ से ही उखड़ जाएगी.

लेकिन मैं जैसी शरीर की बेडौल हूं वैसी अक्ल की भी मोटी हूं. मेरी लंबाई कम और चौड़ाई ज्यादा है. जहां तक खूबसूरती का सवाल है, कहीं न कहीं, कुछ न कुछ होगी ही वरना क्यों आकाश जैसा खूबसूरत नौजवान, वह भी अमेरिका में बसा हुआ सफल इंजीनियर, मुझ 18 बरस की अल्हड़ को एक ही बार देख पसंद कर लिया था. ऊपर से उन्होंने न तो दहेज की मांग की थी, न ही खर्च की नोकझोंक हुई थी.

मेरे मांबाप भी होशियार निकले थे. उन्होंने एक बार की ‘हां’ के बाद आकाश और उस के कितने रिश्तेदारों के कहने पर भी उन्हें एक और झलक न मिलने दी थी. मां ने कह दिया था, ‘शादी के बाद सुबहशाम अपनी दुलहन को बैठा कर निहारना.’

डर तो था ही कि कहीं लेने के देने न पड़ जाएं. मां ने शादी के वक्त भी अपारदर्शी साड़ी में मुझ को नख से शिख तक छिपाए रखा था. क्या मालूम बरात ही न लौट जाए. खैर, जैसेतैसे शादी हो गई और मैं सजीधजी ससुराल पहुंच गई.

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अभी तक तो घूंघट में कट गई. मरफी का सिद्धांत है कि यदि कुछ गलत होने की गुंजाइश है तो अवश्य हो कर रहेगा. मैं कमरे में आ कर बैठी ही थी कि ननद ने पीछे से आ कर घूंघट सरका दिया. मैं बुराभला सब सुनने को तैयार थी. मगर किसी ने कुछ कहा ही नहीं. मुंह दिखाई के नाम पर कुछ चीजें और रुपए मिलने अवश्य शुरू हो गए. दीदी तो अमेरिका से आई थीं. उन्होंने वहीं का बना खूबसूरत सैट मुझे मुंह दिखाई में दिया. बाकी रिश्तेदार और अड़ोसीपड़ोसी भी आते रहे.

इतने में ददिया सास आईं. दीदी झट बोलीं, ‘लता, जरा आगे बढ़ कर दादीजी के पैर छू लो.’

मैं ने वहीं बैठेबैठे जवाब दे दिया, ‘पैर छुआने का इतना ही शौक था तो ले आतीं गांव की गंवार. मैं तो बी.ए. पास शहरी लड़की हूं.’

दीदी को ऐसा चुप किया कि वह उलटे पांव लौट गईं.

कुछ देर बाद एक कमरे के पास से गुजर रही थी तो खुसरफुसर सुनाई पड़ी, ‘इस को इतना गुमान है बी.ए. करने का. एक आकाश की मां एम.ए. पास आई थी, जिस के मुंह से आज तक भी कोई ऐसीवैसी बात नहीं सुनी.’

अब आप ही बताइए, सास के एम.ए. करने का मेरे पैर छूने से क्या सरोकार था? खैर, मुझे क्या पड़ी थी जो उन लोगों के मुंह लगती. मुझे कल मायके चले जाना था, उस के 4 दिन बाद आकाश के संग अमेरिका. वहां दीदी जरूर मेरी जान की मुसीबत बन कर 4 घंटे की दूरी (200 किलोमीटर) पर रहेंगी. मैं पहले दिन से ही संभल कर रहूंगी तो वह मेरा क्या बिगाड़ लेंगी. अनचाहे ही मुझे किसी कवि की लिखी पंक्ति याद आ गई, ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात.’

लेकिन देखूंगी, दीदी की क्षमा कब तक चलेगी मेरे उत्पात के सामने. बड़ी आई थीं मेरे से दादीजी के पैर छुआने. डाक्टर होंगी तो अपने लिए, मेरे लिए तो बस, एक सठियाई हुई रूढि़वादी ननद थीं.

सच पूछिए तो पिछले 4 दिन में मैं एक बार भी उन को याद नहीं आई थी. मैं पिछले दिनों अपनी एक सहेली के यहां गई थी. पूरा 1 महीना उस की देवरानी उस के घर रह कर गई थी. एक मेरी ननद थीं, जिन के चेहरे पर जवान भाई के मरने पर शिकन तक नहीं आई थी.

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जब मैं 10 बरस पहले आकाश के साथ इस घर में घुसी थी तो गुलाब के फूलों का गुलदस्ता हमारे लिए पहले से इंतजार कर रहा था. उसे ननद ने भेजा था. आकाश ने मुझ को घर की चाबी थमा दी थी, लेकिन मुझे ताला खोलते हुए लगा था जैसे ननद वहां पहले से ही विराजमान हों.

घर क्या था, जैसे किसी राजकुमार की स्वप्न नगरी थी. मुझ को तो सबकुछ विरासत में ही मिला था. भले ही वह सब आकाश की 4 साल की कड़ी मेहनत का इनाम था. मैं इतनी खुश थी कि मेरे पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. मेरे सब संबंधियों में इतना अच्छा घरबार उन के खयाल से भी दूर की चीज थी.

मैं ने गुलाब के फूल बैठक में सजा लिए. मगर दीदी का शुक्रिया तो क्या अदा करती, उन की रसीद तक नहीं पहुंचाई. दोचार दिन बाद उन का फोन आया तो कह दिया, ‘हां, मिल तो गए थे.’

एक बार दीदी शुरू में सपरिवार आई थीं. वह रात को 9 बजे पहुंचने वाली थीं. भला इतनी रात गए तक कौन उन लोगों के लिए इंतजार करता. मैं ने 8 बजे ही खाना लगा दिया था. आकाश कुछ बोलते, इस से पहले ही मैं ने सुना कर कह दिया, ‘9 बजे आने के लिए कहा है. फिर भी क्या भरोसा, कब तक आएं? आप खाना खा लो.’

वह न चाहते हुए भी खाने बैठ गए थे.

अभी खाना खत्म भी नहीं हुआ था कि दरवाजे की घंटी बजी. मैं बोली, ‘अब खाना खाते हुए तो मत उठो. पहले खाना खत्म कर लो फिर दरवाजा खोलना.’

खाना खा कर आकाश दरवाजा खोलने गए. मैं बरतन मांजने लगी. उधर न पहुंची तो 15 मिनट बाद ही दीदी रसोई में आ गईं और नमस्ते कर के लौट गईं. मैं ने उन सब का खाना लगा दिया.

दीदी ने हम से भी खाने को पूछा. फिर बोलीं, ‘इस देश में खाने की कमी नहीं है. हर चौराहे पर मिलता है. साथ न खाना था तो कह देते, हम खा कर आते.’

तो क्या मैं ने कहा था कि यहां आ कर खाएं या उन को किसी डाक्टर ने सलाह दी थी? मैं ने सिरदर्द का बहाना बनाया और ऊपर शयनकक्ष में चली गई. खुद ही निबटें अपने भाईजान से.

सुबह उठी तो दीदी चाय बना रही थीं, ‘क्या खालाजी का घर समझ रखा है, जो पूछने की भी जरूरत न समझी?’ मैं ने दीदी को लताड़ा, ‘आप ने क्या समझा था कि मैं आप को उठ कर चाय भी नहीं दूंगी.’

मेरी रसोई को अपनी रसोई समझा था. उस के बाद कभी दीदी को मेरी रसोई में घुसने की हिम्मत न हुई.

मैं ने दीदी को नहानेधोने के लिए 2 तौलिए दिए तो वह 2 बच्चों के लिए और मांग बैठीं. अपने घर में 4 तौलिए इस्तेमाल करें या 8, यहां एक दिन 2 तौलियों से काम नहीं चला सकती थीं? मैं ने एक पुराना सा तौलिया और दे दिया. आखिर मेरा घर है, जो चाहूंगी करूंगी.

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उस के बावजूद कुछ ही दिनों बाद दीदी अचानक दोनों बच्चों के साथ मेरे यहां आ धमकीं. रात को देर तक आकाश से बातें करती रही थीं. वह पति महोदय से खटपट कर के आई थीं. मैं पूछ बैठी, ‘आप ने तो अपनी इच्छा से प्रेम विवाह किया था. फिर अब किस बात का रोना?’

दीदी से कुछ जवाब देते न बना.

मैं तो घबरा गई. कहीं दीदी जिंदगी भर मेरे घर डेरा न डाल लें. अगली सुबह आकाश दफ्तर गए और मैं सोती दीदी के पास ही पहुंच गई, ‘दीदी, वापस लौटने के बारे में क्या सोचा है?’

समझदार को इशारा काफी है. उन्होंने हमारे घर रह पति महोदय से बिलकुल बात न बढ़ाई. उसी दिन जीजाजी को फोन किया और शाम को वापस अपने घर लौट गईं. बस, समझ लीजिए तभी से उन का हमारे यहां आनाजाना कुछ खास नहीं रहा. हम ही उन के यहां साल में 2-3 दिन के लिए चले जाते थे. जाते भी क्यों न, वह बड़े आग्रह से बुलाती जो थीं. बुलातीं भी क्यों न, आखिर उन की पति से कम ही पटती थी. हम से भी नाता तोड़ लेतीं तो आड़े वक्त में कहां जातीं? कौन काम आता?

और फिर उन पर क्या जोर पड़ता था हमें बुलाने में. उन्होंने खाना बनाने को एक विधवा फुफेरी सास को साथ रखा हुआ था. घर की सफाई करने वाली अलग आती थी.

एक बार दीदी भारत गईं तो मेरे लिए मां ने उन के साथ कुछ सामान भेजा. जब मुझे सामान मिला तो उस में से एक कटहल के अचार का डब्बा गायब था, ‘दीदी, अचार चाहिए था तो आप कह देतीं, मैं आप के लिए भी मंगा देती. चोरी करना तो बहुत बुरी बात है.’

बाद में मां ने बताया कि अचार का डब्बा भेजने से रह गया था. बात आईगई हो चुकी थी, तो मैं ने फिर दीदी से कुछ कहने की जरूरत न समझी.

अभी पिछले दिनों दीदी फिर भारत गई थीं. उन्होंने लौट कर फोन किया, ‘लता, तुम्हारे मांबाबूजी से मिल कर आ रही हूं. सब मजे में हैं. मगर तुम्हारे लिए कुछ नहीं भेजा है.’

‘हां, मैं ने ही मां को मना कर दिया था कि हर ऐरेगैरे के हाथ कुछ न भेजा करें. फिर भी मां किसी न किसी के हाथों सामान भेजती रहती हैं. एक पार्सल तो पिछले 8 बरस से आ रहा है. एक 6 महीने बाद मिला था.’

खैर, जो हुआ सो हुआ. मैं अतीत को भूल कर वर्तमान के धरातल पर आ गई. मुझ को अकेले नींद नहीं आ रही थी. रात के 2 बज गए थे. एक तरफ आंसू नहीं थम रहे थे और दूसरी तरफ डर भी लग रहा था इतने बड़े घर में. भूख लग रही थी मगर…मैं अकेली थी…बिलकुल अकेली. शरीर टूट सा रहा था.

मैं मां को भारत ट्रंककाल करने लगी, ‘‘मां, आप कुछ दिनों के लिए अमेरिका आ जाइए. मैं आप का टिकट भेज देती हूं.’’

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मां अपनी मजबूरी सुनाने लगीं. विरासत में मिला सुख कुछ भी तो काम नहीं आ रहा था. पति के मरते ही कुछ भी अपना न रहा था. 10 बरस बाद भी उस घर में न तो कोई अपनापन था, न ही देश में.

आकाश 1 लाख डालर छोड़ कर मरे थे. मैं एअर इंडिया को फोन करने लगी, ‘‘मैं वापस भारत जाना चाहती हूं. अपने घर.’’

भारत लौट कर पीहर पहुंची तो वहां कुछ और ही नजारा पाया. भाई की शादी हो चुकी थी, सो एक कमरा भाईभाभी का और दूसरे में मेरे मांबाबूजी. मेरा बैठक में सोने का प्रबंध कर दिया था. मेरा सामान मां के साथ. सुबह बिस्तर समेटते ऐसा लगता था, जैसे उस घर में मैं फालतू थी. मैं ने सोचा, ‘सहना शुरू किया तो जिंदगी भर सहती ही रहूंगी. ऐसी कोई गईगुजरी स्थिति मेरी भी नहीं है. आखिर 10 लाख रुपए ले कर लौटी हूं. चाहूं तो इन चारों को खरीद लूं.’

एक दिन भाभीजान फरमाने लगीं, ‘‘दीदी, पूरी तलवाने में मदद कर दो न, मैं बेलती जाती हूं.’’

आखिर भाभी ने मुझे समझ क्या रखा था…मैं नौकरानी बन कर आई थी क्या वहां? इतना पैसा था मेरे पास कि 10 नौकर रख देती. लेकिन बात बढ़ाने से क्या फायदा था. मैं कुछ भी नहीं बोली थी. मदद नहीं करनी थी, सो नहीं की.

खाना खाने के वक्त भाभी ने अपना खाना परोसा और खाने लगीं. मैं ने भी ले तो लिया, मगर वह बात मेरे मन को चुभ गई. जब मांबाबूजी ही सब बातों में चुपी लगाए थे तो भाभी तो मेरी छाती पर मूंग दलेंगी ही.

मैं ने कहा, ‘‘मेरे आने का तुम लोगों को इतना कष्ट हो रहा है तो मैं वापस चली जाती हूं. मेरे पास जितना पैसा है, मैं उतने में जिंदगी भर मजे से रहूंगी. न किसी से कहना, न सुनना.’’

कोई कुछ भी न बोला. मैं सन्नाटे में रह गई. मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि मेरे मांबाबूजी ही इतने बेगाने हो जाएंगे. फिर ससुराल से ही क्या आशा करती.

घर छोड़ते हुए मेरे आंसू टपक पड़े. मैं फिर अकेली हो गई थी. बिलकुल अकेली. बिलकुल धोबी का कुत्ता बन कर रह गई, न घर की न घाट की.

पूर्णिमा गुप्ता

फ्राड तांत्रिक

लेखक – डा. विजय नारायण भारद्वाज 

मेरे एक लेक्चरर दोस्त ने कहा, ‘‘चार अक्षर पढ़ लिए, दोचार लेख अखबारों, पत्रिकाओं में छप गए तो किसी को कुछ समझते ही नहीं. अरे, स्वामी सदाचारी, सत्यनिकेतन मोतीबाग, दिल्ली से मिलते ही तुम्हारी आंखें खुल जाएंगी, अंतर की सोई कुंडलियां जाग जाएंगी और सब चौकड़ी भूल जाओगे. मैं 2 बार मिला हूं. बिना पूछे नाम व समस्या न बता दें तो तुम मेरा नाम बदल देना.’’

मैं अपने खयालों में खोया उन की बातें भी सुन रहा था. मुझे लगा जैसे मेरे दोस्त कह रहे हों कि तुम मेरे नाम का कुत्ता पाल लेना, सो मैं ने चौंक कर उन की ओर देखा तो वह कह रहे थे, ‘‘मैं ने एक परचे पर अपना नाम व समस्या लिखी और घड़े में डाल दी. स्वामी सदाचार 6 मीटर दूर बैठे थे. फिर भी मेरी समस्या बता दी और उपाय के लिए इलायची, लौंग मंगाई है. कल सुबह चलना.’’

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अगले दिन हम दोनों मोतीबाग पहुंचे. एक महिला, जो मनोहर मेकअप में थी और जिस के शरीर से सेंट की भीनीभीनी खुशबू आ रही थी, ने ड्राइंगरूम में बिठाया. पानी पिलाया और बोली, ‘‘मैं देखती हूं कि स्वामीजी हवन कर चुके या नहीं. आप का नाम व काम?’’

मैं बोला, ‘‘अपना नाम व काम दोनों मैं स्वामीजी को ही बताऊंगा.’’

वह इतरा कर बोली, ‘‘स्वामीजी तो बिना बताए ही बता देंगे, सर्वज्ञ हैं.’’

उस के बारबार आग्रह पर मैं ने कहा, ‘‘लेंटिकुलर ओपेसिटी है (मोतिया बिंद).’’

‘‘वह क्या होता है?’’

‘‘यह क्या होता है मैं नहीं जानता पर डाक्टर यही बताता है.’’

स्वामीजी के कमरे पर नोटिस लगा था : ‘केवल एक व्यक्ति कक्ष में प्रवेश करे. स्वामीजी से हुई बातचीत गोपनीय रखें. किसी से चर्चा करने पर हानि हो सकती है.’

नमस्कार के बाद मैं ने कहा, ‘‘सुना है, आप व्यक्ति का विवरण बिना पूछे बता देते हैं.’’

‘‘ठीक सुना है. पर इस काम को करने में समय लगेगा और आज मैं एक राष्ट्रीय महत्त्व के काम में व्यस्त हूं. यह सरकार गिरानी है.’’

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‘‘असंभव,’’ मेरे मुंह से निकला कि उन का सदन में स्पष्ट बहुमत है.

तब मोरारजी देसाई की सरकार थी. सदन में उन का स्पष्ट बहुमत था. स्टीफन विपक्ष के नेता थे. उन की ओर से अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया जा चुका था. बाद में पता चला कि चौधरी चरणसिंह व राजनारायण फोड़े जा चुके थे.

‘‘असंभव को संभव करना या कहें हथेली पर सरसों जमाना ही तो तंत्र का काम है. खैर, अपनी समस्या बताइए.’’

मैं ने कहा, ‘‘लेंटिकुलर ओपेसिटी है.’’

वह बोले, ‘‘डाक्टर क्या कहते हैं?’’

‘‘वह तो इतना ही बताते हैं जितना मैं ने आप को बताया है.’’

स्वामीजी ने अपनी हथेली सामने की और बोले, ‘‘मेरे हाथ में क्या दिखता है?’’

मैं ने कहा, ‘‘गुरु पर्वत उन्नत है, सूर्य रेखा स्पष्ट व गहरी है.’’

‘‘नहीं, हाथ में कुछ है, कोई वस्तु?’’

‘‘जी नहीं,’’ मैं ने कहा.

मेरा हाथ पकड़ कर उन्होंने अपनी हथेली से टकराया और बोले, ‘‘सिद्ध रुद्राक्ष है, जेब में रखो, पूजाघर में रख देना. सामान्य जन से कुछ नहीं लेते. आप को सरल मंत्र बताएंगे. 11 माला हर रोज आधी रात को श्मशान में 11 दिन जपना. पहले एक मंत्र जपना तो भय नहीं लगेगा. शरीर कवचबद्ध हो जाएगा फिर हमें बताना. आप के सामने ही उल्लू की बलि देंगे. उल्लू व पूजासामग्री ला देना. जो काम डाक्टर नहीं कर पाए उसे तंत्र कर देगा. भय लगे तो हमारा शिष्य श्मशान मंत्र सिद्ध कर देगा पर 1,100 रुपए दे देना. कल 250 ग्राम लौंग व इलायची ला देना.’’

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मैं फिर नहीं गया. हां, कुछ दिन बाद एक समाचारपत्र में छपा स्वामीजी से संबंधित शिकायत पत्र जरूर पढ़ा :

मुझे बलात्कार के झूठे मामले में फंसाया गया है. पुलिस ने कठोर यातनाएं दीं. मेरे हाथों में डंडा बांध कर पंखे से लटका कर घुमाया गया. पानी मांगने पर मेरे सामने पेशाब कर के गिलास पकड़ाया गया. पैर फैला कर डंडा बांध दिया. हाथ पीछे खिड़की से बांधे. 2 दिन खड़े रखा, यहां तक कि मलमूत्र भी उसी दशा में. मैं ने जीवित नरक भोगा.

मैं सच कहता हूं कि मैं निर्दोष हूं.

(स्वामी) सदाचारी.

दलील, अपील कोई नहीं. वकील- जज आप हैं. उसे निर्दोष भी मानें तो तंत्र क्यों फेल हो गया? झूठी शिकायत करने वाले पर मोहिनी, उच्चारण, मारक मंत्र चलता तो उसे नानी याद आ जाती.

किसी दिव्य दृष्टिसंपन्न ऋषि ने अशोक वाटिका में सीता नहीं देखी, रावण पर मोहन मारण मंत्र नहीं चलाया.

एक गुरुजी लाख नहीं करोड़ टके की बात कहते थे.

‘‘पढ़ाई में सिर मत खपाओ. बिना ऊंची पढ़ाई, व्यवसाय में पूंजी लगाए तंत्र, गुरुडम शुरू करो. धन, सम्मान कीर्ति की वर्षा, हलदी न फिटकरी रंग चोखा. मंत्री, उद्योगपति ही नहीं सुंदरसलोनी कोमलांगियां भी तनमन और धन से समर्पित. मनचाहा हल, नौकरी, छोकरी, व्यवसाय में पौबारह, चुनाव विजय, मंत्रीपद गृहक्लेश मुक्ति पलक झपकते मनचाहा. बस,

कुछ बदल रहा है

लेखक-  अर्चना पैन्युली 

भाग-1

सुनीता जब भी भारत में रह रहे अपने बेटे से फोन पर उस की शादी की बात करती, वह टाल जाता. बेटे का कुंआरापन अब सुनीता को जबरदस्त अखरने लगा था. 6 फुट की उस की हृष्टपुष्ट काठी, 28 साल की जवान उम्र, ऊपर से नौकरी भी अच्छीखासी…ऐसे में ‘सिंगल’ बने रहने का भला क्या तात्पर्य. कुछ माह पहले ही सुनीता ने भारत के कई अखबारों व वेबसाइट्स पर उस की शादी के लिए वैवाहिक विज्ञापन निकाला था. कई तरह के प्रस्ताव आ रहे थे. लड़की वाले चिट्ठियां, फोन व ईमेल्स से संपर्क कर रहे थे और अपनी लड़कियों के आकर्षक बायोडाटा भेज रहे थे.भारत में अपने रिश्तेदारों से सुनीता की जब भी बात होती तो वह भी न जाने कितनी लड़कियां सुझा देते. यहां डेनमार्क में रह रहे कुछ भारतीय भी, जब उन्हें पता चलता कि उन का एक काबिल लड़का अविवाहित है, तो दबे शब्दों में अपनी लड़कियों का जिक्र करने लगते. मगर लड़का था कि किसी भी रिश्ते में कुछ रुचि ही नहीं लेता.

 

सुनीता की पिछली बार जब बेटे से फोन पर बात हुई तो उसे अल्टीमेटम दे डाला, ‘‘हम कुछ नहीं जानते. अगली बार जब हम भारत आएंगे तो मुझे शादी करनी पडे़ेगी, चाहे तू किसी से भी करे.’’‘‘मां, मैं किसी विधवा से शादी कर सकता हूं? किसी बच्चे वाली अकेली औरत से शादी कर सकता हूं? किसी दूसरे धर्म की लड़की से शादी कर सकता हूं?’’ वह अजीबोगरीब सवाल पूछने लगा.सुनीता का माथा ठनका, ‘‘यह तू कैसे सवाल पूछ रहा है? क्या तू वाकई किसी…’’

‘‘नहींनहीं, बस मजाक कर रहा हूं.’’

‘‘नहीं, बेटा बता… क्या तू किसी को पसंद करता है? हम इतने दकियानूसी नहीं हैं,’’ सुनीता ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘मां, जब आप यहां आओगे तो बताऊंगा,’’ वह बोला और झट से बात का रुख बदल दिया.

बेटे से बात खत्म करने के बाद भी सुनीता का ध्यान उसी की तरफ रहा. 10 साल हो गए थे उन्हें उस से अलग रहते हुए. वह तब 18 साल का था, पति की पोस्टिंग तेहरान में थी और उन्होंने उस को 12वीं के बाद तेहरान से भारत भेज दिया था, इंजीनियरिंग कोर्स करने के लिए. पति की विदेश मंत्रालय की नौकरी होने के कारण 3 पोस्टिंग उन्हें लगातार बाहर के देशों की मिलती रहीं. तबादले के इसी क्रम में वे तेहरान के बाद रोम गए, फिर रियाद गए और अब पिछले वर्ष कोपनहेगन आ गए थे.

इसी बीच बेटे ने हैदराबाद से इंजीनियरिंग की, पूना से एम.बी.ए. किया और 4 सालों से बंगलौर इन्फोसिस में नौकरी कर रहा था. बेटी को भी उन्होंने 3 साल पहले रियाद से हैदराबाद के उसी इंस्टीट्यूट से इंजीनियरिंग करने भेज दिया था, जहां से बेटे ने की थी. इस तरह शर्मा दंपती के दोनों बच्चे भारत में थे और वे विदेश में. बेटी अभी पढ़ रही थी इसलिए शर्मा दंपती चाहते थे कि बेटा शादी कर के अपनी गृहस्थी बसा ले तो वे बेटे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से स्वयं को मुक्त समझें.

सुनीता के पड़ोस में एक भारतीय शीतल श्रीनिवासन का परिवार रहता था. यद्यपि शीतल, सुनीता से उम्र में लगभग 12 साल छोटी थी पर उन के बीच दोस्ती अच्छी हो गई थी. इसीलिए शीतल से सुनीता अपने मन की सब बातें कर लेती थी. शीतल के सामने सुनीता अपने मन की शंका जाहिर करते हुए बोली कि बेटे ने आखिर ऐसे सवाल क्यों पूछे? कहीं वास्तव में वह किसी विधवा, बच्चे वाली को चाहता तो नहीं है. जब पिछली बार हम दिल्ली गए थे तो उस के आफिस से एक तलाकशुदा औरत का अकसर उसे फोन आता था. कहीं उस के साथ उस का कुछ चक्कर तो नहीं है.

शीतल का दिमाग बड़ा शातिर था. वह इंटरनेट पर भारत की खबरें पढ़पढ़ कर सुनीता को बताती कि भारत अब तेजी से बदल रहा है. सभी जवान लड़केलड़कियां गर्लफे्रंड बनाने लगे  हैं. डेटिंग, ब्रेकिंगअप व लव मैरिज आज वहां भी आम बात बनती जा रही है.

बेटे की बातें सुन कर सुनीता का मन इस कदर बेचैन था कि भारत जाने का जो कार्यक्र्रम 6 महीने बाद का था वह पति से जिद कर के 1 महीने बाद का करवा लिया. दिल्ली स्थित उन का पहाड़गंज का अपना घर तब ही खुलता था जब वे होम लीव पर भारत आते थे. उन का बेटा मनु अपनी नौकरी से महीने भर का अवकाश ले कर बंगलौर से  दिल्ली अपने मातापिता के स्वागत के लिए पहले ही पहुंच गया. मातापिता के आनेजाने की सुविधा के लिए उस ने किराए की एक कार का इंतजाम कर दिया.

कार ले कर उन्हें रिसीव करने मनु एअरपोर्ट आया. 1 साल बाद सुनीता बेटे से मिल रही थी. वह उस के गले लग गई. पूरे रास्ते, जब वह गाड़ी चला रहा था, पीछे की सीट पर ठीक उस के पीछे बैठी अपने दोनों हाथों से उस का कंधा पकडे़ रही. बेटे का यह स्पर्श सुनीता को एक सुकून दे रहा था. घर पहुंच कर मनु ने कार पार्क की. डिक्की से मातापिता के बैग व सूटकेस निकाले और उन्हें थाम कर अपने घर की तरफ बढ़ गया, पीछेपीछे सुनीता व पंकज शर्मा थे. जैसे ही सुनीता घर में घुसी तो घर एकदम साफसुथरा व सुव्यवस्थित लगा. सुनीता पुलकित हो कर अपने बेटे से बोली, ‘‘मनु, यह तो अच्छा लगा कि तू ने हमारे घर पहुंचने से पहले ही घर की सफाई कर के रख दी.’’

‘‘उस ने की,’’ मनु बोला.‘‘किस ने?’’

‘‘वह भी मेरे साथ बंगलौर से यहां आई है न.’’

‘‘कौन?’’ सुनीता अनजान बनते हुए बोली.

‘और कौन? इस की फ्रेंड जो है,’’ सुनीता के पति बीच में बोले.

‘‘उस का नाम सेंनली है मां.’’

सुनीता ने बेटे को भरपूर नजरों से देखा तो वह नजरें चुराते हुए बोला, ‘‘मां, वह यहां हौजखास में अपनी किसी सहेली के घर टिकी है. कल वह यहां आई थी. उसी ने यह घर ठीकठाक किया है.’’

‘‘कहां की है वह और जाति क्या है उस की?’’

‘‘मैं जातिपाति को नहीं मानता, मां. सेंनली क्रिश्चियन है और असम की है.’’

‘‘क्रिश्चियन, कहां मिली वह तुझे?’’

‘‘हैदराबाद में मेरे साथ इंजीनियरिंग करती थी.’’

‘‘इस का मतलब पिछले 10 सालों से तेरा उस से चक्कर है और तू ने कभी हमें बताया भी नहीं.’’

‘‘मां, हम एकदूसरे के प्रति कुछ समय से सीरियस हुए हैं और आप दोनों पहले भी उस से मिल चुके हैं. जब पापा की कुछ समय के लिए दिल्ली पोस्टिंग थी और मैं गरमियों की छुट्टियों में उसे ले कर घर आया हुआ था.’’

खैर, दूसरे दिन हैदराबाद से सुनीता की बेटी तुला भी दिल्ली पहुंच गई. दोनों बच्चे सान्निध्य में…इन क्षणों का सुनीता को बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता था. अगले रोज ही अपने बेटे को पीतमपुरा भाई के घर मां को लिवाने भेज दिया. मां भी उस के पास पहुंच गईं. मां और बच्चे….अगर विदेश में वह कुछ मिस करती थी तो अपने इन करीबी रिश्तों को.

 

सुनीता ने उन सब के बीच अपनी गृहस्थी ऐसे शुरू कर दी जैसे दिल्ली के अपने इस घर से वह कभी कहीं गई ही नहीं. हमेशा इस की चारदीवारी के भीतर ही बंधी रही.

2-3 दिन गुजरे तो सुनीता बेटे से बोली, ‘‘मनु, जहां कहीं की भी वह हो, जो कुछ भी उस का नाम हो, हमें उस से मिला तो सही. हम दरअसल इस बार उसी से मिलने यहां आए हैं.’’

‘‘वह भी आप लोगों से मिलने ही बंगलौर से यहां आई है,’’ कहते हुए मनु ने मोबाइल निकाला, सभी से थोड़ी दूर खिसक, एकांत में जा उस से कुछ बातें कीं और दूसरे दिन, दोपहर में सेंनली आ गई.

सुनीता को सब अच्छी तरह मालूम था कि सेंनली किस प्रदेश की है, किस जाति की है, मगर जब वह सामने आई तो उसे देख कर उन के दिल पर सांप लोट गया. उन्हें लगा जैसे चीन, जापान, थाईलैंड या कोरिया की कोई युवती उस के सामने आ गई है.

‘यह हिंदुस्तान भी कितना विचित्र देश है. कैसीकैसी शक्लसूरत व स्वर वाले लोग यहां रहते हैं,’ सुनीता मन ही मन बुदबुदाई.

‘‘जरनी कैसा…था?’’

वह बात भी कर रही थी तो टूटीफूटी हिंदी में….उफ.

‘‘तुम कहती हो कि तुम हिंदुस्तानी हो पर तुम्हें हिंदी तक ढंग से बोलनी नहीं आती,’’ सुनीता तल्खी से बोली.

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘मनु से सीख तो रही हूं…’’

‘‘विदेश में कई भारतीयों के बच्चों को मैं ने देखा है. वे विदेश में जन्मे व पलेबढ़े हैं पर बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं. तुम अपने देश में रहते हुए भी ढंग से हिंदी बोलना नहीं जानतीं?’’

‘‘विदेश में जो भारतीय बच्चे हिंदी बोलते होंगे उन की मदर टंग हिंदी होगी. मेरी मदर टंग असमीज है.’’

सुनीता का बात करने का तरीका सेंनली को पसंद नहीं आया तो वह उन्हें उपेक्षित कर तुला व मनु की तरफ उन्मुख हो कर उन से अंगरेजी में बातें करने लगी. तीनों को आपस में फर्राटेदार अंगरेजी में बातें करते देख सुनीता को बड़ी कोफ्त हुई.

‘‘यह तुम लोग अंगरेजी में बात क्यों कर रहे हो?’’

‘‘मम्मी, समझा करो. सेंनली को हिंदी ढंग से नहीं आती,’’ तुला बोली.

‘‘मम्मी, तुम उन छोटेछोटे इसलामी व यूरोपीय देशों की तुलना भारत से मत करो, प्लीज,’’ मनु ने जबान खोली, ‘‘यहां लोग एक नहीं कई भाषाएं बोलते हैं. यहां कई जाति व धर्म के लोग रहते हैं. यहां कई तरह के रंग हैं.’’

सुनीता ने महसूस किया कि मनु को यों अपनी मां के साथ तर्क करते देख सेंनली के चेहरे पर एक भीनी मुसकान तैर गई थी.

बहरहाल, मनु व तुला सेंनली से बात करने में लगे थे और सुनीता के पति पंकज शर्मा हाथों में डिजिटल कैमरा पकड़े बेटे के साथ सेंनली का पोज बनाए तसवीरें खींचने में लगे थे.

 

सुनीता मौन साधे सोफे पर बैठी रही. मनु व तुला का सेंनली के साथ यों घनिष्ठता से बात करते, पति का उस की तसवीरें खींचना और मां का उसे चाय- पकौडे़ परोसना, सब सुनीता को बेहद अखर रहा था. सेंनली को बहू स्वीकार करने को उस का मन गवाही नहीं दे रहा था.

खैर, चायनाश्ते के दौर के बाद सेंनली ने अपना पर्स उठाया और सोफे पर से उठ गई.

ख्वाहिश

ख्वाहिश थी मेरी भी की इस दुनिया में खुद का परचम लहराऊं.

ख्वाहिश  थी मेरी भी की अपने सपने को हकीकत बनाऊं.

ख्वाहिश थी मेरी भी की दूसरों की खुशी के लिए कुछ कर दिखलाऊं.

ख्वाहिश थी मेरी भी की मां-बाप का सर गर्व से उठाऊं.

ख्वाहिश थी मेरी भी की दोस्तो के साथ झूमू और गाऊं.

ख्वाहिश थी मेरी भी की सात समुंदर पार जाऊं.

ख्वाहिश थी मेरी भी की इस जीवन में इतिहास रच आकाश में गुम हो जाऊं.

ख्वाहिश थी मेरी भी की जीवन के सारे रिश्तों को आखिरी दम तक निभाऊं .

ख्वाहिश थी मेरी भी की खुद जागकर औरों को सुकून से सुलाऊं.

ख्वाहिश थी मेरी भी की सब के चेहरे पर मुस्कान लाऊं.

ख्वाहिश थी मेरी भी की अपने भाई को रक्षा सूत्र बांध रक्षा कवच बनाऊं.

पर जीवन की ये ख्वाहिशो को पूरा करना मेरे बस में नहीं था क्योंकि नियति को कुछ और ही मंजूर था.

मेरा जीवन सबसे अलग और विपरीत था.

“इस दुनिया में मेरा वजूद बस मेरी मां की कोख तक ही सीमित था.”

जिनसे मिलने के लिये मैं दिन गिन रही थी, आज उन्ही के हाथों मेरी बलि चढ़ रही थी.

यह देख मैं सिसक रही थी, कल तक जहां मेरे आने की खुशी थी वही आज मुझे मारने की साजिश चल रही थी.

किसी ने नहीं सोचा की मैं क्या चाहती थी, मैं भी अपने सपनों को हकीकत बनते देखना चाहती थी.

ममता की छाए में पापा के साये में, जीवन जीना चाहती थी, आगे बढ़ना चाहती थी.

जिनके कारण मैं ये ख्वाब देख पाई, आज उन्होंने इसे तोड़ने का बीड़ा उठाया था.

मां, तू तो मुझे समझती है. अपने अंश को खुद से जुदा ना करती.

मां मुझे दुनिया में आने तो देती, एक दो दिन दुनिया देखने तो देती.

ऐसा व्यवहार देख तो मैं खुद दम तोड़ देती, बस तू मुझे एक बार दुनिया तो देखने देती, अपने आंचल का स्पर्श तो महसूस करने देती.

मां जीवन की ये कैसी लीला है जहां बेटा परिवार का हीरा और बेटी पीड़ा है.

मुझे बस तुम सबको यही कहना है बेटी होना कोई अभिशाप नहीं, एक खुशियों का मेला है. एक खुशियों का मेला है.

(आपकी अजन्मी बेटी)

लोकसभा चुनाव:- “बेहाल कर रही चुनावी ड्यूटी”

लोकसभा चुनाव की पूरी प्रक्रिया बेहद लंबी है. लगभग 2 महीने तक चुनाव का कामकाज चल रहा है. बहुत सारे सरकारी विभागों में कामकाज ठप्प है. सरकारी कर्मचारी चुनावी ड्यूटी पर है. यहा तक की पुलिस विभाग में भी बहुत सारे केस पेडिंग है. पुलिस चुनावी ड्यूटी में लगी है. सबसे खराब हालत पोलिंग बूथ पर ड्यूटी देने वाले कर्मचारियों की होती है. इनको अपने घर से दूर गांव-गांव ऐसी जगहों पर जाना होता है जहां रहने खाने तक की कोई व्यवस्था नहीं होती है. किसी जानपहचान वाले के घर रूकना या फिर मतदान स्थल पर रात गुजारनी पड़ती है.इस दौरान वह अपने घर परिवार के संपर्क से भी दूर रहते है. ड्यूटी के समय उनको अपने फोन तक के प्रयोग की अनुमति नही होती है. सबसे अधिक परेशानी शिक्षा विभाग में काम करने वाली शिक्षिकाओं की है. इनमें से तमाम के छोटे बच्चे है. एकल परिवार में रहने के कारण वह बच्चों को छोड़ नहीं सकती और ड्यूटी के समय साथ भी नहीं रख सकती.

सांसत में छोटे भाजपा नेता

इनकी ड्यूटी जब गांव देहात के एरिया में लग जाती है तो उसको संभालना मुश्किल हो जाता है. मतदान वाले दिन की ड्यूटी ज्यादा कठिन होती है. सुबह 5 बजे मतदान स्थल पर पहुंचना पड़ता है. इसके लिये रात भर का सफर करना पड़ता है. मतदान खत्म होने के बाद भी उनको छुटटी तब मिलती है जब मतपेटी जमा हो जाती है और सारे कागजात का मिलान हो जाता है. बहुत सारे मतदान स्थल गांव के सरकारी स्कूलों में होते है. जहां आज भी महिलाओं के लिये साफ सुथरे शौचालय नहीं है. स्कूल में एक ही शौचालय होता भी है तो उसका प्रयोग करने वालों की संख्या बढ जाती है. शौचालय को साफ करने वाले नहीं होते है.

लोकसभा चुनाव 2019 : लड़ाई अब सेंचुरी और डबल सेंचुरी की है

इसके अलावा रात रूकने की व्यवस्था गांव में नहीं होती. गरमी और मच्छरों से भरी रात किसी कैदखाने से कम नहीं होती है. चुनावी ड्यूटी से बचने के लिये कर्मचारी बहुत तरह से कोशिश करते है. इसके बाद भी उनको चुनावी ड्यूटी में जाना ही पडता है. लोकसभा चुनाव में 7 चरण पूरे 2 माह के कार्यक्रम से बनाये गये है. ऐसे में मतगणना के बाद ही चुनावी छुट्टी से मुक्ति मिलती है. इस दौरान तमाम कर्मचारी बीमार हो जाते है. गर्मी में चुनाव होने के कारण परेशानी और भी अधिक होती है. चुनाव दर चुनाव यह परेशानियां बढती जा रही है. इसके अलावा महिला कर्मचारियों को चुनाव के दिन मतदान स्थल पर तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पडता है. कई बार यहां पर लड़ाई झगड़ा, गाली गलौच भी होता है. ऐसे में उनको यह सब भी सहना पडता है. नाम ना छापने की शर्त पर कई महिला कर्मचारियों ने बताया कि मतदान वाले दिन वह लोग पानी कम पीते है. जिससे उनको कम से कम शौचालय का प्रयोग करना पड़े. इससे शाम तक कई की तबीयत खराब हो गई. अपने 5 माह के बच्चे को छोड़ कर मतदान स्थल पर ड्यूटी दे रही महिला टीचर ने बताया कि चुनावी ड्यूटी किसी प्रताड़ना से कम नहीं होती है. सरकार किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं करती. अधिकारी कोई बात सुनते नहीं. ज्यादा कहों तो निजी दुश्मनी मानकर प्रताड़ित करते है. कई बार तो साथी पुरूष कर्मचारी इन हालातों से मजा लेते है. चुनाव सुधार की बात करते समय ऐसी चुनावी ड्यूटी को भी सरल करने पर विचार करना चाहिये.

Edited By – Neelesh Singh Sisodia

हक न मांगें बेटियां!

पूरी दुनिया की आबादी का आधा हिस्सा महिलाओं का है. कुल काम का दो तिहाई हिस्सा महिलाएं ही करती हैं. मगर आय का केवल दसवां भाग उनके हिस्से आता है, तो सम्पत्ति का सौवां भाग उनके हिस्से में पड़ता है. संयुक्त राष्ट्र संघ का तथ्यों पर आधारित यह कथन दुनियाभर में महिलाओं के साथ हो रही आर्थिक हिंसा का एक आईना है. दफ्तर हो या घर, महिलाओं को आर्थिक भेदभाव का सामना करना ही पड़ता है. कानून बनाकर कई कानूनी अधिकार महिलाओं को दिये गये हैं, मगर समाज में भी इन्हें मंजूरी मिले, महिलाओं में भी हक पाने का साहस जागे, इसके लिए प्रशासनिक और सरकारी स्तर पर बड़ी मुहिम चलायी जानी जरूरी है, वरना उन्हें उनका हक कभी भी हासिल नहीं होगा.

भारत में औरत का मायका हो या ससुराल, जब प्रापर्टी बंटवारे की बात आती है तो पुरुषों को ही प्रापर्टी में हिस्सा मिलता है. कानून कितने ही बना लो, मगर सामाजिक मान्यताओं का क्या करेंगे? पिता की सम्पत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर हक मिलने की बातें कानून की किताबों में तो जरूर दर्ज हो गयी हैं, मगर समाज इस पर अमल करने को आज भी तैयार नहीं है. हक मांगने पर न सिर्फ बेटियों की मुसीबतें बढ़ जाती हैं, बल्कि उन्हें घर, परिवार और समाज में बदनामी, उपेक्षा और हिंसा का सामना भी करना पड़ता है. कई बार तो हक मांगना उनकी जान पर भारी पड़ जाता है.

औरतें ‘बेवफा’ होने के लिए मजबूर क्यों हो जाती हैं?

लखनऊ के बंथरा थाने में पड़ने वाले रतौली खटोला गांव में सम्पत्ति के लिए एक भाई ने अपनी दो सगी बहनों की हत्या करवा दी. 20 साल की रेखा और 18 साल की सविता का दोष केवल इतना ही था कि वे दोनों पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा चाहती थीं, ताकि अपनी पढ़ाई जारी रख सकें. सम्पत्ति में बहनों की दावेदारी भाई को नागवार गुजरी. उसको डर था कि पिता बहनों की बातों में आकर सम्पत्ति का आधा हिस्सा उन्हें दे देंगे. लिहाजा जमीन-जायदाद बचाने के लिए उसने बहनों को ही मौत के घाट उतार दिया. यह घटना बीते वर्ष दिसम्बर माह की है, जब रात दो बजे चार लोग घर में घुसे और सीधे लड़कियों के कमरे में पहुंच गये. मां उषा भी अपनी बेटियों के कमरे में सोई थी. हत्यारों ने पहले बड़ी बहन और फिर छोटी बहन की धारदार हथियार से हत्या कर दी. मां ने किसी तरह वहां से भाग कर अपनी जान बचायी. पुलिस जांच के बाद हालांकि साजिशकर्ता भाई संतोष और सुपारी लेने वाले दोनों हत्यारे पुलिस की गिरफ्त में आ गये, मगर अपने हक के लिए आवाज उठाने वाली दोनों बहनें अब कभी वापिस नहीं आएंगी.

यह दोहरी हत्या भारतीय समाज में व्याप्त पितृसत्ता और पुरुषवादी सोच को उजागर करता है. यह जड़ जमा चुकी धारणाओं को चुनौती देने का मामला है. हिन्दू उत्तराधिकार कानून में चौदह साल पहले बदलाव हो चुका है. मगर पितृसत्तात्मक सोच उसे पचा ही नहीं पा रही है. इसीलिए कोई लड़की जब अपने मायके में सम्पत्ति का अधिकार मांगती है, बराबरी का हक मांगती है, तो उस पर घर वाले, आस पड़ोस के लोग दबाव बनाते हैं. आमतौर पर हमारे समाज में बेटे को ही पिता का उत्तराधिकारी माना जाता है. हिन्दू परिवारों में बेटे को ही घर का कर्ताधर्ता कहा जाता है. आज से चौदह साल पहले तक पैतृक सम्पत्ति में बेटी को बेटे जैसा दर्जा हासिल नहीं था, लेकिन साल 2005 के संशोधन के बाद कानून ये कहता है कि बेटा और बेटी को पिता की सम्पत्ति में बराबरी का हक है. मगर यह हक बेटी हासिल नहीं कर पा रही है. अपना हक छोड़ने के लिए कभी उसे भावनात्मक रूप से मजबूर कर दिया, कभी हिंसा और उत्पीड़न के जरिये उसे डराया जाता है. मायके से सम्बन्ध खराब होने और रिश्तेदारों में छवि बिगड़ने के डर से हिन्दू उत्तराधिकार कानून बनने के डेढ़ दशक बाद भी ज्यादातर लड़कियां पैतृक सम्पत्ति में अपना हक पाने से महरूम हैं.

मेरी कोई जाति भी नहीं

यह कानून एक तरफ जहां महिलाओं को मजबूत आर्थिक आधार देता है, वहीं दूसरी तरफ गहरी भावनात्मक टूटन का भी कारण बन रहा है. आज भी घर का बेटा अपने पिता की पैतृक सम्पत्ति पर सिर्फ अपना हक समझता है. ऐसे में यदि बहन पैतृक सम्पत्ति में अपना बराबर का हक लेने की बात करती है, तो भाई इस बात से आहत होकर उससे अपने सम्बन्ध खत्म कर लेता है. अक्सर ही लड़कियों के सामने भाइयों के साथ सम्बन्ध या पैतृक सम्पत्ति में से किसी एक चीज को चुनने का मुश्किल विकल्प रहता है. इस कड़े विकल्प के कारण ही अक्सर बहुत सी बहनें अपने आर्थिक हकों को छोड़ देती हैं, क्योंकि वे खुद परिवार को तोड़ने का ठीकरा अपने सर पर नहीं फोड़ना चाहतीं.

अश्लील नाटक नहीं , नजरिया है

समाजशास्त्रियों का मानना है कि बहनें बचपन से ही भाइयों के प्रति प्रेम में अपने छोटे-छोटे हकों को छोड़ती रहती हैं. इसी कारण भाई बड़े होने पर इस बात के लिए तैयार नहीं हो पाते कि सम्पत्ति में उन्हें अपनी बहनों को बराबर का हिस्सा देना है. यह भी अजीब ही है, कि पैतृक सम्पत्ति या मायके के साथ सम्बन्ध में से कोई एक चीज चुनने का विकल्प अक्सर भाई ही अपनी बहनों के सामने रखते हैं. उसके बावजूद सम्बन्ध तोड़ने के अपराधबोध में बहनें ही रहती हैं भाई नहीं! जो बहनें पैतृक सम्पत्ति में अपने हक को लेकर अड़ी रहती हैं, वे कहीं न कहीं भाई-भाभी से सम्बन्ध खराब होने के गहरे अपराधबोध में भी रहती हैं. लेकिन सवाल यह है कि जो सम्बन्ध सिर्फ अपना आर्थिक हित छोड़ने भर से बना हुआ रहे, आखिर वह कितना गहरा और सच्चा है?

इसी कड़ी में कल आगे पढ़िए- आखिर क्यों लड़कियों को विद्रोही मान ली जाती है?

रिश्ता

रोहन अपनी मां मीनाक्षी के एकाकी जीवन से चिंतित था तो अलका को अपने पापा अशोकजी का अकेलापन बर्दाश्त नहीं हो रहा था. अत:

अशोकजी शाम को अपने घर की छत पर टहल रहे थे. एक मोटरसाइकिल सवार गेट के सामने आ कर रुका, जिस का चेहरा हैलमेट में ढका हुआ था.

उस ने पहले अपनी जैकट की जेब से एक लिफाफा निकाल कर लैटर बौक्स में डाला, फिर सिर उठा कर अशोकजी की ओर देखा और हाथ हिलाने के बाद चला गया.

उस लिफाफे में अशोकजी को एक पत्र मिला जिस में लिखा था, ‘सर, आप के डर के कारण आप की बेटी अलका मुझ से रिश्ता नहीं जोड़ रही है. उस की तरह मैं भी 2 महीने बाद नौकरी करने अमेरिका जा रहा हूं. वहां मेरा सहारा पा कर वह सुरक्षित रहेगी.

लिटिल चैंप का घमासान

‘मेरी आप से प्रार्थना है कि आप अलका से बात कर उस का भय दूर करें. आप ने हमारे रिश्ते को स्वीकार करने में अड़चनें डालीं तो जो होगा उस के जिम्मेदार सिर्फ आप ही होंगे.

‘मैं अलका का सहपाठी हूं. अपना फोन नंबर मैं ने नीचे लिख दिया है. आप जब चाहेंगे मैं मिलने आ जाऊंगा. आप के आशीर्वाद का इच्छुक-रोहन.’

पत्र पढ़ कर अशोकजी बौखला गए. उन के लिए रोहन नाम पूरी तरह से अपरिचित था. उन की इकलौती संतान अलका ने कभी किसी रोहन की चर्चा नहीं छेड़ी थी.

पत्र में जो धमकी का भाव मौजूद था उस ने अशोकजी को चिंतित कर दिया. अलका का मोबाइल नंबर मिलाने के बजाय उन्होंने अपने हमउम्र मित्र सोमनाथ का नंबर मिलाया.

अशोकजी के फौरन बुलावे पर सोमनाथ 15 मिनट के अंदर उन के पास पहुंच गए. रोहन का पत्र पढ़ने के बाद उन्होंने चिंतित स्वर में टिप्पणी की, ‘‘यह तो इश्क का मामला लगता है मेरे भाई. अलका बेटी ने कभी इस रोहन के बारे में तुम से कुछ नहीं कहा?’’

‘‘एक शब्द भी नहीं,’’ अशोकजी भड़क उठे, ‘‘मुझे लगता है कि यह मजनू की औलाद मेरी बेटी को जरूर तंग कर रहा है. अलका ने इस के प्यार को ठुकराया होगा तो इस कमीने ने यह धमकी भरी चिट्ठी भेजी है.’’

‘‘दोस्त, यह भी तो हो सकता है कि अलका भी उसे चाहती…’’

सोमनाथ की बात को बीच में काटते हुए अशोकजी बोले, ‘‘अगर ऐसा होता तो मेरी बेटी जरूर मुझ से खुल कर सारी बात कहती. तू तो जानता ही है कि तेरी भाभी की मृत्यु के बाद अपनी बेटी से अच्छे संबंध बनाने के लिए मैं ने अपने स्वभाव को बहुत बदला है. वह मुझ से हर तरह की बात कर लेती है, तो इस महत्त्वपूर्ण बात को क्यों छिपाएगी?’’

‘‘अब क्या करेगा?’’

‘‘तू सलाह दे.’’

‘‘इस रोहन के बारे में जानकारी प्राप्त करनी पड़ेगी. अगर यह गलत किस्म का युवक निकला तो इस का दिमाग ठिकाने लगाने को पुलिस की मदद मैं दिलवाऊंगा.’’

सोमनाथ से हौसला पा कर अशोकजी की आंखों में चिंता के भाव कुछ कम हुए थे.

रोहन के बारे में जानकारी प्राप्त करने की जिम्मेदारी अशोकजी ने अपने भतीजे साहिल को सौंपी. उस की रिपोर्ट मिलने  तक उन्होंने अलका से इस बारे में कोई बात न करने का निर्णय किया था.

‘‘अंकल, रोहन सड़क छाप मजनू नहीं बल्कि बहुत काबिल युवक है,’’ साहिल ने 2 दिन बाद अशोकजी को बताया, ‘‘अलका दी और रोहन कक्षा के सब से होशियार विद्यार्थियों में हैं. तभी दोनों को अमेरिका में अच्छी नौकरी मिली है. पहले इन दोनों के बीच अच्छी दोस्ती थी पर करीब 2 सप्ताह से आपस में बोलचाल बंद है, रोहन के घर का पता इस कागज पर लिखा है.’’

पिंजरे वाली मुनिया

साहिल ने एक कागज का टुकड़ा अशोकजी को पकड़ा दिया था.

‘‘तुम ने मालूम किया कि रोहन के घर में और कौनकौन हैं?’’

‘‘बड़ी बहन की शादी हो चुकी है और वह मुंबई में रहती है. रोहन अपनी विधवा मां के साथ रहता है. उस के पिता की सड़क दुर्घटना में जब मृत्यु हुई थी तब वह सिर्फ 10 साल का था.’’

‘‘और किसी महत्त्वपूर्ण बात की जानकारी मिली?’’ अशोकजी ने साहिल से पूछा.

‘‘नहीं, चाचाजी, मैं ने जिस से भी पूछताछ की है, उस ने रोहन की तारीफ ही की है. हमारी जातबिरादरी का न सही पर लड़का अच्छा है. मेरी राय में अगर रिश्ते की बात उठे तो आप हां कहने में बिलकुल मत झिझकना,’’ अपनी राय बता कर साहिल चला गया था.

उस शाम अशोकजी ने जब अलका से इस विषय पर बातचीत आरंभ की तो सोमनाथ भी वहां मौजूद थे.

सारी बात सुन कर अलका ने साफ शब्दों में अपना मत उन दोनों के सामने जाहिर कर दिया, ‘‘पापा, रोहन से मैं प्यार नहीं करती. फिर ऐसी कोई बात होती तो मैं आप को जरूर बताती.’’

‘‘बेटी, क्या तुम किसी और से प्यार करती हो?’’ सोमनाथजी ने सचाई जानने का मौका गंवाना उचित नहीं समझा था.

‘‘नहीं, अंकल, अभी तो अपना अच्छा कैरियर बनाना मैं  बेहद महत्त्वपूर्ण मानती हूं.’’

‘‘यह रोहन तुम्हें तंग करता है क्या?’’ अशोकजी की आंखों में गुस्से के भाव उभरे.

‘‘मुझे जैसे ही इस बात का एहसास हुआ कि वह मुझ से अलग तरह का रिश्ता बनाना चाहता है, तो मैं ने उस से बोलचाल बंद ही कर दी. उस ने मेरा इशारा न समझ आप को पत्र भेजा, इस बात से मैं हैरान भी हूं और परेशान भी.’’

‘‘तू बिलकुल परेशान मत हो, अलका. कल ही मैं उस से बात करता हूं. उस ने तुझे परेशान किया तो गोली मार दूंगा उस को,’’ अशोकजी का चेहरा गुस्से से भभक उठा.

उसे किस ने मारा

‘‘यार, गुस्सा मत कर…नहीं तो तेरा ब्लड प्रेशर बढ़ जाएगा,’’ सोमनाथ ने अशोकजी को समझाया पर वह रोहन को ठीक करने की धमकियां देते ही रहे.

‘‘पापा,’’ अचानक अलका जोर से चिल्ला पड़ी, ‘‘आप शांत क्यों नहीं हो रहे हैं. एक बार हाई ब्लड पे्रशर के कारण नर्सिंग होम में रह आने के बाद भी आप की समझ में नहीं आ रहा है? आप फिर से अस्पताल जाने पर क्यों तुले हैं?’’

अपनी बेटी की डांट सुन कर अशोकजी चुप तो जरूर हो गए पर रोहन के प्रति उन के दिल का गुस्सा जरा भी कम नहीं हुआ था.

रोहन ने उस रात सोने से पहले अपनी मां मीनाक्षी को शर्मीली सी मुसकान होंठों पर ला कर जानकारी दी, ‘‘कल लंच पर मैं ने अलका और उस के पापा को बुलाया है. उन की अच्छी खातिरदारी करने की जिम्मेदारी आप की है.’’

‘‘यह अलका कौन है?’’ खुशी के मारे मीनाक्षी एकदम से उत्तेजित हो उठीं.

‘‘मेरे साथ पढ़ती है, मां.’’

‘‘प्यार करतेहो तुम दोनों एकदूसरे से?’’

रोहन ने गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘उस के पापा को तुम ने मना लिया तो रिश्ता पक्का समझो. वह गुस्सैल स्वभाव के हैं और अलका उन से डरती है.’’

‘‘अपने बेटे की खुशी की खातिर मैं उन्हें मनाऊंगी शादी के लिए. तू फिक्र न कर, मुझे अलका के बारे में बता,’’ मीनाक्षी की प्रसन्नता ने उन की नींद को कहीं दूर भगा दिया था.

अशोकजी ने फोन कर के रोहन को अपने घर बुलाया था, पर उस ने सुबह व्यस्तता का बहाना बना कर उन्हें व अलका को दोपहर के समय अपने घर आने को राजी कर लिया था.

‘‘बेटी, किसी के घर में बैठ कर उसे डांटनाडपटना जरा कठिन हो जाता है, पर वह लफंगा आसानी से सीधे रास्ते पर नहीं आया तो आज उस की खैर नहीं,’’ अशोकजी ने अपनी इस धमकी को एक बार फिर दोहरा दिया.

लौटते हुए

‘‘पापा, अपने गुस्से को जरा काबू में रखना, खासकर रोहन की मम्मी को कुछ उलटासीधा मत कह देना, क्योंकि रोहन उन्हें पूजता है. अपनी मां की हलकी सी बेइज्जती भी उस से बर्दाश्त नहीं होगी,’’ अलका बोली.

‘‘मैं पागल नहीं हूं जो बिना बात किसी से उलझूंगा. रोहन तुम्हारा नाम अपने दिल से निकालने का वादा कर ले, तो बात खत्म. अगर वह ऐसा नहीं करता है तो मुझे सख्ती बरतनी ही पडे़गी,’’ अशोकजी ने अपनी बेटी की सलाह को पूरी तरह मानने से इनकार कर दिया.

‘‘पापा, समझदारी से काम लोगे तो इस मामले को निबटाना आसान हो जाएगा. हमें रोहन की मां को अपने पक्ष में करना है. बस, एक बार उन्होंने समझ लिया कि यह रिश्ता नहीं हो सकता तो रोहन को सीधे रास्ते पर लाने के लिए उन का एक आदेश ही काफी होगा.’’

‘‘मैं समझ गया.’’

‘‘गुड और गुस्से को काबू में रखना है.’’

‘‘ओके,’’ अपनी बेटी का गाल प्यार से थपथपा कर अशोकजी ने घंटी का बटन दबा दिया था.

मीनाक्षी ने मेहमानों की आवभगत के लिए पड़ोस में रहने वाली गायत्री को भी बुला लिया था.

वह अपनी भावी बहू व समधी की खातिर में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी. इतने अपनेपन से मीनाक्षी ने अशोकजी व अलका का स्वागत किया कि तनाव, शिकायतों व नाराजगी का माहौल पनपने ही नहीं पाया.

रोहन बाजार से मिठाई लेने चला गया था. वह कुछ ज्यादा ही देर से लौटा और तब तक मीनाक्षी ने मेज पर खाना लगा दिया था.

खाना इतना स्वादिष्ठ बना था कि अशोकजी ने सारी चिंता व परेशानी भुला कर भरपेट भोजन किया. मीनाक्षी के आग्रह के कारण शायद वह जरूरत से ज्यादा ही खा गए थे.

भोजन कर लेने के बाद ही मुद्दे की बात शुरू हो पाई. गायत्री आराम करने के लिए अपने घर चली गई थी.

‘‘मीनाक्षीजी, हम कुछ जरूरी बातें रोहन और आप से करने आए हैं,’’ अशोकजी ने बातचीत आरंभ की.

‘‘भाई साहब, मैं तो इतना कह सकती हूं कि अलका को सिरआंखों पर बिठा कर  रखूंगी मैं,’’ मीनाक्षी ने अलका को बडे़ प्यार से निहारते हुए जवाब दिया.

‘‘आंटी, मैं रोहन से प्यार नहीं करती हूं, इसलिए आप कोई गलतफहमी न पालें,’’ अलका ने कोमल लहजे में अपने दिल की बात उन से कह दी.

‘‘मुझे रोहन ने सब बता दिया है, अलका. अपने पापा से डर कर तुम अपनी इच्छा को मारो मत. मुझे विश्वास है कि भाई साहब आज इस रिश्ते के लिए ‘हां’ कर देंगे,’’ अपनी बात समाप्त कर मीनाक्षी ने प्रार्थना करने वाले अंदाज में अशोकजी के सामने हाथ जोड़ दिए.

‘‘आप बात को समझ नहीं रही हैं, मीनाक्षीजी. मेरी बेटी आप के बेटे से शादी करना ही नहीं चाहती है, तो फिर  मेरी ‘हां’ या ‘ना’ का सवाल ही पैदा नहीं होता,’’ अशोकजी चिढ़ उठे.

‘‘पापा, डोंट बिकम एंग्री,’’ अलका ने अपने पिता को शांत रहने की बात याद दिलाई.

‘‘अंकल, आप इस रिश्ते  के लिए ‘हां’ कह दीजिए. अलका को राजी करना फिर मेरी जिम्मेदारी है,’’ रोहन ने विनती की.

‘‘कैसी बेहूदा बात कर रहे हो तुम भी,’’ अशोकजी को अपना गुस्सा काबू में रखने में काफी कठिनाई हो रही थी, ‘‘जब अलका की दिलचस्पी नहीं है तो मैं कैसे और क्यों ‘हां’ कर दूं?’’

‘‘वह तो आप से डरती है, अंकल.’’

‘‘शटअप.’’

‘‘पापा, प्लीज,’’ अलका ने फिर अशोकजी को शांत रहने की याद दिलाई.

‘‘लेकिन यह इनसान हमारी बात समझ क्यों नहीं रहा है?’’

‘‘अलका के दिल की इच्छा मैं अच्छी तरह से जानता हूं, अंकल.’’

‘‘तो क्या वह झूठमूठ इस वक्त ‘ना’ कह रही है?’’

‘‘जी हां, मुझे आप के घर से रिश्ता जोड़ना है और वैसा हो कर रहेगा, अंकल.’’

‘‘मैं तुम्हें जेल भिजवा दूंगा, मिस्टर रोहन,’’ अशोकजी ने धमकी दी.

स्लीपिंग पार्टनर

‘‘भाई साहब, ऐसी अशुभ बातें मत कहिए. आप की बेटी इस घर में बहुत सुखी रहेगी, इस की गारंटी मैं देती हूं,’’ मीनाक्षी की आंखों में आंसू छलक आए तो अशोकजी चुप रह कर रोहन को क्रोधित नजरों से घूरने लगे.

‘‘पापा, आप इन्हें समझाइए और मैं रोहन को बाहर ले जा कर समझाती हूं,’’ अलका झटके से खड़ी हुई और बिना  जवाब का इंतजार किए दरवाजे की तरफ चल पड़ी.

रोहन उस के पीछेपीछे घर से बाहर चला गया. मीनाक्षी और अशोकजी के बीच कुछ देर खामोशी छाई रही. सामने बैठी स्त्री की आंखों में छलक आए आंसुओं के चलते अशोकजी की समझ में  नहीं आ रहा था कि वह उस के मन को चोट  पहुंचाने वाली चर्चा को कैसे शुरू करें.

लेकिन एक बार उन के बीच बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो दोनों को वक्त का एहसास ही नहीं रहा. अपनेअपने खट्टेमीठे अनुभवों को एकदूसरे के साथ उन्होंने बांटना जो शुरू किया तो 2 घंटे का समय कब बीत गया पता ही नहीं चला.

‘‘मीनाक्षीजी, आप के पास सोने का दिल है. मेरी बेटी आप के घर की बहू बन कर आती तो यह मैं उस का सौभाग्य मानता. मुझे पूरा विश्वास है कि वह इस घर में बेहद खुश व सुखी रहेगी. लेकिन अफसोस यह है कि अलका खुद इस रिश्ते में दिलचस्पी नहीं रखती है. मैं उसे राजी करने की कोशिश करूंगा, अगर वह नहीं मानी तो आप रोहन को समझा देना कि वह अलका को तंग न करे,’’ अशोकजी ने भावुक लहजे में मीनाक्षी से प्रार्थना की.

‘‘आप जैसे नेकदिल इनसान को जिस काम से दुख पहुंचे या आप की बेटी परेशान हो, वैसा कोई कार्य मैं अपने बेटे को नहीं करने दूंगी,’’ मीनाक्षी के इस वादे ने अशोकजी के दिल को बहुत राहत पहुंचाई.

अलका और रोहन के वापस लौटने पर इन दोनों ने उलटे सुर में बोलते हुए अपनीअपनी इच्छाएं जाहिर कीं तो उन दोनों को बहुत ही आश्चर्य हुआ.

‘‘अलका, तुम अगर रोहन को अच्छा मित्र बताती हो तो कल को अच्छा जीवनसाथी भी उस में पा लोगी. मीनाक्षीजी के घर में तुम बहुत सुखी और सुरक्षित रहोगी, इस का विश्वास है मुझे. मैं दबाव नहीं डाल रहा हूूं पर अगर तुम ने यह रिश्ता मंजूर कर लिया तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा,’’ अपनी इच्छा बता कर अशोकजी ने बेटी का माथा चूम लिया.

‘‘रोहन, अलका खुशीखुशी ‘हां’ कहे तो ठीक है, नहीं तो तुम इसे किसी भी तरह परेशान कभी मत करना. भाई साहब का ब्लड प्रेशर ऊंचा रहता है. तुम्हारी वजह से इन की तबीयत खराब हो, यह मैं कभी नहीं चाहूंगी,’’ मीनाक्षी ने बड़े भावुक अंदाज में रोहन से अपने मन की इच्छा बताई.

‘‘पापा, क्या आप चाहते हैं कि मैं रोहन से शादी कर लूं?’’ अलका ने हैरान स्वर में पूछा.

‘‘हां, बेटी.’’

‘‘आप की सोच में बदलाव आंटी के कारण आया है न?’’

‘‘हां, यह तुम्हारा बहुत खयाल रखेंगी, इन के पास सोने का दिल है.’’

‘‘गुड,’’ अलका की आंखों में अजीब सी चमक उभरी.

रोहन ने अपनी मां से पूछा, ‘‘मेरी इच्छा को नजरअंदाज कर अब जो आप कह रही हैं, उस के पीछे कारण क्या है, मां?’’

‘‘मैं इन को दुखी और चिंतित नहीं देखना चाहती हूं,’’ मीनाक्षी ने अशोकजी की तरफ इशारा करते हुए जवाब दिया.

‘‘आप की नजरों में यह कैसे इनसान हैं?’’

‘‘बडे़ नेक…बडे़ अच्छे.’’

‘‘गुड, वेरी गुड,’’ ऐसा जवाब दे कर रोहन ने अर्थपूर्ण नजरों से मां की तरफ देखा और बोला, ‘‘इन बदली परिस्थितियों को देखते  हुए हमें सोचविचार के लिए एक बार फिर बाहर चलना चाहिए.’’

‘‘चलो,’’ अलका फौरन उठ कर दरवाजे की तरफ चल पड़ी.

‘‘कहां जा रहे हो दोनों?’’ मीनाक्षी और अशोकजी ने चौंक कर साथसाथ सवाल किए.

‘‘करीब आधे घंटे में आ कर बताते हैं,’’ रोहन ने जवाब दिया और अलका का हाथ पकड़ कर घर से बाहर निकल गया.

कुछ पलों की खामोशी के बाद अशोकजी ने टिप्पणी की, ‘‘इन दोनों का व्यवहार मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है.’’

‘‘अगर दोनों बच्चे शादी के लिए तैयार हो गए तो मजा आ जाएगा,’’ मीनाक्षी की आंखों में आशा के दीप जगमगा उठे.

अलका और रोहन करीब 45 मिनट के बाद जब लौटे तो सोमनाथ और गायत्री उन के साथ थे. इन चारों की आंखों में छाए खुशी व उत्तेजना के भावों को पढ़ कर मीनाक्षी और अशोकजी उलझन में पड़ गए.

‘‘आप दोनों का उचित मार्गदर्शन करने व हौसला बढ़ाने के लिए ही हम इन्हें साथ लाए हैं,’’ रोहन ने रहस्यमयी अंदाज में मुसकराते हुए मीनाक्षी व अशोकजी की आंखों में झलक रहे सवाल का जवाब दिया.

सोमनाथ अपने दोस्त की बगल में उस का हाथ पकड़ कर बैठ गए. गायत्री अपनी सहेली के पीछे उस के कंधों पर हाथ रख कर खड़ी हो गई.

रोहन ने बातचीत शुरू की, ‘‘अलका के पापा का दिल न दुखे इस के लिए मां ने मेरी इच्छा को नजरअंदाज कर मुझ से यह वादा मांगा है कि मैं अलका को कभी तंग नहीं करूंगा. लेकिन मैं अभी भी इस घर से रिश्ता जोड़ना चाहता हूूं.’’

मीनाक्षी या अशोकजी के कुछ बोलने से पहले ही अलका ने कहा, ‘‘मैं रोहन से प्रेम नहीं करती पर फिर भी दिल से चाहती हूं कि हमारे बीच मजबूत रिश्ता कायम हो.’’

क्यों बनाता है गुनहगार मुझे

‘‘तुम शादी से मना करोगी तो ऐसा कैसे संभव होगा?’’ अशोकजी ने उलझन भरे लहजे में पूछा.

‘‘एक तरीका है, पापा.’’

‘‘कौन सा तरीका?’’

‘‘वह मैं बताता हूं,’’ सोमनाथजी ने खुलासा करना शुरू किया, ‘‘मुझे बताया गया है कि ़तुम मीनाक्षीजी से इतने प्रभावित हो कि अलका से इस घर की बहू बनने की इच्छा जाहिर की है तुम ने.’’

‘‘मीनाक्षीजी बहुत अच्छी और सहृदय महिला हैं और अलका…’’

‘‘मीनाक्षीजी, आप की मेरे दोस्त के बारे में क्या राय बनी है?’’ सोमनाथ ने अपने दोस्त को टोक कर चुप किया और मीनाक्षी से सवाल पूछा.

‘‘इन का दिल बहुत भावुक है और मैं नहीं चाहती कि इन का स्वास्थ्य रोहन की किसी हरकत के कारण बिगड़े. तभी मैं ने अपने बेटे से कहा कि अलका अगर शादी के लिए मना करती है तो…’’

‘‘यानी कि आप दोनों एकदूसरे को अच्छा इनसान मानते हैं और यही बात आधार बनेगी दोनों परिवारों के बीच मजबूत रिश्ता कायम करने में.’’

‘‘मतलब यह कि जीवनसाथी अलका और मैं नहीं बल्कि आप दोनों बनो,’’ रोहन ने साफ शब्दों में सारी बात कह दी.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ अशोकजी चौंक पड़े.

‘‘यह क्या कह रहा है तू?’’ मीनाक्षी घबरा उठीं.

‘‘रोहन और मेरी यही इच्छा रही है,’’ अलका बोली, ‘‘आंटी और पापा को मिलाने के लिए हमें कुछ नाटक करना पड़ा. हम दोनों ही विदेश जाने के इच्छुक हैं. मेरे पापा की देखभाल की जिम्मेदारी आप संभालिए, प्लीज.’’

‘‘अंकल, विदेश में मैं अलका का खयाल रखूंगा और आप यहां मां का सहारा बन कर हमें चिंता से मुक्ति दिलाइए.’’

‘‘लेकिन…’’ अशोकजी की समझ में नहीं आया कि आगे क्या कहें और मीनाक्षी भी आगे एक शब्द नहीं बोल पाईं.

‘‘प्लीज, अंकल,’’ रोहन ने अशोकजी से विनती की.

‘‘आंटी, प्लीज, मुझे वह खुशी भरा अवसर दीजिए कि मैं आप को ‘मम्मी’ बुला सकूं,’’ अलका ने मीनाक्षी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले कर विनती की.

‘‘हां कह दे मेरे यार,’’ सोमनाथ ने अपने दोस्त पर दबाव डाला, ‘‘अपनी अकेलेपन की पीड़ा तू ने कई बार मेरे साथ बांटी है. अच्छे जीवनसाथी के प्रेम व सहारे की जरूरत तो उम्र के इसी मुकाम पर ज्यादा महसूस होती है जहां तुम हो. इस रिश्ते को हां कह कर बच्चों को चिंतामुक्त कर इन्हें पंख फैला कर ऊंचे आकाश में उड़ने को स्वतंत्र कर मेरे भाई.’’

गायत्री ने अपनी सहेली को समझाया, ‘‘मीनू, हम स्त्रियों को जिंदगी के हर मोड़ पर पुरुष का सहारा किसी न किसी रूप में लेना ही पड़ता है. बेटा विदेश चला जाएगा तो तू कितनी अकेली पड़ जाएगी, जरा सोच. तुझे ये पसंद हों तो फौरन हां कह दे. मुझे इन्हें ‘जीजाजी’ बुला कर खुशी होगी.’’

‘‘चुप कर,’’ मीनाक्षी के गाल शर्म से गुलाबी हो गए तो सब को उन का जवाब मालूम पड़ गया.

अशोकजी पक्के निर्णय पर पहुंचने की चमक आंखों में ला कर बोले, ‘‘मैं इस पल अपने दिल में जो खुशी व गुदगुदी महसूस कर रहा हूं, सिर्फ उसी के आधार पर मैं इस रिश्ते के लिए हां कह रहा हूं.’’

‘‘थैंक यू, अंकल,’’ रोहन ने हाथ जोड़ कर उन्हें धन्यवाद दिया.

‘‘थैंक यू, मेरी नई मम्मी,’’ अलका, मीनाक्षी के गले से लग गई.

सोमनाथ और गायत्री ने तालियां बजा कर इस रिश्ते के मंगलमय होने की प्रार्थना मन ही मन की.

‘‘मेरी छोटी बहना, बधाई हो. हमारी योजना इतनी जल्दी और इस अंदाज में सफल होगी, मैं ने सोचा भी न था,’’ रोहन ने शरारती अंदाज में अलका की चोटी खींची तो मीनाक्षी और अशोकजी एकदूसरे की तरफ देख बडे़ प्रसन्न व संतोषपूर्ण ढंग से मुस्कुराए.

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