‘कांग्रेस के जो प्रत्याशी नहीं जीतेगे वह भाजपा को नुकसान पहुंचाएंगे’ कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के इस बयान से उत्तर प्रदेश में नये जातीय समीकरण बन सकते है. अगर जातीयता के आधार पर वोट ट्रांसफर हुआ तो राष्टवाद और मोदी नाम पर चुनाव जीतना भाजपा के छोटे नेताओं के लिये मुश्किल हो जायेगा.

भाजपा ने अपने बडे नेताओं की जीत के लिये भले ही बेहतर फील्डिंग सजाई हो पर छोटे नेताओं की जीत सांसत में फंसी है. सपा-बसपा गठबंधन के बाद अब कांग्रेस ने भी अपनी ताकत भाजपा को हराने में लगा दी है जिससे कई सीटों पर भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी अब सीधे मुकाबले में आमने सामने है. कांग्रेस की बदली चुनावी रणनीति ने भाजपा के सामान्य प्रत्याशियों के सामने संकट खडा कर दिया है.

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भाजपा संगठन भले ही उत्तर प्रदेश में 75 से अधिक सीटे जीतने का दावा कर रही रहा हो पर उसे भी इस बात का डर सता रहा है कि सीधी लडाई में कितना सफल होगे. भाजपा ने अपने बडे नेताओं को जितवाने के लिये हर तरह के दांव पेंच अपना लिये पर सामान्य सासंदो के लिये चुनाव मुश्किल हो गया है.

भाजपा के कार्यकर्ता बड़े नेताओं के चुनाव प्रचार में पूरा समय दे रहे है पर उतनी शिदद्त से छोटे नेताओं का चुनाव प्रचार नहीं हो पा रहा है. छोटे शहरों में प्रचार कर रहे लोगों को जमीनी मुद्दों से उलझना पड़ रहा. यहां जाति का मुद्दा हावी है. इसके साथ मंहगाई, विकास और रोजगार के मुददो पर भी लोग बात कर रहे है. यह मुद्दे भले ही उपर ना दिख रहे हो पर अंदर ही अंदर सत्ता पक्ष को परेशान कर रहे है. भाजपा के लिये परेशानी का सबब यह भी है कि वोटिंग का प्रतिशत कम हो रहा है.

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कम मतदान शहरो और उन लोगों में ज्यादा है जो भाजपा के पक्ष में बात अधिक करते है. वैसे तो भाजपा ने कई ऐसे सांसदों के टिकट काटे जिनके पक्ष में जनता की राय अच्छी नहीं थी. भाजपा के तमाम सांसदों को अपने क्षेत्रों में गुटबाजी का सामना करना पड़ रहा है. भाजपा के ज्यादातर लोग मोदी के नाम पर वोट मांग रहे है. लोगों को अपने सांसद से काम होता है. वह उसको समझना चाहती है. ऐसे में मोदी के नाम पर सामान्य सांसद को वोट क्यों दे ? यह समझ उसे नहीं आ रहा है. ऐसे में कई बार वह मतदान ही करने नहीं जाता है.

चुनाव प्रचार का भी महौल बदल रहा है. अब चुनाव प्रचार सडको और कालोनियों में दिख रहा है. उससे आम जनता के बीच प्रचार नहीं हो पा रहा है. जिससे वहां के वोटर में उदासीनता फैल गई है. वह वोट देने नहीं जा रहे जिससे मतदान का प्रतिशत कम हो रहा है. अब यह डर छोटे नेताओं को सताने लगा है. सपा-बसपा की जातीय गोलबंदी में कांग्रेस के शामिल होने के बाद भाजपा के लिये डगर कठिन हो गई है.

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