जिंदगियां रोज कई जीता हूं मैं,

इनमें कोई मेरी है पूछता हूं मैं.

एक रात जो टूट गई थी बेसबब

हर रात बिछड़ी नींद ढ़ूंढ़ता हूं मैं.

ख्वाबों का हश्र ऐसा भी देखा है

पलकें बंद करने से डरता हूं मैं.

अधूरेपन का अहसास हमेशा रहा

तुझसे खुद को पूरा करता हूं मैं.

उजड़ना, बिखरना नसीब मेरा

ए मरूधर, बस यूं ही संवरता हूं मैं...

आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें

डिजिटल

(1 साल)
USD48USD10
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
 

डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन

(1 साल)
USD150USD120
 
सब्सक्राइब करें

सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं

  • सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
  • देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
  • 7000 से ज्यादा कहानियां
  • समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
  • 24 प्रिंट मैगजीन
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...