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रहस्यमयी बौनों का गांव

पूरी दुनिया रहस्यों से भरी हुई है. इन में कई रहस्य तो अजीबोगरीब होने के साथ दिलचस्प भी होते हैं. यहां हम एक ऐसे अजीबोगरीब गांव के बारे में बता रहे हैं, जिसे बौनों का गांव कहा जाता है. आप ने परीकथाओं में जरूर ऐसे गांव का जिक्र सुना होगा, पर ये असल का गांव है जहां सिर्फ बौने ही रहते हैं.

इस गांव की खास बात यह है कि यहां जो बच्चे पैदा होते हैं, वे भी बौने ही होते हैं. इस गांव के करीब आधे लोगों की लंबाई मात्र 2 फीट 1 इंच से ले कर 3 फीट 10 इंच तक ही है. बौनों के इस गांव का नाम यांग्सी है और यह चीन के शिचुआन प्रांत के दूरदराज पहाड़ी वाले इलाके में स्थित है. यह गांव ‘ड्वार्फ विलेज औफ चाइना’ के नाम से भी फेमस है.

बौनों के इस गांव में ज्यादातर मामलों में बच्चों की लंबाई 5 से 7 साल के बाद रुक जाती है. उन का कद अपनी उम्र के साथ नहीं बढ़ता, वहीं कुछ मामलों में बच्चों की लंबाई सिर्फ 10 साल तक ही बढ़ पाई.
गांव के बुजुर्गों की मानें तो उन की खुशहाल और सुकूनभरी जिंदगी कई दशक पहले उस समय खत्म हो गई थी, जब इस इलाके को एक खतरनाक बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था.

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एकदम अचानक ऐसा क्या हुआ कि एक सामान्य कदकाठी वाला गांव बौनों के गांव में तब्दील हो गया? इस रहस्य को वैज्ञानिक पिछले 60 सालों में भी नहीं सुलझा पाए हैं. वैज्ञानिक इस गांव की मिट्टी, पानी, हवा, वातावरण, अनाज आदि का कई बार अध्ययन कर चुके हैं. लेकिन फिर भी इस समस्या का कारण खोजने में नाकाम रहे हैं.

यहां के बच्चों की 5 से 7 साल के बाद लंबाई रुक जाना ही एक समस्या नहीं है. इस के अलावा भी यह कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं. इस इलाके में बौनों को देखने जाने की खबरें तो सन 1911 से आ रही हैं. इस के अलावा सन 1947 में एक अंगरेज वैज्ञानिक द्वारा भी यहां सैकड़ों बौने देखे जाने की अफवाहें आई थीं. लेकिन आधिकारिक तौर पर बौनों के इस गांव की पुष्टि सन 1951 में हुई थी.

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सन 1997 में एक रिसर्च में इस बीमारी की वजह गांव की मिट्टी में पारा होने की बात कही गई थी. वहीं कुछ लोगों का मानना है कि इस का कारण वे जहरीली गैसें हैं जो जापान ने कई दशकों पहले चीन में छोड़ी थीं.
वहीं कुछ लोगों का कहना है कि खराब फेंगशुई के चलते ऐसा हो रहा है. इस के अलावा कुछ लोग यह भी मानते हैं कि सब अपने पूर्वजों को सही तरीके से दफन नहीं करने की वजह से यह सजा भुगत रहे हैं.

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एक खानदान में 11 सीए

चार्टर्ड एकाउंटेंट (सीए) बनना कोई आसान नहीं होता. कई लोग सीए बनने की कोशिश करते हैं लेकिन किसी न किसी वजह से सफल नहीं हो पाते. वहीं दूसरी ओर एक परिवार ऐसा भी है, जिस की 5 पीढि़यों से लगातार सीए बन रहे हैं.

उस परिवार में कोई एक-दो नहीं बल्कि 11 सीए हैं. यह परिवार अब लिम्का बुक औफ रिकौर्ड्स और गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में नाम दर्ज कराने जा रहा है. यह परिवार है बिशंभरनाथ चतुर्वेदी का. चतुर्वेदी परिवार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा का मूल निवासी है.

बरसों पहले यह परिवार मुंबई के कफ परेड इलाके में जा कर बस गया था. सन 1925 में बिशंभरनाथ चतुर्वेदी (बीएन) सीए बने थे. सीए बनने के बाद उन्होंने दिल्ली स्थित एक फर्म में काम शुरू किया. इस के बाद बीएन के बेटे अमरनाथ और दीनानाथ भी सन 1955 में सीए बने.

इन की अगली पीढ़ी में बृजमोहन चतुर्वेदी ने सीए बन कर यह व्यवसाय अपनाया. इसी दौरान उन के भाई मदनमोहन, श्रीकांत चतुर्वेदी और सुबोध चतुर्वेदी अथक परिश्रम के बाद सीए बने.
मदनमोहन के बेटे अपूर्व और ऋषभ ने भी पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए सीए बन कर हिसाबकिताब के व्यवसाय को अपनाया. परिवार की लड़कियां भी पुरुषों से कम नहीं निकलीं. अमरनाथ की बेटी टीना चतुर्वेदी ने सीए की परीक्षा पास कर के परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाया. इस के बाद बृजमोहन चतुर्वेदी की पोती मोहिनी चतुर्वेदी ने भी सीए की परीक्षा पास की.

बृजमोहन चतुर्वेदी अपने समाज और व्यवसायिक क्षेत्र में ‘बीएम’ के नाम से जाने जाते हैं. मुंबई के नरीमन पौइंट में बीएम चतुर्वेदी ऐंड कंपनी का औफिस है. बृजमोहन चतुर्वेदी बताते हैं कि जब उन के दादा बिशंभरनाथ चतुर्वेदी 1925 में सीए बने थे, तो मथुरा में उन के समुदाय के लोगों में सीए बनने की होड़ सी लग गई थी.

फिर हमारे समुदाय के करीब 500 युवक इस पेशे में आए थे. इस समय इसी समुदाय के मुंबई में ही करीब 10 हजार सीए हैं. बीएम कहते हैं कि उन के परिवार की 5 पीढि़यों में 11 सीए हैं, जो अपने आप में एक रिकौर्ड है. परिवार की इस उपलब्धि को वह गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स और लिम्का बुक औफ रिकार्ड्स में दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं.

अजब-गजब: 73 साल के हीडे ने जीती 30 हजार मील की रेस

जब हौसलों के चिराग में मेहनत रूपी तेल डाला जाता है तो सफलता की मिसाल  जरूर जलती है. फ्रांस के जीन लुक वेन डेन हीडे ने भी तमाम व्यवधानों के बावजूद वह मुकाम हासिल कर दिखाया जो अनेक  लोगों का केवल सपना बन कर रह जाता है. उन्होंने 30 हजार मील की गोल्डन ग्लोब रेस 212 दिनों में जीत करकीर्तिमान बनाया है.

गोल्डन ग्लोब रेस पिछले साल जुलाई में आयोजित की गई थी. हीडे के अलावा इस रेस में 18 और नाविक शामिल हुए थे. यह रेस याट से करनी थी. फ्रांस के 73 वर्षीय हीडे ने भी इस रेस में भाग लिया. वह 35 फीट लंबी अपनी याट के साथ समुद्र में उतरे थे. रेस की शुरुआत फ्रांस के लेस सबलेस ओलोने स्थित समुद्री तट से हुई थी.

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इस रेस की एक खास बात यह होती है कि इस में अकेले नाविक को कागज के नक्शों और सेक्सटेंट के माध्यम में समुद्र में रास्ता तलाशना होता है. बाहर की दुनिया से कभीकभी ही शौर्टवेव रेडियो के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है. इन सब वजहों से रेस के दौरान तमाम तरह की परेशानियां सामने आती हैं.

याट के माध्यम से 6 बार दुनिया का चक्कर लगाने वाले 73 वर्षीय हीडे को भी रेस के दौरान कई दुश्वारियों का सामना करना पड़ा. नवंबर के महीने में वह उस समय संकट में फंस गए थे, जब उत्तरी समुद्र में आए तूफान से उन की नाव का मस्तूल क्षतिग्रस्त हो गया था.

ऐसी हालत में रेस जीतनी आसान नहीं थी, इसलिए हीडे ने इसे खुद ही रिपेयर करने की ठान ली क्योंकि वह हर हाल में इस रेस को जीतना चाहते थे. कोशिश कर के उन्होंने खुद ही अपनी नाव का मस्तूल रिपेयर कर के केप हार्न का चक्कर पूरा किया.

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इस के लिए उन्हें कई बार 6 मीटर ऊंचे मस्तूल पर भी चढ़ना पड़ा. ज्यादा मुश्किल इस में लगी पिनों को निकालने में हुई, जबकि यह जमीन पर मौजूद किसी वर्कशौप में भी आसान नहीं होता. इस तरह हीडे ने 212 दिनों में यह रेस जीत कर एक नई उपलब्धि हासिल की. इस रेस में हीडे ने पहला स्थान हासिल किया है. अब 5 नाविक इस रेस में बचे हैं जो दूसरे और तीसरे स्थान के लिए प्रतियोगिता कर रहे हैं.

हीडे द्वारा गोल्डन ग्लोब रेस का खिताब जीतने पर ब्रिटिश नागरिक रौबिन नाक्स जोंसटोन ने उन्हें बधाई दी. रौबिन ने 50 साल पहले गोल्डन ग्लोब रेस जीती थी.

हीडे ने बताया कि अभी अन्य किसी रेस में हिस्सा लेने की उन की योजना नहीं है. वह किसी भी रेस में तब तक हिस्सा नहीं लेंगे, जब तक इस में कुछ बड़ा और आकर्षण न हो. अब वह अपनी नाव बेच कर अन्य लोगों को कोचिंग देने की योजना बना रहे हैं. बिना आधुनिक उपकरणों का प्रयोग किए अकेले ही याट से 30 हजार मील की यह रेस जीतने वाले हीडे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बधाइयां मिल रही हैं.

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रेस्क्यू: बेसिर पैर की बचकानी हालत

रेटिंगःआधा स्टार

निर्माता: ‘आरटीजीएस पिक्चर्स’’ के बैनर तले राहुल गणेश तुलसीराम

निर्देशक: नयन पचोरी

लेखकः नयन पचोरी व अभिजीत कांबले

कलाकारः राहुल गणेश तुलसीराम, श्रिजिता डे, इषिता गांगुली, मेघा शर्मा, रानी अग्रवाल, ब्रजेंद्र काला, गिरीश थापर, अभिनव आनंद, शुभांगी लिटेरिया  अन्य.

अवधिः 1 घंटा 41 मिनट

कहानीः

‘‘रेस्क्यू’’ की कहानी तीन मनोरोगी मेडिकल छात्राओं द्वारा अपने किराए के मकान के एजेंट से डरावना बदला लेने की है. फिल्म में तीन लड़कियां हनी(श्रिजिता डे ), आएशा (मेघा शर्मा) और मीरा (इशिता गांगुली) हैं. जो कि मुंबई के मेडिकल कौलेज में डाक्टरी की पढ़ाई कर रही हैं. अतीत में तीनों की जिंदगी में कुछ घटनाएं घट चुकी हैं. अब तीनों सायकिक हो चुकी हैं. इनमें से दो ‘गे’ हैं, यानी कि इनके बीच समलैंगिक संबंध हैं. जब मीरा के पिता को आएशा व मीरा के संबंधों के बारे में पता चलता है, तो मीरा अपने पिता की हत्या कर देती हैं और घर पर चोरी करने के मकसद से आयी हनी की मदद से अपने पिता को एक जगह गढ्ढा खोदकर दफन कर देती है. फिर यह तीनों लड़कियां मुंबई पहुंचने के बाद किराए के मकान में रहना शुरू करती हैं. इधर जतिन की पूर्व प्रेमिका श्वेता(रानी अग्रवाल) एक दिन राहुल के घर आती है कि उसके उसके पति ने उसे घर से निकाल दिया है और रात में जतिन के साथ हमबिस्तर होती है. पर सुबह गायब हो जाती है.

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अतीत में पुरूषों के साथ इन तीनों लड़कियों के जो अनुभव रहे हैं, उसके लिए किसी पुरूष से बदला लेने के लिए वह तीनों मिलकर एक दिन किराए का मकान दिलाने वाले एजेंट जतिन (राहुलगणेश तुलसीराम) को बंदी बना लेती हैं. तीन दिन तक उसको कई तरह की यातनाएं देती हैं, जिसमें बलात्कार सहित बहुत कुछ होता है. अंततः जतिन मारा जाता है. अंत में पता चलता है कि श्वेता ने अपने पति का कत्ल कर दिया है और जतिन की हत्या में भी उसका हाथ है. श्वेता भी इन तीनेा लड़कियों के साथ थी.

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लेखन व निर्देशनः

फिल्म एक सत्य घटना पर है. यदि लेखक ने शोधकर इस घटना की पूरी जानकारी इकट्ठा कर उसे ज्यों का त्यों पटकथा का रूप दिया होता, तो शायद फिल्म बेहतर बन सकती थी. पर यह पूरी तरह से एक बचकानी पटकथा पर बनी एक अधूरी फिल्म लगती है. कहानी का कहीं कोई सिरा ही नहीं है. तीनो लड़कियां मनोरोगी क्यों बनी? अतीत में इनके साथ ऐसा क्या हुआ कि यह तीनो अब बदला लेने पर उतारू है, वगैरह कुछ भी फिल्म में साफ तौर पर उभरता नही है. क्या यह लड़कियां सेक्स की गुलाम बन चुकी हैं? क्या महज अनुशासन के बंधन के चलते मनोरोगी बनी?

नयन पचोरी का निर्देशन भी अति सतही व बचकाना है. 21 वर्ष की उम्र में यह उनके निर्देशन में बनी दूसरी फिल्म है. पहली फिल्म अभी प्रदर्शन का इंतजार कर रही है. फिल्म में बेवजह कान फोड़़ू गाने ठूंसे गए हैं.

अभिनयः

हर कलाकार ने अभिनय को लेकर निराश ही किया है.

ट्रेकिंग टूर: दिल्ली टू चंद्रशिला

लेखक: देव तंवर  

सामान्य शब्दों में ट्रेकिंग का अर्थ है एक निश्चित लक्ष्य के साथ पहाड़ों और ऊंची चट्टानों की चढ़ाई चढ़ना. इस में बहुत ही ज्यादा बल और संबल के साथ भरपूर जोश का होना आवश्यक है. ट्रेकिंग के लिए भारत में सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख पौपुलर डैस्टिनेशंस हैं.

उत्तराखंड विश्वभर में ट्रेकिंग के लिए प्रसिद्ध है. यहां विश्व के कुछ सब से ऊंचे ट्रेक व पर्वतशृंखलाएं हैं. यह प्रदेश ऊंची पर्वत चोटियों, घने जंगलों, बर्फ से घिरे ग्लेशियर्स और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है.

उत्तराखंड में एक से बढ़ कर एक ट्रेक हैं जिन में चंद्रशिला सब से ऊंचा ट्रेक है. मैं ने चंद्रशिला ट्रेक के बारे में सुना और वहां जाने के लिए मन बना लिया. अपने ट्रैवल एजेंट से बात करने पर मैं ने 6,000 रुपए में यह ट्रेक बुक किया. मैं और मेरे साथ कुछ अनजान साथी अक्षरधाम मंदिर से मिनी बस में चढ़े. हमें मिनी बस से सारी गांव ले जाया गया जहां से देवरियाताल तक 2.5 किलोमीटर का ट्रेक था जिसे हम ने 3 घंटों में पूरा किया. हमारे साथ ट्रैवल एजेंसी का एक गाइड था, जिसे पूरे ट्रेक में हमारा साथ देना था.

ट्रेकिंग के लिए जरूरी सामान

गरम कपड़े ले जाएं जो कंफर्टेबल हों.

अच्छे ट्रेकिंग या स्पोर्ट्स शूज.

खानेपीने का सामान.

रेनकोट साथ रखना बहुत जरूरी है क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में कभी भी वर्षा हो सकती है.

अपने साथ कैमरा या एक से ज्यादा इलैक्ट्रिकल चीजें ले जा रहे हैं तो एक्सटैंशन बोर्ड रखना न भूलें. कुछ देर के लिए होटल या कैफे में बिजली मिले तो आप आसानी से सब एकसाथ चार्ज कर सकते हैं.

पावरबैंक ले जाना न भूलें. पहाड़ों में बिजली की सुविधा नहीं होती.

पानी साथ रखना न भूलें.

ड्राई फ्रूट्स, चौकलेट्स और हाई प्रोटीन के खाद्य पदार्थ साथ जरूर रखें. ये आप की ऊर्जा बनाए रखेंगे.

हैंड सैनिटाइजर रखना न भूलें.

जितना हो सके उतना कम सामान साथ रखें.

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देवरियाताल से चोपता

सारी गांव से देवरियाताल तक का ट्रेक ज्यादा मुश्किल नहीं था. देवरियाताल में हमे टैंट्स में रुकना था. वहां ड्राई टौयलेट्स थे. टैंट में हमें स्लीपिंग बैग्स मिले. ट्रैवल एजेंसी द्वारा यात्रा पर जाने से हमें टैंट्स पहले से लगे हुए मिले वरना टैंट्स भी हमें खुद लगाने पड़ते. आराम कर के हम ने अपना आगे का ट्रेक शुरू किया.

चोपता को भारत का छोटा स्विट्जरलैंड कहा जाता है. यहां की सुंदरता मोहित करने वाली है.  देवरियाताल से 16 किलोमीटर लंबा चोपता का ट्रेक काफी मुश्किल है. देवरियाताल से चोपता के बीच  घने जंगल और ढेरों जानवर हैं. रास्ता पथरीला है, इसलिए यहां ट्रेकिंग करना मुश्किल है. शूज बहुत अच्छे होने चाहिए. इस रास्ते में पुराने पेड़ कभी भी गिर जाते हैं, खाइयां दोनों ओर हैं और रास्ते पतले हैं. यहां के  निवासियों ने कुछ कुत्तों के गले पर लोहे का पट्टा बांध कर उन्हें जंगलों में छोड़ा हुआ है. ये काले कुत्ते काटते नहीं, बल्कि जंगली जानवरों से रक्षा करने के लिए होते हैं. देवरियाताल से चोपता जाने में हमें 9 घंटों का समय लगा.

चोपता से चंद्रशिला

चोपता से आगे बहुत ज्यादा ठंड है. यहां अकसर बर्फबारी भी होती है. इस ट्रेक के रास्ते बहुत ज्यादा खतरनाक हैं. कुछ रास्तों के दोनों तरफ गहरी खाई है जो विचलित कर देती है. 6 किलोमीटर दूरी तय कर के 4 घंटों में हम ने यह ट्रेक पूरा किया. चंद्रशिला की चोटी पर तुंगनाथ मंदिर स्थित है, जिस की ऊंचाई 13,000 फुट है. चंद्रशिला की चोटी से कई दूसरे पहाड़ भी दिखाई देते हैं. यहां से जो नजारा दिखता है वह रोमांचित कर देने वाला है, दिल की धड़कनें सुनाई देने लगती हैं और मन करता है बांहें फैला कर जोरजोर से चिल्लाने लगें. जीवन में यदि इस तरह ट्रेक नहीं किया तो इस जीवन का मजा ही क्या.

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#Metoo: नाना पाटेकर को मिली क्लीन चीट

#metoo  मूवमेंट में नाना पाटेकर को क्लीन चीट मिल गई है. आपको बता दे, कुछ महीने पहले ही तनुश्री दत्ता ने मीटू मूवमेंट के तहत नाना पाटेकर पर गंभीर आरोप लगाए थे. तनुश्री ने बताया था कि नाना ने उनसे फिल्म हौर्न ओके प्लीज के सेट पर बदतमीजी की थी.

रिपोर्ट्स की माने तो मुबंई पुलिस ने एक स्थानीय कोर्ट को जानकारी देते हुए कहा है कि तनुश्री से इस मामले में उन्हें कोई सबूत नहीं मिला है. इस वजह से नाना के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए उनके पास कोई ठोस सबूत नहीं है.

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जहां नाना को मिले क्लीन चीट पर तनुश्री अपना रिएक्शन दे चुकी है. उन्होंने मुंबई पुलिस पर अपना गुस्सा निकालते हुए कहा है कि. ‘भ्रष्ट पुलिस फोर्स और लीगल सिस्टम ने एक ऐसे इंसान को क्लीन चिट दिया है जोकि करप्ट है. तनु ने आगे कहा है कि, ‘हमारे गवाहों को शांत करवा दिया गया और उनकी जगह पर झूठे गवाह लाए गए ताकि ये केस और भी कमजोर बन जाए.

इस आरोप के बाद नाना पाटेकर को फिल्म हाउसफुल 4 से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था. निर्माताओं ने मीटू मामले में ही साजिद खान के नाम के सामने आते ही एक और ठोस कदम उठाया. साजिद अब इस फिल्म से बतौर निर्देशक नहीं जुड़े है. बता दें, तनु के वकील का कहना है कि वह इस मामले को बौम्बे हाईकोर्ट तक लेकर जाएंगे ताकि सच्चाई सामने आ सके और तनुश्री को इंसाफ मिले.

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मैं एक्टर बनना चाहता हूं, क्या करूं?

सवाल

बीए प्रथम वर्ष का छात्र हूं और मैं ऐक्टर बनना चाहता हूं. मैं थिएटर करता हूं. बड़े-बड़े औडिटोरियम्स में शो कर चुका हूं. क्या एक्टर बनने के लिए मुझे नैशनल स्कूल औफ ड्रामा में दाखिला लेना चाहिए या नहीं? यदि हां तो इस के लिए क्या करना होगा और क्या इस प्रशिक्षण के बाद मैं ऐक्टर बन पाऊंगा?

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जवाब

आप की यह अच्छी हौबी है, यदि भविष्य में आप इसे ही कैरियर बनाना चाहते हैं तो बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद आप अपने इस मनपसंद कोर्स में ऐडमिशन ले सकते हैं. जहां तक इस के बारे में जानकारी की बात है तो वह आप को इंटरनैट से मिल जाएगी. आप को आगाह कर दें कि अन्य क्षेत्रों की बनिस्बत इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक है, इसलिए सोचसमझ कर ही फैसला लें.

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जानें, कैसे बनाएं एप्पल एंड वालनट केक

सेब और अखरोट के कौम्बिनेशन से बनने वाले ये केक काफी टेस्टी है. इसमें नट्स के साथ आपको फ्रूट का भी मजेदार टेस्ट मिलेगा. तो आइए जानते है इस रेसिपी को.

सामग्री

अखरोट (1 कप)

चीनी (2 कप)

अखरोट (1 कप)

तेल (1 कप)

मैदा (2 कप)

बेकिंग पाउडर (4 टी स्पून)

दालचीनी पाउडर (5 टी स्पून)

बड़ा सेब (3-4

अंडे (4)

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बनाने की वि​धि

सेब को ​छीलकर छोटे टुकड़ों में काटकर एक तरफ रख दें.

एक बाउल में अंडे और चीनी को फेंट लें और 10 मिनट के लिए एक तरफ रख दें.

मैदा, बेकिंग पाउडर और 4 छोटे चम्मच दालचीनी पाउडर को मिक्स करें.

इसमें फेंटे हुए अंडे मिलाएं.

इसमें तेल, सेब और अखरोट मिलाएं, इसे अब बेकिंग डिश में डालें.

इस पर बचा हुआ दालचीनी पाउडर डालें.

केक को 1 घंटे के लिए बेक करें और सर्व करें.

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गुड फूड भी हो जाते हैं बैड फूड

अति हर चीज की बुरी होती है. यह बात उन चीजों पर भी लागू होती है जिन के बारे में प्रचारित किया जाता है कि वे स्वास्थ के लिए लाभदायक हैं. मसलन, रविंद्र यादव का ही किस्सा लें. इस 44 वर्षीय व्यवसायी को किसी ने बता दिया कि अगर वह विटामिंस और अन्य सप्लीमैंट नियमित लेता रहेगा तो हमेशा स्वस्थ और जवान बना रहेगा. इसलिए वह विटामिंस व सप्लीमैंट्स की 8 गोलियां सुबह को और इतनी ही शाम को लेने लगा. कुछ ही दिनों बाद इस का नतीजा यह निकला कि यादव को हृदय रोगों और मधुमेह की शिकायतें होने लगीं.

जी हां, अगर आप विटामिंस भी अधिक और लंबे समय तक लेंगे तो वे भी आप के शरीर को फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान पहुंचाएंगी. विटामिन ए, डी, ई और के जब शरीर में अधिक मात्रा में एकत्र हो जाते हैं तो वे टौक्सिक या जहरीले स्तर तक पहुंच जाती हैं. सीधी सी बात यह है कि अगर आप सही से भोजन कर रहे हैं और आप को किसी बीमारी की शिकायत नहीं है तो आप को मल्टीविटामिंस की आवश्यकता नहीं. उन्हें डाक्टर की सलाह पर ही लें.

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रेखा शर्मा अपने स्कूटर से जा रही थीं, सामने एक ठेला आ गया जिसे देख कर उन्होंने ब्रेक लगाए और अपना दाहिना पांव संतुलन बनाए रखने के लिए जमीन पर टिका दिया. लेकिन पांव पर थोड़ा सा जोर पड़ा और उस में फ्रैक्चर हो गया. डाक्टर ने डैंसिटोमेट्री टैस्ट कराया तो मालूम हुआ कि रेखा शर्मा औस्टियोपोरोटिक हैं यानी उन की हड्डियां कमजोर हैं.

डाक्टर को भी हैरानी हुई कि 26 वर्ष की उम्र में कोई लड़की औस्टियोपोरोटिक कैसे हो सकती है, ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, रेखा शर्मा अपने फिगर को मैंटेन करने के लिए इतनी अधिक ऐक्सरसाइज कर रही थीं कि उन का बोन मास लगातार कम होता जा रहा था.

गौरतलब है कि ऐक्सरसाइज तो ठीक है लेकिन ओवर ऐक्सरसाइज हानिकारक है और इस के लक्षण हैं थकान, वजनका कम होना, नींद न आना, हड्डियोंके घनत्व में कमी, मासिक चक्र का समय पर न होना, पानी की कमी, चोट, ऐक्सरसाइज के बाद दर्द आदि. ध्यानरहे कि सप्ताह में 5 बार 30 मिनट से 60 मिनट तक की ऐक्सरसाइज ही पर्याप्त होती है.

रूबीना खातून को ओर्थोरेक्सिया नर्वोसा है यानी उन्हें हैल्दी फूड खाने की जबरदस्त लत है. वे यह फूड इसलिए खाती हैं ताकि उन की हैल्थ ठीक रहे, लेकिन यह लत एक डिसऔर्डर है. जिन लोगों को यह रोग होता है उन का व्यवहार एनोरेक्सिया या बुलीमिया जैसा ही होता है. बस, इस फर्क के साथ कि उन्हें फूड की मात्रा की लत होती है और आर्थोरेक्सिया रोगियों को फूड की गुणवत्ता की.

अध्ययनों से मालूम हुआ है कि यह डिसऔर्डर पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक होता है और 30 वर्ष की आयु के बाद यह गंभीर रूप धारण कर लेता है. साथ ही, उच्च वर्ग के उच्च शिक्षित लोग इस का अधिक शिकार होते हैं. ऐसे रोगियों को चाहिए कि वे अपने डायटीशियन से मिलें ताकि अपने मेन्यू में अधिक किस्म के फूड शामिल कर सकें और अगर आवश्यकता पड़े तो मनोवैज्ञानिक से भी बात करें.

अधूरी जानकारी

सवाल यह है कि सप्लीमैंट्स, ऐक्सरसाइज या हैल्थ फूड को ले कर इतनी समस्याएं क्यों खड़ी हो रही हैं? दरअसल, अत्यधिक जानकारी का होना भी बुरा है. आज फूड को ले कर बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध है.

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दरअसल, फूड के बारे में जानकारी का सैलाब आ गया है. लेकिन अधिकतर  जानकारी संदिग्ध स्रोतों से आ रही है. इस जानकारी से हम समझ बैठते हैं कि इस विषय में हमें संपूर्ण या पर्याप्त ज्ञान हो गया है कि हमें क्या खाना चाहिए. लेकिन यह इतना आसान नहीं है जितना कि समझा जाता है.

क्या अच्छा क्या बुरा

दरअसल, फूड्स को ‘अच्छा’ और ‘बुरा’ कहना गलत है. फूड्स इतने साधारण तरीके से काम नहीं करते हैं. मसलन, आमतौर से फैट्स को बैड फूड समझा जाता है लेकिन शरीर के कामकाज के लिए इन का होना भी आवश्यक है मगर कम मात्रा में. इसी प्रकार शलजम को अच्छा बल्कि सुपर हैल्दी फूड समझा जाता है लेकिन अगर इसे अधिक मात्रा में खाया जाए तो यह घातक हो सकता है क्योंकि इस में सोरालैंस होते हैं जिन से कैंसर होता है. यही बात पालक पर भी लागू होती है.

अब सवाल उठता है कि फूड्स के बारे में जो लगातार जानकारियां आ रही हैं उन का क्या किया जाए? सब से पहली बात तो यह जान लें कि कोई भी ‘तथ्य’ केवल उसी समय तक तथ्य रहता है जब तक अगला अध्ययन उस की धज्जियां न उड़ा दे.

गौरतलब है कि फैट्स को पहले तो पूरी तरह मना किया जाने लगा और अब कहा जा रहा है कि कुछ फैट्स बहुत आवश्यक हैं. मसलन, ओमेगा-3 फैटी एसिड्स. इसलिए जो भी कोई नया रिसर्च या दावा सामने आता है उस की अंधभक्ति नहीं करनी चाहिए. जानकारी हासिल करें, लेकिन अपना विवेक भी प्रयोग करें.

अत्यधिकता अच्छी नहीं

दरअसल, फूड्स उस समय बैड होते हैं जब उन्हें जरूरत से अधिक मात्रा में खाया जाए. मात्रा वास्तव में बहुत महत्त्वपूर्ण है. विशेषज्ञ तो सिर्फ एक ही मूल मंत्र बताते हैं, कम मात्रा में सब चीजें खाएं तो आप कभी गलत नहीं होंगे. इस तरह शोध किसी भी चीज को प्रकट करे या दफन करे, आप हमेशा स्वस्थ रहेंगे. दूसरे शब्दों में, आप के लिए यह सही नहीं है कि आप हर समय फल ही खाते रहें या प्रोटीन ही लेते रहें और बाकी फूड समूहों को अपनी डाइट से बाहर निकाल कर फेंक दें. जब आप चंद फूड्स पर निर्भर हो जाते हैं और उन्हें ही अधिक मात्रा में लेने लगते हैं तब गुड फूड भी बैड फूड बन जाता है. ऐसे में अच्छी चीज भी अधिक मात्रा में अच्छी नहीं रह पाती और नुकसान करने लगती है.

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ये खतरे शाकाहारियों, कच्चा भोजन खाने वाले दीवानों और जो फाइबर सप्लीमैंट के साथ बड़ी मात्रा में फल खाते हैं, उन को अधिक होते हैं. गौरतलब है कि हमें रोजाना 25 से 35 ग्राम फाइबर चाहिए यानी लगभग 5 कप फल या सब्जी प्रतिदिन. इसलिए कभी फल लें और कभी सब्जी.

मांसपेशियां बनाने और रिपेयर करने के लिए शरीर को प्रोटीन की आवश्यकता होती है लेकिन अत्यधिक प्रोटीन लेने से यह काम कोई ज्यादा अच्छा नहीं हो जाएगा. आप को जितनी रोजाना कैलरी की जरूरत होती है उस का 30 प्रतिशत ही प्रोटीन होना चाहिए. इस से अधिक होगा तो शरीर में जहरीले कीटोंस जमा होने लगेंगे और नतीजतन गुर्दे पर अधिक जोर पड़ेगा उन्हें फ्लश करने के लिए. साथ ही, इस से शरीर में पानी व कैल्शियम की कमी हो जाएगी और व्यक्ति को डिहाइड्रेशन व बोन लौस का सामना करना पड़ेगा.

इस स्थिति के लक्षण में शामिल हैं कमजोरी व खुमारी, सूखी त्वचा, बालों का झड़ना, भूख कम लगना, मितली आना और सांस में दुर्गंध. लंबे समय में इस से गुर्दों, जिगर और दिल पर दबाव अधिक बढ़ जाता है. साथ ही, अतिरिक्त प्रोटीन फैट में बदल जाता है जिस से व्यक्ति का वजन बढ़ जाता है.

एक अन्य समस्या यह है कि प्रोटीन को कार्बोहाइड्रेट या फैट में बदलने की प्रक्रिया में शरीर प्रोटीन के नाइट्रोजन को यूरिया या यूरिक एसिड में बदल देता है. इसलिए बड़ी मात्रा में यह आप के गुर्दों पर असर डालता है और जोड़ों में दर्द व सूजन पैदा करता है. इसलिए प्रोटीन शेक से सावधान रहें.

शरीर 1 घंटे में केवल 4 या 5 ग्राम प्रोटीन ही प्रोसैस कर सकता है. अधिकतर लोगों को 50 से 70 ग्राम प्रोटीन ही दिन में चाहिए होता है. लगभग 200 ग्राम चिकन या फिश या 150 ग्राम मटन से 40 ग्राम प्रोटीन मिल जाता है. एक अंडे से 5 ग्राम प्रोटीन और 250 एमएल दूध से 9 ग्राम प्रोटीन मिलता है. अगर आप इस से अधिक ले रहे हैं तो आप जरूरत से ज्यादा प्रोटीन ले रहे हैं.

कुछ भ्रांतियां

चाय से हमारा हृदय स्वस्थ रहता है और तनाव भी दूर होता है. लेकिन चाय की लत ठीक नहीं. ऐसा न हो कि आप दिन में 4 कप की जगह 10 कप पीने लगें. चाय के एक कप में 40 एमजी कैफीन होती है जो आयरन और कुछ विटामिंस को हजम करने में रुकावट बनती है. ज्यादा चाय पीने से सिरदर्द, अनियमित हृदय गति और नींद न आना जैसी बीमारियां हो सकती हैं. जो लोग कैफीन के प्रति संवेदनशील होते हैं उन्हें चाय से एसिडिटी होने लगती है. टी बैग ज्यादा जल्दी से कैफीन चाय में घोलते हैं, इसलिए अगर आप दिन में 5 कप से ज्यादा चाय पीते हैं तो कैफीनरहित चाय पिएं. अपने चाय के कप को भी देखें कि वह इतना बड़ा न हो कि 1 कप में 2 कप की चाय आती हो. मधुमेह व हाई ब्लडप्रैशर के रोगी चाय से बचें.

हालांकि मछली में स्वस्थ ओमेगा-3 फैटी एसिड्स होते हैं जिन से हृदय रोग और संभवत: एल्जाइमर से बचा जा सकता है लेकिन मछली में जहरीले धातु जैसे मरकरी भी होते हैं. खासकर टूना, सोडाफिश और शार्क में. अत्यधिक मछली खाने से स्वास्थ्य संबंधी कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे याददाश्त व एकाग्रता में कमी. इसलिए रोजाना 20-25 ग्राम से अधिक मछली नहीं खानी चाहिए या सप्ताह में 2 बार. वे मछली खाएं जिन में मरकरी कम होती है, जैसे श्र्ंिप, सालमन, कैटफिश, कार्प आदि. फिश औयल सप्लीमैंट भी दिन में 3 से 5 ग्राम ही सुरक्षित हैं.

सोया के लाभ अनगिनत हैं लेकिन इस की अधिकता नपुंसकता और हारमोनल परिवर्तन ला सकते हैं. इसलिए केवल दिन में 25-30 ग्राम सोया फूड ही सुरक्षित हैं. इस तरह यह साफ है कि किसी भी फूड की अधिकता यानी ओवरडोज उसे बैड फूड बना देता है.

हेयरकट कराने से पहले रखें इन 5 बातों का ध्यान

हेयरकट कराने से पहले आपको कई बातों का ध्यान रखना होता है. हेयरकट आपके चेहरे का लुक पूरी तरह से बदल देता है. खास कर महिलाओं के लिए हेयरकट का निर्णय लेना मुश्किल होता है. अगर ऐसे में आपका हेयर स्टाइल बेकार हो जाए तो  इसे आप रिस्क नहीं ले सकतीं. तो आइए जानते हैं, हेयरकट लेने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

रखें इन 5 बातों का ध्यान

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  1. सभी हेयर स्टाइल का मेंटनेंस अलग होता है. अपनी लाइफस्‍टाइल के तरीकों को ध्‍यान में रखते हुए अपनी सुविधा अनुसार ही हेयरकट करवाएं.

2. पार्लर जाने से पहले ये भी तय कर लें कि आपको कैसा नया लुक चाहिए या ऐसा हेयरकट जिससे कि बाल लंबे या घने दिखें.

3. दूसरों पर जो हेयर स्टाइल आपको बहुत पसंद आया हो, जरूरी नहीं कि वह आपके चेहरे पर भी जंचे.

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4. बिना सोचे-समझे पार्लर में न जाएं. यह पहले से तय कर लें कि आप किस प्रकार का हेयर स्टाइल चाहती हैं.

5. अपने फेस कट के अनुसार हेयरकट करवाएं. इस बारे में आप हेयर एक्‍सपर्ट से पूछ सकती है. लेकिन आपको जो सूट करें, वही हेयरकट करवाएं.

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