सपा-बसपा गठबंधन को लेकर मायावती पूरी तरह से मुखर हैं और लगातार हमले कर लोकसभा चुनाव में हार के लिये सपा को जिम्मेदार ठहरा रही है. दूसरी तरफ सपा नेता अखिलेश यादव पूरी तरह से चुप्पी साधे हैं. अखिलेश की चुप्पी समाजवादी पार्टी और नेताओं पर भारी पड़ रही है. उनको यह समझ नही आ रहा कि बसपा के साथ संबंधों को लेकर जमीनी स्तर पर कैसे निपटे. बसपा के साथ ऊहापोह की यह हालत अखिलेश यादव के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगा रही है.

बसपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में मायावती ने अपने कार्यकर्ताओं को सपा के संबंध में साफ जानकारी दे दी है. मायावती ने यह साफ कर दिया है कि बसपा आने वाले समय में सारे चुनाव अकेले लड़ेगी. मायावती ने यह भी बता दिया है कि सपा के गठबंधन से बसपा को लोकसभा चुनाव में कोई लाभ नहीं हुआ. मायावती ने इसके पूरे तर्क भी दिये हैं. मायावती ने कहा कि भाजपा को हराने के लिये बसपा ने सपा के साथ तमाम पुराने विवाद भुलाकर गठबंधन किया.

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मायावती ने तर्क दिया कि 2012 में सपा सरकार के समय बसपा विरोधी, दलित विरोधी काम किये. प्रमोशन में आरक्षण बड़ा कारण था. इसके अलावा दलितों के साथ वैमनस्य पूर्ण कार्य हुये. इसके बाद भी बसपा ने अपने विरोध को दरकिनार करके देश हित में सपा के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा.

मायावती ने सपा-बसपा संबंधों के खत्म होने का जिम्मेदार भी सपा को ही ठहराया. मायावती ने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद सपा का व्यवहार बदला हुआ है. सपा के इस व्यवहार से साफ है कि इस तरह के काम से भाजपा को हरा पाना संभव नहीं है. इसलिए पार्टी और मूवमेंट के हित में बसपा आगे होने वाले सभी छोटे-बड़े चुनाव अपने बलबूते पर लड़ेगी.

मायावती ने अपनी तरफ से सपा-बसपा गठबंधन को लेकर हालत साफ कर दी है पर अखिलेश यादव की तरफ से इस बारे में अपनी पार्टी के लोगों को कोई संदेश नहीं दिया जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि लोकसभा चुनाव में हार के बाद सपा में अखिलेश विरोधी खेमा फिर से सक्रिय है. जो बारबार यह दवाब बना रहा है कि सपा से अलग हुए समाजवादी नेताओं को पार्टी में वापस लाया जाये. अखिलेश अभी कोई भी फैसला नहीं ले पाये हैं.

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