असमंजस में किया गया कोई भी फैसला राजनीति में सही परिणाम नहीं देता है. बसपा के लिये मायावती के फैसले असमंजस भरे है. पार्टी में परिवारवाद का विरोध करते करते मायावती ने पार्टी को परिवारवाद के हवाले कर दिया हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि बसपा में अब भरोसेमंद नेताओं की पीढ़ी खत्म हो गई है.

बाहरी नेताओं पर मायावती को भरोसा नहीं है. मायावती को इस बात का डर है कि कहीं बाहरी नेता पार्टी पर कब्जा ना कर लें. ऐसे में परिवार पर भरोसा करना मायावती की मजबूरी हो गई है. बसपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में एक बात यह भी साफ हो गई कि मायावती का यह असमंजस सपा के साथ गठबंधन को लेकर भी बना है. पार्टी में मुस्लिम बिरादरी के प्रतिनिधित्व को लेकर भी मायावती असमंजस में है. मायावती सवर्ण और पिछड़े वर्ग के वोटबैंक को लेकर भी असमंजस में है. मायावती को लगता है कि वह बसपा को भाजपा के मुकाबले खड़ा कर लेगी तो विधानसभा चुनाव में बसपा को सबसे ज्यादा लाभ होगा.

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बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो बनने के बाद मायावती ने पार्टी में नम्बर दो की कुर्सी खत्म कर दी थी. रैली और सभाओं में भी मंच पर एक ही कुर्सी रखी जाती थी. जिस पर मायावती खुद बैठती थी. 2007 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी के अंदर सक्रिय किया. आनंद कुमार नोएडा में रहते थे. पेशे से कर्लक थे. पार्टी में आनंद कुमार का राजनीति से सीधा सरोकार भले ही नहीं था पर उनको मायावती का दाहिना हाथ माना जाता था.

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