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नई जिंदगी की शुरुआत : भाग 1

लेखक-अरुणा त्रिपाठी

पिता की असामयिक मौत ने कल्पना पर जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया था. आर्थिक तंगी के चलते जिंदगी के हर कदम पर उसे समझौता करना पड़ रहा था. लेकिन जब उस ने एक नई जिंदगी की शुरुआत करनी चाही तो अतीत के काले साए ने वहां भी उस का पीछा नहीं छोड़ा.

कई बार इनसान की मजबूरी उस के मुंह पर ताला लगा देती हैऔर वह चाह कर भी नहीं कह पाता जो कहना चाहता है. सुमित्रा के साथ भी यही था. घर की जरूरतों के अलावा कम उम्र के बच्चों के भरणपोषण का बोझ उन की सोच पर परदा डाले हुए था. वह अपनी शंका का समाधान बेटी से करना चाहती थीं पर मन में कहीं डर था जो बहुत कुछ जानसमझ कर भी उन्हें नासमझ बनाए हुए था.

पति की असामयिक मौत ने उन की कमर ही तोड़ दी थी. 4 छोटे बच्चों व 1 सयानी बेटी का बोझ ले कर वह किस के दरवाजे पर जाएं. उन की बड़ी बेटी कल्पना पर ही घर का सारा बोझ आ पड़ा था. उन्होंने साल भर के अंदर बेटी के हाथ पीले करने का विचार बनाया था क्योंकि बेटी कल्पना को कांस्टेबल की नौकरी मिल गई थी. आज बेटी की नौकरी न होती तो सुमित्रा के सामने भीख मांगने की नौबत आ गई होती.

बच्चे कभी स्कूल फीस के लिए तो कभी यूनीफार्म के लिए झींका करते और सुमित्रा उन पर झुंझलाती रहतीं, ‘‘कहां से लाऊं इतना पैसा कि तुम सब की मांग पूरी करूं. मुझे ही बाजार में ले जाओ और बेच कर सब अपनीअपनी इच्छा पूरी कर लो.’’

कल्पना कितनी बार घर में ऐसे दृश्य देख चुकी थी. आर्थिक तंगी के चलते आएदिन चिकचिक लगी रहती. उस की कमाई से दो वक्त की रोटी छोड़ खर्च के लिए बचता ही क्या था. भाई- बहनों के सहमेसहमे चेहरे उस की नींद उड़ा देते थे और वह घंटों बिस्तर पर पड़ी सोचा करती थी.

कल्पना की ड्यूटी गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर थी. वह रोज देखती कि उस के साथी सिपाही किस प्रकार से सीधेसादे यात्रियों को परेशान कर पैसा ऐंठते थे. ट्रेन से उतरने के बाद सभी को प्लेटफार्म से बाहर जाने की जल्दी रहती है. बस, इसी का वे वरदी वाले पूरा लाभ उठा रहे थे.

‘‘कोई गैरकानूनी चीज तो नहीं है. खोलो अटैची,’’ कह कर हड़काते और सीधेसादे यात्री खोलनेदिखाने और बंद करने की परेशानी से बचने के लिए 10- 20 रुपए का नोट आगे कर देते. सिपाही मुसकरा देते और बिना जांचेदेखे आगे बढ़ जाने देते.

यदि कोई पैसे देने में आनाकानी करता, कानून की बात करता तो वे उस की अटैची, सूटकेस खोल कर सामान इस कदर इधरउधर सीढि़यों पर बिखेर देते कि उसे समेट कर रखने में भी भारी असुविधा होती और दूसरे यात्रियों को एक सबक मिल जाता.

ऐसे ही एक युवक का हाथ एक सिपाही ने पकड़ा जो होस्टल से आ रहा था. सिपाही ने कहा, ‘‘अपना सामान खोलो.’’

लड़का किसी वीआईपी का था, जिसे सी.आई.एस.एफ. की सुरक्षा प्राप्त थी. इस से पहले कि लड़का कुछ बोलता उस के पिता के सुरक्षादल के इंस्पेक्टर ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘अरे, यह मेरे साहब का लड़का है.’’

तुरंत सिपाही के हाथों की पकड़ ढीली हो गई और वह बेशर्मी से हंस पड़ा. एक बुजुर्ग यह कहते हुए निकल गए, ‘‘बरखुरदार, आज रिश्वतखोरी में नौकरी से हाथ धो बैठते.’’

कल्पना यह सबकुछ देख कर चकित रह गई लेकिन उस सिपाही पर इस का कुछ असर नहीं पड़ा था. उस ने वह वैसे ही अपना धंधा चालू रखा था. जाहिर है भ्रष्ट कमाई का जब कुछ हिस्सा अधिकारी की जेब में जाएगा तो मातहत बेखौफ तो काम करेगा ही.

कल्पना का जब भी अपनी मां सुमित्रा से सामना होता, वह नजरें नहीं मिलाती बल्कि हमेशा अपने को व्यस्त दर्शाती. उस के चेहरे की झुंझलाहट मां की प्रश्न भरी नजरों से उस को बचाने में सफल रहती और सुमित्रा चाह कर भी कुछ पूछने का साहस नहीं कर पातीं.

कमाऊ बेटी ने घर की स्थिति को पटरी पर ला दिया था. रोजरोज की परेशानी और दुकानदार से उधार को ले कर तकरार व कहासुनी से सुमित्रा को राहत मिल गई थी. उसे याद आता कि जब कभी दुकानदार पिछले कर्ज को ले कर पड़ोसियों के सामने फजीहत करता, वह शर्म से पानीपानी हो जाती थीं पर छोटेछोटे बच्चों के लिए तमाम लाजशर्म ताक पर रख उलटे  हंसते हुए कहतीं कि अगली बार उधार जरूर चुकता कर दूंगी. दुकानदार एक हिकारत भरी नजर डाल कर इशारा करता कि जाओ. सुमित्रा तकदीर को कोसते घर पहुंचतीं और बाहर का सारा गुस्सा बच्चों पर उतार देती थीं.

आज उन को इस शर्मिंदगी व झुंझलाहट से नजात मिल गई थी. कल्पना ने घर की काया ही पलट दी थी. उन्हें बेटी पर बड़ा प्यार आता. कुछ समय तक तो उन का ध्यान इस ओर नहीं गया कि परिस्थिति में इतना आश्चर्यजनक बदलाव इतनी जल्दी कैसे और क्यों आ गया किंतु धीरेधीरे उन के मन में कुछ शंका हुई. कई दिनों तक अपने से सवालजवाब करने की हिम्मत बटोरी उन्होंने और से पूछा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कल्पना बेटी कि तुम दिन की ड्यूटी के बाद फिर रात को क्यों जाती हो…’’

अभी सुमित्रा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कल्पना ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, ‘‘मां, मैं डबल ड्यूटी करती हूं. और कुछ पूछना है?’’

कल्पना ने यह बात इतने रूखे और तल्ख शब्दों में कही कि वह चुप हो गईं. चाह कर भी आगे कुछ न पूछ पाईं और कल्पना अपना पर्स उठा कर घर से निकल गई. हर रोज का यह सिलसिला देख एक दिन सुमित्रा का धैर्य टूट गया. कल्पना आधी रात को लौटी तो वह ऊंचे स्वर में बोलीं, ‘‘आखिर ऐसी कौन सी ड्यूटी है जो आधी रात बीते घर लौटती हो. मैं दिन भर घर के काम में पिसती हूं, रात तुम्हारी चिंता में चहलकदमी करते बिताती हूं.’’

मां की बात सुन कर कल्पना का प्रेम उन के प्रति जाग उठा था पर फिर पता नहीं क्या सोच कर पीछे हट गई, मानो मां के निकट जाने का उस में साहस न हो.

‘‘मां, तुम से कितनी बार कहा है कि मेरे लिए मत जागा करो. एक चाबी मेरे पास है न. तुम अंदर से लाक कर के सो जाया करो. मैं जब ड्यूटी से लौटूंगी, खुद ताला खोल कर आ जाया करूंगी.’’

‘‘पहले तुम अपनी शक्ल शीशे में देखो, लगता है सारा तेज किसी ने चूस लिया है,’’ सुमित्रा बेहद कठोर लहजे में बोलीं.

कल्पना के भीतर एक टीस उठी और वह अपनी मां के कहे शब्दों का विरोध न कर सकी.

सुबह का समय था. पक्षियों की चहचहाहट के साथ सूर्य की किरणों ने अपने रंग बिखेरे. सुमित्रा का पूरा परिवार आंगन में बैठा चाय पी रहा था. उन की एक पड़ोसिन भी आ गई थीं. कल्पना को देख वह बोली, ‘‘अरे, बिटिया, तुम तो पुलिस में सिपाही हो, तुम्हारी बड़ी धाक होगी. तुम ने तो अपने घर की काया ही पलट दी. तुम्हें कितनी तनख्वाह मिलती है?’’

कल्पना ऐसे प्रश्नों से बचना चाहती थी. इस से पहले कि वह कुछ बोलती उस की छोटी बहन ने अपनी दीदी की तनख्वाह बढ़ाचढ़ा कर बता दी तो घर के बाकी लोग खिलखिला कर हंस दिए और बात आईगई हो गई.

सुमित्रा बड़ी बेटी की मेहनत को देख कर एक अजीब कशमकश में जी रही थीं. इस मानसिक तनाव से बचने के लिए सुमित्रा ने सिलाई का काम शुरू कर दिया पर बडे़ घरों की औरतें अपने कपड़े सिलने को न देती थीं और मजदूर घरों से पर्याप्त सिलाई न मिलती इसलिए उन्होंने दरजी की दुकानों से तुरपाई के लिए कपडे़ लाना शुरू कर दिया. शुरुआत में हर काम में थोड़ीबहुत कठिनाई आती है सो उन्हें भी संघर्ष करना पड़ा.

जैसेजैसे सुमित्रा की बाजार में पहचान बनी वैसेवैसे उन का काम भी बढ़ता गया. अब उन्हें घर पर बैठे ही आर्डर मिलने लगे तो उन्होंने अपनी एक टेलरिंग की दुकान खोल ली.

5 सालों के संघर्ष के बाद सुमित्रा को दुकान से अच्छीखासी आय होने लगी. अब उन्हें दम मारने की भी फुरसत नहीं मिलती. कई कारीगर दुकान पर अपना हाथ बंटाने के लिए रख लिए थे.

कल्पना ड्यूटी से आने के बाद औंधेमुंह बिस्तर पर लेट गई. छोटी बहन खाना खाने के लिए 2 बार बुलाने आई पर हर बार उसे डांट कर भगा दिया. सुमित्रा खुद आईं और बेटी की पीठ पर हाथ फेरते हुए बडे़ प्यार से पूछा, ‘‘क्या बात है बेटी, खाना ठंडा हो रहा है?’’

कल्पना उठ कर बैठ गई. उस के रोंआसे चेहरे को देख कर सुमित्रा भांप गई कि जरूर कुछ गड़बड़ है. उन्होंने पुचकारते हुए कहा, ‘‘बहादुर बच्चे दुखी नहीं होते. जरूर कुछ आफिस में किसी से कहासुनी हो गई होगी, क्यों?’’

‘‘वह चपरासी, दो टके का आदमी मुझ से कहता है कि मेरी औकात क्या है…’’ कल्पना रो पड़ी.

‘‘वजह?’’ सुमित्रा ने धीरे से पूछा.

‘‘यह सब इस कारण क्योंकि वह मुझ से ज्यादा तनख्वाह पाता है. एक सिपाही की कुछ हैसियत नहीं होती, मां.’’

‘‘ज्यादा तनख्वाह पाता है तो उस की उम्र भी तुम से दोगुनी होगी. इस में इतनी हीनभावना पालने की क्या जरूरत…’’

मां के कहे को अनसुना करते हुए कल्पना बीच में बोली, ‘‘सारे दिन हाथ में डंडा घुमाओ या फिर सलाम ठोंको. इस के अलावा सिपाही का कोई काम नहीं. किसी ताकतवर अपराधी को पकड़ लो तो उलटे आफत. किसी की शिकायत अधिकारी से करने जाओ तो वह ऐसे देखता है मानो वह बहुत बड़ा एहसान कर रहा हो और फिर इस की भी कीमत मांगता है. तुम से क्या बताऊं, मां, इन अधिकारियों के कारण ही तो मैं…’’

रोटावेटर खास जुताई यंत्र : मिल रही सरकारी मदद

रोटावेटर कैसे काम करता है

रोटावेटर स्टील फ्रेम का बना होता है जिस पर रोटरी शाफ्ट ब्लेड के साथ और शक्ति स्थानांतरण प्रणाली गियर बौक्स के साथ जुड़े होते?हैं. इस में अंगरेजी के ‘एल’ आकार की तरह के ब्लेड होते हैं जो कार्बन स्टील या मिश्रित स्टील के बने होते हैं. पीटीओ अक्ष की घूर्णन गति से शक्ति का स्थानांतरण गियर बौक्स होते हुए ब्लेड को मिलता है.

रोटावेटर की मदद से मिट्टी को ज्यादा भुरभुरा बनाया जा सकता है. कल्टीवेटर की 2 बार की जुताई इस की एक बार की जुताई के बराबर होती है. इस से?ट्रैक्टर चालित हल की तुलना में 60 फीसदी मजदूर की बचत, 40-50 फीसदी संचालन के खर्च में बचत और उपज में 2-3 फीसदी की बढ़ोतरी होती है.

रोटावेटर के लाभ

* इस में अंगरेजी के ‘एल’ आकार के?ब्लेड होते?हैं जो मिट्टी की ऊपरी और निचली परत को आसानी से काट कर मिट्टी को भुरभुरा बना देता?है, वह भी मिट्टी की परत पर अतिरिक्त दबाव डाले बिना.

* फसलों और पौधों की जड़ों को बिना किसी प्रतिरोध के प्रसार करने में मदद मिलती है और बेहतर विकास और उपज देती है.

* मिश्रण के द्वारा निचली परत तक पोषक तत्त्व पहुंचता है और मिट्टी के पोषण तत्त्वों को फिर से जिंदा करने में मदद करता है.

* इस से मिट्टी की जड़ों तक औक्सीजन आसानी से पहुंचता?है जो फसलों और पौधों के लिए जरूरी है. इस वजह से फसल की बढ़वार और पैदावार अच्छी होती है.

* जमीन में उग आए खरपतवार और दूसरे अवशेषों को काट कर जमीन में मिला देता है. इस से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है और उपज अच्छी होती है.

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* खेत में एक बार ही रोटावेटर से जुताई करने से खेत बोआई लायक हो जाता है और समय व पैसे की बचत होती है.

* खेत में ढेले नहीं बनते, जिस से अंकुरण अच्छा होता है.

* यह मशीन पिछली फसल कटने के बाद जो अवशेष खेत में रह जाते?हैं, उन्हें जड़ से खोद कर अच्छी तरह से मिट्टी में मिला देती है.

रोटावेटर का रखरखाव

* उपयोग से पहले यह तय कर लें कि उपकरण पूरी तरह से सही है.

* उपयोग करने के बाद छायादार जगह पर रखें.

सरकार कितना अनुदान देगी : रोटावेटर की अनुमानित लागत 90,000 से 1,00,000 रुपए तक है. इस में सरकार आप को एनएफएसएम यानी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना के तहत अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति लघु सीमांत एवं महिला किसानों के लिए 42,000 रुपए से 50,000 रुपए तक और अन्य किसानों के लिए इन योजनाओं में 34,000 से 40,300 रुपए तक का अनुदान देय है.

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कैसे मिलेगा यह अनुदान

अनुदान के लिए पत्रावली के साथ लगाए जाने वाले दस्तावेज

* आवेदनपत्र के साथ लाभार्थी का पासपोर्ट साइज प्रमाणित फोटो.

* जमीन की जमाबंदी या पासबुक.

* यंत्र का खरीद बिल या प्रोफार्मा इनवोइस और अधिकृत विक्रेता का प्रमाणपत्र.

* यंत्र की प्रमाणित फोटो लाभार्थी के साथ.

* शपथपत्र या अंडरटेकिंग.

* ट्रैक्टर के कागजातों की प्रतिलिपि.

अधिक जानकारी के लिए आप क्षेत्र के कृषि पर्यवेक्षक, सहायक कृषि अधिकारी या सहायक निदेशक, (कृषि) से संपर्क कर सकते हैं.

फेस्टिवल स्पेशल 2019: ऐसे बनाएं पनीर कौर्न चाट रेसिपी

आज आपको  पनीर  कौर्न चाट रेसिपी के बारे में बताने जा रहे है. जो बहुत ही स्वादिष्ट है और इसे आप आसानी से बना भी सकते हैं. तो आइए झट से आपको बताते है पनीर कौर्न चाट की रेसिपी.

 सामग्री

बेबी कौर्न (1 कप)

अंडे 2 (उबले हुए)

पनीर (1 छोटी कटोरी)

शिमला मिर्च 1 (बारीक कटी हुई)

प्याज 1 (बारीक कटी हुई)

आलू 1 (उबला और महीन कटा हुआ)

औलिव औयल (2 टेबल स्पून)

सरसों के दाने (1/2 छोटा चम्मच)

हरी मिर्च (2)

करी पत्ता (6-7)

जीरा पाउडर (1 चम्मच)

नींबू का रस (1 चम्मच)

चीनी (2 चम्मच)

नमक (स्वादानुसार)

काली मिर्च पाउडर स्वादानुसार

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बनाने की वि​धि

पैन में तेल गर्म करें और इसमें सरसों के दाने और करी पत्ता फ्राई कर लें.

अब इसमें कटी हुई प्याज डालकर सुनहरा होने तक सेकें.

प्याज सुनहरा होने पर इसमें बारीक कटी हुई शिमला मिर्च डाल दें. इसे अच्छी तरह भूनें.

बरीक कटा हुआ आलू, बेबी कॉर्न, पनीर और अंडा डालकर 1 से 2 मिनट के लिए धीमी आंच पर सेकें.

अब इसमें नमक, जीरा पाउडर और काली मिर्च डालकर अच्छी तरह मिलाएं.

तैयार मिश्रण को गैस से उतार लें और अब नींबू का रस और चीनी डालकर अच्छी तरह मिला दें.

अब इसे गर्मागर्म धनिए और पुदीने की चटनी या फिर सॉस के साथ सर्व करें.

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4 टिप्स: सर्दियों में स्किन का ऐसे रखें ख्याल

सर्दियों के मौसम में चलने वाली सर्द हवाएं त्वचा की नमी छीन लेती है जिसके कारण त्वचा लाल और शुष्क हो जाती है. खासतौर पर ये समस्या तब बढ़ जाती है जब आपकी त्वचा सेंसिटिव हो. त्वचा में आया लालपन इन्फ्लेम्शन की तरफ इशारा करता है. आपके त्वचा के लाल होने के पीछे दूसरे कारण भी हो सकते हैं, जैसे एंटी बैक्टीरियल साबुन, डिटर्जेंट या केमिकल युक्त साबुन.

सर्दियों में त्वचा के लालपन को कम करने के लिए बाजार में कई तरह के लोशन और क्रीम उपलब्ध हैं. इसके अलावा, आपको इस मौसम में अपनी त्वचा का ख्याल रखने के लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखना बहुत जरूरी है.

  1. त्वचा की सौम्य तरीके से देखभाल

आपको इस मौसम में त्वचा का थोड़ा बेहतर और सौम्य तरीके से ख्याल रखना होगा. आपकी त्वचा पहले ही सेंसिटिव स्थिति में पहुंच गयी है इसलिए उसपर आप ज्यादा एक्सपेरिमेंट करेंगे तो वो और डैमेज हो जाएगी व खुजली होगी. आपको रोजाना अपनी त्वचा को साफ करने की जरूरत है लेकिन ये काम सतर्क होकर करें. त्वचा को ज्यादा ना रगड़ें. सौम्य तरीका अपनाएं और त्वचा को सुखाने के लिए मुलायम तौलिए का ही प्रयोग करें.

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2. मौइश्चराइज

ये पहला, जरूरी और सबसे बेसिक टिप है जिसे आपको फौलो करना चाहिए. त्वचा पर दिखने वाला लालपन ये इशारा करता है कि आपकी स्किन डीहाईड्रेटेड है और उसे हाईड्रेशन की सख्त जरूरत है. त्वचा के लाल हो जाने की वजह से उस जगह पर निशान या धब्बा भी बन सकता है. आप अपनी स्किन टाइप को ध्यान में रखते हुए मौइश्चराइजर चुन सकते हैं और त्वचा को लाल होने से बचाने के लिए आप दिन में दो बार इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.

3. सनस्क्रीन का करें इस्तेमाल

सनस्क्रीन का इस्तेमाल हर मौसम में करना चाहिए चाहे सर्दी हो या गर्मी. ये त्वचा पर एक प्रोटेक्शन की परत चढ़ाता है. आपकी त्वचा सेंसिटिव है और आपको उसे और नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए. सूरज की रौशनी में सीधे निकलने पर यूवी किरणें आपकी त्वचा पर अटैक करती है, इस वजह से आप जब भी घर से बाहर निकलें सनस्क्रीन का इस्तेमाल जरूर करें.

4. डाइट का रखें ख्याल

बाहर से त्वचा को स्वस्थ बनाने के साथ ये भी जरूरी है कि आप अंदर से भी हेल्दी हों. ऐसा माना जाता है कि इस मौसम के दौरान आपका इम्युनिटी लेवल नीचे गिर जाता है. शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि आप अपना खानपान सही रखें. एंटीऔक्सीडेंट्स से भरपूर खाना इसमें आपकी मदद कर सकता है. आप अपनी त्वचा को बेहतर बनाने के लिए गाजर, बेरीज, चुकंदर आदि खा सकते हैं.

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जानिए, बौयफ्रेंड के किन सवालों से कतराती हैं लड़कियां

कहा जाता है कि लड़कियों को समझ पाना बहुत मुश्किल काम होता हैं, जो कि एक हद तक सही बात हैं. क्योंकि लड़कियों के मन में कब क्या चल रहा होता है, कोई नहीं जान पाता है. लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो हर लड़की के मन में छिपी हुई होती हैं और लड़कियां कतराती है कि कहीं उनका बौयफ्रेंड उनसे ये सवाल ना पूछ ले.

जी हां, आज हम आपको उन्हीं कुछ सवालों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका जवाब देने से लड़कियां कतराती हैं और चाहती हैं की उनका बौयफ्रेंड उनसे कभी भी ये सवाल ना पूछे. तो आइये जानते हैं इन सवालों के बारे में.

क्या मैं तुम्हारा पहला प्यार हूं?

हर लड़का अपनी गर्लफ्रैंड से यह सवाल तो जरूर पूछना चाहता है कि क्या वह उसका पहला प्यार है. मगर लड़कियों को अपने बौयफ्रैंड से पहले कोई और जरूर पसंद होता है, चाहे वह उसका क्रश ही क्यों न हो.

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क्या तुम मेरी मौम के साथ शौपिंग पर जाओगी?

हर लड़का चाहता है कि उसकी गर्लफ्रैंड उसकी मौम के साथ शौपिंग पर जरूर जाए, ताकि वह इसी बहाने उन्हें अच्छे से जान लें. मगर लड़कियां अपने बौफ्रैंड की मौम के साथ शौपिंग पर जाने से बहुत डरती है.

तुम्हारे पैरेंट्स मुझे पसंद करेंगे या नहीं?

अपनी गर्लफ्रैंड के पेरेंट्स से मिलना लड़कों के लिए सबसे मुश्किल काम होता है और वह पहले ही अपने पार्टनर से यह सवाल करने लगते हैं. मगर लड़कियां इस बात को लेकर खुद इतनी टेंशन में होती है कि वह सवाल से बचना चाहती हैं.

मेरी फ्रैंड या बहन कितनी क्यूट है न!

हर लड़का अपनी गर्लफ्रैंड से यह जरूर पूछता है कि उसकी बहन या दोस्त उसे कैसे लगती है. मगर लड़कियां ऐसी बातों से दूर रहना ही पसंद करती हैं.

तुम अब किसी दूसरे लड़के को डेट तो नहीं करोगी?

लड़कों के मन में हमेशा यह डर रहता है कि उसकी पार्टनर किसी बात को लेकर गुस्सा न हो जाए. ऐसे में अपनी इस इनसिक्योरटी के चलते अपनी गर्लफ्रैंड से यह सवाल पूछ बैठते हैं.

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मैं उस पीड़ित महिला की मदद करना चाहता हूं पर समझ नहीं आता कि मुझे इन सब में पड़ना चाहिए या नहीं ?

सवाल

मैं सरकारी डिस्पैंसरी में डाक्टर हूं. मेरे पास कुछ समय से एक महिला अपनी गर्भावस्था के चलते दवाइयां लेने आ रही है. पिछले कुछ हफ्तों से मैं नोटिस कर रहा हूं कि जब भी वह आती है तो उस के चेहरे पर तो कभी हाथ पर एक नया घाव का निशान दिखने लगता है. मैं ने उस के घाव का कारण पूछा तो उस ने कुछ बताया नहीं. उस के पीछे काफी लंबी लाइन थी तो मेरे पास उस से अधिक कुछ पूछने का समय भी नहीं था. मेरे अंदाज से वे निशान उस महिला के पति या घरवालों द्वारा मारपीट के थे. मैं वैसे तो उस महिला की मदद करना चाहता हूं पर समझ नहीं आता कि मुझे इस सब में पड़ना चाहिए या नहीं?

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जवाब

यह आप का सद्भाव है जो आप उस महिला के विषय में सोच रहे हैं और यकीनन सभी को इस तरह सोचना चाहिए, लेकिन यह भी सही है कि जब तक वह महिला आप को सचाई नहीं बता देती तब तक आप अंदाजे के आधार पर कुछ नहीं कर सकते.

हो सकता है कि वह महिला घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हो. यदि वह खुद इस बात को कबूलने के लिए तैयार हो तब आप उसे कानूनी सहायता लेने की सलाह दे सकते हैं.

फिलहाल तो आप डाक्टर होने का कर्तव्य निभाएं और उस का इलाज करें. इस के अलावा आप किसी लेडी डाक्टर या नर्स को उस से बात करने के लिए कह सकते हैं. यदि वह खुद कुछ न बताना चाहे या कोई कदम न उठाना चाहे तो इस से आगे शायद ही आप का कुछ करना सही हो.

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अजब गजब: यहां 100 साल तक जीते हैं लोग

आज के गलत खान-पान, रहन-सहन, प्रदूषण और बहुत सारी बीमारियों के कारण लोग लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाते हैं. पर क्या आप जानते हैं, एक ऐसा देश भी है जहां लोग 100 साल तक जीते ही हैं, ये उनके लिए एक मामूली सी बात है.

तो आइए जानते हैं वो कौन सा देश है, जहां लोग 100 साल तक जीते ही हैं.

जी हां, वो देश है जापान. जापान में 100 साल से ज्यादा उम्र वालों में वहां के पूर्व प्रधानमंत्री भी शामिल हैं, जिनका नाम यासुहिरो नाकासोने है, जो मई में ही 100 साल के हुए हैं. इसके साथ ही नेशनल इंस्टीट्यूट औफ पापुलेशन एंड सोशल सिक्योरिटी रिसर्च के मुताबिक अगले पांच सालों में जापान में 100 साल से अधिक उम्र वाले लोगों की संख्या 1 लाख को पार कर जाएगी.

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दूरी-भाग 1 : आखिर किस से भाग रही थी वो लड़की

फरीदाबाद बसअड्डे पर बस खाली हो रही थी. जब वह बस में बैठी थी तो नहीं सोचा था कहां जाना है. बाहर अंधेरा घिर चुका था. जब तक उजाला था, कोई चिंता न थी. दोपहर से सड़कें नापती, बसों में इधरउधर घूमती रही. दिल्ली छोड़ना चाहती थी. जाना कहां है, सोचा न था. चार्ल्स डिकेन्स के डेविड कौपरफील्ड की मानिंद बस चल पड़ी थी. भूल गई थी कि वह तो सिर्फ एक कहानी थी, और उस में कुछ सचाई हो भी तो उस समय का समाज और परिस्थितियां एकदम अलग थीं.

वह सुबह स्कूल के लिए सामान्यरूप से निकली थी. पूरा दिन स्कूल में उपस्थित भी रही. अनमनी थी, उदास थी पर यों निकल जाने का कोई इरादा न था. छुट्टी के समय न जाने क्या सूझा. बस्ता पेड़ पर टांग कर गई तो थी कैंटीन से एक चिप्स का पैकेट लेने, लेकिन कैंटीन के पास वाले छोटे गेट को खुला देख कर बाहर निकल आई. खाली हाथ स्कूल के पीछे के पहाड़ी रास्ते पर आ गई. कहां जा रही है, कुछ पता न था. कुछ सोचा भी नहीं था. बारबार, बस, मां के बोल मस्तिष्क में घूम रहे थे. अंधेरा घिरने पर जी घबराने लगा था. अब कदम वापस मोड़ भी नहीं सकती थी. मां का रौद्र रूप बारबार सामने आ जाता था. उस गुस्से से बचने के लिए ही वह निकली थी. निकली भी क्या, बस यों लगा था जैसे कुछ देर के लिए सबकुछ से बहुत दूर हो जाना चाहती है, कोई बोल न पड़े कान में…

पर अब कहां जाए? उसे किसी सराय का पता न था. जो पैसे थे, उन से उस ने बस की टिकट ली थी. अंधेरे में बस से उतरने की हिम्मत न हुई. चुपचाप बैठी रही. कुछ ऐसे नीचे सरक गई कि आगे, पीछे से खड़े हो कर देखने पर किसी को दिखाई न दे. सोचा था ड्राइवर बस खड़ी कर के चला जाएगा और वह रातभर बस में सुरक्षित रह सकेगी.

बाहर हवा में खुनक थी. अंदर पेट में कुलबुलाहट थी. प्यास से होंठ सूख रहे थे. पर वह चुपचाप बैठी रही. नानीमामी बहुत याद आ रही थीं. घर से कोई भी कहीं जाता, पूड़ीसब्जी बांध कर पानी के साथ देती थीं. पर वह कहां किसी से कह कर आई थी. न घर से आई थी, न कहीं जाने को आई थी. बस, चली आई थी. किसी के बस में चढ़ने की आहट आई. उस ने अपनी आंखें कस कर भींच लीं. पदचाप बहुत करीब आ गई और फिर रुक गई. उस की सांस भी लगभग रुक गई. न आंखें खोलते बन रहा था, न बंद रखी जा रही थीं. जीवविज्ञान में जहां हृदय का स्थान बताया था वहां बहुत भारी लग रहा था. गले में कुछ आ कर फंस गया था. वह एक पल था जैसे एक सदी. अनंत सा लगा था.

‘‘कौन हो तुम? आंख खोलो,’’ कंडक्टर सामने खड़ा था, ‘‘मैं तो यों ही देखने चढ़ गया था कि किसी का सामान वगैरा तो नहीं छूट गया. तुम उतरी क्यों नहीं? जानती नहीं, यह बस आगे नहीं जाएगी.’’ उस के चेहरे का असमंजस, भय वह एक ही पल में पढ़ गया था, ‘‘कहां जाओगी?’’

उस समय, उस के मुंह से अटकते हुए निकला, ‘‘जी…जी, मैं सुबह दूसरी बस से चली जाऊंगी, मुझे रात में यहीं बैठे रहने दीजिए.’’

‘‘जाना कहां है?’’

…यह तो उसे भी नहीं पता था कि जाना कहां है.

कुछ जवाब न पा कर कंडक्टर फिर बोला, ‘‘घर कहां है?’’

यह वह बताना नहीं चाहती थी, डर था वह घर फोन करेगा और उस के आगे की तो कल्पना से ही वह घबरा गई. बस, इतना ही बोली, ‘‘मैं सुबह चली जाऊंगी.’’

‘‘तुम यहां बस में नहीं रह सकती, मुझे बस बंद कर के घर जाना है.’’

‘‘मुझे अंदर ही बंद कर दें, प्लीज.’’

‘‘अजीब लड़की हो, मैं रातभर यहां खड़ा नहीं रह सकता,’’ वह झल्ला उठा था, ‘‘मेरे साथ चलो.’’

कोई दूसरा रास्ता न था उस के पास. इसलिए न कोई प्रश्न, न डर, पीछेपीछे चल पड़ी.

बसअड्डे तक पहुंचे तो कंडक्टर ने इशारा कर एक रिकशा रुकवाया और बोला, ‘‘बैठो.’’ रिकशा तेज चलने से ठंडी हवा लगने लगी थी. कुछ हवा, कुछ अंधेरा, वह कांप गई.

उस की सिहरन को सहयात्री ने महसूस करते हुए भी अनदेखा किया और फिर एक प्रश्न उस की ओर उछाल दिया, ‘‘घर क्यों छोड़ कर आई हो?’’

‘‘मैं वहां रहना नहीं चाहती.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘कोई मुझे प्यार नहीं करता, मैं वहां अनचाही हूं, अवांछित हूं.’’

‘‘सुबह कहां जाओगी?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘कहां रहोगी?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘कोई तो होगा जो तुम्हें खोजेगा.’’

‘‘वे सब खोजेंगे.’’

‘‘फिर?’’

‘‘परेशान होंगे, और मैं यही चाहती हूं क्योंकि वे मुझे प्यार नहीं करते.’’

‘‘तुम सब से ज्यादा किसे प्यार करती हो?’’

‘‘अपनी नानी से, मैं 3 महीने की थी जब मेरी मां ने मुझे उन के पास छोड़ दिया.’’

‘‘वे कहां रहती हैं?’’

‘‘मथुरा में.’’

‘‘तो मथुरा ही चली जाओ?’’

‘‘मेरे पास टिकट के पैसे नहीं हैं.’’ अब वह लगभग रोंआसी हो उठी थी.

वह ‘हूंह’ कह कर चुप हो गया था.

हवा को चीरता मोड़ों पर घंटी टुनटुनाता रिकशा आगे बढ़ता रहा और जब एक संकरी गली में मुड़ा तो वह कसमसा गई थी. आंखें फाड़ कर देखना चाहा था घर. घुप्प अंधेरी रात में लंबी पतली गली के सिवा कुछ न दिखा था. कुछ फिल्मों के खौफनाक दृश्यों के नजारे उभर आए थे. देखी तो उस ने ‘उमराव जान’ भी थी. आवाज से उस की तंद्रा टूटी.

‘‘बस भइया, इधर ही रोकना,’’ उस ने कहा तो रिकशा रुक गया और उन के उतरते ही अपने पैसे ले कर रिकशेवाला अंधेरे को चीरता सा उसी में समा गया था. वह वहां से भाग जाना चाहती थी. कंडक्टर ने उस का हाथ पकड़ एक दरवाजे पर दस्तक दी थी. सांकल खटखटाने की आवाज सारी गली में गूंज गई थी.

भीतर से हलकी आवाज आई थी, ‘‘कौन?’’

‘‘दरवाजा खोलो, पूनम,’’ और दरवाजा खोलते ही अंदर का प्रकाश क्षीण हो सड़क पर फैल गया. उस पर नजर पड़ते ही दरवाजा खोलने वाली युवती अचकचा गई थी. एक ओर हट कर उन्हें अंदर तो आने दिया पर उस का सारा वजूद उसे बाहर धकेलरहा था. दरवाजा एक छोटे से कमरे में खुला था, ठीक सामने एक कार्निस पर 2 फूलदान सजे थे, बीच में कुछ मोहक तसवीरें. एक कोने में एक छोटा सा रैक था जिस पर कुछ डब्बे थे, कुछ कनस्तर, एक स्टोव और कुछ बरतन, सब करीने से लगे थे. एक ओर छोटा पलंग जिस पर साफ धुली चादर बिछी थी और 2 तकिए थे. चादर पर कोई सिलवट तक न थी.

कुल मिला कर कम आय में सुचारु रूप से चल रही सुघड़ गृहस्थी का आदर्श चित्र था. वह भी ऐसा ही चित्र बनाना चाहती थी. बस, अभी तक उस चित्र में वह अकेली थी. अकेली, हां यही तो वह कह रहा था. ‘‘पूनम, यह लड़की बसअड्डे पर अकेली थी. मैं साथ ले आया. सुबह बस पर बिठा दूंगा, अपनी नानी के घर मथुरा चली जाएगी.’ युवती की आंखों में शिकायत थी, गरदन की अकड़ नाराजगी दिखा रही थी. वह भी समझ रहा था और शायद स्थिति को सहज करने की गरज से बोला, ‘‘अरे, आज दोपहर से कुछ नहीं खाया, कुछ मिलेगा क्या?’’

युवती चुपचाप 2 थालियां परोस लाई और पलंग के आगे स्टूल पर रखते हुए बोली, ‘‘हाथमुंह धो कर खा लो, ज्यादा कुछ नहीं है. बस, तुम्हारे लिए ही रखा था.’’ दोपहर से तो उस ने भी कुछ नहीं खाया था किंतु इस अवांछिता से उस की भूख बिलकुल मर गई थी. घर का खाना याद हो आया, सब तो खापी कर सो गए होंगे, शायद. क्या कोई उस के लिए परेशान भी हो रहा होगा? जैसेतैसे एक रोटी निगल कर उस ने कमरे के कोने में बनी मोरी पर हाथ धो लिए और सिमट कर कमरे में पड़ी इकलौती प्लास्टिक की कुरसी पर बैठ गई.

पूनम नाम की उस युवती ने पलंग पर पड़ी चादर को झाड़ा और चादर के साथ शायद नाराजगी को भी. फिर जरा कोमल स्वर में बोली, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा, घर क्यों छोड़ आई?’’ ‘‘जी’’ कह कर वह अचकचा गई.

‘‘नहीं बताना चाहती, कोई बात नहीं. सो जाओ, बहुत थकी होगी.’’ शायद वह उस की आंखों के भाव समझ गई थी. एक ही पलंग दुविधा उत्पन्न कर रहा था. तय हुआ महिलाएं पलंग पर सोएंगी और वह आदमी नीचे दरी बिछा कर. वे दोनों दिनभर के कामों से थके, लेटते ही सो गए थे. हलके खर्राटों की आवाजें कमरे में गूंजने लगीं. उस की आंख में तो नींद थी ही नहीं, प्रश्न ही प्रश्न थे. ऐसे प्रश्न जिन का वह उत्तर खोजती रही थी सदा.

‘‘इंसान को अपने पैर जमीन पर ही रखने चाहिए’’: बोमन ईरानी

नौर्वे के ओस्लो में आयोजित 17वें बौलीवुड फैस्टिवल में बोमन ईरानी को भारतीय सिनेमा में उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया. हालिया फिल्मों ‘मेड इन चाइना’ और ‘झलकी’ में भी उन के किरदार को सराहा गया.

बौलीवुड अभिनेता बोमन ईरानी हमेशा अपने अद्भुत प्रदर्शन और प्रतिष्ठित किरदारों के लिए पहचाने जाते हैं. मगर बहुत कम लोगों को पता होगा कि बोमन ईरानी ने अपने कैरियर की शुरुआत बतौर वेटर और फिर बतौर फोटोग्राफर की थी. जबकि वे कालेज के दिनों में थिएटर किया करते थे. फोटोग्राफी करतेकरते उन्होंने कुछ विज्ञापन फिल्में की थीं. विज्ञापन फिल्मों के ही चलते उन्हें फिल्म ‘डरना मना है’ में एक होटल मालिक का किरदार निभाने का अवसर मिल गया.

इस फिल्म के एक दृश्य को एडीटिंग रूम में देख कर बोमन को 35 वर्ष की उम्र में फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा ने बुला कर उन के सामने फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में अभिनय करने का प्रस्ताव रखा था. तब से बोमन निरंतर अपनी बेहतरीन अभिनय प्रतिभा से लोगों को अपना मुरीद बनाते आए हैं.

बोमन की हाल की फिल्मों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है जैसे वे केवल चुनिंदा फिल्में ही कर रहे हैं. अब पहले की तरह उन की फिल्में धड़ाधड़ परदे पर नहीं आ रहीं. वजह पूछने पर वे कहते हैं, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है. मैं लगातार 15 वर्षों तक फिल्मों में अभिनय करता रहा. समय कैसे गुजर गया एहसास ही नहीं हुआ. लेकिन जब मेरे पोते का जन्म हुआ तो मु झे एहसास हुआ कि काम के चक्कर में मैं तो अपने परिवार व घर से ही अलगथलग हो गया हूं.

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‘‘मुझे पता ही नहीं चल रहा था कि मेरे परिवार व मेरे घर के अंदर क्या हो रहा है. मुझे लगा कि मैं तो बहुतकुछ खो रहा हूं. पोते के आने के साथ ही उस के साथ समय बिताने का कारण बता कर मैं ने फिल्में स्वीकार करनी कम कर दीं. दूसरा, मेरे बचपन का सपना रहा है खुद फिल्म बनाना. तो मैं ने उस पर काम शुरू किया. मैं ने खुद फिल्म की पटकथा लिखी जिस में मु झे काफी समय लगा. अब 2020 में इस पटकथा पर फिल्म का निर्माण व निर्देशन करना है. मैं ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘ईरानी मूवीटोन’ स्थापित कर ली है.’’

बोमन फिल्मों में आने से पहले फोटोग्राफर के तौर पर तमाम लोगों की तसवीरें खींच चुके थे. जिन लोगों के बोमन ने पोर्टफोलियो शूट किए थे उन में से कुछ शायद आज कलाकार बन गए होंगे? कभी उन से दोबारा मुलाकात हुई, कैसा लगा, पूछने पर वे कहते हैं, ‘‘बहुत सारे लोग मिले. बहुत सारे लोगों के मैं ने फोटोग्राफ्स खींचे हैं. बहुत सारे मिलते रहते हैं कि आप ने मेरा सैशन किया था, उस समय पर मैं ‘मिस वर्ल्ड’ व ‘मिस यूनीवर्स’ के फोटोग्राफ्स किया करता था. जब मैं फोटोग्राफर था तब मैं ने शबाना आजमी के फोटोग्राफ्स लिए थे. नसीरुद्दीन साहब के भी लिए थे. बहुत सारे कलाकारों, क्रिकेटर्स के फोटो खींचे थे. मुझे वे दिन बहुत याद आते आते हैं.’’

जब बोमन से यह सवाल किया कि आप की फोटोग्राफी का अनुभव कहीं न कहीं अभिनय में आप की मदद करता है या नहीं तो उन्होंने कहा, ‘‘जी हां, 2-4 चीजें हैं. एक तो तकनीक बहुत काम आती है. लाइटिंग, लैंस की कंपोजिंग सम झ में आती है. यदि कैमरामैन से पूछ लूं कि कौन से लैंस पर है तो उस से सम झ में आ जाता है कि उस की मैग्नीफिकेशन के हिसाब से कहां मेरी परफौर्मैंस कैसी होनी चाहिए.’’

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कभी ऐसा भी हुआ कि इस मसले को ले कर आप की किसी निर्देशक या कैमरामैन से बहस हुई हो और फिर भी वे आप की बात मानने को तैयार न हुए हों? इस पर बोमन बताते हैं, ‘‘जी नहीं. मैं कभी सलाह नहीं देता, बहस नहीं करता. यह मेरा काम नहीं है. मेरा काम अभिनय करना है, मैं उतना ही करता हूं. कभी भी अपने डिपार्टमैंट से बाहर सैट पर बात नहीं करता हूं. कभी कोई दखलंदाजी नहीं. वह उन का काम है, वह प्रोफैशनल हैं. मु झ से ज्यादा जानते हैं.’’

‘‘पारसी थिएटर ने लोगों को बहुतकुछ सिखाया है. इस के बावजूद पारसी थिएटर से निकले हुए लोग बौलीवुड में कम से कम वह मुकाम नहीं पा पाए जो पाना चाहिए था? इस प्रश्न पर थोड़ा विचारते हुए वे कहते हैं, ‘‘पहली चीज तो यह कि पारसी थिएटर में सिर्फ पारसी लोग नहीं रहे, लेकिन वहां से ही शुरुआत हुई है. मेरा मानना है कि बदलाव होना ही होना है. मैं आप को एक बात बताता हूं. मैंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी का नाम ‘ईरानी मूवीटोन’ रखा.

‘‘जब सिनेमा की शुरुआत हुई थी उस जमाने में फिल्मों में पारसी बहुत थे. वे अपनी कंपनी के नाम के साथ ‘मूवीटोन’ जोड़ते थे. मसलन, ‘वाडिया मूवीटोन’, ‘इंपीरियल मूवीटोन’. मेरा मानना है कि रुको मत, आगे बढ़ते रहो. हमें भी समय के साथ बदलना चाहिए.’’

अपने ‘ईरानी मूवीटोन’ नामक प्रोडक्शन हाउस की पहली फिल्म, जिस की कहानी खुद बोमन ने लिखी है, के विषय में बोमन बताते हैं, ‘‘यह बायोपिक किस्म की फिल्म नहीं है. मतलब इस में रीयल जीवन की कथा नहीं है. लेकिन मैं ने अपनी जिंदगी में पिता और पुत्र के रिश्ते के कई मसले देखे हैं. बहुत सारे केस ऐसे हैं कि बाप व बेटे में प्यार बहुत होता है लेकिन उन के बीच बातें कम होती हैं. तो मैं इसी तरह के विषय पर फिल्म बना रहा हूं.’’

बोमन के बेटे कायोज ईरानी भी अभिनेता हैं. साथ ही वे निर्देशन के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं. अपने बेटे के साथ काम करने के विषय में बोमन का कहना है कि उन का बेटा उन्हें मौका देगा तो वे उस के साथ काम जरूर करेंगे. वे कहते हैं, ‘‘मैं मानता हूं कि मेरा बेटा अच्छा काम कर रहा है. वह करण जौहर की फिल्म ‘तख्त’ में एसोसिएट डायरैक्टर है. वह मेहनत कर रहा है. हम लोग जब शाम को घर पर मिलते हैं तो दिनभर की बातें करते हैं.’’

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निजी जिंदगी में भी बोमन मोटिवेशन, प्रेरणादयक भाषण देते रहते हैं. इस से जुड़े अपने किस्से बताते हुए वे कहते हैं, ‘‘एक बार मैं मंच संचालन कर रहा था. कंपनी के सीईओ ने मु झ से कहा कि सर,  आप मंच संचालन कर रहे हैं, आइए,मैं आप से कुछ सवाल करता हूं. उन्होंने मु झ से ‘आप इतने साल कहां थे’ जैसे कुछ सवाल पूछे. मैं खड़े रह कर उन की बातें सुन रहा था. फिर मैं ने उन्हें बताया कि पहले मैं वेटर था. फिर मैं दुकानदार था. फिर फोटोग्राफर था. फिर मैं ने थिएटर शुरू किया. इस तरह बातचीत चलती रही. फिर उन्होंने कहा कि आप की कहानी तो काफी दिलचस्प व प्रेरणादायक है. उन्होंने मु झे सलाह दी कि मु झे अपनी इस कहानी का एक घंटे का कार्यक्रम बना कर पेश करना चाहिए. उन्होंने कहा कि पहले कार्यक्रम के लिए मेरी कंपनी के लिए 4 जगह बुक कर लीजिए. तो मैं ने यह शुरू किया. हर कार्यक्रम में मैं बातें करता था, कहानी सुनाता था.

‘‘अब एक पैकेज बन गया है. अब मैं  कौर्पोरेट्स में मोटिवेशनल स्पीकिंग करता हूं. अच्छा लगता है. मैं खुद भी अपनी जिंदगी, अपनी यात्रा को याद कर के सीखता हूं. हम कहां से आए हैं, यह भूलना नहीं चाहिए. अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिए. इंसान को अपने दोनों पैर जमीन पर ही रखने चाहिए. यह कार्यक्रम मु झे याद दिलाता रहता है कि मैं कौन हूं और मैं कहां से आया हूं.’’

बोमन का मानना है कि अपनी आसपास की चीजों से, किरदारों से हम बहुतकुछ सीखते हैं. वे कहते हैं, ‘‘मैं तो हर चीज से सीख लेता हूं. जब मैं कहीं जाता हूं और एयरपोर्ट पर कोई पिक करने आता है, तो उस से भी बातें करने लगता हूं. मेरी यह आदत है. कई बार लोगों के जो जवाब मिलते हैं उस से मैं इंस्पायर होता हूं. दूसरों में रुचि रख कर हम काफीकुछ सीखते हैं.’’

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल : अंधविश्वास और बैगा गुनिया के संजाल में

जब घर का मुखिया ही अंधेरे में जीना चाहे उसे रोशनी की दरकार समझ न हो, तो घर के अन्य प्राणी क्या खा कर उजाला पसंद करेंगे,रोशनी चाहेगे.यही परम सत्य इन दिनों छत्तीसगढ़ में दिखाई दे रहा है. छत्तीसगढ़ के तृतीय मुख्यमंत्री के रूप में भूपेश बघेल ने प्रगतिशील सोच को दरकिनार करते हुए बारंबार रूढ़िवादिता, अंधविश्वास को बढ़ावा दिया है. और यह संदेश छत्तीसगढ़ में प्रसारित किया है की ढोंग,बैगा, गुनिया अंधविश्वास ही आम छत्तीसगढ़िया के लिए विकास का दरवाजा है.

गोवर्धन पूजा के दिन रायपुर से दुर्ग जाकर ग्राम जंजगिरी में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सुख समृद्धि के नाम पर एक बैगा के हाथों कोडे खाएं और यह संदेश दिया की आज के वैज्ञानिक युग में प्रदेश का आम छत्तीसगढ़ वासी कोड़े खाकर सुख समृद्धि प्राप्त कर सकता है. इसके लिए उसे संघर्ष करने, कर्म करने की आवश्यकता नहीं है. सिर्फ बैगा के कोडे खाओ और पाप काट लो. समृद हो जाओ. यह ढकोसला, यह नाटक बेहद शर्मनाक है. यह और भी विभस्त हो जाता है. जब लोगों को प्रेरणा देने वाली विभूतियां यह धृतकरम करने लगे.

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श्रीमान ने “चाबुक” पड़वाए !

मुख्यमंत्री के रूप में भूपेश बघेल ने जब से छत्तीसगढ़ के मुखिया की कुर्सी पर विराजमान हुए हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ की अस्मिता संस्कृति को बढ़ावा देने का एकमात्र लक्ष्य तय कर लिया है. और ऐसा कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देते, जिसमें छत्तीसगढ़ के लोगों को यह एहसास हो की डा. रमन सिंह के 15 वर्ष के कार्यकाल के बाद छत्तीसगढ़ का बेटा मुख्यमंत्री बना है जो छत्तीसगढ़ की मिट्टी में रचा बसा है इस सोच और दौड़ में वे कब अंधविश्वास, पोगापंथ के संवाहक बन जाते हैं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पता ही नहीं चलता. 28 अगस्त 2019 को गोवर्धन पूजा के दिन उन्होंने प्रदेश में गाय के पूजा, गोठान दिवस मनाने की घोषणा की मगर जंजगिरी ग्राम जिला दुर्ग में गौरा गौरी पूजा मे उनके हाथ पर एक बैगा चाबुक मारता रहा यह वीडियो सभी चैनलों में प्रसारित हुआ और यह बताया गया की ऐसा करने से व्यक्ति के ऊपर किसी भी तरह की आफत नहीं आती और जीवन  खुशहाल हो जाता है .

सवाल है, ऐसे करके क्या मुख्यमंत्री के रूप में संवैधानिक रूप से भूपेश बघेल प्रदेश की जनता को अंधविश्वास की अंधेरी खाई में नहीं ढकेल रहे हैं. क्या आज के समय में कोई मानेगा की चाबुक खाने से दुख दर्द दूर हो जाते हैं,आफत भाग जाती है आदमी खुशहाल हो जाता है… दरअसल, यह सब कम पढ़े लिखे लोगों के छलावे हैं. जिनमें मुख्यमंत्री जैसे गरिमामयी कुर्सी पर बैठा शख्स डूबता है तो यह संदेश दूर तलक जाता है .

बैगा गुनिया की पौ बारह

छत्तीसगढ़ में टोनही अधिनियम सख्ती से लागू है. आदिवासी प्रदेश होने के कारण ग्रामीण अंचल में महिलाओं को टोनहीं कह कर प्रताड़ित किया जाता है. जाने कितनी महिलाएं प्रतिवर्ष क्रूरता  की शिकार होती है. यहाँ  बैगा गुनिया भी ग्रामीण अंचल में लोगों का इलाज करते हैं और खतरनाक ढंग से इलाज करते करते भोले-भाले लोगों पर क्रूरता  करने लगते हैं. ऐसे जाने कितने प्रकरण सामने आते रहते हैं.ऐसे में जब प्रदेश का मुखिया मुख्यमंत्री बैगा गुनिया के हाथों स्वयं को हंसते हंसते चाबुक पड़ वायेगा, चाहे वह प्रतीकात्मक ही क्यों न हो, तो इसका असर दूर अंचल मैं क्या हो सकता है, इसकी कल्पना सहज ही लगाई जा सकती है.

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आंचलिक उपन्यासकार बाबा नागार्जुन का उपन्यास “जमनिया का बाबा” में भक्तों की पीठ पर छड़ी  सेंकने वाले बाबाओं की कहानी है जो छड़ी मारते मारते इतने तरंग में आ जाते हैं की भक्त मरणासन्न हो जाते हैं और बाबा मस्तराम को जेल की हवा खानी पड़ती है.

मुख्यमंत्री को तो बैगा ने प्रतीकात्मक चाबुक मारा, मगर जब दूरदराज इलाको में बैगाओ की चल पड़ेगी तब लोगों को मार-मार कर लाल कर देंगे. तब उसका जिम्मेदार कौन होगा ? अंधविश्वास व्यवस्था के नाम पर छत्तीसगढ़ में तेजी से फैलता ढोंग घतूरा चिंता का बड़ा  सबब है.

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