Download App

सीप में बंद मोती : भाग 1

फोटो में अरुणा के सौंदर्य को देख कर आलोक बहुत खुश था. लेकिन शादी के बाद अरुणा के सांवले रंग को देख कर उस के भीतर हीनभावना घर कर गई. जब उसी सांवलीसलोनी अरुणा के गुणों का दूधिया उजाला फूटने लगा तो उस की आंखें चौंधिया सी गईं.

टन…टन…दफ्तर की घड़ी ने साढ़े 4 बजने की सूचना दी तो सब एकएक कर के उठने लगे. आलोक ने जैसे यह आवाज सुनी ही नहीं.

‘‘चलना नहीं है क्या, यार?’’ नरेश ने पीठ में एक धौल मारी तो वह चौंक गया, ‘‘5 बज गए क्या?’’

‘‘कमाल है,’’ नरेश बोला, ‘‘घर में नई ब्याही बीवी बैठी  है और पति को यह भी पता नहीं कि 5 कब बज गए. अरे मियां, तुम्हारे तो आजकल वे दिन हैं जब लगता है घड़ी की सुइयां खिसक ही नहीं रहीं और कमबख्त  5 बजने को ही नहीं आ रहे, पर एक तुम हो कि…’’

नरेश के व्यंग्य से आलोक के सीने में एक चोट सी लगी. फिर वह स्वयं को संभाल कर बोला, ‘‘मेरा कुछ काम अधूरा पड़ा है, उसे पूरा करना  है. तुम चलो.’’

नरेश चल पड़ा. आलोक गहरी सांस ले कर कुरसी से टिक गया और सोचने लगा. वह नरेश को कैसे बताता कि नईनवेली बीवी है तभी तो वह यहां बैठा है. उस  के अंदर की उमंग जैसे मर सी गई है. पिताजी को भी न जाने क्या सूझी कि उस के गले में ऐसी नकेल डाल दी जिसे न वह उतार सकता है और न खुश हो कर पहन सकता है. वह तो विवाह करना ही नहीं चाहता था. अकेले रहने का आदी हो गया था…विवाह की इच्छा ही नहीं होती थी.

उस ने कई शौक पाले हुए थे. शास्त्रीय संगीत  के महान गायकों के  कैसटों का  अनुपम खजाना था उस के पास जिन्हें सुनतेसुनते वह न जाने कहां खो जाता था. इस के अलावा अच्छा साहित्य पढ़ना, शहर में आयोजित सभी चित्रकला प्रदर्शनियां देखना, कवि सम्मेलनों आदि में भाग लेना उस के प्रिय शौक थे और इन सब में व्यस्त रह कर उस ने विवाह के बारे  में कभी सोचा भी न था.

ऐसे में पिताजी का पत्र आया था,  ‘आलोक, तुम्हारे लिए एक लड़की देखी है. अच्छे खानदान की, प्रथम श्रेणी में  एम.ए. है. मेरे मित्र की बेटी है. फोटो साथ भेज रहा हूं. मैं तो उन्हें हां कर चुका हूं. तुम्हारी स्वीकृ ति का इंतजार है.’

अनमना सा हो कर उस ने फोटो उठाया और गौर से देखने लगा था. तीखे नाकनक्श की एक आकर्षक मुखाकृति थी. बड़ीबड़ी भावप्रवण आंखें जैसे उस के सारे वजूद पर छा गई थीं और जाने किस रौ में उस ने वापसी डाक से ही पिताजी को अपनी स्वीकृति  भेज  दी थी.

पिताजी ने 1 माह बाद ही विवाह की तारीख नियत कर दी थी. उस के दोस्त  नरेश, विपिन आदि हैरान थे और उसे सलाह दे रहे थे  कि सिर्फ फोटो देख कर ही वह विवाह को कैसे राजी हो गया. कम से कम एक बार लड़की से रूबरू तो हो लेता. पर जवाब में वह हंस कर बोला था, ‘फोटो तो मैं ने देख ही लिया है. अब पिताजी लंगड़ीलूली बहू तो चुनेंगे नहीं.’

पर कितना गलत सोचा था उस ने. विवाह की प्रथम रात्रि को ही उस ने अरुणा के चेहरे पर  प्रथम दृष्टि डाली तो सन्न रह गया था. अरुणा की रंगत काफी सांवली थी. फिर तो वे बड़ीबड़ी भावप्रवण आंखें, जिन में वह अकसर कल्पना में डूबा रहता था, वे तीखे नाकनक्श जो धार की तरह सीधे उस के हृदय में उतर जाते थे, सब जैसे कपूर से  उड़ गए थे और रह गया था अरुणा का सांवला रंग.

अरुणा से तो उस ने कुछ नहीं कहा, पर सुबह पिताजी से लड़ पड़ा था, ‘कैसी लड़की देखी है आप ने मेरे लिए? आप पर भरोसा कर  के मैं ने बिना देखे ही विवाह के लिए हां कर दी थी और आप ने…’

‘क्यों, क्या कमी है लड़की में? लंगड़ीलूली है क्या?’ पिताजी टेढ़ी  नजरों से उसे देख कर बोले थे.

‘आप ने तो बस, जानवरों की तरह सिर्फ हाथपैरों की सलामती का ही ध्यान रखा. यह नहीं देखा कि उस का रंग कितना काला है.’

‘बेटे,’ पिताजी समझाते हुए बोले थे, ‘अरुणा अच्छे घर की सुशील लड़की है.

प्रथम श्रेणी में एम.ए. है. चाहो तो नौकरी करवा लेना. रंग का सांवला होना कोई बहुत बड़ी कमी नहीं है. और फिर अरुणा सांवली अवश्य है, पर काली नहीं.’

पिताजी और मां दोनों ने उसे अपने- अपने ढंग से समझाया था पर उस का आक्रोश कम न हुआ था. अरुणा के कानों में भी शायद इस वार्तालाप के  अंश पड़ गए थे. रात को वह धीमे स्वर में बोली थी, ‘शायद यह विवाह आप की इच्छा के विरुद्ध हुआ है…’

वह खामोश रहा था. 15 दिन बाद ही वह काम पर वापस आ गया था. अरुणा भी उस के साथ थी. कानपुर आ कर अरुणा ने उस की अस्तव्यस्त गृहस्थी को सुचारु रूप से समेट लिया था.

‘‘साहब, घर नहीं जाना क्या?’’

चपरासी दीनानाथ का स्वर कान में पड़ा तो उस की विचारतंद्रा टूटी. 6 बज चुके थे. वह उठ खड़ा हुआ . घर जाने का भी जैसे कोई उत्साह नहीं था उस के अंदर. उसे आए 15 दिन हो गए हैं. अभी तक उस के दोस्तों ने अरुणा को नहीं देखा है. जब भी वे घर आने की बात करते हैं वह कोई  न कोई बहाना बना कर टाल जाता है.

आखिर वह करे भी क्या? नरेश की बीवी सोनिया कितनी सुंदर है और आकर्षक भी. और विपिन की पत्नी कौन सी कम है. राजेश की पत्नी लीना भी कितनी गोरी और सुंदर है. अरुणा तो इन सब के सामने कुछ भी नहीं. उस के दोस्त तो पत्नियों को बगल में सजावटी वस्तु की तरह लिए घूमते हैं. एक वह है कि दिन के समय भी अरुणा को साथ ले कर बाहर नहीं निकलता. न जाने कैसी हीन ग्रंथि पनप रही है उस के अंदर. कैसी बेमेल जोड़ी है उन की.

घर पहुंचा तो अरुणा ने बाहर कुरसियां निकाली हुई थीं. तुरंत ही वह चाय और पोहा बना कर ले आई. वह खामोश चाय की चुसकियां ले रहा था. अरुणा उस के मन का हाल काफी हद तक समझ रही थी. उस ने छोटे से घर को तो अपने कुशल हाथों और कल्पनाशक्ति से सजा  रखा था पर पति के मन की थाह वह नहीं ले पा सकी थी.

छोटे से बगीचे से फूलपत्तियां तोड़ कर वह रोज पुष्पसज्जा करती. कई बार तो आलोक भी सजे हुए सुंदर से घर को देख कर हैरान रह जाता. तारीफ के बोल  उस के मुंह से निकलने को ही होते पर वह उन्हें अंदर ही घुटक लेता.

पाक कला में निपुण अरुणा रोज नएनए व्यंजन बनाती. उस की तो भूख जैसे दोगुनी हो गई थी. नहाने जाता तो स्नानघर में कपड़े, तौलिया, साबुन सब करीने से सजे मिलते. यह सब देख कर  मन ही  मन अरुणा के प्रति प्यार और स्नेह के अंकुर से फूटने लगते, पर फिर उसी क्षण वही पुरानी कटुता उमड़ कर सामने आ जाती और वह सोचता, ये काम तो कोई नौकर भी कर सकता है.

एक दिन वह दफ्तर से आ कर बैठा ही था कि नरेश, विवेक, राजेश सजीधजी  पत्नियों के साथ उस के घर आ धमके. नरेश बोला, ‘‘आज पकड़े गए, जनाब.’’

उन सब के चेहरे देख कर एक बार तो आलोक सन्न सा रह गया. क्या सोचेंगे ये सब अरुणा को देख कर? क्या यही रूप की रानी थी, जिसे अब तक उस ने छिपा कर रखा हुआ था? पर मन के भाव छिपा कर वह चेहरे पर मुसकान ले आया और बोला, ‘‘आओआओ, यार, धन्यवाद जो तुम सब इकट्ठे आए.’’

‘‘आज तो खासतौर से भाभीजी से मिलने आए हैं,’’ विवेक  बोला और फिर सब बैठक में आ गए. सुघड़ता और कलात्मकता से सजी बैठक में आ कर सभी नजरें घुमा कर सजावट देखने लगे. राजेश बोला, ‘‘अरे वाह, तेरे घर का तो कायाकल्प हो गया है, यार.’’

तभी अंदर से अरुणा मुसकराती हुई आई और सब को नमस्ते कर के बोली, ‘‘बैठिए, मैं आप लोगों के लिए चाय लाती हूं.’’

‘‘आप भी क्या सोचती होंगी कि आप के पति के कैसे दोस्त हैं जो अब तक मिलने भी नहीं आए पर इस में हमारा कुसूर नहीं है. आलोक ही बहाने बनाबना कर हमें आने से रोकता रहा.’’

‘‘अरुणा, तुम्हारी पुष्पसज्जा तो गजब की है,’’ सोनिया प्रंशासात्मक स्वर में बोली, ‘‘हमारे बगीचे में भी फूल हैं पर   मुझे सजाने का तरीका ही नहीं आता. तुम सिखा देना मुझे.’’

‘‘इस में सिखाने जैसी तो कोई बात ही नहीं,’’ अरुणा संकुचित हो उठी. वह रसोई में चाय बनाने चली गई.  कुछ ही देर में प्लेटों में गरमागरम ब्रेडरोल और गुलाबजामुन ले आई.

‘‘आप इनसान हैं या मशीन?’’ विवेक हंसते हुए बोला, ‘‘कितनी जल्दी सबकुछ तैयार कर लिया.’’

‘‘अब आप लोग गरमागरम खाइए मैं ब्रेडरोल तलती जा रही हूं.’’

1 घंटे बाद जब सब जाने लगे तो नरेश आलोक को कोहनी मार कर बोला, ‘‘वाकई यार, तू ने बड़ी सुघड़ और अच्छी बीवी पाई है.’’

आलोक समझ नहीं पाया, नरेश सच बोल रहा है या मजाक कर रहा है. जाते समय सब आलोक और अरुणा को आमंत्रित करने लगे  तो आलोक बोला, ‘‘दिन तय मत करो, यार, जब फुरसत होगी आ जाएंगे और फिर  खाना खा कर ही आएंगे.’’

‘‘फिर तो तुम्हें फीकी मूंग की दाल और रोटी ही मिलेगी,’’ विवेक हंसता हुआ बोला, ‘‘हमारी पत्नी का तो लगभग रोज का यही घिसापिटा मीनू है.’’

‘‘और कहीं हमारे यहां खिचड़ी  ही न बनी हो. सोनिया जब भी थकी होती है खिचड़ी ही बनाती है. वैसे अकसर यह थकी ही रहती है,’’ नरेश टेढ़ी नजरों से सोनिया को देख कर बोला.

खेती में कृषि यंत्रों का इस्तेमाल

धान कटाई यंत्र

बीसीएस आटोमैटिड रीपर (स्वचालित) : यह रीपर यंत्र फसल की कटाई करने के साथसाथ उस के बंडल भी बनाता है. इस यंत्र के इस्तेमाल से मजदूरों की काफी बचत हो जाती है. इस रीपर यंत्र से धान, सोयाबीन, धनिया, हरा चारा वगैरह भी काट सकते हैं.

इस यंत्र में 10 हौर्सपावर का इंजन लगा होता है. यह मशीन एक घंटे में तकरीबन एक एकड़ फसल को काट कर उस के बंडल भी साथसाथ बांध देती?है. इतने काम में ईंधन खपत एक लिटर प्रति एकड़ होती है.

इस मशीन को चलाना बेहद आसान है. इस पर एक ही आदमी बैठ कर आराम से फसल काट सकता है. इस में कुल 5 गियर होते हैं जिस में 4 गियर आगे और एक गियर पीछे के लिए लगा होता है.

इस के अलावा बीसीएस कंपनी का ट्रैक्टरचालित रीपर बाइंडर भी आता है. इस की कुछ अधिक कीमत है. ये यंत्र सभी छोटेबड़े शहरों में मिल सकते?हैं.

ज्यादा जानकारी के लिए आप बीसीएस कृषि यंत्र निर्माता कंपनी के मोबाइल नंबर 09872874743/09872874745 पर बात कर सकते हैं.

कामको पावर रीपर : इस के 2 मौडल हैं. पहला मौडल केआर 120 एच है. इस की अनुमानित कीमत 1 लाख, 15 हजार है और दूसरा मौडल केआर 120 एम?है, जिस की अनुमानित कीमत 1 लाख, 10 हजार है. इन्हें पैट्रोल व डीजल दोनों से चलाया जा सकता है. पैट्रोल से ईंधन की खपत 800 मिलीलिटर प्रति घंटा है, वहीं डीजल से चलाने पर ईंधन की खपत अधिक होती है. यह 2 घंटे में एक एकड़ फसल की कटाई करता है. यह जमीन से 5 सैंटीमीटर से 25 सैंटीमीटर की ऊंचाई तक यानी 1.2 मीटर की चौड़ाई में फसल की कटाई करता है.

अशोका रीपर बाइंडर : इस यंत्र को 35 हौर्सपावर से 40 हौर्सपावर के ट्रैक्टर के साथ आसानी से जोड़ कर चलाया जाता है और 3 घंटे में एक हेक्टेयर फसल की कटाई के साथसाथ बंधाई भी करता है.

इस यंत्र में हाइड्रोलिक सिस्टम होने के कारण इस यंत्र को अपनी सुविधानुसार ऊपरनीचे किया जा सकता है. मशीन को ट्रैक्टर के साथ जोड़ने के बाद कटाई करते समय 5 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक चलाया जा सकता है.

ज्यादा जानकारी के लिए आप कंपनी के मोबाइल नंबर 09412636370 पर जानकारी ली जा सकती है.

ये भी पढ़ें- रोटावेटर खास जुताई यंत्र : मिल रही सरकारी मदद

भारत रीपर : भारत इंडस्ट्रियल कोऔपरेशन का भारत रीपर, जिन का फोन नंबर 0136-224075, मोबाइल नंबर 9814069075 पर बात कर के आप अधिक जानकारी ले सकते हैं.

सरदार रीपर : अनेक फसलों की कटाई करने वाला इन का मल्टीक्रौप सुपर डीलक्स मौडल 841 है. ज्यादा जानकारी के लिए आप मोबाइल नंबर 9814447143 पर बात कर सकते हैं.

इन कृषि यंत्र निर्माताओं के अलावा अनेक लोग ऐसे यंत्र बना रहे हैं, जिन में गुरु पावर रीपर, किसान क्राफ्ट, लोहन पावर रीपर वगैरह हैं. आप अपने नजदीकी कृषि यंत्र विक्रेता या नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से भी रीपर से जुड़ी जानकारी ले सकते हैं.

धान थ्रेशर

गिल एग्रो का मल्टी क्रौप थ्रेशर : कृषि यंत्र निर्माता खेती में काम आने वाले अनेक यंत्रों को बनाते हैं. पंजाब, हरियाणा में इन की मशीनें काफी पसंद की जाती हैं.

मल्टी क्रौप थ्रेशर का जंबो मौडल है जो मजबूत प्लेटफार्म के साथ जुड़ा यंत्र?है. इस थ्रेशर से अनेक फसलों का अनाज निकाला जा सकता?है. पंजाब के मलौट में स्थित गिल एग्रो के फोन नंबर 91-1637-263352 या मोबाइल नंबर 9417066252 और 9317100008 पर बात कर के ज्यादा जानकारी ले सकते हैं.

अमर मल्टी क्रौप थ्रेशर : यह यंत्र 3 अलगअलग मौडलों में है. इस यंत्र की तमाम खूबियां हैं.

अमर मल्टी क्रौप थ्रेशर (इंजन मौडल) : इस थ्रेशर में 10 हौर्सपावर का डीजल इंजन थ्रेशर यंत्र के साथ ही जुड़ा होता है. अलग से ट्रैक्टर को अन्य शक्ति स्रोत की जरूरत नहीं होती है. इस थ्रेशर से एक घंटे में 7 से 10 क्विंटल तक अनाज निकाला जा सकता है. इस यंत्र का वजन तकरीबन 750 किलोग्राम है.

अमर मक्का मल्टी क्रौप थ्रेशर (ट्रैक्टर मौडल) : इस मल्टी क्रौप थ्रेशर से मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, जई, गेहूं, धान वगैरह की आसानी से ओसाई की जा सकती है. इसे 35 हौर्सपावर या इस से अधिक हौर्सपावर के ट्रैक्टर के साथ चलाया जाता है. यह यंत्र टायरयुक्त मजबूत प्लेटफार्म पर लगा है. इसे एक जगह से दूसरी जगह लाना व ले जाना आसान है. इस यंत्र का वजन तकरीबन 1,200 किलोग्राम है.

अमर मल्टी क्रौप थ्रेशर (बिजली मोटर/पावर टिलर से चलने वाला) : इस यंत्र से?भी अनेक फसलों की ओसाई की जाती है. गेहूं 3 से 4 क्विंटल प्रति घंटे के हिसाब से निकलता है. इस थ्रेशर को चलाने के लिए बाहरी शक्ति की जरूरत पड़ती है जिस के लिए 8 एचपी इंजन या इलैक्ट्रिक मोटर की जरूरत होती है.

ये भी पढ़ें- सरसों की फसल: समय पर बोआई भरपूर कमाई

योद्धा मल्टी क्रौप थ्रेशर : सायको एग्रोटैक का योद्धा मल्टी क्रौप थ्रेशर अंतर्राष्ट्रीय मान्यता के साथ नई डिजाइन व तकनीक द्वारा बनाए जाते हैं. योद्धा मल्टी क्रौप थ्रेशर मोटर, इंजन, ट्रैक्टर और हडंबा कटर मौडल में मौजूद हैं. ये मल्टी क्रौप थ्रेशर किसी भी ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर चलाए जा सकते हैं.

योद्धा मल्टी क्रौप थ्रेशर के सभी पुरजे आसानी से बदले जा सकते हैं और हर जगह आसानी से मिल जाते हैं. इस मल्टी क्रौप थ्रेशर से गेहूं, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, मटर, चना, सूरजमुखी, सरसों, तिलहन और दालों की गहाई आसानी से की जाती है.

मातृत्व का अमृत : भाग 1

पति की मौत के बाद विभा के जीने का कोई सहारा नहीं था. अत: भाईभाभी ने जबरदस्ती उस का दूसरा विवाह डा. विनोद से करवा दिया. लेकिन विभा को उस के एड्स पीडि़त होने का पता चला तो ऐसा महसूस हुआ कि सधवा होते हुए भी आज वह एक विधवा ही है.

लाल सुर्ख जोडे़ में सजी विभा के चारों तरफ गूंजती शहनाई और विवाह की रौनक थी. सुमित की छवि जैसे विभा की आंखों के सामने घूम रही थी और स्वत: ही उसे याद आती थी, सुमित के साथ उस की पहली मुलाकात.

वह दिन, जब सुमित उसे देखने आया था तो उस से ज्यादा नर्वस शायद सुमित खुद ही था. मुंह नीचा किए वह चुपचाप बैठा था और जैसे ही मां विभा को ले कर ड्राइंगरूम में पहुंचीं, मां के पांव छूने की बजाय गलती से सुमित ने विभा के पांव छू लिए. तब अल्हड़ विभा ने उसे ‘दूधों नहाओ और पूतों फलो’ का आशीर्वाद दिया तो वहां उपस्थित सभी ठहाका मार कर हंस पडे़.

सुमित को विभा की चंचलता बहुत भा गई और वह उस के मनमोहक रूप से आकर्षित हुए बिना भी न रह सका. वहीं विभा को भी सुमित की सादगी पसंद आई थी.

विभा सुमित से अपनी पहली भेंट को जब भी याद करती, बहुत देर तक हंसती थी.

आज फिर विभा लाल सुर्ख जोडे़ में लिपटी बैठी थी. पहले जैसी चहलपहल आज नहीं थी. 11 साल पहले जो उत्सुकता विभा की आंखों में विवाह को ले कर थी वह आज आंसू बन कर बह रही थी और कई सवाल उस के कोमल हृदय पर आघात कर रहे थे पर जवाब तलाशने से भी उसे नहीं मिल रहे थे.

एक समझदार पति के साथसाथ उस का सब से प्यारा दोस्त सुमित याद आ रहा था तो याद आ रही थी उसे अपनी ससुराल, जहां पति का बेइंतहा प्यार मिला और देवर, सासससुर के स्नेहपूर्ण व्यवहार ने उस के जीवन में इंद्रधनुषी रंग भर दिए.

उस का घरेलू जीवन तब और साकार हो गया जब विभा के घर में एक नन्हेमुन्ने की आहट हुई. विभा की ससुराल और मायके में खुशियों का उत्सव छाया हुआ था. लेकिन उस को क्या पता था कि उस की खुशियों पर एक ऐसी बिजली गिरेगी जो सबकुछ जला कर राख कर देगी.

दीवाली के दीपों की ज्योति से अंधेरे जीवन में भी प्रकाश हो जाता है पर इस बार की दीवाली विभा के जीवन में अंधकार भरने आई थी. सुमित दीवाली के अवसर पर बाजार गया. विभा कोे 4 महीने का गर्भ था, इसलिए वह न जा सकी. बाजार में बम विस्फोट हुआ और सुमित लौट कर घर न आ सका. उस की मृत्यु का समाचार और फिर उस का क्षतविक्षत शव देख कर जो सदमा विभा को लगा उसे वह सहन न कर सकी और उस का गर्भपात हो गया.

सुमित की यादें जहां विभा के मुखमंडल पर खास छटा बिखेर देती थीं वहीं उस की मृत्यु की कल्पना से भी विभा सिहर उठती थी.

विभा आज अपने अतीत के सारे पृष्ठ पलट लेना चाहती थी. यादें समय के प्रवाह के साथ धूमिल अवश्य पड़ जाती हैं परंतु खत्म कभी नहीं होतीं, क्योंकि हृदय पर बने उन के निशान सागर की गहराई से भी गहरे होते हैं.

गुजरे हुए कल ने विभा के जीवन पर गहरे निशान छोडे़ थे, ऐसे निशान जो उसे बहुत गहरे आघात दे गए थे.

विधवा विभा अपने सासससुर की सेवा करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहती थी, साथ ही एक शिक्षिका होने के नाते अपना सारा जीवन अपने विद्यालय और विद्यार्थियों के हित में समर्पित करना चाहती थी, पर जिस औरत का सुहाग उजड़ जाए उस के अपने भी बेगाने हो जाते हैं. यहां तक कि घर के लोग भी सांप की तरह फुफकारते हैं व दंश भी मारते हैं.

सुमित की मौत के बाद उस के ससुराल वालों का व्यवहार विभा के प्रति अनायास ही बदल गया. सास का छोटीछोटी बातों पर फटकारना, किसी न किसी बात में कमी निकालना, अब आम हो गया था. मगर जब देवर और ससुर की कामुक नजर उसे कचोटने लगी तो उस की सहनशक्ति परास्त हो गई. तब अपना सारा साहस जुटा कर विभा अपने मायके चली आई. घर में मांबाबूजी के अलावा विभा का एक छोटा भाई प्रभात भी था.

घर का सारा काम विभा अकेले ही करती, मांबाबूजी का पूरा खयाल रखती, विद्यालय जाती, शाम को ट्यूशन पढ़ाती और प्रभात की पढ़ाई में सहयोग भी देती. इस तरह उस ने अपनी दिनचर्या को पूरी तरह व्यस्त कर लिया था.

देखते ही देखते 9 साल गुजर गए. प्रभात, विभा के सहयोग की बदौलत आईटी प्रोफेशनल के रूप में अपने पैर जमा चुका था. उस के लिए अच्छेअच्छे रिश्ते आने लगे. मांबाबूजी ने विभा की सलाह से एक सुंदर व सुशिक्षित लड़की सुनैना को देख कर प्रभात का रिश्ता तय कर दिया. विवाह भी हंसीखुशी संपन्न हो गया. घर में एक नई बहू आ गई.

प्रभात की खुशियों में विभा अपनी खुशियां तलाशना सीख गई थी. तभी मुंहदिखाई के समय सुनैना को अपना हीरों जडि़त हार देते वक्त उस ने कहा था, ‘‘सुनैना, तुम्हें इस से भी ज्यादा सुंदर तोहफा तब दूंगी जब तुम हमें एक प्यारा सा, प्रभात जैसा भतीजा दोगी.’’

घर के सारे छोटेबडे़ फैसले विभा की सलाह से लिए जाते थे और प्रभात भी अपनी दीदी के पूरे प्रभाव में था, इसलिए सुनैना के मन में विभा के प्रति द्वेष घर कर गया. अब वह विभा को नीचा दिखाने का कोई न कोई मौका ढूंढ़ती रहती थी.

हालांकि विभा उसे अपनी छोटी बहन की तरह समझती थी और उस की गलतियों को भी क्षमा कर देती थी.

सुनैना मां बनने वाली थी और कमजोरी के कारण डाक्टर ने उसे पूरी तरह आराम की सलाह दी थी, इसलिए बाकी कार्यों के साथसाथ विभा फिर से घर का सारा काम संभालने लगी. सुनैना की हर जरूरत का भी वह पूरापूरा खयाल रखती.

उस दिन विद्यालय से लौटने के बाद विभा फ्रैश हो कर दोपहर के खाने में जुट गई. प्रभात भी घर पर ही था. सब मेज पर खाना खाने के लिए बैठे ही थे कि सुनैना झल्ला उठी.

खाने की थाली में से एक बाल निकल आने के कारण सुनैना गुस्से से लालपीली होते हुए बोली, ‘दीदी, अगर आप को कोई परेशानी है तो यों ही कह दीजिए. वैसे भी हमारी हैसियत तो है ही कि हम एक नौकरानी रख लें.’

आवेश में विभा से यह कटु वचन बोल कर सुनैना प्रभात की सहानुभूति बटोरने के लिए अभिनय करती हुई धम्म से कुरसी पर बैठ गई.

प्रभात ने सुनैना को संभालते हुए तैश में आ कर कहा, ‘दीदी, जरा ध्यान से खाना बनाया कीजिए. सुनैना को डाक्टर ने जरा सा भी स्ट्रेस लेने से मना किया है. आप की ऐसी हरकत की वजह से अगर हमारे बच्चे को कुछ हो गया तो…’

प्रभात के ऐसे व्यवहार से सुनैना को बल मिला और फिर उस ने विभा पर अपने बच्चे को गिराने का आरोप जड़ते हुए कहा, ‘आप तो, जब से मैं इस घर में आई हूं, कुछ न कुछ मेरे खिलाफ करती ही रहती हैं और आज जब मैं मां बनने वाली हूं तो जादूटोना कर के हमारी होने वाली संतान को मारना चाहती हैं. अरे, शैतान भी एक बार खाए हुए नमक की लाज रख लेता होगा और आप जिस घर में बरसों से रह रही हैं उसी घर की दीवारों की नींव को खोद देना चाहती हैं.’

विभा ने जब खुद पर लगे आरोपों का विरोध करना चाहा तो प्रभात ने उसे तमाचा जड़ दिया था. यह चोट सब से गहरी थी और सब से ज्यादा दुखदायी था मांबाबूजी का मूकदर्शक बने रहना. उस दिन एक विधवा की वेदना को विभा पूरी तरह समझ गई थी. विभा ने आवेश में आ कर अकेले ही कहीं और मकान ले कर रहने का फैसला किया पर दिल्ली जैसे शहर में एक महिला का अकेले रहना कहां तक सुरक्षित है, यह सोच कर मांबाबूजी ने उसे रोक लिया.

सुनैना, विभा को परिवार वालों की नजरों में गिराना ही नहीं बल्कि उसे घर से निकलवाना भी चाहती थी, पर अपनी आशाओं पर पानी फिरता देख अवसर पा कर उस ने मांबाबूजी के मन में विभा के दूसरे विवाह का विचार डाल दिया.

मांबाबूजी विभा के लिए किसी उचित वर की तलाश में थे तो सुनैना ने एक लड़के का नाम भी उन्हें सुझाया. उस की बातों में आ कर घर वालों ने ‘विधवा’ विभा का रिश्ता तय कर दिया.

विभा यह तो जान ही चुकी थी कि एक औरत का अस्तित्व उस के पति की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है. और एक सादे समारोह में विभा की दूसरी शादी संपन्न हो गई.

केजरीवाल का मजाक उड़ाने की सजा

जब राजनाथ सिंह जी ने राफेल के पहियों के नीचे नींबू रखे थे तब से मेरी टोने टोटकों में आस्था बढ़ रही है. इसके पीछे एक व्यक्तिगत अनुभव या संक्षिप्त कहानी यह है कि अपनी जवानी के दिनों में मेरा दिल माया नाम की एक सहपाठिन पर आ गया था लेकिन वह राम को चाहती थी. राम और माया में फूट डालने मैंने और मेरे चंद लंपट दोस्तों ने साम, दाम, दंड, भेद सब का सहारा लिया लेकिन दोनों पर कोई फर्क नहीं पड़ा. माया के चालचलन को लेकर मेरे गुट ने खूब दुष्प्रचार किया और एकाध बार अकेले में ले जाकर राम की खूब कुटाई भी की पर वे अपने लैला मजनू छाप प्यार के रास्ते से हटने तैयार नहीं हुए.

फिर तीन पत्ती के एक विशेषज्ञ दोस्त की सलाह पर मैं तत्कालीन नामी तांत्रिक से मिला जो चुटकियों में लड़कियां वश में करवा देने में मशहूर था. इस तांत्रिक ने 51 रु लिए और पानी की एक शीशी अभिमंत्रित कर दी कि इसे जैसे भी हो माया को पिला दो फिर वह मीरा की तरह तुम्हारे भजन गाने लगेगी. पर माया को पानी पिलाऊं कैसे यह वैसी ही समस्या थी जैसी 11 दिन से महाराष्ट्र में देखने में आ रही है कि सरकार बने कैसे. उन दिनों में स्कूल में लंच बौक्स और पानी की बोतल ले जाने का रिवाज नहीं था. लड़के लड़कियां टोंटी वाले नल से मुंह लगाकर पानी गुड़कते थे. अब मैं वह बोतल अगर टंकी में उड़ेल देता तो पूरी लड़कियों के मेरे वश में हो जाने का अंदेशा था जिससे अफरा तफरी मचती और मेरा स्कूल का दरवाजा पार करना भी मुहाल हो जाता.

ये भी पढ़ें- योग की पोल

कई दिनों तक वह शीशी बस्ते में डाले, मैं माया के आगे पीछे डोलता रहा लेकिन बात नहीं बनी तो एक दिन हिम्मत करते मैंने उसे शीशी देकर कहा तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं….. लेकिन यह पानी पी लो. मैं उस वक्त हैरान रह गया जब उसने बिना किसी विरोध के शीशी का पानी अपने हलक में उड़ेल लिया और फिर मुस्कुराकर बोली इसे ले जाकर उस तांत्रिक बाबा को वापस कर देना, तुम से पहले और छह लड़के मुझे यह पानी पिला चुके हैं पर मुझे कुछ नहीं हुआ मेरी तो रग रग में राम है. प्यार खुद अपने आप में इतना बड़ा टोटका है कि इसके आगे ये फुटपाथिए जतन कहीं नहीं ठहरते.

उस दिन मैं बिना किसी त्याग तपस्या के और बिना भूखे प्यासे रहे स्कूल के नीम के ठूंठ के नीचे ही बुद्धत्व को प्राप्त हो गया और तंत्र मंत्र बगैरह से मेरा भरोसा जो दरअसल में था ही नहीं हमेशा के लिए उठ गया. लेकिन राजनाथ सिंह जी ने राफेल के पहियों के नीचे नींबू रखे तो मेरी टोने टोटकों में अनास्था करोड़ों भारतीयों की तरह डगमगाने लगी जिसे जैसे तैसे मैंने स्वरचित तर्कों और बचे खुचे आत्मविश्वास के दम पर संभाल लिया और पूर्ववत परिवार का पेट पालने के अपने कर्तव्य में लग गया जो नोटबंदी के बाद से और दुष्कर काम हो चला है .

पिछले दिनों दिल्ली के प्रदूषण पर जो बवंडर मचा वह मेरी भी चिंता का विषय नहीं था लेकिन उत्तरप्रदेश के एक मंत्री जी का यह बयान पढ़कर कि यह यज्ञ से दूर हो सकता है मेरे दिमाग में भी अंधविश्वास का कीड़ा फिर कुलबुलाने लगा इसके बाद तो दो और केंद्रीय मंत्रियों ने अचूक नुस्खे सुझाए. स्वास्थ मंत्री बोले गाजर खाओ तो दूसरे ने अपना संसदीय ज्ञान बघारा कि सुबह संगीत सुनो तो स्वस्थ रहोगे यानी दिल्ली की जहरीली हवा ब्रह्मा द्वारा निर्मित फेफड़ों पर बेअसर रहेगी .

इस पर भक्त लोग खामोश रहे उन्होंने इन तीनों में से किसी का मज़ाक नहीं उड़ाया. क्योंकि ये राम दल के सैनिक हैं लेकिन जाने क्यों मुझे लग रहा है कि इन्ही भक्तों ने पिछले साल तक  दिल्ली के मुख्यमंत्री अरिविन्द केजरीवाल के सर्दी जुकाम खांसी और मफलर तक का खूब  मज़ाक उड़ाया था. केजरीवाल कोई दुर्वासा नहीं हैं जो बात बात पर श्राप दें लेकिन अब पूरी दिल्ली खांस और कराह रही है तो लगता है, एक बददुआ जो उन्होंने दी ही नहीं दिल्ली के लोगों को लग गई है. द्रौपदी ने दुर्योधन का मजाक उसे अंधे का बेटा कहते उड़ाया था इसके बाद उसकी जो दुर्दशा और महाभारत हुआ उसे सब जानते हैं.

जमाना और दौर दुआओं बददुआओ का ही है बाकी तो करने किसी के पास कुछ बचा नहीं है . स्टोरी का मोरल यह है कि कभी किसी भले आदमी का मजाक महज इसलिए नहीं उड़ाना चाहिए कि वह पौराणिकवादी नहीं है. लेकिन टोने टोटके जरूर करते रहने चाहिए और इसके लिए अब कानून बनना चाहिए कि प्रदूषित शहरों के लोग कमाएंगे खाएंगे. बाद में पहले यज्ञ हवन करेंगे और सुबह उठते ही गाजर खाते संगीत सुनेंगे और इसमें भी सुंदरकांड को प्राथमिकता देंगे. और वाकई लोग प्रदूषण से छुटकारा बिना इन टोटकों के चाहते हैं तो उन्हें अरविंद केजरीवाल से माफी मांगना चाहिए.

ये भी पढ़ें- मानिनी: क्या रवि थोथी मान्यताओं के आगे झुक गया?

यह बड़ा आध्यात्मिक टोटका है जिसे आजमाकर घंटों में दिल्ली प्रदूषण मुक्त हो सकती है अगर इस व्यंग्य को आप 21 लोगों को फारवर्ड करेंगे तो 2 दिन में ही दिल्ली और आसपास के इलाकों में धूप चमकने लगेगी और फारवर्ड नहीं करेंगे तो फिर से खांसने और झींकने मजबूर हो जाएंगे .

फिल्म ‘लव यू टर्न’ में होगी इन तीन दिग्गज टीवी कलाकारों की एंट्री

सिनेमा में आए बदलाव के साथ ही अब छोटे परदे के कलाकार बौलीवुड के लिए अछूते नहीं रह गए. इन दिनों धड़ल्ले से कई टीवी कलाकार बौलीवुड फिल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के साथ ही दर्शकों का मन भी जीत रहे हैं. अब 22 नवंबर को सिनेमाघरों में पहुंचने वाली फिल्म ‘‘लव यू टर्न’’में एक दो नहीं बल्कि तीन टीवी कलाकार नजर आएंगे. जी हां! हरीश राउट निर्देशित रोमांटिक फिल्म ‘‘लव यू टर्न’’ में रूसलान मुमताज, अद्विक महाजन और रूही चतुर्वेदी इन तीन टीवी कलाकारों के साथ ही 2013 में ‘मिस इंडिया’ का खिताब जीतने वाली  पूर्वा राणा मुख्य भूमिका में नजर आएंगी.

यूं तो रूसलान मुमताज ने 2007 में फिल्म ‘‘एम पी 3 मेरा पहला पहला पर’’ से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा था. उसके बाद वह  इक्क दुक्का फिल्में करते रहे. फिल्म ‘जबरिया जोड़ी’ में भी वह छोटे से किरदार में नजर आए थे. मगर उन्हें बतौर अभिनेता पहचान मिली ‘कहता है दिल जी ले जरा’, ‘बालिका वधू’, ‘एक विवाह ऐसा भी’, ‘लाल इश्क’,‘मैं मायके चली जाउंगी’ जैसे सीरियलों में अभिनय करके. पर अब वह फिल्म ‘‘लव यू टर्न’’ में बतौर हीरो नजर आएंगे.

ये भी पढ़ें- ‘‘इंसान को अपने पैर जमीन पर ही रखने चाहिए’’: बोमन ईरानी

इसी तरह अद्धिक महाजन ने भी बतौर हीरो 2008 में फिल्म ‘‘कांटेक्ट’’ से कैरियर शुरू किया था. बाद में उन्होंने तमिल व पंजाबी सिनेमा में भी काम किया. पर अद्धिक महाजन को भी पहचान मिली टीवी पर. ‘बानी: इश्क द बलमा’, ‘ अकबर बीरबल, ‘दिया बाती और हम’, ‘नागिन 3, ‘जमाई राजा’ और ‘दिव्य दृष्टि’ जैसे सीरियलों में अभिनय कर अद्विक महाजन ने अपनी एक खास पहचान बनायी. अब वह फिल्म ‘‘लव यू टर्न’’ में हीरो बनकर आ रहे हैं. ज्ञातब्य है कि इस फिल्म में दो हीरो और दो हीरोइन हैं.

रूही चतुर्वेदी ने भी सबसे पहले 2012 में फिल्म ‘‘आलाप’’ में अभिनय किया था. उसके बाद वह भी टीवी की तरफ मुड़ गयीं. लोग उन्हें टीवी सीरियल ‘कुडली भाग्य’ की खलनायिका शेरलिन खुराना के किरदार में साजिश करते हुए काफी पसंद कर रहे हैं.

ज्ञातब्य है कि रोमांटिक प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘‘लव यू टर्न’’ में दो हीरो और दो हीरोइन हैं.जहां चारों के दिल के तार, एक दूसरे से जुड़े हैं. अब किसके दिल का कनेक्शन कब अपने प्यार से छोड़ कही और जुड़ जाता हैं और प्यार ले लेता हैं. यू टर्न यही देखना काफी दिलचस्प होगा.

ये भी पढ़ें- फिल्म ‘बायपास रोड’ मेरी तकदीर में लिखी थी : अदा शर्मा

हाल ही में एक भव्य समारोह में मीडिया और फिल्म जगत की कुछ हस्तियों के बीच फिल्म का ट्रेलर लांच किया गया, जहां पर फिल्म की सारी यूनिट के साथ रुसलान मुमताज और पूर्वा राणा भी मौजूद रहे. मगर अद्विक महाजन और रूही चतुर्वेदी अपनी शूटिंग के चलते नहीं आ पाए. पर हर किसी ने फिल्म के ट्रेलर और इसके छह गानों की प्रशंसा की.

पूरी फिल्म थाईलैंड में फिल्मायी गयी है. दर्शक पहली बार अनछुए/अनदेखे थाईलैंड के बीच पर इस फिल्म के लिए खास तौर पर फिल्माए गए गानों का नयन सुख ले सकेंगे.

ये भी पढ़ें- इसमें ड्रामा और रोमांस को हिंदुस्तानी कल्चर को ध्यान में रखकर पिरोया है: नील नितिन मुकेश

‘द वन वर्ल्ड इंटरनेशनल फिल्म’ के बैनर तले बनायी गयी फिल्म के निर्देशक हरीश राउत, निर्माता संदीप वर्मा और आनंद ठाकोर हैं. फिल्म में 6 गाने हैं जिन्हें मोहित चैहान, जुबिन नौटियाल‘ पलक मुछाल और अदिति पौल ने गाया है.

‘वेदिका’ के लिए ‘पल्लवी’ ने ‘कार्तिक नायरा’ को सुनाई खरी खोटी

टीवी शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में धमाकेदार ट्विस्ट एंड टर्न देखने को मिल रहे है. जिससे दर्शकों का खुब एंटरटेन हो रहा है. इस शो की कहानी वेदिका, नायरा, कार्तिक और कैरव के इर्द गिर्द घुम रही है. शो की कहानी में काफी इंटरेस्टिंग मोड़ आ चुका है. तो आइए बताते हैं कहानी के इंटरेस्टिंग ट्विस्ट एंड टर्न के बारे में.

इस सीरियल में  अचानक से वेदिका गोयंका हाउस से गायब हो चुकी है. घर के किसी भी सदस्य को नहीं पता है, वेदिका कहां गई. तो इधर वेदिका की दोस्त पल्लवी, कार्तिक नायरा को साथ में देखकर बिलकुल भी खुश नहीं है. पल्लवी चाहती है कि वेदिका कार्तिक साथ में रहे और नायरा, कैरव  को लेकर कहीं दूर चली जाए.

ये भी पढ़ें- ‘‘इंसान को अपने पैर जमीन पर ही रखने चाहिए’’: बोमन ईरानी

https://www.instagram.com/p/B4d79hLhBCo/?utm_source=ig_web_copy_link

कार्तिक नायरा बात कर रहे होते हैं. तभी पल्लवी वहां आती है और उन्हें खरी खोटी सुनाने लगती है. पल्लवी की इन बातों से कार्तिक गुस्से में आ जाता है और उसे कहता है कि जब कोई बात ठीक से पता न हो तो उस बारे में सोच समझ कर बात करनी चाहिए. पल्लवी नायरा को शर्मिंदा करने के लिए काफी बुरा बोलती है. लेकिन कार्तिक पल्लवी को चुप कराता है. इसी बीच कैरव और वंश वहां पहुंचते हैं. उन्हें चिल्लता देखकर कैरव और वंश शांत हो जाते हैं.

https://www.instagram.com/p/B4eDybphWvH/?utm_source=ig_web_copy_link

लेकिन पल्लवी अपनी आदतों से बाज नहीं आती और वो कैरव से कहती है, तुम्हारे मम्मी पापा तुमसे झूठ बोल रहे हैं. पल्लवी के इस बात से कार्तिक नायरा घबरा जाते हैं कि पल्लवी कैरव से क्या कहने जा रही है. दरअसल कैरव को ये नहीं पता कि कार्तिक नायरा साथ नहीं है और कार्तिक की शादी वेदिका से हुई है. तभी कैरव पल्लवी से पूछता है कि क्या? पल्लवी कहती है, तुम्हारे मम्मी पापा बहुत बहादुर हैं. उन्होंने ये बात तुमसे छिपाई है.

ये भी पढ़ें- फिल्म ‘बायपास रोड’ मेरी तकदीर में लिखी थी : अदा शर्मा

उसके बाद पल्लवी कार्तिक के पास आती है और कहती है कि तुमने वेदिका के साथ अच्छा नहीं किया है. कार्तिक भी पल्लवी की सारी बातों का जवाब देता है. कार्तिक पल्लवी से बेहद नाराज होता है. शो के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि कार्तिक और पल्लवी के बीच वेदिका को लेकर गहमागहमी बढ़ती जाएगी. वैसे जल्द ही इस शो में वेदिका की एंट्री होने वाली है.

आखिरकार व्हाट्सऐप हैक क्यों किया गया, जानिए इसका मकसद क्या था ?

जिस विषय पर मैं ये लेख लिख रहा हूं, ये समझ लीजिये कि ये मसला आम आदमी के लिए उतना ही जरुरी है जितना की एक पौधे के लिए पानी. यानी अगर पौधे को पानी नहीं दिया गया तो धीमें-धीमें कर के सूख जाएगा. हिंदुस्तान की आवाम की हालत भी कुछ ऐसी ही हो रही है. जिसको हम अभी भांप नहीं पा रहे हैं. याद कीजिए 24 अगस्त 2017 का दिन. जब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सरकार से कहा था कि निजता का अधिकार भले ही संविधान में लिखे मौलिक अधिकारों में न हो लेकिन हर मौलिक अधिकार से इसकी खुश्बू आती है. लेकिन क्या ये संभव हो पाया. नहीं हो पाया. हम गाहे-बगाहे अपनी सारी गोपनीय सूचना सार्वजनिक करते जा रहे है. अगर हम नहीं भी कर रहे तो ये कई कंपनी इस काम पर जुटी हुई हैं. हम अमेरिका चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के लिए डाटा चोरी करने वारे कांड का जिक्र नहीं करेंगे लेकिन ताजा मामला तो और भी हैरान कर देने वाला है.

हाल ही में एक मीडिया जर्नलिस्ट के डाटा से छेड़छाड़ की गई. उसके स्मार्टफोन पर Pegasus Spyware अटैक हुआ. नतीजन एक खुफिया साइबर कंपनी को उसके फोन का रिमोट एक्सेस मिल गया और इसके बाद शुरू हुई उसकी जासूसी. जब तक जर्नलिस्ट को इस बात की जानकारी मिली उसकी निजी जानकारी साइबर कंपनी के हाथ लग चुकी थी.साइबर कंपनी के हत्थे चढ़ने वाला ये शख्स अकेला नहीं था. व्हाट्सअप के दावे के मुताबिक इस साइबर कंपनी ने कुल 1400 लोगों को टारगेट किया. फेसबुक के स्वामित्व वाले WhatsApp ने गुरुवार को पुष्टि की कि इजरायल की साइबर खुफिया कंपनी NSO ग्रुप की ओर से Pegasus नाम के spyware का इस्‍तेमाल कर भारतीय मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकारों को टारगेट कर उनकी जासूसी की गई. WhatsApp ने इस सप्ताह इजरायल की साइबर खुफिया कंपनी NSO ग्रुप पर मुकदमा दायर किया है. सोशल मीडिया प्लेटफौर्म ने आरोप लगाया है कि इसने वैश्विक स्तर पर 1,400 सलेक्टेड यूजर्स की जासूसी की है.

ये भी पढ़ें- तो क्या मुंबई डूब जाएगी

जैसे ही ये खबर सुर्खियों में आई वैसे हड़कंप मच गया. उन 1400 लोगों की सूची में सब कोई अपने आपको पाने लगा. धड़ाधड़ लोगों ने प्राइवेट डाटा डिलीट किया. कई लोगों ने तुरंत ऐप ही अन इंन्सटौल कर दिया. भारत में इस मामले को लेकर व्हाट्सएप से जवाब मांगा गया है लेकिन उससे पहले ही राजनीति शुरू हो गई. बीजेपी-कांग्रेस के नेताओं ने एक दूसरे पर फोन टैपिंग और जासूसी करने का आरोप मढ़ दिया. लेकिन ये मामला कितना गंभीर है ये सियासतदानों की समझ से परे है.

इजराइली कंपनी NSO के स्पष्टीकरण को सच माना जाए तो सरकार या सरकारी एजेंसियां ही पेगासस सौफ़्टवेयर के माध्यम से जासूसी कर सकती हैं. ख़ुद अपना पक्ष रखने के बजाय, सरकार ने व्हाट्सऐप को 4 दिनों के भीतर जवाब देने को कहा है.कैंब्रिज एनालिटिका मामले में भी फ़ेसबुक से ऐसा ही जवाब मांगा गया था. कैंब्रिज मामले में यूरोपीय क़ानून के तहत कंपनी पर पेनल्टी भी लगी, पर भारत में सीबीआई अभी आंकड़ों का विश्लेषण ही कर रही है.

इस तरह के आरोपों के बाद व्हाट्सएप बैकफुट पर था. आनन-फानन ऐप ने अमरीका के कैलिफोर्निया में इजरायली कंपनी एनएसओ और उसकी सहयोगी कंपनी Q साइबर टेक्नोलौजीज लिमिटेड के ख़िलाफ मुकदमा दायर किया है. दिलचस्प बात यह है कि व्हाट्सऐप के साथ फेसबुक भी इस मुकदमे में पक्षकार है. फ़ेसबुक के पास व्हाट्सऐप का स्वामित्व है लेकिन इस मुक़दमे में फेसबुक को व्हाट्सऐप का सर्विस प्रोवाइडर बताया गया है जो व्हाट्सऐप को इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा कवच प्रदान करता है.

पिछले साल ही फ़ेसबुक ने यह स्वीकारा था कि उनके ग्रुप द्वारा व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम के डाटा का व्यवसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है. फेसबुक ने यह भी स्वीकार किया था कि उसके प्लेटफार्म में अनेक ऐप के माध्यम से डाटा माइनिंग और डाटा का कारोबार होता है. कैंब्रिज एनालिटिका ऐसी ही एक कंपनी थी जिसके माध्यम से भारत समेत अनेक देशों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की गई. व्हाट्सऐप अपने सिस्टम में की गई कौल, वीडियो कौल, चैट, ग्रुप चैट, इमेज, वीडियो, वाइस मैसेज और फ़ाइल ट्रांसफ़र को इंक्रिप्टेड बताते हुए, अपने प्लेटफ़ॉर्म को हमेशा से सुरक्षित बताता रहा है.

ये भी पढ़ें- गैस चैम्बर बन रही दिल्ली

कैलिफ़ोर्निया की अदालत में दायर मुक़दमे के अनुसार इज़रायली कंपनी ने मोबाइल फ़ोन के माध्यम से व्हाट्सऐप के सिस्टम को भी हैक कर लिया. इस सॉफ़्टवेयर के इस्तेमाल में एक मिस्ड कॉल के ज़रिए स्मार्ट फ़ोन के भीतर वायरस प्रवेश करके सारी जानकारी जमा कर लेता है. फ़ोन के कैमरे से पता चलने लगता है कि व्यक्ति कहां जा रहा है, किससे मिल रहा है और क्या बात कर रहा है?

अब यहां पर दो बातें हैं. ऐसा क्यों किया गया और इसके पीछे मकसद क्या है. इजरायली सौफ्टवेयर के माध्यम से अनेक भारतीयों की जासूसी में करोड़ों का खर्च सरकार की किस एजेंसी ने किया होगा? यदि यह जासूसी केंद्र सरकार की एजेंसियों द्वारा अनाधिकृत तौर पर की गयी है तो इससे भारतीय कानून और सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का उल्लंघन हुआ है. यदि जासूसी को विदेशी सरकारों या निजी संस्थाओं द्वारा अंजाम दिया गया है, तो यह पूरे देश के लिए खतरे की घंटी है.

एक नई पहल : भाग 1

 लेखक- नीलमणि शर्मा

‘‘भाभी…जल्दी आओ,प्लीज,’’ मेघा की आवाज सुन कर मैं दौड़ी चली आई.

‘‘क्या बात है, मेघा?’’ मैं ने प्रश्न- सूचक दृष्टि उस की तरफ डाली तो मेघा ने अपनी दोनों हथेलियों के बीच मेरा सिर पकड़ कर सड़क की ओर घुमा दिया, ‘‘मेरी तरफ नहीं भाभी, पार्क की तरफ देखो…वहां सामने बैंच पर लैला बैठी हैं.’’

‘‘अच्छा, तो उन आंटी का नाम लैला है…तुम जानती हो उन्हें?’’

‘‘क्या भाभी आप…’’ मेघा चिढ़ते हुए पैर पटकने लगी, ‘‘मैं नहीं जानती उन्हें, पर वह रोज यहां इसी समय इसी बैंच पर आ कर बैठती हैं और अपने मजनू का इंतजार करती हैं. भाभी, मजनूं बस, आता ही होगा…वह देखो…वह आ गया…अब देखो न इन दोनों के चेहरों की रंगत…पैर कब्र में लटके हैं और आशिकी परवान चढ़ रही है…’’

मैं ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘‘इस उम्र के लोगों का ऐसा मजाक उड़ाना अच्छी बात नहीं, मेघा.’’

‘‘भाभी, इस उम्र के लोगों को भी तो ऐसा काम नहीं करना चाहिए…पता नहीं कहां से आते हैं और यहां छिपछिप कर मिलते हैं. शर्म आनी चाहिए इन लोगों को.’’

‘‘क्यों मेघा, शर्म क्यों आनी चाहिए? क्या हमतुम दूसरों से बातें नहीं करते हैं?’’

‘‘हमारे बीच वह चक्कर थोड़े ही होता है.’’

‘‘तुम्हें क्या पता कि इन के बीच क्या चक्कर है? क्या ये पार्क में बैठ कर अश्लील हरकतें करते हैं या आपस में लड़ाईझगड़ा करते हैं, मेरे हिसाब से तो यही 2 बातें हैं कि कोई तीसरा व्यक्तिउन का मजाक बनाए. फिर जब तुम उन्हें जानती ही नहीं हो तो उन के रिश्ते को कोई नाम क्यों देती हो.’’

‘‘रिश्ते को नाम कहां दिया है भाभी, मैं ने तो उन को नाम दिया है,’’ मेघा तुनक कर बोली, ‘‘मैं ने तो आप को यहां बुला कर ही गलती कर दी,’’ यह कहते हुए मेघा वहां से चल दी.

उस के जाने के बाद भी मैं कितनी देर यों ही बालकनी में बैठी उन दोनों बुजुर्गों को देखती रही और सोचती रही कि मांबाप अब समझदार हो गए हैं. लड़केलड़की की दोस्ती पर एतराज नहीं करते. समाज भी उन की दोस्ती को खुले दिल से स्वीकार रहा है, लेकिन 2 प्रौढ़ों की दोस्ती के लिए समाज आज भी वही है…उस की सोच आज भी वही है.

पार्क में बैठे अंकलआंटी को देख कर वर्षों पुरानी एक घटना मेरे मन में फिर से ताजा हो गई.

पुरानी दिल्ली की गलियों में मेरा बचपन बीता है. उस समय लड़के शाम को आमतौर पर गुल्लीडंडा या कबड्डी खेल लिया करते थे और लड़कियां छत पर स्टापू, रस्सी कूदना या कुछ बड़ी होने पर यों ही गप्पें मार लिया करती थीं. इस के साथसाथ गली में कौन आजा रहा है, किस का किस के साथ चक्कर है, किस ने किस को कब इशारा किया आदि की भी चर्चा होती रहती थी.

मैं भी अपनी सहेलियों के साथ शाम के वक्त छत पर खड़ी हो कर यह सब करती थी. एक दिन बात करतेकरते अचानक मेरी सहेली रेणु ने कहा, ‘देखदेख, वह चल दिए आरती के दादाजी…देख कैसे चबूतरे को पकड़- पकड़ कर जा रहे हैं.’

मैं ने पूछा, ‘कहां जा रहे हैं.’

‘अरे वहीं, देख सामने गुड्डन की दादी निकल आई हैं न अपने चबूतरे पर.’

और मैं ने देखा, दोनों बैठे मजे से बातें करने लगे. रेणु ने फिर कहा, ‘शर्म नहीं आती इन बुड्ढेबुढि़या को…पता है तुझे, सुबह और शाम ये दोनों ऐसे ही एकदूसरे के पास बैठे रहते हैं.’

‘तुझे कैसे पता? सुबह तू स्कूल नहीं जाती क्या…यही देखती रहती है?’

‘अरे नहीं, मम्मी बता रही थीं, और मम्मी ही क्या सारी गली के लोगों को पता है, बस नहीं पता है तो इन के घर वालों को.’

उस के बाद मैं ने भी यह बात नोट करनी शुरू कर दी थी.

कुनकुनी ठंड आ चुकी थी. रविवार का दिन था. मैं सिर धो कर छत पर धूप में बैठी थी. आदतन मेरी नजर उसी जगह पड़ गई. आरती के दादाजी अखबार पढ़ कर शायद गुड्डन की दादी को सुना रहे थे और दादी मूंगफली छीलछील कर उन्हें पकड़ा रही थीं. यह दृश्य मुझे इतना भाया कि मैं उसे हमेशा के लिए अपनी आंखों में भर लेना चाहती थी.

मुंडेर पर झुक कर अपनी ठुड्डी को हथेली का सहारा दिए मैं कितनी ही देर उन्हें देखती रही कि अचानक आरती दौड़ती हुई आई और अपने दादाजी से जाने क्या कहा और वह एकदम वहां से उठ कर चले गए. गुड्डन की दादी की निरीह आंखें और मौन जबान से निकले प्रश्नों का उत्तर देने के लिए भी उन्होंने वक्त जाया नहीं किया. ‘पता नहीं क्या हुआ होगा,’ सोचते- सोचते मैं भी छत पर बिछी दरी पर आ कर बैठ गई.

अभी पढ़ने के लिए अपनी किताब उठाई ही होगी कि गली में से बहुत जोरजोर से चिल्लाने की आवाज आने लगी. कुछ देर अनसुना करने के बाद भी जब आवाजें आनी बंद नहीं हुईं तो मैं खड़ी हो कर गली में देखने लगी.

देखा, गली में बहुत लोग खड़े हैं. औरतें और लड़कियां अपनेअपने छज्जों पर खड़ी हैं. शोर आरती के घर से आ रहा था. उस के पिताजी अपने पिताजी को बहुत जोरजोर से डांट रहे थे…‘शर्म नहीं आती इस उमर में औरतबाजी करते हुए…तुम्हें अपनी इज्जत का तो खयाल है नहीं, कम से कम मेरा तो सोचा होता…इस से तो अच्छा था कि जब मां मर गई थीं तभी दूसरी बिठा लेते…सारी गली हम पर थूथू कर रही है…अरे, रामचंदर ने तो अपनी मां को खुला छोड़ रखा है…पर तुम में अपनी अक्ल नहीं है क्या…खबरदार, जो आज के बाद गली में पैर रखा तो…’

जितनी चीखचीख कर ये बातें कही गई थीं उन से क्या उन के घर की बेइज्जती नहीं हुई पर यह कहने वाला और समझाने वाला आरती के पिताजी को कोई नहीं था. हां, ये आवाजें जैसे सब ने सुनीं वैसे ही सामने गुड्डन की दादी और उन के बाकी घर वालों ने भी सुनी होंगी.

कुछ देर बाद भीड़ छंट चुकी थी. उस दिन के बाद फिर कभी किसी ने दादी को चबूतरे पर बैठे नहीं देखा. बात सब के लिए आईगई हो चुकी थी.

अचानक एक रात को बहुत जोर से किसी के चीखने की आवाज आई. मेरी परीक्षा नजदीक थी इस कारण मैं देर तक जाग कर पढ़ाई कर रही थी. चीख सुन कर मैं डर गई. समय देखा, रात के डेढ़ बजे थे. कुछ देर बाद किसी के रोने की आवाज आई. खिड़की खोल कर बाहर झांका कि यह आवाज किस तरफ से आई है तो देखा आरती के घर के बाहर आज फिर लोग इकट्ठा होने शुरू हो गए हैं.

मेरे पिताजी भी घर से बाहर निकल चुके थे…कुछ लोग हमारे घर के बाहर चबूतरे पर बैठे धीरेधीरे बोल रहे थे, ‘बहुत बुरा हुआ यार, महेश को समझाना पड़ेगा, मुंह अंधेरे ही अपने पिताजी की अर्थी ले चले, नहीं तो उस के पिताजी ने जो पंखे से लटक कर आत्महत्या की है, यह बात सारे महल्ले में फैल जाएगी और पुलिस केस बन जाएगा. महेश बेचारा बिन मौत मारा जाएगा.’

मैं सुन कर सन्न रह गई. दादाजी ने आत्महत्या कर ली…सब लोग उस दिन की बात भूल गए पर दादाजी नहीं भूल पाए. कैसे भूल पाते, उस दिन उन का आत्मसम्मान उन के बेटे ने मार दिया था. आज उन की आत्महत्या पर कैसे फूटफूट कर रो रहा है.

योग की पोल

लेखक: हिमांशु जोशी

पिछले 3 दिनों से रतन कुमारजी का सुबह की सैर पर हमारे साथ न आना मुझे खल रहा था. हंसमुख रतनजी सैर के उस एक घंटे में हंसाहंसा कर हमारे अंदर एक नई ऊर्जा का संचार कर देते थे.

क्या बताएं, जनाब, हम दोनों ही मधुमेह से पीडि़त हैं. दोनों एक ही डाक्टर के पास जाते हैं. सही समय से सचेत हो, नियमपूर्वक दवा, संतुलित भोजन और प्रतिदिन सैर पर जाने का ही नतीजा है कि सबकुछ सामान्य चल रहा है यानी हमारा शरीर भी और हम भी.

बहरहाल, जब चौथे दिन भी रतन भाई पार्क में तशरीफ नहीं लाए तो हम उन के घर जा पहुंचे. पूछने पर भाभीजी बोलीं कि छत पर चले जाइए. हमें आशंका हुई कि कहीं रतन भाई ने छत को ही पार्क में परिवर्तित तो नहीं कर दिया. वहां पहुंच कर देखा तो रतनजी  योगाभ्यास कर रहे थे.

बहुत जोरजोर से सांसें ली और छोड़ी जा रही थीं. एक बार तो ऐसा लगा कि रतनजी के प्राण अभी उन की नासिका से निकल कर हमारे बगल में आ दुबक जाएंगे. खैर, साहब, 10 मिनट बाद उन का कार्यक्रम समाप्त हुआ.

रतनजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘आइए, आइए, देखा आप ने स्वस्थ होने का नायाब नुस्खा.’’

मैं ने कहा, ‘‘यार, यह नएनए टोटके कहां से सीख आए.’’

वह मुझे देख कर अपने गुरु की तरह मुखमुद्रा बना कर बोले, ‘‘तुम तो निरे बेवकूफ ही रहे. अरे, हम 2 वर्षों से उस डाक्टर के कहने पर चल, अपनी शुगर केवल सामान्य रख पा रहे हैं. असली ज्ञान तो अपने ग्रंथों में है. योेग में है. देखना एक ही माह में मैं मधुमेह मुक्त हो जाऊंगा.’’

मैं ने कहा, ‘‘योगवोग अपनी जगह कुछ हद तक जरूर ठीक होगा पर तुम्हें अपनी संतुलित दिनचर्या तो नहीं छोड़नी चाहिए थी. अरे, सीधीसादी सैर से बढ़ कर भी कोई व्यायाम है भला.’’

उन्होंने मुझे घूर कर देखा और बोले, ‘‘नीचे चलो, सब समझाता हूं.’’

ये भी पढ़ें- हमसफर: आखिर उस रात लाजवंती के साथ क्या हुआ था ?

नीचे पहुंचे तो एक झोला लिए वह प्रकट हुए. बड़े प्यार से मुझे समझाते हुए बोले, ‘‘मेरी मौसी के गांव में योगीजी पधारे थे. बहुत बड़ा योग शिविर लगा था. मौसी का बुलावा आया सो मैं भी पहुंच गया. वहां सभी बीमारियों को दूर करने वाले योग सिखाए गए. मैं भी सीख आया. देखो, वहीं से तरहतरह की शुद्ध प्राकृतिक दवा भी खरीद कर लाया हूं.’’

मैं सकपकाया सा कभी रतनजी को और कभी उन डब्बाबंद जड़ीबूटियों के ढेर को देख रहा था. मैं ने कहा, ‘‘अरे भाई, कहां इन चक्करों में पडे़ हो. ये सब केवल कमाई के धंधे हैं.’’

रतनजी तुनक कर बोले, ‘‘ऐसा ही होता है. अच्छी बातों का सब तिरस्कार करते हैं.’’

इस के बाद मैं ने उन्हें ज्यादा समझाना ठीक नहीं समझा और जैसी आप की इच्छा कह कर लौट आया.

एक सप्ताह बाद एक दिन हड़बड़ाई सी श्रीमती रतन का फोन आया, ‘‘भाईसाहब, जल्दी आ जाइए. इन्हें बेहोशी छा रही है.’’

मैं तुरंत डाक्टर ले कर वहां पहुंचा. ग्लूकोज चढ़ाया गया. 2 घंटे बाद हालात सामान्य हुए. डाक्टर साहब बोले, ‘‘आप को पता नहीं था कि मधुमेह में शुगर का सामान्य से कम हो जाना प्राणघातक होता है.’’

डाक्टर के जाते ही रतनजी मुंह बना कर बोले, ‘‘देखा, मैं ने योग से शुगर कम कर ली तो वह डाक्टर कैसे तिलमिला गया. दुकान बंद होने का डर है न. हा…हा हा….’’

मैं ने अपना सिर पकड़ लिया. सोचा यह सच ही है कि हम सभी भारतीय दकियानूसी पट्टियां साथ लिए घूमते हैं. बस, इन्हें आंखों पर चढ़ाने वाला चाहिए. उस के बाद जो चाहे जैसे नचा ले.

एक माह तक रतनजी की योग साधना जारी रही. हर महीने के अंत में हम दोनों ब्लड टेस्ट कराते थे. इस बार रतनजी बोले, ‘‘अरे, मैं पूरी तरह से स्वस्थ हूं. कोई परीक्षण नहीं कराऊंगा.’’

अब तो परीक्षा का समय था. मैं बोला, ‘‘दादा, अगर तुम्हारी रिपोर्ट सामान्य आई तो कल से मैं भी योग को पूरी तरह से अपना लूंगा.’’

बात बन गई. शुगर की जांच हुई. नतीजा? नतीजा क्या होना था, रतनजी का ब्लड शुगर सामान्य से दोगुना अधिक चल रहा था.

रतनजी ने तुरंत आश्रम संपर्क साधा. कोई संतोषजनक उत्तर न पा कर  वह कार ले कर चल पड़े और 2 घंटे का सफर तय कर आश्रम ही जा पहुंचे.

मैं उस दिन आफिस में बैठा एक कर्मचारी से किसी दूसरे योग शिविर की महिमा सुन रहा था. रतनजी का फोन आया, ‘‘यार, योगीजी अस्वस्थ हैं. स्वास्थ्य लाभ के लिए अमेरिका गए हैं. 3 माह बाद लौटेंगे.’’

मैं ठहाके मार कर हंसा. बस, इतना ही बोला, ‘‘लौट आओ यार, आराम से सोओ, कल सैर पर चलेंगे.’’

कुदरत को चुनौती: भाग 1

जसबीर कौर और दलजीत कौर आपस में पक्की सहेलियां ही नहीं थीं, बल्कि उन दोनों के बीच दिलों का गहरा संबंध भी था. जसबीर गांव ढडीके, अजीतवाला, मोगा में रहती थी, जबकि दलजीत कौर पड़ोस के गांव की रहने वाली थी.

दोनों ने स्कूल से कालेज तक की पढ़ाई साथसाथ की थी. दोनों के बीच दोस्ती तो शुरू से ही थी, पर युवा होते ही उन के बीच अजीब से पे्रम का रिश्ता बन गया था. दोनों की दोस्ती एक ऐसे रिश्ते में तब्दील हो गई, जैसी एक युवा और युवती के प्रेम संबंधों के बीच होती है.

धीरेधीरे दोनों ऐसे प्रेम की डोर में बंध गए, जिसे हमारा समाज स्वीकार नहीं करता. ऐसे रिश्ते का विरोध होना लाजिमी था. हुआ भी, लेकिन वे दोनों तो एकदूसरे की दीवानी थीं. यह बात ऐसी नहीं थी जो छिप पाती. उन के संबंधों की जानकारी दोनों के परिजनों तक पहुंची तो जैसे भूचाल सा आ गया.

दोनों के घर वालों ने उन्हें समझाया, गांव के बड़ेबूढ़ों से ले कर पंचायत तक ने भी सामाजिक मानमर्यादा का उन्हें पाठ पढ़ाया, पर उन्होंने किसी की बात नहीं मानी. जसबीर और दलजीत एक साथ रहने और साथसाथ जीनेमरने की कसमें खा चुकी थीं. फिर वे किसी की क्या परवाह क्यों करतीं.

इस बीच दोनों की नौकरियां भी लग गईं. जसबीर कौर को मोगा स्थित आईटीआई में बतौर क्लर्क की नौकरी मिल गई थी जबकि दलजीत कौर गांव चूहड़चक के आईटीआई कालेज में बतौर टीचर नियुक्त हो गई थी. दोनों जब अपने पैरों पर खड़ी हो गईं तो उन्होंने अपना घर बसाने के लिए आगे की योजना बनाई.

तय हुआ कि जसबीर कौर अपना लिंग परिवर्तन करा कर जसबीर सिंह बन जाए और दलजीत कौर उस की पत्नी बन कर रहे. दोनों शादी कर के पतिपत्नी की तरह रहेंगी और अपना अलग घर बसा लेंगी. दोनों लड़कियों ने जो सोचा था, वह काम बहुत कठिन था पर प्रेम में पागल इन दोनों दीवानियों को भला कौन समझाता. यह बात सन 1998 की है.

ये भी पढ़ें- जीजा पर भारी ब्लैकमेलर साली: भाग 2

आईटीआई में जसबीर की नौकरी महिला वर्ग में लगी थी. अपना लिंग परिवर्तन कराने से पहले उसे विभाग और सरकार से अनुमति लेनी जरूरी थी. लिहाजा उस ने स्वास्थ्य मंत्रालय से मंजूरी मांगी. उस की फाइल लुधियाना के सिविल सर्जन को सौंपी गई. वहां से अप्रूवल लेने के बाद औपरेशन के लिए सन 1998 में जसबीर ने अपने कार्यालय से छुट्टियां लीं.

लुधियाना के एक अस्पताल में औपरेशन द्वारा उस का लिंग परिवर्तन किया गया. लिंग परिवर्तन के बाद वह औरत से पुरुष बन गया था. इस बीच दलजीत कौर ने अपना फर्ज निभाते हुए उस की खूब सेवा की थी. जसबीर कौर से जसबीर सिंह बनने में उसे थोड़ा वक्त लग गया था. फिर साल 2004 में दोनों ने शादी कर अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की.

जसबीर और दलजीत ने शादी के बाद जगराओं में मकान बनवा कर रहना शुरू कर दिया. शादी के बाद कुछ सालों तक पतिपत्नी के रिश्तों में बहुत मिठास थी. लेकिन शादी के 7 साल बीत जाने के बाद भी जब उन की कोई संतान नहीं हुई तो दोनों का मन निराशा से भर गया. कई डाक्टरों से इलाज भी करवाया पर दलजीत कौर की गोद सूनी ही रही.

अंत में सन 2011 में लुधियाना के एक अस्पताल में टेस्टट्यूब तकनीक से दलजीत कौर एक बेटे की मां बनी, जिस का नाम अमानत सिंह रखा गया. बच्चा होने के बाद दोनों के जीवन में जैसे खुशियों की बहार आ गई थी. उन की गृहस्थी की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगी थी. सब कुछ ठीक चल रहा था. अमानत भी अब 8 साल का हो गया था और स्कूल जाने लगा था.

4 अगस्त, 2019 की बात है. 8 वर्षीय अमानत ने सुबहसुबह अपने पड़ोसी सुरजीत के घर जा कर बताया कि उस के मातापिता की किसी ने हत्या कर दी है. सुरजीत ने अपनी पत्नी और कुछ पड़ोसियों के साथ जसबीर सिंह के घर जा कर देखा तो वह चौंक गया.

कमरे में बैड पर जसबीर सिंह और उस की बगल में उस की पत्नी दलजीत कौर लहूलुहान पड़े थे. सुरजीत ने पास जा कर देखा तो पाया कि दलजीत की सांसें चल रही थीं, जबकि जसबीर सिंह की मौत हो चुकी थी.

उन्होंने तुरंत इस घटना की सूचना थाना सिटी जगराओं को दी और दलजीत को जिला अस्पताल में भरती करा दिया.

घटना की सूचना मिलने पर थाना सिटी के प्रभारी निधान सिंह, लेडी एसआई किरनजीत कौर, डीएसपी गुरदीप सिंह, डीएसपी (देहात) रछपाल सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए.

पतिपत्नी दोनों खून से लथपथ थे. थानाप्रभारी ने यह जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दी तो थोड़ी देर में सीआईए प्रभारी जगदीश सिंह, थाना सदर के प्रभारी किक्कर सिंह, नारकोटिक्स सैल के प्रभारी इकबाल हुसैन और पुलिस चौकी बस स्टैंड इंचार्ज सईद शकील मौके पर पहुंच गए.

मौके पर फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुला लिया गया. अधिकारियों ने मुआयना किया तो पता चला कि जसबीर सिंह पर तेजधार चाकू से 20-25 वार किए गए थे. घर की अलमारी और लौकर भी खुले हुए थे. अलमारी का सामान इधरउधर बिखरा पड़ा था. बाद में पुलिस को पता चला था कि  हत्यारे घर से लगभग 2 लाख रुपए और जेवर लूट ले गए थे.

पुलिस ने घर के आसपास लगे दोनों सीसीटीवी कैमरे खंगाले, लेकिन कोई भी सुराग नहीं मिला. इतना ही नहीं, न तो घर का कोई दरवाजा टूटा मिला और न ही खिड़की. जांच में पुलिस को यह भी पता चला कि घर का दरवाजा भी अंदर से बंद था, जिसे सुबह उन के बेटे अमानत ने कुरसी पर खड़े हो कर मुश्किल से खोला था और पड़ोसियों को घटना की जानकारी दी थी.

पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बयान दर्ज करने के बाद मृतक के भांजे कमलजीत सिंह के बयान पर 4 अगस्त, 2019 को अज्ञात लोगों के खिलाफ थाना सिटी जगराओं में हत्या का मुकदमा दर्ज कर जसबीर सिंह की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी गई.

ये भी पढ़ें- शेखपुरा की डीएम इनायत खान 

केस का खुलासा करने के लिए डीएसपी गुरदीप सिंह ने थानाप्रभारी निधान सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की. टीम में एसआई किरनजीत कौर, एएसआई गुरमीत सिंह, कांस्टेबल जगजीत सिंह, गुरप्रीत सिंह, दर्शन सिंह आदि को शामिल किया गया.  टीम ने जांच शुरू कर दी.

पुलिस को अब अस्पताल में भरती दलजीत कौर के होश में आने का इंतजार था. इस मामले की वही एक ऐसी चश्मदीद गवाह थी, जिस ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा था.

होश में आने के बाद दलजीत कौर ने अपने बयान में बताया कि 3 अगस्त की रात वह अपने पति जसबीर सिंह और 8 साल के बेटे अमानत के साथ घर में सो रही थी. उस रात वह खाना खा कर करीब साढ़े 9 बजे सो गए थे. आधी रात को 4 लोग घर में दाखिल हुए जिन के मुंह पर कपड़े बंधे थे.

उन में 2 कमरे के बाहर खड़े रहे और 2 अंदर आ गए. उन दोनों ने उन पर हमला कर दिया, वह उन से भिड़ गई तो बदमाशों ने उस की बाजू व कंधे पर तेज धारदार हथियार से हमला कर घायल कर दिया और उस के मुंह में कपड़ा ठूंस कर कुरसी से बांध दिया.

बदमाशों ने उस के पति पर कई वार किए, जिस से उन की मौके पर ही मौत हो गई थी. दलजीत ने बताया कि इस के बाद उन्होंने घर में लूट की और फरार हो गए. बाद में उस ने किसी तरह अपने बेटे को उठाया. जब वह उठा तो हमें खून से लथपथ देख घबरा गया. उस ने ही चाकू से रस्सी काट कर उसे खोला और पड़ोसियों को घटना की जानकारी दी.

पुलिस को दलजीत कौर का यह बयान झूठा और बचकाना लगा. क्योंकि घर के अंदर किसी जोरजबरदस्ती से एंट्री के निशान नहीं मिले थे. उस का बयान उस के बेटे अमानत के बयान से दूरदूर तक भी मेल नहीं खा रहा था. थानाप्रभारी ने उस समय दलजीत से कुछ कहना उचित नहीं समझा. वह उस के खिलाफ और पुख्ता सबूत हासिल करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने अपने मुखबिरों को दलजीत कौर के बारे में पता लगाने के लिए कह दिया.

एसआई किरनजीत कौर को असपास के लोगों से पूछताछ करने पर केवल इतना ही पता चला कि पिछले कुछ समय से दोनों पतिपत्नी के बीच अकसर झगड़ा रहता था. उन के संबंध ठीक नहीं थे. उन्हें यह भी जानकारी मिली कि दलजीत कौर सप्ताह में 2-3 बार अमृतसर श्री हरमिंदर साहिब गुरुद्वारा जाती थी.

उन्होंने यह बात थानाप्रभारी को बताई. थानाप्रभारी ने जब दलजीत कौर के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में एक ऐसा नंबर मिला, जिस पर दलजीत की रातबेरात कई घंटे तक बातें होती थीं.

जांच में वह फोन नंबर अमृतसर निवासी हरकृष्ण सिंह का निकला लेकिन उस की लोकेशन जगराओं की थी. जिस से कहानी काफी हद तक साफ हो गई थी.

थानाप्रभारी निधान सिंह ने चौकी इंचार्ज सईद शकील की अगुवाई में एक टीम अमृतसर में हरकृष्ण के घर भेजी. पर वह घर पर नहीं मिला. हरकृष्ण सिंह और दलजीत कौर पुलिस के शक के दायरे में आ चुके थे. अब पुलिस मौके का इंतजार कर रही थी.

10 अगस्त, 2019 को मृतक जसबीर सिंह की अंतिम अरदास के तुरंत बाद पुलिस ने दलजीत कौर को गिरफ्तार कर लिया. उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने पति की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी दिन देर शाम को करनवीर मज्जू की अदालत में पेश कर पूछताछ के लिए 4 दिन के रिमांड पर ले लिया.

दलजीत कौर से की गई पूछताछ के बाद इस हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई, वह 2 ऐसी औरतों की कहानी थी, जिन्होंने प्रकृति का नियम बदलने का प्रयास किया, जिस के बदले एक को मौत मिली और दूसरी को जेल.

हमारे समाज में अधिकांश अपराध मोह और आकर्षण के कारण ही होते हैं. दलजीत कौर और जसबीर कौर का भी एकदूसरे के प्रति बहुत आकर्षण था. इसीलिए साथ जीनेमरने की कसमें खाने के बाद जसबीर ने अपना लिंग परिवर्तन करा कर पतिपत्नी के साथ रहना शुरू कर दिया था.

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था, पिछले कुछ सालों से दलजीत कौर को पति जसबीर सिंह में शारीरिक रूप से कई खामियां नजर आने लगी थीं. वह उस से शारीरिक रूप से संतुष्ट नहीं थी. वह किसी अन्य पुरुष का संग चाहती थी.

ये भी पढ़ें- हैैवान ही नहीं दरिंदा बाप: भाग 1

ऐसे में उस ने अपना विकल्प फेसबुक को बनाया. जल्द ही फेसबुक के माध्यम से उस की मुलाकात सुल्तानविंड रोड अमृतसर निवासी हरकृष्ण से हो गई, जो पहले से ही विवाहित और युवा बच्चों का बाप था.

क्रमश:

 —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य: मनोहर कहानियां

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें