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छोटी सरदारनी: खतरे में पड़ेगी सरब की जान, क्या साथ आएंगी मेहर और हरलीन

कलर्स के शो ‘छोटी सरदारनी’ में मेहर के पास अपने बच्चे या सरब और परम के बीच में से किसी एक को चुनने के लिए बहुत कम दिन बचे हैं. तो वहीं हरलीन और सरब के बीच भी मेहर के कारण दूरियां खत्म होने का नाम ही नही ले रही हैं. आइए अब आपको बताते हैं क्या होगा शो में आने वाला नया ट्विस्ट…

सरब ने किया बटवारे का फैसला

अब तक आपने देखा कि मेहर के बच्चे के नाम प्रौपटी करने से गुस्से में हरलीन, सरब को दो रास्ते देती है कि वह घर छोड़कर चली जाएगी या फिर घर का बटवारा होगा, लेकिन सरब दोनों बातों के लिए नही मानता. तो रौबी सरब को कहता है कि घर और प्रौपर्टी को बेच दे. वहीं मेहर इस पूरे मामले में चुप्पी बनाए रखती है.

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मेहर को कंस्ट्रक्शन साइट पर ले जाएगा सरब

आज के एपिसोड में आप देखेंगे कि सरब, मेहर को कंस्ट्रक्शन साइट पर लेकर जाएगा. जहां वो मेहर को बताएगा कि वो गरीबों के लिए एक अस्पताल बनवाना चाहता है जो उसके पिताजी का सपना था.

मेहर को गोद में उठा लेगा सरब

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मेहर की प्रेग्नेंसी को देखते हुए सरब परेशान होता है, इसीलिए वह मेहर को गोद में उठा लेता है ताकि उसे सीढ़ियों पर चलने में कोई तकलीफ ना हो.

खतरे में पड़ेगी सरब की जान

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कंस्ट्रक्शन साइट पर सरब का पैर फिसल जाएगा और वो ऊंचाई से नीचे गिर जाएगा, जिससे उसकी जान खतरे में पड़ जाएगी. सरब की ये हालत देख मेहर और हरलीन बुरी तरह घबरा जाएंगी.

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अब सवाल ये है कि क्या सरब को बचाने के लिए मेहर और हरलीन अपने गिले-शिकवे भुलाकर एक साथ आएंगी? जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, रात 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

मन भाया मंगेतर : भाग 2

मन भाया मंगेतर : भाग 1

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35 वर्षीय समाधान पाषाणकर पुणे में रहता था और वहां की एक फाइनैंस कंपनी में नौकरी करता था. उस की शादी हो चुकी थी. उस की पत्नी बैंक में नौकरी करती थी. उस के 2 बच्चे भी थे.

जब तक समाधान प्रमोद पाटनकर और दीप्ति के यहां रहा, तब तक दोनों ने मिल कर समाधान का बहुत ध्यान रखा, जिस में दीप्ति की भूमिका कुछ अधिक थी.

4-5 दिन रहने के बाद जब वह वापस पुणे जाने लगा तो उस ने प्रमोद पाटनकर और दीप्ति का आभार प्रकट किया. प्रमोद पाटनकर और दीप्ति ने औपचारिकता के नाते उस के आभार का उत्तर देते हुए कहा कि घर उस का ही है, कभी भी आ जा सकता है.

अंधे को और क्या चाहिए, सिर्फ 2 आंखें. प्रमोद पाटनकर और दीप्ति का मन टटोलने के बाद समाधान को मानो उस की मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. 4-5 दिनों तक दीप्ति के परिवार के साथ रह कर समाधान के दिल में दीप्ति का तनमन पाने के लिए एक अजीब सी चाह बन गई थी.

वह उस का सामीप्य पाने के लिए अकसर किसी न किसी बहाने मुंबई आता और प्रमोद पाटनकर के घर को अपना आशियाना बना कर दीप्ति के ज्यादा से ज्यादा पास रहने की कोशिश करता.

दीप्ति भी कोई बच्ची नहीं थी, वह समाधान के हावभाव की भाषा अच्छी तरह समझती थी. वैसे भी प्रमोद से पहले दीप्ति की शादी उसी से होने वाली थी. समाधान अकसर हंसीमजाक करते हुए ठंडी आहें भर कर कहता, ‘‘दीप्ति, तुम्हारा घर मुझे अपने घर जैसा लगता है. मेरे आने पर तुम अपने काम से छुट्टी ले कर मेरा कितना ख्याल रखती हो.’’

‘‘यह भी तो तुम्हारा ही घर है.’’ दीप्ति ने उस के प्रश्न का उत्तर उसी के शब्दों में दिया.

‘‘यह घर मेरा कहां है, यह तो तुम्हारे पति का है. लेकिन तुम मुझे अपनी जैसी लगती हो, इसलिए मैं यहां आ जाता हूं.’’ समाधान ने कहा तो दीप्ति के गालों पर लाली उतर आई. लेकिन वह बोली कुछ नहीं.

उस की इस खामोशी को समाधान ने ही तोड़ा, ‘‘दीप्ति, बताओ तुम मुझे क्या समझती हो. वक्त साथ देता तो आज तुम मेरी पत्नी होतीं, लेकिन तुम मेरे नसीब में नहीं थीं.’’

‘‘अब बोलने से क्या फायदा,जो होना था हो गया. पत्नी तो अच्छी है न?’’ दीप्ति ने कहा.

‘‘हां, लेकिन तुम्हारी जैसी नहीं है,’’ ठंडी आह भरते हुए समाधान बोला, ‘‘दीप्ति एक बात कहूं, अगर तुम मानो तो. अभी भी वक्त है. हम दोनों एक हो सकते हैं.’’

समाधान ने दीप्ति को अपनी बातों से कुछ इस तरह प्रभावित किया कि वह अपने आप को संभाल नहीं पाई और 10-12 साल के अपने सुखी दांपत्य को दांव पर लगा दिया. वह पति के प्रति वफादारी भूल कर समाधान की बाहों में आ गिरी. एक बार जब मर्यादा की कडि़यां टूटीं तो फिर टूटती ही चली गईं.

समय अपनी गति से भाग रहा था. दीप्ति और समाधान के बीच बने अवैध संबंध 4 साल बीत जाने के बाद भी प्रमोद पाटनकर की नजरों से छिपे रहे. इस बीच दीप्ति एक बेटी की मां बन गई, जिस का नामकरण प्रमोद पाटनकर ने बड़ी धूमधाम से किया था.

अंतत: एक दिन दीप्ति और समाधान के रिश्ते की सच्चाई प्रमोद के सामने आ गई. दरअसल, एक दिन प्रमोद जब दीप्ति से मिलने उस के स्कूल गया तो दीप्ति स्कूल में नहीं मिली. पता चला कि उस दिन वह स्कूल आई ही नहीं थी.

शाम को प्रमोद जब घर पहुंचा तो उस ने दीप्ति से स्कूल से अनुपस्थित होने के बारे में पूछा. दीप्ति तबीयत खराब होने का बहाना बना कर बात को टाल गई. इस के बाद वह सावधान हो गई और उस ने समाधान को भी सतर्क कर दिया.

समाधान के पास पैसों की कमी नहीं थी. अब वह जब भी दीप्ति से मिलने मुंबई आता तो उस के घर न जा कर किसी होटल में ठहरता था. मौका देख दीप्ति किसी पार्टी में जाने या फिर सहेलियों से मिलने के बहाने समाधान के पास पहुंच जाती थी. लेकिन यह खेल भी ज्यादा दिनों तक नहीं चला.

घटना से लगभग एक माह पहले दीप्ति का मोबाइल प्रमोद के हाथ लग गया. प्रमोद ने उस के फोन का वाट्सऐप चैक किया तो उस में उसे समाधान के साथ हुई चैटिंग मिल गई. उस दिन भी समाधान ने दीप्ति को चर्चगेट, मुंबई के एक होटल में बुलाया था.

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बनसंवर कर दीप्ति जब घर से बाहर गई और शाम तक नहीं लौटी तो प्रमोद ने उसे आड़े हाथों लिया. प्रमोद ने उस के मैसेज और उस का पीछा करने की बातें उस से कहीं तो दीप्ति के होश उड़ गए. अब वह झूठ नहीं बोल सकती थी. स्थिति को संभालने के लिए दीप्ति ने पति से माफी मांगी और दोबारा समाधान से न मिलने की कसम खाई

प्रमोद ने उसे माफ भी कर दिया. लेकिन घनिष्ठ संबंधों में ऐसे कसमेवादों का कोई महत्त्व नहीं होता. दीप्ति को भी प्रमोद की  अपेक्षा समाधान ज्यादा पसंद था. इसलिए वह पति को अपने प्यार के रास्ते का कांटा समझने लगी. इस कांटे को वह हमेशा के लिए खत्म करना चाहती थी. इस बारे में उस ने समाधान से बात की तो वह भी तैयार हो गया. अपनी योजना के अनुसार, घटना के एक सप्ताह पहले समाधान ने दीप्ति को 2 बार नींद की गोलियां ला कर दीं.

दीप्ति ने प्रमोद पाटनकर को 2 बार 10-10 गोलियां चाय में मिला कर दीं. लेकिन प्रमोद पर उन का असर नहीं हुआ. तीसरी बार घटना के एक दिन पहले समाधान ने नींद की 20 गोलियां दीप्ति को ला कर दीं और सभी गोलियां एक साथ देने के लिए कह दिया.

शाम साढ़े 7 बजे औफिस से लौटने के बाद दीप्ति ने पति प्रमोद पाटनकर के साथ वैसा ही किया, जैसा कि समाधान ने उसे कहा था. उस ने नींद की 20 गोलियां चाय में घोल कर पति को दे दीं.

आधापौना घंटा बाद जब प्रमोद पाटनकर पर नींद की गोलियों का पूरा असर हो गया तो दीप्ति ने समाधान पाषाणकर को फोन कर अपने घर बुला लिया.

समाधान आधे घंटे में दीप्ति के फ्लैट पर पहुंच गया. फिर दोनों ने मिल कर बैड पर गहरी नींद में पडे़ प्रमोद पाटनकर को मौत के घाट उतार दिया. दीप्ति ने कस कर पति के पैर पकड़े और समाधान ने उस के गले में रस्सी डाल कर कस दी.

प्रमोद की हत्या के बाद दोनों ने शव को बैड से उठा कर फर्श पर डाला और उसी बैड पर तनमन की प्यास बुझाई. इस के बाद दीप्ति अपने मायके चली गई थी, जबकि समाधान पुलिस की जांच को गुमराह करने के प्रयास में जुट गया था. उस ने अपने होंठों पर लिपस्टिक लगा कर मेज पर रखे चाय के एक खाली कप पर होंठ से लिपस्टिक का निशान बना दिया था.

फिर अलमारी का सामान निकाल कर उस ने पूरे फ्लैट में फैला कर प्रमोद पाटनकर के बिस्तर के नीचे कंडोम का पैकेट रख दिया. इस के बाद वह उस का मोबाइल फोन व जेब में रखे 3 हजार रुपए निकाल कर ले गया.

समाधान पाषाणकर के जाने के कुछ समय बाद दीप्ति पाटनकर अपने फ्लैट पर लौट आई और चीखनेचिल्लाने लगी.

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दीप्ति से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने समाधान पाषाणकर को भी गोरेगांव के एक लौज से गिरफ्तार कर लिया.

समाधान पाषाणकर और दीप्ति पाटनकर से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने थाना नवघर में दोनों के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 201, 328 और 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर के दोनों को थाणे की तलौजा जेल भेज दिया. मामले की आगे की जांच असिस्टेंट इंसपेक्टर साहेब पोटे कर रहे थे.

वर्कप्लेस में विविध ड्रैस कोड देगा आप को नई सोच

27 वर्षीया कोमल एक बड़ी कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर है. मुंबई की लोकल ट्रेन में प्रतिदिन सफर करती है. ड्रैस कोड पर उस के विचार पूछने पर कहती है, ‘‘हमारी जनरेशन फैशन ट्रैंड्स फौलो करना चाहती है, कपड़ों का चयन निजी फ्रीडम व निजी सोच पर निर्भर करता है. कितना बोरिंग हो जाएगा जब  सब पूरे दिन रोज एक ही तरह के कपड़ों में दिखेंगे. अपने दोस्तों से कोई लुकिंग गुड नहीं सुन पाएगा.

‘‘अपनी पसंद के कपड़ों को न पहनने से हमारी असली पसंद दिखेगी नहीं. कलीग्स को जानना, सम झना जरा मुश्किल होगा. यह मैं नहीं हूं, यह मेरा स्टाइल नहीं है, लोग कैसे मु झे सम झेंगे जब मैं अपनी पसंद के कपड़े पहन कर खुद को ऐक्सप्रैस कर ही नहीं पा रही हूं.’’

जो पीढ़ी सत्यता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राइट टू सैल्फ ऐक्सप्रैशन पर चल रही है, उस का पर्सनल स्टाइल उस के लिए खासा माने रखता है. आज की पीढ़ी ओवरनाइट स्टार्टअप की सफलता, मनपसंद कपड़े पहने बड़ी हुई है. उस ने साबित किया है कि फायदेमंद बिजनैस के लिए आप को कल के किसी सीईओ की तरह दिखना जरूरी नहीं है. यह पीढ़ी यह मानती है कि जो आप पहनते हो और जो आप करते हो, दोनों चीजें जुड़ी नहीं हैं. क्रौप टौप पहने कोई लड़की आप की बौस हो, यह भी हो सकता है.

26 वर्षीया आर्किटैक्ट उलरा का कहना है, ‘‘हमारी लाइफ पर सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक मूवमैंट्स हावी होने की कोशिश करते आए हैं. पर सफलता हमारे लिए कुछ और है. चाहे हमारे पास कम पैसे हों, चिंता ज्यादा हो, धुंधला भविष्य हो, पर लगातार कनैक्टिविटी के इस समय में जहां औफिस हर जगह हो सकता है, हम अपने कपड़ों पर किसी भी तरह का नियम लागू नहीं करना चाहते. 8-9 घंटे काम करना होता है, सो, हमें आरामदायक, मनपसंद कपड़े पहन कर खुद का भी अस्तित्व महसूस करने का हक है.

‘‘ड्रैस कोड रखना दूसरे लोगों के कपड़ों को कंट्रोल करने की कोशिश है. अधिकतर औरतों के शरीर और इच्छाओं को पुरुष द्वारा ही कंट्रोल करने की कोशिश रहती है.’’

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कंपनी के स्टैंडर्ड्स

ड्रैस कोड कंपनी के स्टैंडर्ड्स हैं जो देखने में तो काफी अच्छे लगते हैं पर सचाई अलग है. कभीकभी अलगअलग ड्रैस कोड भी होते हैं, जैसे महिलाएं ओपन टो सैंडल्स पहन सकती हैं, पुरुष नहीं.

पुरुषों को पैंट्स पहनना जरूरी है पर महिलाएं क्रौप्ड या कैप्री स्टाइल पैंट्स या स्कर्ट्स पहन सकती हैं.

पुरुषों के बाल छोटे होने चाहिए, जबकि महिलाओं के बालों पर कोई रोक नहीं है.

पुरुषों को कान में कुछ नहीं पहनना है, जबकि महिलाएं मल्टीपल इयररिंग्स पहन सकती हैं.

नई नौकरी ढूंढ़ रहे 61 फीसदी लोगों ने कहा कि जिस कंपनी में ड्रैस कोड था, उस का उन्हें नैगेटिव परसैप्शन था.

वर्कर्स की राय

स्टौर्मलाइन की स्टडी के अनुसार, यूके वर्कर्स कहते हैं कि अगर ड्रैस कोड नहीं होता तो वे ज्यादा प्रोडक्टिव फील करते हैं और ज्यादा अच्छी तरह तैयार होना पसंद करते हैं. 78 फीसदी ने कहा कि भले ही ड्रैस कोड न हो, वे अच्छी तरह तैयार होने की कोशिश करते हैं और वर्क क्लौथ्स के बीच अंतर रखते हैं. 91 फीसदी ने कहा कि  ड्रैस कोड न हो तो वे जो भी जानते हैं, उस की क्वालिटी और कंडीशन को फील करते हैं और वे कपड़ों पर ज्यादा खर्च करते हैं.

68 फीसदी ने कहा कि वे कोई अच्छा काम करने के लिए किसी वैल ड्रैस्ड कलीग पर यकीन करेंगे बजाय उस के जिस ने ड्रैसिंग में कोई एफर्ट न किया हो. इस का मतलब हमें इंप्रैस करने के लिए तैयार होना चाहते हैं. पर हम परकोई यह न थोपे कि हम क्या पहनें. 61 फीसदी का कहना है कि जब डै्रस डाउन फ्राइडे को ड्रैस कोड से रिलैक्स होते हैं तो उन का काम में ज्यादा मन लगता है.

एंप्लौयर्स को अपने लोगों पर ट्रस्ट करना चाहिए. उन्हें वह पहनने देना चाहिए जो उन्हें पसंद है. वे यह सलाह दे सकते हैं कि औफिस में क्या नहीं पहनना है. पर यह नियम बनाना कि यही पहनना है, काफी पैट्रोनाइजिंग है. पर आप को इस बात का भी ध्यान रखना है कि भले ही आप को अपनी आरामदायक रिप्ड जींस कैजुअल ड्रैस लगती हो पर आप को अपने औफिस में यह कभी नहीं पहननी चाहिए. स्टीव जौब्स और मार्क जुकरबर्ग अपनी कैजुअल वर्क यूनिफौर्म्स के लिए जाने जाते हैं, स्टीव काली, टर्टलनेक और मार्क ग्रे टीशर्ट और हूडी के लिए. पर आप यह कैसे पता करेंगे कि आप कैजुअल और अनप्रोफैशनल के बीच सही जगह पर हैं?

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क्या न पहनें

फेयरफील्ड यूनिवर्सिटी में कैरियर प्लानिंग की एसोसिएट डायरैक्टर स्टीफेन गेलो स्टूडैंट्स को ग्रेजुएशन के बाद वर्कफोर्स में जाने के लिए तैयार करती हैं. उन के अनुसार, कैजुअल ड्रैस कोड में भी औफिस में ये कभी नहीं पहनने चाहिए –

लैगिंग्स और जिम के कपड़े कभी न पहनें.

कभी भी गंदी, फेडेड और होल्स वाली जींस न पहनें. यदि टांग का कोई भी पार्ट जींस में दिख रहा है, तो उसे औफिस में न पहनें.

अपने औफिस के कपड़ों के आइडिया के लिए अपने बौस के कपड़े देखें. मु झे क्या पहनना चाहिए, इस के लिए अपने बौस को ही गाइड बना लें. यदि वे बिजनैस कैजुअल पहनते हैं, तो आप भी सूट पहन लें. यदि वे बहुत कैजुअल पहनते हैं, तो आप के रास्ते खुले हैं.

भले ही गरमी हो, अपने कालेज की स्वेट शर्ट पहन कर औफिस न जाएं. आप ने किस कालेज में पढ़ाई की, किसी को मतलब नहीं है, न आज की बात है यह. अपने कालेज के आरामदायक कपड़े घर पर ही रख कर जाएं. अपनी कोजी कालेज हूडी को आराम के समय के लिए ही रहने दें.

भले ही औफिस कितना कैजुअल हो, या आप सुबह कितनी जल्दी में थे, ढंग से तैयार हो कर निकलें. जो आप पहनते हैं, आप की पर्सनैलिटी का पार्ट होता है. यदि आप सिलवटें पड़े हुए गंदे कपड़े पहनते हैं तो आप अपने बारे में कुछ गलत ही बता रहे होते हैं.

वे कंपनियां जो कैजुअल ड्रैस कोड को सपोर्ट करती हैं, अपने एंप्लौइज को पौजिटिव सिग्नल्स भेजती हैं कि वे निजता को पसंद करती हैं. एंप्लौइज के लिए भी यह सम झना जरूरी है कि अपने एंप्लौयर के बिजनैस कैजुअल ड्रैस कोड का पालन करना है और रिलैक्स्ड कोड का मतलब, अस्तव्यस्त, गंदे कपड़े नहीं हैं. फ्लिपफलौप्स और फटी हुई जींस ड्रैस डाउन फ्राइडे के लिए भी अनुचित है.

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 क्या कूल हैं ये : भाग 1

आज की युवा पीढ़ी वक्त के साथ चलना जानती है, समस्याओं को परे रख जिंदगी का लुत्फ कैसे उठाते हैं, यह मैं बेटेबहू को देख अभिभूत हो रही थी. हम ने भी उन के साथ कदमताल मिला कर जीने का जो सुख लिया, जबां से क्या बयां करूं.

प्लेन लैंडिंग की घोषणा हुई तो मैं ने भी अपनी बैल्ट चैक कर ली. मुसकरा कर समर की तरफ देखा. वे भी उत्सुकता से बाहर देख रहे थे. मैं भी खिड़की से बाहर नजर गड़ा कर प्लेन लैंडिंग का मजा लेने लगी.

एक महीने के लिए बेटेबहू के पास दुबई आए थे. बच्चों से मिलने की उत्सुकता व दुबई दर्शन दोनों ही उत्तेजनाओं से मनमस्तिष्क प्रफुल्लित हो रहा था. एयरपोर्ट की औपचारिकताओं से निबट कर सामान की ट्रौली ले कर बाहर आए तो रिषभ प्रतीक्षारत खड़ा था. बेटे को देख कर मन खुशी से भर उठा. लगभग 6 महीने बाद उसे देख रहे थे. सामान की ट्रौली छोड़, दोनों जा कर बेटे से लिपट गए.

‘‘इशिता कहां है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘वह घर में आप के स्वागत की तैयारी कर रही है,’’ रिषभ मुसकरा कर कार का दरवाजा खोलते हुए बोला.

‘‘स्वागत की तैयारी?’’ समर चौंक कर बोले.

‘‘हां पापा, आज शुक्रवार है न, छुट्टी के दिन क्लीनर आता है, तो इशिता सफाई करवा रही है.’’

‘सफाई करवाने का दिन भी फिक्स होता है बच्चों का यहां,’ मैं कार में बैठ कर सोच रही थी, ‘हफ्ते में एक दिन होती है न. अपने देश की तरह थोड़े ही, रोज घिसघिस कर पोंछा लगाती है आशा.’

थोड़ी देर में रिषभ की कार सड़क पर हवा से बातें कर रही थी. सुंदर चमचमाती 6 से 8 लेन की सड़कें, दोनों तरफ नयनाभिराम दृश्य और कार में बजते मेरे मनपसंद गीत… मैं ने आराम से सिर पीछे सीट पर टिका दिया.

‘‘मम्मी, गाने पसंद आए न आप को. सारे पुराने हैं आप की पसंद के,’’ मैं थोड़ा चौंकी कि यह कब कहा मैं ने कि मु झे सिर्फ पुराने गाने ही पसंद हैं. पर बच्चे अंदाजा लगा लेते हैं. मांबाप हैं, तो थोड़ी पुरानी चीजें ही पसंद करेंगे. मैं मन ही मन मुसकराई.

120-130 की स्पीड से दौड़ती कार आधे घंटे में घर पहुंच गई. डिसकवरी गार्डन में फ्लैट था. दुबई जैसे रेगिस्तान के समुद्र में इतनी हरीभरी कालोनी देख कर मन प्रसन्न हो गया. मात्र 5 मंजिल ऊंचे फ्लैट बहुत बड़े एरिया में कई स्ट्रीट में बंटे हुए थे. मैं सोच रही थी कि इतना सामान ऊपर कैसे जाएगा पर बिल्ंिडग के दूसरे रास्ते से आराम से सामान ड्रैग कर अंदर प्रवेश कर गए हम. वहां सीढि़यों के बजाय स्लोप बना हुआ था. किसी भी अच्छी सोसाइटी की ही तरह वहां भी मुख्य दरवाजे पर बिना एंट्री कार्ड को टच करे बिल्ंिडग के अंदर प्रवेश नहीं कर सकते. जैसे ही अंदर प्रवेश किया, अंधेरे कौरिडोर की लाइट्स जगमगाने लगीं. सभीकुछ औटोमैटिक था.

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फ्लैट के दरवाजे पर पहुंच कर घंटी बजाने पर इशिता जैसे प्रतीक्षारत ही बैठी थी. क्षणभर में ही दरवाजा खुल गया और हम दोनों उस से भी लिपट गए. जान है हमारी इशिता. उस की भोली सूरत व मीठी बातें सुन कर तो जैसे लुत्फ ही आ जाता है जीने का. चमकता साफसुथरा फ्लैट देख कर दिल खुश हो गया. बच्चों की छोटी, प्यारी सी गृहस्थी उन के सुखी दांपत्य जीवन की कहानी बिना कहे भी बयान कर रही थी. प्रेमविवाह किया था दोनों ने.

दुबई का समय भारतीय समय से  डेढ़ घंटा पीछे है. इसलिए अभी  वहां पर दो ही बज रहे थे. बैडरूम में जा कर, सामान इधरउधर रख कर आराम से बिस्तर पर पसर गए.

‘‘ममा, खाना लगा दूं?’’ इशिता ने पूछा.

‘‘खा लेंगे अभी,’’ मैं ने इशिता को पास खींच लिया.

शुक्रवार और शनिवार दुबई में छुट्टी होती है. इसलिए बच्चे आराम वाले मूड में थे. ‘‘पापा, खाना खा कर थोड़ा रैस्ट कर लीजिए. फिर बाहर चलते हैं,’’ रिषभ बोला.

शाम को हम चारों बाहर गए. चारों तरफ जगमगाती रोशनी में नहाया दुबई, समतल सड़कों पर फिसलती कारें और मेरा मनपसंद संगीत…कार में बैठने का लुत्फ आ जाता है.

‘‘रिषभ, आज तेरी कार में बैठी हूं. याद है न, जब मैं ड्राइव करती थी और तू बैठता था,’’ मैं रिषभ को छेड़ते हुए बोली.

‘‘हां ममा, याद है, बहुत बैठा हूं आप की बगल में. आजकल तो काफी कहानियां छप रही हैं आप की. मेरी रौयल्टी तो अब तक खूब जमा हो गई होगी,’’ रिषभ बचपन वाला लाड़ लड़ाता हुआ बोला.

‘‘हां, हां, इस बार तेरी पूरी रौयल्टी दे कर जाऊंगी,’’ मैं हंसते हुए बोली. रिषभ जब छोटा था तो मेरी हर कहानी के छपने पर 20 रुपए लेता था. उस के बचपन की वह मधुर सी याद जेहन को पुलकित कर गई. आज कितना बड़ा हो गया रिषभ. तब मैं उसे संभालती थी, अब वह हमें संभालने वाला हो गया.

‘‘रिषभ, तु झे याद है, तू मु झे बचपन में मेरे जन्मदिन पर अपनी पौकेटमनी से पेपर और पेन ला कर दिया करता था लिखने के लिए. मु झे तेरी वह आदत अंदर तक छू जाती थी.’’

‘‘हां, याद है. पता नहीं कैसे सोच लेता था उस समय ऐसा कि आप लिखती हैं तो पेपरपेन से ही खुश होंगी,’’ रिषभ ड्राइव करते हुए पुरानी यादों में लौटते हुए बोला.

‘‘और अब बड़े हो कर तू ने ममा को लैपटौप ला कर दे दिया,’’ समर ठहाका मारते हुए बोले.

इशिता भी हंस पड़ी. रिषभ ने हंसते हुए कार धीमी की. हम अपने गंतव्य तक पहुंच गए थे. घूमघाम कर रात पता नहीं कितने बजे तक घर पहुंचे. हमें समय भी पता नहीं चल रहा था. खाने में भी काफी कुछ खा चुके थे, इसलिए डिनर करने का किसी का मन नहीं था. रोशनी से दमकते दुबई ने तो जैसे दिनरात का फर्क ही भुला दिया था.

घर पहुंच कर, चेंज कर मैं लौबी में आ गई. तीनों बैठे थे. मैं बोली, ‘‘खूब थक गए हैं, चाय पीते हैं. इशिता, तू पिएगी?’’

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‘‘ममा, चाय?’’ इशिता चौंक कर अपनी बड़ीबड़ी आंखें  झपकती मेरी तरफ देख कर आश्चर्य से बोली. अब चौंकने की बारी मेरी थी, कुछ गलत बात तो नहीं कह दी.

‘‘अच्छा, अगर आप का पीने का मन है तो मैं बना देती हूं,’’ इशिता उठ कर रसोई की तरफ जाते हुए बोली.

‘‘ममा, पता भी है, क्या टाइम हो रहा है, रात का डेढ़ बज रहा है. और भारत में इस समय 3 बज रहे होंगे. चाय पियोगे आप इस समय,’’ रिषभ हंसता हुआ बोला.

मैं ने घबरा कर मोबाइल देखा. घड़ी तो भारतीय समय बता रही थी. पर मोबाइल दोनों समय बता रहा था. ‘‘ओह, मु झे तो यहां की चकाचौंध भरी रोशनी में दिनरात का फर्क ही नहीं पता चल पा रहा.’’

तीनों को मुसकराते देख, मैं उन्हें घूरती हुई बैडरूम की तरफ भाग गई. इतने घंटे की नींद कम हो गई थी मेरी. सुबह मेरी नींद भारतीय समय के अनुसार खुल गई. लेकिन दुबई का समय डेढ़ घंटा पीछे होने की वजह से बच्चे तो गहन निद्रा में थे. समर भी अलटपलट कर फिर सो रहे थे. दिल कर रहा था खूब खटरपटर कर सब को जगा दूं. पर, मन मसोस कर सोई रही.

खाना बनाने के लिए कुक आता था. विदेशों में वैसे तो काम करने वालों की सुविधा भारत जैसी नहीं रहती, पर दुबई में इतनी दिक्कत नहीं है. वहां पर एशियन देशों से गए कामगार घर में काम करने के लिए मिल जाते हैं. वहां की मूल आबादी तो 12-13 प्रतिशत ही है, बाकी आबादी तो यहां पर दूसरे देशों से आए हुए लोगों की ही है. यहां पर घरों में काम करने वाले स्त्रीपुरुष, अधिकतर हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी, बंगलादेशी और श्रीलंका के ही होते हैं. कई अन्य देशों की महिलाएं बच्चों की नैनी के रूप में यहां पर अपनी सेवाएं देती हैं.

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अपने देशों में कुछ भी उपद्रव मचाएं पर यहां सब बहुत ही नियमसंयम से रहते हैं. टूटीफूटी इंग्लिश बोलतेबोलते अच्छी इंग्लिश बोलना सीख जाते हैं. घर में काम करने वाले भी इंग्लिश बोलते हैं पर अपनी भाषा भी बोलते हैं. जो बहुत सालों से रह रहे हैं, वे कोईकोई तो अरबी बोलना भी सीख जाते हैं.

‘‘ममा, यह पूरण है,’’ शाम को बेटे ने कुक से मिलवाया, ‘‘वैसे तो यह हमारे औफिस से आने के बाद आता है पर आजकल जल्दी आ कर खाना बना देगा ताकि औफिस से आ कर हम बाहर जा सकें.’’

लिव इन रिलेशनशिप : नैतिकता Vs जरूरत

लिव इन रिलेशनशिप, जो मूलतः पश्चिमी देशों का चलन है. अब भारत में भी तेजी से चलन में आ रहा है . लिव इन महानगरों में शौक में कम जरूरत पर ज्यादा आधारित होता है. लिव इन का साधारण सा मतलब है कि बालिग हो चुके लड़के और लड़की सहमति के आधार पर एक साथ एक छत के नीचे रह सकते हैं, जहां संबंध उनकी मर्जी पर ही बिना शादी के बंधन में बंधे होते हैं .

अगर पारम्परिक भारत की नजर से देखा जाए तो अनुचित और गलत शुरुआत लगती है. मगर इसे महानगरों के सन्दर्भ में देखे तो अब भागमभाग जिंदगी में ऐसे रिश्ते एक जरूरत से बन गए हैं. शहरों में नौकरी और पढ़ाई के लिए आए युवक/युवतियों की जरूरतें ज्यादा और पैसे कम होते हैं जहां आसानी से वो अपने मेल पार्टनर के साथ किराये के साथ हर खर्चे को बांट सकती है .

लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोग कई बार विवाह भी करते हैं . इसके साथ एक और परंपरा खासकर फिल्मी जगत में चल पड़ी है कि शादी से पहले लिव इन में रहकर एक दूसरे को जानने समझने की, बहुत हद तक ठीक भी है मगर लिव इन में रहने के बाद समझ बूझ कर शादी करने पर भी आपका पार्टनर से शादी चल पाएगी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है.

जरूरी है बच्चों की रिस्पैक्ट का ध्यान रखना

जरूरत से शुरू हुए ऐसे रिश्ते अब मौज मस्ती और शारीरिक जरूरत को पूरा करने का एक जरिया भी बन चुके हैं. इसमें शारीरिक हिंसा और यौन उत्पीड़न जैसे अपराध भी जन्म लेने लगे हैं . सहमति से साथ आए दो लोग किसी भी छोटी सी बात पर असहमति होने पर आरोप प्रत्यारोप तक बात आ पहुंचती है .

ऐसे रिश्ते की नाजुकता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कानून भी बनाए हैं ताकि सामाजिक अव्यवस्था न फैले. कभी कभी ऐसा भी होता है कि लड़के या लड़की में से किसी भी एक का भावनात्मक लगाव ज्यादा होता है और वो साथ रहना या शादी करना चाहते हैं मगर दूसरा किसी भी बंधन में आने से इंकार करता है तो उस समय एक के लिए स्थिति बहुत विकट हो जाती है या कई बार लोग शादी की बात करके लिव इन रिलेशनशिप में रहने को राजी करते हैं और अपनी यौन इच्छा पूरी करने के बाद छोड़ कर निकलने में गुरेज नहीं करते वजह साफ है कि कोई सामाजिक या कानूनी बंधन नहीं है इसलिए भी कानूनी संरक्षण जरूरी बन जाता है लिव इन रिश्तों पर भी.

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आइए कुछ कानूनी पहलुओं पर भी नज़र डालते हैं जो कोर्ट द्वारा तय किए गए हैं –

1. लिव इन रिलेशनशिप में घरेलू हिंसा से संरक्षण प्राप्त है मतलब अगर लिव इन पार्टनर मार पीट करता है तो आप कानूनी सहायता ले सकती है .

2. अगर लिव इन से बच्चे का जन्म हो जाता है तो उसे पिता की सम्पत्ति से सभी जायज अधिकार प्राप्त होंगे. हां मगर लड़की को कानूनी रूप से पत्नी का दर्जा नहीं दिया जाएगा. लड़का या लड़की दोनों को ही अपनी शादी करने का अधिकार है.  बच्चा किसके साथ रहेगा ये दोनों मिलकर तय कर सकते हैं या कोर्ट भी जा सकते हैं .

3. लड़की भी गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है ये तब तक मिलेगा जब तक लड़की कहीं और शादी नहीं कर लेती या लड़के की मृत्यु हो जाने की स्थिति में भी गुजारा भत्ता बंद हो जाएगा.. लड़के की सम्पत्ति में लड़की दावा नहीं कर सकती .

4. अगर आप विदेश में लिव इन में रह रहे हैं या विदेशी व्यक्ति के साथ रह रहे हैं तो कानूनी संरक्षण भी वही का स्थानीय कानून से ही मिलेगा .

ध्यान रहे कि आपके लिव इन पार्टनर का बालिग होना बहुत जरूरी है मतलब लड़की 18 साल और लड़का 21 साल.. अन्यथा आप को कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है..

अगर लिव इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला लेते हैं तो लड़की और लड़के दोनों को चाहिए कि वो अपनी अपनी priority तय कर ले . एक दूसरे का प्राथमिकता भी चेक कर लें और भविष्य के लिहाज से भी तय कर लें कि शादी के बंधन में बंधना है या नहीं.. स्पष्ट रूप से ये बात एक दूसरे के सामने रखे. शादी के वादे के बाद लिव इन रिलेशनशिप में रहकर शादी से मुकरने पर भी आप पर कानूनी रूप से कार्रवाई हो सकती है. इस बात का हमेशा ख्याल रखे. बाकी सभी रिश्तों की तरह लिव इन भी समाज का चलन बनता जा रहा है तो उसे एक स्वस्थ्य रिश्ते की तरह ही निभाने की बात होनी चाहिए.

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मैं 25 वर्षीय लड़की हूं मेरी शादी हो रही है , मेरा स्तन ढ़ीला है मुझे डर लग रहा है?

सवाल 

मैं 25 वर्षीया वर्किंग गर्ल हूं. मेरी सुंदरता, अच्छी कदकाठी व खासी लंबाई लोगों को आकर्षित भी करती है लेकिन मेरे स्तन छोटे एवं लटके हुए हैं. अगले महीने मेरी शादी होने वाली है. मु झे डर है कि मेरे होने वाले पति को शायद यह अच्छा न लगे. मैं स्तनों का आकार बढ़ाने और इन्हें सुडौल करने के लिए क्या करूं?

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जवाब

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व्यायाम या मालिश करने से स्तनों के माप में कोई परिवर्तन नहीं होता, ये सिर्फ स्तन के आसपास की मांसपेशियों को मजबूत करते हैं. पूर्णतया अर्धगोलाकार स्तन केवल औपरेशन या दूसरी तकनीकों द्वारा ही प्राप्त किए जा सकते हैं.

जहां तक आप की बात है, आप बेकार की चिंता कर रही हैं. महिला के स्तन के आकार का सैक्स के प्रति रुचि और यौनिक आनंद यानी अंतरसंबंध बनाने में आनंद लेने या देने की क्षमता से कोई संबंध नहीं होता है. आप की यौनिकता यानी सैक्सुअलिटी केवल आप के शरीर के कुछ हिस्सों तक ही सीमित नहीं है. आप का पूरा शरीर आप के आकार, रंग, आकृति और वजन पर ध्यान दिए बिना भी यौनिक है. अपने पूरे शरीर का आनंद लें. चिंतामुक्त विवाह उपरांत सैक्स को पूरी तरह एंजौय करें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

शुभारंभ : रानी के परिवार पर लगेगा चोरी का इल्जाम, क्या टूट जाएगी शादी ?

कलर्स के शो “शुभारंभ” में अब तक आपने देखा कि राजा-रानी अपनी शादी को लेकर काफी खुश नजर आ रहे हैं. लेकिन कीर्तिदा शादी में रुकावट डालने के लिए नई चाल चलती है और रानी के कुंडली में दोष बताती है. यहाँ तक की, वह रानी की शादी गली के कुते से कराने को कह देती है, जिससे कुंडली दोष दूर हो जाए. लेकिन रानी की सूझ-बूझ से ये विपत्ती भी दूर हो जाती है. आइए बताते हैं, क्या होने वाला है शो में आगे.

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 कीर्तिदा ने लगाया रानी के परिवार पर चोरी का इल्जाम

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कीर्तिदा इस बार ऐसा षडयंत्र रचती है कि शादी बस टूट ही जाये. कीर्तिदा खानदान का पुश्तैनी ज़ेवर, जिसे पोची कहते है, उसे रानी के घर  भिजवाते वक्त नकली पोची से बदल देती है और चोरी का घिनौना इल्जाम रानी के परिवार पर लगा देती है.

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रानी को पहुँचता है गहरा आघात

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अपने परिवार पर ऐसे इल्जाम लगते देख, रानी का दिल टूट जाता है. लेकिन अब देखना ये है कि राजा-रानी का प्यार इस मुश्किल इम्तेहान को पार कर पाएगा या फिर कीर्तिदा की चालों में फंस कर दम तोड़ देगा? जानने के लिए देखते रहिए शुभारंभ, सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

मन भाया मंगेतर : भाग 1

दीप्ति और प्रमोद पाटनकर की अच्छीभली गृहस्थी थी, दोनों खूब खुश और सुखी थे. लेकिन जब दीप्ति का पूर्व मंगेतर मेहमान बन कर घर आया तो उस ने दीप्ति की ऐसी सोच बदली कि वह…

प्रमोद अनंत पाटनकर भारतीय जीवन बीमा निगम में अधिकारी थे. वह अपने परिवार के साथ ठाणे के उपनगर मीरा भायंदर स्थित शिवदर्शन सोसायटी में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी दीप्ति पाटनकर के अलावा लगभग 4 साल की एक बेटी थी. इस छोटे से परिवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

बात 15 जुलाई, 2019 की है. उस समय रात के करीब 11 बजे थे. दीप्ति की बेटी ननिहाल में थी. दीप्ति बेटी से मिल कर अपने फ्लैट पर लौटी तो दरवाजा बंद था. कई बार डोरबैल बजाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला तो उस ने पर्स में रखी दूसरी चाबी से दरवाजा खोला. उस ने अंदर जा कर देखा तो वहां का नजारा देख मुंह से चीख निकल गई. उस के पति प्रमोद अनंत पाटनकर की लाश फर्श पर पड़ी थी. उस के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग आ गए. उन सभी के मन में यह जिज्ञासा थी कि पता नहीं प्रमोदजी के फ्लैट में क्या हो गया. लोग फ्लैट के अंदर पहुंचे तो बैडरूम के फर्श पर प्रमोद पाटनकर की लाश देख कर स्तब्ध रह गए. फ्लैट का सारा सामान बिखरा पड़ा था. लोग समझ नहीं पा रहे थे कि यह सब कैसे हो गया.

दीप्ति ने उस समय अपने आप को किसी तरह संभाला और मामले की जानकारी करीब ही रहने वाले अपने पिता भानुदास भावेकर को दी. बेटी के फ्लैट में घटी घटना के बारे में सुन कर वह अवाक रह गए. उन्होंने रोतीबिलखती बेटी दीप्ति को धीरज बंधाया, फिर मामले की जानकारी स्थानीय नवघर थाने में दे दी साथ ही अपने परिवार के साथ दीप्ति के फ्लैट पर पहुंच गए.

हत्या की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी रामभाल सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए. उन्होंने यह सूचना बड़े अधिकारियों के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम व फोरैंसिक टीम को भी दे दी थी.

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घटनास्थल थाने से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर था, इसलिए पुलिस टीम 10 मिनट में वहां पहुंच गई. थानाप्रभारी जब घटनास्थल पर पहुंचे तब तक वहां सोसायटी के काफी लोग जमा हो चुके थे.

वह फ्लैट के अंदर गए, तो उन्हें कमरे में बैड के पास फर्श पर एक आदमी की लाश पड़ी मिली. लाश के पास बैठी एक महिला जोरजोर से रो रही थी. पता चला कि रोने वाली महिला का नाम दीप्ति है और लाश उस के पति प्रमोद अनंत पाटनकर की है.

थानाप्रभारी रामभाल सिंह ने लाश का निरीक्षण किया तो मृतक के गले पर निशान मिला, जिसे देख कर लग रहा था कि मृतक की हत्या गला घोंट कर की गई है. खुली अलमारी और पूरे फ्लैट में फैले सामान से स्पष्ट था कि वारदात शायद लूटपाट के इरादे से की गई होगी.

पुलिस ने जब प्रमोद पाटनकर की पत्नी दीप्ति से पूछताछ की तो उस ने बताया कि पति के आने के पहले वह अपनी बेटी से मिलने मायके चली गई थी. रात 11 बजे जब वह घर लौटी तो कई बार डोरबैल बजाने और आवाज देने के बाद भी फ्लैट का दरवाजा नहीं खुला, तब उस ने अपने पास मौजूद डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला. वह फ्लैट में गई तो उस की चीख निकल गई.

थानाप्रभारी रामभाल सिंह मौके की जांच कर ही रहे थे कि सूचना पा कर के थाणे के एसपी (ग्रामीण) शिवाजी राठौड़, डीएसपी शांताराम वलवी भी वहां पहुंच गए. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी थी.

पहले फोरैंसिक टीम ने मौके से सबूत जुटाए. फिर पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. काररवाई निपट जाने के बाद थानाप्रभारी ने लाश पोस्टमार्टम के लिए बोरीवली के भगवती अस्पताल भेज दी. इस के साथ ही थाना नवघर में कत्ल की वारदात दर्ज कर ली गई.

वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद थानाप्रभारी ने कमरे का बारीकी से निरीक्षण किया. कमरे में रखी टेबल पर चाय के 2 खाली कप रखे मिले. जिन में से एक पर लिपस्टिक का निशान था. इस के अलावा बैड की चादर सिकुड़ी हुई थी और तकिए के नीचे कंडोम का पैकेट रखा था.

यह सब देख कर पुलिस ने अनुमान लगाया कि वहां आई महिला प्रमोद की जानपहचान की रही होगी. उसी ने मौका देख कर इस घटना को अंजाम दिया होगा. वह कौन थी, यह जांच का विषय था.

थानाप्रभारी ने थाने लौट कर इस घटना पर गंभीरता से विचारविमर्श करने के बाद जांच की जिम्मेदारी असिस्टेंट इंसपेक्टर साहेब पोटे को सौंप दी. दीप्ति का बयान दर्ज करने के बाद जांच अधिकारी पोटे केस की जांच में जुट गए. सब से पहले वह यह जानना चाहते थे कि फ्लैट में आने वाली वह महिला कौन थी, जिस के होंठों की लिपस्टिक चाय के कप पर लगी थी. वह महिला मृतक की जेब से नकदी व मोबाइल फोन भी ले गई थी.

इसी बीच पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई, रिपोर्ट में बताया गया कि प्रमोद पाटनकर की चाय में काफी मात्रा में नींद की गोलियां मिलाई गई थीं, इस के बाद उन की गला घोंट कर हत्या कर दी गई. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को इस मामले में किसी गहरे षडयंत्र की बू आने लगी.

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जांच अधिकारी ने एक बार फिर घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद दीप्ति पाटनकर से विस्तृत पूछताछ की तो उन्हें दीप्ति के बयानों पर शक हो गया.

लेकिन मामला एक प्रतिष्ठित परिवार से संबंधित होने की वजह से उन्होंने बिना सबूत के हाथ डालना ठीक नहीं समझा. वह दीप्ति की कुंडली खंगालने में जुट गए. इस मामले में उन्हें कामयाबी मिल गई.

43 वर्षीय प्रमोद पाटनकर महाराष्ट्र के जिला रायगढ़ के रहने वाले थे. अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद वह रोजीरोटी की तलाश में मुंबई आ गए थे. मुंबई में छोटामोटा काम करते हुए वह सरकारी नौकरी पाने की तैयारी करते रहे. कुछ दिनों बाद उन्हें भारतीय जीवन बीमा निगम में एक अधिकारी के पद पर नौकरी मिल गई.

नौकरी लगने के बाद प्रमोद के घर वालों ने उन का रिश्ता मीरा रोड के रहने वाले भानुदास भावेकर की बेटी दीप्ति भावेकर से तय कर दिया.

दीप्ति के घर वालों ने इस के पहले उस के लिए अपने संबंधी के लड़के समाधान पाषाणकर को देख रखा था. दीप्ति को भी समाधान बहुत पसंद था. दोनों साथ में मिलतेजुलते भी थे. लेकिन दीप्ति के परिवार वालों को समाधान पाषाणकर की तुलना में प्रमोद पाटनकर सही लगा. इसलिए उन्होंने  दीप्ति की शादी प्रमोद के साथ कर दी.

परिवार और समाज के दबाव में दीप्ति को भी समाधान को भूलने के लिए मजबूर होना पड़ा. दीप्ति भावेकर मुंबई कालेज से एमबीए करने के बाद गोरेगांव के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी करती थी, जहां उसे 25 हजार रुपए सैलरी मिलती थी.

शादी के बाद प्रमोद मीरा भायंदर स्थित शिवदर्शन सोसायटी के फ्लैट में पत्नी के साथ रहने लगे. प्रमोद और दीप्ति की अच्छीखासी सैलरी थी. उन्हें किसी भी तरह का आर्थिक अभाव नहीं था.

पतिपत्नी दोनों सुबह काम पर तो एक साथ निकलते, लेकिन लौटते अलगअलग समय पर थे. दीप्ति दोपहर के बाद घर आ जाया करती थी, जबकि प्रमोद शाम को. जिस प्यार और हंसीखुशी से उन दोनों का दांपत्य जीवन चल रहा था, वह आगे बढ़ते समय को मंजूर नहीं था.

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सन 2014 में समाधान पाषाणकर मुंबई की एक कंपनी के काम से मुंबई आया तो ठहरने के मकसद से दीप्ति के फ्लैट पर पहुंच गया. दीप्ति ने उस का दिल खोल कर स्वागत किया. समाधान दीप्ति की बुआ का बेटा था. दीप्ति उस के साथ बीते दिनों की जिन यादों को भुला चुकी थी, वह फिर ताजा हो गई थीं.

5 टिप्स : सर्दियों में ऐसे करें अपनी खूबसूरती की देखभाल

त्वचा की देखभाल वैसे तो हर मौसम में करनी होती है लेकिन सर्दियों में त्वचा का रूखा सूखा और बेजान होना एक बड़ी समस्या होती है

यहां हम आपको  आसान टिप्स बता रहे हैं जिससे हर वक्त आप खिली खिली नजर आएंगी.

1- चेहरे को हमेशा ठंडे पानी से धोए और नहाने के लिए गुनगुना पानी ही ले. नहाने के तुरंत बाद कोई अच्छा माश्चराइजर लगाए या नहाने के कुछ देर पहले नारियल के तेल से मसाज भी कर सकते हैं . सनस्क्रीन का इस्तेमाल जरूर करें . इसके अलावा नमी बरकरार रखने के लिए गुलाबजल और गिलसरीन मिलाकर एक बोतल में रख दे इसे सोने से पहले चेहरे और हाथ पैरों में लगाए .

2- होठों के लिप बाम या जेल दिन में दो से तीन बार लगाए..  लिपस्टिक लगाने से पहले कोई वैसलीन जेल थोड़ी देर पहले लगा ले .

3- बालों में धोने से दो घंटे पहले औयलिंग जरूर करें.. नारियल का तेल सर्दियों के लिए बेहतर होता है और चाहे तो उसमें थोड़ा नीबू भी मिला ले .

4-सर्दियों में पपीता, केला आसानी से मिलने वाला फल है इसे खाने के साथ साथ चेहरे पर लगा सकते हैं . पके पपीता का एक टुकड़ा, आधा केला और थोड़ा शहद मिलाकर अच्छे से मैश कर ले और चेहरे तथा शरीर के अन्य भागों पर लगा ले, सूखने पर ठंडे पानी से धो ले . पपीते और केले में एंटी आक्सीडेंट, विटामिन ए और अन्य पोषक तत्व होते हैं . ये नमी के साथ साथ एंटी एजिंग का भी काम करते हैं.

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5- इस मौसम में पैरों का भी खयाल रखे.. एड़ियों को स्क्रब से रगड़ कर साफ करें, सोते समय वैसलीन लगाए, साथ ही मोजे पहन कर रखे . घुटने, कोहनी और अन्य सूखी दिखने वाली जगहों पर अलग से दो तीन बार कोई अच्छा क्रीम या मलाई लगा सकती है .

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इन सबके साथ ही हर दिन थोड़ा थोड़ा एक्सरसाइज या वाक भी रूटीन में शामिल करें ताकि आप एक्टिव रहे और एक्स्ट्रा कैलोरीज बर्न होती रहे.. ज्यादा ठंड तो घर के अंदर ही योग बेहतर विकल्प है.. बच्चों को भी खेलने दे बस खेलते समय अच्छे से कपड़े पहनाएं.. धूप निकलने पर सुबह 10 से 15 मिनट जरूर बैठे जिससे विटामिन डी मिलेगा जो हड्डियों को मजबूत बनाता है.. अगर घर में बच्चे है तो उन्हें सुबह की धूप जरूर दिलाए और हो सके तो धूप में ही तेल की मसाज करें .

इस तरह आप सभी चिंताओं से मुक्त सर्दियों का खुशनुमा मौसम इंजौय कर पाएंगी .

परीक्षा के समय बच्चों का ऐसे रखें ध्यान

परीक्षा का समय आते ही बच्चों के साथ साथ अभिभावक भी ज्यादा चिंतित दिखने लगते हैं. बदलते समय के साथ बच्चे पढ़ाई से ज्यादा समय मोबाइल गेम और इंटरनेट की दुनिया पर बिताने लगे हैं. थोड़ा सा खाली वक़्त और हाथ में मोबाइल.. उस पर से जब वक़्त परीक्षा का हो तो अभिभावक के लिए खुद परीक्षा की घड़ी आन पड़ती है कि कैसे बच्चों को पढ़ाई के लिए बैठाया जा सके और उनका मन भी लगा रहे.

1- परीक्षा के समय से कुछ पहले बच्चों को सुबह उठ कर 1 घंटे पढ़ने की आदत डाले और सुबह के ब्रेकफास्ट में कुछ भी उनका मनपसन्द तैयार करें, खाने के लिए जो इनरजेटिक भी हो और इसकी तैयारी रात से ही कर लें.

जब सुबह उठकर पढ़ने की आदत रहेगी तो परीक्षा के समय भी रात का पढ़ा हुआ आराम से दोहराया जा सकेगा.

2- परीक्षा का शेड्यूल तय होते ही उसी हिसाब से टाइम टेबल बना ले, किस विषय कितना पढ़ना है और कौन सा विषय की तैयारी हो चुकी है, ये सब बच्चों से डिस्कस करके टाइम टेबल तय कर ले और पढ़ाई के दौरान थोड़ा खेलने को भी दे ताकि बच्चे बोर न हो . अगर ट्यूटर पढ़ाता हो तो उनसे शेड्यूल बनाए और उनका पढ़ाया हुआ खुद revise भी कराए ताकि पढ़ाई के संबध में बच्चे से आपकी बात भी होती रही.

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3- पढ़ाई के समय बच्चों के खाने पीने का भी खास ध्यान रखें. हेल्दी और हल्का फूड ही खाने को दें ताकि बच्चे को सुस्ती न आए. अगर बच्चा मैगी या पास्ता की मांग करता है तो उसमें सीजनल सब्जियों को डाले.

पानी भी बराबर पिलाती रहे और  लिक्विड डायट में जूस, सूप दिया जा सकता हैं.

4. बच्चों की परीक्षा के समय थोड़ा खुद को भी अनुशासन में रखे, अगर आप वर्किंग वुमन है तो थोड़ा जल्दी आने की कोशिश करें और सोने से पहले उनके पढ़े हुए पर थोड़ा डिस्कस करें और अगर घरेलू महिला है और खुद पढ़ा सकती है तो खुद ही पढ़ाए, इससे ट्यूशन के पैसे तो बचेंगे ही साथ ही बच्चों से ज्यादा कनेक्ट हो पाएंगी.

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