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 क्या कूल हैं ये : भाग 3

चारों तैयार हो कर फिर घर से बाहर चले गए. पूरण को आने से मना कर दिया. लेकिन अगले दिन पूरण फिर 4 बजे ही हाजिर था.

‘‘सब्जीदाल बता दीजिए क्या बनानी है,’’ वह बोला. मैं उसे सबकुछ दे कर, चाय बनाने के लिए कह कर टीवी पर न्यूज सुनने लगी. पूरण ने दोनों को चाय ला कर दी. बरतन भी पूरण ही धोता था. चाय खत्म करते हुए मैं सोच रही थी कि आज तो इसे इत्मीनान से कुछ सिखा ही दूंगी. बच्चे भी नहीं हैं, पर जब तक किचन में आई, पूरण की सब्जी कट कर बन भी चुकी थी.

‘‘माताजी, देखिए, आज कितनी बढि़या तोरी की सब्जी बनाई है मैं ने,’’ पूरण उस हरीपानी वाली बिना टमाटर की तोरी की सब्जी में करछी चलाता हुआ बोला. उस भयानक सब्जी से भी अधिक मेरा ध्यान उस के बोलने पर चला गया, ‘माताजी.’ मैं माताजी सुन कर बुरी तरह चौंक गई. क्या मैं माताजी जैसी दिखने लगी हूं? सासूमां की याद आ गई. उन्हें जानपहचान वाले माताजी कह देते थे. पर मैं? अभी तक तो भारत में किसी ने मु झे माताजी कहने की हिमाकत नहीं की थी. महिलाएं तो आंटी बोलने से ही जलभुन जाती हैं और मु झे यहां दुबई में माताजी?

भाग कर शीशे में देखा, हर एंगल से खुद को. अभी तो ठीकठाक सी ही हूं. सीनियर सिटिजन भी नहीं हुई अभी. टिकट में कन्सैशन भी नहीं मिलता है मु झे अभी तो. और इस आदमी की ऐसी जुर्रत. दिल किया खड़ेखड़े निकाल दूं. किचन में वापस आई.

‘‘माताजी,’’ पूरण खीसें निपोरता दोबारा बोला.

‘‘हां बोलो, भाई,’’ कुढ़ कर, हथियार डालते मैं मन ही मन बोली, ‘तुम्हारा माताजी तो मैं पचा लूंगी, पर तुम्हें निकाल कर अपने बच्चों को कष्ट नहीं दे सकती, खुश रहो तुम.’

इसी बीच दीवाली आ गई. 15 लोगों की मित्रमंडली जमा हो रही थी घर पर. हमारे समय में तो इतनों के खाने का मतलब सुबह से तैयारी. पर बच्चे कितने मस्त थे. उन के पास तो इतने बरतन भी नहीं थे. कुछ थोड़ाबहुत घर में तैयारी की. बाकी खाना बाहर से और्डर हुआ. पेपर प्लेट, डिस्पोजेबल गिलास, चम्मच वगैरह कुछ कम थे. दोनों को ही लाने के लिए कह दिया और हो गई मजेदार हंगामे वाली पार्टी.

पार्टी शुरू हुई तो हम बैडरूम में बैठ गए पर बच्चों ने खींच लिया हमें भी. कुछ बच्चे सौफ्टडिं्रक ले रहे थे तो अधिकतर हार्डडिं्रक. इशिता और रिषभ डिं्रक नहीं करते, लेकिन मित्रमंडली के साथ पूरी मस्ती करते हैं बिना पिए ही. साथ में हंसतेखिलखिलाते, लोटपोट होते देख लगता ही नहीं है कि यह सब पी कर हो रहा है या बिन पिए. छोटीछोटी डै्रसेज पहनने वाली लड़कियां आज दीवाली पर स्टाइलिश साड़ी या दूसरे भारतीय परिधान पहने हुए थीं. इतनी मस्ती तो हम ने भारत में न की थी दीवाली पर.

क्या कूल जनरेशन है. जो समस्याएं हमारे जीवन में थीं, वे तो इन के लिए समस्याएं ही नहीं हैं. दुबई में मेरी स्कूल, कालेज की फ्रैंड सुरभि रहती है. एक दिन वह पूरा दिन मेरे पास बिता गई और एक दिन मु झे उस के पास जाना था, उस के साथ सारा प्रोग्राम फिक्स कर मैं ने डाइनिंग टेबल पर ऐलान कर दिया, ‘‘कल सुरभि के घर जा रही हूं. पूरा दिन बिताने.’’

‘‘किस के साथ?’’ पति महोदय आश्चर्य से बोले.

‘‘अरे ममा, कल क्यों बनाया प्रोग्राम. मैं छोड़ देता आप को किसी दिन. कल तो बहुत बिजी हूं,’’ रिषभ बोला.

‘‘तु झे परेशान होने ही जरूरत नहीं. मैं तो नीचे से टैक्सी ले लूंगी. दुबई तो कितना सेफ है. यहीं जेएलटी में ही तो रहती है वह,’’ मैं इत्मीनान से बोली.

‘‘हांहां, सब को अपने जैसा सम झा है न,’’ समर बड़बड़ाते हुए बोले, ‘‘तुम इतनी सीधीशरीफ हो, अक्ल तो है नहीं तुम में, कोई भी बेवकूफ बना देगा, यहां दुबई में भी.’’

‘‘हां ममा, टैक्सी से तो मैं भी आप को अकेले नहीं जाने दे सकता,’’ रिषभ भी फैसला सुनाता हुआ बोला.

पर पति की बात ने तो भूचाल ला दिया था दिमाग में. शब्द तारीफ में नहीं कहे गए थे. अंदर की लेखिका ने कई पन्ने रंग डाले महिला सशक्तीकरण के पक्ष में. मैं ने सब पर अपनी निगाहें घुमाईं. तीनों मेरे बारे में फैसला कर आराम से खाना खा रहे थे.

‘‘हां, यह तो है कि बीवियों को 25 में भी, अक्ल नहीं होती और 50 में भी पर पता नहीं पतियों को कैसे 25 में भी अक्ल आ जाती है और 50 में तो होती ही है.’’ बुदबुदाते हुए मैं लंबी सांस खींच कर, रोटी का टुकड़ा मुंह में डाल, गुस्से में जोरजोर से चबाने लगी. तीनों अचानक चौंक कर मेरी तरफ देखने लगे. पति भी अपनी भावुक मिजाज की हरदम प्रसन्नचित्त बीवी का ऐसा करारा जवाब सुन कर हतप्रभ थे और दोनों बच्चे अब तक सबकुछ सम झ कर हंसहंस कर बेहाल हुए जा रहे थे. न चाहते हुए भी समर को भी उन की हंसी में शामिल होना पड़ा और उन सब को हंसता देख मैं भी मुसकराने लगी.

‘‘डोंट वरी ममा. कल जल्दी तैयार हो जाना. मैं छोड़ दूंगा आप को,’’ रिषभ हंसता हुआ बोला.

‘‘हां, कल चली जाओ, तुम,’’ समर भी खाना खत्म कर उठते हुए बोले.

‘‘कोई जरूरत नहीं. बात तो गई मेरी सुरभि से. वह मु झे लेने आएगी 11 बजे.’’

‘‘तो आप हमारा इम्तिहान ले रही थीं,’’ इशिता भी मासूमियत से कुनमुनाई.

‘‘और क्या,’’ मैं ठहाका मारते हुए बोली, ‘‘देखना चाहती थी कि मेरे बंदीगृह की दीवारें और कितनी मजबूत हुई हैं, कितने पहरेदार पैदा हो गए हैं मेरे.’’

‘‘अरे नहीं, ममा,’’ रिषभ लाड़ से मु झ से लिपटता हुआ बोला, ‘‘बहुत प्यार करते हैं आप से, इसलिए फिक्र करते हैं आप की. आप को पता नहीं, कितने इंपौर्टेंट हो आप हमारे लिए. कल लेने मैं आ जाऊंगा आप को. जब आने का मन हो, तब फोन कर देना. तभी निकलूंगा औफिस से.’’

‘‘मु झे मालूम है, बेटा,’’ मैं स्नेह से उस की बांह व चेहरा सहलाते हुए बोली.

ऐसे ही हंसतेहंसाते एक महीना कब गुजर गया, पता ही नहीं चला. दुबई का वीजा या तो एक महीने का बनता है या 3 महीने का. यदि एक महीने से एक हफ्ता भी ऊपर रहना है तो फिर वीजा

3 महीने का ही बनाना पड़ता है. आने का समय हो गया. कितना कुछ भर दिया था इशिता और रिषभ ने. अटैचियां निर्धारित वजन से ज्यादा हो रही थीं. उस पर भी अच्छाखासा हंगामा हो रहा था कि क्या रखें और क्या छोड़ें. दुबई के एयरपोर्ट पर साथ में आया कोई भी, सामान के चैकइन काउंटर तक छोड़ने जा सकता है. रिषभ ने सामान चैकइन करवा दिया. अब हमें अंदर सिक्योरिटी को पार करना था. बच्चों को यहीं पर अलविदा कहना था.

दिल तो भावनाओं के ज्वर से उमड़घुमड़ रहा था. पर अपने आंसू सरलता से दिखाने की आदत नहीं है मेरी. इसलिए हंसतेमुसकराते बच्चों से विदा ले रहे थे हम. बच्चे अपनी जगह पर खड़े हाथ हिला रहे थे. और मैं पीछे मुड़मुड़ कर उन की भुवनमोहिनी जोड़ी को मन ही मन अनंत शुभकामनाएं दे रही थी. लेकिन अंदर जाते ही आंखें बरसने लगीं.

मन उदास हो रहा था. पर सोच रही थी बच्चों ने इतने दिन याद न रहने दिया अपनी उम्र को. अपने रंग में रंग दिया हमें. इस युवा पीढ़ी के साथ जिस ने कदमताल कर दिया, उस ने इन का सुख पा लिया. वरना यदि अपने अडि़यल रवैए और अडि़यल विचारों पर अड़ी रहेगी पुरानी पीढ़ी तो यह पीढ़ी इतनी तेज दौड़ रही है कि फासला बढ़ते देर नहीं लगेगी. यह पीढ़ी उन्हीं के लिए कदम धीरे करेगी, जो इन के साथ दौड़ने की कोशिश करेंगे.

यही सब सोचतेसोचते समर और मैं सिक्योरिटी पार कर डिपार्चर लाउंज की तरफ चल दिए.

 क्या कूल हैं ये : भाग 2

40-45 उम्र का अच्छाखासा आदमी लग रहा था. पहले ही दिन पूरा इतिहास जान लिया मैं ने उस का… भारत में कहां का रहने वाला है, परिवार में 2 बड़े बच्चे हैं और कौनकौन है, वगैरहवगैरह.

बेटा हतप्रभ, ‘‘ममा, इतने वक्त में हमें नहीं पता यह कहां का है और आप ने इतनी जल्दी इस की 7 पुश्तें खंगाल डालीं.’’

‘‘ममा लेखिका जो हैं,’’ समर ने चुटकी ली.

मैं दोनों की चुटकियों को अनसुना कर पूरण को खाना बनाते देख रही थी. ‘‘ऐसे क्या बना रहे हो तुम. ऐसे कोई सब्जी बनती है?’’ कुकिंग का बेहद शौक है मु झे. जैसातैसा नहीं खा सकती. इसलिए कामवालों का बनाया खाना पसंद नहीं आता. भारत में आशा के अलावा आउट हाउस में एक परिवार रहता है. इसलिए आशा और सविता के रहतेकाम करने की जरूरत भले ही न पड़े, पर खाना बनाना मेरा प्रिय शगल था. वह मैं किसी पर नहीं छोड़ती हूं.

‘‘तुम ने गैस बंद क्यों कर दी? अभी तो सब्जी भुनी भी नहीं है, पूरण. ऐसा ही खाना खिलाते हो बच्चों को?’’

‘‘अरे ममा, चलो,’’ बेटा मु झे हंस कर खींचते हुए बोला, ‘‘आप को पूरण का बनाया खाना पसंद नहीं आएगा तो बाहर से और्डर कर दूंगा, यहां भारतीय खाना जितना अच्छा और फ्रैश मिलता है, उतना तो भारत में भी नहीं मिलता.’’

मजबूरी में मैं बेटे के साथ आ गई. लेकिन दिल कर रहा था, अभी के अभी इसे पूरी कुकिंग सिखा दूं कि ऐसा खाना खाते हैं मेरे बच्चे.

लेकिन पूरण का बनाया खाना 4-5 दिनों तक खाने की जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि शुक्रवार और शनिवार 2 दिन छुट्टी के थे और उस के बाद भी बच्चों ने कुछ दिनों की छुट्टी ले ली थी. घर से एक बार निकले हम चारों, रात एकडेढ़ बजे से पहले घर नहीं आ पाते थे.

जैसे उम्र का और रिश्ते का अंतर ही नहीं रह गया था चारों में. कितनी शिकायतें हैं आज के समय में इस नई पीढ़ी से सब को. पर इस कूल जनरेशन के रंग में रंग जाओ, तो लगता है जैसे अपनी उम्र से कई साल पीछे लौट गए. कुछ भी याद नहीं रह रहा था. उन्हीं के जैसी बातें, मस्ती, कहकहे और ताकत भी… पता नहीं कहां से आ गई थी. न बच्चे सोच रहे थे कि वे हमें सुबह 11 बजे से रात 11 बजे तक चला रहे हैं और न हम सोच रहे थे. न समय का ध्यान था और न डेट याद रह रही थी.

लग रहा था जैसे चारों दोस्त होस्टल में रह रहे हैं. और सब से बढ़ कर तो घर में मुश्किल से 3-4 साल पहले आई हमारी प्यारी बहू इशिता, उस के साथ महसूस ही नहीं हो रहा था कि वह कभी हम से जुदा भी थी. घूमने जाते तो वह कभी एक बड़ा कप आइसक्रीम ला कर सब को बारीबारी से खिलाती रहती तो कभी कोल्डडिं्रक ला कर सब को पिलाती. वह जूठे तक का परहेज न करती हमारे साथ. उसे देख कर लगता जैसे यहीं जन्म लिया हो उस ने. उस के आचरण से उस के संस्कार भी साफ दिखाई देते और महसूस करा देते कि जब मातापिता तबीयत से बेटी का पालनपोषण करते हैं तो बेटियां भी ऐसे ही प्यार से  2 घरों को जोड़ देती हैं.

छुट्टियां खत्म हो गई थीं और अब कल से बच्चों को औफिस जाना था, इसलिए आज जल्दी वापस आ गए थे. डिनर और्डर कर रहा था रिषभ, मैं बीच में बोल पड़ी, ‘‘चपाती और्डर करने की जरूरत नहीं, रिषभ, मैं बना लूंगी.’’

‘‘क्यों बना लेंगी, ममा. कोई जरूरत नहीं बनाने की,’’ इशिता बोली.

‘‘इसलिए, क्योंकि चपाती तो घरवाली ही अच्छी होती है,’’ मैं किचन की तरफ जाते हुए बोली और बच्चों की बात अनसुना कर चपाती बनाने लगी. डिनर आ गया था. इशिता ने टेबल पर लगा दिया. बच्चे टेबल पर बैठ गए थे और समर वौशरूम में. मैं ने चपाती बना कर बच्चों को दी और फिर गरम चपाती समर की प्लेट में भी रख दी. समर इतनी देर में भी बाहर नहीं आए. मैं तबतक दूसरी गरम चपाती बना कर ले आई थी. समर की प्लेट की चपाती अपनी प्लेट में रख कर मैं ने दूसरी गरम चपाती समर की प्लेट में डाल दी. तब तक समर भी आ गए.

‘‘ये क्या, ममा?’’ रिषभ आश्चर्य से मेरे क्रियाकलाप देखते हुए बोला, ‘‘ऐसा क्यों किया आप ने?’’

‘‘वह वाली थोड़ी ठंडी हो गई थी न,’’ मैं व्यस्त भाव से बोली. रिषभ आश्चर्यचकित हो बोला, ‘‘ठंडी हो गई थी, सिर्फ 2 मिनट में? पापा, वैसे काफी बिगड़ी आदतें हैं आप की.’’ और फिर अर्थपूर्ण मुसकराहट से वह इशिता को देख कर हंसने लगा.

समर खिसिया कर खाना खाने लगे, ‘‘असल में घर में सविता गरमगरम चपाती बना कर लाती है न, तो आदत पड़ गई.’’

पर मेरा मन बल्लियां उछलने को कर रहा था. जो बात वर्षों नहीं बोल पाई थी उस बात को रिषभ ने क्या मजे से कह दिया था. आज के पति कितने कूल हैं. उन्हें फर्क नहीं पड़ता. वे सबकुछ प्लेट में किचन से एकसाथ डाल कर खा लेते हैं. प्लेट न मिलने पर पेपर प्लेट में भी खा लेते हैं. प्रौपर डिनर, लंच न मिले तो बर्गर, मैगी या औमलेटब्रैड से भी पेट भर लेते हैं. ‘सब ठीक है’ के अंदाज में मजे से जीते हैं. खूब कमाते हैं और खूब खर्च करते हैं. पतिपत्नी दोस्तों जैसे रहते हैं. मिलजुल कर कोई भी काम कर लेते हैं.

एक हमारा जमाना था कि मायके तक जाना मुश्किल था. नौकरी करना तो और भी मुश्किल था. ‘खाना कौन बनाएगा?’ जैसी एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या थी पतियों की, जिस से पार पाना कठिन ही नहीं, नामुमकिन था बीवियों का. नाश्ते, लंच, डिनर में बाकायदा पूरी टेबल सजती थी. पत्नी का टैलेंट गया बक्से में और आधी जिंदगी किचन में. मैं मन ही मन हंसहंस कर लोटपोट हुई जा रही थी.

बच्चों को बड़ों से कुछ सीखना चाहिए. पर मेरी सम झ से तो आज के समय में पापाओं को अपने बेटों से सही तरीके से पति बनना सीखना चाहिए. समर बहुत गंभीरता से खाना खा रहे थे और इशिता व रिषभ आंखोंआंखों ही में चुहलबाजी में मस्त थे. मैं मन ही मन इस प्यारी जोड़ी का प्यार देख आनंद से सराबोर हो रही थी.

दूसरे दिन दोनों बच्चे औफिस चले गए. जब इशिता जाने लगी तो मैं उसे लिफ्ट तक जाते देखती रही. बेटी नहीं है मेरी और मैं घर से किसी लड़की को पहली बार यों चुस्तदुरुस्त, स्मार्ट ड्रैस में औफिस जाते देख हुलसिक हो रही थी. इन बच्चियों का साथ दो, सपोर्ट दो, उड़ने दो इन्हें खुले गगन में. इन के पंख मत नोचो. बहुतकुछ कर सकती हैं ये. आज परिवार भी तो कितने छोटे हो गए हैं. किचन में 4 रोटियां बनाना ही तो जीवन में सबकुछ नहीं है.

सही कहता है रिषभ, ‘ममा, आज के समय में अगर बीवी घर पर रहेगी तो घर थोड़ा और ज्यादा सुंदर व व्यवस्थित हो जाएगा. लेकिन यह सब एक लड़की के सपने टूटने की कीमत पर ही होगा न,’ कितनी सम झ है उसे. कितनी बड़ी बात कह गया. दोनों मिल कर फटाफट कई काम कर डालते हैं, एकदूसरे की मुंडी से मुंडी मिला कर कई प्रोग्राम बना डालते हैं और ढेर सारी शौपिंग करने में भी हाथ नहीं हिचकिचाते उन के.

ठीक तो है, पतिपत्नी में आपसी सम झ होनी चाहिए. चाहे फिर पत्नी बाहर काम करे या घर में रहे. सोचती हुई मैं किचन की अलमारियां खोलखोल कर देखने लगी. ‘आज सारी की सारी ठीक कर डालूंगी,’ मैं बड़बड़ाई.

‘‘क्या?’’ समर पास से गुजरे, ‘‘जो ठीक करना है, बाद में करना. पहले कुछ भूख शांत कर दो.’’

‘‘क्या कहा?’’ मैं ने त्योरियां चढ़ा लीं.

‘‘नहींनहीं, पेट की भई. तुम तो हर समय गलत ही सम झ जाती हो.’’ मेरी चढ़ी त्योरियां देख, समर भाग खड़े हुए.

लंच से निबट कर मैं अपने अभियान में जुट गई. एकएक कर सारी अलमारियां व्यवस्थित कर डालीं. फालतू सामान बाहर कर दिया. इन्हीं कामों में शाम हो गई. तब तक रिषभ औफिस से आ गया. मैं किचन में फैले समान के अंबार के बीच बैठी थी.

‘‘यह क्या, ममा, बहुत शौक है आप को काम करने का. यहां भी शुरू हो गईं.’’

‘‘नहीं, देख रही थी कुछ सामान डबल है. कुछ 3-4 डब्बों में रखा है पीछे. शायद, तुम्हें पता नहीं है, वही सब ठीक किया. कुछ खराब भी हो गया, इसलिए बाहर निकाल दिया. अब कुछ खाएगा तू?’’

‘‘नहीं, वह सब मैं खुद कर लूंगा. आप और पापा के लिए भी कुछ बना देता हूं,’’ कह कर रिषभ ने फ्रीजर से कुछ स्नैक्स निकाल कर ओवन में गरम कर के, उन में अपनी कुछ कलाकारी दिखा कर, प्लेट में सजा कर टेबल पर रख दिया. तब तक सबकुछ समेट कर मैं भी आ गई.

तभी घंटी बज गई. इशिता आ गई थी. मैं ने दरवाजा खोला और इशिता को दोनों बांहों में समेट लिया. ‘‘आ गई मेरी गुडि़या.’’ समर ने भी लपेट लिया उसे. इशिता  झूठीमूठी गुमानभरी नजरें रिषभ पर डालती हुई बोली, ‘‘आप को भी किया था ऐसा प्यार? मु झे देखो, कितना प्यार करते हैं ममापापा.’’

‘‘इधर आओ,’’ रिषभ भी हंसता हुआ उसे खींच कर ले गया और अलमारियां दिखाता हुआ बोला, ‘‘जब मैं आया तो ममा यह सब कर रही थीं. मु झे प्यार कहां से करतीं.’’

दोनों ऐसी चुहल कर रहे थे कि हृदय हर्षित हो गया. इशिता बैग एक तरफ रख कर कोल्ड कौफी बना लाई और हम चारों बैठ कर खानेपीने लगे. मैं सोच रही थी कि कितने मजे से लेते हैं ये युवा जिंदगी को. औफिस से आए हैं दोनों, मैं कुछ बना कर देती, उलटा उन्हीं का बनाया हुआ खा रहे हैं. जब हम इस उम्र में थे तो पति लोग औफिस से ऐसे आते थे जैसे पहाड़ तोड़ कर आए हों. ये दोनों ऐसे आए हैं जैसे बैडमिंटन खेल कर आए हों.

हालांकि पता है मुझे कि दोनों पर नौकरियों का तनाव हावी रहता है. पर आजकल के युवा इन तनावों को भूल कर मनोरंजन करना भी खूब जानते हैं. रिश्तेदारों व पड़ोसियों के तानों में उल झ कर, उन की परवाह कर और तनाव नहीं पालना चाहता आज का युवा वर्ग. बस, शायद इसीलिए बदनाम रहता है. जो इन के रंग में रंग गया वह जिंदगी का लुत्फ उठा लेता है. वरना, रुकने का नाम तो जिंदगी नहीं.

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