Download App

‘युवा महोत्सव’ के प्रभाव में डूब गया ‘लखनऊ महोत्सव‘

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के लिये ‘युवा महोत्सव’ का महत्व ‘लखनऊ महोत्सव‘ से अधिक है. इस कारण युवा महोत्सव के लिये 45 साल पुराने लखनऊ महोत्सव को स्थगित कर दिया गया है. योगी सरकार के लिये युवा महोत्सव का प्रभाव इसलिये अधिक है क्योकि यह स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन 12 जनवरी से 16 जनवरी के आयोजित हो रहा है. योगी सरकार के लिये यह हिन्दुत्व और वोटबैंक से जुड़ा मुद्दा है.

केवल कला और संस्कृति का मंच नहीं

‘लखनऊ महोत्सव‘ केवल कला और संस्कृति का मंच नहीं था इसमें लगने वाले स्टाल लोगों के रोजगार का साधन भी थे. पर्यटन विभाग के आंकडे बताते है कि लखनऊ घूमने आने वाले पर्यटको की संख्या सबसे अधिक इस दौरान ही होती रही है. उत्तर प्रदेश की ‘योगी सरकार’ ने 45 साल पुराने ‘लखनऊ महोत्सव‘ को महत्व नहीं दिया. उसके आयोजन के समय में बदलाव किया.

दिसंबर में भी स्थगित हुआ था ‘लखनऊ महोत्सव’

2019 का ‘लखनऊ महोत्सव‘ स्थगित कर दिया गया. पहले यह महोत्सव 25 नवम्बर से 5 दिसंबर के बीच आयोजित होना था. अयोध्या मुकदमें के फैसले के मददेनजर इसके आयोजन के समय को बदल कर जनवरी 2020 कर दिया गया. सारी तैयारी पूरी होने के बाद अचानक 06 जनवरी को ‘लखनऊ महोत्सव‘ के आयोजन को स्थगित कर दिया गया. ‘लखनऊ महोत्सव‘ के स्थगित होने का कारण 12 जनवरी स्वामी विवेकानंद के जन्मदिवस से आयोजित होने वाला ‘युवा महोत्सव’ है. योगी सरकार युवा महोत्सव को पूरे धूमधाम से आयोजित करना चाहती है. युवा महोत्सव की तैयारी में कोई चूक ना हो जाये इस कारण ‘लखनऊ महोत्सव‘ को स्थगित कर दिया गया.

ये भी पढ़ें- नागरिकता कानून : विरोध का साया, क्रिसमस के बाद नये साल पर भी छाया

लखनऊ की पहचान है ‘लखनऊ महोत्सव

‘लखनऊ महोत्सव‘ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की पहचान रहा है. लखनऊ महोत्सव का आयोजन हर साल 25 नवंबर से 5 दिसम्बर के बीच किया जाता है. 10 दिन का यह महोत्सव का आयोजन यूपी पर्यटन विभाग और लखनऊ जिला प्रशासन संयुक्त रूप से करते रहे है. इसमें उत्तर प्रदेश की कला और संस्कृति को प्रर्दशित किया जाता था.

साल 1975 में हुई थी शुरुआत

लखनऊ महोत्सव की शुरुआत सन् 1975-76 में हुई थी. जब दक्षिण एशियाई पर्यटन वर्ष मनाया गया था. लखनऊ में पर्यटन का सबसे अच्छा समय नवम्बर से फरवरी तक होता है. इसको विंटर टूरिज्म से जोड कर देखा जाता है. इस महोत्सव के बहाने देश-विदेश के पर्यटक लखनऊ की कला, संस्कृति और पर्यटन से रूबरू होते रहे है.

पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया शुरू

पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘लखनऊ महोत्सव’ को वार्षिक महोत्सव के रूप में आयोजित करने का निर्णय लिया गया था. जिसके बाद से ही हर साल लखनऊ महोत्सव का आयोजन बड़ी धूमधाम के साथ किया जाता है. नवाबों का शहर लखनऊ अपनी वेशभूषा के साथ-साथ अपनी अदब वाली बोली और विभिन्न प्रकार के खान-पान के लिए भी प्रसिद्ध है. लखनवी कबाब और शाही पान का एक अलग ही स्वाद रहा है. लखनऊ को नवाबी शहर भी कहा जाता है.

ये भी पढ़ें- जेएनयू में एबीवीपी और वाम छात्रों के बीच हुआ टकराव, स्टूडेंट और टीचर हुए

कला संस्कृति ही नहीं रोजगार का भी साधन

लखनऊ की इसी झलक को दिखाने के लिए हर साल लखनऊ महोत्सव का आयोजन किया जाता है. लखनऊ महोत्सव में ना केवल लखनऊ की झलक मिलती है बल्कि, पूरे भारत की संस्कृति यहां दिखती है. इस महोत्सव में कई रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं. यहां लखनवी व्यंजनों, प्रर्दशनियों के साथ एक्का दौड़, पतंग उड़ाने की प्रतियोगिता, मुर्गा लड़ाई और अन्य पारंपरिक ग्रामीण खेलों से दर्शकों को रोमांचित किया जाता है. इनके जरिए लखनऊ में नवाबी रंग फिर से घोला जाता है ताकि लोग यहां की संस्कृति, सभ्यताओं से जुड़े रहें.

‘लखनऊ महोत्सव’ के बहाने केवल कला संस्कृति ही नहीं तमाम तरह के स्टाल लगाकर लोगों को रोजगार के लिये मौका दिया जाता था. जनवरी 2020 में आयोजित होने वाले लखनऊ महोत्सव में स्टाल की संख्या बढ़कर 8 सौ कर दी गई थी. इसमें चिकनकारी के साथ ही साथ उत्तर प्रदेश की मशहूर चीजें यहां मिलती रही है. ‘लखनऊ महोत्सव’ देश-विदेश में काफी प्रसिद्ध है. ‘लखनऊ महोत्सव’ से यहां का पर्यटन बढ़ता रहा है.

ये भी पढ़ें- ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध की आशंका से भारत के व्यापार पर संकट

शुभारंभ: राजा-राजी की शादी में आएगा धमाकेदार ट्विस्ट, क्या कीर्तिदा को रोक पाएगी आशा?

कलर्स के शो शुभारंभ में राजा और रानी की शादी का दिन आखिरकार आ गया है. वहीं राजा की माँ, आशा ने भी कीर्तिदा की योजना पर पानी फेरने की पूरी तैयारी कर ली है, लेकिन कीर्तिदा भी हार मानने वाली नहीं है. आइए आपको बताते हैं कीर्तिदा को रोकने के लिए क्या करने वाली है आशा… 

शादी रोकने की योजना बनाने में व्यस्त है कीर्तिदा

पिछले एपिसोड में आपने देखा कि राजा-रानी जहाँ अपनी शादी से पहले के खुशियों के पलों में खुश होते हैं तो वहीं कीर्तिदा शादी रोकने के लिए चाल चलने की योजना बनाने में व्यस्त होती है. 

raja

ये भी पढ़ें- शुभारंभ: राजा-रानी की खुशियों में आ रही अड़चनों को कैसे दूर करेगी राजा की माँ?

आशा ने किया कीर्तिदा को शादी से दूर

kirtida

कीर्तिदा के शादी को रोकने की योजना को नाकाम करने के लिए आशा एक कदम उठाती है और वह कीर्तिदा को स्टोर रूम में बंद कर देती है, लेकिन राजा कीर्तिदा के बिना शादी की रस्मों को निभाने से मना कर देता है. वहीं आशा पूरे परिवार को ये यकीन दिलाती है कि राजा-रानी की शादी बिना रूकावट के हो जाए, इसलिए कीर्तिदा ने शादी से दूर रहने का खुद ही प्रण लिया है.

शादी की रस्में निभाएंगे राजा-रानी

rani

आज के एपिसोड में आप देखेंगे कि राजा अपनी माँ की बात मानकर शादी की रस्में निभाने के लिए मान जाएगा, जिसके बाद राजा और रानी शादी की रस्मों को निभाते हुए नजर आएंगे. वहीं आशा इस बात से परेशान रहेगी कि कीर्तिदा कहीं कमरे से बाहर न निकल जाए. 

ये भी पढ़ें- शुभारंभ : रानी के परिवार पर लगेगा चोरी का इल्जाम, क्या टूट जाएगी शादी ?

अब देखना ये है कि क्या कीर्तिदा स्टोर रूम से निकलकर राजा और रानी की शादी रोकने में कामयाब हो पाएगी? जानने के लिए देखते रहिए शुभारंभ, सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे, सिर्फ कलर्स पर. 

मिलावट : भाग 2

‘‘मुझे अपने बेटे पर गर्व है,’’ सुमन फिर बोली, ‘‘क्या बताऊं, बीना, बहुत प्यार करता है. असीम को छोड़ कर कहीं चली जाऊं, तो इसे बुखार हो जाता है.’’

मां और बच्चे में प्यार और ममता तो सहज होती है. उसे बारबार अपने मुंह से कह कर प्रमाणित करने की जरूरत भला कहां होती है.

उस रात बीना ने अनायास पति के सामने अपने मन की बात कह दी, तो वे भी गरदन हिला कर बोले, ‘‘हां, अकसर ऐसा होता है. जहां जरा सी मिलावट हो वहां मनुष्य जोरशोर से यही साबित करने में लगा रहता है कि मिलावट है ही नहीं. जो पतिपत्नी घर पर अकसर कुत्तेबिल्ली की तरह लड़ते रहते हैं वे चार लोगों में ज्यादा चिपकेचिपके से रहते हैं. मानो, लैलामजनू के बाद इतिहास में इन्हीं का स्थान आने वाला है.’’

‘‘आप का मतलब सुमनजी को अपने बच्चे से प्यार नहीं है.’’

‘‘बच्चे से प्यार नहीं है, ऐसा तो नहीं हो सकता. मगर कुछ तो असामान्य अवश्य है जिसे तुम्हारी सुमन बहनजी सामान्य बनाने के चक्कर में स्वयं ही असामान्य व्यवहार कर रही थीं, क्योंकि जो सत्य है, उसे चीखचीख कर बताने की जरूरत नहीं होती. और फिर रिश्तों में तो दिखावे की जरूरत होनी ही नहीं चाहिए. अरे भई, पतिपत्नी, मांबेटे, सासबहू, भाईबहन, इन में अगर सब सामान्य है, तो है. प्यार होना चाहिए इन रिश्तों में जो कि प्राकृतिक भी है. उसे मुंह से कह कर बताने व दिखाने की जरूरत नहीं होती. अगर कोई चीखचीख कर कहता है कि उन में बहुत प्यार है, तो सम झो, कहीं कोई दरार अवश्य है.’’

पति के शब्दों पर विचार करतीकरती बीना फिर कमलाजी के बारे में सोचने लगी. मनुष्य लाख अपने आसपास से कट कर रहने का प्रयास करे, मगर एक सामाजिक जीव होने के नाते वह ऐसा नहीं कर सकता. उस का माहौल उसे प्रभावित किए बगैर रह ही नहीं सकता. सुमन कभी कालेज में अपने बेटे का नाम नहीं लेती थी, जबकि कमला बातबात में पति का बखान करती हैं. वह मन ही मन कमला और सुमन का व्यवहार मानसपटल पर लाती रही थी और उस मनोवैज्ञानिक तथ्य तक पहुंचना चाहती थी कि क्या वास्तव में कहीं कोई मिलावट है?

धीरेधीरे समय बीतने लगा था और वह कालेज के वातावरण में रह कर भी उस में पूरी तरह लिप्त न होने का प्रयास करने लगी थी.

एक दिन सब चाय पी रही थीं कि एकाएक कप की चाय छलक कर सुमन की शौल पर गिर गई.  झट से बाथरूम की ओर भागी थी वह.

‘‘नई शौल खराब हो गई,’’ नीमाजी ने कहा.

तब  झट से कमलाजी ने भी कहा था, ‘‘यह वही शौल है जो हम सब ने मिल कर सुमन की शादी पर उसे उपहार में दी थी.’’

उन की बातों को सुन कर बीना तब स्तब्ध रह गई थी. सुमन की शादी में शौल दी थी. यह शौल तो आजकल के फैशन की है, मतलब सुमन की शादी अभी हुई है.

ये भी पढ़ें- दिल की दहलीज पर

बीना चुप थी. उसे बातोंबातों में पता चल गया था कि सुमन की शादी सालदोसाल पहले ही हुई है और वह 20 साल का जवान लड़का, अवश्य सुमन का सौतेला बेटा होगा. इसीलिए सुमन मेहमानों के सामने यही प्रमाणित करने में लगी रहती है कि उसे उस से बहुत प्यार है. मेरा बेटा, मेरा बच्चा कहतेकहते उस की जीभ नहीं थकती.

जीवन के इस दृष्टिकोण से बीना का पहली बार सामना हुआ था. वास्तव में इस जीवन के कई रंग हैं, यही कारण होगा जिस ने सुमन को इतना संजीदा व सम झदार बना दिया होगा.

इतनी अच्छी है सुमन, तभी तो सौतेले बेटे के सामने उस की इतनी प्रशंसा, इतना सम्मान कर रही थी. उस ने इसे दिखावा माना था. हो सकता है वहां दिखावे की ही जरूरत थी. कई बार मुंह से भी कहना पड़ता है कि किसी को किसी से प्यार है. जहां कुछ सहज न हो वहां असहज होना जरूरत बन जाती है.

सुमन से उस ने इस बारे में कोई बात नहीं की थी, परंतु उस के व्यवहार को वह बड़ी बारीकी से सम झने लगी थी. सुमन बेटे का स्वेटर बुन रही थी. जब पूरा हो गया तब अनायास उस के मुंह से निकल गया, ‘‘मैं नहीं चाहती, उसे कभी अपनी मां की कमी महसूस हो.’’

बीना उत्तर में कुछ नहीं कह पाई थी. आंखें भर आई थीं सुमन की.

‘‘सौतेली मां होना कोई अभिशाप नहीं होता. मेरा बच्चा आज मु झ पर जान छिड़कता है. यह डेढ़ साल की अथक मेहनत का ही फल है जो असीम सामान्य हो पाया है. बहुत मेहनत की है मैं ने इस बगैर मां के बच्चे पर, तब जा कर उसे वापस पा सकी हूं, वरना पागल ही हो गया था यह अपनी मां की मौत के बाद.’’

तब बीना ने सुमन का हाथ थपथपा दिया था.

‘‘बीना, हर इंसान का जीवन एक युद्ध है. हर पल स्वयं को प्रमाणित करना पड़ता है. यह जीवन सदा, सब के लिए आसान नहीं होता, किसी के लिए कम और किसी के लिए ज्यादा दुविधापूर्ण होता है. इस तरह कुछ न कुछ कहीं न कहीं लगा ही रहता है.’’

एक लंबी सांस ले कर सुमन बोली, ‘‘ये जो कमला हैं, जिन पर तुम सदा चिढ़ी सी रहती हो, इन के बारे में तुम क्या जानती हो?’’ सुमन की अर्थपूर्ण व धाराप्रवाह बातों को सुन कर बीना की सांस रुक गई थी.

‘‘6 साल का एक बच्चा है उन का. शादी के 4-5 महीने के बाद ही पति ने कमला को तलाक दे दिया, क्योंकि उस का संबंध किसी और युवती से था. कमला कितनी सुंदर हैं, अच्छे घर की हैं, पढ़ीलिखी हैं, मगर जीवन में सुख था ही नहीं.’’

बीना जैसे आसमान से नीचे गिरी. सुमन के शब्दों पर उसे विश्वास नहीं आया.

‘‘पति का नाम लेले कर अगर वे अपने मन का कोई कोना भर लेती हैं तो हमें भरने देना चाहिए. यहां हमारे कालेज में सभी जानते हैं कि कमलाजी तलाकशुदा हैं. मगर वे इस सचाई को नहीं जानतीं कि हम इस कड़वे सत्य को जानते हैं. अब क्यों उन का दिल दुखाएं, यही सोच कर उन की बातों को सुनाअनसुना कर देते हैं.’’

बीना रो पड़ी थी. सुमन के हिलते हुए होंठों को देखती रही थी. बातों के प्रवाह में समुन बहुतकुछ कहती रही थी, जिन्हें उस ने सुना ही नहीं था.

‘‘क्या सोच रही हो, बीना, मैं तुम्हारे सूट की तारीफ कर रही हूं और तुम…’’

कमलाजी के इसी अंदाज पर बीना कितनी पीछे चली गई थी. अपना व्यवहार  झटक दिया बीना ने. नई नजर से देखा उस ने कमलाजी को और मुसकरा कर उन का हाथ थपक दिया.

ये भी पढ़ें- पहचान

‘‘जी कमलाजी, आप ठीक कह रही हैं.’’

कभीकभी उसे सुमन बड़ी रहस्यमय लगती थी. ऐसा लगता था जैसे बहुतकुछ अपने भीतर वह छिपाए हुए है. सुमन किसी भी स्थिति की समीक्षा  झट से कर के दूध पानी अलगअलग कर सारा  झं झट ही समाप्त कर देती है.

ऐसे बनाएं फ्रेंच अनियन ग्रिल्ड चीज

यह स्वादिष्ट सैंडविच प्याज और मक्खन के साथ तैयार की गई है. इसे आप शाम के नाश्ते में बना सकते हैं. तो चलिए जानते हैं, फ्रेंच अनियन ग्रिल्ड चीज की रेसिपी.

सामग्री

स्लाइस ब्रेड (2)

प्याज (150 ग्राम)

तेल  (10 मिली)

एमैंटल चीज (40 ग्राम)

ये भी पढ़ें- ऐसे बनाएं दलिया वेजिटेबल खिचड़ी

बनाने की वि​धि

एक पैन में स्लाइस प्याज को डालकर पकाएं, प्याज़ को कैरमलाइट होने तक पकाएं.

कैरमलाइज प्याज और एमेंटल चीज की लेयर ब्रेड स्लाइस पर लगाएं और सैंडविच पर मक्खन लगाएं और इसे ​ग्रिलर में लगाकर मक्खन पिघलने तक रखें

कैरमलाइज प्याज और एमेंटल चीज की लेयर ब्रेड स्लाइस पर लगाएं.

सैंडविच पर मक्खन लगाएं और इसे ​ग्रिलर में लगाकर मक्खन पिघलने तक ग्रिल करें.

ये भी पढ़ें- मशरूम कटलेट रेसिपी

रोमा के कई रंग : भाग 2

दोनों युवकों ने पीछे मुड़ कर भागने का प्रयास किया तो पीछे से एक ट्रक आ जाने के कारण वे भाग न सके और हड़बड़ाहट में बाइक सहित सड़क के बीच में गिर पड़े. इस के बाद पुलिस टीम ने फुरती के साथ उन्हें पकड़ लिया.

पूछताछ में दोनों युवकों ने अपने नाम पते विकास व कपिल निवासी गांव मांडला, थाना पुरकाजी, मुजफ्फरनगर व हाल निवासी गांव रावली महदूद बताए.

इस के बाद पुलिस दोनों को ले कर रुड़की कोतवाली पहुंची और उन से सुदेश पाल की हत्या की बाबत पूछताछ की. पहले तो विकास और कपिल पुलिस को टरकाते रहे, मगर जब कोतवाल अमरजीत सिंह ने सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने पुलिस के सामने सुदेश पाल की हत्या में अपनी संलिप्तता स्वीकार कर ली. विकास ने पुलिस को जो जानकारी दी, वह इस प्रकार थी.

विकास कई सालों से सिडकुल स्थित महिंद्रा कंपनी में नौकरी कर रहा था. पिछले 4 सालों से अंगरेश नाम की एक युवती उस के मकान में किराए पर रह रही थी. इसी वजह से अंगरेश के भाई अर्जुन व उस की पत्नी रोमा का उस के यहां आनाजाना लगा रहता था.

उसी दौरान विकास की मुलाकात रोमा से हो गई, जो बाद में प्यार में बदल गई. दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए थे. उन के अवैध संबंधों के बारे में जब विकास के घर वालों को पता चला तो उन्होंने उसे समझाया. इस के बाद विकास ने रोमा का साथ छोड़ दिया.

यह बात 2 साल पहले की है. इस के बाद रोमा रावली महदूद छोड़ कर शंकरपुरी में आ कर रहने लगी.

4 महीने पहले गांव शंकरपुरी के आकाश ने विकास को बताया कि रोमा रिश्ते में उस की मौसी लगती है और उस के मन में अभी भी उस के लिए पहले जैसा प्यार है.

ये भी पढ़ें- मकड़जाल में फंसी जुलेखा : भाग 2

यह सुनते ही विकास के मनमस्तिष्क में रोमा की यादें ताजा हो गईं. वह रोमा से मिलने पहुंच गया. नतीजा यह हुआ कि विकास और रोमा दोबारा छिपछिप कर मिलने लगे. इसी दौरान विकास ने रोमा को अपने नाम से खरीद कर एक मोबाइल फोन व सिमकार्ड दे दिया था. रोमा और विकास की मोबाइल पर अकसर बातें होती रहतीं.

एक दिन रोमा ने विकास को बताया कि उस के अपने जेठ सुदेश पाल के साथ भी अवैध संबंध थे, लेकिन अब वह सुदेश पाल को पसंद नहीं करती. जबकि सुदेश पाल अब भी उस के साथ जबरन संबंध बनाने के लिए परेशान करता रहता है.

रोमा ने बताया कि सुदेश पाल को हमारे अवैध संबंधों की भी जानकारी हो गई है. अब वह हमारे बीच में दीवार बन कर खड़ा हो गया है. अगर तुम सुदेश को निपटा दो तो हम दोनों एक हो सकते हैं. रोमा की यह बात सुन कर विकास को गुस्सा आ गया. उस ने अपने दोस्त आकाश व रोमा से मिल कर सुदेश पाल की हत्या की योजना बनाई.

हत्या करने के बाद वे जेल न जा सकें, यानी पुलिस से बचने के लिए उन्होंने यूट्यूब पर हत्या से संबंधित कई वीडियो देखीं. उन से पता चला कि हत्या करने के बाद पुलिस से बचने के लिए क्या करना चाहिए.

पूरी योजना बनने के बाद रोमा ने सुदेश पाल का मोबाइल नंबर भी उपलब्ध करा दिया. योजना के अनुसार इस हत्या में उन्हें किसी लूटे हुए मोबाइल फोन का प्रयोग करना था.

इस बारे में विकास ने अपने परिचित कपिल से बात की तो उस ने पहली सितंबर, 2019 को लूटा हुआ एक मोबाइल फोन उपलब्ध करा दिया. फिर 4 सितंबर को आकाश ने ही उस के व कपिल के साथ जा कर घटनास्थल की रेकी कराई.

आकाश व रोमा ने ही विकास को बताया था कि सुदेश पाल बोरवैल लगाने का काम करता है और तुम भी उसे इसी बहाने अज्ञात जगह ले जा कर उस की हत्या कर देना.

8 सितंबर को विकास व कपिल सुबह 7 बजे काले रंग की पल्सर बाइक से रावली महदूद से चले. शंकरपुरी पहुंचने के बाद विकास ने उसी लूटे हुए मोबाइल से सुदेश पाल को फोन किया और बोरवैल के लिए जगह दिखाने की बात की. धंधे का मामला था, बोरवैल की जगह देखने के लिए सुदेश पाल गांव के बाहर आ गया.

इस के बाद विकास और कपिल सुदेश पाल को अपनी बाइक पर बैठा कर गांव शेरपुर-बाजुहेड़ी मार्ग के निकट एक खेत में ले गए. वहां पहुंचते ही उन दोनों ने क्लच के तार का फंदा बना कर सुदेश पाल के गले में डाल कर उस का गला घोंट दिया. इस के तुरंत बाद उन्होंने चाकू से उस का गला भी रेत डाला. जिस से उन दोनों के कपड़ों पर खून के धब्बे भी लग गए.

गांव रावली महदूद वापस जाते समय उन्होंने अपने कपड़े व चाकू मेहवड़ पुल के पास ईंट भट्ठे की ओर वाली झाडि़यों में छिपा दिए. इस के बाद दोनों पुलिस से छिपते घूम रहे थे.

पुलिस ने दोनों आरोपियों की निशानदेही पर सुदेश पाल की हत्या में प्रयुक्त चाकू, खून से सने कपड़े, काले रंग की पल्सर बाइक तथा हत्या में इस्तेमाल किए गए 3 मोबाइल फोन भी बरामद कर लिए.

इस के बाद एसएसपी सेंथिल अवुदई कृष्णराज एस. ने थाने में प्रैसवार्ता कर के सुदेश पाल हत्याकांड का खुलासा किया और आरोपियों को मीडिया के सामने पेश किया. पुलिस ने रोमा को भी हिरासत में ले लिया. उस ने भी पुलिस के सामने सुदेश पाल की हत्या की साजिश रचने में अपनी संलिप्तता स्वीकार कर ली.

ये भी पढ़ें- एक रोटी के लिए हत्या

अगले दिन यानी 12 सितंबर, 2019 को सुदेश पाल की हत्या का तानाबाना बुनने वाले आरोपी आकाश को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. मृतक सुदेश पाल 5 बेटियों का पिता था. जिन में से वह भारती, आरती व साक्षी की शादी कर चुका था. बेटा न होने के कारण उस ने अपने भाई अर्जुन के बेटे प्रभात को गोद ले लिया था.

कथा लिखे जाने तक आरोपीगण विकास, कपिल, आकाश और रोमा जेल में थे. थानाप्रभारी अमरजीत सिंह इस प्रकरण की जांच पूरी करने के बाद आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में भेजने की तैयारी में लगे थे.

यूं बनाएं घर और औफिस के कामों में तालमेल

मान्या की शादी 4 महीने पहले ही हुई है. वह बैंक में है. पहले संयुक्त परिवार में रह रही थी. इसलिए उस पर काम का बोझ अधिक नहीं था. लेकिन शादी के 2 महीने बाद ही पति का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया. मान्या को भी पति के साथ जाना पड़ा. वह जिस बैंक में थी उस की अन्य शाखा भी उस शहर में थी, इसलिए मान्या ने भी वहां तबादला करा लिया.

दोनों परिवार से दूर अनजाने शहर में रह रहे हैं. यहां मान्या के ऊपर घर व औफिस की दोहरी जिम्मेदारियों का बोझ आ पड़ा. बचपन से संयुक्त परिवार में रही थी. इसलिए उस ने अकेले काम का इतना अधिक बोझ कभी नहीं संभाला था. उस का टाइम मैनेजमैंट गड़बड़ाने लगा. वह घर और दफ्तर के कार्यों के बीच अपना सही संतुलन नहीं बना पा रही थी. धीरेधीरे उस की सेहत पर इस का असर दिखने लगा.

एक दिन अचानक मान्या औफिस में बेहोश  हो गई. उसे हौस्पिटल ले जाया गया. डाक्टर ने बताया कि वह तनाव से घिरी है. इस का असर उस के स्वास्थ्य पर पड़ने लगा है. उस के बेहोश होने की वजह यही है.

1 हफ्ता मान्या ने घर पर आराम किया. कई रिश्तेदार और दोस्त उस से मिलने आए. एक दिन उस की एक खास सखी भी आई, जो मल्टीनैशनल कंपनी में मैनेजर थी. उस ने बताया, ‘‘तुम्हारे तनाव और बीमारी की वजह तुम्हारे द्वारा टाइम को सही तरीके से मैनेज नहीं करना है. वर्किंग वूमन के लिए अपने टाइम को इस तरह से बांटना कि तनाव और डिप्रैशन जैसी स्थिति न आए, बहुत जरूरी होता है.’’

आधुनिक समय में कामकाजी महिलाओं को घर और औफिस की दोहरी जिम्मेदारियां उठानी पड़ रही हैं, जिन में वे उलझ जाती हैं. वे हर जगह खुद को साबित करने और अपना शतप्रतिशत देने की चाह में तनाव की शिकार हो जाती हैं. पति और बच्चों के साथ समय नहीं बिता पातीं. सोशल लाइफ से दूर होती जाती हैं. औफिस में घर की परेशानियां और घर में औफिस की परेशानियों के साथ कार्य करना, ऐसे बहुत से कारण हैं, जो उन की जिंदगी में कहीं न कहीं ठहराव सा ला देते हैं, जो उन की सुपर वूमन की छवि पर एक प्रश्नचिह्न होता है.

ऐसे में जिंदगी में आई इन मुश्किलों का सामना जिंदादिली के साथ किया जाए, तो हार के रुक जाने का मतलब ही नहीं बनता. वैसे भी जिंदगी में सफलता का मुकाम कांटों भरी राह को तय करने के बाद ही मिलता है.

ये भी पढ़ें- लड़कों में क्या खोजती हैं लड़कियां?

दोहरी जिम्मेदारी निभाएं ऐसे

आइए जानते हैं किस तरह वर्किंग वूमन अपनी दोहरी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए दूसरी महिलाओं के लिए कामयाबी की मिसाल बन सकती हैं:

जमाना ब्यूटी विद ब्रेन का है. अत: सुंदरता के साथसाथ बुद्धिमत्ता भी जरूरी है. हमेशा सकारात्मक सोच रखें. नकारात्मक विचारों को खुद पर हावी न होने दें.ऐसी दिनचर्या बनाएं, जिस में आप अपनी पर्सनल और प्रोफैशनल लाइफ को समय दे सकेें.

अपने व्यक्तित्व पर ध्यान दें. अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करें, क्योंकि यह आप के व्यक्तित्व विकास में बाधक बनती है. अपने अंदर आत्मनिरीक्षण करने की आदत विकसित करें. इस के अलावा अपने दोस्तों, शुभचिंतकों से भी अपनी कमियां जानने की कोशिश करें.

वर्किंग वूमन के लिए टाइम मैनेजमैंट बहुत जरूरी है. इसलिए औफिस और घर पर समय की बरबादी को रोकने का हर संभव प्रयास करें. कौन सा कार्य कितने समय में करना है, इस की रूपरेखा मस्तिष्क या लिखित रूप में आप के पास होनी चाहिए.

घर के कामों में परिवार के सदस्यों और बच्चों की मदद जरूर लें. साथ ही अपनी समस्याओं को परिवार के सदस्यों से प्यार से बताएं.औफिस में अकसर आप को आलोचना का शिकार भी होना पड़ता होगा. ऐसी बातों को नकारात्मक ढंग से न लें. अपनी कार्यक्षमता, संयमित व्यवहार और अपने आदर्शों से आप किसी न किसी दिन अपने आलोचकों को मुंह बंद कर ही देंगी.

यदि आप को औफिस में अतिरिक्त जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, तो उन से पीछा छुड़ाने के बजाय उन्हें सकारात्मक तरीके से निभाएं, क्योंकि ऐसी जिम्मेदारियां आप की कार्यक्षमता की, परीक्षा की जांच के लिए भी आप को दी जा सकती हैं.

वीकैंड पति व बच्चों के नाम कर दें. इस दिन मोबाइल फोन से जितनी हो सके दूरी बना कर रखें. बच्चों और पति को उन की फैवरेट डिश बना कर खिलाएं. शाम के समय मूड फ्रैश करने के लिए परिवार के साथ पिकनिक स्पौट या आउटिंग पर जाएं. इस तरह आप खुद को अगले सप्ताह के कामों के लिए फ्रैश और कूल महसूस करेंगी.

औफिस में अपने काम को पूरी ईमानदारी और लगन से करें. लंच में ज्यादा समय न खराब करें. देर तक मोबाइल पर बातें करने से बचें. औफिस में सहकर्मियों से न तो अधिक निकटता रखें और न ही अजनबियों जैसा व्यवहार करें. औफिस में सहकर्मियों के साथ फालतू की बहस से बचें. उन के साथ आप को जादा देर तक काम करना होता है. अत: उन के साथ दोस्ताना संबंध बना कर चलें.

फिस की परेशानियों को घर न लाएं. ज्यादा देर टीवी देख कर या मोबाइल पर बातें कर के समय खराब न करें. जहां तक हो घर जा कर खाना खुद ही बनाएं. रोजरोज बाहर का खाना और्डर न करें. यह आप और आप के परिवार के लिए सही नहीं.

आप की दोहरी भूमिका निभाने में पारिवारिक सदस्यों का सहयोग बहुत ही जरूरी है. इसलिए  व्यवहारिक जीवन में पतिपत्नी को एकदूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और एकदूसरे की परेशानी को हल करने के लिए आपस में काम बांट लेने चाहिए.

आप का अपने लिए भी समय निकालना जरूरी है ताकि आप इस बीच शौपिंग आदि कर के अपना मूड फ्रैश कर सकें. रोजाना औफिस और घर के बीच की भागदौड़ की थकावट आप की सुंदरता कम कर सकती है. इस के लिए पार्लर में जा कर अपने सौदर्य में चार चांद लगाएं. चाहें तो पति को एक दिन के लिए बच्चों की जिम्मेदारी सौंप कर फ्रैंड्स के साथ मूवी देखने का प्रोग्राम बनाएं.

ये भी पढ़ें- कभी प्यार कभी तकरार, मजबूत रिश्ते का यही आधार…

एक महिला के शरीर में मैं बहुत खुश हूं : कियारा नारायण अय्यर

एक ट्रांसजेंडर होने के बावजूद दिल्ली के ललित होटल में पीआर और एग्जीक्यूटिव के रूप में काम करने वाली किआरा ने अपनी इच्छा से लिंग परिवर्तन कराया क्योंकि लड़के के शरीर में वे खुद को कम्फर्टेबल महसूस नहीं कर रही थी. लड़की बन कर वे एक संतुष्ट और जिन्दादिल जिंदगी जी रही है. आइये जानते हैं एक ट्रांसजेंडर के रूप में उन्हें किस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और किस तरह वह आगे बढ़ती गईं .

अपने जीवन के प्रारंभिक दिनों के बारे में बताइये.

मेरा जन्म जुलाई 1988 को कोलकाता में मिडिल क्लास फैमिली में एक लड़के के रूप में हुआ था. मेरी मां बंगाल से और पिता चेन्नई से थे. घर में दोनों तरह के कल्चर का प्रभाव दिखता था. मैं छोटी थी. मुझ से 6 साल बड़ी एक बहन थी. जब मैं क्लास 10 में थी तभी मां को कैंसर डायग्नोज़ हुआ. मैं मां के इलाज के लिए कौल सेंटर में काम करने लगी. मां के गुजरने के बाद पापा को भी कैंसर डायग्नोज़ हो गया. उन दोनों के गुजरने के बाद मैं ने अपने बारे में सोचना शुरू किया.

आप को कब महसूस हुआ कि आप दूसरों से अलग हैं?

मुझे बचपन से ही महसूस होता था जैसे मैं दूसरों से अलग हूं. मुझे लड़कों के साथ घूमना, दौड़भाग वाले खेल खेलना पसंद नहीं था. इस के विपरीत मुझे घरघर खेलना, साड़ी लपेटना , दीदी को तैयार होते देखना ,खाना बनाना ,फीमेल टीचर बनना जैसी बातें पसंद थीं. मुझे लगता था जैसे मैं लड़की के शरीर में एक लड़का हूँ. मुझे लड़के के शरीर में तकलीफ होने लगी थी. मैं दूसरों को धोखा देना नहीं चाहती थी. मैं नहीं चाहती थी कि किसी लड़की से शादी कर मैं उस की जिंदगी खराब करूं और उसे वह सब न दे सकूं जो एक वास्तविक लड़का उसे दे सकता था. सो मैं ने तय किया कि मैं अपना औपरेशन करवाउंगी और वास्तव में एक लड़की बन कर ही जीऊंगी. लोग क्या कहेंगे इस बात की परवाह मुझे नहीं थी.

ये भी पढ़ें- निजी सैक्टर जनता का नहीं खुद का फायदा

आप का लड़के से लड़की बनने का सफर कैसा रहा?

2010 में मैं ने लड़की बनने का फैसला ले लिया था. सोचा था कि दिल्ली आ कर अपना पूरा ट्रीटमेंट करवाउंगी. 2011 से मैं लड़की बन कर बाहर निकलने लगी. दिल्ली में मिस ट्रांसक्वीन इंडिया की डायरेक्टर रीना राय ने मेरा काफी सपोर्ट किया. उन्होंने मुझे होटल ललित के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर केशव सूरी से मिलवाया जिन्होंने इस फैसले को हकीकत में ढालने में मेरी काफी मदद की .

2017 में मेरी सर्जरी हुई और मैं पूरी तरह लड़की बन गई. सर्जरी में 8 से साढ़े 8 लाख तक का खर्च आया. सर्जरी से सिर्फ शरीर और हार्मोन्स ही नहीं बल्कि मेरी आवाज भी बदली गई. आज एक महिला के शरीर में मैं बहुत खुश हूँ.

फिलहाल मैं दिल्ली के होटल ललित में पीआर और मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव के तौर पर काम कर रही हूं. केशव सूरी ने जौब के पहले दिन ही कहा था कि हम ने आप के टैलेंट के आधार पर आप को काम दिया है. आप के कपड़े या जेंडर से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. जैसे आने में आप को अच्छा लगे वैसे आएं.

ये भी पढ़ें- बुढ़ापे में बच्चों का साथ है जरूरी

iyer

आप लोगों को जीवन में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है ?

शुरुआत में जब इंसान मर्द से औरत बन रहा होता है तो ट्राजिसन के उस दौर में काफी समस्याएं आती हैं. इस समय न आप मर्द होते हैं और न महिला. वह दौर बहुत कठिन होता है क्यों कि लोग आप का मजाक उड़ाते हैं.

रिश्तेदारों द्वारा हमारे साथ दोहरा व्यवहार किया जाता है. लोग हमें घिन की नजर से देखते हैं. यह बर्दास्त के बाहर होता है.

हर कम्युनिटी में कुछ अच्छे होते हैं तो कुछ बुरे. किन्नर माइनॉरिटी में आते हैं इस लिए उन के बारे में लाउडली बोला जाता है.

किन्नर जबरदस्ती अपने जैसे बच्चों को उठा कर ले जाते हैं, यह सोच गलत है. दरअसल जब ऐसे बच्चे के घरवाले ही उन्हें अकेला छोड़ देते हैं तभी किन्नर इन्हें अपनाते हैं और अपने साथ रखते हैं.

मुझे लोगों से यह शिकायत है कि वे किन्नरों को उस समय तो बुलाते हैं जब उन्हें दुआएं चाहिए होती हैं. मगर बाकी समय दुत्कार दिया जाता है. यह दोगला व्यवहार क्यों?

ये भी पढ़ें- ‘चंद्रयान 2’: पाकिस्तान ने चंद्रयान को लेकर भारत पर कसा तंज

तुम मेरी हो : भाग 2

चुनमुन का बुखार कम हुआ तो दोनों थोड़ी देर आराम करने के लिए लेट गए. सारांश की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वह रहरह कर शीतल के बारे में सोच रहा था, ‘कितनी दर्दभरी जिंदगी जी रही हो तुम, जैसे कोई फिल्मी कहानी हो. इतनी पीड़ा सह कर भी चुनमुन का पालनपोषण ऐसा कि यह बाग का खिला हुआ फूल लगता है, टूट कर मुर झाया हुआ नहीं.

पुरुष के इतने वीभत्स रूप को देखने के बाद भी तुम मु झ से अपना दर्द बांट पाई. तुम शायद यह जानती हो कि हर पुरुष बलात्कारी नहीं होता. तुम्हारे इस विश्वास के लिए मैं तुम्हारा जितना सम्मान करूं, वह कम है. स्वयं जीवन की नकारात्मकता में जी रही हो और दूसरों को सकारात्मक ऊर्जा दे रही हो. तुम कितनी अच्छी हो, शीतल.’ शीतल को मन ही मन इस तरह सराहते हुए सारांश उस का सब से बड़ा प्रशंसक बन चुका था.

2-3 दिनों में चुनमुन का बुखार कम होना शुरू हो गया. औफिस के अलावा सारांश अपना सारा समय आजकल चुनमुन के साथ ही बिता रहा था. शीतल ने स्कूल से छुट्टियां ली हुई थीं, इसलिए बाहर से सामान आदि लाने का काम भी सारांश ही कर दिया करता था. उस का सहारा शीतल के लिए एक परिपक्व वृक्ष के समान था, फूलों से लदी बेल सी वह उस के बिना अधूरा अनुभव करने लगी थी स्वयं को. स्त्री एक लता ही तो है जो पुरुष का आश्रय पा कर और भी खिलती है तथा निस्वार्थ हो कर सब के लिए फलनाफूलना चाहती है.

चुनमुन का बुखार उतरा तो कामवाली बाई बीमार पड़ गई. दोनों घरों का काम लक्ष्मी ही देखती थी. उस ने शीतल को फोन पर सूचना दी और यह सूचना जब वह सारांश को देने पहुंची तो वह सिर पकड़ कर बैठ गया. रात को उस की मां नीलम का फोन आया था कि वे सुरभि के साथ 2 दिनों के लिए चमोली आ रही हैं. सिर्फ एक सप्ताह के लिए भारत आई थी सुरभि और सारांश से बिना मिले वापस नहीं जाना चाहती थी.

‘‘लगता है दोनों यहां आ कर काम में ही लगी रहेंगी,’’ सारांश ने निराश हो कर शीतल से कहा.

‘‘तुम क्यों फिक्र करते हो, मैं सब देख लूंगी,’’ शीतल के इन शब्दों से सारांश को कुछ राहत मिली और वह घर की चाबी शीतल को सौंप कर औफिस चला गया. सारांश की मां नीलम और सुरभि दोपहर को पहुंचने वाली थीं. शीतल ने चुनमुन की बीमारी के कारण पहले ही पूरे सप्ताह की छुट्टियां ली हुई थीं विद्यालय से.

सुरभि और मां सारांश की अनुपस्थिति में घर पहुंच गईं. शीतल के रहते उन्हें किसी भी प्रकार की समस्या नहीं हुई. सारांश के आने पर भी वह सारा घर संभाल रही थी. चुनमुन भी सारांश की मां से बहुत जल्दी घुलमिल गया.

ये भी पढ़ें- मध्यांतर भी नहीं हुआ अभी

2 दिन कैसे बीत गए, किसी को पता ही नहीं लगा. जाने से एक दिन पहले रात का खाना खाने के लिए शीतल ने सब को अपने घर पर बुलाया. घर की साजसज्जा, खाने का स्वाद, रहने का सलीका आदि से सारांश की मां शीतल से प्रभावित हुए बिना न रह सकीं. बैडरूम में पुराने गानों की सीडी और विभिन्न विषयों पर पुस्तकों का खजाना देख कर सुरभि को शीतल के शौक अपने जैसे ही लगे और वह प्रसन्नता से चहकती हुई हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ का आनंद लेने लगी. चुनमुन सारांश की मां से कहानियां सुन रहा था.

देररात भारी मन से वे शीतल के घर से आए. घर आ कर भी वे दोनों सारांश से शीतल और चुनमुन के बारे में ही बातें कर रही थीं. मौका पा कर सारांश ने शीतल की जिंदगी की दुखभरी कहानी दोनों को सुनाई और शीतल को घर की बहू बनाने का आग्रह किया. किंतु उसे जो शंका थी, वही हुआ. मां ने इस रिश्ते के लिए साफ इनकार कर दिया. सारांश के इस फैसले से सुरभि यद्यपि सहमत थी किंतु मां ने विभिन्न तर्क दे कर उस का मुंह बंद कर दिया. अगले दिन दोनों दिल्ली वापस चली गईं.

वापस दिल्ली आ कर सुरभि 3 दिन और रही मां के पास, और फिर वापसी के लिए रवाना हो गई. मां अपनी दिनचर्या शुरू नहीं कर पा रही थीं. एक तो सब से मिलने के बाद अकेलापन और उस पर सुरभि का पहुंच कर फोन न आना. दिन तो जैसेतैसे कट गया, पर रात में चिंता के कारण उन्हें नींद नहीं आ रही थी. ‘सुबह कुछ तो करना ही होगा,’ उन के यह सोचते ही मोबाइल बज उठा. फोन सुरभि का ही था.

‘‘मम्मा, प्रकृति का शुक्रिया अदा करो कि तुम्हारी बेटी और दामाद सलामत है,’’ सुरभि ने डरी पर राहतभरी आवाज में कहा.

‘‘क्यों, क्या हो गया, बेटा?’’ मां का मुंह भय से खुला रह गया.

‘‘हमारे प्लेन में कुछ आतंकवादी घुस गए थे. अपहरण करना चाह रहे थे वे जहाज का. हमारा समय अच्छा था कि अंदर राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के 3 कमांडो भी यात्रा कर रहे थे. उन्होंने उन शैतानों की एक न चलने दी और हम सभी सुरक्षित अपनेअपने ठिकानों पर पहुंच गए,’’ सुरभि ने एक सांस में ही सब कह डाला. मां ने राहत की सांस ली और उसे आराम करने को कह कर फोन काट दिया.

मां की आंखों से तो जैसे नींद पूरी तरह उड़ गई. ‘क्या होता अगर कुछ अनहोनी हो गई होती? वे दरिंदे यात्रियों की जान ले लेते या फिर महिलाओं के साथ कुछ और…’ यह सोच कर मां का कलेजा कांप उठा. उन्हें सहसा शीतल का ध्यान आ गया, ‘कितनी बेबस होगी वह भी उस रात… कौन चाहता है कि उस की इज्जत तारतार हो जाए?

क्या कुसूर है शीतल या चुनमुन का? शीतल को क्यों यह अधिकार नहीं है कि वह भी बुरे समय से निकल कर नई खुशियों को गले लगाए. क्यों वह उस शैतान का दिया हुआ दुख ढोती रहे जीवनभर.’ सोचते हुए मां ने एक फैसला किया और रात में ही फोन मिला दिया सारांश को.

‘‘कहो मम्मा,’’ सारांश ने ऊंघते हुए फोन उठा कर कहा.

‘‘बेटा, सुरभि ठीक से पहुंच गई है. मैं ने सोचा कि तु झे बता दूं, वरना तू चिंता कर रहा होगा. और हां, एक बात और कहनी है. सुरभि 3 महीने बाद फिर आ रही है इंडिया, उस की सहेली की शादी है. तू भी टिकट ले ले अभी से ही यहां आने का. छुट्टियां जरा ज्यादा ले कर आना. जल्दी ही तु झे भी बंधन में बांध देना चाहती हूं मैं. जिस महीने में जन्मदिन होता है उसी महीने में शादी हो तो अच्छा माना जाता है हम लोगों में. जल्दी ही तारीख बता दूंगी तु झे.’’

ये भी पढ़ें- हनीमून

‘‘अरे मम्मा, क्या हो गया आज आप को? मेरा जन्मदिन तो पिछले महीने ही था न. मैं आप की बात सम झ नहीं पा रहा ठीक से,’’ परेशान सा होता हुआ सारांश बोला.

‘‘तो मैं कब कह रही हूं कि दूल्हे का जन्मदिन ही पड़ना चाहिए उस महीने. दुलहन का भी हो सकता है. शीतल के जन्मदिन के बारे में चुनमुन बता रहा था मु झे उस दिन.’’

सारांश को एक बार तो अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ मां की बात सुन कर, फिर आश्चर्य और हर्ष से मुसकराते हुए वह बोला, ‘‘पर मम्मा, शीतल से तो पूछने दो मु झे.’’

‘‘मैं ने पढ़ ली थीं उस की आंखें,’’ मां ने छोटे से उत्तर से निरुत्तर कर दिया सारांश को.

सुबह होते ही सारांश शीतल के पास पहुंच गया. चुनमुन सो कर उठा ही था. सारांश को देखते ही उस से लिपट गया.

‘‘आज तुम्हारे स्कूल में पेरैंट्सटीचर मीटिंग है न? क्या मैं चल सकता हूं तुम्हारे साथ पापा बन कर?’’ कहते हुए सारांश ने चुनमुन को स्नेहभरी निगाहों से देखा. चुनमुन प्यार से सारांश के गाल चूमने लगा और शीतल भाग गई वहां से. एक कोने में हाथ जोड़ कर खड़ी शीतल की आंखों से टपटप बहते आंसू सारी सीमाएं तोड़ देना चाहते थे.

शीतल मुड़ कर वापस आई तो सारांश के आगे सिर  झुका लिया अपना. सारांश ने मुसकरा कर उस की ओर देखा मानो कह रहा हो, ‘कह दो आंसुओं से कि दूर चले जाएं तुम्हारी आंखों से, तुम मेरी हो अब, सिर्फ मेरी.’

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें