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Holi Social Story in Hindi : पुरानी महबूबा शन्नो के साथ राधेश्याम जी की होली

Holi Social Story in Hindi : इस बार राधेश्यामजी होली में खुद को रोक न पाए. भई महबूबा संग बाथटब में होली मनाने का मौका कोई छोड़ता है भला. उन के दबे अरमान फिर से जाग उठे और फिर निकल पड़े वे सफेद कुरतापाजामा पहने… इधर राधेश्यामजी ने कई सालों से होली नहीं खेली थी. होली पर वे हमेशा घर में ही कैद हो कर रहते थे. एक दिन रविवार को सुबहसुबह राधेश्यामजी का मोबाइल बजा, तो उन्होंने तुरंत हरा बटन दबा कर फोन को कान पर लगाया. उधर से आवाज आई, ‘‘धौलीपुरा वाले राधू बोल रहे हो?’’ राधेश्यामजी ने कहा, ‘‘हां भई हां, बोल रहा हूं. मगर अब मैं धौलीपुरा महल्ले को छोड़ कर ‘रामभरोसे लाल’ सोसाइटी में रह रहा हूं. गंदी नाली और गलीकूचे वाला महल्ला छोड़ गगन चूमते अपार्टमैंट में रहने का मजा ही अलग है और यहां मु झे अब कोई राधू नहीं कहता.

यहां मेरी इज्जत है. इसलिए इस सोसाइटी के लोग मु झे प्यार से राधेश्यामजी कह कर इज्जत से बुलाते हैं. बताइए आप कौन साहिबा बोल रही हैं?’’ फिर उधर से आवाज आई, ‘‘मैं वही जिस के महल्ले की गलियों और कालेज के आसपास तुम चक्कर लगाया करते थे. मैं रिकशे पर बैठ कर कालेज जाती थी, तो तुम अपनी साइकिल पर सवार हो कर आहिस्ता से मु झे छेड़ते और फिल्मी प्रेमगीत गाते हुए निकल जाते थे. होली पर तो हमेशा ही मु झे अकेले में रंगने और मेरे ही आसपास फटकने की कोशिश में लगे रहते थे तुम. कई बार तो होली आने से पहले ही तुम ने मेरे घर की छत पर बने बाथरूम में मु झे पकड़ कर अकेले में मेरे अंगअंग रंगने और मेरे कोमल गाल अपने कठोर गाल से रगड़ने की बुरी कोशिश भी की थी. लेकिन यह सब मैं आज बोल रही हूं, तुम्हारी अपनी शन्नो.’’ ‘‘अरे, अरे… शन्नो. वह तपेश्वरी देवी मंदिर के पास पटकापुर वाली शन्नो. कहो, कैसी हो

आज कैसे याद किया मु झे? तुम्हारी आवाज तो मेरी साली साहिबा से काफी हद तक मिलती है.’’ ‘‘जी जनाब, अपनी साली साहिबा को अब मारिए गोली. हो सकता है मेरी आवाज आप की साली से मिलतीजुलती हो. क्या बताऊं जी, बस, आज अचानक पुरानी यादें ताजा हो आईं. सो सोचा, इस बार तुम्हें होली पर अपने नजदीक बुला ही लूं. वर्षों की देर से ही सही, चलो, जीतेजी तुम्हारे अरमान पूरे कर ही दूं. अब मैं भी इस बार होली पर तुम्हीं संग रंग खेलूं, तुम्हीं संग भीगूं, तुम्हीं संग होली गीत गाऊं, तुम्हीं संग नाचूं, तुम्ही संग गुजिया खाऊं, अरमान रखती हूं.’’ अपनी पुरानी महबूबा शन्नो की बात सुनते ही राधेश्यामजी ने कहा, ‘‘क्या हुआ अकेली हो, तुम्हारा परिवारशरिवार कहां है,

जानू? होली की कविता सुना कर तो तुम ने मेरा दिल फिर से एक बार जीत लिया. जिंदा दिल कर दिया. जानू, होली और फिर से तुम्हारी याद में मेरे दिल के सुस्त पड़े चैंबरों में प्रेम उमंग की हरकत शुरू हो गई है. मेरे शरीर की धमनियों में सूखता जा रहा लाल रक्त भी अब बल्लियों उछलने लगा है.’’ शन्नो बोली, ‘‘मारो गोली परिवारशरिवार को. पहला प्यार तो पहला ही होता है. बाकी सब तो दिखावटी रिश्तेनाते होते हैं. इसलिए मैं भी अब तक तुम को कहां भूल पाई हूं. आ जाइएगा इस बार होली पर हमारे द्वार. इस बार होली के मौके पर कोई भी नहीं है हमारे घर पर. मेरा घर और मैं, बस, एकदम अकेली रहूंगी घर पर. इसलिए जम कर होली खेलने का सुनहरा मौका है. मेरे यहां तो बाथरूम में भी अब बाथटब लगा है. हो जाएगी जम कर उस में चुपचाप रंगमग्न होली.

जरूर आ जाइएगा इस बार हमारे साथ होली खेलने. और हां, नया सफेद कुरतापाजामा पहन कर ही आना तो मु झे रंगने में ज्यादा मजा आएगा. चलो, अब जल्दी से मेरे घर का पता नोट करो.’’ राधेश्यामजी भी अपने उखड़े हुए दांतों के दर्द को भूल और बिना लाठी का सहारा लिए हुए ऐसे उठ खड़े हुए मानो 21 वर्ष के नौजवान हों और बोले, ‘‘बताओ जल्दी से अपना पता, बताओ. आता हूं इस होली पर तुम्हें रंगने और खुद को भी रंगवाने. अपने वर्षों पुराने अरमान पूरे करने का मौका हाथ लगा है. भला कौन कमबख्त नहीं आएगा. मैं वादा करता हूं कि जरूर आऊंगा होली खेलने. दिल खोल कर तैयार रहिएगा.’’ अपनी महबूबा शन्नो से बातचीत करने के बाद राधेश्यामजी मन ही मन चुपचाप सोचने लगे, ‘‘अच्छा ही हुआ कि इतनी उम्र में भी अभी मेरी अक्ल दाढ़ नहीं उखड़ी, बरकरार है.

वरना अक्ल दाढ़ निकलने के बाद तो सभी पुराने रिश्ते पोपले हो जाते हैं. भतीजेभतीजी तक अपनी बूआजी से तो अपने प्रेम का पुराना रिश्ता निभाते हैं और अपने प्रिय फूफाजी को उम्र के 58वें पड़ाव पर चिढ़ाते हुए गाल फुलाफुला कर फू… फां… फू… फां… कहकह कर खाने वाली आटापंजीरी फूंकने और बातबात पर चिढ़ाने लगते हैं. सगे साले और सलहजें भी रिश्ता निभातेनिभाते परेशान हो जाते हैं. वे भी दूरी बना लेने में ही फायदा सम झते हैं. केवल साली ही आधी घरवाली बन कर अपने प्यारे जीजाश्री का साथ निभाती है. अपनी दीदी की मदद में भी अपना हाथ बंटाती है.’’ इधर रसोई में रह कर अपने कान लगाए ड्राइंगरूम में बैठे हुए आहिस्ताआहिस्ता मोबाइल पर बतियाते हुए उन की पत्नी ने सबकुछ सुन लिया, तो वे चायनाश्ते की प्लेट ले कर आते हुए बोलीं, ‘‘अजी इस बार किस के साथ होली खेलने का प्रोग्राम बन रहा है.

आप तो कहते थे मु झे होली बिलकुल भी पसंद नहीं है. मैं ने आप को पिछले कई वर्षों से होली खेलते नहीं देखा. मैं चाहती हूं आप मेरे साथ होली खेलें. लेकिन आप हर साल मना करते ही आ रहे हैं. न खुद होली खेलते हैं और न किसी को खेलने देते हैं. और अब इस बार किस के साथ होली का प्रोग्राम बन रहा था.’’ राधेश्यामजी ने पत्नी को मुसकराहटभरी गोली मारी और बोले, ‘‘अरे, मैं कहां होलीबोली. मेरा प्रमोशन आने वाला न होता तो सीधे ही नए बड़े साहब को मना कर देता. अब बड़े साहब हैं तो उन को मना भी तो नहीं किया जा सकता. ऊपर से प्रमोशन के बाद पोस्ंिटग का भी सवाल है. कहीं सूदूर क्षेत्र में भेज दिया तो तुम्हारामेरा साथ बिछुड़ जाएगा और मु झे वहां अकेले ही रहना पड़ेगा. सूदूर डिफिकल्ट स्टेशनों पर फैमिली रखना मना होता है. बस, इसलिए उन से होली खेलने, उन के घर आने की हां करनी पड़ी. बड़े साहब से ही बात हो रही थी. वही बुला रहे हैं मु झे होली पर और कह रहे हैं,

मैं इस बार होली का पहला रंग तुम से ही लगवाऊंगा. होली पर हमारे घर जरूर आना, वह भी नया सफेद कुरतापाजामा पहन कर.’’ होली के दिन राधेश्यामजी ने नया सफेद कुरतापाजामा पहना और पत्नी से बोल कर होली खेलने जाने लगे, तो उन की पत्नी बोलीं, ‘‘अकेले मत जाइए. पिंटू को भी लेते जाइए. यह आप को गाड़ी में ले जाएगा और बड़े साहब के साथ होली खेलने के बाद सावधानी से घर वापस भी ले आएगा.’’ जैसेतैसे उन्होंने पत्नी को मना किया कि रहने दो, पिंटू को क्यों तंग करती हो. उस की परीक्षा नजदीक है, उसे पढ़ने दो. वहां किसी ने गीले रंगों से रंगवंग दिया और खांसीजुकाम हो जाएगा और कहीं जुकाम छाती तक पहुंच गया तो भयंकर बुखार से पीडि़त भी हो सकता है.

फिर उस की परीक्षा चौपट हो जाएगी. वैसे भी होली तो हर साल आती है. विज्ञान में एक बार फेल हो गया, तो खामख्वाह ही साल बढ़ जाएंगे. सेहत अलग से खराब होगी, सो अलग. राधेश्यामजी ने उम्र की अंतिम पारी से पहले फिर से अपनेआप को रोमांचभरे उत्साह से भरा और अकेले ही चल पड़े अपनी पुरानी शन्नो के घर की तरफ. मन में शन्नो के शब्द गूंज रहे थे, ‘जरूर आ जाइएगा इस बार हमारे साथ होली खेलने. तुम्हीं संग रंग खेलूं, तुम्हीं संग भीगूं, तुम्हीं संग होली गीत गाऊं, तुम्हीं संग नाचूं, तुम्ही संग गुजिया खाऊं.’ अपनी पुरानी महबूबा शन्नो के बाथरूम में लगे बाथटब को सोचते हुए उन का पैर धम्म से गली की नाली में जा धंसा और छपाक से ‘छपाक’ की आवाज के साथ नाली का गंदा कीचड़युक्त पानी उन के पाजामे व कुरते को बदरंग कर गया. तेज बदबू सी भी आ रही थी, सो अलग. ‘उफ, उफ,’ कहते हुए उन्होंने अपनेआप को और अपने बढ़े नंबर वाले चश्मे को संभाला और वापस अपने घर की तरफ लपके. घर पहुंच कर पत्नी से बोले, ‘‘भागवान, दूसरा नया सफेद कुरतापाजामा निकालो.

यह तो रास्ते में ही बदरंग हो गया. बड़े साहब ने कहा था नया सफेद कुरतापाजामा ही पहन कर घर आना. अब ऐसे गया तो क्या सोचेंगे कि बड़ा नालायक है, जरा सा कहना तक नहीं मानता, कैसे करूं इस का प्रमोशन.’’ पत्नी उन से ज्यादा सम झदार थीं, सो बोलीं, ‘‘मु झे पता था इसलिए मैं ने पहले से ही आप के लिए एक जोड़ी दूसरा नया सफेद कुरतापाजामा और काला बुरका रख रखा था. लो, इसे पहन लो. काले बुरके में जाओगे तो गली का टुच्चा बदमाश हो या फूफा, कोई भी तुम पर रंग नहीं फेंक सकेगा. कुरतापाजामा साफ रहेगा तो आप के बड़े साहब भी आप को देख कर खुश हो जाएंगे.’’ पत्नी साहिबा की सम झदारी पर उन्होंने मधुर सहानुभूति जताते हुए उन के गाल पर सूखा हाथ कोमलता से फेरा, तो वे शरमा गईं, बोलीं, ‘‘आज इतने वर्षों बाद आप का प्यार पा कर मैं धन्य हो गई.

वरना आप के हाथ में अब वह दम कहां जो पहले कभी मेरे पूरे शरीर को स्पर्श मात्र से ही आनंदित कर देते थे. मैं आप का प्यार पा कर अनेक बार बिस्तर पर दोहरी हो जाती थी. और आप का उत्साह मु झे अपनी बांहों में कस कर जकड़ लेता था. लेकिन अब तो होली हो या दीवाली, आप की मीठी जबान भी तीखी कटार लिए सब पर सवार रहती है.’’ राधेश्यामजी ने कहा, ‘‘अरे नहीं, नहीं पगली, छोड़ दो पुरानी बातों को. ताना मत मारो. आज होली है. बड़े साहब के यहां से होली खेल कर आने दो, तुम्हारे साथ भी जम कर खेलूंगा होली. तुम्हें फिर से उत्साह से भर दूंगा. तुम फिर से मचल उठोगी.’’ अपनी पत्नी को बहलातेफुसलाते हुए राधेश्यामजी ने मौके की निजी नाजुकता को सम झा और नया सफेद कुरतापाजामा व बुरका पहन सीधे भाग चले अपने बड़े साहब यानी पुरानी महबूबा शन्नो के घर की तरफ.

राधेश्यामजी ने अपनी पुरानी महबूबा शन्नो के दरवाजे पर पहुंच कर डोरबेल बजाई और दरवाजा खुलने का इंतजार करने लगे. तभी छत पर से किसी ने लोहे के हुक लगी हुई डोरी उन के ऊपर ऐसे डाली कि उस डोरी में लगा हुआ लोहे का हुक सीधे उन के बुरके में जा फंसा और डोरी खींचने पर पूरा बुरका ऊपर की तरफ उठ गया. तभी यह क्या था, उन के सफेद कुरते पर ‘छपाक’, ‘छपाक’ तमाम सारे गोबर, कीचड़, तारकोल, मिट्टी और न जाने क्याक्या के ढेलों का धमाल, धमाधम, धमाधम ठाकठाक, पट्टपट्ट हो उठा. जैसेतैसे उन्होंने अपनेआप को संभाला. पीछे की तरफ हटे तो उन का पैर खटाक से कीचड़ वाले गड्ढे में जा गिरा. फिर उठने के लिए हुए तो उन की चप्पलें कीचड़ में ऐसी धंसी कि जड़ ही हो गईं. जैसेतैसे उन्होंने अपनी चप्पलों को कीचड़ को समर्पित कर अपने पैर बाहर निकाले और नंगे पैर अपने आगे से गीले और पीछे से कीचड़ से चीकट हुए पाजामे को संभालते हुए अपनी पुरानी महबूबा शन्नो के खयालों के साथ आगे बढ़े, तो उन्हें अपनी बदरंग हालत पर तरस आया और वह महबूबा के घर का दरवाजा खुलने से पहले ही मुड़ कर जाने लगे.

तो पीछे से आवाज आई, ‘‘बुरा न मानो जीजाजी, होली है.’’ राधेश्यामजी ने पीछे मुड़ कर देखा. उन की साली साहिबा और पत्नी अपने हाथों में रंगगुलाल लिए खड़े थे. उन के मुड़ते ही वे सब उन को रंगनेपोतने में जुट पड़े और साली साहिबा ने उन्हें पकड़ कर उन की पत्नी के साथ सीधे ही बाथरूम में ले जा कर बंद करते हुए उन के पजामे का नाड़ा जोर से खींचते हुए कहा, ‘‘जीजाजी, अब लीजिए मेरी दीदी के साथ बाथटब का मजा और फिर इस बार नव होली मनाइए. उन्हें शीतल कर रतिरंग कर दीजिए. मैं अभी आप के लिए स्पैशल जौहर इश्क अंबर, अश्वगंधा, शिलाजीत और श्वेत-मूसलीयुक्त एक गिलास गरम दूध ले कर आती हूं. उस में मिली स्पैशल जौहर इश्क अंबर नामक जड़ीबूटी पहली सुहागरात के दिन की तरह चुस्तदुरुस्त कर देगी आप और आप के ढीले पड़े शरीर के अंगअंग को.

मुझे यकीन है, आप आज सदा के लिए भूल ही जाएंगे अपनी पुरानी महबूबा शन्नो को. अब तो आप दीदी को ही शन्नो मान कर होली खेलिए. दीदी तो हमेशा तैयार रहती हैं आप के साथ मलमल कर, पकड़पकड़ कर और रगड़रगड़ कर होली खेलने के लिए. आप हैं कि कभी उन की सुनते ही नहीं.’’ ‘‘बाथटब में होली खेल कर राधेश्यामजी बाहर निकले तो उन्होंने पूछा, यह सब किस की योजना थी तो उन की साली साहिबा बोलीं, ‘‘दीदी ने मु झे बताया कि एक रात बिस्तर पर आप ही तो सपने में बड़बड़ा रहे थे. मेरी शन्नो, मैं आज भी तुम्हारे साथ होली खेलने का अरमान रखता हूं.

तुम्हीं तो मेरे जमाने की मेरी प्रिय प्रेमिका हो. इस बार मु झे बुला लो अपने पास होली खेलने के लिए. और कवितारूप गुनगुना रहे थे, तुम्हीं संग रंग खेलूं, तुम्हीं संग भीगूं, तुम्हीं संग होली गीत गाऊं, तुम्हीं संग नाचूं, तुम्ही संग गुजिया खाऊं.’’ प्रिय जीजाजी, बस, आप की कविता सुन कर हम दोनों ने मिल कर यह ‘समृद्ध होली खेलो’ योजना बना डाली. राधेश्यामजी ने कहा, ‘‘अरे ऐसा नहीं हो सकता. मैं तो सपने देखता ही नहीं हूं. और कविता करना तुम्हीं संग रंग खेलूं, तुम्हीं संग भीगूं, तुम्हीं संग होली गीत गाऊं… तो मेरे बस से बाहर की बात है. मैं सपने देखता भी हूं तो कभी बड़बड़ाता नहीं हूं. ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है.’’ इस बात पर कमलपुष्प समान हंसती हुई साली साहिबा बोलीं, ‘‘रहने दीजिए जीजाजी, आजकल मोबाइल का जमाना है. दीदी ने आप की सारी बड़बड़ाहट और गुनगुनाहट की रिकौर्डिंग कर रखी है.

कहें तो सुनाऊं.’’ ‘‘चलचल, बस कर अब रहने भी दे,’’ कह कर राधेश्यामजी ने अपनी साली साहिबा से कहा, ‘‘चलो, अब सभी बच्चों को भी यहां बुला लेना चाहिए. आज बहुत दिनों बाद फिर से होली की पार्टी करते हैं और महल्लेभर में शाम को सभी के घर जाजा कर होली की हार्दिक बधाई देते हैं.’’ इस बार साली साहिबा बोलीं, ‘‘मेरे प्यारे भोलेभाले जीजाजी, सुना है मेवाड़, राजस्थान की कवयित्री मीराबाई को तो एक नजर में श्याम से प्यार हो गया था. दीदी को तो राधे और श्याम दोदो रूप में आप यानी राधेश्याम मिल गए. बड़ी भाग्यशाली हैं वे. इस होली के बाद मु झे भी कहीं किसी के संग सदा के लिए बांधिए ना. वरना कहीं ऐसा न हो कि मैं आप संग ही सदा के लिए यहीं न रह जाऊं.’’

राधेश्यामजी और उन की पत्नी ने जैसे ही सुना तो दोनों एकसाथ बोले, ‘‘चल पगली, चिंता मत कर. तेरे हाथ भी अब जल्दी ही पीले कर दिए जाएंगे. अगले महीने तु झे देखने वाले आ रहे हैं. कानपुर चटाई महल्ले वाले चाचा के जानकार हैं. लड़का एमटैक टैक्निकल डायरैक्टर है.’’ तब तक उधर राधेश्यामजी के बच्चे भी सामने आ चुके थे. उन्होंने सर्फसाबुन का पाउडर घोला. उस में गहरा पक्का पीला रंग मिलाया और पूरी पीलीपीली झागयुक्त पक्के रंग की बालटी अपनी मौसी के ऊपर उड़ेल दी और कहा, ‘‘लो मौसी, हमारा इरादा तो आप के केवल हाथ ही नहीं, पूरा पीला कर के ही आप को ससुराल भेजने का है. ताकि आप वहां सदा पीलीपीली ही रहना, यहां की तरह बातबात पर तुनकतुनक कर किसी से भी लालपीली कभी मत होना.’’ बच्चों की बात सुन कर राधेश्यामजी का पूरा परिवार हंसी के ठहाके लगा कर होली की खुशियां लुटाने लगा. इस बार उन की साली साहिबा भी पीला गुलाब बन मंदमंद मुसकरा कर शरमा उठीं. Holi Social Story in Hindi

Holi 2026 : होली पर बनाएं ये टेस्टी रसमलाई

Holi 2026 : होली के त्यौहार पर घर-घर में तरह-तरह के पकवान बनते है. इस त्यौहर पर आप रसमलाई ट्राय कर सकते हैं. आइए बताते हैं, टेस्टी रसमलाई  की रेसिपी.

पनीर के लिए सामग्री

– 2 लीटर फुल क्रीम दूध

– 1/4 कप नींबू का रस या सिरका

रसमलाई का ’रस’

– 600 मिली फुल क्रीम दूध (लगभग 2.5 कप)

– 1.25 कप मिल्क पाउडर

– 1/3 कप चीनी

– 3 बड़े चम्मच कतरे हुए सूखे मेवे (बादाम, पिस्ता)

– 1/8 चम्मच केसर तंतु

– 1/2 छोटा चम्मच इलाइची पाउडर

चाशनी

– 2 कप पानी

– 1 कप चीनी

– 1 चम्मच गुलाब जल या केवड़ा एसेंस

बनाने की विधि

– एक भारी तले वाले पैन में दूध उबालें.

– जब दूध पर झाग बनने लगे और ऊपर से बुलबुले आने लगे तो दूध को फाडऩे के लिए सिरका/नींबू का     रस डाल दें.

– जब फटा या गाढ़ा हुए दूध पीला पड़ने लगे तब पैन को आंच से हटा लें.

– मलमल के कपड़े के साथ इसे छान लें.

– सिरका / नींबू के रस के स्वाद से छुटकारा पाने के लिए छेने को ठंडे पानी के नीचे धोएं.

– ठोस छेने को अच्छी तरह निचोड़ें और पानी निकलने दें.

– आप पनीर / छेना को 20- 30 मिनट तक कपड़े में अच्छी तरह बांध कर कहीं लटका भी सकते हैं जब     तक कि पानी टपकना बंद न हो जाए.

पनीर को सानना

– छेने को अपनी हथेलियों और उंगलियों दोनों से 10 मिनट के लिए गूंध कर नरम लोइे में बदल दें.

– लोई के छोटे हिस्से लें और चपटी बौल्स बनाने के लिए धीरे से अपनी हथेलियों के बीच दबाएं.

इन बौल्स को एक तरफ रखें.

– एक पैन में पानी और चीनी मिलाएं और इसे उबाल लें.

– धीरे-धीरे छेने के चपटे टुकड़ों को चाशनी में डालें.

– टुकड़ों को तैरने की जगह देते हुए चाशनी में डालें.

– आंच को थोड़ी कम कर दें, तब तक प्रतीक्षा करें जब तक कि टुकड़े ऊपर तैरने न लगें.

– जब सभी टुकड़े तैरने लगें, पैन को ढक्कनसे ढक दें और इसे मध्यम आंच पर 3-4 मिनट तक उबलने       दें और आंच से उतारें और ठंडा होने दें.

– एक चपटा छैना लें और सारी चाशनी को निचोड़ लें,  धीरे से दबाएं और जब सारी चाशनी निकल जाएगी  तो पनीर के टुकड़े अपने मूल आकार में वापस आ जाएंगे और इसे एक तरफ सेट करें.

– सभी सामग्री एक जगह करें, एक भारी तली की कड़ाही में दूध डालकर उबाल लें.

– चीनी, केसर स्ट्रैंड्स और मिल्क पाउडर मिलाएं और इसे अच्छी तरह मिश्रित होने दें.

– मध्यम आंच पर लगातार चलाते हुए उबालें.

– पतले कतरे हुए नट डाले, हिलाते हुए मिलाते रहें और दूध  को 20-25 मिनट तक उबालें.

– जब एक बार दूध वांछित स्तर तक गाढ़ा हो जाए, यानी न तो बहुत ज्यादा गाढ़ा और न ही बहुत पतला तो   पनीर की बौल्स को इसमें धीरे-धीरे करते हुए डाल दें.

– 1-2 मिनट के लिए गर्म रस में पनीर बौल्स को उबलने दें.

– इसे आंच से उतार लें, ढक दें और उन्हें रस में अच्छी तरह भीगने दें.

– बाद में इसे किसी बड़ी कटोरी में डाल कर ठंडा होने के लिए रख दें.

– अगले दिन खाने में सबसे अच्छा स्वाद आएगा और ठंडा-ठंडा परोसें. Holi 2026

Holi 2026 : अब वैसी होली कहां

Holi 2026 :

दरवाजे पर पहुंचते ही मैं ने जोर से आवाज लगाई, ‘‘फूफाजी?’’

बाहर दरवाजे पर खड़ी बूआजी ने माथे पर बल डाल कर कहा, ‘‘अंदर आंगन में बैठे हैं. जाओ, जा कर आरती उतार लो.’’

फूफाजी ने सुबह से ही टेलीफोन पर ‘जल्दी पहुंचो’, ‘फौरन पहुंचो’ की रट लगा रखी थी. जाने क्या आफत आन पड़ी है, यही सोच कर मैं आटो पकड़ उन के घर पहुंचा था.

फूफाजी आंगन में फर्श पर बैठे थे. उन के सामने स्टोव पर रखे बरतन में पानी उबल रहा था. पास ही सूखे रंगों की डब्बियां और प्लास्टिक की 3-4 बोतलें नीले, पीले, हरे, लाल रंगों से भरी हुई रखी थीं. पैरों के पास सफेद कपड़े के कुछ टुकड़े थे जिन पर रंगों से धारियां खींच कर उन्हें परखा गया था.

‘‘अरे, फूफाजी, आप ने कपड़े रंगने का काम शुरू कर दिया क्या?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘तुम्हारे खानदान के सभी सदस्य क्या उलटी खोपड़ी के ही हैं?’’ अजीब सा मुंह बना कर फूफाजी बोले, ‘‘बूआभतीजे को क्या मैं रंगरेज नजर आता हूं? अगर कभी रोटी के लाले पड़ भी गए तो भीख मांगना मंजूर कर लूंगा मगर ऐसा घटिया काम नहीं करूंगा.’’

‘‘वाह, कितने ऊंचे विचार हैं,’’ बूआजी आंगन में आ गईं और मेरी ओर मुंह कर के बोलीं, ‘‘देख लो बेटा, इन्हें अपने हाथ की मेहनत की कमाई भीख मांगने से भी बुरी लगती है.’’

‘‘बुरी तो लगेगी ही,’’ बूआजी की ओर देख कर फूफाजी बोले, फिर मेरी ओर मुंह फेर कर कहने लगे, ‘‘बेटा मनोज, जरा सोचो, जिस खानदान ने ताउम्र मेहनत से जी चुराया हो…मेरा मतलब है जिस खानदान में मामूली काम के लिए भी नौकर रखे जाते थे उस खानदान का नाम लेवा, यानी कि तुम्हारा यह फूफाजी ऐसा घटिया काम कर सकता है?’’

‘‘अपने हाथों की मेहनत की कमाई तो गिरा हुआ काम नहीं है,’’ मैं ने उन्हें समझाना चाहा था.

‘‘हां, अब सही बात मुंह से निकल गई न. अरे, जब मैं दोनों हाथों से रिश्वत लेता हूं तो तुम लोग उसे बुरा क्यों कहते हो?’’

‘‘बेईमानी, रिश्वतखोरी और मेहनतमजदूरी इन की नजर में सब एक बराबर हैं,’’ बूआजी तमक कर बोलीं, ‘‘कभी आप ने किसी मेहनत करने

वाले को कानून की पकड़ में आते देखा है?’’

‘‘क्यों नहीं देखा. ये चोर, डाकू, लुटेरे, स्मगलर क्या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं? बेचारे जीतोड़ मेहनत करते हैं, अपनी जान को जोखिम में डाल कर अपना धंधा चलाते हैं और अभी माल समेट भी नहीं पाते कि धर लिए जाते हैं.’’

बूआ और फूफा के वाक्युद्ध का सिलसिला कोई भयानक रूप ले उस से पहले उस का रुख मोड़ते हुए मैं ने कहा, ‘‘फूफाजी, आप ने मुझे क्यों बुलाया था, और यह आप कर क्या रहे हैं?’’

‘‘बेटे, होली के लिए मेल खाते रंग बनाने में तुम्हारी सलाह चाहिए.’’

‘‘होली में तो अभी 4 दिन पड़े हैं.’’

‘‘और ये 4 दिन पहले से ही आफिस से छुट्टी ले कर रंग बनाने बैठ गए हैं,’’ बूआजी ने बतलाया.

‘‘अरी भागवान, तुम क्या जानो कि पहले होली किस धूमधाम से मनाई जाती थी. एक सप्ताह पहले से ही रंगों की बौछार और लाल गुलाल हवा में उड़ने शुरू हो जाते थे. और आजकल एक दिन की होली, वह भी घंटा आधा घंटा रंग के छींटे छिड़काए और फिर नहाधो लिए,’’ फूफाजी कहते गए, ‘‘उस जमाने में होली मनाने का जोश ऐसा होता था कि सब कामकाज बंद, दफ्तर, दुकानों में बस, होली के रंग और हुड़दंग.’’

बूआजी के साथ मैं भी फूफाजी को देख रहा था. उन्होंने स्टोव पर उबलते पानी में एक डब्बे से चम्मच भर रंग डाला, आंच कम की, फिर 2 और डब्बियों से आधाआधा चम्मच कुछ डाला और स्टोव बंद कर दिया.

‘‘अब मेरे छोटे भाई की शादी की बात ले लो,’’ फूफाजी हमारी तरफ मुंह कर के कहने लगे, ‘‘शादी का मुहूर्त होली से एक दिन पहले का था. बरात लड़की वालों के गांव जानी थी मगर होली के कारण कोई गांव वाला बरात में जाने को तैयार नहीं था. हर रिश्तेदार, कुनबे के लोग और गांव वालों को घरघर जा कर बरात में शामिल होने का न्योता दिया गया मगर होली की वजह से कोई बराती बनने को राजी नहीं…’’

‘‘उंह, वह होली के कारण नहीं,’’ बूआजी कहने लगीं, ‘‘गांव वालों ने तुम्हारे चाचाजी से झगड़े को ले कर बरात में जाने से इनकार किया था,’’ बूआजी ने याद दिलाया, ‘‘उस झगडे़ में लाठियां भी तो चली थीं.’’

‘‘लाठियां नहीं गोलियां चली थीं,’’ फूफाजी उबल पड़े, फिर मेरी ओर मुंह कर के बोले, ‘‘मनोज बेटा, गांव वालों से मामूली कहासुनी हो गई थी जिस में सुलहसफाई करवाने के लिए हमारे ताऊजी लाठी टेकते हुए गए थे. अब धक्कामुक्की में उन के हाथ से लाठी छूट कर गिरी तो आप की बूआजी ने उस ‘लाठी गिरने को’ लाठी चलाना बना दिया.’’

‘‘फिर आप लोग सिर्फ  दूल्हे के साथ ही लड़की वालों के घर पहुंच गए थे?’’

‘‘अरे, नहीं, भला ऐसे कोई बरात सजती है,’’ फूफाजी बोले, ‘‘बड़ी मुश्किल से लड़की वालों को समझाया कि बराती वहां रंग खेलेंगे तभी दूल्हा मंडप में बैठेगा.’’

‘‘फिर?’’

‘‘अब वहां दूल्हादुलहन मंडप में बैठे थे और बराती रंग खेल रहे थे. अपनेपराए का कोई भेद नहीं, जो भी सामने पड़ा रंग डाला. लड़की के बाप, भाई, मां, ताई, बहनें, भाभी, संबंधी, हलवाई, यहां तक कि बरात का स्वागत करने वालों तक के कपड़े रंगीन कर दिए.’’

फूफाजी झूम कर बता रहे थे कि मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘तो फेरे करवाने वाले पुरोहित पर भी रंग डाला?’’

‘‘उन के तो धोतीकुरता, रामनाम का अंगोछा, पोथीपत्रा सभी पर रंग के छींटे पड़ने लगे,’’ फूफाजी बोले, ‘‘पुरोहित ने जल्दीजल्दी मंत्रोच्चारण कर वरवधू से फेरे लेने को कहा. फिर औनेपौने फेरे डलवा कर अपना पोथीपत्रा समेट, मंत्रों के बीच ‘क्रमश:क्रमश:’ का उच्चारण करते हुए बिना दानदक्षिणा लिए भाग लिए.’’

‘‘बड़ी अजीब शादी थी,’’ मैं ने हैरानी से कहा.

‘‘अब एक विचित्र शवयात्रा की बात भी सुन लो,’’ फूफाजी ने आंखें नचाईं और बताने लगे, ‘‘एक बार होली पर हम यारदोस्त सिर से पांव तक रंग में नहाए हुए थे, चेहरों पर काले, नीले, पीले, लाल रंगों की बहारें खिलाए भांग के गिलासों और पकौड़ों की महफिल जमाए हुए थे कि इतने में एक युवक ने रोनी सी सूरत लिए आ कर हमारे पुते चेहरों को घूरते हुए पूछा, ‘इन में से राज कौन है?’ राज ने उसे इशारे से अपने पास बुलाया.’’

मैं ने फूफाजी की ओर देखा तो वह आगे बताने लगे, ‘‘राज के उस पड़ोसी ने सिसकते हुए बताया कि राज, तुम्हारे पिता की शव यात्रा श्मशान घाट की ओर कूच करने वाली है.’’

‘‘अरे, यानी आप के दोस्त राज के पिताजी का अचानक इंतकाल हो गया था?’’ मेरे मुंह से एकदम निकला.

‘‘नहीं जी,’’ फूफाजी ने मुझ से आंखें मिलाईं और बोले, ‘‘उन्होंने होली की सुबह ही राज की बांहों में दम तोड़ा था मगर हमारा होली खेलने का कार्यक्रम चौपट न हो जाता इसलिए उस ने अपने पिताजी की मौत का गम दिल में दबाए रखा और पूरे जोश से होली खेलता रहा.’’

‘‘वाह, वाह, कैसेकैसे सपूत आप की टोली में शामिल थे,’’ बूआजी ने व्यंग्यबाण छोड़ा.

‘‘और नहीं तो क्या? ’’ फूफाजी ने गर्व से सिर उठाया और बोले, ‘‘हम में से कोई खुद भी मर गया होता तो अर्थी से उठ कर होली खेलने चला आता. आज की तरह नहीं कि संसार के किसी कोने में आंधी, तूफान, भूचाल आया और कुछ जानें गईं तो होली के रंग नाली में बहा दिए.’’

‘‘आप लोग इनसानी हमदर्दी को क्या समझें?’’ बूआजी ने मुंह बिचकाया.

‘‘अब हमदर्दी की बात ले लो, ज्यों ही हमें राज के पिताजी के इंतकाल का पता चला, फौरन राज के साथ उस के घर पहुंचे और वहां जो हम सभी चारों लोग फूटफूट कर रोए तो देखने वाले हैरानपरेशान हो गए कि आखिर इन नौजवानों में से किस का बापू, किस का डैडी, किस के पिताजी, संसार से कूच कर गए हैं,’’ फूफाजी ने आंखें पोंछीं, ‘‘सच मानना मनोज बेटे, हम लोगों ने रोनेपीटने का वह समां बांधा था कि…’’

‘‘लो, सुन लो,’’ फूफाजी की बात को बीच में काटते हुए बूआजी बोलीं, ‘‘रोनेपीटने का समां बांधा था?’’

‘‘चलो, समां बांधा नहीं…समां खुला छोड़ दिया था…अब तो खुश?’’ फूफाजी उखड़ गए.

फूफाजी ने रंग की 2-3 बोतलें एक झोले में डालीं और रंग वाला बरतन स्टोव पर ही छोड़ कर उठ खड़े हुए और बोले, ‘‘आओ, चलेंबेटा.’’

फूफाजी ने रंग की बोतलों वाला झोला उठाया.

अपने दफ्तर के सामने फूफाजी ने किराया दे कर आटो वाले को विदा किया.

‘‘क्या आप अपने दफ्तर के साथी को अपना बनाया स्पेशल रंग देने आए हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं बेटा, नहीं, कल से आफिस साप्ताहिक अवकाश के कारण बंद है और सोमवार की होली है. मेरे दफ्तर के साथी इन 3 दिनों की छुट्टियों में अपनेअपने घरों को चले जाएंगे, फिर उन के साथ होली खेलने का मौका कहां मिलेगा. इसलिए मैं आज ही इन के साथ होली मनाने आ गया हूं,’’ फूफाजी ने झोले से रंग की एक बोतल निकाली और झोला मुझे थमा कर पीछेपीछे चले आने का इशारा कर आफिस की ओर बढ़े.

आफिस के दरवाजे पर चपरासी अपनी कुरसी पर बैठा हथेली पर खैनी रगड़ रहा था.

‘‘भोलाराम…होली मुबारक हो,’’ फूफाजी ने बोतल का रंग भोलाराम पर उड़ेला.

चपरासी उछल कर खड़ा हो गया और खैनी फेंक ‘बचाओबचाओ’ चिल्लाता हुआ आफिस के अंदर की ओर भागा. फूफाजी भी उस के ऊपर रंग फेंकते हुए उस के पीछे हो लिए.

आफिस के कमरों में अपनीअपनी  सीटों पर बैठे, फाइलों पर झुके बाबू लोग चौंक पड़े.

फूफाजी ने मेरे हाथ में पकड़े झोले में से रंग की एक और बोतल निकाली और दोनों हाथों में पकड़ी बोतलों से अपने साथियों पर रंग बरसाते हुए होली है…होली है’ के नारे लगा रहे थे.

बाबू लोग खुद को और फाइलों को बचाने की कोशिश कर रहे थे मगर फूफाजी इस ‘उस्तादी’ से रंग फेंक रहे थे कि किसी को बचने का मौका नहीं मिल रहा था. आफिस में अजब भगदड़ मची हुई थी.

‘अरे, सब सत्यानाश हो गया’ के शोर के बीच फूफाजी के ऊंचे स्वर में ‘होली है भई होली है’ के नारे गूंज रहे थे.

शोर सुन कर बड़े साहब अपने केबिन से बाहर आ गए थे. उन्होंने क्रीम कलर की कमीज पर सुर्ख टाई सजा रखी थी.

‘‘ये क्या हो रहा है?’’ बड़े साहब दहाड़े.

फूफाजी ने बोतल में भरा हरा रंग बड़े साहब की कमीज पर फेंका, जो उन की पैंट और लाल टाई सभी को तर कर गया.

‘‘होली मुबारक…बड़े साहब… हैप्पीहैप्पी होली.’’

‘‘अरे, रोको इसे…पागल हो गया

है क्या…अरे, पकड़ोपकड़ो…भोला… सहगल…वर्मा…पकड़ो इसे. छीन लो रंग,’’ बड़े साहब अपने कपड़ों का सत्यानाश होते देख बिलबिला उठे.

भोला और 3-4 बाबुओं ने रंग की परवा न करते हुए फूफाजी को पकड़ लिया और रंगों की बोतलें फूफाजी के हाथों से छीन कर पटक दीं.

‘‘मैं तुम्हें नौकरी से बाहर कर दूंगा,’’ बड़े साहब गुस्से से उबल रहे थे, ‘‘मैं तुम्हारे खिलाफ एक्शन लूंगा.’’

‘‘मैं आप के खिलाफ सीधे एक्शन लूंगा कि समान धर्म के होते हुए भी आप ने मुझे मेरे धार्मिक त्योहार को मनाने से रोका है. मैं आप के खिलाफ देश भर में एजीटेशन चलाऊंगा. प्रेस कानफे्रंस बुलाऊंगा,’’ फूफाजी जोश और रोष से उछल रहे थे, ‘‘मैं दंगेफसाद भड़का दूंगा. अमन में आग लगा दूंगा.’’

इस से पहले कि मामला और बिगड़ता, मैं फूफाजी का हाथ पकड़ कर उन्हें आफिस से बाहर ले आया.

‘‘आप ने दफ्तर में होली खेल कर अच्छा नहीं किया,’’ मैं ने समझाया.

‘‘दफ्तर में कहां लिखा है कि यहां होली खेलने की मनाही है? जाओ, खुद जा कर दफ्तर में लगे बोर्ड पढ़ लो,’’ फूफाजी ने अपने माथे पर बल डाले, ‘‘थूकना मना है, बीड़ीसिगरेट पीना मना है, रिश्वत लेनादेना मना है, शोर करना मना है, सभी कुछ लिखा है, मगर दफ्तर में होली खेलने की मनाही के बारे में कुछ नहीं लिखा है.’’

‘‘यह तो बड़ी सीधी सी बात है कि होली के रंगों से आफिस रिकार्ड खराब हो जाएगा,’’ मैं ने दलील देनी चाही.

‘‘पहले जमाने में आफिस के बड़े अफसर अपने स्टाफ को दफ्तर में होली खेलने के लिए खुद उकसाते थे ताकि जिन फाइलों के कारण उन पर आंच आ सकती है उन्हें होली के रंगों से नष्ट हो जाने की आड़ ले कर अपनी गरदन को किसी केस में फंसने से बचा सकें,’’ फूफाजी ने बतलाया.

‘‘लेकिन आज तो दफ्तर में होली खेलने की वजह से आप की अपनी गरदन फंस गई है.’’

‘‘तभी तो कहता हूं कि अबवैसी होली कहां,’’ फूफाजी ने लंबी आह भरी.

Holi 2026

Holi 2026 : होली में कलरफुल पकवानों के लिए ट्राय करें ये टिप्स

Holi 2026 : होली आने वाली है और आप अभी तक असमंजस में हैं कि कौनकौन से पकवान बनाए जाएं और कौनकौन से नहीं तो घबराएं नहीं. इस होली पर आप कम कैलोरी वाले पकवान कम समय में बना कर और अलग अंदाज में पेश कर के होली का भी मजा लें व दूसरों की भी वाहवाही लूटें:

1- लोग कम मीठा खाते हैं. इसलिए कर्ड पुडिंग बनाएं. हैंग कर्ड में थोड़ा सा चीनी पाउडर, चुटकी भर जायफल पाउडर, इलायची पाउडर, कुछ बारीक कटे फल और रोस्टेड व छोटे टुकड़ों में कटे ड्राईफ्रूट्स डाल कर छोटीछोटी कटोरियों में सवेरे ही फ्रिज में रख दें. खाने में लाजवाब और बनाने में झटपट पुडिंग तैयार है. जब भी कोई आए उसे फ्रिज से एक कटोरी, प्लास्टिक का चम्मच और नैपकिन पकड़ा दें.

2- आप चाहें तो कर्ड पुडिंग की तरह कस्टर्ड भी बना सकती हैं. उस में थोड़ी सी क्रीम मिला दें तो कस्टर्ड खाने में और स्वादिष्ठ लगता है. उस के ऊपर चौकलेट सौस या स्ट्राबैरी सौस डाली जा सकती है.

3- मिल्क पाउडर और पनीर से घर में कलाकंद झटपट बन जाता है. उसे भी जमा कर छोटे छुकड़ों में काटें और टूथपिक में लगा कर ही सर्व करें.

4- आप चाहें तो फ्रूट स्टिक भी तैयार कर सकती हैं. बस मनचाहे फल लें और टूथपिक में समान आकार में काट कर लगा दें. बिलकुल लो कैलोरी डिश तैयार है.

5- छोटी मिनी इडली पीली, हरी, लाल, सफेद तैयार करें और 1-1 स्टिक में 4-4 इडली लगा दें और फिर एक बड़े कैसरोल में रखें. साथ में चटनी भी ढक कर रख दें. आने वाले मेहमानों को सर्व करें.

6- झालमूड़ी के छोटेछोटे कोन बनाएं. प्याज, खीरा, टमाटर व आलू को बारीक काट कर अलग एक कैसरोल में रख दें, साथ में चटनी भी. जो भी आए उसे एक कोन पकड़ा दें.

7- स्प्राउट सलाद में सभी प्रकार की शिमलामिर्च, प्याज आदि मिला कर छोटेछोटे ईकोफ्रैंडली प्लास्टिक के बाउल्स में रखें. मेहमान के आने पर भुनी मूंगफली का चूरा बुरक प्लास्टिक का चम्मच लगाएं और सर्व करें.

– जलजीरा बना कर रख लें. फिर पेपर गिलास में सर्व करें. चाय देनी हो तो पहले से ही थोड़ी बना कर थर्मस में रख लें. अगर ठंडाई देनी हो तो भी कौजी बनाई हो तो वह भी सर्व की जा सकती है.

8- मिनी आलू दही चाट बनाएं. आलुओं को उबाल कर छील लें. हींगजीरे के तड़के में छौंक लगाएं. फिर फेंटे गए दही में डालें. थोड़ी सी सोंठ, नमक, मिर्च व भुना जीरा मिलाएं. बाउल में सर्व करें. चारों तरफ थोड़ी सी पापड़ी रख आलू भुजिया बुरक स्वादानुसार सोंठ डाल कर सर्व करें. दहीभल्ला चाट भी इसी तरह बनाई जा सकती है.

9- बाजार में इडली का बैटर आसानी से मिल जाता है. बस रात भर गरम स्थान पर रखें. सवेरे खमीर उठने पर उस में कद्दूकस गाजर, लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च व धनियापत्ती डालें और अप्पा पत्रम में फ्राइड इडली तैयार कर चटनी के साथ सर्व करें.

10- इंस्टैंट ढोकले का पैकट बाजार से खरीद लाएं और निर्देशानुसार मिश्रण तैयार करें. फिर इडली स्टैंड के खांचों में थोड़ाथोड़ा मिश्रण डाल कर ढोकला तैयार कर छौंक लगा लें. इडली स्टाइल ढोकला तैयार है.

11- फ्रूट केनेट्स भी तैयार कर सकती हैं. ब्रैड को टोस्टर में रोस्ट करें. इस में चौकोर या गोल टुकड़े काट लें. उन पर हैंग कर्ड लगाएं. अब कीवी रखें फिर दही लगाएं और अनार के दाने बुरक कर सर्व करें.

12- घर पर बेक्ड गुझिया तैयार कर सकती हैं. खोया नहीं है तो कोई बात नहीं. 2 कप मिल्क पाउडर में 1/2 कप दूध डालें और नौनस्टिक कड़ाही में पकाएं. खोया झटपट तैयार हो जाएगा.

13- यदि आप बाजार से बूंदी के लड्डू व छोटे वाले गुलाबजामुन ले आए हैं, तो बूंदी के लड्डुओं को फोड़ लें और थोड़ाथोड़ा बूंदी का मिश्रण ले कर उस के बीच में एक गुलाबजामुन रख कर गोल करें. फ्रिज में 2 घंटे रखें और फिर चाकू से बीच से काटें. टू इन वन लड्डू तैयार हैं.

14- बेक कर के समोसे भी बनाए जा सकते हैं. लोगों को बहुत पसंद आते हैं. यदि आप के पास ओवन या एअरफ्रायर है, तो उस में ही लो तापमान पर रखें. समोसे करारे व खस्ता बने रहेंगे.

15- आजकल लोग पूरी गुझिया नहीं खाते. अत: आधीआधी गुझिया को नैपकिन में लपेट कर रखें.

16- एक ट्रे में नैपकिन, पेपर प्लेट्स, गिलास, बाउल, चम्मच आदि पहले से रख लें. पानी पीने के लिए अलग गिलास और पानी का जग रखें. किसी पुरानी सूती धोती या दुपट्टे के छोटेछोटे टुकड़े फाड़ लें और जब किसी को कुछ देना हो तो हाथ पोंछ कर ही दें.

कोशिश करें कि आप के रंगीन हाथ खाने की सामग्री में न लगें. दूसरों को भी हाथ पोंछने के लिए गीला व सूखा कपड़ा दें ताकि रंगीन पकवान खाने का मजा आ जाए. एक डस्टबिन भी रखें, जिस में पेपर प्लेट्स, कप्स व कपड़ों को फेंका जा सके. Holi 2026

Holi 2026 : इस बार मनाएं हेल्दी होली

Holi 2026 : होली का त्योहार उत्साह, उमंग और उल्लास का त्योहार है. इस दिन रंग-गुलाल उड़ा कर और मिठाइयां खा व खिला कर खुशियां बांटी जाती हैं. लेकिन कई बार जरा सी लापरवाही के चलते इस खूबसूरत त्योहार में रंग में भंग पड़ जाता है और खुशियों व उमंगों वाला यह त्योहार सेहत के साथ खिलवाड़ बन जाता है.

1 बनाएं हैल्दी पकवान :

होली में जहां एक ओर रंगों की फुहार का लोग मजा लेते हैं वहीं दूसरी तरफ बिना मिठाइयों के होली अधूरी लगती है. वहीं, कई बार बाजार की मिलावटी मिठाइयों और गलत खानपान के चलते सेहत की अनदेखी हो जाती है. एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंसैज की डाइटीशियन शिल्पा ठाकुर  के अनुसार, ‘‘होली का सही माने में मजा लेना है तो स्वाद और सेहत दोनों को ध्यान में रखते हुए होली के व्यंजन घर पर ही बनाएं. होली पर घर में बनी ठंडाई, शरबत, गुझिया, कांजी वडा, पापड़ खाएं और इस त्योहार का मजा उठाएं. अगर आप अपने बढ़ते वजन को ले कर परेशान हैं लेकिन साथ ही होली का मजा भी लेना चाहती हैं तो हर चीज खाएं लेकिन सीमित मात्रा में.

‘‘दरअसल, यह बदलता मौसम होता है जब ठंडक जा रही होती है और गरमी का आगमन हो रहा होता है. ऐसे में ठंडा खाने का मन करता है. इस समय होली खेलने के दौरान व होली के समय अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए तलाभुना व ज्यादा मीठा खाने की जगह फलों का अधिक से अधिक प्रयोग करें. फ्रूटचाट बनाएं और खुद खाएं व मेहमानों को भी खिलाएं.’’

2 पेट का रखें ध्यान :

मिलावटी मिठाइयों का सेवन आप को अस्पताल पहुंचा सकता है. इसलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि बाजार की मिलावटी मिठाई खाने से बचें क्योंकि मिलावटी दूध, पनीर व घी से बनी मिठाई खाने से लिवर को नुकसान हो सकता है और आंतों में सूजन, फूड पौइजनिंग, उलटी, दस्त, सिरदर्द, पेटदर्द व त्वचा रोग जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. रौकलैंड अस्पताल के गैस्ट्रोलौजिस्ट डा. एम पी शर्मा कहते हैं, ‘‘होली में अकसर लोग रंगगुलाल लगे हाथों से खाना खा लेते हैं. गंदे हाथों से खाना खाने से इन्फैक्शन होता है. इन्फैक्शन की वजह से डायरिया, उलटी, दस्त आदि होने लगते हैं.

‘‘होली के दिन कई तरह के तेलों में फ्राइड पकौड़े वगैरा खाने से पेट में गैस बनने लगती है या फिर पेट फूलने लगता है. इसलिए होली के दिन घर से जब भी निकलें तो खाना खा कर निकलें या फिर हाथों में रंग लगाने से पहले खाना खा लें. भांग व शराब का सेवन कतई न करें क्योंकि भांग के रिऐक्शन कई तरह से होते हैं. इसलिए मादक पदार्थों से दूर रहें. होली को मस्ती से मनाएं. पेट को कबाड़ न समझें और खानपान को ठीक रखें.’’

3 रंग में न हो भंग :

अब रंगों का रूप बदल गया है. जहां पहले अबीर, गुलाल, टेसू, केसर आदि रंगों से होली खेली जाती थी, वहीं आज पेंट मिले पक्के रंगों से खेली जाती है. ये रंग शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं.

होली खेलने से पहले पूरे शरीर पर वैसलीन या कोल्डक्रीम लगा लें. इस से आप की त्वचा पर रंगों का सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा. बालों पर रंगों का दुष्प्रभाव न पड़े, इस के लिए रात को ही बालों में कोई तेल लगा लें. रंगों से नाखूनों को भी जरूर बचाएं. नाखूनों पर रंग न चढ़े, इसलिए पहले से ही कोई नेलपौलिश नाखूनों पर लगा लें. इस से रंग नाखूनों पर न चढ़ कर नेलपौलिश पर ही चढ़ेगा. यदि रंग नाखूनों के अंदर या आसपास की त्वचा पर चढ़ जाए तो उसे साबुन से रगड़ने के बजाय 2-3 बारी नीबू से रगडें़. होली खेलने के बाद सब से बड़ी परेशानी जिद्दी रंग को साफ करने की होती है. जिद्दी रंग को साफ करने के लिए साबुन के बजाय कच्चे दूध का उपयोग कर त्वचा की धीरेधीरे मसाज करें या मौइश्चराइजिंग क्रीम का उपयोग कर रंग को साफ करने की कोशिश करें. त्वचा में अगर जलन हो रही हो तो जलन को खत्म करने के लिए आप खीरे के रस का प्रयोग करें. बेसन के साथ कच्चे दूध से बना पेस्ट आप के चेहरे के रंग को दूर करने का सब से आसान तरीका है. अगर आंखों में रंग जाने की वजह से आंखों पर जलन महसूस हो रही हो तो खीरे को काट कर थोड़ी देर के लिए पलकों के ऊपर रख लें. इस से आंखों को ठंडक मिलेगी और जलन से भी काफी रहत मिलेगी.

4 गर्भवती महिलाएं ध्यान दें :

यों तो कैमिकलयुक्त रंग और मिलावटी मिठाइयां किसी के लिए भी खतरनाक हो सकती हैं पर गर्भवती महिलाओं को खास खयाल रखने की सलाह दी जाती है. कैमिकलयुक्त रंग और मिलावटी मिठाइयां गर्भवती महिला और उस के गर्भ में पल रहे बच्चे, दोनों ही के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं.

एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंसैज की गाइनीकोलौजिस्ट डा. पूजा ठकुराल के अनुसार, ‘‘गर्भावस्था में महिलाओं की रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. ऐसे में, होली के समय गर्भावस्था में कैमिकल आधारित रंगों का प्रयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से खतरनाक हो सकता है. इन से गर्भवती महिला के रिप्रोडक्टिव सिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है और उसे समयपूर्व प्रसव व बच्चे के विकास से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. अगर गर्भवती महिला को होली पर रंग खेलना ही है तो वह गीले रंगों के बजाय सूखे हर्बल रंगों का इस्तेमाल करे. जहां तक होली के समय मिठाइयों के सेवन की बात है, गर्भवती महिलाएं घर की बनी मिठाइयां, नमकीन आदि खा सकती हैं, साथ ही नारियल पानी वगैरा ले सकती हैं.’’

5 दिल के रोगी रखें खयाल :

इंडियन मैडिकल एशोसिएशन के अध्यक्ष व जानेमाने कार्डियोलौजिस्ट डा. के के अग्रवाल कहते हैं, ‘‘दिल के मरीजों को हमेशा चीनी, चावल व मैदा से दूर रहना चाहिए. मिठाइयों का सीमित मात्रा में सेवन करें क्योंकि इन में अत्यधिक मीठा और ट्रांस फैट होता है. साथ ही, उन्हें डीप फ्राइड चीजें और नमक के अधिक सेवन से भी परहेज करना चाहिए. दिल के रोगी होली खेलते समय ज्यादा दौड़भाग न करें व नशे से दूर रहें. नशा करने से दिल की धड़कन बढ़ने, रक्तचाप बढ़ने और कार्डियक अरेस्ट जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जो दिल के रोगियों के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती हैं.

‘‘इस के अलावा विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत यह है कि जो रंग या गुलाल ज्यादा चमकदार होगा उस में ज्यादा कैमिकल मौजूद होते हैं. इसलिए ऐसे रंगों से बचें. अब तो रंगों व गुलाल को चमकीला बनाने के लिए उन में घटिया अरारोट या अबरक पीस कर मिला दिया जाता है. बाजार में घटिया क्वालिटी के जो रंग बेचे जाते हैं वे ज्यादातर औक्सीडाइज्ड मैटल होते हैं. हरा रंग कौपर सल्फेट, काला रंग लेड औक्साइड से तैयार किया जाता है. ये रंग बहुत ही खतरनाक होते हैं. आंखों को हरे रंग से बचाना बहुत ही जरूरी है. बेहतर यही है कि हर्बल रंगों से होली का लुत्फ उठाएं.’’ Holi 2026

Satirical Story In Hindi : मिशन छिपकली – कामयाबी के नए कीर्तिमान रच रहा है

Satirical Story In Hindi : 45 साल की ढलती उम्र में हमारी जुड़वां संतानें हुई थीं. मुझे नन्हींमुन्नी गुडि़या का मनचाहा उपहार मिला था और वाइफ को उन का दुलारा गुड्डा, लेकिन वाइफ को बिटिया की भी चाहत थी. वे बिटिया को साइंटिस्ट बनाना चाहती थीं. मुझे बेटे के साथ नुक्कड़ पर क्रिकेट खेलने की तमन्ना थी. हम ने महल्ले में मिठाई बंटवाई. अनाथालय के बच्चों के लिए मिठाईनमकीन के पैकेट और कपड़ों के उपहार भिजवाए. हमारी खुशी का ठिकाना न था.

हम ने अपने बच्चों को भरपूर प्यार दिया. उन की सभी इच्छाएं पूरी कीं. कभी शिकायत का कोई मौका नहीं दिया. मोबाइल, लैपटौप, स्कूटी, बाइक, कार, ब्रैंडेड ड्रैसेज, ट्यूटर सबकुछ उन के पास थे. दोनों अब बड़े हो चुके थे. 9वीं कक्षा की परीक्षा दे चुके थे.

‘‘पापा, एडवांस बुकिंग करानी है,’’ बिटिया ने मुझ से रिक्वैस्ट की.

‘‘हांहां, क्यों नहीं, ‘संजू’ लगी है. यह फिल्म काफी पसंद की जा रही है,’’ मैं ने बिटिया का हौसला बढ़ाया. मैं खुद फिल्म देखने के मामले में आगे रहता हूं.

‘‘पापा, अगले साल हम दोनों 10वीं बोर्ड की परीक्षा देंगे. परीक्षा में हैल्प के लिए मिशन की बुकिंग चल रही है,’’ बिटिया ने मुझे बताया.

‘‘बोर्ड की परीक्षा के लिए बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है. सेहत पर बुरा असर पड़ता है. सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी में एडवांस बुकिंग कराना सही होगा. अभी औफर चल रहा है,’’ साहबजादे ने मुझे समझाया.

अपनी समझदानी थोड़ी छोटी है. पूरी बात समझ आने में थोड़ी देर लगी. अपनी संतान को 10वीं में नकल करने के लिए विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई स्पैशल चिटों की जरूरत होगी. मुझे इस संबंध में जानकारी कम थी.

‘‘वैज्ञानिक बनाने के लिए अच्छे कालेज में दाखिला दिलाना होगा. 10वीं कक्षा में अच्छे मार्क्स की जरूरत होगी,’’ वाइफ ने चिंता जताई. बच्चों को उन से झिझक नहीं थी. उन को सबकुछ पता था.

औलाद के भविष्य की चिंता मुझे भी थी. वैज्ञानिक बनने के लिए अच्छे कालेज में दाखिले की जरूरत भी थी. अच्छे कालेज में दाखिले के लिए कक्षा 10 में 90 प्रतिशत मार्क्स आने भी जरूरी थे.

परिवार के साथ मैं सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी से मिला. उन से रेट्स और औफर्स की जानकारी ली.

‘‘साइंस के एक पेपर और मैथ्स के लिए 8 हजार रुपए तथा दूसरे पेपरों के लिए 5 हजार रुपए. हमारी एजेंसी प्रीमियर एजेंसी है. एडवांस बुकिंग में 25 प्रतिशत की छूट दी जा रही है. ये रेट केवल प्रश्नोत्तर चिट के लिए हैं. और हां, मिशन छिपकली के लिए डबल रेट से रुपए देने होंगे. इस के अलावा दूसरी सेवाएं तथा कौम्बो औफर भी हैं,’’ प्रीमियर एजेंसी के रिसैप्शन पर तैनात मैडम ने जानकारी दी.

‘‘यह मिशन छिपकली क्या बला है?’’ मैं ने पूछ ही लिया. वैसे कुछकुछ अंदाजा हो रहा था.

पिछले महीने मैं ने पाटलीपुत्र सुसंवाद समाचारपत्र में खबर पढ़ी थी कि ईस्टर्न इंडिया के महानगरों के चिडि़याघरों से बहुत ही खास प्रजाति की कुछ छिपकलियों की चोरी हो गई थी. ये प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर थीं. इस इमारत की दीवार पर कई मानव आकृतियां चिपकी थीं. मैं ने बाद में इस न्यूज को चश्मा लगा कर पढ़ा था.

‘‘मिशन छिपकली के अंतर्गत एजेंसी बहुमंजिली इमारतों में परीक्षार्थियों को स्पैशल चिट उपलब्ध कराती है. पुलिस, केंद्र अधीक्षक, न्यूजपेपर रिपोर्टर सब को मैनेज करना मुश्किल जौब है. मिशन छिपकली के लिए औनजौब ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है. भगदड़ में दुर्घटना भी हो जाती है. परीक्षा केंद्र ग्राउंडफ्लोर पर होने की हालत में भुगतान की गई रकम का 50 प्रतिशत लौटा दिया जाता है. अप्रत्याशित और कठिन परिस्थितियों के लिए 2 साल की वारंटी का प्रावधान रखा गया है,’’ रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मिशन छिपकली के टैरिफ वाउचर्स का बखान किया.

हम ने शहर की दूसरी सर्विस प्रोवाइडर एजेंसियों से भी संपर्क किया. गोल्डन सर्विस एजेंसी में बालिकाओं के लिए फीस में 30 प्रतिशत की छूट का औफर था. लेकिन एजेंसी की बहुमंजिली सर्विस काफी महंगी थी.

बैस्ट सर्विस प्रोवाइडर ने रजिस्टर्ड परीक्षार्थियों के लिए शहरी इलाकों से परीक्षा केंद्रों तक ले जाने के लिए वीडियो सुविधायुक्त फ्री बस का औफर दिया था.

इन सभी एजेंसियों की शाखाएं राज्य के सभी छोटेबड़े शहरों में होने की भी जानकारी मिली. एजेंसीज ने प्रश्नोत्तर के लिए राजधानी व राज्य के दूसरे शहरों के नामीगिरामी स्कूलों के शिक्षकों व खास कोचिंग संस्थानों के विशेषज्ञों से भी अपने जुड़े होने की बात कही.

इस संपर्क मुहिम के दौरान कई दूसरी सर्विसेज की मौजूदगी के बारे में जाननेसमझने का मौका मिला. उन की सेवाओं की जानकारी मिली. कई खुलासे हुए. ये सुविधाएं परीक्षार्थियों, अभिभावकों के व्यापक हित में हैं, इस का भी ज्ञान हुआ.

मुझे इस उद्योग की पूरी जानकारी नहीं थी. मुझे पता नहीं था कि कभी शिक्षा का केंद्र रहे अपने पुराने शहर में कक्षा-10 स्पैशल चिट सप्लाई के धंधे ने बड़े कारोबार का दर्जा हासिल कर लिया है और इस कारोबार से बड़े घराने भी आकर्षित हो रहे हैं.

परीक्षाएं लंबे समय तक चलती हैं. इस दौरान खेलकूद, मूवी, मौजमस्ती, गेम्स, फेसबुक, चैटिंग, यारदोस्तों से गपें और सभी खिलंदड़ी व मनोरंजक गतिविधियां बंद हो जाती हैं. महीनों किताबों, नोट्स में घुसे रहने से बोरियत होती है. टैंशन से सेहत खराब हो जाती है. ऐसे में परीक्षाओं से जुड़ी सर्विसेज एजेंसियां हमारी आम दिनचर्या के साथसाथ ही कैरियर विकल्पों को आगे बढ़ाने में सहायक होती हैं.

इन सुविधाओं से गुप्तरूप से जुड़े शिक्षकों व सहायक कर्मियों को होने वाली कमाई, उन को कठिन हालात से उबारने में सहायक होती है. राज्य में शिक्षकों व कर्मचारियों के वेतन भुगतान की समस्या हमेशा बनी रहती है. त्योहार के महीनों में भी वेतन भुगतान नहीं हो पाता है. इस तरह सर्विस एजेंसीज उन की वित्तीय समस्याओं का समाधान भी करती हैं.

अभिभावक सर्विस एजेंसीज की बुकिंग के बाद बेफिक्र हो जाते हैं. उन्हें बहुमंजिली इमारतों पर छिपकली बन कर चिपकने से मुक्ति मिल जाती है. अच्छे कालेजों में दाखिले की राह आसान हो जाती है. शिक्षक उत्तरपुस्तिका पर, अपने द्वारा तैयार उत्तर पा कर, मार्क्स लुटाते हैं. एजेंसी विभिन्न कोलेजों व तकनीकी संस्थानों में ऐडमिशन भी दिलवाती है.

‘‘विशिष्ट संस्थानों में ऐडमिशन के लिए आप हमारी एजेंसी से संपर्क कर सकते हैं,’’ ब्राइट सर्विस एजेंसी की सुंदर रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मुझे बताया.

कई स्रोतों से जानकारी मिली कि सर्विस एजेंसीज अपनी सीक्रेट सर्विस के तहत राष्ट्रीय स्तर व राज्य स्तर पर होने वाली प्रतियोगिता परीक्षाओं के प्रश्नपत्र, उत्तर के साथ उपलब्ध कराती हैं. प्रश्नपत्र लीक कराने के लिए कई वैज्ञानिक राजनीतिक हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है. एडवांस बुकिंग कराने से पहले ठोकबजा कर पूरी तसल्ली करने की अपनी पुरानी आदत रही है. सो, मैं ने छानबीन की, कई एजेंसियों से जानकारी ली-

‘‘हमारी एजेंसी एक सर्विस एजेंसी है. यह जनसुविधाएं मुहैया कराती है.’’

‘‘अभिभावकों के हितों की सुरक्षा का काम कर रहे हैं. उन के सपने पूरे हों, इस के लिए कोशिश जारी है.’’

‘‘हमारी इंडस्ट्री बेरोजगारों को रोजगार देती है.’’

‘‘लंबे समय तक पूरी रात किताबों से चिपके रहने से गरदन अकड़ जाती है. ओनली बुक्स ऐंड नो प्ले मेक्स पप्पू ए डल बौय इस का हमारे पास कारगर इलाज है.’’

‘‘नाकामी से जूझते हुए बच्चे कई बार गलत फैसले भी ले लेते हैं. हमारी एजेंसी उन्हें कामयाबी दिलाने का काम करती है.’’

अब मुझे पूरी तसल्ली हो चुकी थी. स्पैशल चिट बनाना, बहुमंजिली इमारतों की दीवार से चिपकना मेरे बूते से बाहर की बात थी. लंबी पढ़ाई और अपनी रोजमर्रा से लंबी जुदाई बच्चों के लिए तकरीबन नामुमकिन था. मिशन छिपकली मुझे जंच रही थी. Satirical Story In Hindi

Romantic Story in Hindi : बदलाव – प्रमोद की जिंदगी में कैसे आया बदलाव?

Romantic Story in Hindi : प्रमोद को सरकारी काम के सिलसिले में सुबह की पहली बस से चंड़ीगढ़ जाना था, इसलिए वह जल्दी तैयार हो कर बसस्टैंड पहुंच गया था. प्रमोद टिकट खिड़की पर लाइन में खड़ा हो गया था. दूसरी लाइन, जो औरतों के लिए थी, में 23-24 साल की एक लड़की खड़ी थी.

बूथ पर बस पहुंचते ही टिकट मिलनी शुरू हो गई. लेकिन तब तक लाइन भी काफी लंबी हो चुकी थी. खैर, प्रमोद को तो टिकट मिल गई और बस में वह इतमीनान से सीट पर जा कर बैठ गया. थोड़ी देर में वह लड़की भी प्रमोद के बगल की सीट पर आ कर बैठ गई. उन्हें 3 सवारी वाली सीट पर इकट्ठा नंबर मिल गया था.

ठसाठस भरने के बाद बस अपनी मंजिल की ओर रवाना हुई. लड़की ने अपना ईयरफोन और मोबाइल फोन निकाला और गाने सुनने लगी. बीचबीच में झटके खा कर वह प्रमोद से टकराती भी रही. बस जैसे ही शहर से बाहर निकली और सुबह की ठंडी हवा शरीर से टकराई तो प्रमोद 5 साल पहले की यादों में खो गया.

उस दिन भी प्रमोद बस से दफ्तर के काम से चंडीगढ़ ही जा रहा था. बसअड्डा पहुंचने में उसे थोड़ी देर हो गई थी. उस दिन किसी नौकरी के लिए चंडीगढ़ में लिखित परीक्षा थी. पहली बस होने के चलते भीड़ बहुत ज्यादा थी. जहां एक ओर मर्दों की बहुत लंबी लाइन थी, वहीं दूसरी ओर औरतों की लाइन छोटी थी.

प्रमोद को यह अहसास हो चला था कि आज इस बस में शायद ही सीट मिले, लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम है, यह सोच कर वह लाइन में खड़ा रहा.

तभी औरतों की लाइन में एक लड़की आ कर खड़ी हो गई. उम्र यही कोई 25 साल के आसपास. खुले बाल, पैंटटीशर्ट पहने, वह हाथ में एक बैग लिए हुए खड़ी थी. प्रमोद ने अपनी लाइन से बाहर आ कर उस लड़की से पूछा, ‘मैडम, आप कहां जाएंगी?’

उस लड़की ने प्रमोद की तरफ गौर से देखा, फिर कुछ सोच कर बोली, ‘चंडीगढ़.’ प्रमोद ने कहा, ‘मैं भी चंडीगढ़ ही जा रहा हूं, अगर आप मेरी थोड़ी मदद कर दें तो…’

वह लड़की बोली, ‘कहिए, मैं आप की क्या मदद कर सकती हूं?’ प्रमोद ने 500 का एक नोट उसे थमाते हुए कहा, ‘आप मेरी भी एक टिकट चंडीगढ़ की ले कर मेरी मदद कर सकती हैं.’

‘ठीक है. आप बैठिए, मैं ले कर आती हूं,’ लड़की ने कहा. प्रमोद बूथ पर लगी बस के पास

आ कर खड़ा हो गया और थोड़ी देर में वह लड़की टिकट ले कर उस के पास आ गई. उन्हें अगले दरवाजे के बिलकुल साथ वाली 2 सवारियों की सीट मिली थी.

बस शहर से निकल पड़ी थी. प्रमोद ने उस लड़की का शुक्रिया अदा किया. बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो प्रमोद ने उस से पूछ लिया, ‘आप का क्या नाम है और चंडीगढ़ में क्या काम करती हैं?’ उस लड़की ने अपना नाम रीमा बताया और वह वहां एक फर्म में सेल्स ऐक्जिक्यूटिव थी. काम के सिलसिले में वह यहां आई थी. काम खत्म कर के वह वापस लौट रही थी.

प्रमोद ने उसे बताया कि वह यहां लोकल दफ्तर में काम करता है और सरकारी काम से महीने 2 महीने में उस का चंडीगढ़ आनाजाना लगा रहता है. बस चलती रही तो बातों का सिलसिला भी चलता रहा. रीमा ने बताया कि वह मूल रूप से पहाड़ी है. यहां चंडीगढ़ में किराए का मकान ले कर रह रही है. घर में मम्मीपापा और छोटी बहन हैं, जो गांव में रहते हैं. बड़ा भाई नोएडा में एक प्राइवेट फर्म में सौफ्टवेयर इंजीनियर है.

प्रमोद ने बताया कि वह भी किराए का मकान ले कर रह रहा है. बीवीबच्चे सब गांव में हैं. महीने में 2-4 बार ही घर का चक्कर लग पाता है. अभी रिटायरमैंट में 12-13 साल का वक्त पड़ा है, इस के बाद ही जिंदगी शायद सैट हो पाए. बातोंबातों में कब पेहवा आ गया, पता ही नहीं चला. बस वहां 15 मिनट के लिए रुकी.

प्रमोद नीचे उतर कर चाय और सैंडविच ले आया. जब तक चाय पी तब तक बस चलने को तैयार हो गई. बातों का सिलसिला फिर शुरू हो गया. उन दोनों ने घरपरिवार व दफ्तर तक की तमाम बातें कर लीं. एकदूसरे को टैलीफोन नंबर भी दे दिए.

हालांकि प्रमोद की उम्र उस लड़की की उम्र से तकरीबन दोगुनी रही होगी, फिर भी उस ने उसे अपना दोस्त मान लिया था और उस से घर चलने को कहा था.

प्रमोद ने उसे बताया, ‘इस बार तो घर नहीं चल पाऊंगा, क्योंकि जरूरी काम है. अगली बार जब भी मैं यहां आऊंगा, तो सुबह नहीं शाम को आऊंगा. रातभर आप के यहां रुक कर जाऊंगा और अगर आप को हमारे यहां आना हो तो वैसा ही आप भी करना,’ इसी वादे के साथ वे दोनों रुखसत हुए. प्रमोद ने सुबहसुबह चंडीगढ़ दफ्तर पहुंच कर काम निबटाया और वापस बस में बैठ कर घर की तरफ रवाना हुआ.

बस रात के तकरीबन 10 बजे वापस पहुंची. बसअड्डे पर उतर कर प्रमोद अपने मकान में पहुंचा ही था कि फोन की घंटी बजी, देखा तो रीमा का ही फोन था. उठाया तो रीमा ने पूछा, ‘घर पहुंच गए ठीकठाक?’ प्रमोद ने कहा, ‘हां, अभीअभी घर पहुंचा हूं.’

रीमा ने कहा, ‘चलो, ठीक है. नहाओधोओ, खाओपीयो, थक गए होगे,’ और फोन काट दिया. अब रीमा से हफ्ते में एकाध बार

तो फोन पर बात हो ही जाती थी. धीरेधीरे यह दोस्ती गहरी हो रही थी.

एक महीने बाद फिर से प्रमोद को दफ्तर के काम से चंडीगढ़ जाना पड़ रहा था. प्रमोद ने रीमा से बात की तो उस ने कहा, ‘आप शाम को ही आ जाओ. सुबह जल्दी उठने में दिक्कत नहीं होगी और इसी बहाने आप के साथ रहने का मौका मिल जाएगा.’ प्रमोद ने दोपहर की बस पकड़ी तो रात 8 बजे चंडीगढ़ उतार दिया. बसअड्डे पर रीमा स्कूटी लिए खड़ी थी. स्कूटी के पीछे बैठ प्रमोद उस के मकान पर चला गया.

बहुत बढि़या घर था. रीमा ने घर में तमाम सुखसुविधाएं जुटा रखी थीं. प्रमोद चाय पीने के बाद नहाधो कर फ्रैश हो गया. रीमा ने भी समय से पहले खाना वगैरह तैयार कर लिया था. प्रमोद के पास आ कर जुल्फें झटका कर उस ने पूछा, ‘आप का मनपसंद ब्रांड कौन सा है…?’

प्रमोद कुछ अचकचा गया, फिर थोड़ी देर में वह बोला, ‘जो साकी पिला दे…’

रीमा ने विदेशी ब्रांड की बोतल ली और पैग बनाने शुरू कर दिए. 2-2 पैग लेने के बाद उन्होंने खाना खाया और पतिपत्नी की तरह प्यार कर के उसी बिस्तर पर सो गए. प्रमोद सुबह उठा तो खुद को बहुत हलका महसूस कर रहा था. रीमा भी जल्दी उठ गई थी. उसे भी दफ्तर जाना था. उन दोनों ने तैयार हो कर नाश्ता किया और अपनेअपने काम पर निकल गए.

अब इसी तरह से जिंदगी चलने लगी. रीमा जब भी प्रमोद के पास आती तो वह उसे होटल में रख लेता. जब भी छुट्टियां होतीं तो वे शिमला, मोरनी हिल्स, धर्मशाला जैसी कम दूरी की जगहों पर घूमने निकल जाते.

एक रात जब प्रमोद रीमा के घर पर सोने की तैयारी कर रहा था, तो उस के मन में यह सवाल उठा कि रीमा जवान है, खूबसूरत है, अच्छा कमाती है. यह तो नएनए कितने ही लड़कों के साथ दोस्ती कर सकती है, मौजमस्ती कर सकती है, फिर यह उस जैसे अधेड़ को क्यों पसंद करती है? प्रमोद ने उस के बालों में उंगली घुमाते हुए पूछा, ‘रीमा, एक बात पूछूं, अगर आप बुरा न मानो तो…’

रीमा ने कहा, ‘मैं जानती हूं कि आप क्या पूछना चाहते हैं. आप यही जानना चाहते हैं न कि मैं यह सब अधेड़ उम्र के लोगों के साथ क्यों करती हूं, जबकि मेरे लिए जवान लड़कों की कोई कमी नहीं है? ‘मैं क्या हमारे यहां सब जवान लड़कियां यही करती हैं. इस की खास वजह यह है कि हम यहां वीकऐंड पर मौजमस्ती करना चाहती हैं. अधेड़ मर्द जिंदगी के हर तरह के रास्तों से गुजरे होते हैं. उन्हें हर तरह का अनुभव होता है. उन का अपना परिवार होता है, इसलिए वे चिपकू नहीं होते और जब जहां उन को कहा जाए वे दोस्ती वहीं छोड़ देते हैं. कमाई की नजर से भी ठीकठाक होते हैं.

‘नौजवान लड़के जिद्दी होते हैं. वे समझौता नहीं करते, बल्कि मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं. कभी नस काट लेते हैं तो कभी पागलों जैसी हरकतें करने लगते हैं. यही वजह है कि हम आप जैसों को पसंद करती हैं.’ प्रमोद और रीमा की दोस्ती तकरीबन 5 साल तक चली. उस के बाद रीमा ने शादी कर अपना घर बसा लिया और दिल्ली शिफ्ट हो गई.

हमारे समाज में यह एक नया बदलाव आया है या आ रहा है. अच्छा है या बुरा है, यह तो अलग चर्चा की बात हो सकती है, लेकिन बदलाव हो रहा है. जीरकपुर बसस्टैंड पर बस रुकी तो झटका लगा और प्रमोद यादों से वर्तमान में लौटा. साथ बैठी लड़की उस के कंधे पर सिर रख कर सो रही थी.

प्रमोद ने उसे जगाया तो अपना बैग संभालते हुए वह बस से उतर गई. प्रमोद बस में बैठा कुछ सोच रहा था. थोड़ी देर में बस बसअड्डे की तरफ चल पड़ी थी. Romantic Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : गठबंधन संस्कार – जब शादी के न्योते पर पड़ी नजर

Satirical Story In Hindi : गुलाबचंद महीनेभर के सफर के बाद थकेमांदे घर वापस आए थे. अटैची को रख कर सोफे पर अधलेटे हुए ही थे कि मेज पर रखे शादी के एक न्योते पर नजर पड़ गई.

गुलाबचंद ने पास बैठी अपनी श्रीमतीजी से पूछा, ‘‘यह न्योता किस का है?’’

श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘आप के बचपन के लंगोटिया यार मंत्रीजी आज ही दे गए हैं. उन के लाड़ले की शादी अपने इलाके के सांसदजी की बेटी से चट मंगनी पट ब्याह वाली तर्ज पर तय हो गई है. आप को बरात में चलने के लिए कह गए हैं.’’

खुशी और हैरानी से न्योते के कार्ड को जैसे ही उठाया, लिफाफे पर लिखी गई इबारत पर नजर पड़ते ही गुलाबचंद के दिमाग में अजीब सी हलचल मच गई. उन के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘छपाई में इतनी बड़ी गलती हो गई और मंत्रीजी का इस पर ध्यान ही नहीं गया…’’

श्रीमतीजी भी कुछ चौंक कर बोलीं, ‘‘क्या गलती हो गई? मैं ने तो इसे अभी तक छुआ भी नहीं है. आप के आने के तकरीबन घंटाभर पहले ही तो दे गए हैं मंत्रीजी.’’

गुलाबचंद ने वह कार्ड श्रीमतीजी को थमा दिया. देखते ही वे भी हैरानी से सन्न रह गईं.

बात थी ही कुछ ऐसी. लिफाफे के बाहर और भीतर ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ छपा था.

इस कमबख्त एक शब्द के चलते गुलाबचंद महीनेभर की थकान भूल से गए और उन्होंने श्रीमतीजी से कहा, ‘‘मंत्रीजी को फोन मिलाओ.’’

श्रीमतीजी ने कहा, ‘‘अभीअभी थकेमांदे इतने दिनों बाद आए हो… पहले फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लो, बाद में आराम से मंत्रीजी से बात करना.’’

श्रीमतीजी की बात को तरजीह देते हुए गुलाबचंद फ्रैश होने चल दिए, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ दिमाग से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था. उन्होंने मंत्रीजी को मोबाइल फोन से नंबर मिला ही डाला.

फोन पर मंत्रीजी का छोटा सा वाक्य कानों में पड़ा, ‘गुलाबचंदजी, इस समय पार्टी की एक जरूरी मीटिंग चल रही है,

जो देर रात तक चलने की उम्मीद है. सुबह मुलाकात होगी…’

दूसरे दिन सुबह जब गुलाबचंद नाश्ता कर ही रहे थे कि मंत्रीजी का फोन आ गया, ‘हैलो गुलाबचंदजी, मैं आप का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं… जल्दी आ जाओ.’

मंत्रीजी का फोन सुन कर गुलाबचंद ने जल्दबाजी में नाश्ता किया और जैसेतैसे गरमगरम चाय पी. बड़े ही उतावलेपन के साथ, बिना कपड़े बदले, जिस हालत में थे, उसी हालत में वे मंत्रीजी के घर की ओर चल पड़े.

‘गठबंधन संस्कार’ शब्द उन्हें अब भी दुखी कर रहा था. ‘सोलह संस्कारों’ के बाद यह ‘सत्रहवां गठबंधन संस्कार’ कब से, कहां से आ गया है? जैसे नए जमाने के फिल्म वाले पुराने फिल्मी गीतों को ‘रीमिक्स’ कर के उन्हें मौडर्न बना रहे हैं, उसी तरह ‘सोलह संस्कारों’ को रीमिक्स कर के मौडर्न तो नहीं बनाया जा रहा है?

इसी उधेड़बुन में गुलाबचंद मंत्रीजी के दरवाजे पर पहुंचे. देखा कि मंत्रीजी दरवाजे पर ही खड़ेखड़े अपनी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं से बतिया रहे थे. गुलाबचंद को देखते ही मंत्रीजी कार्यकर्ताओं से विदा लेते हुए उन्हें घर के अंदर ले गए.

उन्होंने मंत्रानी को आवाज लगाई, ‘‘देखो, आज घर पर कौन पधारा है?’’

मंत्रानी ने रसोई से निकलते हुए जैसे ही गुलाबचंद को देखा, बड़ी खुश हो कर बोलीं, ‘‘इतने दिनों तक कहां रहे गुलाबचंदजी? हम लोग बड़ी बेसब्री से आप का इंतजार कर रहे थे…’’

मंत्रानी कुछ और कहने जा रही थीं कि गुलाबचंद बीच में बोल पड़े, ‘‘भाभीजी, मुझे तो भाई साहब से कुछ दूसरी ही शिकायत है और इतनी बड़ी है कि घर आ कर जैसे ही शादी के कार्ड पर नजर पड़ी…’’

‘‘रहने दो गुलाबचंदजी…’’ मंत्रीजी ने उन की बात को काटते हुए कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हें किसकिस बात को ले कर मुझ से शिकायत है…’’

इसी बीच भाभीजी यानी मंत्रानी जलपान ले कर आ गईं.

जलपान करते हुए मंत्रीजी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहली बड़ी शिकायत तो यह है कि शादी के कार्ड को देखते ही तुम गुस्से में आपे से बाहर हो गए होंगे… और दूसरी शिकायत जिस में तुम उलझे हुए हो कि लड़की वाले विपक्षी पार्टी में होने के साथसाथ मेरे घोर राजनीतिक विरोधी ही नहीं, दुश्मन भी हैं. मेरा उन से हमेशा छत्तीस का ही आंकड़ा रहा है. क्यों, है न यही बात?

‘‘बात यह थी कि एक दिन हमारे भावी समधी सांसदजी ने अपने एक भरोसेमंद हमराज द्वारा बातोंबातों में राजनीतिक स्टाइल की चाशनी में मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि अगर मैं सांसदजी की बेटी से अपने एकलौते लाड़ले की सगाई कर दूं तो सांसदजी अपने खास विधायकों से बिना शर्त मेरी पार्टी को समर्थन दिलवा देंगे. बाद में सही मौका आने पर वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय भी कर लेंगे.

‘‘तुम तो जानते ही हो कि मेरी पार्टी अल्पमत में रहते हुए कितनी मुश्किलों से सरकार चला रही है. मेरी सरकार की कुरसी के गठबंधन में इतनी बेमेल गांठें हैं कि अगर एक गांठ भी खुल जाए तो सबकुछ इस कदर बिखर जाएगा कि भविष्य में दोबारा कुरसी पर बैठने की शायद ही नौबत आए.

‘‘ऐसी मजबूर हालत में अगर समधी सांसदजी हमें समर्थन दे रहे हैं और वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय कर लेते हैं तो हमारी हालत ऐसी हो जाएगी कि गठबंधन की अगर 2-4 गांठें खुल भी जाएं, टूट जाएं तब भी सरकार चलाने में मेरी पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

‘‘और एक राज की बात तुम्हें चुपके से कह रहा हूं… मौका आने पर अपनी ही पार्टी में जोड़तोड़ करवा कर मैं खुद ही मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में लग गया हूं. इन्हीं सब राजनीतिक पैतरों को ध्यान में रखते हुए उन का ‘औफर’ आते ही मैं ने तुरंत हां कर दी और शादी का मुहूर्त निकलवा लिया.

‘‘गठबंधन संस्कार… यही शब्द तुम्हें दुखी कर रहा है न? चूंकि यह शादी राजनीति की बिसात पर हो रही है, जहां हर वक्त अपने फायदे के लिए मौके की तलाश रहती है, आज का दोस्त कल का दुश्मन और आज का विरोधी, कल का समर्थक बन जाता है, इसी माहौल में यह रिश्ता तय हुआ है.

‘‘इन बातों के ध्यान में आते ही मेरे दिमाग में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ का जन्म हुआ.

‘‘भावी समधी सांसदजी ने भी यह रिश्ता राजनीति की बिसात पर तय किया है और नेता का क्या भरोसा? काम सधने के बाद कब पलटी मार जाए? कौनसी नई शर्त थोप दे? इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर ही मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ शब्द का इस्तेमाल किया है.

‘‘सांसदजी ने शर्त रखी थी कि अगर मैं उन की लड़की की सगाई अपने लड़के से कर दूं तो पहले वे अपने विधायकों का बिना शर्त समर्थन मेरी पार्टी को देंगे और मौका आने पर वे अपनी पार्टी का विलय मेरी पार्टी में करेंगे. अगर उन्हें सामान्य रूप में यह रिश्ता तय करना होता तो वे सीधेसीधे मुझ से कह सकते थे. राजनीति अपनी जगह, रिश्ता अपनी जगह. रिश्तों को तो राजनीति से संबंध रखना ही नहीं चाहिए. सामान्य रूप में मैं इस रिश्ते को नकार भी सकता था, लेकिन उन की इस बात पर मेरे नकारने की गुंजाइश ही न रही.

‘‘रही रिश्तों की राजनीति की बात. मान लो कि शादी हो जाने के बाद वे ऊपर से समर्थन तो करते रहते लेकिन विलय वाली बात को यह कह कर नकारते रहते कि अभी सही समय नहीं आया या विलय तभी करेंगे जब मैं मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने करीबियों की बलि दे कर उन के विधायकों को मलाईदार पदों पर बैठा दूं. अगर मैं ऐसा मजबूरन कर भी दूं तब भी वे मुझे चैन से नहीं रहने देंगे. हमेशा समर्थन वापसी का डर दिखाते हुए एक न एक नई शर्त मुझ से मनवाते रहेंगे.

‘‘इन हालात में मैं क्या करता? इन्हीं सब पैतरों की काट करने के लिए मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ लिखवाया है.

‘‘हिंदू धर्म में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ होने के बाद आसानी के साथ रिश्ता तोड़ा नहीं जा सकता. भविष्य में सांसदजी के अडि़यलपन पर अगर रिश्ता तोड़ने के बारे में विचार करता तो दहेज के नाम पर सताने की तलवार आसानी से मेरा गला काट सकती है. मन मसोस कर समधीजी की ऊलजुलूल शर्त मुझे माननी पड़ती, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ में ऐसा हरगिज नहीं हो सकता.

‘‘राजनीति में अलगअलग पार्टी की बेमेल गांठों का बंधन कब बंधे, कब खुले या टूटे, कहा नहीं जा सकता और इस जुड़ने, खुलने या टूटने में हमारा संविधान चुप है, कानून लाचार है…

‘‘इस समय हमारी पार्टी सरकार चला रही है, कल सुबह के अखबार में आप हैडिंग पढ़ सकते हैं कि कल की फलां विपक्षी पार्टी ने आज सत्ता हथिया ली है.

‘‘अब अगर राजनीति में इस ‘गठबंधन’ शब्द का इस्तेमाल न होता तो सत्ता का जोड़तोड़ भी इतनी आसानी से न होता. कानून इजाजत ही नहीं देता.

‘‘ठीक यही बात ‘गठबंधन संस्कार’ में है. ‘गठबंधन संस्कार’ कब तक दांपत्य जीवन में जुड़ा रहे और कब यह संस्कार दांपत्य जीवन से अलग हो जाए… इस पर कानून या समाज या फिर सरकार का कोई बंधन नहीं है, जबकि ‘पाणिग्रहण संस्कार’ में बंधन ही बंधन हैं. धर्म, समाज, कानून सब ‘पाणिग्रहण संस्कार’ को जकड़े हुए हैं.

‘‘अब अगर समधी सांसदजी पार्टी का समर्थन वापसी का जरा सा भी तेवर भविष्य में दिखाएंगे तो उन के तेवर को उन्हीं के ऊपर साधते हुए मैं भी ‘गठबंधन संस्कार’ को भंग करने, तोड़ देने की चेतावनी दूंगा. यह एक ऐसा हथियार होगा जिस के बलबूते मैं समधी सांसदजी को जब तक जीवन में राजनीति रहेगी, तब तक उन पर ताने रहूंगा और वे बेबस बने रहेंगे, चुप रह कर समर्थन देते रहेंगे.

‘‘मुख्यमंत्री बनने के बाद मैं ‘गठबंधन संस्कार’ को सदन में एक नया विधेयक पास करा कर कानूनी जामा पहना दूंगा.’’

अपने नेता दोस्त के ऐसे विचार सुन कर गुलाबचंद सन्न रह गए और उलटे पैर घर लौट गए. Satirical Story In Hindi

Social Story in Hindi : मीठा जहर – कौलगर्ल्स से संबंध बनाते हुए रोहित के साथ क्या हुआ?

Social Story in Hindi : रविवार की सुबह 6 बजे अलार्म की आवाज ने मेरी नींद खोल दी. मेरा पार्क में घूमने जाने का मन तो नहीं था पर मानसी और वंदना के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के मजबूत इरादे ने मुझे बिस्तर छोड़ने की प्रेरणा दी. करीब 4 महीने पहले वंदना के पति रोहित से मेरा परिचय एक पार्टी में हुआ था. वह बंदा ऐसा हंसमुख और जिंदादिल निकला कि उसी दिन से हम अच्छे दोस्त बन गए थे. जल्द ही मानसी और वंदना भी अच्छी सहेलियां बन गईं. फिर हमारा एकदूसरे के घर आनाजाना बढ़ता चला गया.

करीब 2 हफ्ते पहले रोहित को अपने एक सहयोगी दोस्त की बरात में शामिल हो कर देहरादून जाना था. तबीयत ढीली होने के कारण वंदना साथ नहीं जा रही थी. ‘‘मोहित, तुम मेरे साथ चलो. हम 1 दिन के लिए मसूरी भी घूमने चलेंगे.’’ सारा खर्चा मैं करूंगा. यह लालच दे उस ने मुझ से साथ चलने की हां करवा ली थी.

घूमने के लिए अकेले उस के साथ घर से बाहर निकल कर मुझे पता लगा कि वह एक खास तरह की मौजमस्ती का शौकीन भी है. दिल्ली से बरात की बस चलने के थोड़ी देर बाद ही मैं ने नोट कर लिया था कि निशा नाम की एक स्मार्ट व सुंदर लड़की के साथ उस की दोस्ती कुछ जरूरत से ज्यादा ही गहरी है वे दोनों एक ही औफिस में काम करते थे.

‘‘इस निशा के साथ तुम्हारा चक्कर चल रहा है न?’’ रास्ते में एक जगह चाय पीते हुए मैं ने उसे एक तरफ ले जा कर पूछा. ‘‘मैं तुम्हें सच बात तभी बताऊंगा जब वापस जा कर तुम वंदना से मेरी शिकायत नहीं लगाओगे,’’ उस ने मेरी पीठ पर दोस्ताना अंदाज में 1 धौल जमा कर जवाब दिया.

‘‘तुम्हारा सीक्रेट मेरे पास सदा सेफ रहेगा,’’ मैं भी शरारती अंदाज में मुसकराया. ‘‘थैंकयू. आजकल इस शहंशाह की खिदमत यह निशा नाम की कनीज ही कर रही है. तुम्हारा भी इस की सहेली के साथ चक्कर चलवाऊं?’’

‘‘अरे, नहीं. ऐसे चक्कर चलाने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है,’’ मैं ने घबरा कर जवाब दिया. ‘‘चक्कर मत चलाना पर हंसबोल तो लो उस रूपसी के साथ,’’ शरारती अंदाज में मेरी कमर पर 1 और धौल जमाने के बाद वह निशा और उस की सहेली की तरफ चला गया.

निशा की सहेली शिखा ज्यादा सुंदर तो नहीं थी पर उस में गजब की सैक्स अपील थी. यात्रा के दौरान वह बहुत जल्दी खुल कर मेरी दोस्त बन गई तो बरात में शामिल होने का मेरा मजा कई गुना बढ़ गया. अगले दिन सुबह बरात के साथ वापस न लौट कर हम दोनों टैक्सी से मसूरी पहुंच गए. जिस होटल में हम रूके वहां निशा और शिखा को पहले से ही मौजूद देख कर मैं बहुत हैरान हो उठा.

‘‘इन दोनों के साथ मसूरी में घूमने का मजा ही कुछ और होगा,’’ ऐसा कह कर रोहित ने मेरे सामने पहली बार निशा को अपनी बांहों में भरा.

दोस्तों की सोच और व्यवहार का हमारे ऊपर बहुत प्रभाव पड़ता है. अपनी पत्नी मानसी को धोखा दे कर कभी किसी और लड़की के साथ चक्कर चलाने का विचार मेरे मन में नहीं आया था. यह रोहित की कंपनी का ही असर था कि शिखा के साथ की कल्पना कर मेरे मन में गुदगुदी सी होने लगी थी. हम दिन भर उन दोनों साथ मसूरी में घूमे. रात को रोहित उन दोनों के कमरे में चला गया. फिर शिखा मेरे कमरे में आ गई.

रोहित के साथ मैं ने जो शराब पी थी उस के नशे ने मेरे मन की सारी हिचक और डर को गायब कर दिया. उस पल ये विचार मेरे मन में नहीं उठे कि मैं कोई गलत काम कर रहा हूं या मानसी को धोखा दे रहा हूं.

शिखा ने पूर्ण समर्पण से पहले ही अपने पर्स से 1 कंडोम निकाल कर मुझे थमा दिया. उस की इस हरकत से मुझे तेज झटका लगा. मेरे मन में फौरन यह विचार उठा कि वह कौलगर्ल है और फिर देखते ही देखते उस के साथ मौजमजस्ती करने का भूत मेरे सिर से उतर गया.

‘‘मेरा मन बदल गया है. प्लीज, तुम सो जाओ,’’ पलंग से उतर मैं बालकनी की तरफ चल पड़ा. ‘‘आर यू श्योर?’’ वह मुझे विचित्र सी नजरों से देख रही थी.

‘‘बिलकुल.’’ ‘‘सुबह रोहित से किसी तरह की शिकायत तो नहीं करोगे?’’

‘‘अरे, नहीं.’’ ‘‘ वैसे मन न माने तो मुझे कभी भी उठा लेना.’’

‘‘श्योर.’’ ‘‘पैसे वापस मांगने का झंझट तो नहीं खड़ा करोगे?’’

‘‘नहीं,’’ उस के प्रोफैशनल कौलगर्ल होने के बारे में मेरा अंदाजा सही निकला.

अगली सुबह मेरी प्रार्थना पर शिखा हमारे बीच यौन संबंध न बनने की बात रोहित व निशा को कभी न बताने के लिए राजी हो गई.

सुबह उठ कर रोहित ने आंखों में शरारती चमक भर कर मुझ से पूछा, ‘‘कैसा मजा आया मेरे यार? मसूरी से पूरी तरह तृप्त हो कर चल रहा है न?’’ ‘‘बिलकुल,’’ मैं ने कुछ शरमाते हुए जवाब दिया तो उस के ऊपर हंसी का दौरा ही पड़ गया.

‘‘अपना इस मामले में नजरिया बिलकुल साफ है, दोस्त महीने में 1-2 बार मुंह का स्वाद बदल लो तो पत्नी से ऊब नहीं होती है.’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो, गुरूदेव.’’ ‘‘चेले, एक बात साफ कह देता हूं. अगली बार ऐसी ट्रीट तुम्हारी तरफ से रहेगी.’’

‘‘श्योर, पर…’’ ‘‘पर क्या?’’

‘‘मुझे इस रास्ते पर नहीं चलना हो तो तुम नाराज तो नहीं हो जाओगे न?’’ ‘‘अब तो तुम्हारे मुंह खून लग गया है. तुम मेरे साथ मौजमस्ती करने निकला ही करोगे,’’ अपने इस मजाक पर उस का ठहाका लगा कर हंसना मुझे अच्छा नहीं लगा.

हम दोनों वापस दिल्ली आए तो पाया कि वंदना की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई थी. ‘‘खांसीबुखार अभी भी था. रात से पेट भी खराब होने के कारण बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी,’’ अपने रोग के लक्षण बताते हुए वंदना की आवाज बहुत कमजोर लगा रही थी.

‘‘तुम ने जरूर कुछ गड़बड़ खा लिया होगा,’’ रोहित ने उस का माथा चूमते हुए कहा. ‘‘आप मेरी खराब तबीयत को हलके में ले रहो हो…. आप को मेरी चिंता है भी या नहीं?’’ कहतेकहते वंदना रो पड़ी.

‘‘मैं आराम करने से पहले तुम्हें डाक्टर को दिखा लाता हूं.’’ रोहित का यह आदर्श पति वाला बदला रूप देख कर मैं ने मन ही मन उस के कुशल अभिनय की दाद दी.

वंदना की तबीयत सप्ताह भर के इलाज के बाद भी नहीं सुधरी तो मैं उन दोनों को अपने इलाके के नामी डाक्टर उमेश के पास ले गया. डाक्टर उमेश ने वंदना की जांच करने के बाद कुछ टैस्ट लिखे और फिर गंभीर लहजे में रोहित से बोले, ‘‘एचआईवी का टैस्ट आप को भी कराना पड़ेगा.’’

डाक्टर की बात सुन कर वंदना ने जिस डर, गुस्से व नफरत के मिलेजुले भाव आंखों में ला कर रोहित को घूरा था, उस रोंगटे खड़े करने वाले दृश्य को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकूंगा. मैं तो डाक्टर की बात सुन कर मन ही मन बहुत बुरी तरह से डर गया था. मैं ने उसी रात मन ही मन कभी न भटकने का वादा खुद से कर लिया. क्षणिक मौजमस्ती

के लिए अपनी व अपनों की जान को दांव पर लगाना कहां की समझदारी हुई? रोहित और वंदना दोनों की एचआईवी की रिपोर्ट नैगेटिव आई थी. इस कारण उन के 3 साल के बेटे राहुल की एचआईवी जांच नहीं करानी पड़ेगी.

वंदना के लगातार चल रहे बुखारखांसी का कारण उसे टीबी हो जाना था. अंदाजा यह लगाया गया कि यह बीमारी उसे अपने ससुरजी से मिली थी, जिन का देहांत कुछ महीने पहले ही हुआ था. यह देख कर मुझे बहुत अफसोस होता है कि रोहित ने पूरे घटनाक्रम से कोई सीख नहीं ली. कई बार शादी के बाद पतिपत्नी के रिश्ते बहुत ज्यादा मजबूत नहीं होते पर रोहित यह समझने को तैयार नहीं कि कौलगर्ल से संबंध बना कर अपनी व अपने जीवनसाथी की जिंदगी को दांव पर लगाना बहुत खतरनाक है.

आजकल वंदना से उस का बहुत झगड़ा होता है. ‘‘मैं इधरउधर मुंह मारने वाले इस इंसान को अपने साथ सोने का अधिकार अब कभी नहीं दूंगी.

मानसी से मुझे पता चला है कि वंदना अपने इस कठोर फैसले से हिलने को कतई तैयार नहीं है.

रोहित मुझ से मिलते ही वंदना की शिकायत करने लगता है, ‘‘वह मुझे अपने पास नहीं आने देती है. बेड़ा गर्क हो इस डाक्टर उमेश का जिस ने वंदना के मन में एचआईवी का वहम डाला. मेरी कमअक्ल पत्नी की जिद है कि मैं हर महीने उसे एचआईवी से मुक्त होने की रिपोर्ट ला कर दिखाऊं, नहीं तो अलग कमरे में सोऊं.’’ ‘‘उस का डरना व गुस्सा करना अपनी जगह ठीक है. एचआईवी का संक्रमण तुम्हारी पत्नी को ही नहीं, बल्कि आने वाली संतान को भी यह खतरनाक बीमारी दे सकता है.’’

‘‘तुम्हें तो पता ही है कि इस मामले में मैं बचाव का पूरा ध्यान रखता हूं.’’ ‘‘गलत काम करना पूरी तरह से छोड़ ही

दो न.’’ ‘‘तुम ऐसे दूध के धुले नहीं हो जो मुझे लैक्चर दो,’’ वह चिढ़ कर नाराज हो गया तो मैं ने चुप्पी साथ ली.

अब वंदना का स्वास्थ्य धीरेधीरे सुधर रहा था. वह अब हमारे साथ घूमने जाने लगी थी. मैं ने मानसी के व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया है. मोटापा कम करने के लिए मैं उसे सदा उत्साहित करता रहता हूं. नियमित रूप से ब्यूटीपार्लर जाया करे, ऐसी जिद भी मैं करने लगा हूं.

अलार्म की आवाज सुन कर मानसी उठना चाहती थी पर मैं ने उसे बांहों में कैद कर के अपनी छाती से लगा लिया. कुछ मिनट के रोमांस के बाद ही मैं ने उसे बिस्तर छोड़ने की इजाजत दी. मानसी ने मेरे कान से मुंह सटा कर प्यार भरे स्वर में कहा, ‘‘आप बहुत बदल गए हो.’’

‘‘मुझ में आया बदलाव तुम्हें पसंद है न?’’ मैं ने शरारती लहजे में पूछा तो वह शरमाती हुई बाथरूम में चली गई. मानसी की बात में सचाई है. उसे देखते ही मेरा मन भावुक हो जाता है. फिर उसे छाती से लगाए बिना मन को चैन नहीं मिलता है.

मौजमस्ती का शौकीन रोहित परस्त्री से यौन संबंध बनाने से बाज नहीं आ रहा है. मेरे लाख समझाने के बावजूद वह इस मीठे जहर के खतरे को देखना ही नहीं चाहता है. जिस दिन उस की एचआईवी की रिपोर्ट पौजिटिव आ गई, उस दिन क्या वह बुरी तरह नहीं पछताएगा? उस जैसे जिंदादिल आदमी का एड्स का शिकार बन अपनी जिम्मेदारियां अधूरी छोड़ कर दुनिया से विदा हो जाना सचमुच एक बहुत बड़ी ट्रैजेडी होगी. Social Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : प्रसाद – रधिया को क्या मिल पाया अपने सपनों का राजकुमार?

Romantic Story in Hindi : रधिया के मन में जो बात 16 सालों से दबी थी, उस के पूरा होने का समय आ गया था. उस के पिता दीनदयाल उस के लिए एक लड़का देख कर आए थे और उस के बारे में वे अपनी बीवी और बेटे को बता रहे थे. रधिया जब अपने सपनों के राजकुमार के बारे में सोचने लगती, तो वह खिल जाती और आईने में अपना चेहरा देखने लगती.

अब रधिया को न तो दिन को चैन था और न रात को नींद. उस के मन में एक नई उमंग, शरीर में गुदगुदी और दिल में हलचल मची रहती थी. दिन कटते गए. लड़की देखने का दिन तय हुआ.

रधिया को देखने आज उस का राजकुमार आने वाला था. वह सजसंवर कर तैयार हो रही थी. पिताजी स्वागत की तैयारी में लगे थे. ‘मेहमानों की खातिरदारी में कोई कमी न रह जाए, बात आज ही पक्की हो जाए,’ ये सब बातें सोच कर दीनदयाल परेशान थे.

दरअसल बात यह थी कि इस से पहले भी 2 लड़के रधिया को देख कर चले गए थे, पर बात नहीं बनी थी. रधिया को देखने शाम को तकरीबन 5 बजे सभी मेहमान आ गए थे और रधिया के परिवार वाले उन के स्वागत में जुट गए थे.

रधिया की मां मन ही मन बेटी की मंगनी खुशीखुशी होने के लिए दुआ मांग रही थीं. रधिया मेहमानों के पास चाय ले कर पहुंची. एक ही नजर में रधिया को लड़का पसंद आ गया. जैसा वह सोचती थी, वैसा ही था उस के सपनों का राजकुमार.

रमेश खूबसूरत और एक गंभीर नौजवान था. उसे भी रधिया बहुत अच्छी लगी. रधिया के कसे बदन और नशीली आंखों ने जैसे रमेश को घायल कर दिया. अब क्या था. बात बन गई. सबकुछ तय हो गया. शादी का मुहूर्त निकाला गया. शादी 10 दिन बाद थी. लड़के वाले चले गए.

आज दीनदयाल बहुत खुश थे. इतने खुश कि जैसे बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो. रधिया की मां फूली नहीं समा रही थीं. रधिया का तो हाल ही कुछ और था. जब से उस ने अपने सपनों के राजकुमार को देखा था, तब से वह सपनों में खो गई थी. हर तरफ वही नजर आ रहा था.

जब रधिया की सहेलियां उसे छेड़तीं तो उस का मन और मचल जाता. वह अपनी खिली जवानी को आईने में देख कर मुसकरा जाती और आने वाले दिनों के सपनों में खो जाती. किसी तरह 10 दिन बीत गए. आखिर वह दिन भी आ गया, जिस का रधिया को बेताबी से इंतजार था.

सुबह के 8 बजे थे कि मां ने आवाज लगाई, ‘‘बेटी, मेहंदी लगाने के लिए तुम्हारी सहेली शबनम आई है. जा, मेहंदी लगवा ले या यों ही खोईखोई रहेगी.’’ मेहंदी, हलदीचंदन लगाने और सजनेसंवरने के बाद रधिया किसी परी से कम नहीं लग रही थी.

शाम को धूमधाम से बरात आई. शादी की सारी रस्में पूरी हुईं. विदाई का समय आया. चारों तरफ उदासी का माहौल छा गया. दीनदयाल बेटी की विदाई पर फफक पड़े. ससुराल पहुंचने के बाद सब ने रधिया की खूब तारीफ की. रमेश की मां ने बहू को रूप और गुण दोनों से भरा पाया और वे उसे बहू की जगह लक्ष्मी कह कर पुकारने लगीं.

रमेश तो रधिया को रानी कह कर पुकारता था. रधिया के आने से चारों तरफ खुशियां छा गईं. 5 साल बीत गए. रधिया और रमेश का प्यार वैसा ही बना रहा, जैसा कि शादी के शुरुआती दिनों में था. मगर सास की नजर में रधिया खटकने लगी थी, क्योंकि वे अब एक पोता चाहती थीं.

इसी तरह 2 साल और गुजर गए. औलाद न होने की वजह से रमेश की मां परेशान हो कर रमेश से बोलीं, ‘‘क्यों बेटा, हमें तुम पोता नहीं दोगे? तुम्हारे बाबूजी बोल रहे थे कि शादी को 7 साल हो गए, मगर बहू के पैर भारी नहीं हुए. क्या बात है?’’ रमेश ने कहा, ‘‘मां, तुम क्यों घबराती हो? अगर ऐसी बात है तो मैं डाक्टर से सलाह लूंगा और इलाज…’’

रमेश की बात काटते हुए मां बोलीं, ‘‘अभी तक तो पड़ोसनें ही कहती हैं, अब पूरी बिरादरी को क्यों बताना चाहते हो. बेटा, हमारी बात मानो तो तुम दूसरी शादी कर लो.’’ रमेश को इस बात से बड़ी तकलीफ हुई. वह बोला, ‘‘मां, तुम ऐसी बात क्यों बोल रही हो? तुम्हारी बहू अगर सुनेगी तो जीतेजी मर जाएगी. हम लोग डाक्टर से मिल कर सही सलाह लेंगे. हो सकता है, मुझ में ही कोई कमी हो.’’

इस बात पर मां बोलीं, ‘‘तुम तो हट्टेकट्टे हो. हमें यकीन है कि हमारे बेटे में कोई खोट नहीं है. खोट है तो उसी में. जरूर उस पर किसी का साया है, जो हमारी खुशियों में आग लगा रहा है. ‘‘तुम ऐसा करो कि किसी अच्छे तांत्रिक का पता लगाओ. हो सकता है, उस से मिलने पर इस मसले का कोई हल मिल जाए और हमारे मन की मुराद पूरी हो जाए.’’

मां के आगे रमेश लाचार हो गया. उस ने तांत्रिक के बारे में पता लगाना शुरू कर दिया. कुछ भागदौड़ करने के बाद पता चला कि उन के घर से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर रामपुर गांव में एक तांत्रिक आया है, जो ऐसे कामों के लिए जाना जाता है.

रमेश तांत्रिक से मिला. उस तांत्रिक ने कहा, ‘‘अभी मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता, तुम परसों दिन में आओ तो इस के बारे में सोच कर बताऊंगा कि इस के लिए सही समय कब होगा.’’

रमेश फिर तांत्रिक के पास गया. तांत्रिक ने रमेश को चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की पहली रात को सारा इंतजाम करने को कहा और जरूरी सामान का लंबा सा परचा उस के हाथ में थमा दिया, जिस में खुशबूदार तेल, तिल, चंदन वगैरह थे. पूजा की सारी तैयारियां हो गई थीं. तांत्रिक महाराज बताए गए समय पर रमेश के घर आ पहुंचे. चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की पहली रात को उन की पूजा शुरू हुई.

पहली रात की पूजा में रधिया को घंटों धुएं की धूनी दी गई. फिर तांत्रिक ने एक हाथ पकड़ कर पूरे हाथ पर खुशबूदार तेल की मालिश की. रधिया को गैर मर्द का छूना बहुत खराब लगा, मगर वह मजबूर थी. वह उसे रोक भी नहीं सकती थी.

इस तरह लगातार 8 रातों तक बारीबारी से वह तांत्रिक धूप दिखा कर खुशबूदार तेल से अलगअलग अंगों की रगड़ कर मालिश करता रहा.

9वीं रात थी. हमेशा की तरह 9 बजे पूजा शुरू हुई, आज रधिया के पूरे शरीर से कपड़े उतार कर धूप दिखाने और खुशबूदार तेल से मालिश करने के बाद पूजा पूरी होनी थी. आज भी रधिया कुछ न बोल सकी. तांत्रिक के कहने पर उस ने सारे कपड़े उतार दिए. वह साधु के सामने ऐसे खड़ी थी जैसे कोई भोग किसी के लिए परोसा गया हो.

साधु रधिया की मालिश करने लगा. थोड़ी देर के बाद उस ने अपनेआप को साधु के हवाले कर दिया. उस के पास और कोई चारा भी तो नहीं था. ससुराल वाले साधु के पक्ष में जो थे. साधु जी भर कर भूखे भेडि़ए की तरह रधिया को सारी रात नोचता रहा. सुबह साधु की विदाई बड़ी इज्जत के साथ की गई.

रधिया को पूजा का फल मिल चुका था. समय पूरा होने पर उस की सास को तांत्रिक महाराज की मेहरबानी से चांद जैसा सुंदर और फूल जैसा प्यारा पोता मिला. सभी खुश थे. घर में घी के दीए जलाए गए. सास बहू को फिर से लक्ष्मी कह कर पुकारने लगीं, मगर रधिया का हाल ऐसा था, जैसे काटो तो खून नहीं. Romantic Story in Hindi

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