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लौरेंस औफ पंजाब – गैंगस्टर्स का ग्लैमराइजेशन

Lawrence Bishnoi: सिनेमा केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि संवाद का सशक्त माध्यम भी है. इसी परिभाषा का बेहतरीन उपयोग करते हुए बौलीवुड लगातार कुछ ऐसी फिल्में बनाता जा रहा है जिन के माध्यम से वह कुछ लोगों की इमेज को सुधारने का काम करते हुए उन्हें विलेन से हीरो बनाता रहा है. जब किसी बड़ी हस्ती की धूमिल छवि विवादों, अदालती मामलों या बदनामी के घेरे में आती है तो सिल्वर स्क्रीन/फिल्में उन के पक्ष को रखने व जनता की सहानुभूति बटोरने का सब से सशक्त माध्यम भी बन जाती हैं.

मोहम्मद अजहरुद्दीन और फिल्म ‘अजहर’

वर्ष 2016 में निर्देशक टोनी डिसूजा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘अजहर’ रिलीज हुई थी. यह फिल्म भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कैप्टन मोहम्मद अजहरुद्दीन पर बनाई गई थी और मोहम्मद अजहरुद्दीन का किरदार इमरान हाशमी ने निभाया था. क्रिकेट के भगवान माने जाने वाले अजहर जब मैच फिक्ंिसग के आरोपों में फंसे तो उन का कैरियर तबाह हो गया लेकिन इस फिल्म के बाद उन की छवि सुधर गई और वे एक बार फिर हीरो बन गए. फिल्म ‘अजहर’ ने मोहम्मद अजहरुद्दीन को पाकसाफ दिखाने की कोशिश करते हुए दिखाया कि उन्होंने जो कुछ भी किया वह अपने साथियों को बचाने या मजबूरी में किया. अंत में उन्हें एक क्लीन चिट वाला हीरो बना कर दिखाया गया.

संजय दत्त और फिल्म ‘संजू’

वर्ष 2018 में राज कुमार हिरानी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘संजू’ रिलीज हुई थी. यह कहानी अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर आधारित थी. इस में संजय दत्त का किरदार रणबीर कपूर ने निभाया है. सभी को पता है कि संजय दत्त की छवि एक बिगड़े हुए इंसान की रही है. वे कई वर्षों तक जेल की सजा भी काट चुके हैं लेकिन फिल्म ‘संजू’ ने उन की छवि को सुधारने का काम किया था.

फिल्मकार राजकुमार हिरानी का मकसद संजय दत्त पर लगे आतंकवादी के टैग को धो कर उन्हें केवल एक नासम?ा और हालात का शिकार इंसान दिखाना रहा. फिल्म ‘संजू’ में सारा दोष मीडिया की सनसनीखेज रिपोर्टिंग और संजय दत्त की ड्रग्स की लत पर डाल दिया गया. एके-56 रखने के गंभीर अपराध को एक पितापुत्र के भावनात्मक रिश्ते की आड़ में दबा दिया गया.

दाउद की बहन और फिल्म हसीना पारकर

अंडरवर्ल्ड सरगना दाउद की बहन हसीना पारकर की छवि को सुधारने के लिए फिल्मकार अपूर्व लाखिया 2017 में फिल्म ‘हसीना पारकर’ लाए थे, जिस में हसीना पारकर का किरदार श्रद्धा कपूर ने निभाया. यों तो अंडरवर्ल्ड डौन की बहन की छवि को सुधारना एक मुश्किल काम था लेकिन फिल्म ने इस की कोशिश की. हसीना पारकर को एक अपराधी के बजाय ऐसी महिला के रूप में दिखाया जो अपनों को खोने के बाद मजबूरी में अपराध की दुनिया में आती है.

इन सभी फिल्मों पर यदि गंभीरता या यों कहें कि बहुत बारीकी से गौर किया जाए तो इन फिल्मों में सफेद ?ाठ का सहारा ले कर नायक की गलतियों को छोटा कर और उन की मजबूरियों को बड़ा कर पेश किया गया है. हकीकत तो यह है कि बौलीवुड अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि परसैप्शन मैनेजमैंट की बड़ी मशीन बन चुका है.

गैंगस्टर लौरेंस बिश्नोई और डौक्युमैंट्री

फिल्मकार राघव दार की डौक्युमैंट्री फिल्म ‘लौरेंस औफ पंजाब’ भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जहां फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्मकार गैंगस्टर को खोजी पत्रकारिता के नाम पर पेश कर रहा है. यह डौक्युमैंट्री 27 अप्रैल से ओटीटी प्लेटफौर्म ‘जी 5’ पर स्ट्रीम होनी थी लेकिन 19 अप्रैल को जैसे ही ‘जी 5’ ने इस का ट्रेलर बाजार में जारी किया, वैसे ही विवाद शुरू हुआ. मगर ‘जी 5’ ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का ऐलान किया.

जी हां, जब से राघव दार निर्देशित डौक्युमैंट्री फिल्म ‘लौरेंस औफ पंजाब’ का ट्रेलर ओटीटी प्लेटफौर्म ‘जी 5’ की तरफ से रिलीज किया गया है, तब से इस के खिलाफ माहौल गरमा गया है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि पंजाब की धरती वीरों की है या गैंगस्टरों की? मशहूर पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला के मर्डर केस में मुख्य आरोपी और जेल में बंद गैंगस्टर लौरेंस बिश्नोई पर आधारित इस डौक्युमैंट्री को ले कर पंजाब में गुस्सा चरम पर है.

यह डौक्युमैंट्री लौरेंस बिश्नोई के छात्र राजनीति से ले कर जुर्म की दुनिया का सब से बड़ा नाम बनने तक के सफर को दिखाती है. इस में दिखाया गया है कि कैसे पंजाब के एक अमीर परिवार का लड़का अपराध के दलदल में धंसता चला गया लेकिन विवाद इस की कहानी से ज्यादा इस के ग्लोरिफिकेशन यानी अपराधी को बड़ा दिखाने के तरीके को ले कर है.

सिद्धू मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह ने जताया कड़ा एतराज

इस विवाद की आग में आहूति डालने का काम सब से पहले सिद्धू मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह ने यह कह कर किया कि, ‘मेरा बेटा चला गया, अब उस के हत्यारों को सैलिब्रिटी बनाया जा रहा है.’ बलकौर सिंह ने सरकार और ओटीटी प्लेटफौर्म पर सवाल उठाए कि आखिर एक गैंगस्टर के जीवन को इतना ग्लैमराइज क्यों किया जा रहा है? उन का दर्द जायज है, क्योंकि इंसाफ की लड़ाई अभी भी कोर्ट में जारी है. उस के बाद सिद्धू मूसेवाला के फैंस भी सक्रिय हो गए और सोशल मीडिया पर इस फिल्म के खिलाफ आग उगली जाने लगी.

सिद्धू मूसेवाला के फैंस का भी मानना है कि यह डौक्युमैंट्री लौरेंस बिश्नोई के प्रति लोगों की सहानुभूति बटोरने के मकसद से बनाई गई है जोकि पूरी तरह से न्याय प्रणाली और पीडि़त परिवार के लिए अपमानजनक है. वहीं, पंजाब कांग्रेस के साथ ही पंजाब पुलिस भी इस डौक्युमैंट्री को बैन करने की मांग करने लगी. पंजाब सरकार और पुलिस लंबे समय से युवाओं को हथियारों और अपराध की चमकधमक से दूर रखने की कोशिश कर रही है. आलोचकों का तर्क है कि जब बड़े ओटीटी प्लेटफौर्म्स किसी गैंगस्टर के जीवन को ग्लैमराइज कर दिखाते हैं तो इस से युवा प्रभावित होते हैं.

पंजाब पुलिस का कड़ा रुख

पंजाब सरकार और पुलिस ने इस डौक्युमैंट्री को ले कर बेहद सख्त रुख अपनाया है. पंजाब के पुलिस महानिदेशक गौरव यादव ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सामग्री को राज्य की शांति भंग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. पंजाब पुलिस का मानना है कि फिल्म में दिखाए गए नाटकीय चित्रण और वास्तविक फुटेज का मिश्रण संगठित अपराध को सही ठहराने जैसा है. इस से सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड जैसे संवेदनशील मामलों की जांच और गवाहों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है.

निर्देशक राघव दार की सफाई

डौक्युमैंट्री फिल्म ‘लौरेंस औफ पंजाब’ के निर्देशक राघव दार की यह कोई पहली फिल्म नहीं है. राघव दार ने अपने कैरियर की शुरुआत मणिरत्नम के साथ बतौर सहायक निर्देशक फिल्म ‘गुरु’ से की थी. उस के बाद राघव दार ने लंबे समय तक संजय लीला भंसाली के साथ काम किया. राघव दार ने संजय लीला भंसाली निर्मित फिल्म ‘माई फ्रैंड पिंटो’ का निर्देशन किया था, जोकि 2011 में रिलीज हुई थी. राघव दार लिखित व निर्देशित डौक्युमैंट्री ‘मुंबई माफिया: पुलिस बनाम अंडरवर्ल्ड’ नैटफ्लिक्स पर 2023 मे स्ट्रीम हुई थी और कई पुरस्कार भी जीते थे.

विवाद बढ़ने के बाद इस डौक्युमैंट्री के निर्देशक राघव दार ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘हमारा मकसद किसी को हीरो बनाना नहीं, बल्कि अपराध की जड़ को सम?ाना है.‘लौरेंस औफ पंजाब’ को हम ने सिर्फ एक क्राइम स्टोरी की तरह नहीं देखा. हमारा इरादा उन कारणों को समझना था कि ऐसे अपराधी बनते कैसे हैं. कैसा माहौल और कैसे सिस्टम उन्हें आकार देते हैं. यह डौक्युमैंट्री इन्फौर्मेटिव है और मानवीय पहलुओं को भी दिखाती है, ताकि लोग इस के खतरनाक नतीजों को समझ सकें. यह कोई बायोपिक या महिमामंडन नहीं है, बल्कि एक गहन खोजी डौक्युमैंट्री है. इस में दिखाया गया है कि कैसे एक सामान्य छात्र नेता अपराध की दुनिया का इतना बड़ा नाम बन गया.’’

अपराध का उदारीकरण

आखिरकार, ‘लौरेंस औफ पंजाब’ जैसी डौक्युमैंट्री हो या ‘संजू’ और ‘अजहर’ जैसी बायोपिक्स ही क्यों न हों, ये सभी एक बड़े सवाल के घेरे में हैं. अहम सवाल तो यही है कि क्या मनोरंजन के नाम पर समाज के नैतिक मूल्यों से सम?ाता किया जा सकता है? जब सिनेमा किसी अपराधी के अतीत को भावुक संगीत और मजबूरी की चादर में लपेट कर पेश करता है तो वह अनजाने में ही सही, अपराध के प्रति समाज की नफरत को कम कर देता है.

यदि फिल्में इसी तरह छवि सुधारने का औजार बन जाएंगी तो आने वाली पीढि़यां न्याय और अन्याय के बीच का फर्क भूल जाएंगी. आज जरूरत इस बात की है कि फिल्मकार अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझें और ओटीटी प्लेटफौर्म्स ज्यादा से जयादा दर्शक बटोरने की दौड़ में गन कल्चर को ग्लैमरस बनाना बंद करें. फिलहाल पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस डौक्युमैंट्री को रिलीज करने की अनुमति दे दी है लेकिन सख्त शर्तें जोड़ी गई हैं. जी 5 के निर्माताओं को टाइटल से ‘लौरेंस’ और ‘पंजाब’ शब्दों को हटाने का निर्देश दिया है. Lawrence Bishnoi

मध्यम वर्ग से दूर जाती कारें

Middle Class Cars: कारें लग्जरी नहीं जरूरत का सामान है. इस के बाद भी कार उत्पादक कंपनियों और सरकार की नीतियों ने मध्यम वर्ग और महिलाओं का कार को दूर कर दिया है. कार कंपनियां छोटी बजट कारों की जगह महंगी एसयूवी कारों को बेचना मुनाफे का सौदा समझ रही हैं. एसयूवी जैसे कारें महिलाओं को चलाने में असुविधाजनक होती हैं. घरों में अभी भी कारें पुरूष वर्ग की पसंद से आती हैं. पहले छोटी कारें आती थीं तो घर की महिला और पुरूष दोनों ही चला लेते थे. अब महंगी एसयूवी कारें महिलाओं के लिए असुविधाजनक होती हैं.

हेनरी फोर्ड को मौडल टी वाली सस्ती कारें बनाने के लिए याद किया जाता है. अमेरिका में मौडल टी कारों के पहले कारें केवल अमीरों के लिए होती थी. इस को विलासिता के लिए प्रयोग किया जाता था. हेनरी फोर्ड को लगता था कि कारें लेबर वर्ग के लिए भी होनी चाहिए. कार केवल अमीरों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए. साधारण कामकाजी या किसान भी इसे खरीद सके. हेनरी ने सस्ती कार बनाने की दिशा में काम करना शुरू किया. हेनरी की असैंबली लाइन तकनीक बहुत मशहूर हुई. जिस से किफायती कारें लोगों को मिल सकी.

हेनरी फोर्ड फोर्ड मोटर कंपनी के संस्थापक थे. हेनरी फोर्ड ने अपना कैरियर मोटर मैकेनिक के रूप में किया था. उन की रूचि कार को बेहतर बनाने में थी. 1885 में फोर्ड ने एक ओटो इंजन की मरम्मत की. 1887 में उन्होंने एक इंच बोर और तीन इंच स्ट्रोक वाला चार सिलेंडर मौडल बनाया. 1890 में फोर्ड ने दो सिलैंडर इंजन पर काम शुरू किया. 1892 में उन्होंने पहली मोटर कार पूरी की जो दो सिलैंडर चार हार्सपावर मोटर द्वारा चलती थी. जिस का बोर ढाई इंच और स्ट्रोक छह इंच था. यह मोटर बेल्ट द्वारा काउंटर शाफ्ट से और फिर चेन द्वारा पिछले पहिए से जुड़ी थी. बेल्ट को क्लच लीवर द्वारा शिफ्ट किया जाता था ताकि 10 या 20 मील प्रति घंटे की गति को नियंत्रित किया जा सके.

हेनरी फोर्ड ने सी. हेरोल्ड विल्स की मदद से 1901 में 26 हार्सपावर की एक औटोमोबाइल कार तैयार की. इस के बाद ही 1903 में फोर्ड मोटर कंपनी की स्थापना की थी. 1908 में हेनरी फोर्ड ने मौडल टी तैयार किया. इस में स्टीयरिंग व्हील बाईं ओर था. 1913 में फोर्ड असेंबली लाइन बनी. इस के बाद ही मोटर कार की दुनिया में क्रांति आई. इस से कारें सस्ती हुई तो 1914 में 2 लाख 50 हजार कारें बिकी. 1916 में यह संख्या बढ़ कर 4 लाख 72 हजार हो गई.

1918 तक अमेरिका में सभी कारों में से आधी मैडौल टी थीं. यह सभी कारें काले रंग की थी. काला रंग जल्दी सूख जाता था जिस से कार का उत्पादन तेजी से हो सकता था. काले रंग की दूसरी खासियत ग्राहक अपने मनपंसद रंग में रंगवा सके. इन का रंग जल्दी खराब न हो. लेबर जैसे लोग इस को ले कर चलें तो देखने में खराब भी न लगे. मौडल टी कारों का इंजन सरल था. इस को ठीक करना सरल था. छोटीमोटी खराबी चलाने वाला खुद ठीक कर लेता था. हर कार में एक जैसे पार्ट्स लगते थे. जिस से रिपेयर और उत्पादन दोनों सरल हो गए थे.

हेनरी ने मौडल टी के उत्पादन की गति 12.5 घंटे से घटा कर 93 मिनट कर दी जिस से लागत में जबरदस्त कमी आई. मौडल टी कार को खराब रास्तों पर चलने के लिए आसान और मरम्मत में सरल बनाया गया था. इस में स्टील की जगह हल्की और सस्ती सामग्री का उपयोग किया गया. जिस से उत्पादन लागत कम रही. इस के चलते 1908 में 850 डौलर की बिकने वाली मौडल टी 1925 तक 260 डौलर में मिलने लगी थी.

जर्मनी की ‘पीपुल्स कार’:

जर्मनी की वौक्सवैगन कार भी इसी तरह से सस्ती मानी जाती थी. वौक्सवैगन को जर्मनी में ‘पीपुल्स कार’ यानि ‘जनता की कार’ कहा जाता था. इस में वौक्सवैगन वीटल सब से मशहूर मौडल था. वीटल को बग भी कहा जाता है. जो एक तरह का कीड़ा होता है. इस कार को इसी तरह से गोल आकार में डिजाइन किया गया था. लोग इस कार को ‘वीडब्ल्यू बग’ भी कहने लगे थे.

1950-60 में वौक्सवैगन वीटल अमेरिका ओर यूरोप में बहुत मशहूर थी. इस की वजह कीमत का कम होना था. 1950 में अमेरिका में इस की कीमत 1600 डौलर थी. सस्ती कार होने की वजह यह थी कि इस में प्रयोग की गई टेक्नोलौजी सरल और सस्ती थी. इस का एयर कूल्ड इंजन सरल था. पार्ट्स आसान से मिल जाते थे. कार का माइलेज अच्छा था. यह टिकाऊ माना जाता था. उस दौर में 2 करोड़ से अधिक वीटल कारें बनी थी.

भारत की सड़कों सालों राज करने वाली एंबैसेडर कार

एंबैसेडर कार भारत में दशकों तक प्रधानमंत्री से ले कर आम आदमी तक के पास पाई जाती थी. कम लागत के कारण यह सालोंसाल चलती थी. आराम से रिपेयर हो जाती थी. हिंदुस्तान मोटर्स ने साल 1958 में एंबैसेडर कार को बनाना शुरु किया था. इस को ब्रिटेन के मोरिस औक्सफोर्ड सिरीज 3 कार के मौडल के अनुसार बनाया गया था. एंबेसडर पहली ऐसी कार थी जिस को भारत में बनाया गया था. एक दौर में भारत में इस को स्टेट्स सिंबल माना जाता था. यह एक ऐसी कार थी जिसे आम आदमी से ले कर बड़ेबड़े नेता इस्तेमाल करते थे. लाल बत्ती हमेशा सफेद एंबैसेडर पर ही इस्तेमाल की जाती थी.

हर साल करीब 25 हजार गाड़ियां बिकती थीं. ब्रिटेन से प्रेरणा लेने के बावजूद एंबैसेडर को हमेशा ही इंडियन कार कहा जाता है. इसे ‘किंग औफ इंडियन रोड‘ का दर्जा भी मिला. इस के कई मौडल और वर्जन आए. जिन में मार्क 1, मार्क 2, मार्क 3, मार्क 4, एंबैसेडर नोवा, एंबैसेडर 1800 आईएसजेड प्रमुख हैं. ये सभी मौडल 1992 के पहले लान्च किए गए थे. यह एक पावरफुल कार थी. जो पेट्रोल और डीजल दोनों से चलती थी. ताकत में यह आज की एसयूीव से कम नहीं थी.

वीएम बिड़ला ने एचएम मोटर्स यानि हिन्दूस्तान मोटर्स की स्थापना 1942 में गुजरात में की थी. पहले यह फैक्ट्री गुजरात के ओखा पोर्ट पर असैंबलिग करती थी. 1948 में फैक्ट्री पश्चिम बंगाल के उत्तरपारा में शिफ्ट हो गई. 275 एकड़ की विशाल फैक्ट्री में 90 एकड़ में कार बनाने का प्लांट लगा था. भारत सरकार इस बार की सब से बड़ी खरीददार थी. एशिया का यह दूसरा सब से बडा प्लांट था. पहला टोयटा का प्लांट जापान में था.

1980 के दशक में मारुति सुजुकी के भारत आने के बाद भारतीय बाजार में इस का वर्चस्व कम हुआ. मारुति की नई गाड़ी एंबैसेडर से कम कीमत पर मिलती थी. इस का माइलेज और स्पीड अधिक थी. मारूती का रखरखाव महंगा था. इन की लाइफ कम थी. इन को रिपेयर करना सरल नहीं था. मारुति और नई कार कंपनियों के आने से एंबैसेडर कार का बाजार खत्म हो गया. 2014 में कंपनी ने कार बनाना बंद कर दिया.

नैनो बनी थी लखटकिया कार:

अमेरिका में जो सपना हेनरी फोर्ट ने देखा और उसे साकार किया वही सपना साल 2003 में भारत में रतन टाटा ने देखा. रतन टाटा ने बेंगलुरु में बारिश के दौरान शाम को एक स्कूटर पर 4 लोगों के परिवार को गीली सड़क पर यात्रा करते देखा. वह भीग रहे थे. रतन टाटा को लगा कि उन को ऐसे लोगों के लिए कार का निर्माण करना चाहिए. जिससे मोटर साइकिल और स्कूटर पर चलने वाला भी अपनी कार खरीद सके. इस के लिए वह एक लाख में बिकने वाली नैनो कार ले कर आए. 10 जनवरी 2008 को दिल्ली औटो एक्सपो में दुनिया की सब से सस्ती कार के रूप में 1 लाख वाली की ‘लखटकिया‘ कार बाजार में आई. इस ने कार बाजार में धूम मचाई. इस को ‘पीपुल्स कार’ कहा गया.

नैनो कार 624 सीसी, 33 ब्रेक हार्स पावर के पीछे की ओर इंजन वाली 4 दरवाजे की कार थी. यह अपने समय के हिसाब से काफी व्यावहारिक थी. भारत में कार पर चलने वाला दिखावे पर भरोसा करता है ऐसे में सब से सस्ती कार के रूप में इस का प्रचार गलत साबित हुआ. पश्चिम बंगाल के सिंगूर में फैक्ट्री हटाने के विवाद को ले कर हुए विवाद के कारण नैनो का उत्पादन गुजरात में ले जाना पड़ा. जिस से कार को बाजार में लाने में देरी हुई.

10 साल के बाद 2018 के आसपास इस का उत्पादन धीरेधीरे बंद कर दिया गया. अब कार बनाने वालों को समझ आ गया था कि भारत में कार दिखावे के लिए लोग लेते हैं. सरकार की मिलीभगत से सस्ती कारों को बाजार से बाहर कर दिया गया. जिस से मिडिल क्लास कार के सफर को शान की सवारी न समझे और न ही अपर क्लास के साथ मुकाबला कर सके. आज कार बनाने वाली कंपनियां महंगी कार बनाने को ही अपना मुख्य आधार बनाया है. इस के चलते बड़ी और मंहगी कारों का बाजार बढ़ रहा है.

महंगी गाड़ियों का बढ़ता बाजार

भारत में महंगी कारों का बाजार तेजी से बढ़ गया है. जो 2026 में 10.71 फीसदी से बढ़ कर 9.19 अरब डौलर तक पहुंचने का अनुमान है. बड़ी कारों में एसयूवी और लग्जरी एमपीवी की भारी मांग है. मर्सिडीज, वीएमडब्ल्यू, और औडी जैसे ब्रांड भारतीय बाजार में अपना जलवा दिखा दिया है. 2025 में देश में लग्जरी कार बाजार 37 बिलियन डौलर का था, जिस के 2033 तक 60 बिलियन डौलर तक पहुंचने की उम्मीद है. 2020 में 10,120 यूनिट की तुलना में, 60 लाख से अधिक की कारें 2025 में बिकी. यह लगभग 39,859 यूनिट तक पहुंच गई हैं. अमीर लोग और नए बिजनेसमैन भी लग्जरी कारों के प्रमुख खरीदार हैं. इन में मर्सिडीज बेंज, एसयूीव, औडी, जगुआर लैंड रोवर, और टोयोटा लेक्सस जैसे ब्रांड भारतीय बाजार में खूब पंसद किए जा रहे हैं.

साल 2025 के आंकड़ें देखे तो कार कंपनियों ने मंहगी कारें ज्यादा बेची हैं. सब से अधिक कार बेचने वाली कंपनियों में मारुती सुजुकी 18 लाख 6 हजार 515 कारें, महिंद्रा ने 6 लाख 25 हजार 603, टाटा ने 5 लाख 78 हजार 772, हुंडई ने 5 लाख 71 हजार 878, टोयटा ने 3 लाख 51 हजार 582, किया ने 2 लाख 80 हजार 268, स्कोडा ने 72 हजार 665, एमजी ने 70 हजार 555, होंडा ने 61 हजार 485, वीडब्ल्यू ने 39 हजार 137, रेनौल्ट ने 38 हजार 065, निषान ने 22 हजार 606, क्लिट्रोन ने 7 हजार 898 और जीप ने 3 हजार 348 गाड़ियां बेची थी.

कारें मध्यम वर्ग की पहुंच से दूर हो रही है. सरकारी कानूनों के हिसाब से अब 15 साल से पुरानी कारों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है. बढ़ते प्रदूषण का बहाना बना कर पुराने मौडल वाली कारों का चलना धीरे पूरे देश में बंद करने की योजना है. इस के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कई सख्त नीतियां लागू कर रही हैं. जिन का उद्देश्य निजी कारों का इस्तेमाल कम करना और पुराने वाहनों को शहरों से बाहर करना है.

आम आदमी की पहुंच से दूर कार:

अब सरकार की इन नीतियों का प्रभाव नागरिक परिवहन में देखने को मिलने लगा है. दूसरी तरफ सरकारी वाहन अभी भी सड़कों पर धुआं उड़ाते घूम रहे हैं. सरकार को इन के धुएं से फैलने वाला प्रदूषण नहीं दिखता है. शहरों में प्रदूषण फैलने के तमाम कारण है सरकार को केवल वाहन ही दिखते हैं. क्योंकि वह कार बनाने वाली कंपनियों के दबाव में काम कर रही हैं. व्हीकल स्क्रैपेज पौलिसी के तहत भारत सरकार ने 15 साल से पुराने व्यावसायिक वाहनों और 20 साल से पुरानी निजी कारों को ‘एंड-औफ-लाइफ‘ घोषित कर स्क्रैप यानि कबाड़ मान लिया है.

दिल्ली में 10 साल पुराने डीजल और 15 साल पुराने पेट्रोल वाहनों को चलाने पर सख्त रोक लगा दी गई है. सरकार ने इन गाड़ियों को प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र देना बंद कर दिया है. इस से इन को किसी पेट्रोल पंप पर पेट्रोल नहीं मिलेगा. सरकार ने इस के लिए ‘नो पीयूसी, नो फ्यूल’ पौलिसी अपनाई है. सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों को खरीदने पर सब्सिडी दे रही है. यही नहीं कई शहरों में औन स्ट्रीट पार्किंग महंगी की जा रही है और ‘नो व्हीकल जोन‘ बनाए जा रहे हैं. जिस से मध्यम वर्ग के लोग गाड़ी खड़ी करने की परेशानी के चलते कारें न ले सके.

मध्यम वर्गीय परिवारों के पास रहने की जगह ही कम होती है. ऐसे में वह अपने घरों में कार खड़ी नहीं कर सकते हैं. सड़कों पर कार खड़ी करने पर पुलिस के चालान का डर रहता है. कार में टूटफूट और चोरी का खतरा भी रहता है. प्राइवेट पार्किग में एक कार खड़ी करने का मासिक खर्च 2 हजार से 3 हजार के बीच लिया जा रहा है. अपार्टमेंट में भी एक ही गाड़ी खड़ी करने की जगह दी जाती है. अगर दूसरी गाड़ी खड़ी करनी होती है तो उस का किराया अलग से देना होता है. गाड़ी खरीदने से ले कर उस की पार्किंग तक में इतनी दिक्कतें होती हैं कि मध्यम वर्गीय लोग कार खरीद ही न सकें. महाराष्ट्र में नई कार रजिस्ट्रेशन के लिए पार्किंग स्पेस का सबूत अनिवार्य करने का प्रस्ताव है.

आज कार की दुनिया में हेनरी फोर्ट का नाम इसलिए लोग लेते हैं क्योंकि वह यह सोचते थे कि मध्यम वर्ग और मजदूर भी कैसे कारों का प्रयोग कर सके. उन की कार सालोंसाल चलती थी. उस के कलपुर्जे ऐसे होते थे जिन को आसानी से बदला जा सकता था. कार कंपनियां सालों साल अपनी कारों के कलपुर्जे बनाना बंद नहीं करती थी. आज कार कंपनियां कारों में तमाम ऐसे सामान लगाती हैं जिन की कोई जरूरत नहीं होती है. इलेक्ट्रिक कारों को मोबाइल से जोड़ दिया गया है.

आज की कारें जल्दी खराब होने वाली होती हैं. इन का रखरखाव महंगा हो गया है. जिस से मध्यम वर्गीय इन को खरीदने की सोच भी नहीं सकता है. अमीर और गरीब का फर्क समाज में दिखे सरकार और कार कंपनियां इस सोच के हिसाब से काम कर रही हैं. इस वजह से कारें मध्यम वर्ग से दूर होती जा रही है. आज समाज का एक बड़ा वर्ग माह का 15-20 हजार का वेतन पा रहा है. वह वह सस्ती कार भी खरीदने ही हालत में नहीं होता है.

अगर ईएमआई पर खरीद ले तो कार के रखरखाव और डीजल पेट्रोल में ही आधा वेतन खर्च हो जाता है. बड़ी कार तो उस के लिए सपने जैसे होती है. पहले कार सालोंसाल चलती थी तो पिता खरीदता था पुत्र चलाता था. अब कार कंपनी ही 4-5 साल में कार के कलपुर्जे बनाना बंद कर देती है जिस से जल्दीजल्दी नई कार खरीदना ही मुश्किल हो जाता है. कार दिखावे का कारण बन गई जैसे आजादी से पहले बड़े लोग बग्घी से चलते थे आज के बड़े लोग मंहगी कार से चलते हैं. इस से क्लास का फर्क दिखता रहता है. महंगी कारों ने समाज में बराबरी का दर्जा खत्म कर दिया है.

इस का एक असर घर की महिलाओं पर यह दिखने लगा है कि वह अब एसयूवी कार चलाने से बचने लगी हैं. अब वह कार चलाती कम दिख रही हैं. महंगी होने की वजह से इस को खरीद पाना भी संभव नहीं हो रहा है. जिस से वह कार की अपेक्षा स्कूटी का प्रयोग अधिक करने लगी है. यह बात और है कि इस में तमाम असुविधाएं हैं. कार कंपनियों को इन घरेलू महिलाओं की जरूरत का ध्यान रखना चाहिए. अगर इन की सुविधा, पंसद और जरूरत के हिसाब से कारें डिजाइन की जाए तो वह भी खूब बिक सकती हैं. Middle Class Cars

मोबाइल नहीं, तेल और फैक्ट्रियां चलाती हैं दुनिया

Gen Z Culture: ईरान और अमेरिका-इजराइल वार ने एक बात तो फिर प्रूव कर दी कि जेनजी सोशल मीडिया पर चाहे जितना डिपैंड हो कर लाइफ के फुलफिलमैंट को माने, आखिर में सौलिड चीजें ही काम में आती हैं. नेपाल में जेनजी तब भड़की थी जब पिछली सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफौर्म बैन किए थे और उस ने जेनजी इन्फ्लुएंसरों की सरकार भी अब बना ली लेकिन ईरान और अमेरिकाइजराइल वार ने तेल की कमी पैदा कर और शिप्स को रोक कर जता दिया कि जिंदगी मैसेजों से नहीं चलेगी, सौलिड चीजों से चलेगी.

जेनजी सोशल मीडिया के ओशियन में इस कदर डूबी थी कि उसे मालूम ही नहीं था कि उस का खाना, पानी, बिजली, टैलीकौम सर्विसेस छोटे से मोबाइल से नहीं निकलते बल्कि बड़ी फैक्ट्रियों से आते हैं और वे बंद हो गईं तो सोशल मीडिया मरे चूहे की तरह रह जाएगा. डोनाल्ड ट्रंप की सरकार आज मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) एक्टिविस्ट्स की देन है जो या तो अपनी नौलेज चर्च के सरमन से लेते हैं या सोशल मीडिया से. उन के पास सोशल मीडिया भी दूसरे मागा ही भेजते हैं. सोशल मीडिया का एल्गोरिदम ऐसा है कि आप को यह वही बात बारबार बताएगा.

अगर अमेरिकियों ने ट्रंप के प्रवचन सोशल मीडिया पर सुन कर कि ‘ईरान के पास एटमबम हैं’ और इसे दोतीन बार कहीं कुछ देख लिया तो सैकड़ों मैसेजेज, रील्स, यूट्यूब क्लिप इस तरह के टपकने लगेंगे कि ईरान तो जैसे तेलअवीव पर आज ही एटमबम फोड़ने वाला है. सोशल मीडिया जंगल में घुमावदार रास्ते बनाता है और लोग एक की पहाड़ के घने जंगल में सर्कलिंग कर के निकलने की कोशिश करने के दौरान सोचने लगते हैं कि बस यही दुनिया है. 20-25 दिन औयल कम मिला, गैस नहीं मिली, मैटल्स नहीं मिले कि सारी दुनिया की टैक कंपनियों की हेकड़ी और एरोगैंस फटाक से गिर पड़े. सब को पता चल गया कि इन सौलिड चीजों की कमी का क्या मतलब है.

इस वार ने यह भी साबित कर दिया कि फेक नैरेटिव किस तरह जनता को बहका सकता है. लोग भूल जाएं कि सही या गलत क्या है क्योंकि ट्रंप हों, खामेनेई हों, नेतन्याहू हों, सभी भीम तो खूब बने पर मिसाइलें और उन को इंटरसैप्ट करने वाले काउंटर मेजर नहीं बने. भीम भी इतने सारे कि किसी भीम का कोई असर पब्लिक ओपीनियन बनाने के लायक नहीं. इस वार ने यदि यंग जनरेशन को एकजुट कर दिया है तो भी कुछ भला न होगा. जेनजी, जेनअल्फा हों या हों जेनमिलेनियल, उन्हें मोबाइल कल्चर को अपनी लाइफ का ओनली सपोर्ट सिस्टम सम?ाना बंद करना होगा.

हार्ड फैक्ट्स प्रिंट मीडिया में ही मिलेंगे जहां 15 सैकंड में नहीं बल्कि 15 मिनट किसी बात के पूरी तरह पढ़ने और उसे सही से डाइजैस्ट करने में लगते होंगे. जेनजी जो सोच रही है कि वे मीम्स के जरिए रेवोल्यूशन ला रहे हैं, वे सोच लें कि रेवोल्यूशन तो पूरी तरह मोटीमोटी किताबों से आता है. बाइबिल भी 700 पेजों की भारीभरकम किताब है, वेद भी कुरान भी. इन्होंने अपने जमाने में बहकाने का जम कर काम किया पर इन मोटी किताबों के सहारे. इन का मुकाबला इसी तरह की किताबों से ही हो सकता है.

इस वार से सोचिए कि मोबाइल होल्डरों से कुछ फायरवर्क्स के अलावा क्या सीखने को मिला है. नहीं सोचोगे, तो जब 50-60 वर्ष के होगे तो रहने को सिर्फ सड़कें होंगी, पहनने को चिथड़े. अमेरिका में होमलैस लोगों की गिनती बढ़ रही है जो सब सोशल मीडिया पर ऐक्टिव हैं लेकिन दानेदाने को तरसते हैं और कूड़े के ढेर से खाना बटोरते हैं.

 प्लेटफौर्म के चक्कर में फुलिश बनती जनरेशन

इजराइल  के कहने पर अमेरिका को ईरान से जंग करना बड़ा महंगा पड़ रहा है. उस के कम से कम 25 बिलियन डौलर के वार इक्विपमैंट स्वाहा हो गए हैं और अमेरिकी पौपुलेशन अब पैट्रोल, ग्रोसरी के ज्यादा पैसे तो दे ही रही है, उस पर सरकार का लिया 36 ट्रिलियन डौलर का लोन और कई ट्रिलियन बढ़ गया है जिस का इंटरैस्ट अमेरिकी टैक्सपेयर दे रहे हैं.

यह कहां पढ़ा? यह पढ़ा नहीं, इंस्टाग्राम की रील में देखा. ‘ब्रीजी पौलिटिक्स’ नाम के अकाउंट में सैंफ वीगर जर्नलिस्ट जनता को इन्फौर्म करता नजर आ रहा है. 15-20 सैकंड की एक पोस्ट से क्या अमेरिकी सरकार, संसद, मीडिया हिल जाएगी? ‘ब्रीजी पौलिटिक्स’ के 4 लाख मुफ्तखोर फौलोअर्स हैं और इस इन्फ्लुएंसर ने 1,367 पोस्ट अपलोड की हैं पर फिर भी इस पोस्ट पर सिर्फ 529 कमैंट मिले, 1,766 ने इसे रीपोस्ट किया और 2,200 ने बुकमार्क लगा कर सेव किया.

यह रील डोनाल्ड ट्रंप ने देखी या संसद के कांग्रेसमैनों ने देखी, कोई पता नहीं क्योंकि वे ‘ब्रीजी पौलिटिक्स’ को फौलो नहीं करते. अमेरिका की इतनी बड़ी बात और उस का कोई असर नहीं. असर इसलिए भी नहीं कि अगर इंस्टाग्राम पर सर्च किया जाए कि अमेरिका ने इजराइल वार पर कितना खर्च किया तो सैकड़ों ‘नौलेजेबल’ इन्फ्लुएंसर्स की पोस्टें दिख जाएंगी. जो लगभग यही बात अपनेअपने तरीके से कह रहे होंगे. इन सब की रील्स में एक बात कौमन होगी कि मानो वे अकेले हैं जिन्होंने खूब यूएस गवर्नमैंट के डौक्युमैंट्स छानबीन कर यह बात पता की.

असल में एक ने कुछ कहा, दूसरा उसी पर 2 और बातों को जोड़ देगा और बीचबीच में अपने इरिटेटिंग कमैंट्स देता रहेगा. रील देखने वाला इसे कुछ सैकंड देखने के बाद अगली पर चला जाता है जिस में जेनजी का मजाक उड़ाया जा रहा है और फिर तीसरी पर जिस में लंबे किस्म के वाटरमैलन को काट कर दिखाया जा रहा है. ऐसा व्यूअर क्या जर्नलिस्ट सैंफ वीगर की बात को सीरियसली लेगा? क्या वह जेनजी की प्रौब्लम को भी सम?ोगा? क्या वह फार्मिंग में हो रही वाटरमैलन की रेवोल्यूशन को भी समझेगा?

सोशल मीडिया ने असल में सब को फुलिश बना डाला है क्योंकि इस से सक्सैस ईजी है. मदारी के खेल से आईपीएल गेमिंग तक आप को पहुंचने में 1 सैकंड का भी आधा टाइम लगता है और किसी सीरियस बात कहने वाली रील्स को स्विप करने के लिए जीरो सैकंड लगता है, सोशल मीडिया पर फौलोअर्स और व्यूज गिनगिन कर लोग खुश हो रहे हैं पर इन्हीं लोगों को बहका कर पौलिटिशियन, रिलीजियस गुरु और टैक बिजनैसमेन अरबों कमा रहे हैं और किसी को खबर नहीं हो रही.

सोशल मीडिया पावरफुल है पर एक क्राउड की तरह जो अपनी बात दोचार नारों और कागज पर प्रिंट किए स्लोगनों से कह सकती है, बस. अगर अपना, घर का, देश का और वर्ल्ड का फ्यूचर बनाना है, बचाना है तो सोशल मीडिया की चालबाजी को समझें, इस की रील्स नहीं हैं क्योंकि सोशल मीडिया के शातिर ओनर इन को सप्रैस कर रहे हैं. Gen Z Culture

 

Hindi Story: फैसला

Hindi Story: मैं नीरव, 38 वर्षीय, एक सुदर्शन और सौम्य स्वभाव का पुरुष. 8 साल पहले मेरी शादी आरती से हुई थी. 2 साल बीते, कोई संतान नहीं हुई. डाक्टरों की सलाह से इलाज शुरू हुआ. आखिरकार, 4 साल बाद हमारा बेटा आरव इस दुनिया में आया. पर खुशियां ठहरी नहीं. आरती ने बेटे को जन्म दे कर हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.

मैं ने एक महीने तक खुद बेटे की परवरिश की, पर घर चलाने के लिए नौकरी जरूरी थी और नौकरी के लिए घर से बाहर निकलना भी. खास रिश्तेदारों से मदद मांगी, पर कोई भी तैयार न था. सलाहें खूब मिलीं- मां ने कहा, ‘मैं कब तक रहूंगी, दूसरी शादी कर ले, मेरा भी सहारा हो जाएगा.’ बहन ने ?ां?ालाहटभरे स्वर में कहा, ‘दोदो बच्चे पाल रही हूं, भाभी के मायके में क्यों नहीं छोड़ देते बच्चे को?’

2 साल में मां साथ छोड़ गई. तब से आरव क्रैच में पल रहा था और मैं समय के हाथों खुद को ढो रहा था. तभी एक मित्र ने वैवाहिक वैबसाइट पर मेरी प्रोफाइल बना दी. कई प्रस्ताव आए. पर जैसे ही लड़कियों को पता चलता है कि मैं विधुर हूं और एक छोटे बच्चे का पिता भी, वे किनारा कर लेतीं.

लोग कहते हैं कि विधवाओं का जीवन बड़ा कठिन होता है पर विधुरों का भी कम कठिन नहीं होता. बिन मां के बच्चे को पालना उन के लिए भी कम कठिन नहीं. पहले लोग भरेपूरे घरों में भाईयोंबहनों के साथ रहते थे और रसोई हर समय चलती थी व घर में 10-12 बच्चे युवा होते थे, बिन मां का बच्चा भी जैसेतैसे पल जाता था.

अब हर बच्चा अपनी पसंद पूरी करना चाहता है. पढ़ाई का तनाव है. लड़कियां भी बहुत सोचसमझ कर विधुर या तलाकशुदा खासतौर पर बच्चे वालों के साथ शादी करती हैं, वे शादी को पहले दिन से एक बोझ नहीं बनाना चाहतीं.

एक बार एक लड़की बोली, ‘आप अच्छे हैं, लेकिन मैं किसी और के बच्चे की मां बनने का मानसिक बो?ा नहीं उठा सकती.’

दूसरी ने खुल कर कहा, ‘मैं एक नए जीवन की शुरुआत करना चाहती हूं, न कि पहले से बनी जिम्मेदारियों में उलझना.’

एक तीसरी लड़की ने व्यंग्य से पूछा, ‘आप को बीवी चाहिए या बेटे के लिए आया?’

इन अनुभवों ने मेरी हिम्मत को तोड़ कर रख दिया. मैं खुद से सवाल करने लगा- क्या मेरे बेटे का होना ही मेरी सब से बड़ी कमी है? तभी मृदुला का प्रस्ताव आया.

वह भी विधवा थी. उम्र लगभग 32 साल, रंगरूप साधारण. 2-3 दिनों बाद मैं बेटे को ले कर अचानक उस के घर पहुंच गया. वहां कोई न था. आसपड़ोस से पता किया तो किसी ने मृदुला के बारे में कुछ संदेहजनक बातें बताईं कि उस के पहले पति की मौत आग में झुलसने से हुई थी और वह मायके लौट आई थी.

मैं भीतर तक हिल गया. मुझे लगा जैसे चलती राह में कोई बड़ा गड्ढा सामने आ गया हो. मन बना लिया कि रिश्ता नहीं जोड़ना है.

पर उस से मिलने पर वह बातचीत में गंभीर और संतुलित लगी. उसे कोई शर्मिंदगी नहीं हुई कि उस का घर छोटा है. मैं अचानक उस के घर पहुंच गया था इसलिए कोई तैयारी नहीं थी. पर मृदुला ने आत्मीयता से मेरा स्वागत किया. खाने का सुंदर प्रबंध किया. पर मेरा बेटा सिर्फ दूधबिस्कुट ही खाता था. मृदुला ने बिना किसी औपचारिकता के उसे अंदर ले जा कर दूधबिस्कुट दिए और उस के सिर पर हाथ फेर कर उसे शांत किया.

मैं वापसी की राह पर था मन में एक न के साथ. मृदुला आरती के सामने कहीं नहीं ठहरती थी. उस के घर बैठेबैठे ही मैं सोेच रहा था कि कैसे मैं मृदुला को उन दोस्तों और उन की पत्नियों से मिलवाऊंगा जिन के लिए आरती एक आकर्षक, चमकदार, हंसतीबोलती, ठहाके लगाने वाली सखी थी जो हर पार्टी की शान होती थी. आरती भाभी, आरती भाभी की जगह क्या कोई कभी मृदुला भाभी कहेगा? क्या दोस्त मुझे मृदुला के साथ अपने घर बुलाएंगे.

घर पहुंच कर रात को आरव ने पूछ लिया, ‘‘पापा, आप नई मम्मी को कब लाओगे?’’

‘‘अभी नहीं, बेटा.’’

‘‘पापा, आज जिन आंटी से मिलने गए थे, उन से शादी कर लो न.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘उन्होंने मुझे बिना कुछ कहे दूधबिस्कुट दे दिए और सिर पर हाथ रख कर प्यार किया. उन्हें कैसे पता चला कि मुझे बहुत भूख लगी है?’’

बस, उस क्षण मुझे एहसास हुआ, जो संवेदना एक मां की हो सकती है, वही किसी में फिर से जन्म ले सकती है. मुझे यह भी समझ आया कि शायद मृदुला ने भी एक यातना से गुजर कर वही ममता अर्जित की है जो मेरे बेटे को चाहिए.

अब मैं मृदुला से विवाह के लिए ‘हां’ कहने जा रहा हूं. मैं ने तय कर लिया है कि मैं शादी अपने, आरव और मृदुला के लिए कर रहा हूं; दोस्तों, रिश्तेदारों, अपने भाईबहनों या आरती के भाईबहनों के लिए नहीं. मुझे फर्क नहीं पड़ता कि मृदुला के परिवार का फाइनैंशियल बैकग्राउंड क्या है? मैं ने तो तय कर लिया कि मैं उस की जाति तक न पूछूंगा.

‘मेरा फैसला सही तो है न?’ मैं मन ही मन विचार करने लगा, लेकिन, इस बार जवाब खुद मेरे अंदर से आया- हां, यह सिर्फ मेरा नहीं, आरव का भी फैसला है और सब से बड़ी बात यह है कि जिन आंखों से मृदुला ने भी सब को विदा किया था उन में आत्मविश्वास था, दया की भीख नहीं. Hindi Story

लेखिका – पूजा अग्निहोत्री

धरती में तुम समाती क्यों नहीं सीते

Inspirational Story: घर, पति, बच्चे, क्या एक स्त्री का वजूद इन्हीं से है? उस का खुद का आत्मसम्मान, व्यक्तित्व, अधिकार कुछ नहीं. शादी के 25 साल बाद सीता आज खुद को तलाश रही थी और इन्हीं ‘देखो, आखिरकार यह सीता सुंदरी वैडिंग रिजौर्ट तैयार हो ही गया,’ संजय ने उसे देखते हुए गर्व से कहा था, ‘अब तुम इस की मालकिन हो और इसे तुम्हें ही संचालित करना है.’ वह हंस कर रह गई थी. ठीक ही है. अब वह इसी बहाने व्यस्त रहेगी.

21 वर्ष की आयु में ही उन की शादी हो गई थी. रांची में मायका व्यापारिक था तो जमशेदपुर में ससुराल उस से भी बड़ा बिजनैस साम्राज्य वाला था. ऐसे में बच्चे कब हुए, बड़े हो कर पंखदार बने और उड़ चले, यह पता ही न चला. बड़े बेटे को अमेरिका जाने का शौक था. सो, वह उधर मैनेजमैंट की पढ़ाई करने अमेरिका क्या गया, वहीं का हो कर रह गया. दूसरे बेटे ने चार्टर्ड अकांउटैंसी पढ़तेपढ़ते अपना अलग बिजनैस मुंबई में खड़ा कर लिया था. बेटी अपनी ससुराल जा बसी थी.

उसे लगा कि अब उसे चैन मिलेगा. मगर चैन कहां था.

आरंभ से ही उस ने अपने पति संजयजी को कभी स्थिर नहीं देखा. उन के जमाजोड़ में हमेशा बिजनैस व व्यापार समाहित था. इतनी बड़ी प्रौपर्टी के मालिक होते हुए भी उन्हें चैन नहीं था. इस आदमी के पीछे उस ने अपनी सोने सी जिंदगी स्वाहा कर दी. दिन को दिन नहीं और रात को रात नहीं समझ और वे रुपए कमाने के लिए आजीवन भागते फिरे. इतना सारा रुपया कमाने और तमाम तामझाम बटोरने के बावजूद उन्हें चैन नहीं था. सातसात शहरों में मकान और 2 फ्लैट हैं इन के. उसी हिसाब से बिजनैस भी फैला हुआ है. फिर भी उस ने कोई शिकायत नहीं की.

और कितना चाहिए जीने के लिए. बीच में जब उन्हें कुछ कारोबारी परेशानी हुई तो बाबाओंसाधुओं के पीछे वे पागलों की तरह भागते फिरे थे लेकिन लाखों रुपए गंवा कर उन मंत्रतंत्र, टोनेटोटकों से कुछ न हुआ. उन से जब मोह भंग हुआ, तब तक समय कुछ और आगे खिसक चुका था. अब तो वे साधुओंबाबाओं के नाम पर ही बिदक जाते थे.

अब उन्हें समाजसेवा का फुतूर सवार हुआ था. पहले तो उसे भी लगा कि कोई चुनाव वगैरह लड़ने का चक्कर तो नहीं. चलो, कोई बात नहीं. यह भी दौर निकल ही जाएगा लेकिन वैसी कोई बात नहीं थी. राजनीति में उन की कोई रुचि नहीं थी. समाजसेवा करना इतना बुरा नहीं है. अब जब सबकुछ सही हुआ है तो वे यहां कुछ सदाशयता दिखा रहे हैं, सो, क्या बुरा कर रहे हैं.

पहले भी उस ने नहीं कहा था कि इन बाबाओं के पीछे भागो. कभी उस की इन में रुचि रही भी नहीं. मगर वे कभी हरिद्वार तो कभी कनखल के आश्रमों के चक्कर काटते रहे. उसे भी लगता रहा कि इहलोक के साथ परलोक भी सुधर जाए तो क्या बुरा है. यह कोई आश्चर्य की बात भी नहीं. बुढ़ापे में लोग अध्यात्म की ओर मुड़ते ही हैं. उसे तो यही लगा था कि चलो, अच्छा है कि मोहमाया से मुक्ति मिली. यह तो बाद में पता चला कि ये तथाकथित बाबा लोग भी बिजनैस के लिए संपर्कसूत्र के रूप में इन बिजनैसमैनों के लिए भी काम करते हैं.

हर बाबा की नजर दान से मिलने वाले पैसे और घरगाड़ी की सुविधाओं पर लगी रहती है. वैराग्य का उपदेश देने वाले सभी बाबा जम कर आधुनिक से आधुनिक गैजेट इस्तेमाल करते हैं और नाइकी के जूते, रोलैक्स की घडि़यां पहनते हैं. मगर उस दिन उस बाबा ने जो कुछ कहा, उस से उस का सर्वांग जल उठा था.

उन्हीं में से एक बाबा से उस ने कहा था कि इस दुनियावी भागदौड़ में उस का स्थान कहां है तो वे हंस कर बोले थे, ‘आप का इतना पावनपवित्र नाम सीता है, जो जगतजननी हैं. आप भी कुछ समाजसेवा किया करें तो समय सुंदर व्यतीत होगा. कुछ लोगों का समय बदलेगा तो कुछ का भविष्य संवर जाएगा.’

‘इन के नाम पर ही तो मैं शहर में एक सीता सुंदरी रिजौर्ट तैयार कर रहा हूं. उस में सारा कुछ तो इन्हीं के नाम है. जो भी आयव्यय होगा, इन के ही हस्ताक्षरों से तो होगा. मगर यह खुद ऐक्टिव नहीं होतीं, तो हम क्या करें? सो, हमें ही सारा कुछ मैनेज करना होता है. इन्हें कुछ समाजसेवा करनी ही चाहिए,’ संजय बोले थे.

अब यह समाजसेवा की कैसे जाए? तब संजय ने ही कुछ महिला समितियों के नाम सु?ा दिए थे. उन की किटी पार्टियों को देख कर जल्द ही मन ऊब गया कि क्या इसी को समाजसेवा कहते हैं. मगर जो था, सामने ही था. उसे ?ोलना मजबूरी थी. ऐसे में कुछ और संस्थाओं से उस का जुड़ाव हुआ था तो वह उन में अपना मन रमाने लगी थी.

इतने बड़े व्यापारिक साम्राज्य को जोड़ लेने के बाद भी उस के पति संजय को चैन नहीं था. बड़ा बेटा उन दिनों अमेरिका से भारत आया था तो उसे वे एक प्लौट दिखाने ले गए थे. ज्यादा कुछ नहीं, डेढ़ करोड़ रुपए का प्लौट था. उन का कहना था कि अगले 10 वर्षों में शहर फैलते हुए इधर ही आ जाएगा तो यहां एक बड़ा सा शौपिंग मौल बना लेंगे. बेटे ने आजिजी से  कहा, ‘अब हम कहांकहां रहेंगे और क्याक्या करेंगे, पापा. पहले ही मुझे अमेरिका से यहां आनेजाने में परेशानी होती है. आप शांति से रहिए. अच्छाभला तो आप का बिजनैस तथा रिजौर्ट भी चल ही रहा है, जो आप ने मां के नाम पर तैयार किया है.’

हां, उसी के नाम पर है रिजौर्ट- सीता सुंदरी वाटिका- है. और वह उस का मैनेजमैंट संभालती भी थी. मगर उस पर उस का कितना हक है, यह उसे उस दिन पता चला था.

दरअसल हुआ यह कि सिटी  क्लब नामक एक संस्था निर्धन युवतियों के सामूहिक विवाह का हर वर्ष आयोजन करती थी. चूंकि इस संस्था से वह जुड़ चुकी थी, उस की मीटिंगों में भी उस का आनाजाना होता था, ऐसे ही एक मीटिंग में संस्था के अध्यक्ष दीनदयालजी ने जानकारी दी कि इस बार निर्धन युवतियों के विवाह के लिए ढेरों आवेदन आए हुए हैं. सो, हम ने 100 युवतियों के विवाह का लक्ष्य रखा है. इस के लिए बड़ा खर्च तो होगा ही, समारोहस्थल भी बड़ा होना चाहिए. उसी पर विचार करना है.

अब यह विचार क्या करना था. लगभग सभी एकमत थे कि इस के लिए सीता सुंदरी रिजौर्ट ही उपयुक्त स्थल हो सकता है. इस के लिए उस की रजामंदी चाहिए थी. वह एकदम चौंक उठी थी. उस की रजामंदी से क्या तात्पर्य है उन का. आज तक उस ने कभी किसी काम में अपनी रजामंदी नहीं दी. कभी उस की जरूरत ही नहीं समझ गई या कभी उस से रायमशविरा किया गया. संजय ही सारे लेनदेन का ताम?ाम संभालते थे. सो, उस ने साफसाफ कहा कि पहले उस के पति से बात कर ली जाए.

उन दिनों संजय दिल्ली गए थे. बाद में पता चला कि वे उधर ही से फ्लाइट से मुंबई चले जाएंगे और उन का टूरप्रोग्राम 3-4 दिनों के लिए बढ़ सकता है. ऐसे में उस ने ?ि?ाकते हुए कहा था कि उन से पूछ कर बात करते हैं.

‘अरे मैडम, आप भी क्या बात करती हैं,’ संस्था के कोषाध्यक्ष रमाशंकर बोले थे, ‘संजय सर क्या आप के निर्णय से बाहर जाएंगे. वैसे भी, यह रिजौर्ट आप के नाम है. आप बस हां कर दीजिए. न हो, तो अभी उन से बात कर लीजिए.’

‘अब पता नहीं, वे किस मीटिंग में बिजी हों,’ उस ने बात टालने की कोशिश की, ‘रात में जब वे फुरसत में होंगे, मैं उन से बात कर जानकारी दे दूंगी.’

अब कुछ संयोग ऐसा रहा कि उसी समय संजय का फोन आ गया था. बातचीत के क्रम में उन्होंने पूछा कि कुछ कहना हो तो कहो. और तब उस ने संक्षेप में पूरी बात बता दी कि ये लोग इस बार का अपना सामूहिक वैवाहिक कार्यक्रम बड़े स्तर पर करना चाहते हैं. इस के लिए ये चाहते हैं कि वह आयोजन हमारे रिजौर्ट में किया जाए.

‘‘तो तुम निर्णय नहीं ले सकतीं क्या, वह सीता सुंदरी रिजौर्ट तो तुम्हारे नाम पर ही है न. तो एक तरह से मालकिन तो तुम ही हो,’’ वे बोले, ‘‘आखिर, शादीविवाह के लिए ही तो बना है वह रिजौर्ट. सो, उन के लिए बुक कर दो.’’

वह अभी यह कहना ही चाहती थी कि ‘वे तो रिजौर्ट को निशुल्क मांग रहे हैं’ कि संजय ने फोन बंद कर दिया और इसी के साथ जैसे उछल कर संस्था के कोषाध्यक्ष रमाशंकर सामने आ गए थे, ‘‘मैं ने कहा था न मैडम कि वे औब्जेक्शन नहीं करेंगे. वे तो आप को सीधे मालकिन ही मान रहे हैं. ऐसे में अब सिर्फ आप के हां की जरूरत है.

और इस तरह बात आगे बढ़ गई थी. वह तो विवाद तब उठा जब संजय यहां आ कर जाने कि वह रिजौर्ट उन्हें संस्था को निशुल्क देना होगा.

संजय को फिर दिल्ली टूर पर जाना था. ऐसे में सीता ने संस्था के पदाधिकारियों को सजेस्ट किया कि वे संजय से आमनेसामने बात कर लें और इसी के साथ संस्था के प्रतिनिधि शाम के समय उस के घर पहुंच गए थे. सारी बात सुन कर संजय बोले, ‘‘नहींनहीं, ऐसा कैसे हो सकता है. हम अपने भवन को फ्री में किसी को क्यों दें? सीता को बिजनैस के बारे में क्या पता है? हमें यहां सौ प्रकार के खर्चे झेलने होते हैं. स्टाफ को वेतन देना होता है. वह रिजौर्ट तो कभी किसी को निशुल्क नहीं दिया है, न ही देंगे.’’

संस्था के लोगों ने संजय को समझने की कोशिश की कि यह चैरिटी शो है. आप जैसे बिजनैसमैन के माध्यम से ही इस प्रकार के सामाजिक कार्य चला करते हैं. मगर वह सब व्यर्थ रहा. उन लोगों के सामने उन्होंने साफ कह दिया, ‘‘उस औरत को क्या पता बिजनैस के बारे में. कभी घर से बाहर निकली भी है, जो जानेगी कि दुनिया क्या और कैसी है. यहां सब मैं ही मैनेज करता हूं. पैसा कहां से आता है, कहां जाता है, यह मैं ही जानता हूं. मैं सम?ा नहीं पा रहा कि उस ने भावुकता के नाम पर आप को वैडिंग रिजौर्ट निशुल्क देने की स्वीकृति कैसे दे दी. बताइए, इतना बड़ा समारोह आप लोग कर रहे हैं, आप लोगों का लाखों रुपया खर्च हो रहा है.

‘‘निर्धन, निराश्रित लड़कियों की शादी कराना पुण्य का काम तो है ही और ऐसे में 100 लड़कियों की शादी तो और भी अच्छी बात है. निसंदेह आप की संस्था सराहनीय काम कर रही है लेकिन सारा कुछ निशुल्क तो नहीं है न. उन के लिए आप जो साजोसामान खरीद रहे हैं वह मुफ्त तो नहीं ही मिला होगा. सही है कि कुछ लोगों ने सामान के पैकेट दान किए और कुछ लोगों ने नकद रकमें दी हैं. तभी तो आप इतना कुछ कर पा रहे हैं. वहां हजारों लोगों का भोजन बनेगा. आजकल खाने की प्लेट भी हजार रुपए से कम में नहीं बैठती. फिर आप लोग हम से इतनी अपेक्षा क्यों किए बैठे हैं कि हम अपना रिजौर्ट फ्री कर दें? हमें बताइए कि आप को सीता सुंदरी रिजौर्ट निशुल्क क्यों चाहिए? बस, इसलिए कि सीता देवी ने इस के लिए हामी भर दी और आप तैयारियों में लग लिए. अरे, थोड़ाबहुत सब्सिडी ले लीजिए, और क्या चाहिए?

‘‘वह बेवकूफ औरत क्या जाने कि हमारे भी कितने खर्चे हैं. हम सरकार को आयकर भरते हैं. जीएसटी चुकानी पड़ती है हमें. और फिर बिजलीपानी, साफसफाई, मेंटिनैंस के खर्चे. यह सब आएगा कहां से? देख ही रहे हैं कि इन शादीविवाह के मौसम में लोडशेडिंग भी कितनी होती है. ऐसे में 4-5 घंटे जेनरेटर चला तो वही हजारों का तेल हजम कर जाता है. ऐसे में आप ही बताइए कि हम सारा कुछ निशुल्क कर सड़क पर आ जाएं?’’ संजय आवेश में बोले थे.

समिति के सभी सदस्य जड़वत बैठे उसी को देख रहे थे और वह शर्म से गड़ी जा रही थी. अब कार्यक्रम सामने था तो लेनदेन की बात हो रही है. क्या और किस को कहे वह कि उस के कहे का कोई मूल्य नहीं है. संजय ने ही तो उसे इस समूह के साथ जोड़ा था कि कुछ समाजसेवा तुम भी कर लो. और इस प्रकार वह इस संस्था से विगत 2 वर्षों से जुड़ी हुई थी. लेकिन आज की मीटिंग बिना कुछ तय किए खत्म हो गई थी.

अगले दिन फिर समिति के लोग उस के पास आए और कहने लगे, ‘‘मैडम, सारे निमंत्रणपत्र छप कर बंट चुके हैं. कार्यक्रम का एजेंडा भी तैयार है. वैसे भी, इस वैवाहिक मौसम में इतनी जल्दी कोई अच्छा सा रिजौर्ट नहीं मिल सकता. आप ही कुछ कीजिए, बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘अच्छा, मुझे कुछ वक्त दीजिए,’’ उस ने संक्षिप्त जवाब दिया था, ‘‘मैं कुछ सोचती हूं कि मैं क्या कर सकती हूं. कल सुबह मिलिए.’’

अगले दिन वे आए. उस ने कुछ निर्णय ले लिया था. उस ने स्पष्ट कहा, ‘‘3 दिन के 6 लाख रुपए किराया होता है. यदि आप इस के बिजलीपानी, साफसफाई और मेंटिनैंस आदि के खर्च वहन करें तो मैं अपनी स्वीकृति दे सकती हूं.’’

अध्यक्ष दीनदयाल के निर्देश पर कोषाध्यक्ष रमाशंकर तत्काल 50 हजार रुपए का चैक काटने लगे थे. उस ने रिजौर्ट के मैनेजर को बुला कर उसे रिसीव कराया और इस प्रकार वहां सामूहिक विवाह की तैयारी चलने लगी थी. सबकुछ शांतिपूर्वक निबट गया था. समिति के कोषाध्यक्ष रमाशंकर ने रिजौर्ट के प्रबंधक के कहने पर शेष खर्चों के

22 हजार रुपए का एक और चैक दे दिया था. संजय उस समय तो कुछ बोले नहीं लेकिन उन्हें सारी जानकारी मिल चुकी थी. शाम में जब समिति के कुछ पदाधिकारी उस से बात कर रहे थे, वे उस पर फट पड़े, ‘‘तुम बेवकूफ औरत, तुम्हें पता है कि पैसे कैसे आते हैं? जरा बाहर निकलो तो पता चले कि पैसा कमाना कितना कठिन है. तुम्हारी तरह ऐसे पैसे लुटाते रहे तो सारा कुछ खत्म हो जाएगा. बताओ कि इस घाटे की भरपाई कैसे होगी?’’

पलभर में ही उस का चेहरा स्याह हो आया था. कुछ शर्म से, कुछ ग्लानि से वह कुछ कह नहीं पा रही थी. इतने संभ्रांत लोगों के बीच उस की ऐसी बेइज्जती. वह एकदम से स्तब्ध थी. यह आदमी कितना काईंया और धूर्त है. उस ने कैसे इस के साथ इतने दशक बिताए थे. अभी भी उसे ही इंगित करते क्या कुछ कहे जा रहा है और उस के सामने सिवा चुप्पी ओढ़ने के उस के पास कुछ और है ही नहीं. उसे लगा कि यह धरती फटे और वह उस में समां जाए.

वह गलत कहां है, यह उसे सम?ा नहीं आ रहा था. इस धर्मसंकट में तो संजय ने ही उसे डाला था और अब वे रुपयों की दुहाई दे रहे हैं. औरतों का क्या यही जीवन है. जो बेटेबेटी थे, वे बड़े होते ही अपनी दुनिया में मस्त हो गए. और जो यह पति है, हमेशा एक पैर घर में, दूसरा हवाई जहाज में रखे रहता है, उसे भी उस की प्रतिष्ठा का जरा भी खयाल नहीं. तो फिर वह ऐसे घर में क्यों रहे जहां उस की बात का मान नहीं.

उस के अंतर्मन में जो ज्वालामुखी था वह यदि फटा तो उसे संभालेगा कौन? आरंभ से ही वह स्वाभिमानी प्रवृत्ति की रही. पिता का भी विशाल व्यापार था, जो उन के मरते ही उन के भाइयों के नाम हो गया था. अब जब उस ने कुछ जानकारी ली, तब उसे उस के एक भाई ने बताया कि पिता ने अपने जीतेजी दिल्ली के इस पौश इलाके में एक फ्लैट उस के नाम बुक किया था. इस से जो किराया आता था, वह उस के अकाउंट में ट्रांसफर होता था. संयोगवश, उस का किराएदार उसे खाली कर गया था.

उस ने मन ही मन कुछ निश्चय किया और दिल्ली चली आई. यहां अपने पिता के मित्र नारायणजी के घर वह कई बार आ चुकी थी. उस ने वहां बात की और फिर उस फ्लैट में शिफ्ट हो गई. यहां आ कर वह क्या करेगी, यह ज्वलंत प्रश्न था. बीएससी, बीएड की उस के पास डिग्रियां थीं और उसे पढ़ाने का शौक भी था लेकिन कभी उस के नौकरी करने की जरूरत नहीं समझ गई. नारायणजी ने अपने एक मित्र के दिल्ली के ही एक प्राइवेट स्कूल में उसे विज्ञान शिक्षिका की नौकरी दिलवा दी थी, जिस से उस का जीवन आराम से कटने लगा था.

संजय ने सुना तो वे दौड़े चले आए थे. मगर उस ने एक नहीं मानी थी. उस ने स्पष्ट कह दिया, ‘‘यह मेरा घर है. आप को भी रहना है तो यहीं रहिए लेकिन मैं जमशेदपुर नहीं जाने वाली. वहां का घर और सीता सुंदरी रिजौर्ट आप का है तो आप का ही रहे. मुझे उस से कोई मतलब नहीं है. मुझे भी अपनी स्वतंत्रता और अस्मिता चाहिए, जो मुझे यहां मिल रही है.’’

हम जब अपनी भावुकता में होते हैं, अपने ही लोग उस का नाजायज फायदा उठाने की कोशिश करते हैं. मगर जैसे ही हम सजगसतर्क होते हैं, उस से पीछा भी छूट जाता है. और यही हुआ. अब विगत 3 वर्षों से वह यहां रह रही है. तीनों बच्चे भी कभीकभार यहां चले आते हैं तो कोई बात नहीं. मगर वह कहीं नहीं जाती. उस के पास अब समय भी नहीं है.

वह कई ऐक्सरसाइज घर पर ही शौकिया कर लिया करती थी और यहां तो अब वह बिलकुल स्वतंत्र थी. खेलों, खासकर बैडमिंटन में उस की रुचि रही. अब अवसर मिला तो अकसर ही विद्यालय के प्लेग्राउंड में कभीकभार खेलती भी थी, खासकर, स्पोर्ट्स टीचर मनोरमाजी के साथ खास दोस्ती ही हो गई थी. इस के बाद तो उस ने सोसाइटी के भी प्लेग्राउंड के नैट पर नियमित बैडमिंटन खेलते अपनी अलग पहचान बना ली थी. अपनी स्टूडैंट लाइफ में उस का बैडमिंटन स्पोर्ट्स में कोई सानी नहीं था. मगर अब तो जैसे सारा कुछ जो छूट गया था, फिर पुनरावृत्त हो रहा था.

एक दिन अचानक मनोरमाजी ने उसे जानकारी दी कि प्रौढ़ों की एक संस्था ने दिल्ली की राज्य स्तरीय महिला बैडमिंटन प्रतियोगिता का आयोजन किया है. इस प्रकार उस ने बातबात में उस में प्रतिभागिता के लिए फौर्म भर दिया था.

उस ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि इस आयु में भी दिल्ली के राज्य स्तरीय महिला बैडमिंटन में वह कुछ इस तरह भागीदारी करेगी. प्रतियोगिता में उसी की आयु की कई महिलाएं थीं जो अपनी आयु वाली खिलाडि़यों के साथ खेल रही थीं. उसे फाइनल में भी जाने का अवसर मिल गया. आज का दिन उस के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण था. यह अलग बात थी कि यहां उसे, कम अंतरों से ही सही, हार खानी पड़ी और रजत पदक से संतोष करना पड़ा.

सभी उस से कुछ सहानुभूति सी जताने में लगे थे. वहीं, उसे इस बात की सराहना मिलनी चाहिए थी कि 53 साल की उम्र में वह इस मुकाम पर तब पहुंची है जब उस ने विधिवत कोई तैयारी नहीं की थी. उस ने तो बस विगत वर्षों के दौरान एक शौक के रूप में बैडमिंटन खेलना शुरू किया था कि यह मुकाम मिल गया. फिर भी बिना किसी भाव के वह हंस कर बोली थी, ‘‘मैं ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि इस उम्र में मैं किसी खेल में भागीदारी भी करूंगी. मैं ने तो इस खेल को खेलभावना से लिया. ऐसे में जो भी मुझे मिला, मुझे मंजूर है.’’

शाम को सोसाइटी मैनेजमैंट ने उस के रजत पदक जीतने के उपलक्ष्य में एक पार्टी का आयोजन किया था, जिस में सोसाइटी के लोगों ने भागीदारी की थी. कितने ही स्त्री, पुरुष, बच्चे उसे प्रशंसाभरी नजरों से देख रहे थे और वह उन के बीच एक रोलमौडल के रूप में उपस्थित थी.

कौन कहता है कि भीड़ सिर्फ राजनेताओं के इर्दगिर्द उमड़ती है. इस भीड़ को देख कर यह लगता है कि मनुष्य यदि सही है तो उस के प्रयासों के आगे भीड़ बिछने को बैठी रहती है. मगर उस ने तो यह भी कभी नहीं चाहा था. उस ने तो बस अपने आत्मविश्वास को बनाए रखने और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए यह राह निकाली थी.

साढ़े 5 हजार फ्लैटों वाले दिल्ली की इस सोसाइटी में जब वह रहने आई थी तो उसे कोई नहीं जानता था. झारखंड के उस शहर जमशेदपुर में पहली बार उस ने निर्णय लिया कि उसे अकेली ही रहना है तो यहीं रहेगी और पिछले 3 सालों से वह अकेली ही रह रही है. उस के फ्लैट में एक मेड आ कर सारा काम कर जाती थी. जब वह रात को लौटी तो वह वहीं थी.

‘‘अरे, तुम घर नहीं गईं?’’ उस ने सवाल किया, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘बात क्या होना है, मैम, आज आप को मैडल मिला है. इतनी बड़ी खुशी का दिन है. सो, आप को देखना चाहती थी,’’ सलमा बोली, ‘‘वहां सोसाइटी के हौल में इतना बड़ा जलसा हुआ, खानापीना हुआ. यह देख कर बहुत अच्छा लगा कि यह सब आप की शान में आयोजित किया गया है.’’

‘‘ओह, तो यह बात है. ठीक है, अब तुम चाहो तो जा सकती हो.’’

‘‘जी, अब जाऊंगी ही. मगर आप को देख कर मुझे बहुत खुशी मिली है.’’

‘‘अरे, ऐसा कुछ किया नहीं मैं ने. वह तो बस बातबात में सबकुछ होता चला गया था. खैर, तुम खुश हो तो मैं भी खुश हूं.’’

बैड पर पड़ी वह सोच रही थी कि आज वह इस मुकाम तक पहुंच गई, यह क्या कम है. सोसाइटी वाले उस की इज्जत करते हैं, पूरा सम्मान देते हैं और क्या चाहिए. इसी इज्जत और सम्मान के लिए तो उस ने शहर जमशेदपुर छोड़ा था, अपने पति के व्यापारिक साम्राज्य को तिलांजलि दे दी थी. बेटे बाहर सैटल हैं. जब किसी को उस की परवा नहीं तो वही सब की क्यों परवा करे.

उम्र भी तो कोई चीज होती है. मगर 55 वर्ष की उम्र इतनी ज्यादा नहीं होती कि कोई चीज नए सिरे से शुरू न की जा सके. यह क्या कम है कि वह अपने विद्यालय के बच्चों के अलावा सोसाइटी के बच्चों के बीच भी रोलमौडल के रूप में पहचान बना चुकी है. बच्चे उस से अपनी परेशानी साझ करते और वह उन्हें यथासंभव उस के समाधान बताती थी. यह उस के सुझावों का ही परिणाम था कि अनेक बच्चे गुटखातंबाकू से ले कर ड्रग्सड्रिंक्स तक के मकड़जाल से भी मुक्त हुए थे.

यहां उस ने अपनी पढ़ाई का पूरा सदुपयोग सा किया है. यहां रहने वाले बच्चे उस से अपनी पढ़ाई के सवाल पूछने आते हैं तो भरसक वह उन्हें सहयोग करती और दिशानिर्देश देती है. इस मामले में तो ये बच्चे उसे अपने अभिभावकों से भी ज्यादा उस की इज्जत करते हैं. उस के सुखदुख का पूरापूरा खयाल रखते हैं कि वह अकेली रहती है. मगर उन बच्चों को देख कर, उन से मिल कर उसे लगता है कि वह अकेली कहां है.

सोसाइटी का मैनेजमैंट अलग उस का खयाल रखता है. वह कई बार उन्हें समुचित सलाह देती और उन के मशविरे में शामिल भी होती है. यहां सारे न्यू ईयर डे, वैलेंटाइन डे, मदर्स डे, क्रिसमस, दीवाली, होली भी सामूहिक रूप से होते हैं, जिस से यहां एक अद्भुत समां बंध जाता है. ऐसे में अकेलेपन का आभास हो भी तो कैसे?

शुरू में उसे खूब सुनना पड़ा था,  ‘ओह, तो आप अकेले रहती

हैं. बच्चों के पास क्यों नहीं चली जातीं?’ और वह हंस कर रह जाती थी. अब सब को यह बताना जरूरी है क्या कि उस के पति कितने बड़े व्यापारी आदमी हैं. जब वह अपने पति के पास नहीं रही तो बच्चों के पास क्यों जाए और क्यों वह अपनी आजादी को, अपने अस्तित्व को बच्चों के हाथों में सौंप दे. वह कोई पुराने समय की सीता नहीं है. फिर वह उन बातों के लिए धरती में क्यों समाए जब उस ने कुछ गलत किया ही नहीं?

नौकरानी सलमा के जाने के बाद उस ने मेन डोर बंद किया और बैड पर जा गिरी. आंखें नींद से बो?िल थीं. मगर नींद जो थी, आ ही नहीं रही थी. नींद कहीं किसी अतीत में जो भटकने लगी थी. जीवन के जद्दोजेहद और प्रवाह में पता ही नहीं चला कि जीवन के 25 वर्ष कैसे निकल गए थे. मगर अब उसे अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं, संतुष्टि थी. यह तो कुछ ऐसा संयोग रहा कि वह इस राज्य स्तरीय महिला बैडमिंटन खेल प्रतियोगिता की उपविजेता बन कर सामने आ गई है. जो भी हो, आज वह खुश थी. बहुत खुश.

तभी मोबाइल की घंटी बजी. देखा, संजय का फोन था. लगता है किसी ने उसे बताया होगा. उस ने कुछ सैकंड सोचा, कौल को डिक्लाइन कर के फोन स्विच औफ कर दिया. आज वह बिना डिस्टर्ब हुए सोना चाहती थी. Inspirational Story

सवालों के जवाब ढूंढ़ रही थी.

एस्ट्रोनौमी विज्ञान की रोशनी – एस्ट्रोलौजी धूर्तों की साजिश

Astrology Scam: एस्ट्रोलौजी कमाई का धंधा है. एस्ट्रोलौजर बाकायदा विज्ञापन देते हैं, बड़े बोर्ड लगाते हैं, भरपूर पैसे लेते हैं ताकि लोगों का भविष्य सही करने के नाम पर वे ठगी कर सकें. धंधा लूट का है लेकिन धड़ल्ले से चल रहा है. सोशल मीडिया पर भी कई ऐसे एस्ट्रोलौजर सक्रिय हैं जिन के लाखों फौलोअर्स हैं. भाग्य बदलने का यह बिजनैस ऊंचाइयों पर है. लूटने वाले बेशर्म हैं तो लुटने वाले लुटा कर खुश हैं. सवाल यह है कि क्या एस्ट्रोलौजी पूरी तरह झूठ और लूट का धंधा है या इस में कुछ सच्चाई भी है?

भारत में एस्ट्रोलौजी हमेशा से बड़ा धंधा रहा है लेकिन इंटरनैट के सहारे आज यह एक बड़ा कमर्शियल धंधा बन चुका है. भाग्य बदलने के नाम पर लाखोंकरोड़ों का कारोबार हो रहा है. धंधा कोई भी तब तक बुरा नहीं होता जब तक वह अपने ग्राहकों को फायदा पहुचाएं लेकिन इस धंधे में फायदा एकतरफा होता है. ग्राहकों को सिर्फ झूठ परोसा जाता है. इस के बावजूद भारत का एस्ट्रोलौजी मार्केट

60 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का हो चुका है. डिजिटल प्लेटफौर्म्स, ऐप्स, सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम और यूट्यूब ने इसे और तेजी से बढ़ाया है.

धर्म ने इस धंधे पर शुरू से ही अपनी मोहर लगाई है क्योंकि धर्म खुद भविष्य बता कर भक्तों को फंसाता है. ज्योतिषी धर्म के मजबूत दलाल हैं.

कई एस्ट्रोलौजर बड़ेबड़े बोर्ड लगाते हैं, टीवी पर आते हैं सोशल मीडिया पर लाखों फौलोअर्स इन के हैं. कुछ सैलिब्रिटी एस्ट्रोलौजर के तो इंस्टाग्राम पर 1-2 मिलियन से ज्यादा फौलोअर्स हैं. यह लोग कंसल्टेशन, पूजापाठ, रत्न या यंत्र के नाम पर अच्छे पैसे वसूलते हैं. यह पूरी तरह से भाग्य बदलने का बिजनैस है, जहां लोग डर और उम्मीद के कारण लूटे जाते हैं. इन्हें इन के धर्मों ने भी बनाया है कि जो कुछ होना है उन के धर्म के ईश्वर की मरजी से होता है और कुछ लोग ही उस मरजी को पहले से जान सकते हैं. धर्मों ने ज्योतिषियों को खूब बढ़ावा दिया है क्योंकि इस से उन की काल्पनिक कहानियों को बल मिलता है.

इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक पर कई एस्ट्रोलौजर फ्री कंसल्टेशन दे कर ट्रस्ट बनाते हैं, फिर कुंडली में दोष, काला जादू और पूजापाठ के नाम पर हजारोंलाखों रुपए मांगते हैं. कई केस सामने आए हैं जिन में लोगों से 565 लाख रुपए तक ठगे गए हैं.

ज्योतिष कोई विज्ञान नहीं है. यह फार्च्यूनटैलिंग और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर ज्यादा टिका है. लोग अच्छी बातें सुन कर खुश होते हैं, बुरी सुन कर डरते हैं और उपाय के लिए पैसे देने को तैयार हो जाते हैं. उम्मीदों का खेल चलता है. लूटने वाले तो बेशर्म हैं ही, लुटने वाले भी कम बेशर्म नहीं क्योंकि ये लोग जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए शौर्टकट की तलाश में लगे रहते हैं.

मेहनत, शिक्षा या स्किल के जरिए बुरे वक्त को अच्छे में बदला जा सकता है, इस में किसी ज्योतिषी की जरूरत नहीं. राशिफल के नाम पर मूर्ख बनते लोग

सब से पहले आप यह जान लीजिए कि आज तक दुनिया का कोई भी ज्योतिष या एस्ट्रोलौजिस्ट तर्क और विज्ञान की कसौटी पर खुद को साबित नहीं कर पाया है, इसलिए एस्ट्रोलौजी या ज्योतिष एक अंधविश्वास के सिवा कुछ नहीं है. प्रतिदिन अखबारों में आप के व्यक्तिगत जीवन में कल क्या होगा, यह बताने वाला ज्योतिष उसी अखबार में कल देश में क्या होगा, क्यों नहीं बता देता? राशिफल की धूर्तता को सम?ाने के लिए हम एक दिन के राशिफल लेते हैं, अब उस में से 3 राशियों के बारे में ज्योतिषों ने क्या भविष्यवाणियां की हैं उन्हें देखते हैं.

1 मई, 2026 को दैनिक जागरण की वैबसाइट पर राशिफल आनंद सागर पाठक एस्ट्रोपत्री द्वारा दिए गए हैं. इन के अनुसार, 3 राशियों का ब्योरा कुछ इस तरह है.

मेष राशि

आज आप की राशि में सूर्यदेव की उपस्थिति से आत्मविश्वास सातवें आसमान पर रहेगा. ऊर्जा और साहस से कठिन कार्य सहजता से पूरे होंगे. निर्णय भावनाओं से प्रभावित हो सकते हैं. बुधदेव के अस्त होने से मानसिक भ्रम की स्थिति बन सकती है, इसलिए महत्त्वपूर्ण फैसलों में जल्दबाजी न करें.

कुंभ राशि 

तुला राशि के चंद्रमा भाग्य और उच्च शिक्षा के भाव को सक्रिय करेंगे. बड़ा विजन तैयार होगा और सोच आप को अलग पहचान दिलाएगी. भाईबहनों के साथ संवाद में कड़वाहट. यात्रा में सामान और दस्तावेजों का खयाल रखें.

तुला राशि

चंद्रदेव आप की राशि में गोचर कर रहे हैं. संवेदनशीलता और व्यक्तित्व निखरेगा. उपस्थिति से माहौल शांत और सुखद बनेगा. पार्टनर के साथ बातचीत में चुनौतियां. दूसरों को खुश करने में अपनी सेहत की अनदेखी न करें. व्यक्तिगत ब्रैंडिंग और विस्तार के लिए अच्छा दिन. मध्यस्थ की भूमिका निभा कर सहयोग बढ़ाएंगे. शुक्रदेव गहरे रिश्तों में स्थिरता लाएंगे. पार्टनर की जिद को धैर्य से संभालें. जौइंट ऐसेट्स या बीमा में प्रगति. मध्यम फलदायी दिन, निवेश में सतर्क रहें. पर्याप्त नींद लें. किडनी का खयाल रखें और तरल पदार्थ ज्यादा लें.

इन तीनों राशियों को आपस में बदल कर देख लीजिए, ये बातें ऐसी हैं कि किसी भी व्यक्ति को लगता है कि ये उसी के बारे में हैं. इस से यह साबित होता है कि राशि का गणित केवल लोगों को मूढ़ बनाने के लिए ही रचा गया है.

एक शोध में 10 लोगों को चुना गया, फिर उन सभी को अकेले एक कमरे में एक एस्ट्रोनौमर से मिलवाया गया. उस ज्योतिष ने सब को अलगअलग एकएक परचा थमा दिया. जब उन 10 लोगों ने अपनेअपने परचे को पढ़ा तो वे हैरान रह गए. उन्होंने बताया कि परचे में जो भी बातें लिखी हैं वे बिलकुल जैसे उन के जीवन की कहानी हों लेकिन जब उस परचे का रहस्य खोला गया तब वे हक्केबक्के रह गए. असल में उन सभी के अलगअलग परचों में जो 10-10 बातें लिखी थीं वे सभी के परचे में एकसमान थीं जो उन्हें पता नहीं था. सब को यही लगता था कि उन के परचे में लिखी बातें सिर्फ उन्हीं के बारे में हैं.

इस के पीछे का मनोविज्ञान यह होता है कि सभी मनुष्य अंदर से लगभग एकजैसे ही होते हैं. समस्याएं सब के पास होती हैं, मजबूरियां होती हैं, जिम्मेदारियां होती हैं, उम्मीदें और कोई न कोई महत्त्वाकांक्षा भी सभी के पास होती ही है. इंसान इन सभी बातों से उम्रभर जूझता है, इसलिए बहुत से मामलों में इंसान की परिस्थितियां एकजैसी होती हैं. इंसान के इसी मनोविज्ञान का फायदा एस्ट्रोलौजर उठाते हैं.

अगर ज्योतिषी आप से कहता है कि आप दिल के बहुत साफ इंसान हैं लेकिन कोई आप को समझता नहीं तो आप को यह बात अपने ऊपर 100 प्रतिशत फिट लगेगी लेकिन दुनिया में शायद ही ऐसा कोई इंसान हो जिस पर यह बात फिट न बैठे. ज्योतिषियों की सभी बातें ऐसी ही होती हैं. यही है ज्योतिष या एस्ट्रोलौजी की हकीकत. भविष्यवक्ता लोगों के भविष्य को बताने का पाखंड रचने के लिए ऐसी ही गोलमोल बातों का इस्तेमाल करते हैं और सदियों से करते रहे हैं.

नास्त्रेदमस की झूठी भविष्यवाणियों का सच

इंसान के इसी मनोविज्ञान का फायदा नास्त्रेदमस ने भी उठाया. वर्ष 1503 में फ्रांस के एक यहूदी परिवार में जन्मे माइकल डी नारदम जो बाद में नास्त्रेदमस के नाम से प्रसिद्ध हुए. नास्त्रेदमस जिस काल में पैदा हुए वह सामाजिक क्रांति का दौर था. रूढि़यां टूट रही थीं. धर्म की संस्थापनाओं पर सवाल खड़े किए जा रहे थे. चर्च की सत्ता को चुनौती मिल रही थी. इतिहास में 16वीं सदी का यह दौर बहुत ही क्रांतिकारी और परिवर्तनशील साबित हुआ क्योंकि इस दौर में कई महान लोग पैदा हो चुके थे. यह पुनर्जागरण का काल था. कोलंबस, लियोनार्डो, दा विंची जैसे लोग दुनिया की नई व्याख्याएं लिख रहे थे.

ऐसे ही दौर में एक धनी परिवार में नास्त्रेदमस पैदा हुए थे. 14 वर्ष की उम्र में उन्हें मैडिसिन की पढ़ाई के लिए भेजा गया और 21 वर्ष की आयु में वे एक अच्छे फिजिशियन बन कर लौटे. जिस समय वे डाक्टर बने उस समय फ्रांस में प्लेग की महामारी फैली थी. नास्त्रेदमस ने अपनी मैडिकल योग्यता से अनेक लोगों को ठीक किया. दूरदूर से लोग उन के पास आने लगे. उसी दौरान कुछ लोगों ने उन्हें मसीहा कहना शुरू कर दिया.

धीरेधीरे प्लेग का असर कम हुआ लेकिन लोगों ने मसीहा बता कर एक अच्छेखासे डाक्टर को मसीहा बनने पर मजबूर कर दिया और मसीहा बनने के चक्कर में नास्त्रेदमस ने अपनी उसी मैडिकल की कला को ही दांव पर लगा दिया जिस की वजह से लोगों ने उन्हें मसीहा साबित किया था.

नास्त्रेदमस काला जादू और ज्योतिष जैसी फुजूल बातों के चक्कर में पड़ गए और लोगों के भविष्य बांचने लगे. उन्होंने अपना वार्षिक पंचांग चालू किया. रात में अकेले बैठ कर बाबागीरी वाली नौटंकी करते और दिन में बताते कि उन के ऊपर रात में ईश्वर की कृपा होती है और ईश्वर उन के माध्यम से भविष्य की बातें बताता है. नास्त्रेदमस की इस तरह की नौटंकी पर कई लोगों ने यकीन भी कर लिया और उन्हें प्रोफेट यानी भविष्यवक्ता भी मानने लगे. प्लेग वापस लौटा और नास्त्रेदमस की बीवी और बच्चे इस महामारी का शिकार हो कर मर गए. इस से नास्त्रेदमस को प्रोफेट मानने वाले बहुत से लोगों का भ्रम भी टूट गया. कहने लगे यह कैसा रसूल है जो अपने बीवीबच्चों को ही नहीं बचा पाया.

इस हादसे के कई वर्षों बाद तक नास्त्रेदमस शांत रहे, दोबारा डाक्टरी का पेशा अपना लिया और एक अमीर लड़की से दूसरी शादी कर ली. बच्चे भी हुए. बुढ़ापे में उन में एक बार फिर से ज्योतिष की सनक जाग गई. इसी सनक में उन्होंने एक किताब लिखी ‘द प्रोमिसेस’. इस किताब में उन्होंने कोई बात स्पष्ट नहीं लिखी बल्कि ज्योतिष की बड़ीबड़ी डींगें मारने के लिए उन्होंने बेसिरपैर के दोहे गढ़ दिए. अपनी बातों को रहस्यपूर्ण बनाने के लिए उन्होंने अजीबोगरीब छंदों का सहारा लिया.

इस किताब में नास्त्रेदमस की कोई भी बात समय और तारीख के साथ नहीं है, इसलिए नास्त्रेदमस की एक ही बात को कई अलगअलग घटनाओं से जोड़ दिया जाता है. साथ ही, किसी भी घटना को नास्त्रेदमस की भविष्वाणी में साबित करने वाले लोग उन की बातों में फेरबदल करने से भी नहीं चूकते.

दुबई में खुली बड़ेबड़े एस्ट्रोलौजरों की पोल

दुबई की चमकतीदमकती दुनिया में जहां ऊंची इमारतें आकाश को छूती हैं और लग्जरी कारें सड़कों पर दौड़ती हैं, 28 फरवरी, 2026 को एक अनोखा समारोह हुआ. भारत के दिग्गज ज्योतिषी ‘इंटरनैशनल एस्ट्रोलौजी फैस्टिवल’ में दुबई पहुंचे थे. ये वे तथाकथित प्लैनेट्स के एक्सपर्ट थे जो मार्स, जुपिटर और सैटर्न की चाल देख कर राजनेताओं से ले कर बौलीवुड सितारों तक का भविष्य बता देते हैं लेकिन यही महान लोग खुद अपना भविष्य नहीं जान पाए और ऐसे संकट में फंसे कि कई दिनों तक भारत वापस आने के लिए बेचैन रहे.

दुबई में आयोजित ‘इंटरनैशनल एस्ट्रोलौजी फैस्टिवल’ में भारत के डीग जिले से ले कर दिल्लीमुंबई तक के नामी ज्योतिषी इकट्ठा हुए थे. मंच सजा हुआ था. ग्रहों की चाल पर व्याख्यान दिए जा रहे थे. शनि की साढ़ेसाती पर बहसें जारी थीं और राहुकेतु के प्रभाव से बच निकलने के टोटके बताए जा रहे थे.

कुछ ज्योतिषी ने ग्लोबल वार्मिंग को मर्करी यानी बुध ग्रह से जोड़ा तो कुछ ने विश्व शांति के लिए ग्रहों को कंट्रोल करने के उपाय सुझाए लेकिन भविष्य को देखने वाले इन एस्ट्रोलौजर्स को यह नजर ही नहीं आया कि अगले ही दिन उन का अपना भविष्य प्लैनेट्स नहीं ईरान की मिसाइलें तय करेंगी. एक ज्योतिषी तो इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने कहा विश्व में शांति आएगी क्योंकि ग्रह कभी झूठ नहीं बोलते लेकिन ग्रहों ने उन से ही नाराजगी जता ली.

उसी शाम इजराइल और अमेरिका ने ‘रोरिंग लायन’ के तहत ईरान पर हमला बोल दिया. ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या की खबर फैली और जवाब में ईरान ने खाड़ी देशों को निशाना बनाते हुए मिसाइलों व ड्रोन हमलों का सैलाब छोड़ दिया जो इस लेख के प्रकाशित होने तक चल रहा है और अमेरिका और इजराइल के साथ दुबई के पसीने भी छूटे हुए हैं.

29 फरवरी की सुबह दुनिया का सब से व्यस्त हवाईअड्डा दुबई इंटरनैशनल एयरपोर्ट पूरी तरह बंद कर दिया गया. मिसाइलों की दहशत के कारण सारे एयरपोर्ट बंद कर दिए गए. पूरा खाड़ी इलाका ‘नो फ्लाई जोन’ में बदल गया. हजारों यात्री फंस गए. इन में वे तमाम ज्योतिषी शामिल थे जो कल तक दूसरों का भाग्य सुधारने का दावा कर रहे थे. भारत के महान ज्योतिषी अब दुबई के होटलों में कैद हो गए. इन ज्योतिषियों की कुंडली होटलों के कमरों में कुंडली मार कर बैठ गई. ग्रहों ने तो भविष्य बता दिया था लेकिन इन के अपने चश्मे में धुंध थी.

यह घटना ज्योतिष की दुनिया में एक मजाक बन गई. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में एक ‘ट्रैवल एस्ट्रोलौजर’ ईरानी हमलों से ठीक पहले मिडिल ईस्ट को ‘हौटबेड औफ कौन्फ्लिक्ट’ बता रही थी लेकिन अब यह ‘हौटबेड’ इन्हें खुद ही भुगतना पड़ा. बाद में एयरपोर्ट धीरेधीरे खुले और ये ज्योतिषी वापस लौटे पर फिर ईरान ने सऊदी अरब, यूएई, कतर पर हमले शुरू कर दिए कि वहां अमेरिकी सेना के अड्डे हैं. सवाल यह है, क्या इस घटना से ये लोग सुधर जाएंगे? जनता की आंखें खुलेंगी?

ज्योतिष के नाम पर औरतों का शोषण

ज्योतिष पर अंधविश्वास करने वाले लोग कहते हैं कि ग्रहनक्षत्र सबकुछ तय करते हैं लेकिन जब ज्योतिषी खुद फंसते हैं या उन के असली चेहरे सामने आ जाते हैं तो उन की इस फर्जी विद्या की पोल अपनेआप खुल जाती है. इस से साफ पता चलता है कि यह सब अंधविश्वास और धोखे का खेल है.

मार्च 2026 में महाराष्ट्र के नासिक में एक मशहूर ज्योतिषी अशोक खरात को पुलिस ने गिरफ्तार किया. यह शख्स महिलाओं को समस्या हल करने के नाम पर बुलाता था, उन के साथ शारीरिक संबंध बनाता था. उस के औफिस और फार्महाऊस में छिपे कैमरे लगे थे. पुलिस को पेनड्राइव मिली जिस में 60 से ज्यादा औरतों के साथ अशोक खरात के अश्लील वीडियो थे. उस ने कई महिलाओं को ड्रग्स दे कर या डरा कर बारबार शोषण किया.

अशोक खरात के राजनीतिक लोगों और सैलिब्रिटीज से भी अच्छे संबंध थे. ज्योतिष के नाम पर लोगों का विश्वास जीत कर वह औरतों का शोषण करता था और मर्दों से धन ऐंठता था. जब एक महिला ने पुलिस से शिकायत की तो पूरा खेल खुल गया. यहां सवाल यह है कि यह इतना ही बड़ा ज्योतिषी था तो गिरफ्तार क्यों हुआ? कोई औरत उस की पोल खोल देगी, यह बात उसे पता क्यों नहीं चली? उसे पता होता कि उस के अश्लील वीडियोज पुलिस के हत्थे चढ़ सकते हैं तो वह ऐसे वीडियोज बनाता ही क्यों?

मार्च में पाकिस्तान पर हमले की भविष्यवाणी

मार्च 2026 में एक फेमस महिला ज्योतिषी ने सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दावा किया कि 21 मार्च, 2026 को भारत पाकिस्तान पर हमला करेगा. उन्होंने इस वीडियो में कहा कि पूरा योग है, इसलिए हमला तय है. उन्होंने लोगों को कैश, दवा, राशन स्टौक करने की सलाह दी. उन्होंने वीडियो में ईरान के बाद पाकिस्तान की बारी जैसी बातें कहीं. 21 मार्च आया और गया. कोई हमला नहीं हुआ. उस तारीख पर न कोई युद्ध और न ही कोई बड़ा टकराव हुआ. तारीख निकल जाने के बाद मैडम ने वीडियो डिलीट भी कर दिया.

मार्च से मई के बीच देश में कितनी ही बड़ी दुर्घटनाएं हुईं. कहीं नाव डूबी, कहीं भयंकर ऐक्सिडैंट हुए तो कहीं भयंकर आग में कई लोगों की जानें गईं लेकिन इन दुर्घटनाओं के बारे में किसी भी ज्योतिषी ने कोई भविष्यवाणी नहीं की. अगर ज्योतिष सच्चे होते तो उन्हें हर बड़ी दुर्घटना से पहले सटीक तारीख और घटना बतानी चाहिए लेकिन ऐसा कभी नहीं होता. पहले ये जमींदारों और अमीरों को लूटने का हथकंडा था, अब एस्ट्रोलौजी, बस, डर फैलाने और वायरल होने का जरिया बन गया है.

मार्च और अप्रैल में आर्थिक संकट व युद्ध के नाम पर कई ज्योतिषियों ने बड़ेबड़े दावे किए थे लेकिन सारे दाव टायंटायं फिस्स हो गए. राशिफल के नाम पर भी खूब मूर्ख बनाया जाता है. लाखोंकरोड़ों लोगों पर एकजैसी अटकलें लगाई जाती हैं जिन में कुछ तो मैच हो ही जाती हैं. यह संयोग है, सिद्धि नहीं.

एस्ट्रोलौजी और एस्ट्रोनौमी का फर्क

यूनिवर्स को समझने का बस एक ही मौडर्न तरीका है वह है एस्ट्रोनौमी. यह तथ्यों, प्रमाणों और साइंटिफिक रिसर्च पर टिका हुआ है लेकिन इतिहास में बंद कमरे में बैठे कुछ धूर्तों ने एस्ट्रोलौजी की ईजाद की जो ग्रहों की स्थिति से डरा कर लूटने का जरिया बन गई. एस्ट्रोनौमी वह है जिस के विकास के लिए गैलीलियो और कौपरनिकस जैसे लोगों ने यातनाएं सही और जियोर्दानो ब्रूनो जैसे लोगों को जिंदा जला दिया गया.

एस्ट्रोनौमी वह विज्ञान है जिस के तहत इंसान चांद पर पहुंचा और सौरमंडल से आगे निकला. स्पेस में तैनात हब्बल टैलीस्कोप हो या जेम्स वैब टैलीस्कोप, सभी एस्ट्रोनौमी की तरक्की की मिसाल हैं. धरती, उपग्रह, ग्रह, सुदूर के सौरमंडल, गैलेक्सी और यूनिवर्स की तमाम जानकारियां एस्ट्रोनौमी ने दी हैं लेकिन यूनिवर्स की इस खोज में एस्ट्रोलौजर का योगदान क्या है? एस्ट्रोलौजी का आप के भूत, वर्तमान, भविष्य आदि से कुछ लेनादेना नहीं है.

एस्ट्रोलौजी धूर्तों के दिमाग की उपज है. यह लोगों की कमजोरियों का फायदा उठा कर धन कमाने का धंधा है. जहां एस्ट्रोनौमी हमें आकाशगंगाओं की गहराई, ब्लैक होल्स और जीवन की उत्पत्ति के कारणों से रूबरू कराती है वहीं, एस्ट्रोलौजी ग्रहों की स्थिति से भविष्य बताने का जुमला मात्र है. ज्योतिष को किसी वैज्ञानिक परीक्षण की जरूरत नहीं पड़ती. जितने ज्योतिष उतने सिद्धांत. सब की अलग ढपली और अलग राग हैं. जो जितना बड़ा झूठ बोल सकता है वह उतना ही बड़ा एस्ट्रोलौजर है. असल में एस्ट्रोलौजी कोई प्राचीन ज्ञान नहीं बल्कि मानव मन की भ्रमपूर्ण कमजोरी के शोषण का जरिया है.

एस्ट्रोनौमी आधुनिक विज्ञान का एक मजबूत स्तंभ है. यह टैलीस्कोप, स्पैक्ट्रोस्कोपी और मैथमैटिकल मौडलों से यूनिवर्स को सम?ाने का तरीका है. 2023 में जेम्स वैब स्पेस टैलीस्कोप ने यूनिवर्स के शुरुआती मूवमैंट के नए डेटा भेजना शुरू किए जिस से बिगबैंग थ्योरी और ज्यादा मजबूत हुई. एस्ट्रोनौमी हमें बताती है कि ब्रह्मांड कोई जादुई रचना नहीं बल्कि प्राकृतिक नियमों का परिणाम है.

कार्ल सागन ने कहा था, ‘एस्ट्रोनौमी हमें ब्रह्मांड की सच्ची तसवीर देता है न कि कल्पनाओं की. यह हमें सशक्त बनाता है क्योंकि यह भविष्यवाणी नहीं देता बल्कि यूनिवर्स की समझ प्रदान करता है.’

एस्ट्रोलौजी प्राचीन बेबीलोनियन और यूनानी काल की उपज है जो जबरदस्ती ग्रहों को मानव जीवन से जोड़ती है. एस्ट्रोलौजी कोई विज्ञान नहीं बल्कि तब से चले आ रहे धूर्त ज्योतिषियों का धंधा है. वे कुंडली या राशिफल के नाम पर लोगों की आशाओं, अज्ञानता और उन के डर को कैश करवाते हैं.

रिचर्ड डाकिंस ने कहा था कि एस्ट्रोलौजी पोस्ट होक पर टिकी है. किसी भी घटना के बाद इसे फिट किया जा सकता है. आज तक यह किसी डबलब्लाइंड परीक्षण में सफल नहीं हुई. यह धूर्तों की उपज, इसलिए है क्योंकि यह बिना प्रमाण के पैसे वसूलती है. कुंडली या ग्रहों से बचाव के नाम पर लाखों लोग ज्योतिष के जाल में फंसते हैं.

धोखा है एस्ट्रोलौजी

2024 में कई तथाकथित महान ज्योतिषियों ने ग्लोबल घटनाओं के बारे में भविष्यवाणियां की थीं लेकिन सभी फेल हुए. अमेरिकी चुनावों के दौरान कई एस्ट्रोलौजर्स ने ‘ग्रहों की स्थिति’ के आधार पर डोनाल्ड ट्रंप की हार की भविष्यवाणी की लेकिन परिणाम उलटे आए. 2024 में कई ज्योतिषियों ने कहा था कि 2025 तक एलियन से संपर्क होगा. कुछ ने एआई तख्तापलट की बात की थी तो कुछ ने किसी बड़ी सुनामी की बात की थी. रूसयूक्रेन युद्ध हो या भारतपाकिस्तान के बीच का तनाव, ज्योतिष भविष्यवाणियां हर मामले में गलत ही रहीं.

एस्ट्रोलौजी न केवल धोखा है बल्कि मानव की तरक्की का दुश्मन भी है. यह जिम्मेदारी से दूर भागने का उपाय है. मंगल दोष के नाम पर न जाने कितनी शादियां टूट जाती हैं तो शनि साढ़ेसाती के चक्कर में लोग बरबाद होते हैं. कार्ल सेगन कहते हैं कि, ‘असाधारण दावों के लिए असाधारण प्रमाण चाहिए’ लेकिन एस्ट्रोलौजी के पास कोई प्रमाण नहीं. बिना किसी सुबूत के ज्योतिषी ग्रहों की चालढाल तय करते हैं और अमीरों से ले कर आम आदमी तक को लूटते हैं.

ज्योतिषियों की भरमार होते हुए भी देश पर आपदाएं आती हैं. आतंकी हमले होते हैं. तब कोई ज्योतिषाचार्य देश के काम नहीं आता. ऐसी किसी भी आपदा में सारे ज्योतिषी बिलों में छिप जाते हैं.

ज्योतिष से कोई देश आगे नहीं बढ़ता. देश आगे बढ़ता है स्वस्थ विचारों से और स्वस्थ विचारों का मतलब यह है कि समाज कितना वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है. जिस समाज में जिस अनुपात में साइंटिफिक टैंपरामैंट होता है वह समाज वैचारिक रूप से उतना ही स्वस्थ होता है लेकिन एक बीमार ?समाज कभी तरक्की नहीं कर सकता. सब से ज्यादा ज्योतिष भारत में हैं, फिर भी गरीबी, भुखमरी और खुशहाली के पैमाने पर हम सब से फिसड्डी हैं.

एस्ट्रोलौजर गिरोह बना कर काम करते हैं. कुछ किसी घटना के होने की भविष्यवाणी करते हैं, कुछ उस की उलटी भविष्यवाणी करते हैं. उन में से एक को तो सही होना ही है. दोनों में जो सही निकला, उस की बात दोहरा कर वे अपना धंधा चलाते हैं. सभी धर्मों में भविष्य की डींगें हांकी गई हैं लेकिन धर्मप्रचारक और ज्योतिषी उन बातों को छिपा जाते हैं. वे जानते हैं कि मूर्ख भक्त कहां इन ग्रंथों को पढ़ने वाले हैं. Astrology Scam

बच्चों को टैस्ट मशीन न बनाएं

Parenting Tips: पेरैंटिंग के माने और तौरतरीके हर दौर में बदलते रहे हैं लेकिन बच्चों को ले कर इतनी चिंता पहले कभी नहीं थी जितनी आजकल के पेरैंट्स में है. बच्चों की सेहत को ले कर खतरनाक स्तर तक की चिंता वह भी इतनी कि बेवजह पैथोलौजी तक पहुंच जाए, यह किसी चिंता का हल नहीं है बल्कि वक्त और पैसों की बरबादी के अलावा बच्चों में डर पैदा करने वाली बात है.

खुद पर तो प्रयोग करते ही रहते हैं  लेकिन सेहत के मामले में इंटरनैटी ज्ञान का कहर पेरैंट्स अपने बच्चे पर भी ढा रहे हैं. इन दिनों गूगल, एआई और तमाम सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स की आधीअधूरी और गलतसलत जानकारियों ने बजाय आसान करने के पेरैंटिंग को और मुश्किल व जटिल बना दिया है. नए दौर के पेरैंट्स का केयरिंग होना हर्ज की बात नहीं, लेकिन उन की हद और जरूरत से ज्यादा सुरक्षात्मक होने की आदत, जिसे मनोविज्ञान की भाषा में पेरैंटल ओवरप्रोटैक्शन कहते हैं, बच्चे के न तो शारीरिक विकास के लिए ठीक है और न ही मानसिक विकास के लिए ही.

हर किसी को ठीक वैसा ही इश्तिहारों वाला बच्चा चाहिए जो गोलमटोल होता है, हरदम ऐक्टिव रहता है, जिस के घुंघराले बाल होते हैं और जो आमतौर पर मुसकराता रहता है. वह रोता तभी है जब बेचने वाला कोई घुट्टी या ग्राइपवाटरनुमा कुछ बेचने के लिए बच्चे को हैरानपरेशान और बेचैन दिखाता रहता है. इन परेशानियों व तकलीफों से बच्चे को बचाने के लिए पेरैंट्स हर वह चीज खरीदते हैं जिसे विज्ञापन जरूरी बता देते हैं.

यह भी बहुत ज्यादा हर्ज की बात नहीं क्योंकि यह सब बच्चे के लिए आमतौर पर नुकसानदेह नहीं होता लेकिन सेहत के मामले में खुद को बच्चों का डाक्टर सम?ा और मान लेना जरूर बच्चे को खतरे में डाल सकता है. इस से भी ज्यादा खतरे की बात है बच्चे को खुद से पैथोलौजी ले जा कर तरहतरह की जांचें करवाना जो गैरजरूरी होती हैं. यह आदत जोखिम को कम नहीं करती, उलटे, बढ़ा सकती है क्योंकि एक गलत मैडिसन की तरह एक गलत जांच रिपोर्ट भी जानलेवा बन जाती है. अकसर डाक्टर उसी टैस्ट रिपोर्ट को आधार बना कर दवाएं लिख देते हैं जिस रिपोर्ट को पेरैंट्स उस के पास ले गए होते हैं.

भोपाल के वरिष्ठ पीडियाट्रिशियन

डा. ए एस चावला की मानें तो आमतौर पर बच्चों को बहुत ज्यादा पैथोलौजी टैस्ट्स की जरूरत नहीं होती लेकिन पेरैंट्स हर वक्त बच्चे की सेहत को ले कर आशंकित रहते हैं. उन्हें लगता है कि उन के बच्चे की शारीरिक व मानसिक गतिविधियां सामान्य नहीं हैं. सो, वे अपने वहम की पुष्टि के लिए बिना डाक्टर के निर्देश के पैथोलौजी जा कर तरहतरह की जांच करा लाते हैं.

कई पेरैंट्स तो इतने झक्की होते हैं कि एक पैथोलौजी से रिपोर्ट नौर्मल आए तो क्रौस चैक के लिए दूसरी में जा धमकते हैं. इस से कुछ हासिल नहीं होता. हां, वक्त और पैसे की जरूर बरबादी होती है व बच्चे पर भी गलत असर पड़ता है. जिसे दरअसल, इलाज की जरूरत होती है, अनावश्यक जांचों की नहीं.

कहीं मेरा बच्चा बीमार तो नहीं

न्यूक्लियर फैमिली के इस दौर में पेरैंट्स के लिए बच्चे से ज्यादा कीमती और अहम कुछ और नहीं क्योंकि 1 या 2 बच्चों से ज्यादा की बात कोई सोचता ही नहीं. दूसरे, मांबाप बनने की उम्र भी बढ़ रही है. आमतौर पर बच्चा 30 की उम्र के बाद ही पैदा किया जा रहा है. शहरी इलाकों में कामकाजी होने के चलते तो यह उम्र और बढ़ती जा रही है. भारत में भी अमेरिका और यूरोप की तरह बच्चा प्लान कर पैदा किया जा रहा है. यानी, बच्चा अब पहले की तरह होता नहीं है बल्कि बाकायदा प्लानिंग के तहत पैदा किया जाता है.

पेरैंट्स की यह सजगता अच्छी बात है लेकिन बुरी बात है अपने बच्चे को अकसर बीमार सम?ाना. एक बच्चे की अपनी दुनिया और मूड होता है जिस के तहत कभी वह खुश तो कभी उदास दिखता है, कभी कम खाता है तो कभी ज्यादा खाता है. दिक्कत बस, यहीं से शुरू होती है कि जरा सा भी बच्चे को सुस्त देखा या जरूरत से ज्यादा रोते देखा तो नए दौर के पेरैंट्स की जान निकलने लगती है. उन्हें लगता है कि बच्चे को कोई तकलीफ है और वह बीमार है. वे तुरंत भागते हैं डाक्टर के पास.

बातबात में डाक्टर के यहां भागने तक में भी हर्ज की बात नहीं, हर्ज की बात है बच्चे को विटामिन, प्रोटीन और कैल्शियम, यहां तक कि मिनरल्स भी इंटरनैटी नौलेज के तहत नाप कर देना. बुखार अगर 100 डिग्री छूने लगे तो यह मान लेना कि हो न हो, इन्फैक्शन हो गया है. डाक्टर का क्या है, वह तो नब्ज देख कर और स्टैथोस्कोप से छाती और पीठ टटोल कर पैरासिटामौल टाइप की दोचार टेबलेट लिख कर कह देता है कि चिंता की कोई बात नहीं. एकाधदो दिन में बच्चा ठीक हो जाएगा. बस, ये दवाएं वक्त पर देते रहें.

ये हैं गैरजरूरी जांचें

वक्त पर दवाएं देने से भी बच्चा एकदम ठीक नहीं होता तो पेरैंट्स को डाक्टर यानी पीडियाट्रिशियन में ही खोट नजर आने लगती है. मसलन, इन के यहां तो भीड़ उमड़ी रहती है, इसलिए 500-1,000 की फीस ले कर टरका देते हैं या फिर इस डाक्टर को ज्यादा एक्सपीरियंस नहीं लेकिन अगर दूसरे तीसरे ने भी यही किया तो क्या हम खुद ही पैथोलौजी जा कर टैस्ट करा लाते हैं जिस से बीमारी जल्द पकड़ में आ जाए और बच्चा ठीक हो जाए. इस में हर्ज क्या है क्योंकि दूसरीतीसरी बार जाएंगे तो खुद डाक्टर टैस्ट कराने के लिए कहेगा.

आखिर हम भी तो टैस्ट कराते हैं. आजकल तो डाक्टर देखता बाद में है, पहले दर्जनों टैस्ट प्रिसक्रिप्शन पर लिख देता है. बस, यहीं से शुरू होती है बच्चे की असल परेशानी जिसे वह बेचारा बीमारी और तकलीफ की तरह बयां नहीं कर पाता. इंटरनैट की मेहरबानी से हर कोई सामान्य जांचों के बारे में थोड़ाबहुत जानने लगा है जैसे कि सीबीसी यानी कम्पलीट ब्लड काउंट जिस से बीमारी खासतौर से वायरल इन्फैक्शन जल्द पकड़ में आ जाता है लेकिन सीबीसी की सलाह पीडियाट्रिशियन तभी देते हैं जब बच्चे का बुखार 5 दिन तक ठीक न हो.

बच्चे की कमजोरी और सुस्ती में भी यह जांच कराई जाती है लेकिन फर्क डाक्टर और पेरैंट्स के देखने व सम?ाने का होता है. पेरैंट्स को एकदो दिन की बीमारी या बुखार में ही बच्चा सुस्त और कमजोर दिखने लगता है लेकिन डाक्टर सप्ताहभर इंतजार करने के बाद यह सलाह देते हैं. अब दूसरेतीसरे दिन ही बिना डाक्टर के लिखे सीबीसी के लिए बच्चे को ले कर पैथोलौजी पहुंच जाना नादानी की बात है.

इसी तरह के दूसरे टैस्ट जो बहुत आम हो चले हैं ईएसआर और सीआरपी हैं जिन के फुलफौर्म भी अधिकतर पेरैंट्स नहीं जानते लेकिन यह ज्ञान उन्हें सहज प्राप्त है कि एनीमिया और निमोनिया जैसा खतरनाक इन्फैक्शन इन्हीं से पकड़ में आता है. सूजन, टीबी और दूसरी गंभीर बीमारियों को पहचानने के लिए भी इन्हीं का सहारा लिया जाता है लेकिन ये भी सीबीसी की तरह तब तक गैरजरूरी हैं जब तक पीडियाट्रिशियन न कहे. साधारण सर्दीखांसी और दोचार दिनों तक चलने वाले बुखार में ये जांचें नहीं करवानी चाहिए.

हैरानी की बात तो यह है कि ये टैस्ट किसी भी बीमारी का नाम नहीं बताते, सिर्फ बीमारियों की तरफ इशारा करते हैं जिन्हें बच्चे की हालत देख कर डाक्टर ही सम?ा सकता है और उसी के आधार पर इलाज व दवाएं तय करता है. चूंकि पैथोलौजी रिपोर्ट में गड़बड़ी वाले आंकड़े मोटे अक्षरों यानी बोल्ड लैटर्स में लिखे जाते हैं, इसलिए यह तो देखने वाले को सम?ा आता है कि वैल्यू नौर्मल नहीं है लेकिन इन से सिवा डाक्टर के, कोई और यह तय नहीं कर सकता कि बीमारी क्या हो सकती है.

कई बार ये वैल्यूज अस्थायी भी होती हैं, इसलिए खुद से बीमारी का अंदाजा लगाना और महज इसलिए बच्चे को सूई टुचवाना बेवकूफी है कि हम डाक्टर से पहले बीमारी जान लेना चाहते हैं.

50 हजार के लगभग पीडियाट्रिशियंस की सब से बड़ी संस्था आईएपी यानी इंडियन एकेडमी औफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइंस में भी साफसाफ कहा गया है कि स्वस्थ बच्चे की गैरजरूरी जांचें नहीं कराई जानी चाहिए. इन गाइडलाइंस, जो मैडिकल शब्दावली के चलते आम आदमी की सम?ा से बाहर हैं, के निर्देशों के मुताबिक ही डाक्टर टैस्ट की सलाह देते हैं.

मेरा बच्चा भूखा है

बच्चा ढंग से खापी नहीं रहा, यह चिंता 100 फीसदी पेरैंट्स को रहती है, फिर भले ही बच्चा अपनी जरूरत के मुताबिक डाइट ले रहा हो, पेरैंट्स को वह भूखा ही दिखता रहता है. वे चाहते हैं बच्चा हर वक्त कुछ खातापीता रहे, तभी स्वस्थ है. इसलिए खासतौर से मम्मियां हर वक्त उस के मुंह में कुछ न कुछ ठूंसती रहती हैं और अकसर बच्चे के उलटी कर देने तक उन्हें तसल्ली नहीं होती. कम डाइट का संबंध सीधे विटामिनों की कमी से जोड़ना हर भारतीय मांबाप की पहचान है, इसलिए वे जल्द ही महज शक के चलते विटामिन डी और बी 12 की जांच करवाने के लिए पैथोलौजी जा धमकते हैं.

इन दिनों थायराइड बीमारी की गिरफ्त में हरकोई आ रहा है जिस का ताल्लुक चूंकि वजन के घटनेबढ़ने और बच्चों के मामले में उस की ग्रोथ से ज्यादा है इसलिए यह टैस्ट भी महज अपनी तसल्ली के लिए पेरैंट्स करा रहे हैं. जबकि, बच्चों में बड़ों के मुकाबले थायराइड की बीमारी बहुत कम होती है.

आजकल वजन लेने की मशीनें घरघर में मौजूद हैं जिन में बच्चे को हर दोतीन दिन भाजीतरकारी की तरह तोला जाना भी आम है और जिस दिन बच्चे के वजन में किलोआधाकिलो का भी फर्क देखने को मिलता है उस दिन पेरैंट्स कूद कर इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि हो न हो, बच्चे को या तो थायराइड हो गया है या फिर डाइबिटीज की गिरफ्त में वह आ गया है.

ये आशंकाएं ऊपरी हवा की तरह होती हैं जिन का कोई वजूद नहीं होता. इस के बाद भी बच्चे को पैथोलौजी की हवा खिलाना उस के साथ ज्यादती ही है. बच्चा छोटा हो या बड़ा, एकाधदो दिनों तक उस के बारबार पेशाब करने की वजह या ज्यादा पानी पीने की वजह डायबिटीज ही है, यह सोच दरअसल, उस पेरैंटल ओवरप्रोटैक्शन की तरफ इशारा करती है जिस से बचने की सलाह कोई भी डाक्टर या पीडियाट्रिशियन देता है.

पीडियाट्रिशियन की सलाह पर ध्यान दें

आमतौर पर पीडियाट्रिशियन एलर्जी टैस्ट की भी सलाह भी तभी देते हैं जब अपने तजरबे और लक्षणों के आधार पर जरूरी सम?ाते हैं. इस सम?ा से न केवल असहमति बल्कि उसे खामखां में चुनौती देने की मानसिकता की देन है एलर्जी टैस्ट और उस में भी फूड एलर्जी टैस्ट कराना. बड़ों की तरह बच्चों का भी अपना टैस्ट होता है जो बदलता रहता है. इसलिए यह चिंता और टैस्ट दोनों फुजूल हैं कि बच्चा चूंकि खास किस्म का आइटम नहीं खा रहा है इसलिए हो न हो, उसे फूड एलर्जी ही हो गई हो जिस की जांच करा लेना कोई हर्ज की बात नहीं.

यही बात सामान्य एलर्जी पर लागू होती है, मसलन लगातार या बारबार छींक आना, स्किन पर रेशेज आना. ये बहुत आम लक्षण हैं जो वक्त रहते दूर हो जाते हैं. सो, बच्चों के एलर्जी टैस्ट दूसरे टैस्टों की तरह ही गैरजरूरी है और यह महंगा भी होता है.

दिल्ली के ग्रेटर नोएडा स्थित एक होलिस्टिक चाइल्ड केयर के चाइल्ड स्पैशलिस्ट डा. आशुतोष श्रीवास्तव की मानें तो बच्चों के बढ़ते पैथोलौजी टैस्ट चिंता का विषय तो इस लिहाज से हैं कि ये अकसर डाक्टरों की सलाह के बगैर करवाए जाते हैं. इस से एक बड़ा नुकसान डाक्टर और पेरैंट्स के बीच अविश्वास पैदा होने का भी है.

बकौल डा. आशुतोष, पेरैंट्स को बच्चों के डाक्टरों पर भरोसा रखना चाहिए. डाक्टर बहुत जरूरी होने पर ही पैथोलौजिकल टैस्ट्स की सलाह और हिदायत देते हैं. अधिकतर बीमारियां और परेशानियां दवाओं से ही ठीक हो जाती हैं. डाक्टरों को भी चाहिए कि वे पैथोलौजिकल टैस्ट्स की सलाह बहुत जरूरी होने पर ही दें.

बचें किड्स हैल्थ पैकेज से

मुमकिन है डा. आशुतोष का इशारा कम्पलीट चाइल्ड हैल्थ पैकेज जैसे पनपते ट्रैंड पर हो जो न केवल दिल्ली बल्कि तमाम मैट्रो शहरों के बाद अब बी टियर शहरों में भी देखने में आ रहा है. बड़ी और नामी पैथोलौजी लैब्स इन पैकेज को अलगअलग नामों से बेच रही हैं. इस के लिए प्रचार और इश्तिहारबाजी भी आम हो चली है.

ये पैकेज न केवल लुभावने बल्कि डरावने भी होते हैं जो अब औनलाइन भी चल रहे हैं. इन का मजमून ही पेरैंट्स को पैथोलौजी तक आने को उकसाने वाला होता है. इस में कहा जाता है कि क्या आप का बच्चा बारबार बीमार पड़ता है, क्या आप उस की हैल्थ व ग्रोथ को ले कर चिंतित हैं तो अब चिंता छोडि़ए और आइए हमारी लैब में जहां बच्चे की सभी जांचें भारी डिस्काउंट पर की जाती हैं, मसलन सीबीसी, थायराइड प्रोफाइल, विटामिन बी 12 और विटामिन डी सहित कैल्शियम और लिवर-किडनी फंक्शन टैस्ट, ब्लडशुगर और यूरिन रूटीन.

इन विज्ञापनों के मुताबिक इस पैकेज से फायदे ये हैं कि बच्चे की बीमारियों की जल्दी पहचान हो जाती है, डाक्टर को डायग्नोस करने में सहूलियत रहती है और आप खुद बच्चे की ग्रोथ व डैवलपमैंट की सही निगरानी कर सकते हैं. दर्दरहित सैंपल व घर से सैंपल लेने की सुविधा उपलब्ध है, कौल करें.

डर की इस दुकानदारी से पेरैंट्स को लगने लगता है कि क्या हर्ज है अगर दोचार हजार रुपए में बच्चे की सारी जांचें हो रही हैं. यानी, जरूरत होती नहीं, जरूरत पैदा की जाती है.

डाक्टर की सलाह पर जांच कराएं 

अब यह पेरैंट्स के सोचने व फैसला लेने की बात है कि क्यों अच्छेखासे सामान्य बच्चे के इतने सारे टैस्ट करवाए जाएं और उन के बच्चे की सेहत की चिंता ये पैथोलौजी लैब्स क्यों कर रही हैं. जाहिर है पैसा कमाने के लिए जिस में इस बात की कोई गारंटी नहीं कि टैस्ट रिपोर्ट्स सही ही होंगी. वाश बेसिन टैस्ट भी जम कर होते हैं. ऐसे में एक गलत रिपोर्ट पेरैंट्स को तनाव में और डाक्टर को भ्रम में डाल सकती है.

दूसरातीसरा हर्ज यह है कि इस से बच्चे के मन में स्थायी डर भी बैठता है. 80-90 फीसदी बच्चे सूई या इंजैक्शन से बेवजह नहीं डरते. उन्हें बारबार पैथोलौजी ले जाया जाए तो उन पर बुरा असर पड़ता है. उन्हें आगे चल कर नीडल फोबिया भी हो सकता है जिस से बचने के लिए वे लंबे समय तक अपनी परेशानी छिपा भी सकते हैं.

बच्चे बारबार पैथोलौजी ले जाने के चलते खुद को कमजोर भी समझने लगते हैं जिस से उन का आत्मविश्वास कम होता है. गलत रिपोर्ट पर डाक्टर अगर इलाज शुरू कर दे तो इस में खतरे ही खतरे हैं. सो, बेवजह गैरजरूरी जांचों से बच्चे को बचाएं और बिना डाक्टर की हिदायत के पैथोलौजी न जाएं. Parenting Tips

 

 

Mother Daughter Story: चिंता

सरिता, बीस साल पहले,

मई (द्वितीय) 2006

Mother Daughter Story: पद्मजा घर पर अकेली गुमसुम बैठी थीं. पति संपत कैंप पर थे तो बेटा उच्च शिक्षा के लिए पड़ोसी प्रदेश में चला गया था और बेटी समीरा शादी कर के अपने ससुराल चली गई. बेटी के रहते पद्मजा को कभी कोई तकलीफ महसूस नहीं हुई. वह बड़ी हो जाने के बाद भी छोटी बच्ची की तरह मां का पल्लू पकड़े, पीछेपीछे घूमती रहती थी. एक अच्छी सहेली की तरह वह घरेलू कामों में पद्मजा का साथ देती थी. यहां तक कि वह एक सयानी लड़की की तरह मां को यह सम?ाती रहती थी कि किस मौके पर कौन सी साड़ी पहननी है और किस साड़ी पर कौन से गहने अच्छे लगते हैं.

ससुराल जाने के बाद समीरा अपनी सूक्तियां पत्रों द्वारा भेजती रहती जिन्हें पढ़ते समय पद्मजा को ऐसा लगता मानो बेटी सामने ही खड़ी हो. उस दिन पद्मजा बड़ी बेचैनी से डाकिए की राह देख रही थीं और मन में सोच रही थीं कि जाने क्यों इस बार समीरा को चिट्ठी लिखने में इतनी देर हो गई है. इस बार क्या लिखेगी वह चिट्ठी में? क्या वह मां बन जाने की खुशखबरी तो नहीं देगी? वैसी खबर की गंध मिल जाए तो मैं अगले क्षण ही वहां साड़ी, फल, फूलों के साथ पहुंच जाऊंगी.

तभी डाकिया आया और उन के हाथ में एक चिट्ठी दे गया. पद्मजा की उत्सुकता बढ़ गई.

चिट्ठी खोल कर देखा तो उन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. कारण, चिट्ठी में केवल 4 ही पंक्तियां लिखी थीं. उन्होंने उन पंक्तियों पर तुरंत नजर दौड़ाई.

‘‘मां,

‘‘तुम ने कई बार मेरी घरगृहस्थी के बारे में सवाल किया, लेकिन मैं इसलिए कुछ भी नहीं बोली कि अगर तुम्हें पता चल गया तो तुम बरदाश्त नहीं कर पाओगी. मां, हम धोखा खा चुके हैं. वे शराबी हैं, जब भी पी कर घर आते हैं, मुझ से झगड़ा करते हैं. कल रात उन्होंने मु?ा पर हाथ भी उठाया. अब मैं इस नरक में एक पल भी नहीं रह पाऊंगी. इसलिए सोचा कि इस दुनिया से विदा लेने से पहले तुम्हारे सामने अपना दिल खोलूं, तुम से भी आज्ञा ले लूं. मुझे माफ करो, मां. यह मेरी आखिरी चिट्ठी है. मैं हमेशाहमेशा के लिए जा रही हूं, दूर, इस दुनिया से बहुत दूर.

-समीरा.’’

पद्मजा को लगा मानो उन के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो. ऐसा लगा मानो एक भूचाल आया और वे मलबे के नीचे धंसती जा रही हैं.

‘क्या यह सच है?’ उन के दिल ने खुद से सवाल पूछा, क्योंकि समीरा के लिए जब यह रिश्ता पक्का हुआ था तो वह कितनी खुश थी. समीरा फूली न समाई थी लेकिन ऐसा कैसे हो गया?

अतीत की बातें सोच कर पद्मजा का मन बोझलि हो गया. उन की आंखें डबडबाने लगीं.

वे फिर सोचने लगीं कि इस वक्त घर पर मैं अकेली हूं. अब कैसे समीरा के पास जाऊं? ट्रेन या बस से जाने पर तो कम से कम 5-6 घंटे लग ही जाएंगे. तभी उन के दिमाग में एक उपाय कौंध गया और तुरंत उन्होंने अपने पति के मित्र केशवराव का नंबर मिलाया.

‘‘भैया, मुझे फौरन आप की गाड़ी चाहिए. मुझे अभीअभी खबर मिली है कि समीरा की हालत बहुत खराब है. आप का एहसान कभी नहीं भूलूंगी,’’ केशवराव ने तुरंत ड्राइवर सहित अपनी गाड़ी भेज दी. गाड़ी में

बैठते ही पद्मजा ने ड्राइवर से कहा, ‘‘भैया, जरा गाड़ी तेज चलाना.’’

गाड़ी नैशनल हाईवे पर दौड़ रही थी. पीछे वाली सीट पर बैठी पद्मजा का मन बेचैन था. रहरह कर उन्हें अपनी बेटी समीरा की लाश आंखों के सामने प्रत्यक्ष सी दिखने लगती थी.

कार की रफ्तार के साथ पद्मजा के विचार भी दौड़ रहे थे. उन का अपना अतीत चलचित्र की भांति उन की आंखों के सामने साकार होने लगा.

‘पद्मजा,’ तेरे मुंह में घीशक्कर. ले, लड़के वालों से चिट्ठी मिल गई. उन को तू पसंद आ गई,’ सावित्री, उस की मां का मन खुशी से नाच उठा.

‘मां, मैं कई बार तुम से कह चुकी हूं कि यह रिश्ता मुझे पसंद नहीं है. मैं ने शशिधर से प्यार किया है. मैं उसी से शादी करूंगी. वरना…’ पद्मजा की आवाज में दृढ़ता थी.

‘चुप, यह क्या बक रही है तू. अगर कोई सुन लेगा तो एक तो हम यह रिश्ता खो बैठेंगे और दूसरे, तू जिंदगीभर कुंआरी बैठी रहेगी. मुझे सब पता है. शशिधर से तेरी जोड़ी नहीं बनेगी. वह तेरे लायक नहीं. हम तेरे मांबाप हैं. तुझ से ज्यादा हमें तेरी भलाई की चिंता है. हम तेरे दुश्मन थोड़े ही हैं,’ कहती हुई मां सावित्री गुस्से में वहां से चली गईं.

मां की बातों का असर पद्मजा पर बिलकुल नहीं पड़ा. उलटे, उस का क्रोध दोगुना हो गया. वह सोचने लगी कि वह मां मां नहीं और वह बाप बाप नहीं जो अपनी संतान की पसंद, नापसंद को न समझे. इस के साथ ही, उस ने कमरे का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया.

पद्मजा शुरू से ही तुनकमिजाज थी. उस में जोश ज्यादा था. जब भी कोई ऐसी घटना हो जाती थी जो उस के मन के खिलाफ हो तो तुरंत वह आपे से बाहर हो जाती. वह अगले पल अपने कमरे में जा कर अंदर से दरवाजा बंद कर लेती और पिता की नींद की गोलियां मुट्ठीभर ले कर निगल भी लेती थी.

सावित्री बेटी पद्मजा का स्वभाव अच्छी तरह से जानती थीं. इस से पहले भी एक बार मैडिकल में सीट न मिलने पर उस ने ब्लेड से अपनी एक नस काट ली थी. नतीजा यह हुआ कि उस की जान आफत में पड़ गई. सावित्री अपनी बेटी के व्यवहार पर नजर गड़ाए बैठी थीं. बेटी के अपने कमरे में घुसते ही उस ने यह खबर पति के कान में डाल दी. पतिपत्नी दोनों के बारबार बुलाने पर भी वह बाहर न आई. लाचार हो कर पतिपत्नी ने दरवाजा तोड़ दिया और पद्मजा को अस्पताल में दाखिल करा दिया.

आखिरकार, पद्मजा की शादी संपत के साथ हो ही गई. वक्त गुजरता रहा. वैवाहिक जीवन अच्छे से व्यतीत हो रहा था. बच्चे हुए. तुनकमिजाज पद्मजा पति के चरित्र पर शक करती रही थी. और एक दिन, उस ने पति को कठघरे में ला खड़ा कर दिया.

‘पद्मा, यह तुम क्या कह रही हो? तुम्हारी मूर्खता रोजरोज बढ़ती जा रही है. पढ़ीलिखी हो कर तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए.’ संपत बड़ी बेचैनी से पत्नी पद्मजा से बोला.

पद्मजा एकदम बिगड़ गई.

‘हां, पढ़ीलिखी होने की वजह से ही मैं आप से यह पूछ रही हूं. मेरे साथ अन्याय हो तो मैं क्यों बरदाश्त करूं? और कैसे बरदाश्त करूं? मैं पुराणयुग की भोली अबला थोड़े ही हूं कि आप अपनी मनमानी करते रहें, बाहर गुलछर्रे उड़ाएं, ऐश करें और मैं चुपचाप देखती रहूं. आप कभी यह न समझना कि मैं सीतासावित्री के जमाने की हूं और आप की हर भूल को माफ कर दूंगी. आखिर, मैं ने क्या भूल की है? क्या अपने पति पर सिर्फ अपना ही हक मानना अपराध है? दूसरी महिलाओं से नाता जोड़ने, उन के चारों ओर चक्कर काटने को क्या मैं चुपचाप देखती रहूं.’

‘वैसे पूछना गलत नहीं हो सकता लेकिन मैं ने वैसा किया कब था? यह सब तेरा वहम है. तेरे दिमाग पर शक का भूत सवार है. तेरी राय में मेरी कोई लेडी स्टेनो नहीं रहनी चाहिए. मेरे दोस्तों की बीवियों से भी मुझे बात नहीं करनी चाहिए, है न?’

‘ऐसा मैं ने थोड़े ही कहा है, जो कुछ मैं ने अपनी आंखों से देखा और कानों से सुना वही तो बता रही हूं. सच्चाई क्या है, मैं जानती हूं. आप के चिल्लाने से सच्चाई दब नहीं सकती.’

‘छि:, बहुत हो गया. यह घर रोजरोज नरक बनता जा रहा है. न सुख है, न शांति.’ चिढ़ता हुआ संपत बाहर चला गया. पद्मजा रोतीबिलखती बिस्तर पर लेट गई.

उस झगड़े के कई दिन बाद पद्मजा रोज की तरह उस दिन भी बाजार गई थी और वह सब्जी खरीद रही थी कि सामने एक ऐसा नजारा दिखाई पड़ा कि वह फौरन पीछे मुड़ी और बिना कुछ खरीदे ही घर लौट आई. संपत स्कूटर पर कहीं जा रहा था और पीछे कोई खूबसूरत लड़की बैठी थी. दोनों अपनी दुनिया में मस्त थे. आपस में बातें करते हुए, हंसते हुए लोटपोट हो रहे थे. बस, इसी दृश्य ने पद्मजा को उत्तेजित, पागल और बेचैन कर दिया.

आते ही पद्मजा ने प्लास्टिक की थैली एक कोने में फेंक दी और सीधा रसोईघर में घुस गई. अलमारी से किरोसिन का डब्बा उठा कर उस ने अपने शरीर पर सारा तेल उड़ेल लिया. बस, अब तीली जला कर आत्महत्या करने ही वाली थी कि बाहर स्कूटर की आवाज सुनाई पड़ी.

पद्मजा का क्रोध मानो सातवें आसमान पर चढ़ गया. उस के मन में ईर्ष्या ने ज्वालामुखी का रूप धारण

कर लिया.

‘अब मुझे मर ही जाना चाहिए. जीवनभर उसे 8-8 आंसू बहाते, तड़पतड़प कर रहना चाहिए,’ पद्मजा का दिमाग ऐसे विचारों से भर गया.

संपत को घर में कदम रखते ही मिट्टी के तेल जैसी किसी चीज के जलने की गंध लग गई. रसोई में झुक कर देखा तो ज्वालाओं से घिरी पद्मजा दिखाई पड़ी. संपत हक्काबक्का रह गया. वह जोश में आ कर रसोई का दरवाजा पीटने लगा और पद्मजा को बारबार पुकार रहा था. अंत में दरवाजा टूट गया. पद्मजा अस्पताल में भरती कराई गई. फिर बड़ी मुश्किल से वह बच पाई. पद्मजा को जब यह पता चला कि उस दिन संपत के स्कूटर के पीछे बैठी नजर आई लड़की कोई और नहीं वह तो संपत के ताऊ की बेटी थी, बस, पद्मजा का मन पश्चात्ताप से भर गया. उसे अपनी गलती महसूस हुई.

पद्मजा में अपने प्रति ग्लानि तब और बढ़ गई जब पति ने इलाज के दौरान जीतोड़ कर सेवा की. उसे बड़ी शरम महसूस हुई और अपनी जल्दबाजी, मूर्खता पर स्वयं को कोसने लगी.

दौड़ती कार के अचानक रुकते ही पद्मजा वर्तमान में आ गई. अतीत के सारे चलचित्र ओझल हो गए.

‘‘गाड़ी क्यों रोकी?’’ उस ने ड्राइवर से पूछा.

‘‘मांजी, यहां एक छोटा होटल है. सोचा, आप थक गई होंगी. प्यास भी लग गई होगी. क्या मैं आप के लिए थोड़ा ठंडा पानी ले आऊं?’’

‘‘नहीं, इस समय मुझे कुछ भी नहीं चाहिए. मुझे फौरन वहां पहुंचना है वरना…’’ बोलतेबोलते पद्मजा का गला भर गया. उस समय केवल समीरा ही उन के दिलोदिमाग पर छाई हुई थी.

पद्मजा पीछे सीट की तरफ झुक गई. खिड़की के शीशे नीचे कर देने से ठंडी हवा के झोंके भीतर आ कर मानो उस की थकावट दूर करते हुए सांत्वना भी दे रहे थे. बस, उस ने अपनी आंखें मूंद लीं.

कार शहर में पहुंच गई थी और रामनगर महल्ले की तरफ जाने लगी. पद्मजा मन ही मन सोचने लगी कि उस की बिटिया सहीसलामत रहे.

जैसा उस के मन में डर था, पद्मजा ने वहां ऐसा कुछ भी नहीं पाया था. वातावरण एकदम शांत था. गाड़ी के रुकते ही वह दरवाजा खोल कर झट से कूदी और भीतर की तरफ दौड़ पड़ी.

घर के भीतर खामोशी फैली हुई थी. सहमी हुई पद्मजा ने भीतर कदम रखा कि उसे ये बातें सुनाई पड़ीं. समीरा बोल रही थी. बेटी की आवाज सुन कर पद्मजा के सूखे दिल में मानो शीतल वर्षा हुई.

‘‘आप ने क्यों बचा लिया मुझे? एक पल और बीतता तो मैं फांसी के फंदे में झूल जाती और इस माहौल से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता.’’

‘‘समीरा,’’ यह आवाज पद्मजा के दामाद शेखर की थी.

‘‘मैं ने यह बिलकुल नहीं सोचा कि तुम इतनी सैंसिटिव हो. अरे, पतिपत्नी के बीच झड़प हो जाती है, झगड़े भी हो जाते हैं. क्या इतनी छोटी सी बात के लिए मर जाएंगे? समीरा, मैं तुम को दिल से चाहता हूं. क्या तुम यह नहीं जानतीं

कि मैं बगैर तुम्हारे एक पल भी नहीं

रह सकता?’’

‘‘आप जानते हैं कि मुझे शराबियों से सख्त नफरत है. फिर भी आप…’’

‘‘समीरा, मैं शराबी थोड़े ही हूं. तुम्हारा यह सोचना गलत है कि मैं हमेशा पीता रहता हूं. कभीकभी पार्टियों में दोस्तों का मन रखने के लिए थोड़ा पीता हूं. यह तो सच है कि परसों रात मैं ने थोड़ी सी शराब पी थी लेकिन तुम ने जोश में आ कर भलाबुरा कहा, मेरा मजाक उड़ाया और बेइज्जती की और मैं इसे बरदाश्त नहीं कर सका.

‘‘तुम पर अनजाने में हाथ उठाया, उस के लिए तुम जो भी सजा दोगी, मैं उसे भुगतने को तैयार हूं लेकिन ऐसी सजा तो मत दो, समीरा. इस दुनिया में तुम से बढ़ कर मेरे लिए कुछ भी नहीं है. तुम्हारी खातिर मैं शराब छोड़ दूंगा. प्रौमिस, तुम्हारी कसम, लेकिन बगैर तुम्हारे यह जिंदगी कोई जिंदगी थोड़े ही है.’’

शेखर के स्वर में अपनी बेटी के प्रति जो प्रेम, जो अपनापन था, उसे सुन कर पद्मजा मानो पिघल गईं. उन की आंखें भी भर आईं. वे अपनेआप को संभाल ही नहीं सकीं और तुरंत दरवाजे पर दस्तक दी.

‘‘कौन है?’’ समीरा और शेखर एकसाथ ही बेडरूम से बाहर आ गए.

मां को देखते ही भावुक हो समीरा दूर से ही ‘मां’ कहते हुए दौड़ आई और उन से लिपट गई.

‘‘यह क्या किया बेटी तू ने? तेरी चिट्ठी देखते ही मेरी छाती फट गई. मेरी कोख में आग लगाने का खयाल तुझे क्यों आया? यह तू ने सोचा कैसे कि बगैर तेरे हम जिएंगे?’’

‘‘मुझे माफ कर दो मम्मी, मैं ने जोश में आ कर वह चिट्ठी लिख दी थी. यह नहीं सोचा कि वह तुम्हें इतना सदमा पहुंचाएगी.’’

शेखर एकदम शर्मिंदा हो गया. उसे अब तक यह नहीं पता था कि समीरा ने अपनी मां को चिट्ठी लिखी है. उस की नजरें अपराधबोध से झुक गईं.

समीरा मां का चेहरा देख कर भांप गई कि उन्होंने चिट्ठी पढ़ने से ले कर यहां पहुंचने तक कुछ भी नहीं खाया है. समीरा ने पंखा चलाया, फिर मां और ड्राइवर को ठंडा पानी पिलाया. थोड़ी देर बाद वह गरमागरम कौफी बना कर ले आई. उसे पीने के बाद मानो पद्मजा की जान में जान आ गई.

वहां से जाने से पहले पद्मजा बेटी को सम?ातेबु?ाते बोली, ‘‘समीरा, शेखर को कमरे से बाहर बुला ला.’’

‘‘क्यों मां,’’ समीरा ने पूछा.

पद्मजा ने भांप लिया कि समीरा इस बात के लिए पछता रही है कि उस के कारण शेखर की नाक कट गई और अपनी सास के सामने वह शरम महसूस कर रहा है.

‘‘जा, उसे मेरे जाने की बात बता दे,’’ पद्मजा ने बड़े संक्षेप में कहा.

समीरा के भीतर जा कर बताते ही शेखर बाहर आया. भले ही वह पद्मजा की तरफ मुंह कर के खड़ा था, नजरें जमीन में गड़ी हुई थीं.

‘‘शेखर, समीरा की तरफ से मैं माफी मांगती हूं. उसे माफ कर दो.’’ सुन कर शेखर विस्मित रह गया.

पद्मजा अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोलीं, ‘‘वह शुरू से ऐसी ही है, एकदम मेरे जैसी. वह बहुत भोली है, बिलकुल बच्चों जैसी. उसे यह भी नहीं पता कि जोश में आ कर जो भी फैसला वह करेगी, उस से सिर्फ उस को ही नहीं बल्कि दूसरों को भी दुख होता है.’’

समीरा और शेखर दोनों पद्मजा की बातें सुन कर चौंक पड़े.

‘‘बेटी, तू पूछती थी न, मेरे शरीर पर ये धब्बे क्या हैं? ये घाव के निशान हैं जो जल जाने के कारण हुए. मैं ने तु?ो यह कभी नहीं बताया था, ये हुए कैसे? मैं सोचती थी, अगर बता दूं तो मेरे व्यक्तित्व पर कलंक लग जाएगा और मैं तेरी नजर से गिर भी सकती हूं. इसलिए मैं तु?ा से ?ाठ बोलती आई.

‘‘बेटी, अब मैं पछता रही हूं कि मैं ने यह पहले ही तु?ा से क्यों नहीं कहा. लेकिन मु?ो यह देर से पता चला कि बड़ों के अनुभव छोटों को पाठ पढ़ाते हैं. शुरू में मेरे भीतर भी आत्महत्या की भावना रहती थी. हर छोटीबड़ी बात के लिए मैं आत्महत्या कर लेने का निर्णय लेती थी. ऐसा सोचने के पीछे मु?ो वेदना या विपत्तियों से मुक्ति पा लेने के विचार की तुलना में किसी से बदला लेने या किसी को दुख पहुंचाने की बात ही ज्यादा रहती थी. कालक्रम में मेरा यह भ्रम दूर होता गया और यह पता चला कि जिंदगी कितनी अनमोल है.

शेखर, जो पहली बार अपनी सासुमां की जीवन संबंधी नई बात सुन रहा था, विस्मित हो गया. समीरा की भी लगभग यही हालत थी.

पद्मजा आगे बताने लगी.

‘‘दरअसल, मौत किसी भी समस्या का समाधान नहीं. मौत से मतलब, जिंदगी से डर कर भाग जाना, समस्याओं और चुनौतियों से मुंह मोड़ लेना है. यह तो कायरों के लक्षण हैं. कमजोर दिल वाले ही खुदकुशी की बात सोचते हैं. बेटी, बहादुर लोग जीवन में एक ही बार मरते हैं लेकिन बुजदिल आदमी हर दिन, हर पल मरता रहता है. जिंदगी जीने के लिए है, बेटी, मरने के लिए नहीं. सुखदुख दोनों जीवन के अनिवार्य अंश हैं. जो दोनों को समान मानेगा वही जीवन का आनंद लूट सकेगा. समीरा, यह सब मैं तु?ो इसलिए बता रही हूं कि अपनी समस्याओं का समाधान मर कर नहीं जीवित रह कर ढूंढ़ो. जीवन में समस्याओं का उत्पन्न होना स्वाभाविक है. दोनों ठंडे दिमाग से सोच कर समस्या का समाधान ढूंढ़ो.

‘‘मैं भी जोश में आ कर आत्महत्या कर लेने का प्रयास कई बार कर चुकी हूं. उन में से अगर एक भी प्रयत्न सफल हो जाता तो आज न मु?ो इतनी अच्छी जिंदगी मिलती, न इतना योग्य पति मिलता, न हीरेमोती जैसी संतानें मिलतीं और न इतना अच्छा घर. अपने अनुभव के बल पर कहती हूं बेटी, मेरी बातें सम?ाने की कोशिश करो. मुश्किलें कितनी ही कठिन हों, चुनौतियां कितनी ही गंभीर हों, आप अपने सुनहरे भविष्य को मत भूलें. आश्चर्य की बात यह है कि कभी जो उस समय कष्ट पहुंचाते हैं, वे ही भविष्य में हमारे लिए फायदेमंद होते हैं.

‘‘चलिए, अगर मैं ऐसा ही बोलती रहूंगी तो इस का कोई अंत नहीं होगा. जिंदगी, जिंदगी ही होती है,’’ बेटीदामाद से अलविदा कह कर वह जाने को तैयार हो गई.

पद्मजा के ओझल हो जाने तक वे दोनों उन्हें वहीं खड़ेखडे़ देखते रहे. पद्मजा के चले जाने के बाद जिंदगी के बारे में उन्होंने जो कहा था, उस का सार उन दोनों के दिलोदिमाग में भर गया. जैसे हर यात्रा की एक मंजिल होती है उसी तरह हर जिंदगी का भी एक मकसद होता है, एक लक्ष्य रहता है. यात्रा में थोड़ी सी थकावट महसूस होने पर जहां चाहे वहां नहीं उतर जाना चाहिए. मंजिल को पाने  तक हमारी जिंदगी का सफर चलता रहता है.

इस प्रकार समीरा के विचार नया मोड़ लेने लगे. अब तक की मां की वेदना उस की समझ में आ गई थी जिस ने चारों ओर नया आलोक फैला दिया था. अब वह पहले वाली समीरा नहीं रह गई थी. इस समीरा को तो जीवन के मूल्यों का पता चल गया था. द्य

इन्हें आजमाइए

1. पुराना टूथब्रश फेंकने से पहले उसे गैसस्टोव के कोने, कीबोर्ड, खिड़की की रेलिंग या मोबाइल कवर साफ करने में इस्तेमाल करें. छोटेछोटे हिस्सों की सफाई बहुत आसान हो जाती है.

2. जो काम, आइडिया या चिंता बारबार दिमाग में घूमती रहे, उसे तुरंत किसी डायरी में लिख लीजिए, दिमाग याद रखने के लिए नहीं, सोचने के लिए सब से अच्छा काम करता है.

3. बिना ट्रायलरूम जाए, कपड़ों को ट्राय करने के लिए हैंगर को गले में डाल लें, पता चल जाएगा कि वह कपड़ा आप के ऊपर कैसा लगेगा.

4. औनलाइन शौपिंग करते समय हमेशा रिव्यू सैक्शन में असली ग्राहकों की फोटो देखें. सही फिटिंग, रंग और फैब्रिक वहीं ज्यादा सही समझ आता है.

5. पढ़ते समय हमेशा पेन हाथ में रखें. सिर्फ पढ़ना दिमाग को निष्क्रिय बनाता है. लिखते हुए पढ़ना याद्दाश्त को कई गुना बढ़ा देता है.

6. ऐक्सरसाइज के बाद प्रोटीन और लाइट हैल्दी फूड लें. यह मसल्स रिकवरी और एनर्जी के लिए जरूरी है.

7. जूते काट रहे हों तो अंदर थोड़ा तेल या मौइस्चराइजर लगाएं, आराम मिलेगा. Mother Daughter Story

औफिस के काम को ले कर तनाव महसूस कर रहा हूं.

Mental Health: मैं 28 वर्ष का हूं और दिल्ली में रहता हूं. मैं एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंटैंट की नौकरी करता हूं. औफिस में काम का दबाव बहुत ज्यादा है, समय पर काम खत्म नहीं हो पाता और बौस की अपेक्षाएं भी लगातार बढ़ती जा रही हैं. इस के कारण मैं मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करता हूं और घर पर भी चिड़चिड़ापन बना रहता है.

इस के अलावा, मुझे यह भी चिंता रहती है कि क्या मैं अपने कैरियर में सही दिशा में जा रहा हूं या नहीं. कई बार नौकरी छोड़ने का मन करता है, लेकिन आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण ऐसा कर नहीं पाता. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इस स्थिति से कैसे बाहर निकलूं?

आप की स्थिति आज के समय में बहुत सामान्य होते हुए भी गंभीर है, क्योंकि लगातार काम का दबाव और बढ़ती अपेक्षाएं धीरेधीरे मानसिक थकान और चिड़चिड़ापन पैदा कर देती हैं. यह सब आप की कमजोरी नहीं, बल्कि आप की परिस्थितियों का परिणाम है.

जब काम समय पर पूरा नहीं होता और ऊपर से बौस का प्रैशर बढ़ता है तो दिमाग हमेशा तनाव में रहता है और उस का असर घर के व्यवहार पर भी दिखने लगता है. इसलिए सब से जरूरी है कि आप अपने काम करने के तरीके में थोड़ा बदलाव लाएं. काम को छोटे हिस्सों में बांट कर करें, एकसाथ सबकुछ खत्म करने की कोशिश न करें और बीचबीच में छोटे ब्रेक जरूर लें, इस से दिमाग को आराम मिलेगा और काम की गुणवत्ता भी बेहतर होगी.

इस के साथ ही, बौस से शांत तरीके से बातचीत करना भी जरूरी है ताकि आप को यह स्पष्ट हो सके कि कौन सा काम ज्यादा जरूरी है और किसे थोड़ा समय दिया जा सकता है.

जहां तक कैरियर की चिंता का सवाल है, अभी आप तनाव की स्थिति में हैं इसलिए हर चीज गलत लग रही है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि आप का कैरियर गलत दिशा में जा रहा हो. पहले यह सम?िए कि समस्या आप की नौकरी में है या आप के काम के माहौल में. अगर आप को अकाउंटिंग फील्ड पसंद है तो अपनी स्किल्स को बेहतर बना कर आप बेहतर अवसर पा सकते हैं और धीरेधीरे नई नौकरी के विकल्प भी तलाश सकते हैं, लेकिन बिना योजना के नौकरी छोड़ना सही कदम नहीं होगा, खासकर जब आर्थिक जिम्मेदारियां हों.

रिश्तेदारी और समाज में महत्त्व न मिलने से परेशान हूं.

मेरा बड़ा भाई कानपुर शहर में रहता है. वह मुझ से काफी ज्यादा संपन्न है. मैं 35 वर्ष का हूं और मैं भी कानपुर में अपने परिवार के साथ रहता हूं. मैं एक छोटा सा बिजनैस करता हूं जिस से घर का खर्च अच्छे से चल जाता है. भाई की अच्छी बड़ी कोठी है, महंगी गाड़ी है और समाज में उस की काफी पहचान भी है. जब भी हम किसी पारिवारिक समारोह या रिश्तेदारी में जाते हैं तो लोग मेरे बड़े भाई को ज्यादा महत्त्व देते हैं. उन की बातें ध्यान से सुनी जाती हैं, उन का सम्मान अलग स्तर पर होता है.

वहीं मुझे ऐसा महसूस होता है कि लोग मुझे उतनी अहमियत नहीं देते, भले ही मैं अपनी क्षमता के अनुसार ठीकठाक जीवन जी रहा हूं. मुझे यह बात अंदर ही अंदर परेशान करती है. मैं चाहता हूं कि रिश्तेदारी और समाज में मेरी भी एक अलग पहचान बने, लोग मुझे भी सम्मान दें और मेरी बातों को महत्त्व दें. कृपया बताइए कि मैं ऐसा क्या करूं जिस से मुझे भी समाज में उचित सम्मान और पहचान मिल सके?

जो आप महसूस कर रहे हैं वह बहुत स्वाभाविक है, खासकर तब जब तुलना अपने ही भाई से हो और सामने फर्क साफ दिखता हो लेकिन यहां एक जरूरी बात सम?ानी होगी- समाज में मिलने वाला सम्मान केवल पैसे या बड़ी कोठी से नहीं आता, बल्कि व्यक्ति के व्यवहार, सोच, आत्मविश्वास और लोगों के साथ उस के संबंधों से बनता है. आप के भाई की आर्थिक स्थिति बेहतर है, इसलिए लोगों का ध्यान स्वाभाविक रूप से उन की ओर जाता है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि आप के पास अपनी अलग पहचान बनाने का मौका नहीं है.

सब से पहले आप को अपने अंदर यह भावना मजबूत करनी होगी कि आप जो कर रहे हैं, वह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है. अगर आप खुद को कम आंकेंगे तो लोग भी आप को उसी नजर से देखेंगे. जब आप किसी समारोह में जाएं तो अपनी बात आत्मविश्वास के साथ रखें, बातचीत में भाग लें और अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त करें.

कई बार लोग उसी व्यक्ति को ज्यादा महत्त्व देते हैं जो खुद को आत्मविश्वास से प्रस्तुत करता है, चाहे उस की आर्थिक स्थिति कुछ भी हो. इस के साथ ही, अपने व्यवहार पर भी ध्यान दें- मृदुभाषी होना, दूसरों की मदद करना और रिश्तों को निभाना ऐसी बातें हैं जो धीरेधीरे लोगों के दिल में आप की जगह बनाती हैं.

आप अपने क्षेत्र में भी अपनी पहचान मजबूत कर सकते हैं. अपने बिजनैस को थोड़ा और बेहतर बनाने, नई चीजें सीखने या समाज में किसी सकारात्मक काम (जैसे सामाजिक सेवा, किसी आयोजन में सक्रिय भूमिका) से जुड़ने से आप की अलग छवि बनती है. जब लोग आप को एक जिम्मेदार, समझदार और सहयोगी व्यक्ति के रूप में देखने लगेंगे तो सम्मान अपनेआप मिलने लगेगा.

सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सम्मान मांगने से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व और काम से कमाया जाता

है. शुरुआत खुद से करें- अपने आत्मविश्वास को बढ़ाएं, अपनी पहचान को मजबूत करें और लोगों के साथ सकारात्मक तरीके से जुड़ें. Mental Health

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ईएमआई से तो बचाओ भाई

Hindi Stories: मध्यवर्गीय भारतीय की जिंदगी में लोन और ईएमआई का वही स्थान है जो संतफकीर के लिए दोहे व अमृतवाणी और नेताओं के लिए जुमले. फर्क बस इतना है कि दोहे शिक्षा और शांति देते हैं, नेताओं के जुमले समर्थकों को तात्कालिक सुकून दे देते हैं, जबकि ईएमआई कर्जदार के जीवन में स्थायी तनाव और बेचैनी भर देती है.

सांसारिक जीवन के चक्र में मनुष्य को लव और लोन दोनों के मायाजाल से हो कर गुजरना ही पड़ता है. लव के चक्कर में फंसे चेहरे पर मुसकराहट आती है जबकि लोन के चक्र में फंसे चेहरे से ईएमआई हर महीने औटोडैबिट के साथ मुसकराहट काट लेती है. सरकारी बाबू यह मान कर चलता है कि वह नौकरी कर रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि उस की नौकरी, घर, कार, सब ईएमआई की निष्ठापूर्ण सेवा में लगे हैं. वेतन मिलते ही बैंक का व्यवहार बिलकुल उस कुटिल सास जैसा हो जाता है जो मायके से सीमित दहेज और उपहार ले कर आई बहू के प्रति होता है.

उपभोक्ता का मोबाइल भी इस गठजोड़ में शामिल हो चुका है. हर महीने के आखिरी सप्ताह से ले कर अगले महीने की 10 तारीख तक तरहतरह के संदेश आने लगते हैं, ‘प्रिय ग्राहक, आप की ईएमआई की नियत तिथि निकट है. कृपया समय पर भुगतान करें. यदि कर दिया है तो इस संदेश को नजरअंदाज करें. देरी पर ब्याज बढ़ सकता है.’ जागरूकता के नाम पर बैंक द्वारा कर्जदार होने का स्मरण दिलाना भी किसी सूदखोर साहूकार की चेतावनी जैसा ही लगता है.

कर्जदार सोचता है कि जिस बैंक ने कभी लोन देने के लिए फोन पर मित्रवत अंदाज में मनुहार की थी वही बैंक अब पड़ोसी मुल्क की तरह सख्ती दिखाते हुए धमकाने लगा है. बैंकों की सक्रियता ऐसी है कि शायद वह दिन भी दूर नहीं जब शुभ दीपावली की जगह उपभोक्ताओं को शुभ ईएमआई दिवस के संदेश मिलने लगें.

पुरानी हिंदी फिल्मों में हीरोइन के रईस पिता द्वारा गरीब प्रेमी की जो खातिरदारी की जाती थी, कुछ वैसा ही प्रबंध आज बैंकों ने भी कर रखा है. ईएमआई न भरने पर वसूली के लिए हट्टेकट्टे बाउंसरों का प्रावधान इस कर्जकांड का नया अध्याय है. सरकारी सेवक की दिनचर्या अब बेहद सरल हो चुकी है- सुबह औफिस, शाम ईएमआई और रात को बैंक बैलेंस का अधूरा सपना.

बचपन में उस ने सुना था, कर्ज लेना बुरी बात है. अब उसे लगता है, ‘कर्ज ही तो जीवन की सब से स्थायी सच्चाई है.’ अंत में कर्जदार दर्पण में खुद को देख कर मुसकराता है, सोचता है- मैं सरकारी कर्मचारी हूं लेकिन असल में बैंक का आजीवन ग्राहक हूं. पद है स्थायी, वेतन है अस्थायी जबकि ईएमआई स्थायी है व अमर है. Hindi Stories

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