World Leaders : भारत हो या अमेरिका, ईरान हो या हो इजराइल, अब यह पक्का हो गया है कि जनता की सुखसमृद्धि से शासकों को कोई मतलब नहीं. उन्हें केवल अपने एजेंडे से मतलब है और वह या तो धार्मिक होता है या फिर सिर्फ धौंस जमाने वाला. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 3 साल से यूक्रेन से नाहक लड़ रहे हैं. उन की निजी इच्छा है कि वे यूरोप के सर्वेसर्वा बनें.

अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप की इच्छा है कि अमेरिका में गोरों का चर्च वाला राज फिर से लागू हो जिस में काले, भूरे, पीले लोग गुलामों की तरह काम करें.

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इजराइल की जमीन को फैलाने में लगे हैं जबकि उन का देश अच्छाखासा उन्नत हो गया है और उन्हें उन मुसलिमों को बुला कर काम कराना पड़ता है जिन को वे दुश्मन मानते हैं. दूसरी ओर ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनाई को सिर्फ कट्टर इसलाम बेचना है.

भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में भी धर्म सिर चढ़ा हुआ है. पाकिस्तान और बंगलादेश इसलाम को भुना रहे हैं जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदूरक्षक की अपनी छवि बरकरार रखने के लिए चालें चला करते हैं.

मतलब यह कि इन देशों के नेताओं को जनता के हितों की चिंता नहीं है. लोकतंत्र हो या धर्मतंत्र, शासक का 21वीं सदी में पहला काम जनता के लिए सुखसुविधाएं जुटाना है. यह काम जनता अब खुदबखुद करती है. चूंकि हर देशवासी जीना चाहता है, अच्छी तरह जीना चाहता है, लंबे समय तक जीना चाहता है इसलिए वह सरकारों को नहीं देख रहा क्योंकि सरकारें तो और कामों में बिजी हैं. सरकारें तो आम आदमी पर टैक्स थोप कर पैसा छीनती हैं और उसे धर्म या सेना पर खर्च करती हैं.

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